Hindi Romantic Story: प्यार का नशा

Hindi Romantic Story: गीता का ब्याह तो रामशरण से हुआ था, लेकिन वह उसे नहीं चाहती थी. उस का दिल तो अपने पुराने आशिक सुखराम से लगा हुआ था.

शादी के पहले ही संगीता उसे अपना सबकुछ दे बैठी थी. शादी तो घर वालों ने उस की पसंद पूछे बिना ही रामशरण से कर दी थी. उस ने भी घर वालों को अपनी पसंद नहीं बताई थी.

रामशरण चौकीदार था. उस की अकसर नाइट ड्यूटी रहा करती थी. वह सीधासादा आदमी था. रात को 8 बजे टिफिन ले कर घर से निकलता, तो सुबह 8 बजे ही लौटता.

संगीता रात को घर में अकेली रहती. रात को देर तक वह अपने आशिक सुखराम से मोबाइल पर बातें करती थी. वीडियो काल कर के भी अपना हालेदिल बयां करती थी.

आशिक सुखराम संगीता के मायके वाले गांव में रहता था. कभीकभार वह संगीता से मिलने आया करता था.

वह पूरी रात वहीं गुजारता, ऐश करता और सुबह चला जाता.

ऐसा कई महीने तक चलता रहा.

संगीता के पड़ोसियों में सुखराम को ले कर खुसुरफुसुर हुआ करती थी. कोई पूछता, तो संगीता कह देती, ‘‘मेरे सुक्खू भैया हैं, कभीकभार मिलने आ जाते हैं.’’

पड़ोसी इतने नादान नहीं थे. उन्हें शक हो गया था कि चुपचाप रात को आने वाला भैया नहीं, बल्कि सैयां है. कई औरतें इस बारे में खूब रस लेले कर बातें किया करती थीं.

बूढ़ी सुखिया काकी कहती थीं, ‘‘बेचारा रामशरण कमातेकमाते मर रहा है और इधर यह छैलछबीली औरत पराए मर्द के साथ पाप कर रही है. नरक में जाएगी, नरक में. कहे देती हूं कि एक दिन भुगतेगी.

‘‘मैं ने दुनिया देखी है. पराया मर्द किसी का सगा हुआ है क्या… रस ले कर छोड़ देगा. आजकल तो लोग हत्या भी कर देते हैं. कोई बताओ रे, बेचारा रामशरण इस पापलीला से अनजान है अभी तक.’’

जब रामशरण से किसी ने कुछ नहीं बताया, तो एक दिन सुबह सुखिया काकी ने ही हिम्मत दिखाई. उन्होंने काम से लौट रहे रामशरण को अपने घर के पास रोक लिया और पूछा, ‘‘आ गए बेटा…’’

‘‘हां काकी, कैसी हो?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं बेटा, तुम अपनी सुनाओ. खड़ी कर दो साइकिल, आओ बैठ जाओ थोड़ा सुस्ता लो.’’

रामशरण जा कर सुखिया काकी के घर में बैठ गया.

‘‘कल रात को तुम्हारा साला आया था. तुम से मुलाकात हुई कि नहीं? वह अकसर रात को आता है,’’ सुखिया काकी ने बताया.

‘‘मु झे कुछ नहीं पता काकी. मेरा कोई साला नहीं है. मेरी पत्नी संगीता अपने मातापिता की एकलौती औलाद है. मैं उस से पूछूंगा कि कौन आता है,’’ रामशरण को शक हुआ.

‘‘लेकिन बेटा, मेरा नाम मत लेना. मु झे तो लगता है कि तुम्हारे साथ धोखा हो रहा है. बुरा मत मानना, लेकिन मुझे तुम्हारी औरत का चालचलन ठीक नहीं लगता.’’

रामशरण घर गया. पहले तो उस के मन में आया कि वह संगीता से पूछे कि कौन आता है, लेकिन बाद में उस ने सोचा कि वह खुद ही पकड़ेगा, पूछताछ करना ठीक नहीं होगा.

उसी दिन रामशरण ने महल्ले के एक लड़के से बात की, ‘‘राजू, मेरे घर की देखभाल किया कर. पता चला है कि कोई आता है.’’

‘‘आप को आज पता चला है, वह तो कई महीने से आ रहा है. चाची कहती हैं कि वह उन का भैया है. अब वह दिखाई पड़ गया, तो आप को फोन करूंगा.

‘‘आप खुद ही पूछ लेना कि वह कौन है. कोई गलत आदमी होगा, तो उस की कुटाई की जाएगी तबीयत से,’’ राजू बोला.

समय गुजरता गया. एक रात रामशरण का फोन बज उठा. उस ने देखा कि राजू का फोन है. उस ने कहा, ‘‘हां, राजू बोल, क्या बात है?’’

‘चाचा, कुछ देर पहले ही वह आदमी आप के घर आया है. आ जाओ जल्दी से.’

‘‘ठीक है बेटा, आता हूं.’’

कुछ देर में रामशरण घर पहुंच गया और उस ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘कौन है?’’ अंदर से संगीता की आवाज आई.

‘‘मैं हूं, दरवाजा खोलो,’’ रामशरण बोला.

यह सुन कर संगीता घबरा गई.

उस ने सुखराम को जल्दी से पलंग के नीचे छिपाया और फिर जा कर दरवाजा खोला.

‘‘आज रात को ही कैसे आ गए?’’ संगीता ने पूछा.

‘‘ब्लड प्रैशर की दवा भूल गया था. वही लेने आया हूं.’’

‘‘रुको, मैं ला देती हूं.’’

‘‘नहीं, रहने दो. मैं दवा यहीं खाऊंगा,’’ यह कह कर रामशरण अंदर चला गया.

संगीता दवा और पानी लेने चली गई. इधर रामशरण ने तंबाकू रगड़ना शुरू कर दिया.

‘‘यह क्या? आए हो दवा खाने और तंबाकू खाने लगे. तंबाकू खाते हो, इसीलिए ब्लड प्रैशर बढ़ता है.
फेंको तंबाकू और दवा खाओ,’’ संगीता बोली.

लेकिन रामशरण तंबाकू रगड़ता ही रहा. तंबाकू तेज था. उस ने तंबाकू हथेली पर जोर से ठोंका, तो उस की झार से पलंग के नीचे छिपे सुखराम को खांसी आ गई. अब तो संगीता को काटो तो खून नहीं. वह बुरी तरह घबरा गई.

‘‘कौन हो भाई? कहां छिपे हो? सामने आओ,’’ रामशरण ने कहा.

जब सुखराम नहीं निकला, तो रामशरण ने उसे खींच कर निकाला और पूछा, ‘‘कब से यह खेल चल रहा है?’’

घबराहट के मारे सुखराम कुछ बोल नहीं सका.

‘‘घबराओ नहीं, बोलो… मैं मारपीट नहीं करूंगा भाई,’’ रामशरण बोला.

फिर भी सुखराम कुछ नहीं बोल पाया.

‘‘यह बेचारा नहीं बोल पा रहा है, तो तुम ही बता दो मेरी जान,’’ रामशरण ने संगीता की ओर देख कर कहा.

‘‘पूछ ही रहे हो तो सबकुछ सचसच बता देती हूं. यह मेरा प्रेमी है. मैं इसे ही पसंद करती हूं. इस के बिना जी नहीं सकती,’’ संगीता बोली.

‘‘ठीक है, लेकिन मुझ से शादी क्यों की? मु झे पहले ही बता दिया होता. मैं बिलकुल तुम से शादी न करता. लेकिन अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है.

तुम इस से शादी कर लो,’’ रामशरण ने कहा.

उसी बीच सुखराम भाग खड़ा हुआ.

बाहर राजू डंडा लिए खड़ा था. उस ने सुखराम को पकड़ लिया और पिटाई शुरू कर दी. शोर सुन कर महल्ले के तमाम लोग आ गए वहां. कुछ और लोग भी सुखराम की धुनाई करने लगे.

रामशरण ने बाहर निकल कर उन लोगों को मना किया और कहा, ‘‘इसे जाने दो.’’

राजू ने कहा, ‘‘किस मिट्टी के बने हो चाचा? हमें इसे कूटने दो.’’

‘‘नहीं, जाने दो, मत मारो,’’ रामशरण शांत भाव से बोला.

लोगों ने सुखराम को छोड़ दिया. वह जान बचा कर भागा.

लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. ज्यादातर लोग रामशरण की हंसी उड़ा रहे थे. उसे डरपोक और नामर्द कह रहे थे. उन का कहना था कि पकड़े गए आदमी को खूब कूट कर पुलिस के हवाले करना था.

रामशरण अगले ही दिन संगीता को ले कर उस के मायके गया और उस के मातापिता से सारा हाल कह सुनाया. इतना ही नहीं, उस ने पंचायत बैठा दी और कहा, ‘‘मैं संगीता की शादी सुखराम से करा देना चाहता हूं. इस से मेरी नहीं निभेगी. उसे बुलाया जाए.’’

पता लगाया गया तो सुखराम घर में मिल गया. कुछ लोग उसे पंचायत में खींच लाए.

मुखिया गजाधर काका ने सुखराम से पूछा, ‘‘क्या तुम संगीता से ब्याह करोगे?’’

‘‘मैं क्यों ब्याह करूं… मेरे जैसे इस के कई यार होंगे. बुलाती थी तो चला जाता था. जब यह अपने पति की नहीं हुई, तो मेरी क्या होगी? यह तो मु झ से अपने पति को मरवाने की बात कहती थी. अच्छा हुआ कि मैं हत्या के पाप से बच गया,’’ सुखराम बोला.

सुखराम की यह बात सुन कर पंचायत सन्न रह गई.

रामशरण ने कहा, ‘‘अब मैं कुछ नहीं कर सकता. मैं तो दोनों की शादी कराने आया था. अब मैं इस औरत को नहीं रख सकता. मेरी कोई गलती हो तो आप लोग बताएं.’’

मुखिया ने कहा, ‘‘तुम ठीक कह रहे हो. तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. यह झूठे प्यारवार का चक्कर ही बहुत खराब है. यह हमारे देश में, समाज में तेजी से बढ़ रहा है. इस के चलते हत्याएं हो रही हैं.

‘‘समाज को जागना होगा, वरना बच्चों की इसी तरह जिंदगी बरबाद होगी. मैं बहुत चिंतित हूं. यह समस्या कैसे दूर होगी? क्या हमारे लड़केलड़कियां इसी तरह नाक कटाएंगे?’’

संगीता बहुत रोईगिड़गिड़ाई, लेकिन रामशरण उसे अपने साथ नहीं ले गया.

संगीता अपने मायके में रह कर मेहनतमजदूरी करने लगी. वह पछता रही थी कि अगर नाजायज प्यार में न पड़ती, तो उस की जिंदगी तबाह न होती. Hindi Romantic Story

Best Hindi Story: बचाने वाला महान

Best Hindi Story: दलित गर्लफ्रैंड को बाइक से 500 मीटर घसीटा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले में एक नौजवान ने अपनी प्रेमिका को बाइक से तकरीबन 500 मीटर तक सड़क पर घसीट दिया. इस दौरान वह लड़की चीखतीचिल्लाती रही, लेकिन आरोपी प्रेमी ने उसे नहीं छोड़ा. घसीटने की वजह लड़की के आधे से ज्यादा कपड़े फट गए. हालांकि, लड़की की आवाज सुन कर कुछ गांव वाले मदद के लिए दौड़े, तो हड़बड़ाहट में आरोपियों की बाइक फिसल कर गिर गई. इस के बाद वे दोनों आरोपी पैदल भाग निकले. लड़का ओबीसी समाज का और लड़की दलित समाज की बताई गई. उन दोनों में इश्कबाजी का मामला था और इसी चक्कर में उन के बीच झगड़ा हो गया था. जाति प्यार पर हावी हो गई थी.

पंच मेलाराम की नजरें काफी दिनों से अपने घर के साथ चौराहे पर नुक्कड़ वाली जगह पर लगी हुई थीं. वहां पर गरीब हरिया की विधवा बहू गुलाबो मिट्टी की कच्ची झोंपड़ी में बच्चों के लिए टौफीबिसकुट, पैनपैंसिलों, कौपियों वगैरह की दुकान चलाती थी.

पंच मेलाराम नुक्कड़ वाली वह जगह हरिया से खरीदना चाहता था. दरअसल, उस का म झला बेटा निकम्मा व आवारा था, इसलिए मेलाराम गुलाबो की दुकान की जगह पर अपने उस बेटे को शराब की दुकान खोल कर देना चाहता था.

विधवा गुलाबो के घर में अपाहिज सास व 2 बेटियों के अलावा बूढ़ा शराबी ससुर हरिया भी था, जो दो घूंट शराब पीने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था.

पंच मेलाराम ने हरिया को शीशे में उतार लिया था. उसे हर रोज खूब देशी दारू पिला रहा था, ताकि नुक्कड़ वाली जगह उसे मिल जाए.

वह जगह हरिया के नाम नहीं थी. मकान की मालकिन पहले हरिया की अपाहिज पत्नी संतरा थी. बेटे नरपाल की शादी हो गई, तो बहू गुलाबो आ गई.

गुलाबो बेहद मेहनती, गुणवान, अच्छे चरित्र की औरत थी. वह अपनी सास की प्यारी बहू बन गई थी.

नरपाल भी बाप की तरह शराबी था. कभीकभी जंगल में जंगली जानवरों का शिकार कर के मांस बेच कर वह कुछ पैसे कमाता था.

सास ने मकान बहू गुलाबो के नाम कर दिया था. उसे यकीन था कि मकान बहू के नाम होगा तो बचा रहेगा, नहीं तो बापबेटा शराब के लालच में उसे बेच खाएंगे.

नरपाल एक दिन घने जंगल में जंगली जानवर का शिकार करने गया और वापस नहीं आया. 4 दिन बाद तलाश करने पर नरपाल के कपड़े मिले.

कपड़े मिलने का सब ने यही मतलब लगाया कि कोई जंगली जानवर उसे खा गया है. अब वह दुनिया में नहीं रहा.

बेचारी गुलाबो जवानी में विधवा हो गई. जवान होती बेटियों और अपाहिज सास की जिम्मेदारी उस पर आ गई थी.

एक दिन शाम के समय हरिया ने बहू से कहा कि अगर दुकान वाली जगह मेलाराम को बेच दी जाए, तो अच्छे पैसे मिल जाएंगे. अपने रहने वाले दोनों कच्चे मिट्टी के बने कमरे पक्के हो जाएंगे. खर्चे के लिए पैसा बच जाएगा.

‘‘पिताजी, दुकान वाली जगह बेच दी, तो घर का चूल्हा नहीं जलेगा. कच्चे मकान में रहा जा सकता है, पर भूखे पेट जिंदा रहना मुश्किल है. जगह बेच कर पैसा कितने दिन चलेगा?’’ गुलाबो ने दूर की बात सोचते हुए कहा, तो हरिया कुछ देर के लिए चुप हो गया.

दुकान के बाहर पंच मेलाराम खड़ा ससुरबहू की बातें सुन रहा था. वह भीतर आ गया और गुलाबो की भरीपूरी छाती पर नजरें टिकाते हुए चापलूसी भरे लहजे में बोला, ‘‘देखो हरिया, तुम्हारी बहू विधवा हो गई तो क्या हुआ, हमारे गांव की इज्जत है. शाम होते ही यहां चौक में कितने आवारा किस्म के लोग खड़े हो कर बेहूदा इशारे करते हैं.’’

‘‘यही बात तो मैं इसे सम झा रहा हूं. नुक्कड़ वाली जगह बेच कर जो पैसा मिलेगा, उस से पक्का मकान बनवा लेंगे. कुछ पैसा जरूरत के लिए बच भी जाएगा. आगे की आगे देखी जाएगी. मेरी दोनों पोतियां बड़ी हो रही हैं. सभी मिल कर काम करेंगे, तो हमारे बुरे दिन गुजर जाएंगे,’’ हरिया ने अपनी बात कही.

‘‘पिताजी, जगह बेचने का पैसा तो सालभर का खर्चा नहीं चला पाएगा. दोनों बेटियां जवान हो रही हैं. इन की शादियां भी करनी हैं. सासू मां भी दूसरों की मुहताज हैं,’’ गुलाबो ने कहा.

गुलाबो की बात पर मेलाराम हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘गुलाबो, तू अपने रोजगार की चिंता मत कर. मैं सरकारी स्टांप पेपर पर लिख कर दूंगा. तुम्हारी दुकान पर मैं शराब की दुकान खोलूंगा. महीनेभर मैं कम से कम 10-12 लाख रुपए की आमदनी होगी. उस कमाई में से 25 फीसदी हिस्सा तुम्हारा होगा. महीने के महीने तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जाएगा.’’

‘‘वह तो बाद की बात है काका. काम चलने में सालभर लग जाएगा. इस से पहले हम खाएंगे क्या?’’

‘‘उस की चिंता मत कर गुलाबो. तुम हमारे खेतों में काम करो. 5 हजार रुपए हर महीना दूंगा. जब हमारी शराब की दुकान चल पड़ेगी, तुम काम छोड़ देना. लाखों रुपए तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिला करेगा. देखना मौज करोगी,’’ कहते हुए मेलाराम ने 5 हजार रुपए उस के सामने लहरा दिए.

‘‘रुपए रख लो बहू. 5 हजार रुपए हर महीने मिलेंगे. जब हमारी दुकान में दारू का कारोबार चल निकलेगा, तो तुम्हारा हिस्सा लाखों में मिलेगा. तब खेतों में काम करना छोड़ देना,’’ ससुर हरिया ने हरेहरे नोटों को ललचाई नजरों से देखते हुए कहा.

इधर गुलाबो भी सोच में पड़ गई. वह छोटी सी दुकान में हर महीने मुश्किल से हजारबारह सौ रुपए ही कमा पाती थी. इसी मामूली से काम में उस का सारा दिन खत्म हो जाता था.

अगर मेलाराम के खेतों में काम करने से 5 हजार रुपए महीना मिल जाए, तो 2 हजार रुपए में घर का खर्चा चला कर वह 3 हजार रुपए बचा सकती है. इस तरह 2-3 साल काम करेगी, तो अपनी दुकान की जगह बेचे बगैर ही वह अपने दोनों कमरे पक्के बनवा सकती है.

अभी गुलाबो सोच ही रही थी कि मेलाराम ने 5 हजार रुपए गुलाबो के सामने रख दिए. जब उस ने दूसरे दिन काम पर आने को कहा, तो गुलाबो ने गंभीर लहजे में अपने मन की बात कही, ‘‘ठीक है काका, आप के खेतों में काम जरूर करूंगी, मगर मैं अपनी सास और पति की निशानी अपने मकान का एक कोना तक नहीं बेचूंगी. पहले ही कहे देती हूं.’’

‘‘अरे हरिया, तू अपनी बहू को ठंडे दिमाग से सम झाना. मैं जो भी काम करूंगा, उस में तुम्हारा भी फायदा होगा,’’ कहते हुए मेलाराम चला गया.

‘‘बहू सारे रुपए संभाल ले. कल से काम पर जाना शुरू कर दे. तुम्हारी दुकान पर मैं काम कर लूंगा. बूढ़ा आदमी हूं, बैठा रहूंगा,’’ हरिया ने आगे की योजना बनाते हुए कहा.

रुपए ले कर गुलाबो सास के पास गई और सारी बात बताई, तो सास ने नुक्कड़ वाली दुकान की जगह बेचने से साफ मना कर दिया. वह बहू के मेलाराम के खेतों में काम करने के पक्ष में नहीं थी, मगर उसे अपनी बहू पर यकीन था.

गुलाबो को काम करते हुए महीनेभर से ऊपर हो गया था. दूसरे महीने का पैसा भी मेलाराम ने दिया नहीं था. शाम को जाते समय गुलाबो ने पैसे मांगे, तो मेलाराम ने उसे रुकने को कहा. उस के साथ काम करने वाली दूसरी औरतें जा चुकी थीं.

दरअसल, मेलाराम ने खेत पर भी मकान बना रखा था. वह उस में खेतों की रखवाली करने या फसल में रात को पानी देने के लिए रुकता था.

शाम हो चली थी. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. गुलाबो को लगा कि अगर ज्यादा देर हो गई, तो अकेले गांव जाना मुश्किल होगा.

मेलाराम अपने कमरे में था. वह काफी समय से बाहर निकल नहीं रहा था. गुलाबो परेशान हो कर कमरे में घुस गई. महीने का पैसा मांगा, तो मेलाराम ने झपट कर उसे अपनी बांहों में कस लिया और उस की साड़ी खोलने लगा.

गुलाबो ने मेलाराम को अपने से दूर कर उसे उस की बूढ़ी उम्र का एहसास कराना चाहा, ‘‘यह क्या पागलपन है? तुम मेरे बाप की उम्र के हो. ऐसी घिनौनी हरकत तुम्हें शोभा नहीं देती.’’

तभी बाहर से गुलाबो की 12 साला बेटी उसे तलाश करती हुई वहां आ गई. उस ने अपनी मां से छेड़छाड़ करते मेलाराम को पीछे से काट खाया, तो वह गाली बकते हुए बुरी तरह बिदक गया.

मेलाराम ने मासूम बच्ची को जोर से धक्का दिया. वह दीवार से जा टकराई. उस के सिर से खून बह निकला. चोट लगने से वह बेहोश हो गई.

गुस्से में मेलाराम दूसरे कमरे से तलवार उठा लाया, जो उस ने पहले से छिपा कर रखी थी. वह दहाड़ते हुए बोला, ‘‘देख गुलाबो, अगर तू अपनी जवानी का खजाना मु झ पर नहीं लुटाएगी, तो मैं तेरी हत्या कर के तेरी जवान होती बेटी की इज्जत लूट लूंगा.’’

‘‘बेटी के साथ मुंह काला मत करना. हम मांबेटी तो पहले ही मुसीबत की मारी हैं,’’ बेचारी गुलाबो अपनी हालत पर सिसक उठी.

मेलाराम के हाथ में चमकती तलवार देख कर वह घबरा उठी थी. अगर उस की हत्या हो गई, तो उस की बेटी को बचाने कौन आएगा?

‘‘ठीक है. अगर अपनी जवान होती बेटी की आबरू बचाना चाहती है, तो तू पहले सफेद कागज पर लिख कि अपनी नुक्कड़ वाली दुकान मु झे बेच रही है. साथ ही, जिस्म से सारे कपड़े उतार दे.

‘‘बूढ़ा आदमी हूं, थोड़ेबहुत मजे लूटूंगा. तेरी बेटी को तेरे साथ हिफाजत से घर छोड़ आऊंगा. तेरा महीने का पैसा इस शर्त पर दूंगा कि हर शाम मेरी इच्छा पूरी कर के जाया करेगी.’’

‘‘कमीने, अपने घर की एक इंच जगह नहीं बेचूंगी. तेरी यह इच्छा कभी पूरी नहीं होगी,’’ गुलाबो नफरत से गरजी.

‘‘ठीक है, तू ऐसे नहीं मानेगी. पहले तेरी बेटी का गला धड़ से अलग करता हूं,’’ गुर्राते हुए उस ने चमकती तलवार उस की बेटी की गरदन पर रख दी.

ऐसा दिल दहला देने वाला नजारा देख कर गुलाबो कांप उठी. वह नीच गांव से दूर खेतों में मांबेटी की हत्या कर के लाशें दबा देगा. कोई पूछेगा नहीं. उन दोनों का खात्मा हो जाएगा. उस का पति जिंदा नहीं है. ससुर शराबी है. अपाहिज सास भीख मांगती फिरेगी.

अभी गुलाबो सोच में उल झी थी कि मेलाराम फिर गरजा, ‘‘अरे, सोच क्या रही है? जल्दी से सादा कागज पर अपना नाम लिख. अपने सुलगतेमचलते जिस्म से कपड़े उतार, नहीं तो तेरी बेटी का खात्मा हो गया, समझ ले.’’

मजबूर गुलाबो ने सामने पड़े कागज पर दस्तखत कर अपना बदन मेलाराम को सौंप दिया.

गुलाबो का मादक बदन मेलाराम के दिलोदिमाग में वासना का तूफान जगाने लगा था.

मेलाराम ने जवानी में ऐसा मचलता हुस्न नहीं देखा था. वह अभी आगे बढ़ता कि बाहर से आती कुछ आवाजें सुन कर चौंक उठा. आवाजें उस के मकान के नजदीक से आ रही थीं.

गुलाबो ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए, तभी उस की छोटी बेटी हांफती हुई आई और मां से लिपटते हुए बोली, ‘‘मां… मां, बाहर देखो, पापा आ रहे हैं. अपने साथ पुलिस को भी ला रहे हैं.’’

‘‘यह तू क्या कह रही है गुडि़या? तेरे पापा को तो जंगली जानवर…’’ गुलाबो इतना कह पाई थी कि आंधीतूफान की तरह गुस्से की आग में सुलगता हुआ उस का पति नरपाल वहां आ पहुंचा.

उस ने मेलाराम को देखते ही दबोच लिया और उसे इतना मारा कि उस के दोनों हाथ टूट गए और एक आंख फूट गई. अगर पुलिस वाले नहीं बचाते, तो नरपाल मेलाराम को मार ही डालता.

हैरानी में डूबी गुलाबो ने नरपाल से पूछा, ‘‘तुम्हें तो जंगली जानवर…’’

‘‘नहीं…नहीं, मु झे जंगली जानवर क्या खाएंगे, मु झे तो मेलाराम और इस के दोनों बेटों ने जंगल में पकड़ लिया था. मैं नशे में था. ये तीनों हमारा मकान हड़पना चाहते थे.

‘‘मना करने पर इन लोगों ने मु झे बुरी तरह मारापीटा और बेहोशी की हालत में नंगा कर के नदी में बहा दिया. इन का अंदाजा था कि लोग सम झेंगे कि मु झे जंगली जानवर खा गए.’’

नरपाल की बात सुन कर तो गुलाबो ने वह कागज फाड़ डाला, जिस पर मेलाराम ने उस से दस्तखत कराए थे.

गुलाबो आगे बढ़ कर नरपाल से लिपट गई.

‘‘ऐसा हादसा तुम्हारे शराब पीने की आदत के चलते हुए था. पंच मेलाराम हमारे मकान की नुक्कड़ वाली जगह पर शराब की दुकान खोलना चाहता था,’’ गुलाबो ने पति की शराब पीने की आदत पर अपना विरोध जताया.

‘‘गुलाबो, नशा समाज के लिए अभिशाप है. मैं इस का बुरा नतीजा भुगत चुका हूं. अगर एक भला आदमी मुझे बेहोशी की हालत में बहती नदी से न बचाता, तो मेरी बेटी और पत्नी के साथ पता नहीं क्या हो जाता.

‘‘अब मैं न शराब पीऊंगा और न ही शराब की दुकान खुलेगी. अब ये शैतान जेल जाएंगे,’’ नरपाल ने इतना कहा, तो गुलाबो पति की बांहों में समा गई. Best Hindi Story

Story In Hindi: पुराना खाता

Story In Hindi: मंथन की एक राशन की दुकान थी. यह दुकान महल्ले में ही थी, जिस से अगलबगल के लोग सामान खरीद कर ले जाते थे.

मंथन की यह दुकान बहुत पुरानी थी. उस के दादापरदादा के समय की, जिस में पुरानी काठ की लकडि़यों का फर्नीचर था. हर साल दीवाली पर पेंट होने से दुकान अच्छी कंडीशन में थी.

जब से मंथन ने दुकान संभाली थी, तब से वह ग्राहकों पर खास ध्यान देने लगा था. वह सब ग्राहकों से मुसकरा कर बातें करता था. उस के बात करने के तरीके में एक तरह का अपनापन था. लिहाजा, सबकुछ ठीकठाक चल रहा था.

मंथन के पिताजी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब रहने लगी थी. लिहाजा, ज्यादातर मंथन ही दुकान पर बैठता था. एक दिन की बात है. खुशबू, जो रजत की बहन थी, सामान लेने मंथन की दुकान पर गई.

मंथन की कदकाठी बढि़या और चेहरा बहुत ही खूबसूरत था. गोरा रंग, घुंघराले बाल, लंबी नाक, चौड़ी छाती. टीशर्ट और लोअर में भी वह काफी फब रहा था.

रजत के पिताजी अजय बाबू पहले घर का राशनपानी लेने मंथन के यहां जाते थे, लेकिन इधर अब वे भी बीमार रहने लगे थे. रजत को औफिस के कामों से ही समय नहीं मिल पाता था, तो वह भला राशनपानी कैसे ला पाता.

रजत की नईनई शादी हुई थी, लिहाजा, वे लोग नईनवेली बहू को घर से बाहर भेजना ठीक नहीं सम झते थे. सौदा लाने के लिए अब खुशबू ही मंथन की दुकान पर आनेजाने लगी थी.

उस दिन जब खुशबू ने मंथन को देखा, तो देखती ही रह गई. सामान ले कर वह कब की घर पहुंच चुकी थी, लेकिन उस का मन घर में नहीं लग रहा था. बारबार उस का ध्यान मंथन की पर्सनैलिटी को देख कर री झा जा रहा था.

खुशबू की एक सहेली थी, जो उस के घर के बगल में ही रहती थी. उस का नाम सलोनी था. सलोनी और खुशबू हमउम्र होने के साथसाथ पक्की सहेलियां भी थीं.

खुशबू अपने दिल की सारी बातें सलोनी को और सलोनी अपने दिल की सारी बातें खुशबू को बताती थी. दोनों का दिल एकदूसरे के बिना नहीं लगता था.

उसी दिन शाम को खुशबू ने अपने दिल की बात सलोनी को बताई, ‘‘सलोनी, मैं तु झे एक बात बताना चाहती हूं. पता नहीं यह कहना ठीक रहेगा भी या नहीं. कैसे कहूं, मु झे बहुत शर्म आती है.’’

‘‘अरे, दोस्तों से कैसी शर्म. दोस्ती ही एक ऐसा रिश्ता है, जिस में लोग अपने दिल की हर बात बता देते हैं. अब बोल भी दे…’’ सलोनी ढलते सूरज को देखते हुए बोली.

‘‘तुम मंथन को जानती हो…’’

‘‘हां, हमारे महल्ले में राशन की दुकान वाला…’’

‘‘हां, वही,’’ खुशबू बोली.

‘‘अरे यार, उसे कौन नहीं जानता… महल्ले की सब लड़कियां उस पर मरती हैं. वे रीता भाभी हैं न… उन का चक्कर मंथन से सालभर पहले से चल रहा था.

‘‘रीता भाभी के पति को जब रीता और मंथन के अफेयर की खबर सुनाई पड़ी, तो उन्होंने रीता भाभी की जम कर पिटाई कर दी थी और राशन लेने के लिए खुद जाने लगे थे.

‘‘और वह गुडि़या, जो मंथन के किराएदार की बेटी थी, के साथ भी मंथन का चक्कर चल रहा था. मंथन है ही इतना खूबसूरत कि उस पर किसी का भी दिल आ जाए.

‘‘हमारे महल्ले की सब औरतों में चर्चा है कि मंथन को जो भी औरत या लड़की देखती है, तो वह उस की हो कर रह जाती है. सब को लगता है कि मंथन का किसी न किसी से चक्कर चल रहा है.

‘‘मंथन का तो पड़ोस की शालू से भी अफेयर था. पता नहीं क्या हुआ होगा. शालू और मंथन के बारे में तो महल्ले की लड़कियां 2 साल पहले चर्चा कर रही थीं.’’

‘‘यानी मंथन मु झे नहीं मिलेगा,’’ कहते हुए खुशबू का चेहरा उतर गया.

‘‘ऐसा कैसे कह सकती हो,’’ सलोनी ने चुटकी ली.

‘‘अब जब इतने सारे गुण हैं, तो वह मु झ बेशक्ल लड़की को क्यों प्यार करेगा? वह इतना हैंडसम है कि उस को कहने भर की देर है, कोई भी लड़की उस के लिए मरने को तैयार हो जाएगी… मेरी तो किस्मत ही खराब है,’’ खुशबू बोली.

‘‘तू किसी से कमतर क्यों रहने लगी… आज भी जब तू महल्ले से गुजरती है, तो लोगों की आंखें तु झ पर से हट नहीं पातीं. तू कम थोड़ी है. महल्ले के लड़के तो तु झ पर जान छिड़कते हैं. तू एक बार कह कर तो देख, वे तेरे लिए कुछ भी कर सकते हैं,’’ सलोनी ने कहा.

‘‘देख, मु झ से फालतू की बात मत कर. मैं ऐसीवैसी लड़की नहीं हूं, जो हर किसी को अपना दिल देती फिरूं. मैं केवल और केवल मंथन की हूं…’’ खुशबू ने कहा.

शाम कब की रात में ढल चुकी थी. खाना खा कर बिस्तर पर लेटी खुशबू छत को ताकती रही. वह लगातार करवटें बदलती रही, लेकिन नींद आंखों से गायब रही. उसे बारबार सलोनी के बताए लड़कियों के नाम याद आ रहे थे. रीता भाभी, गुडि़या, शालू… उन के पासंग में भी नहीं ठहरती थी वह. सांवला रंग, औसत देह, लेकिन उस की छातियां भरीभरी थीं और उस के कूल्हे भारी थे, जो उस के सांवलेपन में भी चार चांद लगाते थे. फिर पता नहीं कब उसे नींद आ गई.

सुबह खुशबू की नींद देर से खुली. सलोनी कब से आ कर उस के घर पर बैठी थी. कितनी बार आवाज लगाई थी, ‘‘सलोनी, जल्दी करो. जल्दी से तैयार हो जाओ. हम लोग कालेज के लिए लेट हो रहे हैं…’’

खुशबू नहाधो कर कालेज के लिए निकली, लेकिन उस का मन कालेज में भी नहीं लगा. किसी तरह कालेज खत्म कर के वह घर लौटी.

अब खुशबू मंथन की दुकान पर किसी न किसी बहाने जाने लगी. जब उसे सामान की लिस्ट थमाई जाती, तो वह जानबू झ कर कुछ सामान लाती और कुछ सामान छोड़ देती.

मंथन भी खुशबू की आंखों की भाषा को बखूबी सम झ रहा था. एक दिन मौका पा कर वह खुशबू से बोला, ‘‘अच्छा, एक बात बताओ. तुम मु झे देख कर इतना मुसकराती क्यों हो?’’

खुशबू हंसते हुए बोली, ‘‘आप को देख कर कहां मुसकराती हूं. मेरी सूरत ही ऐसी है कि लोगों को मेरा चेहरा मुसकराता हुआ दिखता है. इस में मैं क्या करूं?’’

यह सुन कर मंथन मुसकरा कर रह गया.

एक दिन खुशबू ने 500 रुपए के नोट में छिपा कर एक कागज पर अपना मोबाइल नंबर लिख दिया और घर आ गई, लेकिन उस के दिल में खलबली सी मची हुई थी.

रात को वह सोने के लिए छत पर चली गई और मंथन के फोन का इंतजार करने लगी. रात के तकरीबन 1 बजे उस का मोबाइल वाईब्रेट करने लगा. नया नंबर था. खुशबू का दिल बल्लियों उछलने लगा.

खुशबू ने फोन रिसीव किया. दूसरी तरफ की आवाज को सुनने की गरज से वह धीरे से बोली, ‘‘हैलो…’’

दूसरी तरफ से मंथन की आवाज आई, ‘अभी तक जाग रही हो?’

‘‘हां,’’ वह धीरे से बोली.

‘अब तो चांदतारे सब सो गए और तुम जाग रही हो. भला किस के इंतजार में?’

‘‘कौन सो गया है और कौन जाग रहा है. मैं तो सदियों से नहीं सोई… तुम्हारा इंतजार कर रही हूं इस छत पर,’’ खुशबू बोली.

‘अच्छा, तो तुम भी छत पर सो रही हो, ताकि मु झ से बातें कर सको. कहो तो आ जाऊं तुम्हारे पास? 2-4 छतों का ही तो फासला है,’ मंथन बोला.

‘‘नहीं, मत आना,’’ खुशबू बोली.

‘वैसे, मैं भी आज छत पर सोया हूं,’ मंथन ने बताया.

इस के बाद मंथन और खुशबू में ढेर सारी बातें हुईं. अब तो यह रोज की बात थी. खुशबू और मंथन छत पर ही सोते थे. सोते क्या थे, सोने का बहाना करते थे और प्रेम की पेंगे भरते थे.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक साल पलक झपकते ही बीत गया. अगले साल खुशबू की रिश्ते की बात चलने लगी, पर वह शादी की बात को टालती रहती थी.

इधर शहर में एक बहुत बड़ा शौपिंग मौल खुल गया था. मंथन से कम दाम पर सामान बेचने वाला. शहर के लोग उधर ही भाग रहे थे.

मंथन के पिता अब चल फिर नहीं पाते थे. परिवार की जिम्मेदारी का सारा बो झ अब मंथन के कंधों पर आ गया था. वह ज्यादा तनाव में रहने लगा था.

एक दिन जब मंथन ने सुबह दुकान खोली थी, तब उस की दुकान में बहुत से ग्राहक सामान लेने आए हुए थे. तभी रजत अपने पापा अजय बाबू के साथ मंथन की दुकान पर पहुंचा और उस ने इशारे से मंथन को बताया, ‘‘जैम की शीशी, होरलिक्स का डब्बा और चौकलेट का पैकेट दे दो.’’

मंथन ने चौकलेट का पैकेट, जैम की शीशी और होरलिक्स का पैसा जोड़ कर बिल बनाया.

परची थमाते हुए मंथन बोला, ‘‘रजत बाबू, 700 रुपए हो गए.’’

रजत ने एमआरपी और चीजों के दाम को मिलाया. दाम ठीकठाक ही लगाए गए थे, लेकिन 1-2 सामान में एमआरपी से 2-3 रुपए ही कम निकले.

रजत ने आंखें तरेरते हुए कहा, ‘‘मंथन, तुम ने तो एमआरपी पर ही सब सामान के दाम लगा दिए हैं… जबकि मौल में अभी भारी डिस्काउंट चल रहा है. हम वहीं से सब सामान लेंगे. चलिए पापा…’’

रजत के पापा ये सब बातें बहुत ध्यान से सुन रहे थे. वे बोले, ‘‘मौल तो आज खुला है बेटा, इस से पहले मैं और तुम्हारे दादाजी भी इसी दुकान से सामान खरीदते रहे हैं. तब मंथन के दादाजी दुकान चलाते थे. इन लोगों ने खूब साथ दिया है हमारा. यह रिश्ता एक दिन में नहीं बना है, बल्कि इस को बनने में सालोंसाल लगे हैं.’’

‘‘आप की तरह मैं बेवकूफ नहीं हूं पापा, जो इन से महंगे दाम पर सामान खरीदूं. आखिर हम भी पैसा बहुत मेहनत से कमाते हैं. जब और लोग कंपीटिशन कर रहे हैं, तो इन को भी तो दाम कम करना चाहिए. ये लोग पहले की तरह अब ज्यादा पैसे नहीं ले सकते. अब जमाना बदल गया है,’’ रजत ने कहा.

‘‘रजत बेटा, तुम शायद कोरोना के समय को भूल गए हो. उस समय तुम इसी मंथन के यहां से सामान ले जाते थे. और तुम्हें यह भी पता होना चाहिए कि उस समय तुम्हारे बैंक से तुम्हारी सैलरी नहीं आ रही थी. तब भी हम लोगों को घर बैठे सामान आसानी से मिल जाता था.

‘‘और इसी मंथन की दुकान से तुम ने दसियों हजार रुपए का राशन खाया है. उस समय यही मंथन पीछे के दरवाजे से हमें चीजें मुहैया करवाता था.

‘‘उस समय ये बड़ेबड़े मौल न जाने किस बिल में समा गए थे. तब पुलिस के न जाने कितने लाठीडंडे खा कर मंथन सामान इधरउधर से जुगाड़ कर के पूरे महल्ले को देता था.

‘‘फिर भी मैं वहीं से सामान लूंगा. मौल बैस्ट है मेरे लिए,’’ इतना कह कर रजत वहां से चला गया.

बात आईगई हो गई. अजय बाबू और रजत दोनों खुशबू पर शादी के लिए जोर दे रहे थे. 6 महीने और बीत गए. जो अजय बाबू मंथन के परिवार को इतना अच्छा कहते थे, जब उन को पता चला कि मंथन और खुशबू एकदूसरे से प्यार करते हैं, तो उन के जातिवाद ने सिर उठा लिया.

एक दिन अजय बाबू मंथन की दुकान पर तमतमाए हुए पहुंचे और मंथन को कई झापड़ रसीद कर दिए.
अजय बाबू का शरीर गुस्से से कांप रहा था. वे तमतमाए हुए लहजे में बोले, ‘‘हम ने तुम लोगों को जरा सा मुंह क्या लगा लिया, तुम अपनी औकात से बाहर आ कर हमारे सिर पर चढ़ गए. कहां हम कुलीन ब्राह्मण और कहां तुम बनिया. तुम लोगों को हमेशा अपनी औकात में रहना चाहिए. हमारी बहनबेटियों से खिलवाड़ करते हो… हद में रहा करो, नहीं तो होश ठिकाने लगा दूंगा.’’

दिन बीतते चले गए. कई साल गुजर गए. उम्र निकल जाने के चलते खुशबू के लिए रिश्ते भी अब आने बंद हो गए थे. इधर परिवार और 2 बहनों की शादी की जिम्मेदारी मंथन के कंधों पर थी. वह जैसे बलिदान की वेदी पर झूल गया.

एक दिन अचानक अजय बाबू को लकवा मार गया. अब वे बिस्तर से उठ भी नहीं पाते थे. खुशबू ने पूरे मन से अपने पापा की सेवा की, पर जल्दी ही वे चल बसे.

इतना ही नहीं, एक दिन रजत अपनी कार से औफिस जा रहा था कि तभी उस की कार सामने से आ रही दूसरी कार से टकरा गई और रजत के कार के परखच्चे उड़ गए.

रजत को अस्पताल में भरती करवाया गया. रजत अब महीनों तक बिस्तर से उठ नहीं सकता था. डाक्टर कह रहे थे कि इतने बड़े हादसे में अगर वह बच गया है, तो यही बहुत बड़ी बात है.

रजत की बैंक की प्राइवेट नौकरी थी, जो छूट गई. उस की पत्नी सविता के घर वालों ने कुछ महीनों तक मदद की, उस के बाद उन्होंने भी हाथ खींच लिए.

पूरे 2 साल तक रजत बिस्तर पर रहा. बच्चों की फीस जमा नहीं करवा पाने के चलते स्कूल ने बच्चों के नाम काट दिए. अब रजत के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते थे.

एक दिन की बात है. घर में राशन खत्म हो गया था और बच्चे भूख से बिलबिला रहे थे. रजत के पापा अगर जिंदा होते, तो जरूर मंथन से कह कर राशन ले आते.

कुछ सोच कर सविता ने सारी बात जा कर मौल वाले दुकानदार को बताई, पर उस दिन सविता के पैरों तले की जमीन खिसक गई, जब मौल वाले ने सामान उधार देने से साफ मना कर दिया. उस ने बहुत सारे ग्राहकों के सामने ही सविता की बेइज्जती भी कर दी. सविता बेइज्जती का घूंट पी कर वहां से चली आई.

घर आ कर सविता ने सारी घटना रजत को बताई. रजत अपनी बेबसी पर दांत पीस कर रह गया था. उस के पैर अभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे. कमर की हड्डी भी टूट गई थी. वह लाचार था.

खैर, उड़तेउड़ते यह बात मंथन को पता चली. उस का और अजय बाबू का पुराना संबंध था. इस नाते वह घर का पूरा राशन रजत के यहां देने चला आया.

रजत और सविता दोनों हैरान से मंथन को ताक रहे थे.

मंथन ने रजत को नमस्ते किया और पूछा, ‘‘आप कैसे हैं?’’

रजत को जवाब देते न बना, फिर भी वह मंथन से बोला, ‘‘ठीक हूं. धीरेधीरे रिकवरी हो रही है.’’

‘‘आप के ऐक्सीडैंट के बारे में सुना था, लेकिन दुकान में भीड़भाड़ रहने के चलते आप से मिलने नहीं आ सका. कुछ झिझक भी थी. पता नहीं आप क्या सोचेंगे? वैसे, कुछ दिनों से बच्चों को स्कूल जाते नहीं देखा. वे स्कूल जाते हैं न?’’

‘‘स्कूल तो जाते हैं, लेकिन अब प्राइवेट स्कूल में नहीं, बल्कि सरकारी स्कूल में जाते हैं, लेकिन इधर उन की स्टेशनरी खत्म हो गई है, इसलिए हफ्तेभर से वे स्कूल नहीं जा रहे हैं.’’

‘‘हां, इधर मैं भाभी को भी देखता हूं, वे सुबहसुबह शायद बच्चों को पढ़ाने जाती हैं.’’

‘‘हां, बगल में प्राइमरी स्कूल है. वहीं 6-7 हजार रुपए की प्राइवेट नौकरी कर रही है. वहीं बच्चों को पढ़ाने जाती है. बेचारी को मेरे ऐक्सीडैंट के बाद बाहर निकलना पड़ गया. अब क्या करूं… सविता की कमाई तो मेरी दवादारू में ही खर्च हो जाती है.’’

‘‘पढ़ाने या काम करने में कोई बुराई थोड़ी ही है. सविता भाभी तो ज्ञान का दीपक जला रही हैं… आप के परिवार के लिए कुछ राशन ले कर आया हूं. आप मेरे पुराने खाते को फिर से चालू कर दीजिए.’’

‘‘मंथन, मु झे शर्मिंदा मत करो. मैं पहले ही अपनी नजरों में गिर चुका हूं. मैं अपने बरताव पर शर्मिंदा हूं.’’

‘‘मुसीबत के समय ही तो अपने लोग काम आते हैं. अगर कल को मेरे ऊपर कोई मुसीबत आन पड़ी तो आप लोग मेरी मदद करने आएंगे न? आप बच्चों को स्कूल भेजिए. आप स्टेशनरी का सामान मेरी दुकान से मंगवा लीजिएगा. सब्जीभाजी भी भिजवा दूंगा. जब आप ठीक हो जाएंगे, तब मेरा हिसाब कर दीजिएगा.’’

‘‘सब्जी तो आप नहीं बेचते हैं, फिर सब्जी कैसे देंगे?’’ सविता ने पूछा.

‘‘मेरा एक दोस्त आजकल सब्जी बेच रहा है. उस के यहां से खरीद कर मैं आप को भिजवा दूंगा और पैसे हिसाब में लिख दूंगा.

‘‘अच्छा, अब मैं चलता हूं. दुकान पर लड़का अकेला है,’’ कह कर मंथन चलने को हुआ.

‘‘दुकान पर चले जाना, लेकिन पहले मेरी बहन खुशबू के हाथ की चाय तो पी लो,’’ रजत बोला.

इस के बाद रजत ने खुशबू को इशारा किया, तो वह किचन में चाय बनाने चली गई. थोड़ी देर बाद गरमागरम चाय आ गई.

चाय खत्म कर मंथन बाहर जाने लगा कि तभी रजत ने टोका, ‘‘बहुत दिनों से मेरे मन में एक बात चल रही थी. इतना उपकार तो तुम ने मु झ पर दिया है, लेकिन अभी मैं चलनेफिरने में नाकाम हूं. मेरी खुशबू के प्रति भी कुछ जिम्मेदारी है. मु झे यह भी मालूम है कि तुम दोनों एकदूसरे से बहुत प्यार करते हो. मेरे पिताजी पुराने खयालात के थे, लेकिन अब दुनिया बदल रही है. मु झे भी नए ढंग से सोचना होगा.

‘‘तुम दोनों बेकुसूर होते हुए भी सजा काट रहे हो, इसलिए मेरी तुम से एक गुजारिश है कि तुम मेरी बहन को स्वीकार कर लो. बहुत दुख दिया है मैं ने तुम दोनों को. आज से मु झे तुम मेरी जिम्मेदारियों से मुक्त करो.

‘‘मेरी बहन जहां और जिस के साथ खुश रहेगी, वहीं उस की शादी होनी चाहिए. लेकिन मेरी माली हालत बहुत खराब है. मैं दहेज नहीं दे सकता.’’

‘‘दहेज नहीं दे सकते… मतलब मु झे मुफ्त में आप की बहन से शादी करनी पड़ेगी?’’ मंथन बोला.

खुशबू ने कनखियों से मंथन को ताका. उस को लगा कि अब फिर से वह कुंआरी रह जाएगी. मंथन तो दहेज ले कर ही मानेगा.

तभी मंथन खिलखिला कर हंस पड़ा, ‘‘भाई साहब, आप की बहन को मैं एक जोड़े में विदा करवा कर ले जाऊंगा. अभी मेरी दुकान बहुत बढि़या चल रही है. मैं अपनी दोनों बहनों की शादी कर चुका हूं. हर तरह की जिम्मेदारी का बो झ खत्म हो गया है.

‘‘खुशबू जैसी सम झदार जीवनसाथी पा कर मेरा काम और भी आसान हो गया है. अच्छा, अब मैं चलता हूं. आप लोग शादी की तारीख तय कीजिए.’’

अब रजत, सविता और खुशबू के चेहरे पर खुशी नजर आ रही थी. Story In Hindi

News Story In Hindi: अधूरी बाइक ट्रिप और लद्दाख हिंसा

News Story In Hindi: आज पूरे 3 दिन हो गए थे. विजय, अनामिका, श्रीधर और संजय मनाली में थे. वे चारों 2 बाइक्स पर दिल्ली से मनाली गए थे. सोचा था कि वहां कुछ दिन गुजार कर वे आगे लेहलद्दाख तक बाइक से ही जाएंगे. पर पिछले 2 दिन से पहाड़ों के मौसम ने करवट बदल ली थी. बर्फबारी शुरू हो गई थी. विजय और अनामिका अपने कमरे में बंद थे.

बढ़ती ठंड ने विजय और अनामिका के प्यार की गरमी बढ़ा दी थी. जब रात के 10 बजे वह अपनी नाइटी में बाथरूम से बाहर निकली, तो बिस्तर पर लेटे विजय की जैसे ‘आह’ निकल गई.

अनामिका गजब ढहा रही थी. झीनी नाइटी में उस के नाजुक अंग दिख रहे थे. विजय से रुका नहीं गया और बोला, ‘‘अब इनविटेशन दूं क्या बिस्तर में आने का… पहले ही इतनी सर्दी है और तुम भी इतनी दूर हो.’’

‘‘सब्र का फल हमेशा मीठा होता है. मु झे पता है कि तुम्हारे मन में क्या तिकड़म चल रही है. पर जनाब, याद है न कल हमें बाइक टूर की जानकारी लेनी है. हम दोनों पहली बार बाइक से इतनी दूर लद्दाख जा रहे हैं. अगर आज रात को हम वक्त पर नहीं सोए, तो कल की थकान सफर पर भारी पड़ सकती है,’’ अनामिका ने बड़ी अदा से कहा.

पर विजय कहां मानने वाला था. बिस्तर पर बैठते ही उस ने अनामिका को दबोच लिया और रजाई के अंदर ले गया. अनामिका ने मना नहीं किया और अंदर ही अपनी नाइटी उतार दी. विजय ने उसे अपनी बांहों में भर लिया.

अनामिका बहुत ज्यादा गरम लग रही थी. उस की सांसें तेज चल रही थीं. विजय ने उस के माथे को चूमा और लाइट बंद कर दी. फिर काफी देर तक उन दोनों के बीच प्यार का खेल चला.

अगली सुबह वे चारों नहाधो कर बाइक टूर के औफिस में चले गए. उन के पास बाइक्स थीं, ट्रिप का सारा सामान था, बस कुछ बेसिक बातें जाननी थीं, ताकि ट्रिप में कोई रुकावट न आए.

बाइक टूर आपरेटर ने बताया, ‘‘जून से सितंबर तक के महीने लेहलद्दाख घूमने के लिए सब से अच्छे माने जाते हैं. मोटरसाइकिल सवार खासतौर पर विभिन्न दर्रों से गुजर सकते हैं, जो आमतौर पर इस दौरान खुले रहते हैं.’’

‘‘तो क्या सही बाइक चुनना भी जरूरी होता है?’’ संजय ने सवाल किया.

‘‘देखिए, लेहलद्दाख के सफर के लिए सब से अच्छी बाइक, जिस की सब से ज्यादा सिफारिश की जाती है, वह है 350सीसी इंजन वाली रौयल एनफील्ड. ऐसा नहीं है कि और बाइक अच्छी नहीं हैं, पर यह बाइक हो तो ज्यादा सही रहता है,’’ उस टूर आपरेटर ने बताया.

‘‘हमारे पास यही बाइक्स हैं,’’ अनामिका ने खुश हो कर कहा.

‘‘आप को अपनी बाइक की ऐक्स्ट्रा चाबी साथ रखनी चाहिए. ऐक्स्ट्रा चेन लौक, ऐक्स्ट्रा टायर, स्पेयर क्लच, ऐक्सेलरेटर केबल, चेन लुब्रिकैंट, इंजन औयल, हैडलाइट बल्ब, टायर ट्यूब भी ऐक्स्ट्रा रहेगी, तो सफर में कोई दिक्कत आने पर सुविधा रहेगी.’’

‘‘हमारे पास हैलमैट, घुटने और कोहनी गार्ड, वाटरप्रूफ दस्ताने, जूतों की अच्छी जोड़ी, राइडिंग जैकेट, धूप का चश्मा भी है,’’ विजय ने कहा.

‘‘चूंकि लद्दाख में हवा का दबाव ज्यादा रहता है, तो वहां आप को सिरदर्द, मतली और थकान की शिकायत हो सकती है. लिहाजा, आप ब्रेक लेले कर ही ऊपर जाएं. अगर आप को कोई और समस्या है, तो अपने डाक्टर से जरूर सलाह लें और जरूरी दवाएं अपने पास रखें.

‘‘इतना ही नहीं, लेहलद्दाख बाइक ट्रिप के लिए आप को सभी जरूरी परमिट और दस्तावेज हासिल करने के लिए तैयार रहना होगा, जिन्हें आप को रास्ते में पड़ने वाले विभिन्न चैकपौइंट्स पर दिखाना होगा. जिला प्रशासन और ग्रीन ट्रिब्यूनल, ऐसी 2 अथौरिटी हैं, जो आप के ट्रिप के लिए जरूरी सभी परमिट जारी करती हैं.

‘‘एक और जरूरी बात, सफर शुरू करने से पहले अपने साथ काफी नकदी रखना जरूरी है, क्योंकि रास्ते में आप को ज्यादा एटीएम नहीं मिलेंगे. कुछ जरूरी स्नैक्स जैसे नूडल्स, चिप्स, प्रोटीन बार भी अपने साथ रख सकते हैं. मेरी सलाह है कि आप अपनी बाइक के लिए तकरीबन 20 लिटर ऐक्स्ट्रा ईंधन जरूर रखें.’’

‘‘और कोई जरूरी टिप?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘आप अपने परिवार वालों को अपनी लोकेशन और सफर के बारे में जानकारी देते रहें,’’ टूर आपरेटर ने बताया.

पूरी जानकारी लेने के बाद वे चारों अपने होटल के नीचे चाय पीने के लिए रुक गए.

‘‘तो क्या विचार है? मौसम तो खराब है, आगे चलें फिर अपने बाइक ट्रिप के लिए?’’ श्रीधर ने पूछा.

इतना सुन कर चाय बनाने वाला लोकल लड़का बोला, ‘‘लद्दाख जा रहे हैं क्या?’’

‘‘हां,’’ विजय ने कहा.

‘‘मेरी मानिए तो अभी मत जाना. एक तो बर्फबारी हो गई है, ऊपर से लद्दाख के हालात ज्यादा सही नहीं हैं. सोनम वांगचुक मामला अब सुप्रीम कोर्ट में चला गया है. इस के बाद ही पता चलेगा कि लद्दाख में आने वाला समय कैसा रहेगा,’’ वह लड़का बोला.

‘‘अरे, यह बात तो हमारे दिमाग से निकल ही गई थी. पिछले कुछ दिनों से हम खबरों से दूर ही रहे हैं. तुम्हें
कुछ जानकारी है क्या इस पूरे मामले की?’’ अनामिका ने उस चाय वाले लड़के से पूछा.

इसी बीच अपनी धुन में खोए हुए श्रीधर ने अपनी बाइक साफ करते हुए अनामिका से पूछा, ‘‘लद्दाख तो एकदम शांत जगह रही है हमेशा से, फिर यह अचानक अशांत एरिया कैसे बन गया है?’’

अनामिका भी किसी गहरी सोच में डूबी हुई लग रही थी. हालांकि उस ने श्रीधर का सवाल सुन लिया था, पर फिर भी कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘क्या हुआ अनामिका? बताओ मुझे कि यह सब चल क्या रहा है?’’ श्रीधर ने अनामिका को जैसे झक झोर कर पूछा.

इसी बीच चाय बनाने वाले लोकल लड़के ने बताया, ‘‘बौस, मामला थोड़ा सियासी ज्यादा है. साल 2019 में भारत सरकार ने जम्मूकश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था. साथ ही, इसे जम्मूकश्मीर और लद्दाख में बांट कर अलगअलग केंद्रशासित प्रदेश बना दिया था.

‘‘लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा मिलने से वहां के लोग उस समय बेहद खुश थे, पर कुछ दिनों बाद ही लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग उठने लगी.’’

‘‘इस के लिए यहां के लोकल लोगों ने क्या किया?’’ श्रीधर ने उस लड़के से सवाल किया.

‘‘इस सिलसिले में यहां के लोग कई बार अनशन पर बैठे. शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया. इस बार भी लेह में मशहूर पर्यावरणविद सोनम वांगचुक और एपैक्स बौडी लेह का अनशन चल रहा था. यह अनशन 35 दिनों तक चलना था.

‘‘इसी चक्कर मे एपैक्स बौडी लेह की युवा शाखाओं ने 24 सितंबर को लेह बंद करने का ऐलान किया था. बंद के दिन अनशन वाली जगह पर बड़ी तादाद में लोग जमा हो गए. बीते 5 सालों में ऐसा पहली बार हुआ, जब प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए.

‘‘लेकिन इस के तुरंत बाद सोनम वांगचुक ने अनशन खत्म कर दिया. पर दिन बाद ही उन्हें नैशनल सिक्योरिटी ऐक्ट (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया.’’

‘‘फिर तो मामला जरूर बिगड़ा होगा. धरने वाली जगह पर तब कैसा माहौल था?’’ श्रीधर ने पूछा.

‘‘अनशन लेह के एक पार्क में हो रहा था. हम 26 सितंबर को इस इलाके में थे. वहां कुरसियां बिखरी पड़ी थीं. मोटरसाइकिलें और स्कूटी उलटी पड़ी दिखीं. बिस्तर और दूसरी चीजें तहसनहस थीं. अनशन की जगह से कुछ ही दूरी पर वे इलाके हैं, जहां हिंसा हुई थी.

‘‘लेहमनाली हाईवे पर दाईं और बाईं तरफ लेह हिल काउंसिल और भारतीय जनता पार्टी का लेह दफ्तर है. दोनों ही इमारतों को प्रदर्शनकारियों ने नुकसान पहुंचाया. भाजपा दफ्तर के कुछ हिस्सों में आग लगाई गई, शीशे तोड़ दिए गए.

‘‘हिंसा के बाद लेह में सिक्योरिटी काफी सख्त कर दी गई. सड़कों और गलीकूचों को कंटीले तारों से बंद किया गया. लोगों के चलनेफिरने पर पाबंदी लगा दी गई.’’

‘‘इस मसले पर शांति से भी तो बातचीत हो सकती थी न?’’ अनामिका बोली.

‘‘लोगों की मांगों के सिलसिले में केंद्र सरकार और एपैक्स बौडी लेह के बीच बीते कई सालों से बातचीत का सिलसिला चल रहा है. कई बार यह बातचीत बंद भी हो चुकी है. इस बार अनशन शुरू होने के बाद केंद्र सरकार फिर से बातचीत शुरू करने के लिए तैयार हो गई थी.

‘‘केंद्र सरकार ने 6 अक्तूबर को एपैक्स बौडी लेह और कारगिल डैमोक्रेटिक अलायंस के साथ बातचीत की तारीख भी तय की थी. हालांकि, अब एपैक्स बौडी लेह ने फिलहाल बातचीत से दूर रहने का फैसला किया है.

‘‘एपैक्स बौडी लेह के कोचेयरपर्सन चेरिंग दोरजे लकरुक का कहना है, ‘सोनम वांगचुक के साथ 7 या 8 लोगों ने अनशन शुरू किया था. उस के बाद बहुत सारे लोग जुड़ते गए. यह सिलसिला चल रहा था. हमारे युवा संगठनों ने 24 सितंबर को बंद का आह्वान किया था.’

‘‘चेरिंग दोरजे लकरुक ने आगे बताया, ‘दूसरे दिन जब बंद होना था, तो उम्मीद से बहुत ज्यादा लोग हमारे अनशन वाली जगह पर आ गए थे. मेरे अंदाजे के मुताबिक तकरीबन 7,500 लोग अनशन की जगह पर आए थे. वे इतनी बड़ी तादाद में थे कि बेकाबू हो गए और किसी की माने बगैर वे बाहर चले गए. शुरू में उन्होंने लेह काउंसिल के दफ्तर पर पथराव करना शुरू किया. युवा काफी भड़क गए थे. वे गोली से डरने वाले नहीं थे.’

‘‘इस के बाद देशभर में इस हिंसा के बाद सियासत का दौर शुरू हो गया,’’ वह लड़का बोला.

‘‘तुम सही कह रहे हो. लद्दाख के वर्तमान हालात और स्थानीय लोगों द्वारा किए जा रहे विरोध पर टिप्पणी करते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि ये मौजूदा हालात अनएक्सपैक्टेड नहीं थे. लद्दाख में तो यह होना ही था. उन को मक्खी की तरह दूध में से निकाल फेंका.

‘‘उन का इशारा इस ओर था कि लद्दाख के लोगों की मांगों की अनदेखी की जा रही थी, जिस का नतीजा यह विरोध है,’’ संजय ने अपनी राय रखी.

इस पर विजय बोला, ‘‘पर भारत के गृह मंत्रालय की ओर से जारी बयान में इस हिंसा के लिए सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया गया है. गृह मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि सोनम वांगचुक ने उकसाऊ बयानों के जरीए भीड़ को भड़काया और जब हिंसा शुरू हुई तो भूख हड़ताल खत्म कर एंबुलैंस से अपने गांव चले गए. सोनम वांगचुक ने हालात को संभालने की कोई कोशिश नहीं की.’’

अनामिका बोली, ‘‘पर बाकी नेता तो सोनम वांगचुक के हक में खड़े दिखाई दे रहे हैं. जम्मूकश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने एक्स पर लिखा, ‘लद्दाख को राज्य का दर्जा देने का वादा भी नहीं किया गया था. 2019 में लद्दाख के लोगों ने केंद्र शासित प्रदेश बनने का जश्न मनाया था और अब ये गुस्से में हैं. खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं. अब आप कल्पना कर सकते हैं कि जब जम्मूकश्मीर को राज्य का दर्जा देने का वादा पूरा नहीं होता है, तो हम कितने ठगे गए और निराशा महसूस करते हैं. हम तो इस की मांग लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार तरीके से कर रहे हैं.’

‘‘कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी चुप नहीं रहे. उन्होंने आरोप लगाया कि लद्दाख के लोगों की संस्कृति और परंपराओं पर भाजपा और आरएसएस हमला कर रहे हैं. सोचसम झ कर लद्दाख की संस्कृति, परंपरा और वहां के लोगों की ‘हत्या’ की जा रही है. लोगों की आवाज दबाई जा रही है, इसलिए ही सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर के जेल भेजा गया है.’’

इन चारों को ये बातें अखबारों और मीडिया चैनलों से पता चली थीं.

वह लोकल लड़का बोला, ‘‘एक नौजवान फौजी के मारे जाने पर राहुल गांधी ने ‘एक्स’ पर लिखा था, ‘पिता फौजी, बेटा भी फौजी, जिन के खून में देशभक्ति बसी है. फिर भी भाजपा सरकार ने देश के वीर बेटे की गोली मार कर जान ले ली, सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लद्दाख और अपने अधिकार के लिए खड़ा था.

‘‘‘पिता की दर्दभरी आंखें बस एक सवाल कर रही हैं, क्या आज देशसेवा का यही सिला है? हमारी मांग है कि लद्दाख में हुई इन हत्याओं की निष्पक्ष न्यायिक जांच होनी ही चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

‘‘‘मोदीजी, आप ने लद्दाख के लोगों को धोखा दिया है. वे अपना हक मांग रहे हैं, संवाद कीजिए… हिंसा और डर की राजनीति बंद कीजिए.’’’

अनामिका बोली, ‘‘अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट है और सुप्रीम कोर्ट ने सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्द किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. सोनम वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने रासुका में की गई हिरासत को चुनौती देते हुए उन की रिहाई की मांग की है.’’

‘‘कुछ भी हो, जब हमारे देश के किसी भी कोने से ऐसी हिंसा की खबरें आती हैं, तो माहौल तो खराब होता है. हम यहां से लद्दाख बाइक से जाने वाले थे, पर पहले वहां हुई हिंसा और तोड़फोड़ के बाद अब मौसम ने भी ऐसी करवट बदली है कि हम पिछले 3 दिन से यहीं फंसे हुए हैं. आगे के रास्ते पर भारी जाम लगने का डर और इस बर्फबारी के बाद यहां लोगों की भीड़ बढ़ती जाएगी,’’ विजय बोला.

‘‘आप की सोच सही है. बाइक ट्रिप के लिए खुले मौसम का होना बहुत जरूरी है. सब से बड़ी बात यह कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद लद्दाख की जनता क्या ऐक्शन लेगी या केंद्र सरकार और स्थानीय प्रशासन क्या नई नीति बनाएंगे, यह देखना जरूरी होगा. आप फिलहाल तो अपना बाइक ट्रिप टाल दीजिए और मनाली से ही वापस चले जाएं,’’ उस चाय वाले लड़के ने कहा.

उन चारों ने एकदूसरे का मुंह देखा और हामी भरते हुए अपने होटल के अंदर चले गए. News Story In Hindi

Hindi Kahani: अनोखा सबक – सिपाही टीकाचंद ने सीखा कैसा सबक

Hindi Kahani: सिपाही टीकाचंद बड़ी बेचैनी से दारोगाजी का इंतजार कर रहा था. वह कभी अपनी कलाई पर बंधी हुई घड़ी की तरफ देखता, तो कभी थाने से बाहर आ कर दूर तक नजर दौड़ाता, लेकिन दारोगाजी का कहीं कोई अतापता न था. वे शाम के 6 बजे वापस आने की कह कर शहर में किसी सेठ की दावत में गए थे, लेकिन 7 बजने के बाद भी वापस नहीं आए थे.

‘शायद कहीं और बैठे अपना रंग जमा रहे होंगे,’ ऐसा सोच कर सिपाही टीकाचंद दारोगाजी की तरफ से निश्चिंत हो कर कुरसी पर आराम से बैठ गया.

आज टीकाचंद बहुत खुश था, क्योंकि उस के हाथ एक बहुत अच्छा ‘माल’ लगा था. उस दिन के मुकाबले आज उस की आमदनी यानी वसूली भी बहुत अच्छी हो गई थी.

आज उस ने सारा दिन रेहड़ी वालों, ट्रक वालों और खटारा बस वालों से हफ्ता वसूला था, जिस से उस के पास अच्छीखासी रकम जमा हो गई थी. उन पैसों में से टीकाचंद आधे पैसे दारोगाजी को देता था और आधे खुद रखता था.

सिपाही टीकाचंद का रोज का यही काम था. ड्यूटी कम करना और वसूली करना… जनता की सेवा कम, जनता को परेशान ज्यादा करना.

सिपाही टीकाचंद सोच रहा था कि इस आमदनी में से वह दारोगाजी को आधा हिस्सा नहीं देगा, क्योंकि आज उस ने दारोगाजी को खुश करने के लिए अलग से शबाब का इंतजाम कर लिया है.

जिस दिन वह दारोगाजी के लिए शबाब का इंतजाम करता था, उस दिन दारोगाजी खुश हो कर उस से अपना आधा हिस्सा नहीं लेते थे, बल्कि उस दिन का पूरा हिस्सा उसे ही दे देते थे.

रात के तकरीबन 8 बजे तेज आवाज करती जीप थाने के बाहर आ कर रुकी. सिपाही टीकाचंद फौरन कुरसी छोड़ कर खड़ा हो गया और बाहर की तरफ भागा.

नशे में चूर दारोगाजी जीप से उतरे. उन के कदम लड़खड़ा रहे थे. आंखें नशे से बु?ाबु?ा सी थीं. उन की हालत से तो ऐसा लग रहा था, जैसे उन्होंने शराब पी रखी हो, क्योंकि चलते समय उन के पैर बुरी तरह लड़खड़ा रहे थे. उन के होंठों पर पुरानी फिल्म का एक गाना था, जिसे वे बड़े रोमांटिक अंदाज में गुनगुना रहे थे.

दारोगाजी गुनगुनाते हुए अंदर आ कर कुरसी पर ऐसे धंसे, जैसे पता नहीं वे कितना लंबा सफर तय कर के आए हों.

सिपाही टीकाचंद ने चापलूसी करते हुए दारोगाजी के जूते उतारे. दारोगाजी ने सामने रखी मेज पर अपने दोनों पैर रख दिए और फिर पैरों को ऐसे अंदाज में हिलाने लगे, जैसे वे थाने में नहीं, बल्कि अपने घर के ड्राइंगरूम में बैठे हों.

दारोगाजी ने अपनी पैंट की जेब में से एक महंगी सिगरेट का पैकेट निकाला और फिल्मी अंदाज में सिगरेट को अपने होंठों के बीच दबाया, तो सिपाही टीकाचंद ने अपने लाइटर से दारोगाजी की सिगरेट जला दी.

‘‘साहबजी, आज आप ने बड़ी देर लगा दी?’’ सिपाही टीकाचंद अपनी जेब में लाइटर रखते हुए बोला.

दारोगाजी सिगरेट का लंबा कश खींच कर धुआं बाहर छोड़ते हुए बोले, ‘‘टीकाचंद, आज माहेश्वरी सेठ की दावत में मजा आ गया. दावत में शहर के बड़ेबड़े लोग आए थे. मेरा तो वहां से उठने का मन ही नहीं कर रहा था, लेकिन मजबूरी में आना पड़ा.

‘‘अच्छा, यह बता टीकाचंद, आज का काम कैसा रहा?’’ दारोगाजी ने बात का रुख बदलते हुए पूछा.

‘‘आज का काम तो बस ठीक ही रहा, लेकिन आज मैं ने आप को खुश करने का बहुत अच्छा इंतजाम किया है,’’ सिपाही टीकाचंद ने धीरे से मुसकराते हुए कहा, तो दारोगाजी के कान खड़े हो गए.

‘‘कैसा इंतजाम किया है आज?’’ दारोगाजी बोले.

‘‘साहबजी, आज मेरे हाथ बहुत अच्छा माल लगा है. माल का मतलब छोकरी से है साहबजी, छोकरी क्या है, बस ये सम?ा लीजिए एकदम पटाखा है, पटाखा. आप उसे देखोगे, तो बस देखते ही रह जाओगे. मु?ो तो वह छोकरी बिगड़ी हुई अमीरजादी लगती है,’’ सिपाही टीकाचंद ने कहा.

उस की बात सुन कर दारोगाजी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई.

‘‘टीकाचंद, तुम्हारे हाथ वह कहां से लग गई?’’ दारोगाजी अपनी मूंछों पर ताव देते हुए बोले.

दारोगाजी के पूछने पर सिपाही टीकाचंद ने बताया, ‘‘साहबजी, आज मैं दुर्गा चौक से गुजर रहा था. वहां मैं ने एक लड़की को अकेले खड़े देखा, तो मुझे उस पर कुछ शक हुआ.

‘‘जिस बस स्टैंड पर वह खड़ी थी, वहां कोई भला आदमी खड़ा होना भी पसंद नहीं करता है. वह पूरा इलाका चोरबदमाशों से भरा हुआ?है.

‘‘उस को देख कर मैं फौरन समझ गया कि यह लड़की चालू किस्म की है. उस के आसपास 2-4 लफंगे किस्म के गुंडे भी मंडरा रहे थे.

‘‘मैं ने सोचा कि क्यों न आज आप को खुश करने के लिए उस को थाने ले चलूं. ऐसा सोच कर मैं फौरन उस के पास जा पहुंचा.

‘‘मुझे देख कर वहां मौजूद आवारा लड़के फौरन वहां से भाग लिए. मैं ने उस लड़की का गौर से मुआयना किया.

‘‘फिर मैं ने पुलिसिया अंदाज में कहा, ‘कौन हो तुम? और यहां अकेली खड़ी क्या कर रही हो?’

‘‘मेरी यह बात सुन कर वह मुझे घूरते हुए बोली, ‘यहां अकेले खड़ा होना क्या जुर्म है?’

‘‘उस का यह जवाब सुन कर मैं समझ गया कि यह लड़की चालू किस्म की है और आसानी से कब्जे में आने वाली नहीं.

‘‘मैं ने नाम पूछा, तो वह कहने लगी, ‘मेरे नाम वारंट है क्या?’

‘‘वह बड़ी निडर छोकरी है साहब. मैं जो भी बात कहता, उसे फौरन काट देती थी.

‘‘मैं ने उसे अपने जाल में फंसाना चाहा, लेकिन वह फंसने को तैयार ही नहीं थी.

‘‘आसानी से बात न बनते देख उस पर मैं ने अपना पुलिसिया रोब झड़ना शुरू कर दिया. बड़ी मुश्किल से उस पर मेरे रोब का असर हुआ. मैं ने उस पर

2-4 उलटेसीधे आरोप लगा दिए और थाने चलने को कहा, लेकिन थाने चलने को वह तैयार ही नहीं हुई.

‘‘मैं ने कहा, ‘थाने तो तुम्हें जरूर चलना पड़ेगा. वहां तुम से पूछताछ की जाएगी. हो सकता है कि तुम अपने दोस्त के साथ घर से भाग कर यहां आई हो.’

‘‘मेरी यह बात सुन कर वह बौखला गई और मुझे धमकी देते हुए कहने लगी, ‘‘मुझे थाने ले जा कर तुम बहुत पछताओगे, मेरी पहुंच ऊपर तक है.’

‘‘छोकरी की इस धमकी का मुझ पर कोई असर नहीं हुआ. ऐसी धमकी सुनने की हमें आदत सी पड़ गई है…

‘‘पता नहीं, आजकल जनता पुलिस को क्या सम?ाती है? हर कोई पुलिस को अपनी ऊंची पहुंच की धमकी दे देता है, जबकि असल में उस की पहुंच एक चपरासी तक भी नहीं होती.

‘‘मैं धमकियों की परवाह किए बिना उसे थाने ले आया और यह कह कर लौकअप में बंद कर दिया कि थोड़ी देर में दारोगाजी आएंगे. पूछताछ के बाद तुम्हें छोड़ दिया जाएगा.

‘‘जाइए, उस से पूछताछ कीजिए, बेचारी बहुत देर से आप का इंतजार कर रही है,’’ सिपाही टीकाचंद ने अपनी एक आंख दबाते हुए कहा.

दारोगाजी के होंठों पर मुसकान तैर गई. उन की मुसकराहट में खोट भरा था. उन्होंने टीकाचंद को इशारा किया, तो वह तुरंत अलमारी से विदेशी शराब की बोतल निकाल लाया और पैग बना कर दारोगाजी को दे दिया.

दारोगाजी ने कई पैग अपने हलक से नीचे उतार दिए. ज्यादा शराब पीने से उन का चेहरा खूंख्वार हो गया था. उन की आंखें अंगारे की तरह लाल हो गईं.

वह लुंगीबनियान पहन लड़खड़ाते कदमों से लौकअप में चले गए. सिपाही टीकाचंद ने फुरती से दरवाजा बंद कर दिया और वह बैठ कर बोतल में बची हुई शराब खुद पीने लगा.

दारोगाजी को कमरे में घुसे अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि उन के चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं.

सिपाही टीकाचंद ने हड़बड़ा कर दरवाजा खोला, तो दारोगाजी उस के ऊपर गिर पड़े. उन का हुलिया बिगड़ा हुआ था.

थोड़ी देर पहले तक सहीसलामत दारोगाजी से अब अपने पैरों पर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. इस से पहले कि सिपाही टीकाचंद कुछ सम?ा पाता, उस के सामने वही लड़की आ कर खड़ी हो गई और बोली, ‘‘देख ली अपने दारोगाजी की हालत?’’

‘‘शर्म आनी चाहिए तुम लोगों को. सरकार तुम्हें यह वरदी जनता की हिफाजत करने के लिए देती है, लेकिन तुम लोग इस वरदी का नाजायज फायदा उठाते हो,’’ लड़की चिल्लाते हुए बोली.

लड़की एक पल के लिए रुकी और सिपाही टीकाचंद को घूरते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी बदतमीजी का मजा मैं तुम्हें वहीं चखा सकती थी, लेकिन उस समय तुम ने वरदी पहन रखी थी और मैं तुम पर हाथ उठा कर वरदी का अपमान नहीं करना चाहती थी, क्योंकि यह वरदी हमारे देश की शान है और हमें इस का अपमान करने का कोई हक नहीं. पता नहीं, क्यों सरकार तुम जैसों को यह वरदी पहना देती है?’’

लड़की की इस बात से सिपाही टीकाचंद कांप उठा.

‘‘जातेजाते मैं तुम्हें अपनी पहुंच के बारे में बता दूं, मैं यहां के विधायक की बेटी हूं,’’ कह कर लड़की तुरंत थाने से बाहर निकल गई.

सिपाही टीकाचंद आंखें फाड़े खड़ा लड़की को जाते हुए देखता रहा.

दारोगाजी जमीन पर बैठे दर्द से कराह रहे थे. उन्होंने लड़की को परखने में भूल की थी, क्योंकि वह जूडोकराटे में माहिर थी. उस ने दारोगाजी की जो धुनाई की थी, वह सबक दारोगाजी के लिए अनोखा था. Hindi Kahani

Best Hindi Kahani: दूसरी शादी – परवेज की बेबसी

Best Hindi Kahani: अफरोज के जाने के बाद परवेज की जिंदगी थम सी गई थी. बच्चे अकेले से हो गए थे. अपनों ने जो रंग दिखाया था, उस ने परवेज को झकझोर कर रख दिया था. बच्चों की आंखों में मां की तड़प, उन की बेबसी, उन की मासूमियत भरी आवाज और अपनों से मिले दर्द से वे सहम गए थे.

चाची का बच्चों की औकात से ज्यादा काम करवाना, उन के बच्चों का मारना, तंग करना, खाना न देना, उन को बारबार ‘तुम्हारी तो मां भी नहीं है’ कह कर मजाक उड़ाना, कहीं बाहर जाओ तो बच्चों का दिनभर चड्डी में ही टौयलैट किए हुए ही भूखेप्यासे रहना… बच्चों की ऐसी बुरी दशा और बेबसी देख कर परवेज पूरी तरह टूट चुका था.

कोरोना की दूसरी लहर ने देशभर में मौत का जो नंगा नाच नचाया था, उस से कोई शहर ही नहीं, बल्कि गांवमहल्ला और शायद कोई खानदान ऐसा बचा हो, जो इस की चपेट में न आया हो.

अफरोज के जाने के बाद परवेज अकेला अपने मासूम बच्चों के साथ गांव में रहता था. उस की बड़ी बेटी 8 साल की, उस से छोटी बेटी 5 साल की और उस से छोटा बेटा डेढ़ साल का था.

जो लोग कल तक परवेज की इज्जत करते थे, उस के बच्चों की देखभाल भी करते थे, आज अफरोज के जाने के बाद वे उन से आंखें चुराने लगे थे. लौकडाउन की वजह से परवेज का कामधंधा चौपट हो गया था. कहीं से कोई आमदनी का जरीया न था, ऊपर से इन बच्चों को छोड़ कर वह कहीं जा भी नहीं सकता था.

परवेज के बच्चे अपने चाचा के बच्चों के साथ खेलने की कोशिश करते, तो वे इन्हें मार कर भगा देते. उन की चाची मासूम बच्ची से घर का झाड़ूपोंछा करवाती थीं. जब वह थक जाती तो रोते हुए परवेज के पास आती और कहती कि चाची अपने बच्चों को तो खाना देती हैं, हमें नहीं देतीं.

एक दिन तो हद ही हो गई. परवेज किसी काम से बाहर गया था. लौटा तो देखा कि उस की छोटी बेटी और बेटा कमरे में बैठे रो रहे थे. परवेज ने उन से पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’

बेटी ने बताया, ‘‘चाची मुझ से बड़ा कुकर धुलवा रही थीं. वह मुझ से नहीं उठ रहा था, तो मुझे डांटने लगीं. उन्होंने मुझे खाना नहीं दिया, तो कोई बात नहीं. कम से कम मेरे भाई को तो खाने को कुछ दे देतीं, वह सुबह से भूखा था.’’

यह सुनते ही परवेज का दिल रोने लगा, पर वह कर भी क्या सकता था. कुछ दिनों बाद उसे काम के सिलसिले में वापस मुंबई जाना था. घर पर पड़ेपड़े कई महीने गुजर गए थे.

जब परवेज ने अपनी बड़ी बेटी को बताया, तो वह बोली, ‘‘अब्बा, हम अकेले कैसे रहेंगे? हमें भी साथ ले चलो.’’ परवेज ने उसे समझाया, ‘‘मैं वहां पहुंच कर कुछ ही दिनों में तुम सब को भी ले जाऊंगा.’’

अचानक बेटी बोली, ‘‘आप नई अम्मी ले आओ. हमें भी अम्मी चाहिए. आप दूसरी शादी कर लो.’’

परवेज अफरोज को नहीं भुला पा रहा था और फिर नई मां बच्चों की सही ढंग से देखभाल कर पाएगी या नहीं, इस की कोई गारंटी नहीं थी. लेकिन बच्ची की जिद ने उसे मजबूर कर दिया और वह भी यही सोचने लगा कि कम से कम बच्चों को वक्त पर खाना तो मिलेगा और देखभाल करने वाला कोई तो होगा.

इस तरह परवेज दिल पर पत्थर रख कर मुंबई आ गया और कुछ ही दिन हुए थे कि उस का काम भी चल निकला और जल्द ही उस के लिए एक रिश्ता आ गया, जो उस के एक दोस्त ने बताया था.

उस ने परवेज को एक फोटो दिखाया और बोला, ‘‘यह हिना है. इस के 2 बच्चे हैं. शौहर का अभी एक साल पहले इंतकाल हुआ है. यह अभी अपनी मां के घर है. तुम हां बोलो, तो मैंबात चलाऊं?’’

परवेज ने हिना के मासूम बच्चों के बारे में सुन कर हां कर दी, क्योंकि वह भी अपने बच्चों की मां के न होने का दुख जानता था.

अगले दिन परवेज ने हिना, उस के मांबाप और दोनों बच्चों को अपने ही घर बातचीत करने के लिए बुला लिया. उन्होंने परवेज से काम और बच्चों के बारे मे पूछा, उस के बाद उन्होंने बताया कि हिना के दोनों बच्चों को बचपनसे ही डायबिटीज है. इन्हें इंसुलिन लगती है. अगर तुम्हें यह रिश्ता मंजूर हो तो बताओ.

परवेज ने उन मासूम बच्चों को देखा, जो महज 8 साल और 6 साल के थे. फिर मासूम से चेहरे वाली हिना पर नजर डाली जो अभी जवान ही थी, हां कर दी और अगले ही हफ्ते उन का निकाह हो गया.

निकाह के तीसरे ही दिन हिना ने परवेज को बच्चों को लाने के लिए गांव भेज दिया. कुछ ही दिनों में वह अपने बच्चों को मुंबई ले आया.

हिना जैसी मां पा कर परवेज के बच्चे भी खुश हो गए. हिना ने दिलोजान से बच्चों का खयाल रखना शुरू कर दिया. वह अपने हाथों से उन्हें खाना खिलाती, उन की देखभाल करती और उन्हें कभी मां की कमी महसूस न होने देती. परवेज ने भी उस के बच्चों का अच्छे प्राइवेट स्कूल में दाखिल करा दिया था.

एक दिन हिना ने परवेज को अपनी कहानी सुनाई कि उस के रोंगटे खड़े हो गए. उस ने बताया, ‘‘जब मेरे शौहर का इंतकाल हुआ, तो हम घूमने गुजरात गए थे. उन्हें पहले से ही डायबिटीज थी. वहां पर हम और उन के दोस्तों के परिवार घूमने गए थे कि अचानक इन की तबीयत खराब हो गई. दोस्तों ने इलाज कराने में कोई कमी न छोड़ी, फिर भी वे न बच पाए.

‘‘जब मेरी सास को पता चला, तो वे मुझे धक्का देते हुए बोलीं कि तू ने मेरे बेटे को मार दिया. मैं तो अपने होश में न थी, उन के ये अल्फाज सुन कर बेहोश हो गई. जब होश आया तो मेरा सबकुछ लुट चुका था. मेरा अपनी सुसराल में रहना दूभर हो चुका था.

‘‘मेरे बच्चे भी डायबिटीज के मरीज थे, जो सूख कर कांटा हो गए थे. जेठानी सारा काम मुझ से करवाती थीं. मेरे बच्चों को कभी खाना मिलता, कभी नहीं मिलता. सास ने जीना मुश्किल कर रखा था. आखिर में मुझे अपने मांबाप के घर जाना पड़ा.

‘‘वहां मुझे दो वक्त का खाना तो मिल रहा था, लेकिन शौहर की कमी ने झकझोर कर रख दिया था. अम्मीअब्बा को हमेशा यही बात सताती रहती थी कि बिना शौहर के मेरा और बच्चों का क्या होगा. मेरी भाभी भी बच्चों पर गुस्सा होती रहती थीं. उन्हें कभी किचन में नहीं घुसने दिया जाता था.’’

पर, अब हिना बहुत खुश थी. शादी के एक साल बाद परवेज के घर एक चांद सा बेटा हुआ. जो रिश्तेदार उन्हें दुत्कारते थे, आज खुशीखुशी मिलते हैं. हिना की सास भी मिलने आती रहती हैं. परवेज का भाईभाभी रोज फोन पर बच्चों से बात करते हैं और छुट्टियों में मुंबई आ जाते हैं.

आज परवेज का घरपरिवार खुशहाल है. उस का कामधंधा भी अच्छा चल रहा है. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं है. बुरा वक्त कब निकल गया, पता ही नहीं चला. Best Hindi Kahani

Hindi Story: कर्मयोगी – जैसा कर्म वैसा फल

Hindi Story: धीरज को मैनेजर कुलकर्णी ने अपने केबिन में बुलाया. लिहाजा, मशीन रोक कर वह उसी ओर चल दिया. लेकिन अंदर चल रही बातचीत को सुन कर उस के कदम केबिन के बाहर ही ठिठक गए.

‘‘देख फकीरा…’’ मैनेजर कुलकर्णी अंदर बैठे हुए फकीरा को समझ रहे थे, ‘‘अगर तू ने ऐसा कर लिया, तो समझा ले कि 2 ही दिन में तेरी सारी गरीबी दूर हो जाएगी.’’

‘‘लेकिन साहब…’’ फकीरा हकलाने लगा, ‘‘यह तो धोखाधड़ी होगी.’’

‘‘युधिष्ठिर न बन फकीरा,’’ कुलकर्णी की आवाज में कुछ झंझालाहट थी, ‘‘कारोबार में यह सब चलता रहता है. सभी तो मिलावट किया करते हैं.’’

धीरज उलटे पांव अपनी मशीन के पास लौट आया. मैनेजर और फकीरा में आगे क्या बात हुई होगी, उस ने इस का अंदाजा लगा लिया. वह सोच में पड़ गया, ‘तो क्या कुलकर्णी मालिक की आंखों में धूल झोंकना चाहता है?’

धीरज फिर से मशीन पर काम करने लगा. मशीन के मुंह से लालपीले कैप्सूल उछलउछल कर नीचे रखी ट्रे में गिरते जा रहे थे.

ओखला में कपूर की उस लेबोरेटरी में जिंदगी को बचाने वाली बहुत सारी दवाएं बनती हैं. 60-70 मजदूरों की देखरेख मैनेजर कुलकर्णी करता है. कपूर साहब तो कभीकभार ही आते हैं. कारोबार के संबंध में वह ज्यादातर दिल्ली से बाहर ही रहते हैं. धीरज उन का बहुत ही भरोसेमंद मुलाजिम था.

2 साल पहले धीरज ओखला की किसी फैक्टरी में तालाबंदी होने से बेरोजगार हो गया था. उस दिन वह निजामुद्दीन के क्षेत्रीय रोजगार दफ्तर के बाहर खड़ा था, तभी सामने दौड़ती हुई कार के तेज रफ्तार में मुड़ने से एक फाइल सड़क पर आ गिरी.

धीरज ने फाइल उठा कर जोरजोर से आवाजें दीं, ‘साहबजीसाहबजी, आप के कागजात गिर गए हैं.’ आगे के चौराहे पर वह कार तेजी से रुक गई.

धीरज भागता हुआ वहीं पहुंचा. वह हांफने लगा था.

फाइल लेते हुए कपूर साहब ने उस से पूछा था, ‘क्या करते हो तुम?’

‘बस साहब, इन दिनों तो ऐसे ही सड़कें नाप रहा हूं,’ कह कर वह सिर खुजलाने लगा.

‘नौकरी करोगे?’ उन्होंने पूछा था.

‘मेहरबानी होगी साहबजी,’ उस ने हाथ जोड़ दिए.

‘आओ, गाड़ी में बैठो,’ उन्होंने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल दिया, तो धीरज कार में जा बैठा.

धीरज के बैठते ही कार तेजी से ओखला की तरफ दौड़ने लगी थी. बस, तभी से वह उन की लेबोरेटरी में काम कर रहा है.

पिछले महीने मजदूरों की एक मीटिंग हुई थी. उस में कई लोकल कामरेड आए हुए थे. वे लोग बोनस के मसले पर बात कर रहे थे. धीरज ने भी कुछ कहना चाहा था.

एक कामरेड उस की ओर देख कर बोला था, ‘आप शायद कुछ कहना चाहते हैं?’

‘बोनस का मामला आपसी बातचीत से ही सुलझाना ठीक रहेगा,’ धीरज ने अपना सु?ाव दिया था, ‘घेरावों और हड़तालों से अपने ही लोगों की हालत खराब होती है.’

‘ठीक कहते हो कामरेड,’ कह कर एक मजदूर नेता मुसकरा दिया.

‘हड़ताल तो हमारा आखिरी हथियार होता है. इस से तालाबंदी की नौबत तक आ जाती है,’ धीरज बोला था.

‘जानते हैं, अच्छी तरह से जानते हैं,’ सिर हिला कर कामरेड ने अपनी सहमति जताई थी.

खाली मशीन खड़खड़ की आवाज करने लगी थी. धीरज ने उस में दवा का पाउडर डाल दिया था. लालपीले कैप्सूल फिर से ट्रे में गिरने लगे.

‘‘अरे…’’ फकीरा ने धीरज के पास आ कर उस के कंधे पर हाथ रख

कर कहा, ‘‘तु?ो मैनेजर साहब याद कर रहे थे?’’

यह सुन कर धीरज मुसकरा दिया और पूछा, ‘‘क्यों?’’

फकीरा ने उस की मुसकान का राज जानना चाहा.

‘‘वह मु?ो भी चोर बनाना चाहते होंगे,’’ धीरज उसी तरह मुसकराते हुए बोला.

‘‘तो तू हमारी बातचीत सुन चुका है?’’ फकीरा चौंक गया.

‘‘हां…’’ धीरज ने गहरी सांस ली, ‘‘सुन कर मैं वापस चला आया था.’’

‘‘हमारे न करने से कुछ नहीं होता धीरज…’’ फकीरा उसे सम?ाने लगा, ‘‘हमारे यहां मिलावट का धंधा पिछले 2-3 साल से हो रहा है. घीसू, मातंबर, सांगा सभी तो मिलावट करते हैं.’’

‘‘यह तो बहुत गलत किया जा रहा है,’’ धीरज गंभीर हो गया और उस के माथे पर चिंता की लकीरें दिखने लगीं, ‘‘ये लोग तो मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं.’’

‘‘ज्यादा न सोचा कर मेरे यार,’’ फकीरा ने उस का हाथ अपने हाथों में ले लिया, ‘‘हम मजदूरों को ज्यादा नहीं सोचना चाहिए. हम लोगों का काम केवल मजदूरी करना होता है.’’

‘‘नहीं फकीरा, यहां मैं तुम से सहमत नहीं हूं,’’ धीरज ने उस की बात काट दी, ‘‘मजदूर होने के साथसाथ हम इनसान भी तो हैं.’’

‘‘तो फिर सोचतेसोचते अपना शरीर सुखाता रह,’’ झंझाला कर फकीरा अपनी मशीन की तरफ चल दिया.

शाम को लेबोरेटरी में छुट्टी हो गई, तो सभी मजदूर घर जाने लगे. धीरज भी अपनी साइकिल उठा कर चल दिया. आगे चौराहे पर वह रुक गया. उस के मन में खलबली मच रही थी. वह तय नहीं कर पा रहा था कि किधर जाए?

अगले ही मिनट उस की साइकिल मेन रोड की ओर मुड़ गई.

पैडल मारता हुआ वह डिफैंस कालोनी की ओर चल दिया. आज वह मालिक को सबकुछ सचसच बता देना चाहता था.

कपूर साहब की कोठी आ गई. उस ने साइकिल कोठी के बाहर खड़ी कर दी. उस समय कपूर साहब क्यारी में पानी दे रहे थे. उसे देख कर वह मुसकरा कर बोले, ‘‘आओ धीरज, अंदर आ जाओ.’’

वह सिर खुजलाता हुआ बोला, ‘‘सर, मैं आज आप से जरूरी बात करने आया हूं.’’

‘‘शीला…’’ कपूर साहब ने अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘जरा 2 कप चाय तो भेजना.’’

धीरज संकोच से सिकुड़ता ही जा रहा था. आज तक उस ने जितनी भी नौकरियां कीं, कपूर साहब जैसा मालिक कहीं नहीं देखा.

‘‘वो सर,’’ धीरज ने कुछ कहना चाहा.

‘‘अच्छा, पहले यह बता कि तेरी बेटी कैसी है?’’ कपूर साहब ने उस की बात बीच में ही काट दी.

धीरज ठगा सा रह गया. उस की बेटी के बारे में उन्हें कैसे मालूम? तभी उसे याद हो आया कि पिछले महीने शरबती बेटी के बीमार होने पर उस ने एक हफ्ते की छुट्टी ली थी. हो सकता है कि उस की अरजी मालिक तक पहुंची हो. तभी उस ने हाथ जोड़ दिए, ‘‘पहले से ठीक है, सर.’’

कपूर साहब की पत्नी लान में 2 कप चाय ले आईं. धीरज ने उठ कर उन्हें नमस्कार किया. कपूर साहब ने पत्नी को उस का परिचय दिया, ‘‘यह अपनी लेबोरेटरी में काम करता है.’’

मालकिन मुसकरा कर अंदर चली गईं. कपूर साहब ने चाय की चुसकी ले कर पूछा, ‘‘हां, तो धीरज अब बताओ कि कैसे आना हुआ?’’

‘‘लोगों की जान बचाइए मालिक,’’ कहते हुए धीरज ने सहीसही बात बता दी.

‘‘ठीक है धीरज…’’ कपूर साहब ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘इस बारे में मैं पूरी छानबीन करूंगा.’’

कपूर साहब को नमस्कार कर धीरज घर की ओर चल पड़ा. रास्तेभर वह उसी मामले पर सोचता रहा, ‘कहीं मैं ने मजदूरों के साथ गद्दारी तो नहीं की?’

उस के कानों में फकीरा के शब्द गूंजते जा रहे थे, ‘मजदूरों को ज्यादा नहीं सोचना चाहिए.’

धीरज दिमागी रूप से बहुत परेशान हो गया था. पत्नी ने कारण पूछा, तो उस ने सारी बात बता दी.

पत्नी हंस कर बोली, ‘‘शरबती के पापा, तुम ने जो भी किया है, अच्छा ही किया है. अपने सही काम पर पछतावा कैसा?’’

‘‘तो अच्छा ही किया, है न?’’ धीरज ने कहा.

‘‘तुम ने तो अपना फर्ज निभाया है,’’ पत्नी ने धीरज के कंधे पर अपना हाथ रख कर कहा.

कपूर साहब को कुलकर्णी पर बहुत ज्यादा भरोसा था. उन्हें कुलकर्णी से इस तरह की उम्मीद नहीं थी. कपूर साहब ने लेबोरेटरी में बने कैप्सूलों व दूसरी दवाओं की किसी भरोसे की प्रयोगशाला से जांच कराई.

पता चला कि उन में 20 फीसदी मिलावट है. ऐसे में उन्हें सारी दुनिया घूमती नजर आने लगी. इस से उन्हें गहरा धक्का लगा.

एक दिन कपूर साहब ने कुलकर्णी को मैनेजर के पद से हटा दिया. उस की जगह पर वह खुद ही मैनेजर का काम देखने लगे. लेबोरेटरी में फिर से बिना मिलावट के दवाएं बनने लगीं. उन की बिगड़ी साख फिर से लौट आई.

एक दिन कपूर साहब ने धीरज को अपने केबिन में बुलाया. धीरज एक तरफ हाथ बांधे खड़ा हो कर बोला,

‘‘जी मालिक.’’

‘‘हम तुम्हारे बहुत आभारी हैं धीरज,’’ कपूर साहब आभार जताने लगे, ‘‘अगर तुम न होते, तो हम पूरी तरह से तबाह ही हो जाते. हमारी सारी साख मिट्टी में मिल जाती.’’

‘‘यह तो मेरा फर्ज था मालिक,’’ धीरज ने कहा.

‘‘हर कोई तो फर्ज नहीं निभाता न,’’ कपूर साहब बोले. धीरज चुप रहा.

‘‘आज से तुम हमारी लेबोरेटरी के सुपरवाइजर बन गए हो,’’ कपूर साहब ने धीरज को उसी समय तरक्की दे दी.

‘‘ओह मालिक,’’ कह कर धीरज उन के पैरों पर गिर गया. कपूर साहब ने उसे दोनों हाथों से उठाया. वह उस की पीठ थपथपाने लगे और कहने लगे, ‘‘यह तरक्की मैं ने नहीं दी है, बल्कि यह तो तुम्हें तुम्हारी काबिलीयत से मिली है.’’

अब धीरज के रहनसहन में बदलाव आने लगा. इस बीच उस की बेटी शरबती भी ठीक हो गई. कपूर साहब की उस लेबोरेटरी में वह और भी लगन व ईमानदारी के साथ काम करने लगा था. Hindi Story

Hindi Family Story: एहसान फरामोश – औलाद से मिली बेरुखी

Hindi Family Story: अकीला ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस औलाद के लिए उस ने अपनी जवानी तबाह कर दी, अपनी आरजू का गला घोंट दिया, उन्हें काबिल बनाने के लिए अपना सबकुछ कुरबान कर दिया, वही औलाद काबिल बनते ही उसे तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर छोड़ देगी. ऐसी एहसान फरामोश औलाद के होने से तो न होना ही अच्छा था. अकीला शादी के महज 7 साल बाद ही बेवा हो गई थी.

जिस समय अकीला के शौहर का इंतकाल हुआ था, तब अकीला की उम्र सिर्फ 26 साल थी और तब तक वह 3 बच्चों की मां बन चुकी थी, फिर भी उस की शादी के कई रिश्ते आ रहे थे और दूरदराज के ही नहीं, बल्कि आसपास के भी कई नौजवान उस से शादी करने के लिए बेकरार थे. रिश्ते आएं भी क्यों नहीं, अकीला थी ही ऐसी बला की खूबसूरत कि जो उसे एक बार देख ले, बस देखता ही रह जाए.

गदराया बदन, गोरा रंग, सुर्ख होंठ, लंबेकाले और घने बाल उस की खूबसूरती में चार चांद लगाए हुए थे. हुस्न की मलिका होने के बाद भी अकीला ने अपने इन 3 मासूम बच्चों की खातिर दूसरी शादी करना मुनासिब  नहीं समझा और उन के अच्छे भविष्य  के लिए दिनरात आसपड़ोस के कपड़े सिल कर उन की परवरिश में बिजी हो कर रह गई.

अकीला का एक ही सपना था कि वह अपने बच्चों को खूब पढ़ाएलिखाए, ताकि उन का भविष्य अच्छा बन सके और वे कामयाब इनसान बन जाएं, इसलिए उस ने दिनरात मेहनत की, ताकि बच्चों की परवरिश अच्छी से अच्छी  हो सके. अकीला की मेहनत रंग लाई. उस के तीनों बच्चे पढ़ने में काफी तेज थे और वे हर क्लास में फर्स्ट आया करते थे. इस तरह अच्छी पढ़ाई कर के उस का सब से बड़ा बेटा गुड़गांव में प्रोफैसर बन गया, दूसरा बेटा सरकारी डाक्टर बना और तीसरा बेटा इटावा में लैक्चरर बन गया.

अकीला खुश थी. भले ही उस की आंखों की रोशनी दिनरात काम करने  से कमजोर हो गई थी, जवानी अब ढल चुकी थी, लेकिन उस की औलाद कामयाब इनसान बन चुकी थी. सब से बड़े बेटे प्रोफैसर की शादी एक बहुत बड़े वकील की बेटी से हो गई थी, जो शादी के एक महीने बाद ही अपने शौहर के साथ गुड़गांव चली गई थी. दूसरा बेटा, जो मेरठ में डाक्टर था, की शादी एक बहुत बड़े बिजनैसमैन की बेटी से हुई, जो महज 2 हफ्ते बाद अपने शौहर के साथ मेरठ शिफ्ट हो गई.

एक दिन खबर मिली कि उस के सब से छोटे बेटे, जो इटावा में लैक्चरर था, ने भी वहीं शादी कर ली और अकीला घर में अकेली रहने के लिए मजबूर हो गई. अकीला की तबीयत खराब रहने लगी थी. जब उस की औलाद को यह पता चला तो समाज के डर से तीनों बेटे घर आए और यह तय किया कि वे तीनों 4-4 महीने अम्मी को अपने पास रखेंगे.

सब से पहले बड़े बेटे का नंबर  आया और वह अकीला को अपने साथ गुड़गांव ले गया. कुछ दिन तो सब ठीक चला, पर जल्द ही उस की बीवी ने घर में लड़ाई शुरू कर दी और एक दिन बोली, ‘‘मेरे बस की बात नहीं है इस बुढि़या की सेवा करना.’’ बेटे ने उसे समझाया, ‘‘4 महीने की तो बात है. बस तुम इन्हें यहां रहने दो और अपने साथ काम में लगाए रखो. तुम्हारी भी मदद हो जाएगी.’’

अब तो घर का सारा काम अकीला के जिम्मे हो गया. वह रातदिन घर  के काम में लगी रहती. उस की हालत नौकरानी से भी बदतर हो गई. खाना  भी उसे रूखासूखा दिया जाने लगा. जैसेतैसे अकीला ने 4 महीने वहां गुजारे. 4 महीने पूरे होने के बाद दूसरा बेटा वादे के मुताबिक अपनी मां को लेने आया और अपने साथ मेरठ ले गया.

वहां पर रहते हुए अभी 2 महीने ही गुजरे थे कि एक दिन उन के घर में पार्टी चल रही थी. मेहमानों का आनाजाना लगा था.  अकीला को अपने कमरे से बाहर न निकलने के लिए बोला गया था कि यहां पर बड़ेबड़े लोग आएंगे, कोई पूछ लेगा तो बेइज्जती होगी. पार्टी देर रात तक चलती रही. अकीला भूख से बेहाल हो चुकी थी. अब उस से बरदाश्त करना मुश्किल था.

उस ने अपने कमरे का दरवाजा खोला और कमरे के बाहर पड़े जूठे बरतनों में से खाना उठा कर खाने लगी. अकीला ने जैसेतैसे अपना पेट भरा. अभी वह पानी पीने के लिए किचन की तरफ जा ही रही थी कि उस की बहू, जो अपनी सहेलियों के साथ वहां से गुजर रही थी, की एक सहेली ने पूछा, ‘‘यह कौन है?’’ तभी अकीला का बेटा वहां आ गया और झट से बोला, ‘‘यह हमारी नई नौकरानी है.’’ ये अल्फाज जैसे ही अकीला के कानों में पड़े, तो उस के होश उड़ गए कि आज एक बेटा अपनी मां को मां कहने में भी शर्मिंदगी महसूस कर रहा है.

अब सब से छोटे बेटे का नंबर था. अकीला ने सोचा कि चलो, इसे भी देख लेते हैं. यह भी बेटा रहा या नहीं या फिर अमीरी ने इस की भी आंखों पर परदा डाल दिया है. कुछ दिन बाद अकीला अपने सब से छोटे बेटे के साथ इटावा चली गई. वहां गए हुए अभी एक ही दिन हुआ  था कि उस के बेटे ने साफसाफ बोल दिया, ‘‘मेरी बीवी को बच्चा होने वाला है.

तुम्हें यहां सब काम खुद करना पड़ेगा और अपनी बहू का भी ध्यान रखना पड़ेगा.’’ अकीला रोज सवेरे उठती, नाश्ता बनाती, कपड़े धोती, फिर दोपहर का खाना बनाने में जुट जाती. उस के बाद घर की साफसफाई का काम करना  होता था.  अकीला की बहू आराम से अपनी सहेली के साथ गपशप में मसरूफ रहती थी. बीचबीच में उन के लिए भी चायनाश्ते का इंतजाम करना पड़ता था. अभी एक महीना ही गुजरा था कि अकीला की तबीयत बहुत खराब हो गई.

उसे सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया, जहां उस की देखभाल करने वाला कोई न था.  3-3 बेटेबहू होने के बावजूद अकीला एक लावारिस की तरह अपनी जिंदगी की बची सांसें ले रही थी और सोच रही थी कि उस की परवरिश में ऐसी कौन सी कमी रह गई थी, जो ऐसी एहसान फरामोश औलाद मिली. इसी कशमकश में अकीला ने अपनी जिंदगी की आखिरी सांस ली और इस दुनिया से विदा ले ली. उस के मरने के बाद भी कोई उसे देखने वाला न था.

1-2 दिन इंतजार करने के बाद अस्पताल के कुछ लोगों ने मिल कर उस का कफनदफन किया. कुछ दिनों बाद जब अकीला का बेटा अस्पताल में उसे देखने आया तो सब को बड़ा अचंभा हुआ, क्योंकि आज एक हफ्ते बाद उसे अकीला की याद आई थी. उस ने अपना मोबाइल नंबर भी गलत दिया था, जो पता लिखवाया  था वहां भी ताला लगा था, क्योंकि वह अपनी बीवी के साथ घूमने गया था.

बेटा अस्पताल से चुपचाप चला गया. हमारे समाज में अभी भी ऐसी एहसान फरामोश औलाद मौजूद हैं, जो कामयाब होने के बाद अपने मांबाप की उस मेहनत को भूल जाती हैं, जो उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाने के लिए अपना सबकुछ कुरबान कर देते हैं. ऐसी निकम्मी औलादें उन्हें तिलतिल कर मरने के लिए छोड़ देती हैं. Hindi Family Story

Hindi Kahani: शीलू हत्याकांड – अहमद ने कबूला जुर्म

Hindi Kahani: श्रद्धा हत्याकांड को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि लखनऊ के गोमती नगर में एक मल्टीनैशनल कंपनी की मैनेजर शीलू की हत्या से लोगों का गुस्सा उफान पर था. राजनीतिक पार्टियां इस मामले पर अपनअपनी रोटियां सेंकने में बिजी थीं.

खबरिया चैनलों के मुताबिक, अहमद (बदला हुआ नाम) गोमती नगर में अपनी लिवइन पार्टनर शीलू के मकान में पिछले 2 साल से रह रहा था. शीलू एक रियल ऐस्टेट कंपनी में मैनेजर थी, जबकि अहमद एक छोटी सी कंपनी में नौकरी करता था. शीलू किसी मजबूरी में अहमद को अपने साथ रखे हुए थी. अहमद रोज उसे तंग करता था.

अहमद ने शीलू को अपने प्रेमजाल में फंसाया और फिर उसे ब्लैकमेल करने लगा. आखिरकार अहमद ने अपने पालतू कुत्ते से कटवा कर शीलू का मर्डर कर दिया.

पुलिस की चार्जशीट के मुताबिक, बुधवार रात 12 बजे पुलिस हैल्पलाइन पर अहमद का फोन आया कि उस के पालतू पिटबुल कुत्ते ने उस की दोस्त पर हमला कर दिया है.

पुलिस ने मौके पर पहुंच कर जब तक कुत्ते को मौत के घाट उतारा, वह शीलू के पेट की आंत फाड़ चुका था. पुलिस इसे कुत्ते का हमला मान कर चल रही थी, लेकिन कुत्ते की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उसे कई दिन से भूखा होने, कुत्ते को खरीदने का महज 2 महीने पुराना बिल और कमरे में फैली इथोक्सीक्विन की गंध से पुलिस को अहमद पर शक हो गया.

पुलिस को दिए गए अपने बयान में अहमद ने बताया कि शीलू की हत्या के लिए ही उस ने पिटबुल कुत्ते को खरीदा था. 2 महीने में यह कुत्ता उस का अच्छा दोस्त बन गया था, जबकि शीलू को वह पहचानता तक नहीं था. शीलू को कुत्तों से नफरत थी और वह रोज उसे और उस के कुत्ते को घर से निकालने की धमकी दे रही थी.

घटना के 2 दिन पहले से उस ने अपने पालतू कुत्ते को भूखा रखना शुरू कर दिया. घटना की रात शीलू के सोते ही अहमद ने उस के ऊपर इथोक्सीक्विन का स्प्रे कर दिया. कुत्ते को कमरे में छोड़ दरवाजे को बाहर से बंद कर दिया.

इथोक्सीक्विन का इस्तेमाल कुत्तों के भोजन में प्रिजर्वर की तरह किया जाता है. पिटबुल कुत्ते ने गहरी नींद में सो रही शीलू को अपना भोजन समझ कर नोचना शुरू कर दिया. शीलू बहुत देर तक तड़पती, चिल्लाती और मदद मांगती रही.

शीलू के चीखने की आवाज कुछ कम होना शुरू हुई, तब अहमद ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस के आने से पहले उस ने कमरे का दरवाजा खोल कर शीलू को बचाने की कोशिश का नाटक करना शुरू किया था.

अहमद के कबूलनामे के बाद उस की फांसी की सजा तय थी. अहमद ने जेल के अपने साथियों को जो कहानी सुनाई, वह बहुत ही मनगढ़ंत, बेतुकी, लेकिन रोमांचक लग रही थी.

अहमद ने बताया कि उस ने 2 साल पहले शीलू की कंपनी में काम शुरू किया था. वह कंपनी के फाइनैंस सैक्शन में था. उस का काम कंपनी के स्टौक को गोपनीय रखना था. साथ ही, स्टौक के रखरखाव की जिम्मेदारी भी थी.

शीलू उस की बौस थी. जिस तरह से कालेज जाने वाले छात्रों को रैगिंग के लिए डराया जाता है, उसी तरह से मल्टीनैशनल कंपनी को जौइन करने से पहले उसे उस के दोस्तों ने बौस के नाम से डराया था कि कारपोरेट सैक्टर के बौस धरती के सब से ज्यादा खूंख्वार प्राणी हैं. वे अपने नीचे काम करने वालों के साथ गलत बरताव करते हैं, उन का फायदा उठाते हैं वगैरह.

अहमद ने आगे बताया, ‘‘मुझे दोस्तों की बातों से डरने की जरूरत नहीं थी. मेरी बौस एक अबला नारी थी. जरूरत पड़ने पर मैं ही उस के साथ सैक्स करने को तैयार बैठा था. मेरी सोच बहुत गलत थी. मैं अपनी लेडी बौस को कम आंक रहा था.

‘‘एक हफ्ते में ही शीलू ने मेरे काम में तरहतरह की गलती निकालते हुए मेरा बैंड बजाना और मुझे नीचा दिखाना शुरू कर दिया. पर मैं जानता था कि मेरी पहली ही कंपनी ने अगर मुझे इस तरह से काम से निकाल दिया, तो मेरा कैरियर बरबाद हो जाएगा और मुझे फिर कहीं भी कायदे की नौकरी नहीं मिलेगी.

‘‘औफिस में शीलू के सहयोगियों ने मुझे बताया कि अपनी नौकरी बचाने के लिए मुझे शीलू मैडम की मेहरबानी हासिल करनी होगी और अपनी नौकरी की खुशी में उन के लिए कोई गिफ्ट ले कर उन के घर जाना चाहिए.

‘‘मैं शाम को डरता हुआ उन के घर पहुंचा. शीलू मैडम, गोमती नगर में एक बंगले जैसे ड्यूप्लैक्स में अकेली रहती थीं. नौकरानी ने दरवाजा खोला, मुझे ऊपर से नीचे तक ललचाई नजरों से देखा और फिर खुशीखुशी अपनी मालकिन को मेरा ब्योरा दिया. उसी पल मुझे समझ जाना था कि मैं एक भारी मुसीबत में फंसने वाला हूं.

‘‘शीलू मैडम अपने लिविंगरूम में बहुत ही कम कपड़ों में थीं. उन्होंने केवल सफेद शर्ट पहनी हुई थी. वे कंप्यूटर पर किसी जरूरी काम में बिजी थीं. शायद उन्हें स्कर्ट पहनने और कुरसी पर बैठने का भी समय न था.

‘‘मैडम की दूधिया, मोम की तरह चिकनी और साफ जांघों को देख कर मेरा पसीना निकलने लगा. मैडम की ट्रांसपेरेंट शर्ट भी नाममात्र के लिए ही थी. काली ब्रा से ढके हुए उन के विशाल गुंबद साफ दिखाई दे रहे थे.

‘‘मैडम के चिकने टखनों, पैर, घुटनों और जांघ को घूरतेघूरते जब तक मेरी नजरें मैडम की चितकबरी कौटन पैंटी तक पहुंचीं, तब तक मैडम मेरी नजरों को ताड़ चुकी थीं. उन्होंने गले लगा कर मेरा स्वागत किया.

‘‘किसी भारतीय मर्द की मति हरने के लिए इतना लालच काफी होता है. उन्होंने और उन की नौकरानी ने मेरी अच्छे से आवभगत की. हमारे बीच सिर्फ संबंध बनना ही बाकी रह गया था.

‘‘उस दिन से मैं शीलू मैडम का आशिक बन गया. मैं बेवकूफ लट्टू की तरह उन के चारों ओर गोलगोल घूमने लगा. औफिस तो औफिस, शीलू मैडम की कालोनी के लोग भी मुझे शीलू मैडम का चमचा और उन का निजी नौकर समझने लगे थे.

‘‘शीलू मैडम सैक्स के मामले में डोमिनैंट थीं. शुरू में उन की हरकतें मुझे बहुत अच्छी लगती थीं. उन का गुस्से में मुझे पलंग पर पटक देना, मेरे कपड़े फाड़ देना, जंगली बिल्ली की तरह उछल कर मेरे सीने पर सवार हो जाना, मेरे बम को अपने हंटर की मार से लाल कर देना वगैरह. उन्हें मेरे गले में कुत्तों का पट्टा पहना कर, घुटनों के बल, अपने पैरों के बीच बैठाना बहुत अच्छा लगता था.

‘‘मुझे कुरसी से बांधने के बाद जिस्मानी संबंध के लिए तरसाने में उन्हें मजा आता था. यह एक ऐसा माइंड गेम था कि मैं खुद भी अपनेआप को उन का पालतू कुत्ता समझ कर बरताव करने लगा था, उन के आगेपीछे दुम हिलाने लगा था.

‘‘शीलू मैडम के दो घड़ी के प्यार के बदले उन का नौकर बनना तो बहुत छोटी बात है, मैं उन के लिए अपनी गरदन कटाने को तैयार बैठा था. औफिस में हर कहीं वे मेरा इस्तेमाल कर रही थीं, मुझे उन के काम के लिए अपना इस्तेमाल कराने में कोई तकलीफ नहीं थी.

‘‘मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी, अपने सैक्सी बौस से अफेयर, एक भारतीय लड़के को इस से ज्यादा क्या चाहिए? मेरे सारे साथी मुझ से जलने लगे थे. शीलू मैडम के चक्कर में मैं ने अपनी पुरानी गर्लफ्रैंड को भी धोखा दे दिया, उसे छोड़ दिया था.

‘‘यह सही बात है कि शीलू मैडम ने मुझे अपने घर में शरण दी, लेकिन यह मुफ्त नहीं था. मकान के किराए के बदले शीलू मैडम मेरी आधी तनख्वाह अपने पास रख लेती थीं. इस के अलावा शीलू मैडम को खुश रखने के चक्कर में मेरी बाकी तनख्वाह भी खत्म हो जाती थी.

‘‘मेरी हालत उन के घर में नौकरों से भी बदतर थी. वह मुझ से अपने जूते चमकवाने से ले कर चड्डी धुलाने तक के काम करवाती थीं. शुरूशुरू में मैं राजीखुशी उन के सारे काम कर रहा था.

‘‘मैं सोचता था कि किसी को क्या पता चलेगा. सभी तो यही समझेंगे कि मैं लखनऊ शहर की सब से पसंदीदा महिला शीलू का बौयफ्रैंड हूं, उन का फायदा उठा रहा हूं. बस इसी ख्वाबों की दुनिया ने मुझे बरबाद कर दिया था.

‘‘शीलू मैडम ने मेरे घर की जमीन बिकवा कर अपने नाम लखनऊ में प्लौट खरीद लिया. मेरे पिता इस सदमे में मर गए, तब जा कर मेरी अक्ल पर पड़े पत्थर हटने शुरू हुए.

‘‘शीलू मैडम के कई दूसरे लड़कों से अफेयर के भी मुझे पुख्ता सुबूत मिलने लगे थे. शीलू मैडम मुझ से पहले भी अनेक मर्दों से यह स्वांग रच चुकी थीं.

‘‘शीलू मैडम की पैसों की भूख मैं पहचान चुका था, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी. उन्होंने हमारे सैक्स वाले फोटो वायरल करने, मुझ पर ‘सैक्सुअल हरैसमैंट’ का केस लगाने और मुझे ‘मी टू हैशटैग’ कैंपेन में फंसाने की धमकी दी, तो घबरा कर मुझे उन के आगे सरैंडर करना पड़ा.

‘‘उस दिन हम आखिरी बार बिस्तर पर मिले थे. शीलू मैडम किसी गुलाम की तरह वे सारे काम कर रही थीं, जो रोज मैं उन के लिए किया करता था.

‘‘उस दिन के बाद दिन ब दिन मेरी हालत उन के दरवाजे के चौखट से बंधे हुए कुत्ते से भी बदतर होती जा रही थी. शीलू मैडम मेरे सामने ही अपने दूसरे मर्दों के साथ अफेयर करने लगी थीं. मेरे सामने ही अपने दोस्तों से लिपटना, होंठ से होंठ सटा देना… और मैं बेबसी से बस उन्हें देख सकता था.

‘‘शीलू मैडम ने मेरे लैपटौप और मोबाइल के पासवर्ड ले लिए थे. अकसर वे उन्हें चैक करने के बहाने अपने कब्जे में रख लेती थीं.

‘‘इतना सब होने के बावजूद भी मैं शीलू मैडम की खिलाफत नहीं कर पा रहा था. एक ही छत के नीचे रहते हुए, जबतब मुझे बाथरूम से बाहर निकलती या पानी के छींटे उछालती शीलू मैडम के ताजमहल या नीलम घाटी के दर्शन हो जाते.

‘‘इतने से ही मेरी इच्छा पूरी हो जाती थी. मुझे लगता था कि एड़ा बन कर पेड़ा खाते रहने में भी क्या बुराई है. शीलू मैडम का लिवइन पार्टनर तो मैं ही कहलाऊंगा.

‘‘दौलत की लालची शीलू मैडम ने मेरे नाम से एक फर्जी डीमैट अकाउंट खोल कर कंपनी के शेयरों की इनसाइड ट्रेडिंग कर करोड़ों का घपला कर लिया और मुझे मुसीबत में डाल दिया.

कंपनी के औडिट में मुझे कुसूरवार समझ कर नौकरी से निकाल दिया. मेरी भविष्यनिधि जब्त कर ली. ‘‘शीलू मैडम ने चुपचाप मेरे कानों में कह दिया था, ‘चुप रहो, चिंता की बात नहीं है, मैं तुम्हें बचा लूंगी.’

‘‘धोखा… उन की कोई भी बात सही नहीं थी. मुझे उन की किसी बात पर यकीन नहीं करना चाहिए था.

‘‘पुरानी दोस्ती के नाम पर उन्होंने मुझे अपने घर में रहते रहने की इजाजत दे दी, लेकिन उन के बैडरूम में आने की अब मुझे इजाजत नहीं थी. मुझे घर का सारा काम निबटाना होता था, बदले में शीलू मैडम ने सिफारिश कर मुझे एक कुरियर कंपनी में छोटी सी नौकरी दिला दी थी.

‘‘इतना सब होने के बावजूद मैं ने शीलू मैडम से बदलना लेने के बारे में नहीं सोचा था. ‘‘पर, उस दिन मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया, जब शीलू मैडम देर रात अपने एक दोस्त के साथ घर आईं. आते ही उन्होंने मुझे ‘टौमी… टौमी…’ कह कर और ‘पुच… पुच…’ कर चिढ़ाना शुरू कर दिया.

‘‘शीलू मैडम नशे में चूर थीं और बारबार अपने दोस्त से चिपक रही थीं, उस की बांहों में झूल रही थीं. अगर उन के दोस्त ने न रोका होता, तो वे वहीं दरवाजे के सामने ही उस के साथ सैक्स करना शुरू कर देतीं.

‘‘शीलू मैडम का दोस्त मेरे सामने से ही उन्हें बैडरूम में खींच ले गया. शीलू मैडम ने मुझे अपनी दूध की फैक्टरी में से मक्खी की तरह बाहर निकाल फेंका था. बहुत देर तक उन के कमरे से सैक्सुअल फोरप्ले की आवाज आती रही. मेरी सोच पहले ही मर चुकी थी, उस दिन मेरा दिल भी जल कर राख हो गया. मुझे उस दिन रातभर नींद नहीं आई.

‘‘उसी दिन मैं ने अपनी प्यारी शीलू मैडम को ठिकाने लगाने का प्लान बना लिया था. आज भी उन की मौत का सब से ज्यादा दुख मुझे है.’’ अहमद की इस मनगढ़ंत कहानी पर किसी को यकीन नहीं है. Hindi Kahani

Best Story In Hindi: जुल्म की सजा – समरथ सिंह की कारगुजारी

Best Story In Hindi: उत्तर प्रदेश के बदायूं, शाहजहांपुर और फर्रुखाबाद जिलों की सीमाओं को छूता, रामगंगा नदी के किनारे पर बसा हुआ गांव पिरथीपुर यों तो बदायूं जिले का अंग है, पर जिले तक इस की पहुंच उतनी ही मुश्किल है, जितनी मुश्किल शाहजहांपुर और फर्रुखाबाद जिला हैडक्वार्टर तक की है.

कभी इस गांव की दक्षिण दिशा में बहने वाली रामगंगा ने जब साल 1917 में कटान किया और नदी की धार पिरथीपुर के उत्तर जा पहुंची, तो पिरथीपुर बदायूं जिले से पूरी तरह कट गया. गांव के लोगों द्वारा नदी पार करने के लिए गांव के पूरब और पश्चिम में 10-10 कोस तक कोई पुल नहीं था, इसलिए उन की दुनिया पिरथीपुर और आसपास के गांवों तक ही सिमटी थी, जिस में 3 किलोमीटर पर एक प्राइमरी स्कूल, 5 किलोमीटर पर एक पुलिस चौकी और हफ्ते में 2 दिन लगने वाला बाजार था.

सड़क, बिजली और अस्पताल पिरथीपुर वालों के लिए दूसरी दुनिया के शब्द थे. सरकारी अमला भी इस गांव में सालों तक नहीं आता था.

देश और प्रदेश में चाहे जिस राजनीतिक पार्टी की सरकार हो, पर पिरथीपुर में तो समरथ सिंह का ही राज चलता था. आम चुनाव के दिनों में राजनीतिक पार्टियों के जो नुमाइंदे पिरथीपुर गांव तक पहुंचने की हिम्मत जुटा पाते थे, वे भी समरथ सिंह को ही अपनी पार्टी का झंडा दे कर और वोट दिलाने की अपील कर के लौट जाते थे, क्योंकि वे जानते थे कि पूरे गांव के वोट उसी को मिलेंगे, जिस की ओर ठाकुर समरथ सिंह इशारा कर देंगे.

पिरथीपुर गांव की ज्यादातर जमीन रेतीली और कम उपजाऊ थी. समरथ सिंह ने उपजाऊ जमीनें चकबंदी में अपने नाम करवा ली थीं. जो कम उपजाऊ जमीन दूसरे गांव वालों के नाम थी, उस का भी ज्यादातर भाग समरथ सिंह के पास गिरवी रखा था.

समरथ सिंह के पास साहूकारी का लाइसैंस था और गांव का कोई बाशिंदा ऐसा नहीं था, जिस ने सारे कागजात पर अपने दस्तखत कर के या अंगूठा लगा कर समरथ सिंह के हवाले न कर दिया हो. इस तरह सभी गांव वालों की गरदनें समरथ सिंह के मजबूत हाथों में थीं.

पिरथीपुर गांव में समरथ सिंह से आंख मिला कर बात करने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी. पासपड़ोस के ज्यादातर लोग भी समरथ सिंह के ही कर्जदार थे.

समरथ सिंह की पहुंच शासन तक थी. क्षेत्र के विधायक और सांसद से ले कर उपजिलाधिकारी तक पहुंच रखने वाले समरथ सिंह के खिलाफ जाने की हिम्मत पुलिस वाले भी नहीं करते थे.

समरथ सिंह के 3 बेटे थे. तीनों बेटों की शादी कर के उन्हें 10-10 एकड़ जमीन और रहने लायक अलग मकान दे कर समरथ सिंह ने उन्हें अपने राजपाट से दूर कर दिया था. उन की अपनी कोठी में पत्नी सीता देवी और बेटी गरिमा रहते थे.

गरिमा समरथ सिंह की आखिरी औलाद थी. वह अपने पिता की बहुत दुलारी थी. पूरे पिरथीपुर में ठाकुर समरथ सिंह से कोई बेखौफ था, तो वह गरिमा ही थी.

सीता देवी को समरथ सिंह ने उन के बैडरूम से ले कर रसोईघर तक सिमटा दिया था. घर में उन का दखल भी रसोई और बेटी तक ही था. इस के आगे की बात करना तो दूर, सोचना भी उन के लिए बैन था.

कोठी के पश्चिमी भाग के एक कमरे में समरथ सिंह सोते थे और उसी कमरे में वे जमींदारी, साहूकारी, नेतागीरी व दादागीरी के काम चलाते थे. वहां जाने की इजाजत सीता देवी को भी नहीं थी.

समरथ सरकार के नाम से पूरे पिरथीपुर में मशहूर समरथ सिंह की कोठी में बाहरी लोगों का आनाजाना पश्चिमी दरवाजे से ही होता था. इस दरवाजे से बरामदे में होते हुए उन के दफ्तर और बैडरूम तक पहुंचा जा सकता था.

कोठी के पश्चिमी भाग में दखल देना परिवार वालों के लिए ही नहीं, बल्कि नौकरचाकरों के लिए भी मना था.

अपने पिता की दुलारी गरिमा बचपन से ही कोठी के उस भाग में दौड़तीखेलती रही थी, इसलिए बहुत टोकाटाकी के बाद भी वह कभीकभार उधर चली ही जाती थी.

गांव की हर नई बहू को ‘समरथ सरकार’ से आशीर्वाद लेने जाने की प्रथा थी. कोठी के इसी पश्चिमी हिस्से में समरथ सिंह जितने दिन चाहते, उसे आशीर्वाद देते थे और जब उन का जी भर जाता था, तो उपहार के तौर पर गहने दे कर उसे पश्चिमी दरवाजे से निकाल कर उस के घर पहुंचा दिया जाता था.

आतेजाते हुए कभी गांव की किसी बहूबेटी पर समरथ सिंह की नजर पड़ जाती, तो उसे भी कोठी देखने का न्योता भिजवा देते, जिसे पा कर उसे कोठी में हर हाल में आना ही होता था.

समरथ सिंह की इमेज भले ही कठोर और बेरहम रहनुमा की थी, पर वे दयालु भी कम नहीं थे. खुशीखुशी आशीर्वाद लेने वालों पर उन की कृपा बरसती थी. अनेक औरतें जबतब उन का आशीर्वाद लेने के लिए कोठी का पश्चिमी दरवाजा खटखटाती रहती थीं, ताकि उन के

पति को फसल उपजाने के लिए अच्छी जमीन मिल सके, दवा व इलाज और शादीब्याह के खर्च वगैरह को पूरा करने हेतु नकद रुपए मिल सकें.

लेकिन बात न मानने से समरथ सिंह को सख्त चिढ़ थी. राधे ने अपनी बहू को आशीर्वाद लेने के लिए कोठी पर भेजने से मना कर दिया था. उस की बहू को समरथ के आदमी रात के अंधेरे में घर से उठा ले गए और तीसरे दिन उस की लाश कुएं में तैरती मिली थी.

अपनी नईनवेली पत्नी की लाश देख कर राधे का बेटा सुनील अपना आपा खो बैठा और पूरे गांव के सामने समरथ सिंह पर हत्या का आरोप लगाते हुए गालियां बकने लगा.

2 घंटे के अंदर पुलिस उसे गांव से उठा ले गई और पत्नी की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया. बाद में ठाकुर के आदमियों की गवाही पर उसे उम्रकैद की सजा हो गई.

राधे की पत्नी अपने एकलौते बेटे की यह हालत बरदाश्त न कर सकी और पागल हो गई. इस घटना से घबरा कर कई इज्जतदार परिवार पिरथीपुर गांव से भाग गए.

समरथ सिंह ने भी बचेखुचे लोगों से साफसाफ कह दिया कि पिरथीपुर में समरथ सिंह की मरजी ही चलेगी. जिसे उन की मरजी के मुताबिक जीने में एतराज हो, वह गांव छोड़ कर चला जाए. इसी में उस की भलाई है.

समरथ सिंह की बेटी गरिमा जब थोड़ी बड़ी हुई, तो समरथ सिंह ने उस का स्कूल जाना बंद करा दिया. अब वह दिनरात घर में ही रहती थी.

गरमी के मौसम में एक दिन दोपहर में उसे नींद नहीं आ रही थी. वह लेटेलेटे ऊब गई, तो अपने कमरे से बाहर निकल कर छत पर चली गई और टहलने लगी.

अचानक उसे कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर कुछ आहट सुनाई दी. उस ने झांक कर देखा, तो दंग रह गई. समरथ सिंह का खास लठैत भरोसे एक औरत को ले कर आया था. कुछ देर बाद कोठी का पश्चिमी दरवाजा बंद हो गया और भरोसे दरवाजे के पास ही चारपाई डाल कर कोठी के बाहर सो गया.

गरिमा छत से उतर कर दबे पैर कोठी के बैन इलाके में चली गई. अपने पिता के बैडरूम की खिड़की के बंद दरवाजे के बीच से उस ने कमरे के अंदर झांका, तो दंग रह गई. उस के पिता नशे में धुत्त एक लड़की के कपड़े उतार रहे थे. वह लड़की सिसकते हुए कपड़े उतारे जाने का विरोध कर रही थी.

जबरन उस के सारे कपड़े उतार कर उन्होंने उस लड़की को किसी बच्चे की तरह अपनी बांहों में उठा कर चूमना शुरू कर दिया. फिर वे पलंग की ओर बढ़े और उसे पलंग पर लिटा कर किसी राक्षस की तरह उछल कर उस पर सवार हो गए.

गरिमा सांस रोके यह सब देखती रही और पिता का शरीर ढीला पड़ते ही दबे पैर वहां से निकल कर अपने कमरे में आ गई. उसे यह देख कर बहुत अच्छा लगा और बेचैनी भी महसूस हुई.

अब गरिमा दिनभर सोती और रात को अपने पिता की करतूत देखने के लिए बेचैन रहती.

अपने पिता की रासलीला देखदेख कर गरिमा भी काम की आग से भभक उठती थी.

एक दिन समरथ सिंह भरोसे को ले कर किसी काम से जिला हैडक्वार्टर गए हुए थे. दोपहर एकडेढ़ बजे उन का कारिंदा भूरे, जिस की उम्र तकरीबन 20 साल होगी, हलबैल ले कर आया.

बैलों को बांध कर वह पशुशाला के बाहर लगे नल पर नहाने लगा, तभी गरिमा की निगाह उस पर पड़ गई. वह देर तक उस की गठीली देह देखती रही.

जब भूरे कपड़े पहन कर अपने घर जाने लगा, तो गरिमा ने उसे बुलाया. भूरे कोठरी के दरवाजे पर आया, तो गरिमा ने उसे अपने साथ आने को कहा.

गरिमा को पता था कि उस की मां भोजन कर के आराम करने के लिए अपने कमरे में जा चुकी है.

गरिमा भूरे को ले कर कोठी के पश्चिमी दरवाजे की ओर बढ़ी, तो भूरे ठिठक कर खड़ा हो गया. गरिमा ने लपक कर उस का गरीबान पकड़ लिया और घसीटते हुए अपने पिता के कमरे की ओर ले जाने लगी.

भूरे कसाई के पीछेपीछे बूचड़खाने की ओर जाती हुई गाय के समान ही गरिमा के पीछेपीछे चल पड़ा.

पिता के कमरे में पहुंच कर गरिमा ने दरवाजा बंद कर लिया और भूरे को कपड़े उतारने का आदेश दिया. भूरे उस का आदेश सुन कर हैरान रह गया.

उसे चुप खड़ा देख कर गरिमा ने खूंटी पर टंगा हंटर उतार लिया और दांत पीसते हुए कहा, ‘‘अगर अपना भला चाहते हो, तो जैसा मैं कह रही हूं, वैसा ही चुपचाप करते जाओ.’’

भूरे ने अपने कपड़े उतार दिए, तो गरिमा ने अपने पिता की ही तरह उसे चूमनाचाटना शुरू कर दिया. फिर पलंग पर ढकेल कर अपने पिता की तरह उस पर सवार हो गई.

भूरे कहां तक खुद पर काबू रखता? वह गरिमा पर उसी तरह टूट पड़ा, जिस तरह समरथ सिंह अपने शिकार पर टूटते थे.

गरिमा ने कोठी के पश्चिमी दरवाजे से भूरे को इस हिदायत के साथ बाहर निकाल दिया कि कल फिर इसी समय कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर आ जाए. साथ ही, यह धमकी भी दी कि अगर वह समय पर नहीं आया, तो उसकी शिकायत समरथ सिंह तक पहुंच जाएगी कि उस ने उन की बेटी के साथ जबरदस्ती की है.

भूरे के लिए एक ओर कुआं था, तो दूसरी ओर खाई. उस ने सोचा कि अगर वह गरिमा के कहे मुताबिक दोपहर में कोठी के अंदर गया, तो वह फिर अगले दिन आने को कहेगी और एक न एक दिन यह राज समरथ सिंह पर खुल जाएगा और तब उस की जान पर बन आएगी. मगर वह गरिमा का आदेश नहीं मानेगा, तो वह भूखी शेरनी उसे सजा दिलाने के लिए उस पर झूठा आरोप लगाएगी और उस दशा में भी उसे जान से हाथ धोना पड़ेगा.

मजबूरन भूरे न चाहते हुए भी अगले दिन तय समय पर कोठी के पश्चिमी दरवाजे पर हाजिर हो गया, जहां गरिमा उस का इंतजार करती मिली.

अब यह खेल रोज खेला जाने लगा. 6 महीने बीततेबीतते गरिमा पेट से हो गई. भूरे को जिस दिन इस बात का पता चला. वह रात में ही अपना पूरा परिवार ले कर पिरथीपुर से गायब हो गया.

गरिमा 3-4 महीने से ज्यादा यह राज छिपाए न रख सकी और शक होने पर जब सीता देवी ने उस से कड़ाई से पूछताछ की, तो उस ने अपनी मां के सामने पेट से होना मान लिया. फिर भी उस ने भूरे का नाम नहीं लिया.

सीता देवी ने नौकरानी से समरथ सिंह को बुलवाया और उन्हें गरिमा के पेट से होने की जानकारी दी, तो वे पागल हो उठे और सीता देवी को ही पीटने लगे. जब वे उन्हें पीटपीट कर थक गए, तो गरिमा को आवाज दी.

2-3 बार आवाज देने पर गरिमा डरते हुए समरथ सिंह के सामने आई. उन्होंने रिवाल्वर निकाल कर गरिमा को गोली मार दी.

कुछ देर तक समरथ सिंह बेटी की लाश के पास बैठे रहे, फिर सीता देवी से पानी मांग कर पिया. तभी फायर की आवाज सुन कर उन के तीनों बेटे और लठैत भरोसे दौड़े हुए आए.

समरथ सिंह ने उन्हें शांत रहने का इशारा किया, फिर जेब से रुपए निकाल कर बड़े बेटे को देते हुए कहा, ‘‘जल्दी से जल्दी कफन का इंतजाम करो और 2 लोगों को लकड़ी ले कर नदी किनारे भेजो. खुद भी वहीं पहुंचो.’’

समरथ सिंह के बेटे पिता की बात सुन कर आंसू पोंछते हुए भरोसे के साथ बाहर निकल गए.

एक घंटे के अंदर लाश ले कर वे लोग नदी किनारे पहुंचे. चिता के ऊपर बेटी को लिटा कर समरथ सिंह जैसे ही आग लगाने के लिए बढ़े, तभी वहां पुलिस आ गई और दारोगा ने उन्हें चिता में आग लगाने से रोक दिया.

यह सुनते ही समरथ सिंह गुस्से से आगबबूला हो गए और तकरीबन चीखते हुए बोले, ‘‘तुम अपनी हद से आगे बढ़ रहे हो दारोगा.’’

‘‘नहीं, मैं अपना फर्ज निभा रहा हूं. राधे ने थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है कि आप ने अपनी बेटी की गोली मार कर हत्या कर दी है, इसलिए पोस्टमार्टम कराए बिना लाश को जलाया नहीं जा सकता.’’

समरथ सिंह ने दारोगा के पीछे खड़े राधे को जलती आंखों से देखा. वे कुछ देर गंभीर चिंता में खड़े रहे, फिर रिवाल्वर से अपने सिर में गोली मार ली.

इस घटना को देख कर वहां मौजूद लोग सन्न रह गए, तभी पगली दौड़ती हुई आई और दम तोड़ रहे समरथ सिंह के पास घुटनों के बल बैठ कर ताली बजाते हुए बोली, ‘‘देखो ठाकुर, तेरे जुल्मों की सजा तेरे साथ तेरी औलाद को भी भोगनी पड़ी. खुद ही जला कर अपनी सोने की लंका राख कर ली.’’

जैसेजैसे समरथ सिंह की सांस धीमी पड़ रही थी, वहां मौजूद लोगों में गुलामी से छुटकारा पाने का एहसास तेज होता जा रहा था. Best Story In Hindi

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