नोटबंदी पर अरविंद सुब्रमण्यम ने उठाए सवाल

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने नोटबंदी और जीडीपी के आंकड़ों में गड़बड़ी का इशारा किया है. उन्होंने सवाल उठाया है कि पुराने नोट बंद करने का अर्थव्यवस्था पर इतना कम असर पड़ा. इसका अर्थ है कि या तो जीडीपी की सही से गणना नहीं हो रही या फिर भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत लचीली है. उन्होंने संशोधित वृद्धि दर के आंकड़ों पर विवाद के बीच इसकी समीक्षा विशेषज्ञों द्वारा कराने की वकालत की है. अरविंद के मुताबिक, कुछ पहेली जरूर है, जिसे स्पष्ट किया जाना चाहिए.

‘लोग जो कहना चाहते हैं, कहें’

अरविंद सुब्रमण्यम ने हाल में अपनी नई किताब ‘ऑफ काउंसिल: द चैलेंजेस ऑफ द मोदी जेटली इकनॉमी’ में नोटबंदी की आलोचना की है. हालांकि जब उनसे पूछा गया कि क्या इस मामले में उनसे सलाह ली गई थी, तो उन्होंने इसका साफ जवाब नहीं दिया. अर्थशास्त्री की इस बात को लेकर आलोचना हुई थी कि सरकार के साथ काम करने के दौरान वह नोटबंदी पर कुछ नहीं बोले और अब अपनी किताब बेचने के लिए यह मामला उठा रहे हैं. इस पर पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने कहा कि लोग जो कहना चाहते हैं, कहें. अपनी नई किताब के जरिये वह उस पहेली बड़ी पहेली की ओर ध्यान खींच रहे हैं कि 86 प्रतिशत करंसी बंद हो जाती है और अर्थव्यवस्था पर काफी कम असर पड़ा है. उनकी किताब के अनुसार, नोटबंदी से पहले 6 तिमाही में औसत वृद्धि दर 8 फीसदी थी. बाद की सात तिमाहियों में यह 6.8 प्रतिशत दर्ज की गई.

‘जीडीपी की गणना बेहद तकनीकी काम, विशेषज्ञ ही करें’

केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने पिछले महीने 2004-05 के बजाय 2011-12 के आधार वर्ष का इस्तेमाल करते हुए यूपीए सरकार के जीडीपी आंकड़ों को घटा दिया था. इसमें नीति आयोग की भूमिका को लेकर काफी विवाद हुआ. अरविंद ने इस पर कहा है कि आंकड़े बनाने और उनपर चीजें स्पष्ट करने की मुख्य जिम्मेदारी विशेषज्ञों की है. जीडीपी की गणना काफी तकनीकी काम है और तकनीकी विशेषज्ञों को ही करना चाहिए. जिन संस्थानों के पास यह विशेषज्ञता नहीं है, उन्हें इससे दूर रखना चाहिए. उनका इशारा नीति आयोग की तरफ था.

‘RBI कैश रिजर्व का इस्तेमाल खजाने की लूट होगी’

अरविंद ने कहा कि राजकोषीय घाटा कम करने के लिए आरबीआई के रिजर्व का इस्तेमाल बैंक के खजाने की लूट होगी. सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक के बीच विवाद की खबरें सामने आई थीं. इस मामले में अरविंद ने आरबीआई की स्वायत्ता को देशहित में बताया है. उन्होंने कहा कि जब संस्थान मजबूत होते हैं तभी देश को भी फायदा होता है. देश में बढ़ती असहिष्णुता पर बोले, ‘दुनियाभर के देशों में देखा गया है कि अधिक सामाजिक शांति होने पर आर्थिक विकास भी बेहतर होता है.’

शर्मनाक : हवस के पुजारी

10 मार्च, 2016 की सुबह सैकड़ों लोग भोपाल के पौश इलाके टीटी नगर के कस्तूरबा स्कूल के सामने बने शीतला माता मंदिर के इर्दगिर्द इकट्ठा हो रहे थे. उस दिन वहां कोई धार्मिक जलसा नहीं हो रहा था और न ही यज्ञहवन या भंडारा था. भीड़ गुस्से में थी. कुछ लोगों के हाथ में लोहे के सरिए थे.

देखते ही देखते लोगों ने मंदिर के पीछे बनी दीवार तोड़ डाली, जो इस मंदिर के 58 साला पुजारी राजेंद्र शर्मा के घर की थी.

अभी भीड़ तोड़फोड़ कर ही रही थी कि दनदनाती हुई पुलिस की गाडि़यां आ खड़ी हुईं. पुलिस वाले नीचे उतरे और भीड़ को तितरबितर करने की कोशिश करने लगे, लेकिन उन के पास लोगों खासतौर से औरतों के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि जब परसों उन की बेटी की इज्जत इसी मंदिर में लुट रही थी, तब पुलिस कहां थी?

इस सवाल के जवाब से ज्यादा अहम पुलिस वालों के लिए यह था कि भीड़ पुजारी के घर को और ज्यादा नुकसान न पहुंचा पाए, लिहाजा, पुलिस वालों ने औरतों को समझाया और 4 लोगों को तोड़फोड़ और बलवे के इलजाम में गिरफ्तार कर लिया.

यों फंसाया शिकार

कस्तूरबा नगर में झुग्गीझोंपडि़यां भी काफी तादाद में हैं. यहां के बाशिंदों की अपनी अलगअलग परेशानियां हैं, जिन्हें दूर करने वे इस मंदिर में अपना माथा झुकाने आया करते थे.

मंदिर का पुजारी राजेंद्र शर्मा नकद चढ़ावा और प्रसाद बटोरता था और इस के एवज में भगवान की तरफ से गारंटी भी देता था कि यों ही चढ़ावा चढ़ाते रहो, आज नहीं तो कल जब भी तुम्हारी बारी आएगी, भगवान जरूर सुनेगा और परेशानी दूर करेगा.

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ऐसी ही एक हैरानपरेशान औरत ललिता बाई (बदला नाम) थी, जिस का पति जगन्नाथ प्रसाद (बदला नाम) शराब की लत का शिकार हो कर निकम्मा हो चला था.

नशे में धुत्त रहने वाले जगन्नाथ को घरगृहस्थी तो दूर की बात है, जवान हो रही बेटी आशा (बदला नाम) की भी चिंता नहीं थी कि वह 12 साल की हो रही है और जैसेतैसे 5वीं जमात तक पहुंची है.

ललिता की चिंता यह थी कि अगर पति ने नशा करना नहीं छोड़ा, तो बेटी के हाथ पीले करना मुश्किल हो जाएगा.

काफी समझाने के बाद भी जगन्नाथ की शराब की लत नहीं छूटी, तो ललिता उसे मंदिर ले गई और पुजारी राजेंद्र शर्मा के आगे अपना दुखड़ा रोया.

पुजारी राजेंद्र शर्मा तो मानो इसी दिन का इंतजार कर रहा था. उस ने ललिता को एक टोटका बता दिया कि रोजाना मंदिर में दीया लगाओ, तो जगन्नाथ की शराब की लत छूट सकती है.

इस मशवरे के पीछे इस पुजारी की मंशा यह थी कि जगन्नाथ के घर से रोज दीया रखने तो ललिता आने से रही, क्योंकि माहवारी के दिनों में औरतें मंदिर में पैर रखना तो दूर की बात है, नजदीक से भी नहीं गुजरतीं. ऐसे में जाहिर है कि कभी न कभी ललिता अपनी बेटी आशा को भेजेगी और तभी वह अपनी हवस की आग बुझा लेगा.

और ऐसा हुआ भी. 8 मार्च, 2016 की शाम को दीया रखने आशा आई, तो ललिता की तो नहीं, पर राजेंद्र शर्मा की मुराद पूरी हो गई. जैसे ही आशा ने दीया लगाया, तो राजेंद्र ने उसे मंदिर की एक परिक्रमा लगाने को भी कहा.

आशा ने मंदिर का चक्कर लगाया और मंदिर के सामने आ खड़ी हुई. इस पर राजेंद्र ने उसे एक और दीया मंदिर के भीतर आ कर लगाने को कहा. जैसे ही वह दीया लगाने मंदिर के अंदर गई, तो हवस के इस पुजारी ने उसे खींच लिया और इज्जत तारतार कर दी.

अपनी हवस पूरी करने के बाद राजेंद्र शर्मा ने रोतीकराहती आशा को धमकी दी कि अगर किसी को कुछ बताया, तो अंजाम अच्छा नहीं होगा.

घर आ कर आशा ने मां ललिता को अपने साथ मंदिर में हुई ज्यादती की बात बताई, तो ललिता का खून खौल गया. ललिता ने कुछ खास लोगों को बात बता कर सीधे थाने का रुख किया.

मंदिर की तरह थाने में भी ललिता की सुनवाई नहीं हुई और मौजूदा पुलिस वाले उसे टरकाने की कोशिश करते हुए रिपोर्ट लिखने में आनाकानी करने लगे, पर अब तक महल्ले के काफी लोग थाने के बाहर जमा हो चुके थे. लिहाजा, पुलिस को पुजारी राजेंद्र शर्मा के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट लिखनी पड़ी और उसे गिरफ्तार भी करना पड़ा.

दूसरे दिन 9 मार्च, 2016 को जैसे ही मंदिर में नाबालिग से बलात्कार की खबर आम हुई, तो लोगों ने जीभर कर पुजारी राजेंद्र शर्मा को कोसा, लेकिन यह कम ही लोगों ने सोचा कि मंदिर में बैठी शीतला माता ने क्यों नहीं आशा की इज्जत बचाई? क्यों फिल्मों की तरह उस का त्रिशूल उड़ कर राजेंद्र शर्मा की छाती में जा घुसा? क्यों किसी सांप ने आ कर उसे नहीं डसा, जो मंदिर में हैवानियत कर रहा था?

ऐयाशी के अड्डे

देवी ने कुछ नहीं किया, तो 10 मार्च, 2016 को गुस्साए लोगों ने ही इंसाफ करने की ठान ली, पर पुलिस बीच में आ गई, तो मामला आयागया हो गया.

लेकिन यह हादसा कई सच उजागर कर गया कि मंदिर बलात्कार करने के लिए महफूज जगह है, क्योंकि ये भगवान के घर हैं, इसलिए यहां कुछ गलत नहीं हो सकता. लेकिन हकीकत में मंदिर हमेशा से ही पंडेपुजारियों की ऐयाशी के अड्डे रहे हैं.

घनी बस्तियों में बने मंदिरों में तो दुकानदारी के खराब होने के डर से थोड़ाबहुत लिहाज चलता है, पर शहर से दूर सुनसान और नदी किनारे बने मंदिरों में शाम होते ही चिलम सुलग उठती है और गांजे के धुएं से पूरा माहौल ही गंधाने लगता है. दिनभर तो साधुसंत घरघर जा कर भीख मांगते हैं और शाम को अफीमगांजा और शराब के सेवन से अपनी थकान उतारते हैं.

भोपाल की बस्तियों में बने नाजायज मंदिरों पर कब्जा जमाने की नीयत से ज्यादातर पुजारी वहीं पर ही घर बना कर रहने लगे हैं, क्योंकि जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं और अहम बात यह कि अगर इलाका रिहायशी हो, तो दुकान खुद ब खुद चल पड़ती है.

लोग सुबहशाम मंदिर का घंटा बजाते हैं, पैसाप्रसाद चढ़ाते हैं और पुजारी की भी खासी इज्जत करते हैं, क्योंकि वही उन्हें बताता है कि किस उपाय से कौन सा दुख दूर होगा.

पति जगन्नाथ की शराब पीने की आदत तो इस से नहीं छूटी, उलटे नाबालिग बेटी की इज्जत देवी की आंखों के सामने तारतार होते लुट गई. इस से कुछ लोगों की आंखें खुलीं, तो उन्होंने बलवा कर डाला, जो समस्या का हल नहीं कहा जा सकता.

समस्या का हल है भगवान और उस का राग अलाप कर दोनों हाथों से पैसा बटोरते पंडेपुजारियों की असलियत समझना कि देवी या देवता कुछ नहीं कर सकते, लेकिन इन की आड़ में पुजारी जो न करे सो कम है.

सालभर मंदिरों में धार्मिक जलसे हुआ करते हैं. गरीबों से कहा जाता है कि भगवान सभी की गरीबी दूर करेगा. ऐसा होता तो अब तक देश में एक भी गरीब न बचता, लेकिन चढ़ावे के चक्कर में गरीब हर तरफ से लुटपिट रहा है और उन की औरतों की इज्जत ये पुजारी कैसे करते हैं, भोपाल की 2 वारदातों ने इसे उजागर किया है.

हालांकि आसाराम बापू जैसे भी नाबालिग लड़की की इज्जत अपने आश्रम में ही लूटने के इलजाम में जेल की सजा काट रहे हैं, पर उन से यह सबक कौन सीखता है कि मंदिर जाने से पाप नहीं धुलते, बल्कि पाप होने देने के मौके बढ़ जाते हैं.

यह भी बनी शिकार

दानदक्षिणा लेकर भक्तों के लोकपरलोक सुधरवाने का दावा करने वाले पुजारियों का खुद का लोक कितना बिगड़ा होता है, इस की एक और मिसाल भोपाल में ही 15 मार्च, 2016 को देखने में आई.

38 साला गोमती (बदला नाम) को उस के पति ने तलाक दे दिया था, इसलिए वह रोजगार और काम की तलाश में रायसेन से भोपाल चली आई और बाग दिलकुशा इलाके में किराए के मकान में रहने लगी. घर के पास बने मंदिर में गोमती रोज जाने लगी, तो पुजारी दुर्गा प्रसाद दुबे ने उसे अपनी बातों के जाल में फंसा लिया और 6 साल तक उस का जिस्मानी शोषण किया. इस के एवज में शादी का वादा भी किया.

पर जब दुर्गा प्रसाद दुबे का जी गोमती से भरने लगा, तो वह शादी के वादे से मुकरने लगा. घरों में झाड़ूपोंछा और बरतनकपड़े धो रही गोमती जैसेतैसे अपने जवान होते बेटे का पेट पालती थी. वह पुजारी की बीवी बनने का सपना देखने लगी थी. जब यह ख्वाब टूटा, तो वह भी सीधे थाने गई और पुजारी की ज्यादतियों और देह शोषण के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई. पुलिस ने दुर्गा प्रसाद दुबे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

घूंघट छोड़ अब पढ़ने जा रही हैं बहुएं

इसे बदलाव की बयार का ही नतीजा कहा जा सकता है कि जहां बेटियों को पहले पढ़ाने से परहेज किया जाता था, आज उन्हीं गांवों में बेटियों के साथ बहुएं भी स्कूलकालेज जा रही हैं.

राजस्थान राज्य में कोथून, बडली, महाचंदपुरा, बृजलालपुरा, गोपालपुरा, सांवलिया, खेड़ा लदाणा, टूमली का वास जैसे दर्जनों गांवों व ढाणियों की बहुओं ने अब घूंघट को छोड़ कर कलम थाम ली है.

अकेले जयपुर जिले के कोथून गांव की ही बात करें, तो यहां 30 से ज्यादा बहुएं पढ़ाई के लिए स्कूलकालेज जा रही हैं. इन में से तकरीबन आधा दर्जन बहुएं तो गांव के ही राजकीय उच्च माध्यमिक विद्दालय में पढ़ रही हैं, वहीं बाकी बहुएं चाकसू कसबे के निजी कालेज व स्कूलों में पढ़ने के लिए जा रही हैं.

ससुराल में रह कर पढ़ाई करने वाली बहुओं ने बताया कि उन का पढ़ाई में शुरुआत से ही मन था, लेकिन मायके के गांवों में प्राथमिक व उच्च प्राथमिक स्कूल नहीं होने व घर वालों ने आगे की पढ़ाई करने की इजाजत नहीं देने की वजह से वे आगे की पढ़ाई नहीं कर सकीं.

शादी के बाद जब वे अपनी ससुराल आईं, तो उन्होंने सासससुर से पढ़ने की इच्छा जताई. शुरुआत में नानुकर के बाद आखिरकार वे मान गए.

इस गांव में बहुओं को स्कूल भेजने की पहली शुरुआत सरपंच रह चुके श्योनारायण चौधरी के घर से हुई. उन्होंने अपने परिवार की एक बहू रीना का गांव के ही सरकारी स्कूल में दाखिला कराया.

शादी के बाद बहू रीना स्कूल जाती थी. साल 2011 में गौने के बाद जब बहू घर आई, तो उस ने आगे पढ़ने की इच्छा जताई. इस पर उन्होंने उस का दाखिला गांव के ही एक सरकारी स्कूल में करा दिया. इस के बाद उन के गांव समेत आसपास के गांवों व ढाणियों के लोग भी अपनी बहुओं को स्कूल भेजने लगे.

स्कूल जाने वाली बहुओं सावित्री, टीना, मंजू, संतोष वगैरह ने बताया कि वे भी शहरी लड़कियों की तरह पढ़लिख कर अपने परिवार का हाथ बंटाना चाहती हैं, जो तालीम से ही मुमकिन हो सकता है.

गांव की कई बहुएं तो पढ़लिख कर पुलिस और सरकारी टीचर की नौकरी भी कर रही हैं. इस काम में उन के पति व मां भी उन का साथ दे रहे हैं.

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पढ़ाई में अव्वल लाडो

एक लड़की पढ़ेगी, तो दो घर रोशन होंगे. इसे सरकारी व गैरसरकारी संगठनों की पहल का रंग कहें या लोगों की सोच में आया बदलाव, लड़कियों को तालीम दिलाने के मामले बढ़ रहे हैं. इसी पहल का ही नतीजा है, जो कई गांवों के सरकारी व निजी स्कूलों में लड़कों के बजाय लड़कियां ज्यादा पढ़ने आ रही हैं.

तालीम से जुड़े माहिर अफसर भी मानते हैं कि सरकारी स्कूलों में लड़कों की बनिस्बत लड़कियों का दाखिला ज्यादा है. स्कूलों में लड़केलड़कियों का यह आंकड़ा 30:70 का है यानी लड़कों के बजाय लड़कियां सरकारी स्कूलों में ज्यादा दाखिल हैं.

एक जमाने में गांवों में अपढ़ता के अंधकार के चलते बालिकाओं को घर से बाहर जाने के लिए उन के मांबाप परहेज करते थे, वहीं आज तालीम के प्रति सोच में आए बदलाव के चलते गांवों के लोगों में भी शहरों की तर्ज पर लड़कियों को स्कूल भेजने की दिलचस्पी बढ़ी है.

लड़कियों ने भी परिवार वालों के भरोसे का मान रखा है और पढ़ाई में टौपर बन रही हैं. पिछले सालों के शिक्षा विभाग के माध्यमिक व उच्च माध्यमिक बोर्ड के नतीजों में भी लड़कियां हमेशा आगे रही हैं. इसी तरह पहली से 9वीं व 11वीं जमात में भी लड़कियां पढ़ाई में अव्वल मानी जा रही हैं.

एक समय में स्कूल मेें पढ़ने वाली लड़कियों के लिए दूरदराज में स्कूल होने से कई किलोमीटर तक का सफर पैदल तय करना, स्कूलों में शौचालय की कमी व जरूरी सहूलियतें नहीं होने से लड़कियां पढ़ाई करते समय बीच में ही स्कूल छोड़ देती थीं. वहीं अब शिक्षा का अधिकार अधिनियम के साथ ही हर गांव व पंचायत हैडर्क्वाटर पर स्कूल खुलने से सरकारी व निजी स्कूलों में लड़कियों का दाखिला बढ़ रहा है.

इतना ही नहीं, गंवई व कसबाई लड़कियां अब खेलों में भी जिला, राज्य व नैशनल लैवल पर अपना दबदबा जमा रही हैं. ये लड़कियां तालीम के साथ ही खेल में भी अव्वल आ रही हैं.

जयपुर जिले की चाकसू तहसील के एक शिक्षा अधिकारी रमेशचंद शर्मा बताते हैं कि इलाके में 2-3 सालों से लड़कियों की तालीम के प्रति लोगों में जबरदस्त जागरूकता आई है. चाकसू बीईईओ क्षेत्र के ज्यादातर स्कूलों में छात्रों के बजाय छात्राओं का नामांकन ज्यादा है. चाकसू बीईईओ क्षेत्र के स्कूलों में लड़कों का दाखिला जहां 30 फीसदी है, वहीं लड़कियों का दाखिला दोगुना यानी 70 फीसदी है.

 शादी की खिलाफत

बाल विवाह यानी बचपन में होने वाली शादी को रोकने के लिए भले ही सरकारी कानून नकारा साबित हो रहा हो, लेकिन लड़कियां पढ़ाई की खातिर बचपन की शादी के खिलाफ माहौल तैयार कर रही हैं. वहीं कुछ लड़कियां शादी करने की खिलाफत कर रही हैं और हर मजबूरी बरदाश्त कर पढ़ाई को जारी रखने की कोशिश कर रही हैं. कई लड़कियां तो बुराइयों और रीतिरिवाजों को तोड़ कर बचपन में शादी की खिलाफत कर अपनी पढ़ाई कर रही हैं.

बडली गांव की रहने वाली 15 साल की अनीता कहती है, ‘‘जब मैं 7वीं जमात में पढ़ रही थी, तब घर वालों ने शादी कर देने की बात कही. मैं ने मना कर दिया, लेकिन घर वाले नहीं मान रहे थे. यह बात मैं ने अपने स्कूल में बताई, तो स्कूल की प्रिंसिपल ने घर वालों को पुलिस व कानून का डर दिखाया, तब जा कर घर वाले राजी हुए.’’

टोंक जिले के पीपलू गांव की रहने वाली मौसम की शादी तब तय कर दी गई, जब वह 8वीं जमात में थी.

मौसम ने जब इस बात की खिलाफत की तो आसानी से बात नहीं बनी, लेकिन मौसम ने भी हिम्मत नहीं हारी और खिलाफत जारी रखी. स्कूल के टीचरों के समझाने से आखिर घर वाले राजी हो  गए. अब मौसम 11वीं जमात में पढ़ रही है.

22 साल की सीमा के मांबाप की मौत एक हादसे में तब हो गई थी, जब वह महज 4 साल की थी. सीमा के पालनेपोसने की जिम्मेदारी उस के चाचाचाची पर थी. ये लोग चाहते थे कि उस की शादी जल्दी हो जाए.

चाचाचाची ने सीमा पर बड़ा दबाव बनाया, लेकिन वह शादी करने को तैयार नहीं हुई. उस ने चाचाचाची से अलग रह कर पढ़ाई करने का मन बनाया और आगे पढ़ती रही.

11वीं जमात में पहुंच कर सीमा ने गांव के दूसरे छोटे बच्चों को भी पढ़ाना शुरू कर दिया. इस से उसे अपने खर्च के लिए पैसे भी मिलने लगे.

पढ़ाई जारी रख कर एसटीसी का इम्तिहान पास किया, जिस से अब वह सरकारी टीचर है और खुद के गांव के ही स्कूल में पढ़ाती है. अब उस के चाचाचाची भी चाहते हैं कि वह उन के पास ही रहे और पढ़ाई पूरी करने के बाद ही शादी करे.

मददगार बनीं सरपंच

जयपुर जिले की चाकसू तहसील की ग्राम पंचायत टूमली का वास की सरपंच संतोष कंवर लड़कियों को तालीम का हक दिलाने की कोशिशों में जुटी हुई हैं. वे न केवल रोजाना स्कूल जा कर मुफ्त में क्लास लेती हैं, बल्कि घरघर जा कर लड़कियों के परिवार वालों को अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए बढ़ावा देती हैं.

लड़कियों का पढ़ाई के प्रति उत्साह बढ़ाने के लिए वे उन्हें कौपी, किताब, रबड़, पैंसिल वगैरह भी मुहैया कराती हैं. इतना ही नहीं, सरपंच संतोष कंवर स्कूल में सब से ज्यादा हाजिर रहने वाली लड़कियों को सार्वजनिक मंच पर इनाम भी देती हैं, ताकि सब लड़कियों की पढ़ाई व हमेशा स्कूल में हाजिर रहने की ललक बढ़े.

संतोष कंवर कहती हैं, ‘‘गांव में रहने वाली लड़कियों व उन के परिवार वालों में तेजी से जागरूकता बढ़ी है. जरूरत है इन को सही राह दिखाने की. पढ़ाईलिखाई के मामले में लड़कियों के साथसाथ उन के घर वालों को भी समझाना पड़ता है.’’

लड़कियों की पढ़ाईलिखाई व तरक्की की राह में रोड़ा अटकाने के लिए सामाजिक व धार्मिक बुराइयों को जिम्मेदार मानते हुए संतोष कंवर कहती हैं, ‘‘लड़कियों को तालीम दे कर ही आगे बढ़ाया जा सकता है. इस के लिए सब से पहले सामाजिक व धार्मिक बुराइयों की खिलाफत करना जरूरी है. इन बुराइयों का जाल तोड़ने से ही लड़कियों को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है.’’

वाकई जहां औरतें समझदार हैं, खासतौर से उन गांवों में तरक्की हो रही है. वहां सामाजिक व धार्मिक बुराइयों व परंपराओं को दरकिनार करते हुए लड़कियों के न केवल बाल विवाह रुक रहे हैं, बल्कि ऐसे गांवों की लड़कियां पढ़ाईलिखाई के मामले में भी काफी आगे बढ़ रही हैं.

अंग्रेजी के हौवा की हवा निकालती फिल्म ‘इंग्लिश की टांय टांय फिस्स’

आम तौर पर माना जाता है कि हर देश की पहचान उसकी सभ्यता संस्कृति और बोलचाल की भाषा से होती है. भारत की पहचान हिंदी भाषा है. लेकिन पश्चिमी सभ्यता व संस्कृति तथा विदेशी भाषा अंग्रेजी के दीवाने मानकर चलते हैं कि भारत देश व भारत के हर गांव का विकास अंग्रेजी भाषा से ही संभव है. क्या वास्तव में गांव के विकास के लिए हर गांव वासी का अपनी मातृभाषा को भुलाकर अंग्रेजी भाषा में निपुण होना आवश्यक है? इसी सवाल को हास्य व्यंग के साथ निर्माता संजीत कुमार ठाकुर व शिवप्रसाद शर्मा और निर्देशक शैलेन्द्र सिंह राजपूत ने ‘‘सिद्धिका सिने क्राफ्ट’ के बैनर तले बनी मनोरंजक फिल्म ‘इंग्लिश की टांय टांय फिस्स’  में उठाया है.

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मीनल म्हात्रे राजपूत लिखित फिल्म ‘‘इंग्लिश की टांय टांय फिस्स’’ की कहानी के केंद्र में एक प्रगतिशील गांव है, जहां का सरपंच गांव को आदर्श रूप देने में कोई कमी नही छोड़ना चाहता. उसका बेटा विदेश रहता है, जो एक दिन अपने दो विदेशी दोस्तों के साथ गांव आता हैं. इनमें एक लड़की भी है. इनका आमना सामना जब अंग्रेजी भाषा में अनपढ़ गांव वासियों से होता है, तो हास्य की दिलचस्प स्थितियां पैदा होने के साथ ही कई सवाल उठाती है. फिल्म में अहम सवाल यही है कि क्या अंग्रेजी भाषा का जानकार होने पर ही गांव का कायाकल्प हो सकता है?

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14 दिसंबर को ‘पेन एन कैमरा इंटरनेशनल’ के महमूद अली द्वारा पूरे देश में प्रदर्शित की जाने वाली फिल्म ‘‘इंग्लिश की टांय टांय फिस्स’’ से अभिनेता रोहित कुमार बौलीवुड में कदम रख रहे हैं. इसमें उनके साथ रूसी अभिनेत्री लिजन करिमोवा, मनोज जोशी, सुनील पाल,  गोविंद नामदेव, विजू खोटे व मुश्ताक खान अहम किरदार में हैं. फिल्म के सह निर्माता मनोज खंडेलवाल व संगीतकार संदीप श्री हैं.

जयपुर में शुरू हुआ अंतरराष्ट्रीय फिल्मों का जलसा

2009 में शुरू हुआ, ‘‘जयपुर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह’’ यानी कि ‘जिफ’ अब जयपुर की पहचान बन चुका है. 2013 तक हर साल फिल्मों के चयन का दायरा बढ़ाते हुए इस फिल्म फेस्टिवल ने भारत और विश्व में तब तहलका मचा दिया. जब 2013 में एक साथ 10 सिनेमाघरों में  217 फिल्मों की स्क्रीनिंग की गई. उस वक्त सभी के सामने यह चुनौतीपूर्ण  सवाल था कि ऐसा कैसे संभव हुआ? इसके बाद कई दिग्गजों द्वारा फिल्म समारोहों में ज्यादा से ज्यादा फिल्में दिखाने की होड़ मच गई.

तो दूसरी तरफ दूसरे वर्ष से ‘जिफ’ ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू किया. पर ‘जिफ’ ने कम मगर बेहतरीन फिल्मों को अपने फिल्म समारोह का हिस्सा बनाने पर जोर देना शुरू किया. अब जनवरी 2019 में संपन्न होने वाले ‘जिफ’ के लिए जारी दूसरी सूची में 43 देशों की 106 (भारत से 54 और विदेश से 52) फिल्मों का चयन किया गया है. इन फिल्मों का चयन 28 सद्स्यों के एक अंतर्राष्ट्रीय चयन बोर्ड ने किया है. चयनित फिल्मों की दूसरी सूची में 21 फीचर फिल्में, 9 डौक्युमेंट्री फिचर फिल्में, 6 लघु डौक्युमेंट्री फिल्में, 7 एनिमेशन शौर्ट फिल्में, 1 औडियो म्यूजिक, 48 लघु फिक्शन फिल्में, 6 मोबाइल फिल्में और 8 वेबसीरिज शामिल हैं. इनमें राजस्थान से 11 फिल्में भी शामिल हैं.

इससे पहले जारी पहली सूची में 124 फिल्मों की घोषणा की जा चुकी है. इस तरह अब फिल्मों की कुल संख्या 230 हो गई है. दोनों सूचियों की 230 फिल्में लगभग  103 देशों से प्राप्त 2221 आवेदनों में से चुनी गई हैं. जो की पिछले साल से 40 प्रतिशत ज्यादा हैं, यानि कि ‘जिफ’ की शुरूआत से अब तक यह पहला अवसर होगा. जब सबसे ज्यादा फिल्में दिखाई जाएंगी. इन फिल्मों में विश्व चर्चित फिल्मों से लेकर कई अवार्ड जीत चुकी फिल्में और नवोदित निर्देशकों की फिल्में देखने को मिलेंगी.

यह पांच दिवसीय फिल्म समारोह एक दर्शक के लिए किसी इंटरनेशनल पाठशाला से कम नही है. जहां वह एक तरफ विश्व की कला व संस्कृति से रूबरू होता है. वहीं मनोरंजन भी करता है. इसी के साथ उसे विश्व भर से आये फिल्मकारों व कलाकारों से रूबरू होने का अवसर मिलता है. वहीं फिल्म इंडस्ट्री के लोगों के लिए एक स्थान पर पूरे विश्व भर के फिल्म मेकर्स से संवाद करने का मौका मिलता है.

इस साल ‘जिफ’ में प्रमुखता से दुनियाभर के ऐसे देशों को भी मौका दिया गया. जो फिल्मों के क्षेत्र में अन्य देशों से फिल्म निर्माण में बहुत पीछे हैं. इनमें सर्बिया, तंजानिया, लेबनान, पेरु, नाईजीरिया जैसे देश शामिल हैं. जिफ में अमेरिका, रूस, चाइना, फ्रांस, कोरिया और स्विटजरलैंड जैसे देश भी शामिल हैं. भारत और बांग्लादेश को एक सम्मानजनक स्थान दिया गया है. जयपुर अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह का आयोजन 18 से 22 जनवरी 2019 को जयपुर में होगा.

फिल्म ‘गली ब्वायज’ पर बोलीं कल्कि कोचलीन

जोया अख्तर के निर्देशन में फिल्म ‘जिंदगी ना मिलेगी दोबारा’ और वेब सीरीज ‘मेड इन हैवन’ में अभिनय करने के बाद अभिनेत्री कल्कि कोचलीन अब जोया अख्तर के निर्देशन में फिल्म ‘गली ब्वायज’  करते हुए काफी उत्साहित हैं. फिल्म ‘गली ब्वायज’ में रणवीर सिंह, आलिया भट्ट और कुबरा सैट भी हैं.

फिल्म ‘गली ब्वायज’ की चर्चा करते हुए कल्कि कोचलीन कहती हैं, ‘फिल्म की लेखक व निर्देशक जोया अख्तर से मेरे बहुत अच्छे संबंध हैं. वह बेहतरीन लेखक व निर्देशक होने के साथ साथ स्पष्टवादी हैं. मैं तो उनके निर्देशन में बार बार काम करना चाहती हूं. फिल्म ‘गली ब्वायज’ रोचक फिल्म है. इसे हमने मुंबई के धारावी इलाके में फिल्माया है. यह फिल्म धारावी रैपरर्स और उनके कल्चर की बात करती है. मै इसमें संगीतकार की भूमिका में हूं, जो कि धारावी के रैपर के साथ एक गाना तैयार करती है. मैं इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित हूं.’

वीर दास के ‘‘नेटफ्लिक्स’’ शो का पोस्टर और ट्रेलर रिलीज

मशहूर स्टैंडअप कौमेडियन वीर दास ने अप्रैल 2017 में पहले भारतीय कौमेडियन के रूप में ‘नेटफ्लिक्स’ पर कौमेडी स्पेशल ब्रांड पेश कर इतिहास रचा था. इसके बाद ‘नेटफ्लिक्स’ ने उन्हें अपने दूसरे नेटफ्लिक्स स्पेशल शो के लिए आमंत्रित किया, जो कि अब ग्यारह दिसंबर को 190 देशों में एक साथ प्रसारित होगा. यह वीर दास की उपलब्धि है. क्योकि अब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता क्रिस रौक,  केविल हार्ट, अली वोंग आदि ही स्पेशल्स में ‘नेटफ्लिक्स’ पर नजर आए हैं.

इस बार वीर दास एक और शानदार कौमेडी स्पेशल ‘वीर दास लूजिंग इट विथ’ लेकर आ रहे हैं. अब इस नए शो का पहला ट्रेलर व पोस्टर भी आ गया है. इस शो की एक छोटी सी क्लिप के एक सेंगमेंट में वीर दास महिला उत्पीड़न के मुद्दे को संबोधित करते हुए ‘श्री वाज आसि्ंकग फौर इट’’ के सामान्य रूढ़िवादी जुमले को व्यंग्य के साथ दोहराते हैं. इस में कौमेडी का उपयोग करते हुए वीर समाज की मानसिकता के बारे में अत्यंत महत्वपूर्ण सवाल उठाते हैं.

इस शो की चर्चा करते हुए वीर दास कहते हैं- ‘‘हमारा शो ‘वीर दास लूजिंग इट विथ’ मेरी यात्रा के अनुभवों व राजनीति की समझ आदि के आधार पर लिखा गया है. इसके प्रदर्शन पर दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने के लिए मैं अत्यंत उत्साहित हूं. मुझे उम्मीद है कि इसे भी दर्शकों का वही प्यार मिलेगा, जो उन्होंने हमें पहले दिया था.’’

केदारनाथः स्तरहीन फिल्म

2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर में हुई बारिश की तबाही की पृष्ठभूमि पर अभिषेक कपूर एक प्रेम प्रधान फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ लेकर आए हैं. कमजोर कहानी,अति कमजोर पटकथा व घटिया निर्देशन के चलते यह एक अति सामान्य प्रेम कहानी वाली फिल्म बन कर रह गयी है. जिसमें न इश्क की गहराई है और न ही केदारनाथ की त्रासदी का दर्द ही है. अफसोस की बात है कि हम 2018 में यानी कि इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं, मगर लेखक व निर्देशक ने जिस तरह के घटनाक्रम रचे हैं, वह साठ व सत्तर का दशक याद दिलाते हैं.

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फिल्म की कहानी उत्तराखंड के केदारनाथ में रह रहे व केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित जी (नितीश भारद्वाज) यानी कि हिंदू परिवार की लड़की मंदाकिनी (सारा अली खान ) उर्फ मुक्कू और पिठ्ठू के कार्य में रत मुस्लिम युवक मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) की प्रेम कहानी है. मंदाकिनी और मंसूर दोनों क्रिकेट के दीवाने हैं.

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मंसूर के पिता भी इसी क्षेत्र में पिठ्ठू के रूप में काम किया करते थे. उनके नेक कारनामों के ही चलते केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी ने उन्हे मंदिर में पहुंचकर घंटी बजाने की इजाजत दे रखी थी. अब मंसूर भी हर दिन ऊपर चढ़कर एक बार मंदिर की घंटी बजा लेता है. मंसूर नेकदिल युवक है. यात्रियों को सकुशल मंदिर तक पहुंचाने के साथ साथ पैसे भी कम लेता है. इससे मंसूर की मां काफी परेशान रहती है.

उधर मंदाकिनी के पिता पंडित जी ने उसकी बड़ी बहन (पूजा गौर) की शादी मंदिर से ही जुड़े कल्लू (निशांत दहिया) नामक युवक से पांच साल पहले मंगनी कर तय कर दी थी. मगर पांच साल बाद कल्लू की जिद के चलते अब मक्कू उसकी मंगेतर है. पर खुद मंदाकिनी उर्फ मक्कू को कल्लू पसंद नही है. हर माह वह अपने पिता के पास अपना हाथ मांगने के लिए किसी न किसी युवक को भेजती रहती है.

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मंदाकिनी को जब भी केदारनाथ से रामगढ़ जाना होता, तो वह मंसूर को ही अपना पिठ्ठू चुनती. अल्हड़ स्वभाव की मंदाकिनी को मंसूर से प्यार हो जाता है. मंसूर अपनी तरफ से मंदाकिनी को समझाने का प्रयास करता है कि उन दोनों का मिलन संभव नहीं. मगर मंदाकिनी तो उसी के साथ पूरी जिंदगी बिताना चाहती है. यह प्रेम कहानी आगे बढ़ रही होती है, तभी मंदाकिनी की बड़ी बहन मंसूर से मिलकर कह देती है कि मंदाकिनी उसके साथ खेल खेल रही है. मंसूर, मंदाकिनी से दूरी बना लेता है. पर मंदाकिनी उसके पीछे पड़ी हुई है. एक दिन बारिश में मंसूर के घर के सामने भीगते भीगते मंदाकिनी बेहोश हो जाती है. रात हो चुकी है. मंसूर अपनी मां की आज्ञा का उल्लंघन कर उसे अपने घर ले आता है. इस बात की खबर कल्लू को लग जाती है.

कल्लू अपने हिंदूधर्म के साथियों व मंदाकिनी के पिता गुरू के साथ मंसूर के घर पहुंचता है. मंदाकिनी के पिता उसे अपने साथ ले जाकर गंगा नदी में खड़ा कर मंत्रों से उसका शुद्धिकरण करते हैं.

उधर मंसूर, मंदाकिनी के पिता से बात करने आता है, तो कल्लू व उसके साथी उसे अधमरा कर देते हैं. दूसरे दिन सुबह सुबह मंदाकिनी व कल्लू का विवाह करा दिया जाता है. पर विदाई से पहले मंदाकिनी ब्लेड से अपने हाथ की नस काट लेती है, विदाई टल जाती है. अचानक केदारनाथ में बारिश के रूप में तबाही आ जाती है. हर घर तबाह हो जाता है. लोग नदी में बहने लगते हैं. मंसूर अपनी जान पर खेलकर मंदाकिनी, मंदाकिनी के माता पिता सहित कई हिंदुओं की जान बचाता है. पर खुद मौत के मुंह में समा जाता है.

लेखक की कमजोरी के चलते कमजोर कहानी व घटिया स्तर की पटकथा ने फिल्म को तहस नहस कर दिया. प्रेम कहानी के साथ मैलोड्रामा काफी पैदा किया गया है. लेखक ने होटल, माल्स आदि के विस्तारीकरण के साथ पर्यावरण को क्षति पहुंचाने का मुद्दा इस तरह उठाया कि वह कहीं से भी उभर नहीं पाया.

बल्कि कहानी में भटकाव ही लाता है. इंटरवल से पहले यह फिल्म किसी भी सीरियल का एक अति सुस्त एपिसोड मात्र है, जिसमें कहानी कहीं आगे नहीं बढ़ती. इंटरवल के बाद फिल्म इतनी मैलोड्रामैटिक है कि उम्मीद नही जगाती. इतना ही नहीं लेखक व निर्देशक की अपनी बेवकूफियों के चलते 2013 में केदारनाथ व उत्तराखंड ने तबाही का जो मंजर देखा था, वह भी फिल्म में उभर नहीं पाता. सच यही है कि फिल्म में न इश्क की गहराई है और न ही केदारनाथ की त्रासदी का दर्द ही है. बेमन से बनाई गयी फिल्म है. जहां तक अभिनय का सवाल है तो सैफ अली खान व अमृता सिंह की बेटी सारा अली खान की तारीफ करनी ही पड़ेगी. सारा अली खान के करियर की यह पहली फिल्म है, पर वह पूरी फिल्म में खूबसूरत लगने के साथ ही अपने बेहतरीन अभिनय के चलते छा जाती हैं. सुशांत सिंह राजपूत ने काफी निराश किया है. लेखक व निर्देशक के बाद इस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोर कड़ी सुशांत सिंह राजपूत हैं. अमृता सिंह की प्रतिभा को जाया किया गया है.

फिल्म का गीत संगीत भी असरहीन है. फिल्म का सकारात्मक पक्ष इसकी लोकेशन है, जिसके लिए फिल्म के कैमरामैन तुषार कांति रे की जितनी तारीफ की जाए, उतनी कम है. तुषार कांति रे ने अपने कैमरे के माध्यम से हिमालय की खूबसूरती को बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है.

दो घंटे की अवधि वाली फिल्म ‘‘केदारनाथ’’ का निर्माण रौनी स्क्रूवाला, प्रज्ञा कपूर, अभिषेक कपूर और अभिषेक नायर ने किया है. फिल्म के निर्देशक अभिषेक कपूर, लेखक: अभिषेक कपूर व कनिका ढिल्लों, संगीतकार: अमित त्रिवेदी, कैमरामैन: तुषार कांति रे तथा कलाकार हैं – सुशांत सिंह राजपूत, सारा अली खान, नितीश भारद्वाज, सोनाली सचदेव, अलका अमीन, पूजा गौर, निशांत दहिया व अन्य.

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