चाइल्ड पोर्नोग्राफी: यौनशोषण की सच्ची दास्तान

तुम्हारा नाम रामभवन है ?’ रामभवन के बांदा स्थित उसके घर पर आने वाले आदमी ने कहा.
‘जी सही जगह आये है आप. किस सिलसिले में हमसे मिलने आये है.‘ रामभवन ने उसको देखते हुये जवाब दिया.
‘मैं सीबीआई की टीम में हॅू. हमारे टीम के लोग बांदा के सरकारी गेस्ट हाउस में रूके है. आपको वहां बयान दर्ज कराने आना है.‘ सीबीआई का सदस्य बताने वाले आदमी ने जब यह कहा तो रामभवन के चेहरे की हवाईयां उडने लगी.
‘बयान…किस तरह का बयान हमें दर्ज कराना है.‘
‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी को लेकर एक मुकदमें के सिलसिलें में जांच चल रही है. जिसमें आपके उपर भी आरोप है.‘
‘मेरे उपर आरोप है. पर मैने तो कुछ किया नहीं.‘
‘रामभवन बहुत नासमझ मत बनो. तुम्हारी पेन ड्राइव में बहुत सारी वीडियो क्लिप और फोटो मिली है.‘ बांदा में सिचाई विभाग में कार्यरत जूनियर इंजीनियर रामभवन को इस बात का कोई अंदाजा लग चुका था कि सीबीआई उसके चारों तरफ मकडजाल बुन चुकी है. सीबीआई से आये हुये अफसर के साथ चलने के लिये खडा हुआ. घर के बाहर खडी गाडी में बैठ गया वहां से यह लोग सरकारी गेस्ट हाउस पहंुच गये. रामभवन की निगाह वहां पर अपने ड्राइवर अभय को देखकर रामभवन के दिल की धडकने बढ चुकी थी.
‘यह पेन ड्राइव तुम्हारी ही है‘. सीबीआई के एक अफसर ने रामभवन से पूछा. तो उसने देखा पर कोई जवाब नहीं दिया.
‘…….रामभवन चुप रहने का कोई लाभ नहीं है. एक माह से अधिक का समय हो गया है. सीबीआई की टीम सारे सबूत एकत्र कर चुकी है. विदेशी कई वेबसाइटों पर वह फोटो और वीडियो हमें दिखी जो तुम्हारी पेन ड्राइव में भी मौजूद है. तुम जिस तरह से बच्चों को मोबाइल खेलने के लिये देते हो, उनको उपहार और पैसे देते हो वह भी जानकारी हमारे पास है. तुम्हारे ड्राइवर अभय से हमने पूछताछ कर ली है. यही नहीं सोनभद्र के इंजीनियर नीरज यादव के बेवसाइट पर भी तुम्हारे द्वारा भेजी गई फोटो और वीडियों मिल गये है. अब तुमको पूछतांछ के लिये गिरफ्तार किया जाता है.‘

Ram bhawan

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45 साल के रामभवन को सीबीआई ने अपनी हिरासत में ले लिया. सीबीआई रामभवन को बांदा से आगे की तहकीकात के लिये चित्रकूट लेकर गई. बाद में वापस बांदा की अदालत में रामभवन को पेश किया गया. वहां उसकी पत्नी भी पहंुच चुकी थी. रामभवन तो अपने को बेकसूर बता ही रहा था उसकी पत्नी प्रियावती भी अपने पति को निर्दोष बता रही थी.
सीबीआई ने इसकी पडताल अगस्त-सितम्बर माह से शुरू की थी. सीबीआई टीम को बेल्जियम की एक साइट पर भारतीय बच्चों के पोर्नोग्राफी वीडियों देखने को मिले. इसकी जांच करते करते सीबीआई उत्तर प्रदेश के सोनभद्र और बांदा जिलों तक पहंुच गये. उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड के इस इलाके में गरीबी बहुत है. गरीबी को दूर करने के लिये सरकार ने यहां तमाम योजनाएं भी चला रखी है. इनमें कई विदेशियों की मदद से भी चलते है. कई एनजीओ का यहां आना जाना होता है. पूरे उत्तर प्रदेश में मदद के नाम पर सबसे अधिक पैसा यहां ही आता है.
गरीब लोगों की हालत का लाभ उठाकर उनसे मनचाहा काम भी यहंा करवाया जाता है. कई बार ऐसी खबरे यहां के अखबारों में सुखर््िायां बनती रही है. सीबीआई ने एक माह तक यहां गहरी विवेचना की. इस जांच में सीबीआई को सोनभद्र में रहने वाले इंजीनियर नीरज यादव का पता चला. सबसे पहले सीबीआई ने नीरज यादव को पकडा. यहां पर बांदा में रहने वाले सिचाई विभाग के इंजीनियर राम भवन का भी पता लगा.

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सीबीआई ने रामभवन के करीबी रहने वाले दिनेश को अपने भरोसे में लिया. दिनेश की पहचान छिपाकर सीबीआई ने रामभवन के बारें में पूछताछ की. इस मामले में सीबीआई की सबसे बडी परेशानी यह थी कि यहां कोई वादी मुकदमा नहीं था. सीबीआई अपनी पहल पर ही मुकदमा लिख चुकी थी. रामभवन के करीबी दिनेश की आजकल आपस में बनती नहीं थी. सीबीआई को इसका लाभ मिला और सीबीआई ने दिनेश से कई राज उगलवा लिये. रामभवन के 3 मोबाइल नम्बर, एक पेन ड्राइव सीबीआई को मिल गये. जिसमंे रामभवन के खिलाफ सारा काला चिटठा था. रामभवन के सभी फोन नम्बर उसके अपने पते पर लिये गये थे. रामभवन के खिलाफ पुख्ता सबूत इकठ्ठा करने के बाद सीबीआई ने रामभवन को गिरफ्तार कर लिया.
सीबीआई ने रामभवन को अपर जिला और सत्र न्यायाधीश (पंचम) की अदालत में पेश किया. शासकीय अधिवक्ता मनोज कुमार ने बताया कि रामभवन को रिमांड पर लेकर पूरी जांच की जायेगी. आरोप है कि वह कमजोर वर्ग के बच्चों को अपना निशाना बनाता था. इसमें दिहाडी मजदूरी करने वाले, फुटपाथ पर सामान बेचने वाले और ठेके पर काम करने वाले बच्चे शामिल होते थे. वह उन बच्चों को निशाना बनाता था जिनको कुछ लाभ देकर आसानी से फंसाया जा सके. लडकियों को बुलाने पर लोगों के संदेह का खतरा ज्यादा होता है इस कारण लडको का प्रयोग भी इस धंधे में किया जा रहा था.
देश में बच्चों का यौन शोषण कोई नई बात नहीं है. राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों (एनसीआरबी) के आंकडे बताते है कि साल 2020 में जारी आंकडों में बताया कि हर रोज 100 से अधिक बच्चों के यौन शोषण मामलों की शिकायत आती है. बच्चों के यौन शोषण में तमाम सख्ती के बाद भी इसमें 22 फीसदी की बृद्वि देखी गई है. कई बार पुलिस को इस बात का पता भी नहीं चलता था कि किस जगह से यह धंधा पनप रहा है.
इसमें शामिल बच्चे बेहद गरीब और दूरदराज के जगहों के होते थे कि उनकी पहचान भी नहीं हो पाती थी. ऐसे में अपराधियों की जड तक पहंुच पाना मुश्किल काम होता था. इस अपराध की जड तक पहंुचने के लिये केन्द्रीय अपराध ब्यूरो यानि सीबीआई ने दिल्ली ‘औनलाइन चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज एंड एक्सप्लायटेशन प्रीवेंशन इंवेस्टीगेशन‘ इकाई का गठन किया. इसका काम चाइल्ड पोर्नोग्राफी के पूरे धंधे को बेनकाब करना था.

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विदेशो में भारतीय पोर्न की डिमांड ज्यादा होती है. असल में विदेशो की पोर्न इंडस्ट्री फिल्मी दुनिया की तरह होती है. जबकि भारत में ऐसे वीडियो चोरी चुपके और लोगों को बहकाकर बनाये जाते है. जो फिल्मी कहानी से नहीं दिखते है. ऐसे में यह सच्चे वीडियों मानकर सबसे ज्यादा पसंद किये जाते है. सीबीआई ने जिस रामभवन को पकडा उसे देखकर कोई नहीं कह सकता कि इतना भोला और सरल दिखने वाला इंसान ऐसी घिनौनी हरकतें भी कर सकता है.
45 साल के रामभवन को उसके आसपास रहने वाले बच्चे ‘जेई अंकल’ के नाम से जानते है. जेई का मतलब जूनियर इंजीनियर होता है. रामभवन बच्चों को अपने घर पर बुलाता था. वो बच्चों को खेलने के लिये मोबाइल फोन दे देता था. बच्चे घंटोघंटो उनके घर पर मोबाइल पर वीडियो गेम्स खेलते रहते थे. ‘जेई अंकल’ के अपना कोई बच्चा नहीं था. पडोसियों को लगता था कि अपने बच्चे ना होने के कारण वह दूसरे बच्चों को लाडप्यार करते थे. रामभवन अपने घर आने वाले बच्चों को उपहार और नकद पैसे भी देते थे. बच्चों के परिजनों को रामभवन बताते थे ‘बच्चे औनलाइन गेम्स खेलते है इसमें जो पैसा मिलता है वह आपको सबको दे देता हॅू.‘ यह बच्चे गरीब परिवारों के होते थे. उनके लिये यह छोटीछोटी मदद भी बडी होती थी.

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‘ंजेई अंकल’ का राज सीबीआई ने खोला और बताया कि वह बच्चों की अश्लील फोटो यानि चाइल्ड पोनोग्राफी का औन लाइन बिजनेस करते थे. इसके बाद भी बच्चों के परिवार यह बात मानने को तैयार नहीं है. बच्चों से जब इस तरह के ‘गंदे काम’ के बारे में पूछा गया तो उन सबने कुछ भी बोलने से इंकार कर दिया. सीबीआई कहती है कि बच्चे और उनके परिवार के लोग पैसे पाने की वजह से खामोश है. इसके अलावा उनको लगता है कि बयान देने के बाद कानूनी दांवपेंच में फंसने से अच्छा है कि पूरे मामले से दूर रहा जाये. रामभवन के आसपास रहने वाले लोग मानते है कि वो सीधे आदमी है उनके फंसाया जा रहा है. रामभवन भी खुद को निर्दोष मानते है. वह कहते है हमें सीबीआई जांच से कोई डर नहीं. सच्चाई सामने आ जायेगी.
रामभवन मूलरूप से खरौंच गांव के देविना का पुरवा का रहने वाला है. उसके पिता चुन्ना कारीगर थे. घर बनाने का काम करते थे. उन्होने अपनी मेहनत ने अपने 3 बेटो का पालन पोषण करके बडा किया और उनको अपने पैरों पर खडा किया. रामभवन होनहार था तो उसकी सरकारी नौकरी लग गई. 2004 में रामभवन की शादी प्रियावती से हुई थी. रामभवन के अपनी कोई औलाद नहीं है. 3 साल पहले हार्ट अटैक से रामभवन के पिता चुन्ना कारीगर की मौत हो गई थी. इसके बाद से रामभवन अपनी पत्नी को साथ रखने लगा. तब से गांव में रहना छूट गया. रामभवन के दोनो भाई राजा और रामप्रकाश बांदा जिले के ही नरैनी-अतर्रा रोड पर अपने परिवारों के साथ रहते है.
रामभवन का काम सिचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के रूप में अर्जुन सहायक परियोजना महोबा और रसिन बांध परियोजना चित्रकूट की देखभाल करने का था. बांदा, महोबा और हमीरपुर के जिलों में ही उसकी नौकरी का ज्यादातर समय बीता था. इस कारण पूरे इलाके में उसकी मजबूत पकड थी. 2009-10 में रामभवन की तैनाती कर्वी में हुई थी. रामभवन काफी मिलनसार और सरल स्वभाव का दिखता था. उसका अपने साथ काम करने वालों और पडोसियों से अच्छा व्यवहार था. रामभवन करीब 10 साल से चित्रकूट में तैनात था.

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सिचाई विभाग कार्यालय के सामने ही कपसेठी गांव में किराये का मकान लेकर वह रहता था. रामभवन को नौकरी के षुरूआती दिनों में सिचाई विभाग कालोनी में ही रहने के लिये सरकारी आवास मिल गया था. इसके बाद भी वह कभी कालोनी के मकान में नहीं रहा. चित्रकूट में नौकरी के दिनों में सिकरी गांव के रहने वाले कुक्कू सिंह के यहां किराये का मकान लेकर रहता था. कुछ ही दिनों के बाद पडोसियों ने कुक्कू सिंह से षिकायत की थी कि रामभवन के घर में अनजान लोगों को आना जाना होता है. रामभवन ने खाना बनाने के लिये एक महिला को नौकरानी की तरह से रखा था. उसकी दो बेटियां भी यहां आतीजाती रहती थी. इस शिकायत के कुछ दिन बाद रामभवन ने यह मकान खाली कर दिया था.
दोबारा इसके खिलाफ 2012 में शिकायत हुई थी जब उसके पास रहने वाली एक किशोर उम्र की लडकी ने आत्महत्या कर ली थी. आरोप था कि रामभवन ने लडकी का यौन शोषण किया था. जिसके कारण लडकी ने आत्महत्या कर ली थी. चित्रकूट के लोग बताते है कि रामभवन उस मामले में बच गया क्योकि लडकी के घर परिवार वाले गरीब थे. रामभवन ने पानी की तरह से पैसा बहाकर अपने का बचाने में सफलता हासिल कर ली थी. रामभवन के कारनामों पर पर्दा पडा रहा. 2 नवंबर 2020 को रामभवन का नाम चर्चा में आया.
सीबीआई ने अनपरा सोनभद्र निवासी इंजीनियर नीरज यादव को पकडा. नीरज बीटेक करने के बाद दिल्ली की एक कंपनी में नौकरी करता था. लौकडाउन के दौरान नीरज की नौकरी छूट गई थी. त बवह सोनभद्र आकर रहने लगा. सोषल मीडिया पर उसने पोनोग्राफी के कुछ वीडियो लोड किये थे. वहां से सीबीआई को रामभवन का नाम मिला. सीबीआई ने 25 सितंबर 2020 को सबसे पहले नीरज यादव को पकडा उसके बाद 15 नवम्बर 2020 को रामभवन को पकडा. सिचाई विभाग के जूनियर इजीनियर का नाम यौन शोषण मामले में आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार के सिचाई और जल मंत्री डाक्टर महेन्द्र सिंह ने उनको निलंबित कर कठोरतम कारवाई करने के निर्देष दिये.
सीबीआई को रामभवन के पास से बच्चों के साथ यौन षोषण के 66 वीडियो, 600 से अधिक फोटो, सेक्स टाॅय, बच्चों से संबंधित अश्लील सामाग्री और 8 लाख रूपये बरामद हुये. बरामद हुये. इसमें 50 बच्चों का शामिल होना बताया जाता है. इन बच्चों की उम्र 5 से 15 साल के आसपास मानी जा रही है. यह सभी बच्चे हमीरपुर, चित्रकूट और बांदा के आसपास के रहने वाले माने जा रहे है. रामभवन इनके साथ अश्लील वीडियो बनाकर विदेशो मेे रहने वालों को बेच देता था. सीबीआई ने पाया कि रामभवन ‘डार्कवेब’ नामक वेबसाइट के जरीये यह काम करता था.
‘डार्कवेब’ इंटरनेट का बेहद जटिल स्वरूप है. डेनमार्क, कनाडा, स्वीडन और आयरलैंड जैसे देषों में इसकी जडे पाई गई है. यहां के इंटरनेट सर्वर के जरीये ‘डार्कवेब’ का संचालन होता है. यहां के आईपी एड्रेस का पता भी जल्दी नहीं लग पाता है. ‘डार्कवेब’ के जरीये केवल पोर्नोग्राफी ही नहीं मादक पदार्थो और अवैध असलहों की भी खरीद फरोख्त होती है. ‘डार्कवेब’ का सर्च इंजन कहीं नजर नहीं आता है. इस कारण ही इसको डीपनेट भी कहा जाता है. रामभवन को इसके संचालन की जानकारी कैसे हुई यह बडा सवाल है ?

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सीबीआई के सूत्र मानते है कि अनपरा के रहने वाले इंजीनियर नीरज यादव से रामभवन को यह जानकारी मिली हो. वीडियों बनाने का काम रामभवन करता हो और इसको ‘डार्कवेब’ तक ले जाने का काम नीरज यादव करता हो. नीरज यादव दिल्ली में रहने के दौरान किसी ऐसे चाइल्ड पोनोग्राफी रैकेट के संपर्क में आया होगा. जिसके बाद वह और रामभवन मिलकर यह काम करने लगे हो. सीबीआई रामभवन को रिमांड पर लेकर इन सवालों के जबाव तलाशने काम कर रही है. सीबीआई कां जाच में यह पता चला कि रामभवन 5 साल से 15 साल आयु वर्ग के बच्चों को अपने जाल में फंसा उनकी अश्लील वीडियों बना लेता था. इसके आधार पर बच्चों का यौन शोषण करता था.
‘डार्कवेब’ नामक वेबसाइट के संपर्क में आने के बाद रामभवन इन वीडियो को विदेशो में बेचने का काम भी करने लगा था. उसको जो पैसे मिलते थे वह बच्चों को भी देता था. बच्चों के घर वालों को बताता था कि बच्चे औनलाइन गेम्स में यह पैसा जीतते है. बच्चों को पैसे और उपहार देने से उसके खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं है. रामभवन बच्चांे की इसी मजबूरी का लाभ उठाकर वीडियों बनाता था. रामभवन को पता नहीं था कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है. कभी न कभी अपराध सामने खुलकर आ ही जाता है.
भारत में इन्टरनेट पर अश्लील और आपत्तिजनक तस्वीर या कोई अश्लील फिल्म देखना और बनाना दोनों ही अपराध माने जाते है. इसके बाद भी यहां पर बडी संख्या में अवैध तरीके से ऐसे फोटो और वीडियों तैयार होते है. विदेषों में इनकी डिमांड ज्यादा है. साइबर क्राइम में सबसे अधिक मामले अष्लीलता के दर्ज हो रहे है. कई अपराधिक मामलों में ऐसे वीडियो अपराधियों के गले की फांस भी बन जाते है. भारत में देषी और विदेषी दोनो ही तरह के सेक्सी वीडियो सबसे अधिक देखी जाती है. भारत में 49 प्रतिशत लोग चोरी से पोर्न देखते है. 17 प्रतिषत लोग इस तरह की विडियो नियमित देखते है. भारत में 70 प्रतिषत पोर्न इंटरनेट मीडिया से आता है. भारत में सबसे ज्यादा पोर्न मोबाइल फोन पर देखी जाती है. भारत में अब तेजी से ऐसे वीडियो बनने लगे है. कुछ दिन पहले दिल्ली के स्कूल में पढने वाली लड़की का लगभग 2 मिनट की अश्लील वीडियो चर्चा में आया था. दिल्ली के चैक मेट्रो स्टेशन पर एलसीडी में इस तरह की सेक्स विडियो दिखने लगी थी.
बहुत सारे ऐसे मामले भी आये जिसमें लडके अपने साथियों के वीडियों और फोटो लेते पकडे गये थे. कई बार परेशन लडके लडकियों ने आत्महत्या जैसे कदम भी उठाये थे. कई मशहूर हस्तियों के वीडियो एडिट करके भी बनाने की घटनायें भी सामने आई. इंटरनेट कुछ ही सालों में पोर्न साईट देखने का सबसे बडा साधन बन गया. इसका व्यापार दिन पर दिन बढ़ रहा है. सेक्स से जुडी तमाम तरह की देशी और विदेशी वीडियो इंटरनेट पर मिलने लगी है. ऐसे में वीडियों बनाने का धंधा भी तेजी से फैल रहा है. देह का धंधा करने वाले गिरोह इंटरनेट पर अश्लील चैटिंग और सेक्स वीडियो का कारोबार कर रहे है. इनके जरीये देह धंधे के ग्राहक भी तलाशे जाते है. कई इंटरनेट साइड इस काम में लगी है. इसकी आड में तमाम तरह के फ्राड भी होते है.

पति से परेशान,जब पत्नी करती है अग्नि स्नान!

पहली घटना-
राजधानी रायपुर के वीआईपी कॉलोनी में एक संभ्रांत महिला में पति की प्रताड़ना से परेशान होकर अंततः अग्नि स्नान कर आत्महत्या कर ली. सुसाइड नोट से सच्चाई हुई उजागर.

दूसरी घटना-
जुआरी और शराबी पति के नित्य प्रतिदिन के प्रताड़ना और प्रकोप को झेलते झेलते एक नवविवाहिता ने किरोसीन तेल से आग लगाकर घर पर ही आत्महत्या कर ली.

तीसरी घटना-
अपने दो बच्चों के साथ एक महिला ने पति से परेशान होकर अंततः अग्नि स्नान कर लिया. बच्चों के साथ साथ महिला की भी अग्नि स्नान में मौत हो गई. दोषी पति पर पुलिस ने किया मामला दर्ज.

इन दिनों ये खबरें सुर्खियों में हैं – कोई महिला अग्नि स्नान कर रही है अथवा जहर खाकर आत्महत्या कर रही है. हमारे सामाजिक ढांचे में यह एक कटु सत्य है कि महिला अपने पति को भगवान का दर्जा देती है और विवाह को सात जन्मों का बंधन माना गया है. ऐसे में जब पुरुष अपनी  पत्नी पर अत्याचार करने लगता है तो महिला के सामने आगामी जिंदगी में अंधेरा ही अंधेरा होता है.और वह एक बहुत बड़ी गलती करके आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर लेती है.आज हम इस रिपोर्ट में आपको ऐसे ही घटनाक्रम से रूबरू कराते हुए बताना चाहेंगे कि महिलाओं के सामने आत्महत्या अग्नि स्नान अथवा जहर खाकर आत्महत्या से आगे दरअसल, एक खुशहाल जिंदगी इंतजार कर रही होती है…

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और पुलिस ने की कठोर कार्रवाई
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आमतौर पर पत्नी के आत्महत्या करने के पश्चात मामला रफा-दफा हो जाता है मगर छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला की पुलिस ने एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है जो अपने आप में महत्वपूर्ण है दरअसल, हुआ यह कि शराबी पति की मारपीट से तंग आकर पत्नी के आत्महत्या करने के मामले में पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने के बाद आरोपी पति को गिरफ्तार कर अभियोग पत्र के साथ न्यायालय में पेश कर दिया. पुलिस की इस त्वरित कार्रवाई को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. ग्राम गुड़ेली, थाना सारंगढ़ निवासी 27 वर्षीय बीना सिदार ने अपने घर में केरोसीन डालकर आग लगा ली थी, जिसकी इलाज के दौरान  रायगढ़ के केजीएच अस्पताल में मौत हो गई थी. मर्ग की जांच में मृतिका अपने पति आरोपी लोचन सिदार के शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना से तंग आकर और आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरित किए जाने पर केरोसीन डालकर स्वयं को आग लगाकर आत्महत्या करना पाया गया. पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए जो कार्रवाई की उसकी समाज में सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है .
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जुआ और शराब महत्वपूर्ण कारक
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महिलाओं की आत्महत्या के अनेक प्रकरण की गहराई से पड़ताल करने पर यह तथ्य सामने आता है कि इसके पीछे पति की जुआ और शराब की लत हुआ करती है ऐसी ही एक घटना छत्तीसगढ़ के कोरबा जिला के थाना बांकीमोंगरा के गजरा में घटी पुलिस के अनुसार  जयपाल  की पत्नी पिंकी बाई उम्र 24 ने पति की शराब और जुआ की लत से तंग आकर मिट्टी का तेल डालकर खुद को आग लगा दी आग से उसके दोनों बच्चे 2 वर्षीय बेटा  और 5 वर्षीय बेटी  भी झुलस गये. आसपास के लोगों ने आग बुझाकर सबको अस्पताल पहुंचाया वहां दोनों बच्चों की मौत हो गई. पुलिस ने पत्नी के बयान के आधार पर पति के ऊपर कार्रवाई करते हुए उसे जेल भेज दिया.
ऐसे मामलों की जांच करने वाले पुलिस अधिकारी इंद भूषण सिंह के   मुताबिक मेरे 30 वर्ष के कार्यकाल में अनेक मामले ऐसे जांच में आए हैं जिम में महिलाओं ने आत्महत्या कर ली इसका प्रमुख कारण था पुरुषों का अवैध संबंध, जुआ अथवा शराब की लत. साथ ही पत्नी और बच्चों के साथ प्रताड़ना करना ऐसे पुरुष अपने परिवार को प्रताड़ित करने के कारण एक तरह से अपना जीवन तबाह कर लेते हैं.”
उच्च न्यायालय के अधिवक्ता डॉ उत्पल अग्रवाल के अनुसार ऐसे मामलों में  पुरुष  दोषी होते हैं और अंततः सजा भुगतते हैं.
पिंकीबाई की हालत नाजुक बनी हुई है अस्पताल में पुलिस को दिये बयान में बताया कि उसका पति जुआ शराब का आदी है, इस कारण वह घर से बचत के पैसे भी ले जाता था विरोध करने पर मारपीट करता था, इससे तंग आकर अग्नि स्नान किया है.

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‘दास कैपिटल- गुलामों की राजधानीः यशपाल शर्मा के शानदार अभिनय से सजी फिल्म

रेटिंगः तीन स्टार

निर्माताः मुक्तिनाथ उपाध्याय,प्रतिभा शर्मा और राजन कोठारी

निर्देशकः राजन कोठारी व दयाल निहलानी

कलाकारः यशपाल शर्मा,प्रतिभा शर्मा, सीमा पाहवा,अलका अमीन,मनोज पाहवा,के के रैना,राजश्री देशपांडे, राजपाल यादव, रवि झंकल, प्रतीक कोठारी,जमील खान,अनुपम श्याम, ललित तिवारी, आसिफ बसरा, आएशा रजा मिश्रा,विजय कुमार,दादी पांडे,अमित जयरथ, व अन्य.

अवधिः 1 घंटा 39 मिनट

ओटीटी प्लेटफार्मः सिनेमाप्रिन्योर डॉट कॉम

पचास से अधिक सफलतम फिल्मों के कैमरामैन और ‘‘पुरूष’’ फिल्म के निर्देशक राजन कोठारी ने 2012 में अस्सी के दशक की पृष्ठभूमि में ग्रामीण भारत में उत्पीड़न और नौकरशाही के इर्द-गिर्द घूमती विचारोत्तेजक व सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म ‘दास कैपिटलः गुनाहों की राजधानी’का सह निर्माण व दयाल निहलापी संग सह निर्देशन किया था. फिल्म का निर्माण पूरा होते ही दुर्भाग्य से राजन कोठारी का देहांत हो गया और यह फिल्म प्रदर्शित न हो पायी.

अब आठ वर्ष बाद राज कोठारी के बेटे व फिल्म ‘दास कैपिटल’के सहायक निर्देशक व इसमें भूलेटना का किरदार निभाने वाले अभिनेता प्रतीक कोठारी के प्रयासों के चलते 20 नवंबर से यह फिल्म ‘‘सिनेमाप्रिन्योर डॉट कॉम’’ पर देखी जा सकती है. वैसे इस बीच यह फिल्म कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहो में अपनी धाक जमाती रही है.

कहानीः

80 के दशक की यह कथा एक निम्न-मध्यम वर्ग के दलित पुरुश पुरुषोत्तम की यात्रा है,जो जमीनी स्तर पर नौकरशाही की पृष्ठभूमि में एक ब्लॉक ऑफिस में कैशियर के रूप में काम करते हैं, जो भ्रष्ट, अक्षम और अमानवीय है.

कहानी शुरू होती है बिहार के एक गांव मरगिया से. जहां बीडीओ आफिस में पुरूषोत्तम उर्फ नजीर (यशपाल शर्मा) एकाउंटेंट है. वह छत्तीस वर्ष के होने वाले हैं. मगर पारिवारिक हालात के चलते शादी नहीं हो पायी है. बड़ी मुश्किल से उनकी शादी (प्रतिभा शर्मा) से हो पाती है. नजीर के जीवन में खुशिया आएं, उससे पहले ही उनका तबादला रंगपुर गांव में हो जाता है. जहां का बीडीओ लिद्दर राम (जमील खान) बहुत ही ज्यादा भ्रष्ट है. बीडीओ आफिस के बड़े बाबू तनुधारी (आसिफ बसरा) भी भ्रष्ट हैं. नजीर जो कुछ गलत ढंग से कमाते हैं, उस पर रिद्धिराम व बड़े बाबू की गिद्ध दृष्टि सदैव बनी रहती है, परिणामतः बेचारे नजीर के हाथ कुछ नही आता है. घर की दयनीय हालत के चलते पत्नी शुचि भी परेशान रहती है. नजीर के दोस्त शिवरतन (रवि झांकल) मुर्दा के अस्थि पंजर बेचकर धन कमाते हैं. सदा शराब व अय्याशी में डूबे रहते हैं. शिवरतन के अवैध संबंध भूलेना की मां के साथ हैं. एक दिन भूलेना के पिता दोनों को हमबिस्तर होते देख लेते हैं और आत्महत्या कर लेते हैं. यह बात भूलेना सहन नही कर पाता. शिवरतन पर वह हमला करता है, मगर शिवरतन उसके साथ इस तरह पेश आते हैं कि वह पागल सा हो जाता है. शिवरतन उसे पागल ही बताते हैं.

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इधर आए दिन राज्य के मंत्री ब्लाक में आकर लोगों की भलाई के नाम पर अपनी जेबें भरकर ले जाते हैं. बीडीओ आफिस मे कार्यरत कर्मचारियों ने मंत्री जी को साध कर करोड़ों रूपए कमा लिए हैं. बीडीओ लिद्दर राम ने दस एकड़ में आकवान लगाने के नाम पर कई दस हजार रूप अपनी जेब में कर लिए, यह बात बड़े बाबू को बर्दाष्त नहीं हुई और बडे़ बाबू ने जिलाधिकारी से शिकायत कर दी. जिलाधिकारी जांच करने पहुंचे, पर बीडीओ ने मंत्री जी को बुला लिया और बीडीओ लिद्दर राम का कुछ नहीं बिगड़ा, उल्टे उन्हें केंद्रीय कृषि मंत्री जी के हाथों ‘विकास पुरूषश’ का पुरस्कार मिल गया. पर बड़े बाबू ने आगे शिकायत की. विजलेंस ने छापा मारकर बीडीओ लिद्दर राम का पटना में आलीशान मकान, कई दर्जन बड़ी बसे आदि बरामद की. मामला अदालत पहुंचा, तो लिद्दर राम ने मुखिया (के के रैना) के माध्यम से कोठे की मालकिन राशिदा (सीमा पाहवा) से संपर्क कर उनसे प्रमाण पत्र बनवाया कि उनकी पत्नी दस वर्ष से पटना में कोठा चलाती हैं और उसी कमाई से मकान व बसें खरीदी गयी हैं. अदालत में बीडीओ लिद्दर राम की पत्नी (पूजा प्रधान) खुद यही गवाही में कहती है. बीडीओ अदालत से बाइज्जत बरी हो जाते हैं. अब उनका अत्याचार कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है.

उधर नजीर के दोनो बेटे बीमार रहते हैं. किसी तरह वह हकीम रफीक से उनकी दवा कराते हैं. पर रफीक, उनकी पत्नी शुचि को मरगिया के अस्पताल में भर्ती करने के लिए कहते हैं. तभी नजीर का दोस्त राम रतन (विजय कुमार) कहता है कि दो हजार रूपए दो,तो मंत्री जी देकर उसे ‘सप्लाई इंस्पेक्टर’ के रूप में बहाली करवा देगा. पत्नी के इलाज पर खर्च करने की बजाय वह दो हजार रूपए उसे दे देता है. रात में मंत्री जी के गुंडो की वजह से डाक्टर शुचि के इलाज में लापरवाही करते हैं, और शुचि की मौत हो जाती है. अब डाक्टर को पैसा देना है, तो वहीं बीडीओ कहता है कि पत्नी की मौत की नौटंकी करने की बजाय पैसे लाकर दो, नहीं तो नौकरी से निकलवा देंगे. नाजिर अपने दोस्त शिवरतन के पास जाकर पांच हजार रूपए मांगता है और उसके बदले में उन्हें शुचि का शव सौपने का वादा करता है. पांच हजार लेकर नजीर आगे बढ़ते है, तभी भूलेना, शिवरतन के घर में आग लगा देता है, जिसमें शिवरतन के साथ ही भूलेना की मां भी भस्म हो जाती है.

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लेखन व निर्देशनः

स्व.राजन कोठारी का निर्देशन उत्कृष्ट है. उन्होने बिहार के ग्रामीण इलाके का चित्रण बहुत ही यथार्थ रूप में फिल्म में पेश किया है. फिल्म में ग्रामीण जीवन का मर्मस्पर्शी चित्रण है. इतना ही नहीं यह फिल्म सरकारी व सार्वजनिक धन के दुरुपयोग व भ्रष्टाचार पर कटाक्ष भी करती है. भारत देश में भ्रष्टाचार की जड़े किस तरह एकदम नीचे से लेकर मंत्री/शासकों तक फैली हुई है, इसे बहुत ही यथार्थरूप में उकेरा है. सरकारी कर्मचारियों के लिए पैसा ही किस तरह से सब कुछ बना हुआ इसका भी सटीक चित्रण है. धन के लालची अपने पति को सजा से बचाने के लिए एक औरत अदालत में खड़ी होकर खुद को वेश्या साबित करने से भी नहीं चूकती. यह इस बात का घोतक है कि पैसे के लालच में इंसान किस हद तक गिरता जा रहा है.

बतौर निर्देशक राजन कोठारी और दयाल निहलानी का निर्देशन उत्कृष्ट है. उन्होंने कथानक के साथ न्याय करने की पूरी कोशिश की है. कुछ दृश्य असाधारण रूप से अच्छे बन पड़े हैं. मसलन बीडीओ कार्यालय के कामकाज वाला दृष्य. जबकि एक दृश्य में लिद्दर राम की पत्नी को अपने पति को बचाने के लिए अदालत में एक वेश्या के रूप में झूठी पेश होती है, यह दृष्य प्रफुल्लित करने वाला है. मगर कुछ किरदार बेवजह ही गढ़े गए हैं.

सलीम आरिफ की वेशभूषा और सोमनाथ पकर्रे की कला निर्देशन यथार्थवादी है और 80 के दशक को पुनःजीवित करता है.

अभिनयः

अपने परिवार, भ्रष्ट नियोक्ताओं और राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अपने कर्तव्यों के बीच फंसे पुरूषोत्तम उर्फ नाजिर के किरदार को जिस तरह से यशपाल शर्मा ने अपने उत्कृष्ट अभिनय से जीवंतता प्रदान की है, उसके लिए वह बधाई के पात्र है. यह फिल्म सही मायनों में यशपाल शर्मा की फिल्म है. वह न सिर्फ फिल्म के नायक हैं, बल्कि पूरी फिल्म को अपने उत्कृष्ट अभिनय की बदौलत अपने कंधे पर लेकर चलते हैं.

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काश,यह फिल्म आठ वर्ष पहले ही प्रदर्शित हो गयी होती, तो यशपाल शर्मा का कैरियर किसी अन्य मुकाम पर होता. जमील खान मनोरंजक हैं. उनके चेहरे के भाव और व्यक्तित्व उन्हें भूमिका के लिए आदर्श बनाते हैं. बीडीओ रिद्धिराम के किरदार में जमील खान मनोरंजक हैं. उनके चेहरे के भाव और व्यक्तित्व उन्हें भूमिका के लिए आदर्श बनाते हैं. रवि झांकल, के के रैना ,आयशा रजा मिश्रा, अमित जयरथ भी अपना प्रभव दर्ज कराते हैं. भूलेना के चुनौती भरे किरदार को प्रतीक कोठारी अपनी अभिनय प्रतिभा के बलबूते पर बड़ी सहजता से पेश करते हैं. अनुपम श्याम, सीमा भार्गव पाहवा,  सतीश शर्मा, मनोज पाहवा, ललित तिवारी, स्वर्गीय आसिफ बसरा, राजपाल यादव कम समय के लिए ही आते हैं.

“प्रेमिका” को प्रताड़ना, “प्रेमी” की क्रूरता!

छत्तीसगढ़ के जिला कोरिया की पुलिस ने को 8 वर्षीय बालक के अपहरण व हत्या की गुत्थी को सुलझाते हुए मासूम के शव को बरामद कर 23 वर्षीय आरोपी सहित उसके सहयोगी तीन नाबालिग साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया है.

कोरिया पुलिस अधीक्षक चन्द्र मोहन सिंह ने हमारे संवाददाता को बताया कि प्रार्थी राकेश चौधरी ने रिपोर्ट दर्ज कराई कि उसका नाबालिक पुत्र ऋषि चौधरी उर्फ चरका उम्र 8 वर्ष 13 नवम्बर की शाम 6 बजे से लापता है और उसे शंका है कि उसके नाबालिक पुत्र को किसी व्यक्ति के द्वारा उसके घर से अपहृत कर ले जाया गया है.

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प्रार्थी की रिपोर्ट पर थाना झगराखाण्ड में अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया. पुलिस अधीक्षक कोरिया चंद्रमोहन सिंह के द्वारा मामले की गभीरता को देखते हुए एवं अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक कोरिया डॉ . पंकज शुक्ला के दिशा निर्देशन व पुलिस अनुविभागीय अधिकारी मनेन्द्रगढ़ कर्ण उईके के नेतृत्व में थाना प्रभारी विजय सिंह , थाना प्रभारी मनेन्द्रगढ़ सचिन सिंह , खोगापानी प्रभारी तथा चौकी प्रभारी कोड़ा का अलग – अलग टीम का गठन कर स्वयं पुलिस अधीक्षक चंद्रमोहन सिंह द्वारा घटना स्थल पहुंच घटना स्थल का निरीक्षण किया जाकर पता साजी हेतु निर्देशित किया. पुलिस ने जब विवेचना प्रारंभ की तो आगे चलकर जो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए वह अपने आप में दर्दनाक कहानी को समेटे हुए है.
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लीलावती को पाने किया अपराध
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खोजबीन के पश्चात कोरिया पुलिस के हाथ लगे आरोपी बबलू यादव ने बताया कि मृतक बालक की मां लीलावती से उसका प्रेम संबंध था. लीलावती को अपने साथ भगाकर ले गया था , वह उसे बहुत प्यार करने लगा था लेकिन बाद में लीलावती उसके साथ रहने से मना करने लगी.वह उसे छोड़कर अपने पति एवं बच्चे के पास जाना चाहती थी. कुछ समय से उसे छोड़ कर वापस मायके में रह रही थी और पति से उसके समझौते के आसार थे ,जो आरोपी बबलू यादव को नागवार गुजर रहा था। परेशान प्रेमी बबलू ने ऐसे में यह योजना बनाई की क्यों ना उसके मासूम पुत्र को अपहरण करके उसे प्रताड़ित किया जाए. मासूम ऋषि का अपहरण करके प्रेमी बबलू यादव एक तीर से दो निशाने लगाने की कोशिश कर रहा था. वह यह मान रहा था कि अपहरण करके कुछ दिनों में ऋषि को लौटा देगा, जिससे प्रेमिका उस पर प्रसन्न हो कर उसकी हो जाएगी. मगर परिस्थितियां कुछ ऐसी बनी की अपहरण के बाद उसे लगने लगा कि ऋषि को मार देने से उसका काम और आसान बन सकता है.

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इस बीच लीलावती के पति तक वह चालाकी पूर्वक यह खबर भेजवा रहा था कि उसकी पत्नि बबलू से बात करती है मगर उसकी चालाकी नहीं चल रही थी. लीलावती का पति समझौता करके पत्नि को घर लाने के लिए तैयार हो गया था. परिणाम स्वरूप बबलू यादव ने प्रेमिका के परिवार से बदला लेने का मन बना लिया और मासूम बालक एवं उसके भाई को अपने पास मोबाईल दिखाने के लिए बुलाता रहा. मृतक के चाचा के लड़के नाबालिक बालक को पैसे का लालच देकर उसको अपने पास बुलाता रहा एवं अपचारी बालक को अपहृत बालक को लाने के प्रेरित किया. नाबालिक के द्वारा ऋषि को लाया गया तब आरोपी उसे अपनी मोटर साईकल से बैठाकर अपने ईटा भट्ठा ले गया और नाबालिक बालक के साथ मिल कर पानी में डाल कर उसकी डूबा कर हत्या कर दी. यही नहीं वहां बने नाली में लाश को डाल कर घास एवं मिट्टी से ढक दिया. परंतु बाद में आरोपी बबलू यादव को यह भय सताने लगा था कि नाबालिक बालक किसी को बता देगा. इस डर से दूसरे दिन 14 नवंबर को दो नाबालिग दोस्तों को बुलाया और मृत ऋषि की लाश को सीमेंट के बोरे में ले, सहवानी टोला मशकूर के तलाब के पास नीम पेड़ के नीचे, तीनों ने मिल कर गड्डा खोद, बोरा सहित शव को दफन कर दिया.

पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर कार्यपालिक दण्डाधिकारी की उपस्थिति में शव को बरामद कर पंचनामा कार्यवाही की. आरोपी बबलू यादव आ.अजय यादव उर्फ मुन्ना उम्र 23 एवं अन्य तीनो नाबालिको को भी गिरफ्तार किया गया है . आरोपी बबलू ने मासूम मृतक के शव को जहां पहले दफनाया था, किसी को शक न हो सोच कर वहां एक सुअर मार कर फेंक दिया था जिससे कि पुलिस को गुमराह किया जा सकें . मगर पुलिस की सतर्कता से अंततः आरोपी पकड़ा गया मगर एक बार फिर यह सच्चाई बता गया कि जर जोरू और जमीन का मामला कब कैसा विभत्स रूप लेगा, यह कोई नहीं जानता.

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जब हो छोटा घर और भरापूरा परिवार तो कैसे करें सैक्स और छेड़छाड़

साल 1972 में एक छोटे बजट की फिल्म ‘पिया का घर’ आई थी, जिस में अनिल धवन और जया भादुड़ी की शादी के बाद की लव स्टोरी को बड़े ही मनोरंजक ढंग से दिखाया गया था.

इस फिल्म में अनिल धवन ने राम का और जया भादुड़ी ने मालती का किरदार निभाया था. शादी के बाद मालती एक कमरे के मकान, जिसे मुंबई में ‘चाल’ कहते हैं, रहने आती है. वहां राम का भरापूरा परिवार रहता है. हर समय भगदड़ सी मची रहती है.

असली समस्या तब शुरू होती है जब मालती और राम को रसोईघर में सोना पड़ता है. उन की सुहागरात पर तुषारापात हो जाता है. पूरी फिल्म में वे अकेले में प्यार और सैक्स करने के लाख जतन करते हैं, पर कामयाब नहीं हो पाते हैं. एक बार तो वे सस्ते से होटल में रात गुजारने के चक्कर में बड़ी मुसीबत में भी फंस जाते हैं.

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अब एक दूसरी फिल्म के बारे में बात करते हैं ‘भाग मिल्खा भाग’. इस फिल्म में मिल्खा अपने खड़ूस जीजा और बड़ी बहन के साथ 1947 के बंटवारे के बाद भारत आता है तो रिफ्यूजी कैंप में रहता है. वहां उस का जीजा जब मन करता है अपनी पत्नी को पकड़ लेता है और एक चादर की ओट के पीछे अपनी हवस मिटा लेता है. अपनी बड़ी बहन की सिसकियां सुन कर गुस्साया मिल्खा वहां से भाग जाता है.

अब सवाल उठता है कि जब आप के आसपास लोगों का मेला लगा हो तो अपने साथी के साथ सुकून वाला सैक्स करने के लिया क्या तरीका अपनाया जाए? राम और मालती की तरह होटल में रात गुजारी जाए या मिल्खा के जीजा की तरह परदे की ओट में काम चला लिया जाए, दुनिया जाए भाड़ में?

हमारे देश की भी कमोबेश यही समस्या है. बड़े शहरों के दड़बों जैसे छोटे कमरों में रहने वालों के लिए शांति से होने वाला सैक्स परी कथाओं जैसा काल्पनिक है. गांवदेहात में बेशक कच्चेपक्के घर होते हैं, संयुक्त परिवार होते हैं, पर वहां ज्यादा छोटे घर नहीं होते. लोग खेतीबारी करते हैं, तो दिन में खेत में रहते हैं. ऐसे में शादीशुदा जोड़ों को एकांत मिल ही जाता है. पर समस्या वहां नहीं है, ऐसा भी नहीं कह सकते.

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एक कमरे के मकान में अगर पतिपत्नी और उन का छोटा बच्चा रहते हैं तो पतिपत्नी को प्यार करने में ज्यादा समस्या नहीं आती है. बच्चे को बहका कर उसे बाहर खेलने भेजा जा सकता या पढ़ाई के बहाने दोस्त के घर जाने को कहा जा सकता है या रात को उस के सोने के बाद पतिपत्नी एक हो सकते हैं, पर अगर वहां कोई बालिग रहता हो जैसे मातापिता, देवर या ननद तो दिक्कत बढ़ जाती है.

रमेश की नईनई शादी हुई थी. एक कमरे के मकान में उस की सेज रसोईघर में सजा दी गई. सुहागरात पर उस ने अपनी पत्नी के साथ सैक्स करना शुरू किया तो बाहर से उस की बहन की हंसी छूटने की आवाज आई. उस के बाद ही मां के डांटने का भी स्वर सुनाई दिया. इस से रमेश के रंग में भंग पड़ गया.

रात तो किसी तरह बीती, पर अगले ही दिन रमेश ने अपनी मां से बात की और समस्या का समाधान चाहा. उस के बाद मातापिता और बहन किसी न किसी बहाने घर से बाहर रहने लगे जिस से रमेश अपनी पत्नी के साथ बिना झिझके प्यारमनुहार करने लगा.

पर यह हर घर में नहीं होता. बहुत से जोड़े रमेश की तरह अपने मन की बात कह ही नहीं पाते हैं. ज्यादातर तो अपनी पूरी जिंदगी सुखमय सैक्स की तलाश में ही गुजार देते हैं.

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फिर भी कुछ ऐसे तरीके हैं जिन्हें अपना कर एक कमरे के घर में भी सुकून वाले सैक्स का मजा लिया जा सकता है :

-अगर पति काम करता है और पत्नी घर पर रहती है तो पति औफिस में कह कर रात की ड्यूटी लगवा सकता है. इस का फायदा यह होगा कि जब पति दिन में घर पर रहेगा तो ज्यादातर दूसरे लोग नौकरी या काम के बाहर रहेंगे. अगर मां घर होगी भी तो उसे किसी बहाने बाहर भेज कर पत्नी सुख लिया जा सकता है.

-अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो देर रात का अलार्म लगा कर रात को जब सब गहरी नींद में हों तो सैक्स क्या जा सकता है.

-आपसी रजामंदी से भी अपने हमउम्र लोगों को कह कर उन्हें घर से बाहर भेजा जा सकता है. बस थोड़ा सा बोल्ड होने की जरूरत है. वे समझते हुए आप की बात मान जाएंगे.

-चूंकि बाहर किसी होटल में जा कर मस्ती करना पैसे के लिहाज से महंगा पड़ सकता है, उस से अच्छा है कि घर के दूसरे सदस्यों को अपने खर्चे पर 1-2 घंटे के लिए कहीं आसपास घूमने के लिए भेज दें. अगर वे पास के पार्क में या बाजार चले जाएं तो यह खर्च भी बचेगा.

-रात को छत, रसोईघर में जा कर सोया जा सकता है. बस पायल और चूड़ी उतार दें, ताकि बेवजह की आवाज न हो.

-बच्चों के स्कूल जाने के बाद भी एकांत का फायदा उठाया जा सकता है.

सियासत : कांग्रेस में रार, होनी चाहिए आर या पार

राजनीति में जब मनमुताबिक हालात नहीं होते हैं तो किसी सियासी दल की हालत उस डूबते जहाज की तरह हो जाती है, जिस के चूहे सब से पहले उसे छोड़ कर समुद्र में छलांग लगाते हैं. पर चूहे अगर कद्दावर हों तो जहाज के कप्तान को काटने से भी गुरेज नहीं करते हैं.

आज अगर सरसरी निगाहों से देखा जाए तो कांग्रेस इसी डूबते जहाज सी हो गई है. देश को अपने कई साल के राज से नई दिशा देने वाली कांग्रेस आज खुद दिशाहीन लग रही है. इतनी ज्यादा कि कोई भी छुटभैया नेता उसे ज्ञान बघार देता है.

हालिया बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार को ले कर अब इसी पार्टी में बगावत के सुर सुनाई दे रहे हैं. इस के वरिष्ठ नेता और नामचीन वकील कपिल सिब्बल ने जैसे ही इस के शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठाए कि पार्टी की भीतरी कलह एक बार फिर सामने आ गई.

पर इसे भितरघात बताते हुए राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कपिल सिब्बल को ही निशाने पर ले लिया और साथ ही दूसरे नेता सलमान खुर्शीद ने कपिल सिब्बल को ही ‘डाउटिंग थौमस’ करार दे दिया.

दरअसल, ‘डाउटिंग थौमस’ उस आदमी को कहते हैं जो किसी भी चीज पर यकीन करने से इनकार करता है जब तक कि वह खुद न अनुभव करे या सुबूत न हो. इतना ही नहीं, सलमान खुर्शीद ने एक इंटरव्यू में कपिल सिब्बल को पार्टी छोड़ने तक की सलाह दे दी.

एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में सलमान खुर्शीद ने कपिल सिब्बल की तरफ इशारा करते हुए कहा कि अगर आप पार्टी में हैं और चीजों को खराब कर रहे हैं तो सब से अच्छा यही है कि आप पार्टी छोड़ दें.

सिब्बल का दुखती रग पर हाथ

सवाल यह है कि कपिल सिब्बल ने ऐसा क्या कहा कि कांग्रेस के दूसरे नेता उन पर हावी हो गए? दरअसल, कपिल सिब्बल ने एक इंगलिश अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में कथित तौर पर कहा था कि ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपनी नियति मान लिया है… बिहार ही नहीं, उपचुनावों के नतीजों से भी ऐसा लग रहा है कि देश के लोग कांग्रेस पार्टी को प्रभावी विकल्प नहीं मान रहे हैं.

अपनी पार्टी को कठघरे में खड़ा करने वाले कपिल सिब्बल अकेले ही नहीं हैं, उन के साथसाथ कांग्रेस महासचिव तारिक अनवर ने भी कथित तौर पर कहा था कि बिहार चुनाव को ले कर पार्टी को आत्मचिंतन करना चाहिए.

एक हिंदी अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में तारिक अनवर ने बिहार विधानसभा चुनाव पर कांग्रेस के प्रदर्शन पर कहा, ‘इस का जायजा लेना होगा कि हम लोगों से कहां चूक हो रही है. यह भी हो सकता है कि लंबे वक्त तक सत्ता में बने रहने से हमारे जो स्टेट लीडर हैं, वे आलसी हो गए हों, काम करने की ताकत न रही हो. इस खुशफहमी से बाहर निकलना होगा कि गांधी परिवार से कोई आएगा और हम जीत जाएंगे. ऐसा नहीं चलने वाला…’

तारिक अनवर की चिंता जायज है, पर यह भी कड़वा सच है कि कांग्रेस आज भी गांधी परिवार के इर्दगिर्द ही सिमटी दिखाई देती है और अगर कोई अपना ही इस परिवार पर उंगली उठाता है, तो उसे ‘डाउटिंग थौमस’ करार दे दिया जाता है.

फिर दिक्कत क्या है

ऐसा नहीं है कि जनता को गांधी परिवार से कोई दुश्मनी है या इस पार्टी में बड़े कद के नेताओं की कमी हो गई है, पर इतना जरूर है कि फिलहाल इस पार्टी का कोई भी पासा सही नहीं पड़ रहा है.

इस की एक खास वजह यह है कि कांग्रेस यह नहीं फैसला कर पा रही है कि वह अपने वोटरों का दिल जीतने के लिए दो नावों की सवारी का करतब कब तक करेगी. दो नावों की सवारी का मतलब है अपनी धर्मनिरपेक्षता पर अडिग रहना या सौफ्ट हिंदुत्व का राग अलापना.

पिछले कुछ साल में भारतीय जनता पार्टी लोगों के दिमाग में यह भरने में कामयाब रही है कि वह इस देश में हिंदुत्व की हिफाजत करने वाली एकलौती पार्टी है और तीन तलाक कानून, धारा 370, राम मंदिर पर लिए गए उस के फैसले ने देश में हिंदूमुसलिम तबके के बीच एक लकीर खींच दी है, जिसे मिटाने में कांग्रेस के हाथपैर फूल रहे हैं. वह अगर मुसलिम समाज के हित की बात करती है तो हिंदू समाज की नाराजगी झेलती है और अगर सौफ्ट हिंदुत्व की तरफ जाती है तो मुसलिमों से दूर हो जाती है.

बिहार में दिखा असर

हालांकि बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन की मजबूत साथी थी और उसे 70 सीटें भी दी गई थीं, पर वह उम्मीद के मुताबिक नतीजे नहीं ला पाई. हाल यह हुआ कि हाथ आया पर मुंह को न लगा. यह महागठबंधन 12 जरूरी सीटों से पिछड़ गया और विपक्ष बन कर रह गया.

बाद में सब से बड़ा सवाल यही उभरा कि क्या कांग्रेस को 70 सीटें दी जानी चाहिए थीं? 70 सीटों में से महज 19 सीटें जीत कर कांग्रेस ने कोई कारनामा नहीं किया था. लिहाजा, उसे ही महागठबंधन की कमजोर कड़ी माना गया.

बिहार में कांग्रेस मुसलिमों को रिझाने में पूरी तरह नाकाम रही. उस ने असद्दुदीन ओवैसी को कम आंका या जानबूझ कर उन्हें नजरअंदाज किया, यह अलग सवाल है, पर खुद अपनी 70 सीटों में से उस ने महज 12 सीटों पर मुसलिम उम्मीदवार उतारे थे. उस ने खुद को तो मुसलिमों की हिमायती बताया पर ओवैसी को भाजपा का एजेंट बताते हुए उस पर खूब वार किए.

उधर, असदुद्दीन ओवैसी के पास खोने को कुछ नहीं था, लिहाजा उन्होंने भी कांग्रेस को यह कहते हुए खूब आड़े हाथ लिया कि अपने को सैकुलर कहने वाले दूसरे दलों को मुसलमानों के वोट तो अच्छे लगते हैं, पर उन की दाढ़ी और टोपी उन्हें पसंद नहीं.

जब बिहार में ओवैसी ने अपने खाते में 5 सीटें कर लीं, तो सियासी गलियारों में यह सुगबुगाहट शुरू हो गई कि क्या मुसलिम समाज का कांग्रेस या तथाकथित सैकुलर दलों से मोह भंग हो रहा है? कहीं ओवैसी में उन्हें अपना रहनुमा तो नहीं दिखाई दे रहा है? और अगर ऐसा है तो पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में कुछ अलग ही रंगत देखने को मिलेगी, जो कांग्रेस जैसे सैकुलर दलों के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकती है.

पर अभी भी कुछ ज्यादा नहीं बिगड़ा है. कांग्रेस को दूसरे दलों की ताकत के साथसाथ अपनी अंदरूनी कमियों पर भी गंभीरता से सोचना होगा. अगर उसे गांधी परिवार की जरूरत है तो वह इस बात को खुल कर स्वीकार करे, जिस से राहुल गांधी को नई ताकत मिलेगी. बाकी नेताओं को भी आपसी निजी रंजिश भुला कर एकजुट होना होगा. उन्हें अपने नेतृत्व पर सवाल उठाने का पूरा हक है, पर अगर कोई दूसरा मजबूत विकल्प नहीं है तो जो सामने है, उस में वे अपनी आस्था बनाएं और मजबूती के साथ जनता के सामने जाएं. बिल्ली देख कर कबूतर की तरह अपनी आंखें बंद करने से समस्या का हल नहीं होगा. आरपार की ही लड़ाई सही, पूरी ताकत से लड़ें, फिर नतीजा चाहे कुछ भी रहे.

अब पुलिस की वर्दी में नजर आएंगी ‘सास-बहू और बेटियां’ की एंकर-एक्टर एकता जैन

एंकर से एक्टर बनी एकता जैन अभिनय जगत में नित नए आयाम स्थापित करती जा रही हैं. बहुमुखी प्रतिभा की धनी एकता जैन इन दिनों वह अपनी दुष्यंत प्रताप सिंह निर्देशित नई फिल्म ‘‘शतरंज’’ को लेकर चर्चा में हैं, जिसमें वह एक महिला पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में नजर आने वाली हैं. इस फिल्म का निर्माण आनंद मोशन पिक्चर्स, ओरिजिनल फिल्म लैब और दुष्यंत कॉरपोरेशन के बैनर तले आनंद प्रकाश, मृणालिनी सिंह और फहीम रुस्तम कुरैशी निर्मित कर रहे हैं.

फिल्म ‘‘शतरंज’’ की शूटिंग करने के बाद एकता जैन ने कहा- ‘‘मैं एक फिल्म के सेट पर दुष्यंत सर से मिली थी और उन्हें मेरा काम काफी पसंद आया था. उन्होंने मुझे एक एंकर के तौर पर सास बहू और बेटियां नामक शो, कई टीवी सीरियलों, फिल्मों और अन्य प्रोजेक्ट्स में मेरा काम देख रखा था.‘‘

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वह आगे कहती हैं- ‘‘इस फिल्म में मेरा किरदार काफी चुनौतीपूर्ण है. पहली दफा पर्दे पर मैं एक पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में नजर आऊंगी. मैं भले ही एक महिला पुलिस का किरदार निभा रही हूं, मगर इस किरदार और मेरी निजी जिंदगी में कई तरह की समानताएं हैं. फिल्म के किरदार की तरह ही निजी जिंदगी में मैं भी काफी ऊर्जावान व जीवंत किस्म की लड़की हूं. इस फिल्म में कई रोमांचक ट्विस्ट्स देखने को मिलेंगे. इसमें बताया गया है कि कैसे जिंदगी के खेल में लोगों को मोहरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है. मैं इस बात को लेकर बेहद खुश हूं कि मुझे दुष्यंत  प्रताप सिंह जैसे प्रतिभावान निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिला.‘‘

सभी जानते है कि एकता जैन, एक थी राजकुमारी, शकालाका बूम बूम, जय गंगा मैया, गायत्री महिमा, अपुन तो बस वैसे ही जैसे 25 से अधिक सीरियलों में अभिनय कर चुकी है. उन्होंने नायक: द सुपर हीरो, अनजाने- द अननोन आदि फिल्मों में भी काम किया है. सपोर्टिंग रोल्स में उन्हें काफी सराहना भी मिली है. एकता आखिरी बार हॉरर कॉमेडी फिल्म ‘‘खली बली’’ में धर्मेंद्र और मधु जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ अहम भूमिका में नजर आयी थीं.

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इससे पहले एकता जैन अलग-अलग भाषाओं के नाटकों में अपने अभिनय का जलवा दिखा चुकीं हैं. वह विभिन्न लहजे में बात करने में भी महारत रखती हैं. एकता बेबी सिटर, मिलिट्रू कैम्प, अतिथि, मीना नो मानवदो आदि जैसे नाटकों में काम करने का अनुभव रखती हैं. एकता ऐसी बहुमुखी प्रतिभा का नाम है जिसने फैशन शोज में भी अपना जलवा बिखेरा है. वह कच्छ ब्यूटी कॉन्टेस्ट, मिस बोरीवली कॉन्टेस्ट, मिस  मालाड कॉन्टेस्ट जैसे शोज में भी हिस्सा ले चुकीं हैं. इतना ही नहीं, वे बेस्ट कैटवॉक और मिस बेस्ट स्माइल जैसे खिताब भी अपने नाम करा चुकीं हैं.

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एकता ने लाफिंग कलर्स के शोज के लिए भी एंकरिंग की है. उन्होंने मां शक्ति,शक्तिमान दुर्गा, विष्णु पुराण और कई और शोज के लिए डबिंग भी की है.कई भाषाओं को जानने की काबिलियत के चलते उन्हें काफी प्रशंसा भी मिली है. वह आज तक चैनल के लोकप्रिय शो सास बहू और बेटियां के लिए एंकरिंग भी कर चुकीं हैं.

किन्नर का आखिरी वार- भाग 2

कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां

राइटर- सुरेशचंद्र मिश्र

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आगे पढ़ें कैसे विमला को पाने के जतन करने लगा बंका….

किन्नर के 2 बेटे थे संदीप व कुलदीप. दोनों स्कूल जाते थे. बच्चों की परवरिश और पढ़ाईलिखाई से खर्चे बढ़ गए थे, जबकि आमदनी उतनी ही थी. जरूरत होती तो किन्नर बंका से ब्याज पर पैसे ले लेता था. इसी सिलसिले मे एक रोज बंका, किन्नर यादव के घर आया था. दोनों घर से निकलने लगे, तो विमला ने पति को टोका, ‘‘सुनिए, बच्चों की फीस देनी है, 500 रुपए दे जाओ.’’

‘‘अभी पैसे नहीं है. शाम को बात करते है.’’ किन्नर ने लापरवाही से कहा, तो बंका ने जेब से पर्स निकाला और पांचपांच सौ के 2 नोट निकाल कर विमला की हथेली पर रख दिए, ‘‘ये लो भाभी, बच्चों की फीस दे देना.’’ फिर वह किन्नर की ओर मुखातिब हुआ, ‘‘यार बच्चों की जरूरतों के मामले में भाभी को परेशान मत किया करो. तुम्हारा यह दोस्त है तो..’’ कहने के साथ ही उस ने मुसकरा कर विमला की ओर देखा, ‘‘भाभी, आप संकोच मत करना. जब भी जरूरत हो, कह देना.’’

बंका के पर्स में नोटों की झलक देख विमला हसरत से उस के पर्स को देखती रह गई. बंका समझ गया कि विमला की दुखती रग पैसे की जरूरत है. उस रोज के बाद वह गाहेबगाहे विमला की आर्थिक मदद करने लगा. अब दोनों एकदूसरे को देख मुसकराने लगे थे.

बंका की नजरें विमला के सीने पर पड़ती, तो वह जानबूझ कर आंचल गिरा देती, जिस से बंका अपनी आंखें सेंक सके. दरअसल बंका विमला को पाने के लिए लालायित था, तो विमला भी कुंवारे बंका को अपने रूप जाल में फंसाने को उतावली थी.

घर के बढ़ते खर्चों के कारण किन्नर यादव की व्यस्तता बढ़ गई थी. वह ज्यादा से ज्यादा समय आढ़त पर बिताता था ताकि पल्लेदारी कर ज्यादा पैसा कमा सके. वह सुबह घर से निकलता तो देर रात थकामांदा लौटता था. उस का पूरा दिन और आधी रात आढ़त पर ही बीत जाती थी. घर आता तो खाना खा कर सो जाता था. कभी मन हुआ तो बेमन से विमला को बांहों में लेता फिर अपनी थकान उतार कर एक ओर लुढ़क जाता. इस से विमला का मन भटकने लगा. वह रवि बंका के हसीन जाल में फंसने को उतावली हो उठी.

पहले तो बंका किन्नर यादव की उपस्थिति में ही आता था, बाद में वह उस की गैरमौजूदगी में भी आने लगा. विमला से उस का हंसीमजाक व नैनमटक्का पहले ही दिन से शुरू हो गया था. गुजरते दिनों के साथ दोनों नजदीक भी आते गए. उस के बाद एक दोपहर को वह सब हो गया, जिस की चाहत दोनों के मन में थी.

चाहत में पतिता बन गई विमला

विमला और बंका के सामने एक बार पतन का रास्ता खुला, तो वे उस पर लगातार फिसलते चले गए. दिन में विमला घर में अकेली रहती थी. किन्नर यादव आढ़त चला जाता था और दोनों बच्चे स्कूल. विमला फोन कर के बंका को बुला लेती. बच्चों के स्कूल लौटने से पहले ही बंका अपने अरमान पूरे कर चला जाता था.

दोनों के बीच प्रीत बढ़ी, तो विमला को दिन का उजाला उलझन देने लगा. हर समय किसी के आने का डर भी बना रहता था. इसलिए हसरतों का पूरा खेल उन्हें जल्दीजल्दी निपटाना पड़ता था. दोनों ही इस हड़बड़ी और जल्दबाजी से संतुष्ट नहीं थे.

वे दोनों देह का पूरा खेल सुकून व इत्मीनान से खेलना चाहते थे. जिस दिन किन्नर आढ़त से घर नहीं आ पाता, उस दिन बच्चों के सो जाने के बाद विमला चुपके से उसे घर में बुला लेती.

बंका का किन्नर यादव की गैरमौजूदगी में चुपके से आना और उस के आने से पहले ही चले जाना पड़ोसियों की नजरों से छुपा नहीं रह सका. लिहाजा उन दोनों को ले कर तरहतरह की बातें होने लगीं. फैलतेफैलते ये बातें किन्नर यादव के कानों तक पहुंची तो उस ने विमला से जवाब तलब किया.

रंगे हाथ पकड़े बगैर औरतें हो या पुरुष, अपनी बदचलनी स्वीकार नहीं करते. विमला ने भी मोहल्ले वालों को झूठा और जलने वाला कह कर पल्ला झाड़ लिया. लेकिन किन्नर को इस से संतुष्टि नहीं हुई. उस ने दोनों की निगरानी शुरू कर दी और एक दिन उन्हें आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया.

किन्नर ने विमला को पीटा और बंका को अपमानित कर के घर से निकाल दिया. इस के बावजूद भी दोनों नहीं सुधरे. विमला, बंका को बुलाती रही और वह उस की देह को सुख देने आता रहा.

कुछ समय बाद एक रोज किन्नर ने दोनों को फिर रंगे हाथ पकड़ लिया. उस दिन उस की बंका से मारपीट भी हुई. यह तमाशा पूरे मोहल्ले ने देखा. किन्नर यादव ने बंका को धमकी भी दी, ‘‘तुझ से तो मैं अपने तरीके से निपटूंगा. ऐसा सबक सिखाऊंगा कि पराई औरत के पास जाने से डरेगा.’’

इस घटना के बाद बंका और विमला का मिलन बंद हो गया. किन्नर ने विमला को समझाया, बच्चों की दुहाई दी, इज्जत की भीख मांगी. लेकिन बंका के इश्क में अंधी विमला नहीं मानी. पकड़े जाने के बाद वह कुछ समय तक बंका से दूर रही, उस के बाद फिर से उसे बुलाने लगी.

अक्तूबर के पहले हफ्ते में विमला के दोनों बच्चे संदीप व कुलदीप अपनी नानी के घर सिरिया ताला गांव चले गए. बच्चे नानी के घर गए तो विमला और भी निश्चिंत हो गई.

वह प्रेमी बंका को मिलन के लिए दिन में बुलाने लगी. 8 अक्तूबर, 2020 की सुबह 6 बजे किन्नर किसी काम से घर से निकल गया. उस के जाने के बाद बंका उस के घर आ गया. वह विमला को बाहों में भर कर प्रणय निवेदन करने लगा. विमला ने किसी तरह अपने को मुक्त किया और कहा कि किन्नर किसी भी समय घर आ सकता है. वह वापस चला जाए. खतरा भांप कर बंका ने बात मान ली.

बंका घर से बाहर निकल ही रहा था कि किन्नर यादव आ गया. उस ने बंका को घर से बाहर निकलते देख लिया था, उसे शक हुआ कि बंका विमला के शरीर से खेल कर निकला है. शक पैदा होते ही किन्नर को बहुत गुस्सा आया. उस ने घर में रखा फरसा उठाया और पड़ोसी बंका के घर पहुंच गया.

बंका कुछ समझ पाता उस के पहले ही उस ने उस पर फरसे से प्रहार कर दिया. बंका का कान कट गया और खून बहने लगा. वह बचाओ… बचाओ… की गुहार लगाने लगा, तभी उस ने उस पर दूसरा प्रहार कर दिया, जिस से उस की गर्दन कट गई और वह जमीन पर गिर गया.

इधर बंका की चीख सुन कर विमला उसे बचाने पहुंच गई. विमला को देख किन्नर का गुस्सा और भड़क गया. उस ने बंका को छोड़ विमला पर फरसे से हमला कर दिया. फरसा विमला के पैर में लगा और वह जान बचा कर भागी.

सामने ननकी का घर था, वह उसी घर में घुस गई. पीछा करता हुआ किन्नर भी आ गया. वह विमला के बाल पकड़ कर घर के बाहर लाया और सड़क पर फरसे से उस की गर्दन धड़ से अलग कर दी. ननकी तथा कई अन्य लोगों ने देखा, पर उसे बचाने कोई नहीं आया.

पत्नी की गर्दन काटने के बावजूद किन्नर का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. उस ने एक हाथ में विमला का कटा सिर पकड़ा और दूसरे हाथ में फरसा ले कर थाने की ओर चल दिया. लगभग डेढ़ किलोमीटर का सफर पैदल तय कर के किन्नर थाना बबेरू पहुंचा और पुलिस के सामने आत्म समर्पण कर दिया.

9 अक्तूबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त किन्नर यादव को बांदा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेरी ससुराल वाले कहते हैं कि बेटे को पढ़ा लो, पर बेटी को पढ़ालिखा कर क्या करोगी?

सवाल

मैं 38 साल की शादीशुदा औरत हूं और 2 बच्चों की मां भी. मैं ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं हूं, पर अपने बच्चों को पढ़ाना चाहती हूं, लेकिन मेरी ससुराल वाले इस काम में मुझे सहयोग नहीं देते हैं. वे कहते हैं कि बेटे को पढ़ा  लो, पर बेटी को पढ़ालिखा कर क्या करोगी. मेरे पति भी अपने परिवार की हां में हां मिलाते हैं. मैं क्या करूं?

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जवाब

आप अपनी जगह सही हैं कि बेटी को भी बेटे के बराबर से तालीम हासिल करने का हक है, इसलिए अपनी जायज बात पर अड़ी रहें और ससुराल वालों को समझाएं कि अनपढ़ या कम पढ़ीलिखी लड़की को जिंदगीभर परेशानियां झेलनी पड़ती हैं और उन की शादी भी आसानी से नहीं होती.

ससुराल वालों से पहले पति को अपनी औलाद के भविष्य के बारे में बताएं.  इस पर भी बात न बने, तो खुद छोटेमोटे काम कर के बेटी की पढ़ाई का खर्चा उठाएं,

लेकिन किसी भी कीमत पर उस के न पढ़ने देने की ज्यादती न होने दें. यह एक परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या है. इस से लड़ें, झुकें नहीं.

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अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें-  सरस सलिल-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

उत्तर प्रदेश: गुस्सा जाहिर करती जनता

त्रेता युग के रामराज में सरकार के लोग वेशभूषा बदल कर जनता के दुखदर्द को राजा तक पहुंचाने का काम करते थे. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रामराज में जनता अब गुस्सा जाहिर करने लगी है. गुस्सा जाहिर करने के लिए जनता अपनी जान को भी दांव पर लगाने से परहेज नहीं कर रही है.

अपनी आवाज को सरकार तक पहुंचाने के लिए लोग विधानसभा भवन और भाजपा कार्यालय के सामने आत्मदाह करने लगे हैं. आत्मदाह की आधा दर्जन घटनाएं इस का सुबूत हैं.

अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद प्रदेश में रामराज बनाने का दावा फेल हो चुका है. जनता की बात नहीं सुनी जा रही, जिस से भड़के लोग आत्मदाह का रास्ता चुन रहे हैं.

उत्तर प्रदेश के विधानसभा भवन, लोकभवन और भारतीय जनता पार्टी प्रदेश कार्यालय के बीच 200 मीटर की लंबी सड़क आत्मदाह का केंद्र बन गई है. हाई सिक्योरिटी जोन में विधानसभा के चारों तरफ 650 वर्गमीटर का विशेष निगरानी घेरा बनाया गया है. यहां के चप्पेचप्पे पर अत्याधुनिक साधनों से लैस पुलिस लगाई गई है.

पुलिस को गच्चा देने के लिए पीडि़त पक्ष ने आत्मदाह की जगह वहीं पर बड़ी मात्रा मे नींद की गोलियां खा कर जान देने की कोशिश शुरू कर दी. अक्तूबर महीने में विधानसभा भवन के सामने इस तरह की 6 घटनाएं घट चुकी हैं.

4 मामलों में आग लगा कर जान देने की कोशिश की गई, जिस में 2 औरतों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है. विधानसभा भवन और भारतीय जनता पार्टी कार्यालय अपनी दुखभरी दास्तान कहने के लिए हौट स्पौट बन गया है.

विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह की घटनाएं अनलौक 2 के बाद से तेज हुईं. 17 जुलाई को अमेठी की रहने वाली सोफिया और उस की बेटी ने खुद को आग लगा ली. सिविल अस्पताल में इलाज के दौरान सोफिया की मौत हो गई.

13 अक्तूबर को महाराजगंज जिले की रहले वाली अंजलि तिवारी उर्फ आयशा ने भाजपा प्रदेश कार्यालय के सामने आत्मदाह करने की कोशिश की. जली अवस्था में पुलिस ने सिविल अस्पताल में भरती कराया, जहां उस की मौत हो गई.

19 अक्तूबर को लखनऊ के ही हुसैनगंज इलाके के रहने वाले सुरेंद्र चक्रवर्ती ने आत्मदाह करने की कोशिश की. इसी दिन बाराबंकी का रहने वाला परिवार भी आत्मदाह के इरादे से विधानसभा भवन के सामने पहुंचा था. उसे पुलिस ने पहले ही पकड़ लिया था.

22 अक्तूबर को बेबी खान नामक औरत नींद की गोलियां खा कर बदहवास हालत में विधानसभा गेट के सामने पहुंची, पर पुलिस ने उस को भी पकड़ लिया था.

कोई नहीं सुनता दर्द

जैसेजैसे सरकार ने जनता की आवाज को सुनना बंद कर दिया है, वैसेवैसे इस तरह की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं. फिल्म ‘शोले’ में पानी की टंकी के ऊपर चढ़ कर बसंती से मिलने की जिद को सभी ने देखा था. अखिलेश सरकार में परेशान एक नौजवान विधानसभा भवन के सामने पेड़ पर चढ़ कर फांसी लगाने की जिद कर रहा था.

आत्मदाह करने वाले सुरेंद्र चक्रवर्ती डायमंड डेरी कालोनी में जावेद के घर में किराए के मकान में रहता था. वह फोटोकौपी मशीन का कारोबार करता था. साल 2013 से मकान के किराए को ले कर विवाद चल रहा था.

‘तालाबंदी’ के दौरान बेरोजगारी बढ़ने से सुरेंद्र बेहद परेशान था. ऐसे में जब मकान मालिक ने उस का सामान घर से निकाल कर सड़क पर फेंक दिया, तब आर्थिक तंगी में उसे विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह करने का रास्ता ही सम झ आया.

लखनऊ के सिविल अस्पताल में भरती सुरेंद्र चक्रवर्ती ने बताया, ‘मेरा किराएदारी का मुकदमा चल रहा था. ऐसे में मेरे सामान को जब घर से बाहर फेंक दिया गया, तो मेरे सामने कोई रास्ता नहीं था. पुलिस भी मेरी बात सुन नहीं रही थी. वह मकान मालिक के दबाव में थी. मैं कब तक चुप रहता.

‘मु झे लगा कि अब जान की कीमत पर ही सही पर गूंगेबहरे प्रशासन के सामने अपनी बात कहनी है. मेरे घर से विधानसभा की दूरी एक किलोमीटर थी. मु झे लगा कि अगर सरकार के सामने अपनी आवाज उठाई जाए तो शायद वह मेरी पीड़ा सुन सकेगी. ऐसे में विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह करने का फैसला किया.’

बाराबंकी का रहने वाला नसीर और उस का परिवार भी विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह करने पहुंचा था, पर पुलिस ने पहले ही पकड़ लिया. नसीर सरकारी जमीन पर दुकान लगाता था. नगरनिगम ने दुकान तोड़ दी. परेशान नसीर को कुछ सम झ नहीं आया, तो सरकार तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उस ने यह रास्ता चुना था.

लखनऊ के राजाजीपुरम की रहने वाली बेबी खान का भाई अपराधी था. पुलिस उसे पकड़ने घर जाती थी. जब वह नहीं मिलता था, तो पुलिस घर वालों के साथ गालीगलौज और बदतमीजी करती थी. पुलिस की इस हरकत से बचने के लिए उस ने यह कदम उठाया.

लखनऊ के ही सिविल अस्पताल में भरती बेबी खान ने बताया, ‘मेरे भाई को पुलिस परेशान कर रही थी. उसे पुराने मुकदमों की धमकी दे कर जेल भेजने के लिए पकड़ने की कोशिश कर रही थी. भाई का मेरे घर किसी भी तरह से कोई आनाजाना नहीं था. इस के बाद भी हर दूसरेतीसरे दिन पुलिस हमारे घर पहुंच जाती थी. पुलिस अकसर रात को घर जाती थी.

‘हम जिस महल्ले में रहते हैं, वहां बदनामी होती थी. हम ने कई बार पुलिस को सम झाने की कोशिश की कि हम से उस का कोई मतलब नहीं है. ऐसे में उलटे पुलिस हमें ही धमकी दे रही थी. ऐसी बदनामी से बचने के लिए ही हम ने विधानसभा और भाजपा के औफिस के सामने जान देने का संकल्प ले लिया था.’

महाराजगंज की रहने वाली अंजलि तिवारी उर्फ आयशा छत्तीसगढ की रहने वाली थी. महाराजगंज के अखिलेश के साथ उस की शादी हुई. इस के बाद दोनों में विवाद हो गया और वे अलग हो गए.

अंजलि ने मोहम्मद आलम के साथ निकाह किया और आयशा बन कर उस के साथ रहने लगी. कुछ दिन के बाद मोहम्मद आलम नौकरी करने अरब चला गया, तो उस के घर वालों ने आयशा को ससुराल से निकाल दिया.

अंजलि ने पुलिस में शिकायत की, तो पुलिस ने सुनी नहीं. लिहाजा, उस ने आत्मदाह करने का फैसला लिया.

युद्ध सी तैयारी

आत्मदाह की घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस को युद्ध की सी तैयारी करनी पड़ी है. विधानसभा भवन और भारतीय जनता पार्टी कार्यालय के सामने आत्मदाह और जान देने की घटनाओं को रोकने के लिए हर 10 कदम पर पुलिस लगा दी गई है.

पुलिस कमिश्नर सुजीत कुमार पांडेय बताते हैं, ‘इस क्षेत्र में आनेजाने वालों पर नजर रखी जा रही है. पुलिस के साथ अग्निशमन वाहन, आग बु झाने के उपकरण, कंबल और एंबुलैंस का इंतजाम किया गया है. इस के साथ ही सभी थानों को हाई अलर्ट भेजा गया है, जिस में आत्मदाह की धमकी देने वालों की सूचनाएं जमा करने और जरूरी कार्यवाही करने के लिए कहा गया है.’

विधानसभा भवन के सामने आत्मदाह जैसी घटनाओं को रोकने के लिए 18 पुलिस टीमों को तैनात किया गया है. इस के अलावा 50 कंबल, 15 अग्निशमन उपकरण, 4 दोपहिया वाहन, 3 चारपहिया वाहन, एक अग्निशमन वाहन और एक एंबुलैंस वाहन तैनात किया गया है.

विधानसभा भवन लखनऊ के चारबाग से हजरतगंज मुख्य मार्ग पर बना है. मुख्य सड़क मार्ग होने के चलते यहां पर यातायात खूब रहता है. अब यह मार्ग रात के समय बंद कर दिया गया है. सुबह 6 बजे से यह मार्ग यातायात के लिए खोला जाता है. शनिवार और रविवार को यह रास्ता पूरी तरह से बंद कर दिया गया है.

बढ़ रहा है असंतोष

वरिष्ठ पत्रकार योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, ‘सभी घटनाओं की विवेचना करें तो एक बात साफतौर पर दिखती है कि व्यवस्था के प्रति जनता में असंतोष बढ़ता जा रहा है. लोगों को सम झ नहीं आ रहा है कि वह किस से अपनी बात कहे. थानों में पुलिस अपनी मनमानी करती है. कई बार वह आरोपी के साथ मिल कर पीडि़त के ऊपर ही दबाव बनाने लगती है. अपराध की तमाम घटनाओं में यह बात सामने आती है.

‘उन्नाव के चर्चित रेप कांड, जिस में भाजपा के विधायक रहे कुलदीप सेंगर पर आरोप था, में भी जब उन्नाव की पुलिस ने लड़की की बात नहीं सुनी, तो लड़की ने मुख्यमंत्री आवास के पास आत्मदाह करने की कोशिश की थी. उस के बाद उस के मामले में पुलिस ने सुनवाई शुरू की थी.

‘ये घटनाएं देखदेख कर दूसरे परेशान लोगों को भी यही रास्ता आसान लगता है, जिस से ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं.’

4 पीएम अखबार के संपादक संजय शर्मा कहते हैं, ‘पुलिस नहीं सुनती तो लोग अपने जनप्रतिनिधियों, मंत्रियों, सांसद और विधायक के पास फरियाद ले कर जाते हैं. पिछले दिनों पीलीभीत के सांसद वरुण गांधी और उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्वास्थ्य राज्यमंत्री अतुल गर्ग के 2 फोन ओडियो वायरल हुए, जिन में उन्होंने पीडि़तों की बात नहीं सुनी. उन्हें बुराभला कहा. वे पीडि़त दोनों मामलों में अपने परिजनों के अस्पताल में भरती होने का दर्द बता कर मदद मांगने गए थे.

‘जब पीडि़त जनता की बात नहीं सुनी जाती तो उसे अपनी बात सुनवाने के लिए यह रास्ता ही दिखता है, जिस की वजह से इस तरह की घटनाएं बढ़ रही हैं.’

मनोविज्ञानी समाजसेवी डाक्टर मधु पाठक कहती हैं, ‘इस तरह के मामलों में जिस तरह से मीडिया रिपोर्टिंग करने लगी है, उस में भी संवदेनशीलता की जरूरत है. मीडिया का समाज पर बहुत असर पड़ता है. इन घटनाओं को देख कर लगता है कि अपनी बात सरकार तक पहुंचाने का यह सब से आसान रास्ता है.

‘अगर लोगों को शुरुआती लैवल पर सुन लिया जाए और परेशानी को दूर कर दिया जाए, तो लोग ऐसे कदम कम उठाएंगे.’

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