फ्लर्ट

लेखक- शन्नो श्रीवास्तव

भाग-1

‘‘क्या करूं. तुम ने तो अपनी सहेलियों से मेरा परिचय करवाया नहीं तो सोचा मैं खुद ही परिचय कर लूं,’’ राजू भैया ने अपनी चिरपरिचित आवाज में कहा तो मैं उन्हें घूरते हुए बोली, ‘‘जरूरी है क्या, जो मैं अपनी हर सहेली का आप से परिचय कराऊं.’’

मेरे चिढ़ने का उन पर कुछ खास असर तो नहीं हुआ लेकिन वहां से वह उठ गए और जातेजाते मेरी सहेलियों से कहते गए, ‘‘भई, आप लोगों ने कुछ नाश्तापानी किया या नहीं. रुकिए, मैं ही कुछ आप लोगों के लिए भिजवाता हूं. इस ने तो अब तक आप लोगों को कुछ खिलाया नहीं होगा.’’

मुझे पता था कि भिजवाना क्या वह नाश्ते की 2-4 प्लेटें ले कर खुद हाजिर हो जाएंगे. इसी बहाने इन चंचल तितलियों के पास पहुंचने का उन्हें एक और मौका जो मिल जाएगा.

राजू भैया के वहां से उठते ही मैं ने अपनी सहेलियों से कहा, ‘‘देखो, तुम सब इन की बातों में मत आना. यह बस, ऐसे ही हैं, जहां लड़कियों को देखते हैं, आगेपीछे मंडराने लगते हैं.’’

‘‘कैसी बहन है तू जो अपने भाई के बारे में ऐसी बातें कह रही है,’’ मेरी सहेली सारिका ने कहा तो मैं ने कहा, ‘‘वे बडे़ भाई हैं तो तुम लोग भी मेरी सहेलियां हो. किसी फालतू चक्कर में न पड़ जाओ इसलिए तुम्हें आगाह करे दे रही हूं.’’

मैं उन सब को ले कर बाहर लान में आ गई ताकि राजू भैया नाश्ते की प्लेट के साथ आ कर फिर न जम जाएं.

हम लान में खडे़ बातें कर रहे थे कि तभी एक चाबी का गुच्छा हमारे पास आ कर गिरा.

‘‘किस की चाबी है यह? यहां कहां से आ गई?’’

वंदना ने चाबी का गुच्छा उठाया तो हम आश्चर्य से चारों तरफ देखने लगे.

‘‘अरे, यह गुच्छा तो मेरा है. अच्छा हुआ आप को मिल गया वरना तो मैं ढूंढ़ता ही रह जाता,’’ कहते हुए राजू भैया ने चाबी का गुच्छा वंदना के हाथ से लिया और झुक कर उस का शुक्रिया अदा किया मानो उस ने घास में से सूई ढूंढ़ कर उन्हें दी हो.

राजू भैया हम से कम से कम 3 मीटर की दूरी पर खडे़ थे. वहां से  चाबी हम तक गिर कर आई थी या फेंकने से आई होगी, यह समझने में हमें देर नहीं लगी. मेरी सहेलियों तक पहुंचने की उन की इस कोशिश पर मैं चिढ़ी तो बहुत पर मन ही मन मुसकरा पड़ी. वंदना को जब मैं ने चोरीचोरी राजू भैया की ओर देखते पाया तो बोल ही पड़ी, ‘‘ए वंदना, देख तू बाद में रोते हुए मेरे पास मत आना. उन की आदत मैं पहले ही तुम्हें बता चुकी हूं कि हर एक लड़की के पीछे वह ऐसे ही पडे़ रहते हैं.’’

वंदना ने अपनी खिसियाहट छिपाते हुए कहा, ‘‘धत पगली, ऐसा कुछ थोडे़ ही है.’’

राजू भैया को मैं बहुत पसंद करती थी पर उन की इसी टाइमपास आदत की वजह से हमेशा उन से मेरा झगड़ा हुआ करता था. लड़कियां उन की कमजोरी बनती जा रही थीं. लड़कियों पर अपना प्रभाव डालना उन्हें अच्छा लगता और जब देखते कि कोई लड़की उन की ओर आकर्षित हो गई है या उन से सचमुच प्यार करने लगी है तो फिर उस से कन्नी काटना शुरू कर देते और ऐसा व्यवहार करने लगते जैसे उस में उन की कोई रुचि ही नहीं है.

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अभी पिछले माह हम राजू भैया की दीदी की ननद की शादी में गए थे. वहां चारों तरफ राजू भैया ही छाए हुए थे. एक तो भाभी के भाई होने का रिश्ता, दूसरे, इतने हैंडसम और वाक्पटु. शादी की जिम्मेदारियां भी उन्होंने खूब संभाली थीं. इन सब के बीच भी राजू भैया की निगाहें लगातार तलाश में थीं कि अपने फुरसत के पल किन जुल्फों के साए में बैठ कर बिताएं कि सारी थकान मिट जाए. उन की यह तलाश जल्दी ही दीदी की चेचेरी ननद रेशमी ने पूरी कर दी.

मैं ने जब बारबार रेशमी और राजू भैया को एकसाथ उठतेबैठते देखा तो समझ गई कि जब हम यहां से जाएंगे तो रेशमी की आंखें तो आंसुओं से भीगी रहेंगी पर राजू भैया यहां से निकलते ही रेशमी का नाम भी भूल जाएंगे.

लड़की होने के कारण मैं लड़कियों की भावुकता से अच्छी तरह परिचित थी इसलिए अनजाने में ही हर लड़की को राजू भैया के इस ‘टाइमपास’ से मिलने वाली काल्पनिक पीड़ा से बचाने का मैं ने बीड़ा सा उठा लिया था. और इसी सचाई को जब मैं ने रेशमी को बताने की कोशिश की तब तक उस की आंखों में राजू भैया के सपने तैरने लगे थे.

‘‘कल कौन से रंग का सूट पहनेंगी आप?’’ राजू भैया ने जब धीरे से रेशमी से पूछा तो उस का पूरा चेहरा ही लाल हो गया. रेशमी कुछ कहती उस से पहले मैं बोल पड़ी, ‘‘रेशमी, प्लीज, ये जो रंग पहनने की सलाह दे रहे हैं तुम उसे हरगिज मत पहनना.’’

‘‘क्यों? क्या इन की पसंद इतनी खराब है?’’ खा जाने वाली नजरों से रेशमी ने मुझे देखा. शायद उसे लगा कि राजू भैया की उस में दिलचस्पी मुझे पसंद नहीं आ रही.

अब मैं उसे कैसे बताती कि वह तो यहां से जाते ही तुझे भूल जाएंगे और तू उन की च्वायस पर आंसू बहाती रह जाएगी.

पूरी शादी राजू भैया और रेशमी जहां भी दिखते साथ ही दिखते. एक बार फिर जी में आया कि रेशमी को राजू भैया के बारे में बता दूं कि वह उसे ले कर गंभीर नहीं हो सकते हैं पर रेशमी की कही बात याद आई तो उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

और वही हुआ. वापसी के लिए हम प्लेटफार्म पर बैठे टे्रन का इंतजार कर रहे थे कि तभी राजू भैया बोले, ‘‘सोनी, शादी वाले दिन रेशमी अपनेआप को ऐश्वर्या राय से कम नहीं समझ रही थी. मैं ने तो उसे हंसी में पीले रंग का सूट पहनने को कह दिया था और जब वह पहन कर मुझ से पूछने आई कि कैसी लग रही हूं तो मेरी तो हंसी ही नहीं रुकी. मन में तो आया कह दूं कि बिलकुल वैसी जैसी सरसों के खेत में भैंस, पर बड़ी मुश्किल से मन मार कर उस की तारीफ में कुछ कहना पड़ा.’’

‘‘क्यों करते हैं आप ऐसा, राजू भैया? उस को कितना दुख हो रहा होगा यह कभी सोचा है आप ने? देखा था कैसी लाल आंखें हो गई थीं उस की रोरो कर. वह तो सोच रही होगी कि आप उसे दिलोजान से चाहते हैं और आप…’’

‘‘मैं ने तो एक बार भी नहीं कहा उस से कि मैं उसे चाहता हूं. अब कोई जबरदस्ती समझ बैठे तो इस में मेरी तो कोई गलती नहीं है. देख सोनी, लड़कियां तो चाहती ही यही हैं.’’

‘‘देखिए, सभी लड़कियों को तराजू के एक पलड़े पर रख कर मत तोलिए और न

ही सब लड़कियां रेशमी

जैसी बेवकूफ होतीहैं,’’ मैं गुस्से में भनभना कर बोली, ‘‘भैया, यदि आप ने अपनी आदत नहीं सुधारी तो मैं मामाजी से आप की शिकायत कर दूंगी.’’

‘‘अच्छा, पापा से तो घर पहुंच कर तू मेरी बात बताएगी पर मुझे तो यहीं बता कि वह सामने वाली लड़की अच्छी लग रही है न?’’

मैं ने नजर उठा कर देखा तो सामने से सचमुच एक सुंदर सी लड़की कंधे पर ट्रैवलिंग बैग लटकाए हमारी ओर ही बढ़ी आ रही थी. मैं फिर राजू भैया पर बरसती कि तभी हमारी टे्रन प्लेटफार्म पर आ गई और हम अपना सामान ले कर चढ़ गए.

अपना सामान ठीक से रखने के बाद जब मैं ने सहयात्रियों पर नजर डाली तो मुंह से निकल पड़ा, ‘हो गया कल्याण.’ वह लड़की हमारे सामने वाली बर्थ पर बैठी थी.

‘‘अब आप का रास्ता बहुत अच्छी तरह कटेगा,’’ मैं ने राजू भैया से जब यह कहा तो वह जोर से हंस पड़े.

‘‘लगता है, आप को पहले कहीं देखा है? आप गोरखपुर में तो नहीं रहतीं?’’ राजू भैया ने इस तरह बातों का सिलसिला चलाने के लिए तुक्का फेंका.

‘‘हां, रहती तो वहीं हूं पर मैं आप को नहीं पहचान पा रही हूं,’’ उस ने बड़ी शालीनता से कहा.

‘‘तुक्का लग गया. गोरखपुर की टे्रन में 50 प्रतिशत से ज्यादा लोग तो वहीं जाने वाले होंगे न,’’ मुझ से नहीं रहा गया तो मैं बोल पड़ी.

‘‘क्या तुक्का लग गया?’’ वह लड़की झट से पूछ बैठी.

‘‘यह मेरी छोटी बहन है. बड़ों की बातों में बंदरिया जैसे कूद पड़ने की इस की आदत है,’’ बिलकुल शांत मुद्रा में उन्होंने कहा तो वह लड़की भी हंस पड़ी.

‘‘बंदर की बहन बंदरिया ही तो होगी,’’ कह कर, फिर लेट गई.

रास्ते भर राजू भैया के तुक्के लगते रहे और उन का प्रभाव उस लड़की पर पड़ता गया. गोरखपुर में टे्रन से उतरते समय उस ने अपना पता और फोन नंबर भी राजू भैया को पकड़ा दिया जिसे प्लेटफार्म से बाहर आते ही उन्होंने फाड़ कर फेंक दिया.

घर पहुंचने पर मैं जब मामी से मिली तो बोली, ‘‘मामी, आप राजू भैया की शादी क्यों नहीं कर रही हैं. जहां लड़की देखते हैं बस, पीछे ही लग जाते हैं. भाभी आएंगी तो लगाम खींच कर रखेंगी.’’

‘‘हां बेटा, कोई अच्छी लड़की हो तो बताओ, अब तो हम भी उस की शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘उन्हें तो हर लड़की अच्छी लग जाती है, किसी से भी कर दीजिए…’’ मेरा वाक्य अभी पूरा भी नहीं हुआ था कि पीछे से मेरी चोटी खींच कर राजू भैया बोले, ‘‘चुगलखोर, चुगली कर रही है मेरी?’’

‘‘मामी, सच कहती हूं अभी तो भैया लड़की के पीछे लगते हैं, कभी कोई लड़की इन के पीछे पड़ गई न तो गले में बांधे घूमना पड़ेगा.’’

‘‘मेरे पीछे पड़ कर कोई मेरा क्या बिगाड़ लेगा?’’ कहता हुआ राजू मां की नजरों से बच कर जाने लगा लेकिन सोनी तपाक से बोली, ‘‘वह तो तभी पता चलेगा.’’

हमारा झगड़ा बढ़ता देख मामी बीच में बोल पड़ीं, ‘‘अरे बेटा, यह सब तो आजकल लड़कों का टाइमपास होता है, इस के लिए इतना होहल्ला क्यों कर रही हो.’’

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‘‘हां मामी, लड़कियों का दिल टूटता है तो टूटे, भैया का टाइमपास तो अच्छा हो जाता है न,’’ मैं गुस्से में पैर पटकते वहां से उठ गई. पीछे से राजू भैया के जोरजोर से हंसने की आवाज मुझे सुनाई देती रही.   -क्रमश:

पावर वीडर खरपतवार हटाए पैदावार बढ़ाए

लेखकभानु प्रकाश राणा

हमारे देश के अनेक इलाकों के किसान गन्ना, कपास, सब्जी या फूलों वगैरह की खेती लगातार करते आ रहे?हैं. इन सभी फसलों को ज्यादातर लाइन में बोया जाता है. दूसरी फसलों की तुलना में इन फसलों को बोने वाली लाइनों के बीच की दूरी भी अधिक होती है. इस वजह से लाइनों के बीच वाली जगहों में अनेक खरपतवार आ जाते?हैं.

ये ऐसे खरपतवार होते?हैं जो बिना बोए ही उपज आते हैं. उर्वरकों को हम अपनी फसल में इसलिए डालते हैं कि हमें अच्छी पैदावार मिल सके. इन उर्वरकों का फायदा ये खरपतवार भी उठाते हैं और तेजी के साथ

बढ़ते?हैं जिस का सीधा असर फसल की पैदावार पर पड़ता है यानी फसल पैदावार में गिरावट आ जाती है.

खरपतवारों की रोकथाम

सहफसली खेतीबारी : कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरपतवारों की रोकथाम के लिए फसल चक्र अपनाना एक तरीका है यानी खेत में फसल को बदलबदल कर बोना. इस से खरपतवारों को पनपने का मौका नहीं मिलता.

जैसे, हम अभी गन्ना की फसल ले रहे हैं तो अगली बार उस में गेहूं बोएं, गेहूं कटने के बाद खेत भी कुछ समय खाली रहते हैं. उस समय उस में हरी खाद के लिए ढैंचा वगैरह बोएं. उस के बाद धान लगाएं, फिर गन्ना की बोआई कर सकते हैं. इस तरह बदलबदल कर फसल बोने से खरपतवारों पर रोक लगती है.

करें सहफसली खेती

अगर आप गन्ने की खेती कर रहे?हैं तो उस के साथ सहफसली खेती करें. जब गन्ना?छोटा होता?है उस समय उस की लाइनों के बीच में खाली जगह में आलू, लहसुन, गोभी, भिंडी टमाटर वगैरह की खेती भी करें. इन सब्जियों के अलावा समय के मुताबिक गन्ने के साथ दलहनी फसल उड़द, मूंग, लोबिया वगैरह भी उगा सकते हैं. ऐसा करने से अधिक फायदा होगा. खरपतवारों की रोकथाम तो होगी ही, साथ ही सहफसली खेती में मुनाफा भी होगा.

कहने का सीधा सा मतलब यह है कि दोनों लाइनों के बीच में जो जगह बची है, वहां की मिट्टी की पैदावार कूवत का फायदा खरपतवार उठाते हैं. उसी जगह का इस्तेमाल कर अगर आप ने दूसरी फसल भी ले ली तो खरपतवारों को पनपने का मौका ही नहीं मिला.

खास परिस्थितियों में आप खरपतवारों को खत्म करने के लिए सही खरपतवारनाशक का इस्तेमाल कर सकते हैं. आजकल रासायनिक खरपतवार के अलावा अनेक जैविक खरपतवारनाशक भी आ रहे हैं, उन का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

यंत्रों से करें रोकथाम

इस तरह की फसलों में खरपतवार के सफाए के लिए पावर वीडर एक कारगर यंत्र है. इस खरपतवारनाशक यंत्र से कम समय में अनेक फसलों से खरपतवार निकाले जा सकते हैं. यह यंत्र सभी छोटेबड़े किसानों के लिए अच्छा यंत्र है. साथ ही, पहाड़ी इलाकों के लिए भी उपयोगी है. खरपतवार निकालने के इस तरह के यंत्र खासकर लाइनों में बोई गई फसल के लिए अच्छे रहते हैं.

हौंडा रोटरी टिलर : मौडल एफजे 500 आरडी रोटरी पावर वीडर की कुछ खासीयतें दी गई हैं. इस यंत्र में 5.5 हौर्सपावर का 4 स्ट्रोक एयर कूल्ड इंजन लगा?है और धूल से बचाव के लिए इंजन में एयर क्लिनर भी लगा है.

गियर बौक्स जमीन में ऊंचाई पर दिया गया है. इस वजह से यह मिट्टी में नहीं फंसता और बिना रुकावट के चलता?है. 2 गियर फौर्वर्ड (सामने की ओर) व 1 गियर रिवर्स (वापसी) के लिए दिया गया है जिस से अपनी सुविधानुसार आगे या पीछे किया जा सकता है.

यह यंत्र खरपतवार को जड़ से खोद कर निकालता है. यह यंत्र पैट्रोल से चलाया जाता है और इस की टीलिंग (खुदाई) चौड़ाई को

18 इंच से 24 इंच, 36 इंच तक कटाव बढ़ाया जा सकता?है और टीलिंग यानी खुदाई की गहराई को 3 से 5 इंच तक कम या ज्यादा किया जा सकता है.

इस यंत्र के बारे में अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर 0120-2341050-59 पर आप बात कर सकते हैं. यहां से आप को अपने नजदीकी डीलर की जानकारी या फोन नंबर भी मिल सकता है. आप अपनी सुविधानुसार यहां से इस यंत्र के बारे में जानकारी ले सकते हैं.

दुनियादारी

लेखक- ज्योति मिश्रा

जब यह 12वीं पास हुई थी तब कितना कहा था उन से कि शहर में पढ़ा दो इस को. तब तो चुप लगा गए और अब जब लड़की के ब्याह का समय आया तो कहते हैं कि इसे शहर भेज दूं नौकरी करने. कोई जरूरत नहीं है, इस के भाग्य में जो लड़का होगा, वही इसे मिलेगा.’’

पापा ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मैं ने ही उन को लिखा था कि शेफाली के लिए कोई अच्छा लड़का हो तो बताएं. उन्होंने यही तो लिखा है कि आजकल सब नौकरीशुदा लड़की को ही तरजीह देते हैं. इसलिए इसे सुनंदा के पास भेज दो. जब तक लड़का नहीं मिलता, कहीं कोई नौकरी कर लेगी.’’

‘‘तो क्या बेटी के ब्याह का दहेज बेटी की कमाई से ही जोड़ोगे? हमें नहीं भेजना है इसे शहर. अब तक जैसे निबाहा है, आगे भी निभ जाएगी. लेकिन जवान बेटी को इतनी दूर नहीं भेजूंगी. आएदिन कैसीकैसी खबरें आती रहती हैं. दिल्ली भेजने को मन नहीं मानता.’’

‘‘अरे, अकेले थोडे़ रहेगी. सुनंदा के यहां रहेगी.’’

‘‘बेटी दामाद पर बोझ बनेगी. क्या कहेंगे दामादजी.’’

‘‘अरे, तो मैं ने थोड़ी उन से कहा था. यह भाई साहब का सुझाव है. कोई अच्छा लड़का मिल जाएगा तो इस के हाथ पीले कर देंगे. नहीं जंचा तो हाथ जोड़ कर माफी मांग लेंगे. अब इस मामले में ज्यादा बहस मत करो.’’

दूसरी तरफ उस पत्र ने शेफाली के युवा मन को स्वप्निल पंख दे दिए थे. उस ने भी मां को मनाना शुरू कर दिया, ‘‘मां, मुझे एक बार जाने दो न. कौन सा मैं नौकरी करने की सोच रही थी. लेकिन अगर मौका मिल रहा है तो हर्ज क्या है? अगर काम जंच गया तो तुम आ कर मेरे साथ रहना. हम अलग घर ले लेंगे. सोचो न मां, आगे छोटूबंटू के लिए भी नए रास्ते खुल जाएंगे.’’

रोतीबिसूरती मां मान गईं. शेफाली के जाने की तैयारी शुरू हो गई. आंसू भरी आंखों से विदाई देते हुए मां ने सावधानी से रहने की ढेरों हिदायतें दे डाली थीं.

ट्रेन की खिड़की से ‘नई दिल्ली रेलवे स्टेशन’ का बोर्ड पढ़ते ही शेफाली के दिल की धड़कनें एक नई ताल में धड़क उठी थीं. उसे लेने सुनंदा दीदी के पति संदीप जीजाजी स्टेशन आए थे. बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व था उन का. उस ने बढ़ कर पैर छूने चाहे तो उन्होंने बीच में ही रोक दिया. वह भी झिझक उठी. जब दीदी का विवाह हुआ था तब वह 8वीं में पढ़ती थी. लेकिन अब ग्रेजुएट हो गई थी.

स्टेशन से दीदी के घर तक का उस का सफर कितना रोमांचक और उत्सुकता से भरा था. वह अपने जीवन के इन सुखद क्षणों को सराहे बिना नहीं रह सकी, जिस ने उसे इतनी बड़ी कार में बैठने का मौका दिया था, अचानक एहसास हुआ कि इसी दुनिया में लोग इस तरह भी शान से जीते हैं.

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खिड़की से बाहर झांकती शेफाली अपने देश की राजधानी के एकएक कोने के परिचय को आत्मसात करती जा रही थी. चौड़ी सड़कें, बडे़छोटे हर आकार के घर. बच्चों के खेलने के लिए जहांतहां बने पार्क. बढि़या होटल, सजीधजी दुकानें देख उस का मनमयूर नाच उठा. वह सोचने लगी कि यहां लड़कियां कितनी आजाद हैं. आराम से जींसपैंट, स्कर्ट और झलकता हुआ टौप पहन कर घूमती हैं. अपनेआप आटो रोक कर चढ़ जाती हैं. सब अपने में निश्ंिचत, बेधड़क घूम रही हैं. उसे आजादी का यह माहौल देख कर बहुत अच्छा लगा.

उस की सोच को विराम तब लगा जब जीजाजी ने जोर से हौर्न बजाया. गाड़ी एक बडे़ से फाटक के सामने रुकी थी. वरदी पहने एक चुस्त आदमी ने आ कर गेट खोला. पार्किंग में एकसाथ कई तरह की गाडि़यां खड़ी थीं. रंगबिरंगे कपड़ों में सजेसंवरे, दौड़ते बच्चों को खेलते देख कर उस ने अंदाजा लगाया कि यहां सब अमीर लोग रहते हैं.

जीजाजी का घर छठी मंजिल पर था. लिफ्ट से निकलते हुए पापा हड़बड़ा गए, ‘कहीं फंस गए तो इसी में रह जाएंगे,’ कह कर उन्होंने अपनी झेंप मिटाई थी. आमनेसामने कुल मिला कर 4 मकान थे. जीजाजी ने आगे बढ़ कर घंटी दबाई. घंटी दबाते ही एक मीठी फिल्मी धुन हवा में तैर गई.

हर घर के बाहर की सजावट वहां रहने वालों के कलात्मक शौक को दर्शा रही थी. दीदी के यहां दरवाजे के दोनों तरफ मिट्टी के बडे़बडे़ छेद वाले घडे़ रखे थे. मोटा मखमली पायदान, कतारों में लगे पौधे.

अंदर से किसी के आने की आहट हुई तो वह सहज हो गई. थोड़ी देर में दरवाजा खुला और एक अजनबी चेहरा नजर आया.

‘‘निर्मला, सामान उठाना,’’ कह कर जीजाजी भीतर चले गए थे.

‘‘मेमसाब बाथरूम में हैं,’’ कह कर निर्मला भी परदे के पीछे चली गई.

दोनों बापबेटी, सामने बिछे कालीन को पार कर, सोफे में धंस गए. घर किसी फिल्मी सेट की तरह सजा हुआ था. हर चीज इतनी कीमती कि दोनों कीमत का अंदाजा भी नहीं लगा सकते थे. बड़ा सा टीवी, लेदर का सोफा, शीशे की गोल सेंटर टेबल, बढि़या कालीन, चमकदार भारी परदे. सजावट की अलमारी में रखी महंगीमहंगी चीजें, सुंदरसुंदर बरतन, अनेक प्रकार के कप और ग्लास, रंगबिरंगी मूर्तियां और सुनहरे फ्रेम में जड़ी बड़ीबड़ी पेंटिंग.

अपने 2 कमरे वाले सरकारी घर को याद कर शेफाली सकुचा उठी थी. आंखों के सामने अपने घर की बेतरतीबी पसर गई. यहां आने से पहले वही घर शेफाली को कितना अच्छा लगता था. गृहप्रवेश वाले दिन सब की बधाइयां लेते हुए मां का कलेजा गर्व से कितना चौड़ा हो गया था. लेकिन कितना फर्क था इन 2 घरों की हैसियत में. ताऊजी के शहर आने से उन के परिवार के सदस्यों के रहनसहन के स्तर में कितना परिवर्तन आ गया था.

पल भर में ही निर्मला ट्रे में शीशे के चमचमाते गिलास में ठंडा पानी डाल कर ले आई. उस के बाद चाय और मिठाईनमकीन से सजी प्लेट रख गई. वह अपने काम में कुशल थी. अभी तक दीदी नहीं आईं. वक्त जैसे उन के इंतजार में रुक गया था. कितनी देर हो गई. वह तो जानती थीं कि आज हम आ रहे हैं फिर भी…जीजाजी भी अंदर जा कर गायब हो गए. ये भी कोई बात है. उस ने उकता कर पापा की तरफ देखा.

भतीजी के घर की शानोशौकत ने उन की आंखें फैला दी थीं. उन के चेहरे की खुशी और उत्कंठा के भाव बता रहे थे कि वह मां को सब बताने के लिए बेचैन हो रहे थे.

सच है, जिस लक्ष्मी को शेफाली के पापा ने सदा ज्ञान के आगे तुच्छ समझा था वही आज अपने भव्य रूप में उन्हें लुभा रही थी. सदा के संतोषीसुखी, पितापुत्री अपनी गरीबी को सोच कर आपस में ही संकुचित हो रहे थे.

‘‘अरे, चाय ठंडी हो रही है, लीजिए न चाचाजी.’’

मुसकुराती हुई, खुशबू बिखेरती हुई सुनंदा दीदी की मीठी आवाज गूंजी. कितनी गोरी, कितनी सुंदर, कितनी स्मार्ट लग रही थीं. उन्होंने आगे बढ़ कर पापा के पैर छुए.

पापा ने गद्गद कंठ से आशीर्वाद दिया.

शेफाली जैसे ही दीदी के पैर छूने को झुकी, उन्होंने उसे गले लगा लिया. उस के मन की सारी आशंकाएं खत्म हो गईं. वह सोच रही थी कि पहले से ही दर्पभरी दीदी इस वैभवऐश्वर्य को पा कर और घमंडी हो गई होंगी, लेकिन वह बदल गई हैं…यह भी नहीं सोचा कि रास्ते की गर्दधूल से सनी है मेरी देह. चाय पीते हुए दीदी ने सब का हाल पूछा. फिर उस का कमरा दिखाया.

‘‘बेटा, इतने प्यार से सुनंदा तुम को रख रही है, तुम भी उसे पूरा मानसम्मान देना. अच्छे से रहना. तुम्हारी मां सुनेगी तो खुश हो जाएगी. मुझे भी तसल्ली हुई कि तुम्हें यहां कोई कष्ट नहीं होगा.’’

भीतर से जीजाजी तैयार हो कर निकले. उन्हें आफिस जाना था. वह नाश्ता कर के विदा ले कर चले गए.

‘‘आप लोग भी नहाधो लीजिए और नाश्ता कर के आराम कीजिए,’’ कह कर दीदी फोन पर व्यस्त हो गईं.

खाना खा कर पापा जा कर लेट गए. उन्हें शाम की गाड़ी से लौटना था. उसे भी आराम करने को कह कर दीदी अपने कमरे में चली गईं.

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शाम को दीदी ने पापा से कहा, ‘‘चाचाजी, मैं कुछ कपडे़ लाई थी, छोटूबंटू के लिए और चाचीजी के लिए साडि़यां. इन्हें रख लीजिए. मैं थोड़ा बाजार से आती हूं, फिर आप को स्टेशन छोड़ कर आफिस निकल जाऊंगी.’’

‘‘अभी शाम को आफिस, बिटिया,’’ पापा कहते हुए हिचके.

‘‘हां, चाचाजी, मैं एक काल सेंटर में नौकरी करती हूं. मेरे सारे क्लाइंट्स अमेरिकन हैं. अब भारत और अमेरिका में तो दिनरात का अंतर होता ही है. इसीलिए रात को नौकरी करनी पड़ती है. वैसे शिफ्ट बदलती रहती हैं. कंपनी सारी सुविधाएं देती है. आनेजाने के लिए कार पिकअप, खानापीना सब. सुबह 12 बजे मैं घर आ जाती हूं,’’ दीदी ने सहज हो कर जवाब दिया.

‘‘और दामादजी?’’

‘‘वह कंप्यूटर की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सिस्टम एनालिस्ट हैं. उन की ड्यूटी सुबह 10 से शाम 7 बजे तक होती है. वह 8 बजे शाम तक आएंगे. आप से भेंट नहीं हो पाएगी.’’

‘‘दीदी, आप अमेरिकियों से किस भाषा में बात करती हैं?’’ शेफाली ने जिज्ञासा जाहिर की.

‘‘अमेरिकन इंग्लिश में, जिस की कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जाती है,’’ दीदी ने मुसकरा कर कहा, ‘‘तुम भी सब सीख जाओगी. निर्मला, खाना जल्दी बना लेना. चाचाजी को जाना है.’’

‘‘घर की सारी व्यवस्था नौकरानी के हाथों में है. ऐसी नौकरी का क्या फायदा,’’ पापा बोले, ‘‘शेफाली, तुम ऐसी नौकरी मत करना, चाहे कितना भी पैसा मिले. हम लोग तो शहर के रहने वाले नहीं हैं. तुम्हारा ब्याहशादी सब बाकी है अभी, समझी न.’’

शेफाली ने हामी भरी, ‘‘आप बेफिक्र रहें, पापा.’’

पापा के जाने के बाद शेफाली ने निर्मला से पूछा, ‘‘मिंटी नजर नहीं आ रही है.’’

‘‘आज देर से आई है और तब आप सो रही थीं. अभी वह सो रही है.’’

निर्मला ने खाना बना कर टेबल पर रखा, फटाफट रसोई साफ की और बोली, ‘‘साहब आएंगे तो आप लोग खा लेना.’’

जीजाजी आते ही अपने कमरे में चले गए. वहां से टीवी चलने की आवाज आती रही. उस से उन्होंने बात भी नहीं की. वह अपनेआप को उपेक्षित महसूस करने लगी. रात को बिना खाए ही सो गई.

सुबह निर्मला के आने पर शेफाली की नींद टूटी. उस ने आते ही मिंटी का नाश्ता बनाया. फिर उसे उठाया, तैयार किया और 8 बजे स्कूल बस में चढ़ा आई. फिर जीजाजी के नाश्ते की तैयारी में लग गई. 10 बजे तक जीजाजी भी चले गए.

बेहद जल्दीजल्दी निर्मला काम निबटा रही थी. झाड़ ूपोंछा, बिस्तर झाड़ना, सोफे, परदे, खिड़की, दरवाजे, शोकेस सब की डस्ंिटग की. फिर फटाफट खाना बनाया. मशीन में कपड़े डाले. 12 बजे तक उस ने तमाम काम निबटा लिए, नहाधोकर शैंपू किए हुए बालों को फहराते हुए वह कपडे़ सुखाने लगी.

एकदम घड़ी की सुईयों से बंधा था निर्मला का एकएक काम. इतने काम में तो मां का सारा दिन निकल जाता है और फिर भी वह अस्तव्यस्त सी घूमती रहती हैं. मां ही क्या ज्यादातर औरतों का यही हाल है.

निर्मला का पति एक पब्लिक स्कूल में चौकीदार है. 7 साल की एक बेटी भी है, जो उसी स्कूल में पढ़ती है. घर में कूलर है, रंगीन टीवी है, टेप है. ये दीदी का घर संभालती है और इस का घर इस की सास संभालती है. आखिर निर्मला भी काम- काजी बहू है.

दरवाजे की घंटी ने मधुर स्वर छेड़ा, दीदी आ गईं. नींद से उन की आंखें लाल थीं. उन्होंने किसी तरह चाय के साथ एक टोस्ट निगला. ठंडे स्वर में उस का हाल पूछा और निर्मला को डिस्टर्ब न करने का निर्देश दे कर बेडरूम में चली गईं.

थोड़ी ही देर में मिंटी आ गई. जैसेतैसे निर्मला ने उस के कपडे़ बदले, खाना खिलाया, फिर मिंटी टीवी पर कार्टून देखने बैठ गई. निर्मला बीचबीच में उसे आवाज कम करने को कहती रहती. 4 बजे निर्मला उठी, चाय बनाई, खुद पी, शेफाली को दी, फिर मिंटी को घुमाने पार्क में ले गई. वहां से आ कर दूध पिलाया, खाना खिलाया और 6 बजे उसे सुला दिया.

शेफाली ने निर्मला से पूछा, ‘‘दीदी कब उठेंगी?’’

‘‘नींद टूटेगी तो उठ जाएंगी. इसीलिए बेबी को सुला दिया है, नहीं तो तंग करती है और मेमसाब गुस्सा हो जाती हैं.’’

वह यह देख कर हैरान रह गई कि 4 साल की बच्ची पूरी तरह आया के भरोसे परवरिश पा रही थी. मां बेखबर सो रही थी. पापा का फोन आया, बातें कीं, फिर वह बोर होने लगी. एक ही दिन में नीरसता सताने लगी. आ कर अपने कमरे में लेट गई. कैसी शांति है यहां, 4 कमरे, 4 आदमी. न कोई बातचीत, न ठहाके. उसे अपने घर की याद आ गई और रुलाई फूट पड़ी. जाने कब आंख लग गई.

घंटी बजी तो वह जागी. जीजाजी आए थे. वह बाथरूम से हाथमुंह धो कर बाहर निकली और ठिठक कर वापस अपने कमरे में चली गई. दीदीजीजाजी ड्राइंगरूम में ही टीवी के सामने एकदूसरे से लिपटे, एकदूसरे के होंठों को बेतहाशा चूम रहे थे, जैसे फिल्मों में देखती है. जीजाजी के हाथ दीदी के उभारों पर… शेफाली की कनपटी गरम हो गई.

दीदी ने थोड़ी देर बाद निर्मला को आवाज दे कर चाय लाने को कहा. वह शर्म से पानीपानी हो गई. निर्मला सब जानतीदेखती होगी. वह थरथरा गई.

दीदी ने उस के बारे में पूछा, निर्मला बोली, ‘‘सो रही हैं.’’

शेफाली ने सुकून महसूस किया कि चलो, सामने नहीं जाना पड़ेगा. निर्मला चली गई. थोड़ी देर बाद दीदी भी. जीजाजी दरवाजे तक छोड़ने गए थे. उस ने परदे के पीछे से साफ उन का आलिंगन और चूमना देखा. अब रह गए जीजाजी और शेफाली. डर और संकोच से सराबोर वह सामने पड़ने से कतराती रही.

वह और जीजाजी रात को अकेले…आगे शेफाली सोच नहीं पाई. अब यहां रहना है तो निर्मला की तरह अनजान बन कर रहना होगा. इन के घर की निजता का खयाल रखना होगा.

कुछ ही दिनों में शेफाली यहां के माहौल में रम गई. अब स्कूल से आते ही मिंटी मौसीमौसी करने लगती. कहानियां सुनतेसुनते वह कब खा लेती पता ही नहीं चलता. दीदीजीजाजी भी निश्ंिचत हो कर मिंटी की प्यारी गप्पें सुनते. अब उसे सुलाने की जल्दी किसी को नहीं रहती.  शेफाली के पास छोड़ दोनों एकांत में वक्त बिताते. निर्मला भी निश्ंिचत हो काम निबटाती. घर के औपचारिक माहौल में एक स्वाभाविकता आ गई थी.

एक दिन दीदी ने सलाह दी, ‘‘शेफाली, तुम संदीप से कंप्यूटर सीख लो.’’ तो उस ने हिचक के साथ इस प्रस्ताव को स्वीकारा था. दीदी और निर्मला के जाने के बाद जब मिंटी सो जाती तो दोनों बैठ कर कंप्यूटर पर नया साफ्टवेयर सीखते. जीजाजी के बदन से उठती परफ्यूम की खुशबू उस को उस दृश्य की याद दिला देती थी.

कंप्यूटर के नामी इंस्टीट्यूट जो कोर्स 6 महीने में सिखाते हैं वह जीजाजी से कुछ ही दिनों में शेफाली सीख गई. कंप्यूटर टाइपिंग, ई-मेल करना, इंटरनेट पर काम करना, सर्च करना आदि.

फोन पर ये सब सुन कर मां भावुक हो उठीं, ‘‘तुम्हारे पापा कह रहे थे कि क्या हुआ जो उसे सुनंदा की तरह कानवेंट में नहीं पढ़ा पाए. समझदारी और दुनियादारी तो कोई भी शिक्षा सिखा देती है. शेफाली अपने पैरों पर खड़ी हो जाएगी तो भैया जैसा अच्छा दामाद हमें भी मिल जाएगा. दामादजी को भी तुम्हारा व्यवहार अच्छा लगा तो वह भी बढ़ कर मदद कर देंगे?’’

जल्द ही शेफाली की मर्केंडाइजर की नौकरी लग गई. अब वह भी व्यस्त हो गई. अकसर जीजाजी उसे साथ ले आते.

फ्रेश हो कर वह अपने और जीजाजी के लिए कौफी बनाती. दिन भर के काम के बाद घर आ कर जीजाजी का साथ उसे भाने लगा था. दोनों साथ टीवी देखते. अब अटपटे दृश्यों पर चैनल नहीं बदले जाते थे. न ही कोई उस समय उठ कर जाता. सब कितना सामान्य लगने लगा था. शेफाली इसे मैच्योर होना कहती. फिर जहां ऐसा खुलापन चलता है तो क्या हर्ज है. दीदी तो उस के सामने सिगरेट भी पीने लगी थीं.

उस ने दीदी को कुछ दिन पहले एक लेख पढ़ने को दिया था, ‘धूम्रपान का गर्भ पर असर.’ दीदी हंस दी थीं, ‘‘अब कौन सा बच्चा पैदा करना है मुझे, एक हो गया न, और कौन सा मैं मिंटी के सामने पीती हूं्. देख न, इसीलिए रात की नौकरी  करती हूं. रात में तो सब सोते ही हैं. घर में रहो न रहो, क्या फर्क पड़ता है. दिन में मैं घर में ही रहती हूं ताकि मिंटी मां को मिस न करे.’’

साहस कर शेफाली बोल पड़ी, ‘‘लेकिन दीदी, जीजाजी…’’

दीदी हंसीं, ‘‘देख, मर्दों को दिन में एक बार या हफ्ते में औसतन 2-3 बार काफी होता है. मैं अपने पति को पूरा मजा देती हूं. संदीप ने कुछ कहा क्या? क्यों नहीं साली आधी घरवाली होती है.’’

यह कह कर दीदी ने आंख दबाई तो वह तिलमिला गई थी. छोटी बहन से इतना गंदा मजाक, ‘‘छी: दीदी, आप कैसी भाषा का इस्तेमाल करती हैं. जीजाजी बहुत अच्छे हैं. आप इस तरह बोलेंगी तो फिर मैं यहां नहीं रहूंगी…’’

वह खिलखिला पड़ीं, ‘‘यू विलेज गर्ल…जानती है, हमारे यहां क्या होता है…’’

और उन्होंने अपने आफिस के माहौल और वहां इस्तेमाल होने वाली भाषा का जो वर्णन किया, उसे वह सुन नहीं पाई.

‘‘दीदी, आप छोड़ दो ऐसी नौकरी.’’

वह हंसीं, ‘‘लाइफ इज मस्त आउट देअर. आजकल सब चलता है. आज का फंडा है, जिंदगी एक बार ही मिलती है, इसे भरपूर जीओ और ज्यादा अगरमगर की मत सोचो.’’

तभी जीजाजी आए. अब दोनों उस के सामने ही ‘किस’ कर लेते. दीदी हंसहंस कर बोलीं, ‘‘शेफाली को तुम्हारी बहुत चिंता है. कह रही थी कि मैं रात की नौकरी छोड़ दूं. तुम अकेले हो जाते हो, क्यों?’’

शेफाली उठ कर भीतर चली गई. छी:, जरा भी लाजलिहाज नहीं है दीदी में. यह बात उन्हें कहनी चाहिए थी. या तो उन दोनों का आपस में बहुत विश्वास और खुलापन था या फिर दीदी की नजर में मेरी कोई अहमियत ही नहीं. जीजाजी की नजरें कितनी अजीब हो गई थीं.

उस रात मिंटी को बुखार आ गया लेकिन क्लाइंटविजिट की वजह से दीदी को जाना पड़ा. मिंटी के सोने के बाद जैसे ही वह उठी, जीजाजी बोले, ‘‘शेफाली, कौफी बनाओगी.’’

वह काफी बना लाई. जीजाजी एकाएक बोले, ‘‘तुम्हारे आने के बाद घर घर लगने लगा है. तुम्हारे आने से मिंटी को मां मिल गई. अब काम खत्म कर के मन करता है, सीधा तुम्हारे पास आऊं. काश, सुनंदा में भी तुम्हारे जैसी संवेदनशीलता होती, तो मेरी जिंदगी यों तन्हा नहीं होती. देखा, तुम तो समझ गईं वह जान कर भी नहीं समझना चाहती मेरा अकेलापन, मेरी तनहाई. दिन भर का थकाहारा घर आता हूं तो न पत्नी मिलती है और न बच्ची का साथ. तुम ने आ कर मेरी जिंदगी के बिखराव को संभाल लिया.’’

‘‘आप दीदी से कहिए न कि वह दूसरी नौकरी ढूंढ़ लें.’’

‘‘अब सिंपल ग्रेजुएट और 12वीं पास लोगों को इतने पैसे वाली नौकरी कौन देता है. बड़ीबड़ी डिगरी वाले तो मार्केट में घूमते हैं. यहां क्या योग्यता चाहिए, बस अच्छी अंगरेजी का ज्ञान और प्रकृति के नियमों के खिलाफ जीने की आदत. और बदले में मिलता है पैसा, कमीशन, पार्टियां, पिज्जाबर्गर और कोल्डड्रिंक्स. उसे जिंदगी की रंगीनियां चाहिए. और मैं ठहरा पार्टीपिकनिक से परहेज करने वाला.’’

शेफाली खामोश उन्हें निहार रही थी. मन मचलने लगा था. कैसी संवेदनशील थीं वे आंखें. अंदर तक कुछ शून्य सा पसर गया था. क्या वह मेरी तरफ आकर्षित हैं. मैं उन्हें अच्छी लगती हूं. वह मुझ से प्रेम करते हैं. रोमरोम में उठती ये कैसी सिहरन थी. आंखें मूंदे शेफाली अपनी देह की कंपन पर काबू पाने की चेष्टा करने लगी. जीजाजी ने उस के हाथों पर अपना हाथ धर दिया.

कप उठा कर वह किचन में चली गई. ये क्या हो रहा है उसे. जो बात कुंआरी हो कर वह समझ पाई क्या दीदी नहीं समझ पाती होंगी? दीदी ने तो कहा था कि वह हफ्ते के एवरेज का खयाल रखती हैं…तो…फिर…जीजाजी को मुझ से यह सब कहने की क्या जरूरत है…वह मेरी प्रशंसा कर क्या चाहते हैं…मुझ से यह सब क्यों कह रहे हैं…मुझे पाने के लिए…इतनी शिकायत है दीदी से तो फिर प्रेम प्रदर्शन क्यों करते हैं. दीदी का विरोध क्यों नहीं करते?

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दीदी के व्यवहार में तो उस ने कभी जीजाजी के प्रति उपेक्षा महसूस नहीं की. अंदर दोनों में क्या बातें होती हैं वह नहीं जानती पर उस दिन जो ड्राइंगरूम में उस ने देखा था वह तो झूठ नहीं था. बिना चाहत, बिना प्रेम भी ऐसी उत्तेजना जगती है भला.

थोड़ी आहट के बाद किचन की बत्ती बंद हो गई. जीजाजी ने आ कर उसे बांहों में भर लिया. ये खुशबू, ये आलिंगन, ये स्पर्श, संदीप उसे पागलों की तरह चूमने लगे. उस का रोमरोम सिहर उठा. वह खुद को छुड़ाना नहीं चाहती थी. उस के बदन में चींटियां रेंगने लगीं. कितना अच्छा लग रहा है…

तभी फोन की घंटी बजी. दीदी का फोन था. मिंटी का हाल पूछ रही थीं. वह जैसे सोते से जागी. ये क्या करने जा रही थी वह? अपने ही हाथों अपना सर्वनाश. इस क्षणिक भावुकता का अंत क्या होने वाला था. उस के हाथ क्या लगता? कल को कुछ हो गया तो आरोप तो उस के ही सर आएगा. बढ़ावा भी तो उसी ने दिया था. वही दीदी से बात करने गई थी, उन के दांपत्य जीवन पर.

दीदी के सामने शराफत का ढोंग करने वाले जीजाजी तो अपना मुंह तक नहीं खोलेंगे. उस की बात उसी के खिलाफ इस्तेमाल की जाएगी. क्या वह जानती थी कि ये फांस उसी के गले में अटकेगी. कितने चालाक निकले जीजाजी. मेरी कोमल भावनाओं को उकसा कर, मात्र मेरा उपयोग करना चाहते थे. आज अपने ही घर में अपनों के हाथ छली जाती. ऐसे ही अनचाहे तो हादसे हो जाते हैं.

अपनी उखड़ी सांसों को संयत करते हुए वह मिंटी के पास आ गई. दीदी को मिंटी की चिंता है और वह कैसे उन पर लापरवाही का आरोप लगा रहे थे.

फोन रखने के बाद जीजाजी ने उसे कमरे में आने का इशारा किया. उसे खुद से घृणा होने लगी. शेफाली ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया और मिंटी के पास ही सो गई. सुबह निर्मला के आने पर ही दरवाजा खोला.

मिंटी का बुखार और बढ़ गया था. दीदी ने आफिस से हफ्ते भर की छुट्टी ले ली. दिनरात बच्ची के पास ही बैठी रहतीं. अपने हाथों से उसे खिलातीं. उस के साथ बातें करतीं. उस के सामने दीदी का नया रूप उजागर हुआ था. सच कहते हैं, मां आखिर मां ही होती है और पुरुष, सिर्फ पुरुष.

शेफाली ने आननफानन में फैसला लिया और आफिस के एक सहयोगी की मदद से अलग घर ढूंढ़ लिया. सुनंदा दीदी हैरान रह गईं, ‘‘अचानक क्या हो गया, शेफाली? तुम्हारे आने से हम लोगों को कितना अच्छा लगने लगा है, मिंटी कितनी खुश रहने लगी है. मेरी लाइफ भी स्मूथ हो गई है. अब चाचाचाची क्या कहेंगे?’’

शेफाली ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘दीदी, आफिस दूर पड़ता है. फिर कितने दिन आप पर बोझ रहूंगी. इतने महीनों से तो आप ही के पास रह रही हूं. अब तो नौकरी भी कर रही हूं…’’

‘‘आई नो…पर तुम्हारी शादी तक चाचाजी ने कहा था, तुम यहीं रहोगी.’’

‘‘दीदी, शादी कब होगी, पता नहीं. कोई अच्छा लड़का मिलेगा तो जरूर करूंगी. पर अब कुछ साल नौकरी कर लूं. आप की तरह आत्मनिर्भर बन जिंदगी का मजा ले लूं. इस दिशा में कुछ होगा तो कहना. मैं आती रहूंगी…संपर्क में रहूंगी.’’

उस के होंठों पर मुसकराहट थी पर स्वर काफी सपाट था.

दीदी ने उलझे स्वर में ही जवाब दिया, ‘‘अब तुम ने सोच ही लिया है तो मैं क्या कहूं. पर मुझे अचानक इस फैसले का कारण समझ में नहीं आया. जीजाजी भी यहां नहीं हैं. उन से आ कर मिल लेना या फिर फोन कर देना.’’

दीदी कभी जानें या न जानें पर उस रात कहां ले जातीं उस की ये भावनाएं… निश्चित ही पतन की ओर…मांबाप का गर्व भंग होता, भाई का उपहास, समाज में अनादर…सब से उबर गई. अपनों के बीच हुए किसी हादसे का शिकार होने से बच गई.

मां की कही बात याद आ गई, ‘‘समझदारी और दुनियादारी तो कोई भी शिक्षा सिखा देती है.’’    द

ग्वार की खेती कहां उगाएं कौन सी किस्म

लेखक- भानु प्रकाश राणा

ग्वार के दानों से निकलने वाले गोंद के कारण इस की खेती ज्यादा फायदेमंद हो सकती है. हरियाणा के अनेक इलाकों में ग्वार की खेती ज्यादातर उस के दानों के लिए की जाती है. ग्वार की खेती उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान जैसे अनेक इलाकों में की जाती है. इस की खेती को ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. यह बारानी इलाकों के लिए खरीफ की खास फसल है इसलिए इस की खेती उन्नत तरीके से करनी चाहिए और अच्छी किस्म के बीजों को ही बोना चाहिए.

ग्वार में गोंद होने की वजह से इस का बारानी फसल का औद्योगिक महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है. भारत से करोड़ों रुपए का गोंद विदेशों में बेचा जाता है. ग्वार की अनेक उन्नत किस्मों में 30 से 35 फीसदी तक गोंद की मात्रा होती है.

ग्वार की अच्छी पैदावार के लिए रेतीली दोमट मिट्टी मुफीद रहती है. हालांकि हलकी जमीन में भी इसे पैदा किया जा सकता?है. परंतु कल्लर (ऊसर) जमीन इस के लिए ठीक नहीं है.

जमीन की तैयारी : सब से पहले 2-3 जुताई कर के खेत की जमीन एकसार करें और खरपतवारों का भी खत्मा कर दें.

बोआई का समय?: जल्दी तैयार होने वाली फसल के लिए जून के दूसरे हफ्ते में बोआई करें. इस के लिए एचजी 365, एचजी 563, एचजी 2-20, एचजी 870 और एचजी 884 किस्मों को बोएं.

देर से तैयार होने वाली फसल एचजी

75, एफएस 277 की मध्य जुलाई में बोआई करें. अगेती किस्मों के लिए बीज की मात्रा

5-6 किलोग्राम प्रति एकड़ और मध्य अवधि के लिए बीज 7-8 किलोग्राम प्रति एकड़ की जरूरत होती है. बीज की किस्म और समय के मुताबिक ही बीज बोएं.

खरपतवारों की रोकथाम : बीज बोने के 20-25 दिन बाद खेत की निराईगुड़ाई करें. अगर बाद में भी जरूरत महसूस हो तो 15-20 दिन बाद दोबारा एक बार फिर खरपतवार निकाल दें.

गुड़ाई करने के लिए हाथ से चलने वाले कृषि यंत्र हैंडह्वील (हो) से कर देनी चाहिए. ‘पूसा’ पहिए वाला हो वीडर कम कीमत वाला साधारण यंत्र है. इस यंत्र से खड़े हो कर निराईगुड़ाई की जाती?है. इस का वजन तकरीबन 8 किलोग्राम है. इस यंत्र को आसानी से फोल्ड किया जा सकता है. यह यंत्र कहीं?भी लाया व ले जाया जा सकता है.

इस यंत्र को खड़े हो कर, आगेपीछे धकेल कर चलाया जाता?है. निराईगुड़ाई के लिए लगे ब्लेड को गहराई के अनुसार ऊपरनीचे किया जा सकता?है. पकड़ने में हैंडल को भी अपने हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं. यह कम खर्चीला यंत्र है. आजकल यह यंत्र गांवदेहातों में आसानी से मिलता?है. अनेक कृषि यंत्र निर्माता इसे बना रहे हैं.

खेत में पानी : आमतौर पर इस दौरान मानसून का समय होता?है और पानी की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर बारिश न हो और खेत सूख रहे हों तो फलियां बनते समय हलकी सिंचाई जरूर करें.

फसल की कटाई?: जब फसल की पत्तियां पीली पड़ कर झड़ने लगें और फलियों का रंग भी भूरा होने लगे तो फसल की कटाई करें और कटी फसल को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें. जब कटी फसल सूख जाए तो इस की गहाई करें और दानों को सुखा कर रखें.

अगर फसल में कीट व रोग का हमला दिखाई दे तो कीटनाशक छिड़कें और कुछ दिनों तक पशुओं को खिलाने से परहेज करें.

उन्नत किस्में

हरियाणा के लिए

एफएस 277 : यह किस्म सीधी व लंबी बढ़ने वाली है. साथ ही, देर से पकने वाली किस्म है. यह मिश्रित खेती के लिए अच्छी मानी गई है. इस के बीज की पैदावार 5.5-6.0 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 75 : अनेक शाखाओं वाली यह किस्म रोग के प्रति सहनशील है और देर से पकने वाली है. इस के बीज की पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 365 : यह कम शाखाओं वाली जल्दी पकने वाली किस्म है. यह किस्म तकरीबन 85-100 दिनों में पक जाती?है और औसतन पैदावार 6.5-7.5 क्विंटल प्रति एकड़ है. इस किस्म के बोने के बाद आगामी रबी फसल आसानी से ली जा सकती है.

एचजी 563 : यह किस्म भी पकने में 85-100 दिन लेती?है. इस के पौधों पर फलियां पहली गांठ व दूसरी गांठ से ही शुरू हो जाती हैं. इस का दाना चमकदार और मोटा होता है. इस किस्म की पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 2-20 : ग्वार की यह किस्म पूरे भारत में साल 2010 में अनुमोदित की गई?थी. 90 से 100 दिनों में पकने वाली इस किस्म की फलियां दूसरी गांठ से शुरू हो जाती हैं और इस की फली में दानों की तादाद आमतौर पर दूसरी किस्मों से?ज्यादा होती व दाना मोटा होता है. इस किस्म की औसत पैदावार 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 870 : इस किस्म को भी साल 2010 में हरियाणा के लिए अनुमोदित किया गया?था. पकने का समय 85-100 दिन. दाने की पैदावार 7.5-8 क्विंटल प्रति एकड़ है. गोंद की औसत मात्रा 31.34 फीसदी तक होती है.

एचजी 884 : ग्वार की इस किस्म को पूरे भारत के लिए साल 2010 में अनुमोदित किया गया था. यह किस्म 95-110 दिन में पकती है. मोटे दाने, दाने की पैदावार 8 क्विंटल प्रति एकड़ व गोंद की औसत मात्रा 29.91 फीसदी तक है.

राजस्थान के लिए

आरजीसी 936 : यह किस्म जल्दी पकने वाली है. दाने मध्यम आकार के और हलके गुलाबी रंग के होते?हैं. 80-110 दिन में पकने वाली यह किस्म अंगमारी रोधक है. इस में झुलसा रोग को सहने की कूवत भी होती?है. इस के पौधे शाखाओं वाले झाड़ीनुमा, पत्ते खुरदरे होते?हैं. सफेद फूल इस किस्म की शुद्धता बनाए रखने में सहायक है. सूखा प्रभावित इलाकों में जायद और खरीफ में यह किस्म बोने के लिए सही है. यह किस्म 8 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती है.

आरजीएम 112 (सूर्या) : इस किस्म को जायद और खरीफ दोनों में बोया जा सकता?

है. यह किस्म 85 से 100 दिन में

पक कर तैयार हो जाती?है. इस के पौधे शाखाओं वाले झाड़ीनुमा, पत्ते खुरदरे और एकसाथ पकने वाली यह किस्म

10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज देती?है. इस किस्म के फूलों का रंग नीला, फली मध्यम लंबी भूरे रंग की और दानों का रंग सलेटी है और इस में बैक्टीरियल ब्लाइट सहन करने की कूवत होती है.

आरजीसी 1002 : शुष्क और कम बारिश वाले इलाकों के लिए यह खास किस्म है. इस के पौधे 60 से 90 सैंटीमीटर ऊंचे व अत्यधिक शाखाओं वाले होते?हैं. इस की पत्तियां खुरदरी होती हैं और पत्ती के किनारों पर स्पष्ट कटाव होते?हैं. फली की लंबाई 4.5 से 5.0 सैंटीमीटर (मध्यम) होती?है. यह शीघ्र पकने वाली किस्म है यानी 80-90 दिन में पक जाती है. पैदावार तकरीबन 10 से 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है.

आरजीसी 1003 : इस किस्म के पौधे अधिक शाखाओं वाले होते?हैं. पत्तियां खुरदरी व किनारी बिना दांतेदार होती हैं. यह फसल 85 से 90 दिनों में पक जाती है. पैदावार 8 से

14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. बीज में गोंद की मात्रा 29 से 32 फीसदी होती?है. यह किस्म देश के शुष्क और अर्द्धशुष्क इलाकों के लिए सही है.

आरजीसी 1017 : इस किस्म के पौधों की पत्तियां खुरदरी और दांतेदार होती हैं. इस की फसल 90 से 100 दिनों में पक जाती है. इस के दाने औसत मोटाई वाले, जिस के 100 दानों का वजन 2.80 से 3.20 ग्राम के मध्य होता है. इस की पैदावार 10 से 14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरजीसी 1031 (क्रांति) : इस किस्म के पौधे 75 से 108 सैंटीमीटर ऊंचाई वाले और अत्यधिक शाखाओं वाले होते हैं. पौधों पर पत्तियां गहरी हरी, खुरदरी और कम कटाव वाली होती हैं. दानों का रंग सलेटी और आकार मध्यम मोटाई का होता है. इस किस्म

के पकने की अवधि 110 से 114 दिन है

और पैदावार कूवत 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरजीसी 1038 (करण) : इस किस्म के पकने की अवधि 100 से 105 दिन है. पौधे की पत्तियां खुरदरी और कटाव वाली होती?हैं. इस किस्म की पैदावार कूवत 10 से

21 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है. दानों का रंग सलेटी और आकार मध्यम मोटाई का होता?है. फलियां मध्यम लंबी और इन में दानों का उभार साफ दिखाई देता?है. यह किस्म अनेक रोगों की प्रतिरोधक है.

आरजीसी 1033 : इस किस्म के पौधों की?ऊंचाई तकरीबन 40 से 115 सैंटीमीटर होती?है और पौधों पर पत्तियां गहरी हरी, खुरदरी और कम कटाव वाली होती हैं. फूल हलके गुलाबी रंग के और दानों का रंग सलेटी और आकार मध्यम मोटाई का होता है. इस किस्म की अवधि 95 से 106 दिन है और पैदावार कूवत 15 से

25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आरजीसी 1066 : इस किस्म के पत्ते कटावदार होते हैं. यह किस्म जल्दी पकने वाली है यानी 90 से 100 दिन में पकती है. यह किस्म शाखारहित और गुलाबी रंग के फूलोें वाली होती?है. इस किस्म की पैदावार

तकरीबन 12 क्विंटल प्रति हेक्टेयर?है.

आरजीसी 1055 (उदय) : यह किस्म खरीफ व जायद दोनों के लिए सही?है. पत्तों के किनारे खुरदरे और पौधे शाखा वाले होते हैं. इस के पकने की अवधि 95 से 105 दिन है. औसतन पैदावार 11 से 13 क्विंटल है. सिंचित और बारिश वाले इलाकों के लिए यह किस्म सही है.

पंजाब के लिए

एजी 111 : शाखाओं वाली यह जल्दी पकने वाली उन्नत किस्म?है. इस किस्म के पकने की अवधि 90 से 95 दिन है. औसतन पैदावार 12 से 15 क्विंटल है. सिंचित और बारिश पर आधारित इलाकों के लिए यह किस्म सही है.

ग्वार 80 : यह देरी से पकने वाली और शाखाओं वाली किस्म है. इस के पकने की अवधि 115 से 120 दिन है. औसतन पैदावार

18 से 20 क्विंटल है. सिंचित और बारिश आधारित इलाकों के लिए यह किस्म सही है.

दिल्ली के लिए

नवीन : यह किस्म जल्दी पकने वाली है. इस के पौधे शाखाओं वाले होते हैं. इस की पकने की अवधि 90 से 95 दिन है. औसतन पैदावार 15 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती?है. सिंचित और बारिश आधारित इलाकों के लिए सही है.

सुविधा : यह भी जल्दी पकने वाली किस्म है. इस के पौधे शाखाओं वाले होते?हैं. इस के पकने की अवधि 90 से 95 दिन है. औसतन पैदावार 15 से 18 क्विंटल. सिंचित और बारिश आधारित इलाकों के लिए सही?है.

सोना?: यह देरी से पकने वाली किस्म है. इस के पकने की अवधि 115 से 120 दिन है. औसतन पैदावार 16 से 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. सिंचित और बारिश आधारित क्षेत्रों के लिए सही?है. यह अनेक शाखाओं वाली किस्म?है.

पीएलजी 85 : यह देरी से पकने वाली उन्नत किस्म है. इस के पकने की अवधि 100 से 110 दिन है. औसतन पैदावार 15 से 18 क्विंटल, सिंचित व बारिश आधारित इलाकों के लिए सही?है.

उत्तर प्रदेश के लिए

बुंदेल 1 : यह देरी से पकने वाली किस्म है. इस के पकने की अवधि 115 से 120 दिन?है. औसतन पैदावार 14 से 16 क्विंटल तक है. सिंचित और बारिश आधारित इलाकों के लिए सही है.

बुंदेल 2 : यह भी देरी से पकने वाली किस्म?है. इस के पकने की अवधि 115 से 120 दिन?है. औसतन पैदावार 14 से 16 क्विंटल तक है. सिंचित और बारिश आधारित इलाकों के लिए सही है.

गुजरात के लिए

जीजी 1 : यह अनेक शाखाओं वाली किस्म है. इस के पकने की अवधि 105 से 110 दिन है. औसतन पैदावार 8 से 11 क्विंटल है. बारिश पर आधारित इलाकों के लिए सही और फैलने वाली जीवाणु झुलसा रोग प्रतिरोधक है.

जीजी 2 : बारिश आधारित इलाकों के लिए यह ग्वार की उन्नत किस्म है. इस के पकने की अवधि 100 से 110 दिन है. औसतन पैदावार 11 से 13 क्विंटल है. यह फैलने वाली जीवाणु झुलसा रोग प्रतिरोधक है.

सब्जी के रूप में ग्वार : गंवई इलाकों में ग्वार की फलियों के साथसाथ फूलों की सब्जी बना कर खाने में इस्तेमाल किया जाता है. अब तो शहरों में भी तमाम लोग ग्वार की फलियों को सब्जी के रूप में पसंद करते हैं.

ग्वार की फली का बाजार भाव भी अच्छा मिलता है. इसलिए किसानों को चाहिए कि वह ग्वार की खेती करते समय जागरूक रहें और अपने इलाके के मुताबिक उन्नत किस्मों के बीजों का इस्तेमाल करें, जिस से बेहतर पैदावार मिल सके.

ब्रेकअप के बाद फिर सुर्खियों में आईं सिंगर नेहा कक्कड़

बौलीवुड की सबसे पौपुलर सिंगर में से एक नेहा कक्कड़ इन दिनों काफी वायरल हो रही है और वजह है उनकी इंडियन आइडल के कंटेस्टेंट विभोर परासर से नजदीकियां. सोशल मीडिया में दोनों की काफी फोटोज शेयर की जा रही है जिसमें उनके और विभोर के बीच में कुछ होने की बात सामने आ रही है. दोनों कई महीने से अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक दूसरे की फोटोज को शेयर कर रहे थे, जिनके चलते लोग अनुमान लगाने लगे कि दोनों एक दूसरे को डेट कर रहे है. बता दे की कुछ ही समय पहले नेहा कक्कड़ और हिमांश कोहली के ब्रेकअप की खबरे आई थी जिसके बाद बताया गया था की नेहा इस कारण काफी डिप्रेस हैं.

ब्रेकअप बाद किया वर्ल्ड टूर

नेहा और विभोर हाल ही में वर्ल्ड टूर पर गए था जहां की फोटोज काफी वायरल भी हुई थी. इन फोटोज में  विभोर और नेहा के साथ कुणाल पंडित नजर आए थे. बता दे की विभोर इंडियन आइडल के 10th  सीजन में नजर आए थे. इस दौरान उन्होंने अपनी गायकी से हर किसी का दिल जीत लिया था.

 

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Nehuuu you only know to spread Happiness! 😇 The only word that’s not there in your dictionary is Negativity. People who spend time with you know very well How Positive You are!! The way you Sing, The way you Dance, The way you Perform on Stage, The way you Meet People, The way you talk to your NeHearts I can’t imagine Any Superstar being soo humble like You. One thing that’ll remain forever and Everyone would say this, that No one is and would Ever become Neha Kakkar!! 🙌🏼 The Singing Queen 👸🏻 ♥️ And In the end I would say.. I’m here because of You!! Thank you for Everything you’ve given me. I’ve learnt so much from You. Not just Singing but also how to become a Good Human being!! 🙏🏼 Thankyou for making Me and My Brother #KunalPandit @kunalpanditkp an Important part of The #NehaKakkarUSCanadaTour 🔥 Thanks to the whole Team and All the #NeHearts 🤗🙏🏼 . Yours Truely, #NeHeart #VibhorParashar . . Love You #Queen #NehaKakkar 😘. #NehaKakkarLive #IndianIdol10 #KunalPandit . Pic clicked by @themediatronic 🤗

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स्टेज पर बचा चुके है धमाल

नेहा, विभोर की गायकी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई थी और उन्होंने उनको काफी सपोर्ट भी किया था. इस शो के ड्यूएट राउंड के दौरान नेहा और विभोर ने साथ में परफौर्म किया था. दोनों की जुगलबंदी देखकर हर कोई हैरान हो गया था. बहरहाल लोग भले ही नेहा और विभोर का नाम जोड़े लेकिन सच सिर्फ ये है कि नेहा विभोर की मेंटौर है और वह उनके कैरियर को शेप देने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है.

सा रे गा मा पा में आ चुके है नजर

विभोर सालों पहले सा रे गा मा पा में हिस्सा ले चुके है. छोटी सी उम्र में ही विभोर ने सोनू निगम को अपनी गायकी से चौंका दिया था. नेहा और विभोर वर्ल्ड टूर के दौरान अपनी गायकी से खूब धमाल मचाते है. दोनों के गानों पर औडियंस खूब झूमती है और हर कोई उनके साथ गाने भी लगता है.

परिणीति ने बीच पर कराया हौट फोटोशूट, समुंदर में दिखा ये अंदाज

हमेशा चुलबुले अंदाज में दिखनी वाली बौलीवुड एक्ट्रेस परिणीति चोपड़ा इस बार अलग ही अंदाज में सामने आई है. इंस्टाग्राम पर उनकी कुछ फोटोज इतनी बौल्ड है की आप सोच में पड़ जाएंगे. परिणीति चोपड़ा बोल्डनेस के मामले में किसी भी बौलीवुड एक्ट्रेस से कम नहीं हैं. मौका मिलते ही परिणीति कई बार बिकिनी में पोज देती हुई नजर आ चुकी हैं. इन फोटोज में परिणीति चोपड़ा बहुत ही हौट लग रही हैं. समंदर के किनारे ली गई इस फोटोज में परिणीति के बाल भी कमाल लग रहे हैं. वैसे तो बौलीवुड की कई एक्ट्रेसेस है जो अपने हौटनेस और बौल्डनेस के कारण चर्चाओं में रहती है पर परिणीति की बात जरा हटके हैं…

फोटोज में काफी कौन्फिडेंट दिखी परिणीति

परिणीति चोपड़ा की जितनी भी बिकिनी फोटो है उसमें वो काफी कौन्फिडेंट नजर आती है साथ ही परिणीति को घूमने का भी बहुत शौक है. यही वजह है कि, उनको आए दिन कहीं न कही घूमते हुए देखा जाता है. ऐसे ही वेकेशन्स मे परिणीति को बिकिनी में कई बार पोज देते देखा जा चुका हैं. परिणीति चोपड़ा का इंस्टाग्राम इस बात का सबूत है कि, उनको पानी के आसपास रहना कितना पसंद हैं. इस फोटो में भी वह पानी में ही पोज देती दिख रही हैं.

 

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👠

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My talent for floating came in handy for the photoshoot! 🏝🌈 #FilmfareCover 📸 Abhay Singh (BTS in stories!)

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Floating breakfast? Sure! 💦🦋🍳

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Plan for the next 3 days :- nothing! (Except scuba diving of course) 💦☘️🌼@luxsouthari @makeplansholidays @since1988.in

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कहा कहा दिए परिणीति ने पौज

परिणीति चोपड़ा जब मालदीव वेकेशन पर गई थी जहां उन्होंने पानी के किनारे चश्मा लगाए सनसेट का मजा लेती दिख रही थी. वही परिणीति एक फोटो में स्वीमिंग पूल में आराम से लेटी नजर आ रही थी. ऐसी ही ढेरों फोटोज उनके इंस्टाग्राम पर आपको देखने को मिल जाएंगी जिसमे वो अपनी हौटनेस के जलवे बिखेर रही हैं. आपको बता दे की परिणीति बहुत जल्द ही ‘चोपड़ा संदीप’ और ‘पिंकी फरार’, ‘भुज’ और ‘सानिया’ जैसी फिल्मों में नजर आने वाली हैं. जिसको फैंस बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

सत्यमेव जयते

लेखक- सत्य स्वरूप दत्त

एकाएक मुझे अपने शरीर में ढेरों कांच के पैने टुकड़ों की चुभन की पीड़ा महसूस हुई. लड़कों ने क्या पड़ोसी धर्म निभाया है. मेरे मुंह से हठात निकला, ‘‘लगता है क्रिकेटर लक्ष्मण बनने की शुरुआत ऐसे ही होती है.’’

तभी पड़ोसी ने सांत्वना दी, ‘‘अच्छा हुआ कि आप कार में नहीं बैठे थे. अब छोडि़ए, अड़ोसपड़ोस के बच्चे हैं. उन्हें हम लोग प्रोत्साहन नहीं देंगे तो कौन देगा और बच्चे खेलें भी तो कहां खेलें.’’

प्रोत्साहन? मैं खून का घूंट पी कर रह गया और सोचा, जब तक अपने पर नहीं बीतती, स्थिति की गंभीरता का अनुभव नहीं होता, दूसरे की चुभन का एहसास नहीं होता.

‘‘गाड़ी का दुर्घटना बीमा है न?’’

‘बीमा,’ यह शब्द सुनते ही मुझे अचानक डूबते को तिनके का सहारा जैसा एहसास हुआ.

‘‘हां है. 5 साल से है. अभी एक सप्ताह पहले ही पालिसी का नवीनीकरण कराया है.’’

‘‘फिर क्या चिंता है?’’

क्या चिंता है, सुन कर मैं चौंका. पैसा किसी का भी जाए, नुकसान तो नुकसान है और कोई भी नुकसान चिंता का विषय होना ही चाहिए.

देखते ही देखते अड़ोसपड़ोस के बच्चे मेरे आसपास जमा हो गए.

‘‘क्या हुआ अंकल?’’

‘‘ओह शिट.’’

बच्चे मेरे मुंह से निकले शब्दों की अनसुनी कर बोले, ‘‘आप एक किनारे हो जाइए अंकल, हम कांच साफ कर देते हैं. आप ऐसे में बैठेंगे कैसे?’’

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आननफानन में बच्चों ने कांच के टुकड़े साफ कर दिए. शायद वे प्रायश्चित्त कर रहे थे या फिर अपने अच्छा नागरिक होने का परिचय दे रहे थे.

लगभग 10 बज रहा था. सोचा, बीमा कंपनी का आफिस खुल गया होगा, वहां चल कर दुर्घटना की सूचना दे दूं. उन्हें दुर्घटना हुई कार को देखने का अवसर भी मिल जाएगा. यदि बिना दिखाए ‘विंड स्क्रीन’ बदलवा लूंगा तो वह विश्वास नहीं करेंगे. फिर कुछ कागजी काररवाई भी करनी होगी.

आफिस खुल चुका था पर संबंधित अधिकारी नहीं आया था. वहां अधिकारी के इंतजार में मैं साढ़े 12 बजे तक बैठा रहा. वह आया, आते ही कुछ फाइलों में खो गया और 15-20 मिनट तक खोया ही रहा.

फिर मेरी ओर देख कर बोला, ‘‘कहिए, आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’

मैंने अपनी समस्या उसे बताते हुए कहा, ‘‘मैं दुर्घटनाग्रस्त कार लाया हूं. आप देख लीजिए…’’

‘‘कार देखने का काम तो सर्वेयर करता है,’’ वह अधिकारी बोला, ‘‘वह अभीअभी कहीं सर्वे करने निकल गया है. वैसे मैं भी देख सकता हूं किंतु गाड़ी को सीधे देखने का नियम नहीं है. ऐसा कीजिए, किसी गैराज से खर्चे का एस्टीमेट (अनुमान) ले कर आइए. उस के बाद ही हम कार देखेंगे.’’

मेरी समझ में नहीं आया कि एस्टीमेट जब गैराज वाला देगा तो सर्वेयर क्या देखेगा? और एस्टीमेट से पहले कार देखने व उस का फोटो लेने में क्या हर्ज है.

‘‘देखिए, टूटे हुए विंड स्क्रीन के साथ गाड़ी चलाना खासा मुश्किल होता है ऐसे में आप कह रहे हैं कि पहले गाड़ी ले कर मैं गैराज जाऊं फिर वहां से एस्टीमेट ले कर आप के पास आऊं.’’ मैं ने उस अधिकारी को समझाने का प्रयास किया.

‘‘क्या किया जाए. नियमों से हम सब बंधे हैं. ‘क्लेम’ लेना है तो कष्ट तो उठाना ही होगा. घर बैठेबैठे तो क्लेम मिलने से रहा.’’

‘‘यह तो मैं भी देख रहा हूं कि आप के नियम दौड़ाने के नियम हैं. अगले को इतना दौड़ाया जाए, इतना दौड़ाया जाए कि वह ‘क्लेम’ के विचार से ही तौबा कर ले. जो हो आप रिपोर्ट तो लिख लीजिए.’’

‘‘जी हां. आप फार्म भर दीजिए.’’

फार्म भर कर मैं गैराज गया. फिर अगले दिन एस्टीमेट बना. चूंकि उस दिन शनिवार था इसलिए बीमा कंपनी का आफिस बंद था. बात सोमवार तक टल गई.

सोमवार का दिन आया. वह महाशय भी ड्यूटी पर आए थे किंतु कैमरा खराब हो गया. मंगल को कैमरा ठीक हुआ. कार का फोटोग्राफ खींचा गया किंतु आपत्ति के साथ.

‘‘आप ने टूटा हुआ कांच तो साफ कर दिया. फोटो में अब टूटा हुआ कांच कैसे आएगा?’’ अधिकारी ने कहा.

‘‘टूटे कांच के साथ कोई कार कैसे चला सकता है?’’ मैं ने उन्हें समझाने का प्रयास किया.

‘‘आप अपनी परेशानी बता रहे हैं पर मेरी परेशानी नहीं समझ रहे?’’ अधिकारी बोला, ‘‘फोटो में टूटा हुआ विंड स्क्रीन दिखना जरूरी है अन्यथा विंड स्क्रीन निकलवा कर कोई भी डैमेज क्लेम कर सकता है.’’

‘‘देखिए, अब आप हद से बाहर जा रहे हैं. पहले दिन जब मैं कार में आया था तो विंड स्क्रीन टूटा हुआ था किंतु तब आप ने विंड स्क्रीन देखा नहीं और अब…’’

मेरी बात को बीच में काट कर अधिकारी बोला, ‘‘मेरे देखने से कुछ नहीं होगा. टूटा हुआ विंड स्क्रीन कैमरे को दिखना चाहिए. इस के बिना आप का केस थोड़ा कमजोर पड़ जाएगा. खैर चलिए, आवश्यक फार्म भर दीजिए. कार को रिपेयर करा कर बिल आफिस में जमा कर दीजिए.’’

मैं आफिस से बाहर आया और गैराज में जा कर विंड स्क्रीन लगवाया. लगभग एक सप्ताह बाद कार चलाने लायक हुई थी अन्यथा बिना विंड स्क्रीन की कार लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई थी. लोग समझ रहे थे कि मैं बिना ‘विंड स्क्रीन’ के कार चलाने का रेकार्ड बनाने की कोेशिश कर रहा हूं.

मैं किसकिस के आगे रोना रोता और किसकिस को समझाता कि जब तक बीमा कंपनी वाले फोटो नहीं खींच लेते तब तक नया विंड स्क्रीन लगवाना संभव नहीं है. यदि कोई रेकार्ड स्थापित कर रहा है तो वह है बीमा कंपनी. ‘क्लेम’ के भुगतान में अधिकतम रुकावट एवं देरी का रेकार्ड.

मैं ने समझा कि अब क्लेम मिल जाएगा. बीमा कंपनी की सभी शर्तें पूरी हो गई हैं किंतु मुझे यह पता नहीं था कि ये शर्तें तो द्रौपदी का न खत्म होने वाला चीर हैं.

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‘‘एक समस्या है,’’ अधिकारी ने धीमे स्वर में कहा.

मैं चौंक गया कि अब क्या हुआ.

‘‘पालिसी के नवीनीकरण के एक सप्ताह के भीतर दुर्घटना हो गई है. पुरानी पालिसी के समाप्त होने एवं नई पालिसी जारी होने के बीच एक दिन का अंतर है.’’

‘‘किंतु आप का एजेंट तो मुझ से एक सप्ताह पहले ही चैक ले गया था. आप चैक की तारीख देख सकते हैं. फिर यह पालिसी 5 सालों से लगातार चल रही है.’’

‘‘मैं आप की बात समझ रहा हूं. यह इनसानी शरीर का मामला है. वह एजेंट बीमार पड़ गया. खैर, जो भी हो, यह भुगतान का सीधा सपाट मामला नहीं है. इस पर जांच होगी. आप को जो कुछ कहना है जांच अधिकारी से कहिएगा,’’ उस ने अपना रुख साफ किया.

झुंझलाहट का करेंट मेरे शरीर में ऊपर से नीचे तक दौड़ गया. बीमा कंपनी का यह चेहरा पालिसी देते समय के आत्मीय चेहरे से एकदम अलग था. इच्छा हो रही थी कि यह 3 हजार की धन राशि मैं इस करोड़पति बीमा कंपनी को दान में दे दूं.

मुझे लगा कि इस चेहरे को और झेल पाना मेरे लिए संभव नहीं. दोनों की भलाई इसी में है कि एकदूसरे की नजरों से दूर हो जाएं, अभी, इसी वक्त.

मैं तेजी से आफिस से बाहर आया.

सर्विस इंडस्ट्री, हुंह, नहीं चाहिए ऐसी सर्विस. सर्विस ‘फील गुड.’ एक दिन बीता, एक सप्ताह गुजरा, एक महीना बीता, 2 महीने बीते.

फोन की घंटी बजती है.

‘‘आप के क्लेम के मामले में मुझे बीमा कंपनी ने जांच अधिकारी नियुक्त किया है. मैं एडवोकेट त्रिपाठी हूं. सचाई की तह में जाना अपने जीवन का लक्ष्य है. ‘सत्यमेव जयते’ अपना धर्म है. आप मुझ से मिलें.’’

अगले दिन काले कोट में त्रिपाठीजी सामने थे.

‘‘आप जो घटना है सचसच बताएं और निसंकोच बताएं.’’

मैं ने फिर टेप रेकार्ड की तरह घटनाक्रम को दोहरा दिया.

‘‘इस में नया क्या है? यह तो आप ने रिपोर्ट में लिखा है. मुझे सचाई का पता लगाने के लिए तैनात किया गया है.’’

‘‘रिपोर्ट का एकएक शब्द सच है. आप अड़ोसपड़ोस से पूछ सकते हैं,’’ मैं ने उन्हें समझाने का प्रयास किया.

‘‘मैं ने सचाई का पता लगा लिया है. आप शायद सचाई मेरे मुंह से सुनना चाहते हैं. हजरत, मेरी निगाहों में कोने वाले मकान के हैं, मुझ से बच के जाएंगे कहां ,’’ त्रिपाठीजी के स्वर में तीखा व्यंग्य था.

मैं ने त्रिपाठीजी का चेहरा ध्यान से देखा. वह एक वकील की भूमिका बखूबी निभा रहे थे. वह सच के सिवा और कुछ कहने वाले नहीं थे.

‘‘आप सच सुनना चाहते हैं न?’’ त्रिपाठीजी तल्ख शब्दों में बोले, ‘‘सच तो यह है कि आप कार चला ही नहीं रहे थे. कार आप का लड़का चला रहा था जिस का ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं है. ऊपर से वह शराब पीए था. उसे आगे जाता ट्रक नहीं दिखा जो लोहे की छड़ों को ले कर जा रहा था. छड़ें बाहर झूल रही थीं. गनीमत समझिए कि दुर्घटना विंड स्क्रीन तक सीमित रह गई अन्यथा लोहे की छड़ें सीने के पार हो जातीं. कार की किसे चिंता है, चिंता करने के लिए, माथा पकड़ने के लिए बीमा कंपनी तो है ही. लेकिन आखिरी सांस तक मैं बीमा कंपनी के साथ हूं.’’

मैं ठगा सा त्रिपाठीजी का सच सुन रहा था. उन की गंभीर छानबीन का नतीजा सुन रहा था. कहने को कुछ था भी नहीं. हां, जांच अधिकारी की यह भूमिका नए तर्ज की जरूर थी.

‘‘बोलती बंद हो गई न. अच्छाई इसी में है कि आप यह मामला वापस ले लें. नहीं तो मैं सचाई को अदालत में उजागर करूंगा और ट्रक के खलासी को गवाह के रूप में पेश करूंगा.’’

मैं ने अपने गुस्से को काबू में रखने का प्रयास करते हुए कहा, ‘‘त्रिपाठीजी यह मामला वापस नहीं होगा. अब परिणाम चाहे जो हो.’’

‘‘देखिए, मैं आप को फिर समझा रहा हूं. आप शायद कोर्ट में जाने का अर्थ नहीं समझ रहे. ढाई हजार तो आप को नहीं मिलेंगे ऊपर से 4-5 हजार खर्च हो जाएंगे. आगे आप समझदार हैं. समझदार को इशारा काफी होता है,’’ त्रिपाठीजी ने उठते हुए कहा.

पत्नी भी उन की बातें सुन कर घबरा गईं.

‘‘जाने भी दीजिए, झूठ ही सही. अदालत में लड़के का नाम आएगा, उस पर शराब पी कर गाड़ी चलाने का आरोप लगेगा. छी, जाने दीजिए. ऐसे ढाई हजार मुझे नहीं चाहिए.’’

किंतु यह सब मेरे लिए एक चुनौती थी. इस से पहले कि कंपनी अदालत में जाती मैं उपभोक्ता अदालत में चला गया और कंपनी के नाम नोटिस जारी हो गया. मैं ने संघर्ष करने का मन बना लिया था. खर्च जो हो, परिणाम जो हो.

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नियत तारीख पर कंपनी अदालत में उपस्थित नहीं हुई. उस ने समय मांगा.

एक सप्ताह के भीतर कंपनी से फोन आया, ‘‘आप का चैक बन कर तैयार है, इसे ले लें. कुछ देर अवश्य हो गई है, कृपया अन्यथा न लें. आप नहीं आ सकते तो हम चैक आप के घर पर पहुंचा देंगे. जांच का परिणाम कुछ भी हो, कंपनी अपने ग्राहक को सही मानती है.’’     द्य

लता मंगेशकर के गाने ने दी इस महिला को नई पहचान, हुआ मेकओवर

“एक प्यार का नगमा है” 70 के दशक का ये गाना उन दिनों सभी के पसंदिदा गानों में से एक था. इस खूबसूरत गाने को मशहूर सिंगर लता मंगेश्कर ने अपनी आवाज से और सुरमई बनाया था. आज 2019 में इस गाने से एक महिला करोड़ो लोगों का दिल जीत चुकी हैं. इस महिला ने ये गाना इमोशन्स के साथ गाया है जो कि लोगों को लता जी की याद दिला रहा था. हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें एक महिला “एक प्यार का नगमा है” गाना गा रही थी और उनकी आवाज में बिल्कुल वहीं सुर ताल थे, जो कि लता मंगेसकर में देखा जाता था. लोग उन्हें लता मंगेश्कर से भी कम्पेयर कर रहे थे.

एक खाने  ने दिलाई पहचान

सोशल मीडिया ने इस महिला को काफी फेमस कर दिया है. कुछ दिन पहले ही जो महिला सड़क किनारे ये गाना गाती दिखीं, आज उसकी काया पलट हो गई है. फोटो में जो खूबसूरत महिला है वो और कोई नहीं बल्कि  जिसे कुछ दिन पहले ये गाना गाते देखा गया वही है. सोशल मीडिया पर वीडियों आते ही इस महिला को बौलीवुड सेलेब्स का भी खूब रिस्पोन्स मिला था. सेलेब्स ने भी गाने के लिए महिला की खूब तारिफ की. बौलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर खान ने तो अपने इंस्टाग्राम पर इस महिला की वीडियो शेयर कर उनकी तारीफ की थी.

 मेकओवर के बाद viral lady

जब लोग दूसरों के हुनर को सरहाते है तो लोगों को कहानी मिलती है, जिससे वो अपनी जिंदगी में भी कुछ सीख पाते है. इस महिला को मिली पहचान इस बात का सबूत की आपका हुनर ही आपकी पहचान बन सकती है. पश्चिम बंगाल के रानाघाट रेलवे स्टेशन पर रिकार्ड किए गए इस वीडियो में रानू मंडल नाम की इस महिला का अब मेक औवर हो चुका है. उन्हें मुंबई के एक रिएलिटी शो में गाने का औफर मिला है. इस रिएलिटी शो में मुंबई जाने के लिए एक इवेंट कंपनी उनका खर्च उठा रही है. अगर सबकुछ ठीक रहा तो रानू मंडल की किस्मत के तारे बुलंदी पर होंगे. इस महिला के वीडियो ने उन्हें रातों-रात इंटरनेट सेंसेशन बना दिया.

छोटे किसानों ने मचान खेती से लिखी तरक्की की कहानी

ये सभी छोटी जोत के किसान हैं और अपनी जमीन के छोटे से टुकड़े पर पारंपरिक रूप से सब्जियों की खेती करते आ रहे थे. इस के चलते उन का खर्चा बड़ी मुश्किल से चल पाता था. ऐसे में इन किसानों को परिवार चलाने के लिए बाकी दिनों में मेहनतमजदूरी कर अपना पेट पालना पड़ता था.

ऐसे में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले की स्वैच्छिक संस्था ‘पानी’ ने 2 साल पहले इन किसानों को पारंपरिक खेती छोड़ मचान विधि से सब्जियों की खेती करने की सलाह दी. साथ ही, इस संस्था ने इन किसानों को तकनीकी मदद के साथ ही उपकरण, खादबीज की निशुल्क मदद देने का प्रस्ताव भी रखा.

संस्था के इस प्रस्ताव को देखते हुए कई किसान ‘पानी’ संस्था द्वारा बताई गई विधि से सब्जियों की खेती करने को तैयार हो गए.

फिर क्या था, इस गांव के किसान लालबहादुर, राम दुलार, तुलसीराम, धीरेंद्र, पृथ्वीपाल, निरंजन, धर्मेंद्र, मेवालाल, रामकली, मंजू बलवंत मौर्या, प्यारेलाल ने 2 साल पहले अपने खेत में मचान विधि से खेती करने की शुरुआत की हामी भर दी.

संस्था के सहयोग से बनी बात?: जिन किसानों ने मचान खेती के जरीए अपनी माली हालत में तरक्की लाने का काम किया है, उस में ‘पानी’ संस्था का बहुत बड़ा योगदान है. इस मसले पर ‘पानी’ संस्था के कर्मचारी संजीव पाठक ने बताया कि किसानों की तरक्की के लिए इस

संस्था ने एचडीएफसी बैंक

के सहयोग से किसानों को बांस के टुकड़े, रस्सियां, तार, खाद, बीज वगैरह मुहैया कराए.

इन किसानों ने भी संस्था की देखरेख में मचान विधि से खेती की शुरुआत की. इस के लिए ‘पानी’ संस्था की तरफ से किसानों को कृषि विशेषज्ञ भी उपलब्ध कराए गए.

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नर्सरी में तैयार होते पौधे : संजीव पाठक ने बताया कि मचान विधि से खेती के लिए किसानों द्वारा सब्जियों के बीजों को सीधे खेतों में न बो कर पहले बोई जाने वाली सब्जियों की नर्सरी तैयार कराई जाती?है. नर्सरी में तैयार इन पौधों को मचान वाले खेत में बिना जड़ों को नुकसान पहुंचाए रोपाई का काम पूरा कराया जाता है.

ऐसे करते हैं रोपाई : ‘पानी’ संस्था के सहयोग से किसानों को खेत में मचान तैयार करने में कोई परेशानी नहीं हुई. किसानों ने सब्जियों को बोने से पहले ही पौध को सहारा देने के लिए बांस के टुकड़ों को गाड़ कर खड़ा किया और खंभों के बीच की दूरी 2 मीटर रखते हुए ली जाने वाली फसल को देखते हुए खंभों की ऊंचाई 5 से

6 फुट रखी.

इस के बाद खंभों के सहारे सब्जियों की पौध को ऊपर चढ़ाने के लिए खंभों के?ऊपरी सिरे को तार व रस्सियों से बांधते हुए आपस में जोड़ दिया.

इस गांव के किसान मचान वाले खेतों में सब्जियों के पौधों को रोपाई के लिए मिट्टी सहित निकाल कर शाम के समय रोपाई करने का काम करते हैं. रोपाई के तुरंत बाद पौधों की हलकी सिंचाई करते हैं. इस से खेत में पौधों के मरने का डर कम रहता?है.

ये किसान खेत में रोपे गए पौधों की रोपाई के 10-15 दिन बाद और आगे इसी अंतराल पर निराई कर के खरपतवार साफ करते रहते?हैं.

मचान विधि से खेती कर रहे किसान पहली निराई के बाद गुड़ाई कर के पौधों की जड़ों के आसपास हलकी मिट्टी चढ़ाते हैं. इस से पौधे मजबूत होते?हैं और उन का विकास अच्छा होता है.

मचान विधि से खेती कर रहे किसान कृषि माहिरों द्वारा बताए अनुसार खादबीज की मात्रा का उपयोग करते हैं. साथ ही, फसल में लगने वाले कीटबीमारियों की रोकथाम के लिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेना नहीं भूलते हैं. फसल की सिंचाई भी इन माहिरों की सलाह के मुताबिक ही करते हैं.

दोगुनातिगुना कमा रहे लाभ : गांव राजपुर कसबा उर्फ कजियानी में मचान खेती करने वाले?छोटी जोत के किसान लाल बहादुर ने बताया कि वह 4 बिस्वा खेत में मचान विधि से सब्जियों की खेती कर रहे?हैं. पहले वह इतने ही खेत में सब्जियों की खेती कर के मुश्किल से 2,000 से 3,000 रुपए कमा पाते थे, लेकिन मचान विधि से खेती करने से वह एकसाथ उतने ही खेत में 2 से 3 तरह की फसलें ले रहे?हैं. इस से उन की हर महीने की आमदनी 12,000 से 15,000 रुपए हो गई है.

संजीव पाठक के मुताबिक, मचान विधि से किसान मचान के ऊपर तुरई, करेला, टिंडा, लौकी, खीरा, सेम, नेनुआ की फसल ले रहे हैं, जबकि फसल के नीचे जमीन पर प्याज, सूरन, पालक वगैरह की फसल ले कर दोगुना फायदा कमा रहे हैं.

मचान विधि से खेती कर रही रामकली ने बताया कि मचान विधि से खेती करने से आमदनी में तो इजाफा हुआ है, साथ ही गरमी और बरसात में फसल का नुकसान बहुत कम हो गया?है.

रामकली के मुताबिक, मचान के जरीए सब्जियों की खेती कर इन लोगों ने 90 फीसदी तक फसल को खराब होने से बचाने में कामयाबी पाई है. साथ ही, फसल में कीट व रोग की दशा में दवा छिड़कने में भी आसानी रहती है.

संजीव पाठक के मुताबिक, जिस तरह से छोटी जोत के किसान मचान खेती के जरीए अपनी आमदनी में इजाफा करने में कामयाब रहे हैं, उसी तरह से अगर दूसरे किसान भी अपने खेतों में मचान विधि से खेती करें तो अच्छी आमदनी ले सकते हैं.

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किसान अगर मचान खेती से जुड़ी और अधिक जानकारी चाहते?हैं तो ‘पानी’ संस्था के कर्मचारी संजीव पाठक के मोबाइल

फोन नंबर 916388794731 पर संपर्क कर सकते हैं.                                      ठ्ठ

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक:बढ़ाए पैदावार

आलोक कुमार सिंह, डीके श्रीवास्तव, डा. आरएस सेंगर

फसल की उत्पादकता में बढ़वार करती?हैं. इस क्रिया को जैविक नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते?हैं. इन सूक्ष्म जीवाणुओं को ही जैव उर्वरक कहते हैं.नीलहरित शैवाल एक विशेष प्रकार की काई होती है. इन की कई प्रजातियां होती हैं, जिस में आलोसाइरा, नास्टाक, एनाबीन, सिटोनिमा, टालिपोथ्रिक्स, वेस्टीवापसिस वगैरह प्रमुख हैं.

नाइट्रोजन स्थिरीकरण की क्रिया शैवाल की संरचना में स्थित एक विशिष्ट प्रकार की कोशिका होती है, इसे हैटेरोसिस्ट कहते?हैं. यह सामान्य कोशिकाओं से संरचना करने में अलग होती है. इस का निर्माण सामान्य कोशिकाओं में ही कोशिकाभित्ति मोटी होने और कुछ आंतरिक परिवर्तनों के फलस्वरूप होता है.

नीलहरित शैवाल यानी बीजीए धान के लिए महत्त्वपूर्ण जैव उर्वरक है. इस के प्रयोग से 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (25 फीसदी) रासायनिक नाइट्रोजन की बचत और धान के उत्पादन में 8-10 फीसदी की

बढ़ोतरी होती है. साथ ही, जमीन की उर्वरक क्षमता में बढ़ोतरी होती?है. धान के खेत का वातावरण नीलहरित शैवाल की

बढ़वार के लिए मुफीद होता?है. इस की बढ़ोतरी के लिए जरूरी तापमान, समुचित रोशनी, नमी और पोषक तत्त्व की मात्रा धान के खेत में मौजूद रहती है.

नीलहरित शैवाल द्वारा स्थिर किया गया नाइट्रोजन पौधों को शैवाल की जीवित अवस्था में ही मिल जाता?है या शैवाल कोशिकाओं के मृत होने के बाद जीवाणुओं द्वारा विघटन होने पर मिलता है.

उत्पादन की विधि

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक उत्पादन के लिए 5 मीटर लंबा, 1 मीटर चौड़ा और 8-10 इंच गहरा पक्का सीमेंट का?टैंक बना लें. टैंक की लंबाई जरूरत के मुताबिक घटाई या बढ़ाई जा सकती?है. टैंक ऊंची व खुली जगह पर

होना चाहिए. सीमेंट के?टैंक के स्थान पर

कच्चा गड्ढा भी बना सकते?हैं. कच्चे गड्ढ़े में तकरीबन 400-500 गेज मोटी पौलीथिन बिछा लें. खेत के स्थान पर खुली छतों पर भी 2 इंच ऊंचा गड्ढा व टैंक बना सकते हैं.

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टैंक व गड्ढे में 4-5 इंच तक पानी भर लें और प्रति वर्गमीटर के हिसाब से एक किलोग्राम खेत की साफसुथरी भुरभुरी मिट्टी, 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 10 ग्राम कार्बोफ्यूरोन डाल कर अच्छी तरह मिला कर 2-3 घंटे के लिए?टैंक को?छोड़ दें. मिट्टी बैठ जाने पर

100 ग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से उच्च गुणवत्ता का शैवाल र्स्टाटर कल्चर पानी के ऊपर समान रूप से बिखेर दें. 8-10 दिन में शैवाल की मोटी परत बन जाती?है. साथ ही, पानी भी सूख जाता?है. यदि तेज धूप या किसी दूसरी वजह से शैवाल परत बनाने से पहले ही पानी सूख जाए तब टैंक में और पानी सावधानीपूर्वक किनारे से धीरेधीरे डालें, जिस से शैवाल की मोटी परत टूटने न पाए. 8-10 दिन बाद काई की मोटी परत बनने के बाद भी अगर गड्ढे व टैंक में पानी भरा हो तो उसे डब्बे वगैरह से सावधानीपूर्वक बाहर निकाल दें. इस के बाद टैंक व गड्ढे को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें. सूख जाने पर शैवाल कल्चर को इकट्ठा कर पौलीथिन बैग में भर कर खेतों में प्रयोग करने के लिए रख लें.

फिर उपरोक्त विधि से उत्पादन शुरू करें और स्टार्टर कल्चर के स्थान पर उत्पादित कल्चर का प्रयोग कर सकते हैं. यह उत्पादित कल्चर उच्च गुणवत्ता का?होता है. एक बार में

5 मीटर साइज के?टैंक या गड्ढे से 6.5-7.5 किलोग्राम शैवाल जैव उर्वरक हासिल होता है.

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन के लिए बलुई दोमट मिट्टी सब से अच्छी होती?है. अप्रैल, मई, जून माह इस के उत्पादन के लिए सब से मुफीद होते हैं.

बरतें ये सावधानियां

* नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक के प्रयोग में लाई जाने वाली मिट्टी साफसुथरी और भुरभुरी होनी चाहिए.

* उत्पादन में प्रयोग की जा रही मिट्टी ऊसर जमीन की नहीं होनी चाहिए.

* मिट्टी में कंकड़, पत्थर और घास को छलनी से अच्छी तरह?छान लें.

* जैव उर्वरक उत्पादन के लिए प्रयोगशाला द्वारा जांच किए गए उच्च गुणवत्ता वाले स्टार्टर कल्चर का ही प्रयोग करें.

* किसान अपने यहां उत्पादित जैव उर्वरक की गुणवत्ता की जांच परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा करा लें.

* शैवाल जैव उर्वरक की परतों को नाइट्रोजन उर्वरकों और कीटनाशक रसायनों के साथ कभी न रखें.

* शैवाल जैव उर्वरक की थैलियों को नमी से दूर रखें.

* चूंकि शैवाल जैव उर्वरक के उत्पादन में कार्बोफ्यूरान का इस्तेमाल किया जाता है इसलिए ध्यान रखें कि टैंक के पानी को

जानवर न पी जाएं, वरना उन पर कार्बोफ्यूरान का जहरीला असर हो सकता है, इसलिए टैंक व गड्ढे को जानवरों से बचा कर रखें.

* यदि उत्पादन के समय बारिश हो तो?टैंक व गड्ढे को पौलीथिन शीट से ढक दें और बारिश खत्म होने पर हटा दें.

प्रयोग की विधि

धान की रोपाई के एक हफ्ते बाद स्थिर पानी में 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से शैवाल कल्चर बिखेर दें और शैवाल जैव उर्वरक प्रयोग करने के 4-5 दिन बाद तक खेत में पानी भरा रहने दें.

खेतों में यदि खरपतवारनाशक जैसे?ब्यूटाक्लोर वगैरह रसायनों का इस्तेमाल कर रहे हों तो खरपतवारनाशक डालने के 3-4 दिन बाद जैव उर्वरक का इस्तेमाल करें वरना शैवाल की बढ़ोतरी प्रभावित होगी.

खरपतवारनाशी रसायनों का प्रयोग रोपाई के 2 दिन बाद जरूर कर लें और अन्य सभी खेती के काम और निराईगुड़ाई सामान्य तरह ही करते रहें.

खेत में नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक का प्रयोग पहली व दूसरी टौप ड्रेसिंग के दौरान जरूर कर दें. बेसल ड्रेसिंग में रासायनिक नाइट्रोजन का प्रयोग कम मात्रा में करें. धान के पूर्व जिस खेत में हरी खाद के?रूप में ढैंचा लगाया गया हो, उस खेत में उपरोक्त विधि से नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक का प्रयोग करने से बेसल ड्रेसिंग में भी संस्तुत रासायनिक नाइट्रोजन की मात्रा में 50 फीसदी की कमी कर दें. ध्यान रखें, नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक का प्रयोग जिस खेत में करना हो, उस की मेंड़बंदी अच्छी तरह कर लें, जिस से उर्वरक के प्रयोग के बाद पानी बाहर न निकले.

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प्रयोग से लाभ

कृषक प्रक्षेत्र पर नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक की 12.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की मात्रा 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन देती है इसलिए रासायनिक नाइट्रोजन की मात्रा 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (66 किलोग्राम यूरिया) की बचत हो सकती?है. इस के प्रयोग से धान की उपज में औसतन 2-4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की बढ़ोतरी होती है. साथ ही, पर्यावरण को साफ रखने में सहायक है.

शैवाल जैव उर्वरक इस्तेमाल करने से मिट्टी की भौतिक दशा में सुधार होता है और उपजाऊ ताकत बढ़ती है. मिट्टी में नाइट्रोजन और मौजूद फास्फोरस की मात्रा में बढ़ोतरी होती?है.

कार्बनिक तत्त्वों की बढ़ोतरी से मिट्टी की जलधारण कूवत में भी बढ़ोतरी होती है.

अम्लीय जमीन में लोहे वगैरह तत्त्वों की विषाक्ता कम करता है.

शैवाल जैव उर्वरक के प्रयोग से ऊसर जमीन में सुधार होता?है.

नीलहरित शैवाल जैव उर्वरक बढ़ोतरी नियंत्रक, विटामिन बी12, अमीनो अम्ल

वगैरह भी छोड़ते?हैं, जिस से पौधों की अच्छी बढ़ोतरी होती है और दानों की गुणवत्ता भी

बढ़ती है.                                       ठ्ठ

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