Story In Hindi: धंधा बना लिया – लक्ष्मी ने ललचाया चंपा को

Story In Hindi: ‘‘सुनती हो चंपा?’’

‘‘क्या बात है? दारू पीने के लिए पैसे चाहिए?’’ चंपा ने जब यह बात कही, तब विनोद हैरानी से उस का मुंह ताकता रह गया.

विनोद को इस तरह ताकते देख चंपा फिर बोली, ‘‘इस तरह क्या देख रहा है? मु झे पहले कभी नहीं देखा क्या?’’

‘‘मतलब, तुम से बात करना भी गुनाह है. मैं कोई भी बात करूं, तो तुम्हें लगता है कि मैं दारू के लिए ही पैसा मांगता हूं.’’

‘‘हां, तू ने अपना बरताव ही ऐसा कर लिया है. बोल, क्या कहना चाहता है?’’

‘‘लक्ष्मी होटल में धंधा करते हुए पकड़ी गई.’’

‘‘हां, मु झे मालूम है. एक दिन यही होना था. वही क्या, पूरी 10 औरतें पकड़ी गई हैं. क्या करें, आजकल औरतों ने अपने खर्चे पूरे करने के लिए यह धंधा बना लिया है. लक्ष्मी खूब बनठन कर रहती थी. वह धंधा करती है, यह बात तो मुझे पहले से मालूम थी.’’

‘‘तु झे मालूम थी?’’ विनोद हैरानी से बोला.

‘‘हां, बल्कि वह तो मुझ से भी यह धंधा करवाना चाहती थी.’’

‘‘तुम ने क्या जवाब दिया?’’

‘‘उस के मुंह पर थूक दिया,’’ गुस्से से चंपा बोली.

‘‘यह तुम ने अच्छा नहीं किया?’’

‘‘मतलब, तुम भी चाहते थे कि मैं भी उस के साथ धंधा करूं?’’

‘‘बहुत से मरद अपनी जोरू से यह धंधा करा रहे हैं. जितनी भी पकड़ी गईं, उन में से ज्यादातर को धंधेवाली बनाने में उन के मरदों का ही हाथ था,’’ विनोद बोला.

‘‘वे सब निकम्मे मरद थे, जो अपनी जोरू की कमाई खाते हैं. आग लगे ऐसी औरतों को…’’ कह कर चंपा झोंपड़ी से बाहर निकल गई.

चंपा जा जरूर रही थी, मगर उस का मन कहीं और भटका हुआ था.

चंपा घरों में बरतन मांजने का काम करती थी. जिन घरों में वह काम करती है, वहां से उसे बंधाबंधाया पैसा मिल जाता था. इस से वह अपनी गृहस्थी चला रही थी.

चंपा की 4 बेटियां और एक बेटा है. उस का मरद निठल्ला है. मरजी होती है, उस दिन वह मजदूरी करता है, वरना बस्ती के आवारा मर्दों के साथ ताश खेलता रहता है. उसे शराब पीने के लिए पैसा देना पड़ता है.

चंपा उसे कितनी बार कह चुकी है कि तू दारू नहीं जहर पी रहा है. मगर उस की बात को वह एक कान से सुनता है, दूसरे कान से निकाल देता है. उस की चमड़ी इतनी मोटी हो गई है कि चंपा की कड़वी बातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ता है.

जो 10 औरतें रैस्टहाउस के पकड़ी गई थीं, उन में से लक्ष्मी चंपा की बस्ती के मांगीलाल की जोरू है.

पुरानी बात है. एक दिन चंपा काम पर जा रही थी. कुछ देरी होने के चलते उस के पैर तेजी से चल रहे थे. तभी सामने से लक्ष्मी आ गई थी. वह बोली थी, ‘कहां जा रही हो?’

‘काम पर,’ चंपा ने कहा था.

‘कौन सा काम करती हो?’ लक्ष्मी ने ताना सा मारते हुए ऊपर से नीचे तक उसे घूरा था.

तब चंपा भी लापरवाही से बोली थी, ‘5-7 घरों में बरतन मांजने का काम करती हूं.’

‘महीने में कितना कमा लेती हो?’ जब लक्ष्मी ने अगला सवाल पूछा, तो चंपा सोच में पड़ गई थी. उस ने लापरवाही से जवाब दिया था, ‘यही कोई 4-5 हजार रुपए महीना.’

‘बस इतने से…’ लक्ष्मी ने हैरान हो कर कहा था.

‘तू सम झ रही है कि घरों में बरतन मांज कर 10-20 हजार रुपए महीना कमा लूंगी क्या?’ चंपा थोड़ी नाराजगी से बोली थी.

‘कभी देर से पहुंचती होगी, तब बातें भी सुननी पड़ती होंगी,’ जब लक्ष्मी ने यह सवाल पूछा, तब चंपा भीतर ही भीतर तिलमिला उठी थी. वह गुस्से से बोली थी, ‘जब तू सब जानती है, तब क्यों पूछ रही है?’

‘‘तू तो नाराज हो गई चंपा…’’ लक्ष्मी नरम पड़ते हुए बोली थी, ‘इतने कम पैसे में तेरा गुजारा चल जाता है?’

‘चल तो नहीं पाता है, मगर चलाना पड़ता है,’ चंपा ने जब यह बात कही, तब वह भीतर ही भीतर खुश हो गई थी.

‘अगर मेरा कहना मानेगी तो…’ लक्ष्मी ने इतना कहा, तो चंपा ने पूछा था, ‘मतलब?’

‘तू मालामाल हो सकती है,’ लक्ष्मी ने जब यह बात कही, तब चंपा बोली थी, ‘कैसे?’

‘अरे, औरत के पास ऐसी चीज है कि उसे कहीं हाथपैर जोड़ने की जरूरत नहीं पड़े. बस, थोड़ी मर्यादा तोड़नी पड़ेगी,’ चंपा की जवानी को ऊपर से नीचे देख कर जब लक्ष्मी मुसकराई, तो चंपा ने पूछा था, ‘क्या कहना चाहती है.’

‘नहीं सम झी मेरा इशारा…’ फिर लक्ष्मी ने बात को और साफ करते हुए कहा था, ‘अभी तेरे पास जवानी है. इन मर्दों से मनचाहा पैसा हड़प सकती है. ये मरद तो जवानी के भूखे होते हैं.’

‘तू मुझ से धंधा करवाना चाहती है?’ चंपा नाराज होते हुए बोली थी.

‘‘क्या बुराई है इस में? हम जैसी कितनी औरतें धंधा कर रही हैं और हजारों रुपए कमा रही हैं. फिर आजकल तो बड़े घरों की लड़कियां भी अपना खर्च निकालने के लिए यह धंधा कर रही हैं,’’ लक्ष्मी ने यह कहा, तो चंपा आगबबूला हो उठी और गुस्से से बोली थी, ‘एक औरत हो कर ऐसी बातें करते हुए तु झे शर्म नहीं आती?’

‘शर्म गई भाड़ में. अगर औरत इस तरह शर्म रखने लगी है, तो हमारे मरद हम को खा जाएं. एक बार यह धंधा अपना लेगी न, तब देखना तेरा मरद तेरे आगेपीछे घूमेगा,’ लक्ष्मी ने जब चंपा को यह लालच दिया, तब वह गुस्से से बोली थी, ‘ऐसी सीख मु झे दे रही है, खुद क्यों नहीं करती है यह धंधा?’

‘तू तो नाराज हो गई. ठीक है, अपने मरद के सामने सतीसावित्री बन. जब पैसे की बहुत जरूरत पड़ेगी न, तब मेरी यह बात याद आएगी,’ कह कर लक्ष्मी चली गई थी.

आज लक्ष्मी धंधा करती पकड़ी गई. धंधा तो वह बहुत पहले से ही कर रही थी. सारी बस्ती में यह चर्चा थी.

जब चंपा मिश्राइन के बंगले पर पहुंची, तब मिश्राइन और उस के पति ड्राइंगरूम में बैठे बातें कर रहे थे.

चंपा के पहुंचते ही मिश्राइन जरा गुस्से से बोली, ‘‘चंपा, आज तो तुम ने बहुत देर कर दी. क्या हुआ?’’

चंपा चुप रही. मिश्राइन फिर बोली, ‘‘तू ने जवाब नहीं दिया चंपा?’’

‘‘क्या करूं मेम साहब, आज हमारी बस्ती की लक्ष्मी धंधा करते हुए पकड़ी गई.’’

‘‘उस का अफसोस मनाने लगी थी?’’ मिश्राइन बोली.

‘‘अफसोस मनाए मेरी जूती…’’ गुस्से से चंपा बोली, ‘‘सारी बस्ती वाले उस पर थूथू कर रहे हैं. अच्छा हुआ कि वह पकड़ी गई.

‘‘तेरे आने के पहले उसी पर चर्चा चल रही थी…’’ मिश्राजी बोले, ‘‘लक्ष्मी भी क्या करे? पैसों की खातिर ऐसी झुग्गी झोंपड़ी वाली औरतों ने यह धंधा बना लिया है.’’

मिश्राजी ने जब यह बात कही, तब चंपा की इच्छा हुई कि कह दे, ‘आप जैसे अमीर घरों की औरतें भी गुपचुप तरीके से यह धंधा करती हैं,’ मगर वह यह बात कह नहीं सकी.

वह बोली, ‘‘क्या करें बाबूजी, हमारी बस्ती में एक औरत बदनाम होती है, यह धंधा करती है, मगर उस के पकड़े जाने पर सारी बस्ती की औरतें बदनाम होती हैं.’’ इतना कह कर चंपा बरतन मांजने रसोईघर में चली गई. Story In Hindi

Hindi Romantic Story: हार – अंधी मुहब्बत का घिनौना नतीजा

Hindi Romantic Story: जारा की उम्र उस समय महज 16 साल की थी, जब उसे अहमद से प्यार हो गया था. अहमद कोई और नही, बल्कि उस की फूफी का लड़का था और वह अकसर जारा के घर आताजाता रहता था.

अहमद एक अमीर बाप की औलाद था. उन की एक आलीशान कोठी और कपड़ों का एक बड़ा कारखाना था. इस के साथसाथ अहमद देखने में भी काफी हैंडसम था. यही वजह थी कि जारा की अम्मी बचपन से ही उस के सामने अपने शौहर से कहती रहती थीं कि हम जारा की शादी अहमद से करेंगे.

उन की ये बातें सुन कर जारा का दिल भी अहमद के लिए मचलने लगा और वह अंदर ही अंदर उस की दीवानी बन गई.

अहमद भी उस की तरफ खिंचने लगा था. वह उसे पाने के लिए बेकरार रहने लगा था. रहता भी क्यों नहीं, जारा थी ही ऐसी बला की खूबसूरत. बड़ीबड़ी आंखें, गुलाबी होंठ, सुर्ख गाल और काले घने लंबे बाल उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे.

एक दिन जारा के घर में उस के सिवा कोई न था और अचनाक अहमद आ गया. अहमद जैसे ही घर के अंदर आया, जारा ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. अहमद ने भी उसे अपने आगोश में ले लिया और दोनों यों ही एकदूसरे की बांहों में पड़े रहे.

अब जब भी अहमद को मौका मिलता, वह जारा से मिलने आ जाता. दोनों साथ जीनेमरने की कसम खाते और एकदूसरे से मिल कर बहुत खुश होते, पर अहमद को क्या पता था कि उस के प्यार से अनजान उस के घर वालों को जब जारा के बारे में पता चलेगा, तो घर में भूचाल आ जाएगा.

दरअसल, जारा के अब्बा एक दिन अहमद के अब्बा से 5 लाख रुपए एक महीने के लिए उधार ले कर गए थे, पर आज उन्हें इन रुपयों को लिए हुए 4 साल हो गए थे.

अहमद के अब्बा जब भी जारा के अब्बा से अपने पैसे मांगते थे, वे कोई न कोई बहाना बना लेते थे, जिस की वजह से उन दोनों में अनबन चल रही थी.

जारा के अब्बा कुछ दिन पहले ही अहमद के अब्बा से मिलने गए थे कि तभी अहमद के अब्बा ने उन से अपने पैसे का तकादा किया, तो जारा के अब्बा फौरन भड़क गए और बोले, ‘‘मैं तुम्हारे पैसे ले कर कोई भाग थोड़ा ही रहा हूं. जब मेरे पास होंगे दे दूंगा. तुम ने पैसे क्या दिए, मेरा जीना हराम कर दिया. जब भी मिलते हो, पैसों का तकादा करते हो.’’

अहमद के अब्बा को जारा के अब्बा के ये अल्फाज बहुत बुरे लगे और उन्होंने उन से हर तरह के ताल्लुकात तोड़ दिए. उन से साफ कह दिया, ‘‘न मुझे पैसा चाहिए और न तुम जैसा बदतमीज रिश्तेदार.’’

जारा के अब्बा घर आ गए और उन्होंने सारी बात अपनी बीवी को बताई. उस ने भी जारा के अब्बा से यह नहीं कहा कि जब तुम्हारे पास पैसे हैं तो दे क्यों नहीं देते. अभी तो बाग बेचा है. उस के काफी पैसे मिले हैं.

जारा की अम्मी ने अपने शौहर को समझाने के बजाय अहमद के अब्बा को बुराभला कहा.

अब दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर आनाजाना बंद हो गया. जारा और अहमद एकदूसरे से मिलने के लिए बेकरार रहने लगे. उन दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे कैसे एकदूसरे से मिलें.

जब जारा को इस बात का पता चला, तो उस ने अपने अब्बा से कहा, ‘‘अब्बा, उन के पैसे दे दो. काफी टाइम हो गया है और आप के पास पैसे हैं भी…’’

यह सुनते ही जारा के अब्बा आगबबूला हो गए और जारा को बुराभला कहने लगे. साथ में जारा की अम्मी भी उसे डांटने लगी, ‘‘तू कौन होती है हमें नसीहत करने वाली?’’

जारा चुपचाप एक कोने में बैठ कर रोने लगी. उसे साफ नजर आ रहा था कि अब उस का अहमद से मिलना नामुमकिन है.

वे दोनों एकदूसरे के लिए तड़पते रहे कि तभी अहमद जारा की दादी और चाचा के घर आ गया जो अहमद के भी मामू और नानी लगते थे. अहमद और जारा के प्यार से वे अनजान थे. अहमद ने हिम्मत कर के जारा की दादी को सब बता दिया और उन से कहा कि किसी तरह उन दोनों की शादी करवा दो.

दादी ने किसी को भेज कर जारा को अपने घर बुला लिया और उस से मालूम किया तो जारा ने हां कर दी. दादी ने यह रिश्ता कराने का बीड़ा उठाया.

अब जारा और अहमद को जब भी मौका मिलता, दोनों दादी की मदद से वहीं मिलते और अपनी शादी के सपने देखते हुए एकदूसरे को अपनी बांहों में भर कर खूब प्यार करते. अब जारा की उम्र भी 18 साल की हो गई थी.

जब जारा की दादी ने उस के अब्बू से अहमद और जारा की शादी की बात की और उन के प्यार के बारे में उन्हें बताया तो उन्हें गुस्सा आ गया, क्योंकि अहमद के अब्बा से उन की बोलचाल बंद थी, पर जब जारा की अम्मी ने उन्हें समझाया कि लड़का अच्छा है, घरबार भी अच्छा है, अपनी लड़की वहां जा कर राज करेगी तो उन के दिमाग में बात आ गई और वे इस शादी के लिए राजी हो गए और अगले ही दिन अहमद के अब्बा के पास जारा का रिश्ता ले कर पहुंच गए.

उन्होंने जैसे ही अहमद और जारा के प्यार के बारे में उन्हें बताया, तो वे गुस्सा हो गए और साफसाफ कह दिया, ‘‘मेरे जीतेजी तुम्हारी बेटी इस घर में कदम भी नहीं रख सकती.’’

जारा के अम्मीअब्बू वहां से चुपचाप आ गए और अब्बू ने जारा को सख्त हिदायत दे दी, ‘‘आज के बाद अहमद से मिलने की कोशिश मत करना और उसे अपनी जिंदगी से निकाल दे. उस के अब्बा ने तुम्हें अपनी बहू बनाने से साफ मना कर दिया.’’

जारा ने जब यह सुना, तो उस ने तपाक से बोल दिया, ‘‘यह सब तुम्हारी गलती से हुआ है. अगर तुम उन के पैसे दे देते, तो आज हमारा प्यार तुम्हारे पैसे और नफरत की भेंट न चढ़ता.’’

यह सुनते ही जारा के अब्बू आगबबूला हो गए और तपाक से उसे एक थप्पड़ रसीद कर दिया. जारा रोते हुए अपने कमरे में चली गई.

उधर अहमद को जब इस बात का पता चला, तो उस ने अपने अब्बा से साफ बोल दिया कि वह शादी करेगा तो सिर्फ जारा से, भले ही उस के लिए यह घर क्यों न छोड़ना पड़े.

अहमद और जारा दोनों किसी भी कीमत पर एकदूसरे से अलग नहीं होना चाहते थे. वे दोनों एकदूसरे से मिलने के लिए मौके की तलाश में लगे हुए थे.

कुछ दिन बाद जारा की दादी की मदद से दोनों एकदूसरे से मिल गए और मौका देख कर अहमद जारा को अपने साथ कहीं ले गया. इस बात का सिर्फ जारा की दादी को पता था कि वे दोनों कहां गए हैं.

जारा के अम्मीअब्बू को जब जारा के घर से भागने का पता चला तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ, पर वे कर भी क्या सकते थे. उधर अहमद के अब्बा शादी के लिए किसी भी कीमत पर तैयार न थे.

जारा के अब्बा ने अहमद के बड़े भाई और बहनोई से बात की और उन दोनों का घर से यों गायब होने के बारे में बताया और कहा, ‘‘अगर इन की शादी नहीं की गई, तो हमारी कितनी बदनामी होगी. कैसे भी कर के इन दोनों को बुला कर इन का निकाह कर दिया जाए.’’

जारा की दादी से मिल कर अहमद के बहनोई और भाई ने बात की और उन दोनों को बुला कर निकाह करा दिया.

अहमद निकाह कर के जारा को अपने बहनोई के ही घर पर ले गया. उस के बहनोई और भाई ने अहमद को समझाया कि जब तक अब्बा नहीं मान जाते, तुम यहीं रहो.

अहमद कुछ दिन जारा के साथ अपने बहनोई के घर पर ही रहा, फिर अपने भाई और बहनोई से पैसे ले कर जारा को घुमाने मुंबई ले गया और वहीं अपने एक दोस्त की मदद से एक कमरा किराए पर ले लिया और रोजगार के लिए खुद टैक्सी चलाने लगा.

इस तरह जारा और अहमद पुणे में ही रहने लगे. दोनों कुछ महीने तक तो बड़े प्यार से रह रहे थे, पर समय के साथसाथ कमाई कम और खर्चा ज्यादा होने से उन में छोटीछोटी बातों पर झगड़ा होने लगा.

अहमद के दोस्त उस के घर पर आने लगे, वहीं महफिल जमने लगी. कभी बिरयानी तो कभी पुलाव की दावत होने लगी. अहमद जो भी कमाता, उसे अपने यारदोस्तों पर लुटा देता. जारा उसे रोकने की कोशिश करती, तो वह उस के साथ मारपीट करने पर उतारू हो जाता.

अहमद ने अब कामधंधा छोड़ दिया. वह हर समय दोस्तों के साथ ताश खेलता रहता, गपशप करता रहता. घर में खाने के लाले पड़ने लगे. वह खुद तो दोस्तों के साथ बाहर खाना खा आता था, पर जारा भूखी रहती. उसे उस की कोई परवाह न थी. अहमद अब कभीकभार शराब भी पी कर आने लगा.

एक दिन जब जारा ने उसे रोकने की कोशिश की, तो उस ने उसे भद्दीभद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं. जारा के सारे सपने चकनाचूर हो कर रह गए.

एक दिन अहमद अपने दोस्तों के साथ घर पर ही शराब पी रहा था, तभी उस के एक दोस्त ने कहा, ‘‘यार, भूख लगी है. आज भाभी के हाथ की बिरयानी खिलवा दो, तो मजा आ जाए.’’

अहमद ने जारा को बिरयानी बनाने को कहा, पर वह झुंझला कर बोली, ‘‘बिरयानी कहां से बनाऊं… घर में कुछ है ही नहीं. दिनभर तो तुम अपने इन आवारा दोस्तों के साथ गपशप लड़ाने, शराब पीने में गुजार देते हो, कामधंधा कुछ करते नहीं और फरमाइश राजामहाराजा की तरह करते हो.’’

इतना सुनते ही अहमद भड़क गया और चिल्लाया, ‘‘मैं किसी महाराजा से कम नहीं था. जब से तू मेरी जिंदगी में आई है, मेरी यह हालत हो गई है. तेरी वजह से मेरे बाप ने मुझे घर से निकाल दिया…’’

इस के बाद अहमद ने अपने दोस्तों के सामने ही जारा की जम कर पिटाई की.

जारा से अब बरदाश्त करना मुश्किल हो गया था. उस ने अपने घर जाने का इरादा कर लिया और अहमद से कहा, ‘‘मुझे मेरे घर छोड़ दो.’’

अहमद जारा को उस के गांव के बाहर ही छोड़ कर अपने अब्बा के पास चला गया. जारा रोते हुए अपने घर पहुंची और अपने अम्मीअब्बा को सब हालात से वाकिफ किया.

उस के अब्बा ने समझाते हुए कहा, ‘‘कुछ दिन रुको. उस का गुस्सा भी शांत हो जाएगा और उसे अपनी गलती का भी अहसास होगा, तब वह तुम्हें लेने जरूर आएगा.’’

इस तरह कई महीने गुजर गए, लेकिन अहमद जारा को लेने नहीं आया. जारा अहमद के प्यार में इतनी पागल थी कि वह अभी भी उस का इंतजार कर रही थी और उस के बिछड़ने के गम में खानापीना भी कम कर दिया था.

बड़ी मुश्किल से जब जारा की अम्मी उसे खाना खिलाती तो वह बस इतना ही खाती जितना जीने के लिए जरूरी होता और हर समय गुमसुम रहती.

जारा के अम्मीअब्बू से उस की यह हालत देखी नहीं गई और वे जारा को ले कर अहमद के घर पहुंच गए, पर अहमद के अब्बू ने उन्हें वहीं रोक दिया और अहमद को आवाज लगाई, ‘‘यह लड़की कौन है?’’

अहमद ने जवाब दिया, ‘‘मेरी बीवी जारा है, जो मेरे दोस्तों के बिस्तर गरम करती थी. यह बदचलन है और मेरा इस से अब कोई रिश्ता नहीं. मैं इसे आप सब के सामने तलाक देता हूं… तलाक… तलाक… तलाक…’’

जारा अहमद के ये अल्फाज सुन कर हैरान रह गई. अम्मीअब्बा उसे अपने घर ले आए. जारा की हालत ऐसी हो गई जैसे वह कोई जिंदा लाश हो. उसे अहमद से ऐसी उम्मीद न थी. जो जिंदगीभर साथ जीनेमरने की कसमें खाता था, वह इतना घटिया इनसान निकलेगा, उस ने सपने में भी नहीं सोचा था.

जारा सोच रही थी, ‘मैं दुनिया की सब से बदनसीब इनसान हूं, जो मेरा प्यार जीत कर भी हार गया. मैं ने अहमद की खातिर अपने मांबाप से बगावत की, अपने प्यार की जीत की खातिर, अपने मांबाप को समाज में बेइज्जत कर के अहमद के साथ घर छोड़ कर भागी.

‘लेकिन अफसोस, हमारा प्यार जीत कर भी हार गया, इसलिए प्यार में जीत कर भी मेरी हार हो गई. क्या यही थी मेरी हार, मेरे प्यार की हार?’ Hindi Romantic Story

Family Story In Hindi: वारिस – नकारा सेठ की मदमाती सेठानी

Family Story In Hindi: अकसर शाम को मैं ने उसे गांव के अंदर से बाहर शौच को जाते समय देखा था. सिंदूर की बड़ी सी सुर्ख बिंदी लगाए हुए. उस के नीचे हमेशा चंदन का टीका लगा रहता था. यही कोई होगी साढ़े 5 फुट लंबी. गांव में औरतें इतनी लंबी कम ही होती हैं.

वैसे तो उसे बहुत खूबसूरत नहीं कहा जा सकता, पर गोरी होने के चलते मोटे नैननक्श भी ज्यादा बुरे नहीं लगते थे. बड़ी सी सिंदूर वाली बिंदी उस पर खूब फबती है. शायद इसलिए ही उस की ओर ध्यान खिंच जाता है सब का खासकर मर्द तो एक बार पलट कर देखता जरूर था, फिर चाहे कोई जवान हो या बुजुर्ग. इतनी खूबसूरत न होने पर भी कशिश तो थी, ऊपर से हंस कर बोल जाती तो थोड़ी खुरदरी जबान भी फूल ही बिखेरती आदमी जात पर.

एक बात और यह कि अपनेआप को ज्यादा खूबसूरत दिखाने के लिए वह शायद काली प्रिंट की साड़ियां ज्यादा ही पहनती है, पर वे उस पर जमती भी हैं. अरे, एक खासीयत और रह गई न उस की बाकी, वह अपने पैर बहुत ही साफसुथरे रखती है.

गांव में अकसर औरतों के पैर गंदे और एड़ियां फटी ही देखी हैं, पर लगता है कि वह दिन में कई बार रगड़ती होगी, इसलिए ही तो कांच सी चमकदार हुई रहती हैं उस की एड़ियां ऊपर से, जिन में चांदी की बड़ीबड़ी पाजेब पहने रहती है. झनकझनक चलती तो दूर से पहचान हो जाती और ऊपर से इठलाइठला कर चलना तो लगता कहर ही है.

हां, यही सही में सेठजी की घरवाली है. सेठ धनपत लाल की शादी के तकरीबन 10 बरस बाद भी उस का मूंग भी मैला नहीं हुआ. जैसी आई थी, अब भी वैसी ही है. न मोटी हुई, न पतली.

इतनी धनदौलत है कि चाहे तो धन के कुल्ले करे धनपत लाल. उस के पास बस कमी है तो आंगन में खेलने वाले की, नन्ही किलकारी के गुंजन की. अरे मतलब, अब तक सेठानी की गोद खाली है. शुरू के 5-6 साल तो खेलतेखाते निकल ही गए, मगर अब सेठजी की मां आएदिन ताने देती रहती है.

लोग भी बीच रास्ते में कानाफूसी करते हैं कि सेठ दूसरी औरत लाने के जुगाड़ में है. आतेजाते लोग सेठजी की तारीफ में चुटकी लेले कर कह ही देते हैं कि धनपत लाल तो तराजू पर ध्यान देते हैं, घरवाली पर नहीं.

कुछ लोग बोलते कि गढ़ी के दरवाजे के पास सट्टे हवेली से सुबह अंधेरे एक औरत को निकलते देखा. साफसाफ तो नहीं दिख रही थी, कदकाठी से धनपत लाल की ही घरवाली लग रही थी.

किसी ने सवाल किया कि वह तो लखन सिंह का घर है, वहां क्या करने जाएगी सेठ धनपत की घरवाली? इसी तरह बात आईगई हो गई, पर जब भी मैं उसे देखती, मुझे लगता कि वह अपना दर्द शायद बड़ी सी बिंदी के पीछे छिपाए घूम रही थी.

सुनने में आ रहा था कि अकसर धनपत लाल और उस की घरवाली के बीच कुछ महीनों से झगड़े बढ़ रहे हैं. आए 2-4 दिन में वह देर रात झगड़ा कर कहीं चली जाती है. सास अपनी बहू को ढूंढ़ती रहती है और भोर होते ही वह वापस आ जाती है.

कुछ महीनों तक तो वही सब चलता रहा, अचानक एक दिन सुनने में आया कि इतने बरसों के बाद धनपत लाल की घरवाली के पैर भारी हैं. पूरे गांव में खुशी की लहर है. जहां देखो, वहां वही चर्चा. दुकान पर तो जो भी गया, मिठाई खाए बगैर कैसे आ जाता भला.

अब लड़ाईझगड़े खत्म हो गए थे. रूठ कर जानाआना तो शायद बरसों पहले की बात हो गई. सुना है कि सास तो बहू की सेवा में हाजिर ही खड़ी रहती है. बढ़ते पेट के साथ खुशी में देखतेदेखते कब 9 महीने निकल गए, पता ही नहीं चला.

आज जब गांव में पटाखे चले, बंदूकें चलीं तो पता चला कि सेठ धनपत के बेटा हुआ है.

समय पंख लगा कर उड़ गया. मैं ने आज अचानक देखा, वही बड़ी सी बिंदी लगाए नीचे चंदन का तिलक लगा कर वही की वही शाम को काले फ्लौवर वाली प्रिंट की साड़ी पहने आ रही थी धीरेधीरे.

पल्लू पकड़े एक गोराचिट्टा गोलमटोल सिर पर जूड़ा बांधे आंखों में काजल लगाया हुआ बालक. काजल इतना बड़ा शायद इसलिए कि किसी की नजर न लग जाए उस के अनमोल लाल को.

वह मस्त मदमाती हथिनी सी चल रही थी. उसे देख कर लग रहा था कि जो भी चमक आज उस की बिंदिया में है, वह मां बन कर आ गई या फिर सेठ धनपत लाल को वारिस दे कर. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: दूसरी भूल – अनीता की कशमकश

Hindi Family Story: अनीता बाजार से कुछ घरेलू चीजें खरीद कर टैंपू में बैठी हुई घर की ओर आ रही थी. एक जगह पर टैंपू रुका. उस टैंपू में से 4 सवारियां उतरीं और एक सवारी सामने वाली सीट पर आ कर बैठ गई.जैसे ही अनीता की नजर उस सवारी पर पड़ी, तो वह एकदम चौंक गई और उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं.

इस से पहले कि अनीता कुछ कहती, सामने बैठा हुआ नौजवान, जिस का नाम मनोज था, ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘अरे अनीता, तुम?’’

‘‘हां मैं,’’ अनीता ने बड़े ही बेमन से जवाब दिया.

‘‘तुम कैसी हो? आज हम काफी दिन बाद मिल रहे?हैं,’’ मनोज के चेहरे पर खुशी तैर रही थी.

‘‘मैं ठीक हूं.’’

‘‘मुझे पता चला था कि यहां इस शहर में तुम्हारी शादी हुई है. जान सकता हूं कि परिवार में कौनकौन हैं?’’

‘‘मेरे पति, 2 बेटियां और एक बेटा,’’ अनीता बोली.

‘‘तुम्हारे पति क्या करते हैं?’’

‘‘कार मेकैनिक हैं.’’

‘‘क्या नाम है?’’

‘‘नरेंद्र कुमार.’’

‘‘मैं यहां अपनी कंपनी के काम से आया था. अब काम हो चुका है. रात की ट्रेन से वापस चला जाऊंगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘घर का पता नहीं बताओगी?’’

‘‘क्या करोगे पता ले कर?’’ अनीता कुछ सोचते हुए बोली.

‘‘कभी तुम से मिलने आ जाऊंगा.’’

‘‘क्या करोगे मिल कर? देखो मनोज, अब मेरी शादी हो चुकी?है और मुझे उम्मीद है कि तुम ने भी शादी कर ली होगी. तुम्हारे घर में भी पत्नी व बच्चे होंगे.’’

‘‘हां, पत्नी और 2 बेटे हैं. तुम मुझे पता बता दो. वैसे, तुम्हारे घर आने का मेरा कोई हक तो नहीं है, पर एक पुराने प्रेमी नहीं, बल्कि एक दोस्त के रूप में आ जाऊंगा किसी दिन.’’

‘‘शिव मंदिर के सामने, जवाहर नगर,’’ अनीता ने कहा.

कुछ देर बाद टैंपू रुका. अनीता टैंपू से उतरने लगी.

‘‘अनीता, अब तो रात को मैं वापस आगरा जा रहा हूं, फिर किसी दिन आऊंगा.’’

अनीता ने कोई जवाब नहीं दिया. घर पहुंच कर उस ने देखा कि उस की बड़ी बेटी कल्पना, छोटी बेटी अल्पना और बेटा कमल कमरे में बैठे हुए स्कूल का काम कर रहे थे.

अनीता ने कल्पना से कहा, ‘‘बेटी, मैं जरा आराम कर रही हूं. सिर में तेज दर्द है.’’

‘‘मम्मी, आप को डिस्प्रिन की दवा या चाय दूं?’’ कल्पना ने पूछा.

‘‘नहीं बेटी, कुछ नहीं,’’ अनीता ने कहा और दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

अनीता को तकरीबन 11 साल पहले की बातें याद आने लगीं. जब वह 12वीं जमात में पढ़ रही थी. कालेज से छुट्टी होने पर वह एक नौजवान को अपने इंतजार में पाती थी. वह मनोज ही था. उन दोनों का प्यार बढ़ने लगा. अनीता जान चुकी थी कि मनोज किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा है.

मनोज के पिताजी का अपना कारोबार था और अनीता के पिताजी का भी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, पर अनीता के पापा को यह रिश्ता बिलकुल मंजूर नहीं था.

लिहाजा, अनीता और मनोज ने घर से भागने की ठान ली. घर से 50 हजार रुपए नकद व कुछ जेवर ले कर अनीता मनोज के साथ जयपुर जाने वाली ट्रेन में बैठ गई थी.

जयपुर पहुंच कर वे 8-10 दिन होटल में रहे. पता नहीं, पुलिस को कैसे पता चल गया और उन दोनों को पकड़ लिया गया. अनीता के पापा को आगरा से बुलाया गया. मनोज को पुलिस ने नहीं छोड़ा. नाबालिग लड़की को भगाने के अपराध में जेल भेज दिया गया.

पापा को अनीता से बहुत नफरत हो गई थी, क्योंकि उस ने कहना नहीं माना था.

अनीता ने आगे पढ़ाई करने को कहा था, पर पापा ने मना कर दिया था और उस की शादी करने की ठान ली थी. उस के लिए रिश्ते ढूंढ़े जाने लगे.

सालभर इधरउधर धक्के खाने के बाद पापा को एक रिश्ता मिल ही गया था. विधुर नरेंद्र की उम्र 35 साल थी. उस की पत्नी की एक हादसे में मौत हो चुकी थी. उस की 2 बेटियां थीं. एक 5 साल की और दूसरी 3 साल की.

नरेंद्र एक कार मेकैनिक था. उस की अपनी वर्कशौप थी. पापा ने नरेंद्र से जब शादी की बात की, तो उसे सब सच बता दिया था. नरेंद्र ने सब जान कर भी मना नहीं किया था.

अनीता शादी कर के नरेंद्र के घर आ गई थी. अब वह 2 बेटियों की मां बन गई थी.

एक दिन नरेंद्र ने कहा था, ‘देखो अनीता, मुझे तुम्हारी पिछली जिंदगी से कोई मतलब नहीं. तुम भी वह सब भुला दो. इस घर में आने का मतलब है कि अब तुम्हें एक नई जिंदगी शुरू करनी है. अब तुम अल्पना और कल्पना की मम्मी हो… तुम्हें इन दोनों को पालना है.’

‘जी हां, मैं ऐसा ही करूंगी. अब कल्पना और अल्पना आप की ही नहीं, मेरी भी बेटियां हैं,’ अनीता ने कहा था.

एक साल बाद अनीता ने एक बेटे को जन्म दिया था. बेटा पा कर नरेंद्र बहुत खुश हुआ था. बेटे का नाम कमल रखा गया था.

अनीता नरेंद्र को पति के रूप में पा कर खुश थी और उस ने भी कभी शिकायत का मौका नहीं दिया था. पापामम्मी भी अपना गुस्सा भूल कर अब उस से मिलने आने लगे थे.

आज दोपहर अनीता की अचानक मनोज से मुलाकात हो गई. उसे मनोज को घर का पता नहीं देना चाहिए था.

उस के दिल में एक अनजाना सा डर बैठने लगा. वह आंखें बंद किए चुपचाप लेटी रही.

अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे अनीता रसोई में खाना तैयार कर रही थी. कालबेल बज उठी. उस ने दरवाजा खोला, तो सामने मनोज खड़ा था.

‘‘तुम…’’ अनीता के मुंह से अचानक ही निकला,’’ तुम तो कह रहे थे कि मैं रात की गाड़ी से आगरा जा रहा हूं.’’

‘‘अनीता, मुझे रात की गाड़ी से ही आगरा जाना था, पर टैंपू में तुम से मिलने के बाद मेरा दिल दोबारा मिलने को बेचैन हो उठा. होटल में रातभर नींद नहीं आई. तुम्हारे बारे में ही सोचता रहा. तुम नहीं जानती अनीता कि मैं आज भी तुम को कितना चाहता हूं,’’ मनोज ने कहा.

अनीता चुपचाप खड़ी रही. उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अनीता, अंदर आने के लिए नहीं कहोगी क्या? मैं तुम से केवल 10 मिनट बातें करना चाहता हूं.’’

‘‘आओ,’’ न चाहते हुए भी अनीता के मुंह से निकल गया.

कमरे में सोफे पर बैठते हुए मनोज ने इधरउधर देखते हुए पूछा, ‘‘कोई दिखाई नहीं दे रहा है… सभी कहीं गए हैं क्या?’’

‘‘बच्चे स्कूल गए हैं और नरेंद्र वर्कशौप गए हैं,’’ अनीता बोली.

तभी रसोई से गैस पर रखे कुकर से सीटी की आवाज सुनाई दी.

‘‘जो कहना है, जल्दी कहो. मुझे खाना बनाना है.’’

‘‘अनीता, तुम अब पहले से भी ज्यादा खूबसूरत हो गई हो. दिल करता है कि तुम्हें देखता ही रहूं. क्या तुम्हें जयपुर के होटल के उस कमरे की याद आती है, जहां हम ने रातें गुजारी थीं?’’

‘‘क्या यही कहने के लिए तुम यहां आए हो?’’

‘‘अनीता, मैं तुम्हारे पति को सब बताना चाहता हूं.’’

‘‘तुम उन्हें क्या बताओगे?’’ अनीता ने घबरा कर पूछा.

‘‘मैं नरेंद्र से कहूंगा कि जयपुर में मैं अकेला ही नहीं था. मेरे 2 दोस्त और भी थे, जिन के साथ अनीता ने खूब मस्ती की थी.’’

‘‘झठ, बिलकुल झूठ,’’ अनीता गुस्से से चीखी.

‘‘यह झूठ है, पर इसे मैं और तुम ही तो जानते हैं. तुम्हारा पति तो सुनते ही एकदम यकीन कर लेगा,’’ मनोज ने अनीता की ओर देखते हुए कहा.

अनीता ने हाथ जोड़ कर पूछा, ‘‘तुम आखिर चाहते क्या हो?’’

‘‘मैं चाहता हूं कि आज दोपहर बाद तुम मेरे होटल के कमरे में आ जाओ.’’

‘‘नहीं मनोज, मैं नहीं आऊंगी. अब मैं अपनी जिंदगी में जहर नहीं घोलूंगी. नरेंद्र मुझ पर बहुत विश्वास करते हैं. मैं उन से विश्वासघात नहीं करूंगी,’’ अनीता ने मनोज से घूरते हुए कहा.

‘‘तो ठीक है अनीता, मैं नरेंद्र से मिलने जा रहा हूं वर्कशौप पर,’’ मनोज ने कहा.

‘‘वर्कशौप जाने की जरूरत नहीं है. मैं यहीं आ गया हूं,’’ नरेंद्र की आवाज सुनाई पड़ी.

यह देख अनीता और मनोज बुरी तरह चौंक उठे. अनीता के चेहरे का रंग एकदम पीला पड़ गया.

‘‘यहां क्यों आया है?’’ नरेंद्र ने मनोज को घूरते हुए पूछा, ‘‘तुझे इस घर का पता किस ने दिया?’’

‘‘अनीता ने. कल यह मुझे बाजार में मिली थी,’’ मनोज बोला.

अनीता ने घबराते हुए नरेंद्र को पूरी बात बता दी.

‘‘अबे, तुझे अनीता ने पता क्या इसलिए दिया था कि तू घर आए और उसे ब्लैकमेल करे. मैं ने तुम दोनों की बातें सुन ली हैं. अब तू यहां से दफा हो जा. फिर कभी इस घर में आने की कोशिश की, तो पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ नरेंद्र ने मनोज की ओर नफरत से देखते हुए गुस्साई आवाज में कहा.

मनोज चुपचाप घर से निकल गया.अनीता को रुलाई आ गई. वह सुबकते हुए बोली, ‘‘मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी भूल हो गई, जो मैं ने मनोज को घर का पता दे दिया था.’’

‘‘हां अनीता, यह तुम्हारी जिंदगी की दूसरी भूल है, जो तुम ने अपने दुश्मन को घर में आने दिया. मनोज तुम्हारा प्रेमी नहीं, बल्कि दुश्मन था. सच्चे प्रेमी कभी भी अपनी प्रेमिका को घर से रुपएगहने वगैरह ले कर भागने को नहीं कहते.’’

अनीता की आंखों से आंसू बहते रहे. नरेंद्र ने उस के चेहरे से आंसू पोंछते हुए कहा, ‘‘अनीता, मुझे तुम पर बहुत विश्वास था, पर आज की बातें सुन कर यह विश्वास और बढ़ गया है. वैसे तो मनोज अब यहां नहीं आएगा और अगर आ भी गया, तो मुझे फोन कर देना. मैं उसे पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

नरेंद्र की यह बात सुन कर अनीता के मुंह से केवल इतना ही निकला, ‘‘आप कितने अच्छे हैं…’ Hindi Family Story

Hindi Romantic Story: वहम – पत्नी के पहलू में गैर मर्द से झल्लाया सागर

Hindi Romantic Story: सागर का शिप बैंकौक से मुंबई के लिए सेल करने को तैयार था. वह इंजनरूम में अपनी शिफ्ट में था. उस का शिप मुंबई से बैंकौक, सिंगापुर, हौंगकौंग होते हुए टोक्यो जाता था. वापसी में वह बैंकौक तक आ गया था. तभी शिप के ब्रिज (इसे कंट्रोलरूम कह सकते हैं) से आदेश आया रैडी टु सेल.

सागर ने शक्तिशाली एअर कंप्रैसर स्टार्ट कर दिया. जैसे ही ब्रिज से आदेश मिला ‘डैड स्लो अहेड’ उस ने इंजन में कंप्रैस्ड एअर और तेल छोड़ा और जहाज बैंकौक पोर्ट से निकल पड़ा. फिर ऊपर ब्रिज से जैसा आदेश मिलता, जहाज स्लो या फास्ट स्पीड से चलता गया. आधे घंटे के अंदर ही जहाज हाई सी में था. तब और्डर मिला ‘फुल अहेड.’

अब शिप अपनी पूरी गति से सागर की लहरों को चीरता हुआ मुंबई की ओर बढ़ रहा था. सागर निश्चिंत था, क्योंकि सिर्फ 3 हजार नौटिकल मील का सफर रह गया था. लगभग 1 सप्ताह के अंदर वह मुंबई पहुंचने वाला था. उसे मुंबई छोड़े 4 महीने हो चुके थे.

अपनी 4 घंटे की शिफ्ट खत्म कर सागर अपने कैबिन में सोफे पर आराम कर रहा था. मन बहलाने के लिए उस ने फिल्म ‘रुस्तम’ की सीडी अपने लैपटौप में लगा दी. इस फिल्म को वह पूरा देख भी नहीं सका था. उस का मन बहुत बेचैन था.

‘रुस्तम’ से पहले भी उस ने एक पुरानी फिल्म ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ देखी थी. दोनों की स्टोरी लगभग एक ही थी, जिस में दिखाया गया था कि जब मर्चेंट नेवी का अफसर लंबी यात्रा पर जाता है, तो उस की पत्नी को मौजमस्ती करने का भरपूर मौका मिलता है.

उस के मन में भी शंका हुई कि कहीं उस की पत्नी शैलजा भी ऐसा ही कुछ करती हो. हालांकि तुरंत उस ने मन से यह डर भगाया, क्योंकि शैलजा उसे बहुत प्यार करती थी. पूरी यात्रा में जब भी तट पर होता वह फोन पर उस से कहा करती कि जल्दी लौट आओ, तुम्हें बहुत मिस कर रही हूं. मम्मी भी इलाहाबाद अपने मायके चली गई हैं.

सागर को शादी के 3 महीने के अंदर ही टोक्यो जाना पड़ा था. उस की पत्नी मुंबई में ही एक अपार्टमैंट में रहती थी. बीचबीच में सागर की मां इलाहाबाद से आ कर रहती थीं. उस की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उस ने अपार्टमैंट के दरवाजे पर एक ‘रिंग डोरबैल’ लगा दी थी. इस में एक सैंसर और कैमरा लगा होता है, जो वाईफाई द्वारा अलगअलग चुनिंदा सैल फोन ऐप्स से जुड़ा होता है.

दरवाजे पर कोई भी हरकत होने से या कौलबैल बजने से दरवाजे के बाहर का दृश्य सैल फोन पर देख सकते हैं. इतना ही नहीं टौक बटन दबाने से बाहर खड़े व्यक्ति से बात भी कर सकते हैं.

सागर ने पत्नी शैलजा और मां के फोन के अतिरिक्त मुंबई में एक रिश्तेदार के सैल फोन से इस डोरबैल को कनैक्ट कर रखा था. सागर की पत्नी शैलजा कुछ पार्टटाइम काम करती थी. बाकी टाइम घर में ही रहती थी. कभीकभी बोर हो जाती थी. हालांकि उस की सास से काफी पटती थी पर सभी बातें तो उन से वह शेयर नहीं कर सकती थी और वैसे फिर आजकल वे भी नहीं थीं.

सागर ने शैलजा को मुंबई पहुंचने का अनुमानित समय बता दिया था. फ्लैट की एक चाबी सागर के पास होती थी. शिप अब आधी दूरी तय कर भारतीय समुद्र सीमा में था. सागर 3 दिन से कुछ कम ही समय में मुंबई पहुंचने वाला था. इधर शिप बंगाल की खाड़ी की लहरों पर हिचकोले खा रहा था उधर उस का मन भी शैलजा से मिलने की आस में बेचैन था. वह केबिन में आराम कर रहा था कि दरवाजा खटखटा कर उस का सहकर्मी अंदर आया. बोला, ‘‘यार तुम ने ‘रुस्तम’ देख ली हो तो सीडी मुझे देना.’’

दोस्त तो सीडी ले कर चला गया पर एक बार फिर सागर का मन शंकित हो उठा कि कहीं उस की पत्नी भी किसी गैर की बांहों में न पड़ी हो. बहरहाल, उस ने मन को समझाया कि यह मात्र वहम है. मेरी शैलजा वैसी नहीं हो सकती है जैसा मूवी में दिखाया गया है.

सागर का जहाज मुंबई पोर्ट के निकट था पर पोर्ट पर बर्थ खाली नहीं होने के कारण जहाज को थोड़ी दूरी पर लंगर डालना पड़ा. शाम होने वाली थी. उस का वाईफाई काम करने लगा था. उस के फोन पर मैसेज मिला ‘रिंग ऐट योर डोर’. हलकी बारिश हो रही थी.

उस ने अपने फोन में देखा कि फ्लैट के दरवाजे पर जींस पहने छाता लिए कोई खड़ा है. शैलजा ने हंस कर उसे गले लगाया और फिर दरवाजा बंद हो गया. छाते की वजह से वह उस का चेहरा नहीं देख सका. पहले तो उस ने पत्नी को कहा था कि वह जहाज से निकलने से पहले उसे फोन करेगा पर इस दृश्य को देख कर उस ने अपना इरादा बदल लिया.

जहाज के लंगर डालने के थोड़ी देर बाद कंपनी के लौंच से वह तट पर आया. उस ने टैक्सी ली और अपने फ्लैट पर जा पहुंचा. तब तक लगभग मध्य रात्रि हो चुकी थी. उस ने अपनी चाबी से फ्लैट का दरवाजा जानबूझ कर धीरे से खोला ताकि कोई आहट न हो. अंदर फ्लोर लाइट का हलका प्रकाश था.

सागर ने अंदर आ कर देखा कि बैडरूम का दरवाजा खुला है. शैलजा झीनी नाइटी में अस्तव्यस्त किसी व्यक्ति के बहुत करीब सोई थी. वह व्यक्ति जींस और टीशर्ट पहने था. उस की कमर पर शैलजा की बांह थी. सागर केवल उस व्यक्ति की पीठ देख सकता था. उस के मन में संदेह हुआ कि यह शैलजा का कोई आशिक ही होगा. वह दबे पांव फ्लैट लौक कर लौट पड़ा. उस ने 3 दिन की छुट्टी ले रखी थी. वहां से सीधे होटल में जा कर ठहरा.

रात काफी हो चुकी थी. फिर भी उसे नींद नहीं आ रही थी. नींद खुली तो उस ने रूम में ही हलका ब्रेकफास्ट मंगवा लिया. थोड़ी देर बाद सागर ने शैलजा को फोन कर बताया कि वह मुंबई पहुंच गया है. फिर पूछा ‘‘कैसी हो शैलजा?’’

शैलजा बोली, ‘‘अच्छी हूं. पर कल रात बहुत थक गई थी और करीब 12 बजे सोई तो सुबह 7 बजे महरी आई तब नींद खुली. पर बड़ा मजा आया रात में वरना मैं तो बोर हो रही थी. तुम जल्दी आओ न? जहाज तो किनारे लग चुका होगा. कब आ रहे हो?’’

‘‘मैं जहाज से उतरने ही वाला हूं, 2-3 घंटे में आ रहा हूं.’’

सागर के पास सामान के नाम पर एक अटैची भर थी. उस ने टैक्सी ली. अपार्टमैंट पहुंच कर सिक्युरिटी वाले को अटैची रखने को दी और कहा, ‘‘जब मैं फोन करूं तब इसे मेरे फ्लैट में भेज देना.’’ फ्लैट पहुंच कर उस ने बैल बजाई तो

शैलजा ने अपने फोन पर उस का वीडियो देख लिया, दरवाजा खोल कर शैलजा उस के गले से लिपट गई. वह बैडरूम में गया और बोला, ‘‘शैलजा, टौवेल लाना, बाथरूम जाना है.’’

‘‘बाथरूम तो बिजी है. तुम गैस्टरूम वाले बाथ में चले जाओ.’’

‘‘क्यों? कोई है अंदर?’’

‘‘हां, कोई है.’’

‘‘कौन है?’’

‘‘देख लेना थोड़ी देर में. इतनी जल्दी क्या है?’’

‘‘नहीं, मुझे बाथ टब में नहाना है और गैस्टरूम में बाथ टब नहीं है. पर तुम से जरूरी बात भी करनी है.’’

‘‘ठीक है, थोड़ी देर गैस्टरूम में ही आराम करो, मैं चाय ले कर आती हूं. वहां बात कर लूंगी.’’

सागर गैस्टरूम में बैड पर लेट गया. उस ने सिक्युरिटी को फोन कर नीचे से अपना अटैची मंगवा ली. थोड़ी देर में शैलजा चाय दे कर किचन में चली गई.

कुछ देर बाद शैलजा ने कहा, ‘‘सागर, बाथरूम खाली हो गया है. अब तुम बैडरूम में जा कर बाथरूम यूज कर सकते हो.’’

सागर बाथरूम में गया. उस ने देखा कि वहां कल रात वाली जींस और टीशर्ट टंगी थी. जब तक वह नहा कर निकला शैलजा की आवाज आई, ‘‘डाइनिंग टेबल पर ही आ जाओ, नाश्ता रैडी है.’’

शैलजा ने जूस ला कर दिया, उस के बाद छोले की सब्जी का बाउल रख कर बोली, ‘‘एक मिनट में गरमगरम कचौरियां ले कर आ रही हूं.”

‘‘कचौरियां बाद में आ जाएंगी, पहले तुम यहां बैठो. तुम से जरूरी बात करनी है.’’

तभी किचन से आवाज आई, ‘‘तुम लोग वहीं बैठ कर बातें करो. मैं गरमगरम कचौरियां ले कर आ रही हूं.’’

थोड़ी देर में एक औरत ट्रे में कचौरियां ले कर आई और टेबल के पास बैठ गई. सागर उसे आश्चर्य से देखने लगा तो वह बोली ‘‘मुझे ही देखते रहोगे तो कचौरियां ठंडी हो जाएंगी.’’

शैलजा बोली, ‘‘यह नीरू है. मेरी ममेरी भाभी. मेरे भैया उम्र में हम से सिर्फ 2 साल बड़े हैं. यह भाभी कम दोस्त ज्यादा है. हम लोग क्लासफैलो भी रहे हैं. आजकल यह नासिक में है. इस के पहले तो गुवाहाटी में थी. कौंटैक्ट तो न के बराबर रहा था. भैया टूअर पर गए हैं, तो यहां चली आई. भैया की शादी में हम लोग नहीं जा सके थे.’’

‘‘बाथरूम में जींस और टीशर्ट किस की है?’’

‘‘नीरू भाभी की. कल शाम जब यह आई तो हम दोनों अपार्टमैंट के क्लब में चली गईं. वहां काफी देर तक बैडमिंटन खेलती रहीं. दोनों बहुत थक गई थीं. मैं ने इस से कहा था कि कपड़े चेंज कर ले पर यह इन्हीं कपड़ों में सो गई थी.’’

‘‘इतना ही नहीं, उस के बाद हम लोग, ‘रुस्तम’ मूवी देखने लगे. सीडी पड़ी है, तुम भी देख लेना.’’

“तुम लोगों ने भी ‘रुस्तम’ देखी? सागर ने पूछा.

‘‘हां. इस में ताज्जुब की क्या बात है?’’ नीरू बोली.

‘‘ताज्जुब की बात नहीं है. मैं ने भी शिप में देखी है,’’ और फिर सागर मन ही मन सोचने लगा कि अच्छा हुआ उस ने शैलजा से इस बारे में कोई बात नहीं की. उस के दिल और दिमाग से ‘रुस्तम’ का वहम निकला गया था.

तभी शैलजा बोली, ‘‘तुम कोई जरूरी बात करने वाले थे.’’

सागर ने असली बात को दिल में छिपाते हुए कहा, ‘‘मेरा शिप 10 दिन में फिर टोक्यो के लिए सेल करेगा.’’

‘‘मैं आज शाम को चली जाऊंगी. मेरे सामने थोड़े ही देवरजी जरूरी बात करेंगे,’’ नीरू बोली.

सभी हंसने लगे, पर असल माजरा तो सिर्फ सागर ही समझ रहा था. Hindi Romantic Story

Social Awareness: धर्म की दुकान चले इसलिए बना कानून

Social Awareness, लेखक – शकील प्रेम

साल 2021 में उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून ‘उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021’ लागू हुआ था. यह कानून जबरन, धोखे से, लालच दे कर या शादी के जरीए गैरकानूनी धर्मांतरण को रोकने के लिए बनाया गया था. इस में एक से 10 साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है. साल 2024 में इस कानून में और सख्ती कर अधिकतम सजा को बढ़ा कर उम्रकैद तक की सजा कर दी गई.

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में धर्मांतरण विरोधी इस कानून पर गंभीर सवाल उठाए हैं. अदालत ने कहा कि अगर कोई शख्स अपनी मरजी से धर्म बदलना चाहे तो यह कानून उस के लिए मुश्किलें खड़ी करता है.

विश्व हिंदू परिषद के द्वारा धर्मांतरण के आरोप में 35 लोगों और 20 अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था. यह मामला फतेहपुर के हरिहरगंज में बने इवेंजेलिकल चर्च औफ इंडिया में सामूहिक धर्मांतरण के एक आयोजन से जुड़ा था. एक और मामले में सैम हिगिनबौटम कृषि, प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान विश्वविद्यालय (एसएचयूएटीएस) के कुलपति डाक्टर राजेंद्र बिहारी लाल को आरोपी बनाया गया था.

17 अक्तूबर के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने डाक्टर राजेंद्र बिहारी लाल और दूसरों के खिलाफ धर्म परिवर्तन के मामले को खारिज कर दिया. कुलमिला कर अदालत ने पुलिस की 6 में से 5 चार्जशीटों को रद्द कर दिया.

धर्म परिवर्तन के एक और मामले में सुबूतों पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने पाया कि पीडि़त और गवाहों द्वारा पेश किए गए हलफनामे साइक्लोस्टाइल तरीके से तैयार किए गए थे और उन की निजी जानकारियों को बदलने के बाद उसी मसौदे को कौपी पेस्ट किया गया था.

इस में यह भी सवाल उठाया गया कि उन गवाहों के बयान अभियोजन पक्ष के मामले में कैसे मदद कर सकते हैं, जिन्होंने न तो धर्म परिवर्तन किया था और न ही सामूहिक धर्म परिवर्तन की जगह पर थे.

कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन को फटकार लगाते हुए कहा कि आपराधिक कानून को बेकुसूर लोगों को परेशान करने का साधन नहीं बनाया जा सकता, जिस से कि सरकारी एजेंसियों को पूरी तरह से बेबुनियाद सुबूतों की बुनियाद पर अपनी मरजी से अभियोजन शुरू करने की इजाजत मिल सके.

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की खंडपीठ ने धर्म परिवर्तन के मामले में सरकारी अफसरों के दखल पर भी चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि इस मामले में उत्तर प्रदेश धर्मांतरण अधिनियम के नियमों की संवैधानिक वैधता पर गौर करना हमारा काम नहीं है, फिर भी हम यह मानने से खुद को नहीं रोक सकते कि धर्मांतरण अधिनियम के कुछ प्रावधान बहुत ही कठिन हैं. जो शख्स अपनी मरजी से अपने धर्म के अलावा कोई दूसरा धर्म अपनाना चाहता है, उस के लिए रास्ते मुश्किल कर दिए गए हैं, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है.

कोर्ट ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना और कौन्स्टिट्यूशन के सैकुलर मूल्यों पर जोर देते हुए कहा कि भारत की सैकुलर प्रवित्ती संविधान के ‘मूल ढांचे’ का अभिन्न अंग है. संविधान की प्रस्तावना में भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के अलावा विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता सुनिश्चित करने और उन सभी के बीच बंधुत्व को बढ़ावा देने, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने का संकल्प लिया गया है.

बड़ी अदालत ने कहा कि भारत के लोगों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था और पूजा की स्वतंत्रता दी गई है और यह स्वतंत्रता देश की धर्मनिरपेक्ष प्रकृति की अभिव्यक्ति है. संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है कि सभी व्यक्तियों को अंतरात्मा की स्वतंत्रता प्राप्त करने का समान अधिकार होगा और उन्हें धर्म को मानने, उस का अभ्यास करने और प्रचार करने का अधिकार होगा, जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता के अधीन हैं.

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में लोगों को अपने धार्मिक विचारों का प्रचार करने का अधिकार है.

अनुच्छेद 25 द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के अधीन, हमारे संविधान के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मौलिक अधिकार है कि वह ऐसे धार्मिक विश्वास को अपनाए, जिसे वह अपने विवेक से स्वीकार करता हो.

कोर्ट के इस अहम फैसले से यह तो साबित होता ही है कि धर्मांतरण विरोधी कानून की आड़ में ईसाई और मुसलिम को निशाना बनाया जा रहा है. यह मुद्दा हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए जरूरी भी है, लेकिन जब आंकड़ों पर नजर डालते हैं, तो यह मुद्दा पूरी तरह प्रोपगैंडा ही साबित होता है.

प्यू रिसर्च सैंटर के मुताबिक 98 फीसदी लोग वही धर्म मानते हैं जो उन्हें बचपन में मिला होता है. हिंदू 0.7 फीसदी बाहर जाते हैं, लेकिन 0.8 फीसदी अंदर आते हैं. ईसाई महज 0.4 फीसदी हिंदू से कन्वर्ट होते हैं, लेकिन कुल ईसाई आबादी में नैट गेन सिर्फ 0.3 फीसदी का है. वहीं मुसलिम कन्वर्जन तो और भी कम 0.2 फीसदी है.

साल 1951 से साल 2011 के बीच का जनगणना डाटा भी यह बताता है कि ईसाई आबादी स्थिर (2.3 फीसदी) बनी हुई है. इस में 60 सालों में कोई बड़ा इजाफा नहीं हुआ है. यह डाटा मिशनरीज के द्वारा ‘मास कन्वर्जन’ के दावों को खारिज करता है.

प्यू रिसर्च सैंटर के मुताबिक, फर्टिलिटी रेट सभी धर्मों में घट रहा है. हिंदू में 2.1 फीसदी, मुसलिम में 2.6 फीसदी और ईसाई में महज 2 फीसदी है. हालांकि यह बात सच है कि सबसे ज्यादा हिंदू ही कन्वर्ट करते हैं. गुजरात में धर्म परिवर्तन के कुल आवेदन में 93 फीसदी के आसपास हिंदू आवेदक होते हैं, लेकिन इस से हिंदू धर्म को कोई नैट लौस नहीं है.

‘उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन निषेध अधिनियम, 2021’ के तहत साल 2020 से कुल 427 केस रजिस्टर हुए जिन में 833 गिरफ्तारियां हुईं, लेकिन इन में ज्यादातर मामले कोर्ट में झूठे साबित हुए.

धर्मांतरण का डर दिखा कर अकसर यह फैलाया जाता है कि मुसलिम साल 2035 तक बहुमत में हो जाएंगे, लेकिन यह भी महज प्रोपगैंडा ही साबित होता है, क्योंकि मुसलिमों में भी फर्टिलिटी गैप लगातार सिकुड़ रहा है.

एक झूठ यह भी फैलाया जाता है कि मुसलिम ज्यादा शादियां करते हैं, इसलिए उन की आबादी तेजी से बढ़ती है लेकिन हकीकत यह है कि मुस्लिम में पौलीगैमी सिर्फ 5.7 फीसदी है, तो वहीं हिंदू में यह 5.8 फीसदी है.

भारत में धर्मांतरण ऐसा मुद्दा है जिस से धु्रवीकरण की राजनीति को ताकत मिलती है. धर्मांतरण के ज्यादातर मामले फेक न्यूज पर आधारित होते हैं और यह सब पौलिटिकल प्रोपगैंडा के तहत किया जाता है. ऐसा नहीं है कि देश में धर्मांतरण नहीं होता, लेकिन सालाना सिर्फ 5,000 लोग ही कन्वर्जन करते हैं. देश की तकरीबन 140 करोड़ की आबादी में यह बेहद मामूली संख्या है, जिसे इतना बड़ा मुद्दा बनाना महज प्रोपगैंडा ही है. Social Awareness

Superstitious Crime: जानलेवा बना खाली लोटा

Superstitious Crime: मध्य प्रदेश में जबलपुर जिले के कुम्ही सतधारा के पास ददरा टोला सहदरा गांव में 9 मई, 2025 की सुबह के तकरीबन 7 बजे कसा नदी से नहा कर घर लौट रही 57 साल की एक औरत तितरी बाई बरकड़े ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उस का सगा भतीजा ही उस की जान ले लेगा.

आदिवासी अंचल में रहने वाली तितरी बाई की गलती केवल इतनी थी कि नदी से नहाने के बाद वह खाली लोटा ले कर घर जा रही थी. वह एक हाथ में गीले कपड़े और एक हाथ में लोटा ले कर नदी का घाट चढ़ रही थी, तभी उस का 47 साल का भतीजा मत्तू सिंह बरकड़े मिल गया. चाची के हाथ में खाली लोटा देख कर वह गालीगलौज करने लगा. विरोध जताने पर वह चाची के साथ मारपीट पर उतर आया.

तितरी बाई ने उस से बचने के लिए भागने की कोशिश की तो वह गिर गई, तभी मत्तू ने एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस के सिर पर मार दिया, जिस के चलते उस की मौत हो गई.

इस वारदात की खबर छोटे से गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई. मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने तेजी से कार्रवाई करते हुए कुछ ही घंटों में हत्यारे मत्तू सिंह बरकड़े को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस की पूछताछ में मत्तू ने चाची को मारने की जो वजह बताई, उसे सुन कर पुलिस के भी होश उड़ गए.
मत्तू ने बताया कि रास्ता काटना और खाली बरतन दिखना अपशकुन होता है. इसी अंधविश्वास के चलते उस ने चाची की जान ले ली.

पुलिस ने मत्तू के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) के तहत हत्या का मामला दर्ज कर लिया.

अंधविश्वास के चलते घटी यह वारदात साबित करती है कि आज भी गांवदेहात के इलाकों में अंधविश्वास किस कदर फैला हुआ है.

दिसंबर, 2021 की एक वारदात मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले की है, जब एक पिता पर अंधविश्वास इस कदर हावी हो गया कि उस ने अपने 5 साल के मासूम बेटे की कुल्हाड़ी से काट कर उस की बेरहमी से हत्या कर दी.

पिता के मुताबिक, उसे गुरुमाता ने कहा था कि बेटा उस के घर के लिए अपशकुन है. फिर अंधविश्वास पर भरोसा कर पिता ने ऐसा कदम उठाया जिस की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता. हत्या के बाद बाप ने बच्चे को कई टुकड़ों में काटा और खेत में दफना दिया.

अलीराजपुर जिले के खरखादी गांव में एक पिता दिनेश दावर ने अपने ही 5 साल के मासूम बेटे की अंधविश्वास के चलते कुल्हाड़ी से काट कर हत्या कर दी. पिता को इस बात का शक था उस के बेटे पर भूतप्रेत का साया है.

पिता को लगता था कि उस के बेटे में कोई बुरी आत्मा का वास है, जिस के चलते उस के घर में परेशानियां और अशांति रहती है. परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए उस ने अपने ही जिगर के टुकड़े को मार डाला.

अंधविश्वास के चलते हुई ये घटनाएं यह साबित करती हैं कि अंधविश्वास हमारे आसपास चारों ओर बिखरा पड़ा है. इन में बिल्ली का रास्ता काटना, रास्ते में खाली घड़ा दिखाई देना, शुभ काम के दौरान विधवा या बांझ का दिख जाना, पूजापाठ के दौरान दीपक का बुझ जाना, घाव में कीड़े पड़ना, कुत्ते का रोना,

दरवाजे पर नीबूमिर्च, काला कंगन, लाल रिबन या काला पुतला टांगना, दूल्हे को लोहा पकड़ाना, खाट या चप्पलों का उलटा पड़ा होना, बरतनों का टकराना, दूध का फटना, टूटे हुए आईने में शक्ल देखना, कछुआ या कछुए की मूर्ति घर में रखना भी अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं. इन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है.

देश में सरकारी तंत्र अंधविश्वास को रोकने की बजाय फैलाने में अहम भूमिका निभा रहा है. पांढुरना का गोटमार मेला हो या हिंगोट युद्ध सभी में पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बन कर इन दकियानूसी रिवाजों को खादपानी देने का काम कर रहा है. कोविड 19 वायरस को भगाने के लिए जब दीपक जला कर, ताली और घंटेघडि़याल बजाने का टोटका देश के प्रधानमंत्री खुद ही जनता को बताते हों, उस देश में वैज्ञानिक सोच भला कैसे विकसित होगी.

देश के नागरिकों की बुनियादी जरूरत शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजलीपानी और सड़क की है. इस के लिए सरकार को इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेज खोलने के साथसाथ साफ पानी और भरपूर बिजली के साथ कहीं भी आनेजाने के लिए अच्छी सड़कें मुहैया कराने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, मगर सरकार इन सब को छोड़ कर बड़ीबड़ी मूर्तियां और मंदिर बनाने पर तुली हुई है.

धार्मिक रंग में पूरी तरह रंगी सरकार की सोच यह है कि देश के पढ़ेलिखे नौजवानों को नौकरी की बजाय धार्मिक रैली, जुलूस, कांवड़ यात्रा, भंडारे और आरती में उलझ कर उन्हें तार्किक न बनने दिया जाए. यही वजह है कि आज भी देश में अंधविश्वास और दकियानूसी रिवाजों का बोलबाला है. Superstitious Crime

Indian Society: काले रंग से दबती दलित बालाएं

Indian Society: लहू का रंग लाल होता है, पर ‘ऊंचे’ होने का घमंड पालने वाले कुलीन तबके को अपने ‘ब्लू ब्लड’ पर नाज रहा है. अब आप पूछेंगे कि यह ‘ब्लू ब्लड’ क्या बला है, तो इसे हम आसान शब्दों में समझ सकते हैं कि 17वीं सदी में स्पेन देश के कुलीन वर्ग के लोगों की गोरी चमड़ी में खून की नसें नीली दिखती थीं, क्योंकि उन का धूप से ज्यादा वास्ता नहीं पड़ता था, तो उन नसों को वे ‘ब्लू ब्लड’ कहते थे.

बाद में पूरे यूरोप के ऐसे कुलीन वर्ग को अपने ‘ब्लू ब्लड’ पर नाज हो गया था, जो आम जनता से खुद को अलग समझ कर उन्हें उन के काले, मटमैले रंग के चलते खुद से छोटा समझते थे.

इस कालेगोरे के भेद के चक्कर में समाज में एक सोच पनपती है कि जिस का रंग ‘कालिया’ वह गुलाम और जिस का रंग ‘दूधिया’ वह बादशाह. यह होता है रंगभेद जो पूरी दुनिया में फैला हुआ है. आधी आबादी खासकर नई उम्र की लड़कियों में यह रंगभेद उन के विचारों की जड़ों में मट्ठा का काम करता है.

आम लड़कियों की तो छोडि़ए, नामचीन लेखिका और समाजसेवी अरुंधति राय का दर्द ही सुन लीजिए, ‘‘मैं पतली थी, एक महिला थी और सांवली थी… 3 ऐसी खासीयतें जो केरल के लोगों को स्वीकार नहीं हैं.’’

यह सब अरुंधति राय ने अपनी पुस्तक ‘गौड औफ स्मौल थिंग्स’ के लिए ब्रिटेन का ‘बुकर पुरस्कार’ जीतने के तुरंत बाद मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था.

इसी साल मार्च महीने की बात है. तब केरल की चीफ सैक्रेटरी शारदा मुरलीधरन ने रंगभेद पर अपनी आपबीती शेयर करते हुए बताया था कि कैसे सांवले रंग के चलते उन्हें भेदभाव का सामना करना पड़ा. फेसबुक पर उन्होंने लिखा था कि कैसे एक अनजान शख्स ने उन के औफिस में उन के रंग को ले कर
टिप्पणी की. उस शख्स ने कहा कि शारदा का कार्यकाल उन के पति वी. वेणु जितना ‘काला’ है, उतना ही उन के पति का ‘सफेद’ है.

शारदा मुरलीधरन ने लिखा कि मैं 50 सालों से इस सोच के साथ जी रही हूं कि मेरा रंग अच्छा नहीं है. हमारे समाज में गोरे रंग को ज्यादा अहमियत दी जाती है, इसलिए सांवले रंग के लोगों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है. यह भेदभाव स्कूलकालेज और औफिस में भी होता है.

शारदा मुरलीधरन ने आगे बताया कि जब वे 4 साल की थीं, तो उन्होंने अपनी मां से कहा था कि ‘मुझे वापस अपनी कोख में डाल दो और फिर से गोरा और सुंदर बना कर बाहर निकालो’.

यह जो गोरा और सुंदर होने की डिमांड या गुहार है न, बड़ी खतरनाक है. तभी तो गोरा करने की क्रीम इश्तिहार बाजार पर काबिज हैं. अगर लड़की काले रंग की है, तो वह अपने घरपरिवार, महल्ले, काम की जगह पर जगहंसाई का पात्र बनती है और अगर वही लड़की हफ्ते तक गोरा करने की क्रीम लगा लेती है, तो समाज में आगे की लाइन में खड़ी दिखती है. पहले हर बात में झिझकने वाली अब हिम्मत के साथ अपनी बात रखती है. नतीजा, घरपरिवार के साथसाथ बाकी सब भी खुश.

यहां गलती तथाकथित ‘गोरा’ बनाने वाली क्रीम की नहीं है, बल्कि उस सोच की है जो किसी को ‘काली कलूटी बैगन लूटी’ कहने को अपनी बड़ाई मानती है. फिर आप सोचिए कि उन लड़कियों की क्या हालत होती होगी जो वंचित समाज से हैं, जहां पैदा होना ही कलंक है और अगर लड़की ‘काली’ निकल आई, तो फिर समझ उस का जीना मुहाल.

इन समाज की पक्के रंग की लड़कियां दोहरी मार झेलती हैं. उन्हें उन के रंग के चलते पढ़नेलिखने से तो दूर रखा जाता ही है, शादीब्याह में भी जल्दी निबटा दिया जाता है.

‘फीयरलैस फ्रीडम’ नामक किताब की लेखिका और नारीवादी कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने बीबीसी दिनभर पौडकास्ट में रंग के मुद्दे पर कहा था, ‘‘भारत में रंग के मुद्दे का संबंध अंगरेजों या आजादी से नहीं, बल्कि जाति से ज्यादा है. यह माना जाता है कि जिन का रंग ज्यादा काला है, काले की तरफ है, वह एक तरह से मेहनत करने वाला वर्ग है. उस में जो सब से उत्पीडि़त लोग हैं, दलित हैं, उन का रंग वैसा होता है और जो अभिजात वर्ग है, उस का रंग सफेद होता है.

‘‘खासकर महिलाओं को उन के रंग के हिसाब से देखा जाना, यह चलता आ रहा है और यह सामान्य है. इस के खिलाफ समाज में जो आंदोलन होना चाहिए था, वह नहीं हुआ है.’’

महिलाओं को उन के रंग से देखा जाना और यह सामान्य बात है, सारे रंगभेद की जड़ इसी वाक्य में छिपी है. लड़का अगर काला है तो कोई बात नहीं, पर अगर लड़की जरा सी भी दबे रंग की है, तो घर पर ही उस के रूपरंग का पोस्टमार्टम कर दिया जाता है.

‘ज्यादा चाय मत पिया कर’, ‘भूतनी, पता नहीं हमारे घर में पैदा हो गई’, ‘अब कौन इस से ब्याह करेगा’, ‘इस की तो अगली नस्ल भी बिगड़ जाएगी’ जैसी तोहमतें लगा दी जाती हैं लड़कियों पर, जिस से वे ऐसे दबाव में जीने लगती हैं कि उन्हें गोरे रंग वाले के आसपास रहना भी शाप जैसा लगता है.

नतीजतन, वे घरघुन्नी बन कर रह जाती हैं. स्कूल जाने की उन की हिम्मत नहीं होती है. वे कागज पर पैंसिल से ककहरा लिखने के लिए खुद को लायक नहीं समझती हैं. पैंसिल से एक बात याद आई, ‘पैंसिल टैस्ट’.

एक वह दौर था जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद का बोलबाला था. तब ‘पैंसिल टैस्ट’ हुआ करता था, जिसे इनसान के ‘गोरे’ या ‘रंगीन’ होने का पैमाना समझ जाता था. ‘पैंसिल टैस्ट में उस इनसान के बालों में पैंसिल घुसाई जाती थी, जिस का नस्लीय समूह अनिश्चित था. अगर पैंसिल जमीन पर गिर जाती, तो इनसान ‘पास’ हो जाता और उसे ‘गोरा’ माना जाता. अगर पैंसिल बालों में उलझ जाती, तो उस इनसान के बाल गोरा होने के लिए बहुत घुंघराले माने जाते और उसे ‘रंगीन’ (मिश्रित नस्लीय विरासत वाला) के रूप में वर्गीकृत किया जाता.

‘रंगीन’ के रूप में वर्गीकरण से किसी इनसान को ‘काले’ माने जाने वाले इनसान की तुलना में ज्यादा हक मिलते थे, लेकिन ‘गोरा’ माने जाने वाले इनसान की तुलना में कम हक और फर्ज मिलते थे.

इस ‘पैंसिल टैस्ट’ से समझ लीजिए कि आप की चमड़ी के रंग से आप को हक और फर्ज मिलते थे. कालों को ‘दास’, ‘गुलाम’ बनाने और कहने की प्रथा इसी रंग की बदौलत कामयाब रही थी.

भारत में इस तरह का कोई ‘पैंसिल टैस्ट तो नहीं हुआ, पर आज भी वंचित समाज की लड़कियां रंग के फेर में ऐसी उलझाई गई हैं कि वे स्कूल में पैंसिल पकड़ने से डरती हैं. वे खुद को ‘गुलाम’ समझने लगती हैं. घर में परिवार वालों की, मजदूरी या खेतिहरी में जमींदार की और ससुराल में पति की.

सवाल उठता है कि क्या जब देश खुद को हर मामले में ‘विश्वगुरु’ कहलाने की कवायद में लगा है, तो क्या वंचित समाज की लड़कियों को अपने पक्के रंग के चलते आईने के सामने आने में झिझकते रहना होगा? नहीं, क्योंकि रंग तो कुदरत की देन है और गोरा रंग होने का यह मतलब कतई नहीं है कि बंदा दिल का भी साफ ही होगा.

लिहाजा, सूरत से ज्यादा सीरत पर फोकस करना चाहिए. इस के लिए स्कूलों और समाज में रंगभेद विरोधी शिक्षा और समानता की अहमियत को बढ़ावा देना जरूरी है. रंग के चक्कर में हीनता का बोध मन में लिए फिरने वाली लड़कियों को यह समझना होगा कि काला या पक्का रंग भी खूबसूरत होता है और किसी के कहने भर से आप बदसूरत नहीं हो सकतीं.

अगर काला रंग इतना ही बुरा होता तो सूडान की मौडल न्याकिम गैटवेच को दुनिया यों ही सिरआंखों पर नहीं बिठाती. वे फिलहाल दुनिया की तथाकथित सब से काली मौडल हैं, जिन्हें ‘क्वीन औफ डार्कनैस’ का खिताब मिला हुआ है.

न्याकिम गैटवेच अपने काले रंग पर फख्र करते हुए कहती हैं, ‘‘मुझे कितना भी पैसा मिल जाए, मैं अपने स्किन कलर के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं करूंगी.’’

ऐसी ही हिम्मत हर उस लड़की को दिखानी चाहिए, जिसे उस के रंग की वजह से दबाया जाता है. याद रखिए, चमड़ी पर होने वाली बीमारी ‘सफेद दाग’ की सफेदी कोई नहीं चाहता है, पर आंखों पर लगा काजल हर किसी को अपनी ओर खींच लेता है. जैसे ‘ब्लू ब्लड’ एक सोच है, वैसे ही ‘क्वीन औफ डार्कनैस’ भी सोच ही है, जो न्याकिम गैटवेच को उन के काले रंग के बावजूद दुनियाभर में मशहूर कर देती है. Indian Society

Exclusive Interview: मैं तीन तलाक को पसंद नहीं करती – स्मृति मिश्रा

Exclusive Interview: मुसलिम औरतों के हक से जुड़े शाहबानो बनाम मोहम्मद अहमद खान के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘हक’ को भले ही बौक्स आफिस पर ज्यादा कामयाबी न मिली हो, मगर इस फिल्म में शाजिया बानो के किरदार में यामी गौतम और शाजिया बानो के साथ खड़े रहने वाले नौकरानी उज्मा के किरदार में स्मृति मिश्रा की अदाकारी को काफी सराहा जा रहा है.

रायबरेली से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई तक का सफर करने वाली हीरोइन स्मृति मिश्रा पिछले 13 सालों से ऐक्टिंग जगत में हैं. वे अब तक ‘सावधान इंडिया’, ‘अधूरी कहानी हमारी’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘मंफोर्डगंज की बिनिया’, ‘धर्मपत्नी’ जैसे सीरियलों और ‘अ से अनार’, ‘रेड’, ‘तुम को मेरी कसम’ जैसी फिल्मों के अलावा नैटफ्लिक्स की वैब सीरीज ‘शी2’ में ऐक्टिंग कर चुकी हैं.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की एक फिल्म ‘हक’ चर्चा में है. इस को ले कर आप क्या कहेंगी?

आप सभी जानते हैं कि यह फिल्म शाहबानो कांड पर आधारित है, जिस में मैं ने उज्मा का किरदार निभाया है. मतलब लोग मु झे उज्मा के किरदार में देख रहे हैं. सभी को पता है कि शाहबानो के संघर्ष में उज्मा चट्टान की तरह खड़ी रह कर उस का साथ देती रही. इस फिल्म मेरे सभी सीन हीरोइन यामी गौतम के साथ ही हैं, क्योंकि उज्मा तलाक के खिलाफ है.

उज्मा का मानना है कि तलाक देना गलत है. इसी वजह से मैं ने इस किरदार को करने के लिए हामी भरी, क्योंकि मैं ने महसूस किया है और लोगों से बातचीत कर के भी मु झे यही पता चला कि छोटे से छोटे तबके के लोग भी तलाक के खिलाफ हैं. वैसे भी औरत कोई चीज नहीं है कि आप ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया.

निजी जिंदगी में आप का साबका कभी उज्मा जैसी किसी औरत से पड़ा है या नहीं और तलाक को ले कर आप की अपनी सोच क्या है?

यह बहुत विवादास्पद विषय है. इस पर ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन मैं ने जोकुछ पढ़ा है, उस आधार पर मैं तीन तलाक को कभी पसंद नहीं करती. तीन बार तलाक कह कर आप ने एक औरत को छोड़ दिया. इसे जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता.

आप ने एक औरत के साथ रहते हुए एक लंबा वक्त गुजारा, आप के बच्चे हुए, पर छोटी सी बात पर बिना किसी सोचविचार के उस औरत को अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिए बिना, सिर्फ तीन बार तलाक बोला और तलाक दे दिया… मेरी सम झ में नहीं आता कि कैसे लोग इसे कानूनी सही कहते रहे हैं.

13 साल के अपने ऐक्टिंग कैरियर के अनुभव को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

इन 13 सालों में बतौर कलाकार मु झे सीखने को बहुतकुछ मिला. यह मौका किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं मिल सकता. हम हर उस किरदार को जीते हैं, जो इस दुनिया में है. हम सिर्फ ऐक्टिंग नहीं करते, हम परदे पर किसी भी किरदार को जीते हुए उसे अंदर से महसूस करते हैं.

फिल्म ‘पवई’ में क्या खास है?

फिल्म ‘पवई’ में मुंबई के इस विकासशील उपनगर पवई में रहने वाली 3 अलगअलग औरतों की कहानियों को दिखाया गया है. इस में मैं ने उषा का किरदार निभाया है. इसी फिल्म में 2 और औरतों की कहानी है. इस फिल्म में इस बात को दिखाया गया है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब हो या फिर कामकाजी हो, सभी को संघर्ष करना पड़ता है, भले ही उन के संघर्ष के तरीके अलग हों.

अपने किरदार उषा को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

उषा का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने पति के साथ बिहार से मुंबई आती है. अब उस का पति नहीं है और वह लोगों के घरों का काम करती है. वह अपनी बेटी की भी परवरिश कर रही है. उस को मुंबई के बारे में कुछ नहीं पता है. वह तो अपने पति के भरोसे यहां आई थी, पर अब पति नहीं है. उस के पति ने जो मकान खरीदा था, उसे भी उस का देवर हड़पने की कोशिश कर रहा है.

इस किरदार के लिए आप ने किस तरह का होमवर्क किया?

मेरे घर में एक कामवाली बाई है. उस की दोस्त के साथ भी ऐसा हादसा हो चुका है. उस का पति उसे गांव से शहर ले कर आया था. पर शहर आते ही कि कुछ समय के बाद उस का पति बीमार हुआ और इस संसार को अलविदा कह गया. उस के बाद उस ने जिस तरह का संघर्ष किया, वह सब उस ने मु झे बताया था, तो इस किरदार को निभाते समय मु झे वह सब याद आया और मैं ने स्क्रिप्ट की भी मदद ली.

किसी भी किरदार को निभाते समय आप अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों का कैसे उपयोग करती हैं?

जब किसी किरदार से जुड़ा कोई हादसा मेरे साथ कभी घट चुका होता है, तो मैं उसे याद कर अपने किरदार में डालने की कोशिश करती हूं. अगर वैसा हादसा मेरी जिंदगी में न घटा हो, तो आसपास के लोगों से बात कर के जानने की कोशिश करती हूं.

कलाकार होने के साथसाथ आप पत्नी, बहू और एक बेटे की मां भी हैं. आप इन सारी जिम्मेदारियों को कैसे निभाती हैं?

मैं इन सभी जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती हूं और मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी को भी शिकायत करने का मौका न दूं. पर मु झे इन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए कई बार अपनी दीदी और पति से भी सहयोग लेना पड़ता है. Exclusive Interview

Story In Hindi: आखिर कितना घूरोगे – बौस को हड़काने वाली दब्बू लड़की

Story In Hindi: काली, कजरारी, बड़ीबड़ी मृगनयनी आंखें भला किस को खूबसूरत नहीं लगतीं? मगर उन से भी ज्यादा खूबसूरत होते हैं उन आंखों में बसे सपने कुछ बनने के, कुछ करने के. सपने लड़कालड़की देख कर नहीं आते. छोटाबड़ा शहर देख कर नहीं आते.

फिर भी अकसर छोटे शहर की लड़कियां उन सपनों को किसी बड़े संदूक में छिपा लेती हैं. उस संदूक का नाम होता है- कल. कारण वही पुराना. अभी हमारे देश के छोटे शहरों और कसबों में सोच बदली कहां है? घर की इज्जत है लड़की, जल्दी शादी कर उसे घर भेजना है, वहां की अमानत बना कर मायके में पाली जा रही है. इसीलिए लड़कियों के सपने उस कभी न खुलने वाले संदूक में उन के साथसाथ ससुराल और अर्थी तक की यात्रा करते हैं पर कुछ लड़कियां बचपन में ही खोल देती हैं उस संदूक को, उन के सपने छिटक जाते हैं.

इस से पहले बीन पाएं बड़ी ही निर्ममता से कुचल दिए जाते हैं उन के अपनों द्वारा, समाज द्वारा. विरली ही होती हैं, जो सपनों की पताका थाम कर आगे बढ़ती हैं. यहां भी उन की राह आसान नहीं होती. बारबार उन की स्त्रीदेह उन की राह में बाधक होती है. अपने सपनों को अपनी शर्त पर जीने के लिए उन्हें चट्टान बन कर हर मुश्किल से टकराना होता है. ऐसी ही एक लड़की है वैशाली.

हर शहर की एक धड़कन होती है. वह वहां के निवासियों की सामूहिक सोच से बनती है. दिल्लीमुंबई में सब पैसे के पीछे भागते मिलेंगे. वाहन सब दौड़ रहे हैं. एक मिनट भी जाया करना जैसे अपराध है. छोटे शहरों में इत्मीनान दिखता है. ‘‘हां भैया, कैसे हो?’’ के साथ छोटे शहरों में हालचाल पूछने में ही लोग 2 घंटे रुक जाते हैं. देवास की हवाओं में जीवन की सादगी और भोलेपन की धूप की खुशबू मिली हुई थी जब बाजारवाद ने पूरे देश के छोटेबड़े शहरों में अपनी जड़ें जमा दी थीं.

देवास अभी भी शैशव अवस्था में था. कहने का तात्पर्य यह है कि शहर का असर हमारी वैशाली पर भी था. इन मासूम हवाओं ने ही तो उसे बेहिचक इधरउधर घूमतीफिरती बेफिक्र वैशाली में बदल दिया था. उम्र हर साल एक सीढ़ी चढ़ जाती पर बचपना था कि दामन छुड़ाने का नाम ही नहीं लेता.

वैसे भी वह अपने मांबाप की एकलौती बेटी होने के कारण बहुत प्यार में पली थी. जो इच्छा करती झट से पूरी हो जाती. यों छोटीमोटी इच्छाओं के अलावा एक इच्छा जो वैशाली बचपन से अपने मन में पाल रही थी वह थी आत्मनिर्भर होने की. वह जानती थी कि इस मामले में मातापिता को मनाना जरा कठिन है, पर उस ने मेहनत और उमीद नहीं छोड़ी. वह हर साल अपने स्कूल में अच्छे नंबर ला कर पास होती रही. मातापिता की इच्छा थी कि पढ़लिख जाए तो फिर जल्दी ब्याह कर दें और गंगा नहाएं.

एक दिन उस ने मातापिता के सामने अपनी इच्छा जाहिर कर दी कि वह नौकरी कर के अपने पंखों को विस्तार देना चाहती है. शादी उस के बाद ही. काफी देर मंथन करने के बाद आखिरकार उन्होंने इजाजत दे दी. वैशाली तैयारी में जुट गई. आखिरकार उस की मेहनत रंग लाई और दिल्ली की एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई.

वैशाली की खुशी जैसे घर की हवाओं में अगरबत्ती की तरह महकने लगी. मातापिता भी उस की खुशी में शामिल थे पर अंदरअंदर डर था इतनी दूर दिल्ली में अकेली कैसे रहेगी.

आसपास के लोगों ने भी बहुत डराया, ‘‘दिल्ली है… भाई दिल्ली, लड़कियां सुरक्षित नहीं हैं. जरा देखभाल के रहने का इंतजाम कराना.’’

वे खुद भी तो आए दिन अखबारों में दिल्ली की खबरें पढ़ते रहते थे. यह अलग बात है कि छोटेबड़े कौन से शहर लड़कियों के लिए सुरक्षित हैं पर खबर तो दिल्ली की ही बनती है.

दिल्ली देश की ही नहीं खबरों की भी है. आम आदमी तो खबरें पढ़पढ़ कर वैसे ही घबराया रहता है जैसे सारा अपराध बस दिल्ली में ही होते हो. जितना हो सकता था उन्होंने वैशाली को ऊंचनीच सम झाई भी. फिर भी डर था कि जाने का नाम नहीं ले रहा था. दिल्ली में निवास करने वाले अड़ोसपड़ोस के दूरदराज के रिश्तेदारों के पते लिए जाने लगे. न जाने कितने नंबर इधरउधर के परिचितों के ले कर वैशाली के मोबाइल की कौंटैक्ट लिस्ट में जोड़े जाने लगे.

तसल्ली बस इतनी थी कि किसी गाढ़े वक्त में बेटी फोन मिला देगी तो कोई मना थोड़ी न कर देगा. आखिर इतनी इंसानियत तो बची ही है जमाने में. उन्हें क्या पता कि दिल्ली घड़ी की नोंक पर चलती है.

आखिरकार लक्ष्मीनगर में एक गर्ल्स पीजी किराए पर ले लिया. खानानाश्ता मिल ही जाएगा. औफिस बस 2 मैट्रो स्टेशन दूर था. यहां सब लड़कियां ही थीं. पिता निश्चिंत हुए कि उन की लड़की सुरक्षित है.

वैशाली अपना रूम एक और लड़की से शेयर करती थी. उस का नाम था मंजुलिका. मंजुलिका वैस्ट बंगाल से थी. जहां वैशाली दबीसिकुड़ी सी थी वहीं मंजुलिका तेजतर्रार हाईफाई. कई सालों से दिल्ली में रह रही थी. चाहे आप इसे आबोहवा कहें या वक्त की जरूरत, दिल्ली की खास बात है कि वह लड़कियों को अपनी बात मजबूती से रखना सिखा ही देती है. मंडे की जौइनिंग थी. मातापिता चले गए थे.

अब शनिवार, इतवार पीजी में ही काटने थे. बड़ा अजीब लग रहा था… इतनी तेजतर्रार लड़की के साथ दोस्ती करना पर जरूरत ने दोनों में दोस्ती करा दी. शुरुआत मंजुला ने ही करी. पर जब उस ने अपने लोक के किस्सों का पिटारा खोला तो खुलता ही चला गया.

वैशाली रस लेले कर सुनती रही. उस के लिए यह एक अजीब दुनिया थी. अपना लोक याद आने लगा जहां लोगों के पास इतना समय होता था कि कभी भी, कहीं भी महफिलें जम जातीं. लोग चाचा, मामा, फूफा होते…मैडम और सर नहीं. देर तक बातें करने के बाद दोनों रात की श्यामल चादर ओढ़ कर सो गईं.

औफिस का पहला दिन था. वैशाली ने अपनी जींस और लूज शर्ट पहन ली. गीले बालों पर कंघी करती हुई वह बाथरूम से बाहर निकली ही थी कि मंजुलिका ने सीटी बजाते हुए कहा कि पटाखा लग रही हो, क्या फिगर है तुम्हारी. वह भी हंस दी.

वैसे जींसटौप तो कभीकभी देवास में भी पहना करती थी. कभी ऐसा कुछ अटपटा महसूस ही नहीं हुआ था. उस ने ध्यान ही कहां दिया था अपनी फिगर पर. उस का ऊपर का हिस्सा कुछ ज्यादा ही भारी है यह उसे आज महसूस हुआ जब औफिस पहुंचने पर बौस सन्मुख ने उसे अपने चैंबर में बुलाया और उस से बात करते हुए पूरे 2 मिनट तक उस के ऊपरी भाग को घूरते रहे.

वैशाली को अजीब सी लिजलिजी सी फीलिंग हुई जैसे सैकड़ों चींटियां उस के शरीर को काट रही हों. उस ने जोर से खांसा. बौस को जैसे होश आया. उसे फाइल पकड़ा कर काम करने को कहा.

फाइल ले कर वैशाली अपनी टेबल पर आ गई. संज्ञाशून्य सी. देवास में भी ने लफंगे टाइप के लड़के देखे थे पर शायद हर समय मां या पिताजी के साथ रहने या फिर सड़क पर घूमने वाले बड़ों का लिहाज था, इसलिए किसी की इतनी हिम्मत नहीं हुई थी. उफ, कैसे टिकेगी वह यहां? उसे पिताजी की याद आने लगी. जब शीशे के पार कैबिन में बैठे हुए उस ने सन्मुख को देखा तो पिता की ही तरह लगे थे. 50 के आसपास की उम्र, हलके सफेद बाल, शालीन सा चेहरा. बड़ा सुकून हुआ था कि बौस के रूप में उसे पिता का संरक्षण मिल गया है.

क्यों एक पुरुष अपनी बेटी की उम्र की लड़कियों के लिए बस पुरुष ही होता है. अपने विचारों को झटक कर वैशाली ने अपना ध्यान काम पर लगाने का मन बनाया. आखिर वह यहां काम करने ही तो आई है. कुछ बनने आई है. सारी मेहनत, सारा संघर्ष इसीलिए तो था. वह हिम्मत से काम लेगी और अपना पूरा ध्यान अपने सपनों को पूरा करने में लगाएगी. मगर जितनी बार भी उसे बौस के औफिस में जाना पड़ता उस का संकल्प हिल जाता. अब तो बौस और ढीठ होते जा रहे थे. उस के खांसने का भी उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था.

पीजी में लौटने के बाद वैशाली खुद को बहुत समझाती रही कि उसे बस अपने सपनों पर ध्यान देना है, पर उस लिजलिजी एहसास का वह क्या करे जो उसे अपनी देह पर महसूस होता, चींटियां सी चुभतीं, घिन आती. घंटों साबुन रगड़ कर नहाई पर वह फीलिंग निकलने का ही नहीं ले रही थी. काश,मैल साबुन से धोए जा सकते. आज उसे अपने शरीर से नफरत हो रही थी. पर क्यों? उस की तो कोई गलती नहीं थी. अफसोस, यह एक दिन का किस्सा नहीं था. आखिर रोजरोज उन काट खाने वाली नजरों से खुद को कैसे बचाती.

हफ्तेभर में वैशाली जींसटौप छोड़ कर सलवारकुरते में आ गई. 10 दिन बाद दुपट्टा भी पूरा खोल कर लेने लगी और 15वें दिन तक दुपट्टे में इधरउधर कई सेफ्टी पिन लगाने लगी. मगर बौस की ऐक्सरे नजरें हर दुपट्टे हर सेफ्टी पिन के पास पहुंच ही जातीं. आखिर वह इस से ज्यादा कर ही क्या सकती थी?

वह समझ नहीं पा रही थी कि इस समस्या का सामना कैसे करे. 1-1 दिन कर के 1 महीना बीता. पहली पगार उस के हाथ में थी. पर वह खुशी नहीं थी जिस की उस ने कल्पना की थी.

मंजुलिका ने टोका, ‘‘आज तो पगार मिली है, पहली पगार. आज तो पार्टी बनती है.’’

वैशाली खुद को रोक नहीं पाई और जितना दिल में भरा था सब उड़ेल दिया.

मंजुलिका दांत भींच कर गुस्से में बोली, ‘‘उस की मां की बहन नहीं हैं क्या? उन्हें जा के घूरे जितना घूरना है… और भी कुछ हरकत करता है क्या? ’’

‘‘नहीं, बस गंदे तरीके से घूरता है. ऐसा लगता है, ऐसा लगता है कि…’’ कुछ कहने के लिए शब्द खोजने में असमर्थ वैशाली की आंखें क्रोध, नफरत और दुख से डबडबा गईं.

‘‘अब समझी तू जींसटौप से सूट पर क्यों आई. अरे, तेरी गलती थोड़ी है न. देख तब भी उस का घूरना तो बंद हुआ नहीं. कहां तक सोचेगी. इग्नोर कर… हम लोग कहां परवाह करते हैं. जो मन आया पहनते हैं, ड्रैस, शौर्ट्स, जैगिंग… अरे जब ऐसे लोगों की आंखों में ऐक्सरे मशीन फिट रहती ही है तो वे कपड़ों के पार देख ही लेंगे, तो अपनी पसंद के कपड़ों के लिए क्यों मन मारें? जरूरी है हम अपना काम करें. परवाह न करें.

“वह कहावत सुनी है न कि हाथी चला बाजार कुत्ते भूंकें हजार. अब आगे बढ़ना है तो इन सब की आदत तो डालनी ही होगी. ठंड रख कुछ दिन बाद नया शिकार ढूंढ़ लेंगे,’’ मंजुलिका किसी अनुभवी बुजुर्ग की तरह उसे शांत करने की कोशिश करने लगी.

‘‘मैं सोच रही हूं, नौकरी बदल लूं…’’ वैशाली ने धीरे से कहा.

उस की बात पर मंजुलिका ने ठहाका लगा कर कहा, “नौकरी बदल कर जहां जाएगी वहां ऐसे ही घूरने वाले मिलेंगे बस नाम और शक्ल अलग होगी. कहा न इग्नोर कर.’’

‘‘इग्नोर करने के अलावा भी कोई तो तरीका होगा न…’’

वैशाली अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाई कि मां का फोन आ गया. मांबाबूजी उस की पहली तनख्वाह की खुशी को उस के साथ बांटना चाहते थे. सब बधाई दे रहे थे कि उन की बहादुर बेटी अकेले अपने सपनों के लिए संघर्ष कर रही है.

‘आखिरकार महिला सशक्तीकरण में उन का भी कुछ योगदान है, सोच वह ‘ओह मां,’ ‘ओह पिताजी,’ इतना ही कह पाई पर अंदर तक भीग गई वह इन स्नेहभरे शब्दों से.

वैशाली सारी रात रोती रही. कहां उस के मातापिता उस पर इतना गर्व कर रहे हैं और कहां वह नौकरी छोड़ कर वापस जाने की तैयारी कर रही है और वह भी किसी और के अपराध की सजा खुद को देते हुए. मंजुलिका कहती है, इग्नोर कर… वही तो कर रही थी, वही तो हर लड़की करती है बचपन से ले कर बुढ़ापे तक. पर यह तो समस्या का हल नहीं है. इस से वह लिजलिजी वाली फीलिंग नहीं जाती.

सारी रात वैशाली सोचती रही. अगले दिन लंच पर उस ने अपनी बात साथ में काम करने वाली निधि को बताई. फिर तो जैसे बौस की इस हरकत का पिटारा ही खुल गया. कौन सी ऐसी महिला थी जो उस की इस हरकत से परेशान न होती हो.

निधि ने कहा, ‘‘हाथ पकड़े तो तमाचा भी लगा दूं. पर इस में क्या करूं? मुकर जाएगा.’’

समस्या विकट थी. बात केवल सन्मुख की नहीं थी, ऐसे लोग नाम और रूप बदल कर हर औफिस में हैं, हर जगह हैं. आखिर इन का इलाज क्या हो? और इग्नोर भी कब तक? नहीं वह जरूर इस समस्या का कोई न कोई हल खोज के रहेगी.

घर आने के बाद वैशाली का मन नहीं लगा रहा था. ड्राइंग फाइल निकाल कर स्कैचिंग करने लगी. यही तो करती है हमेशा जब मन उदास होता है.

तभी मामा के लड़के का फोन आ गया. गांव में रहने वाला 10 साल का ममेरा भाई जीवन उसे बहुत प्यारा है. अकसर फोन कर अपने किस्से सुनाता रहता है कि दीदी यह बात, दीदी वह बात… और शुरू हो जाते दोनों के ठहाके.

आज भी उस के पास एक किस्सा था, ‘‘दीदी, सुलभ शौचालय बनने के बाद भी गांव के लोग उस का इस्तेमाल नहीं करते. बस यहांवहां जहां जगह मिलती, बैठ जाते हैं. टीवी में विज्ञापन देख कर हम भी घंटी खरीद लाए. अब गांव में घूमते हुए जहां कोई फारिग होता मिल जाता तो बस घंटी बजा देते हैं.

“सच्ची दीदी, बहुत खिसियाता है. कपड़े समेट कर उठ खड़ा होता है. उस की झेंप देखने लायक होती है. उसे गलत काम का एहसास होता है. देखना एक दिन ये सब लोग शौचालय का इस्तेमाल करने लगेंगे.’’

बहुत देर तक वह इस बात पर हंसती रही फिर न जाने कब नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया. आंख सीधे सुबह ही खुली. घड़ी देखी, देर हो रही थी. सीधे बाथरूम की तरफ भागी.

आज उस ने जींसटौप ही पहना. बढ़ती धड़कनों को काबू कर पूरी हिम्मत के साथ औफिस गई और अपनी सीट पर बैठ कर फाइलें निबटाने लगी.

तभी बौस ने उसे कैबिन में बुलाया. उसे देख उन के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. आंखें अपना काम करने लगीं.

‘‘एक मिनट सर,’’ वैशाली ने जोर से कहा. सन्मुख हड़बड़ा कर उस के चेहरे की ओर देखने लगे. वैशाली ने फिर से अपनी बात पर वजन देते हुए कहा, ‘‘एक मिनट सर, मैं यहां बैठ जाती हूं फिर 5 मिनट तक आप मुझे जितना चाहिए घूरिए और यह हर सुबह का नियम बना लीजिए. पर बस एक बार ताकि जितनी भी लिजलिजी फीलिंग मुझे होनी है वह एक बार हो जाए. उस के बाद अपनी सीट पर जा कर मैं काम करना शुरू करूं तो मुझे यह डर न लगे कि अभी आप फिर बुलाएंगे, फिर घूरेंगे और मैं फिर उसी गंदी फीलिंग से और अपने शरीर के प्रति उसी अपराधबोध से गुजरूंगी… जिस दिन से औफिस में आई हूं ये सब झेल रही हूं,’’ मन में आया कि पूछे कि क्या आप की मांबहन नहीं हैं क्या? जितना घूरना है उन्हें घूरो. पर फिर मन में आया कि नहीं, यह नहीं कहेगा, क्योंकि वह जानती है कि आप नहीं कोई और निश्चित तौर पर आप की मां, बहन को घूर रहा होगा. अपनी मांबहन, पत्नीबेटी सब से कह दीजिएगा कि वे भी घूरने का टाइम फिक्स कर दें. दोनों का समय और तकलीफ बचेगी.

‘‘जी सर, हमारा भी टाइम फिक्स कर दीजिए,’’ वैशाली के पीछे आ कर खड़ी हुई निधि व अन्य महिलाओं ने समवेत स्वर में कहा.

वैशाली अंदर आते समय जानबूझ कर गेट खुला छोड़ आई और उस के पीछे थी इस साहस पर तालियां बजाते पुरुष कर्मचारियों की पंक्ति.

बौस शर्म से पानीपानी हो रहे थे. फिर उस दिन के बाद सन्मुख कभी किसी किसी महिला को घूरते नहीं पाए गए.

चाहे आप इसे आबोहवा कहें या वक्त की जरूरत, दिल्ली की खास बात है कि वह लड़कियों को अपनी बात मजबूती से रखना सिखा ही देती है.

‘‘अगले दिन लंच पर उस ने अपनी बात साथ में काम करने वाली निधि को बताई. फिर तो जैसे बौस की इस हरकत का पिटारा ही खुल गया…’’ Story In Hindi

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