जहरीली शराब का कहर, एक ही परिवार के 4 लोगों की मौत…

लेखक- सुनील शर्मा

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के रानीगंज इलाके में जहरीली शराब पीने से 10 लोगों की मौत हो गई. इन में से 4 लोग तो एक ही परिवार से बताए गए हैं.

ये मौतें रामनगर थानाक्षेत्र के अलगअलग गांव में हुईं. गांव वालों का कहना है कि इन लोगों ने सोमवार 27 मई की रात रानीगंज कसबे में देशी शराब की दुकान से शराब खरीद कर पी थी. थोड़ी देर के बाद जब सभी को पेट दर्द व उलटी की शिकायत हुई तो उन्हें स्वास्थ्य केंद्र पर ले जाया गया.

शराब पीने के बाद उन लोगों को दिखना भी बंद हो गया था. मामला बिगड़ता दिखा तो उन सब को वहां से जिला अस्पताल भेज दिया गया, जिन में से 4 की जिला अस्पताल में ही मौत हो गई.

इतना ही नहीं, इलाज के दौरान मंगलवार, 28 मई की सुबह तक कुल 12 लोगों की मौत हो गई थी. कइयों की हालत नाजुक बनी हुई थी.

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इस सिलसिले में राज्य के आबकारी मंत्री जयप्रताप सिंह ने बताया कि जिला प्रशासन के 4 अफसरों और 8 पुलिस वालों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा है कि कुसुरवारों के खिलाफ सख्त से सख्त कदम उठाए जाएंगे.

दूसरी तरफ गांव वालों का आरोप है कि दानवीर सिंह नाम के एक आदमी की नकली शराब बनाने की एक गैरकानूनी फैक्टरी है. यह नकली शराब उस की सरकारी ठेके वाली दुकान पर बेची जाती है.

 पहले भी लील चुकी है नकली शराब

यह कोई पहला मामला नहीं है जब इस तरह की जहरीली शराब ने लोगों को अपना शिकार बनाया है. इसी साल के फरवरी महीने में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के 4 जिलों में जहरीली शराब पीने से 112 लोगों की मौत हुई थी. सूत्रों की मानें तो शराब माफिया ने उस शराब में स्प्रिट या चूहा मारने की दवा मिलाई थी.

फरवरी महीने में ही असम में भी जहरीली शराब के सेवन के चलते 143 लोगों की मौत हुई थी. तब गैरकानूनी शराब की बिक्री और उसे बनाने के मामले में 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया था.

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सवाल उठता है कि अगर सरकार कुसूरवार लोगों पर कड़ी कार्यवाही करती है तो फिर मौत बेचने का यह धंधा बंद क्यों नहीं हो जाता है? दिक्कत यह है कि इस तरह की शारब बनाने और बेचने वालों का नेटवर्क इतना मजबूत होता है कि वे कोई हादसा होने के बाद कुछ दिन तो चुप रहते हैं, पर बाद में फिर इस नशीले धंधे की भट्ठियों को सुलगा देते हैं. पुलिस और आबकारी महकमे की मिलीभगत से यह धंधा दोबारा फलनेफूलने लगता है, जिस का बुरा अंत फिर किसी की मौत से होता है.

बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में, जहां शराबबंदी की जा चुकी है, से भी जहरीली शराब पी कर लोगों द्वारा अपनी जान गंवाने की खबरें आती रहती हैं तो आप समझ सकते हैं कि नशे का यह गैरकानूनी कारोबार देशभर में अपनी कितनी मजबूत जड़ें जमा चुका है.

राजनीतिक रंजिशें किसी की सगी नहीं

लेखक- अक्षय कुलश्रेष्ठ

विपक्षी अमला ही अब हमलावर हो गया और राजनीतिक वजूद की लड़ाई सामने आ गई. चुनचुन कर लोगों की हत्याएं हो रही हैं. राजनीतिक रसूख पर ऐसा बट्टा लगा है जो बहुतों की रातों की नींदें हराम कर रहा है. यह बात राजनीतिक लोगों को हजम नहीं हो पा रही है कि अब विपक्ष नाम की कोई चीज है भी या नहीं.

एक तरफ हापुड़ में एक कांड को अंजाम दिया गया, वहीं अमेठी भी इस से अछूता नहीं रहा. हापुड़ के गांव करनपुर में घर के बाहर सो रहे भारतीय जनता पार्टी के पन्ना प्रमुख चंद्रपाल की 25 मई 2019 की रात गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई. पास में ही सो रहे बेटे देवेंद्र ने जब शोर मचाया तो दोनों बदमाश अंधेरे का फायदा उठाते हुए जंगल की ओर भाग गए.

हुआ यों कि हापुड़ के गांव करनपुर के रहने वाले चंद्रपाल सिंह पुत्र पूरन सिंह भाजपा के पन्ना प्रमुख थे. उन के 5 बेटे व एक बेटी हैं. 25 मई 2019 की रात वह घर के बाहर सो रहे थे, वहीं पास में ही दूसरी चारपाई पर उन का बेटा देवेंद्र सो रहा था. देर रात 2 बदमाश वहां आए और चंद्रपाल के पड़ोसी धर्मपाल के घर के बाहर लगे खंभे पर बल्ब फोड़ कर अंधेरा कर दिया. इस के बाद बदमाशों ने चंद्रपाल को आवाज लगाई.

आवाज सुन कर चंद्रपाल जैसे ही उठ कर बैठे, बदमाशों ने उन की कनपटी से सटा कर गोली चला दी, लेकिन निशाना चूक गया. गोली उन की बाईं आंख में जा लगी. इस के बाद वह औंधे मुंह नीचे गिर गए. बदमाशों ने चंद्रपाल की कमर में भी 2 गोलियां मारीं.

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गोलियों की आवाज सुन कर देवेंद्र की नींद खुली तो उस ने शोर मचा दिया. इस के बाद बदमाश पैदल ही अंधेरे का फायदा उठाते हुए जंगल की ओर भाग गए. शोर सुन कर गांव वाले जमा हुए तब तक चंद्रपाल की मौैत हो चुकी थी.

वहीं दूसरी ओर अमेठी के बरौलियां गांव में भी 25 मई 2019 की रात वारदात हुई. वहां भारतीय जनता पार्टी लोकसभा चुनाव में भारी बहुमत से जीत की खुशी मना रही थी. देर रात साढ़े 11 बजे 2 बाइक सवार बदमाश वहां आए. बदमाशों ने पूर्व प्रधान और भाजपा के समर्थक सुरेंद्र सिंह के सिर में गोली मार दी और मौके से फरार हो गए.

हत्या के वक्त सुरेंद्र सिंह घर के बरामदे में सो रहे थे, तभी उन पर गोलियों से हमला हुआ. घायल हालत में सुरेंद्र सिंह को अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने उन्हें लखनऊ के लिए रैफर कर दिया. लखनऊ ले जाते समय रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

स्मृति ईरानी सुरेंद्र सिंह की शवयात्रा में शामिल हुईं और उन्होंने अर्थी को कंधा भी दिया. उन्होंने कहा कि सुरेंद्र की हत्या करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. हत्या करने और करवाने वाले दोनों को कड़ी सजा दिलाएंगे. इस के लिए सुप्रीम कोर्ट तक भी जाना पड़ा तो जाएंगे और उन की लड़ाई पार्टी लड़ेगी.

पत्नी रुक्मणि सिंह ने कहा कि स्मृति ईरानी ने भरोसा दिया है कि वे अपने बच्चों की तरह ही मेरे बच्चों का खयाल रखेंगी. स्मृति ईरानी ने कहा कि अब इस परिवार को संभालने की जिम्मेदारी मेरी है. यह मेरी लड़ाई है. मैं सुप्रीम कोर्ट तक जाऊंगी.

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बेटे अभय ने कहा कि मेरे पिता भारतीय जनता पार्टी की नेता स्मृति ईरानी के काफी करीबी थे और लोकसभा चुनाव में प्रचार की जिम्मेदारी निभा रहे थे. जीत के लिए विजय यात्रा निकाली जा रही थी. यह बात कांग्रेस नेताओं को हजम नहीं हुई, शायद इसीलिए उन की हत्या कर दी गई.

सुरेंद्र सिंह ने 2109 लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी के चुनाव प्रचार में अहम भूमिका निभाई थी. कई गांवों में सुरेंद्र सिंह का अच्छाखासा दबदबा था. इस का फायदा इस चुनाव में स्मृति ईरानी को मिला. कांग्रेस के गढ़  अमेठी में कमल खिलाने का श्रेय काफी हद तक सुरेंद्र सिंह को भी जाता है.

Edited by – Neelesh Singh Sisodia

वे बच्चे

लेखक- मनमोहन भाटिया

लाल बत्ती पर जैसे ही कार रुकी वैसे ही भिखारी और सामान बेचने वाले उन की तरफ लपके. बड़ा मुश्किल हो जाता है इन भिखारियों से पीछा छुड़ाना. जब तक हरी बत्ती न हो जाए, भिखारी आप का पीछा नहीं छोड़ते हैं. अब तो इन के साथसाथ हिजड़ों ने भी टै्रफिक सिग्नलों पर कार वालों को परेशान करना शुरू कर दिया है. सब से अधिक परेशान अब संपेरे करते हैं, यदि गलती से खिड़की का शीशा खुला रह जाए तो संपेरे सांप आप की कार के अंदर डाल देते हैं और आप चाह कर भी पीछा नहीं छुड़ा पाते हैं.

‘‘कार का शीशा बंद कर लो,’’ मैं ने पत्नी से कहा.

‘‘गरमी में शीशा बंद करने से घुटन होती है,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘डेश बोर्ड पर रखे सामान पर नजर रखना. भीख मांगने वाले ये छोटे बच्चे आंख बचा कर मोबाइल फोन, पर्स चुरा लेते हैं,’’ मैं ने कहा.

इतने में एक छोटी सी बच्ची कार के दरवाजे से सट कर खड़ी हो गई और पत्नी से भीख मांगने लगी.

कुछ सोचने के बाद पत्नी ने एक सिक्का निकाल कर उस छोटी सी लड़की को दे दिया. वह लड़की तो चली गई, लेकिन उस के जाने के फौरन बाद एक और छोटा सा लड़का आ टपका और कार से सट कर खड़ा हो गया.

‘‘एक को दो तो दूसरे से पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जाता है. देखो, इस को कुछ मत देना, नहीं तो तीसरा बच्चा आ जाएगा,’’ मैं बोला.

इसी बीच बत्ती हरी हो गई और कार स्टार्ट कर के मैं आगे बढ़ गया.

‘‘इन छोटेछोटे बच्चों को भीख मांगते देख कर बड़ा दुख होता है. स्कूल जाने की उम्र में पता नहीं इन को क्याक्या करना पड़ता है. इन का तो बचपन ही खराब हो जाता है,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘यह हम सोचते हैं, लेकिन भीख मांगना इन के लिए तो एक बिजनेस की तरह है. रोज इसी सड़क से आफिस जाने के लिए गुजरता हूं, इस लाल बत्ती पर रोज इन्हीं भिखारियों को सुबहशाम देखता हूं. कोई नया भिखारी नजर नहीं आता है. मजे की बात यह कि भिखारी सिर्फ कार वालों से ही भीख मांगते हैं. लाल बत्ती पर कभी इन को स्कूटर, बाइक वालों से भीख मांगते नहीं देखा है,’’ मैं ने कहा, ‘‘भिखारियों के साथसाथ अब सामान बेचने वालों से भी सावधान रहना पड़ता है.’’

‘‘छोड़ो इन बातों को,’’ पत्नी ने कहा, ‘‘कभीकभी तरस आता है.’’

‘‘फायदा क्या इन पर तरस दिखाने का,’’ मैं ने कहा, ‘‘जरा ध्यान रखना, फिर से लाल बत्ती आ गई.’’

‘‘अपनी भाषा कभी नहीं सुधार सकते. लाल, हरी बत्ती क्या होती है. ट्रैफिक सिग्नल नहीं कह सकते क्या,’’ पत्नी ने कहा.

‘‘फर्क क्या पड़ता है, बत्ती तो लाल और हरी ही है,’’ मैं ने कहा.

‘‘मैनर्स का फर्क पड़ता है. हमेशा सही बोलना चाहिए. अगर तुम्हें किसी को टै्रफिक सिग्नल पर मिलना हो और तुम उसे लाल बत्ती पर मिलने को कहो और मान लो, टै्रफिक सिग्नल पर हरी बत्ती हो या फिर बत्ती खराब हो तो वह व्यक्ति क्या करेगा? अगली लाल बत्ती पर आप का इंतजार करेगा, जोकि गलत होगा. इसीलिए हमेशा सही शब्दों का प्रयोग करना चाहिए,’’ पत्नी ने कहा.

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‘‘अब इस बहस को बंद करते हैं. फिर से बत्ती लाल हो गई है.’’

इस बार एक छोटा सा 7-8 साल का बच्चा मेरी तरफ आया.

‘‘अंकल, टायर, एकदम नया है, सिएट, एमआरएफ, लोगे?’’ बच्चा बोला.

मैं चुप रहा.

‘‘एक बार देख लो,’’ बच्चा बोला, ‘‘सस्ता लगा दूंगा.’’

‘‘नहीं लेना,’’ मैं ने कहा.

‘‘एक बार देख तो लो. देखने के पैसे नहीं लगते,’’ बच्चा बोला.

‘‘कितने का देगा?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मारुति 800 का नया टायर शोरूम में लगभग 1,100 रुपए में मिलेगा. आप के लिए सिर्फ 800 रुपए में,’’ बच्चा बोला.

‘‘मेरे लिए सस्ता क्यों? टायर चोरी का तो नहीं?’’ मैं ने कहा.

‘‘हम लोगों की कंपनी में सेटिंग है, इसलिए सस्ते मिल जाते हैं.’’

‘‘एक टायर कितने में लाते हो?’’

‘‘सिर्फ 50 रुपए एक टायर पर कमाते हैं.’’

‘‘50 रुपए में टायर देगा?’’

‘‘नहीं लेना तो मना कर दो, क्यों बेकार में मेरा टाइम खराब कर रहे हो,’’ बच्चा बोला.

‘‘टायर बेचने बेटे तुम आए थे, मैं चल कर तुम्हारे पास नहीं गया था,’’ मैं ने कहा.

‘‘सीधे मना कर दो,’’ बच्चा बोला.

‘‘मना किया तो था, लेकिन फिर भी तुम चिपक गए तो मैं ने सोचा, चलो जब तक लाल बत्ती है तुम्हारे साथ टाइम पास कर लूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘टाइम पास करना है तो आंटी के साथ करो न. मेरा बिजनेस टाइम क्यों खराब कर रहे हो,’’ कह कर बच्चा चला गया.

‘‘बात तो बच्चा सही कह गया,’’ पत्नी बोली, ‘‘मेरे साथ बात नहीं कर सकते थे, टाइम पास करने के लिए वह बच्चा ही मिला था. ऊपर से जलीकटी बातें भी सुना गया.’’

‘‘आ बैल मुझे मार. चुप रहो तो मुसीबत, पीछा ही नहीं छोड़ते और बोलो तो जलीकटी सुना जाते हैं,’’ मैं ने कहा.

‘‘जब टायर लेना नहीं था तो उस के साथ उलझे क्यों?’’ पत्नी ने कहा.

ऐसे ही बातोंबातों में घर आ गया.

दिल्ली शहर की भागदौड़ की जिंदगी में घर और दफ्तर का रुटीन है, इसी में इतनी जल्दी दिन बीत जाता है कि अपनों से भी बात करने का समय निकालना मुश्किल हो जाता है.

एक दिन आगरा घूमने का कार्यक्रम बना कर सुबह अपनी कार से रवाना हुए. खुशनुमा मौसम और सुबह के समय खाली सड़कें हों तो कार चलाने का आनंद ही निराला हो जाता है.

फरीदाबाद की सीमा समाप्त होते ही खुलाचौड़ा हाइवे और साफसुथरे वातावरण से मन और तन दोनों ही प्रसन्न हो जाते हैं. बीचबीच में छोटेछोटे गांव और कसबों में से गुजरते हुए कोसी पार कर मैं पत्नी से बोला, ‘‘चलो, वृंदावन की लस्सी पी कर आगे चलेंगे. वैसे हम दोनों पहले भी वृंदावन घूमने आ चुके हैं. मंदिरों व भगवान में अपनी कोई रुचि नहीं लेकिन यहां के बाजार में लस्सी पीने अैर भल्लाटिक्की खाने का अलग ही मजा है.’’

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कार एक तरफ खड़ी कर इस्कान मंदिर के सामने की दुकान में हम लस्सी पीने के लिए बैठ गए.

लस्सी पी कर बाहर निकले तो पत्नी बोली, ‘‘चलो, अब थकान कम हो गई.’’

कार के पास जा कर जेब से चाबी निकाली और कार का दरवाजा खोलने के लिए चाबी को दरवाजे पर लगाया ही था कि तभी एक छोटा सा बच्चा आ कर दरवाजे से सट कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘अंकल, पैसे.’’

भिखारियों को मैं कभी पैसे नहीं दिया करता पर पता नहीं क्यों उस बच्चे पर मुझे तरस आ गया और जेब से 1 रुपए का सिक्का निकाल कर उस छोटे से बच्चे को दे दिया.

वह तो चला गया लेकिन उस के जाने के बाद पता नहीं कहां से छोटे बच्चों का एक  झुंड आ गया और चारों तरफ से हमें घेर लिया.

‘‘अंकल, पैसे,’’ एक के बाद एक ने कहना शुरू किया.

मैं ने एक बार पत्नी की तरफ देखा, फिर उन बच्चों को.

जी में तो आया कि डांट कर सब को भगा दूं पर जिस तरह बच्चों की भीड़ ने हमें घेर रखा था और लोग तमाशबीन की तरह हमें देख रहे थे, शायद उस से विवश हो कर मेरा हाथ जेब में चला गया और फिर हर बच्चे को 1-1 सिक्का देता गया. किसी बच्चे को 1 रुपए का और किसी को 2 रुपए का सिक्का मिला. किसी के साथ भेदभाव नहीं था. यह इत्तफाक ही था कि जेब में 2 सिक्के रह गए और बच्चे भी 2 ही बचे थे. एक बच्चे को 5 रुपए का सिक्का चला गया और आखिरी वाले को 50 पैसे का सिक्का मिला.

‘‘क्यों, अंकल, उसे 5 रुपए और मुझे 50 पैसे?’’

‘‘जितने सिक्के जेब में थे, खत्म हो गए हैं. और सिक्के नहीं हैं, अब आप जाओ.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं,’’ बच्चे ने अकड़ कर कहा.

‘‘और पैसे मैं नहीं दूंगा. सारे सिक्के खत्म हो गए. तुम कार के दरवाजे से हटो,’’ मैं ने कहा.

‘‘मतलब ही नहीं बनता यहां से जाने का. फटाफट पैसे निकालो. दूसरे बच्चे दूर चले गए हैं. उन्हें भाग कर पकड़ना है. अपने पास ज्यादा टाइम नहीं है. अंकल, आप के पास पैसे खत्म हो गए हैं तो आंटी के पास होंगे,’’ बच्चे ने पत्नी की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘आंटी, पर्स से फटाफट पैसे निकालो.’’

मैं और मेरी पत्नी दोनों एकदम अवाक् हो एकदूसरे की शक्ल देखने लगे.

पत्नी ने चुपचाप पर्स से 5 रुपए का सिक्का निकाला और उस बच्चे को दे दिया.

सिक्का पा कर छोटा सा बच्चा जातेजाते कहता गया,  ‘‘इतनी बड़ी कार ले कर घूमते हैं. पैसे देने को 1 घंटा लगा दिया.’’

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फटाफट कार में बैठ कर  मैं ने कार स्टार्ट की और अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा.

हम आगरा पहुंचे तो काफी थक चुके थे. पत्नी ने मेरे चेहरे की थकान को देख कर कहा, ‘‘चलो, किसी गेस्ट हाउस में चलते हैं.’’

गेस्ट हाउस के कमरे में बिस्तर पर लेटेलेटे सामने दीवार पर टकटकी लगा कर मुझे सोचते देख पत्नी ने पूछा, ‘‘क्या सोच रहे हो?’’

‘‘उस छोटे बच्चे की बात मन में बारबार आ रही है. एक तो भीख दो, ऊपर से उन की जलीकटी बातें भी सुनो. सोच रहा हूं कि दया का पात्र मैं हूं या वे बच्चे. दया की भीख मैं उन से मांगूं या उन को भीख दूं. कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि भिखारी कौन है. आखिर सुकून की जिंदगी कब और कहां मिलेगी. कहीं भी चले जाओ, ये भिखारी हर जगह सारा मजा किरकिरा कर देते हैं.’’

‘‘चलो, इस किस्से को अब भूल जाओ और हम दोनों ही प्रतिज्ञा करते हैं कि आज के बाद कभी भी किसी को भीख या दान नहीं देंगे, चाहे वह व्यक्ति कितना ही जरूरतमंद क्यों न हो.’’

‘‘करे कोई, भरे कोई,’’ मेरे मुंह से हठात निकल पड़ा.

‘‘किसी के चेहरे पर लिखा नहीं होता कि वह जरूरतमंद है.’’

‘‘सही बात है. हमें खुद अपनेआप को देखना है. दूसरों की चिंता में अपना आज क्यों खराब करें. अब आराम करते हैं.

रैना

लेखक- रतन वर्मा

यह खबर जंगल की आग की तरह पूरी कालोनी में फैल गई थी कि रैना के पैर भारी हैं और इसी के साथ कल तक जो रैना पूरी कालोनी की औरतों में सहानुभूति और स्नेह की पात्र बनी हुई थी, अचानक ही एक कुलटा औरत में तबदील हो कर रह गई थी. और होती भी क्यों न. अभी डेढ़ साल भी तो नहीं हुए थे उस के पति को गुजरे और उस का यह लक्षण उभर कर सामने आ गया था.

अब औरतों में तेरेमेरे पुराण के बीच रैना पुराण ने जगह ले ली थी. एक कहती, ‘‘देखिए तो बहनजी इस रैना को, कैसी घाघ निकली कुलक्षिणी. पति का साथ छूटा नहीं कि पता नहीं किस के साथ टांका भिड़ा लिया.’’

‘‘हां, वही तो. बाप रे, कैसी सतीसावित्री बनी फिरती थी और निकली ऐसी घाघ. मुझे तो बहनजी, अब डर लगने लगा है. कहीं मेरे ‘उन पर’ भी डोरे न डाल दे यह.’’

‘‘अरे छोडि़ए, ऐसे कैसे डोरे डाल देगी. मैं तो जब तक बिट्टू के पापा घर में होते हैं, हमेशा रैना के सिर पर सवार रहती हूं. क्या मजाल कि वह उन के पास से भी गुजर जाए.’’

‘‘पर बहनजी, एक बात समझ में नहीं आती…सुबह से रात तक तो रैना कालोनी के ही घरों में काम करती रहती है, फिर जो पाप वह अपने पेट में लिए फिर रही है वह तो कालोनी के ही किसी मर्द का होगा न?’’

‘‘हां, हो भी सकता है. पर बदजात बताती भी तो नहीं. जी तो चाहता है कि अभी उसे घर से निकाल बाहर करूं पर मजबूरी है कि घर का काम कौन करेगा?’’

‘‘हां, बहनजी. मैं भी पूछपूछ कर हार गई हूं उस से, पर बताती ही नहीं. मैं ने तो सोच लिया है कि जैसे ही मुझे कोई दूसरी काम वाली मिल जाएगी, इस की चुटिया पकड़ कर निकाल बाहर करूंगी.’’

सच बात तो यह थी कि कालोनी की किसी भी औरत ने उस आदमी का नाम उगलवाने के लिए रैना पर कुछ खास दबाव नहीं डाला था. शायद यह सोच कर कि कहीं उस ने उसी के पति का नाम ले लिया तो.

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मगर नौकर या नौकरानी का उस शहर में मिल पाना इतना आसान नहीं था. इसलिए मजबूर हो कर रैना को ही उन्हें झेलना था, और झेलना भी ऐसे नहीं बल्कि सोतेजागते रैना के खूबसूरत चेहरे में अपनी- अपनी सौत को महसूसते हुए. मसलन, जिन 4 घरों में रैना नियमित काम किया करती थी, उन सारी औरतों के मन में यह संदेह तो घर कर ही गया था कि कहीं रैना ने उन के ही पति को तो नहीं फांस रखा है.

फिर तो रोज ही सुबहशाम वे अपनेअपने पतियों को खरीखोटी सुनाने से बाज नहीं आतीं, ‘आप किसी दूसरी नौकरानी का इंतजाम नहीं करेंगे? मुझे तो लगता है, आप चाहते ही नहीं कि रैना इस घर से जाए.’

‘क्यों? मैं भला ऐसा क्यों चाहूंगा?’

‘कहा न, मेरा मुंह मत खुलवाइए.’

‘देखो, रोजरोज की यह खिचखिच मुझे पसंद नहीं. साफसाफ कहो कि तुम कहना क्या चाहती हो?’

‘क्या? मैं ही खिचखिच करती हूं? और यह रैना? कैसे हमें मुंह चिढ़ाती सीना ताने कालोनी में घूम रही है, उस का कुछ नहीं? आप मर्दों में से ही तो किसी के साथ उस का…’

इस प्रकार रोज का ही यह किस्सा हो कर रह गया था उन घरों का, जिन में रैना काम किया करती थी.

आखिर उस दिन यह सारी खिच- खिच समाप्त हो गई जब औरतों ने खुद ही एक दूसरी नौकरानी तलाश ली.

फिर तो न कोई पूर्व सूचना, न मुआवजा, सीधे उसी क्षण से निकाल बाहर किया था सभी ने रैना को. बेचारी रैना रोतीगिड़गिड़ाती ही रह गई थी. पर किसी को भी उस पर दया नहीं आई थी.

कुछ दिनों तक तो रैना का गुजारा कमा कर बचाए गए पैसों से होता रहा था पर जब पास की उस की सारी जमापूंजी समाप्त हो गई तब कालोनी के दरवाजे- दरवाजे घूम कर पेट पालने लगी थी. इसी तरह दिन कटते रहे थे उस के. और जब समय पूरा हुआ तो खैराती अस्पताल में जा कर रैना भरती हो गई थी.

उस कालोनी में कुछ ऐसे घर भी थे जिन्होंने अपने यहां नियमित नौकर रखे हुए थे. उन्हीं में एक घर रमण बाबू का भी था, जहां रामा नाम का एक 12 वर्ष का बच्चा काम करता था, लेकिन एक दिन अचानक ही रामा को उस का बाप आ कर हमेशाहमेशा के लिए अपने साथ ले गया.

घर का झाड़ ूपोंछा, बरतन व कपडे़ धोने आदि का काम अकेले कमलाजी से कैसे हो पाता? सो, अब उन के घर में भी नौकर या नौकरानी की तलाश शुरू हो गई थी. कमलाजी की बेटी को तो अपनी पढ़ाई से ही फुरसत नहीं मिलती थी कि वह घर के किसी भी काम में मां का हाथ बंटा सकती. सो 2 ही दिनों में घर गंदा दिखने लग गया था. जब सुबहसुबह ड्राइंगरूम की गंदगी रमण बाबू से देखी नहीं गई तो उन्होंने खुद ही झाडू उठा ली. यह देख कर कमलाजी बुरी तरह अपनी बेटी पर तिलमिला उठी थीं, ‘‘छी, शर्म नहीं आती तुम्हें? पापा झाडू दे रहे हैं और तुम…’’

‘‘बोल तो ऐसे रही हैं मम्मी कि मैं इस घर की नौकरानी हूं. अगर यही सब कराना था तो मुझे पढ़ाने की क्या जरूरत थी. बचपन में ही झाड़ ू थमा देतीं हाथ में.’’

अभी बात और भी आगे बढ़ती कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई थी.

‘‘अरे, देखो तो कौन है,’’ रमण बाबू ने कहा.

दरवाजा खोला तो सामने गोद में नवजात बच्चे को लिए रैना नजर आई थी. उसे देख कर मन और भी खट्टा हो गया था कमलाजी का. बोली थीं, ‘‘तू…तू… क्यों आई है यहां?’’

रैना गिड़गिड़ा उठी थी, ‘‘कल से एक दाना भी पेट में नहीं गया है मालकिन. छाती से दूध भी नहीं उतर रहा. मैं तो भूखी रह भी लूंगी पर इस के लिए थोड़ा दूध दे देतीं तो…’’

कमलाजी अभी उसे दुत्कारने की सोच ही रही थीं कि तभी घर के ढेर सारे काम आंखों में नाच उठे थे. फिर तो उन के मन की सारी खटास पल भर में ही धुल गई थी. बोल पड़ीं, ‘‘जो किया है तू ने उसे तो भुगतना ही पड़ेगा. खैर, देती हूं दूध, बच्चे को पिला दे. रात की रोटी पड़ी है, तू भी खा ले और हां, घर की थोड़ी साफसफाई कर देगी तो दिन का खाना भी खा लेना. बोल, कर देगी?’’

चेहरा खिल उठा था रैना का. थोड़ी ही देर में घर को झाड़पोंछ कर चमका दिया था उस ने. बरतन मांजधो कर किचन में सजा दिए थे. यानी चंद ही घंटों में कमलाजी का मन जीत लिया था उस ने.

शाम को रैना जब वहां से जाने लगी तो कमलाजी उसे टोक कर बोली थीं, ‘‘वैसे तो तुझ जैसी औरत को कोई भी अपने घर में घुसने नहीं देगा पर मैं तुझे एक मौका देना चाहती हूं. मन हो तो मेरे यहां काम शुरू कर दे. 150 रुपए माहवार दूंगी. खाना और तेरे बच्चे को दूध भी.’’

इतना सुनना था कि रैना सीधे कमलाजी के पैरों पर ही झुक गई थी.

इस प्रकार पूरी कालोनी में कुलक्षिणी के नाम से मशहूर रैना को कमलाजी के घर में काम मिल ही गया था. इस के लिए कमलाजी को कालोनी की औरतों के कटाक्ष भी झेलने पड़े थे, पर जरूरत के वक्त ‘गदहे को भी बाप’ कही जाने वाली कहावत का ज्ञान कमलाजी को था.

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रैना के घर में काम पर आने से रमण बाबू की गृहस्थी की गाड़ी फिर से पहले की तरह चलने लग गई थी, लेकिन रैना का आना उन के हक में शुभ नहीं हुआ था. जब तक रमण बाबू घर में होते, अपनी पत्नी, यहां तक कि बेटी की नजरों में भी संदिग्ध बने रहते.

धीरेधीरे हालात ऐसे होते गए थे रमण बाबू के कि दिनभर में पता नहीं कितनी बार रैना को ले कर कभी पत्नी की तो कभी बेटी की झिड़की उन्हें खानी पड़ जाती थी.

आखिर एक दिन अपने बेडरूम के एकांत में कमलाजी से पूछ ही दिया उन्होंने, ‘‘मैं चरित्रहीन हूं क्या कि जब से यह रैना आई है, तुम और तुम्हारी बेटी मेरे पीछे हाथ धो कर पड़ी रहती हो?’’

‘‘रैना के बारे में तो आप जानते ही हैं. आप ही बताइए जिन घरों में रैना काम किया करती थी उन घरों के मर्द कहीं से बदचलन दिखते हैं? नहीं न. पर रैना का संबंध उन में से ही किसी न किसी से तो रहा ही होगा. मैं उस मर्द को भी दोष नहीं देती. असल में रैना है ही इतनी सुंदर कि उसे देख कर किसी भी मर्द का मन डोल जाए. इसीलिए आप को थोड़ा सचेत करती रहती हूं. खैर, आप को बुरा लगता है तो अब से ऐसा नहीं करूंगी. पर आप खुद ही उस से थोड़े दूर रहा कीजिए…’’

रैना को रमण बाबू के घर में काम करते हुए लगभग 1 वर्ष हो आया था. इस बीच रैना ने एक दिन की भी छुट्टी नहीं की थी. तभी एक दिन उसे मोहन से पता चला कि उस की मां गांव में बीमार है.

मां का हाल सुन रैना की आंखों में आंसू आ गए थे. मां के पास जाने के लिए उस का मन मचल उठा था लेकिन तभी उसे अपने बच्चे का खयाल आ गया था. बच्चे के बारे में क्या कहेगी वह. समाज के लोग तो पूछपूछ कर परेशान कर देंगे. फिर मन में आया कि जब तक मां के पास रहेगी, घर से निकलेगी ही नहीं. रही बात मां की, तो उसे तो वह समझा ही लेगी. वैसे भी कौन सा उसे जिंदगी बिताने जाना है गांव…

सारा कुछ ऊंचनीच सोचने के बाद कमलाजी से सप्ताह भर की छुट्टी की बात की थी उस ने.

‘‘क्या, 1 सप्ताह…’’ अभी आगे कुछ कमलाजी बोलतीं कि बेटी ने अपनी मां को टोक दिया था, ‘‘मम्मी, जरा इधर तो आइए,’’ फिर पता नहीं उन के कान में क्या समझाया था उस ने कि उस के पास से लौट कर सहर्ष रैना को गांव जाने की इजाजत दे दी थी उन्होंने.

रैना के जाने के बाद कमलाजी अपने पति से बोली थीं, ‘‘रैना 1 सप्ताह के लिए अपने गांव जा रही है. अगर आप कहें तो हम लोग भी इस बीच पटना घूम आएं. काफी दिन हो गए मांबाबूजी को देखे.’’

‘‘देखो, मैं तो नहीं जा सकूंगा. यहां मुझे कुछ जरूरी काम है. चाहो तो तुम बच्चों के साथ हो आओ,’’ रमण बाबू बोले थे.

फिर तो रात की ट्रेन से ही कमलाजी, दोनों बच्चों के साथ पटना के लिए प्रस्थान कर गई थीं.

कमलाजी को गए अभी दूसरा ही दिन था कि अचानक ही रात में रमण बाबू को बुखार, खांसी और सिरदर्द ने आ दबोचा. सारी रात बुखार में वह तपते रहे थे. सुबह भी बुखार ज्यों का त्यों बना रहा था. चाय की तलब जोरों की लग रही थी पर उठ कर चाय बना पाने का साहस उन में नहीं था. वह हिम्मत जुटा कर बिस्तर से उठने को हुए ही थे कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई.

उन्होंने उठ कर दरवाजा खोला तो सामने रैना खड़ी थी. उसे देख कर वह चौंक पड़े थे. अभी वह कुछ पूछते कि रैना ही बोल पड़ी, ‘‘बाबूजी, जब मैं गांव पहुंची तो मां एकदम ठीक हो गई थीं. फिर वहां रुक कर क्या करती. यहां मालकिन को दिक्कत होती या नहीं?’’

‘‘पर यहां तो कोई है नहीं. सभी पटना…’’ एकबारगी जोरों की खांसी उठी और वह खांसतेखांसते सोफे पर बैठ गए.

उन्हें उस हाल में देख कर रैना पूछ बैठी, ‘‘तबीयत तो ठीक है, मालिक?’’

खांसी पर काबू पाने की कोशिश करते हुए वह बोले थे, ‘‘देख न, कल रात से ही बुखार है. खांसी और सिरदर्द भी है.’’

इतना सुनना था कि रैना ने आगे बढ़ कर उन के माथे पर अपनी हथेली टिका दी. फिर चौंकती हुई बोल पड़ी, ‘‘बुखार तो काफी है, मालिक. कुछ दवा वगैरह ली आप ने?’’

जवाब में सिर्फ इतना बोल पाए रमण बाबू, ‘‘एक कप चाय बना देगी?’’

फिर तो चाय क्या, पूरी उन की सेवा में जुट गई थी रैना.

रमण बाबू ने फोन कर के डाक्टर को बुलवा लिया था. डाक्टर ने जोजो दवाइयां लिखीं, रैना खुद भाग कर ले आई. डाक्टर की हिदायत के अनुसार रमण बाबू के माथे पर वह अपने हाथों से ठंडे पानी की पट्टी भी रखती रही. खुद का खानापीना तो भूल ही गई, अपने बच्चे को भी दूध तभी पिलाती जब वह भूख से रोने लगता.

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इस प्रकार 2 ही दिनों में उस की देखभाल से रमण बाबू काफी हद तक स्वस्थ हो चले थे. इस बीच रैना ने उन्हें कुछ अलग ढंग से भी प्रभावित करना शुरू कर दिया था. एक तो घर का एकांत, फिर रैना जैसी खूबसूरत और ‘चरित्रहीन’ स्त्री की निकटता, उस को प्राप्त करने के लिए रमण बाबू का भी मन डोल उठा था.

रात को घर का सारा काम निबटाने के बाद रैना रमण बाबू के पास जा कर बोली, ‘‘अब मैं जाती हूं, मालिक. मालकिन तो बुधवार की रात को आएंगी, मैं बृहस्पतिवार की सुबह आ जाऊंगी. आप की तबीयत भी अब ठीक ही है.’’

जवाब में रमण बाबू बोल पड़े थे, ‘‘अरे कहां, आज तो तबीयत पहले से भी ज्यादा खराब है.’’

‘‘जी?’’ चौंक कर रैना ने अपनी हथेली उन के माथे पर टिका दी थी. फिर बोली थी, ‘‘न, कहां है बुखार.’’

अभी वह उन के माथे से अपनी हथेली हटाती कि एक झपट्टे के साथ उस की कलाई पकड़ कर रमण बाबू बोल पड़े थे, ‘‘तू भी कमाल की है. अंदर का बुखार कहीं ऊपर से पता चलता है?’’

रैना समझ गई थी कि अब उस के मालिक पर कौन सा बुखार सवार है. चेहरे पर उन के प्रति घिन सी उभर आई थी. एक झटके से अपना हाथ उन की पकड़ से मुक्त कराती हुई  रैना बोल पड़ी थी, ‘‘छि मालिक, आप भी? आप मर्दों के लिए तो औरत भले अपनी जान ही क्यों न दे दे, पर आप के लिए वह मांस के टुकडे़ से अधिक कुछ भी नहीं,’’ इस के साथ ही अपने बच्चे को उठा कर वह तेजी से बाहर निकल गई थी.

बृहस्पतिवार की सुबह रैना जल्दी- जल्दी तैयार हो कर रमण बाबू के यहां पहुंच गई. कमलाजी की नजर उस पर पड़ी तो दांत पीसती हुई बोल पड़ी थीं, ‘‘आ गई महारानी? अरे, तुझ जैसी औरत पर भरोसा कर के मैं ने बहुत बड़ी भूल की.’’

रैना समझ तो गई थी कि मालकिन क्यों उस पर गुस्सा हो रही हैं, फिर भी पूछ बैठी थी, ‘‘मुझ से कोई भूल हो गई, मालकिन?’’

‘‘अरे, बेशरम, भूल पूछती है? अब बरबाद करने के लिए तुझे मेरा ही घर मिला था? हुं, मां बीमार है, छुट्टी चाहिए…’’

‘‘मां सचमुच बीमार थीं मालकिन पर जब मैं वहां पहुंची तो वह ठीक हो चुकी थीं. वहां रुकने से कोई फायदा तो था नहीं. मन में यह भी था कि यहां आप को दिक्कत हो रही होगी, इसीलिए चली आई. यहां आ कर देखा तो मालिक बहुत बीमार थे. आप लोग भी नहीं थे यहां…’’

‘‘बस, मौका मिल गया तुझे मर्द पटाने का.’’

‘‘यह क्या बोल रही हैं मालकिन. मैं तो लौट ही जाती, पर मालिक को उस हालत में छोड़ना ठीक नहीं लगा. मालिक को कुछ हो जाता तो?’’

‘‘चुप…चुप बेशरम. बोल तो ऐसे रही है जैसे वह मालिक न हुए कुछ और हो गए तेरे. अरे, बदजात, यह भी नहीं सोचा तू ने कि किस घर में सेंध मार रही है? पर तू भला क्यों सोचेगी? अगर यही सोचा होता तो शहर क्यों भटकना पड़ता तुझे? अरे, पति मेरे हैं, जो होता मैं देखती आ कर, पर…’’

‘‘बस, बस मालकिन, बस,’’ आखिर रैना के धैर्य का बांध टूट ही गया, ‘‘अगर मालिक को कुछ हो गया होता तो क्या कर लेतीं आप आ कर? अरे, पति का दर्द क्या होता है, यह आप क्या समझेंगी. आप के माथे पर तो सिंदूर चमक रहा है न. मुझ से पूछिए कि मर्द के बिना औरत की जिंदगी क्या होती है. आप ने मुझे कैसीकैसी गालियां नहीं दीं. इसीलिए न कि आज मेरे पति का हाथ मेरे सिर पर नहीं है. आज वह जिंदा होता, तब अगर छिप कर मैं किसी गैर से भी यह बच्चा पैदा कर लेती तो कोई मुझे कुछ नहीं कहता. यह जिसे पूरी कालोनी वाले मेरा पाप समझते हैं, इस में भी मेरी कोई गलती नहीं है. अरे, हम औरतें तो होती ही कमजोर हैं. बताइए, आप ही बताइए मालकिन, कोई गैर मर्द यदि किसी औरत की इज्जत जबरन लूट ले तो कुलटा वह मर्द हुआ या औरत हुई? पर नहीं, हमारे समाज में गलत सिर्फ औरत होती है.

‘‘खैर, मर्द लोग औरत को जो समझते हैं, सो तो समझते ही हैं, पर दुख तो इस बात का है कि औरतें भी औरत का मर्म नहीं समझतीं. अच्छा मालकिन, गलती माफ कीजिएगा मेरी. मैं समझ गई कि मेरा दानापानी यहां से भी उठ गया. पर मालकिन, मैं ने तो अपना धर्म निभाया है, अब ऊपर वाला जो सजा दे,’’ बोलते- बोलते रैना फफक पड़ी थी.

कमलाजी मौन, रैना की एकएक बात सुनती रही थीं. उन्हें भी लगने लगा था कि रैना कुछ गलत नहीं बोल रही. तभी रैना फिर बोली, ‘‘अच्छा तो मालकिन, मैं जाती हूं. कहासुना माफ कीजिएगा.’’

अभी जाने के लिए रैना पलटने को ही थी कि कमलाजी बोल पड़ीं, ‘‘हेठी तो देखो जरा. थोड़ा रहनसहन और चाल- चलन के लिए टोक क्या दिया, लगी बोरियाबिस्तर समेटने. मैं ने तुझ से जाने के लिए तो नहीं कहा है.’’

रैना की आंखें कमलाजी पर टिक गई थीं. कमलाजी फिर से बोल पड़ीं, ‘‘देख, मैं भी औरत हूं. औरत के मर्म को समझती हूं. मैं ने तो सिर्फ  यही कहा है न कि अकेले मर्द के घर में तुझे नहीं जाना चाहिए था. खैर छोड़, अच्छा यह बता, क्या सचमुच किसी ने तेरे साथ जबरदस्ती की थी? अगर की थी तो तू उस का नाम क्यों नहीं बता देती?’’

रैना का चेहरा अजीब कातर सा हो आया. वह बोली, ‘‘उस का नाम बता दूं तो मेरे माथे पर लगा दाग मिट जाएगा? अरे, मैं तो थानापुलिस भी कर देती मालकिन, पर अपनी गांव की तारा को याद कर के चुप हो गई. मुखिया के बेटे ने तारा का वही हाल किया था जो मेरे साथ हुआ. उस ने तो थानापुलिस में भी रपट लिखवाई थी, पर हुआ क्या? रात भर तारा को ही थाने में बंद रहना पड़ा और सारी रात…

‘‘मुखिया का बेटा तो आज भी छाती तान कर घूमता फिर रहा है और बेचारी तारा को कुएं में डूब कर अपनी जान गंवानी पड़ी…मालकिन लोग तो मुझ पर ही लांछन लगाते कि सीधेसादे मर्द को मैं ने ही फांस लिया. अच्छा मालकिन, बुरा तो लगेगा आप को, एक बात पूछूं?’’

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‘‘पूछ.’’

‘‘अगर आप के पीछे मालिक ने ही मेरे साथ बदसलूकी की होती और मैं आप से बोल देती तो आप मुझे निकाल बाहर करतीं या मालिक को? मुझे ही न. हां, दोचार रोज मालिक से मुंह फुलाए जरूर रहतीं फिर आप दोनों एक हो जाते, और…’’ बोलतेबोलते फिर रैना फफक पड़ी थी.

कमलाजी ने गौर से रैना के चेहरे को देखा था. कुछ देर वैसे ही देखती रही थीं, फिर जैसे ध्यान टूटा था उन का. बोल पड़ी थीं, ‘‘अच्छा, अब रोनाधोना छोड़. देख तो कितना समय हो गया है. सारे काम ज्यों के त्यों पड़े हैं. चल, चल कर पहले नाश्ता कर ले, फिर…’’

मालकिन का इतना बोलना था कि एकबारगी फुर्ती सी जाग उठी थी रैना में. आंसू पोंछती वह तेजी से अंदर की ओर बढ़ गई थी.

ग्लैमरस लाइफ बनी मौत का कारण…

 लेखक-  प्रगति अग्रवाल 

बीते 28 मार्च की बात है. छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में गुरुर थाने से करीब 5-7 किलोमीटर दूर स्थित धानापुरी गांव के कुछ लोग सुबह 8 बजे जब गंगरेल भिलाई नहर में नहाने गए तो वहां उन्होंने एक युवती की लाश तैरती देखी. ग्रामीणों ने इस की सूचना धानापुरी की सरपंच योगेश्वरी मानिक सिन्हा और गुरुर थाना पुलिस को दी. पुलिस ने वहां पहुंच कर नहर में तैरती लाश को बाहर निकलवाया. लाश किसी युवती की थी, जिस की उम्र करीब 30 साल थी. लाश के हाथपैर और गला रस्सी से बंधा हुआ था. रस्सी को एक कांश्भाररी पत्थर से बांधा गया था. मृतका के पेट पर चाकू से वार करने के 2 निशान थे. पुलिस जब नहर से लाश निकालने की काररवाई कर रही थी, तब आसपास के काफी ग्रामीण एकत्र हो गए.

पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से युवती की शिनाख्त कराने के प्रयास किए. लेकिन कोई भी उस युवती को नहीं पहचान सका. युवती चुस्त कुरता और सलवार पहने थी. मृतका की हथेली पर अंग्रेजी में ए. यादव लिखा था और बाएं हाथ पर पंखुड़ी का टैटू बना हुआ था.

इस बीच, बालोद के एसपी एम.एल. कोटवानी भी मौके पर पहुंच गए. निरीक्षण कर उन्होंने अनुमान लगाया कि युवती की हत्या रात को की गई होगी और उस के शव को करीब 10 किलोमीटर के दायरे से ला कर वहां फेंका गया है.

लाश को पत्थर से बांध कर संभवत: इसलिए फेंका गया होगा कि वह पानी के नीचे डूबी रहे. लेकिन गंगरेल नहर में बहाव तेज होने से लाश पत्थर सहित पानी के साथ बह कर धानापुरी की तरफ आ गई.

प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने युवती के शव को सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. आगे की जांच के लिए सब से पहले लाश की शिनाख्त जरूरी थी, कपड़ों और टैटू से लग रहा था कि युवती किसी खातेपीते परिवार की और बड़े शहर की रहने वाली थी. समझदारी से काम लेते हुए पुलिस ने युवती के शव के फोटो वाट्सएप के जरिए सोशल मीडिया पर डाल दिए.

इस का परिणाम भी जल्दी ही सामने आ गया. कई लोगों ने उस शव की शिनाख्त आंचल यादव के रूप में की. पुलिस को केवल मृतका का नाम पता चला था, बाकी जानकारी नहीं मिली थी. इस पर पुलिस ने आंचल यादव नाम की युवतियों के फेसबुक अकाउंट खंगाले.

इस में आंचल यादव नाम के एक फेसबुक अकाउंट पर लगी फोटो से लाश का हुलिया मेल खा रहा था. आंचल के फेसबुक अकाउंट पर एक ऐसी फोटो भी मिल गई. जिस में उस के हाथ पर पंखुड़ी का टैटू साफ नजर आ रहा था. टैटू का मिलान होने पर यह तय हो गया कि लाश आंचल यादव की ही है.

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आंचल की लाश की हुई शिनाख्त

फेसबुक अकाउंट और अन्य सूत्रों से पुलिस को पता चला कि आंचल गुरुर से 5-7 किलोमीटर दूर जिला मुख्यालय धमतरी की विवेकानंद कालोनी की रहने वाली थी. वह धमतरी के अलावा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी रहती थी.

शव की विश्वसनीय शिनाख्त मृतका के घर वाले कर सकते थे. इस के लिए गुरुर थाना पुलिस ने धमतरी सिटी कोतवाली पुलिस से संपर्क किया. धमतरी पुलिस के सहयोग से गुरुर थाना पुलिस का संपर्क आंचल के परिवार से हो गया.

पुलिस की सूचना पर आंचल के भाई सिद्धार्थ ने अस्पताल जा कर शव की शिनाख्त की. शव आंचल यादव का ही था. पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने और आवश्यक काररवाई के बाद देर शाम आंचल का शव उस के भाई सिद्धार्थ को सौंप दिया. बालोद थाने में हत्या का मामला पहले ही दर्ज कर लिया गया था.

पुलिस ने आंचल के बारे में जानकारी लेने के लिए उस के परिवार वालों से पूछताछ की. उस की मां ममता यादव ने बताया कि आंचल एक दिन पहले यानी 25 मार्च को रायपुर से अदालत की किसी पेशी के सिलसिले में धमतरी आई थी. उस रात वह करीब 9 बजे अपनी कार से धमतरी में विवेकानंद कालोनी स्थित घर पर पहुंची थी.

घर पहुंचते ही उस के मोबाइल पर एक काल आई. फोन पर बात करने के बाद आंचल घर से चली गई. मां ने उसे रात में जाने से रोका भी था, लेकिन वह नहीं मानी और थोड़ी देर में लौट आने की बात कह कर घर से बाहर निकल गई.

पुलिस ने अपने स्तर पर आंचल यादव के बारे में पता करवाया. पता चला कि ग्लैमरस लाइफ जीने वाली आंचल का धमतरी, भिलाई और रायपुर के अलावा छत्तीसगढ़ व अन्य कई बड़े शहरों के हाई प्रोफाइल लोगों से संपर्क था. वह अकसर रायपुर की पेज थ्री पार्टियों और क्लबों में नजर आती थी. उसे लग्जरी कारों का भी शौक था.

तीखे नाकनक्श वाली आंचल जिस शानोशौकत और आधुनिकता से रहती थी, उस से लोगों का अनुमान था कि वह मौडलिंग करती है और छत्तीसगढ़ की छौलीवुड हीरोइन है. आंचल ने अपने फोटोशूट कराने के लिए पर्सनल फोटोग्राफर रखा हुआ था. हालांकि लोगों ने आंचल को कभी मौडलिंग करते या  किसी फिल्म अथवा एलबम वगैरह में नहीं देखा था, लेकिन उस का रहनसहन और जीवनशैली किसी फिल्मी हीरोइन से कम नहीं थी. इसलिए सभी उसे मौडल या हीरोइन समझते थे.

आंचल रोजाना फेसबुक व सोशल मीडिया पर एक्टिव रहती थी. वह फेसबुक पर रोजाना अपना एक ग्लैमरस फोटो अपलोड करती थी. अपने फेसबुक अकाउंट पर 25 मार्च को शाम 4 बज कर 7 मिनट पर अंतिम बार उस ने एक कुत्ते के साथ वाला फोटो अपलोड किया था. आंचल के फेसबुक पर 22 हजार से ज्यादा फौलोअर थे.

प्रारंभिक जांच पड़ताल में यह बात भी सामने आई कि फरवरी 2014 में वन विभाग के एक रेंजर की अश्लील सीडी बना कर आंचल ने उसे ब्लैकमेल कर 3 करोड़ रुपए मांगे थे. इस मामले में उसे पुलिस ने गिरफ्तार भी किया था. कुछ दिन बाद जेल से छूटने पर आंचल ने अपना गृहनगर धमतरी छोड़ दिया था और रायपुर में अकेली रहने लगी थी. आंचल ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर खुद को रिलायंस लाइफ इंश्योरेंस कंपनी की एक्जीक्यूटिव सेल्स मैनेजर बताया था.

शौर्ट पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आंचल की हत्या की पुष्टि हो गई. उस के पेट में चाकू से वार करने के निशान थे. यह स्पष्ट नहीं हुआ था कि हत्या से पहले उस के साथ दुष्कर्म हुआ था या नहीं. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर ने रिपोर्ट में लाश के करीब 12 घंटे तक पानी में रहने की बात कही थी.

इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि घर से निकलने के कुछ ही देर बाद आंचल की हत्या कर दी गई होगी. मां ने बताया था कि आंचल के पास मोबाइल था. लेकिन पुलिस को कोई मोबाइल फोन नहीं मिला था.

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रहस्य बन गई थी आंचल की हत्या

आंचल के घर वालों ने 27 मार्च को धमतरी में उस की लाश का अंतिम संस्कार कर दिया. आंचल के शव की अंत्येष्टि के बाद पुलिस ने उस के घर वालों से पूछताछ की. इस में वही बात सामने आई कि 25 मार्च की रात 9 बजे आंचल के मोबाइल पर किसी की काल आई थी.

उस के बाद वह अपनी कार घर पर छोड़ कर कहीं चली गई थी. वह किस के साथ गई, इस के बारे में आंचल की मां और भाई ने अनभिज्ञता जताई. मां ने इतना जरूर बताया कि आंचल किसी के साथ बाइक पर बैठ कर गई थी.

आंचल के संबंध हाईप्रोफाइल लोगों से होेने और एक बार पहले ब्लैकमेलिंग के चक्कर में जेल जाने से पुलिस ने अनुमान लगाया कि यह हत्या योजनाबद्ध तरीके से की गई है. इसलिए पुलिस ने आंचल के संपर्क वाले लोगों को जांच के दायरे में लिया.

साथ ही धमतरी में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज खंगालने का काम भी शुरू किया. पुलिस ने आंचल का मोबाइल तलाशने और उस की लोकेशन का पता लगाने की भी कोशिश की. लेकिन कुछ पता नहीं चला.

आंचल की हत्या का मामला हाईप्रोफाइल होने के कारण दुर्ग रेंज के आईजी हिमांशु गुप्ता 27 मार्च को थाना गुरुर पहुंचे. उन्होंने इस मामले में पुलिस अधिकारियों से आवश्यक जानकारी ली और उन्हें दिशानिर्देश दिए. आईजी ने धमतरी के एसपी बालाजी राव को भी इस मामले में बालोद पुलिस का सहयोग करने को कहा.

आंचल के धमतरी और रायपुर में रहने और कई शहरों के रईसजादों से संपर्क होने की वजह से जांच कई नजरिए से होनी जरूरी थी. इस के लिए पुलिस की 5 अलगअलग टीमें बनाई गईं. इन टीमों ने अलगअलग लोगों को ध्यान में रख कर जांच शुरू की. इन में एक कोण पैसे और ब्लैकमेलिंग का भी था.

आंचल ने रायपुर के वीआईपी रोड स्थित फ्लावर वैली में करीब 35 हजार रुपए महीना किराए पर बंगला ले रखा था. 28 मार्च को पुलिस ने आंचल के इस बंगले की तलाशी ली. तलाशी में पुलिस को सीडी, लैपटौप, पैनड्राइव, वन विभाग के अफसरों के नाम लिखे कुछ दस्तावेज आदि मिले. पुलिस ने इन की जांच पड़ताल की. लेकिन कहीं से भी आंचल की हत्या का कोई क्लू नहीं मिला. पुलिस ने आंचल की फ्रैंड्स से भी पूछताछ कर के हत्या का कारण जानने का प्रयास  किया, लेकिन ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली, जिस से इस मामले में उम्मीद की कोई किरण नजर आती.

पुलिस की जांच का फोकस आंचल के दोस्तों, हाईप्रोफाइल लोगों और उस के घर वालों पर था. पुलिस ने कुछ बिंदुओं पर जांच शुरू की. ऐसा कर के पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही थी कि आंचल कब और किस समय कहां जाती थी और किन लोगों के ज्यादा संपर्क में थी.

अपने महंगे शौक पूरे करने और ग्लैमरस जिंदगी जीने के लिए आंचल के पास आमदनी के क्या स्रोत थे, यह भी जानने की कोशिश की गई. यह भी पता लगाया गया कि 25 मार्च को दिन भर उस की किनकिन लोगों से मोबाइल पर बात हुई थी. उस दिन वह रायपुर से धमतरी आई तो किनकिन लोगों को इस बात की जानकारी थी और किन लोगों से उस की मुलाकात हुई.

साथ ही यह भी कि रात 9 बजे वह बाइक पर बैठ कर किस के साथ गई थी. इस के अलावा एक पुलिस टीम को सीसीटीवी कैमरे खंगालने और आंचल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई.

साइबर सेल की मदद से पुलिस ने आंचल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली. पता चला कि 25 मार्च को आंचल के फोन पर 40 से ज्यादा लोगों के काल आए थे. इन में कई हाईप्रोफाइल लोगों के अलावा रायपुर व भिलाई के रहने वाले उस के दोस्त भी शामिल थे. पुलिस ने इन में से कई लोगों से पूछताछ की.

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जांच के लिए कई कोण मिले

पर सब बेकार साबित हुए

जांच में पुलिस को यह भी पता चला कि जगदलपुर के एक व्यक्ति ने आंचल के पिता राकेश यादव से 50 लाख रुपए में उन का धमतरी का मकान और जमीन खरीदी थी.

बाद में आंचल ने पिता की मानसिक स्थिति खराब होने की बात कह कर इस सौदे से इनकार कर दिया था. इस पर मकान खरीदने वाले ने आंचल के खिलाफ पुलिस में मुकदमा दर्ज कराया था. पुलिस ने जमीन खरीदने वाले शख्स को जांच के दायरे में ले कर पूछताछ की.

जांच में पुलिस को कोलकाता के एक कथित तांत्रिक बाबा से भी आंचल के संपर्कों का पता चला. बाबा आंचल से मिलने रायपुर भी आता था. आंचल इस बाबा के जरिए कोई सिद्धि हासिल कर सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचना चाहती थी.

बाद में इस बाबा से आंचल का मोहभंग हो गया था. बाबा से पीछा छुड़ाने के बाद आंचल को अहसास हुआ कि वह ठगी गई है. आंचल ने अपने करीबी कुछ लोगों को बताया था कि बाबा ने पैसे हड़पने के साथ उस का शोषण भी किया था. हालांकि बाबा के खिलाफ आंचल ने पुलिस में कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई थी.

पुलिस ने आंचल के ब्लैकमेलिंग के पुराने मामले को ध्यान में रख कर वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों से भी पूछताछ की. लेकिन ऐसी कोई बात सामने नहीं आई, जिस से आंचल के हत्यारों का सुराग मिल पाता.

सभी एंगलों पर चल रही जांचपड़ताल के बीच 27 मार्च की शाम दुर्ग के आईजी हिमांशु गुप्ता और बालोद के एसपी एम.एल. कोटवानी ने धमतरी में आंचल के घर जा कर उस की मां ममता यादव और भाई सिद्धार्थ से पूछताछ की. इस पूछताछ में पुलिस को आंचल की हत्या के बारे में कुछ अहम सुराग मिले. इस के बाद पुलिस ने जांच की दिशा तय कर ली.

आवश्यक तथ्य  जुटाने के बाद पुलिस ने 30 मार्च की शाम आंचल के भाई सिद्धार्थ यादव को हिरासत में ले लिया. उसे थाने ला कर सख्ती से पूछताछ की गई. बाद में उसे आंचल की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. सिद्धार्थ से पूछताछ के आधार पर उस की मां ममता यादव को भी गिरफ्तार  किया गया. मांबेटे से पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई. उस का कारण था आंचल की वजह से होने वाली परिवार की बदनामी.

धमतरी के रहने वाले राकेश यादव आबकारी विभाग में निरीक्षक थे. उन का छोटा सा परिवार था. इस परिवार में पत्नी ममता यादव के अलावा बड़ी बेटी थी आंचल और छोटा बेटा था सिद्धार्थ. राकेश यादव ने दोनों बच्चों आंचल और सिद्धार्थ को बड़े लाड़प्यार से पाला. आंचल ने धमतरी के एक इंग्लिश मीडियम स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई करने के बाद ग्रैजुएशन की. इस के बाद उस ने एक निजी बीमा कंपनी में काम करना शुरू कर दिया.

कहा जाता है कि तीखे नाकनक्श वाली आंचल जैसेतैसे जवान होती गई, वैसेवैसे उस की खूबसूरती गजब ढाने लगी. आंचल जब आइने में अपना चेहरा देखती थी तो उसे अपनी खूबसूरती पर रश्क होता. उस की सहेलियां भी उसे हीरोइन कह कर चिढ़ाती थीं. वे उस से कहती थीं कि तू इतनी खूबसूरत है कि फिल्मी हीरोइन भी तेरे आगे पानी भरेंगी.

खूबसूरती और महत्त्वाकांक्षा

बनी पतन का कारण

जवानी के साथ बढ़ती खूबसूरती ने आंचल के ख्वाबों की ऊंचाई भी बढ़ा दी. वह ग्लैमर की दुनिया में नाम कमाने के बारे में सोचने लगी. लेकिन इस के लिए न तो उस के पास अनुभव था और न ही ग्लैमर की दुनिया तक पहुंचने का रास्ता उसे पता था. अपने ख्वाबों को पूरा करने के लिए वह आधुनिक परिवेश में ढलती गई और इसी चक्कर में उस के कदम बहक गए.

उन्हीं दिनों वह वन विभाग के एक रेंजर के प्यार में उलझ गई. बाद में आंचल ने उस रेंजर की अश्लील सीडी बना ली. इस सीडी के बहाने वह रेंजर को ब्लैकमेल कर 3 करोड़ रुपए मांगने लगी. रेंजर ने पुलिस में मुकदमा दर्ज करा दिया. इस मामले में सन 2014 में पुलिस ने आंचल को गिरफ्तार किया था. आंचल को करीब ढाई महीने तक जेल में रहना पड़ा. बाद में वह जमानत पर छूट गई.

बेटी की ऐसी गुश्ताखियों से लगे सदमे के कारण पिता राकेश यादव की मौत हो गई. जेल से छूटने के बाद आंचल ज्यादा स्वच्छंद हो गई. उस ने धमतरी शहर छोड़ दिया और वह रायपुर जा कर रहने लगी.

रायपुर में उस की जानपहचान कई रईसजादों से हो गई. जल्दी ही उस की दोस्ती का दायरा रायपुर, भिलाई और दुर्ग के अलावा कई अन्य शहरों के हाईप्रोफाइल लोगों तक फैल गया. वह रायपुर में होने वाली हाईप्रोफाइल नाइट पार्टियों की शान बन गई.

रईसजादों से दोस्ती हुई तो आंचल ने रायपुर की फ्लावर वैली में किराए का एक बंगला ले लिया. साथ ही उस ने लग्जरी कार भी ले ली.

वह आधुनिक तौरतरीकों और शानोशौकत से ग्लैमरस लाइफ जीने लगी. कभीकभी वह धमतरी भी आ जाती थी. साथ ही कभी उस की मां या भाई भी रायपुर आ जाते थे. इस बीच भाई सिद्धार्थ ने धमतरी में किराए पर टैक्सी चलाने का काम शुरू कर दिया था.

आंचल भले ही रायपुर में रहती थी, लेकिन उस की स्वच्छंदता और चालचलन के किस्से धमतरी में रह रहे भाई सिद्धार्थ और मां ममता के कानों तक पहुंच जाते थे. उन्हें मौडर्न लाइफ स्टाइल के नाम पर आंचल का अश्लीलता बिखेरने वाले छोटेछोटे कपड़े पहन कर पार्टियों में शामिल होना और शराब पीना अच्छा नहीं लगता था. इस से उन के परिवार की बदनामी हो रही थी.

आंचल के कारण सिद्धार्थ और ममता को लोगों के ताने सुनने पड़ते थे. बदनामी की वजह से सिद्धार्थ की शादी भी नहीं हो रही थी. इसे ले कर आंचल और सिद्धार्थ में अकसर विवाद होता रहता था. आंचल और सिद्धार्थ के बीच पिता की संपत्ति का भी विवाद था.

आंचल ने 3 डौगी पाल रखे थे. इन में से एक डौगी का नाम उस ने अपने छोटे भाई सिद्धार्थ उर्फ जिमी के नाम पर जिमी रखा हुआ था. कई बार आंचल अपने भाई को जलील करने के लिए उस के टुकड़ों पर पलने वाला कुत्ता तक कह देती थी. बेटी के रहने सहने के ढंग और भाई के साथ उस के व्यवहार से मां भी परेशान थी.

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गुस्से में उबला खून बना खतरनाक

25 मार्च को आंचल रायपुर से पेशी के सिलसिले में धमतरी आई थी. वह अपनी कार से अपने 3 पालतू कुत्ते भी लाई थी. शाम करीब 7 बजे अपनी काले रंग की कार से वह घर पहुंची. थोड़ी देर बाद उस का भाई सिद्धार्थ से पुरानी बातों को ले कर विवाद हो गया.

इस पर आंचल ने भाई से कहा कि तुम मेरी कमाई पर पल रहे हो. तुम्हारी औकात घर के पालतू कुत्ते जिमी जैसी है. यह सुन कर सिद्धार्थ को गुस्सा आ गया. उस ने आंचल को 2 तमाचे जड़ दिए.

चांटे खाने से तिलमिलाई आंचल ने अपने बैग से चाकू निकाला और सिद्धार्थ पर हमला कर दिया. इस से सिद्धार्थ के हाथ पर जख्म हो गया और खून रिसने लगा. खून बहता देख कर सिद्धार्थ अपना आपा खो बैठा.

उस ने आंचल से चाकू छीन लिया और उसी से आंचल के पेट पर कई वार किए. फिर उस ने तब तक उस पर गला दबाए रखा जब तक कि उस के प्राण नहीं निकल गए.

इस घटना के वक्त आंचल की मां ममता घर में ही थी. वह बाथरूम में काम कर रही थी. ममता बाथरूम से कमरे में आई तो आंचल फर्श पर पड़ी थी उस के पेट से खून बह रहा था और सांसें थम चुकी थीं. सिद्धार्थ ने मां को सारी बात बता दी. मां भी आंचल की हरकतों और तानों से त्रस्त थी. इसलिए वह बेटे का साथ देने को तैयार हो गई. आखिर मांबेटे ने मिल कर आंचल का शव ठिकाने लगाने की योजना बनाई.

आंचल का शव घर में पड़ा छोड़ कर सिद्धार्थ उस का मोबाइल ले कर बाइक से मकई चौक गया. वहां उस ने पान खाया, फिर म्युनिसिपल स्कूल के पास आ कर आंचल का मोबाइल स्विच औफ कर दिया. इस के बाद सिद्धार्थ घर लौट आया.

सिद्धार्थ ने मां की मदद से आंचल की कार की डिक्की में उस की लाश रखी. फिर वह पुलिस और सीसीटीवी कैमरों से बचने के लिए कार ले कर जिला अस्पताल के बगल से जाने वाली पतली गली में हो कर म्युनिसिपल स्कूल के पास पहुंचा.

वहां से वह बस्तर रोड पर निकल गया. गुरुर और कनेरी होते हुए वह गंगरेल नहर पर पहुंच गया. नहर पर पहुंच कर उस ने डिक्की से आंचल की लाश कार से निकाली. नहर के किनारे ले जा कर उस ने लाश को रस्सी के सहारे एक भारी पत्थर से बांधा और लाश नहर में लुढ़का दी.

नहर में आंचल का शव फेंकने के बाद सिद्धार्थ ने उस की घड़ी, मोबाइल फोन, सोने का ब्रेसलेट आदि चीजें वालेदगहन के पास फेंक दीं.

घर वापस लौट कर सिद्धार्थ ने आंचल की कार में लगे खून के धब्बों को साफ किया. इस से पहले मां ने कमरे में फर्श पर फैले खून को साफ कर दिया था. आंचल की लाश ठिकाने लगाने के बाद मांबेटे ने पुलिस को बताने के लिए झूठी कहानी रच ली.

दूसरे दिन नहर में आंचल का शव मिलने और शिनाख्त होने के बाद वे पुलिस को यही बताते रहे कि 25 मार्च की रात 9 बजे आंचल जब घर आई तो उस के मोबाइल पर काल आ गई थी. इस के बाद वह काल करने वाले को अपशब्द कहते हुए बाहर चली गई और फिर वापस नहीं लौटी.

पूछताछ के दौरान पुलिस को सिद्धार्थ की कलाई पर कटे का निशान नजर आया. कलाई में कट का निशान लगने के बारे में सिद्घार्थ और उस की मां ने अलगअलग बातें बताईं. इलाज कराने की बात पर भी दोनों ने अलगअलग अस्पतालों के नाम बताए. इस से पुलिस का शक मांबेटे पर गहरा गया.

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छिप न सका अपराध

पुलिस ने आंचल की कार की तलाशी ली तो उस में खून के निशान मिले. इस के अलावा सीसीटीवी कैमरे खंगालने पर भगवती अस्पताल के पास से रात करीब 9 बजे आंचल की कार जाती हुई दिखाई दी. आंचल की कार में सिद्धार्थ के फिंगरप्रिंट भी मिल गए.

कई ठोस सबूत मिलने के बाद पुलिस ने जब सिद्धार्थ को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो वह जल्दी ही टूट गया. इस के बाद उस ने आंचल की हत्या की सारी कहानी पुलिस को बता दी.

पुलिस ने सिद्धार्थ के बयानों के आधार पर उस की मां ममता यादव को भी गिरफ्तार कर लिया. सिद्धार्थ की निशानदेही पर आंचल की घड़ी, मोबाइल फोन ब्रैसलेट आदि बरामद हो गए. वह चाकू भी बरामद हो गया, जिस से आंचल की हत्या की गई थी.

यह विडंबना रही कि ग्लैमरस जिंदगी जीने की तमन्ना में आधुनिकता का लबादा ओढ़ कर स्वच्छंद उड़ान भरने वाली आंचल न तो अपनी जिंदगी जी सकी और ना ही अपने परिवार को सुकून से रहने दिया. उस के जिंदगी जीने के तौरतरीकों से हंसताखेलता परिवार बिखर गया. आंचल के खून से हाथ रंग कर  भाई और मां जेल पहुंच गए.

एकता कपूर की इस एक्ट्रेस को देखकर लोग हुए “बेकाबू”

एकता कपूर का ALT BALAJI अपने बौल्ड वेब केटेंट के लिए काफी पोपुलर हैं. एक बार फिर एकता फैंस के लिए नई सीरीज के साथ तैयार हैं जिसका नाम हैं “बेकाबू”. इस वेब सीरीज में एक्ट्रेस प्रिया बनर्जी  काफी सेक्सी लुक्स में नजर आ रही हैं. जिसे लोग खासा पसंद कर रहे हैं. प्रिया ने इस वेब सीरीज में काफी बौल्ड सीन दिये हैं. “बेकाबू” एक सेक्स ओरिएंटेड लव सीरीज हैं. प्रिया के साथ इस वेब सीरीज में मधुस्नेहा उपाध्याय, प्रिया बनर्जी, राजीव सिद्दार्थ, जितेंद्र हीरावत और आनंदिता सिंह हैं.

अडल्ट वेब सीरीज हैं बेकाबू

औल्ट बालाजी की नई वेबसीरीज बेकाबू एक मशहूर लेखक कियान रौय की कहानी है, जिसके पीछे कश्ती नाम की एक लड़की पड़ी है. कियान की पब्लिशिंग एजेंट को इसमें मीडिया के लिए एक बढ़िया स्टोरी नजर आती है, लेकिन मामला सिर्फ स्टाकिंग भर का ही नहीं है. इस सीरीज के सभी एपीसोड में आपको भरपूर इंटिमेत सीन दिखने को मिलेंगे. कश्ती यानी प्रिया और कियान (राजीव) के बौल्ड सीन देखकर हैरान रह जायेंगे.

 

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प्रिया की फैन फौलोविंग

बात करें प्रिया की फैंन फौलोविंग की तो अकेले इंस्टाग्राम पर उनके 279 हजार फौलोवर्स हैं. “बेकाबू” के बाद उनकी फैंन फौलोविंग में काफी इजाफा हुआ हैं.

 


तेलुगू फिल्म से वेब सीरीज तक

वैसे तो प्रिया कोलकत्ता से ताल्लुक रखती हैं पर उनकी पढ़ाई लिखाई कनाडा में हुई. तेलुगू फिल्म “किस” से डेब्यू करने वाली प्रिया ने हिन्दी और तमिल भाषा में भी काम किया हैं. प्रिया ने कई ब्यूटी पेजेंट जीते है, कई विज्ञापनों में काम किया है. वेब सीरीज ‘बेकाबू’ के बाद वो ‘हिट पतंगे’ और ‘हमें तुमसे प्यार कितना’ जैसी फिल्मों में नजर आएंगी.

 

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शुभलाभ

लेखक-विश्वजीत बनर्जी

यह शायद सूर के किसी पद से लिया गया हो, पर अब याद नहीं. बच्चा था सो उस समय ‘म’ अक्षर की इतनी बार पुनरावृत्ति से इस के उच्चारण में बड़ा मजा आता था. यह कुछकुछ अंगरेजी ‘टंगट्वीस्टर’ जैसा ही था.

आधुनिक काल में अनुप्रास के ये सब उदाहरण चलने वाले नहीं हैं. हमारे सांसद एवं विधायक सूर या तुलसी के पदों की नहीं बल्कि लाभ के पद के मादक मधु को चख कर जिस प्रकार मतवाले हो रहे हैं इस बारे में अनुप्रास अलंकार के नए उदाहरण कुछ इस प्रकार हो सकते हैं, ‘लाभ के पद के लोभ से लालायित हो कर लार टपकना या फिर कुछ और क्लिष्ट ‘पद के लोभ से लाभ का पद लाभ कर लाभ के पद के त्याग का लाभ उठाना’ आदि.

व्याकरण के अलंकार ज्यादा उपयोगी होते जा रहे हैं क्योंकि वैचारिक एवं नैतिक नग्नता को ढकने के लिए अलंकार तो चाहिए ही, चाहे वह महज व्याकरण के ही क्यों न हों.

अब तनिक देखा जाए कि युधिष्ठिर ने महाभारत के दौरान लाभ के पद के अहम मसले को किस प्रकार हैंडल किया था. युद्ध में सामान्यतया स्थिर रहने वाले युधिष्ठिर के हृदय की धुकपुकाहट उस समय बढ़ गई थी जब उन्होंने यक्ष के अंतिम प्रश्न को सुना.

यह प्रश्न महाभारत में दर्ज नहीं है और यक्ष ने इसे युधिष्ठिर के कान में फुसफुसा कर पूछा था क्योंकि वे स्वयं भी इस के उत्तर के बारे में कौन्फिडेंट नहीं थे. अब अपने चारों भाइयों को जीवित करने के लिए यह रहा तुम्हारा आखिरी सवाल :

लाभ के पद की परिभाषा क्या है? तुम्हारे पास आप्शन हैं :

(ए) जिस पद से लाभ मिलता हो.

(बी) जिस पद को त्यागने से त्याग का लाभ मिलता हो.

(सी) जो पद न रखते बनता है न त्यागते.

(डी) ईश्वर ही जानता है.

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युधिष्ठिर ने धर्माचार्यों एवं गुरु द्रोण से प्राप्त सारे ज्ञान को खंगाल डाला पर प्रश्न का उत्तर नहीं मिला. धर्मराज इतने विचलित तो द्रौपदी के चीरहरण के समय भी नहीं दिखे होंगे. (डी) औप्शन में दिया गया जवाब ‘ईश्वर ही जानता है’ पर उन्हें भरोसा तो था पर इस के लिए फाइनली पूछ कर चेक करना जरूरी था.

‘फोन-ए-फे्रंड’ की तर्ज पर उन्होंने कृष्ण को याद किया पर पता चला कि वह वैलेंटाइन डे के मौके पर गोपियों से मिलने गए हुए थे. युधिष्ठिर ने यक्ष से ‘टाइम आउट’ मांगा एवं सीधे बैकुंठ पहुंचे. उन्हें उम्मीद थी कि बैकुंठ में इस प्रश्न का उत्तर अवश्य प्राप्त होगा.

बैकुंठ में गुरु बृहस्पति, इंद्रदेव, नारद आदि भी युधिष्ठिर की जिज्ञासा को शांत नहीं कर पाए. अत: इस शंकासमाधान के लिए सभी ने एक ग्रुप बना कर विष्णु के पास जाना ही उचित समझा. क्षीर सागर में लेटे विष्णु ने जम्हाई लेते हुए अपनी आंखें खोलीं और उन की फरियाद सुन कर अपनी आंखें फिर मूंद लीं. थोड़ी देर बाद आंखें खोल कर विष्णु, युधिष्ठिर से बोले, ‘‘तुम अपने चारों तरफ देखो और बताओ कि तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?’’

‘‘प्रभु, चारों ओर क्षीर सागर की सफेद लहरें हिलोरें मार रही हैं,’’ युधिष्ठिर बोले, ‘‘मंदमंद हवा में अद्भुत सुगंध है, आकाश से गंधर्व और किन्नर फूलों की वर्षा कर रहे हैं, अप्सराएं फैशन परेड की तरह आजा रही हैं, शेषनाग अपने विशाल फन से आप को एन.एस.जी. कमांडो की भांति प्रोटेक्शन दे रहे हैं और इन सब के बीच आप फुल बेड रेस्ट का लुत्फ उठा रहे हैं और हां, लक्ष्मीजी भी आप की सेवा में अहर्निश लगी हुई हैं.’’

‘‘एग्जैक्टली,’’ विष्णु उत्तेजित हो कर बोले और फिर स्वयं अपनी तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘देखो, मेरा पद ही लाभ का पद है और यह सारी सुविधाएं जो तुम देख रहे हो, पदेन सुविधाएं हैं.’’

इतने सरल विश्लेषण की किसी को उम्मीद न थी, सो ‘विष्णु जिंदाबाद’ का नारा लगाते हुए सभी देवतागण उन के चरणस्पर्श के लिए दौड़े. युधिष्ठिर ने यक्ष के सामने उपस्थित हो कर औप्शन (डी) ईश्वर ही जानता है, पर अपने उत्तर को लौक कराया और अपने भाइयों की जान बचाई.

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लाभ के पद के सवाल पर हमारे लोकतंत्र को जैसे लकवा ही मार गया है. लोकतंत्र के तीनों मुख्य स्तंभ विधायिका, न्यायपालिका एवं कार्यपालिका सकते में आ चुके हैं. अब विधायिका को ही लें, राष्ट्रपति के पास सांसदों की बर्खास्तगी के  लिए आवेदनों की बाढ़ सी आ गई है और अगर ये सभी सचमुच बर्खास्त होते हैं तो 2-3 चीजें हो सकती हैं, संसद के खाली हो रहे विशाल सूने केंद्रीय कक्ष में शऽशऽशऽ कोई है…किस्म की हारर फिल्मों की शूटिंग हो सकती है, साथ ही सत्र के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच लाइव संसदीय डब्लू.डब्लू.एफ. का मजा उठाने से लोग वंचित रह जाएंगे, राज्य विधानसभाओं में अगर बर्खास्तगियां होती हैं तो बहुत सारे फर्नीचर बनाने वालों की जीविका खतरे में पड़ सकती है.

न्यायपालिका की स्थिति भी बहुत ठीक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में लाभ के पद को परिभाषित करने की अर्जी दी गई है. भला बताइए, न्यायपालिका को लाभ के पद की परिभाषा आखिर कैसे मालूम हो? लाभ के पद की नईनई परिभाषाएं आखिर लाभान्वित लोगों से ज्यादा सटीक कौन दे सकता है?

कार्यपालिका की सब से बड़ी समस्या होगी बर्खास्त होने या इस्तीफा देने वाले सांसदों तथा विधायकों के बंगले खाली करवाना और बिजली, पानी और टेलीफोन की मद में उन से बकाया रकम वसूलना, क्योंकि सांसद, विधायक बिना पंडित से पूछे यह काम करेंगे नहीं और पंडित पोथी देख कर खरमास में खाली करने की बात करेगा. अत: कार्यपालिका तब तक चैन की नींद सो सकती है. रही बात सांसदों से बकाया वसूलने की तो यह सवाल लाजमी है कि अगर बिजली, पानी, टेलीफोन आदि का बकाया लेना ही था तो सांसदों को सालाना 50 हजार यूनिट बिजली और पानी मुफ्त देने का प्रावधान क्यों रखा था? उन्हें 3 मुफ्त टेलीफोन लाइन पर सालाना 1 लाख 70 हजार फ्री लोकल कौल देने का क्या मतलब है? रेल में प्रथम श्रेणी में असीमित सफर, 40 बार तक बिजनेस क्लास में हवाई सफर, मुफ्त ए.सी., फ्रिज तथा कलर टीवी से सुसज्जित बंगले, मोटा यात्रा भत्ता आदि के प्रावधान के बाद भी बकाया राशि की मांग अन्याय नहीं बल्कि अपराध भी है.

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अरे भई, इतना सब मुफ्त दिया है तो थोड़ा और मुफ्त कर देते. या तो पूरा माफ करो या पूरे के पैसे लो, अगर सभी सुविधाओं के पूरे पैसे लगते तो क्या हमारे विवेकवान सांसद इतना खर्च थोड़े ही करते. निष्कर्ष यही निकलता है कि सांसद का पद अन्य सभी पदों का बाप है. अत: अब उचित यही होगा कि संसद तथा विधानसभाओं के सदस्य पदों को छोड़ कर सभी तथाकथित लाभ के पदों को अलाभकारी घोषित कर दिया जाए. साथ ही संसद और विधानसभाओं के प्रवेशद्वार पर महाजन की तिजोरी की तरह स्वस्तिक का चिह्न अंकित कर ‘शुभलाभ

स्पर्श दंश

लेखक- सुरेंद्र कुमार

एक छोटी सी घटना भी इनसान के जीवन को कैसे बदल सकती है, इस को वह अब महसूस कर रहा था. सुरेश अपनी ही सोच का कैदी हो अपने ही घर में, अपनों के बीच बेगाना और अजनबी बन गया था.

सुनंदा उस में आए बदलाव को पिछले कुछ दिनों से खामोश देख रही थी. आदमी के व्यवहार में अगर तनिक भी बदलाव आए तो सब से पहले उस की पत्नी को ही इस बात का एहसास होता है.

सुनंदा शायद अभी कुछ दिन और चुप रह कर उस में आए बदलाव का कारण खोजती लेकिन आहत मासूम मानसी की पीड़ा ने उस के सब्र के पैमाने को एकाएक ही छलका दिया.

अपनी बेटी के साथ सुरेश का बेरुखा व्यवहार सुनंदा कब तक चुपचाप देख सकती थी. वह भी उस बेटी के साथ जिस में हमेशा एक पिता के रूप में सुरेश की सारी खुशियां सिमटी रहती थीं.

रविवार की सुबह सुरेश ने मानसी के साथ जरूरत से ज्यादा रूखा और कठोर व्यवहार कर डाला था. वह भी तब जब मानसी ने लाड़ से भर कर अपने पापा से लिपटने की कोशिश की थी.

बेटी का शारीरिक स्पर्श सुरेश को एक दंश जैसा लगा था. उस ने बड़ी बेरुखी से बेटी को यह कहते हुए कि मानसी, तुम अब बड़ी हो गई हो, तुम्हारा यह बचपना अब अच्छा नहीं लगता, अपने से अलग कर दिया था. सुरेश ने बेटी को झिड़कते हुए जिस अंदाज से यह कहा था उस से मानसी सहम गई थी. उस की आंखों में आंसू आ गए थे. साफ लगता था कि सुरेश के व्यवहार से उस को गहरी चोट लगी थी. वह तुरंत ही वहां से चली गई थी.

बेटी के साथ अपने इस व्यवहार पर सुरेश को बहुत पछतावा हुआ था. वह ऐसा नहीं चाहता था मगर उस से ऐसा हो गया था. तब उस को लगा भी था कि सचमुच व्यवहार पर उस का नियंत्रण नहीं रहा.

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सुरेश जानता था कि कई दिनों से खामोश सबकुछ देख रही सुनंदा अब शायद खामोश नहीं रहे. मानसी ने जरूर उस के सामने अपनी पीड़ा जाहिर की होगी.

सुरेश का सोचना गलत नहीं था. रसोई के काम से फारिग हो सुनंदा कमरे में आ गई और आते ही उस ने सुरेश के हाथ में पकड़ा अखबार छीन कर फेंक दिया. वह तैश में थी.

‘‘इस बार जब से तुम टूर से वापस आए हो तुम को आखिर हो क्या गया है? अगर बिजनेस की कोई परेशानी है तो कहते क्यों नहीं, इस तरह सब से बेरुखी से पेश आने का क्या मतलब?’’

‘‘मैं किस से बेरुखी से पेश आता हूं, पहले यह भी तो पता चले?’’ अनजान बनते हुए सुरेश ने पूछा.

‘‘इतने भी अनजान न बनो,’’ सुनंदा ने कहा, ‘‘जैसे कुछ जानते ही नहीं हो. जानते हो तुम्हारे व्यवहार से दुखी मानसी आज मेरे सामने कितनी रोई है. वह तो यहां तक कह रही थी कि पापा अब पहले वाले पापा नहीं रहे और अब वह तुम से बात नहीं करेगी.’’

‘‘अगर मानसी ऐसा कह रही है तो जरूर ही मुझ से गलती हुई है. मैं अपनी बेटी को सौरी कह दूंगा. मैं जानता हूं, मेरी बेटी ज्यादा देर तक मुझ से रूठी नहीं रह सकती.’’

‘‘क्या हम दोनों उस के बगैर रह सकते हैं? एक ही तो बेटी है हमारी,’’ सुनंदा ने कहा.

इस पर सुरेश ने पत्नी का हाथ थाम उसे अपने पास बिठा लिया और बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ सुनंदा, क्या तुम को ऐसा नहीं लगता कि हमारी नन्ही बेटी अब बड़ी हो गई है?’’

सुरेश की बात को सुन कर सुनंदा हंस पड़ी और कहने लगी, ‘‘जनाब, इस बार आप केवल 10 दिन ही घर से बाहर रहे हैं और इतने दिनों में कोई लड़की जवान नहीं हो जाती. बेटी बड़ी जरूर हो जाती है, पर इतनी बड़ी भी नहीं कि हम उस की शादी की चिंता करने लगें. अगले महीने मानसी केवल 15 साल की होगी. अभी कम से कम 5-6 वर्ष हैं हमारे पास इस बारे में सोचने को.’’

‘‘मैं ने तो यह बात सरसरी तौर पर की थी, तुम तो बहुत दूर तक सोच गईं.’’

‘‘मुझ को जो महसूस हुआ मैं ने कह दिया. वैसे इस तरह की बातें तुम ने पहले कभी की भी नहीं थीं. इस बार जब से टूर से आए हो बदलेबदले से हो. बुरा मत मानना, मैं कोई गिलाशिकवा नहीं कर रही हूं. लेकिन न जाने क्यों मुझ को ऐसा लगने लगा है कि तुम अपनी परेशानियां अब मुझ से छिपाने लगे हो. तुम्हारे मन में जरूर कुछ है, अपनी खीज दूसरों पर उतारने के बजाय बेहतर यही होगा कि मन की बात कह कर अपना बोझ हलका कर लो,’’ सुरेश के कंधे पर हाथ रखते हुए सुनंदा ने कहा.

‘‘तुम को वहम हो गया है, मेरे मन में न कोई परेशानी है और न ही कोई बोझ.’’

‘‘मेरी सौगंध खा कर और आंखों में आंखें डाल कर तो कहो कि तुम को कोई परेशानी नहीं,’’ सुनंदा ने कहा.

उस के ऐसा करने से सुरेश की परेशानी जैसे और भी बढ़ गई. सुनंदा से आंखें न मिला कर उस ने कहा, ‘‘तुम भी कभीकभी बचपना दिखलाती हो. कारोबार में कोई न कोई परेशानी तो हमेशा लगी ही रहती है.’’

‘‘मैं कब कहती हूं कि ऐसा नहीं होता मगर पहले कभी तुम्हारी कोई कारोबारी परेशानी तुम्हारे घरेलू व्यवहार पर हावी नहीं हुई. इस बार तुम्हारी परेशानी का एक सुबूत यह भी है कि तुम अपनी बेटी की फरमाइश पर उस की बार्बी लाना भी भूल गए, वह भी तब जब उस ने मोबाइल से 2 बार तुम को इस के लिए कहा था. एक तो तुम मुंबई से उस की बार्बी नहीं लाए, उस पर उस से इतना रूखा व्यवहार, वह आहत हो रोएगी नहीं तो क्या करेगी?’’

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‘बार्बी’ के जिक्र से ही सुरेश के शरीर को जैसे कोई झटका सा लगा. जिस गुनाह के एहसास ने उस को अपनी बेटी से बेगाना बना दिया था उस गुनाह के नागपाश ने एकाएक ही उस के सर्वस्व को जकड़ लिया. सुरेश की मजबूरी यह थी कि वह आपबीती किसी से कह नहीं सकता था. सुनंदा से तो एकदम नहीं, जो शादी के बाद से ही इस भ्रम को पाले हुए है कि उस के जीवन में किसी दूसरी औरत की कोई भूमिका नहीं रही.

सुनंदा ही नहीं दुनिया की बहुत सी औरतें जीवन भर इस विश्वास का दामन थामे रहती हैं कि उन के पति को उस के अलावा किसी दूसरी औरत से शारीरिक सुख का कोई अनुभव नहीं. मर्द इस मामले में चालाक होता है. पत्नी से बेईमानी कर के भी उस की नजरों में पाकसाफ ही बना रहता है.

लेकिन कभीकभी मर्द की बेईमानी और उस का गोपनीय गुनाह कैसे उस के जीवन से उस के अपनों को दूर कर सकता है, सुरेश की कहानी तो यही बतलाती थी.

सुनंदा ने गलत नहीं कहा था. मानसी ने 2 बार मोबाइल से अपने पापा सुरेश से ‘बार्बी’ लाने की बात याद दिलाई थी. लेकिन न तो मानसी इस बात को जानती थी और न ही सुनंदा कि जब दूसरी बार मानसी ने सुरेश से बार्बी लाने की बात की थी तब वह मुंबई में नहीं गोआ में था.

सुरेश बिना किसी पूर्व कार्यक्रम के पहली बार गोआ गया था और गोआ ने उस के लिए रिश्तों के माने इतने बदल डाले कि वह अपनी बेटी से मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत दूर हो गया था.

मानसी का बचपन बीत गया था पर उस का गुडि़यों के संग्रह का शौक अभी गया नहीं था. मानसी के होश संभालने के बाद से सुरेश जब कभी भी टूर पर जाता था वह अपने पापा से बार्बी की नईनई गुडि़या लाने को कहती थी. ऐसा कभी नहीं हुआ था कि सुरेश अपनी बेटी की मांगी कोई चीज लाना भूला हो. इस बार भी सुरेश नहीं भूला था. यह अलग बात है कि इस बार उस ने बार्बी मुंबई से नहीं गोआ से खरीदी थी. मगर उसी बार्बी ने सुरेश को बेटी से दूर कर दिया था.

सुनंदा भले ही सुरेश के बारे में कितने भी भ्रम पाले रही हो मगर सच था कि शादी के बाद भी वह जिस्म का कारोबार करने वाली औरतों से यौनसंपर्क बनाता रहा था. ऐसा वह तभी करता था जब वह अपने कारोबार के सिलसिले में घर से बाहर दूसरे शहर में होता था. अगर कभी सुरेश का अपना मन बेईमान न हो तो कारोबारी दोस्तों की बेईमानी में साथी बनना पड़ता था. अब की बार इसी तरह के एक चक्कर में सुरेश के साथ जो घटना घटी थी उस ने उस की अंदर की आत्मा को झकझोर डाला था.

गोआ जाने का सुरेश का कोई कार्यक्रम नहीं था. यह तो सुरेश का मुंबई वाला कारोबारी दोस्त युगल था जिस ने अचानक ही गोआ का कार्यक्रम बना डाला था. युगल बाजारू औरतों का रसिया था और अपनी पत्नी के साथ विवाद के चलते वह चैंबूर इलाके में फ्लैट ले कर अकेले ही रह रहा था.

औरतों की तो मुंबई में भी कोई कमी नहीं थी मगर गोआ में उस के जाने का आकर्षण बालवेश्याएं थीं. 12-13 से ले कर 15-16 साल की उम्र तक की वे लड़कियां जो तन और मन दोनों से ही अभी सेक्स के लायक नहीं थीं. मगर अय्याश तबीयत मर्दों की विकृत सोच इन्हीं में पाशविक आनंद तलाशती है.

गोआ में बालवेश्यावृत्ति के बारे में सुरेश ने भी पढ़ा था. इस को ले कर जब युगल ने सुरेश से बात की तो उस का मन भी ललचा गया था.

सारी रात बस का सफर कर के सुरेश और युगल सुबह गोआ की राजधानी पणजी पहुंचे थे. गोआ सुरेश के लिए नई जगह थी, युगल के लिए नहीं. पणजी में कहां और किस होटल में ठहरना था और क्या करना था यह युगल को मालूम था.

होटल में लगभग 4 घंटे आराम करने के बाद सुरेश और युगल बाहर घूमने निकले. दोनों गोआ के खूबसूरत बीचों पर घूम कर अपना समय गुजारते रहे क्योंकि उन्हें तो रात होने का इंतजार था.

शाम होटल लौटते समय सुरेश बाजार से मानसी के लिए बार्बी गुडि़या खरीदना नहीं भूला. मुंबई के मुकाबले गोआ में बार्बी थोड़ी महंगी जरूर मिली थी, मगर उस को खरीदने के बाद सुरेश काफी निश्ंिचत हो गया था कि अब घर वापस जाने पर उसे अपनी बेटी की नाराजगी नहीं झेलनी पड़ेगी.

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होटल के अपने कमरे में आ कर सुरेश ने मानसी के लिए खरीदी बार्बी को यह सोच कर मेज पर रख दिया था कि यहां से जाते समय वह अपने बैग में जगह बना कर इसे रख लेगा.

पणजी में आ कर युगल ने होटल में एक नहीं 2 कमरे बुक करवाए थे. एक सुरेश के नाम से और दूसरा अपने नाम से. बेशक दोनों पणजी पहुंचने के बाद एक ही कमरे में साथसाथ थे, लेकिन रात को उन दोनों को अलग- अलग कमरे में रहना था.

शाम को होटल में वापस आ कर युगल लगभग 1 घंटा गायब रहा था. उस को रात का इंतजाम जो करना था.

1 घंटे बाद युगल वापस आया और अपने होंठों पर जबान फेरते हुए एक खास अंदाज में बोला, ‘‘सुरेश, सारा इंतजाम हो गया है. रात 11 बजे के बाद लड़की तुम्हारे कमरे में होगी. सुबह होने से पहले तुम्हें उस को फारिग करना है. लड़की के साथ पैसों का कोई लेनदेन नहीं होगा. जो उस को छोड़ने आएगा, पैसे वही लेगा.’’

इस के बाद युगल ने गोआ की मशहूर शराब की बोतल खोली. खाना उन दोनों ने होटल के कमरे में ही मंगवा लिया था. खाना खाने के बाद दोनों ने थोड़ी देर गपशप की. रात के लगभग साढे़ 10 बजे अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को देख युगल ने अपनी एक आंख दबाते हुए सुरेश से ‘गुडनाइट’ कहा और अपने नाम से बुक दूसरे कमरे में चला गया.

सवा 11 बजे के आसपास सुरेश के कमरे के दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी.

सुरेश के ‘यस, कम इन’ कहने पर एक आदमी अपने साथ एक लड़की लिए कमरे में दाखिल हो गया. लड़की की उम्र 14 साल से ज्यादा नहीं थी. लड़की का कद भी छोटा था और उस के अंग विकास के शुरुआती दौर में थे.

लड़की को कमरे में छोड़ कर वह आदमी सुरेश से 700 रुपए ले कर चला गया. यह उस लड़की की एक रात की कीमत थी.

उस आदमी के जाने के बाद सुरेश ने कमरे की चिटखनी लगा दी थी.

लड़की सिर झुकाए अपनी उंगली के नाखून कुतर रही थी. उस के चेहरे पर किसी तरह की कोई घबराहट नहीं थी. मगर कोई दूसरा भाव भी नहीं था.

इतना तय था कि उसे यह जरूर पता था कि उस के साथ रात भर क्या होने वाला था. मगर उस के साथ जो होना था उस के बारे में शायद उस को पूरा ज्ञान नहीं था. उस की उम्र अभी शायद इन चीजों के बारे में जानने की थी ही नहीं.

सुरेश ने उस का नाम भी पूछा था. नाम से लगता था कि वह क्रिश्चियन थी. मारिया नाम बतलाया था उस ने अपना.

अपने शरीर के निशानों को सहलाने के बाद भी उस की आंखों में मासूमियत बरकरार थी. उस मासूमियत में दम तोड़ते कई सवाल भी थे.

इनसान की जिंदगी में ऐसे कई मौके आते हैं जब वह खुद अपनी ही नजरों में अपने किए पर शर्मिंदा नजर आता है. यही हालत उस वक्त सुरेश की थी.

कपडे़ पहनने के बाद मारिया कमरे में इधरउधर देखने लगी. फिर उस की भटकती नजरें किसी चीज पर टिक गई थीं.

उसी पल सुरेश ने उस के चेहरे पर बच्चों की निर्दोष और स्वाभाविक ललक देखी.

सुरेश ने देखा, मारिया की नजरें उस बार्बी पर टिकी थीं जोकि उस ने मानसी के लिए खरीदी थी.

वह ज्यादा देर बार्बी को दूर से निहारते नहीं रह सकी थी. उम्र और सोच से वह थी तो एक बच्ची ही. उस ने मामूली सी झिझक के बाद मेज पर रखी बार्बी उठाई और उस को अपने सीने से लगा कर सुरेश को देखते हुए बोली, ‘‘साहब, आप ने जो कहा, रात भर मैं ने वही किया. अगर आप मेरी सेवा से खुश हैं तो बख्शीश में यह गुडि़या मुझे दे दो. मैं कभी किसी गुडि़या से नहीं खेली साहब, क्योंकि कोई भी मुझ को गुडि़या ले कर नहीं देता.’’

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मारिया के मुख से निकले ये शब्द किसी कटार की तरह सुरेश के सीने के आरपार हो गए थे. एक पल के लिए उस को ऐसा लगा था कि ‘बार्बी’ को अपने सीने से चिपकाए उस के सामने उस की अपनी बेटी मानसी खड़ी थी…वही मासूम आंखें…मासूम आंखों में वैसी ही ललक, वही अरमान…

उसी रात सुरेश की अपनी नजरों में अपनी ही मौत हो गई थी. वह मौत जिस को किसी दूसरे ने नहीं देखा था. इस गुपचुप मौत के बाद उस में कुछ भी सामान्य नहीं रहा था. अपनी बेटी के शरीर का स्पर्श ही सुरेश के लिए एक ऐसे दंश जैसा बन गया था जिस का दर्द उस से सहन नहीं होता था.

गोआ के एक होटल के कमरे में सुरेश को मारिया नाम की उस लड़की में मानसी नजर आई थी, अब मानसी में उस को मारिया नाम की लड़की की सूरत दिखने लगी थी. वह उन दोनों को अलग करने में स्वयं को असमर्थ महसूस कर रहा था.

उस मोड़ पर

भावनाओं की रौ में बह कर लिए गए फैसले हमेशा गलत होते हैं. चांदनी के प्यार में दीवाने हुए राजीव ने भी ऐसा ही एक फैसला किया उस से शादी करने का. लेकिन महत्त्वाकांक्षी चांदनी ने उसी राजीव के फैसले को इतनी बेदर्दी से ठुकरा दिया जिस के लिए उस ने अपना घर और घर वालों को छोड़ा था.

कभीकभी जीवन की सचाइयां वर्षों के फैसलों को पल भर में बदल देती हैं. प्यार और भावनाओं के आवेश में किए गए वादे दौलत की चमक के आगे बेमानी जान पड़ते हैं और इनसान को लगने लगता है कि उस के पांव के नीचे का धरातल कितना कमजोर था, उस के विश्वास की बुनियाद कितनी खोखली थी.

अपने विवाह के निमंत्रणपत्र को निहारते हुए ऐसे न जाने कितने विचार राजीव के मन को मथ रहे थे. उस की यादों में वे लमहे कौंध गए, जब शाम के समय वह और चांदनी सागर के किनारे रेत पर जा बैठते थे. चांदनी बारबार रेत पर उस के नाम के साथ अपना नाम लिखती जिसे सागर की लहरें आ कर मिटा देती थीं. तब वह उस की बांहों को थाम स्नेहसिक्त स्वर में कहती, ‘आज ये नासमझ लहरें भले ही तुम्हारे नाम के साथ लिखे मेरे नाम को मिटा डालें किंतु कल जब हम दोनों का विवाह हो जाएगा तब तुम्हारे नाम के साथ मेरे नाम को कौन मिटा पाएगा?’ उन लमहों को याद कर राजीव के होंठों पर एक विद्रूप सी मुसकान तैर गई और वह अतीत की गहराइयों में उतरता चला गया.

उस शाम लायंस क्लब में काव्य गोष्ठी का आयोजन था. कई बड़ेबड़े कवि वहां आए हुए थे. साहित्य में रुचि होने के कारण राजीव भी अकसर ऐसे कार्यक्रमों में जाया करता था. उस दिन एक 20-21 साल की युवती की काव्य रचना को काफी सराहा गया था. शब्दों का चयन और भावों की अभिव्यक्ति के बीच सुंदर तालमेल था. कार्यक्रम की समाप्ति पर वह उस लड़की के करीब पहुंचा और बोला, ‘आप बहुत अच्छा लिखती हैं, इतनी कम उम्र में विचारों में इतनी परिपक्वता कम ही देखने को मिलती है.’

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चांदनी हंस दी तो वह एकटक उसे निहारता रह गया था.

‘सच कहूं तो आप का नाम भी आप की कविता की तरह दिल को ठंडक पहुंचाने वाला है,’ वह बोला.

चांदनी खिलखिला पड़ी. उस की खनकती हंसी ऐसी थी मानो जलतरंग बज उठी हो. उस की सुंदर दंतपंक्तियों को देख लग रहा था मानो गुलाब की 2 पंखडि़यों के बीच में आकाश से तारे उतर कर सिमट गए हों.

राजीव मंत्रमुग्ध सा उसे निहारता ही रह गया. उसे लगा, चांदनी के रूप में विधाता ने स्वयं एक जीतीजागती काव्य रचना लिख डाली थी. जैसे ही घर जाने के लिए चांदनी ने बाहर की ओर कदम बढ़ाए, बादलों की गड़गड़ाहट ने बारिश की सूचना दे डाली.

चांदनी घबरा कर बोली, ‘अब मैं घर कैसे जाऊंगी?’

‘अगर आप को कोई एतराज न हो तो आप मेरे साथ कार में बैठ कर अपने घर चल सकती हैं,’ राजीव ने कहा.

पहले तो चांदनी के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभरे फिर परिस्थिति की मजबूरी को समझते हुए उस ने सहमति में गरदन हिला दी. राजीव चांदनी को उस के घर छोड़ कर अपने घर लौट आया.

राजीव शहर के सब से बड़े ज्वैलर्स विजय सहाय का छोटा बेटा था. उस से बड़े दोनों भाई संजय और अजय बी.ए. तक पढ़ाई कर के पिताजी के व्यवसाय में उन का हाथ बटा रहे थे किंतु राजीव की पढ़ने में रुचि अधिक थी इसलिए वह अपने ही शहर के एक प्रतिष्ठित कालिज से एम.बी.ए. की पढ़ाई कर रहा था. शाम को वह अपनी दुकान पर चला जाता था.

उस दिन भी राजीव कुछ ग्राहकों को आभूषण दिखा रहा था, जब चांदनी अपनी मां के साथ वहां आई. उसे देख वह प्रसन्न हो उठा. चांदनी भी उसे दुकान में देख कर हैरान रह गई थी.

‘अरे, तुम यहां? लगता है, पढ़ाई के साथसाथ  पार्टटाइम नौकरी भी करते हो?’

राजीव मुसकराया, ‘ऐसा ही कुछ समझ लो. फिर उस की मां से बोला, ‘हां, तो बताइए आंटी, क्या दिखाऊं?’

‘बेटी के लिए हलका सा हार चाहिए.’

‘अभी लीजिए,’ और इसी के साथ राजीव ने वार्डरोब से कई डब्बे निकाल कर उन के सामने रख दिए. एक के बाद एक कर के कई डब्बे देखने के बाद एक लाल मोतियों के हार पर चांदनी की नजर अटक गई. उस ने उस हार को अपने गले में पहना और खुद को शीशे में निहारते हुए राजीव से पूछा, ‘कैसा लग रहा है?’

प्रशंसात्मक नजरों से राजीव ने चांदनी को देखा और बोला, ‘आप के गले में पड़ कर यह हार नहीं जीत लग रहा है.’

‘हार से ज्यादा सुंदर तो आप की बातें हैं,’ चांदनी बोली, ‘क्या कीमत है इस की?’

‘किस की, हार की या मेरी जबान की?’ राजीव हंसा फिर बोला, ‘5 हजार रुपए.’

चांदनी ने हार खरीद लिया. राजीव ने अपने पिताजी से कह कर उस की कीमत कुछ कम करवा दी. चांदनी उस के हाथ से रसीद लेते हुए बोली थी, ‘लगता है तुम्हारा यहां अच्छा रसूख है.’

राजीव हंस दिया था. अगली शाम वह दुकान पर जब पहुंचा तो चांदनी को वहां पहले से ही आ कर बैठे देखा. वह उस के पिताजी से पूछ रही थी, ‘आप का वह राजीव नाम का कर्मचारी आज नहीं आया?’

पिताजी पहले तो हंसे, फिर बोले, ‘बेटी, वह मेरा कर्मचारी नहीं, मेरा सब से छोटा बेटा है.’

तभी चांदनी की नजर राजीव पर पड़ी. उस ने आंखें तरेर कर उस की तरफ देखा तो उस ने अभिवादन में हलका सा सिर झुका दिया.

चांदनी को हार के साथ के टाप्स चाहिए थे. राजीव ने एक हफ्ते बाद उसे आने के लिए कहा परंतु 3 दिन में ही टाप्स तैयार करवा कर वह उन्हें ले कर चांदनी के घर पहुंच गया.

राजीव को घर आया देख चांदनी बहुत खुश हुई और जल्दी से चाय बना कर ले आई. वह मध्यवर्गीय परिवार की लड़की थी. उस के पिता बिजली विभाग में क्लर्क थे. घर में मांबाप के अलावा एक छोटी बहन भी थी.

चाय पीते हुए चांदनी ने पूछा था, ‘राजीव, तुम इतने बड़े ज्वैलर्स के बेटे हो, घर का जमाजमाया व्यवसाय है, फिर भला तुम्हें एम.बी.ए. करने की क्या सूझी?’

‘मुझे शुरू से ही पढ़ाई का शौक रहा है. पढ़ाई कभी व्यर्थ नहीं जाती, चांदनी. एक न एक दिन काम आती  ही है,’ उस ने तर्क दिया.

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चांदनी ने कंधे उचकाए फिर लापरवाही से बोली, ‘पता नहीं, एम.बी.ए. तुम्हारे ज्वैलरी के व्यवसाय में क्या काम देगा? मेरे विचार में तो पढ़ाईलिखाई का चक्कर छोड़ कर तुम्हें जल्द से जल्द अपने व्यवसाय पर अपनी पकड़ मजबूत करनी चाहिए.’

राजीव खामोश रहा.

वह बोली, ‘क्या सोचने लगे?’

‘सोच रहा था कि अगली बार तुम्हारे घर किस बहाने से आऊंगा?’

उस की बात पर वह खिलखिला कर बोली, ‘राजीव, अब तुम्हें मेरे घर आने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं है. जब भी दिल करे बेझिझक आया करो.’

धीरेधीरे चांदनी, राजीव की अच्छी दोस्त बन गई. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ने लगा. दोस्ती के इस रिश्ते में कब प्यार की कोंपलें फूटने लगीं उसे पता ही नहीं चला. अकसर वह और चांदनी समुद्र के किनारे जा बैठते थे. ऐसी ही एक सुनहरी शाम को राजीव ने चांदनी का हाथ अपने हाथ में ले कर पूछा था, ‘चांदनी, मुझ से शादी करोगी?’

यह सुन कर उस के गाल शर्म से  लाल हो उठे थे. वह बोली थी, ‘तुम इतने पैसे वाले बाप के बेटे हो. तुम से विवाह करने का सौभाग्य मिले, इस से ज्यादा खुशी की बात मेरे लिए और क्या हो सकती है? मेरे घर वाले तुरंत राजी हो जाएंगे.’

चांदनी का जवाब पा कर राजीव का मन मयूर नाच उठा था किंतु साथ ही उसे यह चिंता भी थी कि पिताजी प्रेम विवाह के सख्त खिलाफ थे. मंझले भैया एक लड़की को चाहते थे पर पिताजी ने उन की एक न सुनी और भाई का विवाह अपनी पसंद की लड़की से कर दिया. चांदनी के साथ उस के प्रेम की बात उन के कानों में पड़ेगी, तब पता नहीं उन पर क्या प्रतिक्रिया हो. आखिर उस ने सबकुछ समय पर छोड़ दिया.

राजीव का एम.बी.ए. पूरा हो चुका था. अब वह पिताजी के साथ पूरी तरह उन के व्यवसाय में व्यस्त हो गया. एक दिन उस के पिताजी ने काम के सिलसिले में उसे देहरादून जाने के लिए कहा और बोले, ‘देखो बेटे, देहरादून में मेरे बचपन का दोस्त लक्ष्मीकांत रहता है. तुम उन्हीं के घर ठहरना. लक्ष्मीकांत का भी देहरादून में ज्वैलरी का व्यवसाय है. तुम अपने काम में उन की मदद लोगे तो तुम्हारा काम जल्दी हो जाएगा.

देहरादून पहुंच कर राजीव को लक्ष्मीकांत की कोठी तलाशने में कोई कठिनाई नहीं हुई. उसे देख कर वह बहुत प्रसन्न हुए. ड्राइंगरूम में राजीव को बैठा कर उन्होंने आवाज लगाई, ‘अरे, पूजा बेटी, राजीव आ गया है. चाय ले कर आओ.’

थोड़ी देर बाद परदा हटा और ट्रे हाथ में लिए पूजा ने कमरे में प्रवेश किया. लक्ष्मीकांतजी ने राजीव से पूजा का परिचय कराया तो वह धीरे से ‘हैलो’ बोली और नजरें नीची किए चाय बनाने लगी.

दोनों को चाय दे कर जब वह जाने को हुई तो लक्ष्मीकांत बोले, ‘पूजा बेटी, राजीव हमारे घर दोचार दिन रुकेगा. यह पहली बार देहरादून आया है, इसे घुमाना तुम्हारा काम है.’

‘ठीक है, पापा. आज शाम को मैं इन्हें सहस्रधारा ले कर जाऊंगी.’

नाश्ता कर के राजीव और लक्ष्मीकांत काम के सिलसिले में बाहर चले गए. शाम को वह वापस लौटा तो पूजा तैयार खड़ी थी. दोनों कार से सहस्रधारा पहुंचे. सहस्रधारा का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता था.

पूजा व राजीव दोनों पानी के बीच में पड़े पत्थरों पर बैठ गए.

राजीव ने पूछा, ‘पूजा, आजकल तुम क्या कर रही हो?’

‘एम.ए. करने के साथसाथ मैं ज्वैलरी डिजाइनिंग का कोर्स कर रही हूं ताकि पापा के व्यवसाय में उन का हाथ बटा सकूं,’ पूजा बोली थी, ‘और तुम क्या कर रहे हो?’ उस ने राजीव से पूछा.

‘मैं ने एम.बी.ए. किया है. अब पिताजी के व्यवसाय में हाथ बंटा रहा हूं.’

‘एम.बी.ए. कर के तुम कोई दूसरा काम भी कर सकते हो. किसी कंपनी में नौकरी कर सकते हो. मार्केटिंग कर सकते हो. टीचिंग भी कर सकते हो.’

‘सलाह तुम अच्छी दे रही हो किंतु मुझे यह सब करने की क्या जरूरत है, जब पिताजी का जमाजमाया व्यवसाय है.’

‘तुम्हारे बारे में तो मैं नहीं जानती पर अपने बारे में मैं बता सकती हूं कि तुम्हारी जगह अगर मैं होती तो कम से कम कुछ महीनों तक अपने बलबूते अपने पैरों पर खड़ी होने का प्रयास जरूर करती. मुझे पता तो चलता कि मेरे अंदर कितनी क्षमता है,’ पूजा एक पल के लिए रुकी थी फिर बोली, ‘जीवन में अपनी अलग पहचान बनानी भी बहुत जरूरी है. संघर्ष करने से इनसान के जीवन में निखार आता है. पापा का व्यवसाय तो कभी भी अपनाया जा सकता है.’

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राजीव पूजा की बातों से बहुत प्रभावित हुआ था. शाम हो चली थी. घर जाने के लिए दोनों उठ खड़े हुए. अभी राजीव ने कदम आगे बढ़ाया ही था कि अचानक पत्थर पर से पैर फिसल गया. इस से पहले कि वह लड़खड़ा कर गिरता, पूजा ने उसे संभाल लिया था. दर्द की तीखी लहर उस के शरीर में दौड़ गई थी.

‘लगता है पांव में मोच आ गई है,’ राजीव ने अपना पांव मसलते हुए कहा.

‘एक मिनट  ठहरो,’ पूजा तेजी से कार की ओर लपकी और वहां से दवा का डब्बा उठा लाई. दर्द की दवा पैर पर मल कर उस ने क्रेप बैंडेज बांध दी. पूजा ने ड्राइविंग सीट संभाल ली. राजीव उस के बराबर में जा बैठा और वह दक्षता से कार चलाती हुई उसे घर ले आई थी.

3 दिन देहरादून में रुक कर राजीव अपने घर लौट आया. अपने मित्र का हालचाल जानने के बाद पिताजी बोले, ‘राजीव, पूजा तुम्हें कैसी लगी?’

‘पिताजी, पूजा बहुत अच्छी लड़की है. बहुत बुद्धिमान और साहसी. आजकल ज्वैलरी डिजाइनिंग का कोर्स कर रही है.’

‘मुझे पूरी उम्मीद थी कि पूजा तुम्हें पसंद आएगी,’ पिताजी बोले, ‘बेटे, मैं और लक्ष्मीकांत तुम्हारा और पूजा का विवाह करना चाहते हैं.’

‘क्या? पिताजी, ऐसा कैसे हो सकता है?’ राजीव ने हैरानी से मां और पिताजी को बारीबारी से देखा.

‘क्यों नहीं हो सकता? पूजा अच्छी लड़की है. घर अच्छा है, फिर तुम्हें और क्या चाहिए?’ पिताजी ने उसे घूरा.

राजीव की उन से कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई. वह उठ कर अपने कमरे में आ गया.

मां राजीव के कमरे में आईं और उस के समीप बैठ कर स्नेह से बोलीं, ‘मुझे बता बेटा, क्या बात है? क्या पूजा तुझे पसंद नहीं?’

उस दिन सबकुछ बताने का समय आ गया था, राजीव ने मां की तरफ देखा. हिम्मत जुटा कर धीमे स्वर में बोला, ‘मां, मैं चांदनी से प्यार करता हूं. यही सच है और एक न एक दिन आप सब को इस सचाई को स्वीकारना ही पड़ेगा.’

‘तू जानता है राजीव, तेरे पिताजी यह बात कभी नहीं मानेंगे. उन के दिल में तेरे विवाह को ले कर कितने अरमान हैं. क्या बीतेगी उन के दिल पर, जब उन्हें यह पता चलेगा?’ मां के चेहरे पर चिंता की लकीरें सिमट आईं.

‘मां, पिताजी के अरमानों के लिए क्या मैं अपने प्यार को कुर्बान कर दूं?’

‘मेरे लिए किसी को कोई कुर्बानी देने की जरूरत नहीं है राजीव की मां,’ पिताजी ने कमरे में आते हुए कहा और कुरसी खींच कर बैठते हुए बोले, ‘देखो राजीव, पिता होने के नाते तुम्हें समझाना मेरा फर्ज है. विवाह कोई हंसीखेल नहीं. जीवन भर का बंधन है. तुम्हारा भाई अजय भी यह गलती करने जा रहा था पर वक्त रहते वह संभल गया. देखो, मैं कितनी अच्छी बहू लाया हूं उस के लिए. आज वह कितना खुश है.’

‘भैया संभले नहीं थे, आप से डर गए थे इसलिए आप के आगे झुक गए. पर मैं झुकने वाला नहीं. अपने प्यार का बलिदान नहीं कर सकता मैं.’

‘अच्छा बताओ, तुम कितने दिन से चांदनी को जानते हो?’ राजीव की ओर देख पिताजी व्यंग्यात्मक लहजे में बोले.

‘लगभग 6 माह से,’ धीमे स्वर में राजीव बोला.

‘और मैं ने पूजा को बचपन से बड़ा होते देखा है. 15 साल की थी वह जब उस की मां चल बसी थीं. तभी से उस ने अपने घर को संभाल लिया था. उस में बहुत ठहराव है…’

अपने पिताजी की बात बीच में काटते हुए राजीव बोला, ‘आप और मां एक बार चांदनी को देख तो लीजिए. पिताजी, चांदनी बहुत सुंदर है. उस के संस्कार बहुत ऊंचे हैं, जबकि आधुनिक परिवेश में पलीबढ़ी पूजा हमेशा जींस टाप पहने रहती है. ऐसी लड़की हमारे घर में कैसे सामंजस्य बैठा पाएगी?’

‘देखो राजीव, किसी के पहनावे से उस के संस्कारों का पता नहीं चलता है. चांदनी एक साधारण परिवार की लड़की है. मैं दावे से नहीं कह रहा हूं पर इस बात की संभावना हो सकती है कि वह तुम से  नहीं तुम्हारे पैसे से प्यार करती हो.’

अपने पिताजी की बात पर राजीव गुस्से से भन्ना कर बोला, ‘आप समझते हैं कि दुनिया में पैसा ही सबकुछ है, भावनाएं कुछ भी नहीं. आप को अपने पैसे पर इतना ही घमंड है तो मैं अभी यह घर छोड़ कर चला जाता हूं. आप को अपने पैरों पर खड़ा हो कर दिखाऊंगा. आप का पैसा और रुतबा न होने पर भी चांदनी मुझ से ही शादी करेगी, देख लीजिएगा.’

‘अगर ऐसा हुआ तो मैं खुद अपनी बहू को घर ले कर आऊंगा,’ पिताजी बोले.

राजीव ने अपने कपड़े अटैची में रखे और मां पिताजी के पांव छू अटैची उठा घर से बाहर आ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कहां जाए, तभी सौरभ का खयाल आते ही वह आटो पकड़ कर सौरभ के घर की ओर चल दिया.

सौरभ को राजीव ने सारी स्थिति बता दी तो वह बोला, ‘घर से तू चला आया, अब करेगा क्या?’

‘कुछ न कुछ तो करूंगा ही. चांदनी को पाने के लिए अपनी अलग पहचान बनाना बहुत जरूरी है.’

शाम को राजीव काफी हाउस में चांदनी से मिला और सारे हालात के बारे में उसे बताया. घर से अलग होने की बात सुन कर चांदनी स्तब्ध रह गई. वह नाराजगी जाहिर करते हुए बोली, ‘राजीव, तुम्हें घर नहीं छोड़ना चाहिए था. घर में रह कर भी तो तुम पिताजी को मना सकते थे.’

‘पिताजी मानने वाले नहीं थे, फिर अजय भैया के वक्त भी वह कहां माने थे? आखिरकार भाई को ही झुकना पड़ा था. मैं नहीं चाहता कि हमारे प्यार का भी वही हश्र हो इसलिए मुझे घर छोड़ना पड़ा.’

‘किंतु राजीव, मैं नहीं चाहती कि मेरी खातिर तुम अपने घर वालों को छोड़ो. लोग तो मुझे ही बुरा कहेंगे न.’

‘जिसे जो कहना है, कहने दो. मुझे किसी की परवा नहीं है. मैं अपना घर छोड़ सकता हूं चांदनी, किंतु तुम्हें नहीं छोड़ सकता.’

‘फिर अब क्या करने का इरादा है?’

‘अब नौकरी तलाश करूंगा. तुम निराश मत हो चांदनी, सब ठीक हो जाएगा.’

एक माह के अंदर ही राजीव को नौकरी मिल गई. एक प्रोफेशनल कालिज में वह बी.बी.ए. के छात्रों को पढ़ाने लगा. शाम के समय 9वीं और 10वीं के बच्चे उस के पास ट्यूशन पढ़ने आने  लगे थे. इस से अच्छी आमदनी होने लगी थी उसे. कुछ दिन बाद राजीव ने सौरभ के घर के पास ही एक फ्लैट किराए पर ले लिया. अब वह बहुत खुश था. उस का एम.बी.ए. करना सार्थक हो गया था. धीरेधीरे घर की आवश्यक वस्तुएं जुटाने में 3 माह बीत गए.

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एक रात वह अपने कमरे में बैठा टेलीविजन पर फिल्म देख रहा था, तभी बड़े भैया का फोन आया, ‘राजीव, जल्दी से सिटी नर्सिंगहोम पहुंचो, मां को हार्टअटैक पड़ा है.’

राजीव का दिल धक् से रह गया. जल्दी से स्कूटर स्टार्ट कर वह नर्सिंगहोम पहुंचा. घर के सभी सदस्य आई.सी.यू. के बाहर जमा थे. वह पिताजी के निकट चला आया, उसे देख उन की आंखें भर आईं. उन के हाथों को कस कर थाम राजीव रुंधे कंठ से बोला, ‘हिम्मत रखिए पिताजी, मां को कुछ नहीं होगा?’

‘दर्द में भी तुम्हारी मां बारबार तुम्हें ही याद कर रही थी,’ कहते हुए पिताजी फूटफूट कर रो पड़े थे.

राजीव ने उन्हें बहुत मुश्किल से संभाला. 1 घंटे बाद डाक्टर आई.सी.यू. से बाहर निकले. मां अब खतरे से बाहर थीं. सारी रात हम ने आंखों में काट दी. सुबह नर्स ने आ कर सूचना दी कि आप लोग मां से मिल सकते हैं. पहले राजीव और पिताजी मां के पास गए. राजीव को देख उन के चेहरे पर हलकी सी मुसकराहट आई. अपलक उसे देखती मां ने धीमे स्वर में कहा, ‘राजीव बेटे, तू घर लौट आ. मैं तेरे बगैर जी नहीं पाऊंगी.’

एक हफ्ता नर्सिंगहोम में रह कर मां घर आ गईं. मां और पिताजी के कहने पर राजीव ने अपना फ्लैट छोड़ दिया और सामान ले कर घर वापस आ गया. चांदनी उन दिनों अपनी मौसी के पास गई हुई थी, इसलिए वह उसे कुछ भी न बता सका.’

एक शाम मां और पिताजी के पास राजीव लान में बैठा था तो पिताजी बोले, ‘राजीव, तुम चांदनी से विवाह की बात कर लो. मैं और तुम्हारी मां जल्द से जल्द उस के मांबाप से मिलना चाहते हैं.’

राजीव का दिल उमंग से भर उठा. एक सप्ताह बाद चांदनी लौटी तो वह उस से मिलने पहुंचा. उस दिन वह गुलाबी साड़ी और सफेद मोतियों के हार में बहुत खूबसूरत लग रही थी. उस की आंखों में झांक कर राजीव बोला था, ‘चांदनी, अब वक्त आ गया है कि तुम दुलहन बन कर मेरे घर आ जाओ. बताओ, मैं तुम्हारे घर वालों से कब बात करने आऊं?’

राजीव ने उस से यह बात छिपा ली कि उस के घर वाले अब उस से विवाह के लिए राजी थे. उस ने सोचा कि जब अचानक मां और पिताजी को ले कर वह चांदनी के घर पहुंचेगा, तब उसे कितनी प्रसन्नता मिलेगी.

चांदनी कुछ क्षण खामोश रही फिर बोली, ‘पहले मैं तुम से कुछ मांगना चाहती हूं, बताओ दोगे?’

‘मांगो, क्या मांगती हो? कहो तो आसमान से चांदसितारे तोड़ कर तुम्हारे कदमों में बिछा दूं,’ मुसकराते हुए राजीव बोला.

‘राजीव, मजाक मत करो. मैं गंभीर हूं.’

अब वह भी संजीदा हो उठा. सवालिया नजरों से उस की तरफ देखा था.

‘राजीव, मैं चाहती हूं कि विवाह से पहले तुम अपनी नौकरी छोड़ दो और अपने पिताजी का बिजनेस संभाल लो.’

‘लेकिन क्यों? अच्छीभली नौकरी है, क्या बुराई है इस में,’ राजीव ने हैरत से उस की तरफ देखा.

‘बुराई कुछ भी नहीं परंतु सोचो, कहां यह 2 हजार रुपए की छोटी सी नौकरी और कहां तुम्हारे पिताजी का लाखों का बिजनेस. उस में जो शान और इज्जत होगी वह तुम्हारी इस नौकरी में नहीं होगी.’

‘और कुछ?’ चांदनी का चेहरा गौर से देखते हुए राजीव बोला.

‘विवाह से पहले, उस 2 कमरों के फ्लैट को छोड़ कर अपनी कोठी में चले आओ, क्योंकि तुम्हारे घर से अलग रहने पर तुम्हारी इतनी बड़ी कोठी पर तुम्हारे दोनों भाइयों का कब्जा हो जाएगा.’

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‘अच्छा हुआ चांदनी, विवाह से पहले ही तुम ने अपने मन की बात साफ कह दी,’ बुझे मन से राजीव बोला.

‘मेरी बात का बुरा मत मानना राजीव, हर लड़की की कुछ आकांक्षाएं होती हैं, कुछ सपने होते हैं. मैं ने हमेशा अभाव में जीवन काटा है. बचपन से मेरी इच्छा थी कि किसी बहुत बड़े आदमी के बेटे से मेरा विवाह हो. मैं भी कारों में घूमूं, आलीशान कोठी में रहूं. आज मेरा सपना पूरा होने जा रहा है तो तुम इसे व्यर्थ के आत्मसम्मान के चक्कर में पड़ कर मत तोड़ो,’ चांदनी विनती करते हुए बोली.

राजीव चुपचाप उठ कर वहां से चला आया और सीधे घर न जा कर समुद्र के किनारे रेत पर जा बैठा और आतीजाती लहरों को देखने लगा. कितनी शामें उस ने यहां चांदनी के साथ बिताई थीं. भविष्य के कितने सतरंगी सपने संजोए थे. किंतु आज उसे सबकुछ अर्थहीन लग रहा था. रहरह कर पूजा की कही बातें उस के जेहन में गूंज रही थीं :

‘अपने बलबूते कुछ करने का प्रयास करो. थोड़ा सा भी कमाओगे तो तुम्हारा आत्मविश्वास बढ़ेगा. तुम्हें सच्ची खुशी हासिल होगी.’

कितना फर्क था दोनों की सोच में. अब राजीव को अपने जीवन का फैसला लेने में अधिक देर नहीं लगी. शांत मन से वह घर चला आया और मां और पिताजी से बोला था, ‘पिताजी, मैं पूजा से विवाह करना चाहता हूं.’

आश्चर्य से वे दोनों बेटे का चेहरा देखने लगे.

‘आप ने बिलकुल ठीक कहा था पिताजी कि भावावेश में लिए गए फैसले अकसर गलत होते हैं. आप का अनुमान सही था. चांदनी मुझ से नहीं बल्कि आप के पैसे से प्यार करती थी. अच्छा ही हुआ पिताजी, जो आप ने उस दिन मुझे घर से जाने दिया, अन्यथा मुझे चांदनी की भावनाओं का कभी पता नहीं चलता. जीवन का वह मोड़ मेरे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण था. उसी मोड़ पर आ कर मैं भंवर में फंसने से बच गया. मेरे जीवन को सही दिशा मिली.’

‘अच्छी तरह सोच लो राजीव, तुम्हें अपने फैसले पर अफसोस तो नहीं होगा?’ पिताजी बोले.

‘अब कैसा अफसोस पिताजी? मैं उस मृगतृष्णा से बाहर आ चुका हूं. पूजा जैसे हीरे को छोड़ मैं पत्थर तराश रहा था.’

पिताजी उठे और देहरादून फोन कर के लक्ष्मीकांत को यह खुशखबरी सुनाने चल दिए मां और भाभियां विवाह की तैयारियों में जुट गईं.

सोचते-सोचते राजीव अतीत से वर्तमान में आ गया.

अधिकारों वाली अधिकारी…

शेखपुरा की डीएम इनायत खान 

लेकिन गिनेचुने अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो अपनी परवरिश को ध्यान में रखते हुए जमीन से जुड़े रहते हैं. इनायत खान उन्हीं अधिकारियों में से हैं…

नींद में देखे गए सपने और खुली आंखों से सपने देखना अलगअलग बातें हैं. क्योंकि नींद में दिखने वाले सपने

कोई जरूरी नहीं कि सुबह तक याद रह जाएं. और अगर याद रह भी जाएं तो उन का कोई महत्त्व नहीं होता. जबकि खुली आंखों से दिखने वाले सपनों का वजूद कल्पनाओं की कमजोर टांगों पर टिका होता है.

कहने का अभिप्राय यह कि कल्पना की कडि़यों को जोड़ कर बुने गए सपने हानिकारक भले ही न हों, लेकिन उन का वजूद बुलबुले की तरह होता है, जो हवा के जरा से झोंके में नेस्तनाबूद हो जाता है.

एक और कहावत है सपनों के पीछे भागना. हर पढ़ालिखा समझदार इंसान अपने भविष्य के लिए एक राह चुनता है और उसी पर चलने की कोशिश करता है. मेहनत और लगन से मनचाही राह पर चल कर कई लोग अपनी मंजिल तक पहुंच भी जाते हैं. इसी को कहते हैं सपनों के पीछे भागना. लेकिन इस में कोई दो राय नहीं कि सपनों के पीछे भागने वालों में से कम ही लोगों को सफलता मिल पाती है.

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हां, जो सफल होते हैं, उन में से कुछ दूसरों की बनाई घिसीपिटी राह पर चलते हैं और कुछ अपने लिए नया मुकाम तय करते हैं. ऐसे ही लोगों में हैं इनायत खान, जिन्होंने हाल ही में बिहार के जिला शेखपुरा के जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाली है.

आगरा के एक मध्यमवर्गीय परिवार की इनायत खान ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रैट की कुरसी तक पहुंचने के लिए कम मेहनत नहीं की. वह पूरी लगन और मेहनत से अपने सपनों के पीछे भागती रहीं और अंतत: उन्हें 2011 में सफलता मिल ही गई.

इनायत खान ने उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले आनंद इंजीनियरिंग कालेज से 2007 में इलैक्ट्रौनिक्स में बी.टेक किया था. इस के बाद उन्होंने एक साल तक एक प्रसिद्ध सौफ्टवेयर कंपनी में नौकरी की. लेकिन वहां उन का मन नहीं लगा, इस की वजह उन का आईएएस बनने का सपना भी था, जिस के पीछे वह भाग रही थीं.

अपने सपने को सच करने के लिए उन्होंने 2009 में पहली बार सिविल सेवा परीक्षा दी. इस में वह प्री में तो निकल गईं, लेकिन फाइनल में नहीं निकल पाईं. इसी बीच इनायत का चयन ग्रामीण बैंक में हो गया. लेकिन मेहनती इनायत को इस तरह की नौकरी नहीं चाहिए थी. इसलिए वह आगरा से दिल्ली आ गईं और मुखर्जीनगर के पास गांधी विहार में किराए का एक कमरा ले कर आईएएस की तैयारी में जुट गईं.

2011 में इनायत ने फिर से सिविल सेवा की परीक्षा दी. इस बार वह सफल रहीं. उन का नंबर था 176. उन्हें कैडर मिला बिहार. इनायत की पहली पोस्टिंग नालंदा में हुई, जहां उन्हें असिस्टेंट कलेक्टर बनाया गया. इस के बाद उन्हें एसडीओ बना कर राजगीर भेज दिया गया.

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अब तक इनायत खान बहुत कुछ सीखसमझ चुकी थीं. मसलन अपने अधीनस्थों से कैसे काम लेना है. उन के खुद के काम क्या हैं और अधिकार क्या. राजगीर के बाद इनायत की पोस्टिंग भोजपुर में हुई. वहां उन्होंने बतौर डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कमिश्नर (डीडीसी) का पद संभाला. यहीं से इनायत खान की अलग पहचान बननी शुरू हुई, एकदम कड़क अफसर की इमेज. भोजपुर आ कर उन्हें पता चला कि डेवलपमेंट कमेटी का औफिस बाबुओं के बूते पर चलता है.

बाबुओं और छोटे अफसरों पर शिकंजा कसने के लिए इनायत खान ने सब से पहले प्रखंड के प्रत्येक औफिस में सीसीटीवी कैमरा और अटेंडेंस के लिए बायोमीट्रिक मशीनें लगवाई ताकि सभी समय पर आएंजाएं और कैमरों की जद में रहें.

इतना ही नहीं, वह कार्यालय परिसर में कुरसी लगवा कर बैठ जाती थीं. वहां ऐसे कई लोग थे जो रोज पटना आतेजाते थे. इनायत ने इन सब की क्लास ली और भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी. इस से मनमौजी अफसरों की गतिविधियों पर अंकुश लग गया.

कई बार इनायत जिले में चल रहे कामों का औचक निरीक्षण करने के लिए जाती तो गाड़ी दूर खड़ी करा देतीं और पैदल ही कार्यस्थल पहुंच जातीं. इस से काम कराने वालों के मन में डर रहता था कि कहीं इनायत न आ जाएं. वहां के अफसर और बाबू चाहते थे कि इनायत का जल्दी से जल्दी ट्रांसफर हो जाए.

जल्दी ही उन का तबादला हो भी गया. उन्हें पर्यटन विभाग का संयुक्त सचिन बनाया गया. इस के साथ ही उन्हें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया. यहां से इनायत खान को शेखपुरा का 21वां जिलाधिकारी बना कर भेजा गया, जहां वह बखूबी अपना काम कर रही हैं.

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इनायत खान तेजतर्रार अधिकारी तो हैं ही, साथ ही सामाजिक कार्यों से भी गहराई से जुड़ी रहती हैं. उन में दूसरों का दर्द समझने का भी माद्दा है. 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों से भरी बस पर आतंकी हमला हुआ और 40 जवान शहीद हो गए. शहीद होने वालों में बिहार के भी 2 जवान रतन कुमार ठाकुर और संजय सिन्हा शामिल थे.

इनायत खान ने आगे बढ़ कर रतन कुमार और संजय सिन्हा की एकएक बेटी को गोद लेने का ऐलान किया. इन दोनों बच्चियां की पढ़ाई और उन की परवरिश पर होने वाला खर्च वह आजीवन उठाएंगी. इतना ही नहीं, उन्होंने अपना एक दिन का वेतन भी शहीदों के परिवारों को दिया और अपने स्टाफ से भी ऐसा करने को कहा. द्य

 

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