प्रोजैक्ट-भाग 1: समीर की शादी की दूसरी सालगिरह वाले दिन क्या हुआ

लेखक-पुखराज सोलंकी

शनिवार को ओवर टाइम करने के बावजूद भी समीर का काम पूरा नहीं हो पाया था. रविवार को छुट्टी थी और सोमवार को औफिस की मीटिंग में किसी भी हाल में उसे प्रोजैक्ट पेश करना था, इसलिए वह औफिस का काम घर पर ले आया था, ताकि कैसे भी कर के प्रोजैक्ट समय पर पूरा हो जाए.

लेकिन, घर पहुंचते ही उसे याद आया कि रविवार को वह अपनी पत्नी शालिनी के साथ फिल्म देखने जाने वाला है. और इस बार वह मना भी नहीं कर सकता था, क्योंकि अब की मैरिज एनिवर्सरी भी तो इसी रविवार को पड़ रही है.

पिछली बार की तरह इस बार वह अपने काम की वजह से शालिनी का मूड औफ नहीं करना चाहता था. रात के खाने के बाद वह शालिनी से यह कह कर अपने काम में जुट गया, ‘सौरी डियर.. आज थोड़ा काम निबटा लूं, कल पूरा दिन ऐंजौए करेंगे.‘

समीर के चेहरे पर काम का तनाव साफ झलक रहा था, जिसे चाह कर भी वह शालिनी से छुपा न सका. शालिनी उस की ओर करवट ले कर लेटी उसे देखती रही और लेटेलेटे कब उस की आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला.

अगले दिन सुबह जब शालिनी तैयार हो कर समीर के सामने आई, तो वह उस की तारीफ किए बिना नही रह सका. अभी उस की तारीफ खत्म भी नहीं हुई थी कि शालिनी ने अपनी बंद मुट्ठी समीर की ओर बढ़ाई. समीर ने उस का हाथ थाम कर बंद मुट्ठी की एकएक कर उंगली खोली और मुट्ठी में बंद चमकीली सिंदूरदानी अपने हाथ में ले कर शालिनी की मांग भरी और उसे अपनी बांहों में भर लिया.

इस दौरान शालिनी को भी न जाने क्या शरारत सूझी, वह उस की पीठ पर अपनी उंगली फिराते हुए बोली, ‘बताओ, मैं ने क्या लिखा है?‘

‘तुम्हारा नाम,‘ शालिनी को अपनी बांहों में कसते हुए समीर ने कहा.‘बिलकुल गलत. अच्छा चलो, दोबारा लिखती हूं, अब ठीक से बताना.‘शालिनी  फिर से समीर की पीठ पर उंगली से कुछ लिखने लगी. अपनी पीठ पर घूमती शालिनी की उंगली के साथसाथ समीर ने अपना दिमाग भी घुमाना शुरू किया और फिर तपाक से बोला, ‘आई लव यू.‘

सही जवाब पा कर शालिनी के चेहरे पर मुसकान फैल गई, ‘आई लव यू टू मेरी जान, चलो, अब जल्दी से तैयार हो जाओ. याद है न, आज हम लोग फिल्म देखने जाने वाले थे,‘ समीर को याद दिला कर शालिनी अपने काम में बिजी हो गई.

शालिनी चाहती तो आज फिल्म देखने का प्रोग्राम कैंसिल भी कर सकती थी. उस की कोई खास इच्छा नहीं थी फिल्म देखने की और न ही थिएटर में उस के पसंद की कोई मूवी लगी थी. उसे तो बस कैसे भी कर के इस बार यह खास दिन समीर के साथ बिताना था.

हालांकि शालिनी अच्छी तरह से जानती थी कि इस बार समीर के लिए यह प्रोजैक्ट कितना माने रखता है. लेकिन फिर भी उस ने समीर की मरजी देखनी चाही और चुप रही.

शालिनी यह सब सोच ही रही थी कि समीर तैयार हो कर उस के सामने आ खड़ा हुआ. वह समीर को अपलक देखती रही, समीर नीचे से ऊपर तक बिलकुल टिपटौप था. बस चेहरा थोड़ा उतरा हुआ था. तैयार होने बावजूद वह अपने चेहरे से काम का तनाव नहीं छुपा सका. अनमना सा समीर शालिनी को साथ ले कर चल पड़ा.

वहां थिएटर में पहुंच कर वे गाड़ी पार्क कर के अंदर की ओर जाने लगे कि वहां पार्किंग में पहले से खड़ी एक ब्लैक कार को देख कर समीर चैंक गया और बोला, ‘अरे, बौस की गाड़ी, मतलब, बौस भी फिल्म देखने आए हुए हैं.‘

‘इतना बड़ा शहर है, इस कंपनी और इस कलर की गाड़ी किसी और की भी तो हो सकती है, क्या नंबर याद है तुम्हें बौस की गाड़ी का?‘ शालिनी ने पूछा.

नंबर को सुनते ही समीर बोला, ‘खैर, छोड़ो जो होगा देखा जाएगा. दोनों आगे बढे़ और थिएटर में अपनी सीट पर जा कर बैठ गए. फिल्म शुरू हो चुकी थी. फिल्म का शुरुआती सीन ही इतना सस्पैंस भरा था कि समीर की उत्सुकता बढ़ गई और उस के चेहरे से काम का तनाव जाता रहा.

इंटरवल में जब वह स्नैक्स लेने कैंटीन पहुंचा, तो भीड़ में अपने कंधे पर अचानक किसी का हाथ पाया. उस ने पीछे मुड़ कर देखा तो वही हुआ जिस बात का अंदेशा था. उस का बौस सोमवार की मीटिंग में आने वाले उन दोनों अफसरों के साथ फिल्म देखने पहुंचा हुआ था.

‘क्या बात है समीर अकेलेअकेले, पहले पता होता तो तुम्हें भी साथ ले आते हम लोग,‘ बौस ने मुसकराते हुए कहा.‘नहीं सर, मैं अकेला नहीं शालिनी भी साथ में है, वह वहां बैठी है. वैसे, आज हमारी शादी की दूसरी सालगिरह है. बस इसीलिए फिल्म दिखाने ले आया.‘

‘ओहो… कांग्रेचुलेशन समीर. और हां, मैडम कहां है भई, आज तो उन्हें भी बधाई देनी बनती है,‘ बौस ने ठहाका लगाते हुए कहा.समीर अपने बौस और उस के साथ आए दोनों अफसरों को शालिनी के पास ले आया. सब ने शालिनी को बधाई दी.

‘क्या लेंगे सर आप लोग ठंडा या गरम?‘ समीर ने पूछा.‘भई, तुम्हारी शादी की सालगिरह है, सिर्फ इतने से काम नहीं चलने वाला पूरी पार्टी देनी होगी.’समीर ने पार्टी के लिए हां भरी, तभी फिल्म शुरू हो गई, तो सभी अपनीअपनी सीटों पर जा कर बैठ गए.

फिल्म के खत्म होने पर समीर ने शालिनी को कुछ शौपिंग कराई. शहर की कई फेमस जगहों पर घुमाया, वहां सेल्फियां लीं और घर लौटते हुए खाना उसी होटल में खाया, जहां वे शादी से पहले कई बार एकसाथ गए थे.

रात गहराने लगी थी. घर पहुंच कर समीर सीधे अपने काम में जुट गया. फिर से उस के चेहरे पर वही काम का तनाव देख शालिनी समझ गई. कपड़े चेंज कर वह भी उस की मदद करने की मंशा से पास आ कर बैठ गई. उस ने भी कुछ हाथ बंटाया और देर रात तक समीर के उस महत्वाकांक्षी प्रोजैक्ट को अंजाम तक पहुंचा ही दिया.

समीर अब काफी हलका महसूस कर रह था. उसे उम्मीद नहीं थी कि दिनभर की मौजमस्ती के बाद देर रात तक प्रोजैक्ट तैयार हो जाएगा. वह खुशी से उछल पड़ा. मदद के लिए शालिनी का शुक्रिया अदा करते हुए उसे अपनी बांहों में भर लिया.

शालिनी भी तो यही चाहती थी. उसे मालूम था कि जब तक काम पूरा नहीं होगा, समीर उस के पास नहीं आने वाला इसीलिए उस ने साथ लग कर उस के काम को अंजाम तक पहुंचाया.

‘थैंक यू सो मच डियर, तुम न होती तो सुबह हो जाती,‘ कहते हुए समीर ने शालिनी के गले पर नौनस्टोप एक बाद एक किस करने लगा.

शालिनी की सांसों की रफ्तार बढ़ने लगी. वह भी उस का साथ देते हुए बोली, ‘अब सुबह एकदूसरे की बांहों में ही होगी.‘ और समीर को कस कर अपनी बांहों में जकड़ लिया.

अगले दिन सुबह किचन में खटपट की आवाज से शालिनी की आंख खुली, तो चैंक गई. किचन में जा कर देखा तो हमेशा देर से उठने वाला समीर आज नहाधो कर नाश्ता बनाने लगा है.

‘क्यों मैडम पूरे 3 घंटे लेट उठी हो. लगता है, कल रात कुछ ज्यादा ही मेहनत कर ली थी,‘ शालिनी को देख कर समीर बोला.‘मेहनत न करती तो तुम्हारा प्रोजैक्ट कैसे पूरा होता.‘

‘मैं इस मेहनत की नहीं उस मेहनत की बात कर रहा हूं,‘ यह सुन कर शालिनी शरमा कर बाथरूम की ओर चल दी.जब तक वह बाहर निकली, तब तक समीर नाश्ता कर चुका था. और आज शाम थोड़ी देर से आने की कह कर वह औफिस के लिए निकल गया.

औफिस पहुंच कर जब उस ने मीटिंग में बौस के सामने अपना प्रोजैक्ट पेश किया, तो बौस ने बाहर से आए उन अफसरों के सामने उस प्रोजैक्ट को रखा.

कुछ देर की बातचीत, जांचपरख और नफानुकसान देखने के बाद समीर के उस महत्वाकांक्षी प्रोजैक्ट को सलैक्ट करने का डिसीजन ले लिया गया.

बौस ने उसे अगले ही दिन लखनऊ से नोएडा जाने का टिकट थमाते हुए कहा, ‘2 दिन बाद कंपनी के हैड औफिस नोएडा में एक मीटिंग है, जिस में तुम्हें देशविदेश से आए लोगों के सामने इसी प्रोजैक्ट को एक बार फिर से पेश करना होगा. यह लो टिकट. कल दोपहर 3 बजे की ट्रेन है. अब तो दोदो पार्टियां बनती हैं.‘

‘जी सर जरूर, लौट के आने पर 2 नहीं 4 पार्टियां दे दूंगा एकसाथ,‘ समीर खुशीखुशी बोला.घर पहुंच कर समीर ने शालिनी को यह खुशखबरी दी. इस प्रोजैक्ट में उस ने भी तो अपना सहयोग दिया था. यह सुन कर वह भी बहुत खुश हुई. समीर ने जब बताया कि कल वह 2 दिन के लिए दोपहर 3 बजे की ट्रेन से कंपनी के काम से नोएडा जा रहा है, इसलिए पैकिंग कर देना. तब से शालिनी पैकिंग में जुट गई.

अगले दिन समीर शालिनी को काम खत्म होते ही जल्द लौट आने का वादा कर के निश्चित समय पर स्टेशन की ओर घर से निकल गया.

Bigg Boss 14 Updates : कविता ने अली से कहा, वह गुस्से के मामले में उनकी बाप हैं!

छोटे पर्दे का सबसे विवादित शो बिग बौस 14 में (Bigg Boss 14) में लगातार महाट्विस्ट हो रहा है. जिससे दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा है. शो के बीते एपिसोड में आपने देखा कि कविता कौशिक (Kavita Kaushik) फिर से घर की कैप्टन बनीं और घर के कैप्टन होने के नाते वो अपने पावर का इस्तेमाल कर सकती हैं.

तो ऐसे में कविता कौशिक को बिग बौस (Bigg Boss) ने एक टास्क दिया था. जिसमें उनसे ये कहा गया था कि वह अपनी मर्जी से घर के ऐसे सदस्य का सामान जब्त कर सकती हैं जिसने घर में नियम तोडे़ हैं.
इसी टास्क के दौरान कविता कौशिक ने अली गोनी(Aly Goni) का सामान लेने की कोशिश की. तो वहीं अली गोनी, कविता कौशिक को रोकने लगे.

इसके बाद कविता उनपर भड़क गईं. इस दौरान अली और कविता के बीच जमकर लड़ाई हुईं. कविता कौशिक और एली गोनी के बीच तीखी बहस हुईं. दोनों ने एक-दूसरे को खूब खरी-खोटी सुनाई.

कविता ने अली से कहा कि वह गुस्से के मामले में उनकी बाप हैं. ये बात सुनकर अली गोनी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. और वो घर के सामान को तोड़ते हुए दिखाई दिए.

इतना ही नहीं अली गोनी जमकर कविता कौशिक को गालियां और अपशब्द कहे.अली गोनी की मनमानी की वजह से कविता के हाथ में चोट भी लग गई.

कविता अपने बारे में ऐसी बातें सुनकर काफी इमोशनल हो गई और उनकी आंखें भर आई. उन्होंने , निक्की तम्बोली से ये सारी बातें करते हुए फूट-फूट कर रोईं. तो उधर अली गोनी और जैस्मिन भसीन दोनों ही कविता कौशिक को इग्नोर करते दिखाई दिए.

अली गोनी और जैस्मिन भसीन के इस बर्ताव को देखकर फैंस ने सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा जाहिर किया हैं. फैंस ने सोशल मीडिया पर सोशल मीडिया पर अली गोनी और जैस्मिन भसीन को लेकर खूब कमेंट्स किए हैं.

एक यूजर ने सोशल मीडिया पर लिखा कि कविता शेरनी हैं. उनके सामने जैस्मिन और एली की एक भी नहीं चली. एली गोनी और जैस्मिन भसीन को शर्म आनी चाहिए. यहां तक कि घर में कविता ने इस लड़ाई को खुद खत्म करती दिखाई दी.

तो वहीं दूसरे यूजर ने लिखा कि जैस्मिन की वजह से घर के सभी सदस्य कविता कौशिक को टारगेट कर रहे हैं. पर कविता घर में स्ट्रॉग कंटेस्टेंट हैं. वह सबका सामना मजबूती के साथ करेंगी.

बिग बॉस 14 के अपकमिंग एपिसोड में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या बिग बौस हाउस में  कविता को घरवालों का सपोर्ट मिलेगा ?

डार्क 7 व्हाइट रिव्यू: सेक्स और गंदी गालियों की भरमार

रेटिंगः 1 स्टार

निर्माताः संजय वाधवा और कोमल वाधवा

निर्देशक सात्विक मोहंती

कलाकारः सुमित व्यास,निधि सिंह, जतिन शर्मा, कंुज आनंद,मध्ुारिमा राय, रायनू वर्मा,पंकित दवे, सत्यजीत राजपूत,संजय स्वराज, षेखर चैधरी, संजय बत्रा,मोनिका चैधरी व अन्य.

अवधिः बीस से बाइस मिनट के दस एपीसोड,कुल अवधि साढ़े तीन घंटे

ओटीटी प्लेटफार्म: जी 5 और आल्ट बालाजी पर एक साथ 24 नवंबर से

श्वेता व्रजपुरिया की किताब ‘‘डार्क व्हाइट’’पर निर्देशक सात्विक मोहंती एक पोलीटिकल मर्डर मिस्ट्ी वाली वेब सीरीज ‘डार्क 7 व्हाइट’लेकर आए हैं.यह सात दोस्तांे की कहानी है,सभी अपने बाकी के छह दोस्तांे को अपने अपने फायदे के लिए उपयोग करते हैं.

कहानीः

कहानी शुरू होती है जयपुर से,जब 2019 में राज्य के सबसे कम उम्र के युवा नेता युद्धवीर सिंह (सुमित व्यास) मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए ‘वन नेशन पार्टी’ दफ्तर के सामने इकट्ठा होते हैं,जहां उनके पुराने दोस्त व मंगेतर भी मौजूद हैं.शपथ ग्रहण समारोह के लिए युद्धवीर सिंह ख्ुाली जीप में रवाना होते हैं.उनके बगल में उनकी प्रेमिका डेजी(निधि सिंह) भी हैं.मगर शपथ ग्रहण समारोह में पहुॅचने से पहले ही रास्ते में उनकी हत्या हो जाती है.एसीपी अभिमन्यू सिंह(जतिन शर्मा)इसकी जांच शुरू करते हैं.शक के घेरे मंे युद्धवीर सिंह के कालेज के वक्त के छह दोस्त हैं,जो कि पिछले दस वर्ष से उनके साथ हैं.इनमें से डेजी उनकी मंगेतर व पूर्व मुख्यमंत्री भैरो राणा चैधरी( संजय स्वराज)की बेटी हैं.कुश लांबा(कंुज आनंद),योगेश कटारिया(शेखर चैधरी ), नीलांक्षी उर्फ नीलू(मोनिका चैधरी),ग्रेस्मिा( तान्या कालरा),धवल(रचित बहल),शशांक हैं.एक तरफ एसीपी अभिमन्यू सिंह अपने सहयोगी इंस्पेक्टर डागा (सत्यजीत राजपूत) के साथ मिलकर इसकी जांच कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ मृत युद्धवीर सिंह 2009 से अपने इन दोस्तांे और राज्य के मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा की कथा सुनाना शुरू करते हैं.परिणामतः कहानी 2009 और वर्तमान मंे बार बार आती जाती रहती है.

वास्तव में यह कहानी 2009 में जयपुर के केसीसी कालेज के ब्वॅाय होस्टल से शुरू होती है.जहां  प्रिंस युद्धवीर सिंह ने शराब व ड्ग्स की पार्टी दे रखी है.इस पार्टी में उसी कालेज की कुछ लड़कियंा भी हैं.एक कमरे में युद्धवीर सिंह,नीलांक्षी गर्ग उर्फ नीलू संग अभद्र व्यवहार करते हैं,वह किसी तरह से वहां से निकलती है और उसी वक्त उस कमरे में ताशी पहुॅचती है.ताशी और युद्धवीर सिंह हम बिस्तर होते हैं.उधर रास्ते में नीलू को इंस्पेक्टर अभिमन्यू सिंह मिलते हैं.और वह इंस्पेक्टर को लेकर होस्टल वापस आती हैं.होस्टल में एक कमरे के हालात समझकर इंस्पेक्टर पुलिस फोर्स बुला लेता है.इस बीच पिछले तीन वर्ष से काबिज काॅलेज के स्टूडंेट नेता कुश व योगेश, युद्धवीर से ऐसा करने से मना करता है.तब युद्धवीर उन दोनों को याद दिलाते हैं कि वह प्रिंस है और उसके दादा जी शमषेर सिंह (संजय बत्रा)महाराजा हंै.जबकि कुश व योगेश स्टूडेंट लीडर होने के साथ साथ राज्य के मुख्यमंत्री भैरो राणा(संजय स्वराज)के दाहिने हाथ हैं.यह जग जाहिर है.तभी कमरे में इंस्पेक्टर अभिमन्यू सिंह पहुॅचते हैं.और वह न सिर्फ युद्धवीर का थप्पड़ रसीद करते हंैं,बल्कि उन्हंे गिरफ्तार कर पुलिस स्टेशन ले जाने लगते हंै.पर कुश व योगेश ,इंस्पेक्टर ेसे बात कर मामला रफा दफा कर देते हैं.तब पहली बार युद्धवीर सिंह को अहसास होता है कि उसके दादा का महाराजा होने से ज्यादा ताकतवर यह छुटभैये कालेज के नेता हैं और उस वक्त वह नेता बनने तथा भैरो सिंह की तरह मुख्यमंत्री बनने का निर्णय कर लेते हैं.

उसके बाद युद्धवीर सिंह का वहशीपना, शातिर दिमाग लोगों के सामने आता है.उसकी हरकतंे देखकर लोग उसे राक्षस तक मान लेते हैं.युद्धवीर सिंह कालेज स्टूडेंट के नेता के लिए चुनाव मैदान में खड़े होते हैं.उनका दाहिना हाथ और घर का नौकर धवल उनके साथ है.यह सब मिलकर सबसे पहले कुश व योगेश के ‘गे’होने और दोनों के बीच पति पत्नी जैसे संबंध होने का वीडियो बना प्रचारित करते हैं.फिर अपनी एक प्रेमिका ताशी(मधुरिमा राॅय) को वह स्वीमिंग पुल मंे डुबाकर उसकी हत्या कर आरोप योगेश कटारिया पर लगा देते हैं.कुश उसे छुड़ाने के मुख्यमंत्री भैरांे से बात करता है,मुख्यमंत्री कह देते हैं कि वह कालेज की राजनीति में हस्तपक्षेप नहीं करेंगे.तब कुश,युद्धवीर सिंह से मदद माॅंगता है.युद्धवीर सिंह राजनीतिक चाल चलते हुए योगेश को छुड़वा देते हैं.उसके बाद कुश व योगश भी युद्धवीर के इशारे पर नाचने लगते हैं.इधर युद्धवीर के नाजायज रिश्ते नीलू संग बने हुए हैं.कुश व योगेश राजनीति के मूर्ख खिलाड़ी की तरह युद्धवीर को मुख्यमंत्री भैरो से मिला देते हैं.भैरौ उसे अपनी पार्टी की युवा शाखा से जोड़ देते हैं.फिर युद्धवीर,भैरो की बेटी डेजी पर डेरे डालने में सफल होते हैं.इसी बीच युद्धवीर के बच्चे की नीलू मां बनने वाली होती है.युद्धवीर व नीलू के जाल में फंसकर अस्पताल में धवल का नाम पिता के रूप में लिखा जाता है और बाद में युद्धवीर उस बच्चे को अयान नाम देकर गोद ले लेता है और  नीलू को अयान की आंटी बना देता है.डेजी संग सगाई के वक्त एक कमरे में भैरो की खुद ही हत्या कर युद्धवीर उसका आरोप नीलू पर लगाकर हमेषा के लिए उसे अपनी गूंगी गुलाम बना लेता है.और ख्ुाद भैरो की पार्टी का अध्यक्ष बन जाता है.डेजी उसके साथ है.पर डेजी को युद्धवीर का सच पता चल चुका है.कई घटनाएं घटती हैं और 2019 के चुनाव में युद्धवीर विजय हासिल कर मुख्यमंत्री बनने वाले हंै,पर शपथ ग्रहण से पहले ही उनकी हत्या हो जाती है.अब उसके सभी दोस्तों के पास उसकी हत्या करने की वजह मौजूद है.इंस्पेक्टर अभिमन्यू इन दस वर्षो में पदोन्नत होकर एसीपी बन चुके हैं और वही इस हत्या की जाॅंच करते हैं.इधर कुश लंाबा व डेजी मुामंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं.पर जो कुछ होता है,उससे कुत्सित राजनीति का अति गंदा चेहरा ही सामने आता है.

लेखनः

न कहानी का अता पता,न पटकथा का.अति घटिया लेखन.वेब सीरीज के शुरूआती एपीसोड मे युद्धवीर यानीकि अभिनेता सुमित व्यास का संवाद है-‘‘सपने और सेक्स दोनो में एक बात काॅमन होती है.अगर पूरे न हो तो आॅर्गेजम नहीं होती.’’इसी से अहसास हो जाता है कि लेखक की सोच क्या हैं?पूरी सीरीज के कंटेंट व कहानी का अहसास हो जाता है.पूरे दस एपीसोड में सिर्फ लिपलाॅप किसिंग/चुम्मा चाटी,सेक्स ,संभोग दृष्य,गंदी गालियों को जबरन ठूंसा गया है.संवाद के नाम पर सिर्फ गंदी गालियों की ही भरमार है.लड़के व लड़की सभी सिगरेट,ड्ग्स व शराब का सेवन करते ुहुए नजर आते हैं.क्या आज की युवा पीढ़ी के पास इसके अलावा कोई काम ही नही है?कम से कम हमें समाज में ऐसी युवा पीढ़ी का प्रतिशत न केबराबर ही नजर आता है.आखिर इस तरह की कहानी व दृष्य परोसने के पीछे निर्माता,निर्देशक व लेखक की मंशा क्या है?वह ख्ुाद क्या पाना चाहते हैं और किस तरह का समाज व देश बनाना चाहते हैं?

ताशी का किरदार निभा रही अभिनेत्री मधुरिमा राॅय काॅलेज के प्रांगण में लड़के व लड़कियों की भीड़ के सामने अपनी ‘‘ब्रा’’ निकालकर हवा में उछालते हुए ‘आजादी’का जयघोश करती है.उसके बाद वहां मौजूद सभी लड़कियां भी अपनी अपनी ‘‘ब्रा’’ निकालकर हवा में उछालकर ‘आजादी’ का जयघोश करती हैं.तो क्या ‘‘नारी स्वतंत्रता’’और ‘‘नारी सशक्तिकरण’‘, ‘‘ब्रा’’ को फेंकने में ही है.

कुछ सेक्स/संभोग दृष्य बहुत ही भद्दे ढंग से फिल्माए गए हैं.परिणामतः इसे परिवार के संग नही देखा जा सकता है.तो वहीं कहानी में कई जगह झोल है.कुछ चीजंे बहुत ही ज्यादा अस्पष्ट ढंग से घटित होती हैं.कहानी बार बार वर्तमान से अतीत में जाती रहती है.पर पटकथा लेखक की कमजोरी के चलते कुछ दृष्यों का दोहराव भी है.कई जगह दर्षक समझ नही पाता कि हो क्या रहा है.युद्धवीर सिंह के परिवार को सही ढंग से पेश नहीं किया गया.पारिवारिक रंजिश भी सही एंग से चित्रित न हो सकी.

फिल्मकार व लेखक ने लोकतंत्र व चुनाव पर भी कटाक्ष किया है.एक जगह एसीपी अभिमन्यू सिंह का यह संवाद-‘‘राजनीति में हादसे नहीं होते,मर्डर होते हैं.’’एक अन्य संवाद है-‘‘पोलीटिक्स एंड सेक्स डोन्ट गिव यू इंज्वाॅयमेंट अनलेस यू हैव आर्गेजम.’’

युद्धवीर बार बार कहता है- ‘‘पोलीटिक्स इज फक,डेमोक्रेसी इज मिथ.’

कहानी में ‘टर्न और ट्विस्ट’ भी शून्य ही हैं.कहानी राजस्थान की है.मगर राजस्थानी शब्द कहीं सुनायी नही देता.

इस वेब सीरीज में प्रतिभाशाली कलाकारों का जमघट होने के बावजूद अच्छी वेब सीरीज नही बन पायी.इसके लिए लेखक व निर्देशक दोनों ही दोषी हैं.क्यांेकि चरित्र चित्रण काफी कमजोर हैं.क्लायमेक्स जरुरत से ज्यादा कमजोर है.

निर्देशनः

बतौर निर्देशक सात्विक मोहंती की यह दूसरी वेब सीरीज है.पर पहले ओटीटी प्लेटफार्म पर आयी ैहै,जबकि उनकी पहली वेब सीरीज ‘राॅंची डायरी’अब तक रिलीज नहीं हुई है.निर्देशक के तौर पर वह अपना कोई प्रभाव नही छोड़ पाते.प्रचारित किया गया था कि यह पोलीटिकल थ्रिलर है,मगर इसमें राजनीतिक चालबाजियां नही है,सिर्फ महत्वाकंाक्षा की पूर्ति के लिए उठाए गए निम्नस्तर के कारनामे ही हैं.

अभिनयः

सुमित व्यास ने जिस तरह का अभिनय किया है,वह महज कैरीकेचर के अलावा कुछ नही है. उनकी परफार्मेंस बहुत ही ज्यादा निराशाजनक है. युद्धवीर सिंह का किरदार पहले पांच एपीसोड तक बड़ी लंबी दाढ़ी और बड़े लंबे बालांे के गेटअप में है और छठे एपीसोड के बाद लुक बदल जाता है.पांचवे एपीसोड तक अपरिपक्व राजनेता,वहषी और राक्षस की तरह युद्धवीर नजर आते है.यदि यह कहा जाए कि पहले पांच एपीसोड तक तो वह फिल्म‘कबीर सिंह’और ‘उल्टा पंजाब’के शाहिद कपूर के किरदारों की नकल करते हुए नजर आते हैं,तो गलत नही होगा.इस सीरीज को देखकर अहसास होता है कि सुमित व्यास खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं.यही वजह है कि ‘रिबन’में हीरो बनकर आने के बाद उन्हे किसी भी फिल्म में हीरो बनने का मौका नही मिला.इस वेब सीरीज में उनका अभिनय पूरी तरह से नकली है.जबकि हमें पता है कि सुमित व्यास  हैंडसम होने के साथ ही बेहतरीन अभिनेता व बेहतरीन लेखक भी हैं, उसके बाद भी वह‘डार्क 7 व्हाइट’ जैसी वेब सीरीज करने के लिए तैयार होते हैं,तो इसे क्या कहा जाए? इससे एक ही बात समझ मंे आती है कि इस तरह वह अपने कैरियर को तबाह करने पर तुले हुए हैं.

पुलिस इंस्पेक्टर के किरदार में जतिन शर्मा शुरूआत में अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं,मगर एसीपी बनते ही उनका अभिनय भी खराब हो जाता है.

डेजी के किरदार में निधि सिंह ने काफी सधा हुआ अभिनय किया है.यह अलग बात है कि लेखक व निर्देशक ने उनके किरदार को ज्यादा तवज्जो नहीं दी है.ग्रेस्मा के किरदार में तान्या कालरा ने ठीक ठाक परफार्म किया है.

शादी से पहले मैं अपने प्रेमी के साथ सेक्स कर चुकी हूं, क्या मेरे पति को इस बार में पता चल जाएगा?

सवाल

मैं 23 साल की हूं और शादी से पहले हमबिस्तरी कर चुकी हूं. मेरे प्रेमी ने मुझे छोड़ कर दूसरी लड़की से शादी कर ली है. मैं भी उसे भूल चुकी हूं. क्या शादी के बाद मेरे पति को मेरे पहले से हमबिस्तरी करने का पता चल जाएगा?

जवाब

आप बेझिझक शादी करें और अपने पति को प्रेमी के साथ बने संबंधों के बारे में भूल कर भी न बताएं. मर्द को प्यार करने वाली, घर संभालने वाली बीवी चाहिए होती है, उस का इतिहास नहीं. द्य मैं 4 सालों से एक लड़के से प्यार करती हूं, पर वह मुझे अपनी बैस्ट फ्रैंड ही मानता है. उसे मेरे प्यार का पता है, पर वह उसे स्वीकार नहीं करता. मुझे क्या करना चाहिए? आप को उस से प्यार का नाता तोड़ लेना चाहिए. बस, अच्छी जानपहचान बनी रहने दें.

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इन वजहों से होता है कमर दर्द, ऐसे मिलेगा छुटकारा

बढती उम्र अपने साथ कई तरह की शारीरिक बिमारियां और दर्द साथ लेकर आती है इनमें जो सबसे भयानक और आम दर्द होता है वो है कमर दर्द. वैसे कमर दर्द से कोई भी प्रभावित हो सकता है. हमारे दिनचर्या में आधुनिकरण इतना हावी हो गया कि युवा वर्ग भी इससे अछूता नहीं है. लेकिन प्राय: बढ़ती उम्र और औरतों के साथ यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है. यह ऐसी समस्या है जो लम्बे समय तक बनी रहती है और इससे पूरी तरह से छुटकारा पाना मुश्किल होता है. लेकिन अब आपको चिन्ता करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आज हम आपको इसका सटीक हल बताने जा रहे हैं जिसका इस्तेमाल करके आप कमर दर्द पर नियंत्रण ही नहीं बल्कि हमेशा हमेशा के लिए छुटकारा पा सकती हैं.

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कमर दर्द होने का कारण

शरीर में वजन का बढ़ना

अगर आपके शरीर का वजन बढ़ गया है तो आपको कमर दर्द की समस्या हो जाती है क्योंकि जब आपके शरीर का वजन बढ़ता है तो इसका आधे से ज्यादा भार आपकी कमर पर होता है.

भारी वजन उठाना

भारी वजन उठाने पर भी ये समस्या पैदा हो सकती है. इसलिए आपके पास जितना वजन उठाने की क्षमता है उतना ही उठाएं.

गलत तरीके से सोना

जब कभी आप सोते वक्त ऐसी पोजीशन में आ जाती हैं जो आपके शरीर के उल्टी दिशा में होता है. सोने का यह गलत तरिका आपको कमर दर्द की समस्या से पीड़ित कर सकती है.

अश्लीलता: डांस गुरु के कारनामे

सौजन्य- सत्यकथा

आज आपको छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एक ऐसे डांस गुरु की सच्ची कहानी बताते हैं जो डांस सिखाने के आड़ में अपनी ही शियाओं के साथ अश्लील हरकतें करता और उनके वीडियो बना लेता. पुलिस ने डांस गुरु को गिरफ्त में लेकर जेल दाखिल कर दिया है. दरअसल, अक्सर सुनने को मिलता है कि फलां युवक ने फलां युवती अथवा महिला का अंतरंग समय में, अथवा नहाते वीडियो बना लिया. और आगे चलकर पकड़ा गया या फिर ब्लैक मेलिंग भय दोहन पर उतर आया.

सोशल मीडिया और आधुनिक टेक्नोलॉजी के इस समय काल में यह सब सामान्य घटनाक्रम जैसा बन गया है . मगर इस संपूर्ण घटनाक्रम के पीछे के अपराधिक मनोविज्ञान को समझना और इससे अपने आप को बचाव करते हुए सुखमय जीवन व्यतीत करना एक महत्वपूर्ण विषय है.

आज हम इस पेचीदा मसले पर महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए यह बताना चाहते हैं कि इन दिनों युवतियों के वीडियो बनाने के अनेक प्रकरण सामने आ चुके हैं, और लगातार आ रहे हैं. ऐसे में आवश्यकता है समझदारी और सामान्य जानकारी गांठ बांध कर रखने की. अगर आप अपनी आंखें और दिमाग खुला रखेंगी तो आने वाली इस विपत्ति से आसानी से बच सकती हैं. यहां हम आपको कुछ ऐसी घटनाएं बता रहे हैं जो यह इंगित करती है कि युवती और महिलाओं की थोड़ी सी लापरवाही किस तरह उन्हें परेशानी में डालती है. “और थोड़ी सी समझदारी” किस तरह उन्हें भविष्य के संकट से बचाती है. ऐसे ही एक अन्य घटनाक्रम में…

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक सांसद के रसोइये ने पास के एक मकान में रहने वाली महिला का छुपकर वीडियो बना लिया यह घटनाक्रम पकड़ में आने के बाद सुर्खियों का विषय बन गया.
राजधानी रायपुर में ही एक दूसरे घटना क्रम में टिकरापारा सुदामा नगर में युवती का बाथरुम में नहाते वक्त एमएमएस बनाकर वीडियो वायरल करने की धमकी देकर रेप करने का मामला प्रकाश में आया है. आरोपी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. आरोपी युवक का नाम आशीष राजपूत है. पुलिस बताती है – आरोपी आशीष राजपूत 24 वर्षीय शादीशुदा युवती का वीडियो बनाकर वायरल करने की धमकी देकर लगातार रेप करता था. बीती रात महिला ने पति के साथ पुलिस थाने पहुंचकर मामले की शिकायत दर्ज कराई. अप पुलिस ने युवक को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया. ऐसी अनेक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि अश्लील वायरल वीडियो करने का यह खेल आधुनिक समय का एक बड़ा अपराध बनकर सामने आया है.

अंतरंग वीडियो बनाने का “खेला”

पूर्व में मानसिक रूप से अपंग लोग अक्सर युवतियों और महिलाओं का अंतरंग समय का फोटोग्राफ्स खींचकर भय दोहन ब्लैकमेलिंग का काम किया करते थे जो आज आधुनिक समय में मोबाइल अथवा छुपे हुए कैमरे से वीडियो बनाकर पूर्ण किया जा रहा है. अक्सर इस तरह की घटना पढ़ने सुनने को मिलती है-

पहला प्रसंग-
रायपुर के पंडरी क्षेत्र में एक कपड़े दुकान में जब महिला कपड़े चेंज करने गई तो देखा कि वहां छुपा हुआ कैमरा है. महिला ने पुलिस बुलाई तो मामले का खुलासा हुआ दुकानदार पर हुआ मामला दर्ज.
दूसरा प्रसंग- महिला नहा रही थी तो उसने देखा खिड़की से कोई कैमरा लेकर उसका फोटो खींच रहा है महिला ने हल्ला मचाया तब उस युवक को पकड़ा गया.

तीसरा प्रसंग-
एक युवक ने युवती का छुपकर अंतरंग समय का वीडियो बना लिया और उसे ब्लैकमेल करते हुए संबंध बनाने का दबाव बना उसकी अस्मत लूट ली

इस तरह की अनेक घटनाएं घटित हो रही हैं और लोग पकड़े भी जा रहे हैं. पुलिस कार्रवाई कर रही है मगर इसके बावजूद घटनाएं कम होने की जगह बढ़ते चली जा रही है जो यह इंगित करता है कि आपको स्वयं सतर्क और सजग रहना होगा.

अश्लीलता की सारी हदें पार !

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के पंडरी इलाके के वीआईपी स्टेट में रहने वाली सराफाकर्मी को परेशान करने के लिए एक युवक ने अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी. शहर के कचना हाउसिंग बोर्ड के डांस गुरु ने युवती के मोबाइल पर अश्लील वीडियो की झडी लगा दी. सराफाकर्मी युवती ने आरोपी को मना किया तो फोन करके परेशान करने लगा. बार-बार समझाइस के बाद जब नहीं माना तो युवती ने मामले की शिकायत पर पुलिस से की. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में लेकर जेल दाखिल करवा दिया. दरअसल, वह अलग-अलग नंबरों से अश्लील वीडियो भेजता रहा.

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पंडरी टीआई ने बताया कि वीआईपी स्टेट पंडरी में रहने वाली सराफा कर्मी ने शिकायत की थी, कि अलग-अलग नंबरों से उसके वीडियो आ रहे है.

जब भी नंबरों पर कॉल करते है तो कॉलर गंदी-गंदी बात करता है.युवती की शिकायत पर नंबरों के आधार पर पुलिस ने आरोपी को पकड़ा तो पुलिस की पूछताछ में आरोपी ने अपना नाम हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी कचना निवासी डांस गुरू कुमार मनोज बताया. आरोपी के फोन से पुलिसकर्मियों ने युवती का नंबर और उसे भेजे गए वीडियो का स्क्रीन शॉट जब्त किया है. आरोपी युवक पर धारा 509 ख के तहत पुलिसकर्मियों ने कार्रवाई की है

दरअसल सेक्स के मनोरोगी का मनोविज्ञान बताता है. यह घटनाक्रम यह स्पष्ट करता है कि इस तरह युवतियां और महिलाएं सेक्स के मनोरोगी की आंतरिक बीमारी का शिकार होकर परेशान होती है. अक्सर उन्हें कोई मदद नहीं मिल पाती और जानकारी के अभाव में पुलिस और कानून से सहयोग नहीं लेकर अपना जीवन दुश्वार बना लेती हैं.

पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा के मुताबिक महिलाओं को ऐसे विषम समय में निर्भीक होकर पुलिस की सहायता लेनी चाहिए और संपूर्ण घटनाक्रम को बताना चाहिए दोषी आरोपी को जेल के सींखचों में भेजा जा सके. वही डांस गुरु कुमार मनोज की शिकार बनी युवती ने हमारे संवाददाता को बताया मुझे यह डांस गुरु मनो रोगी जान पड़ता है इसे मैंने समझाने का प्रयास किया था मगर वह किसी भी स्थिति में समझने को तैयार नहीं था इसलिए मुझे पुलिस में शिकायत करनी पड़ी.

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एक कुत्ते की मौत: युवती के फांसी लगाने का मनोविज्ञान

जी हां! यह एक सच्ची घटना है. छत्तीसगढ़ के आदिवासी बाहुल्य जिला रायगढ़ में घटित घटना सौ फीसदी सच है. मामला पुलिस जांच में है इसलिए जो तथ्य सामने आए हैं उनकी बिनाह पर कहा जा सकता है कि एक युवती ने सचमुच अपने कुत्ते, जिसे वह “बाबू” कह कर पुकारती थी,की मौत के बाद अवसाद ग्रस्त होकर फांसी लगा आत्महत्या कर ली.

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला के गोरखा गांव निवासी दिलीप सिंह ने लगभग चार वर्ष पहले घर में एक कुत्ता लाया था. विगत दिनों कुछ दिनों की बीमारी के पश्चात कुत्ते की मृत्यु हो गई . इधर पालतू कुत्ते बाबू की मौत से दु:खी होकर युवती फांसी पर चढ़ गई. इस घटनाक्रम के पश्चात लोगों में यह जन चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग चकित हैं. रायगढ़ जिले के पुलिस कप्तान संतोष सिंह ने बताया कि जिले के कोतरा रोड थाना क्षेत्र के अंतर्गत गोरखा गांव में पालतू कुत्ते की मौत से दुखी 21 वर्षीय प्रियांशु सिंह ने फांसी लगाकर कथित तौर पर आत्महत्या कर ली. प्रियांशु स्थानीय महाविद्यालय में एम कॉम की छात्रा थी.

पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पुलिस को युवती की आत्महत्या की जानकारी मिली तब गोरखा गांव के लिए पुलिस दल रवाना किया गया तथा शव बरामद किया गया. ग्राम गोरखा गांव निवासी दिलीप सिंह के द्वारा करीब चार वर्ष पहले एक कुत्ता पाला गया था. इस दौरान युवा होती युवा होती प्रियांशु सिंह का अपने घरेलू पालतू कुत्ते से स्नेह बढ़ता चला गया और जब वह बिमार हुआ तब भी प्रियांशु बहुत दुखी रहा करती थी मगर किसी ने यह नहीं सोचा था कि कुत्ते की मौत के बाद प्रियांशु ऐसा सख्त कदम भी उठा सकती है. दरअसल, अक्सर इस तरह की घटनाएं घटती हैं मगर यह घटनाएं दुर्लभ होती हैं. ऐसे में आज हमारे इस लेख का विषय यह है कि इस घटनाक्रम के पीछे आखिर मनोविज्ञान क्या होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है.

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हम साथ साथ हैं!

रायगढ़ जिला के पुलिस अधीक्षक संतोष सिंह ने हमारे संवाददाता को जानकारी दी कि दिलीप सिंह की बेटी प्रियांशु कुत्ते बाबू की खुद देखभाल करती थी और कुत्ता अक्सर प्रियांशु के साथ ही रहता था. उन्होंने बताया कि लगभग 12 दिनों तक बीमार रहने के बाद विगत दिनों कुत्ते की मृत्यु हो गई . पालतू कुत्ते की अप्रत्याशित मौत का सदमा संभवतः प्रियांशु सिंह बर्दाश्त नहीं कर पाई अपने पालतू कुत्ते की मौत से प्रियांशु दु:खी थी. घटना दिवस सुबह सात बजे जब घर के सदस्य कुत्ते के शव को दफनाने की तैयारी कर रहे थे तब उन्होंने प्रियांशु को वहां नहीं देखा. बाद में जब परिजन प्रियांशु के कमरे में पहुंचे तब उन्होंने उसके शव को एक गंमछे से फांसी पर लटकते हुए पाया.

आत्महत्या की पालतू कुत्ते बाबू के साथ थ्योरी इसलिए पुलिस और लोग सच मान रहे हैं क्योंकि
घटनास्थल से एक पत्र बरामद किया है जिसमें प्रियांशु ने कहा है- वह बाबू( कुत्ते) की मौत से दु:खी है और उसने अपने शव को कुत्ते के साथ दफनाने का अनुरोध किया है.

इस संपूर्ण घटनाक्रम के पश्चात स्पष्ट हो जाता है कि प्रियांशु सिंह अपने पालतू कुत्ते बाबू के साथ कितना घुल मिल चुकी थी.

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आत्महत्या का मनोविज्ञान

पुलिस ने युवती के शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया है तथा मर्ग कायम कर लिया गया है. प्रियांशु के परिजन बताते हैं बाबू (कुत्ते) के शव को प्रियांशु की अंतिम इच्छा के अनुसार दफनाया गया है. वहीं डॉक्टर जी. आर. पंजवानी ऐसी “आत्महत्याओं” के मनोविज्ञान के बारे में बताते हुए कहते हैं- दरअसल यह किशोर अवस्था की एक ग्रंथि है जिसमें कोमल मन के साथ किशोर मन अपने आसपास के पशुओं आदि के साथ इतना आत्मीय हो जाता है कि उन्हें अगर कुछ हो जाए तो जीवन निरर्थक लगने लगता है ऐसे संक्रमण समय में परिजनों को चाहिए कि उन्हें ढाढस बंधाते हुए उन पर निगाह रखें. प्रियांशु सिंह मामले में भी अगर परिजन होश मंदी के साथ काम लेते तो शायद यह बड़ी घटना घटित होने से रह जाती. वहीं डॉक्टर आशीष अग्रवाल के मुताबिक ऐसी घटना दुर्लभ ही घटित होती है मगर यह सच है कि जब घर के पालतू पशु से अत्यधिक आत्मीयता लगा हो जाता है तो भावुक मन के लोग आत्महत्या का कदम उठा लेते हैं. ऐसे में यही सलाह दी जा सकती है कि घर की बड़े बुजुर्गों को विशेष रूप से बच्चों और युवाओं को समझाइश देते रहना चाहिए.

अंतत -भाग 3: जीत किस की हुई

पत्र पढ़ कर ताऊजी वितृष्णा से हंस पड़े थे और व्यंग्यात्मक स्वर में कहा था, ‘देखा रघुवीर, सुन लो मां, तुम्हारे दामाद ने कैसा आदर्श बघारा है. चोर कहीं का. आखिर उस ने सचाई स्वीकार कर ही ली. लेकिन अब भी अपनेआप को हरिश्चंद्र साबित करने से बाज नहीं आया.’

पिताजी इस घटना से और भी भड़क उठे थे. उन्होंने उसी दिन आंगन में सब के सामने कसम खाई थी कि ऐसे जीजा का वे जीवनभर मुंह नहीं देखेंगे. न ही ऐसे किसी व्यक्ति से कोई संबंध रखेंगे, जो उस शख्स से जुड़ा हुआ हो, फिर चाहे वह उन की बहन ही क्यों न हो.

बूआ न केवल फूफाजी से जुड़ी हुई थीं बल्कि वे उन का एकमात्र संबल थीं. उस के बाद वास्तव में ही पिताजी फूफाजी का मुंह न देख सके. वे यह भी भूल गए कि उन की कोई बहन भी है. उन्होंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वे लोग कहां हैं, किस हालत में हैं.

इधर ताऊजी ने बिलकुल ही नए क्षेत्र में हाथ डाला और अपना एक पिं्रटिंग प्रैस खोल लिया. शुरू में एक साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ. बहुत समय तक ऐसे ही चला, किंतु धीरेधीरे पत्रिका का प्रचारप्रसार बढ़ने लगा. कुछ ही वर्षों में उन के प्रैस से 1 दैनिक, 2 मासिक और 1 साप्ताहिक पत्रिका का प्रकाशन होने लगा. ताऊजी की गिनती सफल प्रकाशकों में होने लगी. किंतु जैसेजैसे संपन्नता बढ़ी, वे खुद और उन का परिवार भौतिकवादी होता चला गया. जब उन्हें यह घर तंग और पुराना नजर आने लगा तो उन्होंने शहर में ही एक कोठी ले ली और सपरिवार वहां चले गए.

इस बीच बहुतकुछ बदल गया था. मैं और भैया जवान हो गए थे. मां, पिताजी ने बुढ़ापे की ओर एक कदम और बढ़ा दिया. दादी तो और वृद्ध हो गई थीं. सभी अपनीअपनी जिंदगी में इस तरह मसरूफ हो गए कि गुजरे सालों में किसी को बूआ की याद भी नहीं आई.

पिताजी ने बूआ से संबंध तोड़ लिया था, लेकिन दादी ने नहीं, इस वजह से पिताजी, दादी से नाराज रहते थे और शायद इसीलिए दादी भी बेटी के प्रति अपनी भावनाओं का खुल कर इजहार न कर सकती थीं. उन्हें हमेशा बेटे की नाराजगी का डर रहा. बावजूद इस के, उन्होंने बूआ से पत्रव्यवहार जारी रखा और बराबर उन की खोजखबर लेती रहीं. बूआ के पत्रों से ही दादी को समयसमय पर सारी बातों का पता चलता रहा.

फूफाजी ने अहमदाबाद जाने के बाद अपने मित्र के सहयोग से नया व्यापार शुरू कर दिया था. लेकिन काम ठीक से जम नहीं पाया. वे अकसर तनावग्रस्त और खोएखोए से रहते थे. बूआ ने एक बार लिखा था, ‘बदनामी का गम उन्हें भीतर ही भीतर खोखला किए जा रहा है. वे किसी भी तरह इस सदमे से उबर नहीं पा रहे. अकेले में बैठ कर जाने क्याक्या बड़बड़ाते रहते हैं. समझाने की बहुत कोशिश करती हूं, पर सब व्यर्थ.’

कुछ समय बाद बूआ ने लिखा था, ‘उन की हालत देख कर डर लगने लगा है. उन का किसी काम में मन नहीं लगता. व्यापार क्या ऐसे होता है. पर वे तो जैसे कुछ समझते ही नहीं. मुझ से और बच्चोें से भी अब बहुत कम बोलते हैं.’

बूआ को भाइयों से एक ही शिकायत थी कि उन्होंने मामले की गहराई में गए बिना बहुत जल्दी निष्कर्ष निकाल लिया था. यदि ईमानदारी से सचाई जानने की कोशिश की गई होती तो ऐसा न होता और न वे (फूफाजी) इस तरह टूटते.

बूआ के दर्दभरे पत्र दादी के मर्म पर कहीं भीतर तक चोट कर जाते थे. मन की घनीभूत पीड़ा जबतब आंसू बन कर बहने लगती थी. कई बार मैं ने स्वयं दादी के आंसू पोंछे. मैं समझ नहीं पाती कि वे इस तरह क्यों घुटती रहती हैं, क्यों नहीं बूआ के लिए कुछ करतीं? यदि फूफाजी निर्दोष हैं तो उन्हें किसी से भी डरने की क्या आवश्यकता है?

लेकिन मेरी अल्पबुद्धि इन प्रश्नों का उत्तर नहीं ढूंढ़ पाती थी. बूआ के पत्र बदस्तूर आते रहते. उन्हीं के पत्रों से पता चला कि फूफाजी का स्वास्थ ठीक नहीं चल रहा. वे अकसर बीमार रहे और एक दिन उसी हालत में चल बसे.

फूफाजी क्या गए, बूआ की तो दुनिया ही उजड़ गई. दादी अपने को रोक नहीं पाईं और उन दुखद क्षणों में बेटी के आंसू पोंछने उन के पास जा पहुंचीं. जाने से पूर्व उन्होंने पिताजी से पहली बार कहा था, ‘जिसे तू अपना बैरी समझता था वह तो चला गया. अब तू क्यों अड़ा बैठा है. चल कर बहन को सांत्वना दे.’

मगर पिताजी जैसे एकदम कठोर और हृदयहीन हो गए थे. उन पर दादी की बातों का कोई प्रभाव न पड़ा. दादी क्रोधित हो उठीं. और उस दिन पहली बार पिताजी को खूब धिक्कारा था. इस के बाद दादी को ताऊजी से कुछ कहने का साहस ही नहीं हुआ था.

बूआ ने भाइयों के न आने पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. उन्होंने सारे दुख को पी कर स्वयं को कठोर बना लिया था. पति की मौत पर न वे रोईं, न चिल्लाईं, बल्कि वृद्ध ससुर और बच्चों को धीरज बंधाती रहीं और उन्हीं के सहयोग से सारे काम निबटाए. बूआ का यह अदम्य धैर्य देख कर दादी भी चकित रह गई थीं, साथ ही खुश भी हुईं. फूफाजी की भांति यदि बूआ भी टूट जातीं तो वृद्ध ससुर और मासूम बच्चों का क्या होता?

फूफाजी के न रहने के बाद अकेली बूआ के लिए इतने बड़े शहर में रहना और बचेखुचे काम को संभालना संभव न था. सो, उन्होंने व्यवसाय को पति के मित्र के हवाले किया और स्वयं बच्चों को ले कर ससुर के साथ गांव चली गईं, जहां अपना पैतृक मकान था और थोड़ी खेतीबाड़ी भी.

बूआ को पहली बार मैं ने तब देखा था जब वे 3 वर्ष पूर्व ताऊजी के निधन का समाचार पा कर आई थीं, हालांकि उन्हें बुलाया किसी ने नहीं था. ताऊजी एक सड़क दुर्घटना में अचानक चल बसे थे. विदेश में पढ़ रहे उन के बड़े बेटे ने भारत आ कर सारा कामकाज संभाल लिया था.

दूसरी बार बूआ तब आईं जब पिछले साल समीर भैया की शादी हुई थी. पहली बार तो मौका गमी का था, लेकिन इस बार खुशी के मौके पर भी किसी को बूआ को बुलाना याद नहीं रहा, लेकिन वे फिर भी आईं. पिताजी को बूआ का आना अच्छा नहीं लगा था. दादी सारा समय इस बात को ले कर डरती रहीं कि बूआ की घोर उपेक्षा तो हो ही रही है, कहीं पिताजी उन का अपमान न कर दें. लेकिन जाने क्या सोच कर वे मौन ही रहे.

पिताजी का रवैया मुझे बेहद खला था. बूआ कितनी स्नेहशील और उदार थीं. भाई द्वारा इतनी अपमानित, तिरस्कृत हो कर क्या कोई बहन दोबारा उस के पास आती, वह भी बिन बुलाए. यह तो बूआ की महानता थी कि इतना सब सहने के बाद भी उन्होंने भाई के लिए दिल में कुछ नहीं रखा था.

चलो, मान लिया कि फूफाजी ने पिताजी के साथ विश्वासघात किया था और उन्हें गहरी चोट पहुंची थी, लेकिन उस के बाद स्वयं फूफाजी ने जो तकलीफें उठाईं और उन के बाद बूआ और बच्चों को जो कष्ट झेलने पड़े, वे क्या किसी भयंकर सजा से कम थे. यह पिताजी की महानता होती यदि वे उन्हें माफ कर के अपना लेते.

अब जबकि बूआ ने बेटी की शादी पर कितनी उम्मीदों से बुलाया है, तो पिताजी का मन अब भी नहीं पसीज रहा. क्या नफरत की आग इंसान की तमाम संवेदनाओं को जला देती है?

दादी ने उस के बाद पिताजी को बहुतेरा समझाने व मनाने की कोशिशें कीं. मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात. विवाह का दिन जैसेजैसे करीब आता जा रहा था, दादी की चिंता और मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी.

ऐसे में ही दादी के नाम बूआ का एक पत्र आ गया. उन्होंने भावपूर्ण शब्दों में लिखा था, ‘अगले हफ्ते तान्या की शादी है. लेकिन भैया नहीं आए, न ही उन्होंने या तुम ने ऐसा कोई संकेत दिया है, जिस से मैं निश्चिंत हो जाऊं. मैं जानती हूं कि तुम ने भैया को मनाने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी होगी, मगर शायद इस बार भी हमेशा की तरह मेरी झोली में भैया की नफरत ही आई है.

‘मां, मैं भैया के स्वभाव से खूब परिचित हूं. जानती हूं कि कोई उन के फैसले को नहीं बदल सकता. पर मां, मैं भी उन की ही बहन हूं. अपने फैसले पर दृढ़ रहना मुझे भी आता है. मैं ने फैसला किया है कि तान्या का कन्यादान भैया के हाथों से होगा. बात केवल परंपरा के निर्वाह की नहीं है बल्कि एक बहन के प्यार और भांजी के अधिकार की है. मैं अपना फैसला बदल नहीं सकती. यदि भैया नहीं आए तो तान्या की शादी रुक जाएगी, टूट भी जाए तो कोई बात नहीं.’

पत्र पढ़ कर दादी एकदम खामोश हो गईं. मेरा तो दिमाग ही घूम गया. यह बूआ ने कैसा फैसला कर डाला? क्या उन्हें तान्या दीदी के भविष्य की कोई चिंता नहीं? मेरा मन तरहतरह की आशंकाओं से घिरने लगा.

आखिर में दादी से पूछ ही बैठी, ‘‘अब क्या होगा, बूआ को ऐसा करने की क्या जरूरत थी.’’

‘‘तू नहीं समझेगी, यह एक बहन के हृदय से निकली करुण पुकार है,’’ दादी द्रवित हो उठीं, ‘‘माधवी आज तक चुपचाप भाइयों की नफरत सहती रही, उन के खिलाफ मुंह से एक शब्द भी नहीं निकाला. आज पहली बार उस ने भाई से कुछ मांगा है. जाने कितने वर्षों बाद उस के जीवन में वह क्षण आया है, जब वह सब की तरह मुसकराना चाहती है. मगर तेरा बाप उस के होंठों की यह मुसकान भी छीन लेना चाहता है. पर ऐसा नहीं होगा, कभी नहीं,’’ उन का स्वर कठोर होता चला गया.

दादी की बातों ने मुझे अचंभे में डाल दिया. मुझे लगा उन्होंने कोई फैसला कर लिया है. किंतु उन की गंभीर मुखमुद्रा देख कर मैं कुछ पूछने का साहस न कर सकी. पर ऐसा लग रहा था कि अब कुछ ऐसा घटित होने वाला है, जिस की किसी को कल्पना तक नहीं.

शाम को पिताजी घर आए तो दादी ने बूआ का पत्र ला कर उन के सामने रख दिया. पिताजी ने एक निगाह डाल कर मुंह फेर लिया तो दादी ने डांट कर कहा, ‘‘पूरा पत्र पढ़, रघुवीर.’’

पिताजी चौंक से गए. मैं कमरे के दरवाजे से सटी भीतर झांक रही थी कि पता नहीं क्या होने वाला है.

पिताजी ने सरसरी तौर पर पत्र पढ़ा और बोले, ‘‘तो मैं क्या करूं?’’

‘‘तुम्हें क्या करना चाहिए, इतना भी नहीं जानते,’’ दादी के स्वर ने सब को चौंका दिया था. मां रसोई का काम छोड़ कर कमरे में चली आईं.

‘‘मां, मैं तुम से पहले भी कह चुका हूं.’’

‘‘कि तू वहां नहीं जाएगा,’’ दादी ने व्यंग्यभरे, कटु स्वर में कहा, ‘‘चाहे तान्या की शादी हो, न हो…वाह बेटे.’’

क्षणिक मौन के बाद वे फिर बोलीं, ‘‘लेकिन मैं ऐसा नहीं होने दूंगी. मैं आज तक तेरी हठधर्मिता को चुपचाप सहती रही. तुम दोनों भाइयों के कारण माधवी का तो जीवन बरबाद हो ही गया, पर मैं तान्या का जीवन नष्ट नहीं होने दूंगी.’’

दादी का स्वर भर्रा गया, ‘‘तेरी जिद ने आज मुझे वह सब कहने पर मजबूर कर दिया है, जिसे मैं नहीं कहना चाहती थी. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस बेटे के जीतेजी उस के अपराध पर परदा डाले रही, आज उस के न रहने के बाद उस के बारे में यह सब कहना पड़ेगा. पर मैं और चुप नहीं रहूंगी. मेरी चुप्पी ने हर बार मुझे छला है.

‘‘सुन रहा है रघुवीर, फर्म में गबन धीरेंद्र ने नहीं बल्कि तेरे सगे भाई ने किया था.’’

मैं सकते में आ गई. पिताजी फटीफटी आंखों से दादी की तरफ देख रहे थे, ‘‘नहीं, नहीं, मां, यह नहीं हो सकता.’’

दादी गंभीर स्वर में बोलीं, ‘‘लेकिन सच यही है, बेटा. क्या मैं तुझ से झूठ बोलूंगी? क्या कोई मां अपने मृत बेटे पर इस तरह का झूठा लांछन लगा सकती है? बोल, जवाब दे?’’

‘‘नहीं मां, नहीं,’’ पिताजी का समूचा शरीर थरथरा उठा. उन की मुट्ठियां कस गईं, जबड़े भिंच गए और होंठों से एक गुर्राहट सी खारिज हुई, ‘‘इतना बड़ा विश्वासघात…’’

फिर सहसा उन्होंने चौंक कर दादी से पूछा, ‘‘यह सब तुम्हें कैसे पता चला, मां?’’

‘‘शायद मैं भी तुम्हारी तरह अंधेरे में रहती और झूठ को सच मान बैठती. लेकिन मुझे शुरू से ही सचाई का पता चल गया था. हुआ यों कि एक दिन मैं ने सुधीर और बड़ी बहू की कुछ ऐसी बातें सुन लीं, जिन से मुझे शक हुआ. बाद में एकांत में मैं ने सुधीर को धमकाते हुए पूछा तो उस ने सब सचसच बता दिया.’’

‘‘तो तुम ने मुझे यह बात पहले क्यों नहीं बताई?’’ पिताजी ने तड़प कर पूछा.

‘‘कैसे बताती, बेटा, मैं जानती थी कि सचाई सामने आने के बाद तुम दोनों भाई एकदूसरे के दुश्मन बन जाओगे. मैं अपने जीतेजी इस बात को कैसे बरदाश्त कर सकती थी. मगर दूसरी तरफ मैं यह भी नहीं चाहती थी कि बेकुसूर दामाद को अपराधी कहा जाए और तुम सभी उस से नफरत करो. किंतु दोनों ही बातें नहीं हो सकती थीं. मुझे एक का परित्याग करना ही था.

‘‘मैं ने बहुत बार कोशिश की कि सचाई कह दूं. पर हर बार मेरी जबान लड़खड़ा गई, मैं कुछ नहीं कह पाई और तभी से अपने सीने पर एक भारी बोझ लिए जी रही हूं. बेटी की बरबादी की असली जिम्मेदार मैं ही हूं,’’ कहतेकहते दादी की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.

‘‘मां, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. तुम्हारी खामोशी ने बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया,’’ पिताजी दोनों हाथों से सिर थाम कर धड़ाम से बिस्तर पर गिर गए. मां और मैं घबरा कर उन की ओर लपकीं.

पिताजी रो पड़े, ‘‘अब तक मैं क्या करता रहा. अपनी बहन के साथ कैसा अन्याय करता रहा. मैं गुनाहगार हूं, हत्यारा हूं. मैं ने अपनी बहन का सुहाग उजाड़ दिया, उसे घर से बेघर कर डाला. मैं अपनेआप को कभी क्षमा नहीं कर पाऊंगा.’’

पिताजी का आर्तनाद सुन कर मां और मेरे लिए आंसुओं को रोक पाना कठिन हो गया. हम तीनों ही रो पड़े.

दादी ही हमें समझाती रहीं, सांत्वना देती रहीं, विशेषकर पिताजी को. कुछ देर बाद जब आंसुओं का सैलाब थमा तो दादी ने पिताजी को समझाते हुए कहा, ‘‘नहीं, बेटा, इस तरह अपनेआप को दोषी मान कर सजा मत दे. दोष किसी एक का नहीं, हम सब का है. वह वक्त ही कुछ ऐसा था, हम सब परिस्थितियों के शिकार हो गए. लेकिन अब समय अपनी गलतियों पर रोने का नहीं बल्कि उन्हें सुधारने का है. बेटा, अभी भी बहुतकुछ ऐसा है, जो तू संवार सकता है.’’

दादी की बातों ने पिताजी के संतप्त मन को ऐसा संबल प्रदान किया कि वे उठ खड़े हुए और एकदम से पूछा, ‘‘समीर कहां है?’’

समीर भैया उसी समय बाहर से लौटे थे, ‘‘जी, पिताजी.’’

‘‘तुम जाओ और इसी समय कानपुर जाने वाली ट्रेन के टिकट ले कर आओ, पर सुनो, ट्रेन को छोड़ो… मालूम नहीं, कब छूटती होगी. तुम एक टैक्सी बुक करा लो और ज्योत्सना, माया तुम दोनों जल्दी से सामान बांध लो. मां, हम लोग इसी समय दीदी के पास चल रहे हैं,’’ पिताजी ने एक ही सांस में हस सब को आदेश दे डाला.

फिर वे शिथिल से हो गए और कातर नजरों से दादी की तरफ देखा, ‘‘मां, दीदी मुझे माफ कर देंगी?’’ स्वर में जाने कैसा भय छिपा हुआ था.

‘‘हां, बेटा, उस का मन बहुत बड़ा है. वह न केवल तुम्हें माफ कर देगी, बल्कि तुम्हारी वही नन्हीमुन्नी बहन बन जाएगी,’’ दादी धीरे से कह उठीं.

अंतत: भाईबहन के बीच वर्षों से खड़ी नफरत और गलतफहमी की दीवार गिर ही गई. मैं खड़ी हुई सोच रही थी कि वह दृश्य कितना सुखद होगा, जब पिताजी बूआ को गले से लगाएंगे.

 

अंतत -भाग 1: जीत किस की हुई

बैठक में तनावभरी खामोशी छा गई थी. हम सब की नजरें पिताजी के चेहरे पर कुछ टटोल रही थीं, लेकिन उन का चेहरा सपाट और भावहीन था. तपन उन के सामने चेहरा झुकाए बैठा था. शायद वह समझ नहीं पा रहा था कि अब क्या कहे. पिताजी के दृढ़ इनकार ने उस की हर अनुनयविनय को ठुकरा दिया था.

सहसा वह भर्राए स्वर में बोला, ‘‘मैं जानता हूं, मामाजी, आप हम से बहुत नाराज हैं. इस के लिए मुझे जो चाहे सजा दे लें, किंतु मेरे साथ चलने से इनकार न करें. आप नहीं चलेंगे तो दीदी का कन्यादान कौन करेगा?’’

पिताजी दूसरी तरफ देखते हुए बोले, ‘‘देखो, यहां यह सब नाटक करने की जरूरत नहीं है. मेरा फैसला तुम ने सुन लिया है, जा कर अपनी मां से कह देना कि मेरा उन से हर रिश्ता बहुत पहले ही खत्म हो गया था. टूटे हुए रिश्ते की डोर को जोड़ने का प्रयास व्यर्थ है. रही बात कन्यादान की, यह काम कोई पड़ोसी भी कर सकता है.’’

‘‘रघुवीर, तुझे क्या हो गया है,’’ दादी ने सहसा पिताजी को डपट दिया.

मां और भैया के साथ मैं भी वहां उपस्थित थी. लेकिन पिताजी का मिजाज देख कर उन्हें टोकने या कुछ कहने का साहस हम लोगों में नहीं था. उन के गुस्से से सभी डरते थे, यहां तक कि उन्हें जन्म देने वाली दादी भी.

मगर इस समय उन के लिए चुप रहना कठिन हो गया था. आखिर तपन भी तो उन का नाती था. उसे दुत्कारा जाना वे बरदाश्त न कर सकीं और बोलीं, ‘‘तपन जब इतना कह रहा है तो तू मान क्यों नहीं जाता. आखिर तान्या तेरी भांजी है.’’

‘‘मां, तुम चुप रहो,’’ दादी के हस्तक्षेप से पिताजी बौखला उठे, ‘‘तुम्हें जाना हो तो जाओ, मैं ने तुम्हें तो कभी वहां जाने से मना नहीं किया. लेकिन मैं नहीं जाऊंगा. मेरी कोई बहन नहीं, कोई भांजी नहीं.’’

‘‘अब चुप भी कर,’’ दादी ने झिड़क कर कहा, ‘‘खून के रिश्ते इस तरह तोड़ने से टूट नहीं जाते और फिर मैं अभी जिंदा हूं, तुझे और माधवी को मैं ने अपनी कोख से जना है. तुम दोनों मेरे लिए एकसमान हो. तुझे भांजी का कन्यादान करने जाना होगा.’’

‘‘मैं नहीं जाऊंगा,’’ पिताजी बोले, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि सबकुछ जानने के बाद भी तुम ऐसा क्यों कह रही हो.’’

‘‘मैं तो सिर्फ इतना जानती हूं कि माधवी मेरी बेटी है और तेरी बहन और तुझे उस ने अपनी बेटी का कन्यादान करने के लिए बुलाया है,’’ दादी के स्वर में आवेश और खिन्नता थी, ‘‘तू कैसा भाई है. क्या तेरे सीने में दिल नहीं. एक जरा सी बात को बरसों से सीने से लगाए बैठा है.’’

‘‘जरा सी बात?’’ पिताजी चिढ़ गए थे, ‘‘जाने दो, मां, क्यों मेरा मुंह खुलवाना चाहती हो. तुम्हें जो करना है करो, पर मुझे मजबूर मत करो,’’ कह कर वे झटके से बाहर चले गए.

दादी एक ठंडी सांस भर कर मौन हो गईं. तपन का चेहरा यों हो गया जैसे वह अभी रो देगा. दादी उसे दिलासा देने लगीं तो वह सचमुच ही उन के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ा, ‘‘नानीजी, ऐसा क्यों हो रहा है. क्या मामाजी हमें कभी माफ नहीं करेंगे. अब लौट कर मां को क्या मुंह दिखाऊंगा. उन्होंने तो पहले ही शंका व्यक्त की थी, पर मैं ने कहा कि मामाजी को ले कर ही लौटूंगा.’’

‘‘धैर्य रख, बेटा, मैं तेरे मन की व्यथा समझती हूं. क्या कहूं, इस रघुवीर को. इस की अक्ल पर तो पत्थर पड़ गए हैं. अपनी ही बहन को अपना दुश्मन समझ बैठा है,’’ दादी ने तपन के सिर पर हाथ फेरा, ‘‘खैर, तू चिंता मत कर, अपनी मां से कहना वह निश्चिंत हो कर विवाह की तैयारी करे, सब ठीक हो जाएगा.’’

मैं धीरे से तपन के पास जा बैठी और बोली, ‘‘बूआ से कहना, दीदी की शादी में मैं और समीर भैया भी दादी के साथ आएंगे.’’

तपन हौले से मुसकरा दिया. उसे इस बात से खुशी हुई थी. वह उसी समय वापस जाने की तैयारी करने लगा. हम सब ने उसे एक दिन रुक जाने के लिए कहा, आखिर वह हमारे यहां पहली बार आया था. पर तपन ने यह कह इनकार कर दिया कि वहां बहुत से काम पड़े हैं. आखिर उसे ही तो मां के साथ विवाह की सारी तैयारियां पूरी करनी हैं.

तपन का कहना सही था. फिर उस से रुकने का आग्रह किसी ने नहीं किया और वह चला गया.

तपन के अचानक आगमन से घर में एक अव्यक्त तनाव सा छा गया था. उस के जाने के बाद सबकुछ फिर सहज हो गया. पर मैं तपन के विषय में ही सोचती रही. वह मुझ से 2 वर्ष छोटा था, मगर परिस्थितियों ने उसे उम्र से बहुत बड़ा बना दिया था. कितनी उम्मीदें ले कर वह यहां आया था और किस तरह नाउम्मीद हो कर गया. दादी ने उसे एक आस तो बंधा दी पर क्या वे पिताजी के इनकार को इकरार में बदल पाएंगी?

मुझे यह सवाल भीतर तक मथ रहा था. पिताजी के हठी स्वभाव से सभी भलीभांति परिचित थे. मैं खुल कर उन से कुछ कहने का साहस तो नहीं जुटा सकी, लेकिन उन के फैसले के सख्त खिलाफ थी.

दादी ने ठीक ही तो कहा था कि खून के रिश्ते तोड़ने से टूट नहीं जाते. क्या पिताजी इस बात को नहीं समझते. वे खूब समझते हैं. तब क्या यह उन के भीतर का अहंकार है या अब तक वर्षों पूर्व हुए हादसे से उबर नहीं सके हैं? शायद दोनों ही बातें थीं. पिताजी के साथ जो कुछ भी हुआ, उसे भूल पाना इतना सहज भी तो नहीं था. हां, वे हृदय की विशालता का परिचय दे कर सबकुछ बिसरा तो सकते थे, किंतु यह न हो सका.

मैं नहीं जानती कि वास्तव में हुआ क्या था और दोष किस का था. यह घटना मेरे जन्म से भी पहले की है. मैं 20 की होने को आई हूं. मैं ने तो जो कुछ जानासुना, दादी के मुंह से ही सुना. एक बार नहीं, बल्कि कईकई बार दादी ने मुझे वह कहानी सुनाई. कहानी नहीं, बल्कि यथार्थ, दादी, पिताजी, बूआ और फूफा का भोगा हुआ यथार्थ.

दादी कहतीं कि फूफा बेकुसूर थे. लेकिन पिताजी कहते, सारा दोष उन्हीं का था. उन्होंने ही फर्म से गबन किया था. मैं अब तक समझ नहीं पाई, किसे सच मानूं? हां, इतना अवश्य जानती हूं, दोष चाहे किसी का भी रहा हो, सजा दोनों ने ही पाई. इधर पिताजी ने बहन और जीजा का साथ खोया तो उधर बूआ ने भाई का साथ छोड़ा और पति को हमेशा के लिए खो दिया. निर्दोष बूआ दोनों ही तरफ से छली गईं.

मेरा मन उस अतीत की ओर लौटने लगा, जो अपने भीतर दुख के अनेक प्रसंग समेटे हुए था. दादी के कुल 3 बच्चे थे, सब से बड़े ताऊजी, फिर बूआ और उस के बाद पिताजी. तीनों पढ़ेपलेबढ़े, शादियां हुईं.

उन दिनों ताऊजी और पिताजी ने मिल कर एक फर्म खोली थी. लेकिन अर्थाभाव के कारण अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था. उसी समय फूफाजी ने अपना कुछ पैसा फर्म में लगाने की इच्छा व्यक्त की. ताऊजी और पिताजी को और क्या चाहिए था, उन्होंने फूफाजी को हाथोंहाथ लिया. इस तरह साझे में शुरू हुआ व्यवसाय कुछ ही समय में चमक उठा और फलनेफूलने लगा. काम फैल जाने से तीनों साझेदारों की व्यस्तता काफी बढ़ गई थी.

औफिस का अधिकतर काम फूफाजी संभालते थे. पिताजी और ताऊजी बाहर का काम देखते थे. कुल मिला कर सबकुछ बहुत ठीकठाक चल रहा था. मगर अचानक ऐसा हुआ कि सब गड़बड़ा गया. ऐसी किसी घटना की, किसी ने कल्पना भी नहीं की थी.

अंतत -भाग 2: जीत किस की हुई

अचानक ही फर्म में लाखों की हेराफेरी का मामला प्रकाश में आया, जिस ने न केवल तीनों साझेदारों के होश उड़ा दिए बल्कि फर्म की बुनियाद तक हिल गई. तात्कालिक छानबीन से एक बात स्पष्ट हो गई कि गबन किसी साझेदार ने किया है, और वह जो भी है, बड़ी सफाई से सब की आंखों में धूल झोंकता रहा है.

तमाम हेराफेरी औफिस की फाइलों में हुई थी और वे सब फाइलें यानी कि सभी दस्तावेज फूफाजी के अधिकार में थे. आखिरकार शक की पहली उंगली उन पर ही उठी. हालांकि फूफाजी ने इस बात से अनभिज्ञता प्रकट की थी और अपनेआप को निर्दोष ठहराया था. पर चूंकि फाइलें उन्हीं की निगरानी में थीं, तो बिना उन की अनुमति या जानकारी के कोई उन दस्तावेजों में हेराफेरी नहीं कर सकता था.

लेकिन जाली दस्तावेजों और फर्जी बिलों ने फूफाजी को पूरी तरह संदेह के घेरे में ला खड़ा किया था. सवाल यह था कि यदि उन्होंने हेराफेरी नहीं की तो किस ने की? जहां तक पिताजी और ताऊजी का सवाल था, वे इस मामले से कहीं भी जुड़े हुए नहीं थे और न ही उन के खिलाफ कोई प्रमाण था. प्रमाण तो कोई फूफाजी के खिलाफ भी नहीं मिला था, लेकिन वे यह बताने की स्थिति में नहीं थे कि अगर फर्म का रुपया उन्होंने नहीं लिया तो फिर कहां गया? ऐसी ही दलीलों ने फूफाजी को परास्त कर दिया था. फिर भी वे सब को यही विश्वास दिलाने की कोशिश करते रहे कि वे निर्दोष हैं और जो कुछ भी हुआ, कब हुआ, कैसे हुआ नहीं जानते.

इन घटनाओं ने जहां एक ओर पिताजी को स्तब्ध और गुमसुम बना दिया था, वहीं ताऊजी उत्तेजित थे और फूफाजी से बेहद चिढ़े थे. जबतब वे भड़क उठते, ‘यह धीरेंद्र तो हमें ही बदनाम करने पर तुला हुआ है. अगर इस पर विश्वास न होता तो हम सबकुछ इसे कैसे सौंप देते. अब जब सचाई सामने आ गई है तो दुहाई देता फिर रहा है कि निर्दोष है. क्या हम दोषी हैं? क्या यह हेराफेरी हम ने किया है?

‘मुझे तो इस आदमी पर शुरू से ही शक था, इस ने सबकुछ पहले ही सोचा हुआ था. हम इस की मीठीमीठी बातों में आ गए. इस ने अपने पैसे लगा कर हमें एहसान के नीचे दबा देना चाहा. सोचा होगा कि पकड़ा भी गया तो बहन का लिहाज कर के हम चुप कर जाएंगे. मगर उस की सोची सारी बातें उलटी हो गईं, इसलिए अब अनापशनाप बकता फिर रहा है.’

एक बार तो ताऊजी ने यहां तक कह दिया था, ‘हमें इस आदमी को पुलिस के हवाले कर देना चाहिए.’

लेकिन दादी ने कड़ा विरोध किया था. पिताजी को भी यह बात पसंद नहीं आई कि यदि मामला पुलिस में चला गया तो पूरे परिवार की बदनामी होगी.

बात घर से बाहर न जाने पाई, लेकिन इस घटना ने चारदीवारी के भीतर भारी उथलपुथल मचा दी थी. घर का हरेक प्राणी त्रस्त व पीडि़त था. पिताजी के मन को ऐसा आघात लगा कि वे हर ओर से विरक्त हो गए. उन्हें फर्म के नुकसान और बदनामी की उतनी चिंता नहीं थी, जितना कि विश्वास के टूट जाने का दुख था. रुपया तो फिर से कमाया जा सकता था. मगर विश्वास? उन्होंने फूफाजी पर बड़े भाई से भी अधिक विश्वास किया था. बड़ा भाई ऐसा करता तो शायद उन्हें इतनी पीड़ा न होती, मगर फूफाजी ऐसा करेंगे, यह तो उन्होंने ख्वाब में भी न सोचा था.

उधर फूफाजी भी कम निराश नहीं थे. वे किसी को भी अपनी नेकनीयती का विश्वास नहीं दिला पाए थे. दुखी हो कर उन्होंने यह जगह, यह शहर ही छोड़ देने का फैसला कर लिया. यहां बदनामी के सिवा अब धरा ही क्या था. अपने, पराए सभी तो उन के विरुद्ध हो गए थे. वे बूआ को लेकर अपने एक मित्र के पास अहमदाबाद चले गए.

दादी बतातीं कि जाने से पूर्व फूफाजी उन के पास आए थे और रोरो कहा था, ‘सब लोग मुझे चोर समझते हैं, लेकिन मैं ने गबन नहीं किया. परिस्थितियों ने मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचा है. मैं चाह कर भी इस कलंक को धो नहीं पाया. मैं भी तो आप का बेटा ही हूं. मैं ने उन्हें हमेशा अपना भाई ही समझा है. क्या मैं भाइयों के साथ ऐसा कर सकता हूं. क्या आप भी मुझ पर विश्वास नहीं करतीं?’

‘मुझे विश्वास है, बेटा, मुझे विश्वास है कि तुम वैसे नहीं हो, जैसा सब समझते हैं. पर मैं भी तुम्हारी ही तरह असहाय हूं. मगर इतना जानती हूं, झूठ के पैर नहीं होते. सचाई एक न एक दिन जरूर सामने आएगी. और तब ये ही लोग पछताएंगे,’ दादी ने विश्वासपूर्ण ढंग से घोषणा की थी.

व्यवसाय से पिताजी का मन उचट गया था, उन्होंने फर्म बेच देने का प्रस्ताव रखा. ताऊजी भी इस के लिए राजी हो गए. गबन और बदनामी के कारण फर्म की जो आधीपौनी कीमत मिली, उसे ही स्वीकार कर लेना पड़ा.

पिताजी ने एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली, जबकि ताऊजी का मन अभी तक व्यवसाय में ही रमा हुआ था. वे पिताजी के साथ कोई नया काम शुरू करना चाहते थे. किंतु उन के इनकार के बाद उन्होंने अकेले ही काम शुरू करने का निश्चय कर लिया.

फर्म के बिकने के बाद जो पैसा मिला, उस का एक हिस्सा पिताजी ने फूफाजी को भिजवा दिया. हालांकि यह बात ताऊजी को पसंद नहीं आई, मगर पिताजी का कहना था, ‘उस ने हमारे साथ जो कुछ किया, उस का हिस्सा ले कर वही कुछ हम उस के साथ करेंगे तो हम में और उस में अंतर कहां रहा. नहीं, ये पैसे मेरे लिए हराम हैं.’

किंतु लौटती डाक से वह ड्राफ्ट वापस आ गया था और साथ में थी, फूफाजी द्वारा लिखी एक छोटी सी चिट…

‘पैसे मैं वापस भेज रहा हूं इस आशा से कि आप इसे स्वीकार कर लेंगे. अब इस पैसे पर मेरा कोई अधिकार नहीं है. फर्म में जो कुछ भी हुआ, उस की नैतिक जिम्मेदारी से मैं मुक्त नहीं हो सकता. यदि इन पैसों से उस नुकसान की थोड़ी सी भी भरपाई हो जाए तो मुझे बेहद खुशी होगी. वक्त ने साथ दिया तो मैं पाईपाई चुका दूंगा, क्योंकि जो नुकसान हुआ है, वह आप का ही नहीं, मेरा, हम सब का हुआ है.’

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