पहला-पहला प्यार

लेखक- शन्नो श्रीवास्तव

‘‘दा,तुम मेरी बात मान लो और आज खाने की मेज पर मम्मीपापा को सारी बातें साफसाफ बता दो. आखिर कब तक यों परेशान बैठे रहोगे?’’

बच्चों की बातें कानों में पड़ीं तो मैं रुक गई. ऐसी कौन सी गलती विकी से हुई जो वह हम से छिपा रहा है और उस का छोटा भाई उसे सलाह दे रहा है. मैं ‘बात क्या है’ यह जानने की गरज से छिप कर उन की बातें सुनने लगी.

‘‘इतना आसान नहीं है सबकुछ साफसाफ बता देना जितना तू समझ रहा है,’’ विकी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘दा, यह इतना मुश्किल भी तो नहीं है. आप की जगह मैं होता तो देखते कितनी स्टाइल से मम्मीपापा को सारी बातें बता भी देता और उन्हें मना भी लेता,’’ इस बार विनी की आवाज आई.

‘‘तेरी बात और है पर मुझ से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं होगी,’’ यह आवाज मेरे बड़े बेटे विकी की थी.

‘‘दा, आप ने कोई अपराध तो किया नहीं जो इतना डर रहे हैं. सच कहूं तो मुझे ऐसा लगता है कि मम्मीपापा आप की बात सुन कर गले लगा लेंगे,’’ विनी की आवाज खुशी और उत्साह दोनों से भरी हुई थी.

‘बात क्या है’ मेरी समझ में कुछ नहीं आया. थोड़ी देर और खड़ी रह कर उन की आगे की बातें सुनती तो शायद कुछ समझ में आ भी जाता पर तभी प्रेस वाले ने डोर बेल बजा दी तो मैं दबे पांव वहां से खिसक ली.

बच्चों की आधीअधूरी बातें सुनने के बाद तो और किसी काम में मन ही नहीं लगा. बारबार मन में यही प्रश्न उठते कि मेरा वह पुत्र जो अपनी हर छोटीबड़ी बात मुझे बताए बिना मुंह में कौर तक नहीं डालता है, आज ऐसा क्या कर बैठा जो हम से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. सोचा, चल कर साफसाफ पूछ लूं पर फिर लगा कि बच्चे क्या सोचेंगे कि मम्मी छिपछिप कर उन की बातें सुनती हैं.

जैसेतैसे दोपहर का खाना तैयार कर के मेज पर लगा दिया और विकीविनी को खाने के लिए आवाज दी. खाना परोसते समय खयाल आया कि यह मैं ने क्या कर दिया, लौकी की सब्जी बना दी. अभी दोनों अपनीअपनी कटोरी मेरी ओर बढ़ा देंगे और कहेंगे कि रामदेव की प्रबल अनुयायी माताजी, यह लौकी की सब्जी आप को ही सादर समर्पित हो. कृपया आप ही इसे ग्रहण करें. पर मैं आश्चर्यचकित रह गई यह देख कर कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उलटा दोनों इतने मन से सब्जी खाने में जुटे थे मानो उस से ज्यादा प्रिय उन्हें कोई दूसरी सब्जी है ही नहीं.

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बात जरूर कुछ गंभीर है. मैं ने मन में सोचा क्योंकि मेरी बनाई नापसंद सब्जी या और भी किसी चीज को ये चुपचाप तभी खा लेते हैं जब या तो कुछ देर पहले उन्हें किसी बात पर जबरदस्त डांट पड़ी हो या फिर अपनी कोई इच्छा पूरी करवानी हो.

खाना खा कर विकी और विनी फिर अपने कमरे में चले गए. ऐसा लग रहा था कि किसी खास मसले पर मीटिंग अटेंड करने की बहुत जल्दी हो उन्हें.

विकी सी.ए. है. कानपुर में उस ने अपना शानदार आफिस बना लिया है. ज्यादातर शनिवार को ही आता है और सोमवार को चला जाता है. विनी एम.बी.ए. की तैयारी कर रहा है. बचपन से दोनों भाइयों के स्वभाव में जबरदस्त अंतर होते हुए भी दोनों पल भर को भी अलग नहीं होते हैं. विकी बेहद शांत स्वभाव का आज्ञाकारी लड़का रहा है तो विनी इस के ठीक उलट अत्यंत चंचल और अपनी बातों को मनवा कर ही दम लेने वाला रहा है. इस के बावजूद इन दोनों भाइयों का प्यार देख हम दोनों पतिपत्नी मन ही मन मुसकराते रहते हैं.

अपना काम निबटा कर मैं बच्चों के कमरे में चली गई. संडे की दोपहर हमारी बच्चों के कमरे में ही गुजरती है और बच्चे हम से सारी बातें भी कह डालते हैं, जबकि ऐसा करने में दूसरे बच्चे मांबाप से डरते हैं. आज मुझे राजीव का बाहर होना बहुत खलने लगा. वह रहते तो माहौल ही कुछ और होता और वह किसी न किसी तरह बच्चों के मन की थाह ले ही लेते.

मेरे कमरे में पहुंचते ही विनी अपनी कुरसी से उछलते हुए चिल्लाया, ‘‘मम्मा, एक बात आप को बताऊं, विकी दा ने…’’

उस की बात विकी की घूरती निगाहों की वजह से वहीं की वहीं रुक गई. मैं ने 1-2 बार कहा भी कि ऐसी कौन सी बात है जो आज तुम लोग मुझ से छिपा रहे हो, पर विकी ने यह कह कर टाल दिया कि कुछ खास नहीं मम्मा, थोड़ी आफिस से संबंधित समस्या है. मैं आप को बता कर परेशान नहीं करना चाहता पर विनी के पेट में कोई बात पचती ही नहीं है.

हालांकि मैं मन ही मन बहुत परेशान थी फिर भी न जाने कैसे झपकी लग गई और मैं वहीं लेट गई. अचानक ‘मम्मा’ शब्द कानों में पड़ने से एक झटके से मेरी नींद खुल गई पर मैं आंखें मूंदे पड़ी रही. मुझे सोता देख कर उन की बातें फिर से चालू हो गई थीं और इस बार उसी कमरे में होने की वजह से मुझे सबकुछ साफसाफ सुनाई दे रहा था.

विकी ने विनी को डांटा, ‘‘तुझे मना किया था फिर भी तू मम्मा को क्या बताने जा रहा था?’’

‘‘क्या करता, तुम्हारे पास हिम्मत जो नहीं है. दा, अब मुझ से नहीं रहा जाता, अब तो मुझे जल्दी से भाभी को घर लाना है. बस, चाहे कैसे भी.’’

विकी ने एक बार फिर विनी को चुप रहने का इशारा किया. उसे डर था कि कहीं मैं जाग न जाऊं या उन की बातें मेरे कानों में न पड़ जाएं.

अब तक तो नींद मुझ से कोसों दूर जा चुकी थी. ‘तो क्या विकी ने शादी कर ली है,’ यह सोच कर लगा मानो मेरे शरीर से सारा खून किसी ने निचोड़ लिया. कहां कमी रह गई थी हमारे प्यार में और कैसे हम अपने बच्चों में यह विश्वास उत्पन्न करने में असफल रह गए कि जीवन के हर निर्णय में हम उन के साथ हैं.

आज पलपल की बातें शेयर करने वाले मेरे बेटे ने मुझे इस योग्य भी न समझा कि अपने शादी जैसे महत्त्वपूर्ण फैसले में शामिल करे. शामिल करना तो दूर उस ने तो बताने तक की भी जरूरत नहीं समझी. मेरे व्यथित और तड़पते दिल से एक आवाज निकली, ‘विकी, सिर्फ एक बार कह कर तो देखा होता बेटे तुम ने, फिर देखते कैसे मैं तुम्हारी पसंद को अपने अरमानों का जोड़ा पहना कर इस घर में लाती. पर तुम ने तो मुझे जीतेजी मार डाला.’

पल भर के अंदर ही विकी के पिछले 25 बरस आंखों के सामने से गुजर गए और उन 25 सालों में कहीं भी विकी मेरा दिल दुखाता हुआ नहीं दिखा. टेबल पर रखे फल उठा कर खाने से पहले भी वह जहां होता वहीं से चिल्ला कर मुझे बताता था कि मम्मा, मैं यह सेब खाने जा रहा हूं. और आज…एक पल में ही पराया बना दिया बेटे ने.

कलेजे को चीरता हुआ आंसुओं का सैलाब बंद पलकों के छोर से बूंद बन कर टपकने ही वाला था कि अचानक विकी की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, ‘‘तुम ने देखा नहीं है मम्मीपापा के कितने अरमान हैं अपनी बहुओं को ले कर और बस, मैं इसी बात से डरता हूं कि कहीं बरखा मम्मीपापा की कल्पनाओं के अनुरूप नहीं उतरी तो क्या होगा? अगर मैं पहले ही इन्हें बता दूंगा कि मैं बरखा को पसंद करता हूं तो फिर कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि मम्मीपापा उसे नापसंद करें, वे हर हाल में मेरी शादी उस से कर देंगे और मैं यही नहीं चाहता हूं. मम्मीपापा के शौक और अरमान पूरे होने चाहिए, उन की बहू उन्हें पसंद होनी चाहिए. बस, मैं इतना ही चाहता हूं.’’

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‘‘और अगर वह उन्हें पसंद नहीं आई तो?’’

‘‘नहीं आई तो देखेंगे, पर मैं ने इतना तो तय कर लिया है कि मैं पहले से यह बिलकुल नहीं कह सकता कि मैं किसी को पसंद करता हूं.’’

तो विकी ने शादी नहीं की है, वह केवल किसी बरखा नाम की लड़की को पसंद करता है और उस की समस्या यह है कि बरखा के बारे में हमें बताए कैसे? इस बात का एहसास होते ही लगा जैसे मेरे बेजान शरीर में जान वापस आ गई. एक बार फिर से मेरे सामने वही विकी आ खड़ा हुआ जो अपनी कोई बात कहने से पहले मेरे चारों ओर चक्कर लगाता रहता, मेरा मूड देखता फिर शरमातेझिझकते हुए अपनी बात कहता. उस का कहना कुछ ऐसा होता कि मना करने का मैं साहस ही नहीं कर पाती. ‘बुद्धू, कहीं का,’ मन ही मन मैं बुदबुदाई. जानता है कि मम्मा किसी बात के लिए मना नहीं करतीं फिर भी इतनी जरूरी बात कहने से डर रहा है.

सो कर उठी तो सिर बहुत हलका लग रहा था. मन में चिंता का स्थान एक चुलबुले उत्साह ने ले लिया था. मेरे बेटे को प्यार हो गया है यह सोचसोच कर मुझे गुदगुदी सी होने लगी. अब मुझे समझ में आने लगा कि विनी को भाभी घर में लाने की इतनी जल्दी क्यों मच रही थी. ऐसा लगने लगा कि विनी का उतावलापन मेरे अंदर भी आ कर समा गया है. मन होने लगा कि अभी चलूं विकी के पास और बोलूं कि ले चल मुझे मेरी बहू के पास, मैं अभी उसे अपने घर में लाना चाहती हूं पर मां होने की मर्यादा और खुद विकी के मुंह से सुनने की एक चाह ने मुझे रोक दिया.

रात को खाने की मेज पर मेरा मूड तो खुश था ही, दिन भर के बाद बच्चों से मिलने के कारण राजीव भी बहुत खुश दिख रहे थे. मैं ने देखा कि विनी कई बार विकी को इशारा कर रहा था कि वह हम से बात करे पर विकी हर बार कुछ कहतेकहते रुक सा जाता था. अपने बेटे का यह हाल मुझ से और न देखा गया और मैं पूछ ही बैठी, ‘‘तुम कुछ कहना चाह रहे हो, विकी?’’

‘‘नहीं…हां, मैं यह कहना चाहता था मम्मा कि जब से कानपुर गया हूं दोस्तों से मुलाकात नहीं हो पाती है. अगर आप कहें तो अगले संडे को घर पर दोस्तों की एक पार्टी रख लूं. वैसे भी जब से काम शुरू किया है सारे दोस्त पार्टी मांग रहे हैं.’’

‘‘तो इस में पूछने की क्या बात है. कहा होता तो आज ही इंतजाम कर दिया होता,’’ मैं ने कहा, ‘‘वैसे कुल कितने दोस्तों को बुलाने की सोच रहे हो, सारे पुराने दोस्त ही हैं या कोई नया भी है?’’

‘‘हां, 2-4 नए भी हैं. अच्छा रहेगा, आप सब से भी मुलाकात हो जाएगी. क्यों विनी, अच्छा रहेगा न?’’ कह कर विकी ने विनी को संकेत कर के राहत की सांस ली.

मैं समझ गई थी कि पार्टी की योजना दोनों ने मिल कर बरखा को हम से मिलाने के लिए ही बनाई है और विकी के ‘नए दोस्तों’ में बरखा भी शामिल होगी.

अब बच्चों के साथसाथ मेरे लिए भी पार्टी की अहमियत बहुत बढ़ गई थी. अगले संडे की सुबह से ही विकी बहुत नर्वस दिख रहा था. कई बार मन में आया कि उसे पास बुला कर बता दूं कि वह सारी चिंता छोड़ दे क्योंकि हमें सबकुछ मालूम हो चुका है, और बरखा जैसी भी होगी मुझे पसंद होगी. पर एक बार फिर विकी के भविष्य को ले कर आशंकित मेरे मन ने मुझे चुप करा दिया कि कहीं बरखा विकी के योग्य न निकली तो? जब तक बात सामने नहीं आई है तब तक तो ठीक है, उस के बारे में कुछ भी राय दे सकती हूं, पर अगर एक बार सामने बात हो गई तो विकी का दिल टूट जाएगा.

4 बजतेबजते विकी के दोस्त एकएक कर के आने लगे. सच कहूं तो उस समय मैं खुद काफी नर्वस होने लगी थी कि आने वालों में बरखा नाम की लड़की न मालूम कैसी होगी. सचमुच वह मेरे विकी के लायक होगी या नहीं. मेरी भावनाओं को राजीव अच्छी तरह समझ रहे थे और आंखों के इशारे से मुझे धैर्य रखने को कह रहे थे. हमें देख कर आश्चर्य हो रहा था कि सदैव हंगामा करते रहने वाला विनी भी बिलकुल शांति  से मेरी मदद में लगा था और बीचबीच में जा कर विकी की बगल में कुछ इस अंदाज से खड़ा होता मानो उस से कह रहा हो, ‘दा, दुखी न हो, मैं तुम्हारे साथ हूं.’

ठीक साढ़े 4 बजे बरखा ने अपनी एक सहेली के साथ ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. उस के घुसते ही विकी की नजरें विनी से और मेरी नजरें इन से जा टकराईं. विकी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और उन्हें हमारे पास ला कर उन से हमारा परिचय करवाया, ‘‘बरखा, यह मेरे मम्मीपापा हैं और मम्मीपापा, यह मेरी नई दोस्त बरखा और यह बरखा की दोस्त मालविका है. ये दोनों एम.सी.ए. कर रही हैं. पिछले 7 महीने से हमारी दोस्ती है पर आप लोगों से मुलाकात न करवा सका था.’’

हम ने महसूस किया कि बरखा से हमारे परिचय के दौरान पूरे कमरे का शोर थम गया था. इस का मतलब था कि विकी के सारे दोस्तों को पहले से बरखा के बारे में मालूम था. सच है, प्यार एक ऐसा मामला है जिस के बारे में बच्चों के मांबाप को ही सब से बाद में पता चलता है. बच्चे अपना यह राज दूसरों से तो खुल कर शेयर कर लेते हैं पर अपनों से बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं.

बरखा को देख लेने और उस से बातचीत कर लेने के बाद मेरे मन में उसे बहू बना लेने का फैसला पूर्णतया पक्का हो गया. विकी बरखा के ही साथ बातें कर रहा था पर उस से ज्यादा विनी उस का खयाल रख रहा था. पार्टी लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर थी. यों तो हमारा फैसला पक्का हो चुका था पर फिर भी मैं ने एक बार बरखा को चेक करने की कोशिश की कि शादी के बाद घरगृहस्थी संभालने के उस में कुछ गुण हैं या नहीं.

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मेरा मानना है कि लड़की कितने ही उच्च पद पर आसीन हो पर घरपरिवार को उस के मार्गदर्शन की आवश्यकता सदैव एक बच्चे की तरह होती है. वह चूल्हेचौके में अपना दिन भले ही न गुजारे पर चौके में क्या कैसे होता है, इस की जानकारी उसे अवश्य होनी चाहिए ताकि वह अच्छा बना कर खिलाने का वक्त न रखते हुए भी कम से कम अच्छा बनवाने का हुनर तो अवश्य रखती हो.

मैं शादी से पहले घरगृहस्थी में निपुण होना आवश्यक नहीं मानती पर उस का ‘क ख ग’ मालूम रहने पर ही उस जिम्मेदारी को निभा पाने की विश्वसनीयता होती है. बहुत से रिश्तों को इन्हीं बुनियादी जिम्मेदारियों के अभाव में बिखरते देखा था मैं ने, इसलिए विकी के जीवन के लिए मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी.

मैं ने बरखा को अपने पास बुला कर कहा, ‘‘बेटा, सुबह से पार्टी की तैयारी में लगे होने की वजह से इस वक्त सिर बहुत दुखने लगा है. मैं ने गैस पर तुम सब के लिए चाय का पानी चढ़ा दिया है, अगर तुम्हें चाय बनानी आती हो तो प्लीज, तुम बना लो.’’

‘‘जी, आंटी, अभी बना लाती हूं,’’ कह कर वह विकी की तरफ पलटी, ‘‘किचन कहां है?’’

‘‘उस तरफ,’’ हाथ से किचन की तरफ इशारा करते हुए विकी ने कहा, ‘‘चलो, मैं तुम्हें चीनी और चायपत्ती बता देता हूं,’’ कहते हुए वह बरखा के साथ ही चल पड़ा.

‘‘बरखाजी को अदरक कूट कर दे आता हूं,’’ कहता हुआ विनी भी उन के पीछे हो लिया.

चाय चाहे सब के सहयोग से बनी हो या अकेले पर बनी ठीक थी. किचन में जा कर मैं देख आई कि चीनी और चायपत्ती के डब्बे यथास्थान रखे थे, दूध ढक कर फ्रिज में रखा था और गैस के आसपास कहीं भी चाय गिरी, फैली नहीं थी. मैं निश्चिंत हो आ कर बैठ गई. मुझे मेरी बहू मिल गई थी.

एकएक कर के दोस्तों का जाना शुरू हो गया. सब से अंत में बरखा और मालविका हमारे पास आईं और नमस्ते कर के हम से जाने की अनुमति मांगने लगीं. अब हमारी बारी थी, विकी ने अपनी मर्यादा निभाई थी. पिछले न जाने कितने दिनों से असमंजस की स्थिति गुजरने के बाद उस ने हमारे सामने अपनी पसंद जाहिर नहीं की बल्कि उसे हमारे सामने ला कर हमारी राय जाननेसमझने का प्रयत्न करता रहा. और हम दोनों को अच्छी तरह पता है कि अभी भी अपनी बात कहने से पहले वह बरखा के बारे में हमारी राय जानने की कोशिश अवश्य करेगा, चाहे इस के लिए उसे कितना ही इंतजार क्यों न करना पड़े.

मैं अपने बेटे को और असमंजस में नहीं देख सकती थी, अगर वह अपने मुंह से नहीं कह पा रहा है तो उस की बात को मैं ही कह कर उसे कशमकश से उबार लूंगी.

बरखा के दोबारा अनुमति मांगने पर मैं ने कहा, ‘‘घर की बहू क्या घर से खाली हाथ और अकेली जाएगी?’’

मेरी बात का अर्थ जैसे पहली बार किसी की समझ में नहीं आया. मैं ने विकी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तेरी पसंद हमें पसंद है. चल, गाड़ी निकाल, हम सब बरखा को उस के घर पहुंचाने जाएंगे. वहीं इस के मम्मीडैडी से रिश्ते की बात भी करनी है. अब अपनी बहू को घर में लाने की हमें भी बहुत जल्दी है.’’

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मेरी बात का अर्थ समझ में आते ही पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. मम्मीपापा को यह सब कैसे पता चला, इस सवाल में उलझाअटका विकी पहले तो जहां का तहां खड़ा रह गया फिर अपने पापा की पहल पर बढ़ कर उन के सीने से लग गया.

इन सब बातों में समय गंवाए बिना विनी गैरेज से गाड़ी निकाल कर जोरजोर से हार्न बजाने लगा. उस की बेताबी देख कर मैं दौड़ते हुए अपनी खानदानी अंगूठी लेने के लिए अंदर चली गई, जिसे मैं बरखा के मातापिता की सहमति ले कर उसे वहीं पहनाने वाली थी.

अब अपने नए गाने से सभी का दिल लूटेंगी सपना चौधरी

सपना चौधरी सोशल मीडिया पर हमेशा छाई रहती है, कभी अपने गानों से तो कभी अपने “तेरी आंख्या का यो काजल वाले” टुमके से. फैंस भी उनकी सारे अपडेट चाहते है तभी तो वो सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती है. इसी के चलते एक फिर सपना लाइम लाइट में आ गई है. हाल ही में सपना का एक गाना यूट्यूब (YouTube) काफी वायरल हो रहा है. इस वीडियो में सपना चौधरी (Sapna Choudhary) एकदम अनोखे अंदाज में नजर आ रही हैं. सपना के इस सौन्ग का टाइटल ‘मजनूं’ है. सपना के इस सौन्ग को फरिश्ता और राहुल फुथी ने गाया है. इस हरियाणवी सौन्ग में सपना चौधरी के साथ करण मिर्जा और शिखा राघव भी नजर आ रही हैं.


पोस्टर शेयर कर दी नये गाने की जानकारी

सपना ने हाल ही में अपने  इंस्टाग्राम स्टोरी पर  एक पोस्टर शेयर किया है. ये उनके आने वाले गाने “कत्ल” (KATAL) का है. इस गाने में सपना के साथ मोहित शर्मा नजर आऐंगे.

बिग बौस के बाद मिली असल पहचान

भोजपुरी, पंजाबी और हरियाणवी सिनेमा में अपना तमका जना चुकी सपना (Sapna Choudhary) जब से बिग बौस 11 (Bigg Boss 11) हाउस का हिस्सा बनी है, उनकी लोकप्रिता में चार चांद लग चुके हैं. ‘बिग बौस 11’ में सपना के तीखे तेवर और बेबाक अंदाज ने सभी का दिल जीता वही बिग बौस के घर के सदस्यों ने भी सपना को काफी सराहा.

भोजपुरी और पंजाबी में भी मचाया धमाल

सपना चौधरी (Sapna Choudhary) भोजपुरी फिल्म ‘बैरी कंगना 2’ में स्पेशल सौन्ग भी कर चुकी हैं. सपना चौधरी ने पंजाबी सौन्ग ‘बिलौरी अंख’ पर भी जमकर डांस किया था, और इस गाने में क्रिकेटर युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह उनके साथ नजर आए. इस गाने ने जमकर धमाल मचाया. वैसे भी सपना चौधरी इन दिनों देश के कोने-कोने में अपनी डांस परफॉर्मेंस से लोगों का दिल जीत रही हैं.

आम्रपाली दुबे और अक्षरा सिंह पुराना वीडियो फिर वायरल…

वैसे तो भोजपुरी के सभी गानों में कुछ ना कुछ अलग होता है जिसके चलते वो लोगों के दिमाग में बस जाता हैं. भोजपुरी के ऐसे कई गाने है जो हर डिजे और डांस लवर की पहली पसंद हुआ करता हैं. ऐसा ही एक गाना है भौजपुरी फिल्मों की सबसे पौपुलर एकट्रेसेस आम्रपाली दुबे और अक्षरा सिंह का. इस गाने में भोजपुरी फिल्मों की दो बड़ी अभिनेत्रियों के बीच शानदार जुगलबंदी देखने को मिली है. हाल ही में दोनों का एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. इस वीडियों को लोग खासा पसंद कर रहे हैं.

वीडियो ने मचाई धूम

इस वीडियो में ये दोनों एक्ट्रेसेस डांस में एक-दूसरे को टक्कर दे रही हैं. साड़ी पहनकर अक्षरा और आम्रपाली एक ही जैसे डांस स्टेप्स करती दिखाई दे रही हैं. वहीं इन दोनों का ये अंदाज फैंस को बहुत पसंद आ रहा है. ये भोजपुरी गाना अब तक लाखों लोग देख चुके हैं. अक्षरा ने इस वीडियो में ब्लू साड़ी तो वही आम्रपाली ने ग्रीन साड़ी पहनी है जिसमें दोनों बला की खूबसूरत लग रही है.

सहेली के होली’

अक्षरा और आम्रपाली दोनों को भोजपुरी फिल्मों का बेहतरीन सिंगर और डांसर माना जाता  है. वायरल हो रहे इस गाने का टाइटल ‘सहेली के होली’ है. इस गाने पर दोनों एक्ट्रेसेस के बीच डांस का जबरदस्त मुकाबला देखने को मिल रहा है. दोनों ने ही अपने डांस और अदाओं से जमकर धमाल मचाया. यहां तक कि ये तय करना मुश्किल हो रहा है कि कौन बेहतरीन डांसर है. अक्षरा और आम्रपाली दोनों ने इस वीडियों में अपने डांसिंग टैलेंट को साबित किया है.

 

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Aap sabhi logon ko Hanuman Jayanti ki dher saari shubhkamnayein 🙏 #sankatmochan #naamtihaaro #jaihanuman 🙏😍

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💝 #thankful #onelife #positivevibes #spreadthelove💞💫💞

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छोटे पर्दे से की शुरुआत

बेहद ही कम समय में अक्षरा और आम्रपाली सभी की चहेती बन गई है. दोनों से अपने कैरियर की शुरुआत छोटे पर्दे से की थी. आज इन दोनों को भोजपुरी जान कहां जा सकता है क्योंकि जिस भी फिल्में अक्षरा और आम्रपाली फिल्म हिट होना लाजमी हैं.

गायब तेजस्वी यादव सामने आए और बताया कहां थे वह

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद ‘गायब’ तेजस्वी सामने आए और कहा,”मेरे प्यारे बिहार, मैं यहीं हूं।”
मालूम हो कि लोकसभा चुनाव के बाद से ही बिहार में आरजेडी के युवा नेता और बिहार में महागठंधन की कमान संभालने वाले तेजस्वी यादव ने आखिरकार अपनी चुप्पी तोड़ी और लोगों से मुखातिब हुए।

तेजस्वी ने क्या कहा

तेजस्वी के सक्रिय राजनीति से दूर रहने की वजह से विपक्ष के नेता उन पर राजनीतिक कटाक्ष कर रहे थे। कईयों ने तो यहां तक कह दिया था कि तेजस्वी यादव आरजेडी को मिली करारी हार की वजह से डर गए हैं और उन की राजनीति में पुनर्वापसी का इरादा नहीं है।
सोशल मीडिया पर भी तरहतरह के कयास लगाए जा रहे थे और यूजर्स उन्हें ट्रोल भी कर रहे थे।
एक ने लिखा था,”बिहार में चमकी बुखार से बच्चों की मौत हो रही है और उधर तेजस्वी इंगलैंड में क्रिकेट वर्ल्ड कप का मजा ले रहे हैं।”

तेजस्वी का जवाब

इधर सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय होते हुए तेजस्वी ने ट्वीट कर इस का जवाब देते हुए कहा है,”पिछले कुछ हफ्तों से मैं अपने चोट के इलाज में व्यस्त था। हालांकि, मैं राजनीतिक विरोधियों के साथसाथ मसालेदार कहानियों को पकाने वाले मीडिया के एक वर्ग को देख कर मजा ले रहा हूं।”

इस के बाद तेजस्वी ने एक के बाद एक 4 ट्वीट कर कहा, “हम उन लोगों के प्रति जवाबदेह हैं, जो हम में एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय के विकल्प की तलाश करते हैं और यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि हमारी लड़ाई जारी है।”

बच्चों की मौत दुखद

तेजस्वी ने बिहार में चमकी बुखार से सैकङों गरीब बच्चों की मौत पर संवेदना जताते हुए कहा,”इस दुखद समय में पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं से बिना किसी फोटोबाजी किए पीड़ित परिवारों के घर जाने को कहा गया। इस के अलावा सांसदों से इस मामले को संसद में उठाने को कहा गया, मेरे प्रिय बिहार, मैं यहीं हूं।”

राबङी को क्यों आया था गुस्सा

हाल ही में पत्रकारों के एक सवाल पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री राबङी देवी झल्ला उठी थीं।
दरअसल, जब पत्रकारों ने पूछा कि तेजस्वी बहुत दिनों से नजर नहीं आ रहे, क्या वे इंगलैंड में क्रिकेट वर्ल्ड कप देखने गए हैं? तो राबङी देवी को इस सवाल पर गुस्सा आ गया और कहा कि नहीं, तेजस्वी तुम्हारे घर में हैं।

अब जब तेजस्वी ने जवाब दे दिया है तो सोशल मीडिया पर लोग उन्हें आराम करने की सलाह दे रहे हैं। कुछ कह रहे हैं, नेता को भी हक है निजी जीवन जीने की।
बात तो सही है, पर यहां डर्टी पौलिटिक्स की शुरुआत भी तो नेता लोग ही करते हैं, जनता जनार्दन तो बस उस में तङका लगाती है बस।

प्यार के साथ साथ फैशन में भी आगे है अर्जुन कपूर

अर्जुन कपूर इन दिनों सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहे हैं. उसकी वजह उनकी रिलेशनशिप है. अर्जुन और मलाइका के चर्चे बौलीवुड के उन हौट टोपिक्स में से एक है जो हर दिन अपना अलग रंग दिखा रहा हैं. पहले अर्जुन को शूटिंग के दौरान चोट लगना और फैंस का मलाइका का रिपलाइ का वेट करना. और हाल ही में मलाइका का अर्जुन के साथ फोटो शेयर करना, फैंस को खासा पसंद आ रहा है. पर इन सब के बीच अगर बात अर्जुन के फैशन सेंस की हो तो वो किसी से कम नही हैं. अपने लुक्स और बौल्ड नेचर के चलते अर्जुन को काफी लोग फौलो करते है. इसलिए आज हम अर्जुन के कुछ खास टफ लुक्स जिसे आप कही भी ट्राय कर सकते है, स्पेशली कौलेज बौय्स…

अर्जुन का केप लुक

अर्जुन को आप केजुअल कपड़ो में ही देखा होगा. इसका कारण है की उनको टी-शर्ट और नोर्मल ट्राउजर ज्यादा पसंद है. इस लुक में अर्जुन ने ब्लू टी- शर्ट के साथ ब्लैक जैकेट और ब्लैक कैप पहनी है. जिसमें वो काफी अच्छे लग रहे हैं.

 

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Favourite pose… playing dress up for my #saturdaynight !!! #BelvedereStudioB @belvedere_india

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अर्जुन का चैक लुक

इस लुक में अर्जुन ने जो ओवर चैक शर्ट पहनी है वो इस पुरे ड्रेस को कम्प्लिट कर रहा हैं. रेड एंड ब्लैक चैक शर्ट के साथ अर्जुन ने ब्लैक शूज और ब्लैक जींस का कौम्बिनेशन काफी क्लासी लग रहा हैं.

 

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Top of da morning to ya Captain… #checkitout #indiasmostwanted #marketingjunkie #poser4life

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अर्जुन का कूल लुक

इस लुक को कूल कहना गलत नही होगा. इस लुक मे अर्जुन ने जो वाइब्रेंट कलर पहना है वो उनपर काफी सूट कर रहा है. इस लुक में भी उन्होंने कैप लगाई है. अर्जुन को कैप से खासा लगाव है जो अक्सर उनके ड्रेसिंग में देखा जा सकता हैं.

अर्जुन का पार्टी लुक

इस लुक को आप किसी भी के लिए यूज कर सकते है. इस ब्लू सूट के साथ वाइट शूज और टी-शर्ट का कौम्बिलेशन काफी अच्छा लग रहा है, जिसे आप किसी भी पार्टी में ट्राय कर सकते है.

तो ये थे अर्जुन के कुछ स्टाइलिश लुक जिसे आप ट्राय कर सकते है. इन सब लुक्स में एक साख बात ये है की अर्जुन ने सभी में कैप का यूज किया है तो अगर आप भी उनकी तरह कैप लवर है तो ये स्ताइल्स आपके लिए परफेक्ट हैं.

मैं एक्टर बनना चाहता हूं, पर कैसे?

सवाल 

बीए प्रथम वर्ष का छात्र हूं और मैं ऐक्टर बनना चाहता हूं. मैं थिएटर करता हूं. बड़े-बड़े औडिटोरियम्स में शो कर चुका हूं. क्या एक्टर बनने के लिए मुझे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा में दाखिला लेना चाहिए या नहीं? यदि हां तो इस के लिए क्या करना होगा और क्या इस प्रशिक्षण के बाद मैं एक्टर बन पाऊंगा?

जवाब

आप की यह अच्छी हौबी है, यदि भविष्य में आप इसे ही कैरियर बनाना चाहते हैं तो बीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद आप अपने इस मनपसंद कोर्स में ऐडमिशन ले सकते हैं. जहां तक इस के बारे में जानकारी की बात है तो वह आप को इंटरनैट से मिल जाएगी. आप को आगाह कर दें कि अन्य क्षेत्रों की बनिस्बत इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बहुत अधिक है, इसलिए सोचसमझ कर ही फैसला लें.

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महाभोज

लेखक-  संजय अइया

सुबह उठते ही गरमागरम चाय का अभी पहला घूंट ही गटका था कि अंदर काफरमान कानों के रास्ते अंदर उतर गया, ‘‘आज नाश्ता तभी बनेगा जब बाजार से सब्जी आ जाएगी.’’

हुआ यह था कि पिछले एक सप्ताह से दफ्तर के कामों में इतना उलझा रहा कि लौटते समय बाजार बंद हो जाता था और सब्जी का थैला बैग में पड़ा रह जाता. इन दिनों में पत्नी ने छोले व राजमा के साथ बेसन का कई तरह से इस्तेमाल कर एक तो अपनी पाक कला ज्ञान का भरपूर परिचय कराया, दूसरे, सब्जी की कमी को पूरा कर हमारी इज्जत ढकी थी.

पत्नी के आदेश को सिरमाथे मान कर मैं शार्टकट के रास्ते तेज कदमों से सब्जी बाजार की ओर जा रहा था. अभी थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि नाक में तेज बदबू ने प्रवेश किया. मैं ने अपनी उल्लू जैसी आंखों को मटका कर चारों ओर देखा पर कुछ दिखलाई नहीं दिया. अभी वहां से कुछ कदम ही आगे बढ़ा था कि फिर जोरदार बदबू का झोंका आया. अब की बार मैं ने कुत्ते जैसी नाक से मजबूरी में बदबू को सूंघा और उस जगह पर नजर डाली जहां से वातावरण प्रदूषित हो रहा था. देखा, एक मरा हुआ ढोर नगरनिगम के कचरे के डब्बे में पड़ा था और कौए उस को नोंचनोंच कर खा रहे थे.

नाक पर रूमाल रखा और स्कूली दिनों को याद कर 100 मीटर की फर्राटा दौड़ लगा दी. सामने से तिवारीजी आते दिखाई दिए और मुझे इस तरह इतना फर्राटे से भागते देखा तो रोक कर पूछने लगे, ‘‘क्यों भाई, सब ठीकठाक तो है?’’

मैं ने अपनी सांसों को नियंत्रित किया और तिवारीजी के चेहरे को देखा तो वह किसी हौरर फिल्म के डे्रकुला जैसे लग रहे थे. बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे हुए बाल, नंगे पांव, गंदे से कपड़े. ‘‘बात क्या है, तिवारीजी, आप ठीकठाक तो हैं न?’’

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‘‘क्यों, मुझे क्या हुआ?’’

‘‘अरे भाई, ये बढ़ी हुई दाढ़ी, नंगे पांव, बिखरे हुए बेतरतीब केश, और ये बढ़े हुए नाखून…आखिर माजरा क्या है?’’

तिवारीजी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से घूरा और बोले, ‘‘तुम्हें नहीं मालूम?’’

‘‘मुझे कुछ नहीं मालूम.’’

‘‘यार, तुम कैसे हिंदू हो?’’

‘‘क्या मतलब? आप की दाढ़ीनाखून बढ़ने से मेरे हिंदू होने का क्या संबंध है?’’ मैं ने प्रश्न किया.

‘‘यार, हिंदू होने के नाते तुम्हें इतना तो पता होना ही चाहिए कि इन दिनों पितृपक्ष (श्राद्ध) के दिन चल रहे हैं और इन दिनों में न तो कोई शुभ काम किया जाता है और न ही दाढ़ीनाखून कटवाते हैं.’’

‘‘लेकिन तिवारीजी, हिंदू धर्म में इस तरह का कोई नियम है, ऐसा कुछ मैं ने आज तक किसी भी हिंदू धार्मिक पुस्तक में नहीं पढ़ा.’’

‘‘यार, वेदपुराणों में लिखा है, ऐसा हमें हमारे बापदादा ने बताया था.’’

‘‘आप ने पढ़ा है?’’ मैं ने नास्तिकों की तरह पूछा.

‘‘इस में पढ़ना क्या है? बुजुर्गों ने कहा है सो है, यही तो हमारी हिंदू संस्कृति, धर्म और सभ्यता है.’’

‘‘जहां पर प्रश्न करने की, शक करने की कोई गुंजाइश नहीं होती,’’ मैं ने कहा.

‘‘चुप रहो यार, ऐसा कर के पुरखों की आत्मा को शांति मिलती है.’’

‘‘क्या तुम्हारे पूर्वज तुम्हें ऐसा गंदा देख कर खुश हो रहे होंगे,’’ मैं ने उन का मजाक बनाते हुए कहा, ‘‘अजीब तुम्हारे पुरखे हैं.’’

‘‘लगता है, तुम पर किसी अधर्मी की छाया पड़ गई है.’’

‘‘बिलकुल नहीं मित्र, जो धर्म में है ही नहीं उसे प्रचारित करने वालों के खिलाफ मैं बोल रहा हूं. इसी कारण आज हिंदू धर्म मजाक बन गया है,’’ मैं ने एक संक्षिप्त सा भाषण ही दे डाला.

‘‘देखो यार, तुम्हारे भाषण देने से मुझ पर कोई अंतर नहीं पड़ेगा क्योंकि मैं भगवाधारी कट्टर पार्टी से हूं और पार्टी का आदेश सिरमाथे पर,’’ तिवारीजी बोले, ‘‘पुरखे ऐसा करने से खुश होते हैं तो मैं ने ऐसा कर दिया. मैं तो वही करूंगा जो पार्टी के लोग चाहते हैं. फिर मुझे अपनी जाति से बाहर तो कोई नहीं करेगा,’’ ऐसा कह कर तिवारीजी हीही कर के हंस पड़े.

मैं ने तिवारीजी से कहा, ‘‘गजब का स्टेमना है आप का.’’

प्रशंसा सुन कर वह खुश हो गए और कहने लगे, ‘‘क्या बताएं यार, अकेले मैं ने नहीं मेरे पूरे परिवार ने आज अभी तक भोजन ग्रहण नहीं किया है.’’

‘‘क्यों? क्या मिला नहीं?’’

‘‘कैसी बातें करते हो तुम, सातों पकवान बना कर रख छोड़े हैं लेकिन खा नहीं सकते.’’

‘‘क्यों, क्या बात हो गई?’’

‘‘यार, सुबह से हम पूर्वजों को यानी कि कौओं को खाने का निमंत्रण दे रहे हैं लेकिन अभी तक वह नहीं पहुंचे. लगता है यह प्रजाति भी लुप्त हो रही है,’’ कह कर उन्होंने अपनी काली गरदन के पास उंगली रगड़ कर मैल की गोली बनाई और क्रिकेटर की तरह निशाना साध कर फेंक दी और उदास हो गए.

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उन की उदासी मुझ से देखी नहीं गई. पूरे परिवार को भूख से परेशान होने की बात सुन कर मेरा मन द्रवित हो उठा. मैं ने कहा, ‘‘यार, तिवारीजी, मैं कुछ कहूं?’’

मरी हुई आवाज उन के मुंह से निकली, ‘‘बोलो.’’

‘‘मुझे नहीं लगता कि कौए तुम्हारे यहां लंच लेने आएंगे.’’

‘‘क्यों?’’ हैरत से मेरी ओर देखते हुए उन्होंने पूछा.

‘‘यार, जिन्हें तुम न्योता दे रहे हो वे सब तो महाभोज करने में लगे हैं.’’

‘‘कौए, महाभोज, क्या मतलब?’’ तिवारीजी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘यार, अभी जिस रास्ते से मैं भागता हुआ  आ रहा था उस पर एक मरे हुए जानवर को कौए खा रहे थे, तुम ही कहो, आज के दिन इतनी अच्छी नानवेज डिश छोड़ कर वह घासफूस खाने तुम्हारे घर की छत पर क्यों आएंगे?’’

‘‘इस का अर्थ तो यह हुआ कि आज मेरा पूरा परिवार भूखा ही रहेगा.’’

‘‘शायद,’’ मैं ने भी गंभीरता से कहा.

‘‘फिर क्या उपाय हो सकता है?’’ तिवारीजी ने किसी क्लाइंट की तरह मुझ से सलाह मांगी.

‘‘एक उपाय है.’’

‘‘कहो दोस्त, जल्दी कहो, पूरे परिवार को जोरों से भूख लगी है.’’

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मैं ने पहले तो अपने दाएंबाएं देखा ताकि मौका मिले तो भाग सकूं. फिर कहा, ‘‘यार, एक भोजन की थाली परोस कर उस मरे हुए जानवर के पास रख आओ. हो सकता है टेस्ट चेंज करने के लिए कौए कुछ खा लें.’’

‘‘आइडिया तो बहुत बढि़या है,’’ कह कर तिवारीजी ने मुझे अपने गले से चिपटा लिया और अपने घर की ओर तेज कदमों से चल दिए ताकि जल्दी से थाली परोस कर मरे ढोर के पास रख सकें, जहां उन के पुरखे उसे ग्रहण कर सकें.    द्य

कश्‍मीर की यह बाला बौलीवुड में दिखाएगी हुस्न और अदाकारी के जलवे

कश्मीर न सिर्फ कुदरती नजारों के लिए मशहूर है, बल्कि वहां कम संसाधनों के बीच भी सपने और चाहत लोगों के बीच जवां हैं.
धरती का स्वर्ग कश्मीर की वादियों के बीच पलीबङी एक ऐसी ही खूबसूरत बाला अब अपने हुस्न और अदाकारी के जलवे दिखाने बौलीवुड में डेब्यू करने जा रही हैं.

सच्ची घटनाओं पर आधारित

दरअसल, बाल यौन शोषण के खिलाफ एक युवा महिला की कहानी के संघर्ष की सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्‍म ‘टाइम टु रिटैलिएट : मासूम’ आगामी 5 जुलाई, 2019 को देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है. इस फिल्म में दिलकश और छरहरी बदन वाली खूबसूरत कश्‍मीरी बाला आलिया खान बौलीवुड में अपने अदाकारी के जलवे दिखाने के लिए तैयार हैं.

धर्म के नाम पर गलत परंपरा का विरोध करती फिल्म

फिल्म की कहानी मदरसों में मौलानाओं द्वारा बाल यौन उत्‍पीड़न और उस का विरोध कर रही एक मुसलिम युवती जोया की कहानी पर आधारित है.
फिल्म में निर्माता निर्देशक ने हिम्मत दिखाई है और इसलामिक कट्टरता और कट्टरपंथियों से बरबाद कश्मीर की वादियों में अपने सपनों को पंख देने वाली सुंदर बाला जोया को आगे बढते दिखाया है.

गलत परंपरा का विरोध जरूरी

जोया के किरदार में आलिया डार खान हैं और इस के लिए उन्होंने काफी मेहनत भी की है.
मीडिया से बातचीत में आलिया डार ने बताया,”ऐसा कोई भी धर्म जिस में कट्टरता को बढावा मिले, खुद के निजी सपने चकनाचूर हों तो उस का विरोध होना चहिए.”

फिल्म की कहानी में जोया मुसलिम होते हुए भी एक अन्य धर्म के एडवोकेट से प्‍यार करती है. इस बात की जानकारी जब उस के रिश्तेदारों और समाज के तथाकथित पाखंडियों को लगती है तो वे इस का विरोध करते हैं. जोया की शादी जबरन उस की जाति के एक जाहिल लङके से करवा दी जाती है.
शादी के बाद उसे स्थानीय मदरसे में हो रहे कुछ घिनौने काम के बारे में पता चलता है. इस के खिलाफ वह आवाज उठाती है. इस के बाद उसे जबरन तलाक दिलवा दिया जाता है.
बाद में जोया की शादी एक हिंदू लङके से होती है. यहां भी धर्म के नाम पर एक मासूम बच्ची पर हो रहे गलत कामों का वह पुरजोर विरोध करती है.

फिल्म में किरदार को जीवंत दिखाने के लिए आलिया ने कङी मेहनत की है. मुख्य भूमिकाओं में आलिया खान डार के साथ वृद्धि पटवा और रितेश रघुवंशी भी हैं. इस फिल्म के निर्माता निर्देशक हैं कुमार आदर्श.
मीडिया से बातचीत में आलिया ने बताया,”फिल्‍म में मेरा किरदार बेहद अहम है और इसे मैं ने पूरी ईमानदारी से निभाने की कोशिश की है.”

फिल्म को ले कर उत्साहित हैं

अपनी फिल्‍म को ले कर आलिया काफी उत्साहित हैं. आलिया इस से पहले साउथ की 1-2 एड फिल्‍मों में भी काम कर चुकी हैं. वे जल्द ही तेलुगू फिल्‍मों में भी नजर आएंगी.

आलिया कश्‍मीर की डार फैमली से आती हैं, जहां लड़कियों का बाहर निकल कर काम करना सही नहीं माना जाता.
आलिया कहती हैं,”मेरे सपनों को पंख देने में मेरे पिता अब्‍दुल अजीज डार और मां परवीन डार का हाथ है. मेरे पेरैंट्स आधुनिक खयालात वाले हैं और यही खयालात पूरे हिदुस्तान के मातापिताओं की हो तो बेटियों को आगे बढने से कोई नहीं रोक सकता. एक लङकी के लिए परिवार का सपोर्टिव होना बेहद जरूरी है.”

मगर धर्म के गलत रिवाजों को आईना दिखाती यह फिल्म बिना किसी अड़चन के सिनेमाघरों में रीलिज हो हो जाए, यह भी बङी बात होगी क्योंकि धर्म चाहे कोई भी हो, उस के पाखंड की पोल खुले, भला यह धर्म के ठेकेदार चाहेंगे कभी?

Edited by – Neelesh singh Sisodia 

आम्रपाली का टिकटौक वायलर, फैंस ने ‘कहां आग लगी दी’

सोशल मीडिया पर अक्सर एक्टिव रहने वाली और भोजपुरी स्टार आम्रपानी दुबे एक बार फिर फैंस का दिल लूट लिया है. इस बार बार आम्रपाली ने टिकटौक का सहारा लेकर सोशल मीडिय़ा में धमाल मचा दिया है. उन्होंने हाल ही में एक टिकटौक वीडियों बनाया है जिसमें वो काफी खूबसूरत लग रही हैं. यूट्यूब (youTube) क्वीन के नाम से मशहूर आम्रपाली दुबे इस वीडियो में साड़ी पहने नजर आ रही हैं और भोजपुरी सौन्ग पर एक्ट कर रही हैं. इस वीडियो में आम्रपाली दुबे (Amrapali Dubey) का अंदाज लोगों को काफी पसंद आ रहा है.

आम्रपाली का टिकटौक वीडियों

इस वीडियो को आम्रपाली ने खुद शेयर नहीं किया हैं बल्कि इस वीडियो को ‘सुपरस्टार औफ भोजीवुड’ नाम के इंस्टाग्राम अकाउंट पर शेयर किया गया है. उनका इस वीडियो को कई हजार व्यूज मिल चुके हैं. लोग उनके इस वीडियो को देखने के बाद रिएक्शन भी दे रहे हैं.

यूपी-बिहार के लोग कर रहे है ज्यादा पसंद

आम्रपाली दुबे को वैसे भी उनकी डांसिंग और सिंगिग के लिए जाना जाता है. इस वीडियो में भी उन्होंने अपने डांस का जलवा बिखेरा है. उनके इस डांस वीडियो को यूपी-बिहार के लोग खूब पसंद कर रहे हैं.

 

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छोटे पर्दे से भोजपुरी सुपरस्टार तक का सफर

छोटे पर्दे की बहु के रूप में अपना कैरियर शुरु करने वाली आम्रपाली ने ‘रहना है तेरी पलकों की छांव में’ में सुमन के रूप में मुख्य भूमिका निभाई. उन्हें 2014 में भोजपुरी सिनेमा में दिनेश लाल यादव की फिल्म ‘निरहुआ रिक्शावाला’ से प्रसिद्धि मिली. फिर 2015 में उन्हें भोजपुरी इंटरनेशनल फिल्म अवार्ड (बीआईएफए) में फिल्म ‘निरहुआ हिंदुस्तानी’ के लिए “बेस्ट डेब्यू एक्ट्रेस अवार्ड” से सम्मानित किया गया. इसके बाद  2017 में भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री के इतिहास में पहली बार ‘राते दीया बुताके’ गाने को साढ़े 10 करोड़ से ज्यादा यूट्यूब पर देखने वाले मिले. इस लगातार सफलता के चलते आम्रपाली रातों रात सुपरस्टार बन गई. अब वो सभी डाटरेक्टर्स की पहली पसंद बन चुकी हैं. उन्होंने अभी तक कुल 25 फिल्में की हैं जो ज्यादातर हिट रही हैं.

अजीत जोगी का “भाग्य” उन्हें कहां ले आया ?

मगर कभी सत्ता के शीर्ष पर रहे अजीत जोगी ने जनता कांग्रेस पार्टी क्या बनाई उनका भाग्य उन्हें कहां से कहां ले आया. अगरचे वे कांग्रेस नहीं छोड़ते और शांत भाव से आलाकमान के अनुशासन में होते तो नि:संदेह उनकी जगह छत्तीसगढ़ में कोई मुख्यमंत्री नहीं बन सकता था.

अजीत जोगी ने विधानसभा समर के दो वर्ष पूर्व जो राजनीतिक गोटियां बिछाई उनमें उनके दोनों हाथों में लड्डू की स्थिति बन सकती थी. मगर अजीत जोगी का भाग्य इस करवट बैठेगा इसका अनुमान राजनीति के महा पंडितो को भी नहीं था.
अजीत जोगी ने अपनी पार्टी बनाई और छत्तीसगढ़ में धूम मचा दी उन्हे सुनने हजारों की भीड़ आती थी. यह सच है कि ऐसी भीड़ न कांग्रेस के नेताओं को सुनने आती थी ना ही भाजपा के नेताओं को . राहुल गांधी की विशाल सभा बिलासपुर के पेंड्रा के कोटमी में रखी गई थी अजीत जोगी ने इसे उनके घर में सेंध मान चुनौती दी और बीस किलोमीटर की दूरी पर उसी दिन अपनी सभा का आयोजन कियाऔर दिखा दिया कि उनकी सभा में भी हजारों लोग जुटते हैं और जूटे भी. मगर उस दिन राहुल के मन की फांस और बढ़ गई.

अजीत जोगी का दांव

अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने दांव खेला था . उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों के समकक्ष एक तीसरी पार्टी का गठन करके दोनों को चुनौती देनी शुरू कर दी थी . हालात ऐसे थे कि अजीत जोगी जब किसी मुद्दे पर आंदोलन का शंखनाद करते तो दूसरे दिन कांग्रेसी अपना बोरिया बिस्तर लेकर उसी आंदोलन को करने लगते . यह अद्भुत किंतु राजनीतिक सच था कि कांग्रेस और भाजपा दोनों को दो वर्षों तक अजीत जोगी ने अपने पीछे पीछे खुब दौड़ाया और एक तरह से राजनीतिक हलाहल पैदा कर दिया . राजनीतिक हलचल उत्पन्न कर दिया.

यह माने जाने लगा की अबकी चुनाव में अजीत जोगी को नकारा नहीं जा सकता . भाजपा को कुछ सीटे कम मिली तो और कांग्रेस को कुछ सीटें कम मिली तो दोनों स्थितियों में अजीत जोगी के हाथ सत्ता की रास होगी और हो सकता है मुख्यमंत्री भी बन जाए . मगर हा… भाग्य ! ऐसा नहीं हो सका क्यों नीचे पढ़ें-

अजीत जोगी का कलेजा !

यह सच है विरोधी भी स्वीकार करते हैं कि छतीसगढ़ के इस राजनीतिक हस्ती का कलेजा बहुत बड़ा है . राजनीतिक सोच, चिंतन, व्यक्तित्व और कृतित्व विशालतम है . प्रदेश मेंआपके समक्ष कोई टिक नहीं सकता था . जैसी सोच कार्यप्राणी है वह अनुपम है प्रदेश हितकारी रही है .

अजीत जोगी जन जन के नेता हैं . आम आदमी उनसे अपनी छवि,ताकत देखता है . और अजीत जोगी इस ताकत इस शक्ति के बूते काम करते रहे . कांग्रेस में लगभग तीन दशकों तक उन्होंने अनेक पदो पर रहते हुए दिखा दिया कि अजीत जोगी का कोई पर्याय नहीं हो सकता . यही कारण है इस माद्दे के बूते उन्होंने अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी अपनी मातृ पार्टी को चुनौती देनी शुरू कर दी . क्योंकि वे सच जानते थे कि छत्तीसगढ़ में राजनीतिक नेतृत्व देने की ताकत किसी भी दीगर कांग्रेस शख्स के पास नहीं है . कांग्रेस उन्हीं से प्रारंभ होती है और उन्हीं तक आकर खत्म होती है . उन्होंने बड़े साहस के साथ स्वयं होकर पार्टी को छोड़ा ऐसा इतिहास में शायद कभी नहीं हुआ है .

जो नहीं सोचा, वह हो गया …

छत्तीसगढ़ में अजीत प्रमोद कुमार जोगी और राजनीतिक दिग्गजों ने जो नहीं सोचा था वह घटित हो गया . कांग्रेस को 68 सीटें मिल गई जो ऐतिहासिक विजय थी. इसकी परिकल्पना स्वयं कांग्रेस ने भी नहीं की थी . डॉ रमन और उनकी पार्टी भाजपा के हाथों के तो मानो तोते ही उड़ गए . और अजीत जोगी की प्रक्कलना धरी की धरी रह गई . नरेंद्र मोदी की शैली और डॉक्टर रमन सिंह का शिकंजा दोनों विधानसभा चुनाव मे ध्वस्त हो गए .अन्यथा अजीत जोगी आज ही महानायक होते और राजनीति की क, ख, ग, उनके सागौन बंगले से शुरू होती .
दरअसल उन्होंने कुछ गंभीर गलतियां की . अजीत जोगी के पार्टी के विधायक और कभी कांग्रेस से विधानसभा के उपाध्यक्ष रहे धर्मजीत सिंह कहते हैं अगरचे साहब साफ स्वच्छ छवि के लोगों को तरजीह देते, केजरीवाल पैटर्न को अपनाकर नए जुझारू लोगों को टिकट देते तो स्थिति बदल सकती थी . वही उनके सिपहसालार विनोद शुक्ला कहते हैं साहब मैं कुछ अच्छाइयां है तो कुछ खामियां भी आप अपने मुंह लगे लोगों को छोड़ नहीं पाए .
जो भी हो समय बदल गया- समय मुट्ठी से रिसकर निकल गया और राजनीति का महानायक समय को शायद समझ नहीं सका.

मास्टर स्ट्रोक दांव धरा रह गया…

अजीत जोगी ने मायावती के साथ हाथ मिलाकर अपनी पार्टी खड़ी करने मास्टर स्ट्रोक खेला था. क्योंकि आज हिंदुस्तान की राजनीति में दो दलिय दलों का ही बोल बाला है. आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल दलित हर जगह ऐसे में छत्तीसगढ़ में यह प्रयोग अभिनव था और साहस पूर्ण भी .
आज विधानसभा समर में पराजय के पश्चात अजीत जोगी मानो विषाद में चले गए हैं . जैसे तेवर चुनाव पूर्व होते थे राजनीति पर बयान और सक्रियता वह शांत पड़ गई है .

उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद अपने युवा पुत्र अमित ऐश्वर्य जोगी को सौंप दिया है . और अमित जोगी ने एक तरह से मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नाक मे दम कर रखा है .

अजीत जोगी निर्णय लेने में कभी देरी नहीं करते . राजनीति के नब्ज पर उनका हाथ कल भी था और आज भी है . आप एक ऐसी विभूति हैं जो जहां खड़ी हो जाती है लाइन वहीं से लगती है . छत्तीसगढ़ की यह अनुपम बेजोड़ शख्सियत अब आने वाले दिनों में नगरीय निकाय के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा दोनों के छक्के छुड़ाने की रणनीति में लगी हुई है….

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