उज्ज्वला फेल, लकड़ी व उपले पास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीसियों और घोषणाओं की तरह उज्ज्वला योजना के जरीए गांव में चूल्हे के कायाकल्प करने का दावा किया गया. 1 मई, 2016 से शुरू की गई इस योजना में गरीब परिवारों को एलपीजी गैस के मुफ्त कनैक्शन दिए गए.

सरकार दावा कर रही थी कि इस योजना के बाद गांवदेहात के घरों में लकड़ी के चूल्हों से छुटकारा मिल जाएगा, पर उज्ज्वला योजना में गैस के कनैक्शन जहां दिए गए वहां चूल्हे महज दिखाने के लिए ही हैं. ज्यादातर चूल्हों में जंग लग चुका है या फिर वे किसी ज्यादा पैसे वाले नातेरिश्तेदार के घर पहुंच चुके हैं.

गरीबी है अहम वजह

गांवों में ही नहीं, बल्कि शहरों की झुग्गियों में आज भी बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जो गरीबी में अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. उन को यह पता है कि धुएं से आंखें खराब होती हैं और सांस यानी दमे की बीमारी का खतरा होता है.

वाराणसी के रहने वाले इंदू शेखर सिंह कहते हैं, ‘‘गांव के रहने वाले ज्यादातर लोगों की हालत ऐसी नहीं है कि वे 500 से 1,000 रुपए का गैस सिलैंडर खरीद सकें. गांव में उन्हें लकड़ी या उपले मुफ्त में मिल जाते हैं. ऐसे में उन्हें लकड़ी और उपले ही सुलभ ईंधन लगते हैं. जिन लोगों के पास पैसा है भी, तो वे यह सोचते हैं कि अगर पैसा बचा लिया जाए तो क्या नुकसान है? यही पैसा किसी और काम में लग जाएगा. गैस के इस्तेमाल को गांव के लोग अभी भी जरूरत की नहीं, बल्कि विलासिता की चीज मानते हैं.’’

सस्ती और सुलभ हो

लखनऊ की नेहा सिंह अपना स्कूल चलाती हैं जिस में तमाम गांव के लोग अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजते हैं.

वे कहती हैं, ‘‘गांव के लोगों के पास पैसा पहले की तुलना में बढ़ा जरूर है, पर उसी अनुमात में महंगाई भी बढ़ गई है. घरेलू गैस के लिए खर्च करना उन को फुजूल का काम लगता है. जरूरत इस बात की है कि घरेलू गैस को सस्ता किया जाए और वह हर जगह मिल जाए. अभी तो लोगों को दूर जा कर सिलैंडर लेना होता है.’’

उज्ज्वला योजना के सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि सिलैंडर को दोबारा सही से भरने का काम नहीं हो रहा है. गैस कंपनियों के आंकड़े बताते हैं कि 60 फीसदी गैस सिलैंडर दोबारा ढंग से नहीं भर पाते हैं.

आमदनी के साधन बढ़ें

दलितों व गरीबों के गांवों में अभी भी 60 से 80 फीसदी आबादी लकड़ी और चूल्हे पर ही खाना बना रही है. जिन बड़े परिवारों में घरेलू गैस का इस्तेमाल होने लगा है, वहां भी पूरा खाना घरेलू गैस पर नहीं बनता है.

ऐसे तमाम घरों में चायनाश्ता या घर की लड़कियां और नई बहुएं घरेलू गैस पर भले ही खाना या नाश्ता बना लें, पर बड़े घरों में भी पारंपरिक खाना चूल्हे पर ही बन रहा है. ऐसे में पैसे की कमी के साथसाथ जानकारी की कमी भी इस के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है. इस की वजह एक ओर पैसों की कमी तो दूसरी ओर मुफ्त की लकड़ी और उपले हैं. अगर गांव के लोगों को भी लकड़ी और उपले खरीदने पड़ें तो वे पारंपरिक चूल्हों को बंद कर घरेलू गैस का इस्तेमाल शुरू कर सकते हैं.

डायन…डरावना अंधविश्वास

यूरोप के अंधकार युग के समय वहां की ज्यादातर जवान लड़कियों को डायन करार दे कर जला कर मार डालने की वारदातों का जिक्र आज भी इतिहास के पन्नों में पढ़ने को मिलता है. उस समय इस के खिलाफ आवाज उठाने वालों को डायन कह देना धर्म के नेताओं के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी.

जरमनी, इटली और फ्रांस के साथसाथ इंगलैंड जैसे देशों में सैकड़ों बेकुसूर लोगों खासकर औरतों और कम उम्र की लड़कियों को डायन बता कर उन पर जोरजुल्म किया जाता था और आखिर में उन्हें आग के हवाले कर दिया जाता था.

जिन लड़कियों पर जोरजुल्म किया जाता था, उन्हीं में से एक थी जोवन आव मार्क, जो हमलावर अंगरेजों के हाथों फ्रांस को बचाने के मकसद को ले कर जंग में कूद पड़ी थी और 5 सालों के अंदर कट्टर मुक्तिवाहिनी बनाने वाली जोवन आव मार्क को अंगरेजी हुकूमत की सेनाओं द्वारा डायन बता कर जला कर मार दिया गया था.

आज हम सभी 21वीं सदी में हैं और आज के वैज्ञानिक युग में भारत के पूर्वोत्तर राज्यों खासकर असम में एक के बाद एक डायन बता कर हत्या कर देने की दिल दहला देने वाली वारदातें रुकने का नाम नहीं ले रही हैं.

डायन क्या है

डायन एक तरह का अंधविश्वास है. अलौकिक शक्तियों के सहारे किसी का बुरा करने वाले मर्द और औरतें, जो भविष्य की बातें करते हैं, अपना रूप बदल सकते हैं और जिस तरह का काम हो, उस का वे समाधान करने का दावा करते हैं.

इस तरह के लोग कई समुदायों से देखने और सुनने को मिलते हैं. इन्हें ही डायन कहा जाता है.

हमारे देश में डायन का अंधविश्वास कितना पुराना है, यह कहना मुश्किल है, लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में भूतप्रेत और डायन जैसी कुप्रथा वहां के लोगों की ही देन है.

कुछ पंडितों का भी यही कहना है. माधव कंदलि की ‘रामायण’ में भी डायन शब्द का जिक्र है. राजा दशरथ की मौत के बाद रामसीता को वनवास मिलने की कुसूरवार भरत ने अपनी मां कैकेयी को ही ठहराया था.

डायन प्रथा आज सभी समाज में है. बोडो समुदाय   में थानथीन मंत्र शब्द प्रचलित है और खासकर असम के ग्वालपाड़ा जिले में राभा और बोडोकछारी संप्रदायों में यह कुप्रथा भरी पड़ी है.

थानथीन मंत्र को ज्यादातर औरतें सीखती हैं. वे विश्वास करती हैं कि इस मंत्र को पढ़ कर इनसान को मारा जा सकता है.

मिजोरम में मिजो संप्रदाय में खहरिंग को डायन कहा जाता है. ऐसी औरतों को मिजो संप्रदाय के लोग समाज से बाहर कर के उस की हत्या तक कर देते हैं.

मीसिंग समुदाय में यह कुप्रथा कूटकूट कर भरी पड़ी है. यह संप्रदाय मरनो यानी डायन पर पूरा विश्वास करता है. दूरदराज के गांवों में अमंगल और जब कोई अनहोनी घटना घटती है या बीमारियों से किसी की मौत होती है तो कहा जाता है कि डायन ने यह सब किया है.

इस मीसिंग समुदाय में अगर किसी पर शक हुआ तो उसे पकड़ कर रस्सियों से बांधा जाता है और काट कर उसे नदी में बहा दिया जाता है.

ऐसा भी देखने को मिलता है कि प्राचीन समाज में प्रचलित यह कुप्रथा और अंधविश्वास आज भी बहुत से संप्रदायों में देखने को मिल जाता है.

असम के असमिया समाज में मुखालगा यानी नजर लगना कहा जाता है. किसी शख्स का बीमार होना, फल लगने वाले पेड़ पर फल नहीं लगना, पेड़ के पत्ते का सूख जाना या समय से फल हो कर जमीन पर गिर आना वगैरह जैसी घटनाओं को नजर लगना कहा जाता है.

बताया जाता  है कि ऐसे मामलों में कोई कुसूरवार होता है तो उस के सामने जाने से लोग कतराते हैं. यहां तक कि छोटे बच्चों को नजर न लगे, इस के लिए काले टीके लगाए जाते हैं.

इन्हें डायन कहा जाता है

किसी दिमागी परेशानी से जूझ रहे शख्स के अजीब बरताव को देख कर अंधविश्वास में डूबे लोग इन्हें डायन कहते हैं. दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो अपने निजी फायदे को पूरा करने और जमीनजायदाद के लालच में किसी को भी डायन करार देते हैं.

यही नहीं, किसी से पुरानी दुश्मनी है तो वह समाज में शोर फैला देता है कि फलां आदमी डायन है, जबकि एक तांत्रिक अपनी दुकान चलाने के लिए किसी दूसरे तांत्रिक को फटकने नहीं देने के लिए उस तांत्रिक को भगाने के चक्कर में समाज में यह अफवाह फैला देता है कि फलां तांत्रिक जादूमंत्र से बुरा करने वाला है.

डायन बता कर हत्या

असम में डायन बता कर बेकुसूर मर्दों, औरतों और लड़कियों के ऊपर जोरजुल्म करने और उन की हत्या कर देने की तमाम वारदातें हो चुकी हैं. साल 1999 में ग्वालपाड़ा जिले के दुधनै इलाके में सयालमारी, साल 2000 में भवानीपुर, साल 2013 में दारीदरी गांव, साल 2000 में कोकराझाड़ जिले के कचूगांव, साल 2006 में विजयनगर, साल 2006 में नंदीपुर, साल 2010 में सेफरांगगुड़ी, साल 2011 में बेलगुड़ी, साल 2011 में सराईपुल, साल 2011 में सांथाईबाड़ी, साल 2011 में बेदलांगमारी, साल 2007 में बाक्सा जिले के रौमारी कलबाड़ी, साल 2009 में बागानपाड़ा, साल 2011 में ठेकरकूची, साल 2008 में शोणितपुर जिले के ठेकेरिलगा गांव, साल 2009 में ततखालगांव और साल 2012 में लखीपथार, साल 2005 में विश्वनाथ चारिआली के खादरू चाय बागान के कछाली लाइन गांव में डायन बता कर किसी को मार देने की वारदातें हो चुकी हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, साल 2010 से ले कर 2015 तक 36 औरतों और 47 मर्दों को डायन बता कर हत्या कर दी गई, लेकिन असम महिला समता सोसायटी की एक समीक्षा के मुताबिक, महज ग्वालपाड़ा जिले में ही पिछले 10 सालों में डायन होने के शक में जोरजुल्म किए जाने के 87 मामले दर्ज हैं. इन मामलों में 98 औरतें और 2 मर्द शामिल हैं, जिस में 7 औरतें और 4 मर्दों की हत्या केवल ग्वालपाड़ा जिले में की गई.

इन आंकड़ों से पता चलता है कि जिन जगहों पर इस तरह की बर्बर घटनाएं घटी हैं, वह जगह गांव के भीतरी इलाका समूह है, जहां के रहने वाले लोग पढ़ाईलिखाई और डाक्टरी इलाज से कोसों दूर हैं. इन्हीं वजहों के चलते गांव में किसी को किसी तरह की बीमारी हो जाती है तो वह उसे अस्पताल ले जाने के बजाय तांत्रिकों व ओझाओं के पास ले जाते हैं.

नतीजतन, ओझाओं द्वारा टोनाटोटका कर इलाज करना शुरू करते हैं और उसी बीच उस बीमार आदमी की मौत हो जाती है. ओझा गांव के लोगों को यह बता कर पिंड छुड़ाता है कि इस के ऊपर डायन सवार थी और इसी वजह से यह मौत हुई.

आज के इस वैज्ञानिक युग में भी अंधविश्वास का मकड़जाल इस कदर लोगों पर जकड़ा है कि कितने बेकुसूर मर्दों, औरतों और लड़कियों को डायन बता कर हत्या कर दी जाती है. एक ओर जहां हम डिजिटल इंडिया बनाने की बात करते हैं तो वहीं आज भी अंधविश्वास हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है.

बहरहाल, आज के इस वैज्ञानिक युग में अंधविश्वास जैसे मकड़जाल को हटाने के लिए सरकार को उचित कदम उठाने चाहिए, नहीं तो डायन का आरोप लगा कर यों ही हत्याएं होती रहेंगी.

अमिताभ की अगली फिल्म ‘झुंड’ इस डेट को होगी रिलीज

अमिताभ अपनी अगली फिल्म के साथ जल्दी ही बड़े पर्दे पर नजर आने वाले हैं. नागराज मांजुले के निर्देशन में बनने वाली फिल्म “झुंड” की रिलीज डेट फाइनल हो गई है. ये फिल्म 20 सितंबर 2019 को सिनेमाघरों में दिखेगी. फिल्म में बिग बी लीड रोल में नजर आएंगे. इसकी जानकारी खुद ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने अपने ट्विटर से दी.


ये फिल्म नागपुर के एक रिटायर्ड स्पोर्ट्स टीचर विजय बासरे के जीवन पर आधारित है. विजय ने 2001 में स्लम के बच्चों को फुटबौल की ट्रेनिंग देने के लिए एक एनजीओ की स्थापना की थी. एनजीओ का मुख्य उद्देश्य बच्चों को फुटबौल खेलने के लिए प्रेरित करना था. फिल्म में विजय की भूमिका में अमिताभ नजर आएंगे. आपको बता दें कि निर्माता नागराज की आखिरी फिल्म सैराट थी. सैराट के स्टार रिंकू जारगुरू और आकाश ठोसर भी फिल्म में मुख्य भूमिका में नजर आएंगे.
आपको बता दें कि अमिताभ ने फिल्म की शूटिंग जनवरी में ही खत्म कर दी थी. शूटिंग पूरी करने के बाद अमिताभ ने फोटोज शेयर की थी. एक पोस्ट में उन्होंने लिखा था कि एक को पूरा करने के बाद छोड़ने वाले होते हैं तो इमोशन जैसे लक्षण दिखाई देते हैं. उन्होंने आगे लिखा था- शुक्रिया झुंड… हेलो अगेन ब्रह्मास्त्र. आपको बता दें कि झुंड के के अलावा, अमिताभ बच्चन, रणबीर कपूर और आलिया भट्ट स्टारर ब्रह्मास्त्र में नजर आएंगे.

कमला हैरिस की उड़ान

क्या अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए डैमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए कमला हैरिस की कोशिश भारतीय जनता पार्टी को आर्थिक नुकसान पहुंचाएगी? शायद हां. भारतीय मूल की तमिल मां और जमैकन पिता की अमेरिकी संतान कमला हैरिस को अपनी दावेदारी घोषित करते ही पैसा मिलना शुरू हो गया है. इस में से बहुत पैसा वे भारतीय देंगे जिन्होंने 2014 से पहले भारतीय जनता पार्टी को दिया था.

अमेरिका के चुनावों में रेस और रिलीजन काफी हावी रहते हैं. वहां भी लोग नीतियों से ज्यादा नेताओं के व्यक्तित्व को वोट देने के चक्कर में गलत राजनीतिबाजों को चुनते रहते हैं. अमेरिका में सिविल वार में यूनियन और कौन्फैड्रेट की लड़ाई के बाद गुलामी तो बंद हो गई पर कालों के प्रति घृणा कम नहीं हुई और कालों के साथ भारत के दलितों का सा व्यवहार होता है.

ऊंचे, अमीर, योग्य गोरों की तरह भारतीय मूल के अमेरिका में नागरिक बने पैसे वाले अपनेआप को आम कालों, हिस्पैनिकों और यहां तक कि चीनियों से भी बेहतर समझते हैं. वे अपने सवर्ण होने का गौरव व दंभ अपने साथ भारत से बांध कर ले गए थे और चूंकि कमला हैरिस में ब्राह्मण खून है, इसलिए भारतीय मूल के सफल सवर्ण अपना जो पैसा नरेंद्र मोदी पर लगा रहे थे, शायद, अब कमला हैरिस पर लगाएंगे. कमला हैरिस को राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए डैमोक्रेटिक टिकट लेने के लिए लाखों डौलर जमा करने होंगे और ये सिर्फ गोरे अमेरिकी देंगे, इस में शक है. उन्हें भारतीय मूल के लोगों पर भी बहुत निर्भर रहना होगा.

यह कोई जरूरी नहीं कि कमला हैरिस पहली बाधा भी पार कर पाएं पर उन का चुनाव में उतरना ही भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए काफी है. ये लोग भारत में नरेंद्र मोदी को समर्थन इसीलिए कर रहे थे कि वे उन की ऊंची जातियों के दंभ पर मोहर लगा रहे थे ताकि अमेरिका में वे कह सकें कि वे दूसरे भारतीयों से अलग हैं. अब वे कमला हैरिस पर दांव लगा रहे हैं.

शराबी बौयफ्रैंड से करें तोबा    

हीरोइन आलिया भट्ट की सौतेली बड़ी बहन पूजा भट्ट भी अपने जमाने की मशहूर अदाकारा रही हैं. उन के चाहने वालों की तादाद भी आलिया भट्ट या किसी दूसरी हीरोइन से कम नहीं थी. मानने वाले मानते हैं कि पूजा भट्ट जैसी सादगी वाली लेकिन सैक्सी हीरोइनें फिल्म इंडस्ट्री में न के बराबर हुई हैं. पूजा भट्ट ने गिनीचुनी फिल्में ही की थीं और फिर उन्होंने फिल्मों को ‘बायबाय’ कह दिया था.

वही पूजा भट्ट कुछ दिन पहले फिर चर्चा में आई थीं जब उन्होंने अपनी निजी जिंदगी का यह राज उजागर किया था कि उन का भी एक बौयफ्रैंड था जिस के साथ वे कुछ दिन लिवइन में रही थीं.

पूजा भट्ट ने उस बौयफ्रैंड का नाम तो नहीं बताया लेकिन यह जरूर बताया कि वह अव्वल दर्जे का शराबी था और आएदिन नशे में उन के साथ मारपीट करता था.

बकौल पूजा भट्ट जब उन्होंने इस हकीकत को अपनी जानपहचान वालों से साझा किया तो उन्होंने पूजा को ही निशाने पर ले लिया कि वे क्यों शराबी बौयफ्रैंड के साथ रहते हुए उस की ज्यादतियां झेलती रहीं जबकि वे महेश भट्ट जैसे नामी फिल्ममेकर और डायरैक्टर की बेटी हैं?

इस पर पूजा भट्ट का जवाब यह था कि एक बड़े आदमी की बेटी होने से यह दुख कम नहीं हो रहा था और लोग जब सच बोलते हैं तो अपनों से ही घिर जाते हैं.

जाहिर है कि शराबी बौयफ्रैंड माशूका को कोई सुख नहीं दे सकता, उलटे वह उस के प्यार और भलमनसाहत का नाजायज फायदा ही उठाता है. फिर क्यों लड़कियां किसी शराबी को अपना बौयफ्रैंड या आशिक बनाती हैं? इस बात का अमीरीगरीबी, जातपांत या छोटेबड़े से कोई ताल्लुक नहीं है सिवा फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ के इस गाने को दोहराने के कि ‘दिल तो है दिल, दिल का एतबार क्या कीजे…’

एतबार के काबिल नहीं

शराबी बौयफ्रैंड कितनी बड़ी आफत होता है, इस की एक मिसाल भोपाल की सायना (बदला हुआ नाम) भी है.  भोपाल की एक प्राइवेट कंपनी में सायना 15,000 रुपए महीने की तनख्वाह पर नौकरी करती है. तकरीबन 3 साल पहले उस की मुलाकात आलोक (बदला हुआ नाम) से हुई, तो दोनों में प्यार हो गया. मेलमुलाकातें बढ़ीं तो वादों और इरादों की रस्में भी परवान चढ़ने लगीं. दोनों ने शादी का फैसला भी ले लिया.

पेशे से पेंटर आलोक भी उस की तरह जातपांत और धर्म में यकीन नहीं करता था और उसे अपनेआप पर गजब का भरोसा था कि अगर आदमी के इरादे पक्के हों तो वह दुनिया को अपने हुनर और उसूलों के सामने झुका सकता है.

आलोक की इसी सोच और अदा पर सायना मरमिटी थी, पर जल्द ही सायना को पता चल गया कि आलोक खुद रोज शाम को शराब के आगे झुक जाता है.

शुरूशुरू में तो आलोक ने अपने शराब के आदी होने की बात सायना से छिपाई, लेकिन जब छिपाना मुश्किल हो गया तो शराफत से खुद ही मान लिया.

यह सच सायना के लिए किसी सदमे से कम नहीं था, क्योंकि वह आलोक पर अपना सबकुछ न्योछावर कर चुकी थी और उसे अपने होने वाले शौहर के रूप में देखने लगी थी.

सायना ने आलोक को बहुत बार समझाया कि शराब बेहद बुरी चीज है जो पैसे और सेहत दोनों का नुकसान करती है.

समझाने पर आलोक मान जाता था लेकिन 2-3 दिन बाद ही फिर शराब का दामन थाम कर नशे में डूब जाता था.

सायना को यह बात नागवार गुजरने लगी कि आलोक के लिए शराब उस के प्यार और समर्पण से ज्यादा अहम है लेकिन उस ने कोशिशें नहीं छोड़ीं. उस का एक दूसरा बड़ा डर यह भी था कि अगर शादी के बाद भी आलोक ने शराब नहीं छोड़ी, जिस की उम्मीद ज्यादा थी, तो उस की जिंदगी दुश्वार हो जाएगी.

आलोक अपनी कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा शराब पीने में उड़ा देता था यानी किसी भी लिहाज से वह भरोसेमंद इनसान नहीं था.

तंग आ कर जब शायना ने यह कहना शुरू किया कि वह या तो शराब को चुन ले या उसे, तो आलोक मायूस और बेबस हो कर कहता था कि वह न तो शराब छोड़ सकता है और न ही उसे. शराब उस की जरूरत है और सायना उस का प्यार.

लेकिन सायना को अब समझ आने लगा था कि आलोक की जरूरत जिंदगी पर भारी पड़ने लगी है तो उस ने आलोक को छोड़ने का फैसला ले लिया और धीरेधीरे उस से किनारा कर लिया.

आलोक के प्यार और वादों की पोल और कलई भी जल्द ही खुल गई जब नजरअंदाज किए जाने से गुस्साया आलोक कभी भी उस के होस्टल आ कर हुड़दंग और गालीगलौज करने लगा. अब तो वह दिन में भी शराब पीने लगा था और इस का जिम्मेदार सायना की बेवफाई को ठहराने लगा था.

एक दफा शराब के नशे में आलोक का ऐक्सिडैंट हुआ जिस में उस का एक पैर हमेशा के लिए खराब हो गया. एक बार फिर सायना की मुहब्बत अंगड़ाई लेने लगी और उसे लगा कि अब शायद आलोक सुधर जाए.

लिहाजा, सायना ने आलोक से मिलने का फैसला कर लिया. लेकिन उस की एक सहेली ने उसे समझा कर रोक लिया और दलील यह दी कि अब कोई फायदा नहीं एक ऐसा दोस्त या आशिक, जिसे अपनी गर्लफ्रैंड की इज्जत की परवाह न हो, उस की तरफ तरस खा कर वापस लौटना कोई समझदारी वाला काम नहीं है. अब हो सकता है कि आलोक सायना के पैसे से ही नशा करने लगे.

दूसरा कड़वा सच यह भी सायना को समझ आया कि अपनी बदहाली का जिम्मेदार वह खुद है जो लाख समझाने पर भी नहीं माना. अगर पैर ठीक नहीं हुआ तो उस की जिम्मेदारी भी सायना को ही उठानी पड़ेगी. इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अब वह शराब पीना छोड़ ही देगा.

जल्द लें फैसला

दिल कड़ा कर के सायना ने शराबी बौयफ्रैंड से कभी न मिलने की कसम खा ली और अब उसे भूलने की कोशिश में कामयाब भी हो रही है. अब उसे जिंदगी में दोबारा दिलचस्पी पैदा हो रही है.

सायना बताती है कि जब भी वह आलोक से मिलती थी तो उस के शराब के आदी होने का खौफ हमेशा दिलोदिमाग पर छाया रहता था जिस से रोमांस का जज्बा खत्म सा हो चला था.

सायना को अपने फैसले पर अब कोई पछतावा नहीं है, उलटे वह दूसरी लड़कियों को मशवरा देती है कि अगर उन का बौयफ्रैंड शराबी है, तो वे ऐसा जरूर करें:

* पहले देख लें कि जिस से दोस्ती या प्यार करने जा रही हैं वह शराबी तो नहीं है. और अगर है भी तो शराब की लत किस हद तक है. अगर छूट सकती हो तो ही कदम आगे बढ़ाएं.

* जो बौयफ्रैंड अपनी माशूका के लिए उस के प्यार से समझाने पर शराब जैसी बुराई नहीं छोड़ सकता तो वह कतई भरोसे के काबिल नहीं कहा जा सकता.

* शराबी बौयफ्रैंड तभी तक शरीफ रहता है जब तक उसे प्यार मिल रहा है. जब माशूका शराब को ले कर झूठी या सच्ची जैसी भी नाराजगी दिखाती है तो वह हिंसक हो उठता है जिस से इस रिश्ते की बदनामी ही होती है. नशा उतरने के बाद माफी मांगने या गिड़गिड़ाने से माशूका को पसीजना नहीं चाहिए, क्योंकि जो शख्स थूक कर चाट सकता हो, वह कुछ भी कर सकता है.

* शराब के नशे में बौयफ्रैंड किसी से भी झगड़ा कर सकता है. ऐसे में बात अगर पुलिस तक जाती है तो माशूका को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. अप्रैल, 2018 में सोशल मीडिया पर एक दिलचस्प वीडियो वायरल हुआ था जिस में हैदराबाद की एक लड़की पुलिस वालों से उलझती नजर आ रही थी. हुआ इतना भर था कि इस लड़की के बौयफ्रैंड ने नशे में हैदराबाद के जुबली हिल्स इलाके में ऐक्सिडैंट कर दिया था.

टै्रफिक पुलिस ने पूछताछ की तो नशे में चूर बौयफ्रैंड तो कुछ नहीं बोला लेकिन मामला दर्ज होने पर लड़की पुलिस वालों से भिड़ गई. बाद में मामला आयागया हो गया, लेकिन यह तो साबित हो ही गया कि शराबी बौयफ्रैंड कभी भी मुसीबत की वजह बन सकता है.

  • शराबी बौयफ्रैंड को सुधारने की कोशिश करें लेकिन उस की हदें और मीआद तय कर लें.
  • शराबी बौयफैंन्ड से बहस करने से कोई फायदा नहीं, क्योंकि नशे में तुक या समझ की कोई बात आज तक न तो किसी शराबी ने समझी है और न ही उस पर अमल किया है. अकसर शराबी बौयफ्रैंड माशूका को खोने के डर से उस की हां में हां मिलाता जाता है लेकिन हकीकत में कोई इत्तिफाक उस से नहीं रखता.

शराब या प्यार

कहते हैं कि प्यार में बड़ी ताकत होती है लेकिन लाख में से एकाध मामला ही ढूंढ़े से ऐसा मिलेगा जिस में किसी शराबी ने प्यार या दोस्ती के लिए शराब छोड़ी हो, तो फिर शराबी से दोस्ती या प्यार क्यों?

इस सवाल के जवाब में दिमागी बीमारियों के माहिर भोपाल के मशहूर डाक्टर विनय मिश्रा कहते हैं कि शराबी बौयफ्रैंड हो या शौहर, ऐसे रिश्ते में शराब जहर का ही काम करती है, इसलिए सोचसमझ कर फैसला लेना चाहिए.

जज्बात की रौ में बहने से बेहतर है कि समझदारी से काम लिया जाए, नहीं तो जिंदगीभर पछताने के अलावा हाथ में कुछ नहीं रह जाता.

शराबी बौयफ्रैंड के मामले में यह थ्योरी बेमानी है कि किसी को अगर चाहो तो उसे उस की कमजोरियों के साथ अपनाओ, जबकि होना यह चाहिए कि किसी को चाहो तो उस की कमजोरियों को दूर करने की कोशिश करो और वे दूर न हों तो उसे छोड़ दो.

यह बात भी अपनी जगह ठीक है कि जरूरी नहीं कि हर शराबी बुरा आदमी हो लेकिन यह बात किसी सुबूत की मुहताज नहीं कि अकसर शराब दूसरे ऐब भी साथ ले कर आती है. मसलन, जुआ, जुर्म और तंगी. इसलिए बेहतर और खुशहाल जिंदगी के लिए शराबी बौयफ्रैंड से तोबा करना ही मुनासिब रहता है.

मैं रोजाना अपनी बीवी से हमबिस्तरी करता हूं. क्या ये सेहत के लिए ठीक नहीं है.

सवाल
मैं 21 साल का हूं और रोजाना अपनी बीवी से हमबिस्तरी करता हूं. क्या ऐसा करना सेहत के लिए ठीक नहीं है?

जवाब

इस से सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता है, लिहाजा आप बेखौफ ऐसा कर सकते हैं.

इश्क में राहुल ने उजाड़ दिया पूरा परिवार

8 जनवरी, 2017 को दोपहर बाद की बात है. 34 साल का राहुल माटा पूर्वी दिल्ली के मधु विहार स्थित अजंता अपार्टमेंट के गेट पर पहुंचा. इसी अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर-32 में उस के मातापिता रहते थे. लेकिन राहुल की गलत आदतों की वजह से उस के पिता रविंद्र माटा ने उसे घर से बेदखल कर दिया था. इस के बाद उस के सोसाइटी में घुसने तक पर रोक लगा दी गई थी. जाहिर है, राहुल की कोई न कोई बात उस सोसाइटी के पदाधिकारियों को बुरी लगी होगी, तभी तो गेट पर तैनात गार्डों से भी कह दिया गया था कि उसे किसी भी सूरत में सोसाइटी के अंदर न आने दिया जाए.

उस दिन राहुल अपने फ्लैट पर जाने के लिए सोसाइटी के गेट पर पहुंचा तो वहां मौजूद सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक दिया. गार्ड ने कहा कि सोसाइटी के पदाधिकारियों के आदेश पर ही वह यह कर रहा है. एक सुरक्षागार्ड की राहुल के सामने भला क्या औकात थी. गार्ड द्वारा रोकने की बात राहुल को बुरी लगी. वह गार्ड को डांटते हुए आगे बढ़ा तो गार्ड ने इस का विरोध किया. क्योंकि उसे तो अपनी ड्यूटी करनी थी. राहुल को गार्ड की यह जुर्रत नागवार लगी और वह गार्ड से झगड़ने लगा तथा उस की पिटाई कर दी.

शोरशराबा सुन कर सोसाइटी के कई लोग अपनेअपने फ्लैट से निकल आए. उन लोगों ने भी सुरक्षागार्ड का पक्ष लिया, पर राहुल सभी की बात अनसुनी कर के जबरदस्ती आगे बढ़ गया. तब तक राहुल के 63 वर्षीय पिता रविंद्र माटा भी फ्लैट से बाहर निकल आए थे. बेटे का गार्ड से झगड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. उस से बात करने के लिए वह उस की तरफ बढ़े. चूंकि वह उसे संपत्ति से पहले ही बेदखल कर चुके थे, इसलिए राहुल ने उन से झगड़ना शुरू कर दिया.

उसी दौरान राहुल ने अपने साथ लाए नारियल काटने वाले चापड़ से पिता पर हमला कर दिया. वहां जितने भी लोग मौजूद थे, उन में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह रविंद्र माटा को बचा सकते. बल्कि वह अपनी जान बचाने के लिए अपने फ्लैटों में चले गए और दरवाजे बंद कर लिए. राहुल पिता पर करीब ढाई मिनट तक चापड़ से वार करता रहा और वह जमीन पर गिर कर तड़पते रहे. इस दौरान किसी ने पुलिस के 100 नंबर पर फोन कर के वारदात की जानकारी देने का साहस जरूर कर दिया था.

राहुल को जब लगा कि उस के पिता मर चुके हैं तो वह खून से सना चापड़ हाथ में थामे अपने फ्लैट पर पहुंचा. पर उस की मां विभा माटा ने पहले ही दरवाजा बंद कर लिया था. राहुल ने मां को आवाज देते हुए कई बार दरवाजा खटखटाया, पर विभा ने दरवाजा नहीं खोला. राहुल को अब इस बात का डर लगा कि कहीं सोसाइटी के लोग उसे पकड़ न लें. इसलिए खुद को बचाने के लिए वह किसी दूसरे फ्लैट में जा रहा था, तभी रास्ते में रेनू बंसल नाम की महिला मिलीं, जो पास के फ्लैट में ही रहती थीं. राहुल ने चापड़ से उन्हें भी घायल कर दिया. रेनू को घायल करने के बाद वह तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 35 में घुस गया.

यह फ्लैट फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा का था. उस समय वह अपने बेटे कशिश के साथ मौजूद थे. राहुल के हाथ में खून से सना चापड़ देख कर वह भी डर गए. राहुल ने दोनों बापबेटों को धक्का दे कर कहा, ‘‘मेरे पास मत आना, वरना मार डालूंगा.’’

वी.के. शर्मा ने अपनी फिल्मी लाइफ में फिल्मी गुंडों को देखा था पर अब तो राहुल उन के सामने सचमुच का गुंडा था. उस से कोई पंगा लेने के बजाए उन्होंने खुद को बचाना जरूरी समझा और बेटे के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. राहुल उन के किचन में चला गया और अंदर से किचन का दरवाजा बंद कर लिया. तब तक मधु विहार थाने की पुलिस अजंता अपार्टमेंट पहुंच चुकी थी. गेट से कुछ कदम दूर रविंद्र माटा की लहूलुहान लाश पड़ी थी. सोसाइटी के लोगों ने बताया कि इन की हत्या इन के बेटे राहुल ने की है जो फ्लैट नंबर 35 में छिपा है.

पुलिस टीम फ्लैट नंबर 35 में पहुंची. उस फ्लैट का किचन और एक कमरा अंदर से बंद था. पुलिस ने दोनों जगह दस्तक दी तो पुलिस का नाम सुनते ही अभिनेता वी.के. शर्मा ने दरवाजा खोल दिया. सामने पुलिस देख कर उन्होंने राहत की सांस ली. उन्होंने बताया कि राहुल उन के किचन में है.

पुलिस ने किचन का दरवाजा खटाखटा कर राहुल से दरवाजा खोलने को कहा. पर राहुल ने दरवाजा नहीं खोला. उसे डर था कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी. इसलिए वह अपने बचाव का रास्ता खोजने लगा. पर उसे ऐसा कोई रास्ता नहीं मिला. जब काफी देर तक राहुल ने दरवाजा नहीं खोला तो पुलिस ने दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

तब राहुल ने रसोई गैस (पीएनजी) खोल कर पुलिस को धमकी दी. इतना ही नहीं उस ने आग भी लगा दी. रसोई गैस की आग ने पूरे किचन को चपेट में ले लिया. पुलिस ने दरवाजा तोड़ कर किचन की आग की लपटों में घुस कर राहुल माटा को बाहर निकाल लिया. उस समय तक राहुल काफी जल गया था. राहुल को सुरक्षित निकालने में 10 पुलिसकर्मी भी झुलस गए. झुलसे हुए पुलिसकर्मियों में इंसपेक्टर मनीष जोशी, एसआई संजय, निशाकर, अंशुल, मनीष, एएसआई सुनील कुमार, चंद्रघोष, हैडकांस्टेबल रामकुमार, कांस्टेबल सुधीर, गजराज शामिल थे. खुद के घायल होने के बावजूद भी पुलिस राहुल को मैक्स अस्पताल ले गई.

तब तक आग पूरे फ्लैट में फैल चुकी थी. फायर ब्रिगेड की 10 गाडि़यां मौके पर पहुंच गईं. घंटे भर की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका. पर आग में अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट का सारा सामान स्वाहा हो चुका था. उन्हें उत्कृष्ट अदाकारी के लिए संगीत नाटक अकादमी से मिला पुरस्कार भी स्वाहा हो गया था.

बचाव के दौरान पुलिसकर्मियों के झुलसने की बात सुन कर डीसीपी ओमवीर सिंह बिश्नोई भी अस्पताल पहुंच गए. आरोपी राहुल माटा और 4 पुलिसकर्मियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया गया. राहुल 40 प्रतिशत जल चुका था. घायल पुलिसकर्मियों को देखने के लिए पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा भी अस्पताल पहुंचे.

राहुल ने रेनू बंसल नाम की जिस महिला को घायल किया था, उसे भी 26 टांके लगे थे. राहुल की हालत सामान्य होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से विस्तार से पूछताछ की तो चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

राहुल माटा एक धनाढ्य परिवार से था. उस के पिता रविंद्र माटा का कनाडा में अपना बिजनैस था. करीब 20 साल पहले वह कनाडा चले गए थे. परिवार में पत्नी विभा माटा के अलावा 2 बेटे ही थे. एक राहुल माटा और दूसरा मुकुल माटा. दोनों बच्चों की प्रारंभिक पढ़ाई दिल्ली में हुई थी. विभा दिल्ली में सरकारी नौकरी करती थीं. स्कूली शिक्षा पूरी  करने के बाद राहुल ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया. आगे की पढ़ाई के लिए पिता ने उसे अमेरिका भेज दिया. सन 1995 से 1999 तक उस ने अमेरिका में पढ़ाई की.

इस के बाद सन 2000 में उस ने अमेरिका की ही एक बैंक में नौकरी कर ली. 8 सालों तक वहां काम करने के बाद वह पिता के पास कनाडा चला गया. पिता को कनाडा की नागरिकता मिली हुई थी. कनाडा में उस ने मर्चेंट नेवी में नौकरी की पर अनुशासनहीनता के आरोप में उसे सन 2011 में नौकरी से निकाल दिया गया.  कनाडा की एक लड़की से छेड़छाड़ के आरोप में राहुल को जेल जाना पड़ा, जिस में उसे 2 साल की सजा भी हुई. इस आरोप की वजह से राहुल को कनाडा से डिपोर्ट कर भारत भेज दिया गया.

बाद में सन 2014 में उस का मर्चेंट नेवी का लाइसैंस भी निरस्त हो गया. तब मर्चेंट नेवी में नौकरी करने का उस का रास्ता भी बंद हो गया.

रविंद्र माटा ने अपने छोटे बेटे मुकुल माटा को भी कनाडा बुला लिया था. उस की वहां एक मोबाइल फोन कंपनी में नौकरी लग गई थी. दोनों बापबेटे कनाडा में रहते थे, जबकि राहुल अपनी मां विभा के साथ दिल्ली के अजंता अपार्टमेंट के फ्लैट में रहता था. अब से करीब 2 साल पहले विभा भी रिटायर हो गई थीं. अजंता अपार्टमेंट का यह फ्लैट रविंद्र ने सन 1994 में खरीदा था.

दिल्ली में कोई कामधाम करने के बजाय राहुल दिन भर दोस्तों के साथ घूमता रहता था. खर्च के लिए पैसे मां से ले जाता था. विभा जब उसे कोई काम करने को कहतीं तो वह काम न मिलने का बहाना बना देता. इस के बावजूद भी मां उसे समझाती रहतीं. पर वह उन की सलाह को अनसुना कर देता था.

जिस अपराध की वजह से राहुल को कनाडा छोड़ना पड़ा था, उसी तरह का आरोप उस पर सोसाइटी की एक महिला ने भी लगाया था. राहुल पर बारबार इस तरह के आरोप लगने के बाद भी मांबाप ने उस की शादी नहीं की. इस का नतीजा यह हुआ कि राहुल 2 बच्चों की मां निशा के चक्कर में पड़ गया. निशा के 15 और 16 साल के 2 बच्चे थे. वह एक स्कूल में टीचर थी. राहुल निशा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगा. एक दिन राहुल ने यह बात मां को बताई तो उन्हें यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उन्होंने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना.

इतना ही नहीं, वह निशा को मां के पास फ्लैट पर भी लाने लगा. विभा ऐतराज जताती रहीं और उसे फ्लैट पर लाने के लिए मना करती रहीं. मां की आपत्ति पर राहुल ने कहा कि उस ने उस के साथ मंदिर में शादी कर ली है. यह सुन कर विभा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने यह जानकारी कनाडा में रह रहे पति को दे दी, साथ ही यह भी कह दिया कि मना करने के बावजूद राहुल जबरदस्ती निशा को फ्लैट पर लाता है.

तब वीडियो कौन्फ्रैंसिंग कर रविंद्र ने भी बेटे राहुल को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर तो प्यार का फितूर चढ़ा था. वह भी अपनी जिद पर अड़ा था. राहुल की जिद से रविंद्र माटा और उन की पत्नी को इस बात की आशंका होने लगी कि कहीं बिना शादी की हुई यह महिला और उस के बच्चे उन के फ्लैट पर कब्जा न कर लें.

राहुल की हठधर्मिता से विभा का उस के प्रति व्यवहार भी बदल गया. हर महीने वह उसे खर्च के जो पैसे देती थीं, उन्होंने देने बंद कर दिए. तब राहुल उन से झगड़ता और उन की पिटाई तक कर देता. कभीकभी तो मांबेटे के बीच झगड़ा इतना बढ़ जाता कि पड़ोसियों को बीचबचाव के लिए आना पड़ता.

उस के हिंसक मिजाज से सोसाइटी के लोग भी परेशान थे. एकदो बार पड़ोसियों ने हस्तक्षेप किया तो राहुल ने उन के साथ भी बदतमीजी की. विभा के परिवार में कलह लगातार बढ़ती जा रही थी. फोन कर के वह कनाडा में बैठे पति को सब बताती रहती थीं. बेटे के आचरण से रविंद्र माटा भी परेशान हो गए.

12 अक्तूबर, 2016 को वह कनाडा से दिल्ली आ गए. उन्होंने एक बार फिर बेटे राहुल को समझाया. उन्हें लगा कि राहुल सुधरने वाला नहीं है तो उन्होंने उसे अपनी चलअचल संपत्ति से पूरी तरह से बेदखल करने की चेतावनी दे दी और कह दिया कि वह आइंदा उन के फ्लैट पर न आए.

सोसाइटी वाले तो राहुल के व्यवहार और उस के शोरशराबा करने से पहले परेशान थे. ऊपर से रविंद्र माटा ने सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता से कह दिया कि राहुल को उन के फ्लैट में आने की अनुमति न दी जाए. इस के बाद अजंता रेजीडैंशियल सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता ने गेट पर तैनात सुरक्षागार्डों को राहुल की एंट्री पर बैन लगाने की हिदायत दे दी. बेटे से खतरे को देखते हुए रविंद्र माटा ने अपने फ्लैट की एंट्री और बालकनी में लोहे के ग्रिल और दरवाजे भी लगवा दिए. बेटे के तेवर देखते हुए उन्होंने इस की शिकायत थाने में भी कर दी थी. सीनियर सिटिजन सेफ्टी के लिहाज से पुलिस ने उन्हें कुछ सेफ्टी टिप्स दिए, साथ ही पुलिस ने पड़ोसियों से भी उन का ध्यान रखने को कह दिया. बहरहाल रविंद्र माटा और विभा अब सतर्क रहने लगे. हालात सामान्य होने पर रविंद्र माटा का कनाडा लौटने का कार्यक्रम निश्चित था.

घर से बेदखल होने के बाद राहुल निशा के साथ पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर में रहने लगा था. अब उसे अपने मांबाप दुश्मन लगने लगे. इतना ही नहीं, उस ने दोनों की हत्या करने की ठान ली. इस के लिए उस ने बाजार से एक चापड़ खरीद लिया. चापड़ अपने साथ ले कर वह 8 जनवरी को दोपहर के समय अजंता अपार्टमेंट पहुंच गया. वह जैसे ही गेट पर पहुंचा, वहां तैनात सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक लिया और बता दिया कि उस के अपार्टमेंट में घुसने पर बैन लगा है.

सुरक्षागार्ड के इतना कहते ही राहुल उस से उलझ गया और अपना रौब दिखाने लगा. गार्ड तो अपनी ड्यूटी कर रहा था, पर राहुल नहीं माना. सुरक्षागार्ड की पिटाई करने के बाद राहुल अपने फ्लैट की तरफ जाने लगा. इस के बाद शोर सुन कर बाहर आए पिता को उस ने चापड़ से वार कर मौत के घाट उतार दिया.

पिता की हत्या करने के बाद वह मां की हत्या करने के लिए फ्लैट पर गया. फ्लैट का दरवाजा बंद होने पर उस ने दूसरी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया.

रेनू बंसल को घायल करने के बाद वह फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट में घुस गया और खुद को बचाने के चक्कर में उन के घर को आग के हवाले कर दिया. वी.के. शर्मा पिछले 15 सालों से इस फ्लैट में रह रहे थे.

राहुल माटा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 9 जनवरी, 2017 को कड़कड़डूमा अदालत में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया. राहुल ने जज को बताया कि उस ने अपने पिता की हत्या नहीं की और वी.के. शर्मा के फ्लैट में आग उस ने नहीं, बल्कि पुलिस ने लगाई थी. बहरहाल पुलिस ने कोर्ट के आदेश के बाद उसे जेल भेज दिया. मामले की जांच इंसपेक्टर अजीत सिंह कर रहे हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है.

एहसान फरामोश भाई ने किया बहन का कत्ल

3 नवंबर, 2016 को जालंधर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री राज शेखर की अदालत में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी  थी. इस की यह वजह यह थी कि उन की अदालत में करीब 3 साल पहले 23 अगस्त, 2013 को हुए गुरजीत कौर हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. अपने समय का यह काफी चर्चित मामला था, क्योंकि इस हत्याकांड का अभियुक्त करीब पौने 2 साल की जांच के बाद पकड़ा गया था. इस बीच थाने में कई थानाप्रभारी आए और गए थे. इस हत्याकांड का कोई चश्मदीद गवाह भी नहीं था. अभियोजन पक्ष ने तकनीकी सहारा ले कर अपने पक्ष को मजबूत किया था. चर्चित मामला होने की वजह से अदालत  कक्ष वकीलों और आम लोगों के अलावा मीडिया वालों से भरा था.

फैसला सुनने के लिए मृतका गुरजीत कौर का पति रंजीत सिंह सेठी और दोनों बेटे भी अदालत कक्ष में मौजूद थे. अभियुक्त नरेश डिंपी को भी पुलिस ने ले आ कर अदालत कक्ष में खड़ा कर दिया था. अब सभी को जज साहब के आने का इंतजार था. चूंकि पिछली तारीख पर बहस हो कर सजा तय हो चुकी थी, इसलिए अब केवल सजा ही सुनाना था. जज साहब ने अभियुक्त नरेश डिंपी को क्या सजा सुनाई, यह जानने से पहले आइए इस पूरे मामले को जान लेते हैं.

मोबाइल रिपेयरिंग का काम करने वाला 18 साल का जगजीत सिंह सेठी उर्फ रमन 23 अगस्त, 2013 की दोपहर डेढ़ बजे जालंधर के वंचितनगर स्थित अपने घर खाना खाने पहुंचा तो घर का मुख्य दरवाजा खुला देख कर हैरान रह गया. मां को आवाज देते हुए वह घर में दाखिल हुआ तो बैडरूम के दरवाजे के बीचोबीच खून से लथपथ पड़ी मां गुरजीत कौर को देख कर वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगा.

रमन की रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर पड़ोसी आए तो उन्हें घटना के बारे में पता चला. गुरजीत कौर की हलत देख कर सभी सन्न रह गए. रमन ने घटना की सूचना अपने पिता रंजीत सिंह सेठी को दी तो वह भी भाग कर घर आ गए. वह जालंधर स्थित दानामंडी में ऐरो पैंट लिमिटेड में डिस्पैच मैनेजर थे. घर पहुंचते ही उन्होंने घटना की सूचना पुलिस को दे दी थी. तभी उन्हें गुरजीत कौर के कराहने की हल्की सी आवाज सुनाई दी. सभी उसे नजदीक के कपूर अस्पताल ले गए, जहां के डाक्टरों ने उन की हालत देख कर उन्हें सिविल अस्पताल ले जाने को कहा.

सिविल अस्पताल पहुंच कर गुरजीत का इलाज शुरू हुआ, लेकिन उस के शरीर का खून काफी मात्रा में बह चुका था, इसलिए इलाज के दौरान ही उस की मौत हो गई. इतनी देर में थाना डिवीजन नंबर-8 की पुलिस अस्पताल पहुंच चुकी थी. पुलिस ने लाश को कब्जे में ले कर उस का निरीक्षण किया. मृतका की गरदन पर गहरा घाव था, जो शायद किसी तेजधार हथियार का था.

उस के सिर और पेट पर गहरे चोटों के निशानों के अलावा चेहरे और बाजुओं पर खरोंचों के निशान थे. पुलिस ने लाश का पंचनामा तैयार कर उसे पोस्टमार्टम के लिए वहीं अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया. इस के बाद अपराध संख्या 194/2013 पर हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी थी.

पुलिस ने घटनास्थल पर जा कर जांच की. बैडरूम का सामान इस तरह अस्तव्यस्त था, जैसे मृतका और हत्यारे के बीच काफी संघर्ष हुआ था. पुलिस ने घर से क्याक्या गायब है, यह पूछा तो रंजीत सिंह ने बताया कि उन की पत्नी अपने पास काफी पैसे रखती थी, क्योंकि वह ब्याज पर रुपए देती थी. उस के पास कितने रुपए थे, यह वह नहीं बता सकते. लेकिन अलमारी की तलाशी ली गई तो उस में ढाई लाख रुपए मिले. बैडरूम के अलावा सभी कमरे जस के तस थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, गुरजीत कौर की गरदन पर चाकू जैसे किसी हथियार से वार किया गया था. उसी तरह पेट पर भी वार किया गया था. इस के अलावा सिर के पिछले हिस्से पर बिना जख्म की चोट थी. यह चोट किसी भारी चीज की थी. सिर के अगले हिस्से में भी वैसी ही चोट थी. मृतका की मौत अधिक खून बहने की वजह से हुई थी.

मरने से पहले मृतका ने काफी संषर्घ किया था. उस की मुट्ठी में कुछ बाल पाए गए थे. संभवत: वे उसी आदमी के थे, जिस ने उस की हत्या की थी. पुलिस को घटनास्थल से ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला था, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सकता. हत्या के इस मामले में पुलिस कुछ नहीं कर पा रही थी.

पुलिस खुद कुछ नहीं कर पाई तो उस ने मुखबिरों को लगा दिया. किसी मुखबिर ने बताया कि इस मामले में घर के ही किसी आदमी का हाथ हो सकता है. इस के बाद पुलिस को मृतका के बेटे रमन पर संदेह हुआ, क्योंकि वह आवारा किस्म के लोगों के बीच उठताबैठता था. शराब पीने के साथसाथ वह जुआसट्टा भी खेलता था. संदेह के आधार पर पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने रमन को ही नहीं, उस के दोस्तों को भी थाने ला कर सख्ती से पूछताछ की. लेकिन वे सभी बेकसूर पाए गए. पुलिस ने मृतका की मुट्ठी में पाए गए् बालों और रमन तथा उस के दोस्तों के बालों की जांच कराई. मेल न खाने से सभी को छोड़ दिया गया था. इस के बाद पुलिस के पास जांच को आगे बढ़ाने का कोई सबूत नहीं था.

पुलिस अंधेरे में हाथपैर मारती रही. धीरेधीरे पौने 2 साल का समय बीत गया. इस बीच कई थानाप्रभारी आएगए, लेकिन कोई गुरजीत कौर के हत्यारे तक पहुंच नहीं पाए.

रंजीत सिंह सेठी वंचितनगर के अपने मकान में पत्नी गुरजीत कौर और 2 बेटों के साथ रहते थे. उन का छोटा सा परिवार था. वह इतना कमाते थे कि उन्हें किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं थी. बेटे बडे़ हुए तो बड़ा बेटा ट्रांसपोर्ट नगर में इलैक्ट्रिशियन का काम करने लगा और छोटा मोबाइल रिपेयरिंग का.

रंजीत सिंह की पत्नी गुरजीत कौर देखने में दबंग जरूर लगती थीं, लेकिन दिल से वह बड़ी दयालु थीं. जरूरतमंदों की मदद करने में भी वह पीछे नहीं रहती थीं. दबंग वह इसलिए थीं, क्योंकि वह ब्याज पर रुपए उठाती थीं. ब्याज की रकम वसूलने के लिए दबंगई दिखानी ही पड़ती थी.

जनवरी, 2015 में थाना डिवीजन नंबर 8 में थानाप्रभारी के रूप में आए नरेश जोशी की नजर अनसुलझे मामलों में गुरजीत कौर सेठी हत्याकांड की फाइल पर पड़ी तो उन्होंने इसे प्राथमिकता के तौर पर सब से ऊपर रखा. उन्होंने फाइल का अध्ययन किया और घर के हर सदस्य से बारीबारी से पूछताछ की. रिश्तेदारों के अलावा उन्होंने करीबी और मिलने वालों के बारे में विस्तार से पूछताछ कर के उन की एक लिस्ट बनाई और फिर बारीबारी से उन से भी पूछताछ की.

इस पूछताछ में उन की नजर मृतका के धर्मभाई नरेश कुमार डिंपी पर जम गई. हत्या के बाद वह रंजीत के घर कभी नहीं आया था. जबकि उस के पहले धर्मभाई होने के नाते उस का गुरजीत कौर के घर काफी आनाजाना तो था ही, घर में भी काफी दखल था.

बच्चे उसे मामा कहने के साथ उस की काफी इज्जत भी करते थे. वह आटोमोबाइल इलैक्ट्रिशियन का काम करता था. सन 2011 में उस ने सीमा से प्रेमविवाह किया था. उस का एक पैर खराब था, जिस से वह लंगड़ा कर चलती थी. डिंपी और सीमा की शादी में धर्मबहन होने के नाते गुरजीत कौर ने दिल खोल कर खर्च किया था.

नरेश जोशी ने नरेश कुमार डिंपी की तलाश में अपनी पूरी पुलिस टीम और मुखबिरों को लगा दिया था. 2 मार्च, 2015 को मुखबिर की सूचना पर उसे गिरफ्तार कर के उन्होंने गुरजीत कौर हत्याकांड के रहस्य से परदा उठा दिया. पूछताछ में अपना अपराध स्वीकार करते हुए नरेश कुमार डिंपी ने बताया कि गुरजीत कौर ने उस की पत्नी सीमा को अपशब्द कहे थे, जिस से नाराज हो कर उस ने उस की हत्या कर दी थी.

10-11 साल पहले गुरजीत कौर की गाड़ी की लाइट खराब हो गई थी. उसे ठीक कराने के दौरान नरेश ने उस की मुलाकात हुई थी. मोबाइल इलैक्ट्रिशियन होने के नाते नरेश ने ही उस की लाइटें ठीक की थीं. यह मुलाकात जल्दी ही घर तक पहुंच गई थी.

नरेश अकेला था. उस के भाई वगैरह तो थे, लेकिन सब अपनेअपने कामों और परिवारों में मस्त थे. समय के साथ गुरजीत कौर और नरेश के संबंध गहराते गए. रक्षाबंधन पर गुरजीत कौर ने उसे राखी बांध कर अपना धर्मभाई बना लिया था और मरते दम तक उस ने इस रिश्ते को निभाया भी था.

भाई मानने के नाते उस ने समयसमय पर नरेश की आर्थिक मदद भी की थी. सन 2011 में नरेश की मुलाकात सीमा से हुई, जो जल्दी ही प्यार में बदल गई. सीमा खूबसूरत और सभ्य लड़की थी. उस में सिर्फ एक ही कमी थी कि वह लंगड़ा कर चलती थी. नरेश ने सीमा को गुरजीत कौर से मिलवा कर उस से शादी करने की इच्छा व्यक्त की.

गुरजीत कौर को भी सीमा पसंद आ गई थी. इसलिए धर्मभाई की खुशी के लिए उस ने सीमा के मातापिता से बात की. उस के मांबाप शादी के लिए तैयार नहीं हुए थे तो नरेश ने गुरजीत कौर की मदद से सीमा से प्रेम विवाह कर लिया था.

शादी के बाद नरेश के घर को गृहस्थी लायक बनाने के लिए गुरजीत कौर ने एक बहन का फर्ज अदा करते हुए नरेश को 25 हजार रुपए दिए थे. नरेश के पास जो भी पैसे थे, घर बसाने में सारे खर्च हो गए थे. उस के पास खर्च के लिए भी पैसे नहीं बचे तो उस ने गुरजीत कौर से 10 हजार रुपए ब्याज पर उधार मांगे.

इस पर गुरजीत कौर ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देख नरेश, बड़ी बहन होने के नाते मेरा जो फर्ज बनता था, वह मैं ने पूरा कर दिया. अब तुम फिजूलखर्ची बंद कर के कमाओ और पत्नी के साथ आराम से रहो. तुम ब्याज के रुपयों के चक्कर में मत पड़ो, क्योंकि मुझे तुम्हारी कमाई के बारे में पता है. तुम हर महीने मुझे 10 हजार रुपए का ब्याज नहीं दे पाओगे.’’

‘‘दीदी, मुझे रुपए की सख्त जरूरत है. बिना रुपए के मेरी गाड़ी नहीं चल सकती. मैं हर महीने बिना मांगे तुम्हें ब्याज देता रहूंगा. बस तुम मुझे 10 हजार रुपए दे दो, ताकि मैं अपनी गाड़ी चला सकूं.’’

गुरजीत कौर ने नरेश को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं माना. तब गुरजीत कौर ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम नहीं मान रहे हो तो मैं तुम्हें रुपए दे दूंगी. लेकिन यह मत सोचना कि ये रुपए बहन के हैं. तुम 10 हजार रुपए का एक हजार रुपए हर महीने ब्याज दे पाओगे.’’

‘‘दीदी, मैं ब्याज के 1 हजार रुपए हर महीने बिना मांगे पहुंचा दूंगा.’’ नरेश कुमार डिंपी ने कहा.

इस के बाद गुरजीत कौर ने उसे 10 हजार रुपए दे दिए. अपने वादे के मुताबिक नरेश हर महीने गुरजीत कौर को ब्याज के एक हजार रुपए देता रहा. उस ने 20 महीने में ब्याज के रूप में गुरजीत कौर को 20 हजार रुपए दे दिए. जबकि मूलधन 10 हजार रुपए जस का तस रहा.

ब्याज भरतेभरते वह परेशान हो गया. लेकिन गुरजीत कौर से उस ने जो वादा किया था, उस के अनुसार वह उस की वजह से कभी कुछ कह नहीं पाया.

दरअसल, नरेश कुमार डिंपी का सोचना था कि धर्मबहन होने के नाते उसे परेशान देख कर गुरजीत कौर खुद ही कह देगी कि अब बस कर भाई, तेरे 10 हजार रुपए पूरे हो गए. लेकिन गुरजीत कौर ने तो उस से पहले ही कह दिया था कि ब्याज के मामले में वह कोई रिश्ता नहीं देखती. करीब 2 साल तक ब्याज देने के बाद नरेश ने ब्याज देना बंद कर दिया.

गुरजीत कौर को यह बात बड़ी नागवार गुजरी. ब्याज की रकम को ले कर दोनों में मनमुटाव हो गया. ब्याज देना तो दूर, नरेश ने गुरजीत के घर आना भी बंद कर दिया. तब गुस्से में एक दिन गुरजीत कौर ब्याज के पैसों के तकाजे के लिए नरेश के घर जा पहुंची. उसे देख कर नरेश और सीमा परेशान हो उठे.

गुरजीत कौर का इस तरह आना उन्हें अच्छा नहीं लगा. शायद इसी वजह से चायपानी को कौन कहे, दोनों ने उसे बैठने तक को नहीं कहा. गुरजीत कौर को पतिपत्नी का यह व्यवहार काफी नगवार गुजरा. उस ने नरेश से अपने ब्याज के रुपयों के बारे में पूछा तो उस ने बड़ी रुखाई से कहा, ‘‘अभी तुम जाओ, कल मैं तुम्हारे रुपए पहुंचा दूंगा.’’

गुरजीत कौर लौट आई. उसे नरेश का व्यवहार काफी बुरा लगा था. अगले दिन दोपहर को नरेश उस के घर आया तो वह घर में अकेली थी. नरेश आ कर सोफे पर बैठ गया. वह कुछ कहता, उस के पहले ही उस के और उस की पत्नी के व्यवहार से नाराज गुरजीत कौर ने कहा, ‘‘उस लंगड़ी की इतनी हिम्मत हो गई कि अपने घर में चायपानी की कौन कहे, उस ने बैठने तक को नहीं कहा.’’

‘‘दीदी, हमारी आपस की बातों में सीमा को मत घसीटो.’’ नरेश ने गुरजीत की बात को बीच में काटते हुए कहा. लेकिन दबंग गुरजीत कौर का पारा तो जैसे सातवें आसमान पर था. उस ने नरेश की बात को अनसुनी करते हुए कहा, ‘‘क्यों न कहूं कुछ उसे. औकात ही क्या है उस लंगड़ी की ’’

गुरजीत कौर के मुंह से बारबार अपनी पत्नी के बारे में अपशब्द सुन कर नरेश को गुस्सा आ गया. उस ने कहा, ‘‘दीदी, तुम कौपी ला कर हिसाब करो, मुझे फालतू की कोई बात नहीं सुननी.’’

गुरजीत कौर ने उठते हुए कहा, ‘‘मुझे भी उस लंगड़ी के बारे में कौन सी बातें करनी हैं ’’

इतना कह कर गुरजीत कौर हिसाब की कौपी लाने बैडरूम की ओर बढ़ी, तभी पत्नी के बारे में गुरजीत कौर द्वारा कहे गए अंतिम शब्दों को सुन कर नरेश को गुस्सा आ गया. उस ने वहीं टेबल पर रखी हथौड़ी उठाई और पीछे से जा कर उस के सिर पर पूरी ताकत से मार दी. गुस्सा और दर्द से गुरजीत कौर तड़प उठी. वह घायल शेरनी की तरह नरेश पर झपट पड़ी.

नरेश भी उसे थप्पड़ और मुक्के मारने लगा. दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. गुरजीत कौर के हाथ में बेस बौल का बैट आ गया. वह बैट नरेश के सिर पर मारना चाहती थी, लेकिन नरेश ने बैग छीन कर फेंक दिया और डाइनिंग टेबल पर रखी छुरी उठा कर उस की गरदन पर वार कर दिया.

इस के बाद 2-3 वार उस ने पेट पर किए. इस के बाद उस ने उसे धक्का दे कर गिरा दिया और खुद भाग गया. गुरजीत कौर गंभीर रूप से घायल हो कर फर्श पर पड़ी थी. थोड़ी देर में वह बेहोश हो गई. इसीलिए उस के बेटे रमन और पड़ोसियों ने उसे मरा हुआ समझा था.

नरेश जोशी ने अभियुक्त नरेश का बयान और इकरारनामा दर्ज कर उसे अदालत में पेश कर के 2 दिनों के रिमांड पर लिया. हत्या में प्रयुक्त छुरी और हथौड़ी पहले ही बरामद कर ली गई थी. अन्य काररवाई पूरी कर उसे फिर से अदालत में पेश किया गया, जहां से जेल भेज दिया गया.

नरेश जोशी ने इस मामले की जांच समय से पहले ही पूरी कर के अदालत में आरोप पत्र जमा कर दिया था. गुरजीत कौर की हत्या का यह मुकदमा करीब पौने 2 साल चला. इस मामले का कोई चश्मदीद गवाह था नहीं, सिर्फ तकनीकी सहारा ले कर अभियोजन पक्ष ने अपने पक्ष को मजबूत किया था. उसी के आधार पर सरकारी वकील ने बहस कर के नरेश कुमार डिंपी को हत्यारा साबित किया था.

जज साहब के अदालत में आते ही सन्नाटा पसर गया था. अपनी कुर्सी पर बैठते हुए जज साहब ने एक नजर अदालत कक्ष में मौजूद सभी लोगों पर डाली. उस के बाद गुरजीत कौर सेठी हत्याकांड की फाइल खोल कर बचाव पक्ष के वकील श्री खन्ना की ओर देख कर कहा, ‘‘इस मामले की बहस वगैरह तो पूरी हो ही चुकी है. अब फैसला सुनाना है.’’

चूंकि घटनास्थल से मिली हथौड़ी और चाकू पर मिले फिंगरप्रिंट नरेश के फिंगरप्रिंट से मेल खा गए थे. इस के अलावा मृतका की मुट्ठी में मिले बाल भी नरेश के ही थे. इसलिए अदालत में उसे गुरजीत कौर की हत्या का दोषी मानते हुए सश्रम उम्रकैद की सजा सुनाई.

नरेश ने जो किया था, उसे उस की सजा उम्रकैद के रूप में मिल गई थी, लेकिन अगर वह जरा सा संतोष कर लेता तो आज अपनी पत्नी के साथ आराम से रह रहा होता. उस ने हत्या भी उस की की, जिस के उस के ऊपर तमाम एहसान थे. ऐसे आदमी को हमारे यहां एहसान फरामोश कहते हैं.

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