Best Hindi Kahani: बांगुर बाबा और कमली

Best Hindi Kahani: कमली ने आसमान की ओर देखा. उस ने अंदाजा लगाया कि शायद शाम के 4 बजे हैं. उस का पति कलुआ थकहार कर 5 बजे तक घर आएगा.

यह सोच कर दीवार की ओर लगे एक आईने के सामने खड़े हो कर कमली ने सिंगार करना शुरू कर दिया. सिंगार के बाद कमली ने अपनेआप को आईने में देखा, तो खुद ही शरमा गई.

कमली की उम्र 28 साल के आसपास थी. उस का शरीर लंबा और इकहरा था. पतली कमर और पेट के बीच गहरी नाभि कमली को और भी मादक बनाती थी.

कमली का रंग सांवला जरूर था, पर उस का पतला चेहरा, सुतवां नाक और नशीली आंखें उसे बहुत खूबसूरत बनाती थीं.

आसपास के कई गांवों में भी कमली जैसी मदमस्त औरत नहीं थी. गांव के सभी नौजवान यहां तक कि बड़ी उम्र के मनचले भी कमली को देख कर आहें भरते थे. पर मजाल है कि कमली किसी के फेर में आ जाए.

स्वभाव से कमली एक तेजतर्रार औरत थी, जो मर्दों की नजरों को पढ़ना अच्छी तरह जानती थी. तभी तो जब भी वह गांव के बाजार में सौदा लेने जाती, तो मनचलों की नजरें उस के खूबसूरत जिस्म और उभरे और सुडौल सीने को घूरती रहतीं. लोगों का घूरना कमली अच्छी तरह समझती थी.

कमली के उभार उस की चोली से झांकते तो वह अपने सीने पर धीरे से आंचल डाल लेती, जिस से ‘आह’ भरते मर्द मन मसोस कर रह जाते थे.

अभी कमली अपने रूप को आईने में निहार कर खुद पर मोहित हो ही रही थी कि कलुआ घर आ गया. उस ने सिर पर पगड़ी के रूप में बंधा कपड़ा निकाल फेंका और खटिया पर बैठ गया.

कमली उसे देख कर मुसकराई, पर कलुआ से मुसकराया भी नहीं गया. कमली रसोई से गुड़ और पानी ले कर आई. कलुआ से बैठा नहीं जा रहा था, सो वह खटिया पर ही पसर गया.

कमली ने पानी पीने के लिए बारबार कहा, तो कलुआ ने थोड़ा गुड़ और पानी पिया और फिर खटिया पर लेट गया.

लोटा एक ओर सरका कर कमली भी खटिया पर कलुआ के बगल में ही लेट गई और अपना सिर कलुआ के सीने पर रख दिया. वह अपनी उंगलियां कलुआ के जिस्म पर घुमाने लगी. ऐसा कर के कमली कलुआ के साथ प्यार करना और संबंध बनाना चाह रही थी, पर कलुआ के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई. ठंडा सा पड़ा रहा वह. मर्दाना शरीर में कोई तनाव भी नहीं आया.

कमली सम झ गई थी कि आज भी ठाकुर ने कलुआ को बुराभला कहा है.

‘‘ठाकुर ने कुछ कहा क्या?’’ कमली ने पूछा.

‘‘बारबार कर्जा चुकता करने को कहते हैं, जबकि पैसे तो मैं कई बार लौटा चुका हूं, पर,’’ आगे कुछ नहीं बोल सका था कलुआ.

एक बार कमली के बीमार पड़ने पर कलुआ ने गांव के ठाकुर से 1,000 रुपए उधार लिए थे, जिन्हें बाद में धीरेधीरे कर के चुका भी दिया था, पर ठाकुर के मुताबिक अभी तक उस ने आधी रकम ही चुकता की थी, इसलिए वे बाकी के पैसों की मांग किए जा रहे थे.

कमली मन ही मन विचार करने लगी थी कि उसे ही इस समस्या के समाधान के लिए कुछ करना होगा.
अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे कमली ठाकुर की कोठी पर पहुंच गई. आंगन के बाहर ही 40 साल की खूबसूरत ठकुराइन दिख गईं. कमली ने ठकुराइन को ‘नमस्ते’ किया.

‘‘आओ कमली, कैसे आना हुआ?’’ ठकुराइन नरम स्वभाव की थीं. उन की मीठी आवाज सुन कर कमली को अच्छा लगा, तो उस ने बताया कि वह कर्जे के बारे में ठाकुर साहब से कुछ बात करना चाहती है.

अभी ठकुराइन कुछ कह पातीं कि इतने में ठाकुर अंदर से आ गए. उन की उम्र तकरीबन 50 साल थी, पर शक्ल से वे अभी जवान ही दिखते थे.

ठाकुर अकसर ठकुराइन से नाराज रहते थे, क्योंकि अब तक ठकुराइन के कोई बच्चा नहीं था. ठाकुर इस बात की जिम्मेदार ठकुराइन को मानते थे और इसी वजह से वे उन्हें खरीखोटी सुनाते और परेशान करते थे.

ठाकुर को आता देख कर ठकुराइन झट से अंदर चली गईं.

कमली की कर्जे वाली बात ठाकुर ने सुनी और उन्होंने एक हवस भरी नजर कमली के सीने और पेट पर डाली और कहा, ‘‘अगर तू मेरे साथ एक रात बिताने को तैयार हो जाए, तो मैं कलुआ का सारा कर्जा माफ कर दूंगा.’’

‘‘वाह, ठाकुर साहब वाह, ऐसे तो तुम लोग हम अछूतों का छुआ पानी भी नहीं पीते, पर हमारे बदन को चाटने से भी तुम्हें परहेज नहीं,’’ कमली गुस्से में भर कर बोली और पैर पटकते हुए वापस चली आई.

ठाकुर को कमली की इस अदा पर गुस्सा नहीं आया, बल्कि वे कमली के तेजी से ऊपरनीचे होते कूल्हों को देख कर निहाल हुए जा रहे थे. वे जानते थे कि परेशान हो कर एक दिन कमली उन के पास आ ही जाएगी.

और सच भी यही था कि कलुआ की परेशानी को देखते हुए कमली ने सोचा कि अपना शरीर एक रात के लिए ठाकुर को सौंप देने में कोई बुराई तो नहीं है. सुबह उठ कर नहाधो लेगी, कम से कम कलुआ को तो ठाकुर परेशान तो नहीं करेंगे.

कमली इसी उधेड़बुन में थी कि उस ने सामने से एक भीड़ को आते देखा. ‘बांगुर बाबा की जय, बांगुर बाबा की जय’ के नारे लग रहे थे. गुलाबी रंग के कपड़े पहने हुए कुछ लोग हाथ में बैनर उठाए हुए थे और एक आदमी परचे बांट रहा था.

कमली को भी परचा मिला, पर वह तो अनपढ़ थी, इसलिए कुछ न पढ़ सकी. भीड़ में से एक आदमी से पूछने पर उस ने बताया कि इसी गांव के बाहरी छोर पर बांगुर बाबा ने अपना पंडाल लगाया है, जहां पर वे गरीबों की मदद करेंगे और बेऔलाद औरतों को ऐसा मंत्र देंगे, जिस से उन के औलाद हो जाएगी. सभी लोगों के कष्ट हरने का तरीका भी है बांगुर बाबा के पास.

कमली बांगुर बाबा की इन शक्तियों के बारे में सुन कर बहुत खुश हो गई और मन ही मन उन के पास जाने का विचार करने लगी.

अगले दिन जब कलुआ काम पर चला गया तो कमली उसे बिना बताए गांव के बाहर लगे बांगुर बाबा के पंडाल में पहुंच गई.

भीड़ अभी आनी शुरू हुई थी. बांगुर बाबा के आदमी एक ओर मेजकुरसी डाल कर कागज पर आने वाले लोगों का नामपता और उन की समस्याएं लिख रहे थे और बारीबारी बांगुर बाबा के पास एक दूसरे छोटे से पंडालनुमा कमरे में भेज रहे थे. वे अंदर जाने वाले के सिर पर एक गुलाबी रंग का कपड़ा भी बांध रहे थे.

कमली भी बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार कर रही थी. उस की बारी आई तो धड़कते दिल के साथ उस ने अपना नामपता और समस्या लिखवा दी.

‘हम गरीब हैं और हम पर ठाकुर का कर्जा है…’ कमली की यह समस्या लिख दी गई और उस के सिर पर गुलाबी कपड़ा बांध दिया गया. फिर कमली को अंदर भेज दिया गया.

अंदर जा कर कमली ने देखा कि बांगुर बाबा कोई बूढ़ा आदमी तो नहीं, बल्कि यही कोई 50-52 साल का आदमी था, पर उस ने किसी बाबा की तरह अपने चेहरे पर दाढ़ी जरूर बढ़ा रखी थी.

बाबा के पास ही एक बरतन में आग सुलग रही थी, जिस पर वह बीचबीच में कोई पाउडर सा डाल देता था.

बांगुर बाबा ने कमली को ऊपर से नीचे तक जम कर घूरा और कहा कि उस की गरीबी जरूर दूर होगी, बस वह शांत बैठी रहे.

बांगुर बाबा कुछ देर तक पता नहीं क्या बुदबुदाता रहा और उस के आगेपीछे घूमने लगा और फिर उस ने कमली की पीठ पर हाथ रख दिया. बांगुर बाबा की इस छुअन से कमली चौंक गई. उसे लगा कि बांगुर बाबा की नीयत में कुछ खोट है.

कमली ने विरोध करते हुए खड़े हो कर भागना चाहा, पर वह ऐसा कर नहीं सकी, बल्कि उस का सिर भारी हो जाने के चलते उसे नींद सी आने लगी और वह बेहोश हो कर एक ओर लुढ़क गई.

जब कमली होश में आई, तो उस के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. बांगुर बाबा एक ओर बैठा हुआ चिलम फूंक रहा था.

कमली ने तेजी से कपड़े पहनने शुरू कर दिए और खा जाने वाली नजरों से बांगुर बाबा को घूरने लगी. हालांकि, कमली का शरीर अभी भी बो िझल सा था, पर फिर भी उस ने पास में रखी हुई एक सुराही को उठा कर बांगुर बाबा के सिर पर मारना चाहा, पर बांगुर बाबा पहले से ही सतर्क था.

‘‘ज्यादा शोर मचाने की जरूरत नहीं है. यह देख तेरे नंगे जिस्म की वीडियो फिल्म कैद है इस में,’’ कहते हुए बांगुर बाबा ने एक बड़े से मोबाइल की स्क्रीन को कमली की तरफ दिखाया.

कमली ने देखा कि उस मोबाइल में उस का नंगे जिस्म के हर हिस्से की वीडियो फिल्म कैद थी.

कमली फफक पड़ी. उस की इज्जत लुट चुकी थी. अपने शरीर को तो उस ने ठाकुर को भी नहीं छूने दिया जो उस का कर्जा माफ कर देता, पर बांगुर बाबा ने उस के भरोसे का कत्ल कर दिया. उसे बेहोश कर के उस की इज्जत लूटी और वीडियो फिल्म भी बना ली.

कमली रोने लगी थी और तेजी से बाहर की ओर भागी. कुछ भी हो अब वह कलुआ को अपनी यह शक्ल
नहीं दिखाएगी. तेज कदमों से वह गांव के बाहर नदी की ओर बढ़ती जा रही थी.

नदी के पुल पर पहुंच कर कमली ने नीचे बहती धार को देखा, तो वह ठिठक गई.

कमली ने सोचा कि वह तो मर जाएगी, पर उस के बाद कलुआ का क्या होगा. इस भरी दुनिया में उसे तो दो रोटी देने वाला भी कोई नहीं है. ठाकुर जब उस पर जुल्म करेगा, तो किस के आंचल में मुंह छिपाएगा कलुआ? और फिर उस के साथ गलत काम तो बांगुर बाबा ने किया है, सजा तो उसे मिलनी चाहिए, तो वह भला अपनी जिंदगी क्यों खत्म करे?

कमली इसी ऊहापोह के बीच वापस अपने घर पहुंची और अपने घर के आंगन में लगे नल से 2-3 बालटी पानी भरा और अपने बदन को रगड़रगड़ कर साफ कर के नहाने लगी.

शाम को आज कलुआ फिर परेशान दिखा. उसे ठाकुर ने बुराभला कहा था और तमाचे भी रसीद किए थे. कमली का सब्र जवाब दे रहा था. उस के दिमाग में ठाकुर का जुल्म, बांगुर बाबा और ठकुराइन के चेहरे लगातार घूम रहे थे. वह मन ही मन कोई योजना बना रही थी.

इस घटना को 2-3 बीत गए थे. कमली जानती थी कि हर शनिवार को ठाकुर शहर जाते हैं, इसलिए वह ठाकुर के जाने के बाद ठकुराइन से मिलने जा पहुंची और उन का दुख बांटने लगी, ‘‘अब तो ठाकुर साहब की उम्र भी हो चली है. एकाध साल में बच्चा नहीं हुआ तो जिंदगीभर बां झ होने का ठप्पा लगा रहा जाएगा आप पर.’’

ठकुराइन के चेहरे पर आई उदासी और निराशा को पढ़ते हुए कमली ने उन्हें बांगुर बाबा के बारे में बताया और यह भी कहा कि बांगुर बाबा किसी भी समस्या को हल कर देते हैं.

‘‘अच्छा, पर कैसे?’’ पूछते हुए ठकुराइन के चेहरे की चमक बढ़ गई.

‘‘अलगअलग समस्या के हल के लिए अलगअलग दाम है. मसलन, पति किसी दूसरी औरत के चक्कर में फंसा हो तो 2,000 रुपए और बच्चा होने के लिए वे 5,000 रुपए लेते हैं. और ये सारे काम वे शनिवार की शाम को होते हैं,’’ कमली ने जोश के साथ बताया.

ठकुराइन किसी भी तरह से एक औलाद चाहती थीं. वे कमली की बातें सुन कर राजी हो गईं.

‘‘ठीक है कमली, मैं बांगुर बाबा के पास जाऊंगी… तुम रुको,’’ ठकुराइन अंदर जा कर 5,000 रुपए ले आईं.

‘‘ये पैसे आप मत रखो. मु झे दे दो. मैं बांगुर बाबा को दे दूंगी, क्योंकि मैं इस से पहले भी उन के पास जा चुकी हूं और वे मु झे अच्छी तरह से जानते हैं,’’ कमली ने कहा तो ठकुराइन ने तुरंत ही पैसे उसे दे दिए.

कमली ने पैसों को अच्छी तरह से अपनी चोली में छिपा लिया था. ठकुराइन किसी भी हाल में आज शनिवार की शाम को ही बांगुर बाबा से मिल लेना चाहती थीं.

कमली और ठकुराइन सब की नजरों से बचतेबचाते हुए बांगुर बाबा के पंडाल पर पहुंचीं और कमली ने बांगुर बाबा के चेलों को ठकुराइन की समस्या लिखवा दी.

चेलों ने ठकुराइन के सिर पर गुलाबी रंग का कपड़ा बांध दिया, जिस के बाद ठकुराइन अंदर चली गईं और कमली कुछ देर रुक कर मुसकराती हुई वापस अपने घर चली गई. अपनी योजना के पहले चरण में तो वह कामयाब हो गई थी.

2-3 दिन के बाद कलुआ और कमली ने पंचायत के सदस्यों से अर्ज किया कि वे पंचायत के सामने अपनी कुछ फरियाद रखना चाहते हैं और पंचायत में ठाकुर साहब को भी बुलाया जाए.

पंचों ने ठाकुर को बुला भेजा, पर ठाकुर अपनी अकड़ में थे, सो पंचों के बुलाने पर नहीं आए. पर पंचों के बारबार कहने और पंचायत का मान रखने के लिए आखिरकार ठाकुर पंचायत में आ गए. गांव के बड़ेबूढ़े, मर्दऔरतें और बच्चे वहां जमा हुए और पंच एक आसन पर विराजे.

एक पंच ने कहना शुरू किया, ‘‘यह पंचायत कमली और कलुआ की अर्ज पर बुलाई गई है. तो बताओ कमली, तुम्हें क्या कहना है?’’

कमली खड़ी हुई और तेज आवाज में उसने कहा, ‘‘मेरे पति ने कई साल पहले ठाकुर साहब से 500 रुपए बतौर कर्ज लिए थे, जिन्हें पूरे ब्याज के साथ हम लौटा भी चुके हैं, पर फिर भी ठाकुर साहब नहीं मानते कि हम ने पैसे लौटाए हैं और वे लगातार मेरे मर्द पर जुल्म करते रहते हैं.’’

‘‘तुम ने कर्जा लौटा दिया है, इस का क्या सुबूत है तुम्हारे पास?’’ ठाकुर बीच में ही दहाड़ पड़े.

कमली ने जवाब दिया, ‘‘हम अनपढ़ लोग हैं और हमारे पास कोई सुबूत नहीं है कि हम कर्जा दे चुके हैं, इसलिए अपनी गलती को संभालते हुए हम आज भरी पंचायत में दोबारा अपना कर्जा चुकता करने को तैयार हैं. पर इस शर्त के साथ कि कलुआ आज के बाद ठाकुर के घर बंधुआ मजदूरी नहीं करेगा और ठाकुर हम से दोबारा पैसे नहीं मांगेंगे.’’

कमली की बात सुन कर किसी को भला क्या एतराज होता. कलुआ ने अपनी जेब से पूरे 1,000 रुपए निकाले और पंचों के सामने गिन कर ठाकुर की ओर बढ़ा दिए.

ठाकुर दांत पीसते हुए सोचने लगे, ‘‘इन लोगों के पास एकदम से इतना पैसा कहां से आ गया?’’ पर बात पंचायत और सब के सामने थी, इसलिए उन्होंने पैसे ले लिए और यह ऐलान कर दिया कि अब कलुआ उन का कर्जदार नहीं है और न ही वह उन का बंधुआ मजदूर है.

कलुआ को अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि अब उसे ठाकुर की गालियां नहीं सुननी पड़ेंगी और न ही उन के घर पर काम करना पड़ेगा. आज वह ठाकुर के कर्ज से छुटकारा पा गया था.

रात को कमली ने चिलम में तंबाकू भरी और कलुआ ने चिलम जलाई. कलुआ ने भी दम मारा और कमली
ने भी. दोनों आंगन में खटिया डाल कर लेट गए.

‘‘तू यह तो बता कि 1,000 रुपए लाई कहां से? क्या ठाकुर से अपने जिस्म का सौदा कर किया है?’’

कलुआ ने कमली के उभारों पर अपने हाथ का दबाव बढाते हुए पूछा तो कमली ने मुसकराते हुए कहा कि वह खाली आम खाए पेड़ गिनना छोड़ दे.

कलुआ कमली की बात सुन कर मुसकराने लगा और अपने चेहरे को कमली के उभरे सीने के बीच रख दिया और उस के हाथ कमली के चिकने जिस्म पर फिसलने लगे.

कमली ने महसूस किया कि आज कलुआ उसे जी भर कर प्यार कर रहा था. आज कलुआ के बदन में बहुत तनाव था. कलुआ और कमली के जोर से खटिया भी मधुर शोर करने लगी थी.

आज अचानक तकरीबन 4 महीने के बाद ठकुराइन और कमली की मुलाकात हुई. दोनों की नजरों में जो बात हुई उसे वे दोनों ही सम झ सकीं. ठकुराइन की शरमाती नजरें यह बताने के लिए काफी थीं कि बांगुर बाबा से उस शाम की मुलाकात के बाद वे पेट से हो गई हैं.

‘‘ठाकुर साहब को उन के पिता बनने की खबर बता दी है. वे बहुत खुश हैं,’’ ठकुराइन ने फुसफुसाते हुए कहा, तो कमली भी मुसकराए बिना नहीं रह सकी.

‘‘पर बांगुर बाबा ने हमारी वीडियो फिल्म बना ली है. यह बात हम किसी को नहीं बताएंगे,’’ कमली ने कहा तो ठकुराइन ने भी कमली से फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘हां भई, नदी के घाट पर नहाते समय तो सब नंगे ही होते हैं.’’

दोनों ने एकदूसरे के हाथों को जोर से दबाया और अपनेअपने रास्ते चल पड़ीं. कमली यह सोच कर खुश हो रही थी कि किस तरह से उस ने एक तीर चला कर कई शिकार कर लिए हैं.

समय आने पर ठकुराइन ने एक बच्चे को जन्म दिया. ठाकुर ने पूरे गांव में दावत दी और जम कर मजा किया. पड़ोस के गांव से नाचनेगाने वाली बुलाई गई और रातभर नौटंकी के मजे लिए गए. रातभर यह गाना बजता रहा, ‘लौंडिया लंदन से लाएंगे, रातभर उसे नचाएंगे…’

आखिरकार ठाकुर को उन का वारिस मिल ही गया था. भले ही वे यह नहीं जान सके थे कि वे उस बच्चे के असली पिता नहीं हैं.

कलुआ को अपनी जीविका चलाने के लिए कुछ काम तो करना ही था और कमली के पास ठकुराइन के दिए हुए पूरे 4,000 रुपए बाकी थे. इन पैसों से कमली ने घर के लिए 2-3 महीने का राशन लिया और एक लकड़ी का खोखा बनवाया, जिसे गांव के बाहर जाने वाली सड़क के किनारे रखवा दिया गया, जिस में टौफी, बिसकुट, तंबाकू, पानी की बोतल, गुटका वगैरह रख कर वे दोनों अपनी जीविका चलाने लगे.

ठाकुर को औलाद मिल गई थी. ठकुराइन को ठाकुर की नजरों में इज्जत मिल रही थी. कलुआ को कमाई का साधन और मजदूरी से छुटकारा मिल गया था, पर बांगुर बाबा किसी और गांव में समस्याओं को हल करने की आड़ में गरीब और भोलेभाले लोगों का शोषण कर रहा था.

ऐसे न जाने कितने बांगुर बाबा अभी भी समाज में हैं और अंधविश्वास का फायदा उठा रहे हैं. केवल पढ़ाईलिखाई और जागरूकता ही लोगों को ऐसे बांगुर बाबाओं से बचा सकती है. Best Hind Kahani

Hindi Romantic Story: प्यार की कोई हद नहीं

Hindi Romantic Story: मेरा नाम धीरज है. वह दिन मेरी यादों में अब भी ताजा है, जैसे कल ही की बात हो. उस समय मैं एक अल्हड़, नासमझ नौजवान था. सपनों की दुनिया में जीने वाला, जिसे प्यार के गहरे मतलब का पता तक न था. गांव के सालाना मेले में, भीड़भाड़ और ढोलनगाड़ों के बीच, मेरी नजर अचानक सीमा पर ठहर गई.

सीमा अपने दोस्तों के साथ हंसते हुए बातें कर रही थी. उस की हंसी में इतनी कशिश थी कि आसपास की रौनक भी फीकी लगने लगी. वह बस मुसकरा रही थी और मैं उस मुसकान में अपने भविष्य का कोई अक्स देखने लगा.

पहली नजर के बाद, हमारी मुलाकातें धीरेधीरे आम हो गईं. कभी कुएं से पानी भरते हुए वह मेरे पास से गुजर जाती, कभी आम के बगीचे के रास्ते पर अचानक सामना हो जाता.

शुरू में मैं दूर से उसे निहारने तक ही सीमित था, पर समय के साथसाथ हमारी आंखें बोलने लगीं. उन चोरीचुपके पलों में हम ने सपने बुने.

सीमा कहती, ‘‘धीरज, हमारा एक छोटा सा घर होगा, उस का दरवाजा नीला होगा. खिड़की से धूप और हवा भरपूर आएगी. पिछवाड़े तुलसी का पौधा होगा.’’

हम दोनों अपनी ही बनाई दुनिया में खोए रहते. मुझे लगता था, अगर हमारे दिल साफ हैं, तो पूरा संसार हमारे साथ खड़ा होगा. पर मैं गलत था.

एक शाम हम खेतों के किनारे बैठे थे. आकाश में डूबता सूरज था और दूर से बैलों की घंटियां सुनाई दे रही थीं.

सीमा अपनी चूडि़यों से खेल रही थी और मैं उस के चेहरे को चुपचाप देख रहा था. तभी कदमों की तेज आहट सुनाई दी. उस के पिता और उस का भाई वहां आ गए थे. चेहरे पर गुस्सा, आंखों में समाज की पुरानी दीवारें.

सीमा के पिता की आवाज भारी थी, जैसे किसी ने पत्थर फेंका हो, ‘‘कौन हो तुम? अपनी औकात भूल गए हो? हमारी जाति से बाहर का हो कर भी हमारी बच्ची पर अपनी नजरें उठाने की हिम्मत कैसे की?’’

सीमा के भाई ने एक कदम आगे बढ़ा कर उंगली मेरे सीने पर टिका दी, ‘‘अगली बार सीमा के आसपास भी दिखे, तो याद रखना कि अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

उस पल मेरी सांसें थम सी गईं. मैं कुछ कहना चाहता था. शायद यह कि प्यार जाति नहीं देखता या कि सीमा और मैं बस सपने देख रहे थे. लेकिन मेरे होंठ सूख गए. दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि लगा वे लोग आवाज भी सुन लेंगे. मेरा गला खुश्क हो गया, जैसे किसी ने वहां कांटे भर दिए हों.

मैं ने उन की आंखों में देखना चाहा, पर हिम्मत नहीं जुटा पाया.

सीमा मेरी ओर देख रही थी. उस की आंखों में डर था, पर एक उम्मीद भी. शायद वह चाहती थी कि मैं कुछ कहूं, कुछ बोलूं. लेकिन मैं खामोश खड़ा रहा. उस खामोशी ने हमारे सपनों की बुनियाद को हिला दिया.

उस रात मैं बहुत देर तक जागता रहा. हर बार सोचा कि कल जा कर सीमा से कह दूंगा कि डरना नहीं चाहिए. पर सुबह होतेहोते मेरा साहस बुझ गया. गांव के लोगों की निगाहें, उन की बातें, उस के पिता और भाई के गुस्से का खौफ सब मिल कर मेरे सीने पर पत्थर सा दबाव डाल रहे थे.

दिन बीतते गए. मैं अब वे रास्ते बदलने लगा, जहां सीमा दिख सकती थी. मेरे भीतर अपराधबोध कचोटता रहा. हर बार जब मैं कुएं के पास से गुजरता, तो लगता कि वहां हमारी हंसी की गूंज अब मुझे डांट रही है. रातों को, जब अकेला होता, तो खुद को कोसता. ‘तुम ने क्यों नहीं कुछ कहा? क्यों नहीं खड़े हुए उस के लिए?’ लेकिन सुबह होते ही वही डर मुझे जकड़ लेता.

सीमा की शादी की खबर बिजली सी गिरी मेरे ऊपर. गांव में ढोलनगाड़े गूंज रहे थे, लोग शादी के भोज के मजे ले रहे थे, पर मेरे भीतर एक सन्नाटा था. शादी के दिन मैं अपने घर की छत पर खड़ा था.

मैं ने उसे दुलहन के लिबास में देखा… वह बहुत खूबसूरत लग रही थी, पर उस की मुसकान में एक अजीब सी थकान थी या शायद यह मेरे टूटे हुए दिल की कल्पना थी. बरात आई, शहनाइयां बजीं. जब उस की डोली उठी, तो मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे भीतर से कुछ खींच लिया हो.

सीमा के जाने के बाद, गांव वैसा नहीं रहा. आम के बगीचे अब सूने लगते, मेले की भीड़ में अब संगीत नहीं, शोर सुनाई देता था.

मैं अकसर उन रास्तों पर भटकता जहां हमने सपने देखे थे. हर जगह मुझे अपनी ही बुजदिली का अक्स दिखाई देता.

मैं ने कभी उसे अपने प्यार का इजहार नहीं किया और शायद यही मेरी सब से बड़ी भूल थी. न कि समाज
की दीवारें.

अब, सालों बाद भी, जब मैं उन दिनों को याद करता हूं, तो एक कसक उठती है. सीमा मेरी जिंदगी का वह अध्याय है जिसे मैं न तो मिटा सकता हूं, न ही जी सका हूं. मैं जानता हूं, प्यार शायद अब उस की जिंदगी में किसी और रूप में बसा होगा, पर मेरे दिल में वह अब भी वही लड़की है. नीले दरवाजे वाले घर के सपने देखने वाली.

मेरे लिए वह प्यार एक अनदिखे धागे की तरह है, जिसे समाज की सीमाएं तोड़ नहीं सकीं, पर मेरे अपने डर ने उसे अधूरा छोड़ दिया. Hindi Romantic Story

Equality Struggle: दलित नौजवान – अपनी मशाल खुद बनें

Equality Struggle: हर साल 14 अप्रैल को ‘अंबेडकर जयंती’ के मौके पर ‘नीला गमछा’ गले में लटका कर डाक्टर भीमराव अंबेडकर की एक हाथ में संविधान पकड़े और दूसरे हाथ से आसमान को उंगली दिखाती मूर्ति के ‘चरणों’ में झुक कर गुलाब या गेंदे के ‘लालपीले फूल’ चढ़ा देने भर से अगर आप ने काले फ्रेम का चश्मा और कोटपैंट पहने इस इनसान की सोच पकड़ ली है, तो आप गलत दिशा में जा रहे हैं. आप की इस इनसान को ले कर भ्रामक सोच आज भी कायम है.

डाक्टर भीमराव अंबेडकर को सम झने के लिए हमें जातिवाद के उस जहरीले सांप को सम झना होगा, जिस ने अपने अहंकार में आज तक अपनी केंचुली भी नहीं बदली है. हमें समाज की बेकार सोच के उस कूड़ेदान से वह आईना बाहर निकालना होगा, जिस में शूद्रों को उन की परछाईं तक नहीं दिखती है. कितने भयावह हालात हैं न?

एक उदाहरण से समझते हैं. एक समय देश के सब से ज्यादा पढ़ेलिखे लोगों में शुमार डाक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान को ले कर अपने एक भाषण में कहा था, ‘मैं यहां पर संविधान की अच्छाइयां गिनाने नहीं जाऊंगा, क्योंकि मु झे लगता है संविधान कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह अंतत: बुरा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग बुरे होंगे. और संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, वह अंतत: अच्छा साबित होगा, अगर उसे इस्तेमाल में लाने वाले लोग अच्छे होंगे.’

किसी इनसान के अच्छा या बुरा होने की इस से ज्यादा सटीक व्याख्या नहीं हो सकती, क्योंकि यह बात वह आदमी भरी संसद में बोल रहा है, जिसे अपने बचपन से ले कर आज तक जाति के नाम पर दुत्कार, पीड़ा और नफरत ही मिली है. आज भले ही उस ने अपनी पढ़ाईलिखाई से अपने विचारों को ‘शुद्ध’ कर लिया है, पर जब वह यह शिक्षा पा रहा था, तब स्कूल में उसे ‘अशुद्ध’ होने का ‘जातिगत तमगा’ देने वालों ने पूरी ‘श्रद्धा’ से चाहा था कि ब्रह्मा के पैर से जन्मा यह ‘अछूत’ अपने पुश्तैनी काम के बो झ तले दब कर कीड़ेमकोड़े की तरह मरखप जाए.

अब आज की बात करते हैं. इसी साल सितंबर का महीना और जगह उत्तर प्रदेश का बाराबंकी जिला. वहां के मसौली थाना इलाके के मलौली मजरे डापलिन पुरवा के रहने वाले निचली जाति के उदयभान निर्मल के मुताबिक, वह यूपीएसआई (उत्तर प्रदेश पुलिस सबइंस्पैक्टर) की तैयारी कर रहा था और इस के लिए वह चौराहे पर बनी क्वांटम लाइब्रेरी में रोजाना पढ़ने के लिए जाता था.

आरोप है कि रविवार, 21 सितंबर को दोपहर 2 बजे के बाद लंच हुआ और खाना खाने के लिए सभी छात्र एकत्र हुए. इसी बीच उदयभान निर्मल ने गलती से किसी दूसरे छात्र का टिफिन छू दिया. उस ऊंची जाति के प्रदुम्न ने जातिगत नफरत दिखाते हुए टिफिन दूर फेंक दिया.

पीडि़त छात्र उदयभान निर्मल के मुताबिक, प्रदुम्न ने टिफिन फेंकते हुए कहा कि तुम नीची जाति के हो, मेरे साथ बैठ कर खाना नहीं खा सकते. तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है.

पीडि़त उदयभान निर्मल आगे ने बताया कि प्रदुम्न ने जातिसूचक अपशब्द और गाली देने के बाद दोस्तों को फोन कर के बुला लिया और उस की बेरहमी से पिटाई कर दी. आगे कुछ कार्रवाई करने पर जान से मारने की धमकी दी.

बेइज्जती और मारपीट से दुखी दलित छात्र उदयभान निर्मल ने मसौली थाने में तहरीर दे कर कार्रवाई की मांग की है.

उदयभान निर्मल का कहना है कि वह प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा है, लेकिन ‘शिक्षा के मंदिर’ (लाइब्रेरी) में भी जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा, जो बेहद दुखद और शर्मनाक है.

उदयभान ने भले ही अपने नाम के आगे ‘निर्मल’ लगा है, पर वह प्रदुम्न जैसे अगड़ी जाति वालों के मन का मैल धो नहीं पा रहा है. लाइब्रेरी, जहां शांत रह कर शिक्षा हासिल की जाती है, वहां भी प्रदुम्न के मन में ‘जातिवाद का शोर’ इतना ज्यादा हावी था कि उसे उदयभान की हलकी सी छुअन भी स्वीकार नहीं हुई.

‘तुम्हारा काम जूतेचप्पल की मरम्मत करना है, पढ़ाईलिखाई करना तुम्हारा काम नहीं है’ वाली यह सोच प्रदुम्न में अचानक से नहीं जन्मी है, बल्कि इसे तो उस के बड़े ने पालपोस कर विरासत में दिया है कि भले ही देश कितनी भी तरक्की कर जाए, संविधान कितना भी मजबूत हो जाए, पर ये दोनों तुम्हारे जूते की नोक पर रहेंगे, क्योंकि तुम ‘बह्मा की श्रेष्ठ संतान’ हो, ‘ब्लू ब्लड’ हो. तुम देश और संविधान से भी ऊपर हो. यह ‘वैचारिक बुल्डोजर’ सदियों से वंचित समाज को रौंदता आया है.

यहां सवाल उठता है कि क्या जातिवाद को खत्म करने के लिए पढ़ाईलिखाई को वंचितों का हथियार बनाया जा सकता है? हां, पर हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि निचली जाति के लोगों में पढ़ाईलिखाई को ले कर सोच क्या बनी हुई है.

पढ़ाई करने से हम देश, समाज और दुनिया के प्रति जागरूक होते हैं, अच्छा रोजगार पाते हैं, चार लोगों में अपने विचार रखने की सोच बना पाते हैं, पर साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जिस देश और समाज में हम रह रहे हैं, उस पर धार्मिक कट्टरता बहुत ज्यादा हावी हो गई है. हर किसी को अपनेअपने ईश्वर की तलाश सी रहती है. यही वजह है कि वंचित समाज ने भी डाक्टर भीमराव अंबेडकर में अपना ईश्वर तलाशना शुरू कर दिया है. यह मूर्तिपूजा का ही नया रूप है, क्योंकि इस तलाश में भीमराव अंबेडकर के विचार तो दब गए हैं.

पाखंडी पंडेपुजारी तो चाहते हैं कि उन के मंदिरों में वे भक्त ही भेड़ की तरह सिर झुकाए चले आएं, जिन में दानपात्र भरने की ताकत है, फिर चाहे वे किसी भी समाज, समुदाय और जाति के क्यों न हों. फटेहाल दलित अंबेडकर की मूर्ति में उल झे रहें, नीले गमछे के बो झ में दबे रहें, नेता के भाषणों को सुनने वाली भीड़ बने रहें और थोड़ा सा बरगलाने पर ढेर सारे वोट सियासी रहनुमाओं के बैलेट बौक्स में दान स्वरूप चढ़ा दें, यही काफी है. वे बिना सिर के (बेदिमाग) वोटबैंक हैं, जिन्हें सिर्फ चुनाव में चूना लगाया जाता है.

यह सियासी प्रपंच तब और ज्यादा बढ़ा, जब हर नेता को यह लगा कि दलित समाज डाक्टर अंबेडकर के नाम पर एकजुट हो गया है या हो सकता है. नेताओं ने इसे अपना ‘दलित प्रेम’ बताया पर हकीकत में ऐसा नहीं है. हर दल इस समुदाय से ‘सियासी स्वार्थ’ साध रहा है, इन के घर भोजन करने की नौटंकी कर रहा है, इन्हें ‘सुरक्षित सीट’ से टिकट दे रहा है, पर भला कुछ नहीं कर रहा. खुद इस समाज से निकले नेता भी कागजी शेर बन कर रह गए हैं. अगड़ों का ‘यैसमैन’ कहलाने में इन्हें अलग तरह का सुख मिलता है.

इस बात को इस उदाहरण से सम झते हैं. ‘फौरवर्ड प्रैस’ में कंवल भारती का एक लेख छपा था, जिस में उत्तर प्रदेश में हाथरस जिले की इगलास सुरक्षित सीट से साल 2017 में चुने गए विधायक राजवीर दिलेर का जिक्र किया गया था. इन के पिता किशन लाल भी 5 बार के विधायक और एक बार के सांसद थे. पढ़ाईलिखाई इन की ज्यादा नहीं है.

राजवीर दिलेर के बारे में पत्रकार आलोक शर्मा की एक रिपोर्ट अखबार ‘टाइम्स औफ इंडिया’ में छपी थी, जिस के मुताबिक ये सवर्णों के यहां जमीन पर बैठते हैं, चाय के लिए अपना कप अपने साथ रखते हैं और कहते हैं कि ‘मेरे बाप भी जातिवाद मानते थे, और मैं भी मानता हूं’.

राजवीर दिलेर का सुरक्षित क्षेत्र जाटों का इलाका है, जिन की तादाद 90,000 है. इन्हीं के वोटों पर इस दलित की जीत निर्भर करती है. क्या इस विधायक से दलितों के लिए काम करने की उम्मीद की जा सकती है?

शायद नहीं, क्योंकि ऐसे नेता भी वोटबैंक की ताकत सम झते हैं. इन्हें भले ही ‘सुरक्षित सीट’ मिल जाती है, पर जब तक दूसरी जातियों का हाथ इन के सिर पर नहीं आता है, तब तक इन का जीतना बड़ा मुश्किल होता है.

जब नेताओं का ऐसा गठजोड़ बनता है, तो दलित तबके के गरीब और अनपढ़ लोग तो क्या, अच्छे पढ़ेलिखे और ‘वैल सैटल्ड’ लोग भी तन और मन से हताश हो जाते हैं. हरियाणा में आईपीएस वाई. पूरन कुमार की खुदकुशी का मामला इसी प्रशासनिक और राजनीतिक अंधेरगर्दी का नतीजा है, जहां एक बड़ा अफसर 7 अक्तूबर, 2025 को चंडीगढ़ में गोली मार कर अपनी जिंदगी खत्म कर लेता है.

आईपीएस वाई. पूरन कुमार आंध्र प्रदेश के रहने वाले थे. उन का जन्म 27 अक्तूबर, 1977 को हुआ था. उन्होंने आईआईएम अहमदाबाद से पीजीडीएमसी किया था. इस के बाद उन्होंने यूपीएससी की तैयारी की और ऐग्जाम क्लियर किया. वे साल 2001 बैच के हरियाणा कैडर के आईपीएस अफसर थे.

फिलहाल वाई. पूरन कुमार रोहतक रेंज के आईजी थे. 29 सितंबर, 2025 को ही उन का ट्रांसफर हुआ था. उन्हें अब रोहतक के सुनरिया में पुलिस ट्रेनिंग कालेज में आईजी के तौर पर पोस्टिंग मिली थी.

वाई. पूरन कुमार कई सालों से सिस्टम से परेशान थे. मई, 2021 में उन्होंने अंबाला के एसपी के सामने तब के डीजीपी मनोज यादव के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. उन का आरोप था कि उन्हें उन की जाति के चलते परेशान और सताया जाता है.

नवंबर, 2023 में वाई. पूरन कुमार ने तब के मुख्य सचिव संजीव कौशल से उस समय के गृह सचिव टीवीएसएन प्रसाद के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की इजाजत मांगी थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि उन की जाति के चलते उन्हें गैर कैडर पद पर तैनात किया गया था.

पिछले साल अप्रैल में वाई. पूरन कुमार ने साल 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनावों से ठीक पहले चुनाव आयोग के सामने एक शिकायत दर्ज कराई थी, जिस में उन्होंने आरोप लगाया था कि आचार संहिता लागू होने के बाद 2 एजीजीपी को डीजीपी और 2 आईजी को एडीजीपी के तौर पर प्रमोट किया गया था.

अपने सुसाइड नोट में आपीएस वाई. पूरन कुमार ने 8 आईपीएस और 2 आईएएस अफसरों पर आरोप लगाए थे. उन्होंने जिन पर आरोप लगाया था, उन में 8 आईपीएस अमिताभ ढिल्लों, मनोज यादव, पीके अग्रवाल, संदीप खिरवार, सिबास कविराज, संजय कुमार, पंकज नैन और डाक्टर रवि किरण आदि के नाम शामिल हैं. इन के अलावा 2 रिटायर्ड आईएएस राजीव अरोड़ा और टीवीएसएन प्रसाद का नाम भी है.

अब आप सोचिए कि इतने बड़े रैंक का बड़ा सरकारी अफसर, जिस पर अपने इलाके में शांति और भाईचारा बनाने का दबाव रहता है, वह अपनी जाति की हीनता के बो झ तले दबाया जा रहा था. वह भी ऐसे लोगों द्वारा जो उसी के ‘प्रशासनिक भाईबंधु’ थे.

तो क्या जातिवाद का यह जहरीला सांप कभी भी केंचुली नहीं उतरेगा? चूंकि हमारे समाज में जातपांत बहुत गहरे तक पैठ जमाए हुए है, तो लगता है कि फिलहाल यह दूर की कौड़ी है, पर यहां एक बात जो बहुत ज्यादा अहम है, वह है इस बहुजन समाज की आपसी एकता, जिसे पढ़ाईलिखाई से और ज्यादा मजबूत किया जा सकता है.

दूसरा तरीका यह है कि जहां आप रहते हैं, उस घर, गली, महल्ले को व्यवस्थित करें. लोगों को यह मत सोचने दें कि उन का गंदगी या गरीबी में रहना पिछले जन्म का पाप है, जिसे वे आज इस जन्म में भोग रहे हैं. दुनिया की कोई भी ताकत आप को साफसुथरा और आप के आसपास की जगह को ‘नीट एंड क्लीन’ बनाने से रोक नहीं सकती है.

तीसरा, अपने आसपास के लोगों में फैली सामाजिक बुराइयों को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठाएं. आप कोई बड़े अफसर बने हैं, तो यह मत सम झें कि अब निकलो इस नरक से जहां हमारी पुरानी पीढि़यां जानवर से बदतर जिंदगी गुजार कर मरखप गईं. इस उलट आप की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि समाज के इस हिस्से को कैसे अंधविश्वास, नशाखोरी, बेरोजगारी, आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने से रोका जाए.

रास्ता दिखाने के लिए एक के हाथ में ही मशाल होना काफी है. अपनी मशाल खुद बनें. जातिवाद के अंधेरे से निबटने का यही एकमात्र रास्ता है. Equality Struggle

Hindi Story: नया खिलौना – जब खेल बना श्रुति का प्यार

Hindi Story: आज श्रुति की खुशी का ठिकाना न था. स्कूल से आते समय उस लड़के ने मुसकरा कर उसे फ्लाइंग किस जो दी थी. 16 साल की श्रुति के दिल की धड़कनें बेकाबू हो उठी थीं. वह पल ठहर सा गया था. वैसे उस लड़के के साथ श्रुति की नजरें काफी दिनों पहले ही चार हो चुकी थीं. आतेजाते वह उसे निहारा करता. श्रुति को भी ऊंचे और मजबूत कदकाठी का करीब 18 साल का वह लड़का पहली नजर में भा गया था. लड़का श्रुति के घर से कुछ दूर मेन रोड पर बाइक सर्विसिंग सैंटर में काम करता था.

श्रुति की एक सहेली उस लड़के को जानती थी. उसी सहेली ने बताया था कि जतिन नाम का एक लड़का अपने घर का इकलौता बेटा है और 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद कुछ घरेलू परेशानियों के कारण काम करने लग गया है.

घर में सब के होने के बावजूद श्रुति बारबार बरामदे में आ कर खड़ी हो जाती ताकि उस लड़के को एक नजर फिर से देख सके. श्रुति के दिल की यह हालत करीब 2 महीने से थी पर  आज इस प्रेम की गाड़ी को रफ्तार मिली जब उस लड़के ने उस से साफ तौर पर अपनी चाहत जाहिर की.

अब श्रुति का ध्यान पढ़ाई में जरा सा भी नहीं लग रहा था. उस की नजरों के आगे बारबार वही चेहरा घूम जाता. हाथ में मोबाइल थामे वह लगातार यही सोच रही थी कि उस लड़के का मोबाइल नंबर कैसे हासिल करे.

बहन की उलझन भाई ने तुरंत भांप ली. श्रुति को भी तो कोई राजदार चाहिए ही था. उस ने अपने मन की हर बात खुद से 2 साल छोटे भाई गुड्डू से कह दी. भाई ने भी अपना फर्ज अच्छी तरह निभाते हुए झट श्रुति का फोन नंबर एक कागज पर लिखा और उस लड़के के पास पहुंच गया.

‘यह क्या है?’ उस के सवाल पूछने पर गुड्डू ने बड़ी तेजी से जवाब दिया, ‘खुद समझ जाओ.’

कागज थमा कर वह घर चला आया और श्रुति मोबाइल हाथ में ले कर बड़ी बेचैनी से कौल का इंतजार करने लगी. मोबाइल की घंटी बजते ही वह दौड़ कर छत पर चली जाती ताकि अकेले में उस से बातें कर सके. मगर नंबर दिए हुए 3 घंटे बीत गए, पर उस लड़के की कोई कौल नहीं आई.

उदास सी श्रुति छत पर टहलती रही. उस की निगाहें लगातार उस लड़के पर टिकी थीं जो अपने काम में मशगूल था. थक कर वह किचन में मम्मी का हाथ बंटाने लगी कि मोबाइल पर छोटी सी रिंग हुई. श्रुति फोन के पास तक पहुंचती तब तक मोबाइल खामोश हो चुका था. गुस्से में  वह फोन पटकने ही वाली थी कि फिर उसी नंबर से कौल आई. पक्का वही होगा, सोचती हुई वह कूदती हुई छत पर पहुंच गई. अपनी बढ़ी धड़कनों पर काबू करते हुए हौले से ‘हैलो’ कहा तो उधर से ‘आई लव यू’ सुन कर उस का चेहरा एकदम से खिल उठा.

‘‘मैं भी आप को बहुत पसंद करती हूं. मुझे आप की हाइट बहुत अच्छी लगती है,’’ श्रुति ने चहक कर कहा.

‘‘बस हाइट और कुछ नहीं,’’ कह कर जतिन हंसने लगा. श्रुति शरमा गई फिर तुनक कर बोली, ‘‘फोन करने में इतनी देर क्यों लगाई?’’

‘‘अच्छा, इतना इंतजार था मेरी कौल का?’’ वह भी मजे ले कर बातें करने लगा.

श्रुति और जतिन देर तक बातें करते रहे. रात में श्रुति ने फिर से उसे कौल लगा दी. अब तो यह रोज की कहानी हो गई. श्रुति जब तक दिन में 10 बार उस से बातें नहीं कर लेती, उस का दिल नहीं भरता. एग्जाम आने वाले थे पर श्रुति का ध्यान पढ़ाई में कहां लग रहा था. वह तो खयालों की दुनिया में उड़ रही थी.

अकसर वह जतिन से मिलने जाती. जतिन श्रुति को चौकलेट्स और शृंगार का सामान ला कर देता तो वह फूली नहीं समाती. उस से बातें करते समय वह सबकुछ भूल जाती. ठीक उसी प्रकार जैसे बचपन में अपने खिलौने से खेलते हुए दुनिया भूल जाती थी.

उस लड़के का प्यार एक तरह से श्रुति के लिए खिलौने जैसा लुभावना था जिसे वह दुनिया से छिपा कर रखना चाहती थी. उसे डर था कि कहीं किसी को पता लग गया तो वह प्यार उस से छीन लिया जाएगा. पापा से वह खासतौर पर डरती थी. पापा ने एक बार गुस्से में उस का सब से पहला खिलौना तोड़ दिया था. तब से वह उन से खौफजदा रहने लगी थी. अपनी जिंदगी में जतिन की मौजूदगी की भनक तक नहीं लगने देना चाहती थी.

और फिर वही हुआ जिस का डर था. उस का 9वीं कक्षा का फाइनल रिजल्ट अच्छा नहीं आया. पापा ने रिजल्ट देखा तो बौखला गए. चिल्ला कर बोले, ‘‘बंद करो इस की पढ़ाईलिखाई. बहुत पढ़ लिया इस ने. अब शादी कर देंगे.’’

श्रुति सहम गई. कहीं यह खिलौना भी पापा छीन न लें. यह सोच कर रोने लगी. अब वह 10वीं कक्षा में आ गई थी. फाइनल एग्जाम में किसी भी तरह उसे अच्छे नंबर लाने थे. वह मन लगा कर पढ़ने लगी ताकि एग्जाम तक उस की परफौर्मैंस सुधर जाए. इधर जतिन भी दूसरी जौब करने लगा था. अब वह श्रुति को हर समय नजर नहीं आ सकता था. वह कभीकभार ही मिलने आ पाता. श्रुति भी उस से कम से कम बातें करती. एग्जाम में वह अच्छे नंबर ले कर पास हो गई. समय धीरेधीरे बीतता गया और अब श्रुति उस लड़के से बातचीत भी बंद कर चुकी थी. देखतेदेखते वह 12वीं की भी परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर गई. अच्छे अंकों से पास करने से उसे अच्छे कालेज में दाखिला भी मिल गया.

कालेज के पहले दिन वह बहुत अच्छे से तैयार हुई. कुछ दिनों पहले ही बालों में रिबौंडिंग भी करा चुकी थी. जींस और टीशर्ट के साथ डैनिम की जैकेट और खुले बालों में काफी स्मार्ट लग रही थी. उस ने खुद को मिरर में निहारा और इतराती हुई सहेली के साथ निकल पड़ी.

कालेज गेट के पास अचानक वह सामने से आते एक लड़के से टकरा गई. सौरी कहते हुए उस लड़के ने श्रुति के हाथ से गिरा हैंडबैग उसे थमाया और एकटक उसे निहारने लगा. श्रुति का दिल तेजी से धड़कने लगा. बेहद आकर्षक व्यक्तित्व वाला वह लड़का श्रुति को पहली नजर में भा गया था. वह दूर तक पलटपलट कर उस लड़के को देखती रही.

कालेज में पूरे दिन श्रुति की नजरें उसी लड़के को ढूंढ़ती रहीं. लंच में वह कैंटीन में दिखा तो श्रुति मुसकरा उठी. वह लड़का भी हैलो कहता हुआ उस के पास आ गया. दोनों ने देर तक बातें कीं और एकदूसरे का फोन नंबर भी ले लिया. घर जा कर भी उन के बीच बातें होती रहीं. कालेज के पहले दिन हुई दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई.

श्रुति के पास जब से आकाश नाम का यह नया खिलौना आया वह पुराना खिलौना यानी जतिन को भूल गई. अब कभी जतिन उसे फोन कर बात करने की कोशिश भी करता तो वह उसे इग्नोर कर देती, क्योंकि वह अपना सारा समय अब अपने बिलकुल नए और आकर्षक खिलौने यानी आकाश के साथ जो बिताना चाहती थी. Hindi Story

Story In Hindi: पानी चोर – क्या हुआ जब पकड़ी गई कल्पना

Story In Hindi: रात के तकरीबन 2 बजे थे. कल्पना ने अपना कई दिनों से खाली पड़ा घड़ा उठाया और उसे साड़ी के पल्लू से ढक कर दबे पैर घर से चल पड़ी. करीब 15 मकानों के बाद वह एक कोठी के सामने रुक गई.

कल्पना को कोठी की एक खिड़की अधखुली नजर आई. उस ने धीरे से पल्ला धकेला, तो खिड़की खुल गई. उस की आंखें खुशी से चमक उठीं. वह उस खिड़की को फांद कर कोठी में घुस गई. कोठी के अंदर पंखों व कूलरों की आवाजों के अलावा एकदम खामोशी थी. लोग गहरी नींद में सो रहे थे.

कल्पना एक कमरा पार कर के दूसरे कमरे में पहुंची. वहां अलमारी अधखुली थी, जिस में से नोटों की गड्डियां व सोने के गहने साफ दिखाई दे रहे थे. कल्पना उन्हें नजरअंदाज करती हुई आगे बढ़ गई और तीसरे कमरे में पहुंची. वहां कई टंकियों में पानी भरा हुआ था.

कल्पना ने अपना घड़ा एक टंकी में डुबोया और पानी भर कर जिस तरह से कोठी में दाखिल हुई थी, उसी तरह से पानी ले कर अपने घर लौट आई.

‘‘पानी ले आई कल्पना. जब मैं ने देखा कि घड़ा घर पर नहीं है, तो सोचा कि तू पानी लेने ही गई होगी,’’ कल्पना के अधेड़ पति शंकर ने कहा, जो 2 महीने से मलेरिया से पीडि़त हो कर चारपाई पर पड़ा था.

‘‘जी, पानी मिल गया. आप पानी पी कर अपनी प्यास बुझाएं. मैं दूसरा घड़ा भर कर लाती हूं. अजीत उठे, तो उसे भी पानी पिला दीजिएगा,’’ कल्पना ने पानी से भरा गिलास देते हुए कहा.

शंकर ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई. 2 दिनों से इस घर के तीनों लोगों ने एक बूंद पानी भी नहीं पीया था. अजीत तो कल्पना का दूध पी लेता था, मगर कल्पना और शंकर प्यास से बेचैन हो गए थे.

कल्पना ने पानी से भरा हुआ दूसरा घड़ा भी ला कर रख दिया. जब वह तीसरा घड़ा उठा कर बाहर जाने लगी, तब शंकर ने पूछा, ‘‘आज भीड़ नहीं है क्या? तू ने पानी पीया? टैंकर कहां खड़ा है? क्या आज सरपंच ने टैंकर अपने घर में खाली नहीं किया?’’

‘‘आप आराम कीजिए, मैं अभी यह घड़ा भी भर कर लाती हूं,’’ कह कर कल्पना तीसरा घड़ा उठा कर चली गई.

इस बार भी कल्पना उसी तरह कोठी में दाखिल हुई और घड़ा टंकी में डुबोया. घड़े में पानी भरने की आवाज से अब की बार कोठी का कुत्ता जाग कर भूंकने लगा.

तभी कल्पना को बासी रोटी के टुकड़े एक थाली में पड़े दिखाई दिए. कल्पना ने रोटी का टुकड़ा उठा कर कुत्ते की ओर फेंका और घड़ा उठा कर तीर की मानिंद कोठी के बाहर हो गई.

तभी एक काले से आदमी ने वहां आ कर तेज आवाज में कल्पना से पूछा, ‘‘कौन हो?’’

कल्पना बिना कुछ कहे आगे बढ़ती गई. वह आवाज पहचान गई थी. वह सरपंच राम सिंह ठाकुर की आवाज थी.

सरपंच ने कल्पना का पीछा करते हुए कहा, ‘‘चोर कहीं की, पानी चोर. शर्म नहीं आती पानी चुराते हुए.’’

इतना कह कर सरपंच ने कल्पना को दबोच लिया. उस ने खुद को छुड़ाना चाहा, तो सरपंच बोला, ‘‘मैं अभी ‘पानी चोर’ कह कर शोर मचा कर सारे गांव वालों को जमा कर दूंगा. भलाई इसी में है कि तू वापस कोठी चल और मुझे खुश कर दे. मैं तेरी हर मुराद पूरी करूंगा.’’

‘‘चल हट,’’ हाथ छुड़ाते हुए कल्पना ने कहा.

सरपंच ने जब देखा कि कल्पना नहीं मान रही है, तो उस ने ‘चोरचोर, पानी चोर’ कह कर जोरजोर से आवाजें लगानी शुरू कर दीं.

आवाज सुन कर गांव वाले लाठी व फरसा ले कर कोठी के पास जमा हो गए. कुछ लोग लालटेनें ले कर आए.

मामला जानने के बाद कुछ लोग कल्पना से हमदर्दी जताते हुए कह रहे थे कि बेचारी क्या करती, 2 दिनों से उसे पानी नहीं मिला था. दूसरी ओर सरपंच के चमचे कह रहे थे कि इस पानी चोर को पुलिस के हवाले करो.

‘‘ऐसा मत करो, बेचारी गरीब है. छोड़ दो बेचारी को,’’ एक बूढ़ी औरत ने हमदर्दी जताते हुए कहा.

किसी ने कल्पना के पति शंकर को जा कर बताया कि कल्पना सरपंच के घर से पानी चुराते हुए पकड़ ली गई है और उसे थाना ले जा रहे हैं.

बीमार शंकर भागाभागा आया और सरपंच के पैरों पर गिर कर कल्पना की ओर से माफी मांगने लगा. मगर ठाकुर ने उसे पैरों की ठोकर मार दी और कल्पना को ले कर थाने की ओर चल पड़ा. बेचारा शंकर यह सदमा बरदाश्त न कर सका और वहीं हमेशा के लिए सो गया.

कल्पना को ले कर जब सरपंच और उस के चमचे थाने पहुंचे, तो थानेदार ने पूछा, ‘‘क्या हो गया? यह लड़की कौन है? इसे बांध कर क्यों लाए हो?’’

सरपंच ने थानेदार को नमस्ते करते हुए कहा, ‘‘जी, मैं गांव डोगरपुर का सरपंच ठाकुर राम सिंह हूं. इस औरत ने मेरी हवेली में घुस कर चोरी की है. मैं ने इसे रंगे हाथों पकड़ा है और आप के पास शिकायत करने आया हूं,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘कितना माल यानी मेरा मतलब है कि कितना सोनाचांदी व रुपए चोरी किए हैं इस ने?’’ थानेदार ने पूछा.

‘‘जी, रुपए या सोनाचांदी नहीं, इस ने तो एक घड़ा पानी मेरे घर में घुस कर चुराया है.

‘‘समूचे इलाके के लोग बूंदबूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, वे 15 किलोमीटर पैदल चल कर मुश्किल से एक घड़ा पानी ले कर लौटते हैं.

‘‘इस की हिम्मत तो देखिए साहब, खिड़की फांद कर पानी चुरा कर ले जा रही थी,’’ सरपंच ने बताया.

‘‘क्या चाहते हो तुम?’’

‘‘आप रिपोर्ट लिख कर इस औरत को जेल भेज दो,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘जाओ मुंशीजी के पास रिपोर्ट लिखवा दो.’’

‘‘मुंशीजी, रिपोर्ट लिखाने से पहले सरपंच को अच्छी तरह समझा देना,’’ थानेदार ने मुंशीजी को आवाज लगा कर कहा.

मुंशीजी ने सरपंच को एक ओर ले जा कर उस के कान में कुछ कहा.

‘‘अरे हैड साहब, मैं कई सालों से सरपंच हूं. मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि बिना लिएदिए आजकल कोई काम नहीं होता है,’’ सरपंच ने जेब से नोटों की 2 गड्डियां निकाल कर मुंशीजी के हवाले कर दीं.

मुंशीजी ने सरपंच की एफआईआर दर्ज कर ली. कल्पना को थानेदार के सामने पेश किया, ‘‘श्रीमानजी, यह वही लड़की है, जिस ने मेरे घर से एक घड़ा पानी चुराया है.’’

थानेदार ने कल्पना को नीचे से ऊपर तक घूरा और बोला, ‘‘क्या तू ने चोरी की? चोरी करते वक्त तुझे शर्म नहीं आई?’’

कल्पना पत्ते की तरह कांप रही थी. उस के रोने से मुरझाए हुए चेहरे पर आंसुओं की लाइनें नजर आ रही थीं.

दूसरे दिन कल्पना को अदालत में पेश किया गया. वहां सरपंच के साथ उस के चमचे कल्पना के खिलाफ गवाही देने के लिए आए हुए थे.

पुलिस ने पानी से भरा हुआ वह घड़ा अदालत में पेश किया, जो कल्पना के पास से जब्त किया गया था.

जज ने सब से पहले कल्पना की ओर देखा, जो कठघरे में सिर नीचा किए खड़ी थी.

अदालत ने गवाहों के लिए पुकार लगवाई. सरपंच के चमचों ने अदालत को बताया कि कल्पना ने पानी चुराया, जिसे सरपंच ने रंग हाथों पकड़ लिया. मगर मौके पर कोई गवाह नहीं था. सभी गवाहों ने यही बताया कि सरपंच ने उन्हें बताया.

जज ने कल्पना से पूछा, ‘‘क्यों, क्या तुम ने एक घड़ा पानी सरपंच के घर से चुराया?’’

‘‘जी, एक घड़ा नहीं, बल्कि 3 घड़े पानी मैं सरपंच के घर से लाई. पर उसे चुराया नहीं, बल्कि अपने हिस्से का ले कर आई,’’ कल्पना ने बेधड़क हो कर बताया.

‘‘अपने हिस्से का… चुराया नहीं, लाई का क्या मतलब है?’’ जज ने पूछा.

‘‘इस भयंकर गरमी में गांव के सारे कुएं, हैंडपंप व तालाब सूख गए हैं. एकएक बूंद पानी के लिए गांव वाले तरस रहे हैं. प्यास से मर रहे हैं.

‘‘पंचायत ने गांव में पानी का इंतजाम किया है. हमारे गांव में पानी के लिए सिर्फ 2 टैंकरों का इंतजाम है, जिस में से एक टैंकर सरपंच अपने घर खाली करा लेता है, जिसे वह चोरी से बेचता है. दूसरे टैंकर का पानी गांव वाले छीनाझपटी कर के लेते हैं.

‘‘मैं वह अभागी औरत हूं, जिसे कई दिनों से एक बूंद पानी नहीं मिला. बीमार पति घर में हैं. मैं सरपंच के घर से अपने हिस्से का पानी ही लाई हूं.

‘‘मेरी बातों पर यकीन न हो, तो इन गांव वालों से पूछ लीजिए. मैं अदालत से गुजारिश करती हूं कि मैं पानी चोर नहीं हूं, बल्कि असली पानी चोर तो सरपंच है. सरपंच के घर की टंकियां पानी से भरी पड़ी हैं.’’

अदालत में गांव वालों ने भी कहा कि यह बात सच है. कल्पना सही कह रही है.

वह 50 रुपए प्रति घड़े की दर से पानी बेचता है. अभी इस वक्त भी सरपंच के घर पानी के लिए ग्राहकों की लंबी कतार लगी है.

सरपंच बगलें झांकने लगा. जज को सरपंच व पुलिस की जालसाजी की बू इस मुकदमे में आने लगी. कल्पना को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया और असली चोर को पकड़ने के लिए जांच के आदेश जारी कर दिए गए.

कल्पना जब अपने गांव पहुंची, तो उसे पता चला कि किसी ने रात में ही उस के पति शंकर, जो सदमे से उसी दिन चल बसा था, की लाश फूंक दी थी.

जब कल्पना अपने घर पहुंची, तो उस का अबोध लड़का अजीत भी हमेशा के लिए सोया हुआ मिला. कल्पना ने जैसे ही अपने बेटे की लाश को देखा, तो उस की जोर से चीख निकल पड़ी.

‘‘अजीत… अजीत…’’ कह कर वह बेहोश हो गई. गांव वाले जो कल्पना के खिलाफ थे, अब सरपंच के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, ‘पानी चोर… सरपंच पानी चोर… असली चोर सरपंच…’

कल्पना पागल हो चुकी थी. वह अपने बेटे की लाश को बता रही थी, ‘‘बेटे, मैं पानी चोर नहीं हूं, असली पानी चोर सरपंच है.’’

इतना कह कर कल्पना कभी हंसती, तो कभी रोने लगती थी.

पुलिस ने सरपंच के घर से लबालब भरी पानी की कई टंकियों को जब्त किया. जो पानी खरीदने आए थे, उन्हें गवाह बना कर ठाकुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. Story In Hindi

Best Hindi Story: सपनों का सफर – परिणीता के सपनों में जीता रवि

Best Hindi Story: उस ने आज फिर शाम होते ही खुद को अपने कमरे में बंद कर लिया. मुझे उलझन होने लगी. मैं खुद को रोक नहीं पाया और अब मैं उस के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था.

थोड़ी देर में उस ने दरवाजा खोला, ‘‘क्या है अजय, मैं कुछ देर अकेले रहना चाहता हूं. प्लीज, मुझे छोड़ दो…’’ वह अजीब सी दर्दभरी सूरत बना कर एक तरह से मुझ से गुजारिश करने लगा.

मुझे यह देख कर घबराहट होने लगी. मैं ने उस के कमरे में तकरीबन दाखिल होते हुए पूछा, ‘‘क्यों इतनी परेशानी हो रही है? मैं दोस्त हूं तुम्हारा. मुझे अपना दर्द बताओ. कहने से दर्द कम हो जाता है.

‘‘अकेले घुटघुट कर सहने से अच्छा है कि दर्द को कह दिया जाए,’’ मैं देख रहा था कि उस की आंखें भर आई थीं और लग रहा था कि अभी वह रो देगा.

मैं ने उस की बांह पकड़ कर सोफे पर बैठा दिया और खुद उस के पास ही बैठ गया, ‘‘रवि, मुझे बताओ कि ऐसा क्या है, जिस ने तुम्हें इतना अकेला बना दिया है? ऐसी कौन सी बात है, जो तुम अपने बचपन के दोस्त से भी नहीं बताना चाहते? इस तरह से घुटते रहोगे, तो बीमार पड़ जाओगे. मुझे अपना सारा दर्द बताओ,’’ मैं ने उसे समझाया.

रवि इतना सुनते ही बच्चों की तरह फूटफूट कर रोते हुए लिपट गया, ‘‘अजय, मैं जीना नहीं चाहता हूं. मेरी जिंदगी में अब कुछ नहीं बचा है. मेरे जीने का मकसद ही खत्म हो गया है.’’

‘‘मुझे बताओ कि आखिर बात क्या है?’’ मैं ने उसे सहलाते हुए कहा.

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद रवि कुछ संभलते हुए बोला, ‘‘अजय, मेरी जिंदगी में तूफान है और मैं एक ऐसी जगह खड़ा हूं, जहां से न तो पीछे जा सकता हूं और न आगे…’’

थोड़ी देर की खामोशी के बाद रवि ने आगे कहना शुरू किया, ‘‘अजय,  पहली बार मुझे जिंदगी में परिणीता से मिलने के बाद ऐसा लगा था कि कोई अनजानी सी ताकत है, जो हमें करीब लाने की कोशिश कर रही है. यह सही था कि मुझे उस से प्यार हो गया था, लेकिन धीरेधीरे हम कब एकदूसरे के होते चले गए, हमें खुद ही पता न चला.

‘‘परिणीता मेरी जिंदगी में एक खूबसूरत सपने की तरह थी और हम दोनों इस सपने को जीना चाहते थे, लेकिन जैसा कि हमेशा होता रहा है, परिणीता के घर वालों को हमारे बारे में पता चला और परिणीता पर पहरा लगा दिया गया. शादी के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी गई. फिर एक दिन मैं शाम को घर लौट रहा था कि गली के मोड़ पर परिणीता की आवाज सुनाई दी.

‘‘मैं ठिठक गया. वह बोली, ‘रवि, मुझे तुम से बहुत जरूरी बात करनी है. मेरे साथ चलो.’

‘‘मैं ने उस से पूछा, ‘ऐसी क्या बात है, जो तुम यहां नहीं कह सकतीं?’

‘‘वह बोली, ‘मेरे साथ चलो, मैं यहां नहीं कह सकती.’

‘‘यह बात उस ने मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए कही. मैं चल पड़ा.

‘‘नवीन पार्क पहुंच कर उस ने कहना शुरू किया, ‘रवि, मैं यहां से कहीं दूर जाना चाहती हूं…’

‘‘मैं ने घबरा कर कहा, ‘क्यों परी, किसी ने कुछ कहा क्या?’

‘‘वह बोली, ‘रवि, मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. तुम्हारे बिना मैं मर जाऊंगी, लेकिन मेरे घर वाले न तुम्हें पसंद करते हैं और न ही मेरा आगे पढ़ना पसंद करते हैं. आज ही पता चला है कि किसी गांव में बहुत रूढि़वादी परिवार में मेरी शादी तय हो रही है. मैं तो जीतेजी मर जाऊंगी…’

‘‘मैं ने उसे समझाया, ‘परी, तुम परेशान मत हो. कोई न कोई उपाय निकल जाएगा.’

‘‘वह बोली, ‘नहीं रवि, कोई मदद नहीं करेगा. तुम तैयारी कर लो. हम कोर्ट मैरिज कर लेंगे और यहां से बहुत दूर चले जाएंगे.’

‘‘परिणीता एक बहुत ही होनहार लड़की है. उस का सपना एक कामयाब मैनेजर बनने का है. पर मुझे डर लग रहा है कि उस के घर वाले जबरदस्ती उस की शादी कहीं भी करा देंगे और उस के सपने पूरे नहीं हो पाएंगे. मेरे लिए इस से बड़ी हार और कुछ नहीं हो सकती…

‘‘अजय, तुम उस के पिता से मिलो और उन्हें समझाओ. वे परी के सपनों के साथ इस तरह की नाइंसाफी न

करें. मैं खुद को रोक लूंगा. वे कहेंगे तो मैं कहीं दूर चला जाऊंगा, लेकिन परिणीता को उसे अपना सपना पूरा करने दें…’’ इतना कह कर रवि चुप

हो गया. उस की आंखें भर आई थीं.

मैं ने उसे तसल्ली दी और कहा कि मैं कोशिश करूंगा परिणीता के पिता से मिलने की, लेकिन दिक्कत यह थी कि मैं इस के पहले कभी परिणीता के पिता से मिला नहीं था और मेरा उन से पहले से कोई ज्यादा परिचय भी नहीं था.

बहरहाल, मैं ने रवि से वादा तो कर ही लिया था और उस की घबराहट देखने के बाद इस के अलावा और कोई चारा भी नहीं था. उसे उस के घर छोड़ कर मैं लौट आया और सोचने लगा कि कैसे परिणीता के पिता से मिला जाए और इस मसले पर किस तरह बात की जाए कि परिणीता की पढ़ाई न रुके और वह अपने सपने को पूरा कर सके.

अगले दिन मैं अपने औफिस जाने के लिए निकला और सोचा कि आज शाम को लौटते हुए परिणीता के पिता से मिलने जाऊंगा.

औफिस पहुंच कर मैं अपने काम में बिजी हो गया था और लौटने के समय एक डिपार्टमैंटल स्टोर में कुछ जरूरी सामान खरीदने लगा.

इसी बीच मुझे लगा कि कोई बहुत गौर से मुझे देख रहा है. मैं ने ध्यान दिया तो मुझे लगा कि कुछ दूरी पर शायद परिणीता ही खड़ी थी और उस के साथ उस की मां भी थीं.

मैं ने बिना समय गंवाए उस की मां के पास पहुंच कर कहा, ‘‘नमस्ते आंटी.’’

‘‘नमस्ते बेटा, कैसे हो?’’

‘‘मैं ठीक हूं आंटी.’’

‘‘परी, तुम कैसी हो?’’ मैं ने धीरे से परिणीता से पूछा.

‘‘ठीक हूं,’’ उस ने उदास लहजे में जवाब दिया.

मैं ने जानबूझ कर पूछा, ‘‘तुम्हारी पढ़ाई ठीक से चल रही है या नहीं? देखो, अगले महीने यूनिवर्सिटी के मैनेजमैंट कोर्स का इम्तिहान है, फार्म भर देना और तैयारी शुरू कर देनी चाहिए.’’

‘‘जी, ठीक है,’’ वह औपचारिक रूप से बोली.

‘‘आंटी, आप की तबीयत ठीक है न?’’ मैं ने बात को बढ़ाने के लिए उस की मां

से पूछा.

‘‘अब क्या तबीयत ठीक रहेगी बेटा, उम्र भी हो गई है बस. परी की चिंता लगी है, इस

के हाथ पीले हो जाएं तो मन को

आराम मिले.’’

‘‘अरे आंटी, ऐसी भी क्या जल्दी है. परी एक बहुत ही होनहार लड़की है. उसे आगे पढ़ाइए. शादी तो हो ही जाएगी,’’ मैं ने उस की मां को अपने मतलब की तरफ ले जाने की कोशिश की.

‘‘मैं तो चाहती ही हूं, क्योंकि शादी में भी आजकल लड़के वाले नौकरी वाली लड़की की मांग करते हैं, पर इस के पापा जिद किए हुए हैं और जल्दी शादी करना चाहते हैं.’’

‘‘आंटी, ऐसी क्या बात है कि अंकल जैसे समझदार आदमी भी इस तरह जिद कर बैठे हैं?’’

‘‘असल में इस के पापा रवि को पसंद नहीं करते और परी को यहां से दूर भेजना चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन आंटी, रवि की वजह से परी की जिंदगी, उस का भविष्य बरबाद करना क्या सही है? रवि से ज्यादा अहम परी की पढ़ाई, उस का भविष्य है, उस के सपने हैं और हर मांबाप की सब से बड़ी जिम्मेदारी अपने बच्चों के सपनों को पूरा करने में मदद करना है, न कि किसी छोटी समस्या को ले कर बच्चों के भविष्य को निराशा में धकेल देना,’’ मैं ने समझाने की कोशिश की.

‘‘मैं समझ सकती हूं और लड़के वाले भी हर जगह नौकरी वाली लड़की की मांग करते हैं, इसलिए भी मैं नहीं चाहती कि परी की पढ़ाई रुके.’’

‘‘आंटी, आप कहें तो मैं अंकल से बात करूं?’’

‘‘कोशिश कर लो, मगर मुझे नहीं लगता कि वे मानेंगे,’’ परी की मां की आवाज में निराशा झलक रही थी.

‘‘ठीक है आंटी, मैं बात करूंगा. लेकिन जब मैं बात करूं तो आप भी मौजूद रहेंगी. मैं कल सुबह ही आऊंगा.’’

‘‘ठीक है बेटा,’’ इतना कह कर मां आगे बढ़ गईं और परिणीता थोड़ा पीछे रही. मैं ने उसे देख कर कहा, ‘‘बिलकुल परेशान मत होना. सब ठीक हो जाएगा.’’

मेरी बातें सुन कर परिणीता को थोड़ी तसल्ली हुई.

अगले दिन मैं परिणीता के पिता से मिलने उस के घर पहुंचा तो देखा कि वे कहीं बाहर जा रहे थे.

‘‘नमस्ते अंकल,’’ मैं उन के सामने पहुंच कर बोला.

‘‘नमस्ते बेटा, क्या हाल है? अब तो कम ही दिखाई देते हो,’’ वे बोले.

‘‘अंकल, काम बहुत बढ़ गया है. औफिस में जल्दी जाना होता है और लौटने में भी देर हो जाती है, इसलिए कहीं भी चाह कर नहीं जा पाता,’’ मैं ने सफाई देते हुए कहा.

‘‘देखो बेटा, अकेले रहोगे तो ऐसे ही परेशान रहोगे. या तो घर से किसी को बुला लो और नहीं तो बेहतर होगा कि शादी कर लो, सब सही हो जाएगा.’’

‘‘अंकल, मेरी सगाई हो चुकी है और शादी अगले साल होगी. तब तक मेरी होने वाली वाइफ की भी बीएड पूरी हो जाएगी. हालांकि मेरे मातापिता चाहते थे कि इसी साल शादी हो जाए, लेकिन ऋचा यानी मेरी होने वाली पत्नी से पता चला कि वह बीएड करना चाहती है, तो मेरे मातापिता और मैं ने इसे मान लिया,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों बेटा, शादी के बाद भी वह बीएड कर सकती है?’’ अंकल ने अपना नजरिया बताया.

‘‘अंकल, शादी हो जाने के बाद हर लड़की के हालात बदल जाते हैं और मानसिकता में बदलाव आ जाता है. लड़की ससुराल में रह कर पढ़ाई कर सकती है, लेकिन उसे बहुतकुछ खोने का डर भी रहता है और अपने मातापिता के यहां रह कर वह अपनी पढ़ाई अच्छी

तरह से बिना किसी दबाव के आसानी

से पूरी कर सकती है,’’ मैं ने अंकल

को प्रैक्टिकल तरीके से समझाने की कोशिश की.

‘‘हां, तुम्हारी बात कुछ सही है. चलो, ठीक है, बीएड कर लेने के बाद वह तुम्हारे लिए भी मददगार साबित होगी,’’ हम लोग बात करते हुए थोड़ी दूर बाजार तक आ गए थे.

‘‘अंकल, बुरा मत मानना, पर आप परी को आगे पढ़ने से क्यों मना कर रहे हैं? जब वह एमबीए करना चाहती है, तो उसे करने दीजिए. शादी तो बाद में भी हो जाएगी,’’ अपने मुद्दे पर आते हुए मैं ने कहा.

‘‘देखो अजय, परी का मामला कुछ अलग है. मेरी भी इच्छा थी कि परी एमबीए करने के बाद ही अपने घर से विदा हो, लेकिन कुछ हालात बदल गए हैं.’’

‘‘शायद रवि के बारे में आप कुछ कहना चाहते हैं. मेरे विचार से इस मसले पर भी समझदारी से काम लेना ही मुनासिब होगा. जहां तक परी की पढ़ाई की बात है, तो मुझे पूरा यकीन है कि रवि का मसला कोई बाधा नहीं बनेगा,’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जहां तक मैं समझता हूं, रवि एक समझदार लड़का है, लेकिन उस ने परी के साथ रिश्ता बनाया, यह सोच कर मुझे बहुत झटका लगा.’’

‘‘अंकल, आप की चिंता जायज है. लेकिन परी मेरे लिए बहन की तरह है और इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि सिर्फ रवि ही नहीं, बल्कि परी भी बहुत समझदार है और ये दोनों ही बहुत भावुक हैं, इसलिए ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, जिस से दोनों के परिवारों को कोई चिंता हो,’’ हम बात करते हुए एक पार्क में बैंच पर बैठ गए थे.

‘‘अजय, यह कैसे मुमकिन है कि परी इन हालात में पढ़ाई को एकाग्रता से पूरी कर पाएगी?’’ अंकल ने काफी सावधानी के साथ कहा.

‘‘इसलिए कि रवि खुद चाहता है कि परी को आगे एमबीए करने में कोई बाधा नहीं आए. वह तो जब तक परी की पढ़ाई पूरी न हो जाए, अपना ट्रांसफर कहीं दूर करा लेना चाहता है,’’ मैं ने कहा.

‘‘क्यों… रवि इतनी परेशानी किसलिए उठाएगा? उसे ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘अंकल, इसलिए कि ऐसा करना जरूरी है. सच तो यह है कि जब 2 लोग आपस में सच्चा प्यार करते हैं, तो वे सिर्फ और सिर्फ एकदूसरे को खुश देखना चाहते हैं, चाहे इस के लिए उन्हें अपनी खुशी, अपनी भावनाओं को आहत ही क्यों न करना पड़े और इस में कोई शक नहीं है कि उन दोनों का प्यार एक हकीकत है…’’

‘‘अजय, यह प्यार नहीं है. यह इस उम्र की भावनाओं का उभार है. यह अकसर होता है.’’

‘‘मैं आप को अपनी समझ से कह रहा हूं. आप को मानने के लिए कोई दबाव नहीं दे रहा हूं. अगर आप को बुरा लगा तो मुझे माफ कर दें.’’

‘‘नहीं बेटा, मुझे बुरा नहीं लगा. तुम इसे गलत मत समझना,’’ अंकल की आवाज में भर्राहट सुनाई दे रही थी.

‘‘अंकल, आप भी मेरे पिता समान हैं. मैं आप की किसी बात का बुरा नहीं मान सकता और मैं परी को भी अपनी बहन समझता हूं, इसलिए इस हक से ही कुछ कहने की हिम्मत कर सका,’’ मैं ने अंकल को संभालने की कोशिश की.

अचानक ही अंकल ने मुझे अपने गले से लगा लिया और बुरी तरह से फूटफूट कर रोने लगे, ‘‘बेटा, मैं क्या करूं. परी मेरी एकलौती बेटी है और कभी भी मैं ने उसे किसी बात के लिए मना नहीं किया, उस की हर इच्छा पूरी की, पर आजकल मुझे क्या हुआ… मैं कैसे इतना कठोर हो गया…’’

मैं अंकल को समझाने और संभालने की कोशिश करने लगा.

थोड़ी देर में मैं अंकल को घर छोड़ कर चला गया. हालांकि देर हो गई थी. औफिस में बौस को भी देरी की वजह समझानी पड़ी, पर मन में एक संतोष हो रहा था कि सबकुछ अच्छे तरीके से मैं ने उन लोगों को समझा दिया.

शाम को घर आने के बाद फोन बजने लगा, ‘‘हैलो…’’

‘अजय, मैं परी का पापा बोल रहा हूं. तुम घर आ गए?’

‘‘जी अंकल, मैं घर आ गया हूं.’’

‘बेटा, कुछ बात करनी थी. मैं तुम से मिलना चाहता हूं. क्या मैं इस समय तुम से मिलने आ सकता हूं?’

‘‘जी, बिलकुल आ सकते हैं, लेकिन आप परेशान न हों, मैं खुद आ रहा हूं.’’

‘नहीं बेटा, मैं आ रहा हूं,’ अंकल ने फोन रख दिया. थोड़ी देर में वे मेरे घर आए और अंदर आ कर बैठ गए.

मैं ने पूछा, ‘‘क्या बात है अंकल? कुछ परेशानी है?’’

‘‘नहीं अजय, मैं ने काफी सोचा और परी की मम्मी से भी बात की. परी की पढ़ाई पूरी कराने के बाद ही हम उस की शादी करेंगे, यह हम लोगों ने तय कर लिया है.’’

‘‘अंकल, यह तो बहुत ही अच्छी बात है. आजकल लड़कियों को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाने में मांबाप को पूरा सहयोग देना चाहिए. बहुत ही होनहार लड़की है परी. मुझे बहुत खुशी हुई कि अब परी अपने सपनों को पूरा कर पाएगी,’’ मैं बहुत खुश हुआ. मुझे लगा कि मेरी कोशिश और रवि का पवित्र प्यार सफल हो गया.

‘‘बेटा, तुम ने मेरी आंखें खोल दीं. मैं ने परी को काफी टैंशन दी है. मैं

उस से माफी मांगूंगा. पर बेटा, तुम्हें

परी को एडमिशन दिलाने में मदद करनी होगी.’’

‘‘जरूर अंकल, मैं पूरी तरह से मदद करूंगा. आखिर वह मेरी भी बहन ही तो है. आप चिंता न करें.’’

‘‘अगर बहन मानते हो, तो एक जिम्मेदारी और निभानी पड़ेगी. कर सकोगे?’’

‘‘आप बोलिए तो सही, मैं हर जगह परी के भाई होने की जिम्मेदारी निभाऊंगा और मुझे बहुत खुशी होगी.’’

‘‘तो तुम्हें रवि को बताना होगा कि भले हम परी की शादी उस के एमबीए पूरा करने पर करेंगे, लेकिन सगाई हम इस महीने में ही कर देना चाहते हैं.’’

‘‘ठीक है अंकल, लेकिन क्या किसी लड़के को देखा है और बातचीत पक्की हुई है?’’

‘‘हां देखा और समझा भी है. परी को पसंद भी है, इसलिए रवि से कहना कि अपने मातापिता को मुझ से मिलवा दे, ताकि सगाई की तारीख जल्द ही तय कर ली जाए,’’ अंकल मुसकरा रहे थे और उन के चेहरे पर सुकून नजर आ रहा था. Best Hindi Story

Hindi Family Story: फिर सुहागन हो गई – विधवा रूमी का दर्द

Hindi Family Story: 10 मिनटों में नितिन की कहानी खत्म हो गई. वह जमशेदपुर में एक कर्तव्यनिष्ठ और होनहार बैंक अधिकारी था. मध्यरात्रि के अंधेरे में टाटारांची हाइवे पर उस की मोटरसाइकिल की सामने से आती हुई स्कौर्पियो से टक्कर हो गई. वह गिर पड़ा, लुढ़कते हुए उस का सिर माइलपोस्ट से जा टकराया और ब्रेन हैमरेज हो गया. रक्त अधिक बहने के कारण 10 मिनटों में ही उस के प्राण पखेरू उड़ गए. स्कौर्पियो वाला वहां से सरपट भाग गया. 38 वर्षीय नितिन की 25 वर्षीया पत्नी रूमी विवाह के 2 वर्षों के भीतर पति खो बैठी.

ऐक्सिडैंट और मौत की खबर रात को जमशेदपुर पहुंचते ही घर के सभी सदस्य दहाड़ें मारमार कर रोने लगे. किसी को भी सुध नहीं थी. नितिन की मां और रूमी की तो रोरो कर हालत खराब हो गई.

सुबह हो चुकी थी. महल्ले वालों ने शोक समाचार सुना और वे मातमपुरसी के लिए आने लगे. नितिन के पिता विरेंद्र बाबू अपनी पत्नी को सांत्वना दे रहे थे, गले लगा रहे थे. लेकिन रूमी अकेली पड़ गई थी, किसी को उसे सम?ाने की सुध नहीं रही. आने वाले कईर् पड़ोसी फुसफुसाहट में बातें कर रहे थे, उन के हावभाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो रूमी ही नितिन की मृत्यु का कारण हो.

समय बीता, वर्ष बीते, विरेंद्र बाबू और उन की पत्नी रूमी का खयाल बेटी जैसा रख रहे थे.एक दिन दोनों ने रूमी को जिंदगी की हकीकत से रूबरू कराया. विरेंद्र बाबू रूमी से बोले, ‘‘बेटे, तुम स्नातक की पढ़ाई पूरी कर लो, जो होना था हो गया, तुम अपने पैरों पर खड़ी होने का प्रयास करो.’’

‘‘पापाजी, मैं प्राइवेट से बीए करने को तैयार हूं. आप किताबें और कुछ जरूरी सामान मंगवा दें.’’

इंटैलिजैंट तो थी ही, रूमी ने 3 वर्षों में ग्रैजुएशन कर लिया, नंबर अच्छे आए. उस ने 18 महीनों का कंप्यूटर डिप्लोमा कोर्स भी कर लिया. उसे फिर अच्छा रैंक मिला. प्लेसमैंट सेल ने कई आईटी  कंपनियों को रूमी के लिए अनुमोदन भी किया.

एक आईटी कंपनी से वौक इन इंटरव्यू का कौल आया. रूमी स्मार्ट थी, उस में दृढ़ आत्मविश्वास भी था. उस का चयन एनालिस्ट के लिए हो गया.

कंपनी के इंजीनियरों के बीच उस के काम की प्रशंसा होने लगी. सहकर्मीगण उसे आ कर बधाई भी देते. रूमी चुपचाप उन के अभिवादन को स्वीकार करती और मौनिटर में लग जाती. वह अपने काम से वास्ता रखती, किसी से ज्यादा बातें या हंसीमजाक से अपने को दूर ही रखती.

औफिस में अब तक उम्रदराज सीनियर मैनेजर हुआ करते थे, लेकिन एक नए इंजीनियर ग्रैजुएट ने सीनियर मैनेजर की पोस्ट पर जौइन किया. औफिस में एक नौजवान बौस के रूप में आए अंकित ने पदभार ग्रहण के बाद औफिस के सभाकक्ष में सभी कर्मचारियों को संबोधित किया और समय की पाबंदी व कार्यलक्ष्य का दृढ़ता से पालन करने का आग्रह किया.

सभी को खबर हो गई कि 27 वर्षीय अंकित श्रेष्ठ कुंआरा है. बारीबारी से अंकित ने सभी को अपने कक्ष में बुला कर परिचय किया, रूमी से भी.

राउंड के दौरान अंकित कभीकभी रूमी के पास आ कर कुछ सवालजवाब करता. ऐसा सिलसिला चलता रहा. अंकित राउंड में कर्मचारियों से मिल कर उन की कार्यप्रगति के बारे में जानकारी लेता रहता था.

इस बीच कंपनी को एक बड़ा प्रोजैक्ट मिला. अंकित को एक टीम बनानी पड़ी और टीम लीडर के लिए रूमी का चयन किया गया. अंकित ने रूमी को अपने कक्ष में बुलाया और कहा, ‘‘आप के काम को देख कर मैं ने आप को टीम लीडर बनाया है. मैसेज कर रहा हूं, टीम मैंबर की लिस्ट भी भेज रहा हूं. आप काम संभाल लीजिए. कभी कठिनाई हो तो मु?ा से संपर्क करें.’’

‘‘जी, सर.’’

रूमी को इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि अंकित पहली नजर में उसे दिल दे बैठा था.

प्रोजैक्ट का काम जोरशोर से शुरू हो चुका था. इस सिलसिले में रूमी की अंकित के कक्ष में जाने की तीव्रता भी बढ़ चुकी थी. ऐसे ही एक दिन रूमी ने कक्ष में प्रवेश किया तो अंकित फोन पर बातें कर रहा था. रूमी वापस लौटने लगी तो अंकित ने हाथ से कक्ष में बैठने का इशारा किया. रूमी बैठ गई.

बातें खत्म होते ही अंकित भी सीट पर बैठ गया और बोला, ‘‘रूमी, काम की बातें तो रोज होती हैं, अब यह बताओ कि कहां रहती हो, पेरैंट्स कहां रहते हैं, इस कंपनी में कब, कैसे आईर्ं?’’ रूमी को थोड़ा अटपटा लगा पर इतने दिनों में रूमी भी अंकित को थोड़ाबहुत जान चुकी थी. इसलिए उस ने अपनी कहानी सुना दी. सुन कर अंकित थोड़ा गंभीर हो गया. बाद में मुसकराते हुए बोला, ‘‘प्रोजैक्ट जल्द तैयार हो जाना चाहिए, अभी तक प्रोग्रैस संतोषजनक है.’’ रूमी जितनी देर बैठी रही, अंकित की आंखें कुछ कहती नजर आईं.

ऐसा सिलसिला चलता रहा. रूमी महसूस कर चुकी थी कि अंकित उस में काफी दिलचस्पी ले रहा है और रूमी ने पाया कि वह भी अंकित की ओर आकर्षित हो रही है. एक अन्य मुलाकात में अंकित ने आखिर कह ही डाला, ‘‘रूमी, आज लंच हम लोग साथ करेंगे, यदि आप को कोई आपत्ति न हो तो.’’रूमी मना नहीं कर पाई. रैस्तरां पास ही था.

लंच में बातें चलती रहीं. रैस्तरां में हलका संगीत भी चलता रहा. डिम लाइट में दोनों की एकदूसरे से आंखें मिल जातीं और लंच के बाद तो अंकित ने रूमी का हाथ पकड़ लिया. रूमी ने कोई प्रतिरोध नहीं किया, लेकिन बोली, ‘‘देखिए, मैं विडो हूं. आप की जौइनिंग रिपोर्ट देखी है, आप से उम्र में 3 साल बड़ी भी हूं.’’

‘‘मैं सब जानता हूं. मैं ने तुम्हारा बायोडाटा देखा है. मु?ो मालूम है, मैं तुम से 3 वर्ष छोटा हूं. फिर भी मैं तुम्हें अपनाना चाहता हूं.’’

‘‘आप के घरवाले राजी होंगे?’’

इस प्रश्न का उत्तर अंकित के पास नहीं था, लेकिन वह खुश था कि रूमी की स्वीकृति मिल गई है.

प्रोजैक्ट रिपोर्ट बन गई थी. रूमी का अंकित के चैंबर में जाना नहीं के बराबर हो गया था. लेकिन राउंड के दौरान अंकित रूमी के कियोस्क में कुछ ज्यादा समय दे रहा था.

औफिस में कानाफूसी होने लगी थी. लोग समझ चुके थे कि अंकित और रूमी के बीच कुछ चल रहा है.रूमी ने अपनी जेठानी को अंकित के बारे में बताया.

‘‘देखो, रूमी, मु?ो इस में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन कुछ बातें ठीक से सम?ा लेना. कहीं अंकित तुम्हारे साथ खिलवाड़ तो नहीं कर रहा है, उस के पेरैंट्स की क्या प्रतिक्रिया हो सकती है, यहां पापाजी, मम्मीजी के क्या विचार हैं, यह सब तुम्हें पहले ही जान लेना चाहिए. वैसे, मैं तुम्हारे साथ हूं, मैं जानती हूं कि तुम गलत फैसला नहीं ले सकती हो.’’

कंपनी कार्यालय की स्थापना के 5 वर्ष पूरे होने पर कौर्पोरेट औफिस से सभी कर्मचारियों को पार्टी देने का निर्देश आया, मुनाफा भी हुआ था. तय हुआ, शहर से दूर ‘डाउन टाउन रिजौर्ट’ में लंच होगा. रविवार का दिन चुना गया. लग्जरी बस किराए पर की गई और निर्धारित समय पर एक अच्छी पार्टी हुई. पार्टी के बाद सभी बस से वापस चल पड़े. अंकित अपनी गाड़ी से गया था.

‘‘रूमी, तुम रुक जाओ, मैं गाड़ी से तुम्हें छोड़ दूंगा. चलो, कौफी पी लेते हैं,’’ अंकित ने सु?ाव दिया.

दोनों वापस रिजौर्ट से रैस्तरां में आ गए और कौफी पीने लगे. अंकित इस बार फैसला कर चुका था कि फाइनल बात करेगा. रूमी के हाथों को अपने हाथों में ले कर उस ने दोहराया, ‘‘मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं. मैं शादी करना चाहता हूं.’’

रूमी ने सिर झाका लिया और शरमा सी गई. उस में एक आत्मविश्वास भी था, वह जानती थी अपने बारे में उसे स्वयं फैसला लेना है लेकिन पारिवारिक बंधनों का खयाल भी था.

रूमी तुरंत कुछ बोल नहीं पाई. बस, मुसकरा भर दिया. दोनों वापस चल पड़े.रूमी जिस प्रोजैक्ट की टीम लीडर थी, उसे क्लाइंट के बोर्ड औफ डायरैक्टर्स के सामने प्रेजैंटेशन देने का कार्यक्रम बना. क्लाइंट का कार्यालय पटना में था.

‘‘तुम टीम लीडर हो, प्रोजैक्ट रिपोर्ट प्रेजैंटेशन देने के लिए तुम्हें पटना चलना होगा,’’ अंकित ने कहा.

‘‘पापाजी से पूछना होगा, मैं कल बताऊंगी.’’

‘‘एयर टिकट बुक हो चुका है, मैं भी साथ चल रहा हूं. तुम अपने पेपर्स और लैपटौप अपडेट कर लो. परसों जाना है, जाना तो होगा ही,’’ अंकित ने जोर देते हुए कहा.

विरेंद्र बाबू, रूमी के पटना टूर के बारे में सुन कर चिंतित हो गए.

‘‘बड़ी बहू को साथ ले जाना, वह भी थोड़ा बाहर घूम आएगी,’’ उन्होंने कहा.

‘‘ऐसा नहीं हो सकता, पापाजी, मेरी यात्रा प्लेन से फिक्स है. आप को चिंता नहीं करनी चाहिए. यह सब तो चलता रहेगा.’’

पटना की यात्रा सफल रही, रूमी ने बहुत सुंदर ढंग से प्रोजैक्ट रिपोर्ट का प्रेजैंटेशन दिया. बोर्ड औफ डायरैक्टर्स ने रिपोर्ट को पास कर दिया.

पटना के मौर्य होटल में रात्रिविश्राम था. रूमी और अंकित थोड़ी शौपिंग कर के होटल आ गए. दोनों के अलग कमरे थे.

‘‘रात का खाना कमरे में ही साथ खाएंगे, मैं ने और्डर कर दिया है. खाना तुम्हारे कमरे में आ रहा है,’’ अंकित ने कहा.

दोनों ने साथ खाना खाया. रात देर तक बातें होती रहीं. दोनों की समीपता बढ़ती गई और वह हो गया जो एकांत में रात के पहर बंद कमरे में हो सकता था.

तड़के सुबह अंकित अपने कमरे में चला गया. वापसी की तैयारी होने लगी. रास्तेभर दोनों एक तरह से खामोश रहे लेकिन विदा लेते समय अंकित ने कहा, ‘‘रूमी, अब हमें शादी की तैयारी करनी चाहिए.’’

रूमी यह सुनने को बेताब थी. उस ने भी शादी का मन बना लिया था. अपने बारे में तो वह आश्वस्त थी कि वह अपना फैसला खुद ले सकती थी लेकिन अंकित के पेरैंट्स का क्या रुख हो सकता है, सोच कर चिंतित थी.

अगले दिन लंच के लिए औफिस से बाहर जाना हुआ. ‘‘अंकित, यदि तुम्हारे पेरैंट्स तैयार नहीं हुए तो क्या होगा, तुम उन से बात करो,’’ रूमी ने कहा, ‘‘अगर नहीं माने तो भी क्या तुम मु?ा से शादी करोगे?’’

यह अगरमगर दोनों के दिमाग में चलती रही और इस बीच दीवाली की छुट्टियां आईं.4 दिनों की छुट्टियों में अंकित अपने घर दुर्गापुर चला गया.बहुत हिम्मत कर के उस ने अपनी मां को सारी बातें बताईं और अपना फैसला भी बता दिया.

‘‘शादी मैं रूमी से ही करूंगा. आप लोगों की ‘हां’ चाहिए.’’

मां यह सुन कर सन्न रह गईं, पापा ने सुना तो स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘‘रूमी से विवाह की मंजूरी नहीं दी जा सकती, तुम नौकरी छोड़ दो और पारिवारिक बिजनैस में लग जाओ, यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

यहां भी अगरमगर होती रही.

दीवाली के दूसरे दिन भी अंकित की छुट्टी थी लेकिन सुबह मौर्निंगवौक के लिए निकला और टैक्सी से जमशेदपुर ड्यूटी जौइन करने चल पड़ा. हां, उस ने मां के नाम एक पत्र लिख छोड़ा था. मां ने कई बार फोन किया. एक बार पापा ने भी फोन किया लेकिन अंकित ने कोईर् जवाब नहीं दिया.

अगले दिन औफिस जाते ही उस ने रूमी को बुलवाया और साफ शब्दों में कहा, ‘‘हमें कोर्टमैरिज करनी है.’’

‘‘मुझे एक बार पापाजी को बताना होगा. वे राजी हों या नहीं, मैं शादी के लिए तैयार हूं. लेकिन एक बार बताना जरूरी है.’’

शाम को घर लौट कर रूमी ने पापाजी और जेठानी को कोर्टमैरिज की बात बताई. दोनों ने प्रोत्साहित किया, लेकिन मम्मीजी और 3 देवरों ने इस का घोर विरोध किया.

फिर एक अड़चन. लेकिन पूरे आत्मविश्वास और दृढ़ता से रूमी डटी रही. उस के तेवर को देखते हुए पापाजी ने अपनी पत्नी और बेटों को समझाया, ‘‘विरोध करने का कुछ लाभ नहीं होगा, घर में ड्रामा होना अच्छा नहीं.’’

पापाजी के हस्तक्षेप से सभी मान गए. पापाजी ने अंकित से एक बार खुद बात करने की इच्छा जताई. रूमी ने हामी भर दी.

पापाजी ने अंकित से कहा, ‘‘तुम लोगों की शादी से हमें कोई आपत्ति नहीं है. तुम्हारी? कोर्टमैरिज से भी हम सहमत हैं. अपने परिवार वालों से बात करने की जिम्मेदारी तुम्हारी है. मुझे सिर्फ 2 बातें करनी हैं, एक, रूमी के सुख और सुरक्षा की गारंटी होनी चाहिए, दूसरे, इसे हम ने बेटी की तरह माना है और बेटी का पूरा प्यार दिया है, कोर्टमैरिज के बाद हम इसे अपने घर ले जाएंगे और एक दिन बाद इसे बेटी की तरह अपने घर से विदा करेंगे.’’

‘‘मुझे दोनों शर्तें मंजूर हैं,’’ अंकित ने विनम्रता से कहा.

पापाजी ने घर वापस आ कर बड़ी बहू को रूमी की शादी का जोड़ा, चूडि़यां, सिंदूर और आवश्यक कपड़े अंकित के लिए गिफ्ट और सूट के कपड़े बाजार से लाने को कहा.

वैधानिक औपचारिकता के बाद दोनों की शादी हो गई. पापाजी, बड़ी बहू और अंकित का एक दोस्त शादी के गवाह बने, मिठाइयां बांटी गईं.

विदाई का दिन आ गया. समयानुसार अंकित और उस के 4 दोस्त 3 गाडि़यों में आ गए. रूमी को लाल लहंगा, लाल चोली और लाल दुपट्टे के साथ पूरी दुलहन की तरह सजाया गया और विदाई गीत शुरू हो गए.

विदाई गीत शुरू होते ही पापाजी बहुत सैंटीमैंटल हो गए और फफकफफक कर रोने लगे. रूमी ने भीगी पलकों से पापाजी को प्रणाम किया और सीने से लग कर कहा, ‘‘पापाजी, आप क्यों रोते हैं? मैं आप लोगों से मिलती रहूंगी. आप ने मुझे बेटी माना है, मुझे आते रहने का हक देते रहिए. आप लोग अपना खयाल रखें. आप आंसू मत बहाइए, मैं तो फिर सुहागन हो गई.’’

अंकित और रूमी को मम्मीजी और बड़ी बहू ने नम आंखों से गाड़ी तक पहुंचाया. गाड़ी में बैठते ही अंकित ने ड्राइवर से कहा, ‘‘दुर्गापुर चलो.’’ और सड़क के रास्ते गाड़ी दुर्गापुर के लिए चल पड़ी. Hindi Family Story

Hindi Kahani: इमामुद्दीन – जिंदगी का मुश्किल सफर

Hindi Kahani: इमामुद्दीन काफी देर तक पार्क में टहलता रहा और फिर कोने की एक बैंच पर बैठ गया. वह बीचबीच में गहरी सांस लेता और ‘उफ’ कहता हुआ छोड़ देता. उस के भीतर चिंताओं के काले बादल उमड़घुमड़ रहे थे. ऐसा लग रहा था जैसे यही बादल इमामुद्दीन की आंखों से आंसू बन कर बरस पड़ेंगे.

इधर इमामुद्दीन की बीवी आयशा बानो घर पर अपने शौहर का इंतजार कर रही थी, उधर इमामुद्दीन कुछ सोच रहा था. पार्क में जब थोड़ी चहलपहल बढ़ने लगी, तो वह और ज्यादा बेचैन हो उठा. अब भूख से उस का पेट भी कुलबुलाने लगा था और जब प्यास लगने लगी तो वह अपने घर की तरफ लौटने लगा.

आयशा बानो दरवाजे पर ही खड़ी थी, बोली, ‘‘कहां चले गए थे तुम?’’

‘‘कहीं नहीं… बस, ऐसे ही पार्क तक. कुछ खाने को हो तो दे दो, प्यास भी लगी है.’’

आयशा बानो पानी ले आई और फिर रोटी बनाने लगी. इमामुद्दीन का सोचना अभी जारी था. वह खाना खातेखाते कई बार रुक जाता. आयशा उसे देख रही थी, लेकिन कुछ बोली नहीं थी. उसे मालूम था कि इमामुद्दीन के मन में क्या चल रहा है.

इमामुद्दीन ने आयशा से पूछा, ‘‘गंगाजी को होश आया कि नहीं?’’

‘‘नहीं,’’ आयशा ने छोटा सा जवाब दिया और रोटी इमामुद्दीन के आगे रख दी.

इमामुद्दीन और आयशा चंद्रभान तिवारी के घर में पिछले 24 साल से किराए पर रह रहे थे. चंद्रभान की कोई औलाद नहीं थी. वे अपनी पत्नी गंगा के साथ अकेले ही रहते थे. उन के घर से लगा हुआ 2 कमरे का एक और मिट्टी का कच्चा घर था, जिस में इमामुद्दीन किराए पर रहता था.

एक दिन चंद्रभान तिवारी की अचानक मौत हो गई और उन की पत्नी गंगा देवी बेसहारा हो गईं. इतना ही नहीं, एक दिन गंगा देवी को लकवा मार गया. अब तो उन की जिंदगी एक चारपाई पर सिमट गई थी.

कुछ दिनों तक नातेरिश्तेदार, पासपड़ोस के लोग गंगा देवी को देखने आते रहे, कुछ समय बाद उन्होंने भी आना बंद कर दिया.

इमामुद्दीन जब चंद्रभान तिवारी के घर में किराए पर रहने आया था, उस के पहले वह ईदगाह महल्ले में रहता था. उस के सिर से बचपन में ही उस की अम्मी नसरीन का साया उठ गया था. उस की खाला भी तब ईदगाह के पास ही रहती थीं.

इमामुद्दीन के अब्बू फैजान अली के इंतकाल के बाद इमामुद्दीन शहर आ गया और मजदूरी करने लगा. उस समय उस की उम्र रही होगी 20-22 साल. जब से ही वह चंद्रभान तिवारी के मकान में रह रहा था.

इमामुद्दीन को गंगा देवी में अपनी मां दिखाई देती थीं. इमामुद्दीन और आयशा दोनों मजदूर थे, पर उन के दिल में दूसरों के प्रति करुणा और इज्जत का अटूट भाव था. वे दोनों अनपढ़ थे. खास बात तो यह थी कि वे अनुभवी और समझदार थे. दोनों के दिल में दूसरों के लिए खूब जगह थी.

गंगा देवी जब लकवे के चलते खाट पर पड़ी थीं, तब इमामुद्दीन और आयशा ने ही उन की खूब सेवा की थी. गंगा देवी के इलाज में इमामुद्दीन ने अपनी थोड़ीबहुत जमापूंजी भी खर्च कर दी थी. आयशा गंगा देवी को नहलाती, उन के कपड़े बदलती और इमामुद्दीन दवा खत्म होने पर दवा लाता और उन्हें समय पर खिलाता.

धीरेधीरे यह रिश्ता और गाढ़ा होता चला गया. आयशा बहू की तरह बाकायदा गंगा देवी का खयाल रखती, उन के पैर दबाती, इमामुद्दीन उन्हें ह्वीलचेयर में बिठा कर थोड़ाबहुत बाहर घुमा कर ले आता.

समय बीतता गया. इमामुद्दीन पास में ही अपना छोटा सा घर बनवा रहा था. चंद्रभान तिवारी का घर धीरेधीरे खंडहर होता जा रहा था. आखिर घर की मरम्मत कराए तो कौन कराए? धीरेधीरे इमामुद्दीन का नया घर तैयार हो गया.

इमामुद्दीन और आयशा गंगा देवी को अपने नए घर में ले आए. भले ही इमामुद्दीन ने नया घर बनवा लिया था, लेकिन चंद्रभान तिवारी के खंडहर घर से उस का भावनात्मक रिश्ता हो गया था.

चंद्रभान तिवारी के घर को देख कर वह सोचा करता था, ‘भले ही यह घर अब खंडहर होता जा रहा है, लेकिन इसी घर ने ही मुझे छत्रछाया दी, पनाह दी.’

पड़ोस के कुछ लोगों ने तो इमामुद्दीन से कहा भी कि तेरी अक्ल मारी गई है, जो एक बीमार अपाहिज औरत को भी अपने नए घर में ले आया है. जितने मुंह उतनी बातें. जो आता इमामुद्दीन को अपनीअपनी समझ के हिसाब से पट्टी पढ़ाने लगता.

इमामुद्दीन सब लोगों की बातें सुनता और कहता कि बात मकान मालिक और किराएदार की नहीं है भाई, इन 23 सालों में जितना अपनापन चंद्रभान तिवारी और गंगा देवी ने मुझे दिया है, वह मैं कभी भूल नहीं सकता. मैं अब गंगा देवी की सूरत में अपनी मां नसरीन को देखता हूं.

इमामुद्दीन पुरानी यादों से लौट आया. उसी रात गंगा देवी की मौत हो गई. इमामुद्दीन ने हिंदू धर्म के हिसाब से गंगा देवी का क्रियाकर्म किया.

गंगा देवी अब शून्य में विलीन हो चुकी थीं, पर इमामुद्दीन और आयशा भी उन के बिना अजीब सा खालीपन महसूस कर रहे थे. Hindi Kahani

Hindi Family Story: दरार – जब हुई शायना और शौहर के बीच तकरार

Hindi Family Story: शायना के अम्मीअब्बू ने उस की शादी में कई लाख रुपए खर्च किए थे. खूब दहेज, जेवर और कैश दे कर उन्होंने सोचा था कि शायना की जिंदगी बेहतर हो जाएगी, ससुराल में इज्जत मिलेगी, इतना दहेज और कैश देने से उस का सुसराल में राज रहेगा, वह अपनी मनमानी करेगी और सब को उस की बात माननी पड़ेगी, क्योंकि वह एक बड़े घर के बेटी है, जो दहेज के साथ लाखों रुपए नकद लाई है…

शायना के अम्मीअब्बू की इस सोच ने शायना और उस के शौहर के बीच ऐसी दरार डाल दी, जो कभी नहीं भरी जा सकी और दोनों एक महीने के अंदर ही अलगअलग रह कर जीने के लिए मजबूर हो गए. शायना के जाने के बाद उस के शौहर शाहिद ने कई बार उसे फोन भी किया, पर उस के अम्मीअब्बू ने न तो शायना से शाहिद की बात होने दी और न ही शाहिद को शायना को अपने साथ ले जाने दिया.

वे इसी घमंड में रहे कि शाहिद उन की सारी बातें मानेगा और शायना वहां पर राज करेगी, पर उन का यह भरम उस वक्त टूट गया, जब शाहिद ने दूसरी शादी कर ली. शायना की शादी की बात शाहिद से तय हो गई थी. शाहिद के अब्बा का कपड़ों का कारोबार था.

शाहिद अपने अब्बा के साथ ही काम करता था. शाहिद के अलावा उस का एक और भाई था, जो कैंसर से पीडि़त होने की वजह से हर वक्त बीमार रहता था. सारे कारोबार की बागडोर शाहिद के हाथों में ही थी.  शाहिद ऊंची कदकाठी का एक खूबसूरत नौजवान था.

यही वजह थी कि शाहिद को पहली ही नजर में देख कर शायना के अम्मीअब्बू ने शाहिद के रिश्ते के लिए हां कर दी थी. शायना भी खूबसूरती की मलिका थी. ऊंचा कद, गदराए बदन के साथसाथ वह खूबसूरती की बेमिसाल मूर्ति थी.

गुलाबी होंठ और सुर्ख गाल उस की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे. जो भी शाहिद और शायना की जोड़ी को देखता था, बस देखता ही रह जाता था. उन दोनों की तारीफ करने के लिए लोगों के पास अल्फाज कम पड़ जाते थे.

शायना की शादी के अभी 4 महीने बाकी थे. उस के अम्मीअब्बू ने उस के दहेज का सामान खरीदना शुरू कर दिया था. हर सामान ब्रांडेड खरीदा जा रहा था. अगर कोई सामान उन के शहर में न मिलता तो वह दूसरे शहर से मंगाया जाता था.

शायना के लिए लाखों रुपए का सोना खरीदा गया था. सोना सिर्फ सायना के लिए ही नहीं, बल्कि सायना की सास के लिए भी खरीदा गया था. इस तरह महीनों तक शायना की शादी की तैयारी चलती रही, फिर वह दिन भी आ गया जब शायना का निकाह शाहिद से होना था.

शाहिद बरात ले कर शायना के घर आ गया. बरातियों का स्वागत बड़ी धूमधाम से किया गया. कई तरह के खानों का इंतजाम किया गया. निकाह के बाद विदाई के समय भी लाखों रुपया नकद दिया गया और इस तरह लाखों रुपया खर्च होने के बाद शायना और शाहिद की शादी हो गई. शायना बड़ी धूमधाम के साथ अपनी ससुराल पहुंच गई. शायना और शाहिद एकदूसरे को पा कर बहुत खुश थे.

अभी शादी को कुछ दिन ही गुजरे थे कि शायना ने शाहिद से महंगे मोबाइल फोन की मांग की.  शाहिद बोला, ‘‘अभी रुक जाओ. तुम्हें जिस से भी बात करनी है, मेरे मोबाइल फोन से बात कर लिया करो. कुछ दिनों में मैं अब्बा से बात कर के तुम्हें नया मोबाइल फोन दिला दूंगा.’’

शायना को शाहिद की यह बात पसंद नहीं आई. अभी शायना की मोबाइल फोन की बात तो कबूल हुई नहीं थी कि शायना ने शाहिद से बोला, ‘‘अगले हफ्ते मैं अपने मायके जाऊंगी. लेकिन मुझे इस पुरानी कार से नहीं जाना.

तुम मेरी पसंद की नई कार ले लो, उसी से मैं अपने मायके जाऊंगी.’’ शाहिद ने शायना को समझाते हुए कहा, ‘‘यह कार भी तो सही है. इस में क्या खराबी है? क्यों फालतू की जिद कर रही हो…’’ शायना को शाहिद की यह बात बहुत नागवार गुजरी.

उस ने अगले ही दिन फोन पर अपनी अम्मी से शाहिद की शिकायत कर दी और बोला, ‘‘मुझे तुम से बात करने को दिल करता है, तो मैं तुम से बात भी नहीं कर सकती, क्योंकि इन्होंने अभी तक मुझे मोबाइल फोन  नहीं दिलाया.

‘‘मैं तुम से मिलने भी नहीं आ सकती, क्योंकि इन्होंने अभी तक नई कार भी नहीं खरीदी. कैसे फटीचर लोगों से तुम ने मेरी शादी करा दी.’’ अगले दिन शायना की अम्मी का फोन शाहिद के पास आ गया. वे छूटते ही बोलीं, ‘‘हमारे लेनदेन में कौन सी कमी रह गई थी, जो तुम मेरी बेटी शायना की ख्वाहिश पूरी नहीं कर सकते? तुम्हारी जगह किसी और को इतना सबकुछ देते तो मेरी बेटी के पैर धो कर पीता.’’

शाहिद को शायना की एक तो यह बात बुरी लगी कि शायना ने घर की बात अपनी अम्मी को बताई और उन से अपनी सुसराल की बुराई की, दूसरे शायना की अम्मी ने अपनी दौलत का रुआब दिखाते हुए उसे जलील किया. शाहिद ने शायना को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अपनी अम्मी से घर की बात नहीं करनी चाहिए थी.’’

शायना फौरन तड़क कर बोली, ‘‘मैं अपनी परेशानी अपने अम्मीअब्बा को नहीं बताऊंगी, तो किसे कहूंगी…’’ और वह ऐंठ कर अपने बिस्तर पर  पड़ गई. शाहिद ने शायना को काफी समझाने की कोशिश की, पर वह न खाना खाने को तैयार हुई और न अपने कमरे से बाहर निकली.

शाम को फिर शाहिद के मोबाइल फोन पर शायना की अम्मी का फोन आया, तो शाहिद ने शायना को मोबाइल फोन देते हुए कहा, ‘‘लो, आप की अम्मी का फोन आया है.’’ शायना ने फोन लेते ही रोना शुरू कर दिया और शाहिद के सामने  ही अपनी अम्मी से शाहिद की बुराई करने लगी.

उस की अम्मी ने शायना को कहा, ‘‘तुम चुप हो जाओ. मैं आज ही तुम्हारे भाई को भेजती हूं. तुम उस के साथ घर आ जाओ. जब तक ये तेरी बात नहीं मानेंगे, तुम हमारे पास ही रहना.’’ कुछ ही देर में शायना का भाई उस की ससुराल पहुंच गया और शाहिद के मना करने पर भी शायना को अपने साथ ले आया. शाहिद को शायना की यह बात बहुत बुरी लगी.

जब इस झगड़े का पता  शाहिद के अम्मीअब्बू को पता चला तो अब्बू ने शाहिद को डांटा, ‘‘हमें क्यों नहीं बताया. हम उसे समझाते. तुम कल ही अपनी सुसराल जाओ और शायना को  ले कर आओ. घर की बात घर में ही रहनी चाहिए.’’ उधर जब शायना घर पहुंची, तो उस ने अपनी सुसराल की तमाम बुराइयां की और कहा, ‘‘शाहिद तो अपने अब्बा के ही कहने पर चलता है.

छोटीछोटी चीज के लिए अपने अब्बा के सामने हाथ फैलाता है. मैं ने जब उस से मोबाइल फोन खरीदने को कहा तो बोला कि अब्बा से बोलता हूं. जब  वे पैसे देंगे, तब मोबाइल फोन दिला दूंगा. कार के लिए कहा, तो बहाने बनाने लगा.’’ शायना की अम्मी बोलीं, ‘‘तू फिक्र मत कर. जब तक शाहिद और उस के अब्बू तेरी बात नहीं मानेंगे, मैं तुझे वहां नहीं भेजूंगी.’’ अगले दिन शाहिद ने शायना की अम्मी को फोन किया, ‘‘मैं शायना को लेने आ रहा हूं…’’ इस पर शायना की अम्मी बोलीं, ‘‘अपने अब्बा को साथ ले कर आना. जब तक वह सायना की बात नहीं मानेंगे, हम उसे नहीं भेजेंगे.

जब उन्हें फुरसत मिल जाए, तब दोनों साथ आना. हमारी बेटी की जिंदगी का मामला है. हमें  क्या पता था कि हमें तुम जैसे घटिया रिश्तेदार मिलेंगे.’’ शाहिद ने अपने अब्बा को बताया,  तो उन्हें बहुत बुरा लगा. उन्होंने भी फैसला कर लिया था कि वे उसे लेने वहां नहीं जाएंगे.

शाहिद ने अगले दिन फिर फोन किया और शायना से बात करने की कोशिश की, मगर शायना की अम्मी ने ऐसा नहीं होने दिया.  शायना की अम्मी को यह घमंड था कि ससुराल वालों को शायना जैसी खूबसूरत और पैसे वाली लड़की मिली है, वे जरूर हाथ जोड़ कर आएंगे और शायना की सारी बातें मानेंगे. इधर शाहिद के छोटे भाई की अचानक तबीयत खराब हो गई.

घर के सब लोग उस की फिक्र करने लगे, क्योंकि उस का कैंसर लास्ट स्टेज पर पहुंच गया था. वह कुछ हफ्ते का ही मेहमान था. शाहिद ने शायना से बात करने की कोशिश की, पर उस ने उस से बात नहीं की. शाहिद ने उस की अम्मी को बताया, ‘‘भाई की तबीयत बहुत खराब है.

मैं शायना को लेने आ रहा हूं. अब्बा के पास अभी टाइम नहीं है. वे बहुत ज्यादा परेशान हैं.’’ शायना की अम्मी ने साफ मना कर दिया, ‘‘हम तब तक शायना को नहीं भेजेंगे, जब तक तुम्हारे अब्बू नहीं आएंगे.’’ शाहिद यह सुन कर दंग रह गया, फिर भी वह हिम्मत कर के शायना को लेने अपनी सुसराल पहुंच ही गया.

उस ने शायना से बात करनी चाही, मगर उस की सास ने उसे बात करने से मना कर दिया और उसे शाहिद के साथ भी भेजने से इनकार कर दिया. शाहिद निराश हो कर खाली हाथ वहां से वापस आ गया. जब शाहिद के अम्मीअब्बू को इस बात का पता चला, तो उन्हें बहुत बुरा लगा.

इधर वह दिन भी आ गया, जब शाहिद का छोटा भाई यह दुनिया छोड़ कर चला गया, जिस से पूरे घर वालों  को काफी दुख हुआ. घर में मातम  पसर गया. इतना सबकुछ होने के बाद भी शायना के घर वालों को जब इस बात की खबर मिली, तो उन में से कोई भी इस गमगीन माहौल में शाहिद के घर वालों को दिलासा देने नहीं गया. वक्त गुजरता गया.

कुछ रिश्तेदारों ने शायना के अम्मीअब्बू को यह दिलासा दी थी कि शाहिद जरूर अपने अब्बा के साथ शायना को लेने आएगा. शायना की अम्मी ने भी उसे यह कह रखा था कि तुम अपनी जिद पर डटी रहना. अभी वह वक्त है, जब शौहर को अपने इशारों पर नचाया जा सकता है.

अगर तुम हिम्मत हार गई, तो जिंदगीभर उस के और उस के घर वालों के इशारों पर तुम्हें नाचना पड़ेगा. इस तरह उन दोनों के रिश्ते में दरार बढ़ती गई. वक्त तेजी से गुजर रहा था.

शायना को अकेलापन अब खाने को दौड़ रहा था, लेकिन अपनी मां की जिद की वजह से वह सही फैसला नहीं ले पा रही थी. उसे लग रहा था कि पता नहीं कब  तक यों अकेले जिंदगी बितानी पड़ेगी? क्या शाहिद उसे लेने वापस आएगा भी या नहीं? उधर शाहिद ने मुसलिम पर्सनल ला के तहत दूसरी शादी कर ली और अपनी जिंदगी खुशीखुशी गुजारने लगा.

जब शायना और उस के अम्मीअब्बू को शाहिद की दूसरी शादी का पता चला, तो उन के होश उड़ गए. उन्होंने सपने में भी यह नहीं सोचा था कि शाहिद ऐसा भी कर सकता है. गुस्से में आ कर उन्होंने शाहिद से फैसला करने के बजाय उस पर दहेज लेने के अलावा और भी कई केस कर दिए, पर इस से कोई हल नहीं निकला. केस चल रहा है.

शायना घर पर बैठी है. जब तक उस का तलाक या कोई और फैसला नहीं होता, उसे यों ही बिना निकाह के घर पर ही रहना पड़ रहा है. इस केस को एक साल हो गया है, पर अभी तक शायना के अम्मीअब्बू कोई रास्ता नहीं निकाल पाए हैं. उन्होंने अपनी जिद के चक्कर में शायना की जिंदगी बरबाद कर दी और उन दोनों के रिश्ते में एक ऐसी दरार डाल दी जो कभी नहीं भरी जा सकती.

शायना आज अपने घर पर एक जीतीजागती मूर्ति बन कर रह गई थी और सोच रही थी कि काश, मैं अपने घर को खुद ही संभाल कर चलती तो आज यह दिन न देखना पड़ता. उस की उम्र ढलने लगी, पर अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है.  शायना कर भी क्या सकती है, वह खुद एक जिंदा लाश बन कर रह गई है. उन के रिश्तों की इस दरार की वजह उस की मां और खुद शायना है. अगर वक्त रहते वह सही फैसला ले लेती, तो उसे आज यह दिन न देखना पड़ता. Hindi Family Story

Religion and Love: प्रेम विवाह करें तो घर और धर्म छोड़ें

Religion and Love: ‘‘हमारी बिटिया अब पापा किस को कहेगी…’’

22-23 साल की एक औरत अपनी गोद में डेढ़ महीने की बेटी को देखदेख कर रोते हुए बारबार यही कह रही थी. उस के पास एक और बूढ़ी औरत भी बैठी थी. वह भी रो रही थी. उन्हें देख कर लग रहा था कि वे दोनों शायद सासबहू हैं, क्योंकि जवान औरत बारबार घूंघट कर रही थी. मरने वाला उस डेढ़ महीने की बेटी का पिता होगा. उन के साथ कुछ दूरी पर एक बूढ़ा, एक लड़का और कुछ उन के साथी खड़े थे.

लखनऊ का पोस्टमार्टम हाउस अंदर से बंद था. बाहर खाली जगह पड़ी थी. वहां इंटरलौकिंग वाली ईंटों से बना फर्श था. पास में सीमेंट से बनी बैंच और एक प्लेटफार्म था. बैंच पर लोग बैठ कर किसी अपने की डैड बौडी का इंतजार करते थे.

सीमेंट से बना प्लेटफार्म डैड बौडी रखने के काम आता था. पूरे शहर से पोस्टमार्टम के लिए वहां वे डैड बौडी आती थीं, जिन में पुलिस केस दर्ज हो. पुलिस पोस्टमार्टम के जरीए यह जानने की कोशिश करती है कि डैड बौडी के साथ क्या हुआ होगा? उस को किस तरह से मारा गया होगा? मरने का क्या समय रहा होगा? पोस्टमार्टम के बाद जब सारी खानापूरी हो जाती है, तभी डैड बौडी घर वालों को सौंपी जाती है.

कुछ देर में एक आदमी हाथ में चाबी का गुच्छा ले कर आता है और पोस्टमार्टम हाउस के एक कमरे को खोलता है. दरवाजा खुलते ही एक अजीब सी गंध 12-15 फुट दूर तक बैठे लोगों तक आती है. वहां आसपास कुछ और लोग भी होते हैं. शायद उन के भी घरपरिवार का कोई वहां रहा हो. वे लोग भी किसी अपने की डैड बौडी का इंतजार कर रहे होंगे.

‘सनी रावत… थाना निगोहां…’ पोस्टमार्टम हाउस के कमरे में गए आदमी ने अंदर से ही आवाज लगाई.

यह सुनते ही उस रोतीबिलखती औरत की आवाज तेज हो गई. साथ वाली औरत भी रो रही थी. उन के पास खड़ा एक नौजवान तेजी से पोस्टमार्टम हाउस की तरफ बढ़ गया. उस के साथ 2 और लड़के भी गए और एक बूढ़ा आदमी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ़ रहा था.

अब तक तेजी से अंदर गए लड़के वापस आ रहे थे. उन के हाथ में काले रंग की पौलीथिन में बंधी एक डैड बौडी थी, जिसे उन लोगों ने उस सीमेंट से बने प्लेटफार्म पर रख दिया था.

पूरे परिवार के लोग रो रहे थे. एक लड़का अपने दुख को सहन करता हुए बाहर गेट की तरफ आया और वहां पहले से खड़ी गाड़ी को अंदर बुलाने लगा. ड्राइवर गाड़ी को मोड़ कर अंदर लाया.

एक बार लड़कों ने फिर डैड बौडी को उठाया और गाड़ी में रख दिया. उसी गाड़ी में घरपरिवार के सारे लोग बैठ गए. गाड़ी चल पड़ी.

यह डैड बौडी थाना मोहनलालगंज के शंकर बक्श खेड़ा गांव के मजरा रायभान खेड़ा के रहने वाले रामनरेश रावत के 24 साल के बेटे सनी रावत की थी. जिस औरत की गोद में 2 महीने की बेटी थी उस का नाम साधना था, जो मरने वाली की पत्नी थी. बूढ़ी औरत मरने वाली की मां इद्रानी और नौजवान का नाम राज बहादुर था, जो मरने वाले का भाई था.

सनी रावत 8 सितंबर, 2025 की शाम को 7 बजे घर से बाहर निकला था. इस के बाद वह घर वापस नहीं लौटा था. तब पिता ने उस के फोन नंबर पर बात की.

तब सनी ने बताया कि वह गोसाईंगंज के देवी खेड़ा के संतोष यादव के साथ है. कुछ देर में घर पहुंच जाएगा, पर देर रात तक जब वह घर नहीं पहुंचा तो पिता ने फिर से फोन किया, तो फोन उठा नहीं. इस के बाद घर वाले सोने चले गए.

अगली सुबह 5 बजे जब सब लोग उठे और सनी को वापस आया नहीं देखा, तो उसे फिर से फोन किया. इस बार फोन बंद था.

घर वाले सनी रावत की गुमशुदगी लिखाने थाना मोहनलालगंज पहुंचे. वहां पर सोशल मीडिया पर यह पता चला कि थाना निगोहां के गौतम खेड़ा गांव के पास बांका नाले में किसी नौजवान की लाश पड़ी है. परिवार के सभी लोग आननफानन में वहां के लिए निकल पड़े.

रामनरेश रावत ने लाश की शिनाख्त अपने बेटे सनी रावत के रूप में की. परिवार वालों का आरोप था कि सनी रावत की हत्या कर के लाश को नाले में फेंक दिया गया.

रामनरेश रावत की तहरीर पर निगोहां थाने में अपराध संख्या 174/2025 धारा – 103(1), 351(3) बीएनएस के तहत संतोष यादव निवासी देवी खेड़ा गोसाईंगंज, जीतू यादव और देवेश यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया. फिर एक के बाद एक आरोपियों को पकड़ लिया गया.

इस के बाद जो खुलासा हुआ, वह एक दर्दनाक कहानी है.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मे सनी रावत की मौत सिर पर लगी चोट और पानी में डूबने से हुई थी. सनी के घर से जहां उस की डैड बौडी मिली, वह जगह 15 किलोमीटर दूर थी. बांका नाले किनारे सनी कैसे पहुंचा? यह बड़ा सवाल था. जो उसे यहां लाया है, वही इस का जवाब दे सकता था. सनी के घर वालों के मुताबिक हत्या की वजह उस का साधना से प्रेम विवाह करना था.

3-4 साल पहले की बात है. सनी निगोहां थाना के मस्तीपुर गांव में अपनी ननिहाल में रहता था. उस के नाना के घर से कुछ दूरी पर ही जीतू यादव नामक नौजवान का घर था. सनी और जीतू यादव की आपस में दोस्ती हो गई. दोनों का एकदूसरे के घर आना भी हो गया. जीतू की बहन साधना से भी सनी की मुलाकात होने लगी. इस के बाद उन दोनों के बीच प्यार हो गया.

जब उन के प्यार की चर्चा गांव में फैलने लगी, तो जनवरी, 2004 में एक दिन दोनों ने घर से भाग कर लव मैरिज कर ली. इस से गुस्से में आए जीतू, उस के भाई देवेश और परिवार के दूसरे लोगों ने सनी के पिता रामनरेश और मां इद्रानी को मारपीट कर घर से भगा दिया. इन के घर में आग लगा दी.

राम नरेश अपनी पत्नी समेत अपने पुश्तैनी गांव शंकर बक्श खेड़ा में आ कर रहने लगे. सनी अपनी पत्नी साधना को ले कर मुंबई भाग गया. जब साधना पेट से हुई तो सनी उस को लेकर गोसाईंगंज आ गया, जो मोहनलालगंज कसबे के ही पास है.

2 साल बीत जाने के बाद भी साधना के भाई उस के पति को धमकी दे रहे थे. ऐसे में साधना और सनी छिपछिप कर रह रहे थे. डेढ़ महीना पहले ही साधना को बेटी हुई थी.

गांव के लोगों ने जीतू और उस के परिवार को ताना मारने के अंदाज में बधाई दी. इस से जीतू और उस के परिवार के लोगों के मन में लगे घाव हरे हो गए. अब जीतू ने तय कर लिया कि सनी को मार देना ही आखिरी इलाज है.

8 सितंबर, 2025 की शाम को जब सनी रावत जेल रोड के पास देशी शराब के ठेके के पास बैठा था, तो साधना के भाई जीतू यादव ने उस को अपनी स्कार्पियो गाड़ी में बैठा लिया. गाड़ी में उस का भाई देवेश यादव, साला संतोष यादव और दोस्त राज कपूर पहले से बैठे थे. गाड़ी सुनसान रास्तों में आगे बढ़ रही थी.

देवेश और जीतू ने सनी पर लोहे की रौड से वार कर के उसे मार दिया.

इस के बाद सनी की लाश को छिपाने के मकसद से वे लोग सिसेंडी रोड पर गौतमखेड़ा के पास बांका नाला के पास गए. सनी कहीं जिंदा न बच जाए, इस के लिए वहां रोड पर एक बार फिर लोहे की रौड से उसे मारा गया, फिर उस की लाश को नाले में फेंक दिया. इस के बाद वे सब अपनेअपने घर चले गए.

जब दूसरे दिन सनी रावत की लाश बरामद हुई और नामजद मुकदमा लिखा गया, तब पुलिस ने इन की धरपकड़ का अभियान चलाया. 11 सितंबर, 2025 को देवेश और संतोष को सिसेंडी रोड पर जंगल तिराहा के पास से पकड़ा गया.

उन की निशानदेही पर स्कार्पियो गाड़ी नंबर यूपी32 पीडब्ल्यू 6758, लोहे की रौड और खून से सना अंगोछा भी बरामद किया गया. पुलिस ने बरामद सामान जब्त कर पकड़े गए दोनों आरोपियों देवेश और संतोष को जेल भेज दिया.

पुलिस को अभी भी जीतू और राज कपूर की तलाश थी. 13 सितंबर, 2025 की शाम पुलिस को सूचना मिली कि जय सिंह और राज कपूर जबरौली के पास जंगल में छिपे हैं. पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया.

आरोपी जेल पहुंच गए. डेढ़ महीने की बच्ची अनाथ हो गई. उस की 24 साल की मां साधना विधवा हो गई. पिता सनी बदले की भेंट चढ़ गया.

लाख कानून बन जाएं, लेकिन समाज अभी भी अपने हिसाब से चल रहा है. बेटी अभी भी पिता की जायदाद में हिस्सा नहीं ले पाती है. क्या साधना को अपने पिता की जायदाद में उस के भाइयों के बराबर हिस्सा मिलेगा? यह बड़ा सवाल है, जिस का जवाब अमूमन ‘न’ ही होता है. ऐसे में साधना अपनी बाकी जिंदगी कैसे काटेगी? अपनी छोटी बेटी का पालनपोषण कैसे करेगी? इस की वजह केवल इतनी थी कि साधना और सनी ने गैरजाति में प्रेम विवाह किया, जो उन के घर वालों को मंजूर नहीं था.

क्यों नहीं स्वीकारे जाते प्रेम विवाह

हमारे समाज में जाति और धर्म के रीतिरिवाजों की जड़ें इतने गहरे तक धंसी हैं कि उन से उबर पाना आसान नहीं है. जिंदगी के हर मोड़ पर कुछ न कुछ रीतिरिवाज होते हैं, जो धर्म से जुड़े होते हैं. अगर कहीं जन्मदिन भी मनाया जा रहा है, जिस में केक कटना है, जिस को हिंदू धर्म मानता नहीं है, वहां भी अब पूजापाठ होने लगी है. एक तरफ केक कटेगा, तो दूसरी तरफ पूजापाठ होगी.

धर्म को मानने वाले केवल हिंदू ही नहीं हैं, बल्कि जो ईसाई, मुसलिम यहां तक कि बौद्ध धर्म को मानते हैं, वे भी धार्मिक पाखंड का शिकार होते हैं. धर्म चलाने वालों को पता है कि जिस दिन जाति खत्म हो जाएगी, उस दिन धर्म और उस का पाखंड भी खत्म हो जाएगा.

धर्म और जाति की बात होती है, तो यह माना जाता है कि विवाद केवल जनरल, ओबीसी और एससी के होते हैं. असल में ऐसा नहीं है. जब भी प्रेम विवाह की बात होती है, तो जनरल में भी जातीय विभेद है. एससी और ओबीसी में भी अलगअलग जाति को ले कर भेदभाव है.

आजादी के बाद से 1980 तक जब तक राममंदिर आंदोलन का असर नहीं था, जाति के भेद मिटाने के कानून भी बने ठगे, जिन में स्पैशल मैरिज ऐक्ट सब से बड़ा उदाहरण है. उस समय ‘जाति तोड़ो’ का नारा भी दिया गया था और धर्म को ले कर विरोध हो रहा था.

पर बाद में धीरेधीरे यह विरोध खत्म हो गया. उस की वजह यह रही कि धर्म का प्रचार करने वाले को तो पैसा मिलता है, लेकिन उस के पाखंड का विरोध करने वाले को पैसा नहीं मिलता. उलटा धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप में कई मुकदमे कायम होने लगे. ऐसे में धर्म के पाखंड और जातीयता का विरोध करने वाले कमजोर होते गए. समाज का यह असर घरपरिवार के भीतर रसोईघर और बैडरूम तक पहुंच गया.

1980 के धार्मिक काल के बाद समाज में गैरजाति और गैरधर्म में प्रेम विवाह का विरोध होने लगा. संविधान, कानून और कोर्ट के आदेशों के बाद भी प्रेम विवाह करने वालों की जिंदगी महफूज नहीं है.

ऐसे में एक ही उपाय है कि अगर प्रेम विवाह करना है, तो हर तरह का धर्म छोड़ना होगा. इस के अलावा अपना घर छोड़ कर अलग रहना पड़ेगा, तभी जिंदगी महफूज हो सकेगी. अगर इतना करने की ताकत या हिम्मत नहीं है, तो प्रेम और विवाह दोनों करने का हक नहीं है, क्योंकि प्रेम जाति और धर्म देख कर नहीं होता है. जहां इस तरह का काम होगा, वहां समाज और घरपरिवार विरोध में खड़ा होगा.

सनी रावत के बेटी होने पर जीतू यादव को मामा बनने की बधाई देते समय समाज के लोग अगर उसे ताने नहीं मारते, तो सनी रावत की हत्या होने से बच सकती थी. दोनों परिवार तहसनहस नहीं होते. सनी और साधना मुंबई से वापस नहीं आते, तो भी यह वारदात टल सकती थी.

ऐसे में अगर प्रेम विवाह करने का फैसला लिया है, तो घरपरिवार और धर्म छोड़ कर जिंदगी गुजारनी होगी. Religion and Love

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