प्यार पर टूटा पंचायत का कहर

बिहार के जिला भागलपुर स्थित कजरैली इलाके का एक गांव है गौराचक्क. वैसे तो इस गांव में सभी जातियों के लोग रहते हैं. लेकिन यहां बहुतायत यादवों की है. यहां के यादव साधनसंपन्न हैं. उन में एकता भी है. उन की एकजुटता की वजह से पासपड़ोस के गांवों के लोग उन से टकराने से बचते हैं.

इसी गांव में परमानंद यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 1 बेटी और 2 बेटे थे. बेटी बड़ी थी, जिस का नाम सोनी था. साधारण शक्लसूरत और भरेपूरे बदन की सोनी काफी मिलनसार और महत्त्वाकांक्षी थी. उस के अंदर काफी कुछ कर गुजरने की जिजीविषा थी.

2 बेटों के बीच एकलौती बेटी होने की वजह से सोनी को घर में सभी प्यार करते थे. उस की हर एक फरमाइश वह पूरी करते थे. सोनी के पड़ोस में हिमांशु यादव रहता था. रिश्ते में सोनी उस की बुआ लगती थी. यानी दोनों में बुआभतीजे का रिश्ता था. दोनों हमउम्र थे और साथसाथ पलेबढे़ पढ़े भी थे.

वह बचपन से एकदूसरे के करीब रहतेरहते जवानी में पहुंच कर और ज्यादा करीब आ गए. यानी बचपन के रिश्ते जवानी में आ कर सभी मर्यादाओं को तोड़ते हुए प्यार के रिश्ते की माला में गुथ गए.

सोनी और हिमांशु एकदूसरे से प्यार करते थे. इतना प्यार कि एकदूसरे के बिना जीने की सोच भी नहीं सकते थे. वे जानते थे कि उन के बीच बुआभतीजे का रिश्ता है. इस के बावजूद अंजाम की परवाह किए बगैर प्यार की पींग बढ़ाने लगे. बुआभतीजे का रिश्ता होने की वजह से घर वालों ने भी उन की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया.

एक दिन दोपहर का वक्त था. सोनी से मिलने हिमांशु उस के घर गया. कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. सोनी सोफे पर अकेली बैठी कुछ सोच रही थी. हिमांशु को देखते ही मारे खुशी के उस का चेहरा खिल उठा. हिमांशु के भी चेहरे पर रौनक आ गई. वह भी मुसकरा दिया. तभी सोनी ने उसे पास बैठने का इशारा किया तो वह उस के करीब बैठ गया.

‘‘क्या बात है सोनी, घर में इतना सन्नाटा क्यों है?’’ हिमांशु चारों तरफ नजर दौड़ाते हुए बोला, ‘‘चाचाचाची कहीं बाहर गए हैं क्या?’’

‘‘हां, आज सुबह ही मम्मीपापा किसी काम से बाहर चले गए. वे शाम तक ही घर लौटेंगे और दोनों भाई भी स्कूल गए हैं.’’ वह बोली.

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‘‘इस एकांत में बैठी तुम क्या सोच रही थी?’’  हिमांशु ने पूछा.

‘‘यही कि सामाजिक मानमर्यादाओं को तोड़ कर जिस रास्ते पर हम ने कदम बढ़ाए हैं, क्या समाज हमारे इस रिश्ते को स्वीकार करेगा?’’ सोनी बोली.

‘‘शायद समाज हमारे इस रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेगा.’’ हिमांशु ने तुरंत कहा.

‘‘फिर क्या होगा हमारे प्यार का? मुझे तो उस दिन की सोच कर डर लगता है, जिस दिन हमारे इस रिश्ते के बारे में मांबाप को पता चलेगा तो पता नहीं क्या होगा?’’ सोनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, वे हमें जुदा करने की कोशिश करेंगे.’’ सोनी की आंखों में आंखें डाले हिमांशु आगे बोला, ‘‘इस से भी जब उन का जी नहीं भरेगा तो हमें सूली पर चढ़ा देंगे. अरे हम ने प्यार किया है तो डरना क्या? सोनी, मेरे जीते जी तुम्हें किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘सच में इतना प्यार करते हो मुझ से?’’ वह बोली.

‘‘चाहो तो आजमा लो, पता चल जाएगा.’’ हिमांशु ने तैश में कहा.

‘‘ना बाबा ना. मैं ने तो ऐसे ही तुम्हें तंग करने के लिए पूछ लिया.’’

‘‘अच्छा, अभी बताता हूं, रुक.’’ कहते हुए हिमांशु ने सोनी को बांहों में भींच लिया. वह कसमसाती हुई उस में समाती चली गई. एकदूसरे के स्पर्श से उन के तनबदन की आग भड़क उठी. कुछ देर तक वे एकदूसरे में समाए रहे, जब होश आया तो वे नजरें मिला कर मुसकरा पड़े. फिर हिमांशु वहां से चला गया.

लेकिन उन का यह प्यार और ज्यादा दिनों तक घर वालों की आंखों से छिपा हुआ नहीं रह सका. सोनी के पिता को जब जानकारी मिली तो उन के पैरों तले जमीन खिसक गई. परमानंद यादव बेटी को ले कर गंभीर हुए तो दूसरी ओर उन्होंने हिमांशु से साफतौर पर मना कर दिया कि आइंदा वह न तो सोनी से बातचीत करेगा और न ही उन के घर की ओर मुड़ कर देखने की कोशिश करेगा. अगर उस ने दोबारा ऐसी ओछी हरकत करने की कोशिश की तो इस का अंजाम बहुत बुरा होगा.

प्रेम प्रसंग की बातें गांवमोहल्ले में बहुत तेजी से फैलती  हैं. परमानंद ने बहुत कोशिश की कि यह बात वह किसी और के कानों तक न पहुंचे पर ऐसा हो नहीं सका. लाख छिपाने के बावजूद पूरे मोहल्ले में सोनी और हिमांशु की प्रेम कहानी के चर्चे होने लगे. इस से परमानंद का मोहल्ले में निकलना दूभर हो गया.

परमानंद ने सोनी पर कड़ा पहरा बिछा दिया. सोनी के घर से बाहर अकेला जाने पर पाबंदी लगा दी. पत्नी से भी उन्होंने कह दिया कि सेनी को अगर घर से बाहर जाना भी पड़ेगा तो उस के साथ घर का कोई एक सदस्य जरूर जाएगा.

पिता द्वारा पहरा बिठा देने से हिमांशु और सोनी की मुलाकात नहीं हो पा रही थी. सोनी की हालत जल बिन मछली की तरह हो गई थी. उसे न तो खानापीना अच्छा लगता था और न ही किसी से मिलनाजुलना. उस के लिए एकएक पल काटना पहाड़ जैसा लगता था.

सोनी की एक झलक पाने के लिए वह बेताब था. पागलदीवानों की तरह वह यहांवहां भटकता फिरता था. उस की हालत देख कर मां जेलस देवी काफी परेशान रहती थी. मां ने भी बेटे को काफी समझाया कि उस ने जो किया, उसे समाजबिरादरी कभी मान्यता नहीं दे सकती. रिश्ते के बुआभतीजे की शादी को कोई स्वीकार नहीं करेगा. बेहतर है, तुम इसे बुरा सपना समझ कर भूल जाओ.

मगर हिमांशु मां की बात को मानने को तैयार नहीं था. उधर सोनी ने भी अपनी मां से कह दिया कि वह हिमांशु के अलावा किसी और लड़के से शादीनहीं करेगी. मां ने बहुत समझाया लेकिन प्रेम में अंधी सोनी की समझ में नहीं आया. वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

मां भी क्या करती, जब समझातेसमझाते वह थक गई तो उस ने कुछ भी कहना छोड़ दिया. काफी देर बाद सोनी की समझ में आया कि उसे आजादी पानी है तो पहले घर वालों को विश्वास दिलाना होगा कि वह हिमांशु को पूरी तरह भूल चुकी है. घर वालों को जब उस पर विश्वास हो जाएगा तब वह इस का फायदा उठा कर हिमांशु तक पहुंच सकती है. अगर एक बार वह उस के पास पहुंच गई तो उसे कोई रोक नहीं पाएगा.

ये दिमाग में विचार आते ही सोनी का चेहरा खिल उठा और वह घडि़याली आंसू बहाते हुए मां की गोद में जा कर समा गई, ‘‘मां मुझे माफ कर दो. वाकई मुझ से बड़ी भूल हो गई थी. मैं ने आप की बात नहीं मानी, इसलिए आप के मानसम्मान को ठेस पहुंची. मेरी ही वजह से आप को और पापा को बेइज्जती का सामना करना पड़ा. पता नहीं ये सब कैसे हो गया. बताओ अब मैं क्या करूं.’’

‘‘देख बेटी, सुबह का भूला शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते. फिर तू तो मेरा अपना खून है.’’ मां ने सोनी को समझाया, ‘‘मैं तो कहती हूं बेटी कि जो हुआ उसे बुरा सपना समझ कर भूल जा. तेरी शादी मैं अच्छे से अच्छे खानदान में करूंगी.’’

उस के बाद मांबेटी एकदूसरे के गले मिल कर पश्चाताप के आंसू पोंछती रहीं. मां को विश्वास में ले कर सोनी मन ही मन खुश थी. उस के होंठों पर एक अजीब सी कुटिल मुसकान थिरक उठी थी.

मांबाप को भी जब पक्का यकीन हो गया कि सोनी ने हिमांशु से बात तक करनी बंद कर दी है तो उन्होंने धीरेधीरे उस के ऊपर की पाबंदी हटा ली. पिता परमानंद अब उस के लिए लड़का ढूंढने लगे ताकि वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकें.

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परमानंद को इस बात की जरा भी भनक नहीं थी, उन की बेटी मांबाप की आंखों में धूल झोंक रही है. जबकि उस की योजना प्रेमी के साथ फुर्र हो जाने की है.

योजना मुताबिक, सोनी ने मां के सामने ननिहाल जाने की इच्छा प्रकट की तो मां उसे मना नहीं कर सकी. सोचा कि बेटी ननिहाल घूम आएगी तो मन भी बदल जाएगा. यही सोच कर सितंबर, 2016 में उसे बेटे के साथ ननिहाल भेजवा दिया.

ननिहाल पहुंचते ही सोनी आजाद पंछी की तरह हो गई. उस ने हिमांशु को फोन कर दिया कि वह ननिहाल में आ गई है. यहां उस पर किसी तरह की कोई पाबंदी या बंदिश नहीं है. इसलिए वह यहां आ कर उस से मिल सकता है. यह खबर मिलते ही हिमांशु उस की ननिहाल पहुंच गया.

महीनों बाद दोनों एकदूसरे से मिले थे. उन्होंने पहले जी भर कर एकदूसरे को प्यार किया. उसी वक्त सोनी ने हिमांशु से कह दिया कि वह उस के बिना जी नहीं सकती. वो उसे यहां से कहीं दूर ऐसी जगह ले चले, जहां उन के अलावा कोई तीसरा न हो. हिमांशु भी यही चाहता था कि सोनी को ले कर वह इतनी दूर चला जाए, जहां अपनों का साया तक न पहुंच सके.

सोनी घर से भागने के लिए हिमांशु पर दबाव बनाने लगी. प्यार के सामने विवश हिमांशु यार दोस्तों से कुछ रुपयों का बंदोबस्त कर के उसे ले कर दिल्ली भाग गया. परमानंद को जब पता चला तो वह आगबबूला हो उठा. उस ने हिमांशु और उस के घर वालों के खिलाफ कजरैली थाने में बेटी के अपहरण का मुकदमा दर्ज करा दिया.

अपहरण का मुकदमा दर्ज होते ही कजरैली  थाने की पुलिस सक्रिय हुई. पुलिस ने हिमांशु के घर पर दबिश दी. हिमांशु घर से गायब मिला तो पुलिस हिमांशु की मां जेलस देवी को थाने ले आई. उस से सख्ती से पूछताछ की लेकिन वह कुछ नहीं बता पाई. तब पुलिस ने जेलस देवी को घर भेज दिया.

कई महीने बाद भी जब सोनी का पता नहीं चला तो पुलिस हिमांशु और सोनी को हाजिर कराने के लिए जेलस देवी पर बारबार दबाव बनाती रही. कहीं से यह बात हिमांशु को पता चल गई कि पुलिस उस की मां को बारबार परेशान कर रही है. तब 8 महीने बाद हिमांशु सोनी को ले कर घर लौट आया.

सोनी ने अदालत में हाजिर हो कर न्यायाधीश के सामने यह बयान दिया कि वह बालिग हो चुकी है. अपनी मनमरजी से कहीं आजा सकती है. उसे अच्छेबुरे का ज्ञान है. अब रही बात मेरे अपहरण करने की तो मैं अपने मरजी से ननिहाल गई थी. वहीं रह रही थी, हिमांशु ने मेरा अपहरण नहीं किया था. बल्कि मैं अपनी मरजी से कहीं गई थी. हिमांशु निर्दोष है.

भरी अदालत में सोनी के बयान सुन कर परमानंद और उन के साथ आए लोग दंग रह गए, क्योंकि उस ने हिमांशु के पक्ष में बयान दिया था. सोनी के बयान के आधार पर अदालत ने उसे मुक्त दिया.

यह सब सोनी की वजह से ही हुआ था. इसलिए परमानंद भीतर ही भीतर जलभुन कर रह गया. उस समय तो उस ने समझदारी से काम लिया. वह सोनी को ले कर घर आ गया और हिमांशु अपने घर चला गया. घर ला कर परमानंद ने सोनी को बंद कमरे में खूब मारापीटा. फिर उसे उसी कमरे में बंद कर के बाहर से ताला लगा दिया.

इस के बाद परमानंद ने ठान लिया कि हिमांशु की वजह से ही पूरे समाज में उस के परिवार की नाक कटी है, इसलिए वह उसे ऐसा सबक सिखाएगा कि सब देखते रह जाएंगे. वह धीरेधीरे गांव के लोगों को भी हिमांशु के खिलाफ भड़काने लगा कि उस की वजह से ही पूरे गांव की बदनामी हुई है.

योजना को अंजाम देने के लिए परमानंद ने एक योजना बनाई. योजना के अनुसार, वह और उस का परिवार एकदम शांति से रहने लगा ताकि हिमांशु को रास्ते से हटाने के बाद सभी को यही लगे कि इस में उस का कोई हाथ नहीं है. परमानंद अभी यह तानाबाना बुन ही रहा था कि एक नई घटना घट गई.

20 अप्रैन, 2017 को सोनी फिर हिमांशु के साथ भाग गई. इस बार हिमांशु के साथ हिमांशु का परिवार भी खड़ा था. दोनों का प्यार देख कर घर वालों ने दोनों की सहमति से मंदिर में शादी करा दी थी. शादी के 15 दिनों बाद हिमांशु और सोनी फिर गांव लौट आए. इस बार सोनी अपने घर के बजाय हिमांशु के घर गई.

हिमांशु और सोनी के लौटने की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई. गांव वाले दोनों की हिम्मत देख कर हतप्रभ थे कि हिम्मत तो देखिए रिश्तों को कलंकित करते कलेजे को ठंडक नहीं पहुंची जो गांव को बदनाम करने फिर से यहां आ गए. खैर, जैसे ही ये खबर परमानंद को मिली तो उस का खून खौल उठा. वह आपे से बाहर हो गया.

अगले दिन यानी 5 जून, 2017 को सुबह के करीब 10 बजे गांव में पंचायत बुलाई गई. पंचायत परमानंद के दरवाजे के सामने रखी गई. उस में सैकड़ों की तादाद में गांव वालों के अलावा 21 पंच जुटे. सभी पंच परमानंद के पक्ष में खड़े उस की हां में हां मिला रहे थे. पंचायत में हिमांशु के परिवार का कोई भी सदस्य शामिल नहीं था.

पंचायत की अगुवाई गांव का गणेश यादव कर रहा था. एक दिन पहले ही गणेश यादव जेल से जमानत पर रिहा हुआ था. पंचायत में प्रताप यादव सिपाही भी था. वह बक्सर में तैनात था और कुछ दिनों की छुट्टी पर घर आया था. इसी की मध्यस्थता में पंचायत शुरू हुई थी.

10 बजे शुरू हुई पंचायत शाम 5 बजे तक चली. अंत में पंचों ने एकमत हो कर हिमांशु के खिलाफ तुगलकी फरमान सुना दिया कि हिमांशु ने जो किया वह बहुत गलत किया. उस की करतूतों से गांव की भारी बदनामी हुई है. उसे उस की गलती की सजा तो मिलनी ही चाहिए ताकि आइंदा गांव का कोई दूसरा युवक ऐसी जुर्रत करने के बारे में सोच भी न सके.

सभी पंचों ने कहा कि हिमांशु की गलती की सजा मौत है. उसे जान से मार देना चाहिए. इस पर पंचायत के सभी लोग सहमत हो गए. सभी ने लाठी, डंडा, तलवार, पिस्टल, ईंट आदि ले कर उस के घर पर एकाएक हमला बोल दिया.

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हिमांशु यादव घर पर ही था. उस के घर का दरवाजा बंद था. दरवाजे को तोड़ कर लोग उसे घर के भीतर से खींच लाए और उस का शरीर गोलियों से छलनी कर के पूरी भड़ास निकाल दी. इस के बाद महिलाएं उस की गर्भवती पत्नी सोनी को भी कमरे से खींच कर कहीं ले गईं. उस दिन के बाद से आज तक उस का कहीं पता नहीं चला कि वह जिंदा भी है या उस के साथ कोई अनहोनी हो चुकी है.

बेटे और बहू को बचाने गई हिमांशु की मां जेलस देवी भी पंचों के कोप का शिकार बन गई. उसे भी मारमार कर अधमरा कर दिया गया. पंच बने आतताइयों का जब इस से भी जी नहीं भरा तो उन्होंने उस के घर को आग लगा दी और फरार हो गए.

दिल दहला देने वाली घटना की सूचना जैसे ही थाना कजरैली के थानाप्रभारी विजय कुमार को मिली तो उन के हाथपांव फूल गए. वह तत्काल मयफोर्स के घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. मौके पर पहुंचते ही सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी गई. सूचना मिलते ही एसएसपी मनोज कुमार, एसपी (सिटी)  और सीओ गौराचक्क गांव पहुंच गए. पीडि़त परिवार के लोगों से मिलने के बाद पुलिस ने आतताइयों के घर दबिश दी लेकिन वे सभी अपनेअपने घरों से फरार मिले.

पुलिस ने हिमांशु की घायल मां जेलस देवी को इलाज के लिए मायागंज अस्पताल पहुंचवा दिया. हिमांशु की लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. मौके से कई खाली खोखे बरामद हुए. गांव का तनावपूर्ण माहौल देखते हुए एसएसपी ने वहां पीएसी की 2 टुकडि़यां तैनात कर दीं ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे.

पुलिस ने अस्पताल में जेलस देवी के बयान लिए तो उस ने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. उस के बयान के आधार पर कजरैली थाने में हत्या, हत्या का प्रयास और बलवा करने की विभिन्न धाराओं में 21 आरोपियों के खिलाफ नामजद मुकदमा दर्ज हुआ.

मामले में बहू सोनी के पिता और मुख्य आरोपी परमानंद यादव सहित सुनील यादव, भितो यादव, सुमन यादव, सीताराम यादव, विवेक यादव, प्रकाश यादव उर्फ विक्की, पूसो यादव, राजा यादव, पंकज यादव, प्रकाश यादव, अधिक यादव, प्रताप यादव (सिपाही), विजय यादव, अजब लाल यादव, गणेश यादव, वरुण यादव, सुमन यादव, अरुण यादव, कुशी यादव और गोपाल यादव को नामजद आरोपी बनाया गया.

हिमांशु यादव की पत्नी सोनी यादव के अपहरण का अलग से मुकदमा दर्ज किया गया. इस मुकदमे में आरोपी आशा देवी, राधा देवी, रुक्मिणी देवी, मनीषा देवी, अंजू देवी, अन्नू देवी, नागो यादव और अब्बो देवी को नामजद दिया गया. यह सब भी अपनेअपने घर से फरार मिलीं. पर 2 हमलावर प्रकाश यादव और राजा यादव पुलिस के हत्थे चढ़ गए. पुलिस ने उन से पूछताछ कर उन्हें जेल भेज दिया. घटना के बाद गांव के लोग 2 खेमों में बंट गए.

धीरेधीरे 10-12 दिन बीत गए. हिमांशु हत्याकांड और सोनी अपहरण के आरोपियों का पुलिस पता तक नहीं लगा सकी. समाचार पत्र इस लोमहर्षक घटना की खबरें छापछाप कर पुलिस की नाक में दम कर रहे थे. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने 20 जून, 2017 को न्यायालय से आरोपियों की संपत्ति के कुर्कीजब्ती के आदेश ले लिए.

आरोपियों को जब पता चला कि पुलिस ने न्यायालय से उन की संपत्ति के कुर्कीजब्ती के आदेश ले लिए हैं तो सीताराम यादव, सुनील यादव, विवेक यादव, अरुण यादव, कुशो यादव और सुमन यादव ने 14 जुलाई, 2017 को अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की कोर्ट में सरेंडर कर दिया. कोर्ट से सभी आरोपियों को जेल भेज दिया.

इस के पहले भी 2 आरोपियों ने कोर्ट में सरेंडर किया था और 3 को पुलिस पहले गिरफ्तार कर चुकी थी. बाकी अभियुक्तों को भी पुलिस तलाशती रही. 30 जुलाई, 2017 को मुख्य आरोपी परमानंद यादव को पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर बांका जिले से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से सोनी के बारे में पूछताछ की तो उस ने अनभिज्ञता जताई.

इस केस में अजब लाल यादव भी आरोपी था. जबकि उस के घर वालों का कहना है कि उस का इस मामले से कोई लेनादेना नहीं है. उस की बेटी अनुष्ठा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयेग को पत्र लिख कर कहा कि उस के पिता को गलत फंसाया गया है. मानवाधिकार आयोग ने 8 जनवरी, 2018 को एसएसपी मनोज कुमार से हिमांशु हत्याकांड की ताजा रिपोर्ट देने को कहा.

आयोग के सवालों के जवाब देने के लिए एसएसपी ने डीएसपी (सिटी) को अधिकृत कर दिया. कथा लिखे जाने तक जवाब तैयार नहीं हुआ था. अपहृत सोनी का कुछ पता नहीं चल सका था. हिमांशु के घर वालों ने अपहरण कर के सोनी की हत्या की आशंका जताई है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

यात्राओं में बढ़ती बेरोजगारों की भीड़ : इन की बरबादी में ही पंडों का फायदा

सावन में होने वाली कांंवड़ यात्रा को अब तथाकथित ऊंची जाति के तबके ने तकरीबन छोड़ दिया है. सवर्ण समाज के बच्चे अब इंगलिश स्कूलों यहां तक कि विदेशों तक में पढ़ते हैं. कांवड़ यात्रा अब सिर्फ पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासियों के बच्चे करते हैं. आप चाहें तो कांंवड़ यात्रियों का सर्वे कर सकते हैं, उन के जनेऊ भी चैक कर सकते हैं.

मांं लोगों के घरों में चौकाबरतन कर के घर चला रही है, पिता मजदूरी कर रहे हैं या फिर किसी प्राइवेट कंपनी में छोटीमोटी नौकरी कर के परिवार के लिए रोजीरोटी का बंदोबस्त कर रहे हैं और जवान बेटा भगवा गमछा गले में लटका कर धर्म की रक्षा में जुटा है. ऐसे बेरोजगार ज्यादातर एससी, एसटी और ओबीसी में ही बहुतायात से पाए जाते हैं.

सावनभादों के मौसम में अकसर लोगों को रंगबिरंगे, पचरंगे, सतरंगे झंडेझंडिया लिए जयकारे लगाते पैदल सड़कों पर यात्रा करते देखा जा सकता है. जयपुर इलाके में कहीं डिग्गी कल्याण की पदयात्राएं, तो कहीं अजमेर की तरफ जाने वाले रास्तों पर ख्वाजा के जायरीन, कहीं सवाईभोज के दीवाने, तो कहीं जोगमाया के चाहने वाले… सब से ज्यादा भीड़ सड़कों पर इन दिनों रामदेवरा जाने वाले जातरुओं की होती है. भगवा रंग में रंगे कांवड़िए तो देशभर में नजर आते ही हैं.

झंडा उठाए इन भक्तगणों की सोशल प्रोफाइल देखने, इन के चेहरे पढ़ने, इन की माली, सामाजिक बैकग्राउंड पर ध्यान देते हैं, तो साफ जाहिर होता है कि ये दलित, पिछड़े व आदिवासी जमात के गरीबगुरबे, किसानमजदूर ही होते हैं.

हालांकि यह कीमती समय इन के खेतों में होने का है. इस समय फसलें आकार ले रही होती हैं, खेतों को निराईगुड़ाई की सख्त जरूरत रहती है, नदीनाले, तालाबएनीकट व खेतों के भरनेफूटने के दिन होते हैं, जलसंचय का मौसम होता है, अपनी आजीविका के साधनसंसाधनों को सहेजनेसंभालने का समय होता है, लेकिन ये अपना घरबार छोड़ कर निकल पड़ते हैं. इन गरीबों, मेहनतकशों को ईश्वर की तथाकथित कृपा चाहिए, इन्हें देवीदेवताओं का आशीर्वाद हासिल करना है, सो ये झंडा ले कर निकल पड़ते हैं.

घरबार, गायभैंस, बैलबकरी, बालबच्चे सब छोड़ जाते हैं. इन्हें कल्याण धणी, रामसा पीर और ख्वाजा साहब की रहमत की दरकार रहती है. ये मेहनत करने वाले हाथ भिक्षा की मुद्रा में होते हैं. इन का खुद से भरोसा उठ चुका होता है और ये सड़कों, मंदिरों और मजारों पर धोक लगाते फिर रहे होते हैं. इन पर आसमानी कृपा बरसेगी, ऐसा इन को यकीन होता है.

इन पैदल चल रहे लोगों में बहुत ही कम दुकानदार, फैक्टरी के मालिक, मिल वाले होंगे या सरकारी कर्मचारी ने छुट्टी ले कर इस तरह पैदल जाना गवारा किया होगा.

कौन समझदार इस मच्छरों और सांपों के सीजन में, बारिश और कीचड़ में अपनी परेशानी भोगने इस तरह सड़क पर निकलेगा, लेकिन आस्था के नाम पर जो निकल पड़े हैं, उन में से कई लोग दुर्घनाग्रस्त होंगे, वापस घर नहीं पहुंचेंगे, कई सांप के काटने के शिकार होंगे, कइयों को कुचल कर मरना पड़ेगा, कुछेक बारिश के पानी में बह जाएंगे, पर हाल साल ऐसे धर्म यात्रियों की तादाद बढ़ती ही जाती है.

इस जंजाल में फंसे लोग बड़ी मासूमियत से कहते हैं कि उन्होंने बाबा के पैदल जाने की मनौती कर रखी है. पैदल चलना ठीक है, पर अक्ल से पैदल होना बहुत खतरनाक है. अपने समय और संसाधनों की ऐसी बरबादी मत कीजिए. हर साल पैदल निकल कर क्या हासिल हुआ है? जब आज तक नहीं हुआ तो आगे भी नहीं होगा.

यह आध्यात्म का नहीं, बल्कि बरबादी का रास्ता है. अपने खेतखलिहान, रोजीरोटी और घरपरिवार को संभालनेसंवारने के इस कीमती वक्त में अंधभक्ति की अंधेरी सुरंग में नहीं धंसना चाहिए.

इस मसले पर सामाजिक कार्यकर्ता व विचारक प्रेमाराम सियाग कहते हैं, “ये पदयात्रा या कांवड़ यात्रा नहीं, बल्कि अपनी दुर्गति को बुलावा है. सिर्फ रामरसोड़ों के चायनाश्ते और खानेपीने के चक्कर मे अपना कीमती वक्त बरबाद करना है. इस तरह चलने से कुछ भी हासिल नहीं होगा. थोड़ा ठहर कर सोचिए और घर लौट जाइए. अच्छा काम कीजिए, मस्त रहिए, कानून को मानिए, सभ्य नागरिक बनिए, क्योंकि मेहनत से ही खुशहाली आएगी.”

बेकारी में कामकाजी होने का भरम

पैदल और कांवड़ यात्राएं ही नहीं, बल्कि मेहनतकश दलित, पिछड़े व आदिवासी समाज के नौजवान आजकल घरघर घूम कर चंदा जमा कर के भजन संध्याओं का आयोजन कर रहे हैं. भागवत व सत्यनारायण की कथाओं के बड़ेबड़े पंडाल खड़े कर रहे हैं. रामलीलाओं में जयकारे लगा रहे हैं. शोभायात्राओं की झांकियां कंधों पर उठाए घूम रहे हैं. मंदिर निर्माण के लिए चंदा जमा कर के बड़ेबड़े झंडे चढ़वा रहे हैं. धार्मिक जुलूसों में रंगबिरंगे झंडे लहरा रहे हैं. लेकिन इन सब का नतीजा कुछ नहीं निकलता है.

नेताओं की रैलियों में झंडेजयकारों का भार उठा रहे हैं. रातदिन सोशल मीडिया पर धर्मरक्षा की जंग लड़ रहे हैं. अपने धार्मिक और राजनीतिक आकाओं के लिए अपने परिवार और रिश्तेदारों तक से लड़ाई लड़ कर रहे हैं, जबकि होना तो यह चाहिए था कि किसान, गरीब, दलित, पिछड़ी जमात के नौजवान बेहतर स्कूल व कालेज के लिए लड़ें. बेहतर डाक्टरी इंतजामों के लिए जद्दोजेहद करें. सर्दीगरमी में तड़पते किसानों के बेहतर इंतजाम के लिए काम करें. नाइंसाफी व जोरजुल्म के खिलाफ आवाज उठाएं. नए रोजगार पैदा करें. देश की हिफाजत के लिए बेहतर तकनीक व हथियार बनाएं.

पंडों की कमाई की नई तरकीब

अकसर धर्म को कर्म, सेवा व भक्तिभाव से जोड़ कर देखा जाता है. कांंवड़ उत्सव हो या पदयात्राएं, इन में भी आखिर सवर्ण तबका ही बाजी मार रहा है. पिछड़े, दलित और कमेरे लोग सोचते हैं कि पसीना निकालने से ही धर्म कमाया जाता है, पसीना निकालना ही भक्ति भावना है. सवर्ण तबके के लोग जो हमेशा दिमाग से खेलते हैं, हार्डवर्क की बजाय सौफ्टवर्क में यकीन रखते हैं.

इस सवर्ण तबके ने कांंवड़ उत्सव में भी धर्म कमाने की, भोले को मनाने की नई तरकीब खोज निकाली है. इन्होंने तदबीर बनाई है कि जितने भी कांवड़िए आते हैं, उन की सेवा के लिए शिविर लगाए जाएं. शिविरों में कांवड़ियों के लिए खानेपीने की हर तरह का इंतजाम किया जाता है. ये अपनी औरतों समेत कांवड़ियों के पैर गरम पानी से धोते हैं. इन का मानना होता है कि यह सेवा कांवड़ लाने से भी बड़ी सेवा व भक्ति है.

गरीब कांवड़िए इन की इस सेवा में ही खुश हो लेते हैं और मारे खुशी के अरंड के पौधे पर चढ़ जाते हैं कि असली शिवभक्त तो हम ही हैं. ये शिविर और सेवा देहातियों को कांवड़ लाने के लिए और ज्यादा बढ़ावा देती है, जिस से हर बार कावड़ उत्सव में कांवड़ियों की तादाद बढ़ती जाती है, जिस से ऊंची जाति के इन बामणबाणियों के बाजारों में रौनक आती है. उस रौनक में से वे कुछ हिस्सा शिविरों में लगा देते हैं.

बेकारी का आईना है ऐसी भीड़

कांवड़ियों की बढ़ती भीड़ के मद्देनजर ‘मानवतावादी विश्व समाज’ के अध्यक्ष व एसपी किशन सहाय एक बार कहा था कि कांवड़ियों की जो भीड़ बढ़ी है, वह साबित करती है कि बेरोजगारी कितनी विकराल हो गई है.

किशन सहाय के इस बयान को मीडिया ने भले ही हिंदू धर्म के खिलाफ विवादास्पद व हिंदुओं का अपमान बताया हो, लेकिन एक आम जागरूक नागरिक के नजरिए से देखें तो इस में गलत क्या है?

जब लोग व्यवस्था से नाराज होते हैं तो अंधविश्वास में फंसते हैं. जब बेरोजगारों को सत्ता रोजगार नहीं दे पाएगी तो बेरोजगार नौजवान ठाली बैठे क्या करेंगे? कांवड़ लाने ही तो जाएंगे. भांगअफीम के नशे का सुनहरा अवसर व साथ में इस गरमी में नहाने के लिए गंगा का ठंडा पानी हो तो किस  का मन नहीं करेगा कांवड़ लाने का. अगर किसी को शक हो तो इन यात्रियों का सामान चैक कर लो, भरम से परदा उठ जाएगा. अगर कोई सचाई को बोल दे तो सारे पाखंडी इकट्ठे हो कर आग उगलने लग जाते हैं.

पश्चिमी राजस्थान में रामदेवरा धाम है. वहां पर भी ऐसी ही यात्राओं का हुजूम लगता है. सब बेरोजगार व गरीब, दलितपिछड़े लोग सड़कों पर झंडा उठाए चलते हुए मिलेंगे. वहां इस मौसम में सांप भी बहुत ज्यादा होते हैं. सांप के काटने के चलते कई लोग मर जाते हैं. वाहनों में भेड़बकरियों की तरह भरभर कर चलते हैं और हादसे के शिकार हो जाते हैं.

शिक्षाविद शिवनारायण इनाणियां कहते हैं, “किसानोंदलितों का काम के समय को इस तरह धर्मांधता में फंस कर बरबाद करना ठीक नहीं है. इस से खुद का ही नुकसान होता है. गरीबों का शोषण होता है. काम ठप होता है. रसोई लगा कर लोग फर्जी धर्मगुरु व नेता बन जाते हैं. वैसे भी जिन को दान करना है, उन्हें अपने गांव के स्कूल में सुविधाएं बढ़ाने के लिए पैसा खर्च करना चाहिए. गांव में किसी गरीब बच्चे की शिक्षा का खर्चा उठाना चाहिए. किसी बेसहारा के इलाज में मदद करनी चाहिए.

“ऐसी उन्मादी भीड़ यात्राओं के फैशन को बढ़ावा दे कर शोषण की दुकानें चलाने वालों को फायदा नहीं पहुंंचाना चाहिए. जबजब सत्ता की तरफ से लोगों को निराशा मिलती है, तो लोगों का मानसिक स्तर कमजोर होता है. कमजोरी के इस समय का उपयोग धर्मांधता फैलाने वालों को नहीं करने देना चाहिए.”

धर्मांधता कमजोर सोच की देन

जब नेपाल में भूकंप आया तो लोग भूख व दर्द में तड़प रहे थे. सत्ता फेल हो चुकी थी, तब पौप फ्रांसिस ने एक ट्वीट किया था कि मिशनरी के लिए यह सही वक्त है. उस समय लोगों का मानसिक स्तर डांवांडोल था और उन का मतलब धर्म प्रचार से था.

दुनियाभर से उन का विरोध हुआ, नेपाल के जागरूक लोगों ने मिशनरियों को घुसने तक नहीं दिया तो पौप ने सफाई दे कर माफी मांगी थी. जिक्र करने का मतलब यह है कि कमजोर सोच ही धर्मांधता में फंसने की एकमात्र वजह है और धर्म के नाम पर दुकान चलाने वाले ठग इसे बखूबी समझते हैं.

भारत के नौजवानों के अलग सपने, अलग रास्ते हैं. ये बजरंग दल, बीएचपी, ब्रह्मकुमारी, इस्कोन, आर्ट औफ लिविंग, नागा, अखाड़ा परिषद आदि में भरती हो कर अध्यात्म के रास्ते मोक्ष हासिल करना चाहते हैं.

हमें गलतफहमी है कि रेलवे का निजीकरण होने से बेरोजगारी बढ़ेगी, लेकिन देखना यह है कि कांवड़ योजना कितनों को रोजगार दे रही है. पैदल यात्रा योजना के तहत चीन की सीमा से होते मानसरोवर तक पहुंचा जा रहा है.

यह हमारी गलतफहमी है कि लोक सेवा आयोग समय पर भरतियां नहीं करते, इसलिए नौजवानों की ऊर्जा फालतू के कामों में बरबाद हो रही है, जबकि नौजवनाओं ने बड़ी दूरदर्शिता दिखाते हुए अध्यात्म से ओतप्रोत सत्ता चुनी है जो तमाम भरती एजेंसियों को खत्म कर के, तमाम संस्थानों का निजीकरण कर के मोक्ष के रास्ते के रोड़े हटा रही है. नौजवानों का भरतियों में बहुत समय खराब हो रहा था और नौकरी कर के इस जन्म में गृहस्थी के जंजाल में फंस कर अगली जिंदगी खराब करना नहीं चाहते हैं.

– खेत में खुदकुशी करते किसानमजदूर

-इलाज की कमी में मरते बीमार

-कुपोषण में बिलखता भारत

-शिक्षा की कमी में भटकता बचपन

-कारखानों में वर्कलोड से मरते मजदूर

-महिलाओं के साथ होते बलात्कार व हिंसा

-दलितों के साथ होते अत्याचार

-जातीय भेदभाव में कराहता देश

-भुखमरी से मरते इनसान

-धार्मिक उन्माद की भेंट चढ़ता समाज

-रोजगार की कमी में अपराध को मिलता बढ़ावा

-भ्रष्टाचार द्वारा देश को नोचता सिस्टम

-देश को लूटते देशीविदेशी लुटेरे

ये सब दलितपिछड़े तबके की वर्तमान जिंदगी की छोटी समस्याएं हैं. इन को वैसे ही इस जिंदगी के साथ खत्म होना ही है, इसलिए नौजवानों का इन से कोई लेनादेना नहीं है.

पंडित रविशंकर ठीक कह रहे हैं कि सरकारी स्कूलों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यहां नक्सलवाद पैदा होता है. स्कूलें बंद होंगे तो एकाएक अध्यात्मिक सड़कों पर नौजवानों का रेला नजर आने लग जाएगा. अस्पताल भी बंद होने चाहिए. बूढ़े और बीमारों को वहां तक पहुंचाने में समय बरबाद होता है और धर्मस्थलों से भीड़ डाइवर्ट हो रही है.

शिक्षाविद केएल परास्या कटाक्ष करते हुए कहते हैं, “हर बुनियादी सुविधा दे रहे संस्थानों व योजनाओं को बंद कर देना चाहिए. फालतू में इस जन्म में उलझाए बैठे हैं. नौजवानों की चाहत के मुताबिक जल्द से जल्द मोक्ष की मंजिल पाने में हमे सहयोग करना चाहिए. भारत का नौजवान तबका बिलकुल जागा हुआ है और बहुत मेहनत कर रहा है. हमें हमारे नौजवानों का सहयोग करना चाहिए. आखिर उन के सपनों का सवाल जो है.”

जिम्मेदारियों से भागना

कांवड़ और पैदल यात्रियों के जत्थे डीजे पर भजनों की बेतुकी धुनों पर नशे में चूर हो कर नाचते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पागलपन का दौरा पड़ा हो. अगर ये यात्रा में नहीं नाच कर कहीं दूसरी जगह ऐसी हरकत कर रहे होते तो घर वाले कब के किसी अच्छे दिमागी डाक्टर की शरण में ले जाते.

आस्था के नाम पर जो लोग यात्राओं पर निकलते हैं, असल में वे अपनी जिम्मेदारियों से भागने वाले लोग हैं. मातापिता, भाईबहन, देशसमाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभा पाने वाले लोग धर्म का सहारा लेते हैं. अपने मांबाप को उन के हाल पर छोड़ कर उन की इच्छा के खिलाफ अपनी मौजमस्ती के लिए जहां मरजी निकल पड़ते हैं, जबकि जो आदमी अपनी जिम्मेदारी व फर्ज निभा लेता है उसे कहीं पर भी जाने की जरूरत नहीं है.

आज से 40 साल पहले कोई यात्रा नहीं थी, तो क्या हमारे पुरखे धार्मिक नहीं थे? क्या पैदल यात्रा, कांवड़ यात्रा, गणेश उत्सव, गरबा, मटकी फोड़, करवाचौथ हमारे पुरखे मनाते थे? क्या ये किसी भी धर्म का हिस्सा थे? कौन लोग हैं, जिन्होंने ऐसे आयोजन शुरू किए? इन लोगों का मकसद क्या है? सच तो यह है कि इन आयोजनों को धर्म से जोड़ने वालों का मकसद इस देश के कमेरे तबके को लूट कर खुद के लिए रोजगार पैदा करना है.

Video: दुल्हे की चाह में राखी सांवत का नया टोटका, सर पर फोड़े अंडे

ड्रामा क्वीन कहे जाने वाली राखी सांवत ऐसा कोई भी नहीं छोड़ती है जब उन्हे मीडिया कैप्चर ना करती हो उनकी नोटंकी हमेशा ही मीडिया के सामने आ ही जाती है कुछ दिनों पहले ही राखी का पायलट पर नोट उडाने का वीडिया वायरल हुआ था, अब हाल ही में उनका नया वीडियो सामने आया है जिसमे वो कुछ अलग  ही नोटंकी करती नजर आ रही है. जी हां, राखी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है जिसमें वो पति की चाह में नया टोटका अजमा रही है.

आपको बता दें, कि राखी सांवत के कई वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते है ऐसा ही एक वीडियो अब वायरल हो रहा है जिसमें राखी बारिश में अपने सर पर अंडे फोडती नजर आ रही है. और बोल रही है कि अच्छा पति मिल जाएं. अब इस वीडियो पर लोग जमकर कमेंट कर रहे है. साथ ही राखी का नया टोटका देख रहे है.

 

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राखी सावंत (Rakhi Sawant) के इस वीडियो पर कमेंट करते हुए एक यूजर ने लिखा, “कॉमेडी फिल्मों में एक छोटी- मोटी एक्टिंग मिल जाएगी लेकिन दुल्हा नहीं.” तो वहीं एक दूसरे यूजर ने लिखा, “अरे यार आपको कितने दुल्हे चाहिए, कोई इन्हें पोपटलाल का एडरेस दे दो.” राखी सावंत के इस वीडियो को कुछ ही घंटों में हजारों की संख्या में लाइक्स मिल चुके हैं.

 

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बता दें कि एक्ट्रेस राखी सावंत ने दुबई बेस्ड बिजनेसमैन आदिल खान दुर्रानी के साथ बीते साल शादी रचाई थी. दोनों की शादी की तस्वीरें भी वायरल हुईं. पहले तो आदिल ने राखी से शादी की बात नकारी लेकिन बाद में उन्होंने राखी को अपना लिया. हालांकि राखी और आदिल का यह रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं चला और कुछ ही महीनों के बाद दोनों का तलाक हो गया.

Adipurush के डायलॉग राइटर ने मांगी लोगों से माफी, ट्विटर पर किया पोस्ट

आदिपुरुष फिल्म रिलीज तो हो गई लेकिन इस फिल्म को लेकर चर्चाएं अभी जारी है फिल्म रिलीज के पहले दिन तो जमकर कमाई करती दिखाई दी. लेकिन धीरे-धीरे फिल्म की कमाई में गिरावट आनी शुरु हो गई. बता दें, फिल्म के डायलॉग और वीएफएक्स लोगों को बिलकुल पसंद नहीं आए . जिससे सबसे ज्यादा ट्रोल फिल्म के डायल़ॉग राइटर मनोज मुंतशिर (Manoj Muntashir) को किया गया. जिसके बाद सोशल मीडिया पर मनोज मुंतशिर ने सबसे माफी मांगी है, लेकिन लोगों को उनका ये अंदाज बिलकुल पसंद नहीं आया और कहा कि ये नाटक कर रहे है.

आपको बता दें, कि मनोज मुंतशिर ने एक ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने भगवान राम के भक्तों से हाथ जोड़कर माफी मांगी है. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, ‘मैं स्वीकार करता हूं कि फिल्म आदिपुरुष से जन भावनाएं आहत हुई हैं. अपने सभी भाइयों-बहनों, बड़ों, पूज्य साधु-संतों और श्री राम के भक्तों से, मैं हाथ जोड़ कर, बिना शर्त क्षमा मांगता हूं. भगवान बजरंग बली हम सब पर कृपा करें, हमें एक और अटूट रहकर अपने पवित्र सनातन और महान देश की सेवा करने की शक्ति दें.

मनोज मुतंशिर का ये ट्वीट वायरल हो गया और लोगों ने इसपर कमेंट बरसाने शुरु कर दिए. हालांकि, बड़ी संख्या में लोगों का कहना है उन्हें ये माफी पहले मांगनी चाहिए थी. एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा, ‘ये काम तो पहले दिन ही करना चाहिए था, लेकिन तब तो तुम दुनिया को ज्ञान दे रहे थे कि मास्टरपीस बनाया है.’ दूसरे यूजर ने लिखा, ‘डायलॉग लिखने से पहले सोचना था.’ एक यूजर ने ‘नई मिलेगी माफी’ पोस्टर भी कमेंट में डाला है.बता दें , कि फिल्म की रिलीजिंग के बाद डायलॉग बदल दिए गए थे.

Blind Film Review: सोनम कपूर की रोमांच विहीन फिल्म ‘ब्लाइंड’

  • निर्माताःसुज्वौय घोष,अविषेक घोष, ह्यूनवो थाॅमस किम,सचिन नाहर, पिंकी नाहर,ज्योति देशपांडे
  • लेखक: शोम मखीजा और सुदीप निगम
  • निर्देशकः शोम मखीजा
  • कलाकारः सोनम कपूर,पूरब कोहली,विनय पाठक,लिलेट दुबे,शुभम सराफ,लूसी आर्डेन,जावेद खान व अन्य
  • अवधिः दो घंटे चार मिनट

ओटीटी प्लेटफार्म: जियो सिनेमा पर मुफ्त में, सात जुलाई से 2011 में प्रदर्शित क्राइम थ्रिलर प्रधान कोरियन फिल्म ‘‘ब्लाइंड’’ का ही उसी नाम से भारतीय करण कर शोम मखीजा लेकर आए हैं,जिससे अभिनेत्री सोनम कपूर पूरे चार वर्ष बाद अभिनय में वापसी कर रही हैं.

सोनम कपूर पिछली बार निर्देशक अभिषेक शर्मा की फिल्म ‘जोया फैक्टर‘ में साउथ सिनेमा के स्टार दुलकर सलमान के साथ नजर आई थी जो साल 2019 में सिनेमाघरों रिलीज हुई थी.‘ब्लाइंड‘ सिनेमा घरों में रिलीज न होकर सीधे ओटीटी प्लेटफार्म जियो सिनेमा पर रिलीज हुई है.जी हाॅ! ग्लासगो,स्काॅटलैंड में फिल्मायी गयी इस फिल्म को सात जुलाई से ‘जियोसिनेमा’ पर मुफ्त में देखा जा सकता है.मुफ्त में मिली हुई चीज की गुणवत्ता से सभी परिचित है.तो उसी के अनुरूप यह फिल्म भी बेकार ही है.

कहानी:

फिल्म की कहानी के केंद्र में स्कॉटलैंड में रहने वाली पुलिस ऑफिसर जिया सिंह (सोनू कपूर) हैं.अनाथलय में पली बढ़ी जिया सिंह एक रात अनाथालय की मालकिन के बेटे व अपने मंुॅह बोले भाई आंड्यिन परेरा (दानिश रजवी) को पब से अपनी कार से घर ले जाने की कोशिश कर रही होती है,जिससे वह पढ़ाई करे.तभी दुर्घटना हो जाती है.

इस त्रासदी में जिया सिंह की आंखों की रोशनी चली जाती है.भाई की मौत हो जाती है.उसे पुलिस विभाग से इसलिए निकाल दिया जाता है कि उसने अपने भाई के साथ अपनी पुलिस पावर का बेजा इस्तेमाल किया था.

जिया भी अपने भाई की मौत का जिम्मेदार खुद को मानती है.पर एक दृष्टिहीन लड़की के तौर पर वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को सहज बनाने का प्रयास करती है.इसी बीच शहर में लड़कियों के अपहरण और हत्या की घटनाएं बढ़ने लगती हैं.एक रात जिया सिंह जब अपनी मां (लिलेट दुबे ) से मिलकर वापस आ रही होती है,तो वह एक कैब में लिफ्ट लेती है.पर कुछ देर में उसे अहसास होता है कि वह जिस कार में हैं,उसका ड्ाइवर (पूरब कोहली ) ही अपहरण व हत्या का आरोपी है.

वह किसी तरह खुद को उसके चंगुल से बचाकर पुलिस स्टेशन पहुॅचती है.जहां पदोन्नति पाने की लालसा में पुलिस अफसर पृथ्वी खन्ना (विनय पाठक) ,जिया से सारी बातें जानकर जांच शुरू करते हैं.अपराधी का सुराग देने वाले को इनाम के पोस्टर लग जाते हैं.एक युवक निखिल( शुभम सराफ ) पुलिस स्टेशन पहुॅचकर बताता है कि वह वारदात का चश्मदीद गवाह है.

जिस गाड़ी में लड़की का अपहरण हुआ,वह टैक्सी नही कार थी. जिया टैक्सी बता चुकी हैं.इसलिए पृथ्वी खन्ना,निखिल पर यकीन नही करते.पर दूसरी बार जब पुनः निखिल पुलिस इंस्पेक्टर पृथ्वी खन्ना को फोन कर अपनी बात दोहराता है,तो जिया के कहने पर पृथ्वी उसकी बात पर यकीन कर उससे मिलना चाहते हैं,पर तभी अपराधी ड्ायवर निखिल को बुरी तरह से घायल कर देता है.कैब ड्राइवर एक साइकोपैथ है, जो लड़कियों को अगुवा करके उन्हें मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना देता है.उसके बाद अपराधी व पुलिस के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू हो जाता है.

लेखन व निर्देशनः

एक बेहतरीन कहानी पर अति घटिया फिल्म कैसे बनायी जा सकती है, यह निर्देशक शोम मखीजा से सीखा जा सकता है.एक साइको किलर जब एक अकेली व अंधी तनहा लड़की को शिकार करने की साजिश रचे, तो खौफ और डर की उम्मीद गलत नहीं है.मगर यहां डरन व रोमांच कुछ भी निर्देशक पैदा नही कर पाए.इंटरवल से पहले कहानी अपनी गति से आगे बढ़ती है,मगर इंटरवल के बाद फिल्म न सिर्फ पटरी से उतरती है बल्कि अति सुस्त पड़ जाती है.

दर्शक को लगता है कि फिल्मसर्जक बेवजह कहानी को रबर की तरह खींच रहा है.लेखन भी अधकचरा ही है.किसी भी किरदार का ठीक से रचा ही नही गया है.जिया अनाथाश्रम में क्यों पली बढ़ी?आरियन परेरा तेरह वर्ष से उसका भाई कैसे है,कुछ भी स्पष्ट नही है.सायकोपाथ ड्ाइवर ऐसा क्यों है,इस पर भी फिल्म कोई बात नही करती.जबकि एक दृश्य में उसे स्त्री रोग विशेषज्ञ डाक्टर दिखाया गया है,जो अस्पातल में एक महिला का छोटा सा आपरेशन करता है. फिल्म मेें रोमांच के साथ ही इमोशंस का भी घोर अभाव है.

एडीटिंग की अपनी कमजोरियां हैं.फिल्म के क्लायमेक्स में क्या होगा,इसका अंदाजा तो दर्शक बीस मिनट बाद ही लगा लेता है.

अभिनयः

जिया सिंह के किरदार मेें सोनम कपूर निराश करती हैं.सोनम कपूर किरदार की गहराई को नही समझ पायीं.पुलिस इंस्पेंक्टर पृथ्वी खन्ना के किरदार में विनय पाठक अपनी छाप छोड़ते हैं.मनोरोगी हत्यारे की भूमिका में पूरब कोहली ने अभिनय अच्छा किया है.मगर लेखक व निर्देशक ने उनके किरदार को ठीक से गढ़ा ही नहीं.

Beard बढ़ाने के ये है 7 आसान तरीके, करने होंगे बस ये काम

बियर्ड रखना लड़को में आम बात है वह उनकी खूबसूरती में चार-चांद लगा देता है इतना ही नहीं, बियर्ड आपकी पर्सनेलटी को भी निखारती है. तो ऐसे में ज़रुरी है कि आ बियर्ड रखें या नहीं, लेकिन आप रखना चाहते है तो उसके लिए जरुरी है कि कैसे आप बियर्ड की ग्रोथ बढ़ाए. क्योकि सभी को हेयर ग्रोथ का आर्शीवाद मिला हो ये ज़रुरी नहीं है. वो लोग बड़े किस्मत वाले होते हैं, जिनकी बियर्ड की नैचुरल ग्रोथ होती है. लेकिन क्या आप जानते हैं, कि कुछ ऐसे तरीके हैं जो बियर्ड की तेजी से ग्रोथ करने के लिए अपनाए जा सकते हैं.

आज हम आपको 7 ऐसे तरीकों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो आपको अपनी बियर्ड को तेजी से बढ़ाने के लिए रोजाना करने चाहिए.

1. फेस मसाज लें

चेहरे पर बालों की ग्रोथ के के लिए ये आवश्यक है कि आपके फेस की स्किन का ब्लड सर्कुलेशन अच्छा हो. इस काम में फेस मसाज आपकी मदद कर सकता है. फेशियल मसाज रोलर का उपयोग करने से स्किन के ब्लड सर्कुलेशन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे स्किन में निखार आता है और हेयर ग्रोथ अच्छी होती है.

2. प्रोटीन की मात्रा बढ़ाए

चेहरे पर बालों की ग्रोथ के लिए खाने में पर्याप्त प्रोटीन की भी आवश्यकता होती है. आप अपने खाने में साग के साथ मांस, मछली, अंडे और दूध को शामिल करना शुरू करें. हैल्थी और बैलेंस्ड डाइट से मिलने वाला न्यूट्रिशन आपकी बियर्ड के साथ-साथ आपके शरीर को भी लाभ पहुंचा सकता है. यह भी आवश्यक है कि आप अपने बॉडी मास इंडेक्स को नॉर्मल रेंज में रखें. एक हैल्थी डाइट आपके मौजूदा बालों को भी स्वस्थ और अधिक चमकदार बनाने में मदद कर सकती है.

3. नीलगिरी और आवंला के तेल से करें मालिश

नीलगिरी और आंवला के अर्क वाले तेलों से अपनी दाढ़ी और चेहरे की त्वचा की मालिश करें. इसके अलावा आप उनके साथ मॉइस्चराइजर का भी उपयोग कर सकते हैं.याद रखें कि शुद्ध नीलगिरी का तेल highly concentrated होता है, इसलिए इसे अपनी स्किन और बालों पर उपयोग में लाने से पहले नारियल के तेल, बादाम के तेल या जैतून के तेल के साथ पतला करना याद रखें.

4. दाढ़ी को अकेले छोड़ दें

ये एक बेहद जरूरी कदम है, जिसे हर समय अनदेखा किया जाता है. आप अपनी दाढ़ी को अकेला छोड़ दो और उसके साथ कुछ मत करो. इसे समय दें और इसे अक्सर संवारने या ट्रिम करने से बचें.आपको इसका फल अवश्य मिलेगा, हम पर विश्वास करें.

5. व्यायाम करना शुरु करें

बालों की हेल्थी ग्रोथ का सीधा संबंध आपके स्वास्थ्य से है. यदि आपका शरीर आकार में नहीं है, तो शानदार बियर्ड की अपेक्षा न करें.एक्सरसाइज करना शुरू करें, और यकीन मानिए यह आपको केवल एक शानदार दाढ़ी के अलावा और भी बहुत कुछ देगा. एक्सरसाइज से ब्लड सर्कुलेशन में भी सुधार आता है, जो बियर्ड की ग्रोथ में फायदेमंद होता है.

6. पर्याप्त नींद लें

बियर्ड के मामले में तनाव बेहद खतरनाक हो सकता है. यह आपकी बियर्ड की ग्रोथ को खत्म करने का काम करता है. अब सवाल ये है कि आप तनाव से कैसे छुटकारा पा सकते हैं? रोजाना 8 घंटे की पूरी नींद लेने से. इसे आजमाएं, और देखें कि आपकी बियर्ड बहुत तेजी से बढ़ेगी.

7. अपने चेहरे को साफ और एक्सफोलिएट करें

सप्ताह में कम से कम एक बार हल्के स्क्रब से अपने चेहरे को एक्सफोलिएट करें और सुनिश्चित करें कि आपकी स्किन साफ रहे. सूखी त्वचा और जमी हुई गंदगी आपकी बियर्ड के विकास में बाधा डालती है. अपने चेहरे को गुनगुने पानी से साफ करें. अपने चेहरे के आस-पास के क्षेत्रों में एक्सफ़ोलिएटिंग स्क्रब का उपयोग करें. इसके बाद अपना चेहरा धो लें. एक तौलिये से उसे सुखाएं.इसके बाद अपनी स्किन पर बियर्ड ऑयल लगाएं.

मेरे पति की सेक्स के प्रति रूचि कम हो गई है, कोई उपाय बताएं ?

सवाल

मैं 21 वर्षीय विवाहिता हूं. विवाह को 2 वर्ष हुए हैं और मेरे पति की सेक्स के प्रति अभी से रूचि कम हो गई है. कोई उपाय बताएं, जिस से उन की सेक्स में दिलचस्पी बढ़ जाए. क्या कोई दवा कारगर होगी?

जवाब

सेक्स करने की इच्छा (कामेच्छा) हर व्यक्ति की अलग अलग होती है. इस का कोई निश्चित मानदंड नहीं है. यह व्यक्ति की इच्छा और क्षमता पर निर्भर करती है.

ऐसी कोई दवा नहीं है, जो व्यक्ति की यौनेच्छा को बढ़ा सके. अलबत्ता इस बात पर गौर करें कि आप के पति को अपनी नौकरी या व्यवसाय को ले कर कोई परेशानी तो नहीं है या फिर औफिस में काम का बोझ ज्यादा तो नहीं, क्योंकि कई बार ऐसी किसी परेशानी के कारण भी व्यक्ति का सेक्स करने को मन नहीं करता. थकान की वजह से नींद जल्दी आ जाती है. सेक्स के लिए प्रवृत्त होने के लिए व्यक्ति का तन और मन दोनों का स्वस्थ और सक्रिय होना आवश्यक होता है.

सेक्स करने का ये फायदा शायद ही कोई जानता हो

आज के जमाने में लोग अपनी सेहत को लेकर काफी जागरुक हो गए हैं और महिला और पुरुष अपने वजन को लेकर चौकन्ने रहते हैं. इसके लिए वे न सिर्फ अपने खानपान पर खास ध्यान देते हैं बल्कि फिट रहने के लिए हजारों रुपये भी खर्च करते हैं. लेकिन एक नए शोध के अनुसार अब आपको वजन कम करने के लिए न तो घंटों जिम में जाकर पसीना बहाने की जरूरत है और न ही घंटों जॉगिंग की. सेक्स एक ऐसा जरिया है जो आपको वजन बढ़ने की परेशानी से बचा सकता है.

कई शोधों से यह बात साबित हो चुकी है कि सेक्स करके आसानी से वजन कम किया जा सकता है. सेक्स करने से तेजी से कैलोरी बर्न होती है जिससे वजन कम होता है. हम यहां आपको बता रहे हैं कैसे सेक्स मददगार होता है वजन घटाने में.

एक शोध में यह सामने आया है कि अगर पुरुष 25 मिनट तक सेक्स करे तो इससे वह 101 कैलोरी जला सकता है जबकि इतने ही समय तक सेक्स करके महिला 70 कैलोरी बर्न करती है. इस अध्ययन के मुताबिक जवान और स्वस्थ पुरुष औसतन सेक्स के दौरान एक मिनट में 4.2 कैलोरीज बर्न करते हैं, जबकि ट्रेडमिल में 9.2 कैलोरीज बर्न होती हैं. वहीं महिलाएं सेक्स के दौरान एक मिनट में 3.1 कैलोरीज बर्न करती हैं.

जॉगिंग ही नहीं सेक्स भी जलाती है कैलोरीज

सेक्स करके भी आप अपनी कैलोरी बर्न कर सकते हैं. अपने पार्टनर के साथ एक घंटे तक मस्ती करके आप 70 कैलोरी जलाते हैं. इस एक घंटे में फोरप्ले करके यौन संबंध को मस्ती के साथ और भी रोचक बना सकते हैं. अगर अधिक कैलोरी बर्न करना चाहते हैं तो अपने सेक्स के तरीकों को बदलें.

सेक्स कम करता है चर्बी

नियमित रूप से सेक्स संबंध बनाने से कार्टिसोल का स्तर सामान्य रहता है. कार्टिसोल ऐसा हार्मोन है जो आपकी भूख बढ़ाता है. इस हार्मोन के अधिक स्राव होने के कारण भूख अधिक लगती है. जबकि कार्टिसोल का स्तर कम रहने से शरीर से अतिरिक्त फैट जलता है.

बेहतर सेक्स और खानपान

सेक्स के मामले में अगर आप अपनी इमेज अच्छी रखना चाहते हैं और चाहते हैं कि आपका पार्टनर आपसे खुश रहे तो अपना खानपान जरूर सुधारें. आपको तले हुए खाने से बचना चाहिए और ऐसा भोजन लेना चाहिए जिससे वसा न बढ़ता हो. इसके अलावा फिटनेस पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

सेक्स करता है बीमारियों से बचाव

सेक्स करने से न केवल वजन कम होता है बल्कि कई सामान्य और गंभीर बीमारियों से भी बचाव होता है. सेक्स से हार्ट अटैक की संभावनाएं कम होती हैं और ब्लड प्रेशर भी काबू में रहता है. महिलाओं में मासिक धर्म में परेशानी नहीं होती.

तो अब आप वजन कम करने के लिए बाहर जाने की बजाय अपने पार्टनर को प्यार करें और अपने वजन को काबू में रखें, इससे आपकी सेक्स लाइफ भी खुशहाल रहेगी और आप सेहतमंद भी रहेंगे.

पैसे के लिए वन्यजीवों की तस्करी

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक होने की वजह से पुलिस प्रशासन काफी सख्त था. नतीजा यह हुआ कि अन्य राज्यों की सीमाओं से गुजरने वाले वाहनों पर खास नजर रखी जाने लगी. मीरजापुर के एसपी कलानिधि नैथानी ने भी अपने यहां सभी थानाप्रभारियों को सख्त निर्देश दे रखा था कि बाहर से आने वाले वाहनों पर सख्त नजर रखी जाए. 8 जनवरी, 2017 को यातायात प्रभारी देवेंद्र प्रताप सिंह मंगला सिंह, दिनेश यादव, गोविंद चौबे तथा भरूहना चौकीप्रभारी पंकज कुमार राय के साथ भरूहना चौराहे पर आनेजाने वाले वाहनों की जांच कर रहे थे. जांच के दौरान चुनार-वाराणसी की ओर से आने वाली एक इनोवा कार को रोका गया.

इस की वजह यह थी कि उस की नंबर प्लेट पर इस तरह मिट्टी लगाई गई थी ताकि उस का नंबर जल्दी से दिखाई न दे. सिपाहियों ने कार रुकवाई तो उस में ड्राइवर सहित 3 लोग सवार थे. सिपाहियों ने कार में पीछे झांका तो उस में 4-5 बड़ेबड़े कार्टून रखे दिखाई दिए.

सिपाहियों ने नंबर प्लेट की मिट्टी पैर से हटाई तो पता चला कि कार आंध्र प्रदेश की थी. उस में बैठे लोग संदिग्ध लगे तो पुलिस ने कार में बैठे लोगों से कार की डिक्की खोलने को कहा. जब उन लोगों ने डिक्की खोलने में आनाकानी की तो पुलिस का शक बढ़ गया. पुलिस को मामला कुछ गड़बड़ लगा.

मीरजापुर जनपद नक्सल प्रभावित सोनभद्र और चंदौली जिलों से सटा होने के साथसाथ मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड से ले कर छत्तीसगढ़ के नजदीक है, इसलिए मादक पदार्थों, विस्फोटक पदार्थों से ले कर वन्यजीवों की खाल, अवैध शस्त्र आदि के तस्कर इधर से गुजरते हैं.

इन्हीं बातों को ध्यान में रख कर पुलिस ने थोड़ी सख्ती से डिक्की खोलने को कहा तो ड्राइवर बोला, ‘‘साहब, उस में कुछ खास नहीं है. थोड़ा घरेलू सामान है, जिसे हम घर ले जा रहे हैं.’’

‘‘घरेलू सामान है तो दिखाने में क्या हर्ज है. चलो, तुम डिक्की नहीं खोलना चाहते तो हमीं खोल कर देख लेते हैं.’’ कार के पास खड़े एक सिपाही ने कहा ही नहीं, बल्कि आगे बढ़ कर उस ने डिक्की खोल भी दी. इसी के साथ उस ने कार के पिछले हिस्से में रखे कार्टूनों में से जैसे ही एक कार्टून पर पड़ा बोरा उठाया, अंदर से शेर के गुर्राने जैसी आवाज आई. सिपाही डर कर पीछे हट गया.

जानवर के गुर्राने की आवाज वाहनों की जांच में लगे अन्य पुलिसकर्मियों और अधिकारियों ने ही नहीं, वहां खड़े तमाशा देख रहे अन्य लोगों ने भी सुन ली थी. इसलिए पुलिस अधिकारी जहां कार के करीब पहुंच गए, वहीं तमाशबीन भी नजदीक आ गए थे.

पुलिस अधिकारियों ने जब सभी कार्टूनों पर पड़ा बोरा हटाया तो अंदर जो दिखाई दिया, उसे देख कर सब के सब हैरान रह गए. सभी कार्टूनों में पिंजरे रखे थे, जिन में दुर्लभ प्रजाति के जानवर बंद थे. पुलिस उन्हें गौर से देख रही थी कि तभी मौका पा कर गाड़ी में सवार 3 लोगों में से 2 लोग कार की चाबी ले कर भाग निकले. संयोग से एक आदमी पुलिस के हाथ लग गया.

दुर्लभ वन्यजीवों के साथ एक आदमी के पकड़े जाने की सूचना देवेंद्र प्रताप सिंह ने एसपी कलानिधि नैथानी को देने के साथ पुलिस लाइन से क्रेन मंगवा भी ली. क्रेन की मदद से इनोवा कार संख्या एपी28डी सी-3173 को पुलिस लाइन ले जाया गया.

सूचना पा कर डीएफओ के.के. पांडेय, सीओ (नगर) बृजेश कुमार तथा क्राइम ब्रांच प्रभारी विजय प्रताप सिंह भी पुलिस लाइन पहुंच गए. देखतेदेखते शेर जैसे दिखने वाले दुर्लभ जीव के बरामद होने की सूचना पूरे शहर में फैल गई.

इस के बाद पुलिस लाइन के आसपास की सड़कों पर भीड़ लगने लगी. सूचना पा कर एसपी कलानिधि नैथानी, एएसपी आशुतोष शुक्ल, सीओ बी.के. त्रिपाठी भी पुलिस लाइन पहुंच गए थे. अधिकारियों की उपस्थिति में कार से पिंजरे बाहर निकाले गए. कार की तलाशी में 32 बोर का एक रिवौल्वर और कुछ कारतूस भी बरामद हुए.

इस सब से साफ हो गया कि यह दुर्लभ प्रजाति के जानवरों की तस्करी का मामला है. पुलिस ने इन जानवरों के साथ जिस आदमी को पकड़ा था, उस का नाम अब्दुल आरिफ था. वह हैदराबाद का रहने वाला था. पूछताछ में पता चला कि उस के फरार हुए साथियों के नाम फहीम और इमरान थे.

अगले दिन एसपी कलानिधि नैथानी और वन अधिकारियों की उपस्थिति में पकड़े गए वन्यजीव तस्कर अब्दुल आरिफ से विस्तार से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में उस ने वन्यजीवों की तस्करी से जुड़ी चौंकाने वाली जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी—

आंध्र प्रदेश के जिला हैदराबाद के थाना कालापत्थर का एक गांव है ताड़वन. इसी गांव में मोहम्मद अब्दुल वाशिद अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 2 बेटियां थीं. अब्दुल वाशिद ने समय से सभी बच्चों की शादी कर के अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा ली थी.

शादियां हुईं तो परिवार बढ़ा, परिवार बढ़ा तो खर्चे भी बढ़े. ऐसे में अब्दुल वाशिद के 2 बेटे हैदराबाद जा कर रोजीरोजगार से लग गए. लेकिन सब से छोटे बेटे अब्दुल आरिफ को छोटेमोटे कामों से जैसे नफरत थी. वह हमेशा बड़ा आदमी बनने और करोड़ों में खेलने के सपने देखता था. यही वजह थी कि लोग उसे शेखचिल्ली कहने लगे थे.

इसी सब के चलते उस की मुलाकात फिरोज से हुई. दोनों की सोच एक जैसी थी, इसलिए जल्दी ही उन में दोस्ती हो गई. काम की बात चली तो फिरोज ने कहा, ‘‘मेरा कहा मानो तो मैं तुम्हें एक काम बताऊं. उस में थोड़ा रिस्क तो है, लेकिन पैसा बहुत है. अगर चालाकी से काम किया जाएगा तो रिस्क भी खत्म हो जाएगा.’’

‘‘पहले काम तो बताओ. बिना रिस्क के वैसे भी पैसा कहां मिलता है. अगर मोटी कमाई करनी है तो रिस्क तो उठाना ही पड़ेगा.’’ आरिफ ने कहा.

‘‘काम कोई खास मेहनत का नहीं है, उस में सिर्फ सावधानी की जरूरत है. काम करने लगोगे तो पैसों की बरसात होने लगेगी.’’ फिरोज ने कहा.

‘‘यार पहेलियां मत बुझाओ, काम बताओ. मैं पैसों के लिए कुछ भी कर सकता हूं.’’ आरिफ ने उत्तेजित हो कर कहा.

‘‘काम कोई मुश्किल नहीं है, सिर्फ जंगली जानवरों को कार से ले आना है.’’

‘‘तुम कह रहे हो कि काम कोई मुश्किल वाला नहीं है. मैं जंगली जानवरों को कैसे पकड़ कर लाऊंगा?’’ आरिफ ने हैरानी से कहा.

‘‘जंगली जानवरों को तुम्हें पकड़ना नहीं है. पकड़ेगा कोई और, तुम्हें सिर्फ एक जगह से दूसरी जगह कार से पहुंचाना है. इस के लिए तुम्हें आनेजाने के खर्च के साथसाथ जानवर जरूरत की जगह पहुंचाने के लिए मोटी रकम मिलेगी.’’ फिरोज ने कहा.

फिरोज द्वारा बताया गया यह काम अब्दुल आरिफ को पसंद आ गया तो वह काम करने को तैयार हो गया. इस के बाद फिरोज ने उस की मुलाकात मोहम्मद अब्दुल रहमान से करा दी. वह कालापत्थर के अलीबाग के रहने वाले अब्दुल अजीज का बेटा था. बातचीत के बाद आरिफ काम पर लग गया.

रहमान ने ही आरिफ को फहीम और इमरान के साथ पटना के रहने वाले डब्लू के यहां भेजा. आरिफ और उस के साथी उस इनोवा कार पर वाराणसी से सवार हुए थे. उस कार में जानवर हैं, इस की गंध किसी को न मिले, इस के लिए उस में तेज सुगंध वाला परफ्यूम छिड़क दिया गया था.

इन वन्यजीवों को बिहार से हैदराबाद तक पहुंचाने के लिए आरिफ को 50 हजार रुपए के अलावा रास्ते का पूरा खर्च दिया जाता. इस के अलावा प्रति जानवर 6 हजार रुपए इनाम भी मिलता. लेकिन आरिफ पुलिस को यह नहीं बता सका कि इन जानवरों का क्या किया जाएगा.

पूछताछ के बाद वन्यजीवों को वनविभाग को सौंप दिया गया. आरिफ के बयान के आधार पर देहात कोतवाली में उस के अलावा रहमान, इमरान, डब्लू और फहीम के खिलाफ भादंवि की धारा 9/51, 40, 39डी, 43, 48ए वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत मुकदमा दर्ज कर के आरिफ को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

अब्दुल आरिफ तो पकड़ा गया था, लेकिन उस के साथी फरार हो गए थे. एसपी कलानिधि नैथानी उन्हें भी पकड़ना चाहते थे. उन्हें उन के मोबाइल नंबर आरिफ से मिल गए थे. इसलिए उन्हें पकड़ने के लिए स्वाट, सर्विलांस तथा देहात कोतवाली पुलिस की संयुक्त टीम बना कर उन के पीछे लगा दी गई थी.

इस का नतीजा यह निकला कि 18 जनवरी को भरूहना चौकीप्रभारी पंकज कुमार राय ने आरिफ के साथी फहीम को मीरजापुर रेलवे स्टेशन से पकड़ लिया. पूछताछ के बाद उसे भी जेल भेज दिया गया.

फहीम और आरिफ से पूछताछ में जो जानकारी मिली, उस के अनुसार ये जो जानवर ले जा रहे थे, उन्हें बंगाल के जंगलों से पकड़ा गया था. हैदराबाद इस तरह के जानवरों का बड़ा बाजार है. बिहार और बंगाल के जंगलों से पकड़े गए वन्यजीवों का उपयोग शक्तिवर्धक दवा बनाने में किया जाता है.

इन्हें पकड़ने के लिए पूरा एक रैकेट काम करता है. कुछ वनकर्मियों से भी इन की मिलीभगत होती है. इस रैकेट के बारे में किसी को भी पूरी जानकारी नहीं होती. हर व्यक्ति का काम बंटा होता है और हर आदमी को सिर्फ अपने काम के बारे में जानकारी होती है.

गिरफ्तार आरिफ और फहीम से 6 दुर्लभ प्रजाति के वन्यजीव बरामद हुए थे. इन में 5 कैरेकल कैट (जंगली बिल्ली) तथा 1 लैपर्ड कैट का बच्चा था. इन्हें न्यायालय के आदेश पर लखनऊ स्थित नवाब वाजिद अली शाह प्राणी उद्यान भेज दिया गया था.

इन जंगली जानवरों को हैदराबाद से पानी के जहाज से अन्य देशों में भेजा जाना था. वन्यजीव तस्करों का नेटवर्क भारत ही नहीं, नेपाल तक फैला है. तस्कर अपने एजेंटों के माध्यम से दुर्लभ और खूंखार जानवरों को खरीद कर लाखों कमाते हैं.

खूंखार जंगली जावरों को 10 लाख से एक करोड़ रुपए तक में बेचा जाता है. अब तक ये शेर, कैरेकल (एक प्रकार की जंगली बिल्ली), चीता, तेंदुआ सहित कई अन्य जानवरों की तस्करी कर चुके हैं.

तस्करों के पास से बरामद जंगली बिल्लियां दुर्लभ प्रजाति की थीं. उन की संख्या देश भर में 200 से भी कम है. पता चला है कि कुछ निजी चिडि़याघर चलाने वाले भी ऐसे जानवरों को खरीद कर अपने यहां रखते हैं. इस के लिए वे तस्करों को लाखों रुपए देते हैं.

– कथा पुलिस व मीडिया सूत्रों पर आधारित

जब पति करने लगे ज्यादा सेक्स की मांग

कोरोना की दहशत को एक तरफ रखकर देखें तो तमाम लोगों ने अलग अलग तरीकों से लौकडाउन में जिन्दगी का भरपूर लुत्फ उठाया . जिन्हें खाने पीने का शौक था उन्होंने घर पर ही तरह तरह के पकवान बनाकर खाए और जिन्हें सेक्स के बाबत मूड न होने और वक्त की कमी की शिकायत रहती थी उन्होंने जमकर और मनचाहे तरीकों से सेक्स का मजा लिया , वे बीवियां जो अपने आप से या फिर नजदीकी सहेलियों से इस बात का रोना रहती थीं कि क्या करूं बहिन ये तो दिन भर के थके हारे आते हैं और खाना खाकर बिस्तर पर लुढ़ककर खर्राटे भरने लगते हैं और मैं प्यासी तड़पती रहती हूँ लाक डाउन उन के लिए सेक्स के मामले में वरदान साबित हुआ .

लेकिन यही वरदान भोपाल की रहने बाली सुमित्रा जैसी औरतों के लिए जल्द ही अभिशाप बनने लगा . सुमित्रा का पति चन्दन मंडीदीप की एक दवा फेक्ट्री में काम करता है और खुद सुमित्रा तीन घरों में खाना बनाने जाती है . दोनों की पगार से घर ठीक ठाक तरीके से चल जाता है . चन्दन सुबह 9 बजे घर से निकलता था तो रात के 8 बजे वापस आ पाता था लगभग यही वक्त सुमित्रा के वापस लौटने का होता था . 3  साल के बेटे मुन्नू की देखभाल सास करती थी . दोनों थके हारे होते थे इसलिए खा पीकर 10 बजे तक सो जाते थे .सेक्स के लिए उन्होंने इतवार का दिन तय कर रखा था लेकिन कई बार वे इसमें कुछ वजहों के चलते  चूक भी जाते थे .

लौकडाउन लगा तो शुरू के चार पांच दिन तो दोनों आने बाले वक्त की चिंता में डूबे पैसों का हिसाब किताब लगाते रहे कि पास में जो नगदी है उससे कितने दिन काम चल जाएगा और लाक डाउन जैसी की चर्चा है अगर और लम्बा खिंचा तो फिर क्या करेंगे . चन्दन का फेक्ट्री जाना बंद हो गया था और सुमित्रा को भी कह दिया गया था कि वह कुछ दिन खाना बनाने न आये क्योंकि कोरोना फैलने का डर है और शहर में कर्फ्यू भी लगा हुआ है . पास की किराने की दुकान से चन्दन महीने भर का इकट्ठा राशन खरीद कर ले आया था जिससे दोनों बेफिक्र यह सोचते हो चले थे कि अब आगे जो होगा सो देखा जाएगा .

गलत शुरुआत –

अब दोनों की दिनचर्या बदल गई थी और काम पर जाने का टेंशन भी  खत्म हो गया था . छठे दिन सुबह चन्दन देर से उठा उस वक्त सुमित्रा बाथरूम से नहा कर निकली ही थी कि उसे पेटीकोट और ब्रा में देख चन्दन की कनपटियाँ गर्म हो उठीं ,  उसने सुमित्रा को फ़िल्मी स्टाइल में गोद में उठाकर बिस्तर में ला पटका और भूखे शेर की तरह उस पर टूट पड़ा . दोनों करीब एक घंटा बिस्तर में रहे और जब अलग हुए तो उन्हें महसूस हुआ कि मुद्दत बाद हमबिस्तरी का सही मजा आया है . सुमित्रा जब कपडे पहनकर रसोई की तरफ जाने लगी तो चन्दन शरारत से बोला यह तो ट्रेलर था असली फिल्म तो रात को शुरू होगी .

सुमित्रा को तो अपने कानों पर यकीन ही नहीं हो रहा था कि यही वह चन्दन है जो इतवार की रात एक बार के बाद ही पस्त होकर कहता था कि बस हो गया अब सोउंगा सुबह फेक्ट्री जाना है तू भी सो जा थक गई होगी अब वह कैसे चंदन को बताती कि वह थकी नहीं है बल्कि और थकना चाहती है पर पति की हालत देख खामोश रह जाती थी और आज सुबह सुबह ही इतनी थक गई थी कि और सो जाने को मन कर रहा था . घर के काम करते करते वह रात का इंतजार वैसे ही करने लगी जैसे शादी के बादके दिनों में करती थी .

रात हुई तो चन्दन ने फिर उसे दबोच लिया वह खुद भी इसके लिए बैचेन थी और पति का पूरा साथ दे रही थी . कुछ देर बाद चन्दन ने मोबाइल उठाकर उसे एक ब्लू फिल्म दिखाई और बोला चल अब यह ट्राई करते हैं . सुमित्रा उस दिन वाकई वैसे ही थक गई थी जैसा की चाहती रहती थी लेकिन चन्दन को बुरा न लगे इसलिए उसने खुद को उसके हवाले कर दिया और जैसा वह कहता गया वैसा वैसा करती गई . उस रात कोई 4 बजे वे सोये .

फिर तो यह रोज सुबह , दोपहर और रात का सिलसिला हो गया अब हालत यह थी कि वह हमबिस्तरी से बचना चाहती थी लेकिन चन्दन के सर जाने कौन सा भूत सवार हो गया था कि उसे सेक्स और सेक्स के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं था . कोई काम धाम या चिंता तो थे नहीं लिहाजा उसका खाली दिमाग शैतान का तो नहीं लेकिन सेक्स का घर जरुर हो चला था .  सुमित्रा यह सोच कर पति को मना नहीं कर पाती थी कि कहीं उसे बुरा न लग जाए क्योंकि उसे भी तो शादी के 6 साल बाद ऐसा सुनहरी मौका हाथ लगा है . लेकिन यह कितनी गलत शुरुआत थी इसका एहसास और पछतावा अब सुमित्रा को हो रहा है .

जब टूटी परेशानियां –

कुछ दिन बाद सुमित्रा को प्राइवेट पार्ट में दर्द हुआ तो वह घबरा उठी गौर से देखने पर पता चला कि उस पर हलकी सी सूजन भी है .यह बात उसने चन्दन को बताई तो वह बोला अब कुछ दिन हमबिस्तरी बंद कर लेते हैं और दो चार दिन में डाक्टरनी को दिखा लेंगे हालाँकि अभी डाक्टर्स भी मरीजों को नहीं देख रहे हैं . लेकिन चन्दन एक दिन ही अपने वादे पर कायम रह पाया और दूसरे दिन सुमित्रा से बोला यार बर्दाश्त नहीं हो रहा है अब आदत पड़ गई है . सुमित्रा ने समझा बुझा कर और अपनी हालत का हवाला देकर उसे टरकाया लेकिन यह सोचकर वह काँप उठी कि अगर लाक डाउन के बाद भी पति की आदत नहीं सुधरी तो लेने के देने पड़ जायेंगे यह सोचकर भी उसे घबराहट होने लगी कि अगर वह चन्दन को सेक्स सुख नहीं दे पाई तो वह इधर उधर मुंह मारने लगेगा अब वह उस घडी को भी कोस रही थी जब उसने पति का जोर शोर और जोश से साथ दिया था.

सहेली काम आई

इत्तफाक से दूसरे दिन ही उसकी खास सहेली निम्मी घर आई तो उसने सारी बात उसे बताई . निम्मी ने उसे बताया कि तेरे शौहर का अभी तो यह हाल हुआ है मेरा तो शादी के वक्त से ही ऐसा है उसे रोज वक्त वेवक्त सेक्स करना रहता है जिससे मैं परेशान रहती हूँ कभी कभार वह सेक्स पावर बढ़ाने बाली गोलियां खा लेता है इससे एक बार तो उसका अंग छिल गया था और उसमे दाने भी पड़ गए थे  . कई बार मेरे साथ भी ऐसा हुआ कि अंग पर सूजन आ गई दर्द भी खूब हुआ इससे बचने यानी उसे संतुष्ट करने मैं हाथ और मुंह से उसे संतुष्ट करने लगी हूँ तू भी यही ट्रिक अपना और उसे समझा कि ज्यादा सेक्स से हम औरतों पर क्या बीतती है .

सुमित्रा ने इन तरीकों को आजमाया जो एक हद तक कारगर भी रहे लेकिन अब लाक डाउन के बाद भी चन्दन हर कभी कुदरती सेक्स की मांग करने लगता है तो वह दिक्कत में पड़ जाती है और निम्मी की बताई ट्रिक अपनाती है . पहले पति के संग के लिए बेताब रहने बाली सुमित्रा अब सेक्स के नाम से ही डरने लगी है .12 बी तक पढ़ी लिखी निम्मी ने ही उसे बताया था कि बात तेरे या मेरे पति की ही नहीं बल्कि दुनिया भर की कई औरतें पति की बढ़ती सेक्स मांग से परेशान हैं लाक डाउन के दौरान तो अफ्रीका की कई औरतों ने सरकार से मांग की थी कि लाक डाउन बंद किया जाए और पतियों को काम पर भेजा जाए क्योंकि वे फुर्सत के चलते  दिन रात सेक्स के लिए उतावले रहते हैं .

यह करें

पति जब जरुरत से ज्यादा सेक्स की मांग करने लगे तो पत्नियों को इन बातों पर अमल करना चाहिए –

– सेक्स का टाइम टेबिल बनायें कि यह हफ्ते में एक या दो बार ही होगा.

– इस पर भी वह जिद करे तो हाथ या मुंह से उसे संतुष्ट करें लेकिन इस दौरान साफ़ सफाई का ध्यान रखें .

– पति को समझाएं कि ज्यादा सेक्स दोनों की सेहत के लिए नुकसानदेह है इससे संक्रमण यानी इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है .

– सेक्स के माहिर डाक्टर यह मशवरा देते हैं कि हमबिस्तरी साल में 54 बार यानी महीने में 4 – 5 बार करना ठीक रहता है .

– पति जब सेक्स की इससे ज्यादा मांग करने लगे तो उसे शह न दें और न ही उसकी बात माने इससे आप पेट से भी हो सकती हैं अगर बच्चा न चाहिए हो तो खामोख्वाह की झंझट पैदा हो जाती है और रिश्ते पर भी बुरा फर्क पड़ता है.

– पति अगर सेक्स पावर बढ़ाने बाली दवाइयां लेने लगे या नशा करने लगे तो उसे इसके खतरे समझाएं सेक्स कुदरती तौर पर ही करने पर असली सुख देता है.

– पति को ब्लू फ़िल्में देखने से रोकें और खुद तो इसमें उसका साथ बिलकुल न दें.

– पति को रोजाना कसरत के लिए कहें और खानपान सादा रखें ज्यादा मिर्च मसाले बाला खाना सेक्स और सेहत दोनों के लिए नुकसानदेह होता है.

– इस पर भी बात न बने तो पति को शहर के काबिल सेक्स डाक्टर के पास ले जाएँ नीम हकीमों के चक्कर में तो बिलकुल न पड़ें.

शिकस्त : शाफिया-रेहान के रिश्ते में दरार क्यों आने लगी

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