रेप के झूठे मामलों में फंसाए जाने वाले पीड़ितों पर बनी डॉक्यूमेंट्री ‘इंडियाज़ सन्स’ की स्पेशल स्क्रीनिंग

दीपिका नारायण भारद्वाज और नीरज कुमार द्वारा निर्देशित डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘इंडियाज़ सन्स’ की स्पेशल स्क्रीनिंग हाल ही में मुम्बई के बांद्रा स्थित सेंट एंड्रयूज ऑडिटोरियम में संपन्न हुई.

उल्लेखनीय है कि ‘इंडियाज़ सन्स’ कोई आम डॉक्यूमेंट्री फिल्म नहीं है, बल्कि इसमें एक ऐसे मसले को उठाया गया है जिसकी तरफ कोई ध्यान देना पसंद नहीं करता है. इसमें दिखाया गया है कि कैसे बलात्कार से जुड़े कानून का बेजा इस्तेमाल कर शादीशुदा मर्दों को फंसाया जाता है. ऐसे लोग जो सालों सलाखों के पीछे गुज़ारने के बाद निर्दोष करार दिये जाते हैं और बाद में कानूनी रूप से उन्हें रिहा कर दिया जाता है.

इस फ़िल्म का निर्माण शोनी कपूर ने किया है जबकि मुंबई में इस फ़िल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग का आयोजन फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन की संस्थापक किरण श्रीवास्तव की ओर से किया गया था. फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन महिला सशक्तिकरण के लिए काम करनेवाली एक ऐसी संस्था है जो लैंगिक भेदभाव के बग़ैर सभी को समान हक़ और न्याय दिलाने की वकालत करती है.

इस ख़ास स्क्रीनिंग के मौके पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी. एन. कृष्णा एक विशेष अतिथि के रूप में मौजूद थे. उन्होंने इस डॉक्यूमेंट्री को देखने के बाद कहा, “यह फिल्म बेहद सटीक ढंग से इस बात को दर्शाती है कि कैसे पैसों की उगाही और बदले की भावना से लोग अपनी निजी हितों को सर्वोपरि रखते हुए क़ानूनों का बेजा इस्तेमाल करते हैं |  यह इसलिए भी हो रहा है क्योंकि पुलिस और न्यायपालिका का नज़रिया भी निष्पक्ष नहीं है. बेकसूरों के साथ ग़लत बर्ताव कर  महिलाओं के लिए न्याय की मांग करना ग़लत है |  मैं बलात्कार से जुड़े कानूनों का दूसरा पहलू सशक्त ढंग से पेश करने के लिए डायरेक्टर दीपिका नारायण भारद्वाज और ‘इंडियाज़ सन्स’ की पूरी टीम तारीफ करना चाहता हूं और उन्हें बधाई देता हूं. इस मसले पर हमें गंभीरता के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए क्योंकि ऐसे झूठे मामलों से असली पीड़ितों का भी न्याय व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है.”

गौरतलब है कि ‘इंडियाज़ सन्स’ की स्क्रीनिंग खत्म होने के बाद सभी दर्शकों ने खड़े होकर देर तक तालियां बजाईं और फिल्म की खूब सराहना की. फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन की संस्थापक ने इस मौके पर कहा, “फ़ेमपावरमेंट फाउंडेशन के ज़रिए मैं महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ती हूं और महिला अचीवर्स पर गौरवान्वित भी महसूस करती हूं. मगर इसे विसंगति ही कहेंगे कि आज में देश के बेटों व मर्दों के हक की बात कर रही हूं. यह बात भले ही कितनी भी विसंगतिपूर्ण क्यों ना लगे, मगर एक सिक्के का दूसरा पहलू भी होता है. ऐसे समय में जब महिलाएं तेज़ी से सशक्तिकरण की ओर बढ़ रही हैं, ऐसी भी कई महिलाएं हैं जो अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करने से बाज़ नहीं आती हैं और इसके इसके बारे में बात करना बहुत ज़रूरी है.”

वे आगे कहती हैं, “मैं इस बात में यकीन करती हूं कि जैसे-जैसे किसी शख़्स की ताक़त में इज़ाफ़ा होता है, वैसे वैसी उसकी ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती जाती हैं. इसे महज़ स्पाइडरमैन द्वारा कही गयी बात मत समझिए, बल्कि इसका एहसास करना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जल्द ही दुनिया को एक ‘स्पाइडर वुमन’ की भी ज़रूरत पड़नेवाली है! ऐसे में ज़रूरी है कि हम महिलाओं की बढ़ती शक्ति के साथ-साथ महिलाओं की ज़िम्मेदारियों पर भी गहन तरीके से विचार-विमर्श करें.”

फ़िल्म ‘इंडियाज़ सन्स’ की डारेक्टर दीपिका नारायण भारद्वाज कहती हैं, “हम अक्सर सभी बेटियों के हक के लिए तो आवाज़ उठाते ही, लेकिन अब समय आ गया है कि हम अब अपने देश के बेटों को न्याय दिलाने के लिए पहल करें और इस दिशा में अपनी आवाज को बुलंद करें.”

लोकतंत्र से गैंगरेप

हाथरस में गैंगरेप की घटना को प्रदेश सरकार के हठ ने देश के सामने ‘लोकतंत्र से गैंगरेप‘ सा बना दिया. लड़की की चिता की राख भले ही बुझ गई हो, पर इस से भड़का विरोध ठंडा नहीं पड़ेगा. कोर्ट से ले कर बिहार के चुनाव तक तमाम सवाल भाजपा को सपने में भी डराते रहेंगे.

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ‘ठाकुरवाद’ को ले कर पक्षपात करने का आरोप गहरा होता चला जा रहा है. कुलदीप सेंगर और स्वामी चिन्मयानंद के बाद हाथरस कांड में यह साबित हो गया है. ऐसे में योगी आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठे रहना भाजपा के लिए नुकसानदायक होगा.

उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक एससी समाज की लड़की के साथ दंबगों द्वारा बाजरे के खेत में सुबहसुबह किया गया गैंगरेप भले की समाज की आंखों के सामने नहीं हुआ, पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पुलिस ने सब की आंखों के सामने लड़की की लाश को जबरन जला कर ‘लोकतंत्र से गैंगरेप‘ किया है.

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गैंगरेप की शिकार हाथरस की रहने वाली 20 साल की उस लड़की को गंभीर हालत में 28 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में भरती कराया गया था जहां अगले दिन उस की मौत हो गई. उत्तर प्रदेश पुलिस ने मौत के इस राज को दफन करने के लिए लड़की की लाश उस के घर वालों को नहीं सौंपने का फैसला किया. पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल से ही लड़की की लाश को अपने कब्जे में ले लिया. घर वालों को इस बात का डर पहले से हो रहा था. इस वजह से उन्होंने मीडिया में यह शिकायत करनी शुरू कर दी थी कि उत्तर पुलिस इंसाफ नहीं कर रही है.

उस लड़की के साथ 14 सितंबर को गैंगरेप से ले कर 28 सितंबर तक अस्पताल में जिस तरह से उस के साथ लापरवाही की जा रही थी, उस से लड़की के परिवार वालों को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर भरोसा नहीं रह गया था. यही वजह थी कि वे हाथरस से 200 किलोमीटर दूर दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में लड़की को इलाज के लिए ले कर गए. उन को पता था कि अगर हाथरस से 400 किलोमीटर दूर लखनऊ जाएंगे तो वहां उन के हालात को किसी के सामने नहीं आने दिया जाएगा.

दिल्ली में मीडिया की चर्चा में आने के बाद भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने पूरी तानाशाही की. लाश को ले कर एंबुलैंस सीधे लड़की के गांव के लिए निकल गई. अस्पताल में ही उस के परिवार वालों को लडकी की लाश देखने तक नहीं दी गई. लड़की के परिवार के साथ मीडिया की कुछ गाड़ियों ने एंबुलैंस का पीछा किया.

लड़की के भाई संदीप ने कहा, ‘हम लोगों को चेहरा तक नहीं दिखाया. उलटा भारी पुलिस बल उन्हें रोकने के लिए लगा दिया. पुलिस ने जानवर का रूप ले लिया था और वह दरिंदों के साथ खड़ी हो गई. मां अपनी बेटी की लाश देखना चाहती थी और वह पुलिस से गिड़गिड़ाती रही, पर पुलिस ने मुंह तक नहीं देखने दिया. मां आंचल फैला कर भीख मांगती रही पर पुलिस ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार दीं.’

और भी दर्द दिया

हाथरस तक पहुंचने के लिए पुलिस ने पुराने रास्ते का इस्तेमाल किया, जबकि लड़की के परिवार वाले और मीडिया दूसरे रास्ते से गांव पहुंच रहे थे. एंबुलैंस में लाश ले कर पुलिस जब लड़की के घर के सामने से गुजर रही थी तो वहां मौजूद उस के घर वालों ने गाड़ी को बीच में रोक लिया.

लड़की की मां और उस की भाभी गाड़ी के ऊपर ही सिर पीटपीट कर रो रही थीं. मां का कहना था, ‘हम बेटी की अंतिम क्रिया से पहले उस को नहला कर नए कपड़े पहना कर हलदी लगाने की रस्म अदा करने के बाद अंतिम संस्कार करेगे.’

पर पुलिस यह बात मानने को तैयार नहीं थी. यही नहीं पुलिस लड़की की भाभी की इस बात को भी सुनने को तैयार नहीं थी कि लड़की के पिता और भाई दिल्ली से आ जाएं तब कोई फैसला हो. पुलिस ने लड़की के घर वालों की बात तो सुनी ही नहीं, बल्कि वह घर वालों को जबरन साथ ले जाना चाहती थी कि किसी तरह से वे उस का अंतिम संस्कार कर दें.

घर वाले जब इस के लिए तैयार नहीं हुए तो पुलिस लाश को ले कर सीधे गांव के बाहर श्मशान ले गई. अभी तक आधी रात का समय बीत रहा था और लड़की के पिता और मीडिया वहां तक नहीं पहुंचे थे. जो लोग पहुंचे थे उन को पुलिस ने गांव के बाहर ही रोक लिया था. गांव के अंदर आने वाली कच्ची सड़क को पूरी तरह से बंद कर दिया गया था.

गांव में 13 थाने का पुलिस बल और बाकी अफसर तैनात कर दिए गए थे. पूरा गांव एक तरह से छावनी में बदल दिया गया था.

पैट्रोल से जला दी लडकी

हिंदू धर्म के रीतिरिवाजों में किसी  की अंतिम क्रिया से पहले लाश को नहलाया जाता है. इस के बाद उस को नए कपड़े पहना कर चिता पर लिटाया जाता है. चिता को लकड़ी से तैयार किया जाता है. किसी करीबी परिजन जैसे पिता, पति या भाई द्वारा चिता को अग्नि दी जाती है.

हिंदू धर्म में ऐसा कहा जाता है कि अंतिम क्रिया विधिवत करने से मरने वाले की आत्मा को मुक्ति मिलती है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हिंदू धर्म के ब्रांड एंबैसेडर माने जाते हैं. इस के बाद भी योगी की पुलिस ने धर्म, रीतिरिवाज, मानवाधिकार, कानून किसी का भी साथ नही दिया.

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लड़की की लाश को जंगल के बीच रख कर उसे गोबर के उपलों और कुछ लकड़ियों से ढक दिया गया. पैट्रोल और मिट्टी का तेल छिड़क कर रात के तकरीबन ढाई बजे आग लगा दी गई. इस के बाद वहां किसी तरह पहुंचे मीडिया वालों को पुलिस ने यह नहीं बताया कि क्या जल रहा है?

अंतिम संस्कार को ले कर पीड़िता के चाचा और बाबा ने बताया कि जब पुलिस जबरन दाह संस्कार कर रही थी, तब उन्हें वहां जाने नहीं दिया गया. जो भी किया पुलिस ने किया था. जब कुछ देर के लिए पुलिस वहां नहीं थी, तो वे 2-4 उपले डालने के लिए गए थे. तभी पुलिस वालों ने उनकी फोटो खींच ली. अब इसी को पुलिस बता रही है कि परिवार वाले अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे.

कोर्ट ने लिया संज्ञान

लड़की की लाश जलने के साथ ही साथ उस की अस्थियां और चिता की राख तक को समय पर नहीं विसर्जित किया जा सका. बुलगढी गांव के बाहर सड़क किनारे चिता की राख का ढेर, अधजले उपले, बिखरी अस्थियां तीसरे दिन तक पड़ी रहीं. हिंदू रीतिरिवाजों के मुताबिक तीसरे दिन तक इन का विसर्जन हो जाना चाहिये. गुरुवार को अस्थियां विसर्जित नहीं की जाती हैं, पर शुक्रवार शाम तक अस्थियां विसर्जित नहीं की गई थीं. ऐसे में साफ है कि न केवल लड़की के जिंदा रहते उस की बेइज्जती की गई, बल्कि मरने के बाद भी कदमकदम पर उस का अपमान किया गया.

पुलिस ने दावा किया किया कि लड़की का अंतिम संस्कार रात 2 बजे के आसपास परिवार वालों की रजामंदी से पुलिस बल की मौजूदगी में किया गया. पुलिस की इस बात पर किसी को भरोसा नहीं हो पा रहा था. चारों तरफ पुलिस और योगी सरकार की आलोचना शुरू हो गई. यही नहीं इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने रात में लड़की की लाश को जलाने के मामले में मौलिक अधिकारों का मुददा मान कर खुद संज्ञान में लिया. जस्टिस राजन राय और जस्टिस जसप्रीत सिंह ने कहा कि रात के ढाई बजे अंतिम संस्कार बेहद क्रूर और असभ्य तरीके से किया गया. यह कानून और संविधान से चलने वाले देश में कतई स्वीकार्य नही है.

कोर्ट ने सरकार और अफसरों को सुनने के साथ ही साथ लडकी के परिवार को भी सुनने का फैसला किया. पहली बार कोर्ट ने खुद रजिस्टार को आदेश दिया कि वह इस संबंध में पीआईएल दाखिल करे.

तानाशाह बनी सरकार

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बरताव कोे जो लोग जानते हैं वे कहते है कि योगी गुस्से में किसी बात की परवाह नहीं करते हैं. नागरिकता कानून विरोध के समय विरोध करने वालों को ‘ठीक से समझाने‘ का संदेश उन्होंने दिया था. अपराधियों से निबटने के लिए उन्हें ‘ठोंक दो’ के अलावा कानपुर कांड में विकास दुबे के घर को गिराना हो, डाक्टर कफील और आजम खां को जेल भेजना हो उन का गुस्सा हर जगह देखने को मिला.

उत्तर प्रदेश के अपराधियों में मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद के घर को गिराने का मामला ऐसा ही था. हाथरस कांड में भी मुख्यमंत्री पर अपराधियों को बचाने का आरोप लगा. आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि आरोपी ठाकुर बिरादरी के हैं, ऐसे में मुख्यमंत्री योगी उन को बचाने के लिए हर गलत काम करने को तैयार हैं.

विरोधी दल ही नहीं भाजपा की नेता उमा भारती ने भी इस बात का विरोध दर्ज कराते हुए कहा कि इस से पार्टी की छवि खराब हुई है. मुख्यमंत्री को चाहिए कि वे लड़की के परिवार से मीडिया और विपक्ष के लोगों को मिलने दे.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने हाथरस जाने का प्रयास किया पर उन को रोक दिया गया. बाद में मिलने की मंजूरी दी गई. बसपा नेता मायावती ने बयान दे कर विरोध दर्ज कराते हुए मुख्यमंत्री योगी से अपने पद से इस्तीफा देने को कहा. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पूरे प्रदेश में धरनाप्रदर्शन किया.

उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी यानी स्पैशल टास्क फोर्स का गठन किया और उस की रिपोर्ट पर पुलिस महकमे के कुछ अफसरों को निलंबित कर दिया. सभी पक्षों के नार्को टेस्ट कराने का भी आदेश दिया. बाद में जांच सीबीआई को सौंपने की बात कही.

इस के बावजूद हाथरस की आग को विपक्ष बुझने नहीं देगा. बिहार चुनाव में इस को मुददा बनाने की तैयारी हो रही है. ऐसे में बिहार में भाजपा की सहयोगी जनता दल (यूनाइटेड) ने भी योगी सरकार की आलोचना की है. जद(यू) नेता केसी त्यागी ने कहा, ‘क्या देश में दलित वंचितों के साथ दुष्कर्म के मामले में न्याय के लिए प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ेगा हाथरस में जो हुआ वह उत्तर प्रदेश सरकार के लिए शर्मनाक है. यह उत्तर प्रदेश सरकार के लिए डूब मरने जैसी बात होगी.’

बस लिखापढ़ी करती रही पुलिस

हाथरस जिले से आगरामथुरा नैशनल हाईवे 93 पर 14 किलोमीटर दूर चंदपा कसबा है. यह बेहद छोटा सा कसबा है. यहां के लोग खरीदारी करने हाथरस ही जाते है. चंदपा कसबे से 2 किलोमीटर दूर बूलगढ़ी गांव है. यह भी बेहद गरीब गांव है. यहां पहुंचने के कच्चे रास्ते हैं. इस गांव में विभिन्न जातियों के 300 परिवार रहते हैं. इस गांव में एससी तबके और ठाकुर जाति के परिवार भी रहते हैं.

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14 सितंबर की सुबह 9 बजे के करीब गांव में रहने वाले ओम प्रकाश की बेटी 20 साला मनीषा अपनी मां रमा देवी और भाई सत्येंद्र के साथ घास काटने खेतों में गई थी. घास का एक बोझ ले कर लड़की का भाई उसे रखने घर चला आया था और मां और बेटी वहीं खेतों में घास काटने लगीं.

कुछ देर में मां ने बेटी के चिल्लाने की आवाज सुनी तो बेटे को आवाज देती लड़की की तरफ गई. तब मां ने देखा कि बेटी खेत में अंदर की तरफ बेहोश पड़ी थी. उस के गले और शरीर पर चोट के निशान थे.

मां ने आवाज लगाई तो गांवघर के लोग वहां आ गए. पुलिस को सूचना दी गई. घायल बेटी को घर पर रखने के कुछ देर बाद चंदपा थाने ले आए.

मनीषा के भाई सत्येंद्र ने लिखित तहरीर में पुलिस को बताया कि मनीषा और मां घास काट करे थे तभी गांव का ही रहने वाला संदीप वहां आया और मनीषा को खींच कर खेत में ले गया. उस का गला दबा कर हत्या करने की कोशिश की गई. मनीषा ने शोर मचाया तो मां और भाई को आता देख आरोपी संदीप भाग गया.

पुलिस ने इसी तहरीर पर आरोपी संदीप पुत्र गुड्डू के खिलाफ धारा 307 और एसएसीएसटी ऐक्ट में मुकदमा कायम कर लिया. कोतवाली चंदपा के प्रभारी दारोगा डीके वर्मा ने तहरीर के आधार पर मुकदमा दर्ज कर के आरोपी की तलाश शुरू कर दी.

पुलिस की सूचना पा कर सीओ सिटी राम शब्द मौका ए वारदात पर पहुंचे और मनीषा की खराब हालत देख कर उसे इलाज के लिए हाथरस के जिला अस्पताल भेज दिया. इन दोनों पक्षों के बीच पहले भी रंजिश हो चुकी थी. मुकदमा कायम था और मामला कोर्ट में दाखिल था. ऐसे में पुलिस ने मामले की विवचेना शुरू कर दी.

19 सितंबर को पुलिस ने आरोपी संदीप को पकड़ा और सीओ सिटी ने जांच के बाद मुकदमे में छेड़खानी की धारा 354 को बढ़ा भी दिया. 20 सितंबर  को सीओ सादाबाद के रूप में ब्रह्म सिंह ने चार्ज लिया. सीओ सिटी की जगह अब वे मुकदमे की विवेचना देखने लगे.

22 सितंबर को ब्रह्म सिंह ने लड़की से बातचीत के आधार पर मुकदमे में धारा 376 डी को बढ़ाया. लडकी ने 22 तारीख को दिए अपने बयान में आरोपी संदीप के साथ कुछ और लोगों का नाम लिया था और गैंगरेप की बात कही थी.

गैंगरेप के आरोप में पुलिस ने इसी गांव के 3 और आरोपियों लवकुश पुत्र रामवीर, रवि पुत्र अतर सिंह, रामकुमार पुत्र राकेश का नाम भी मुकदमे में शामिल कर लिया. पुलिस ने 23 सितंबर को लवकुश को पकड लिया. 25 सितंबर को रवि और 26 सितंबर को रामकुमार को पकड़ लिया. मुख्य आरोपी संदीप को पहले की पकड़ लिया गया था.

मामले में ढिलाई बरतने के आरोप में कोतवाली निरीक्षक चंदपा को लाइन हाजिर कर दिया गया था. 28 सितंबर को लड़की को बेहद नाजुक हालत में अलीगढ़ मैडिकल कालेज से दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल भेज दिया गया. 29 सितंबर को दिल्ली में लड़की की मौत हो गई. मौत के बाद लड़की की लाश के साथ जो हुआ वह किसी तरह के गैंगरेप से कम नहीं था.

पिसते दलित परिवार

ठाकुर बिरादरी में 2 गुट हैं. इन की आपसी लड़ाई में दलित परिवार पिसते रहते हैं. 1996 में जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री थी. बाल्मीकि समाज के लोगों से ठाकुर परिवार का झगड़ा हुआ था. झगड़े की वजह गांव के बाहर कूड़ा डालने की जगह थी. एससी परिवार का कहना था कि उन की जगह पर कूड़ा डाला जा रहा है. इस को ले कर दोनों ही परिवारों में झगड़ा हुआ था, जिस में एससी परिवार के लोगों ने दलित ऐक्ट, मारपीट और सिर फोड़ने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिस में ठाकुर परिवार को जेल जाना पड़ा था. इनब्के बीच साल 2006 में आपसी मारपीट का मुकदमा लिखा गया था. कुछ समय के बाद इन के बीच आपसी समझौता भी हुआ, पर आपस में दुश्मनी बनी रही.

जब भी ये लोग आपस में सुलह की बात करते थे ठाकुर बिरादरी का ही दूसरा पक्ष किसी न किसी बहाने मामले को उलझा देता था. कुछ समय से लड़की और आरोपी संदीप के परिवार के बीच की 19 साल की दुश्मनी कम होने लगी थी. परिवार के लोग आपस में भले ही नहीं बोलते थे, पर संदीप और लड़की में बातचीत होने लगी थी. यह बात उन दोनों के परिवार वालों को पसंद नहीं थी. घटना के कुछ दिन पहले लड़की के परिवार वालों ने इस बात की शिकायत भी की थी, जिस से संदीप के पिता ने अपने लड़के की पिटाई भी की थी. ऐसे में आपसी विवाद में एक एससी परिवार तबाह हो गया.

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बलात्कार का सच

उत्तर प्रदेश पुलिस इस बात का दावा कर रही है कि लड़की के साथ बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई. कानून के जानकार कहते हैं कि पुलिस के दावे से कोई बचाव नहीं होगा. लड़की का बयान ही अंतिम माना जाएगा. 14 सितंबर को लड़की के साथ बलात्कार हुआ, मैडिकल नहीं हुआ. लड़की के अंदर के अंगों से छेड़छाड़ हुई.

कानून कहता है कि रेप साबित करने के लिए केवल 4 दिन का ही समय होता है. स्पर्म केवल 4 दिन तक ही अंग पर दिखते हैं. नाजुक अंगों पर नाखून के निशान, आधा नंगा या पूरा नंगा पाया जाना भी रेप माना जाता है. रेप की पुष्टि के लिए स्पर्म मिलना अनिवार्य नहीं होता है.

किसी महिला के नाजुक अंग पर पूरी तरह से या बिलकुल न के बराबर मर्द के अंग का स्पर्श भी बलात्कार माना जाता है. 14 दिन के बाद रेप के सुबूत नहीं मिलते, लेकिन अंगों पर चोट के निशान मिल जाते हैं. अस्पताल में एडमिट होने के समय अंगों से बहने वाला खून भी सुबूत होता है. उस समय यह जानने की कोशिश क्यों नहीं की गई कि यह क्यों हो रहा है. ऐसे में रेप की पुष्टि कानून की नजर में कोई बड़ा मसला नहीं है. ऐसे हालात ही सुबूत के तौर पर पेश हो सकते हैं.

उन्नाव कांड: पिछड़ी जाति की लड़की की प्रेम कहानी का दुखद अंत

उन्नाव कांड

उन्नाव में पिछड़ी जाति की लड़की का दुखद अंत गांव में लड़कियों की प्रेम कहानी के दर्द को बताता है, जहां लड़के किशोरावस्था में बिना जातबिरादरी को देखे प्यार कर लेते हैं. प्यार कर लेने के बाद दोनों के जिस्मानी संबंध भी बन जाते हैं. ऐसे में जब लड़की शादी के लिए कहती है, तो जाति और धर्म की दीवार खड़ी हो जाती है.

आज भी गांव की शादियों में जाति और धर्म सब से प्रमुख हो जाता है. सब से बड़ी बात तो यह है कि लड़कियां नोटरी शपथपत्र को ही कोर्ट मैरिज मानने की गलती कर लेती हैं, जिस को पुलिस कभी शादी का प्रमाणपत्र मान कर लड़की की मदद नहीं करती है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 60 किलोमीटर दूर उन्नाव जिले के हिंदूपुर गांव की रहने वाली नंदिनी (बदला नाम) पढ़ाई में बहुत अच्छी थी. वह 5 बहनों और 2 भाइयों में सब से छोटी थी. गांव के बाहरी हिस्से में उस का मकान था.

नंदिनी का घर गांव के गरीब परिवारों में पिछड़ी जाति की विश्वकर्मा बिरादरी में आता था. कच्ची दीवारें और धान के पुआल से बना छप्पर था. उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार द्वारा नंदिनी को मेधावी छात्रा के रूप में 12वीं जमात पास करने के बाद लैपटौप उपहार में दिया गया था.

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गरीब परिवार होने के चलते नंदिनी का गांव के प्रधान के घर आनाजाना था. उसे प्रधान के जरीए सरकारी योजना का फायदा मिल जाता था. गांव में नंदिनी के घर से कुछ ही दूरी पर शिवम द्विवेदी का परिवार रहता था. वह नंदिनी से उम्र में 2 साल बड़ा था.

प्रेम, छल और गुनाह

नंदिनी और शिवम के बीच प्रेम संबंध बन गए. कुछ समय बाद दोनों ने शादी करने की योजना बनाई. शिवम ने 19 जनवरी, 2018 में नंदिनी के साथ नोटरी शपथपत्र के जरीए शादी कर ली. नंदिनी अब घर से दूर रायबरेली जिले में रहने लगी.

कुछ समय बाद नंदिनी ने सार्वजनिक रूप से शादी करने का दबाव बनाना शुरू किया, तो शिवम ने खुद को बचाने का काम शुरू कर दिया. नंदिनी और शिवम के बीच संबंधों की जानकारी गांव में भी इन के परिवारों वालों को होने लगी, तो शिवम के घर वालों ने उस की अलग शादी का दबाव बनाना शुरू किया.

शिवम नंदिनी से बचने के लिए उस से दूर जाने लगा, तो नंदिनी ने उस को घेरने के उपाय शुरू कर दिए.

जब नंदिनी को लगा कि शिवम उस से दूर जाने की कोशिश कर रहा है, तो उस का प्रेम बदला लेने पर उतर आया.

नंदिनी को यह पता था कि गांव में उस का परिवार शिवम के घर वालों से मुकाबला नहीं कर पाएगा. शिवम का परिवार दबदबे वाला था. पुलिस और प्रशासन पर उस के परिवार का दबाव था. शिवम के परिवार का राजनीतिक असर था. ऐसे में नंदिनी ने कानून का सहारा लिया और अपने खिलाफ बलात्कार का मुकदमा लिखा दिया.

12 दिसंबर, 2018 को नंदिनी ने शिवम और अन्य के खिलाफ गैंगरेप करने का आरोप लगाया.

पुलिस ने इस आरोप को खारिज कर दिया. नंदिनी ने राज्य महिला आयोग और कोर्ट का सहारा लिया. कोर्ट और महिला आयोग की सिफारिश पर 5 मार्च, 2019 को गैंगरेप का मामला दर्ज हुआ. इस के बाद लंबे समय तक पुलिस जांच का बहाना बनाती रही. आखिर में 19 सितंबर, 2019 को पुलिस ने शिवम को जेल भेजदिया.

30 नवंबर, 2019 को शिवम जेल से जमानत पर छूट कर आ गया. नंदिनी को इस बात की हैरानी थी कि इतनी जल्दी शिवम जमानत पर कैसे जेल से बाहर आ गया. उस ने अपने परिवार से यह बात बताई और कहा कि कल वह रायबरेली जा कर अपने वकील से मिल कर पता करेगी कि वह कैसे छूट हो गया है? रायबरेली जाने के लिए नंदिनी को कानपुर से रायबरेली जाने वाली ट्रेन सुबह 5 बजे मिलनी थी.

रेप के मुकदमे का बदला

3 दिसंबर, 2019 की सुबह नंदिनी ट्रेन पकड़ने के लिए घर से निकली. घर से रेलवे स्टेशन तकरीबन 2 किलोमीटर दूर था. नंदिनी सुबह 4 बजे घर से निकली. जाड़े का समय था. रास्ते में घना अंधेरा भी था.

नंदिनी के पिता ने उस को स्टेशन छोड़ने के लिए कहा, तो उस ने बूढ़े पिता की परेशानी को देखते हुए मना कर दिया. वह खुद ही घर से निकल गई.

गांव से रेलवे स्टेशन के रास्ते में कुछ रास्ता ऐसा था, जहां कोई नहीं रहता था. इसी जगह पर नंदिनी पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी गई. वह खुद को बचाने के लिए मदद की तलाश में दौड़ी, तो आग और भड़क गई और उस के कपड़े जल कर जिस्म से चिपक गए.

रास्ते में एक जगह कुछ लोग दिखे तो नंदिनी वहीं गिर पड़ी. लड़की के कहने पर रास्ते में रहने वालों ने डायल 112 को जानकारी दी.

शिकायत पर पहुंची पुलिस को लड़की ने जली हालत में पुलिस और प्रशासन को अपने ऊपर मिट्टी का तेल डाल कर जलाने वालों के नाम बताए.

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90 फीसदी जली हालत में नंदिनी को पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और फिर देश की राजधानी नई दिल्ली इलाज के लिए ले जाया गया. जिंदगी और मौत के बीच 3 दिन तक जद्दोजेहद करने के बाद नंदिनी ने दम तोड़ दिया.

नंदिनी के पिता को दुख है कि घटना के दिन वे उसे रेलवे स्टेशन तक छोड़ने नहीं गए. वह अपनी लड़ाई खुद लड़ रही थी. इस वजह से वे आत्मविश्वास में थे. इस के पहले वे लड़की को रेलवे स्टेशन तक छोड़ने जाते थे.

नंदिनी की मौत हो जाने के बाद उस के परिवार वालों ने उस की लाश को दफनाने की सोची. उन का मानना था कि बेटी एक बार तो जल चुकी है, फिर उसे श्मशान घाट ले जा कर क्यों दोबारा जलाया जाए.

चरित्र हनन का आरोप

शिवम द्विवेदी और दूसरे आरोपियों के परिवार वाले इस घटना का तर्क देते हुए कहते हैं कि गुनाह उन के घर वालों ने नहीं किया, उन को साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. वे कहते हैं कि लड़की को जलाने की घटना जिस समय की है, उस समय उन के लड़के घरों में सो रहे थे. पुलिस ने उन को सोते समय घर से पकड़ा है. अगर उन्होंने अपराध किया होता तो आराम से घर में सो नहीं रहे होते.

इन के समर्थक बताते हैं कि जेल से शिवम के छूटने के बाद लड़की ने उस को फिर से जेल भिजवाने की धमकी दी थी. इस के बाद खुद ही मिट्टी का तेल डाल कर खुद को जलाने का काम किया. ये लोग सोशल मीडिया पर इस बात का प्रचार भी कर रहे हैं कि शिवम को फंसाने और जेल भिजवाने के नाम पर 15 लाख रुपए लड़की मांग रही थी. इस में से 7 लाख रुपए शिवम के परिवार वाले दे भी चुके थे.

नंदिनी के भाई ने कहा कि उस की बहन पढ़लिख कर परिवार की मदद करना चाहती थी. शिवम के संपर्क में आ कर उसे इस हालत का सामना करना पड़ा. कानून मानता है कि मरते समय का दिया गया बयान सच माना जाता है.

सवाल उठता है कि उन्नाव कांड में लड़की जली हालत में लड़कों के नाम गलत क्यों बताएगी? उस समय तक लड़की यह सम झ चुकी थी कि उस की मौत तय है. वह सब से पहले अपने साथ हुई घटना की गवाही देना चाहती थी, जिस की वजह से उस ने पुलिस और प्रशासन के लोगों को बयान दिया. लड़की और लड़के के बीच शादी का नोटरी शपथपत्र हर बात को साफ करता है.

समाज और राजनीति आमनेसामने

उत्तर प्रदेश का उन्नाव जिला रेप और बलात्कार को ले कर पहले भी चर्चा में रहा है. भाजपा के विधायक कुलदीप सेंगर के समय मामला राजनीतिक था. अब दूसरी घटना में लड़की को जलाने के बाद मामला राजनीतिक कम सामाजिक ज्यादा बन गया है.

हालांकि कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को इस रेप कांड का कुसूरवार मान लिया है. उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई है.

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एक तरफ समाज के लोग लड़की और उस को दिए गए संस्कारों को जिम्मेदार मान रहे हैं. उन्नाव में रेप की दूसरी घटना के चर्चा में आने के बाद विपक्ष को सत्ता पक्ष को घेरने का पूरा मौका मिल गया.

लोकसभा में बहस और हंगामा कर के मांग की जा रही है कि ‘महिला सुरक्षा दिवस’ मनाया जाए. उत्तर प्रदेश में विधानसभा के बाहर प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव धरने पर बैठ गए. उन की पार्टी ने सड़क पर उतर कर प्रदर्शन किया और उत्तर प्रदेश सरकार को घेरने का काम किया.

कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी लखनऊ के 2 दिन के दौरे से समय निकाल कर उन्नाव में लड़की के घर वालों से मिलने गईं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले को हलका करने के लिए लड़की के घर वालों को मुआवजा देने का काम किया. लड़की के परिवार वालों को 25 लाख रुपए की माली मदद, गांव में 2 मकान और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया. उन्नाव के मामले के बाद तमाम ऐसी घटनाएं सामने आने लगीं. इन घटनाओं से समाज की हकीकत का पता चलता है. इस बार रेप कांड सामाजिक है. समाज उन्नाव जिले की घटना को प्रेमप्रसंग मान कर दरकिनार कर रहा है.

उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है. यहां प्रेमप्रसंगों को रोकने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शपथ ग्रहण करते ही ‘एंटी रोमियो दल’ बनाया था. मामला एक ही धर्म के लोगों का था. ऐसे में ‘एंटी रोमियो दल’ और पुलिस के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी.

धर्म आधारित सत्ता तो रामायण और महाभारत काल से ही छले जाने पर औरत को ही दोषी मानती थी. अहल्या का पत्थर बना दिया जाना, सीता का घर से निकाला जाना और कुंती का बेटे को छोड़ने जैसी बहुत सी घटनाएं इस के उदाहरण हैं. ऐसे में उन्नाव के हिंदूपुर गांव की लड़की को भी ऐसे लोग गलत ही मान सकते हैं.

इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने एसएचओ अजय कुमार त्रिपाठी को  सस्पैंड कर दिया.

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रेप की बढ़ती घटनाएं और धर्म में उलझे लोग

बिहार के भोजपुर इलाके के संदेश थाना क्षेत्र में इनसानियत को शर्मसार करने वाली एक घटना घटी. 65 साल के एक बुजुर्ग ने 7 साला बच्ची के साथ मंदिर में रेप किया. एक नौजवान ने उस का वीडियो बनाया और सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया. वह बुजुर्ग घर के ओसारे में खेल रही बच्ची को टौफी का लालच दे कर मंदिर के एक कमरे में ले गया और उस के साथ रेप किया.

संदेश के थाना प्रभारी सुदेह कुमार के मुताबिक, आरोपी और वीडियो बनाने वाले को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. इधर हाल के दिनों में रेप की घटनाएं पूरे देश में तेजी से बढ़ी हैं. सजा और कानून की बातें अपनी जगह पर हैं और इस तरह की घटनाएं अपनी जगह पर. मंदिर में तो लोग मन्नत मानते हैं, तरहतरह की उम्मीद रखते हैं और जब इन मंदिरों में देवीदेवताओं के सामने किसी बच्ची के साथ इस तरह का कुकर्म हो और ये कुछ नहीं कर पाएं तो इन पर यकीन करने वाले लोगों पर भी सवालिया निशान लग जाता है.

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आज तो धर्म का खूब महिमा मंडन किया जा रहा है और गांवगांव में मंदिर बनाने, अखंड कीर्तन, यज्ञ, हवन और तरहतरह के पूजापाठ में लोग लीन हैं और इस तरह की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है. हम किस तरह का समाज और देश बनाना चाहते हैं, इस पर भी इस देश के नागरिकों को सोचने और सम झने की जरूरत है. कौन करते हैं रेप 94 फीसदी रेप सगेसंबंधी, रिश्तेदार, पारिवारिक दोस्त और पड़ोसी द्वारा किए जाते हैं. ऐसी लिस्ट में पुलिस, सेना और अर्धसैनिक बल के वे लोग भी शामिल हैं, जिन के ऊपर सुरक्षा की गारंटी है. 3 सांसदों और 48 विधायकों ने कबूल किया है कि उन के ऊपर औरतों के साथ हिंसा करने के आरोप हैं, जिस में रेप भी शामिल है.

इतना ही नहीं, बलात्कारियों का दूसरे समुदाय, जाति, धर्म के नाम पर बदले की भावना से दलित और अल्पसंख्यक औरतों के साथ सामूहिक रेप की भी घटनाएं घटती रहती हैं. इस तरह के हालात पैदा हो गए हैं कि घर और घर के बाहर कहीं भी लड़कियां और औरतें महफूज नहीं हैं. दुधमुंही बच्ची से ले कर 80 साल की औरतें तक रेप की शिकार हो रही हैं. झारखंड राज्य साइंस फौर सोसाइटी के राज्य सचिव देवनंदन शर्मा आनंद ने रेप की घटनाओं पर कहा कि देश के नागरिकों में वैज्ञानिक सोच और नजरिया पैदा करने का टारगेट संविधान के पन्नों में ही सिमट कर रह गया और समाज की हालत लगातार बदतर होती चली गई.

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धर्म के धंधेबाजों ने लोगों में मौजूद डर व असुरक्षा का फायदा उठाते हुए आस्था व विश्वास की भावनाओं का जम कर दोहन किया. नतीजतन, आज बाबा के आश्रमों समेत मंदिरों और मदरसों से रेप की खबरें सामने आ रही हैं. देश में स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटी, तकनीकी शिक्षण संस्थान, कलकारखाने व अस्पताल की भले ही कमी हो, पर रोज नए मंदिरों, धार्मिक स्थलों के बनने में कहीं कोई कमी नहीं है. राजनीतिक व चुनावी फायदे के लिए नेता इसे संरक्षण देते हैं. इस से जमीन के कब्जे व कमाई का रास्ता खुल जाता है.

इस के अलावा अंधभक्त बाबा की कृपा, लोकपरलोक सुधारने, पुण्य हासिल कर के स्वर्ग तक पहुंचने का रास्ता तय करने के लिए घर की बहूबेटियों को आश्रम पहुंचाने में कोई संकोच नहीं करते. मंदिरों को दान में भारी चढ़ावा देते हैं. नतीजतन, लोग भूख, गरीबी, अशिक्षा, बदहाली, बेरोजगारी की पीड़ा झेलने को मजबूर हैं, पर मंदिरों, धार्मिक स्थलों का फायदा मुट्ठीभर लोग ही उठाते हैं. हालत यह है कि उपग्रहों के प्रक्षेपण व ऐसे ही तकनीकी मामलों में भी धार्मिक कर्मकांड कर ऊपर वाले की कृपा की व्यवस्था कर ली जाती है.

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आधुनिक ज्ञानविज्ञान के विकास के बावजूद धर्म के धंधेबाजों की अंधेरगर्दी जारी है. लुटेरी ताकतों, नेताओं की मदद और संरक्षण उन्हें हासिल होता है. इन्हीं नेताओं, अफसरों पर देश को आगे ले जाने की जिम्मेदारी है, पर मौजूदा हालात देश को कहां ले जाएंगे, इसे सम झना मुश्किल नहीं है. द्य सुलग रहा है तनबदन जो छोड़ा था राह में निभाने के लिए आ, मु झ को मेरी खामियां बताने के लिए आ. थोड़ाबहुत जो प्यार था मेरे लिए दिल में, गर थी जरा नफरत तो जताने के लिए आ. अब घुट रहा है दम मेरा चैन ओ सुकून से, देने खुराक ए गम तू सताने के लिए आ. सुलग रहा है तनबदन तनहाई की तपिश में, बस मिल के फिर से भूल जाने के लिए आ. थोड़ाबहुत लिहाज कर उलफत का मेरी तू, इक बार अपना चेहरा दिखाने के लिए आ. -पुखराज सोलंकी

निर्भया गैंगरेप के गुनहगारों को सुनाया सजा-ए-मौत का फैसला, 22 जनवरी को दी जाएगी फांसी

जिस पल का इंतजार देश की जनता को आठ सालों से था वो जाकर अब आया है. दिल्ली के चर्चित निर्भया गैंगरेप मामले में अदालत ने चारों आरोपियों को सजा ए मौत की सजा सुनाई है. वर्ष 2012 में चलती बस में सामूहिक दुष्कर्म और उसकी मौत के गुनहगारों के खिलाफ दिल्ली की एक अदालत ने मंगलवार को ‘डेथ वारंट’ जारी कर दिया. पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सतीश कुमार अरोड़ा ने डेथ वारंट जारी करते हुए दोषियों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी देने का निर्देश दिया है.

पवन गुप्ता, मुकेश सिंह, विनय शर्मा और अक्षय ठाकुर मामले में दोषी पाए गए हैं. दोषियों के वकीलों ने कहा है कि वे सुप्रीम कोर्ट में एक क्यूरेटिव याचिका दायर करेंगे. सभी दोषी राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी दायर कर सकते हैं.

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16 दिसंबर, 2012 को 23 वर्षीय महिला के साथ चलती बस में बेरहमी से सामूहिक दुष्कर्म किया गया था, जिसके चलते बाद में उसकी मौत हो गई थी. मामले में छह आरोपियों को पकड़ा गया था. इन सभी में से एक आरोपी नाबालिग था. उसे जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया था. वहीं, एक अन्य आरोपी राम सिंह ने तिहाड़ जेल में फांसी लगाकर खुदकुशी कर दी थी.

बाकी बचे चारों आरोपियों को ट्रायल कोर्ट ने दोषी माना और सितंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई. इसके बाद 2014 में दिल्ली की हाईकोर्ट ने फैसले को बरकरार रखा और मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्णय को सही माना. सुप्रीम कोर्ट ने मामले में पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी.

निर्भया की मां ने मीडिया से बातचीत में कहा कि, मेरी बेटी को न्याय मिल गया. 4 दोषियों की फांसी देश की महिलाओं को सशक्त बनाएगी. इस फैसले के बाद लोगों का कानून में विश्वास बढ़ेगा.निर्भया के पिता ने कोर्ट के फैसले पर कहा, मैं कोर्ट के फैसले से खुश हूं. दोषियों को 22 जनवरी की सुबह 7 बजे फांसी दी जाएगी. यह फैसला इस तरह के अपराध करने की हिमाकत करने वालों में डर पैदा करेगा.

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निर्भया के दोषियों के वकील एपी सिंह ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए मीडिया से कहा है कि हम सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करेंगे.

हैदराबाद में चार आरोपियों के साथ कानून का भी हुआ एनकाउंटर

तेलंगाना पुलिस जिंदाबाद के नारे लगाए. दोषियों को अदालत ने सजा ए मौत भले न दी हो लेकिन कानून के रखवालों ने तामील कर दी. आज मैं बस इतना कहना चाहता हूं कि एक कुप्रथा का सहारा लेकर तथाकथित न्याय किया गया. आज चार आरोपियों के एनकाउंटर के साथ एक और एनकाउंटर किया गया वो एनकाउंटर हुआ कानून का.

अभी वो केवल आरोपी ही थे दोषी नहीं. आरोपियों को 10 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा गया था. अभी तक ये भी पता नहीं कि आरोपी वही है या फिर और कोई. आरोपियों को पुलिस की कस्टडी पर रखकर सारे साक्ष्य और सबूत इकट्ठा किए जा रहे थे. कहा जा रहा है कि उन्होंने पुलिस के सामने गुनाह कबूल किया था. ये बात किसी से छिपी नहीं है कि पुलिस कैसे गुनाह कबूल करा देती है. इसी वजह से अदालत में जज के सामने जब किसी मुजरिम को पेश किया जाता है तो जज पूछते हैं कि आप किसी दबाव में तो नहीं बयान नहीं दे रहे. मतलब की जज को भी पता होता है कि पुलिस रिमांड के दौरान पुलिस के पास कौन-कौन से तरीके होते हैं गुनाह को कबूल कराने के.

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दोषियों को सजा ए मौत मिलनी चाहिए. बेशक मिलनी चाहिए. गैंगरेप और हत्या के आरोपियों को सरे आम फांसी पर लटका देना चाहिए. अदालत चाहे तो आरोपियों की फांसी का लाइव टेलिकास्ट करा देते  ताकि जहां कहीं भी हैवान होते उनको रूह कांप जाती. अगर इससे भी मन नहीं भरता तो दुनिया की सबसे कठोर जो सजा होती वो दे दी जाती. किसी को कोई गम नहीं होता. उन आरोपियों से किसी को भी हमदर्दी नहीं हो सकती.

खैर, महिला डॉक्टर को तो न्याय मिल गया लेकिन क्या न्याय उनको भी मिल पाएगा, जिनके जिस्म को तार-तार करने वाले हैवान आज भी न्याय के मंदिर पर सजा काट रहे हैं. जिस जगह पर महिला डॉक्टर की जली लाश मिली थी उससे कुछ ही दूरी पर 48 घंटे के भीतर एक दूसरी महिला की जली हुई निर्वस्त्र लाश मिली थी. लेकिन आज तक उसके बारे में कुछ नहीं हुआ. कोई खबर नहीं, कोई प्रदर्शन नहीं, सड़कों पर आक्रोश नहीं. मतलब साफ है कि न्याय भी उसी को मिलेगा जिसका कोई ओहदा होगा. क्या तेलंगाना पुलिस को उस महिला के साथ ऐसा जघन्य अपराध करने वालों को भी उतनी ही जल्दी नहीं पकड़ना चाहिए? ये सवाल है.

वरिष्ठ अधिवक्ता फ़ेलविया ऐग्निस ने इस एनकाउंटर को लोकतंत्र के लिए ‘भयावह’ बताते हुए कहा, “रात के अंधेरे में निहत्थे लोगों को बिना सुनवाई बिना अदालती कार्यवाही के मार देना भयावह है. पुलिस इस तरह से क़ानून अपने हाथों में नहीं ले सकती. इस तरह के एनकाउंटर को मिल रहे सार्वजनिक समर्थन की वजह से ही पुलिस की हिम्मत इतनी बढ़ जाती है कि वह चार निहत्थे अभियुक्तों को खुले आम गोली मारने में नहीं हिचकिचाते”.

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वरिष्ठ अधिवक्ता और महिला अधिकार कार्यकर्ता वृंदा ग्रोवर का कहना है कि इससे उपजे ध्रुवीकरण और बहस में सबसे बड़ी हार महिलाओं की ही होगी. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “यह एनकाउंटर संदेहास्पद है. और जो लोग भी इसको ‘न्याय’ समझ कर उत्सव मना रहे हैं वो यह नहीं देख पा रहे हैं कि इस पूरी बहस में सबसे बड़ा नुक़सान महिलाओं का होने वाला है.”

उन्होंने कहा कि इसके दो कारण है. पहला तो यह कि अब जिम्मेदारी तय करने की बात ही खत्म हो जाएगी. महिलाएं जब भी शहरों में बेहतर आधारभूत ढांचे की मांग करेंगी, सरकार और पुलिस दोनों ही रोजमर्रा की कानून व्यवस्था और आम पुलिसिंग को दुरुस्त करने की बजाय इस तरह हिरासत में हुई गैर-कानूनी हत्याओं को सही ठहराने में लग जाएंगे.

वृंदा ग्रोवर ने कहा, “दूसरी सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस एनकाउंटर को मिल रही सार्वजनिक स्वीकृति पुलिस को अदालत और क़ानून की जगह स्थापित करती सी नज़र आती है. मतलब अगर पुलिस ही इस तरह न्याय करने लग जाए तो फिर अदालत की ज़रूरत ही क्या है?”

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भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सांसद व पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने हैदराबाद पुलिस द्वारा किए गए मुठभेड़ पर सवाल उठाए हैं. मुठभेड़ की निंदा करते हुए मेनका गांधी ने कहा, “जो भी हुआ है बहुत भयानक हुआ है इस देश के लिए. आप लोगों को इसलिए नहीं मार सकते, क्योंकि आप चाहते हैं. आप कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकते, वैसे भी उन्हें अदालत से फांसी की सजा मिलती.” उन्होंने कहा, “अगर न्याय बंदूक से किया जाएगा तो इस देश में अदालतों और पुलिस की क्या जरूरत है?”

डा. प्रियंका रेड्डी: कानून, एनकाउन्टर और जन भावना

6 दिसंबर की सुबह सुबह जो समाचार देश की मीडिया में आकाश के बादलों की तरह छा गया वह था हैदराबाद में हुए डा. प्रियंका रेड्डी के साथ हुए बलात्कार एवं नृशंस हत्याकांड के बाद देशभर में गुस्से के प्रतिकार स्वरुप पुलिस के एनकाउंटर का. जिसमें बताया गया था कि डॉ प्रियंका रेड्डी के साथ हुई अनाचार के चारों आरोपियों को पुलिस ने एक एनकाउंटर में मार गिराया है.

इस खबर के पश्चात चारों तरफ मानो खुशियों का सैलाब उमड़ पड़ा. सोशल मीडिया हो या देश का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जब समाचार को लेकर आया तो इसके पक्ष में कसीदे पढ़े जाने लगे. यह अच्छी बात है कि लोगों में बलात्कार अनाचार के प्रति रोष दिखाई पड़ता है. मगर इस एनकाउंटर के पश्चात जिस तरह एकतरफा एनकाउंटर को जायज ठहराया गया वह कई प्रश्न खड़े करता है और यह संकेत देता है कि हमारा समाज, देश किस दिशा में जाने को तैयार खड़ा है. देखिए सोशल मीडिया कि कुछ प्रतिक्रियाएं-

प्रथम-हैदराबाद में रेप के चारों आरोपियों को पुलिस ने मार गिराया. बहुत लोग खुश हो रहे हैं. सत्ता यही चाहती है कि आप ऐसी घटनाओं पर खुश हों और आपकी आस्था बनी रहे.

द्वितीय- क्या एनकाउंटर की इसी तर्ज पर बड़ी मछलियों को भी मार दिया जाएगा? लिस्ट बहुत लंबी है. किस किस का नाम लिया जाय और किसे छोड़ा जाय?

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तृतीय- शायद मानवाधिकार और बुद्धिजीवी वर्ग पुनः सक्रिय होनेवाला है, इस एनकाउंटर के लिए पर आम जनता प्रसन्न है. तुरंत दान महा कल्याण. डिसीजन ओन द स्पॉट.निर्भय  की तरह न झूलेगा केस न जुवेनाइल कोर्ट का झमेला. जियो जियो .

चतुर्थ- सेंगर, कांडा, चिन्मयानंद, मुजफ्फरपुर शेल्टर होम के मालिक और एम जे अकबर जैसों का एनकाउंटर कब होगा ?

पंचम- “कुछ देर बाद कई मानवाधिकार के ढोल वाले अपना शटररुपी मुँह खोलेंगे.उन्हें अवॉयड करियेगा. आज पीड़ित बेटी को अधिकार मिला है.

सुबह सुबह की तल्ख  खबर

हैदराबाद गैंगरेप और मर्डर केस के चारों आरोपियों का एनकाउंटर कर दिया गया है. चारों आरोपियों को गुरुवार देर रात नेशनल हाइवे-44 पर क्राइम सीन पर ले जाया गया था. जहां उन्होंने भागने की कोशिश की तो पुलिस को एनकांउंटर करना पड़ा.हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि इन चारों का एनकाउंटर किन परिस्थितियों में हुआ है.हैदराबाद में महिला वेटनरी डॉक्टर के साथ जिस तरह से चार लोगों ने कथित रूप से गैंगरेप किया और उसे जिंदा जला दिया उसके बाद देशभर में लोगों के भीतर इस घटना को लेकर आक्रोश था. लेकिन अब इन चारों ही आरोपियों को पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया है.

बता दें कि गैंगरेप और बर्बरता से हत्या के मामले तेलंगाना सरकार ने बुधवार को आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की सुनवाई के लिए महबूबनगर जिले में स्थित प्रथम अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत को विशेष अदालत (फास्ट ट्रैक कोर्ट) के रूप में नामित किया था. इस मामले में पुलिस ने सोमवार को अदालत में याचिका दाखिल करके आरोपियों की दस दिनों की हिरासत की मांग की . लगातार तीन दिनों तक अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद सात दिनों की पुलिस हिरासत दे दी गई.

 डॉ प्रियंका के साथ जो हुआ, और अनुत्तरित प्रश्न

गौरतलब है कि 28 नवंबर को इन चार आरोपियों की जिनकी उम्र 20 से 26 साल के बीच थी ने डॉक्टर  प्रियंका रेड्डी को टोल बूथ पर स्कूटी पार्क करते देखा था. आरोप है कि इन लोगों ने जानबूझकर उसकी स्कूटी पंक्चर की थी. इसके बाद मदद करने के बहाने उसका एक सूनसान जगह पर लेकर गैंगरेप किया और बाद में पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया. पुलिस के मुताबिक घटना से पहले इन लोगों ने शराब भी पी रखी थी. रेप और मर्डर की घटना के बाद पूरे देश में गुस्सा था .

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वहीं इस एनकाउंटर के बाद लोगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने की मिल रही है. एक चैनल  से बात करते हुए एक्टिविस्ट और वकील वृंदा ग्रोवर ने सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि वह सभी के लिए “न्याय” चाहती हैं लेकिन इस तरह नहीं होना चाहिए था. वहीं इसी मुद्दे पर अनशन पर बैठीं दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने कहा कि जो हुआ अच्छा है कम से कम वह सरकारी दामाद बनकर रहेंगे जैसा कि दिल्ली के निर्भया केस में हुआ.

सबसे बड़ा प्रश्न इस संपूर्ण मामले में यह है कि क्या प्रियंका रेड्डी को इन चार आरोपियों के एनकाउंटर से न्याय मिल गया?

अगर पुलिस ने निअपराधियों को आरोपी बनाकर, देश को दिखा दिया होगा तो, जैसा कि अक्सर फिल्मों में होता है, तो क्या होगा?

सवाल यह भी है कि जैसी प्रसन्नता लोग सोशल मीडिया पर जाहिर कर रहे हैं क्या वह सही  कही जा सकती  है?

यह भी सच है कि लोगों में  प्रियंका रेड्डी बलात्कार कांड के बाद भयंकर रोष था, यह भी सच है कि कानून अपना काम अच्छे से नहीं कर पा रहा.यह भी सच है कि जिस त्वरित गति से प्रकरण की सुनवाई होनी चाहिए, नहीं हो पा रही. यह भी सही है कि मामला ले देकर राष्ट्रपति दया याचिका  पर फंस जाता है.  तो क्या इलाज अब एनकाउंटर ही बच गया है?

डॉक्टर प्रियंका रेड्डी कांड  के दोषी निसंदेह कानून के अपराधी हैं और हमारा कानून इतना सक्षम है कि वह दूध का दूध पानी का पानी कर सकता है. कानून की मंशा यही है कि चाहे सो गुनाहगार बचे जाएं मगर एक बेगुनाह नहीं मारा जाना चाहिए. इसी सारभूत तत्व को लेकर हमारा कानून  काम कर रहा है, अगर इसी तरह एनकाउंटर करके लोगों को मारा जाएगा तो फिर क्या  कानून की भावना, कानून की आत्मा के साथ क्या हमारा समाज और सिस्टम गलत नहीं कर रहा है.

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आने वाले समय में इस एनकाउंटर को जांच आयोग बनाकर और न्यायालय की देहरी पर हर तरीके से परखा जाएगा तब शायद यह तथ्य सामने आ जाएंगे की किस जगह एनकाउंटर में कई बड़ी गलतियां हुई हैं.

– जैसे सुबह सवेरे अंधेरी रात में चारों आरोपियों को घटनास्थल पर रीक्रिएशन के लिए ले जाना….?

-क्या आरोपियों के हाथों में हथकड़ीयां नहीं बांधी गई थी?

क्या आरोपी फिल्मी सितारों की तरह इतने ताकतवर थे की पुलिस की भारी दस्ते पर सरासर भारी पड़ गए? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इन चारों के चेहरे देखकर लगता है कि यह आम गरीब  परिवार से थे. क्या यह लोग किसी बड़ी शख्सियत के वारिस होते, तो क्या पुलिस इस तरह काउंटर का पाती.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि डॉ प्रियंका के हत्यारों के रूप में आरोपियों के साथ जो हुआ उससे देश में खुशी का माहौल दिखाई दे रहा है. मगर हमें  यह समझना होगा कि आरोपियों की जगह हम या हमारे कोई परिजन होते,उनके साथ अगर ऐसा पुलिस करती, तो हम क्या सोचते!

और अगर हम यह जानते होते की यह अपराधी नहीं है और तब यह एनकाउंटर होता तब क्या व्यतीत होता? क्योंकि यह सच जानना समझना होगा कि पुलिस के द्वारा गिरफ्तार कियाा जाना, कोई अपराधी सिद्ध हो जाना नहीं है. हमारे देश में जिस तरह पुलिस काम करती है, उससे यह समझा जा जा सकता है कि कभी भी किसी को भी पुलिस गिरफ्तार कर सकती है मगर अंतिम फैसला इजलास पर होता है.

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