Family Story In Hindi: मुखौटा

Family Story In Hindi: अमित अख्तर ने जब परचा मेरे आगे रखा, तो मैं हैरान हो उठा, ‘‘तुम एमएलए का चुनाव लड़ोगे?’’

‘‘हां, वकील बाबू, लेकिन आप को हैरानी क्यों हुई?’’

‘‘दरअसल…’’ मैं थोड़ा हिचकिचाया, ‘‘तुम तो हिस्ट्रीशीटर हो… क्या तुम्हें कोई पार्टी टिकट देगी? क्या तुम चुनाव जीत जाओगे? क्यों अपनी जिंदगीभर की कमाई मुफ्त में गंवाना चाहते हो?’’

‘‘वकील बाबू, इसी को तो राजनीति कहते?हैं. अगर आप को राजनीति के हथकंडे मालूम होते, तब चुनाव हम नहीं आप लड़ रहे होते. और रही हमारे हिस्ट्रीशीटर होने की बात, तो आप को बता दें, हमारे प्रदेश के एक भूतपूर्व मुख्यमंत्री हैं, उन पर 38 मुकदमे चले हैं, जबकि हम पर तो अभी 22 ही चल रहे हैं.’’

मैं ने अमित अख्तर का परचा भर कर दे दिया. फिर शाम को उस के घर भी पहुंच गया.

अमित अख्तर के घर पर उस के चेलेचपाटों की महफिल जमी थी. शहर के नामीगिरामी गुंडे वहां मौजूद थे.

मुझे देखते ही अमित अख्तर ने हाथ मिलाया और अपने बराबर में ही एक कुरसी पर बैठा लिया, फिर मेरे कान में फुसफुसाते हुए बोला, ‘‘वकील बाबू, अब आप हमारे हथकंडे देखिए.’’

फिर उस ने अपने एक चेले को आवाज दी, ‘‘मुकीम, तुम अपने साथ बब्बू, राम सिंह, राजू और अनीस को ले कर सेठ जहांगीरी के यहां चले जाओ और उस से कहो कि अमित दादा ने 50 हजार रुपए मंगवाए हैं.’’

‘‘जैसा हुक्म दादा…’’ मुकीम ने किसी पालतू कुत्ते की तरह गरदन हिलाई, ‘‘अगर सेठ रुपए देने से मना करे, तो उस का काम तमाम कर दूं?’’

‘‘नहीं, अगर वह मना करे, तो मुझे टैलीफोन करना. मैं उस से खुद बात कर लूंगा. और हां, एक बात और सुन… तुम और तुम्हारे सभी साथी आज से मुझे दादा नहीं, बल्कि नेताजी कह कर पुकारा करेंगे.’’

‘‘जैसा हुक्म, नेताजी.’’

कुछ ही पलों में 2 मोटरसाइकिलें स्टार्ट हुईं और तेज रफ्तार से दूर होती चली गईं.

करीब 15 मिनट बाद टैलीफोन की घंटी बजी, तो अमित अख्तर ने चोंगा उठा कर कान से लगाया, ‘‘मुकीम, क्या कहा सेठ ने?’’

‘‘सेठ पैसा देने से मना कर रहा है.’’

‘‘तुम सेठ को फोन दो.’’

अगले ही पल सेठ की आवाज सुनाई दी, ‘‘अमित बाबू, हम पर दया कीजिए. 2-4 हजार की बात हो तो दे देता हूं, लेकिन 50 हजार रुपए मेरे बस की बात नहीं है.’’

‘‘सेठ, हमारी बात गौर से सुनो, हम चुनाव लड़ रहे हैं. हमें तलवार पार्टी से टिकट लेना है… हम एमएलए भी बनेंगे और बाद में मंत्री भी.

‘‘अगर हम मंत्री बन गए, तो तेरे सारे लाइसेंस रद्द करवा देंगे, तुझे भिखारी बना देंगे. अगर हम कुछ न बन पाए, तो सुन… हमारे ऊपर 22 मुकदमे चल रहे हैं, इन में से 10 कत्ल के हैं, 23 वां मुकदमा तेरे कत्ल का शुरू हो जाएगा… मैं चोंगा रखूं या तू कुछ बकता है?’’

‘‘मैं 50 हजार रुपए दे रहा हूं… लेकिन तुम मंत्री बनने के बाद हमारा खयाल जरूर रखना.’’

‘‘चिंता मत कर, तू अभी से गेहूं, चावल, चीनी जमा कर ले, चुनाव के बाद मैं मुख्यमंत्री से कह कर सभी चीजों के दाम बढ़वा दूंगा.’’

‘‘क्या आप की मुख्यमंत्री से बात हो गई है?’’

‘‘हां, उन्होंने ही मुझे मंत्री बनने के नुसखे बताए हैं. उन्होंने पार्टी का टिकट देने के लिए 5 लाख का चंदा मांगा है… यह चंदा मुझे तुम्हारे जैसे लोग ही तो देंगे.’’

चोंगा रख कर अमित अख्तर मेरी तरफ देख कर मुसकराया.

कुछ ही देर में उस के गुंडे सेठ जहांगीरी से 50 हजार रुपए ले आए.

‘‘नेताजी, इन रुपयों का क्या करना है?’’ मुकीम ने नोटों का बैग अमित अख्तर के आगे रख दिया.

‘‘सुनो, 1-1 हजार की 50 गड्डियां बनाओ. हर मंदिरमसजिद को हमारी तरफ से चंदा दे दो. जो रुपया बचे, उस की हरिजन बस्ती में शराब और गरीब मुसलमानों में बिरयानी बांट दो.’’

मुकीम और उस के साथियों के जाने के बाद मैं ने अमित अख्तर को घूरा, ‘‘तुम यह हराम की दौलत मंदिर, मसजिद को दान दे रहे हो?’’

‘‘अरे वकील बाबू, यह हराम… हलाल क्या होता है… रुपया तो रुपया होता है… इस पर हराम या हलाल कुछ नहीं लिखा होता. फिर मंदिर, मसजिद वालों को क्या मालूम, यह रुपया मैं ने कहां से और कैसे
कमाया है.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ, कुछ देर पहले तुम ने टैलीफोन पर मुख्यमंत्री को 5 लाख का चंदा देने की बात कही थी… यह 5 लाख तुम कहां से लाओगे?’’

अमित अख्तर ने जोरदार कहकहा लगाया, ‘‘बताए देता हूं, लेकिन इस बात का खयाल रखना, चुनाव से पहले यह यह बात किसी को बताना नहीं… अगर बताई तो… खैर सुनो, कुछ जगहों पर लूटखसोट होगी और 2-4 अपहरण की घटनाएं…’’

‘‘अगर पकड़े गए, तब क्या होगा?’’

‘‘यह काम मैं थोड़े ही करूंगा, चेले किस काम आएंगे.’’

‘‘अच्छा, एक बात बताओ, तुम अख्तर से अमित अख्तर क्यों बन गए?’’

‘‘यह वोटों की राजनीति है. मैं ने हिंदू व मुसलिम वोटों को अपनी ओर खींचने के लिए अमित अख्तर नाम रखा है. मुसलमानों से मिलने जाऊंगा, तो सिर पर टोपी लगा लूंगा और हिंदुओं से मिलूंगा, तो माथे पर तिलक लगा लूंगा.’’

‘‘अगर दोनों धर्म वालों से एकसाथ मिले, तब…’’

‘‘तब मैं सिर पर गांधी टोपी लगा कर आदर्शवादी बन जाऊंगा,’’ कहते हुए उस ने जोरदार ठहाका लगाया.

फिर वैसा ही हुआ, जैसा अमित अख्तर ने कहा था. तलवार पार्टी ने अपने पुराने एमएलए को टिकट न दे कर अमित अख्तर को टिकट दे दिया. अमित अख्तर के गुंडों ने कहीं डराधमका कर, कहीं मतपेटियां लूट कर, तो कहीं दौलत लुटा कर चुनाव जीत लिया.

इस के बाद अमित अख्तर ने तलवार पार्टी के अध्यक्ष को सोने की तलवार भेंट की. इस के बदले में पार्टी ने उसे उपमंत्री बना दिया.

मंत्री बनने के बाद अमित अख्तर का नगर में शानदार स्वागत किया गया. जब वह मंच पर भाषण दे रहा था, तब लोगों की भीड़ में खड़े हुए मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह तो हिस्ट्रीशीटर अमित अख्तर है, मंत्री कैसे बन गया?’’

लोगों ने मुझे घूर कर देखा. एक आदमी बोला, ‘‘लगता है, तुम पुलिस के आदमी हो… शायद तुम्हें मालूम
नहीं, नेताजी के ऊपर पुलिस द्वारा झूठे मुकदमे चलाए गए थे. नेताजी तो गरीबों के हमदर्द हैं, दयालु हैं और महान देशभक्त हैं.’’

तभी वहां मौजूद भीड़ ‘नेताजी जिंदाबाद’ के नारे लगाने लगी.

मैं हैरान था और साथ ही मुझे गुस्सा भी आ रहा था कि हमारे देश की जनता कितनी जल्दी मुखौटों के पीछे छिपे चेहरों को भूल जाती है. Family Story In Hindi

Family Story In Hindi: दांव पर सत्या

Family Story In Hindi: जुए का नशा सब से मादक होता है. दांव हारने वाला जुआरी भी तब तक हार नहीं मानता, जब तक वह पूरी तरह से बरबाद न हो जाए.

गांव जटपुर का नेतराम, जिसे सब ‘नेतिया’ कह कर पुकारते थे, दांव पर दांव लगा रहा था और आज वह हर दांव हार रहा था. ऐसा लगता था कि आज का दिन उस का नहीं था. सबकुछ गंवाने के बाद भी वह वहां से उठने का नाम नहीं ले रहा था.

यही जुआ खेलने का नशा होता है कि आदमी चाह कर भी इस से अपना दामन छुड़ा नहीं पाता है, बल्कि दांव हारने पर खेलने का और ज्यादा जज्बा पैदा होता है.

‘‘नेतिया, अब तू अपना क्या दांव पर लगाएगा? अब तो तेरी जेब खाली हो गई,’’ बेलू ने हंसते हुए कहा.

‘‘क्यों? पैसा ही तो खत्म हुआ है, अभी तो मेरे पास बहुतकुछ है.’’

‘‘लगा तो फिर क्या लगाएगा दांव पर नेतिया? बिना कुछ दांव पर लगाए तो अगली बाजी खेल नहीं पाएगा,’’ शेरा ने ताश के पत्ते फेंटते हुए कहा.

‘‘तुम बताओ, इस बार की बाजी कितने की लगा रहे हो? देखना, नेतिया अपने बाप से नहीं अगर पीछे हट गया,’’ नेतिया ने बीड़ी सुलगाते हुए कहा.

नेतिया को छोड़ कर सब बाजी जीते हुए बैठे थे. पीपल की छांव में बैठे हुए गांव के ये गरीब मजदूर तबके के लोग आखिर कितनी बड़ी बाजी खेल सकते थे. उन की बाजी 50-100 रुपए से शुरू हो कर हजार 2 हजार पर जा कर टिक जाती थी.

नेतिया के पास इकन्नी भी नहीं थी, लेकिन जुए की मादकता ने उसे अपनी गिरफ्त में ले रखा था. उसे हर हारे हुए जुआरी की तरह लग रहा था कि अगली बाजी उस की होगी, हर हाल में वही जीतेगा.

‘‘देख नेतिया, इस बार हम लोग 2-2 हजार का दांव खेलने जा रहे हैं. इस से ज्यादा रकम हम ले कर नहीं बैठे. अब तू बता दांव पर क्या लगाएगा?’’ शेरा ने पूछा.

नेतिया को लगा कि अगर वह यह दांव जीत जाता है, तो उस की पूरी वसूली ही नहीं हो जाएगी, बल्कि वह बड़ी रकम उठाने में भी कामयाब हो जाएगा और उसे पूरा यकीन था कि यह बाजी उस की होने वाली है.
जुआरी का यही विश्वास और लालच उस के अंदर आगे खेलने की आग और ललक पैदा करता है.

नेतिया ने जोश में कहा, ‘‘मैं दांव पर अपना ‘गबरू’ बछड़ा लगाता हूं.’’

‘‘न भाई न. बछड़े अब किसी काम के नहीं. अब खेतों की जुताई बैलबछड़ों से होती नहीं. छोटे से छोटा किसान भी अपने खेतों की जुताई ट्रैक्टर से कराता है. बछड़ा तो हम मुफ्त में भी न लें,’’ बेलू ने नकारते हुए कहा.

‘‘अरे, तो दांव पर क्या लगाऊं, कुछ सम?ा में नहीं आ रहा…’’ नेतिया बोला.

‘‘अरे नेतिया, सोचता क्या है… सत्या भाभी को दांव पर लगा दे युधिष्ठिर की तरह. जैसे द्वापर में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को जुएं में दांव पर लगा दिया था,’’ मलखान ने मजाक भी किया और सुझाव भी दिया.

‘‘ओ मल्खे, अपनी सलाह अपने पास रख. औरत को दांव पर नहीं लगाऊंगा.’’ नेतिया बोला.

‘‘तो फिर क्या लगाएगा? अब तेरे पास बचा ही क्या है? मकान पुश्तैनी है. उसे तू दांव पर लगा नहीं सकता. उस में तेरे भाई चेतराम का बराबर का हिस्सा है. खेतखलिहान पहले ही तेरी जोरू ने तेरे जुआरी होने के चलते अपने नाम लिखा रखे हैं, तो फिर तू अपनी जोरू को ही दांव पर लगा सकता है. उसे दांव पर लगा या फिर यहां से उठ जा और जुआ खेलने से तोबा कर.’’

नेतिया यह सुन कर बड़ी दुविधा में फंस गया कि या तो वह अपनी बीवी सत्या को दांव पर लगाए या फिर जुए का ‘रणक्षेत्र’ छोड़ कर भागे.

नहींनहीं, वह रणक्षेत्र छोड़ कर नहीं भागेगा. वह ऐसा कर के ‘रणछोड़’ नहीं कहलाएगा. वह दांव जरूर खेलेगा. वह बहादुर है कोई कायर नहीं. वैसे भी वह यह दांव जरूर जीतेगा…

यह सोच कर नेतिया जोश में आ कर बोला, ‘‘आओ बे, लगी सत्या दांव पर. मैं युधिष्ठिर, सत्या द्रौपदी. आओ बे कौरवो, देखना आज पांडव जीतेगा, कौरव हारेंगे. अब कोई उठ कर नहीं जाएगा. नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं,’’ नेतिया ने ऐलान किया.

कोलाहल. उत्सुकता का माहौल. भीड़ पर भीड़. बाजी लग गई. सब के चेहरे पर एक ही सवाल कि अगर नेतिया हार गया तो सत्या का क्या होगा?

ताश के एकएक पत्ते पर सब की निगाह… और फिर एक और महाभारत की शुरुआत. नेतिया दांव हार गया. भीड़ हैरान. चारों तरफ बेचैनी का ज्वारभाटा कि अब आगे क्या होगा? क्या सत्या जुआरियों की हो जाएगी?

सत्या का छोकरा दौड़ता हुआ घर आया, ‘‘मांमां, तू हार गई.’’

सत्या को एकदम से कुछ समझ में नहीं आया. वह झंझला कर चीख कर बोली, ‘‘क्या बक रहा है नाशपिटे? कौन हार गई?’’

‘‘मां, तू जुए में हार गई. बापू ने तुझे दांव पर लगाया था. वह दांव हार गया. पीपल के नीचे बापू सिर पकड़े बैठा है. लोग उस पर हंस रहे हैं.’’

सत्या को जैसे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. हजारों बिच्छुओं ने जैसे उसे एकसाथ डंक मार दिया
हो. उसे पता था उस का आदमी जुआरी है, लेकिन वह उसे ही दांव पर लगा देगा, उसे इस बात का भरोसा नहीं हो पा रहा था.

लेकिन जुआरी कौन सा दांव खेल जाए, इस का क्या भरोसा… किसी अनहोनी के डर से सत्या ने अपने देवर चेतराम को आवाज लगाई, ‘‘चेता, ओ चेता.’’

चेतराम उस समय जानवरों को चारा डाल रहा था. वह अपनी भाभी की आवाज सुन कर आया, ‘‘हां, क्या हुआ भाभी?’’

‘‘देख, तेरे भैया ने क्या नरक रचा है,’’ फिर सत्या ने सारी बात चेतराम को बताई.

चेतराम भाभी की बात सुनते ही भड़क गया, ‘‘भाभी, ऐसे काम नहीं चलेगा. इन्होंने इस युग को भी द्वापर युग ही समझ रखा है. ये द्रौपदी की जगह तेरा चीरहरण करना चाहते हैं. जरा मोटा वाला लट्ठ ला और तू भी लाठीडंडा उठा. मैं देखता हूं इन ससुर जुआरियों को.’’

‘‘सही कह रहा है तू चेता. इन सब के दिमाग में आज भी वही गोबर भरा हुआ है कि जब देखो औरत को दांव पर लगा दो. तू रुक जरा. मैं शेरा, भूरा, बेलू, मल्खे और टेलू जुआरियों की बीवियों को भी बुला लाती हूं.

वे सब की सब भी दुखी हैं इन की करतूतों से. अब इन्हें ठीक करने का समय आ ही गया है,’’

सत्या की आवाज सुन कर केवल जुआरियों की बीवियां ही नहीं, बल्कि घर की दूसरी औरतें भी आ गईं. इन
10-12 औरतों के हाथों में झाड़ूडंडे थे.

ये सब की सब चेतराम के साथ चुपके से पीपल के पेड़ के पास जा पहुंची, जहां पहले से ही भीड़ जमा थी. फिर इन्होंने अचानक से अपने जुआरी पतियों की ?ाड़ूडंडों से खबर लेनी शुरू कर दी… दे दनादन.

जुआरियों ने भागना चाहा तो औरतों ने मिल कर उन्हें नीचे गिरा लिया और उन की औरतें उन की छातियों पर चढ़ कर बैठ गईं.

सत्या नेतिया की छाती पर बैठी चीख रही थी, ‘‘चीरहरण करवाने चले थे मेरा इन जुआरियों, कबाबियों से. द्वापर की द्रौपदी समझ रखा है क्या सत्या को. द्वापर नहीं, यह कलियुग है कलियुग. किसी ने हाथ भी लगाया तो खून पी जाऊंगी उस का.’’

सत्या नेतिया का गरीबान पकड़े उस की छाती पर सवार थी. वह इस समय खतरनाक शेरनी बनी हुई थी.
तभी ग्राम प्रधान ने 112 पर फोन कर पुलिस को बुला लिया. दारोगा रामप्रकाश ने भी जुआरियों को खूब हड़काया, फिर उन्हें जीप में डाल कर आगे की कार्रवाई के लिए थाने ले गया.

एक सोचीसमझी रणनीति के तहत इन जुआरियों के परिवार में से कोई भी उन की मदद के लिए थाने नहीं गया. किसी ने उन की जमानत भी नहीं करवाई.

जब धरे गए सभी जुआरी सजा काट कर वापस आए, तो उन्हें घर में तभी घुसने दिया गया जब उन्होंने कान
पकड़ कर फिर कभी जुआ न खेलने की कसम खाई. Family Story In Hindi

Story In Hindi: लकवा

Story In Hindi: इस समय सुबह के साढ़े 7 बज रहे थे. मौसम ठीकठाक था. ज्यादा चुभती धूप नहीं थी. बच्चे स्कूल जा रहे थे. सफाई मुलाजिम सड़क साफ कर रहे थे. दूध वाले अपने ग्राहक के घर पर दस्तक दे कर ‘दूध ले लो, दूध आ गया’ की आवाज लगा कर उन को बाहर बुला रहे थे. कुलमिला कर सभी बिजी थे.

इधर मनु का ठेला भी तकरीबन तैयार था. अमरूद, केला, नाशपाती, पपीता, संतरा और सेब अच्छी तरह से लगा दिए गए थे.

मनु ने अपनी बहन बाली को चूम कर उस का धन्यवाद किया कि उस ने कितने करीने से सारा ठेला दुलहन के जैसे सजा दिया था.

दाएं हाथ से धीरेधीरे ठेलते हुआ मनु चल दिया. अपनी गली से आगे बढ़ कर दूसरी गली पर आया ही था कि ‘ओ हीरो, एक गुच्छा रख दे…’ उमा की आवाज आ गई.

उमा की बहन रमा को पीलिया था. सुबह उमा मनु से केले का गुच्छा रखवा लेती थी. रमा को केला, गन्ने का रस और छिलके वाली मूंग की दाल का आहार देना तय था.

उमा ने 10-10 के 3 नोट रख दिए मनु के हाथ में. मनु ने रुपए लिए, माथे से लगा कर जेब में रख लिए और हंस कर उसे धन्यवाद भी कहा और 24 घंटे के अंतराल में दोनों का आंखों ही आंखों में संवाद भी हो गया.

दोनों ने पलकें झपका कर एकदूसरे को अपनी कुशल दे दी थी.

उमा मनु की बचपन की साथी थी. उम्र में उस से 4 साल बड़ी थी, पर उस से कुछ नहीं होता. मनु और उस की खूब गहरी छनती थी. दोनों त्योहार पर रंगोली बनाते थे. गरबा रास में 9 दिन साथसाथ जाया करते थे.

कितना मजा था तब. जब मनु 16 का था और उमा 20 की थी.

मनु एक हाथ से ठेला खिसका रहा था. उस के बाएं हाथ में लकवे का असर था. 3 साल पहले उस के पूरे बाएं अंग में लकवा हुआ था. अब चेहरा तो ठीक हो गया है, पैर भी काफी दुरुस्त हैं, मगर हाथ अभी भी कमजोर है. बस, दायां हाथ ठीक चलता है.

उमा केले ले कर भीतर आ गई. हाथोंहाथ एक केला छील कर उस ने रमा को खिला दिया. उमा को 2 घंटे में काफी जल्दी से सब काम करने थे, उस के बाद उस को भी काम पर जाना था.

उमा की मां भी कहने को घर पर हैं, मगर वे अपने किसी विश्वास के चलते सुबह 6 बजे से 10 बजे तक मंदिर में जाप करती हैं, शायद रमा ठीक हो जाए. उन की नजर में यह पीलिया एक दैवीय प्रकोप है.

उमा ने लाख समझाया है कि यह दवा और आहार से ठीक होगा, मगर वे न तो डाक्टर हैं और न ही नौकरी करती हैं. वे शायद अपना होना और अपनी अहमियत को साबित करने के लिए मंदिर चली जाती हैं.

मां कहती रहती हैं, ‘‘मैं इतना नियमधर्म करती हूं तब जा कर यह घर सकुशल है.’’

घर पर भी उठतेबैठते मां कुछ न कुछ नाम जपती ही रहती हैं. उमा अपने घर पर, मां के इन धार्मिक ढोंग और पोंगापंडितों की चरणपूजा से नफरत करती थी.

उमा घर पर कहती भी थी कि शुद्ध घी का हलवा भगवान को भोग लगाने की जगह लावारिस लोग, जो फुटपाथ पर हैं, को सादा खिचड़ी ही खिला दो. भगवान के 4 समय पोशाक और परिधान बदलते हो, उस जूता मरम्मत करने वाले अंकल को बैठने के लिए एक आसन दे दो. मगर उस की कौन सुनता है. मां अगर उस की सुन लेंगी, तो उन को अपने बेरोजगार होने का डर है.

उमा अपना फर्ज पूरा करती है. वह अपना काम करती है और पूरे समर्पण से करती है.

रमा को अब पीलिया हुए 2 हफ्ते हो गए हैं. वह धीरेधीरे ठीक हो रही है, मगर मां का कहना है कि यह उन के तप और पूजापाठ का ही फल है.

अब डाक्टर के कहने पर उमा ने बूंद भर घी में बघारी हुई मूंग की दाल और पतलीपतली चपाती बना कर रमा को खिलाईं. इतना अच्छा खाना खा कर रमा तन और मन दोनों से चुस्तदुरुस्त होती जा रही है.

‘‘अब हफ्ते बाद सुबह तुम को आलू के परांठे बना कर मैं खिलाने वाली हूं,’’ कह कर उमा ने रमा को बगैर दूध की चाय बना कर भी पिलाई.

रमा के उमा का हाथ चूम लिया. रमा का हर राज जानती है उमा. रमा के प्रेम संबंध, उस का ब्रेकअप और ब्रेकअप के बाद का डिप्रैशन, सब उमा ने सुनसुन कर बांट लिया.

खुद रमा की उमा दीदी ने भी तो कैसा जीवन देखा है और झेला है. बस, वही तो जानती है. एक दिन तो वह अपने से छोटे मनु को मन ही मन पति मान बैठी थी. तब सारे महल्ले ने उस को कैसा बदनाम किया था.

उमा घबरा कर अपनी बूआ के पास दिल्ली चली गई थी, मगर वहां भी 10 दिन से ज्यादा न टिक सकी थी. बूआ का देवर खुलेआम छेड़ा करता था उस को. बूआ तो देख कर भी अनदेखा कर देती थीं.

उमा ने बूआ को एकाध बार उस ने संकेत भी किया, मगर वे तो खुद अपने देवर की आधी पत्नी बनी हुई थीं.

बूआ के पति सैकड़ों मील दूर झारखंड में कोयला खान में काम करते थे. वे महीनों तक घर नहीं आते थे. रखवाली के लिए अपना भाई अपनी पत्नी को सौंप गए थे. अब देवरभाभी एकदूसरे की काफी अच्छी देखभाल कर रहे थे.

इतनी बेहूदगी उमा से सहन नहीं हो रही थी, इसलिए उमा ने वहां से चले जाना ही ठीक समझा और लौट कर घर आ गई. तब तक मनु पर लकवे की मार असर कर चुकी थी.

रमा से यह खबर सुन कर उमा का तो कलेजा ही धक से रह गया था. उसे रातों को नींद नहीं आती थी. कितनी बार वह सोचती थी कि उसी की वजह से मनु को यह लकवा हुआ, मगर मनु की बहन बाली से तो उस का खूब प्यार का नाता था. बाली ने सब खुलासा किया. उस ने बताया कि गलत खानपान और बीड़ी पीने से यह समस्या हुई थी.

‘‘ओह, मनु…’’ इतना कह कर और अपना डूबता हुआ दिल संभालती हुई मनमसोस कर रह गई उमा.
मनु ने कालेज की पढ़ाई भी बीच में छोड़ दी थी. उसे किसी ने निजी बस में टिकट काटने का काम दिया था. हर रोज 100 मील चलती थी बस. उस को सुबह 9 से शाम 7 बजे की ड्यूटी करनी होती थी.

मनु को यह काम ठीक लगा था. उसी दौरान वह बस चालक की संगत में बीड़ी पीने लगा. खैर, अपनी कमाई थी. जो मरजी करो, कौन देखने और रोकने आ रहा था, इसलिए बिंदास पी रहा था वह. कभीकभार महंगी सिगरेट भी पी लेता था.

मगर एक दिन बस में कुछ मनचले छोकरों को टोकने पर मनु के साथ भयंकर हाथापाई हो गई थी और उस ने नौकरी छोड़ कर घर पर ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम ले लिया था. दूसरी से 5वीं तक के बच्चों को मनु गणित पढ़ाता था और बस इसी दौरान उस को लकवा मार गया.

मनु की एक छोटी बहन थी. वह भी 10वीं में पढ़ती थी. उस के वश में इतना ही था कि मजबूर और मजदूर मांबाप की खरीखोटी सुन कर उसे वैसा का वैसा मनु को सुना दे. मनु का सरकारी अस्पताल में इलाज चल रहा था. उस की इस गली से केवल 200 कदम दूर सरकारी अस्पताल था. उसी के करीब एक निजी अस्पताल भी था.

इलाज कराना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था, बस यह बायां शरीर काम करने लगे, अब मनु के लिए दिनरात सोतेजागते का एक यही सपना रह गया था.

वहीं 10 रुपए में एक थाली भोजन भी मिल जाता था. मनु घर आता और अपने आंसू पी कर बस चुपचाप बिस्तर पर पड़ा रहता था. डाक्टर उस से खूब बात करते थे.

दरअसल, मनु का पढ़ालिखा होना डाक्टर को अच्छा लगा. वे खुश थे कि अनपढ़ मजदूर मातापिता की संतान मनु की सोच अच्छी है. मनु में धीरज कूटकूट कर भरा था.

धीरेधीरे मनु अच्छा हो रहा था. डाक्टर ने ही उस को अपने किसी जानकार से कह कर 10,000 का बिना ब्याज का लोन दिलाया था. 8,000 का ठेला और 2,000 के फल खरीद कर मनु ने बहुत ही मन से ठेला लगाना शुरू कर दिया था. उस निजी अस्पताल के बाहर सेब खरीदने वाले आते ही थे, केले भी बिक जाते थे.

पहले ही दिन मनु की जेब में 3,000 रुपए थे, जबकि शाम ढलने तक सारे फल बिके नहीं थे. आज भी उस ने 10 रुपए का एक थाली भोजन खा लिया था. शाम को वह डाक्टर के पास रुपए ले कर गया.

डाक्टर ने मनु के हाथ में नोट देख लिए थे. वे हंस कर बोले, ‘‘कम से कम 3 महीने बाद लौटाना.’’

‘‘अरे, आज ही…’’ मनु बोला.

‘‘नहींनहीं, अभी बिलकुल नहीं चाहिए. अभी तुम खुश रहो. दवा लो और अपना खयाल रखो. हफ्ते बाद चैकअप करा लेना,’’ कह कर डाक्टर अपने राउंड पर चले गए. मनु अपने नोट दबाए वैसा ही बुत बना रहा.

इस तरह ठेला खींचते हुए और फल बेचते हुए मनु को 2 महीने हो रहे थे. अब उमा भी कुछ बेशर्म हो गई थी. वह न महल्ले की चिंता करती थी, न कहनेसुनने वालों की. अपना काम बनना चाहिए, बस यही उस का मूल मंत्र हो गया था, इसलिए सुबह की मनु की पहली ग्राहक वही थी.

अब रमा ने एक अंगड़ाई ली और बारबार भुवन के बारे में सोचने लगी. रमा को एक पार्टी में बुलाया था उस ने. फोन पर संदेश था उस का. एक हफ्ते बाद 3 दिन तक जश्न है होटल हैवन में. किसी भी शाम को आना, बस बता देना. शाम 7 से रात 11 बजे तक पार्टी चलती रहेगी.

उमा अब तैयार हो गई थी. वह एक वृद्धाश्रम में नौकरी करती थी. उस का काम था 30 लोगों के इस वृद्धाश्रम में सुबह साढ़े 10 से शाम 5 बजे तक की दिनचर्या का पूरा रजिस्टर भरना. यहां आनेजाने वाले डाक्टर और दूसरे विजिटर्स का भी एक अलग रजिस्टर था. हर हफ्ते की पिकनिक और सिनेमा ले जाने का भी जिम्मा उमा का ही था.

उमा को यहां काम करते हुए 7-8 महीने होने आए थे. यहां रहने वाले बुजुर्ग लोग कितने अमीर थे, मगर कितने अकेले थे. उमा यह करीब से जानती और महसूस करती थी. उमा चली गई और मां अभी लौट कर आई नहीं थीं.

रमा ने आज कोशिश कर के स्नान कर लिया था. बुखार नापा. आज बुखार नहीं था. कुछ देर बाद एक कप दूध पी कर देखा. न तो उलटी आई और न ही जी मिचलाया यानी पीलिया जड़ से मिट रहा था. उस ने फोन पर एक गीत चलाया और नाचने लग गई.

नाचते हुए रमा आईने के करीब आ गई. आई ब्रो रेजर लिया और अपनी भवें तराश लीं. वाह, क्या चेहरा निखर गया था उस का. उस ने खुद को ही चूम लिया.

रमा शायद मूड में थी. उस ने मां को खींच कर अपने पास बिठा लिया. मां की गोदी में लेट कर पूछने लगी, ‘‘आज कुछ देर बाहर चली जाऊं मां?’’

‘‘मैं कुछ कहूं उस से पहले खुद से पूछ, ताकत है भी कि नहीं?’’ कह कर मां उस को थपकी देने लगीं.

रमा अपनी मां को कुछ दलीलें देने लगीं. मां उस की दलील सुन कर मन ही मन खिलखिलाहट से भर गईं. वे खुद भी तो ऐसी ही थीं आजादखयाल. मौजमस्ती की शौकीन. पिता और चाचा की लाड़ली. स्कूल में दर्जा 2 से मोहन के प्यार में पागल थीं वे. छठी जमात में आईं, तो उन दोनों ने मंदिर में शादी ही कर ली थी. दोनों दोपहर 2 बजे मंदिर गए. मंदिर बंद था, मगर मोहन ने बंद मंदिर को ही साक्षी बना कर उस की मांग भर दी.

फिर वे दोनों एकदूजे को गले लगा कर यों ही बैठे रहे थे. शायद ऐसे ही रहते और शाम से रात हो जाती, मगर ऐसा हुआ नहीं. कुछ आवाजों ने उन को झकझोर कर जगाया.

वह तो मोहन के दोस्त आ गए थे. ताजा खबर यह थी कि मोहन और मीना दोनों ने शादी कर ली.

यह सुनते ही मीना ने मोहन की मदद से मंदिर के अहाते में नल का पानी चला कर ताजा भरी हुई मांग को धोया और दोनों सरपट भागे अपनेअपने घर. दोनों के घर पर मुखबिर पहुंच गए थे. काफी नमकमिर्च लगा कर कहानी बना कर सुना दी गई थी.

अब 10 दिन मीना स्कूल नहीं गई. फिर टीचर और प्रिंसिपल के सम?ाने पर दोनों स्कूल जाने लगे थे. मीना के घर पर संयुक्त परिवार था. मोहन के घर पर उस का बड़ा भाई और मां ही थे. मीना अकसर ही मोहन के घर चली जाती थी. 10वीं तक तो पूरा कसबा ही उन दोनों को पतिपत्नी कह कर मजे लेने लगा था.

बस, अब सहन करना मुश्किल था. मीना और मोहन घर से भाग गए. भाग कर जाते किधर और कहां. कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कुछ दिन बाद बनारस की बस ले कर घाट पर भीख मांगने लगे. महीनेभर बाद धर लिए गए.

मीना को घर पर ला कर नजरबंद कर दिया गया.

मोहन की जिंदगी तो 3-4 दिन बाद सामान्य हो गई थी. 2 साल किसी जेल खाने वाली जिंदगी जी कर काटी मीना ने. इस बार वे दोनों ज्यादा तैयारी के साथ भागे, मगर कुछ मुखबिर उन से भी ज्यादा होशियार निकले.

एक हफ्ते बाद वे दोनों हरिद्वार में भीख मांगते हुए पकड़े गए और घर वापस लाए गए. मोहन की पिटाई हुई. फिर उस की अकेली मां को याद कर उसे धमकी देकर छोड़ दिया गया.

अब मीना 18 साल की थी. एक महीने में उस की सगाई कर दी गई. सूरत में कपड़े के कारोबारी की दुलहन बन कर वह ससुराल आ गई.

ससुराल में पति से ज्यादा जवान उस के ससुरजी थे. मीना कितनी ही बार ससुर के गलत स्पर्श से बची. अब वह पुरानी वाली मीना नहीं थी. मोहन को फोन कर उस ने सब बताया. एक दिन मोबाइल पर ससुरजी की वीडियो बनाई और अपने पीहर भेज दी.

इधर मीना के पीहर वाले उसे वापस ले गए और उधर मोहन से लगाव फिर शुरू हो गया था. थकहार कर परिवार ने उन दोनों को सात फेरों की इजाजत दे दी. मीना और मोहन अब पतिपत्नी बन गए. 10 महीने बाद उमा का जन्म हुआ. जीवन सरल था, मगर ठीक ही था मगर समय को कुछ और ही मंजूर था. उमा के जन्म के एक महीने के अंदर ही मोहन की सड़क हादसे में याददाश्त चली गई. वह अगर घर से बाहर जाता, तो घर का पता भूल जाता.

मीना ने मजदूरी शुरू कर दी. उस के पीहर से महीने का पूरा राशन और उमा का बेबी फूड समय पर आ जाता था, मगर अभी मोहन का छोटा भाई भी बेरोजगार था. मीना के पीहर की मदद से उस को भी काम मिल गया.

अब जैसा भी था, खाने पीने की कोई फिक्र नहीं थी. जीवन चल रहा था.

4 साल बाद रमा का जन्म हुआ और मोहन नींद में चल बसा.

मीना के पीहर ने उस की मदद की. रमा के लालनपालन की भी जिम्मेदारी ली. अब तो सास भी चली गई थी. देवर ने शादी कर के अलग घर बसा लिया था.

मीना का अजीबोगरीब जीवन अपनी गति से चल रहा था. अब वह इस कांटों भरे जीवन को अपनी ही हरकतों का नतीजा मानती थी. उसे लगता था कि आज उमा इतनी मेहनत कर रही है, काश, मीना सही रहती. परिवार का मान रखती. शायद आज उस के दिन कुछ और ही होते… काश.

‘‘मैं जा सकती हूं न?’’ रमा ने उस को झकझोर कर पूछा, ‘‘बताओ न?’’

‘‘जरूरजरूर, क्यों नहीं. अपने जीवन का जोखिम खुद ही उठाना सीखो. जाओ, और अपना खयाल रखो,’’ कह कर मीना चाय बनाने चली गईं.

शाम को घर आते ही उमा को भी खबर मिल गई कि तैयार हो कर रमा हैवन होटल जा रही है.

‘‘भुवन के चक्कर में है न?’’ उमा ने पूछा.

‘‘अरे, सब सेफ है दीदी, कोई खतरा नहीं. आप मुझ पर भरोसा रखो,’’ कह कर रमा ने उसे गले लगा कर चूम लिया. गुलाब के चालू किस्म के इत्र की महक उमा की नाक में भर गई.

‘‘रमा, कुछ भी तेल और मसाले का मत खा लेना. अभी सावधान रहना.’’

‘‘अरे, अभी तो देर है. अभी नहीं जा रही.’’

‘‘तब तो, इधर देख, सुन, रसोई में मूंग दाल है. उसे पी ले. पेट भर ले यहीं,’’ उमा ने उसे समझाया, तो रमा एकदम मान गई और दाल पीने लगी. आधापौना घंटा खुद को और संवार कर निखार कर वह चली गई.

भुवन रमा को सही जगह पर मिल गया. उस होटल में विदेशी मेहमान थे. रमा इस से पहले भी ऐसी पार्टी
में गई थी. अभी 3 लोग भाषणबाजी करेंगे. सब को गिफ्ट मिलेंगे और फिर खाना और पीना गपशप… फिर सब अपनेअपने घर.

रमा ने इधरउधर देखा. कुछ लड़कियां उस की देखीभाली सी लगीं. कुछ महीने पहले उस ने शालीमार होटल में इन को देखा था.

तकरीबन 3 घंटे बाद सब हंस कर विदा हुए. भुवन ने उसे घर तक छोड़ा. 500 का लिफाफा दिया. यही तो मेहनताना था. रौनक बढ़ाओ, खाना खाओ और 500 रुपए अलग से.

रमा के लिए यह क्या बुरा था. वैसे, वह बीए पास करने के बाद कुछ अच्छी नौकरी भी करने की सोच रही थी.

इसी तरह 3-4 हफ्ते और निकल गए. रमा एक बार और भुवन की बताई पार्टी मे सजसंवर कर शोभा बढ़ा आई थी. इस बार 700 रुपए मिले थे.

उधर मनु का फल का ठेला आमदनी देने लगा था. मनु को डाक्टर का भक्त बन गया था.

एक दिन डाक्टर ने उस को जिंदगी की सचाई पर एक प्रेरक भाषण दिया. डाक्टर ने बताया कि अगर बीमारी लाइलाज हो जाए तो इलाज में पैसा लगता है, इसलिए 2-4 लाख रुपए पास होने चाहिए. इस के लिए दुनियादार होना चाहिए. समझदार होना चाहिए.

21 साल के मनु को डाक्टर की हर बात बहुत अच्छी लग रही थी. वह गरदन हिला कर सुन रहा था.
अब डाक्टर की हर बात मनु के लिए माननीय होती. एक हफ्ते बाद डाक्टर उस को अपने साथ अपने फार्महाउस ले कर गए. तकरीबन आधा घंटा वहां रह कर मनु ने काफीकुछ देखा और सीखा.

वहां एक लड़की से परिचय कराते हुए डाक्टर ने कहा, ‘‘यह मेरी बहन की बेटी है. दिव्यांग है. उम्र 25 है मगर इस का दिमाग 14 साल का है. इस से शादी करो तो यह फार्महाउस मैं तुम को उपहार में देना चाहता हूं.’’

यह सुन कर मनु के सिर पर बिजली सी गिर गई. उस की आवाज कांपने लगी. उसे अचानक महसूस हुआ कि वह कितना अमीर है. वह कितना दौलतमंद है. कुछ बहाना बना कर उस ने टाल दिया डाक्टर ने उस की बात का बुरा नहीं माना. वे दोनों वापस लौट आए.

इस घटना के 2 दिन बाद मनु के मामा उस के घर आए. उस की मामी को अस्पताल लाए थे. मामी अभी 30-35 साल की थीं. उन के दिमाग में ट्यूमर हो गया था. मामी का सरकारी इलाज हुआ. दिमाग की सर्जरी हुई. कुल 4 लाख का खर्च आया. 3 लाख सरकार ने दिए.

एक लाख का मामा ने किसी तरह इंतजाम किया.

मामी को घर लाया गया. वह जिंदा थीं मगर अब उन का दिमाग मरा हुआ सा था. अब मामा को जिंदगीभर नौकरी भी करनी थी, मामी की सेवाटहल भी.

मामा की माली हालत ठीकठाक थी. अब तो यह सब देख कर मनु के पैरों से जमीन खिसक गई. वैसे तो वह भी लकवे के चलते दिमाग से हाथ धोने वाला था. वह तो उसे सही दवादारू मिल गई.

मनु ने अगले दिन डाक्टर से मुलाकात की. डाक्टर ने उस की एकएक बात गौर से सुनी. इस तरह सब ठीक हो गया.

अब एक साल बाद हालात एकदम अलग हैं. मनु अपने फार्महाउस पर रहता है. उस के दोनों हाथ सामान्य से लगने लगे हैं यानी लकवे का असर तकरीबन 10 फीसदी ही बचा है.

फार्महाउस में फल और फूल उग रहे हैं. कुछ कमरे किराए पर उठा रखे हैं. मनु की पत्नी अपने बचपने के साथ उस को कभी भी किसी भी समय गले लगा लेती है.

मनु की बहन बाली एक महंगे कालेज में पढ़ाई रही है. मनु के मातापिता एक किराने की दुकान पर ठाट से गल्ले पर बैठते हैं. दुकान संभालने के लिए असिस्टैंट है.

उमा की नौकरी जस की तस है. रमा ने एक होटल में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली है.

महल्ले वाले मनु के घर की तरफ संकेत कर के कहते हैं कि ‘देखोजी, कौन मानेगा कि इस जगह जो कबाड़ी अपनी दुकान लगाता है, यहां मनु का परिवार रहता था’. Story In Hindi

Hindi Family Story: विरासत – मां का कद ऊंचा करती एक बेटी

Hindi Family Story: मुझे ऐसा क्यों लगने लगा है कि शादी के बाद  लड़कियां बदल सी जाती हैं और उन का वह घर जहां वह अभी कुछ माह या साल पहले गई थीं, अधिक प्रिय हो जाता है. लगता है कि मेरी बेटी कामना के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ है. आती है तो खोईखोई सी रहती है, भाईबहन के साथ की वह धींगामस्ती भी अब नजर नहीं आती. छोटे भाईबहन को कभीकभार आइसक्रीम खिलाने ले जाना, कोई पिक्चर दिखाना या शापिंग के लिए ले जाना, सब ‘रुटीन वे’ में होता है. आज तो उस ने हद ही कर दी. मैं उस की पसंद का मूंग की दाल का हलवा बनाने में व्यस्त थी तभी मैं ने सुना वह अपनी छोटी बहन भावना से कह रही थी, ‘‘भानु, अब की बार मैं जल्दी चली जाऊंगी. तेरे जीजाजी आने वाले हैं. कैंटीन का खाना उन को बिलकुल सूट नहीं करता. आज शाम को बाजार चलते हैं, मुझे मम्मीजी की साड़ी भी लेनी है.’’

यह मम्मीजी कौन हैं? आप को बताने की जरूरत नहीं है. वही हैं जो ससुराल जाने पर हर लड़की की अधिकारपूर्वक मम्मीजी बन जाती हैं, चाहे वह उसे असली मम्मी की तरह मानें या न मानें.

मैं गलत नहीं कह रही हूं. पिछले 10 दिनोें से मुझे वायरल फीवर भी था. थोड़ी कमजोरी भी महसूस कर रही थी, पर उस कालिज से, जहां मैं पढ़ा रही थी, मैं ने छुट््टी ले ली थी. मुझे बस एक ही धुन थी कि बेटी को वह सब चीजें खिला दूं जो उसे पसंद थीं और वह थी कि अपनी बहन से जाने की जल्दी बता रही थी. जैसे मैं अब उस के लिए कुछ नहीं थी.

तभी मैं ने यह भी सुना, ‘‘भानु, इस सितार पर तो धूल जम गई है, तू क्या इसे कभी नहीं बजाती? मैं तो पहले ही जानती थी कि तू साइंस की स्टूडेंट है, भला तुझे कहां समय मिलेगा सितार बजाने का? मां से कह कर मैं इस बार यह सितार लेती जाऊंगी. मैं वहां क्लास ज्वाइन कर के सितार बजाना सीख लूंगी, वैसे भी अकेले बोर होती हूं.’’

हलवा बन चुका था पर कड़ाही कपड़े से पकड़ कर उतारना भूल गई तो उंगलियां जल गईं. अब किसी को बुला कर सितार पैक कराना होगा, जिस से लंबे सफर में कुछ टूटेफूटे नहीं. बेटी है न, उस के जाने के खयाल से ही मेरी आंखें भर आई थीं. मैं ने जल्दी से आंखें आंचल से पोंछ लीं. लगता है, मेरी बेटी अपनी सारी चीजें जिन से मेरी यादें जुड़ी हुई हैं, मुझ से दूर कर ही देगी.

पिछली बार जब वह आई थी, मैं उस के रूखे, घने, लंबे केशों में तेल लगा रही थी कि अचानक ही मैं ने सुना, ‘मां, मैं वह मसूरी वाली ‘पोट्रेट’ ले जाऊं जो आप ने ‘एम्ब्रायडरी कंपीटीशन’ के लिए बनाई थी. वही वाली जो आप ने प्रथम पुरस्कार पाने के बाद मुझे मेरे जन्मदिन पर प्रेजेंट कर दी थी. मम्मीजी उसे देख कर बहुत खुश होंगी. आप ने कितनी सुंदर कढ़ाई की है. पहाड़ लगता है बर्फ से भरे हैं.’’

मैं हां कहने में थोड़ी हिचकिचाई. कितने पापड़ बेलने पड़े थे उस तसवीर को काढ़ने में. कितने प्रकार की स्टिचेज सीखनी पड़ी थीं उसे पूरा करने में, और वह मुझ से ले कर उसे अपनी उन मम्मीजी को दे देगी. पर कोई बात नहीं, मैं तो उसे खुश देखने के लिए अपनी कोई भी प्रिय वस्तु देने को तैयार थी, यह तो फ्रेम में जड़ी केवल एक तसवीर ही थी.

अनुराग उसे लेने सुबह ही आ गया था. शाम को जब मैं दोनों को चाय के लिए बुलाने गई तो देखा दोनों दीवार से तसवीर उतार कर यत्नपूर्वक ब्राउन पेपर  के ऊपर अखबार लपेट रहे थे.

मैं ने दीवार की तरफ देखा, कितनी सूनी, बदरंग सी लग रही थी. ठीक उसी तरह जैसे कामना के चले जाने के बाद उस का कमरा लगता था. मैं बिना कुछ बोले तेज कदमों से वापस लौट आई. कब सुबह हुई, जल्दीजल्दी नाश्ता हुआ फिर साथ ले जाने का खाना पैक हुआ और कामना विदा हो गई, पता ही न चला. भावना सिसक रही थी, ‘‘दीदी, जल्दी आना.’’ मैं चुपचाप उसे देखती रही जब तक कि वह आंखों से ओझल न हो गई.

हर बार की तरह तीसरेचौथे महीने कामना नहीं आई. मैं सोचसोच कर परेशान थी कि क्या कारण हो सकता है उस के न आने का. तभी उस की मम्मीजी का एक छोटा सा पत्र मुझे मिला.

‘अत्यंत प्रसन्नता से आप को सूचित कर रही हूं कि हम दोनों की पदोन्नति हो गई है, यानी कि आप नानी और मैं दादी बनने वाली हूं. कामना को एकदम डाक्टर ने बेड रेस्ट बताया है, इसलिए कुछ महीने बाद ही जा सकेगी वह. हां, गोदभराई के लिए आप को हमारे यहां आना होगा क्योंकि हमारे घर की परंपरा है कि पहला बच्चा ससुराल में ही होता है. अत: डिलीवरी भी यहीं होगी. आप बिलकुल निश्ंिचत रहिएगा क्योंकि मैं भी तो कामना की मम्मी हूं.’

पत्र पढ़ कर कामना के न आने का दुख तो मैं भूल ही गई और खुशी से भावना को जोर से आवाज दी. खबर सुन कर वह भी नाच उठी. घर में कितनी ही देर तक हर्षोल्लास का वातावरण बना रहा. कामना के पापा जहां पोस्टेड थे वहां से घर वह छुट््टियों में ही आते थे. इस बार हमसब एकसाथ गए रस्म अदा करने. बेटी को देख कर उतनी ही खुशी हुई जितनी अपने हाथों से लगाए वृक्ष को फूलतेफलते देख कर होती है.

रस्म अदा करने के बाद कामना मेरा हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मां, चलो, तुम्हें कुछ दिखाते हैं.’’

एक कमरे के पास आ कर वह रुक गई और बोली, ‘‘देखो मां, यह बच्चे की नर्सरी है.’’ अंदर जा कर मैं चकित रह गई. दीवार पर हलके रंग का प्लास्टिक पेंट, फूलपत्तियां बनी हुईं, छोटेछोटे बच्चे ऐंजेल बने हुए थे. एक तरफ ‘क्रिब’ में बिछी हुई गुलाबी प्रिंटेड और गुलाबी उढ़ाने की चादर भी. दूसरे कोने में तरहतरह के खिलौने, नर्सरी राइम्स की किताबें करीने से सजी हुईं.

‘‘मां, तुम मेरी वह छोटी कुरसीमेज भेज देना जिस पर मैं बचपन में पढ़ती थी.’’

मैं ने प्यार से उस के गाल पर हलकी सी चपत लगाई, ‘‘हां, मैं जाते ही शिबू से तुम्हारी मेजकुरसी पहुंचवा दूंगी.’’

कहना नहीं होगा, शिबू ही उस की देखभाल करता था जब मैं कालिज पढ़ाने चली जाती थी. घर पहुंचते ही कामना का कमरा खोला, दीवार पर उस के बचपन की कितनी ही तसवीरें लगी हुई थीं. एक कोने में उस की छोटी कुरसीमेज, मेज पर उस का एक छोटा सा बाक्स भी रखा हुआ था. बाक्स नीचे रखा और कुरसीमेज पेंट करा के उसे कामना की ससुराल पहुंचाने की बात मैं ने शिबू को बताई.

वह दिन भी आया कि कामना अपने छोटे से बेटे को साथ लिए आई. साथ में उस का पति अनुराग भी था. मैं तो कब से तीनों की राह देखती दरवाजे पर खड़ी थी. आगे बढ़ कर मैं ने बच्चे को गोद में ले लिया और चूम लिया.

‘‘मां, तुम मुझे प्यार करना भूल गईं.’’

‘‘अब तुम बड़ी जो हो गई हो,’’ मैं ने हंस कर कहा.

हंसीखुशी के बीच महीना कैसे बीत गया, पता ही न चला. कामना अकसर बच्चे को अपने कमरे में ले जाती, खिलाती, सुलाती.

कल ही उस की ट्रेन थी. मैं बरामदे की आरामकुरसी पर लेटी ही थी कि कामना आ पहुंची.

‘‘मां, बहुत थक गई हो न. लाओ न पैर दबा दूं थोड़ा,’’ और हाथ में ली हुई फाइल उस ने पास की कुरसी पर रख दी, पर मैं ने अपने पैर समेट लिए थे.

‘‘अरे, मैं तो ऐसे ही लेट गई थी’’ तभी बेटे के रोने की आवाज सुन कर वह चल दी. उत्सुकतावश मैं ने फाइल उठा ली. देखने में पुरानी किंतु नए रंगीन ग्लेज  पेपर, रिबन से बंधी हुई. मैं सीधे बैठ गई. अंदर लिखाई जानीपहचानी सी लग रही थी. फाइल में कितनी ही कटिंग थीं, समाचारपत्रों की, कालिज की पत्रिकाओं की. मेरी लिखी हुई टिप्पणियां भी थीं.

हां, वह पहली कटिंग भी थी जब कामना 8वीं में पढ़ती थी. मुझे याद आ गया, कामना 100 मीटर की रेस में भाग लेने वाली थी, कितनी ही बार वह खेलों में भाग ले कर पुरस्कार भी पा चुकी थी. पर उस दिन उस के पैर में भयानक दर्द था. कुछ मलहम मला, सिंकाई की, दवाई खिलाई, पैर में कस कर पट््टी बांध दी, पर उस के पैर के ‘क्रैंप’ न गए. उधर उस की जिद थी कि वह रेस में भाग जरूर लेगी. मुझे भी अपने कालिज पहुंचना जरूरी था. मैं ने शिबू द्वारा थर्मस में गरम दूध में कौफी डाल कर और एक नोट लिख कर भेजा, ‘बेटी कामना, रेस में हार कर दुखी मत होना. जीवन में ऐसी बहुत सी रेस आएंगी और तुम जरूर ही जीतोगी. तुम मेरी रानी बेटी हो न, हारने पर मन छोटा मत करना.’

मैं जब कालिज का काम खत्म कर कामना के स्कूल के सालाना स्पोर्ट्स देखने पहुंची तो कामना अपनी कक्षा की लड़कियों के साथ पिरामिड बनाने में लगी थी. सब से ऊपर वही थी. तालियों से मैदान गूंज उठा.

मुझे सुकून हुआ कि मेरी बेटी हार कर भी निराश नहीं थी. खेल खत्म होने पर जब वह मेरे पास आई तो उस की आंसू भरी आंखों को मैं ने चूम लिया था, इस की कटिंग भी थी.

ऐसी ही कितनी कटिंग काट कर उस ने संजो कर करीने से लगाई थीं. अकसर हम दोनों ही व्यस्त हो जाते थे, दूर हो जाते. मैं कभी परीक्षा लेने दूसरे शहर चली जाती तो मेरी अनुपस्थिति में उसे ही घर सुचारु रूप से चलाना है, मैं उसे लिख कर भेजती. लौट कर देखती कि वह थोड़े ही दिनों में और भी बड़ी हो गई है. किसी को मेरी याद तक न आती थी. कामना, जो घर में थी उन्हें संभालने के लिए.

मैं तल्लीन हो कर पेज पलटने में लगी थी तभी कामना आ पहुंची. एक शरारत भरी हंसी उस के अधरों पर फैल गई, ‘‘मां, अपनी फाइल ले जाऊं मैं,’’ मैं ने उठ कर कामना को सीने से लगा लिया. कौन कहता है कि बेटियां अपने उस घर के लिए बटोरती ही रहती हैं? सच तो यह है कि ये बेटियां ही तो मांबाप की सिखाई हुई अच्छीअच्छी बातों की विरासत से अपने उस दूसरे घर को भी प्रकाशमान करती हैं. मेरी इस बेटी ने इस विरासत को अपना कर मेरा सिर कितना ऊंचा कर दिया था. Hindi Family Story

Hindi Kahani: और हीरो मर गया – कहानी स्ट्रगल के साथी की

Hindi Kahani: जुनून इतना पुरजोर था कि उसे मुंबई खींच कर ले गया, पर यह तो उसे मुंबई पहुंच कर ही पता चला कि हर दिन मुंबई पहुंचने वाले लोगों में फिल्मी हीरोहीरोइन बनने की ख्वाहिश रखने वाले लड़केलड़कियों की भी बड़ी भारी तादाद होती है.

रोजरोज मुंबई आने वाले ये लोग फिल्म स्टार बनने की ख्वाहिश रखने वाले स्ट्रगलरों की भीड़ में इजाफा करते जाते हैं. विनय भी इस भीड़ का हिस्सा बन गया. इसी भीड़ की धक्कामुक्की और रेलमपेल ने एक दिन उसे एक फिल्म ऐक्टिंग इंस्टीट्यूट के दरवाजे पर पहुंचा दिया.

विनय ने घर से लाए अपने रुपएपैसों की गिनती की, फिर उस ने एक ऐक्टिंग इंस्टीट्यूट के एक साल के कोर्स में दाखिला ले लिया. वहां विनय की मुलाकात उदय नाम के एक लड़के से हुई. लंबाचौड़ा उदय बहुत हैंडसम था, पर महीनेभर में विनय अपनी ऐक्टिंग के दम पर सब के आकर्षण का केंद्र बन गया. विनय और उदय की दोस्ती धीरेधीरे इतनी गहरी हो गई कि वे रूम पार्टनर बन कर साथसाथ रहने लगे.

कोर्स पूरा हो जाने के बाद आत्मविश्वास से भरे इन दोनों नौजवानों की मेहनत रंग लाई. दोनों को ही 1-1 फिल्म मिल गई. मगर विनय की फिल्म 2 रील की शूटिंग के बाद ही अटक गई. उसे 2 और फिल्मों का भी औफर मिला, मगर वे दोनों फिल्में भी किसी न किसी वजह से बीच में ही दम तोड़ गईं. उधर, उदय की फिल्म न केवल पूरी हुई, साथ ही सुपरहिट भी हुई.

उदय की धूम मच गई. नतीजतन, उस के सामने बड़ेबड़े बजट की फिल्मों के प्रस्ताव वालों की कतार लगी थी, तो विनय स्ट्रगल करने वाले कलाकारों की कतार में धक्के खातेखाते पीछे होता जा रहा था.

उदय एक बड़े फिल्मकार द्वारा गिफ्ट किए गए शानदार फ्लैट में शिफ्ट हो गया. विनय अपने रूम में अकेला रह गया, तो उस ने अपना नया रूम पार्टनर बना लिया.

विनय को हार तो स्वीकार थी, मगर घुटने टेकना स्वीकार नहीं था. नाकामी का अंधेरा जितना ज्यादा गहराता जाता, उतना ही कामयाबी के उजालोें के लिए उस की जद्दोजेहद और मजबूती से बढ़ती जाती. हिम्मत की इसी चट्टान से उस के दिल का दर्द कविता और कहानी बन कर फूटने लगा.

मशहूर टैलीविजन की हस्ती और सीरियल बनाने वाली प्रीता नूरी की नजर विनय के लेखन पर पड़ी, तो उन्होंने उसे सीरियल लिखने वाले लेखकों की अपनी टीम में शामिल कर लिया.

प्रीता नूरी के लेखकों की टीम में लेखन करने के अलावा विनय एक फिल्म पत्रिका में पार्टटाइम न्यूज रिपोर्टर भी हो गया था. इस तरह उसे इतनी आमदनी होने लगी थी कि वह फिल्मी दुनिया में अपने बूते अपनी जद्दोजेहद जारी रख सकता था.

एक दिन एक पत्रिका में विनय ने पढ़ा, ‘फिल्म स्टार उदय अब सुपरस्टार के पायदान के नजदीक.’

विनय को खुशी हुई. इस बात का संतोष हुआ कि कम से कम उस के साथी कलाकार को तो कामयाबी मिली.

एक दूसरी फिल्म पत्रिका ने लिखा, ‘उदय एक दिन फिल्मी दुनिया का ध्रुव तारा साबित होगा,’ तीसरी पत्रिका ने लिखा, ‘सुपरस्टार उदय :

द हैंडसम हीरो: आंखें रोमांटिक और मुसकराहट जानलेवा.’

विनय जिस फिल्म पत्रिका में न्यूज रिपोर्टर था, उस के संपादक को जब पता चला कि फिल्म स्टार उदय कभी विनय का रूम पार्टनर रहा है, तो वह विनय के पीछे ही पड़ गया कि वह उदय का कोई धांसू इंटरव्यू तैयार करे. साथ ही, पत्रिका को चाहिए थे फिल्म स्टार उदय के रोमांस के किस्से. स्टार बनने से पहले और बाद के इश्क की रंगरंगीली दास्तान.

विनय उदय से मिलने शूटिंग पर गया, तो उदय ने बिजी कह कर मिलने में आनाकानी की.

कई बार तो विनय को लगा कि उदय उसे देख कर भी अनदेखा कर आगे बढ़ जाता है.

यह देख विनय हैरान था. क्या उदय वाकई इतना बिजी है कि उस के पास स्ट्रगल के दिनों के अपने दोस्त से बात करने की फुरसत भी नहीं थी? वह क्या इतना बड़ा स्टार बन गया है कि मुझ जैसे मामूली आदमी से मिलने में उसे अपनी तौहीन महसूस होती है? पर वह तो पत्रकार की हैसियत से मिलना चाहता है. तो क्या अब उदय इतना बड़ा हो गया है कि उसे मीडिया की दरकार भी नहीं रही?

विनय ने दूसरे दिन फिर से उदय से मिलने की कोशिश की, पर वह नाकाम रहा. तीसरे दिन फिर कोशिश की, फिर नाकाम रहा. आखिर एक दिन उस ने उदय के घर पर फोन किया, तो पीए ने जवाब दिया, ‘साहब के पास अभी बिलकुल भी टाइम नहीं है.’

उधर दूसरी ओर फिल्म पत्रिकाओं में उदय के चटपटे इंटरव्यू छप रहे थे.

विनय ने सिर थाम लिया. उस का संपादक उस के बारे में क्या सोच रहा होगा. दूसरी पत्रिकाओं में चटपटी खबर को पढ़ कर विनय ने उदय के पीए को मन ही मन कोसा, ‘देखो तो इसे… बोलता है कि साहब के पास अभी टाइम नहीं है. अच्छा, तो साहब के पास आजकल रोमांस के लिए टाइम है, दोस्तों से मिलने के लिए नहीं है’, विनय ने अपनेआप को भी कोसा, ‘तेरी तो किस्मत ही खराब है. फिल्मों में ऐक्टिंग करना तो दूर रहा, फिल्म पत्रकारिता भी तेरे बस की नहीं. छोड़ दे यह फिल्मी दुनिया…’

‘नहीं छोड़ूंगा,’ विनय के भीतर से आवाज आती रही और वह अपनी जिद पर डटा रहा कि वह फिल्मी दुनिया नहीं छोड़ेगा. वह इसी फिल्मी दुनिया में कामयाबी की अपनी एक अलग राह खोज कर रहेगा.

उधर, प्रीता नूरी विनय की काबिलीयत से काफी प्रभावित हो चुकी थीं. उन्होंने विनय को एक फिल्म की कहानी और पटकथा पर आयोजित एक मीटिंग में बतौर सलाहकार अपने साथ बिठाया. फिल्म इंडस्ट्री के मशहूर लेखक प्रवीण तन्मय कहानी और पटकथा पेश कर रहे थे. उस मीटिंग में फिल्म के हीरो और हीरोइन भी शामिल थे.

वहां विनय ने महसूस किया कि फिल्म इंडस्ट्री में पहले की तुलना में लेखकों की इज्जत काफी बढ़ चुकी है. उस ने देखा कि केवल डायरैक्टर और फिल्मकार ही नहीं, बल्कि फिल्म के हीरोहीरोइन भी लेखक प्रवीण तन्मय को काफी इज्जत दे रहे थे.

विनय को लगा कि वह भी एक कामयाब फिल्म लेखक बन सकता है.

इधर लेखक प्रवीण तन्मय की कहानी से प्रीता नूरी इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने उस का डायरैक्शन भी उन्हें ही सौंप दिया. प्रवीण तन्मय ने जब इस फिल्म के डायरैक्शन की बागडोर संभाली, तो विनय को अपना चीफ असिस्टैंट बनाया. कामयाबी के पायदान की तरफ विनय का यह पहला ठोस कदम था. उस का खोया हुआ आत्मविश्वास फिर से लौट आया था. भीतर के उजाले से उस की बाहर की दुनिया भी बदलनी शुरू हो गई थी.

एक दिन अचानक विनय के भीतर एक कहानी का आइडिया कौंध गया और कुछ समय चुरा कर उस ने कहानी पूरी कर ली, जिस का नाम था ‘और हीरो मर गया’.

इस कहानी ने खुद विनय को इतना रोमांचित कर दिया कि आननफानन उस ने उसे पटकथा और संवादों में भी ढाल दिया. फिल्म राइटर्स एसोसिएशन में रजिस्ट्रेशन कराने के बाद उस ने अपनी यह कहानी प्रवीण तन्मय को दिखाई. प्रवीण तन्मय खुशी से उछल पड़े. कहानी प्रीता नूरी को भी सुनाई गई, तो वे भी मुग्ध हो गईं.

इसी बीच लेखक प्रवीण तन्मय के डायरैक्शन में बनी फिल्म ‘युद्ध जारी है’ हिट हो चुकी थी. प्रवीण तन्मय को कुछ दूसरे प्रोड्यूसरों से भी लेखन और डायरैक्शन के प्रस्ताव मिल रहे थे, लिहाजा, वे काफी बिजी हो गए थे. इधर प्रीता नूरी ने विनय की कहानी ‘और हीरो मर गया’ के डायरैक्शन का भार विनय को ही सौंप दिया. कामयाबी के पायदान पर विनय का यह दूसरा ठोस कदम था.

फिल्म कम समय और कम लागत में बन कर तैयार हो गई. फिल्म में कोई बड़ा स्टार नहीं था. कहानी के मुताबिक, नए और छोटे कलाकारों को फिल्म में लिया गया था और तकरीबन सभी कलाकारों ने गजब की ऐक्टिंग की थी.

फिल्म ने लागत से कई गुना ज्यादा आमदनी की और इस तरह विनय का नाम हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में एक जानामाना नाम बन गया. कामयाबी के पायदान पर विनय का यह तीसरा ठोस कदम था.

विनय की तीसरी फिल्म ने तो इतनी कमाई कर डाली कि खुश हो कर फिल्मकार ने विनय को एक शानदार फ्लैट गिफ्ट कर दिया. अब विनय से कहानी लिखवाने व डायरैक्शन के लिए फिल्मकारों की लंबी कतार लग गई. उधर, उदय की 5 फिल्में लगातार पिट गई थीं. उस की फिल्मों के शूटिंग शैड्यूल ही कैंसिल हो गए.

एक दिन विनय तब सुखद आश्चर्य से भर गया, जब उदय को अपने सामने खड़ा पाया. यह वही सुपरस्टार उदय था, जिस के पास स्ट्रगल के दिनों के अपने साथी को पहचानने और बात करने का समय नहीं था.

विनय ने हैरानी से उदय से पूछा, ‘‘सुपरस्टारजी, आप तो धांसू डायलौग डिलीवरी के लिए मशहूर हैं और मेरी कहानियों के डायलौग बहुत साधारण होते हैं. कहानी भी सीधेसादे पात्रों को ले कर होती है.

‘‘हर फिल्म में आप की ड्रैसें महंगे फैशन डिजाइनरों द्वारा तैयार की जाती हैं और मेरी कहानी के पात्र तो आम होते हैं, इसलिए उन्हें साधारण पोशाक ही सूट करती हैं.

‘‘आप तो जोखिम भरे स्टंट करने के लिए मशहूर हैं. फिल्म में एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग पर छलांग लगाते हुए आप को देख कर दर्शक रोमांचित हो जाते हैं, जबकि मेरी कहानियों के पात्र हवा में नहीं उड़ते, जमीन पर चलते हैं.

‘‘आप की अभी तक की रिकौर्डतोड़ फिल्मों की कामयाबी का क्रेडिट परदे पर आप के द्वारा गाए गए सुपरहिट गीतों को दिया जाता है, डांस को दिया जाता है, जबकि मेरी कहानी के किरदार तो जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराते हैं. भला आप ऐसे साधारण किरदारों को परदे पर करना क्यों पसंद करोगे?’’

सवाल का खुद जवाब न देते हुए उदय ने विनय से ही पूछ लिया, ‘‘हां, मैं जानता हूं कि आप की कहानियों के पात्र आम आदमी होते हैं, साधारण होते हैं. तो आप ही बताइए कि फिर दर्शक उन्हें पसंद क्यों कर रहे हैं?’’

उदय की बात सुन कर विनय बोला, ‘‘क्योंकि मेरी कहानियां मौलिक और असली होती हैं.’’

उदय ने विनय का हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘मैं उन उंगलियों को चूमना चाहता हूं, जो ऐसी कहानियों को लिख रही हैं. कामयाबी के घमंड ने मुझे अंधा बना दिया था, पर स्ट्रगल से मिली आप की कामयाबी के उजालों ने मेरी आंखें खोल दी हैं. मेरी पतंग तो हवा में उड़ रही थी. कामयाबी तो यह है, जो आप ने अपने खूनपसीने से हासिल की है. फिल्म इंडस्ट्री में आप ने अपना पैर अंगद के पैर की तरफ जमा दिया है. मैं आप को बधाई देता हूं. हो सके, तो मुझे माफ कर दो.’’

विनय ने उदय को अपनी छाती से लगा लिया. उदय बोला, ‘‘भाग्य के भरोसे पर टिकी बेतुकी फिल्मों की अपनी कामयाबी से मेरा मन ऊब गया है. मैं जमीन पर पैर रख कर अपनी मेहनत से अपने हुनर को तौलना चाहता हूं.

‘‘दोस्त, तुम तो स्ट्रगल के दिनों के मेरे साथी हो. मेरे लिए कोई ऐसी ही कहानी लिखो न, जिस का किरदार विलक्षण हो, पर धरती के आम इनसान की तरह हो.’’

विनय ने उदय के सादगी से दमकते चेहरे की ओर देखा तो देखता ही रह गया. अब वह फिर वही पहले जैसा कलाकार उदय हो गया था. उस के भीतर का हीरो मर चुका था. Hindi Kahani

Hindi Family Story: तितली – मांबाप के झगड़े में पिसती सियाली

Hindi Family Story: रविवार के दिन की शुरुआत भी मम्मीपापा के  झगड़े की कड़वी आवाजों से हुई. सियाली अभी अपने कमरे में सो ही रही थी कि चिकचिक सुन कर उस ने चादर सिर तक ओढ़ ली, इस से आवाज पहले से कम तो हुई, पर अब भी उस के कानों से टकरा रही थी.

सियाली मन ही मन कुढ़ कर रह गई. पास पड़े मोबाइल को टटोल कर उस में ईयरफोन लगा कर उन्हें कानों में कस कर ठूंस लिया और आवाज को बहुत तेज कर दिया.

18 साल की सियाली के लिए यह कोई नई बात नहीं थी. उस के मांबाप आएदिन ही झगड़ते रहते थे, जिस की सीधी वजह थी उन दोनों के संबंधों में खटास का होना… ऐसी खटास, जो एक बार जिंदगी में आ जाए, तो आपसी रिश्तों का खात्मा ही कर देती है.

सियाली के मांबाप प्रकाश और निहारिका के संबंधों में यह खटास कोई एक दिन में नहीं आई, बल्कि यह तो  एक मिडिल क्लास परिवार के कामकाजी जोड़े के आपसी तालमेल बिगड़ने के चलते धीरेधीरे आई एक आम समस्या थी.

सियाली के पिता प्रकाश अपनी पत्नी निहारिका पर शक करते थे. उन का शक करना भी एकदम जायज था, क्योंकि निहारिका का अपने औफिस के एक साथी के साथ संबंध चल रहा था. जितना शक गहरा हुआ, उतना ही प्रकाश की नाराजगी बढ़ती गई और निहारिका का नाजायज रिश्ता भी उसी हिसाब से  बढ़ता गया.

‘‘जब दोनों साथ नहीं रह सकते, तो तलाक क्यों नहीं दे देते… एकदूसरे को,’’ सियाली बिस्तर से उठते हुए  झुं झलाते  हुए बोली.

सियाली जब तक अपने कमरे से बाहर आई, तब तक वे दोनों काफी हद तक शांत हो चुके थे. शायद वे किसी फैसले तक पहुंच गए थे.

‘‘तो ठीक है, मैं कल ही वकील से बात कर लेता हूं, पर सियाली को अपने साथ कौन रखेगा?’’ प्रकाश ने निहारिका की ओर घूरते हुए पूछा.

‘‘मैं समझती हूं… सियाली को तुम मुझ से बेहतर संभाल सकते हो,’’ निहारिका ने कहा, तो उस की इस बात पर प्रकाश भड़क सा गया, ‘‘हां, तुम तो सियाली को मेरे पल्ले बांधना ही चाहती हो, ताकि तुम अपने उस औफिस वाले के साथ गुलछर्रे उड़ा सको और मैं एक जवान लड़की के चारों तरफ एक गार्ड बन कर घूमता रहूं.’’

प्रकाश की इस बात पर निहारिका ने भी तेवर दिखाते हुए कहा, ‘‘मर्दों के समाज में क्या सारी जिम्मेदारी एक मां की ही होती है?’’

निहारिका ने गहरी सांस ली और कुछ देर रुक कर बोली, ‘‘हां, वैसे सियाली कभीकभी मेरे पास भी आ सकती है…  1-2 दिन मेरे साथ रहेगी तो मु झे भी एतराज नहीं होगा,’’ निहारिका ने मानो फैसला सुना दिया था.

सियाली कभी मां की तरफ देख रही थी, तो कभी पिता की तरफ, उस से कुछ कहते न बना, पर वह इतना सम झ गई थी कि मांबाप ने अपनाअपना रास्ता अलग कर लिया है और उस का वजूद एक पैंडुलम से ज्यादा नहीं है जो उन दोनों के बीच एक सिरे से दूसरे सिरे तक डोल रही है.

शाम को जब सियाली कालेज से लौटी, तो घर में एक अलग सी शांति थी. पापा सोफे में धंसे हुए चाय पी रहे थे, जो उन्होंने खुद ही बनाई थी. उन के चेहरे पर कई महीनों से बनी रहने वाली तनाव की शिकन गायब थी.

सियाली को देख कर उन्होंने मुसकराने की कोशिश की और बोले, ‘‘देख ले… तेरे लिए चाय बची होगी… लेले और मेरे पास बैठ कर पी.’’

सियाली पापा के पास आ कर बैठी, तो पापा ने अपनी सफाई में काफीकुछ कहना शुरू किया, ‘‘मैं बुरा आदमी नहीं हूं, पर तेरी मम्मी ने भी तो गलत किया था. उस के काम ही ऐसे थे कि मु झे उसे देख कर गुस्सा आ ही जाता था और फिर तेरी मां ने भी तो रिश्तों को बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.’’

पापा की बातें सुन कर सियाली से भी नहीं रहा गया और वह बोली, ‘‘मैं नहीं जानती कि आप दोनों में से कौन सही है और कौन गलत है, पर इतना जरूर जानती हूं कि शरीर में अगर नासूर हो जाए, तो आपरेशन ही सही रास्ता और ठीक इलाज होता है.’’

बापबेटी ने कई दिनों के बाद आज खुल कर बात की थी. पापा की बातों में मां के प्रति नफरत और गुस्सा ही छलक रहा था, जिसे सियाली चुपचाप सुनती रही थी.

अगले दिन ही सियाली के मोबाइल पर मां का फोन आया और उन्होंने सियाली को अपना पता देते हुए शाम को उसे अपने फ्लैट पर आने को कहा, जिसे सियाली ने खुशीखुशी मान भी लिया था और शाम को मां के पास जाने की सूचना भी उस ने अपने पापा को दे दी, जिस पर पापा को भी कोई एतराज नहीं हुआ.

शाम को सियाली मां के दिए पते पर पहुंच गई. पता नहीं क्या सोच कर उस ने लाल गुलाब का एक बुके खरीद लिया था और वह फ्लैट नंबर 111 में पहुंच गई.

सियाली ने डोरबैल बजाई. दरवाजा मां ने ही खोला था. अब चौंकने की बारी सियाली की थी. मां गहरे लाल रंग की साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थीं. उन की मांग में भरा हुआ सिंदूर और माथे पर बिंदी… सियाली को याद नहीं कि उस ने मां को कब इतनी अच्छी तरह से सिंगार किए हुए देखा था. हमेशा सादा वेश में ही रहती थीं मां और टोकने पर दलील देती थीं, ‘अरे, हम कोई ब्राह्मणठाकुर तो हैं नहीं, जो हमेशा सिंगार ओढ़े रहें… हम पिछड़ी जाति वालों के लिए साधारण रहना ही अच्छा है.’

तो फिर आज मां को ये क्या हो गया? बहरहाल, सियाली ने मां को बुके दे दिया. मां ने बड़े प्यार से कोने में रखी एक मेज पर उसे सजा दिया.

‘‘अरे, अंदर आने को नहीं कहोगी सियाली से,’’ मां के पीछे से आवाज आई.

सियाली ने आवाज की दिशा में नजर उठाई, तो देखा कि सफेद कुरतापाजामा पहने हुए एक आदमी खड़ा हुआ मुसकरा रहा था.

सियाली उसे पहचान गई. वह मां का औफिस का साथी देशवीर था. मां उसे पहले भी घर ला चुकी थीं.

मां ने बहुत खुशीखुशी देशवीर से सियाली का परिचय कराया, जिस  पर सियाली ने कहा, ‘‘जानती हूं मां… पहले भी आप इन से मुझ को मिलवा चुकी हो.’’

‘‘पर, पहले जब मिलवाया था तब ये सिर्फ मेरे अच्छे दोस्त थे, लेकिन आज मेरे सबकुछ हैं. हम लोग फिलहाल तो लिवइन में रह रहे हैं और तलाक का फैसला होते ही शादी भी कर लेंगे.’’

सियाली मुसकरा कर रह गई थी. सब ने एकसाथ खाना खाया. डाइनिंग टेबल पर भी माहौल सुखद ही था. मां के चेहरे की चमक देखते ही बनती थी.

सियाली रात को मां के साथ ही सो गई और सुबह वहीं से कालेज के लिए निकल गई. चलते समय मां ने उसे 2,000 रुपए देते हुए कहा, ‘‘रख ले, घर जा कर पिज्जा और्डर कर देना.’’

कल से ले कर आज तक मां ने सियाली के सामने एक आदर्श मां होने के कई उदाहरण पेश किए थे, पर सियाली को यह सब नहीं भा रहा था. फिलहाल तो वह अपनी जिंदगी खुल कर जीना चाहती थी, इसलिए मां के दिए गए पैसों से वह उसी दिन अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने चली गई.

‘‘सियाली, आज तू यह किस खुशी में पार्टी दे रही है?’’ महक ने पूछा.

‘‘बस यों समझो कि आजादी की पार्टी है,’’ कह कर सियाली मुसकरा दी थी.

सच तो यह था कि मांबाप के अलगाव के बाद सियाली भी बहुत रिलैक्स महसूस कर रही थी. रोजरोज की टोकाटाकी से अब उसे छुटकारा मिल चुका था और वह अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना चाहती थी, इसीलिए उस ने अपने दोस्तों से अपनी एक इच्छा बताई, ‘‘यार, मैं एक डांस ग्रुप जौइन करना चाहती हूं, ताकि मैं अपने

जज्बातों को डांस द्वारा दुनिया के सामने पेश कर सकूं.’’

इस पर उस के दोस्तों ने उसे और भी कई रास्ते बताए, जिन से वह अपनेआप को दुनिया के सामने पेश कर सकती थी, जैसे ड्राइंग, सिंगिंग, मिट्टी के बरतन बनाना, पर सियाली तो मौजमस्ती के लिए डांस ग्रुप जौइन करना चाहती थी, इसलिए उसे बाकी के औप्शन अच्छे  नहीं लगे.

सियाली ने अपने शहर के डांस ग्रुप इंटरनैट पर खंगाले, तो ‘डिवाइन डांसर’ नामक एक डांस ग्रुप ठीक लगा, जिस में 4 मैंबर लड़के थे और एक लड़की थी.

सियाली ने तुरंत ही वह ग्रुप जौइन कर लिया और अगले दिन से ही डांस प्रैक्टिस के लिए जाने लगी और इस नई चीज का मजा भी लेने लगी.

इस समय सियाली से ज्यादा खुश कोई नहीं था. वह तानाशाह हो चुकी थी. न मांबाप का डर और न ही कोई टोकने वाला. वह जब चाहती घर जाती और अगर नहीं भी जाती तो भी कोई पूछने वाला नहीं था. उस के मांबाप का तलाक क्या हुआ, सियाली तो एक ऐसी चिडि़या हो गई, जो कहीं भी उड़ान भरने के लिए आजाद थी.

एक दिन सियाली का फोन बज उठा. यह पापा का फोन था, ‘सियाली, तुम कई दिन से घर नहीं आई, क्या बात है? कहां हो तुम?’

‘‘पापा, मैं ठीक हूं और डांस सीख रही हूं.’’

‘पर तुम ने बताया नहीं कि तुम डांस सीख रही हो…’

‘‘जरूरी नहीं कि मैं आप लोगों को सब बातें बताऊं… आप लोग अपनी जिंदगी अपने ढंग से जी रहे हैं, इसलिए मैं भी अब अपने हिसाब से ही  जिऊंगी,’’ इतना कह कर सियाली ने फोन काट दिया था, पर उस का मन एक अजीब सी खटास से भर गया था.

डांस ग्रुप के सभी सदस्यों से सियाली की अच्छी दोस्ती हो गई थी, पर पराग नाम के लड़के से उस की कुछ ज्यादा ही पटने लगी थी.

पराग स्मार्ट था और पैसे वाला भी. वह सियाली को गाड़ी में घुमाता और खिलातापिलाता. उस की संगत में सियाली को भी सिक्योरिटी का अहसास होता था.

एक दिन पराग और सियाली एक रैस्टोरैंट में गए. पराग ने अपने लिए एक बीयर मंगवाई और सियाली से पूछा, ‘‘तुम तो कोल्ड ड्रिंक लोगी न सियाली?’’

‘‘खुद तो बीयर पीओगे और मु झे बच्चों वाली ड्रिंक… मैं भी बीयर पीऊंगी,’’ कहते हुए सियाली के चेहरे पर  एक अजीब सी शोखी उतर आई थी.

सियाली की इस अदा पर पराग भी मुसकराए बिना न रह सका और उस ने एक और बीयर और्डर कर दी.

सियाली ने बीयर से शुरुआत जरूर की थी, पर उस का यह शौक धीरेधीरे ह्विस्की तक पहुंच गया था.

अगले दिन डांस क्लास में जब वे दोनों मिले, तो पराग ने एक सुर्ख गुलाब सियाली की ओर बढ़ा दिया और बोला, ‘‘सियाली, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

यह सुन कर ग्रुप के सभी लड़केलड़कियां तालियां बजाने लगे.

सियाली ने भी मुसकरा कर पराग के हाथ से गुलाब ले लिया और कुछ सोचने के बाद बोली, ‘‘लेकिन, मैं शादी जैसी किसी बेहूदा चीज के बंधन में नहीं बंधना चाहती. शादी एक सामाजिक तरीका है 2 लोगों को एकदूसरे के प्रति ईमानदारी दिखाते हुए जिंदगी बिताने का, पर क्या हम ईमानदार रह पाते हैं?’’ सियाली के मुंह से ऐसी बड़ीबड़ी बातें सुन कर डांस ग्रुप के लड़केलड़कियां शांत से हो गए थे.

सियाली ने थोड़ा रुक कर कहना शुरू किया, ‘‘मैं ने अपने मांबाप को उन की शादीशुदा जिंदगी में हमेशा लड़ते ही देखा है, जिस का खात्मा तलाक के रूप में हुआ और अब मेरी मां अपने प्रेमी के साथ लिवइन में रह रही हैं और पहले से कहीं ज्यादा खुश हैं.’’

पराग यह बात सुन कर तपाक से बोला, ‘‘मैं भी तुम्हारे साथ लिवइन में रहने को तैयार हूं,’’ तो सियाली ने इसे झट से स्वीकार कर लिया.

कुछ दिन बाद ही पराग और सियाली लिवइन में रहने लगे, जहां वे जी भर कर जिंदगी का मजा ले रहे थे. पराग के पास पैसे की कोई कमी नहीं थी.

कुछ दिनों के बाद उन के डांस ग्रुप की गायत्री नाम की एक लड़की ने सियाली से एक दिन पूछ ही लिया, ‘‘सियाली, तुम्हारी तो अभी उम्र बहुत कम है… और इतनी जल्दी किसी के साथ लिवइन में रहना… कुछ अजीब सा नहीं लगता तुम्हें…’’

सियाली के चेहरे पर एक मीठी सी मुसकराहट आई और चेहरे पर कई रंग आतेजाते गए, फिर उस ने अपनेआप को संभालते हुए कहा, ‘‘जब मेरे मांबाप ने सिर्फ अपनी जिंदगी के बारे में सोचा और मेरी परवाह नहीं की, तो मैं अपने बारे में क्यों न सोचूं… और गायत्री, जिंदगी मस्ती करने के लिए बनी है, इसे न किसी रिश्ते में बांधने की जरूरत है और न ही रोरो कर गुजारने की…

‘‘मैं आज पराग के साथ लिवइन में हूं, और कल मन भरने के बाद किसी और के साथ रहूंगी और परसों किसी और के साथ, उम्र का तो सोचो ही मत… बस मस्ती करो.’’

सियाली यह कहते हुए वहां से चली गई, जबकि गायत्री अवाक सी खड़ी रह गई.

तितली कभी किसी एक फूल पर नहीं बैठती… वह कभी एक फूल पर, तो कभी दूसरे फूल पर, और तभी तो  इतनी चंचल होती है और इतनी खुश रहती है… रंगबिरंगी तितली, जिंदगी से भरपूर तितली. Hindi Family Story

Family Story In Hindi: फर्क – इरा की कामयाबी या किसी का एहसान

Family Story In Hindi: इरा की स्कूल में नियुक्ति इसी शर्त पर हुई थी कि वह बच्चों को नाटक की तैयारी करवाएगी क्योंकि उसे नाटकों में काम करने का अनुभव था. इसीलिए अकसर उसे स्कूल में 2 घंटे रुकना पड़ता था.

इरा के पति पवन को कामकाजी पत्नी चाहिए थी जो उन की जिम्मेदारियां बांट सके. इरा शादी के बाद नौकरी कर अपना हर दायित्व निभाने लगी.

वह स्कूल में हरिशंकर परसाई की एक व्यंग्य रचना ‘मातादीन इंस्पेक्टर चांद पर’ का नाट्य रूपांतर कर बच्चों को उस की रिहर्सल करा रही थी. प्रधानाचार्य ने मुख्य पात्र के लिए 10वीं कक्षा के एक विद्यार्थी मुकुल का नाम सुझाया क्योंकि वह शहर के बड़े उद्योगपति का बेटा था और उस के सहारे पिता को खुश कर स्कूल अनुदान में खासी रकम पा सकता था.

मुकुल में प्रतिभा भी थी. इंस्पेक्टर मातादीन का अभिनय वह कुशलता से करने लगा था. उसी नाटक के पूर्वाभ्यास में इरा को घर जाने में देर हो जाती है. वह घर जाने के लिए स्टाप पर खड़ी थी कि तभी एक कार रुकती है. उस में मुकुल अपने पिता के साथ था. उस के पिता शरदजी को देख इरा चहक उठती है. शरदजी बताते हैं कि जब मुकुल ने नाटक के बारे में बताया तो मैं समझ गया था कि ‘इरा मैम’ तुम ही होंगी.

इरा उन के साथ गाड़ी में बैठ जाती है. तभी उसे याद आता है कि आज उस के बेटे का जन्मदिन है और उस के लिए तोहफा लेना है. शरदजी को पता चलता है तो वह आलीशान शापिंग कांप्लेक्स की तरफ गाड़ी घुमा देते हैं. वह इरा को कंप्यूटर गेम दिलवाने पर उतारू हो जाते हैं. इरा बेचैन थी क्योंकि पर्स में इतने रुपए नहीं थे. अब आगे…

एक महंगा केक और फूलों का बुके आदि तमाम चीजें शरदजी गाड़ी में रखवाते चले गए. वह अवाक और मौन रह गई.

शरदजी को घर में भीतर आने को कहना जरूरी लगा. बेटे सहित शरदजी भीतर आए तो अपने घर की हालत देख सहम ही गई इरा. कुर्सियों पर पड़े गंदे,  मुचड़े, पहने हुए वस्त्र हटाते हुए उस ने उन्हें बैठने को कहा तो जैसे वे सब समझ गए हों, ‘‘रहने दो, इरा… फिर किसी दिन आएंगे… जरा अपने बेटे को बुलाइए… उस से हाथ मिला लूं तब चलूं. मुझे देर हो रही है, जरूरी काम से जाना है.’’

इरा ने सुदेश और पति को आवाज दी. वे अपने कमरे में थे. दोनों बाहर निकल आए तो जैसे इरा शरम से गड़ गई हो. घर में एक अजनबी को बच्चे के साथ आया देख पवन भी अचकचा गए और सुदेश भी सहम सा गया पर उपहार में आई ढेरों चीजें देख उस की आंखें चमकने लगीं… स्नेह से शरदजी ने सुदेश के सिर पर हाथ फेरा. उसे आशीर्वाद दिया, उस से हाथ मिला उसे जन्मदिन की बधाई दी और बेटे मुकुल के साथ जाने लगे तो सकुचाई इरा उन्हें चाय तक के लिए रोकने का साहस नहीं बटोर पाई.

पवन से हाथ मिला कर शरदजी जब घर से बेटे मुकुल के साथ बाहर निकले तो उन्हें बाहर तक छोड़ने न केवल इरा ही गई, बल्कि पवन और सुदेश भी गए.

उन्होंने पवन से हाथ मिलाया और गाड़ी में बैठने से पहले अपना कार्ड दे कर बोले, ‘‘इरा, कभी पवनजी को ले कर आओ न हमारे झोंपड़े पर… तुम से बहुत सी बातें करनी हैं. अरसे बाद मिली हो भई, ऐसे थोड़े छोड़ देंगे तुम्हें… और फिर तुम तो मेरे बेटे की कैरियर निर्माता हो… तुम्हें अपना बेटा सौंप कर मैं सचमुच बहुत आश्वस्त हूं.’’

पवन और सुदेश के साथ घर वापस लौटती इरा एकदम चुप और खामोश थी. उस के भीतर एक तीव्र क्रोध दबे हुए ज्वालामुखी की तरह भभक रहा था पर किसी तरह वह अपने गुस्से पर काबू रखे रही. इस वक्त कुछ भी कहने का मतलब था, महाभारत छिड़ जाना. सुदेश के जन्मदिन को वह ठीक से मना लेना चाहती थी.

सुदेश के जन्मदिन का आयोजन देर रात तक चलता रहा था. इतना खुश सुदेश पहले शायद ही कभी हुआ हो. इरा भी उस की खुशी में पूरी तरह डूब कर खुश हो गई.

बिस्तर पर जब वह पवन के साथ आई तो बहुत संतुष्ट थी. पवन भी संतुष्ट थे, ‘‘अरसे बाद अपना सुदेश आज इतना खुश दिखाई दिया.’’

‘‘पर खानेपीने की चीजें मंगाने में काफी पैसा खर्च हो गया,’’ न चाहते हुए भी कह बैठी इरा.

‘‘घर वालों के ही खानेपीने पर तो खर्च हुआ है. कोई बाहर वालों पर तो हुआ नहीं. पैसा तो फिर कमा लिया जाएगा… खुशियां हमें कबकब मिलती हैं,’’ पवन अभी तक उस आयोजन में डूबे हुए थे.

‘‘सोया जाए… मुझे सुबह फिर जल्दी उठना है. सुदेश का कल अंगरेजी का टेस्ट है और मैं अंगरेजी की टीचर हूं अपने स्कूल में. मेरा बेटा ही इस विषय में पिछड़ जाए, यह मैं कैसे बरदाश्त कर सकती हूं? सुबह जल्दी उठ कर उस का पूरा कोर्स दोहरवाऊंगी…’’

‘‘आजकल की यह पढ़ाई भी हमारे बच्चों की जान लिए ले रही है,’’ पवन के चेहरे पर से प्रसन्नता गायब होने लगी, ‘‘हमारे जमाने में यह जानमारू प्रतियोगिता नहीं थी.’’

‘‘अब तो 90 प्रतिशत अंक, अंक नहीं माने जाते जनाब… मांबाप 99 और 100 प्रतिशत अंकों के लिए बच्चों पर इतना दबाव बनाते हैं कि बच्चों का स्वास्थ्य तक चौपट हुआ जा रहा है. क्यों दबा रहे हैं हम अपने बच्चों को… कभीकभी मैं भी बच्चों को पढ़ाती हुई इन सवालों पर सोचती हूं…’’

‘‘शायद इसलिए कि हम बच्चों के भविष्य को ले कर बेहद डरे हुए हैं, आशंकित हैं कि पता नहीं उन्हें जिंदगी में कुछ मिलेगा या नहीं… कहीं पांव टिकाने को जगह न मिली तो वे इस समाज में सम्मान के साथ जिएंगे कैसे?’’ पवन बोले, ‘‘हमारे जमाने में शायद यह गलाकाट प्रतियोगिता नहीं थी पर आजकल जब नौकरियां मिल नहीं रहीं, निजी कामधंधों में बड़ी पूंजी का खेल रह गया है. मामूली पैसे से अब कोई काम शुरू नहीं किया जा सकता, ऐसे में दो रोटियां कमाना बहुत टेढ़ी खीर हो गया है, तब बच्चों के कैरियर को ले कर सावधान हो जाने को मांबाप विवश हो गए हैं… अच्छे से अच्छा स्कूल, ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं, साधन, अच्छे से अच्छा ट्यूटर, ज्यादा से ज्यादा अंक, ज्यादा से ज्यादा कुशलता और दक्षता… दूसरा कोई बच्चा हमारे बच्चे से आगे न निकल पाए, यह भयानक प्रत्याशा… नतीजा तुम्हारे सामने है जो तुम कह रही हो…’’

‘‘मैं तो समझती थी कि तुम इन सब मसलों पर कुछ न सोचते होंगे, न समझते होंगे… पर आज पता चला कि तुम्हारी भी वही चिंताएं हैं जो मेरी हैं. जान कर सचमुच अच्छा लग रहा है, पवन,’’ कुछ अधिक ही प्यार उमड़ आया इरा के भीतर और उस ने पवन को एक गरमागरम चुंबन दे डाला.

पवन ने भी उसे बांहों में भर, एक बार प्यार से थपथपाया, ‘‘आदमी को तुम इतना मूर्ख क्यों मानती हो? अरे भई, हम भी इसी धरती के प्राणी हैं.’’

‘‘यह नाटक मैं ठीक से करा ले जाऊं और शरदजी को उन के बेटे के माध्यम से प्रसन्न कर पाऊं तो शायद उस एहसान से मुक्त हो सकूं जो उन्होंने मुझ पर किए हैं. जानते हो पवन, शरदजी ने अपने निर्देशन में मुझे 3 नाटकों में नायिका बनाया था. बहुत आलोचना हुई थी उन की पर उन्होंने किसी की परवा नहीं की थी. अगर तब उन्होंने मुझे उतना महत्त्व न दिया होता, मेरी प्रतिभा को न निखारा होता तो शायद मैं नाटकों की इतनी प्रसिद्ध नायिका न बनी होती. न ही यह नौकरी आज मुझे मिलती. यह सब शरदजी की ही कृपा से संभव हुआ.’’

नाटक उम्मीद से कहीं अधिक सफल रहा. मुकुल ने इंस्पेक्टर मातादीन के रूप में वह समां बांधा कि पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. स्कूल प्रबंधक और प्रधानाचार्या अपनेआप को रोक नहीं सके और दोनों उठ कर इरा के पास मंच के पीछे आए, ‘‘इरा, तुम तो कमाल की टीचर हो भई.’’

मुकुल के पिता शरदजी तो अपने बेटे की अभिनय क्षमता और इरा के कुशल निर्देशन से इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने वहीं, मंच पर आ कर स्कूल के लिए एक वातानुकूलित कंप्यूटर कक्ष और 10 कंप्यूटर अत्यंत उच्च श्रेणी के देने की घोषणा कर प्रबंधक और प्रधानाचार्या के मन की मुराद ही पूरी कर दी.

जब वे आयोजन के बाद चायनाश्ते पर अन्य अतिथियों के साथ प्रबंधक के पास बैठे तो न जाने उन के कान में क्या कहते रहे. इरा ने 1-2 बार उन की ओर देखा भी पर वे उन से ही बातें करते रहे. बाद में इरा को धन्यवाद दे वे जातेजाते पवन और सुदेश की तरफ देख हाथ हिला कर बोले, ‘‘इरा…मुझे अभी तक उम्मीद है कि किसी दिन तुम आने के लिए मुझे दफ्तर में फोन करोगी…’’

‘‘1-2 दिन में ही तकलीफ दूंगी, सर, आप को,’’ इरा उत्साह से बोली थी.

‘‘जो आदमी खुश हो कर लाखों रुपए का दान स्कूल को दे सकता है, उस से हम बहुत लाभ उठा सकते हैं, इरा… और वह आदमी तुम से बहुत खुश और प्रभावित भी है,’’ अपना मंतव्य आखिर पवन ने घर लौटते वक्त रास्ते में प्रकट कर ही दिया.

परंतु इरा चुप रही. कुछ बोली नहीं. किसी तरह पुन: पवन ने ही फिर कहा, ‘‘क्या सोच रही हो? कब चलें हम लोग शरदजी के घर?’’

‘‘पवन, तुम्हारे सोचने और मेरे सोचने के ढंग में बहुत फर्क है,’’ कहते हुए बहुत नरम थी इरा की आवाज.

‘‘सोच के फर्क को गोली मारो, इरा. हमें अपने मतलब पर ध्यान देना चाहिए, अगर हम किसी से अपना कोई मतलब आसानी से निकाल सकते हैं तो इस में हमारे सोच को और हमारी हिचक व संकोच को आड़े नहीं आना चाहिए,’’ पवन की सूई वहीं अटकी हुई थी, ‘‘तुम अपने घरपरिवार की स्थितियों से भली प्रकार परिचित हो, अपने ऊपर कितनी जिम्मेदारियां हैं, यह भी तुम अच्छी तरह जानती हो. इसलिए हमें निसंकोच अपने लिए कुछ हासिल करने का प्रयास करना चाहिए.’’

‘‘मैं तुम्हें और सुदेश को ले कर उन के बंगले पर जरूर जाऊंगी, पर एक शर्त पर… तुम इस तरह की कोई घटिया बात वहां नहीं करोगे. शरदजी के साथ मैं ने नाटकों में काम किया है, मैं उन्हें बहुत अच्छी तरह जानती हूं. वह इस तरह से सोचने वाले व्यक्ति नहीं हैं. बहुत समझदार और संवेदनशील व्यक्ति हैं. उन से पहली बार ही उन के घर जा कर कुछ मांगना मुझे उन की नजरों में बहुत छोटा बना देगा, पवन. मैं ऐसा हरगिज नहीं कर सकती.’’

दूसरे दिन इरा जब स्कूल में पहुंची तो प्रधानाचार्या ने उसे अपने दफ्तर में बुलाया, ‘‘हमारी कमेटी ने तय किया है कि यह पत्र तुम्हें दिया जाए,’’ कह कर एक पत्र इरा की तरफ बढ़ा दिया.

एक सांस में उस पत्र को धड़कते दिल से पढ़ गई इरा. चेहरा लाल हो गया, ‘‘थैंक्स, मेम…’’ अपनी आंतरिक प्रसन्नता को वह मुश्किल से वश में रख पाई. उसे प्रवक्ता का पद दिया गया था और स्कूल की सांस्कृतिक गतिविधियों की स्वतंत्र प्रभारी बनाई गई थी. साथ ही उस के बेटे सुदेश को स्कूल में दाखिला देना स्वीकार किया गया था और उस की इंटर तक फीस नहीं लगेगी, इस का पक्का आश्वासन कमेटी ने दिया था.

शाम को जब घर आ उस ने वह पत्र पवन, ससुरजी व घर के अन्य सदस्यों को पढ़वाया तो जैसे किसी को विश्वास ही न आया हो. एकदम जश्न जैसा माहौल हो गया, सुदेश देर तक समझ नहीं पाया कि सब इतने खुश क्यों हो गए हैं.

इरा ने नजदीकी पब्लिक फोन से शरदजी को दफ्तर में फोन किया, ‘‘आप को हार्दिक धन्यवाद देने आप के बंगले पर आज आना चाहती हूं, सर. अनुमति है?’’

सुन कर जोर से हंस पड़े शरदजी, ‘‘नाटक वालों से नाटक करोगी, इरा?’’

‘‘नाटक नहीं, सर. सचमुच मैं बहुत खुश हूं. आप के इस उपकार को कभी नहीं भूलूंगी,’’ वह एक सांस में कह गई, ‘‘कितने बजे तक घर पहुंचेंगे आप?’’

‘‘मेरा ड्राइवर तुम्हें लगभग 9 बजे घर से लिवा लाएगा… और हां, सुदेश व पवनजी भी साथ आएंगे,’’ उन्होंने फोन रख दिया था.

अपनी इरा मैम को अपने घर पर पा कर मुकुल बेहद खुश था. देर तक अपनी चीजें उन्हें दिखाता रहा. अगले नाटकों में भी इरा मैम उसे रखें, इस का वादा कराता रहा.

पूरे समय पवन कसमसाते रहे कि किसी तरह इरा मतलब की बात कहे शरदजी से. शरदजी जैसे बड़े आदमी के लिए यह सब करना मामूली सी बात है, पर इरा थी कि अपने विश्वविद्यालय के उन दिनों के किए नाटकों के बारे में ही उन से हंसहंस कर बातें करती रही.

जब वे लोग वापस चलने को उठे तो शरदजी ने अपने ड्राइवर से कहा, ‘‘साहब लोगों को इन के घर छोड़ कर आओ…’’ फिर बड़े प्रेम से उन्होंने पवन से हाथ मिलाया और उन की जेब में एक पत्र रखते हुए बोले, ‘‘घर जा कर देखना इसे.’’

रास्ते भर पवन का दिल धड़कता रहा, माथे पर पसीना आता रहा. पता नहीं, पत्र में क्या हो. जब घर आ कर पत्र पढ़ा तो अवाक रह गए पवन… उन की नियुक्ति शरदजी ने अपने दफ्तर में एक अच्छे पद पर की थी. Family Story In Hindi

Hindi Romantic Story: दिव्या भाभी – ललचाए देवर चिंटू ने चली गहरी चाल

Hindi Romantic Story: दिव्या भाभी को देख कर मनचलों के दिल में धकधक होने लगती थी. देवर चिंटू भी अपनी भाभी का रसपान करने के लिए उतावला था. एक दिन वह ऐसी दवा लाया कि दिव्या भाभी पर सैक्स का भूत सवार हो गया. क्या चिंटू को अपने प्लान में कामयाबी मिली?

दिव्या भाभी को कौन नहीं जानता. पूरे गांव में चर्चे हैं उस के. यह भी अफवाह है कि गांव में अभी तक उस के जैसी सुंदर बहू नहीं आई है. बिना सिंगार किए भी लुभावनी और आकर्षक लगती है. चालढाल, नैननक्श, शरीर के किसी भी अंग में कोई कमी दिखाई देती ही नहीं.

सुंदर होने के साथ ही दिव्या भाभी बहुत हंसोड़, मजाकिया और गंदी शरारतें करने वाली है, इसलिए गलीमहल्ले का कौन सा लड़का है, जो उस से मिलने को उतावला नहीं रहता. गांव में अफवाह सी फैली हुई है कि लड़के उस की ओर चुंबक के समान खिंचे चले आते हैं.

14-15 साल वाले जिन लड़कों के जवानी के कीटाणु काटने शुरू करते हैं, वे दिन में कम से कम एक बार तो दिव्या भाभी के दरबार में हाजिरी देते ही हैं. नयानया जवान होने वाला कोई किशोर उस के दरबार में अगर एक ही दिन में 2-3 बार हाजिरी दे तो कोई हैरत की बात नहीं.

दिव्या भाभी भी इतनी शरारती है कि ऐसे लड़कों का कभी अंग पकड़ कर हिला देती है तो कभी उन की छातियों में पड़ी हुई गुठलियां भींच देती है. जब लड़के दर्द से कराहते हैं, तो उसे बड़ा मजा आता है.

दिव्या भाभी के देवर चिंटू ने अभी जवानी की दहलीज पर कदम रखा है. जवानी के कीटाणुओं ने आजकल उस के अंदर तहलका सा मचाया हुआ है. चिंटू का असली नाम अभिषेक है, लेकिन घर और आसपास के महल्ले वाले उसे चिंटू ही बुलाते हैं. स्कूल में भी उस ने यही नाम लिखवाया है.

10वीं जमात पास करते ही चिंटू ने 11वीं में दाखिला ले लिया है. उस का परिवार भी ज्यादा बड़ा नहीं है. भाईभाभी के अलावा एक दादा हैं, जो घर से दस कदम दूर घेर में पड़े रहते हैं. दादाजी की एक विधवा बहन है, जो अब यहीं रहती हैं. चिंटू और उस का बड़ा भाई मोहन, उसे फुआ के नाम से पुकारते हैं. बड़ेबूढ़ों के रूप में इन दोनों का ही चिंटू और मोहन को आशीर्वाद हासिल है, क्योंकि 2 साल पहले उन के मम्मीपापा की कार हादसे में मौत हो गई थी.

महल्ले के दूसरे लड़कों के समान ही चिंटू भी अपनी भाभी दिव्या के साथ बहुत शरारतें करता है. जब भी मौका मिलता है, उस के साथ छेड़खानी करने से नहीं चूकता. वह नहीं मानता, भाभी ‘मां’ समान होती है. उसे तो अपनी भाभी दोस्त के जैसी दिखाई देती है.

दिव्या भाभी भी जबतब मौका देख कर चिंटू के गाल पर चूंट कर निकल जाती. एक दिन जब चिंटू चारपाई पर बैठा खाना खा रहा था, तो पीछे से आ कर दिव्या ने उस के गाल पर काट भी लिया था. चिंटू के मुंह से चीख सी निकल गई थी.

देवरभाभी में अकसर ऐसी शरारतें और नोकझोंक होती ही रहती है, लेकिन उन दोनों में से बुरा कोई नहीं मानता. कुछ ही समय एकदूसरे से नाराज रहते हैं, फिर मान जाते हैं.

चिंटू अब 17वें साल में है. ऐसा उस की हाईस्कूल की मार्कशीट में लिखी गई जन्मतिथि के अनुसार है. उस का अंदाजा है कि वह 1-2 साल और भी बड़ा हो सकता है, क्योंकि पापा ने स्कूल में जन्मतिथि कम कर के लिखवाई थी.

चिंटू के अंदर विशेष कीटाणु कई साल पहले बन चुके थे. जिन्हें उस ने अनेकों बार निकाल कर देखा. वह केवल यही देखना चाहता था कि उन का रंग कैसा होता है. क्योंकि उस के किसी दोस्त ने बताया था कि पहले उन का रंग सफेद होता है, फिर पीला हो जाता है, इसलिए इस सिद्धांत पर उस ने कई बार प्रयोग कर के देखा.

जब भाभी चिंटू के साथ गंदी शरारतें करती है, तो कीटाणुओं को बारबार निकालने का मन करता है. मुसकरा कर देखने और मीठीमीठी बातें करने पर तो उस के अंदर कुलबुलाहट सी मच जाती है. एक दिन तो चिंटू को इतना जोश आया कि उस ने मौका तलाश कर भाभी का हाथ पकड़ लिया.

भाभी ने अपना हाथ यह कहते हुए छुड़ाया, ‘‘देवरजी, पहले इस लायक हो तो जाओ.’’

चिंटू नहीं समझ पाया इस का मतलब क्या है? उस ने खुद ही कई बार इस वाक्य का मतलब निकाल कर देखा, लेकिन उस का सही मतलब नहीं समझ पाया. इस वाक्य का मतलब हां है या न, इस बारे में वह बहुत भ्रमित रहा. फिर उस ने खुद ही मतलब निकाला कि प्यार के मामले में लड़कियों की न का मतलब हां ही होता है.

अक्तूबर का महीना था. सर्दियां आने को थीं. बेमौसमी बारिश ने मौसम को ज्यादा ठंडा बना दिया था. चिंटू के भैया आज घर पर नहीं थे. उन्हें जरूरी काम से एक रिश्तेदार के घर रुकना पड़ा था. इस की जानकारी उन्होंने फोन पर दिव्या को दे दी थी. दिन में तेज हवाएं चलने के चलते बिजली गुल थी. तार टूट जाने की वजह से बिजली के आने की भी उम्मीद नहीं थी.

भाभी ने शाम का खाना जल्दी ही बनाया और सब लोगों ने मिल कर खाया. रात के 9 बजे तक सब अपनेअपने कमरों में घुस गए. जिस को जो काम सही लगा, वही करने लगा.

चिंटू को अपना होमवर्क करते हुए अचानक सूझा, ‘भाभी के पास कई सारी कहानियों की किताबें हैं. कोर्स की किताबें तो पढ़ता ही रहता हूं. आज कोई अच्छी कहानी पढ़ूंगा.’’

चिंटू सीधा भाभी के कमरे में पहुंचा. बिना कुछ बोले ही दरवाजे पर खड़ा हो कर भाभी को निहारने लगा. उस समय भाभी बिस्तर पर औंधी लेटी हुई फोन को स्क्रौल कर रही थी. बगल में कोई पत्रिका रखी हुई थी. ऐसी हालत में वह एकदम हीरोइन के समान दिखाई देने लगी.

मोमबत्ती की धीमी रोशनी में उस का हर अंग मन में रोमांच पैदा करने वाला था. कौन सा अंग था भाभी का, जो नागिन के समान लहराता नहीं दिखाई दे रहा था. वाह, क्या नजारा था. उस समय दिव्या भाभी के प्रति होने वाले आकर्षण को चिंटू नहीं रोक पाया.

चिंटू ने अंदर आ कर दिव्या की कमर पर चूंटते हुए कहा, ‘‘भाभी, कोई पत्रिका दे दो. इस महीने कौनकौन सी नई आई हैं? आज कहानी पढ़ने का मन है.’’

‘‘रैक में से ले लो. वहां बहुत सी पत्रिकाएं रखी हुई हैं,’’ भाभी ने भर्राई आवाज में कहा, जैसे नशे में हो.

‘‘तुम ही उठा कर दो, मुझे क्या पता कौन सी मजेदार है,’’ चिंटू ने थोड़ा हक जताते और जिद करते हुए कहा.

नहीं चाहते हुए भी भाभी को उठ कर पत्रिका और किताबों की रैक के पास आना पड़ा. भाभी ने जैसे ही पत्रिका उठाने के लिए हाथ बढ़ाया. चिंटू ने दोनों हाथों से उसे पीछे से अपनी बांहों में कस लिया.

भाभी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो… छोड़ दो, कोई आ जाएगा.’’

चिंटू और कस कर पकड़ते हुए बोला, ‘‘नहीं, आज नहीं. बरदाश्त नहीं हो रहा है. अब नहीं रहा जाता. बस एक बार.’’

छीनाझपटी सी शुरू हो गई. चिंटू कहता, ‘‘आजा.’’

भाभी कहती, ‘‘न… न…’’

तभी किसी के ‘ठपठप’ कदमों की आवाज सुनाई दी. चिंटू ने तुरंत भाभी को छोड़ कर उस का फोन उठाया और कान पर लगाते हुए झूठमूठ किसी से बतियाने का नाटक सा करने लगा, ‘‘हां ठीक है. अभी बात कर लूंगा… मैं 10 बजे तक पहुंच जाऊंगा… भाभी जल्दी ही नाश्ता बना देती है… कालेज में ही आ जाना… नहीं, अभी घर पर ही है, चाहो तो बात कर सकते हो…’’

तभी फुआ अंदर कमरे में आई. चिंटू और भाभी को शक की निगाह से देखा और बिना कुछ बोले ही लौट गई. गुस्से में फोन बिस्तर पर फेंक कर चिंटू भी अपने कमरे में आ कर सो गया.

इस घटना के बाद भाभी ने चिंटू के साथ बातचीत करना छोड़ दिया. जब कभी बोलती भी तो घुड़क कर. देखती तो घूर कर, जैसे अभी काट खाएगी. चिंटू को भाभी के इस बदले हुए बरताव की कुछ वजह पता भी थी और कुछ नहीं भी.

जब चिंटू ने भाभी से इस बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘अगर मैं तुम्हारे साथ मजाक कर लेती थी तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं गलत हूं. फुआ देख लेती तो क्या होता? अगर तुम्हारे भाई को पता चल गया तो फिर अंजाम जानते हो कि क्या होगा?’’

चिंटू को भाभी के ये शब्द कांटे के समान चुभे. उसे अपनी बेइज्जती सी महसूस हुई. पहले लुभाया, फिर धमकाया. उस ने सोच लिया, ‘भाभी तुम से तो बदला जरूर लेना है. अब चाहे अंजाम कुछ भी हो.’

चिंटू ने अपना सारा गुनाह अपने एक दोस्त को बताते हुए कहा, ‘‘भाभी का बरताव अब बिलकुल बदल गया है. छोटी सी बात पर वह खीज कर बोलती है. एकदो बार तो बिना किसी बात के ही मुझे घुड़क भी दिया.’’

दोस्त ने सलाह दी, ‘‘यार, तुम ने कच्ची छोड़ दी, पूरा काम हो जाता तो फिर न बोलती, बल्कि और खुश होती. अगर तुम्हें पूरा काम करना है तो इस का तरीका मैं बताता हूं,’’ उस ने चिंटू के कान में फुसफुसाते हुए सारा प्लान समझा दिया.

चिंटू को सुन कर शांति मिली और थोड़ी हैरानी भी हुई, ‘‘ऐसी दवा भी आती है…’’ उस ने खुशी से झूमते हुए कहा.

कालेज की छुट्टी होते ही चिंटू मामचंद बलबीर की दुकान पर पहुंचा और दुकानदार से बोला, ‘‘भैंस गाभिन करने की दवा चाहिए.’’

‘‘भैंस कैसी है?’’ दुकानदार ने कनखियों से उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘खारके की कटिया है. कभीकभार बोलती है, फिर चुप हो जाती है. हरी होने का नाम ही नहीं ले रही. बस गात फुलाए जा रही है.’’

‘‘यह लो एक पुडि़या, आधी शाम को दे देना, आधी सुबह को. रोटी या आटे के गोले में मिला कर देना. खाते ही बोलने लगेगी.’’

चिंटू ने बिल चुकाया और दवा ले कर घर आ गया. वह बहुत खुश था. आज तो होगा ही होगा. दिल में उमंग थी. जब भी भाभी के बारे में सोचता, शरीर में कामुक लहर सी दौड़ती. बारबार मन में यह भावना उठती, ‘सीधी उंगली से कभी घी नहीं निकलता, उसे टेढ़ा करना ही पड़ता है. अब देखता हूं कि भाभी कैसे बचेगी?’

शाम को खाना खाने के बाद जब सोने का समय हुआ, चिंटू ने बड़ी चालाकी से दिव्या भाभी के दूध में दवा की पुडि़या की एकचौथाई मात्रा मिला दी. घर में सोने से पहले दूध पीने का रिवाज था, इसलिए जब दिव्या सब के कमरे में एकएक गिलास दूध देने में बिजी थी, तब चिंटू को दूध में दवा मिलाने का मौका मिल गया था.

सब दूध पी कर सोने की तैयारी करने लगे. आधे घंटे के बाद ही दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया. पहले धीरेधीरे शरीर में कुछ हरारत सी हुई, फिर तेजी के साथ.

दिव्या ने खुद को कई बार रोकना चाहा, लेकिन सहवास की आग जो भड़की, फिर भड़कती ही चली गई.

जब उस का खुद पर से कंट्रोल खत्म हो गया तो उस ने मोहन का गरीबान पकड़ कर उस के ऊपर लेटते हुए जोश में कहा, ‘‘ओ पंडित, आज करता नहीं क्या?’’

मोहन को थोड़ी हैरानी हुई कि आज दिव्या खुद ही कह रही है, जबकि अकसर मोहन को ही बोलना पड़ता था. उस ने बिना कोई पल गंवाए दिव्या को अपनी बांहों में कसते हुए जलती आग में घी डालना शुरू कर दिया.

लेकिन आज उसे घी की नहीं पानी की जरूरत थी. और उस से भी कहीं ज्यादा बर्फ की. उस के ऊपर उन डब्बों को उलटने की जरूरत थी, जिन पर आग लिखा होता है, पर उन में रेत होता है.

मोहन से जब आग पूरी तरह शांत न हुई, तो दिव्या ने उसे अपने नीचे लिटा लिया और खुद ऊपर आ गई. आज खेत में फावड़े का काम करने के चलते मोहन काफी थका हुआ था, इसलिए केवल एक बार संबंध बना सका. वह कुछ ही मिनट में सो गया.

दिव्या सोते हुए मोहन की ओर देखने लगी और गुस्सा होने लगी. उसे अपने अंदर ज्वाला सी दहकती महसूस हो रही थी, इसलिए उस की आंखों में नींद  कहां थी. आंखें बंद करते ही मन में गंदे खयाल आने लगते. उस ने मोहन की ओर ललचाई नजरों से एक बार फिर देखा, लेकिन वह गहरी नींद में था.

जब दिव्या से बरदाश्त न हुआ तो वह धीरे से उठी और चिंटू के कमरे में चली गई. चिंटू आंख बंद किए लेटा हुआ था. लेकिन वह जाग रहा था.

चिंटू को पूरा यकीन था कि भाभी आएगी जरूर, चाहे किसी भी समय आए. दवा का असर खाली नहीं जा सकता. एक छोटी सी पुडि़या की आधी खुराक जब इतनी बड़ी भैंस को हीट पर ला सकती है, तो 50 किलो की औरत क्या चीज है.

आते ही दिव्या ने चिंटू के पास लेटते हुए कहा, ‘‘आज मैं तुम्हारे साथ सोना चाहती हूं. आओ, अपनी प्यास बुझा लो.’’

चिंटू तो ये शब्द सुनने के लिए महीनों से बेकरार था. वह लिपट गया. जी भर कर प्यार किया.

दिव्या फिर अपने कमरे में आई. कुछ देर आंखें बंद कर सोने की कोशिश की, लेकिन उसे नींद न आई. उस ने फिर ललचाई नजरों से मोहन की ओर देखा. जोश से भर कर उसे अपनी बांहों में कसना चाहा.

मोहन जाग गया और बोला, ‘‘दिव्या, क्या कर रही हो?’’ नींद टूटने से वह थोड़ा गुस्सा हो गया.

‘‘मैं नहीं जानती कि मुझे क्या हो गया है. मेरे शरीर में कोई ज्वालामुखी फट रहा है. मुझ से बरदाश्त नहीं हो रहा है,’’ वह तड़पते हुए बोली.

मोहन ने दिव्या की ओर ध्यान से देखा. उस की हालत वाकई खराब थी. शरीर उघड़ा हुआ और बहुत गरम था. वह बहुत बेचैन थी.

मोहन ने हालात को भांप कर गांव में ही अपने दोस्त डाक्टर प्रशांत को फोन मिलाया, ‘‘यार, तुम्हारी भाभी की हालत बहुत खराब है. जल्द ही आओ.’’

‘इस समय रात के 2 बजे हैं.’

‘‘हां यार, समस्या गंभीर है. आना ही पड़ेगा.’’

डाक्टर प्रशांत आधे घंटे में हाजिर हो गया. उस ने दिव्या को चौंक कर देखा. ‘‘इन्होंने कोई बहुत ज्यादा गरम चीज खाई है. इस से पूरे शरीर पर एलर्जी हो सकती है. मामला कंट्रोल करने की कोशिश करता हूं, वरना तुरंत अस्पताल ले जाना पड़ेगा.’’

इस के बाद डाक्टर ने 2 इंजैक्शन दिव्या को लगाए और कुछ खाने की दवाएं दीं. उसे तुरंत ही शांति मिल गई और वह सो गई.

चिंटू खुश था. उसे लग रहा था कि उस ने अपना बदला ले लिया. भाभी कहां तो सतीसावित्री बनती थी. फिर ऐसा जादू चला कि खुद ही खिंची चली आई.

कुछ दिन बाद देवरभाभी में फिर वही हंसीमजाक, छेड़खानी और शरारतों का सिलसिला शुरू हो गया.

एक दिन भाभी ने चिंटू के साथ कोई गंदी शरारत की तो उस ने भाभी को सबकुछ बता दिया. साथ ही, बाकी बची दवा की पुडि़या भी उस के हाथ में सौंप दी.

दिव्या को पहले तो गुस्सा आया, लेकिन फिर उस की आंखें शर्म से झुक गईं. वह अपने दोनों हाथ मुंह पर रख कर शरमाती हुई तेजी से चल दी. शायद वह चिंटू के सामने पहली बार शरमाई थी.

अब जब भी दिव्या भाभी चिंटू के सामने आ जाती है, थोड़ा सा मुसकराती है और नीची निगाह कर के निकल जाती है. Hindi Romantic Story

Family Story In Hindi: किराए की कोख – कौए के घोंसले में कोयल के अंडे

Family Story In Hindi: पूरे महल्ले में सब से खराब माली हालत महेंद्र की ही थी. इस शहर से कोसों दूर एक गांव से 2 साल पहले ही महेंद्र अपनी बीवी सुनीता और 2 बच्चों के साथ इस जगह आ कर बसा था. वह गरीबी दूर करने के लिए गांव से शहर आया था, लेकिन यहां तो उन का खानापीना भी ठीक से नहीं हो पाता था.

महेंद्र एक फैक्टरी में काम करता था और सुनीता घर पर रह कर बच्चों की देखभाल करती थी. बड़ा बेटा 5 साल से ऊपर का हो गया था, लेकिन अभी स्कूल जाना शुरू नहीं हो पाया था.

सुनीता काफी सोचती थी कि बच्चे को किसी अगलबगल के छोटे स्कूल में पढ़ने भेजने लगे, लेकिन चाह कर भी न भेज सकती थी.

जिस महल्ले में सुनीता रहती थी, उस महल्ले में सब मजदूर और कामगार लोग ही रहते थे. ठीक बगल के मकान में रहने वाली एक औरत के साथ सुनीता का उठनाबैठना था.

जब उस को सुनीता की मजबूरी पता लगी, तो उस ने सुनीता को खुद भी काम करने की सलाह दे डाली. उस ने एक घर में उस के लिए काम भी ढूंढ़ दिया.

सुनीता ने जब यह बात महेंद्र को बताई, तो वह थोड़ा हिचकिचाया, लेकिन सुनीता का सोचना ठीक था, इसलिए वह कुछ कह नहीं सका.

सुनीता उस औरत द्वारा बताए गए घर में काम करने जाने लगी. वह काफी बड़ा घर था. घर में केवल 2 लोग ममता और रमन पतिपत्नी ही थे, जो किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे.

दोनों का स्वभाव सुनीता के प्रति बहुत नरम था. ममता तो आएदिन सुनीता को तनख्वाह के अलावा भी कुछ न कुछ चीजें देती ही रहती थी.

रमन और ममता के पास किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में एक भी बच्चा नहीं था.

रविवार के दिन ममता और रमन छुट्टी पर थे. काम खत्म कर सुनीता जाने को हुई, तो ममता ने उसे बुला कर अपने पास बिठा लिया. वह सुनीता से उस के परिवार के बारे में पूछती रही.

सुनीता को ममता की बातों में बड़ा अपनापन लगा, तो वह अचानक ही

उस से पूछ बैठी, ‘‘जीजी, आप के कोई बच्चा नहीं हुआ क्या?’’

ममता ने मुसकरा कर सुनीता की तरफ देखा और धीरे से बोली, ‘‘नहीं, लेकिन तुम यह क्यों पूछ रही हो?’’

सुनीता ने ममता की आवाज को भांप लिया था. वह बोली, ‘‘बस जीजी, ऐसे ही पूछ रही थी. घर में कोई बच्चा न हो, तो अच्छा नहीं लगता न. शायद आप को ऐसा महसूस होता हो.’’

ममता की आंखें उसी पर टिक गई थीं. वह भी शायद इस बात को शिद्दत से महसूस कर रही थी.

ममता बोली, ‘‘तुम सही कहती हो सुनीता. मैं भी इस बात को ले कर चिंता में रहती हूं, लेकिन कर भी क्या सकती हूं? मैं मां नहीं बन सकती, ऐसा डाक्टर कहते हैं…’’

यह कहतेकहते ममता का गला भर्रा गया था. सुनीता भी आगे कुछ कहने की हिम्मत न कर सकी थी. उस के पास शायद इस बात का कोई हल नहीं था.

ममता और रमन शादी से पहले एक ही कंपनी में काम करते थे, जहां दोनों में मुहब्बत हुई और उस के बाद दोनों ने शादी कर ली. कई साल तक दोनों ने बच्चा पैदा नहीं होने दिया, लेकिन बाद में ममता मां बनने के काबिल ही न रही. इस बात को ले कर दोनों परेशान थे.

सुनीता को ममता के घर काम करते हुए काफी दिन हो गए थे. ममता का मन जब भी होता, वह सुनीता को अपने पास बिठा कर बातें कर लेती थी. पर अब सुनीता ममता से बच्चा न होने या होने को ले कर कोई बात नहीं करती थी. दिन ऐसे ही गुजर रहे थे.

एक दिन ममता ने सुनीता को आवाज दी और उसे साथ ले कर अपने कमरे में पहुंच गई. उस ने सुनीता को अपने पास ही बिठा लिया.

सुनीता अपनी मालकिन ममता के बराबर में बैठने से हिचकती थी, लेकिन ममता ने उसे हाथ पकड़ कर जबरदस्ती बिठा ही लिया.

ममता ने सुनीता का हाथ अपने हाथ में लिया और बोली, ‘‘सुनीता, तुम से एक काम आ पड़ा है, अगर तुम कर सको तो कहूं?’’

ममता के लिए सुनीता के दिल में बहुत इज्जत थी, भला वह उस के किसी काम के लिए क्यों मना कर देती. वह बोली, ‘‘जीजी, कैसी बात करती हो? आप कहो तो सही, न करूं तो कहना.’’

ममता ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, ‘‘सुनीता, डाक्टर कहता है कि मैं मां तो बन सकती हूं, लेकिन इस के लिए मुझे किसी दूसरी औरत का सहारा लेना पड़ेगा… अगर तुम चाहो, तो इस काम में मेरी मदद कर सकती हो.’’

ममता की बात सुन कर सुनीता का मुंह खुला का खुला रह गया. उस को यकीन न होता था कि ममता उस से इतने बड़े व्यभिचार के बारे में कह सकती है.

सुनीता साफ मना करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं बेशक गरीब हूं, लेकिन अपने पति के होते किसी मर्द की परछाईं तक को न छुऊंगी. आप इस काम के लिए किसी और को देख लो.’’

ममता हैरत से बोली, ‘‘अरे बावली, तुम से पराया मर्द छूने को कौन कहता है… यह सब वैसा नहीं है, जैसा तुम सोच रही हो. इस में सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा तुम्हें कोई नहीं छुएगा. यह समझे कि तुम सिर्फ अपनी कोख में बच्चे को पालोगी, जबकि सबकुछ मैं और मेरे पति करेंगे.’’

सुनीता की समझ में कुछ न आया था. सोचा कि भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी औरत को छुए भी नहीं और वह मां बन जाए.

सुनीता को हैरान देख कर ममता बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रही हो सुनीता? तुम चाहो तो मैं सीधे डाक्टर से भी बात करा सकती हूं. जब तुम पूरी तरह संतुष्ट हो जाओ, तब ही तैयार होना.’’

सुनीता हिचकिचाते हुए बोली, ‘‘जीजी, मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूं… अगर मैं तैयार हो भी जाऊं, तो मेरे पति इस बात के लिए नहीं मानेंगे.’’

ममता हार नहीं मानना चाहती थी. आखिर उस के मन में न जाने कब से मां बनने की चाहत पल रही थी. वह बोली, ‘‘तुम इस बात की चिंता बिलकुल मत करो. मैं खुद घर आ कर तुम्हारे पति से बात करूंगी और इस काम के लिए तुम्हें इतना पैसा दूंगी कि तुम 2 साल भी काम करोगी, तब भी कमा नहीं पाओगी.’’

सुनीता यह सब तो नहीं चाहती थी, लेकिन ममता से मना करने का मन भी नहीं हो रहा था.

काम से लौटने के बाद सुनीता ने अपने पति से सारी बात कह दी. महेंद्र इस बात को सिरे से खारिज करता हुआ बोला, ‘‘नहीं, कोई जरूरत नहीं है इन लोगों की बातों में आने की. कल से काम पर भी मत जाना ऐसे लोगों के यहां. ये अमीर लोग होते ही ऐसे हैं.

‘‘मैं तो पहले ही तुम्हें मना करने वाला था, लेकिन तुम ने जिद की तो कुछ न कह सका.’’

सुनीता को ऐसा नहीं लगता था कि ममता दूसरे अमीर लोगों की तरह है. वह उस के स्वभाव को पहले भी परख चुकी थी. वह बोली, ‘‘नहीं, मैं यह बात नहीं मान सकती. ऐसी मालकिन मिलना आज के समय में बहुत मुश्किल काम है. आप उन को सब लोगों की लाइन में खड़ा मत करो.’’

महेंद्र कुछ कहता, उस से पहले ही कमरे के दरवाजे पर किसी के आने की आहट हुई, फिर दरवाजा बजाया गया.

सुनीता को ममता के आने का एहसास था. उस ने झट से उठ कर दरवाजा खोला, तो देखा कि सामने ममता खड़ी थी.

सुनीता के हाथपैर फूल गए, खुशी के मारे मुंह से बात न निकली, वह अभी पागलों की तरह ममता को देख ही रही थी कि ममता मुसकराते हुए बोल पड़ी, ‘‘अंदर नहीं बुलाओगी सुनीता?’’ सुनीता तो जैसे नींद से जागी थी.

वह हड़बड़ा कर बोली, ‘‘हांहां जीजी, आओ…’’ यह कहते हुए वह दरवाजे से एक तरफ हटी और महेंद्र से बोली, ‘‘देखोजी, अपने घर आज कौन आया है… ये जीजी हैं, जिन के घर पर मैं काम करने जाती हूं.’’

महेंद्र ने ममता को पहले कभी देखा तो नहीं था, लेकिन अमीर पहनावे और शक्लसूरत को देख कर उसे समझते देर न लगी. उस ने ममता से दुआसलाम की और उठ कर बाहर चल दिया.

ममता ने उसे जाते देखा, तो बोल पड़ी, ‘‘भैया, आप कहां चल दिए? क्या मेरा आना आप को अच्छा नहीं लगा?’’

महेंद्र यह बात सुन कर हड़बड़ा गया. वह बोला, ‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं तो इसलिए जा रहा था कि आप दोनों आराम से बात कर सको.’’

ममता हंसते हुए बोली, ‘‘लेकिन भैया, मैं तो आप से ही बात करने आई हूं. आप भी हमारे साथ बैठो न.’’

महेंद्र न चाहते हुए भी बैठ गया. ममता का इतना मीठा लहजा देख वह उस का मुरीद हो गया था. उस के दिमाग में अमीरों को ले कर जो सोच थी, वह जाती रही.

सुनीता सामने खड़ी ममता को वहीं बिछी एक चारपाई पर बैठने का इशारा करते हुए बोली, ‘‘जीजी, मेरे घर में तो आप को बिठाने के लिए ठीक जगह भी नहीं, आप को आज इस चारपाई पर ही बैठना पड़ेगा.’’

ममता मुसकराते हुए बोली, ‘‘सुनीता, प्यार और आदर से बड़ा कोई सम्मान नहीं होता, फिर क्या चारपाई और क्या बैड. आज तो मैं तुम्हारे साथ जमीन पर ही बैठूंगी.’’

इतना कह कर ममता जमीन पर पड़ी एक टाट की बोरी पर ही बैठ गई.

सुनीता ने लाख कहा, लेकिन ममता चारपाई पर न बैठी. हार मान कर सुनीता और महेंद्र भी जमीन पर ही बैठ गए. सुनीता ने नजर तिरछी कर महेंद्र को देखा, फिर इशारों में बोली, ‘‘देख लो, तुम कहते थे कि हर अमीर एकजैसा होता है. अब देख लिया.’’

महेंद्र से आदमी पहचानने में गलती हुई थी. तभी ममता अचानक बोल पड़ी, ‘‘सुनीता, क्या तुम मुझे चाय नहीं पिलाओगी अपने घर की?’’

सुनीता के साथसाथ महेंद्र भी खुश हो गया. एक करोड़पति औरत गरीब के घर आ कर जमीन पर बैठ चाय पिलाने की गुजारिश कर रही थी.

सुनीता तो यह सोच कर चाय न बनाती थी कि ममता उस के घर की चाय पीना नहीं चाहेंगी. जब खुद ममता ने कहा, तो वह खुशी से पागल हो उठी,

महेंद्र और सुनीता की इस वक्त ऐसी हालत थी कि ममता इन दोनों से इन की जान भी मांग लेती, तो भी ये लोग मना न करते.

चाय बनी, तो सब लोग चाय पीने लगे. इतने में सुनीता का छोटा बेटा जाग गया. ममता ने उसे देखा तो खुशी से गोद में उठा लिया और उस से बातें करने में मशगूल हो गई.

महेंद्र और सुनीता यह सब देख कर बावले हुए जा रहे थे. उन्हें ममता में एक अमीर औरत की जगह अपने घर की कोई औरत नजर आ रही थी.

थोड़ी देर बाद ममता ने बच्चे को सुनीता के हाथों में दे दिया और महेंद्र की तरफ देख कर बोली, ‘‘भैया, मैं कुछ बात करने आई थी आप से. वैसे, सुनीता ने आप को सबकुछ बता दिया होगा.

‘‘भैया, मैं आप को यकीन दिलाती हूं कि सुनीता को सिर्फ लेडी डाक्टर के अलावा कोई और नहीं छुएगा. यह इस तरह होगा, जैसे कोयल अपने अंडे कौए के घोंसले में रख देती है और बच्चे अंडों से निकल कर फिर से कोयल के हो जाते हैं, अगर आप…’’

महेंद्र ममता की बात पूरी होने से पहले ही बोल पड़ा, ‘‘बहनजी, आप जैसा ठीक समझे वैसा करें. जब सुनीता को आप अपना समझती हैं, तो फिर मुझे किसी बात से कोई डर नहीं. इस का बुरा थोड़े ही न सोचेंगी आप.’’

ममता खुशी से उछल पड़ी. सुनीता महेंद्र को मुंह फाड़े देखे जा रही थी. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि महेंद्र इतनी जल्दी हां कह सकता है. लेकिन महेंद्र तो इस वक्त किसी और ही फिजा में घूम रहा था. कोई करोड़पति औरत उस के घर आ कर झोली फैला कर उस से कुछ मांग रही थी, फिर भला वह कैसे मना कर देता.

ममता हाथ जोड़ कर महेंद्र से बोली, ‘‘भैया, मैं आप का यह एहसान जिंदगीभर नहीं भूलूंगी,’’ यह कहते हुए ममता ने अपने मिनी बैग से नोटों की एक बड़ी सी गड्डी निकाल कर सुनीता के हाथों में पकड़ा दी और बोली, ‘‘सुनीता, ये पैसे रख लो. अभी और दूंगी. जो इस वक्त मेरे पास थे, वे मैं ले आई.’’

सुनीता ने हाथ में पकड़े नोटों की तरफ देखा और फिर महेंद्र की तरफ देखा. महेंद्र पहले से ही सुनीता के हाथ में रखे नोटों को देख रहा था.

आज से पहले इन दोनों ने कभी इतने रुपए नहीं देखे थे, लेकिन महेंद्र कम से कम ममता से रुपए नहीं लेना चाहता था, वह बोला, ‘‘बहनजी, ये रुपए हम लोग नहीं ले सकते. जब आप हमें इतना मानती हैं, तो ये रुपए किस बात के लिए?’’

ममता ने सधा हुआ जवाब दिया, ‘‘नहीं भैया, ये तो आप को लेने ही पड़ेंगे. भला कोई और यह काम करता, तो वह भी तो रुपए लेता, फिर आप को क्यों न दूं?

‘‘और ये रुपए दे कर मैं कोई एहसान थोड़े ही न कर रही हूं.’’

इस के बाद ममता वहां से चली गई. महेंद्र ने ममता के जाने के बाद रुपए गिने. पूरे एक लाख रुपए थे. महेंद्र और सुनीता दोनों ही आज ममता के अच्छे बरताव से बहुत खुश थे. ऊपर से वे एक लाख रुपए भी दे गईं. ये इतने रुपए थे कि 2 साल तक दोनों काम करते, तो भी इतना पैसा जोड़ न पाते.

दोनों के अंदर आज एक नया जोश था. अब न किसी बात से एतराज था और न किसी बात पर कोई सवाल.

जल्द ही सुनीता को ममता ने डाक्टर के पास ले जा कर सारा काम निबटवा दिया. वह सुनीता के साथ उस के पति महेंद्र को भी ले गई थी, जिस से उस के मन में कोई शक न रहे.

ममता ने अब सुनीता से घर का काम कराना बंद कर दिया था. घर के काम के लिए उस ने एक दूसरी औरत को रख लिया था. सुनीता को खाने के लिए ममता ने मेवा से ले कर हर जरूरी चीज अपने पैसों से ला कर दे दी थी. साथ ही, एक लाख रुपए और भी नकद दे दिए थे.

ममता नियमित रूप से सुनीता को देखने भी आती थी. उस ने महेंद्र और सुनीता से उस के घर चल कर रहने के लिए भी कहा था, लेकिन महेंद्र ने वहां रहने के बजाय अपने घर में ही रहना ठीक सम?ा.

जिस समय सुनीता अपने पेट में बच्चे को महसूस करने लगी थी, तब से न जाने क्यों उसे वह अपना लगने लगा था. वह उसे सबकुछ जानते हुए भी अपना मान बैठी थी.

जब बच्चा होने को था, तब एक हफ्ता पहले ही सुनीता को अस्पताल में भरती करा दिया गया था. जिस दिन बच्चा हुआ, उस दिन तो ममता सुनीता को छोड़ कर कहीं गई ही न थी. सुनीता को बेटा हुआ था.

ममता ने सुनीता को खुशी से चूम लिया था. उस की खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन सुनीता को मन में अजीब सा लग रहा था. उस का मन उस बच्चे को अपना मान रहा था.

अस्पताल से निकलने के बाद ममता ने सुनीता को कुछ दिन अपने पास भी रखा था. उस के बाद उस ने सुनीता को और 50 हजार रुपए भी दिए.

सुनीता अपने घर आ गई, लेकिन उस का मन न लगता था. जो बच्चा उस ने अपनी कोख में 9 महीने रखा, आज वह किसी और का हो चुका था. पैसा तो मिला था, लेकिन बच्चा चला गया था.

सुनीता का मन होता था कि बच्चा फिर से उस के पास आ जाए, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकता था. उस की कोख किसी और के बच्चे के लिए किराए पर जो थी. Family Story In Hindi

Story In Hindi: लाल कमल – उम्मीद की किरण बना आईएएस आनंद

Story In Hindi: आईएएस यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के बाद आनंद अभी बेंगलुरु में एक ऊंचे प्रशासनिक पद पर काम कर रहा है.

महात्मा गांधी की पुकार पर साल 1942 के आंदोलन में स्कूल छोड़ कर देश की आजादी के लिए कूद पड़ने वाले करमना गांव के आदित्य गुरुजी के पोते आनंद को देश और समाज के प्रति सेवा करने की लगन विरासत में मिली है.

आनंद बचपन से ही अपने तेज दिमाग, बड़ेबुजुर्गों के प्रति आदर और हमउम्र व बच्चों के बीच मेलजोल के साथ पढ़नेलिखने व खेलनेकूदने में भाग लेने के चलते बहुत लोकप्रिय था.

गांवसमाज के हर तीजत्योहार, शादीब्याह, रीतिरिवाज में आनंद को उमंग के साथ हिस्सा लेने में बहुत खुशी होती थी. केवल छात्र जीवन में ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक सेवा में आने के बाद भी होलीदशहरा में वह गांव आने का मौका निकाल ही लेता था.

इस बार मार्च महीने में दफ्तर के कुछ काम से उसे पटना जाना था. पटना आने के बाद आनंद ने एक दिन गांव जाने का प्रोग्राम बनाया.

आनंद को गांव आ कर काफी अच्छा लगता है, पर अब यहां बहुतकुछ बदल गया है.

यह बात आज के बच्चे सोच भी नहीं सकते कि जहां पहले कभी कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी और टमटम के अलावा कोई दूसरी सवारी नहीं हुआ करती थी, वहां अब पक्की रोड पर

बसें और आटोरिकशा 12 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन तक जाने के लिए हर 15 मिनट पर तैयार मिल जाते हैं.

यहां तक कि पटना से निकलने वाले सभी अखबार अब इस गांव में आते हैं और हौकर इन्हें घरघर तक पहुंचा जाता है. साथ ही, टैलीविजन पर भी अब हर छोटीबड़ी खबर और मनोरंजन के तमाम कार्यक्रमों समेत नईपुरानी फिल्में भी देखने को मिल जाती हैं.

अब आनंद के बाबूजी तो रहे नहीं, पर चाचा और चाची रहते हैं. उसे देखते ही उन के चेहरे पर खुशी की चमक आंखों में नमी लिए पसर गई.

आनंद ने चाचा के पैर छुए. उन्होंने उस के सिर को दोनों हाथों में ले कर चूमते हुए ढेर सारा आशीर्वाद दिया.

चाची दोनों की बातें सुनते हुए अंदर से बाहर आ गई थीं. आनंद ने उन के भी पैर छुए.

चाची ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हम कह रहे थे कि आनंद हम को देखे बिना जा ही नहीं सकता.’’

‘‘कैसे हैं आप लोग?’’ आंखों में भर आए आंसुओं को रूमाल से पोंछते हुए आनंद ने पूछा.

‘‘तुम्हारे जैसे बेटे के रहते हमें क्या हो सकता है? हम भलेचंगे हैं. लो, कुछ चायनाश्ता कर के थोड़ा आराम कर लो, तब तक मैं खाना तैयार कर लेती हूं,’’ कह कर चाची अंदर चल पड़ीं.

‘‘बहुत परेशान न होइएगा चाची. सादा खाना ही ठीक रहेगा,’’ आनंद ने कहा और चायनाश्ता करते हुए चाचा से अपने खेतखलिहान के साथ ही साफ बागबगीचे, गांवसमाज की बातें करने लगा.

चाची के हाथ का बना खाना खाते हुए आनंद को बरबस ही बचपन की यादें ताजा हो आईं.

खाना खाने के बाद आनंद ने कुछ देर आराम किया. शाम को चाचा ने फागू को बुलाया. उन्होंने सरसों के सूखे डंठलों को खलिहान से मंगवा कर परिवार के सदस्यों की संख्या के हिसाब से एक ज्यादा होल्लरी यानी लुकाठी बनवाई.

होलिका दहन के लिए गांव की तय जगह पर लोग समय पर इकट्ठा हो गए थे. आनंद भी चाचा के जोर देने पर वहां पहुंच गया था.

वैसे, होली के इस मौके पर होने वाली हुल्लड़बाजी और नशे के असर से सहीगलत न समझ पाने वाले नौजवानों की हरकतों को आनंद बचपन से ही नापसंद करता रहा है.

आनंद को यह बात तो अच्छी लगती कि होलिका दहन में गांवमहल्ले की बहुत सी गंदगी, बेकार की चीजें, जो सही माने में बुराई की प्रतीक हैं, जला कर आबोहवा को कुछ हद तक साफ करने में मदद मिलती है. परंतु वह यह भी मानता है कि होलिका दहन के ढेर से उठती आग की लपटों से कभीकभार आसपास के हरेभरे पेड़ों और मकानों को पहुंचने वाले नुकसान से इस को मनाने के सही ढंग पर नए सिरे से सोचना चाहिए.

आनंद को देख कर गांव के बहुत से नौजवान लड़के उस के पास आ गए. उन सभी लड़कों ने अपने मातापिता से आनंद के बारे में पहले ही बहुतकुछ सुन रखा था. वे अपने बच्चों को आनंद जैसा बनने की सीख देते थे.

आनंद को भी उन से मिल कर बहुत अच्छा लगा.

आनंद ने उन नौजवानों से दोस्त की तरह कई बातें कीं, फिर होलिका दहन के बारे में भी अपने मन की बातें उन से साझा कीं. वे सभी आनंद जैसे एक बड़े ओहदे वाले शख्स की इतनी अपनेपन भरी बातों से बहुत ज्यादा प्रभावित थे.

एक लड़के सुंदर ने आगे आते हुए कहा, ‘‘आनंद अंकल, हम आप से वादा करते हैं कि आगे से सावधान रहेंगे और किसी भी दुर्घटना की नौबत नहीं आने देंगे.’’

सुधीर ने भी भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘अंकल, आज होली के नाम पर न तो कोई गंदे गाने गाएगा और न ही गंदी हरकत करेगा.’’

और सच में ही उस शाम के होलिका दहन को बड़ी सादगी से मनाया गया.

आनंद ने सभी को होली की मिठाई खिलाई. उस के बाद वह अपने चाचा के साथ घर लौट आया.

चैत्र पूर्णिमा की रात थी. दालान में चारपाई पर लेटे आनंद को चांदनी में नहाई रात काफी अच्छी लग रही थी. नींद की गहराई में धीरेधीरे उतरते हुए भी आनंद के कानों में होली के गीत सुनाई पड़ रहे थे.

अचानक ही तभी कुत्तों के भूंकने की आवाजों को बीच गांव के लोगों की घबराहट भरी आवाजों का शोर जोर पकड़ता हुआ सुनाई पड़ा.

‘‘मालिक, गोलीबंदूक के साथ बसहा गांव वाले फसल लगे खेतों की सीमा पर आ कर लड़नेमरने को तैयार खड़े हैं,’’ दीनू को अपने चाचा से यह कहते हुए सुन कर चौंकता हुआ आनंद झटके से उठ बैठा.

आनंद ने अपने मोबाइल फोन से कुछ संबंधित बड़े पुलिस अफसरों से बात करने की कोशिश की.

रास्ते में दीनू ने बताया कि आधी रात के बाद गांव के कुछ अंधविश्वासी लोग देवी मां के मंदिर में जमा हुए थे.

तांत्रिक इच्छा भगत ने पहले देवी मूर्ति की लाल उड़हुल के फूलों, रोली, अबीरगुलाल से पूजा की थी, उस के बाद एक तगड़ा काला कुत्ता भैरों के रूप में वहां लाया गया.

वहां जुटे लोगों ने खुद शराब पीने के साथसाथ उस कुत्ते को भी शराब पिलाई और फूलमाला से पूजा की गई.

नए साल में अपने गांव की खुशहाली और पुराने साल आई मुसीबतों को हमेशा के लिए भगाने के लिए उन्होंने करायल, अरंडी का तेल, पीली सरसों, लाल मिर्च, सिंदूर, चावल वगैरह को एक छोटे मिट्टी के बरतन में ढक कर भैरों कहे जाने वाले कुत्ते की गरदन में बांध दिया.

तांत्रिक इच्छा भगत ने मंदिर से एक जलता हुआ दीया उठा कर कुत्ते की गरदन में सामान समेत बंधे मिट्टी के बरतन में सावधानीपूर्वक रख दिया. फिर दीए की गरमी से परेशान कुत्ता भूंकता हुआ बसहा गांव की तरफ दौड़ पड़ा.

इच्छा भगत और कुछ लोग इस बात को पक्का करना चाहते थे कि वह कुत्ता वापस उन के अपने गांव में न लौटे.

उधर खेतों की रखवाली कर रहे बसहा गांव के कुछ किसानों ने दूसरे छोर पर आग की लपटों के साथ कुत्ते की गुर्राहट भरी आवाज सुनी. कुछ ही देर में पकने को तैयार गेहूं की फसल लपटों में झालसने लगी थी.

रखवाली कर रहे किसानों को पूरा माजरा समझाने में ज्यादा समय नहीं लगा. उन्होंने दौड़ कर तमाम गांव वालों को बुला लिया. ट्यूबवैल चला कर पानी से आग बुझाने के साथसाथ कुछ लोग गोलीबंदूक के साथ इस घटना के पीछे रहे करमना गांव को सबक सिखाने को ललकारने लगे थे. हवा में गोलियों की आवाजें गूंजने लगी थीं.

इस से पहले कि करमना गांव के कुछ अंधविश्वासी और नासमझ तत्त्वों की शरारत के कारण पड़ोसी गांव वालों की होली की खुशी खूनखराबे और मातम की भेंट चढ़ जाती, आनंद अपने साथ जिला मजिस्ट्रेट और एसपी की टीम मौके पर ले कर पहुंच गया. उस ने गुस्साए लोगों को समझाबुझा कर शांत किया.

अंधविश्वास में ‘भैरव टोटका’ करने वाले इच्छा भगत व दूसरे लोगों को पुलिस पकड़ कर वहां थोड़ी ही देर में पहुंच गई.

आनंद के कहने पर उन लोगों ने बसहा गांव के लोगों से अपने गलत अंधविश्वास के चलते किए गए काम के लिए माफी मांगी.

‘‘हम आप के पैर पकड़ते हैं भैया, हमें माफ कर दीजिए. हम शपथ लेते हैं कि आगे से नासमझ और अंधविश्वास से भरा कोई काम नहीं करेंगे.’’

तब तक आग बुझाने के लिए फायर ब्रिगेड की टीम भी वहां आ चुकी थी.

तेजी से किए गए बचाव काम से आग को ज्यादा फैलने के पहले ही बुझाने में कामयाबी मिल गई थी.

आनंद ने गांव वालों की ओर से हुई गलती के लिए माफी मांगते हुए कहा, ‘‘रघुवीर, मैं तुम्हारे जज्बात को अच्छी तरह समझ सकता हूं… अपनी जिस फसल को खूनपसीना बहा कर तुम ने तैयार किया है, उस के खेत में इस तरह जल जाने के चलते हुए दिल के घाव को भरना किसी के लिए मुमकिन नहीं है. फिर भी करमना गांव के लोगों की ओर से मैं खुद जिम्मेदारी लेता हूं कि तुम्हें जो भी नुकसान हुआ है, उसे हमारे द्वारा कल ही पूरा किया जाएगा.’’

अपने खेत की तैयार फसल के जलने से नाराज रघुवीर कुसूरवारों को सबक सिखाने पर आमादा था, पर अपने स्कूल के दिनों में सही बात से आगे बढ़़ने की प्रेरणा देने वाले आदित्य गुरुजी जैसे आनंद के रूप में अभी वहां आ खड़े हो गए थे, इसलिए वह अपने गुस्से पर काबू कर गया.

रघुवीर आनंद के पैरों पर झाकता हुआ बोला, ‘‘माफ करें सर. आप की हर बात मेरे सिरआंखों पर.’’

आनंद ने रघुवीर को गले लगाते हुए कहा, ‘‘उठो रघुवीर, अब बसहापुर गांव और करमना गांव आपस में

मिल कर एकदूसरे की मुसीबतों को मिटाते हुए खुशियां लाने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे. तुम बिलकुल चिंता मत करो.

‘‘इस बार गांव के स्कूल वाले मैदान में करमना और बसहा दोनों गांव मिल कर एकसाथ होली मनाएंगे.’’

वहां जमा दोनों गांवों के लोगों के चेहरे पर खुशी की लाली चमक उठी. ‘हांहां’ के साथ ‘होली है होली है’ की आवाजें चिडि़यों की चहचहाहट भरे माहौल में गूंज उठीं.

उसी समय गांव के पूर्वी आकाश में सूरज एक लाल कमल की तरह खिलता नजर आ रहा था. Story In Hindi

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