शेखपुरा की डीएम इनायत खान 

लेकिन गिनेचुने अधिकारी ऐसे भी होते हैं, जो अपनी परवरिश को ध्यान में रखते हुए जमीन से जुड़े रहते हैं. इनायत खान उन्हीं अधिकारियों में से हैं…

नींद में देखे गए सपने और खुली आंखों से सपने देखना अलगअलग बातें हैं. क्योंकि नींद में दिखने वाले सपने

कोई जरूरी नहीं कि सुबह तक याद रह जाएं. और अगर याद रह भी जाएं तो उन का कोई महत्त्व नहीं होता. जबकि खुली आंखों से दिखने वाले सपनों का वजूद कल्पनाओं की कमजोर टांगों पर टिका होता है.

कहने का अभिप्राय यह कि कल्पना की कडि़यों को जोड़ कर बुने गए सपने हानिकारक भले ही न हों, लेकिन उन का वजूद बुलबुले की तरह होता है, जो हवा के जरा से झोंके में नेस्तनाबूद हो जाता है.

एक और कहावत है सपनों के पीछे भागना. हर पढ़ालिखा समझदार इंसान अपने भविष्य के लिए एक राह चुनता है और उसी पर चलने की कोशिश करता है. मेहनत और लगन से मनचाही राह पर चल कर कई लोग अपनी मंजिल तक पहुंच भी जाते हैं. इसी को कहते हैं सपनों के पीछे भागना. लेकिन इस में कोई दो राय नहीं कि सपनों के पीछे भागने वालों में से कम ही लोगों को सफलता मिल पाती है.

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हां, जो सफल होते हैं, उन में से कुछ दूसरों की बनाई घिसीपिटी राह पर चलते हैं और कुछ अपने लिए नया मुकाम तय करते हैं. ऐसे ही लोगों में हैं इनायत खान, जिन्होंने हाल ही में बिहार के जिला शेखपुरा के जिलाधिकारी की जिम्मेदारी संभाली है.

आगरा के एक मध्यमवर्गीय परिवार की इनायत खान ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रैट की कुरसी तक पहुंचने के लिए कम मेहनत नहीं की. वह पूरी लगन और मेहनत से अपने सपनों के पीछे भागती रहीं और अंतत: उन्हें 2011 में सफलता मिल ही गई.

इनायत खान ने उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले आनंद इंजीनियरिंग कालेज से 2007 में इलैक्ट्रौनिक्स में बी.टेक किया था. इस के बाद उन्होंने एक साल तक एक प्रसिद्ध सौफ्टवेयर कंपनी में नौकरी की. लेकिन वहां उन का मन नहीं लगा, इस की वजह उन का आईएएस बनने का सपना भी था, जिस के पीछे वह भाग रही थीं.

अपने सपने को सच करने के लिए उन्होंने 2009 में पहली बार सिविल सेवा परीक्षा दी. इस में वह प्री में तो निकल गईं, लेकिन फाइनल में नहीं निकल पाईं. इसी बीच इनायत का चयन ग्रामीण बैंक में हो गया. लेकिन मेहनती इनायत को इस तरह की नौकरी नहीं चाहिए थी. इसलिए वह आगरा से दिल्ली आ गईं और मुखर्जीनगर के पास गांधी विहार में किराए का एक कमरा ले कर आईएएस की तैयारी में जुट गईं.

2011 में इनायत ने फिर से सिविल सेवा की परीक्षा दी. इस बार वह सफल रहीं. उन का नंबर था 176. उन्हें कैडर मिला बिहार. इनायत की पहली पोस्टिंग नालंदा में हुई, जहां उन्हें असिस्टेंट कलेक्टर बनाया गया. इस के बाद उन्हें एसडीओ बना कर राजगीर भेज दिया गया.

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अब तक इनायत खान बहुत कुछ सीखसमझ चुकी थीं. मसलन अपने अधीनस्थों से कैसे काम लेना है. उन के खुद के काम क्या हैं और अधिकार क्या. राजगीर के बाद इनायत की पोस्टिंग भोजपुर में हुई. वहां उन्होंने बतौर डिस्ट्रिक्ट डेवलपमेंट कमिश्नर (डीडीसी) का पद संभाला. यहीं से इनायत खान की अलग पहचान बननी शुरू हुई, एकदम कड़क अफसर की इमेज. भोजपुर आ कर उन्हें पता चला कि डेवलपमेंट कमेटी का औफिस बाबुओं के बूते पर चलता है.

बाबुओं और छोटे अफसरों पर शिकंजा कसने के लिए इनायत खान ने सब से पहले प्रखंड के प्रत्येक औफिस में सीसीटीवी कैमरा और अटेंडेंस के लिए बायोमीट्रिक मशीनें लगवाई ताकि सभी समय पर आएंजाएं और कैमरों की जद में रहें.

इतना ही नहीं, वह कार्यालय परिसर में कुरसी लगवा कर बैठ जाती थीं. वहां ऐसे कई लोग थे जो रोज पटना आतेजाते थे. इनायत ने इन सब की क्लास ली और भविष्य में ऐसा न करने की चेतावनी दी. इस से मनमौजी अफसरों की गतिविधियों पर अंकुश लग गया.

कई बार इनायत जिले में चल रहे कामों का औचक निरीक्षण करने के लिए जाती तो गाड़ी दूर खड़ी करा देतीं और पैदल ही कार्यस्थल पहुंच जातीं. इस से काम कराने वालों के मन में डर रहता था कि कहीं इनायत न आ जाएं. वहां के अफसर और बाबू चाहते थे कि इनायत का जल्दी से जल्दी ट्रांसफर हो जाए.

जल्दी ही उन का तबादला हो भी गया. उन्हें पर्यटन विभाग का संयुक्त सचिन बनाया गया. इस के साथ ही उन्हें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया. यहां से इनायत खान को शेखपुरा का 21वां जिलाधिकारी बना कर भेजा गया, जहां वह बखूबी अपना काम कर रही हैं.

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इनायत खान तेजतर्रार अधिकारी तो हैं ही, साथ ही सामाजिक कार्यों से भी गहराई से जुड़ी रहती हैं. उन में दूसरों का दर्द समझने का भी माद्दा है. 14 फरवरी, 2019 को पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों से भरी बस पर आतंकी हमला हुआ और 40 जवान शहीद हो गए. शहीद होने वालों में बिहार के भी 2 जवान रतन कुमार ठाकुर और संजय सिन्हा शामिल थे.

इनायत खान ने आगे बढ़ कर रतन कुमार और संजय सिन्हा की एकएक बेटी को गोद लेने का ऐलान किया. इन दोनों बच्चियां की पढ़ाई और उन की परवरिश पर होने वाला खर्च वह आजीवन उठाएंगी. इतना ही नहीं, उन्होंने अपना एक दिन का वेतन भी शहीदों के परिवारों को दिया और अपने स्टाफ से भी ऐसा करने को कहा. द्य

 

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