तेरा मेरा साथ: भाग 1

आज मुकदमे की आखिरी तारीख थी. पाखी सांस रोके फैसले के इंतजार में थी. उस ने दोनों बच्चों के हाथ कस कर पकड़ रखे थे. वकीलों की दलीलों के आगे वह हर बार टूटती, बिखरती और फिर अपनेआप को मजबूती से समेट कर हर तारीख पर अपनेआप को खड़ा कर देती.

क्याक्या आरोप नहीं लगे थे इन बीते दिनों में. हर तारीख पर जलील होती थी पाखी. 8 साल की शादी. सबकुछ तो ठीक ही था.

अरुण एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे. खुद का मकान, खातापीता परिवार, सासससुर और एक छोटा भाई व बहन. एक लड़की को और क्या चाहिए था. फूफाजी ने रिश्ता बताया था. पापा कितने खुश थे. कोई जिम्मेदारी नहीं. एक छोटी बहन है, वह भी शादी के बाद अपने घर चली जाएगी. पाखी उन्हें एक ही नजर में पसंद आ गई थी. पापा बहुत खुश थे.

‘आप लोगों की कोई डिमांड हो तो बता दीजिए…’ पाखी के पिताजी ने  कहा था.

पाखी को आज भी याद है… अरुण ने छूटते ही कहा था, ‘अंकल, मैं इतना कमा लेता हूं कि आप की बेटी को खुश रख लूंगा. आप अपनी बेटी को जो देना चाहें, दे सकते हैं, पर हमें कुछ नहीं चाहिए.’

पाखी की नजर में कितनी इज्जत बढ़ गई थी अरुण के लिए, पर…

‘‘कृपया शांति बनाए रखें. जज साहब आ रहे हैं,’’ इस आवाज ने पाखी की सोच को तेजी से ब्रेक लगा दिया. जज साहब ने बड़ी ही सधी आवाज में फैसला सुनाना शुरू किया.

‘‘वाद संख्या 15, साल 2018, अरुण सिंह बनाम पाखी सिंह के द्वारा याचिका दाखिल की गई थी. कोर्ट द्वारा 6 महीने का वक्त दिए जाने पर भी दोनों पक्ष साथ रहने को तैयार नहीं हैं. सो, यह अदालत तलाक के मुकदमे व बच्चों की कस्टडी के सिलसिले में मुकदमे का फैसला सुनाती है.

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‘‘हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13बी के अनुसार, दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों को सुनने के बाद अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि अरुण सिंह व पाखी सिंह दोनों की सहमति से उन का संबंध विच्छेद किया जाता है. चूंकि दोनों की संतानें अभी नाबालिग हैं और पाखी सिंह एक सामान्य गृहिणी हैं व आर्थिक रूप से कमजोर हैं, इसलिए अरुण सिंह पाखी सिंह को उन के भरणपोषण के अलावा बच्चों के पालनपोषण व भरणपोषण के लिए भी 10,000 रुपए खर्चे के तौर पर देंगे. साथ ही, यह अदालत महीने में 2 बार यानी हर 15 दिन पर पिता को अपने बच्चों से मिलने का अधिकार देने का फैसला सुनाती है. पाखी सिंह को इस संबंध में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.’’

जज साहब फैसला सुना कर चले गए. धीरेधीरे सभी लोग कमरे से बाहर निकल गए. पाखी बहुत देर तक यों ही बैठी रही. अरुण ने जातेजाते मुड़ कर उसे देखा. दोनों की आंखें टकरा गईं. न जाने कितने सवाल उन की आंखों में तैर रहे थे मानो दोनों एकदूसरे से पूछ रहे थे, अब तो खुश हो न… यही चाहते थे न हम. पर क्या सचमुच वे दोनों यही चाहते थे…

विवाह की वेदी पर ली गईं सारी कसमें एकएक कर के याद आ रही थीं… हिंदू विवाह सिर्फ एक संस्कार नहीं, सात जन्मों का नाता है. इसे कोई नहीं तोड़ सकता. एकदूसरे का हाथ थामे अरुण और पाखी ने भी तो यही कसमें खाई थीं. पर वक्त के थपेड़ों ने रिश्तों के धागों को तारतार कर दिया था.

पारिवारिक अदालत के बाहर तलाक के लिए खड़े दंपतियों को देख कर मन कैसाकैसा हो गया था. आखिर ऐसा  क्या हो जाता है, जो संभाला नहीं जा सकता. पाखी भी तो यही सोचती थी. पर उसे क्या पता था, जिंदगी उसे ऐसे  मोड़ पर ला कर खड़ा कर देगी.

क्या अधूरा रह गया था

पिताजी ने सबकुछ तो दिया. पर कहीं कुछ अधूरा सा था, जिस की भरपाई पाखी अपने आंसुओं से करती रही. बड़ी बहू… बहुत सारी जिम्मेदारियां उस के कंधों पर थीं. दिनभर वह चकरघिन्नी की तरह नाचती रहती, कभी पापा की दवा तो मांजी का नाश्ता, तो कभी सोनल का प्रोजैक्ट. कहने को तो सोनल उस की हमउम्र थी, पर 2 भाइयों की लाड़ली और एकलौती बहन. लाड़ के चलते वह कभी बड़ी न हो पाई.

पाखी हमेशा सोचती थी… हमउम्र हैं, सहेलियों की तरह चुटकियों में हर काम निबटा देंगे और देवर तो मेरे भाई सोनू की तरह ही है. जब सोनू का काम कर सकती थी, उस का क्यों नहीं. पर लोग सच कहते हैं, ससुराल तो ससुराल ही होती है.

पाखी की बचपन की सहेली हमेशा कहती थी, ‘पाखी किसी रिश्ते में कोई रिश्ता न ढूंढ़ना, तो खुश रहोगी.’ कितनी नादान थी वह. उसे क्या पता था, ससुराल पहुंचने से पहले ही एक छवि वहां बन चुकी थी, बड़े बाप की बेटी है, डिगरी वाली है. इन को कौन सम?ा सकता है.

मांजी अकसर कह देतीं, ‘वह तो अरुण ने शराफत में कह दिया कि दो जोड़ी कपड़ों में विदा कर दीजिए. इस के पापा मान भी गए. कितने अच्छेअच्छे रिश्ते आ रहे थे मेरे लाड़ले के लिए. पर हमारी ही मति मारी गई थी.’

पाखी हैरान सी देखती रह जाती. जिन डिगरियों को देख कर पापा का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता था, आज वही उलाहनों और तानों का जरीया बन गई थीं.

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अरुण भी खिंचेखिंचे से रहने लगे थे. पाखी भरेपूरे घर में अकेली रह गई थी. पाखी और अरुण में न के बराबर बातें होती थीं और जब कभी बातें होती भी थीं, धीरेधीरे बहस, फिर ?ागड़े का रूप ले लेतीं.

पाखी और अरुण के बीच ?ागड़े अपने मसलों को ले कर नहीं होते, पर आखिर पिस तो दोनों ही रहे थे. पाखी… पाखी, तुम ने बच्चों की फीस नहीं जमा  की, स्कूल से नोटिस आया है.

पाखी अरुण की आवाज सुन कर किचन से दौड़ी चली आई, ‘अरे, अभी तक फीस नहीं जमा हुई? मैं ने तो भैया को बोला था.’

‘मु?ा से… मु?ा से कब बोला भाभी?’

‘अरे भैया, आप उस दिन अपने दोस्त से मिलने जा रहे थे उसी तरफ, तब आप ही ने कहा था कि मैं जमा कर दूंगा,’ पाखी की आवाज सुन कर पापा, मांजी, सोनल कमरे से बाहर निकल आए, ‘क्या बात है भाई, सुबहसुबह इतना शोर क्यों मचा रखा है’.

‘पापा, देखिए न, बच्चों के स्कूल से नोटिस आया है कि अभी तक फीस जमा नहीं हुई है. मैं क्याक्या देखूं… घर या बाहर’.

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अरुण सिर पकड़ कर बैठ गए. मम्मी ने बेटे की ऐसी हालत देख कर पाखी पर ही चिल्लाना शुरू कर दिया, एक काम ठीक से नहीं कर पाती. पता नहीं, दिनभर करती क्या रहती है. हर चीज के लिए आदमी लगा हुआ है, तब भी महारानी को अपनेआप से फुरसत नहीं.’

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‘तो आज भी मेमसाहब मुझ पर एहसान लादने चली आई हैं. और वह भी इस रूप में? क्या इस स्त्री को तनिक भी लाजशरम नहीं है? जीवन की इस संध्या बेला में यह चटख, चमकीले कपड़े, झुर्री पड़े, बुढ़ाते चेहरे को छिपाने के यत्न में पाउडर और लिपस्टिक की महकतीगमकती परतें. आंखों के आरपार खिंचा सिनेतारिकाओं का सा काजल और चांदी के तारों को छिपाने के यत्न में नकली बालों का ऊंचा फैशनेबल जूड़ा देख कर वितृष्णा से उन के मुंह में ढेर सी कड़वाहट घुल गई.

इंद्रा से पति की बेरुखी छिपी न रह सकी, ‘‘तुम आज भी नाराज हो न? पर क्या कर सकती हूं, समय ही नहीं मिलता आने का.’’

‘‘मैं तो तुम से कोई सफाई नहीं मांग रहा हूं?’’

‘‘तो क्या मैं समझती नहीं हूं तुम्हें. जब देखो मुंह फुलाए पड़े रहते हो. पर सच कहती हूं कि एक बार उन विदेशी महिलाओं को देखते तो समझते. किस कदर भारत पर फिदा हो गई हैं. कहती हैं, ‘यहां की स्त्रियों की संसार में कहीं भी समता नहीं हो सकती. कितनी शांत, कितनी सरल और ममतामयी होती हैं. घर, पति और बच्चों में अनुरक्त. असली पारिवारिक जीवन अगर कहीं है तो केवल भारत में. एक हमारा देश है जहां स्त्रियों को न घर की चिंता होती है, न बच्चों की. और पति नाम का जीव? उसे तो जब चाहो पुराने जूते की तरह पैर से निकालो और तलाक दे दो,’’ वह हंसी, ‘‘हमारे महिला क्लब को देख कर भी वे बेहद प्रभावित हुईं…’’

सुरेंद्र पत्नी के गर्व से दमकते चेहरे को आश्चर्यचकित सा देखते रह गए. पति, घर, बच्चे, सुखी पारिवारिक जीवन, ममतामयी नारियां? यह सब क्या बोल रही है इंद्रा? क्या वह इस सब का अर्थ भी समझती है? यदि हां, तो फिर वह सब क्या था? जीवनभर पति को पराजित करने की दुर्दमनीय महत्त्वाकांक्षा, जिस के वशीभूत उस ने एक अत्यंत कोमल, अत्यंत भावुक हृदय को छलनी कर दिया. उन का सबकुछ नष्ट कर डाला.

‘‘तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो तो कहो, किसी के हाथ भिजवा दूंगी. मेरा मतलब है कुछ फल वगैरा या कोई किताब, कोई पत्रिका?’’

सूनीसूनी आंखें कुछ पल पत्नी के चेहरे पर जैसे कुछ खोजती रहीं, ‘‘जरूरत? डाक्टर को बुला दो, बस…’’

ठंडा, उदास स्वर इंद्रा को कहीं गहरे तक सहमाता चला गया.

‘‘कहिए, कोई खास बात?’’

सुरेंद्र ने डाक्टर सुधीर की आवाज सुन कर आंखों पर से हाथ हटाया, ‘‘जी, हां, डाक्टर साहब, इन्हें यहां से बाहर कर दीजिए.’’

डाक्टर सुधीर एकाएक सन्न रह गए. सुरेंद्र का कांपता स्वर, उन की आंखों में छलकता करुण आग्रह आखिर यह सब क्या है? कैसी अनोखी विडंबना है? पतिपत्नी के युगोंयुगों से चले आ रहे तथाकथित अटूट दृढ़ संबंधों का आखिर यह कौन सा रूप है? मृत्युशय्या पर पड़ा व्यक्ति सब से अधिक कामना अपने सब से प्रिय, सब से मधुर संबंधियों के सान्निध्य की करता है, और यह व्यक्ति है कि…

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एक असहाय सी दृष्टि उन्होंने इंद्रा पर डाली.

‘‘लेकिन, डाक्टर, मैं ने तो इन से कोई ऐसीवैसी बात नहीं की. मेरा मतलब है…’’ इंद्रा का चेहरा अपमान से स्याह पड़ गया था.

‘‘मैं समझता हूं, श्रीमती सुरेंद्र. लेकिन आप जब भी यहां आती हैं, इन का ब्लडप्रैशर बढ़ जाता है. और इन के ब्लडप्रैशर बढ़ने का अर्थ आप समझती हैं न, कितना खतरनाक हो सकता है? आज सारी रात ये सो नहीं पाएंगे. कई दिनों के बाद कल रात इन्हें नींद की गोलियों के बगैर नींद आई थी, मगर आज फिर पुरानी हालत हो जाएगी. आप समझने की कोशिश कीजिए.’’

डाक्टर के नम्रता और शालीनता में डूबे शब्द सुन कर इंद्रा का खून खौल गया. ‘‘हां, हां, मैं खूब समझती हूं. कितनी कठिनाई से समय निकाल कर इन्हें देखने आती हूं और ये हैं कि…ठीक है, अब नहीं आऊंगी.’’ झटके से पलट कर वह तेज कदम रखती हुई स्पैशल वार्ड के बाहर निकल गई.

‘‘पत्नी को देख कर आप को इतना उद्विग्न नहीं होना चाहिए, मिस्टर सुरेंद्र. आप समझदार हैं. जरा संयम रखिए,’’ डाक्टर सुधीर सुरेंद्र को अपनी स्नेह भीगी दृष्टि से सहला रहे थे.

‘‘बहुत नियंत्रण किया है अपनेआप पर, डाक्टर. बहुत सहा है इस कलेजे पर पत्थर रख कर, इसी आशा में कि शायद यह किसी दिन संभल जाएगी. पर अब नहीं सहा जाता. इस औरत को देखते ही मेरे दिमाग की नसें फटने लगती हैं. समझ में नहीं आता, क्या कर डालूं? उस का गला दबा दूं या अपना?’’  सुरेंद्र बेहद कातर हो उठे थे.

‘‘आप नहीं जानते, डाक्टर, मेरी इस दशा के लिए पूरी तरह यह औरत जिम्मेदार है. इस ने मेरा जीवन बरबाद कर दिया है. मेरा घर, मेरे बच्चे, मेरा सबकुछ. मैं इसे कभी माफ नहीं कर सकता. डाक्टर, थोड़ा सा ग्लूकोज दीजिए, प्लीज? बड़ी तकलीफ हो रही है सीने में. लगता है दिल डूबा जा रहा है जैसे…’’

ग्लूकोज पिला कर, नर्स को नींद का इंजैक्शन लगाने का आदेश दे कर डाक्टर सुधीर चले गए.

लेकिन नींद का इंजैक्शन और डाक्टर के सांत्वना में डूबे शब्द, सब मिल कर भी सुरेंद्र के मस्तिष्क की फटती नसों को शांति के सागर में न डुबो सके.

इंद्रा ने कुछ पलों के लिए आ कर उन की आर्द्र स्मृतियों के दर्द को फिर से कुरेद कर रख दिया था. यत्न से दबाई चिनगारियां जरा सी हवा पा कर फिर से सुलग उठी थीं.

तब नईनई नौकरी लगी थी उन की. नया शहर, नए मित्र, नया काम, सबकुछ नयानया. एक दिन घूमफिर कर लौटे थे तो पिता का पत्र मिला, ‘लड़की देखी है. सुंदर है, बीए कर रही है. घरखानदान अच्छा है. चाहो तो तुम भी आ कर देख जाओ.’

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उन्होंने सीधासादा सा उत्तर लिख दिया था, ‘आप सब ने देख लिया, पसंद कर लिया. फिर मैं क्या देखूंगा? पढ़ीलिखी लड़की है, जैसी भी है, अच्छी ही होगी. मुझे मंजूर है.’

इंद्रा की परीक्षा तक उन्हें रुकना पड़ा था. वे कुछ महीने उन्होंने कैसे काटे थे, मन हर समय उल्लास की सतरंगी किरणों से घिराघिरा सा रहता. विवाह के नाम से कलियां सी चटखने लगतीं. आंखों में खुमार सा उतर आता. वे क्या जानते थे कि यह विवाह उन के जीवन का सब से बड़ा कंटक बन कर उन के जीवन की दिशा ही मोड़ देगा, उन का सबकुछ अस्तव्यस्त कर डालेगा?

फिर एक दिन इंद्रा ने उन के साथ उन के घर में कदम रखा था. जीवनभर साथ देने की अनेक प्रतिज्ञाएं कर के दुखसुख में कदम से कदम मिला कर जीवन में आए संघर्षों से जूझने के वादे ले कर.

लेकिन उस के सारे वादे, सारी प्रतिज्ञाएं, वर्षभर के ही अंदरअंदर धूल चाटने लगी थीं.

बड़ी कंपनियां और टैक्स हैवन

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पद पाने के 100 दिनों में दुनियाभर की अमीर कंपनियों की नकेल कसने में सफलता पाने का पहला कदम उठा लिया. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जरमनी, कनाडा, इटली, जापान और यूरोपीय यूनियन ने तय किया है कि बड़ी कंपनियां अपना पैसा टैक्स हैवनों में ले जा कर छिपा नहीं पाएंगी. टैक्स हैवन माने जाने वाले वे देश हैं जो बहुत कम टैक्स चार्ज करते हैं. बहुत से देशों में काम करने वाली कंपनियां अपने हैडऔफिस इन देशों में खोल रही हैं ताकि दुनियाभर में कमाए पैसों पर वे नाममात्र का टैक्स दे कर सुरक्षित रख सकें.

अब फैसला हुआ है कि अगर किसी कंपनी का कारोबार तो एक देश में है पर टैक्स कम टैक्स चार्ज करने वाले देश में दिया जा रहा है तो वह देश अतिरिक्त कर लगाएगा. अब यह देखना है कि जहां मुनाफा कमाया जा रहा है वह इस बात का ऐसेस कैसे करता है. इस का मतलब है कि बड़ी कंपनियों को अपने लेखाजोखों में बड़ा परिवर्तन करना पड़ेगा.

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दूसरे शब्दों में इस का मतलब यह है कि विश्वभर में फैली और विश्वभर में कमा रही कंपनियां खतरे में हैं. इन में टैक और फार्मा कंपनियां ज्यादा हैं और इन्हीं में युवाओं को मोटी सैलरी मिलती है. दुनियाभर का टैलेंट असल में इन कंपनियों में जमा हो रहा है और ये टैलेंट जहां नएनए टैक उत्पाद बना रहे हैंवहीं सरकारों की नाक के नीचे अमीरगरीब की खाई को चौड़ा कर रहे हैं. ये युवा ही ऐसे प्रोग्राम बनाते हैं जिन के बलबूते पर कंपनियां अपने राज को राज रख पाती हैं. इन युवाओं के कारण कंपनियों के राज तो गुप्त हैं पर किसी सरकार का कोई राज छिपा नहीं है.

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ऐसी बहुत फिल्में बन चुकी हैं जिन में ये तेजतर्रार युवा ऐसे देश में बैठ कर काम कर रहे हैं जहां बड़े देशों के फौलादी हाथ नहीं पहुंच रहे पर टैक्नोलौजी के बल पर वे सरकार को घुटने टेकने को मजबूर कर रहे हैं. हर देश की सरकार इन युवाओं को अपने यहां बनाए रखना चाहती है पर बिना टैक्स दिए चल रही कंपनियां कई गुना अच्छा पैसा दे रही हैं. ये कंपनियां ऐसी माफिया हैं जो बिना बंदूकों के सरकारों का तख्ता पलट सकती हैं.

टैक्स हैवनों को भेदने का कदम अमीरगरीब के भेद की लड़ाई नहीं हैअभी तो यह बड़ी सरकारों की अपनी डिफैंस की लड़ाई है जो वे पैसे के बहाने से लड़ रही हैं.

Rani Chatterjee ने किया चंद दिनो में वेट लॉस, दिखने लगे थे स्ट्रैच मार्क्स

भोजपुरी इंडस्ट्री की सेल्फी क्वीन रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब एक्टिव रहती हैं. वह आए दिन सोशल मीडिया पर अपनी फोटोज और वीडियो शेयर करती रहती हैं. हाल ही में उन्होंने exercise करते हुए फोटोज शेयर की थी. जिसे फैंस ने खूब पसंद किया था.

रानी चटर्जी ने शेयर कीं सेल्फी

अब उन्होंने फिर जिम में सेल्फी लेते हुए कई फोटोज शेयर की हैं. इन फोटोज में रानी चटर्जी फिट दिखाई दे रही हैं. रानी का ये फोटोज सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. फैंस खूब कमेंट कर रहे हैं.

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फोटो पर फैंस ने किया ये कमेंट

इस फोटो पर एक यूजर ने लिखा है कि रानी जी स्टोमक में स्ट्रेच दिख रहे हैं लेकिन फिर भी आप अच्छी लग रही हैं तो वहीं दूसरे यूजर ने लिखा कैमरा तो अच्छा था ही लेकिन कैमरे में दिखने वाला इंसान बहुत-बहुत खूबसूरत है.

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वर्कफ्रंट की बात करे तो रानी चटर्जी एम.एक्स. प्लेयर पर रिलीज हुई वेब सीरीज ‘मस्तराम’ में नजर आई थीं. इस सीरीज में रानी चटर्जी ने अंशुमन झा के साथ कई बोल्ड सीन्स किए थे. भोजपुरी फिल्म ‘लेडी सिंघम’ में जल्द ही रानी चटर्जी नजर आएंगी. इस फिल्म में रानी चटर्जी के साथ बॉलीवुड अभिनेता शक्ति कपूर भी दिखाई देंगे.

 

बंगाली एक्ट्रेस मणि भट्टाचार्य कर रही हैं संजीव मिश्रा संग Bhojpuri Film

एक तरफ लोग भोजपुरी फिल्मों पर फूहड़ता व अश्लीलता परोसने का आरोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ हर दिन नई फिल्मों का निर्माण शुरू होता रहता है. अब कुछ लोग स्वस्थ मनोरंजन के अच्छा सामाजिक संदेश देने वाली भोजपुरी फिल्मों का निर्माण करने लगे हैं. इसी कड़ी में सोमवार को सीमा की जन्मभूमि सीतामढ़ी में ‘‘आयुष मोशन पिक्चर्स’’के बैनर तले निर्माण की जा रही भोजपुरी फिल्म ‘‘प्रोडक्शन न.1’’की शूटिंग शुरू हुई .

शूटिंग  के बीच कामिनी विवाह भवन पुनैरा में फिल्म के कलाकार संजीव मिश्रा ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा-‘‘मैं बड़ा ही भाग्यशाली हूँ कि मुझे अपनी जन्म धरती पर फिल्म की शूटिंग करने का अवसर मिला है. मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की बात हो ही नही सकती है.एक तो यह एक पवित्र धरती है,यहां पर किसी फिल्म का शूटिंग होना मेरे लिए बहुत ही गौरव की बात होती है. मैं अपने किरदार को अभी ज्यादा खुद नहीं बता सकता.मगर इस फिल्म में मैं अति सशक्त किरदार निभा रहा हूं.’’

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जबकि इस फिल्म में मुख्य किरदार निभा रही अभिनेत्री मणि भट्टाचार्य ने कहा-‘‘मैं तो मूलतः बंगाली हुई. मेरी मातृभाषा बंगला है. लेकिन मुझे भोजपुरी फिल्में करने में आनंद आता है.सीतामढ़ी की धरती पर मैं पहली बार आई हूं.यहाँ शूटिंग करके अच्छा लग रहा है.’’

फिल्म के निर्देशक सतेंद्र तिवारी ने कहा-‘‘माना कि ‘प्रोडक्शन न.1’मेरे निर्देशन की पहली फिल्म है,पर मैं इसे एक सर्वश्रेष्ठ फिल्म बनाने में अपनी तरफ से कोई कसर नही छोड़ूंँगा. दर्शको को फूल एंटरटेन करूँगा.फिल्म की कहानी पूरी तरह से पारिवारिक परिवेश पर केंद्रित है.जिसमे एक्शन,इमोशन,रोमांस और कॉमेडी का तड़का भी है.फिल्म की शूटिंग सीतामढ़ी जिले के रमणीय जगहों पर की जा रही है.’’

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फिल्म का निर्माण ‘आयुष मोशन पिक्चर्स’के बैनर तले किया जा रहा है.इसके लेखक कृष्णा झा, संगीतकार संतोष कुमार(सोनू आनंद),गीतकार वीरेंद्र पांडेय,हरेराम डेंजर,कैमरामैन चन्द्रिका प्रसाद,एक्शन डायरेक्टर दिनेश यादव हैं.फिल्म के मुख्य कलाकार हैं-संजीव मिश्रा,मणि भट्टाचार्य,आयुषी तिवारी,अनूप अरोड़ा,विनोद मिश्रा ,नीलम पांडेय,दिनेश सिंह बागड़ी, शिखा चौबे,रत्नेश वर्णवाल, भूताली मैन, आशीष सिंह(मंटू)सन्नी कुमार व अन्य.

ससुराल में ऐसे हुआ Disha Parmar का गृहप्रवेश, हंस-हंसकर हुआ बुरा हाल

बिग बॉस 14 फेम राहुल वैद्य (Rahul Vaidya) और दिशा परमार (Disha Parmar) हाल ही में शादी के बंधन में बंध गए हैं. शादी से जुड़े हर रस्म की फोटोज और वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. फैंस इन फोटोज और वीडियो को खूब पसंद कर रहे हैं.

बता दें कि राहुल वैद्य ने  नेशनल टीवी दिशा को शादी के लिए प्रपोज किया था. राहुल वैद्य ने दिशा परमार से पूछा था कि क्या वो उनसे शादी करना चाहती हैं. दिशा परमार ने जवाब में हां कहा. दोनों अपनी लवस्टोरी के लिए सुर्खियों में छाए रहे.

 

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राहुल-दिशा की शादी  हुई धूमधाम से 

फैंस को राहुल-दिशा की शादी का बेसब्री से इंतजार था. और हाल ही में दोनो ने सात फेरे लिए. अब राहुल-दिशा की गृहप्रवेश की वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही है. जिसमें दिशा का हंस-हंसकर बुरा हाल हो रहा है. जी हां, गृहप्रवेश के दौरान राहुल-दिशा खूब हंस रहे हैं.

 

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गृहप्रवेश पर खूब हंसी दिशा परमार

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि दिशा परमार का अपने ससुराल में गृह-प्रवेश हो रहा है. इस दौरान लोग उन पर फूलों की बरसात कर रहे हैं. यह प्यार देखकर दिशा परमार खूब खुश हो रही हैं.

 

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दुल्हन बनीं दिशा परमार ने रेड कलर का लहंगा पहना हुआ था. वह काफी खूबसूरत लग रही थी. तो वहीं राहुल वैद्य व्हाइट गोल्डन कलर की शेरवानी में नजर आ रहे थे. वह भी काफी Handsome लग रहे थे.

Anupamaa और बा का अंदाज देखकर क्रेजी हुए फैंस, वायरल हुआ ये Insta रील

रुपाली गांगुली और सुधांशु पांडे स्टारर सीरियल अनुपमा (Anupamaa) हर हफ्ते टीआरपी चार्ट में नम्बर वन पर कब्जा जमाए हुए है. शो में अनुपमा का किरदार निभाने वाली एक्ट्रेस रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रही हैं.

वह ऑनस्क्रीन बहुत इमोशनल दिखाई देती हैं लेकिन वह रियल लाइफ में जमकर मौज मस्ती करती हैं. रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) अक्सर शो से रिलेटेड या अपने पर्सनल लाइफ की फोटोज और वीडियोज शेयर करती रहती हैं.

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वायरल हो रहा है ये इंस्टा रील 

 

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अब हाल ही में उन्होंने शो की शूटिंग के दौरान बनाई गई एक इंस्टा रील शेयर की है. जिसमें अनुपमा और बा नजर आ रहे हैं. जी हां, अनुपमा यानी रुपाली गांगुली  ने अपनी सास बा यानी अल्पना बुच  के साथ इंस्टा रील में नजर आ रही हैं. दोनों ही एक्ट्रेसेज हाथ में छाता लिए खड़ी हुई हैं और लिप सिन्क वीडियो बना रही हैं.

अनुपमा और बा ने ‘कभी खुशी कभी गम’ के डायलॉग पर बनाईं रील 

इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि अनुपमा ने हाथ में ग्रे कलर का छाता ले रखा है. और बा के हाथ में भी लाल रंग का छाता है. दोनों ही एक्ट्रेसेज  ‘कभी खुशी कभी गम’ के डायलॉग पर रील बनाती नजर आ रही हैं. रुपाली ने वीडियो को शेयर करते हुए लिखा है कि ओह हैलो मिसेज ब्राइटली. ओह हैलो शुगर. क्या आप इस फिल्म का नाम गेस कर सकते हैं?

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वनराज के कैफे की अनुपमा बनी पहली कस्टमर

शो के करेंट ट्रैक की बात करे तो वनराज  के कैफे के साथ-साथ पूरा परिवार लीला कैफे के उद्घाटन के बाद कस्टमर का इंतजार करेगा लेकिन एक भी कस्टमर नहीं आएगा.तभी अनुपमा पूरे परिवार को एक-एक ऑर्डर टेबल पर बैठने के लिए कहेगी.

 

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वनराज पूछेगा कि आखिर उसने ऐसा क्यों कहा, तभी अनुपमा कहेगी कि मार्केटिंग का यही तरीका होता है. जिस दुकान पर ज्यादा कस्टमर होते हैं, लोग वहीं ज्यादा आते हैं. अनुपमा की ये बात सुनकर वनराज हैरान हो जाएगा और उसकी खूब तारीफ करेगा तो वहीं काव्या जल-भून जाएगी. शो के अपकमिंग एपिसोड में ये देखना दिलचस्प होगा कि वनराज के कैफे में कस्टर की भीड़ होती है या नहीं.

Satyakatha- चाची के प्यार में बना कातिल: भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

14जून, 2021 की सुबह के 5 बजे का वक्त रहा होगा. सचिन उठते ही सब से पहले अपने घेर की तरफ चला गया. सचिन के पिता चंद्रपाल घर के पीछे बने जानवरों के घेर में ही सोते थे. घेर में जाते ही सचिन की निगाह पिता की चारपाई पड़ी, तो उस की जोरदार चीख निकल गई. चंद्रपाल की चारपाई खून से लथपथ पड़ी थी. चंद्रपाल के ऊपर पड़ी चादर तो लहूलुहान थी ही, साथ ही तमाम खून उस की चारपाई के नीचे भी पड़ा था.

सचिन की चीखपुकार सुन कर आसपड़ोस के लोग भी जाग गए थे. देखते ही देखते चंद्रपाल के घेर में लोगों का जमावड़ा लग गया. चारपाई के पास खून से सनी एक ईंट भी पड़ी थी. हालांकि चंद्रपाल की हालत देखते हुए कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस की सांसें अभी भी चल रही होंगी, इस के बावजूद भी सचिन पिता को अस्पताल ले गया. जहां पर डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था.

इस घटना की जानकारी पुलिस को अस्पताल के द्वारा ही पता चली थी. यह घटना उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा की थी. सूचना पाते ही कुंडा थानाप्रभारी अरविंद चौधरी कुछ कांस्टेबलों को साथ ले कर सीधे काशीपुर एल.डी. भट्ट अस्पताल पहुंचे. सरकारी अस्पताल में ही पुलिस ने मृतक के परिजनों से घटना की जानकारी जुटाई.

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इस के बाद एसआई महेश चंद ने शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. बाद में पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंच कर खून से सनी ईंट और अन्य सबूत जुटाए.

पुलिस केस की जांच में जुट गई. सचिन ने पुलिस को बताया कि 2 दिन पहले ही उस के पिता के साथ उस की चाची सविता की किसी बात को ले कर तूतूमैंमैं हुई थी. लेकिन उसे उम्मीद है कि उस की चाची इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकती.

यह जानकारी सचिन के लिए मायने नहीं रखती थी

यह जानकारी भले ही सचिन के लिए कोई मायने नहीं रखती थी. लेकिन पुलिस के लिए यह सूत्र अहम मायने रखता था. पुलिस ने सविता को पूछताछ के लिए अपनी हिरासत में ले लिया.

पूछताछ के दौरान सविता ने साफ शब्दों में जबाव दिया कि वह अपने जेठ का खून क्यों करेगी. उस के जेठ तो उस के बच्चों को बहुत ही प्यार करते थे. उसी दौरान चंद्रपाल के छोटे भाई ने बताया कि सविता का चालचलन ठीक नहीं है. वह 2 दिन पहले ही अपने भतीजे मंजीत को ले कर मुरादाबाद भाग गई थी. उसी बात को ले कर चंद्रपाल ने उसे काफी डांटफटकार लगाई थी.

यह जानकारी मिलते ही पुलिस समझ गई कि माजरा क्या है. इस से पहले मंजीत कहीं भाग पाता, पुलिस ने उसे भी अपनी कस्टडी में ले लिया और दोनों को थाने ले आई. थाने ला कर दोनों से कड़ी पूछताछ हुई.

पुलिस ने इस मामले में मंजीत से पूछताछ की

पुलिस ने मंजीत से इस मामले में पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस रात तो वह फैक्ट्री में काम करने गया हुआ था. ऐसे में वह अपने ताऊ की हत्या कैसे कर सकता है.

इस सच्चाई को जानने के लिए पुलिस की एक टीम उस फैक्ट्री में भी गई. वहां पर सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी तो सचमुच मंजीत की एंट्री वहां दर्ज थी. उपस्थिति वाले रजिस्टर पर उस के हस्ताक्षर भी मौजूद थे. यह सब देख कर पुलिस की जांच पर पानी फिर गया.

पुलिस ने इस बारे में सविता के पति रामपाल से पूछताछ की. रामपाल ने बताया कि वह सारे दिन मेहनतमजदूरी कर इतना थक जाता है कि सोने के बाद उसे होशोहवास नहीं रहता.

उसी जांचपड़ताल के दौरान पुलिस की नजर रामपाल के दरवाजे पर पड़ी. जिस पर खून की अंगुलियों के निशान साफ नजर आ रहे थे. फिर पूरे घर की तलाशी ली गई. तभी पुलिस को बाथरूम में खून से सना एक कपड़ा भी मिला, जिस से खून साफ किया गया था.

यह सब तथ्य जुटाने के बाद पुलिस ने मंजीत और सविता से अलगअलग पूछताछ की. जिस के दौरान थानाप्रभारी ने सविता से सीधा प्रश्न किया, ‘‘हमें तुम्हारी सारी सच्चाई पता चल गई है. हमें बाथरूम में वह कपड़ा भी मिल गया, जिस से खून साफ किया गया था. यह बात तो पक्की है कि चंद्रपाल की हत्या में तुम्हारा पूरा हाथ है. तुम्हारे लिए यही सही है कि सीधेसीधे सब कुछ बता दो. तुम ने चंद्रपाल की हत्या क्यों की.’’

पुलिस पूछताछ में सविता ज्यादा देर तक नहीं टिक पाई. उस ने बता दिया कि उस ने ही भतीजे के साथ मिल कर अपने जेठ की हत्या की है. सविता के बाद पुलिस ने मंजीत को अलग ले जा कर कहा कि तुम्हारी प्रेमिका चाची ने हमें सब कुछ बता दिया है. लेकिन हम तुम से केवल इतना जानना चाहते हैं कि तुम ने फैक्ट्री में ड्यूटी करते हुए भी किस तरह से चंद्रपाल की हत्या की?

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मंजीत भी कच्चा खिलाड़ी था. उस ने भी पुलिस को सब कुछ साफसाफ बताते हुए अपना जुर्म कबूल कर लिया था. इस केस के खुलने के बाद जो चाचीभतीजे की प्रेम कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

यह मामला उत्तराखंड के जिला ऊधमसिंह नगर के कुंडा थाना से उत्तर दिशा में लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित गांव टीले का है. बहुत पहले गांव मैरकपुर पाकवाड़ा, मुरादाबाद निवासी सुमेर सिंह रोजीरोटी की तलाश में यहां आए और यहीं के हो कर रह गए.

सुमेर सिंह के 4 बेटे थे, जिन में चंद्रपाल सब से बड़ा, उस के बाद विक्रम तथा रामपाल सब से छोटा था. समय के साथ तीनों की शादियां भी हो गईं. शादी होते ही सभी भाइयों ने अपनी गृहस्थी संभाल ली और अलगअलग मकान बना कर रहने लगे थे.

अब से 5 साल पहले चंद्रपाल का चचेरा भाई करन अपने परिवार से मिलने आया था. करन ने यहां का रहनसहन देखा तो वह भी यहीं का दीवाना हो गया.

करन के परिवार से संबंध रखने के कारण चंद्रपाल ने उसे रहने के लिए अपने ही घर में शरण दी थी.

रामपाल की शादी काशीपुर के टांडा उज्जैन से हुई थी. रामपाल शुरू से ही सीधेसरल स्वभाव का था. जबकि रामपाल की बीवी शहर की रहने वाली और तेजतर्रार थी. शादी के बाद गांव का रहनसहन उसे पसंद नहीं था.

एक साल उस ने जैसेतैसे उस के साथ काटा और फिर उस ने रामपाल से संबंध विच्छेद कर लिया. उस समय तक उस की बीवी के कोई औलाद पैदा नहीं हुई थी. रामपाल की बीवी उसे छोड़ कर चली गई तो रामपाल उदास रहने लगा.

इस के बाद भाइयों ने फिर से रामपाल की शादी मुरादाबाद जिले के टांडा स्वार के मानपुर की रहने वाली सविता से करा दी. सविता के साथ दूसरी शादी हो जाने से रामपाल खुश रहने लगा था.

रामपाल सुबह ही मेहनतमजदूरी करने के लिए घर से निकल जाता, फिर देर शाम ही घर पहुंच पाता था. गुजरते समय के साथ सविता 2 बच्चों की मां भी बन गई. हालांकि सविता पहले से ही देखनेभालने में सुंदर थी, लेकिन 2 बच्चों को जन्म देने के बाद तो उस की देह और भी चमक उठी थी.

रामपाल के मकान के सामने ही करन सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस वक्त करन का बड़ा बेटा मंजीत जवानी के दौर से गुजर रहा था. मंजीत आवारा किस्म का था. हर समय वह अपनी चाची सविता के पास ही पड़ा रहता था.

उस के साथ रहने से सविता को एक सब से बड़ा फायदा था कि वह उस के बच्चों को संभालने में उस की मदद करता था. सविता को जब कभी भी अपने घर का कामकाज निपटाना होता था तो वह अपने बच्चों को मंजीत के पास ही छोड़़ देती थी.

कुसगंति से मंजीत के मन में गंदगी पनपनी शुरू हुई तो चाची के प्रति उस की सोच भी बदल गई थी.

हालांकि सविता उसे अपने भतीजे के रूप में ही देखती आ रही थी. लेकिन जैसे ही मंजीत का बदलता नजरिया देख कर सविता के मन में भी उथलपुथल पैदा हो गई. उसे अब पति रामपाल का शरीर कुछ थकाथका सा महसूस होने लगा था.

कई बार सविता बच्चों को मंजीत को सौंप कर उसी के सामने नहाने लगती थी, जिसे आंख चुरा कर देखने में मंजीत की आंखों को बहुत ही सुख मिलता था.

सविता नहाने के बाद अपने तन को तौलिए से ढंक कर कमरे में जाती तो मंजीत की हवस भरी निगाहें उस के शरीर का पीछा करती रहती थीं. फिर एक दिन ऐसा भी आया कि सविता कमरे में तौलिए से अपने तन का पानी पोंछ रही थी, उसी दौरान उस के हाथ से तौलिया छूटा और नीचे गिर गया.

सविता ने बड़ी ही फुरती से तौलिया उठाने की कोशिश की तो सामने दरवाजे के सामने ही मंजीत खड़ा देख रहा था.

‘‘अरे मंजीत, तुम यहां? तुम ने कुछ देखा तो नहीं?’’

‘‘नहींनहीं चाची, मैं ने कुछ नहीं देखा.’’

मंजीत की बात सुनते ही सविता मुसकराई, ‘बुद्धू कहीं का, पूरा सीन हो गया, लेकिन ये कुछ समझने को तैयार ही नहीं.’

अगले भाग में पढ़ें- उस दिन दोनों के बीच चाचीभतीजे के रिश्ते तारतार हुए

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