Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

खूबसूरत और जवान युवती दारू के ठीहे पर हो और बवाल न हो, ऐसा संभव नहीं. दिलफेंक युवक दारू पीने कम, रीमा के गदराए बदन को घूरने ज्यादा आते थे. रीमा को ले कर वहां अकसर मारपीट होती थी. पुलिस को शक था कि कहीं इन्हीं में से उस का कोई पुराना आशिक तो नहीं, जिस ने इस दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया हो. पुलिस ने इस दृष्टिकोण को भी जांच में शामिल कर लिया था.

उलझी जिंदगी की चौंकाने वाली कहानी

इस के साथ ही पुलिस को जांच में रीमा से जुड़ी एक और चौंकाने वाली बात पता चली. रीमा की 3 शादियां हुई थीं. पहली शादी के 15 दिनों बाद ही रीमा विधवा हो गई थी. उस के पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. उस के बाद रीमा मायके आ गई और वहीं रहने लगी थी. सफेद साड़ी में लिपटी जवान बेटी को देख कर पिता रामरक्षा परेशान रहते थे. वह सोचते थे कि इतना लंबा जीवन बेटी कैसे काटेगी. ठीकठाक वरघर देख कर उस की गृहस्थी फिर से बस जाए तो अच्छा है.

रिश्तेदारों के माध्यम से रामरक्षा ने महराजगंज के बेलवा काजी के रहने वाले रविंद्र गौड़ से बेटी का दूसरा ब्याह कर दिया. विवाह से पहले उन्होंने बेटी की पिछली जिंदगी के बारे में सब कुछ साफसाफ बता दिया था, ताकि पिछली जिंदगी नासूर न बने.

लेकिन होनी को भला कौन टाल सकता है, शादी के कुछ महीनों बाद रीमा फिर ससुराल से हमेशा के लिए मायके लौट आई. पता चला कि दूसरा पति रविंद्र गौड़ अव्वल दर्जे का दारूबाज था. दारू हलक से नीचे उतरने के बाद नशे में धुत हो कर वह रीमा को बिना वजह बुरी तरह मारतापीटता था.

पति के अत्याचारों से तंग आ कर वह पति का घर हमेशा के लिए छोड़ कर मायके आ कर रहने लगी थी.

पत्नी के इस कदम से रविंद्र परेशान था. वह नहीं चाहता था रीमा मायके में जा कर रहे, वह चाहता था कि जो हुआ उसे भुला कर रीमा घर लौट आए. लेकिन रीमा पति की बात मानने के लिए कतई तैयार नहीं थी, वह ससुराल आने के लिए तैयार नहीं हुई.

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इस बात को ले कर शंकर टोला गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत में गांव वालों के साथसाथ रीमा, रीमा के घर वाले, बगल के गांव जैनपुर टोला मोहम्मद बरवा का अनरजीत और पति रविंद्र मौजूद था. पंचायत के सामने रविंद्र ने पत्नी रीमा के सामने घर वापस आने का प्रस्ताव रखा. लेकिन रीमा ने पति का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया.

रीमा की बातों से हमदर्दी दिखाते अनरजीत बीचबीच में उछल कर बोलता रहा. अनरजीत की बातों से नाराज रविंद्र ने उसे ललकारा कि बहुत हमदर्द बनते हो तो क्यों नहीं उस से ब्याह कर लेते?

रविंद्र की बातों को अनरजीत ने दिल पर ले लिया और भरी पंचायत में रविंद्र की ललकार चुनौती के रूप में ले ली. उस ने पंचायत के बीच कह दिया कि यदि रीमा राजी हो तो वह उस से ब्याह करने के लिए तैयार है. रीमा ने हामी भर दी. पंचायत वहीं खत्म हो गई. उस दिन के बाद से रीमा और अनरजीत लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगे.

बाद में दोनों ने दुर्गा मंदिर बांसस्थान में गंधर्व विवाह कर लिया. इस बिंदु को भी पुलिस ने अपनी जांच में शामिल कर लिया.

पुलिस ने रविंद्र गौड़ से पूछताछ की. लेकिन इस हत्याकांड में उस का कोई हाथ नजर नहीं आया. डेढ़ महीना बीत जाने के बावजूद भी पुलिस जहां से चली थी, फिर वहीं आ कर खड़ी हो गई थी. त्रिकोण कहानी में उल्लिखित बातों का कोई सूत्र नहीं मिला था.

मतलब साफ था अनरजीत और रीमा हत्याकांड में उन की जिंदगी से जुड़ी घटना का कहीं इन्वौल्वमेंट नहीं था. पुलिस यह सोचसोच कर परेशान थी कि आखिर दोहरे हत्याकांड को किस ने और क्यों अंजाम दिया था? पुलिस अभी तक हत्या का मोटिव भी पता नहीं लगा सकी थी.

पुलिस उलझी अंधविश्वास में

इस बीच कहानी में उस समय एक नया मोड़ आ गया, जब मृतका की चाची सीमा के शरीर पर तथाकथित अदृश्य शक्ति ने सवारी कर सभी को चौंका देने वाली बात कही. सीमा बोली, ‘‘मैं रीमा की आत्मा हूं. मुझे पता है कि मेरी और अनरजीत की हत्या किस ने की है?’’

फिर उस ने गांव के 5 लोगों के नाम बताए. सीमा के बताए नामों के आधार पर पुलिस ने पांचों लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. ऐसा करना पुलिस की मजबूरी थी. हत्यारों का अभी तक पता नहीं चला था. पुलिस का तर्क था कि हो सकता है कातिल इन्हीं में से कोई हो.

पुलिस पांचों लोगों से पूरी रात सख्ती से पूछताछ करती रही. लेकिन यहां भी नतीजा शून्य रहा, पूछताछ बेनतीजा निकली.

पांचों आरोपियों का हत्या में कहीं हाथ नहीं मिला तो उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया गया. पुलिस घटना की तह में जाने के लिए सर्विलांस की मदद ले रही थी. पुलिस मृतकों के फोन की काल डिटेल्स भी निकाल कर कई बार अध्ययन कर चुकी थी. साथ ही मुखबिरों की भी मदद ले रही थी.

पहली अक्तूबर, 2020 को एक मुखबिर ने पुलिस को ऐसी सूचना दी, जिसे सुन कर पुलिस चौंक गई. मुखबिर ने पुलिस को बताया कि घटना से कुछ दिनों पहले लकड़ी तस्कर रहमुद्दीन उर्फ रामदीन का अनरजीत से रुपयों को ले कर विवाद हुआ था. रामदीन उसे देख लेने की धमकी दे कर चला गया था.

मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने अपनी जांच लकड़ी तस्कर रामदीन उर्फ रहमुद्दीन की ओर मोड़ दी. छानबीन के दौरान पता चला कि घटना से महीने भर पहले चोरी से जंगल से सागौन की कीमती लकडि़यां कटवा कर रात के समय ले जाते हुए रामदीन को पुलिस ने धर दबोचा था और गाड़ी सहित लकडि़यां जब्त कर ली थीं.

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रामदीन गाड़ी छुड़ाने के लिए अनरजीत के पास कर्ज मांगने आया था. वह उस के सामने गिड़गिड़ाया भी था, लेकिन अनरजीत ने रुपए देने से इंकार कर दिया था.

महत्त्वपूर्ण सुराग

अनरजीत और रामदीन दोनों पुराने दोस्त थे. वह जानता था कि अनरजीत के पास लाखों रुपए की रकम जमा रहती है. यह रकम वह अपने घर पर ही रखता है. फिर भी मदद करने से इंकार कर रहा है. यह बात रामदीन को चुभ गई थी. छानबीन में पाया गया अनरजीत और रामदीन के बीच वाकई में विवाद हुआ था. इस से शक की सुई रामदीन की ओर घूम गई थी. शक के आधार पर पुलिस ने 5 अक्तूबर, 2020 को रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को हिरासत में ले लिया.

पूछताछ में रामदीन ने अपना जुर्म कबूल लिया. पता चला कि रुपयों के लिए उसी ने अनरजीत और उस की पत्नी रीमा की हत्या की थी.

2 महीने से रहस्य बने दोहरे हत्याकांड का पटाक्षेप हो गया. उसी दिन शाम को सीओ कपिलदेव मिश्र ने गुलरिहा थाने में प्रैसवार्ता बुला कर आरोपी रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को पेश किया. पत्रकारों के सामने आरोपी रामदीन ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. पूछताछ करने पर अनरजीत और रीमा की हत्या की कहानी ऐसे सामने आई—

अगले भाग में पढ़ें- अनरजीत का हमप्याला था रामदीन

Crime Story: जंगल में चोरी के लिए- पार्ट 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लेखक- शैलेंद्र कुमार ‘शैल’ 

40 वर्षीय अनरजीत मूलरूप से गोरखपुर के गुलरिहा थानाक्षेत्र के जैनपुर टोला मोहम्मद बरवा का रहने वाला था. उस के परिवार में मांबाप के अलावा पत्नी संगीता और 2 बेटे थे. अनरजीत ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन मेहनती बहुत था. एक साथ वह कई काम करता था. उस का मुख्य काम रसोई गैस सप्लाई का था. वह गुलरिहा स्थित एक गैस एजेंसी का सब से विश्वासपात्र डिलिवरीमैन था.

वह दिन भर में करीब 10-12 गाड़ी यानी करीब 450 सिलेंडर डिलीवर कर लेता था. शाम तक उस के पास करीब 3 लाख रुपए से ज्यादा की रकम जमा हो जाती थी. यह अनरजीत का रोज का काम था.

इस के साथ ही उस ने अपने घर पर किराने की दुकान भी खोल रखी थी. दुकान उस की पत्नी संगीता चलाती थी. इसी आमदनी से उस ने काफी रुपए बैंक बैलेंस कर लिए थे. वह दोनों बेटों की अच्छी शिक्षा पर पैसे खर्च करता था. बाद के दिनों में उस ने किराए पर चलाने के लिए एक सवारी गाड़ी खरीद ली थी. उस से भी उसे अच्छा मुनाफा हो जाया करता था. कुल मिला कर अनरजीत के घर में रुपयों की कोई कमी नहीं थी. उस का एक ही सपना था कि दोनों बेटे पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हो जाएं.

पता नहीं उस की गृहस्थी को किस की बुरी नजर लगी कि सब कुछ चिंदीचिंदी बिखर गया. एक पत्नी के जीवित रहते हुए उस ने शान में आ कर दूसरी शादी कर ली. दूसरी शादी करते ही पहली पत्नी संगीता और अनरजीत के बीच में झगड़ा शुरू हो गया.

संगीता अपनी सौतन रीमा को साथ रखने के लिए कतई तैयार नहीं थी. उस ने पति से साफ कह दिया था कि इसे जहां मन हो, ले जा कर रखो. लेकिन मैं इसे अपने घर में नहीं रहने दूंगी. हार मान कर अनरजीत ने रीमा के मायके शंकर टोला गांव के बाहर जमीन खरीद कर 2 कमरों वाला टिन का मकान बनवा कर रीमा के साथ रहना शुरू कर दिया.

अनरजीत ने भले ही रीमा से गंधर्व विवाह कर लिया था, लेकिन उस ने पहली पत्नी संगीता और बच्चों की देखरेख की जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा था. इस में रीमा की भी रजामंदी थी. पति के इस निर्णय से वह बेहद खुश थी. बल्कि वह तो यहां तक चाहती थी कि वह संगीता के साथ उसी घर में जा कर रहे, जबकि संगीता को यह मंजूर नहीं था. घर में शांति बनी रहे, इसीलिए अनरजीत ने ऐसा किया था.

अनरजीत का हमप्याला था रामदीन

खैर, अनरजीत के शंकर टोला में रहते हुए उस के कई दोस्त बन गए थे, जिस में जंगल डुमरी नंबर- 2, टोला सकलदीपपुर का रहने वाला रामदीन उर्फ रहमुद्दीन उस का हमप्याला था. रामदीन की पैठ अनरजीत के घर के अंदर तक थी. इसलिए वह उस के हर राज को जानता था.

रामदीन लकड़ी का कारोबारी था. जंगल से चोरी से सागौन और अन्य कीमती लकडि़यां काट कर बेचना उस का मुख्य धंधा था.

ऐसा नहीं था कि वह अकेला ही इस काम को अंजाम देता था. इस काम को वह जंगल के अधिकारियों की मिलीभगत से अंजाम देता था. बदले में वह उन्हें मोटी रकम खिलाता था. इसीलिए उस का धंधा रात के अंधेरे में चलता था.

3 अगस्त, 2020 को रामदीन रात के अंधेरे में जंगल से सागौन की बेशकीमती लकडि़यां काट कर चोरी से अपनी गाड़ी पर लाद कर ले जा रहा था. तभी पुलिस ने पकड़ कर उस की गाड़ी सीज कर दी. गाड़ी सीज करने से रामदीन बुरी तरह परेशान हो गया. उस का धंधा बंद हो गया. वह जल्द से जल्द अपनी गाड़ी छुड़ाना चाहता था लेकिन पैसे नहीं होने से वह गाड़ी नहीं छुड़ा पाया.

ऐसे में उसे दोस्त अनरजीत की याद आई. वह उस के पास पहुंचा और अपनी समस्या बता कर उस से एक लाख रुपए कर्ज मांगा. अनरजीत ने रुपए देने से मना किया तो वह दोनों हाथ जोड़ कर उस के सामने गिड़गिड़ाया, मिन्नतें कीं, लेकिन अनरजीत ने रुपए देने से मना कर दिया.

रामदीन जान रहा था कि अनरजीत झूठ बोल रहा है. पैसे होते हुए भी वह देने से मना कर रहा है. उसे अनरजीत का यह व्यवहार काफी नागवार लगा. उसी पल उस के दिमाग में एक खतरनाक योजना ने जन्म लिया.

रामदीन जानता था कि रात के समय अनरजीत के पास लाखों रुपए जमा रहते हैं. क्यों न उस रकम को ही हासिल कर लिया जाए. लेकिन रुपए हासिल करना आसान नहीं था. रुपए कैसे हासिल करने हैं, उस ने यह योजना भी बना ली.

योजना के मुताबिक 5 अगस्त, 2020 की रात 11 बजे रामदीन अनरजीत के घर पहुंचा. उस समय अनरजीत और उस की पत्नी रीमा गहरी नींद में सो रहे थे. दरवाजा भिड़ा हुआ था. जैसे ही उस ने हाथ लगाया दरवाजा भीतर की ओर खुल गया. कमरे में घुसने से पहले उस ने बाहर की ओर देखा. दूरदूर तक कोई दिखाई नहीं दिया तो वह दबे पांव कमरे में घुस गया.

अनरजीत और रीमा दोनों तख्त पर सो रहे थे. अनरजीत को देखते ही रामदीन को गुस्सा आ गया. गुस्से में रामदीन ने अपने पास लाई नुकीली हथौड़ी से नींद में सो रहे अनरजीत के सिर पर जोरदार वार किया. फिर उस पर चाकू से वार किया. अनरजीत नीचे फर्श पर गिर कर मौत के आगोश में समा गया. फिर उस ने रीमा की गरदन पर पास में रखे फावड़े से वार किया, जिस से उस की भी मौत हो गई.

दोनों को मौत के घाट उतारने के बाद रामदीन ने घर की अलमारी को खंगाला.  लेकिन अलमारी से उसे 30 हजार रुपए ही मिले. उस ने सोचा था कि घर में रखे लाखों रुपए हाथ लगेंगे तो सब काम बन जाएगा. लेकिन सब उल्टा हो गया. रुपयों के चक्कर में उस ने 2 जान ले ली थी. फिर जो उस के हाथ आया, उसे ले कर वहां से फरार हो गया.

आखिरकार मुखबिर की सूचना पर 2 महीने बाद पुलिस को घटना का परदाफाश करने में कामयाबी मिल गई. पुलिस ने आरोपी रामदीन से कत्ल में प्रयुक्त नुकीली हथौड़ी और धारदार चाकू बरामद कर लिया. विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने रामदीन उर्फ रहमुद्दीन को कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे मंडलीय कारागार गोरखपुर भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. आरोपी रामदीन उर्फ रहमुद्दीन अपने किए का नतीजा सलाखों के पीछे भुगत रहा है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

कहीं विलेन न बन जाए अंपायर काॅल

सिर्फ सचिन तेंदुलकर या सुनील गावस्कर जैसे पूर्व भारतीय क्रिकेटरों ने ही नहीं बल्कि शेन वाॅर्न और रिकी पोंटिंग के साथ साथ अब तो पूर्व एलीट पैनल के अंपायर डाॅरेल हापर ने भी अंपायर काॅल को लेकर चिंता जतायी है कि इसके प्रति बढ़ता अविश्वास कहीं क्रिकेट को भारी न पड़े. कहीं अंपायर काॅल क्रिकेट के लिए खलनायक न बन जाए. दअरसल हुआ यह कि भारत ने आॅस्ट्रेलिया के विरूद्ध जिस मेलबर्न टेस्ट में ऐतिहासिक जीत हासिल की है, वह जीत आते आते भी हाथ से फिसल सकती थी, क्योंकि अंपायर काॅल ने ऐसी स्थितियां एक नहीं दो बार बना दी थीं. मेलबार्न टेस्ट मंे तीसरे दिन जब जसप्रीत बुमराह की गंेद आॅस्ट्रेलियाई खिलाड़ी बन्र्स के जूते से टकरायी तो साफ लगा कि खिलाड़ी एलबीडब्ल्यू आउट है. भारत के कप्तान अंजिक्य रहाणे ने तुरंत डीआरएस लिया. रिप्ले में साफ दिखा कि गेंद लाइन में गिरी है और उसका इम्पैक्ट भी लाइन के अंदर था. इसके बावजूद भी खिलाड़ी को आउट नहीं दिया गया क्योंकि अंपायर का फैसला नाॅट आउट था.

भारत अंपायर के इस फैसले को एक कड़वा घूंट समझकर पी गया, लेकिन जब कुछ ही ओवरों बाद मोहम्मद सिराज ने मार्नस लांबुशान के खिलाफ एलबीडब्ल्यू की अपील की तो फिर वही पुरानी कहानी दोहरायी गई, यानी भारत बेहद नाजुक मौकों पर दो बार आॅस्ट्रेलिया के खतरनाक चक्रव्यूह में जाते जाते बचा. आॅस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के बारे में माना जाता है कि अगर उन्हें एक भी गलत डिसीजन के चलते फायदा मिल जाए तो वह खेल की लय पलट देते हैं. हालांकि मेलबर्न मंे ऐसा नहीं हुआ और भारत के हाथ तय लग रही ऐतिहासिक जीत आयी.

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लेकिन अगर वह दिन सचमुच भारतीयों का न हुआ होता तो इस तिनके के सहारे से आॅस्ट्रेलियाई एक बनते हुए इतिहास को पलट सकते थे. हालांकि भारतीय क्रिकेट कप्तान अंजिक्य रहाणे ने डीआरएस के संबंध में आधिकारिक तौरपर कुछ नहीं कहा, लेकिन इस फैसले के बाद एक बार फिर से पूरी दुनिया के क्रिकेट विशेषज्ञ व खिलाड़ियों के बीच यह बहस छिड़ गई है कि डीआरएस सिस्टम में अंपायर काॅल को तुरंत खत्म कर दिया जाना चाहिए. क्योंकि यह खेल के लिए बड़े संकट खड़ा कर सकता है. वैसे यह पहला मौका नहीं है जब दुनिया के धुरंधर खिलाड़ियों ने डीआरएस में मौजूद अंपायर काॅल की आलोचना की है, इसके पहले भी यह आलोचना होती रही है. गुजरे साल यूं तो क्रिकेट कम हुई है लेकिन फिर भी 62 ऐसे निर्णयों ने अंपायर काॅल की वजह से बल्लेबाजों को जीवनदान दिया हैै.

गौरतलब है कि पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 364 खिलाड़ी एलबीडब्ल्यू रिव्यू किये गये. लेकिन इनमें से 62 खिलाड़ियों को आउट नहीं दिया गया, जबकि गेंद की स्थिति उन्हें साफ आउट बता रही थी. सवाल है जब अंपायर काॅल की वजह से किसी खिलाड़ी को आउट दिया ही नहीं जाना तो फिर इस डीआरएस का मतलब ही क्या रह जाता है? क्या सिर्फ गेंदबाजी करने वाली टीम इस बात से संतोष कर ले कि खिलाड़ी तो आउट था, मगर दिया नहीं गया आखिर इस नियम के मायने क्या हैं? क्योंकि हमें मालूम होना चाहिए कि कोई भी खिलाड़ी डीआरएस तभी लेता है, जब उसे अंपायर के फैसले पर संतुष्टि नहीं होती. शेन वाॅर्न, रिकी पोंटिंग से लेकर पूरी दुनिया के धुंरधर खिलाड़ियों ने अंपायर काॅल को गलत ठहराया है. टेस्ट क्रिकेट में डीआरएस रिव्यू 2008 में शुरु किया गया था. भारत और श्रीलंका के बीच हो रहे मुकाबले मंे पहली बार इसका इस्तेमाल हुआ था.

लेकिन लगातार इसकी किसी न किसी रूप में आलोचना हो रही है. सबसे ज्यादा आलोचना इसमें मौजूद अंपायर काॅल को लेकर ही हो रही है. ऐसा नहीं है ओलाचना करने वाले सिर्फ खिलाड़ी ही हैं. अब तो अंपायर भी इसकी आलोचना करने लगे हैं. डेरिल हार्पर ने अंपायर काॅल पर तुरंत प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया है, उनके मुताबिक पिछले एक दशक से भी अधिक समय से इस्तेमाल होने के बावजूद अगर इसे लेकर खिलाड़ी असहज हैं तो ऐसे नियम का फायदा क्या? इससे जुड़े संवाद और इसको लेकर समझ में लगातार अविश्वास मौजूद है. अगर अंपायर ने खिलाड़ी को नाॅट आउट दे दिया और डीआरएस लेने के बाद पता चलता है कि खिलाड़ी तो आउट था, इसके बावजूद भी अगर खिलाड़ी को आउट नहीं दिया जाता तो फिर आखिर इस सुविधा का फायदा क्या हुआ?

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जाहिर है इससे एक कड़ुवाहट बढ़ती है. बोलिंग कर रही टीम को लगता है कि अंपायर ने उनके साथ धोखा किया है. अगर बल्लेबाजी करने वाली टीम जीत जाती है तो कहीं न कहीं गंेदबाजी करने वाली टीम यही समझती है कि अंपायर के इस फैसले की वजह से सामने वाली टीम जीती है. मतलब साफ है कि इस फैसले से सिर्फ और सिर्फ गलतफहमी ही बढ़ रही है. ऐसे में उचित यही है कि इस नियम को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से हटा दिया जाए. क्योंकि किसी एक अंपायर के फैसले ही सवालों के घेरे में नहीं रहे बल्कि कोई ऐसी टीम नहीं है, जिसे पिछले एक दशक में इस तरह के गलत फैसलों का नुकसान न उठाना पड़ा हो. मतलब यही है कि इससे किसी को फायदा नहीं है. साल 2020 में भी करीब 20 प्रतिशत के आसपास अंपायर काॅल वाले फैसले विवादस्पद रहे हैं. ऐसे में तकनीक पर या तो भरोसा जताया जाये या उसे छोड़ दिया जाए. गौरतलब है कि टेनिस और फुटबाॅल जैसे खेलों में भी टेक्नोलाॅजी की मदद ली जाती है, लेकिन फिर उस टेक्नोलाॅजी को किसी ह्यूमन डिसीजन से रिप्लेस नहीं किया जाता. क्योंकि कैमरे की आंख पर या तो हम भरोसा करें या फिर बिल्कुल ही भरोसा न करें.

Sapna Choudhary के इस हरियाणवी सौन्ग ने मचाया धमाल, देखें Video

अपने डांस मूव्स के जरिये करोड़ों दिलों पर राज करने वाली हरियाणवी डांसिंग क्वीन सपना चौधरी (Sapna Choudhary) के करोंड़ों फौलोअर्स हैं. वह जितना यूट्यूब पर देखी जाती हैं उससे कई ज्यादा सोशल मीडिया पर उनके चाहने वालों की संख्या है.

सोशल मीडिया पर उनकी इस कदर फैन फौलेविंग होने का एक कारण ये भी है कि वे ना सिर्फ अपने डांस मूव्स से बल्कि अपनी हौट और सेक्सी फोटोज से फैंस के दिलों पर राज करना जानती हैं. डांसिंग क्वीन सपना चौधरी (Sapna Choudhary)  जब स्टेज पर कदम रखती हैं तो उनके हर एक ठुमके पर फैंस अपनी जान छिड़कने लगते हैं. अब फिर से उनका एक डांस वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. जिसे फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.

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हरियाणवी सौन्ग ‘घूंघट की ओट’ पर सपना चौधरी जबरदस्त डांस करते नजर आ रही है. इस वीडियो को 88 लाख से भी ज्यादा व्यूज मिल चुके हैं.

सपना चौधरी का यह डांस वीडियो को सोनोटेक पंजाबी यूट्यूब चैनल पर पोस्ट किया गया है. सपना चौधरी अपने डांस के लिए पूरे देश में मशहूर है.

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बता दें कि सपना चौधरी ‘बिग बौस 11’ का भी हिस्सा रह चुकी है. और उनकी लोकप्रियता पूरे देश में है. हाल ही में सपना चौधरी ने अपने नए गाने का पोस्टर भी जारी किया था. उनके इस गाने के नाम ‘लोरी’ है, जो 20 जनवरी को रिलीज होने वाला है.

Bigg Boss 14: राखी ने अभिनव को नौमिनेट होने से बचाया तो सोनाली ने दिया ये रिएक्शन

बिग बौस शो के लेटेस्ट एपिसोड में कंटेस्टेंट ने सलमान खान की मौजूदगी में बिग नौमिनेशन के टास्क में हिस्सा लिया. इस गेम के दौरान कंटेस्टेंट्स के बीच काफी नोकझोंक देखने को मिली.

तो वहीं शो में सलमान खान ने घरवालों को कुछ टास्क दिए जिसके बाद इस हफ्ते एलिमिनेशन के लिए नौमिनेशन्स की प्रक्रिया को पूरा किया गया. तो वहीं गेम के दौरान अर्शी और रुबीना के बीच तीखी बहस देखने को मिली.

दोनों एक्ट्रेस सलमान खान के सामने भी लड़ाई करती नजर आई. इसके बाद गेम में एक दिलटचस्प मोड़ आया, जी हां जब दोनों ने अखाड़े में भी लड़ाई की.

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गेम के पहले राउंड में दोनों कंटेस्टेंटे्स को ये बताना था कि कैसे वे बिग बौस के घर में एक-दूसरे से ज्यादा डिजर्विंग हैं. और उनके बातों के आधार पर बाकी घरवालों को उन्हें सपोर्ट करना था.

तो उधर राखी सावंत ने बिग बौस हाउस में यह बता दिया है कि उन्हें अभिनव से प्यार है और वे उनकी तरफ फिजिकली भी आकर्षित हैं. तो वहीं इस हफ्ते कैप्टन के तौर पर राखी को नौमिनेशन की प्रक्रिया में घर के किसी एक सदस्य को सेव करने का मौका मिला.

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तो ऐसे में राखी ने अभिनव का नाम ले लिया. राखी सावंत ने इस हफ्ते अभिनव शुक्ला को नौमिनेशन से बचा लिया है. तो राखी के इस एक्शन से सोनाली फोगाट ने कहा कि ‘राखी सावंत एहसान फरामोश हैं.’

दरअसल राखी ने सोनाली से ये वादा किया था कि वे सोनाली को नौमिनेशन बचाएंगी. पर राखी ने अभिनव शुक्ला को सेव कर लिया है. इसलिए सोनाली फोगाट ने अपनी नराजगी जाहीर की..

शो में इस हफ्ते घर से बेघर होने के लिए निक्की तंबोली, रुबीना दिलैक, सोनाली फोगाट का नाम सामने आया है. अब शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि इस हफ्ते घर से कौन बेघर होता है.

अनुष्का शर्मा और विराट कोहली ने अपनी नन्ही परी का रखा ये नाम

बौलीवुड एक्ट्रेस अनुष्का शर्मा (Anushka Sharma) ने 11 जनवरी यानि सोमवार दोपहर में एक बेटी को जन्म दिया है. और  ये खुशखबरी पिता विराट कोहली (Virat kohli) ने खुद सोशल मीडिया पर अपने फैंस और शुभचिंतकों के साथ शेयर किया.

ये खुशखबरी सुनने के बाद यूजर्स लगातार इस कपल को बधाईयां और शुभकामनाएं दे रहे हैं. और ऐसे में फैंस जानना चाहते हैं कि विराट-अनुष्का ने अपनी बेटी का क्या नाम रखा है.

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खबर यह आ रही है कि इस कपल ने अपनी बेटी का नाम अनवी (Anvi) रखा है. बता दें कि उनकी बेटी का नाम दोनों के नाम से मिलकर बना है. तो चलिए जानते हैं कि अनवी का मतलब क्या होता है

अनवी का मतलब लक्ष्मी होता है और ये नाम बहुत ही शुभ नाम माना जाता है. बता दें कि विराट कोहली ने ये जानकारी खुद सोशल मीडिया पर दी कि वह एक बेटी के पिता बन गए हैं.

 

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विराट कोहली ने ट्विट करते हुए ये लिखा कि हम दोनों को यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि आज दोपहर हमारे घर बेटी हुई है. हम आपके प्यार और शुभकामानओं के लिए दिल से आभारी हैं.अनुष्का और बेटी, दोनों बिल्कुल ठीक हैं.

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उन्होंने आगे ये लिखा कि जिंदगी के इस नए चैप्टर के लिए हम सौभाग्यशाली महसूस कर रहे हैं. हम जानते हैं कि आप यह जरुर समझेंगे कि इस समय हम सब को थोड़ी प्राइवसी चाहिए होगी.

Serial Story: दस्विदानिया भाग 1

दीपक उत्तरी बिहार के छोटे से शहर वैशाली का रहने वाला था. वैशाली पटना से लगभग 30 किलोमीटर दूर है. 1982 में गंगा नदी पर गांधी सेतु बन जाने के बाद वैशाली से पटना आनाजाना आसान हो गया था. वैशाली की अपनी एक अलग ऐतिहासिक पहचान भी है.

दीपक इसी वैशाली के एनएनएस कालेज से बीएससी कर रहा था. उस की मां का देहांत बचपन में ही हो चुका था. उस के पिता रामलाल की कपड़े की दुकान थी. दुकान न छोटी थी न बड़ी. आमदनी बस इतनी थी कि बापबेटे का गुजारा हो जाता था. बचत तो न के बराबर थी. वैशाली में ही एक छोटा सा पुश्तैनी मकान था. और कोई संपत्ति नहीं थी. दीपक तो पटना जा कर पढ़ना चाहता था, पर पिता की कम आमदनी के चलते ऐसा नहीं हो सका.

दीपक अभी फाइनल ईयर में ही था कि अचानक दिल के दौरे से उस के पिता भी चल बसे. उस ने किसी तरह पढ़ाई पूरी की. वह दुकान पर नहीं बैठना चाहता था. अब उसे नौकरी की तलाश थी. उस ने तो इंडियन सिविल सर्विस के सपने देखे थे या फिर बिहार लोक सेवा आयोग के द्वारा राज्य सरकार के अधिकारी के. पर अब तो उसे नौकरी तुरंत चाहिए थी.

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दीपक ने भारतीय वायुसेना में एअरमैन की नियुक्ति का विज्ञापन पढ़ा, तो आवेदन कर दिया. उसे लिखित, इंटरव्यू और मैडिकल टैस्ट सभी में सफलता मिली. उस ने वायुसेना के टैक्नीकल ट्रेड में एअरमैन का पद जौइन कर लिया. ट्रेनिंग के बाद उस की पोस्टिंग पठानकोट एअरबेस में हुई. ट्रेनिंग के दौरान ही वह सीनियर अधिकारियों की प्रशंसा का पात्र बन गया. पोस्टिंग के बाद एअरबेस पर उस की कार्यकुशलता से सीनियर अधिकारी बहुत खुश थे.

वायुसेना के रसियन प्लेन को बीचबीच में मैंटेनैंस के लिए रूस जाना पड़ता था. दीपक के अफसर ने उसे बताया कि उसे भी जल्दी रूस जाना होगा. वह यह सुन कर बहुत खुश हुआ. उस ने जल्दीजल्दी कुछ आमतौर पर इस्तेमाल होने वाले रसियन शब्द और वाक्य सीख लिए. अपने एक दोस्त, जो 2 बार रूस जा चुका था से हैवी रसियन ओवरकोट भी उधार ले लिया. रूस की जबरदस्त ठंड के लिए यह जरूरी था.

1 महीने के अंदर ही दीपक को एक रसियन प्लेन के साथ बेलारूस की राजधानी मिंस्क जाना पड़ा. उस जहाज का कारखाना वहीं था. तब तक सोवियत संघ का बंटवारा हो चुका था और बेलारूस एक अलग राष्ट्र बन गया था.

अपने दोस्तों की सलाह पर उस ने भारत से कुछ चीजें जो रूसियों को बेहद पसंद थीं रख लीं. ये स्थानीय लोगों को मित्र बनाने में काम आती थीं. चूंकि जहाज अपना ही था, इसलिए वजन की सीमा नहीं थी. उस ने टूथपेस्ट, परफ्यूम, सुगंधित दार्जिलिंग चायपत्ती, ब्रैंडेड कौस्मैटिक आदि साथ रख लिए.

‘‘लेडीज कौस्मैटिक वहां की लड़कियों को इंप्रैस करने में बहुत काम आएंगे,’’ ऐसा चलते समय दोस्तों ने कहा था.

मिंस्क में लैंड करने के बाद दीपक का सामना जोरदार ठंड से हुआ. मार्च के मध्य में भी न्यूनतम तापमान शून्य से थोड़ा नीचे था. मिंस्क में उस के कम से कम 2 सप्ताह रुकने की संभावना थी. खैर, उस के मित्र का ओवरकोट प्लेन से निकलते ही काम आया.

दीपक के साथ पायलट, कोपायलट, इंजीनियर और क्रू  मैंबर्स भी थे. दीपक को एक होटल में एक सहकर्मी के साथ रूम शेयर करना था. वह दोस्त पहले भी मिंस्क आ चुका था. उस ने दीपक को रसियन से दोस्ती के टिप्स भी दिए.

अगले दिन से दीपक को कारखाना जाना था. उस की टीम को एक इंस्ट्रक्टर जहाज के कलपुरजों, रखरखाव के बारे में रूसी भाषा में समझाता था. साथ में एक लड़की इंटरप्रेटर उसे अंगरेजी में अनुवाद कर समझाती थी.

नताशा नाम था उस लड़की का. बला की खूबसूरत थी वह. उम्र 20 साल के आसपास होगी. गोरा रंग तो वहां सभी का होता है, पर नताशा में कुछ विशेष आकर्षण था जो जबरन किसी को उस की तारीफ करने को मजबूर कर देता. सुंदर चेहरा, बड़ीबड़ी नीली आंखें, सुनहरे बाल और छरहरे बदन को दीपक ने पहली बार इतने करीब से देखा था.

दीपक की नजरें बारबार नताशा पर जा टिकती थीं. जब कभी नताशा उस की ओर देखती दीपक अपनी निगाहें फेर लेता. वह धीमे से मुसकरा देती. जब वह सुबहसुबह मिलती तो दीपक हाथ मिला कर रूसी भाषा में गुड मौर्निंग यानी दोबरोय उत्रो बोलता और कुछ देर तक उस का हाथ पकड़े रहता.

नताशा मुसकरा कर गुड मौर्निंग कह आगे बोलती कि प्रस्तिते पजालास्ता ऐक्सक्यूज मी, प्लीज, हाथ तो छोड़ो. तब दीपक झेंप कर जल्दी से उस का हाथ छोड़ देता.

उस की हरकत पर उस के साथी और इंस्ट्रक्टर भी हंस पड़ते थे. लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक ही टेबल पर बैठते थे. 1 सप्ताह में वे कुछ फ्रैंक हो गए थे. इस में इंडिया से साथ लाए गिफ्ट आइटम्स की अहम भूमिका थी.

नताशा के साथ अब कुछ पर्सनल बातें भी होने लगी थीं. उस ने दीपक को बताया कि रूसी लोग इंडियंस को बहुत पसंद करते हैं. उस के मातापिता का डिवोर्स बहुत पहले हो चुका था और कुछ अरसा पहले मां का भी देहांत हो गया था. उस के पिता चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में काम करते थे और वह उन से मिलती रहती थी.

लगभग 10 दिन बाद दीपक को पता चला कि प्लेन को क्लीयरैंस मिलने में अभी 10 दिन और लगेंगे. एक दिन दीपक ने इंस्ट्रक्टर से कहा कि उस की मास्को देखने की इच्छा है.

इंस्ट्रक्टर ने कहा, ‘‘ओचिन खराशो (बहुत अच्छा) शनिवार को नताशा भी किसी काम से मास्को जा रही है. तुम भी उसी की फ्लाइट से चले जाओ. मात्र 1 घंटे की फ्लाइट है.’’

‘‘स्पासिबा (थैंक्स) गुड आइडिया,’’ दीपक बोला और फिर उसी समय नताशा से फोन पर अपनी इच्छा बताई तो वह बोली नेत प्रौब्लेमा (नो प्रौब्लम).

दीपक बहुत खुश हुआ. उस ने अपने दोस्त से मास्को यात्रा की चर्चा करते हुए पूछा, ‘‘अगर मुझे किसी रूसी लड़की के कपड़ों की तारीफ करनी हो तो क्या कहना चाहिए?’’

जवाब में दोस्त ने उसे एक रूसी शब्द बताया. शनिवार को दीपक और नताशा मास्को पहुंचे. दोनों होटल में आसपास के कमरों में रुके. नताशा ने उसे क्रेमलिन, बोलशोई थिएटर, बैले डांस, रसियन सर्कस आदि दिखाए.

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1 अप्रैल की सुबह दोनों मिले. उसी दिन शाम को उन्हें मिंस्क लौटना था. नताशा नीले रंग के लौंग फ्रौक में थी, कमर पर सुनहरे रंग की बैल्टनुमा डोरी बंधी थी, जिस के दोनों छोरों पर पीले गुलाब के फूलों की तरह झालर लटक रही थी. फ्रौक का कपड़ा पारदर्शी तो नहीं था, पर पतला था जिस के चलते उस के अंत:वस्त्र कुछ झलक रहे थे. वह दीपक के कमरे में सोफे पर बैठी थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. तिह क्रासावित्सा (यू आर लुकिंग ब्यूटीफुल).’’

‘‘स्पासिबा (धन्यवाद).’’

वह नताशा की ओर देख कर बोला ‘‘ओचिन खराशो तृसिकी.’’

‘‘व्हाट? तुम ने कैसे देखा?’’

‘‘अपनी दोनों आंखों से.’’

‘‘तुम्हारी आंखें मुझ में बस यही देख रही थीं?’’

फिर अचानक नताशा सोफे से उठ खड़ी हुई और बोली, ‘‘मैं इंडियंस की इज्जत करती हूं.’’

‘‘दा (यस).’’

‘‘व्हाट दा. मैं तुम्हें अच्छा आदमी समझती थी. मुझे तुम से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ और फिर बिना दीपक की ओर देखे कमरे से तेजी से निकल गई.

दीपक को मानो लकवा मार गया. वह नताशा के कमरे के दरवाजे की जितनी बार बैल बजाता एक ही बात सुनने को मिलती कि चले जाओ. मैं तुम से बात नहीं करना चाहती हूं.

उसी दिन शाम की फ्लाइट से दोनों मिंस्क लौट आए. पर नताशा ने अपनी सीट अलग ले ली थी. दोनों में कोई बात नहीं हुई.

अगले दिन लंच के समय कारखाने की कैंटीन में दीपक, उस का मित्र, नताशा और इंस्ट्रक्टर एक टेबल पर बैठे थे. दीपक बारबार नताशा की ओर देख रहा था पर नताशा उसे नजरअंदाज कर देती. दीपक ने इंस्ट्रक्टर के कान में धीरे से कुछ कहा तो इंस्ट्रक्टर ने नताशा से धीरे से कुछ कहा.

नताशा से कुछ बात कर इंस्ट्रक्टर ने दीपक से पूछा, ‘‘तुम ने नताशा से कोई गंदी बात की थी? वह बहुत नाराज है तुम से.’’

‘‘मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की थी,’’ बोल कर दीपक ने जो आखिरी बात नताशा को कही थी उसे दोहरा दिया.

इंस्ट्रक्टर ने भी सिर पीटते हुए कहा, ‘‘बेवकूफ यह तुम ने क्या कह दिया? इस का मतलब समझते हो?’’

‘‘हां, तुम्हारी ड्रैस बहुत अच्छी है?’’

‘‘नेत (नो), इस का अर्थ तुम्हारी पैंटी बहुत अच्छी है, होता है बेवकूफ.’’

तब दीपक अपने मित्र की ओर सवालिया आंखों से देखने लगा. फिर कहा, ‘‘तुम ने ही सिखाया था यह शब्द मुझे.’’

नताशा भी आश्चर्य से उस की तरफ देखने लगी थी. दोस्त भी अपनी सफाई में बोला, ‘‘अरे यार मैं ने तो यों ही बता दिया था. मुझे लेडीज ड्रैस का यही एक शब्द आता था. मुझे क्या पता था कि तू नताशा को बोलने जा रहा है. आई एम सौरी.’’

फिर नताशा की ओर देख कर बोला, ‘‘आई एम सौरी नताशा. मेरी वजह से यह गड़बड़ हुई है. दरअसल, दीपक ने तुम्हारी ड्रैस की तारीफ करनी चाही होगी… यह बेचारा बेकुसूर है.’’

यह सुन कर सभी एकसाथ हंस पड़े.

दीपक ने नताशा से कहा, ‘‘ईजवीनीते (सौरी) नताशा. मैं ने जानबूझ कर उस समय ऐसा नहीं कहा था.’’

‘‘ईजवीनीते. प्रस्तिते (सौरी, ऐक्सक्यूज मी). हम दोनों गलतफहमी के शिकार हुए.’’

इंस्ट्रक्टर बोला, ‘‘चलो इसे भी एक अप्रैल फूल जोक समझ कर भूल जाओ.’’

इस के बाद नताशा और दीपक में मित्रता और गहरी हो चली. दोनों शालीनतापूर्वक अपनी दोस्ती निभा रहे थे. दीपक तो इस रिश्ते को धीरेधीरे दोस्ती से आगे ले जाना चाहता था, पर कुछ संकोच से, कुछ दोस्ती टूटने के भय से और कुछ समय के अभाव से मन की बात जबान पर नहीं ला रहा था.

इसी बीच दीपक के इंडिया लौटने का दिन भी आ गया था. एअरपोर्ट पर नताशा दीपक को बिदा करने आई थी. उस ने आंखों में छलक आए आंसू छिपाने के लिए रंगीन चश्मा पहन लिया. दीपक को पहली बार महसूस हुआ जैसे वह भी मन की कुछ बात चाह कर भी नहीं कर पा रही है. दीपक के चेहरे की उदासी किसी से छिपी नहीं थी.

‘‘दस्विदानिया, (गुड बाई), होप टु सी यू अगेन,’’ बोल कर दोनों गले मिले.

Serial Story: दस्विदानिया भाग 2

दीपक भारत लौट आया. नताशा से उस का संपर्क फोन से लगातार बना हुआ था. इसी बीच डिपार्टमैंटल परीक्षा और इंटरव्यू द्वारा दीपक को वायुसेना में कमीशन मिल गया. वह अफसर बन गया. हालांकि उस के ऊपर कोई बंदिश नहीं थी, उस के मातापिता गुजर चुके थे, फिर भी अभी तक उस ने शादी नहीं की थी.

इस बीच नताशा ने उसे बताया कि उस के पापा भी चल बसे. उन्हें कैंसर था. संदेह था कि चेर्नोबिल न्यूक्लियर प्लांट में हुई भयानक दुर्घटना के बाद कुछ लोगों में रैडिएशन की मात्रा काफी बढ़ गई थी. शायद उन के कैंसर की यही वजह रही होगी.

पिता की बीमारी में नताशा महीनों उन के साथ रही थी. इसलिए उस ने नौकरी भी छोड़ दी थी. फिलहाल कोई नौकरी नहीं थी और पिता के घर का कर्ज भी चुकाना था. वह एक नाइट क्लब में डांस कर और मसाज पार्लर जौइन कर काम चला रही थी. उस ने दीपक से इस बारे में कुछ नहीं कहा था, पर बराबर संपर्क बना हुआ था.

लगभग 2 साल बाद दीपक दिल्ली एअरपोर्ट पर था. अचानक उस की नजर नताशा पर पड़ी. वह दौड़ कर उस के पास गया और बोला, ‘‘नताशा, अचानक तुम यहां? मुझे खबर क्यों नहीं की?’’

नताशा भी अकस्मात उसे देख कर घबरा उठी. फिर अपनेआप को कुछ सहज कर कहा, ‘‘मुझे भी अचानक यहां आना पड़ा. समय नहीं मिल सका बात करने के लिए…तुम यहां कैसे?’’

‘‘मैं अभी एक घरेलू उड़ान से यहां आया हूं. खैर, चलो कहीं बैठ कर कौफी पीते हैं. बाकी बातें वहीं होंगी.’’

दोनों एअरपोर्ट के रेस्तरां में बैठे कौफी पी रहे थे. दीपक ने फिर पूछा, ‘‘अब बताओ यहां किस लिए आई हो?’’

नताशा खामोश थी. फिर कौफी की चुसकी लेते हुए बोली, ‘‘एक जरूरी काम से किसी से मिलना है. 2 दिन बाद लौट जाऊंगी.’’

‘‘ठीक है पर क्या काम है, किस से मिलना है, मुझे नहीं बताओगी? क्या मैं भी तुम्हारे साथ चल सकता हूं?’’

‘‘नहीं, मुझे वहां अकेले ही जाना होगा.’’

‘‘चलो, मैं तुम्हें ड्रौप कर दूंगा.’’

‘‘नेत, स्पासिबा (नो, थैंक्स). मेरी कार बाहर खड़ी होगी.’’

‘‘कार को वापस भेज देंगे. कम से कम कुछ देर तक तो तुम्हारे साथ ऐंजौय कर लूंगा.’’

‘‘क्यों मेरे पीछे पड़े हो?’’ बोल कर नताशा उठ कर जाने लगी.

दीपक ने उस का हाथ पकड़ कर रोका और कहा, ‘‘ठीक है, तुम जाओ, मगर मुझ से नाराजगी का कारण बताती जाओ.’’

नताशा तो रुक गई, पर अपने आंसुओं को गालों पर गिरने से न रोक सकी.

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दीपक के द्वारा बारबार पूछे जाने पर वह रो पड़ी और फिर उस ने अपनी पूरी कहानी बताई, ‘‘मैं तुम से क्या कहती? अभी तक तो मैं सिर्फ डांस या मसाज करती आई थी पर मैं पिता का घर किसी भी कीमत पर बचाना चाहती हूं. मैं ने एक ऐस्कौर्ट एजेंसी जौइन कर ली है. शायद आने वाले 2 दिन मुझे किसी बड़े बिजनैसमैन के साथ ही गुजारने पड़ेंगे. तुम समझ रहे हो न मैं क्या कहना चाहती हूं? ’’

‘‘हां, मैं समझ सकता हूं. तुम्हें किस ने हायर किया है, मुझे बता सकती हो?’’

‘‘नो, सौरी. हो सकता है जो नाम मैं जानती हूं वह गलत हो. मैं ने भी उसे अपना सही नाम नहीं बताया है. वैसे भी इस प्रोफैशन की बात किसी तीसरे आदमी को हम नहीं बताते हैं. मैं बस इतना जानती हूं कि मुझे 3 दिनों के लिए 4000 डौलर मिले हैं.’’

‘‘तुम उसे फोन करो, उसे पैसे वापस कर देंगे.’’

‘‘नहीं, यह आसान नहीं है. वह मेरी एजेंसी का पुराना भरोसे वाला ग्राहक है.’’

कुछ देर सोचने के बाद दीपक ने कहा ‘‘एक आइडिया है, उम्मीद है काम कर जाएगा. उस का फोन नंबर तो होगा तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, मुझे होटल का नंबर और रूम नंबर पता है.’’

‘‘गुड, तुम उसे फोन लगाओ और कहो कि तुम्हें कस्टम वालों ने पकड़ लिया है. तुम्हारे पर्स में कुछ ड्रग्स मिले. तुम्हें खुद पता नहीं कि कहां से ड्रग्स पर्स में आ गए और अब वही तुम्हारी सहायता कर सकता है.’’

नताशा ने फोन कर उस बिजनैसमैन से बात कर वैसा ही कहा.

उधर से वह फोन पर गुस्सा हो कर नताशा से बोला, ‘‘यू इडियट, तुम ने मेरे या

इस होटल के बारे में कस्टम औफिसर को क्या बताया है?’’

‘‘सर, मैं ने तो अभी तक कुछ नहीं बताया है… पर परदेश में बस आप का ही सहारा है. आप कुछ कोशिश करें तो मामला रफादफा हो जाएगा. मैं अपने डौलर तो साथ लाई नहीं हूं.’’

‘‘मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता हूं. खबरदार दोबारा फोन करने की कोशिश की.

अब तुम जानो और तुम्हारा काम… भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारे 4000 डौलर,’’ और उस ने फोन काट दिया.

बिजनैसमैन की बातें सुन कर दोनों एकसाथ खुशी से उछल पड़े. नताशा बोली, ‘‘अब तो मेरे डौलर भी बच गए. पापा के घर का काफी कर्ज चुका सकती हूं. मेरा रिटर्न टिकट तो 2 दिन बाद का है. फिर भी मैं कोशिश करती हूं कि आज रात की फ्लाइट मिल जाए,’’ कह वह रसियन एअरलाइन एरोफ्लोट के काउंटर की तरफ बढ़ी.

दीपक ने उसे रोक कर कहा, ‘‘रुको, इस की कोई जरूरत नहीं है. तुम अभी मेरे साथ चलो. कम से कम 2 दिन तो मेरा साथ दो.’’

दीपक ने नताशा को एक होटल में ठहराया. काफी देर दोनों बातें करते रहे. दोनोें एकदूसरे का दुखसुख समझ रहे थे. रात में डिनर के बाद दीपक चलने लगा. उसे गले से लगाते हुए होंठों पर ऊंगली फेरते हुए बोला, ‘‘नताशा, या लुवलुवा (आई लव यू). कल सुबह फिर मिलते हैं. दोबरोय नोचि (गुड नाइट).’’

‘‘आई लव यू टू,’’ दीपक के बालों को सहलाते हुए नताशा ने कहा.

अगले दिन जब दीपक नताशा से मिलने आया तो वह स्कारलेट कलर के सुंदर लौंग फ्रौक में बैठी थी. बिलकुल उसी तरह जैसे मास्को के होटल में मिली थी.

दीपक बोला, ‘‘दोबरोय उत्रो. क्रासावित्सा (गुड मौर्निंग, ब्यूटीफुल).’’

‘‘कौन ब्यूटीफुल है मैं या तृसिकी?’’ वह हंसते हुए बोली ‘‘दोनों.’’

‘‘यू नौटी बौय,’’ बोल कर नताशा दीपक से सट कर खड़ी हो गई.

दीपक ने उसे अपनी बांहों में ले कर कहा, ‘‘अब तुम कहीं नहीं जाओगी. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं. मैं कल ही अपनी शादी के लिए औफिस में अर्जी दे दूंगा.’’

‘‘आई लव यू दीपक, पर मुझे कल जाने दो. मैं ने पिता की निशानी बचाने के लिए अपनी अस्मिता दांव पर लगा दी… मुझे अपने देश जा कर सबकुछ ठीक करने के लिए मुझे कुछ समय दो.’’

अगले दिन नताशा एरोफ्लोट की फ्लाइट से मास्को जा रही थी. दीपक उसे छोड़ने दिल्ली एअरपोर्ट आया था. उस के चेहरे पर उदासी देख कर वह बोली, ‘‘उम्मीद है फिर जल्दी मिलेंगे. डौंट गैट अपसैट. बाय, टेक केयर, दस्विदानिया,’’ और वह एरोफ्लोट की काउंटर पर चैक इन करने बढ़ गई. दोनों हाथ हिला कर एकदूसरे से बिदा ले रहे थे.

कुछ दिनों बाद दीपक ने अपने सीनियर से शादी की अर्जी दे कर इजाजत मांगने की बात की तो सीनियर ने कहा, ‘‘सेना का कोई भी सिपाही किसी विदेशी से शादी नहीं कर सकता है, तुम्हें पता है कि नहीं?’’

‘‘सर, पता है, इसीलिए तो पहले मैं इस की इजाजत लेना चाहता हूं.’’

‘‘और तुम सोचते हो तुम्हें इजाजत मिल जाएगी? यह सेना के नियमों के विरुद्ध है, तुम्हें इस की इजाजत कोईर् भी नहीं दे सकता है.’’

‘‘सर, हम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हैं. मैं शादी उसी से करूंगा.’’

‘‘बेवकूफी नहीं करो, अपने देश में क्या लड़कियों की कमी है?’’

‘‘बेशक नहीं है सर, पर प्यार तो एक से ही किया है मैं ने, सिर्फ नताशा से.’’

‘‘तुम अपना और मेरा समय बरबाद कर रहे हो. तुम्हारा कमीशन पूरा होने में कितना वक्त बाकी है अभी?’’

‘‘सर, अभी तो करीब 12 साल बाकी हैं.’’

‘‘तब 2 ही उपाय हैं या तो 12 साल इंतजार करो या फिर नताशा को अपनी नागरिकता छोड़ने को कहो. और कोई उपाय नहीं है.’’

‘‘अगर मैं त्यागपत्र देना चाहूं तो?’’

‘‘वह भी स्वीकार नहीं होगा. देश और सेना के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य बनता है जो प्यार से ज्यादा जरूरी है, याद रखना.’’

‘‘यस सर, मैं अपनी ड्यूटी भी निभाऊंगा… मैं कमीशन पूरा होने तक इंतजार करूंगा,’’ कह वह सोचने लगा कि पता नहीं नताशा इतने लंबे समय तक मेरी प्रतीक्षा करेगी या नहीं. फिर सोचा कि नताशा को सभी बातें बता दे.

दीपक ने जब नताशा से बात की तो उस ने कहा, ‘‘12 साल क्या मैं कयामत तक तुम्हारा इंतजार कर सकती हूं… तुम बेशक देश के प्रति अपना फर्ज निभाओ. मैं इंतजार कर लूंगी.’’

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Serial Story: दस्विदानिया भाग 3

नताशा से बात कर दीपक को खुशी हुई. दोनों में प्यारभरी बातें होती रहती थीं. वे बराबर एकदूसरे के संपर्क में रहते. धीरेधीरे समय बीतता जा रहा था. करीब 2 साल बाद एक बार नताशा दीपक से मिलने इंडिया आई थी. दीपक ने महसूस किया उस के चेहरे पर पहले जैसी चमक नहीं थी. स्वास्थ्य भी कुछ गिरा सा लग रहा था.

दीपक के पूछने पर उस ने कहा, ‘‘कोई खास बात नहीं है, सफर की थकावट और थोड़ा सिरदर्द है.’’

दोनों में मर्यादित प्रेम संबंध बना हुआ था. एक दिन बाद नताशा ने लौटते समय कहा, ‘‘इंतजार का समय 2 साल कम हो गया.’’

‘‘हां, बाकी भी कट जाएगा.’’

बेलारूस लौटने के बाद से नताशा का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था. कभी जोर से सिरदर्द, कभी बुखार तो कभी नाक से खून बहता. सारे टैस्ट किए गए तो पता चला कि उसे ब्लड कैंसर है. डाक्टर ने बताया कि फिलहाल दवा लेती रहो, पर 2 साल के अंदर कुछ भी हो सकता है. नताशा अपनी जिंदगी से निराश हो चली थी. एक तरफ अकेलापन तो दूसरी ओर जानलेवा बीमारी. फिर भी उस ने दीपक को कुछ नहीं बताया.

इधर कुछ महीने बाद दीपक को 3-4 दिनों से तेज बुखार था.

वह अपने एअरफोर्स के अस्पताल में दिखाने गया. उस समय फ्लाइट लैफ्टिनैंट डाक्टर ईशा ड्यूटी पर थीं. चैकअप किया तो दीपक को 103 डिग्री से ज्यादा ही फीवर था.

डाक्टर बोली, ‘‘तुम्हें एडमिट होना होगा. आज फीवर का चौथा दिन है…कुछ ब्लड टैस्ट करूंगी.’’

दीपक अस्पताल में भरती था. टैस्ट से पता चला कि उसे टाईफाइड है.

डा. ईशा ने पूछा, ‘‘तुम्हारे घर में और कौनकौन हैं, आई मीन वाइफ, बच्चे?’’

‘‘मैं बैचलर हूं डाक्टर… वैसे भी और कोई नहीं है मेरा.’’

‘‘डौंट वरी, हम लोग हैं न,’’ डाक्टर उस की नब्ज देखते हुए बोलीं.

बीचबीच में कभीकभी दीपक का खुबार 103 से 104 डिग्री तक हो जाता तो वह नताशानताशा पुकारता. डा. ईशा के पूछने पर उस ने नताशा के बारे में बता दिया. डाक्टर ने नताशा का फोन नंबर ले कर उसे फोन कर दिया. 2 दिन बाद नताशा दीपक से मिलने पहुंच गई. उस दिन दीपक का फीवर कम था. नताशा उस के कैबिन में दीपक के बालों को सहला रही थी.

तभी डा. ईशा ने प्रवेश किया. बोलीं, ‘‘आई एम सौरी, मैं बाद में आ जाती हूं. बस रूटीन चैकअप करना है. आज इन्हें कुछ आराम है.’’

दीपक बोला, ‘‘नहीं डाक्टर, आप को जाने की जरूरत नहीं है. आप अपना काम कर लें… अब नताशा आ गई है, तो मैं ठीक हो जाऊंगा.’’

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डा. ईशा ने नताशा से पूछा, ‘‘तुम इंडिया कितने दिनों के लिए आई हो?’’

‘‘ज्यादा से ज्यादा 2 दिन तक रुक सकती हूं.’’

‘‘ठीक है, इन का बुखार उतरना शुरू हो गया है. उम्मीद है कल तक कुछ और आराम मिलेगा.’’

डाक्टर के जाने के बाद दीपक ने नताशा से पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? थकीथकी लग रही हो?’’

‘‘नहीं, मैं बिलकुल ठीक हूं. तुम आराम करो. मैं अभी चलती हूं. फिर आऊंगी शाम को विजिटिंग आवर्स में.’’

नताशा डा. ईशा से मिलने उन के कैबिन में गई तो डा. ईशा बोलीं, ‘‘आप लंच मेरे साथ लेंगी… मेरे क्वार्टर में आ जाना, मैं वेट करूंगी.’’

लंच के बाद नताशा डा. ईशा से बैठी बातें कर रही थी. डा. ईशा ने कहा, ‘‘क्या बात है, इंडियन खाना पसंद नहीं आया? तुम ने तो कुछ खाया ही नहीं. तुम्हें तो इंडियन खाने की आदत डालनी होगी.’’

‘‘नहीं, खाना बहुत अच्छा था. मैं ने भरपेट खा लिया है.’’

‘‘दीपक तुम्हें बहुत चाहते हैं… तुम्हारे लिए लंबा इंतजार करने को तैयार हैं.’’

उसी समय नताशा के सिर में जोर का दर्द हुआ और नाक से खून रिसने लगा. डा. ईशा उसे सहारा दे कर वाशबेसिन तक ले गई, फिर बैड पर आराम करने के लिए लिटा दिया और पूछा, ‘‘तुम्हें क्या तकलीफ है और ऐसा कितने दिनों से हो रहा है?’’

नताशा ने अपने बैग से दवा खाई और अपनी पूरी बीमारी विस्तार से बता दी. फिर अपनी फाइल और रिपोर्ट उन्हें दिखा कर कहा, ‘‘अब मेरी जिंदगी कुछ ही महीनों की बची है. डाक्टर ने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा 1 साल. मैं चाहती हूं आप दीपक को धीरेधीरे समझाएं… हो सकता है मैं इस के बाद अब उस से मिल न सकूं, क्योंकि लंबी यात्रा के लायक नहीं रहूंगी.’’

अगले दिन दीपक को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. वह अपने क्वार्टर में नताशा के साथ था. नताशा को अगले दिन जाना था. दीपक बोला, ‘‘मैं तो एअरफोर्स में हूं, मेरा विदेश जाना संभव नहीं है. तुम्हीं मिलने आ जाया करो. मुझे बहुत अच्छा लगता है तुम से मिल कर.’’

‘‘अच्छा तो मुझे भी लगता है, पर मुझे लगता है तुम्हारी देखभाल करने वाला कोई यहां होना चाहिए. मेरे इंतजार में कहीं तुम्हारे स्वास्थ्य पर बुरा असर न पड़े.’’

‘‘नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं वेट कर लूंगा.’’

नताशा जा रही थी. दीपक से बिदा लेते समय उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. डाक्टर ने दीपक को एअरपोर्ट जाने से मना कर दिया था.

नताशा बोली, ‘‘दस्विदानिया, दोस्त.’’

डा. ईशा नताशा के साथ एअरपोर्ट आई थीं.

नताशा बोली, ‘‘डाक्टर, अब मैं दीपक से मिलने नहीं आ सकती हूं…आप समझ ही रही हैं न… मैं ने दीपक से कुछ नहीं कहा है. पर आप उसे सच बता दीजिएगा.’’

नताशा चली गई. डा. ईशा ने उस की बीमारी के बारे में दीपक को बता दिया. वह बहुत दुखी हुआ. डा. ईशा दीपक से अकसर मिलने आतीं और उसे समझातीं. लगभग 6 महीने बाद नताशा का आखिरी फोन उसे मिला. वह अस्पताल में अंतिम सांसें गिन रही थी.

नताशा ने कहा, ‘‘सौरी दोस्त, मैं अब और तुम्हारा इंतजार नहीं कर सकती हूं. किसी भी पल आखिरी सांस ले सकती हूं. टेक केयर औफ योरसैल्फ. दस्विदानिया, प्राश्चे नवसेदगा (गुड बाय सदा के लिए).’’

करीब आधे घंटे के बाद नताशा की मृत्यु की खबर दीपक को मिली. वह बहुत दुखी हुआ. उस की आंखों से भी लगातार आंसू बह रहे थे. डा. ईशा दीपक को सांत्वना दे रही थी.

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बीमारी के बाद दीपक और ईशा दोनों अकसर मिलने लगे थे. एक दिन दोनों साथ बैठे थे. दीपक थोड़ा सहज हो चला था. वह बोला, ‘‘अकेलापन काटने को दौड़ता है.’’

‘‘आप देश के बहादुर सैनिक हो. अपना मनोबल बनाए रखो. ड्यूटी के बाद कुछ अन्य कार्यों में अपनेआप को व्यस्त रखो.’’

‘‘मैं नताशा को भुला नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘यादें इतनी आसानी से नहीं भूलतीं, पर कभीकभी यादों को हाशिए पर रख कर जिंदगी में आगे बढ़ना होता है. मैं भी उसे कहां भूल सकी हूं.’’

‘‘किसे?’’

‘‘फ्लाइंग अफसर राकेश से मेरी शादी तय हुई थी. हम दोनों एकदूसरे को चाहते भी थे, पर एक टैस्ट फ्लाइट के क्रैश होने से वह नहीं रहा.’’

‘‘उफ , सो सौरी.’’

कुछ दिन बाद क्लब में डा. ईशा और दीपक एक सीनियर अफसर स्क्वाड्रन लीडर उमेश के साथ बैठे थे. उमेश ने कहा, ‘‘तुम दोनों की कहानी मिलतीजुलती है. क्यों न तुम दोनों एक हो कर एकदूसरे के सुखदुख में साथ दो.’’

डा. ईशा और दीपक एकदूसरे को देखने लगे. उमेश ने महसूस किया कि दोनों की आंखों से स्वीकृति का भाव साफ छलक रहा है.

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