वह रात : क्या था उस रात का राज – भाग 1

बरसात तो रामपुर से ही शुरू हो गई थी, इसलिए मूड कुछ उखड़ाउखड़ा सा हो रहा था. महीने का दूसरा शनिवार आ रहा था. रविवार को मिला कर 2 छुट्टियां हो जाती थीं. सोचा कि गांव ज्यादा दूर तो नहीं है, चाची के पास जाना चाहिए.

चाची से मेरी बहुत पटती थी. चाची मुझ से बहुत प्यार करती थीं. हमेशा से मेरी हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखती थीं.

चाची तो कई बार बुला चुकी थीं, लेकिन नौकरी के चलते मेरा गांव जाना हो नहीं पाता था.

आबोहवा के हिसाब से हिमाचली हमारे छोटे से गांव ‘गौरा’ का क्या कहना. साढ़े 7 हजार फुट की ऊंचाई से शुरू हो कर 9 हजार फुट तक में फैले इस इलाके को गरमियों के मौसम में स्वर्ग ही कहा जा सकता है. बस, जरा सी बरसात होने की देर है, झट से स्वेटरशौल निकल आएंगे.

मेरे पापा बिजली महकमे के फील्ड स्टाफ में थे, इसलिए उन को तो ड्यूटी पर हाजिर होना बहुत जरूरी था.

मैं बैंक में मुलाजिम थी, वह भी क्लर्क.

मेरे गांव जाने की बात सुन कर सभी चौंक गए. मैं ने इस बार अपनी सहेली तनु को भी अपने साथ गांव चलने के लिए तैयार कर लिया था.

सुनंदा चाची, मेरी सगी चाची जरूर थीं, पर वे चाची कम और सहेली ज्यादा थीं. मां ने बताया था, ‘जब सुनंदा ब्याह कर आई थी, तब ‘तू’ सिर्फ 5 साल की थी और सुनंदा चाची 14 की.’

इस तरह वे मुझे से ज्यादा बड़ी भी नहीं थीं. मां ने कई बार मुझे दुनियादारी सिखाने और चाची को चाची समझाने की सीख देने की कोशिश की, लेकिन हर बार चाची आड़े आ जातीं. शायद उन्हें अपना छिनालुटा बचपन याद आता होगा.

चाची मां से कहती थीं, ‘जाने दो न दीदी, बच्ची है. हमारे दम पर लापरवाही नहीं करेगी, तो फिर किस के दम पर करेगी?’

मैं कई बार मां से सवाल कर बैठती, ‘मां, 14 साल की उम्र क्या किसी लड़की की शादी की उम्र होती है?’

‘बेटी, सब समयसमय की बात है. जब हम लोगों की शादियां हुई थीं, उस समय 14 साल की लड़की जवान होती थी, आज बच्ची होती है,’ कहते हुए मां एक ठंडी सांस भर कर रह जातीं.

अपनी यादों के साथ बस में मैं और तनु बातचीत कर ही रही थीं कि अचानक बस झटके से रुक गई. आगे बहुत सी गाडि़यां सड़क पर खड़ी थीं. पता चला कि आगे सड़क टूटी हुई है.

शहर से गांव महज 16 किलोमीटर ही तो था, लेकिन अब मुझे अफसोस होने लगा कि मैं ने क्यों किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया और अपने साथ तनु को भी फंसा दिया.

मैं ने तनु की तरफ देखा. मुझे लग रहा था कि अब वह भड़क जाएगी, लेकिन उस ने हंस कर कहा, ‘‘चलो, नीचे उतर कर देखते हैं कि माजरा क्या है?’’

हमारे पास छोटेछोटे बैगों में एकएक सूट और छोटे बच्चों के लिए थोड़ी सी टौफियां थीं. हम ने बैग उठा कर कंधे पर लटका लिए और बस से नीचे उतर गईं.

बस से आगे खड़े ट्रक को पार करने के बाद हम ने देखा कि सड़क पर ढेर सारा मलबा गिरा हुआ था, जिसे मजदूर साफ कर रहे थे. वहां खड़े जूनियर इंजीनियर ने बताया कि इसे साफ करने में कम से कम 2 दिन तो लगेंगे ही, मतलब 2 दिन तक बसें बंद.

हम ने देखा कि मलबे के दूसरी ओर भी उतनी ही गाडि़यां खड़ी थीं. हमें लगा कि अब घर तक पैदल ही जाना पड़ेगा, जो कि वहां से 8 किलोमीटर दूर है.

अभी हम लोग आगे चल ही रहे थे कि पीछे से तकरीबन भाग कर आने वाले मुसाफिरों ने बताया कि इस ओर खड़ी बस हम लोगों को ले जाएगी और हमारे वाली बस इस बस की सवारियों को रामपुर ले जाएगी.

थोड़ी ही देर में उधर के सारे मुसाफिर इधर की बस में बैठ चुके थे. हम आधे घंटे बाद घर में थीं.

चाची हमें देख कर बहुत खुश हुईं. उन्होंने मेरी मनपसंद खीर बना दी थी. पहाड़ी उड़द की दाल और मीठा चावल बनाया था. चाची को पता था कि मीठे चावल मुझे बहुत पसंद हैं.

खाना खा कर हम लोग चाची के कमरे में ही आ धमके थे और उन के डबल बैड पर बैठ गए. चाची भी हमारे साथ ही आ बैठी थीं. हम लोग बहुत देर तक बातें करते रहे. पूरे शहर के, आसपास के 10 गांवों के किस्सों को हम ने आपस में बांटा. चाची थकी हुई थीं. बरसात के चलते हम लोग कुछ जल्दी सो गए.

हमें सोए अभी मुश्किल से आधा घंटा ही हुआ होगा कि बाहर से किसी के पुकारने की आवाज आई, ‘‘कोई है? दरवाजा खोलिए…’’

आधी रात, जोर की बरसात, पहाड़ का मौसम… इस समय कौन होगा?

चाची उठतीं, इस से पहले मैं बोल उठी, ‘‘आप आराम करिए चाची. मैं देखती हूं.’’

पर मैं उठती, इस से पहले ही साथ वाले कमरे का दरवाजा खुला और

चाची का 17 साला बेटा हरीश बाहर निकल आया और बोला, ‘‘कौन है इतनी रात को?’’

‘‘बाबूजी, हम मुसाफिर हैं. रामपुर जा रहे थे. जोर की बरसात हो रही है. रातभर के लिए थोड़ी सी सोने के लिए जगह दे दीजिए. सुबह होते ही हम चले जाएंगे. आप की बड़ी दया होगी,’’ अंधेरे में एक आवाज उभरी.

‘‘रामू…’’ हरीश हैरान होते हुए बोला, ‘‘तू इस समय कहां से आ

रहा है?’’

‘‘अरे साहब, यह आप का घर है. मुझे तो पता ही नहीं था. चलो, अच्छा हुआ. अब हमें रातभर के लिए रहने को जगह मिल जाएगी.’’

‘‘कौन है हरीश?’’ चाची ने तेज आवाज लगाई.

‘‘कोई नहीं है मां, तुम सो जाओ भीतर जा कर,’’ हरीश ने भीतर की ओर देखते हुए कहा, पर हम तीनों तो बाहर निकल आई थीं.

नीचे बाहर खुले आंगन में मूसलाधार बरसात में भीगते हुए 3 शख्स खड़े थे, जो सर्दी से ठिठुर भी रहे थे.

‘‘पर तू ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया रामू,’’ हरीश ने हमें देख कर भी अनदेखा कर दिया.

‘‘साहब, मैं काम से मशनू गांव गया था. वापस रामपुर लौटने में रात तो हो ही गई थी, पर मैं ने सोचा कि कोई बात नहीं, टौर्च है, चले जाएंगे.

BB OTT2: आधी रात को मनीषा रानी ने किया कुछ ऐसा, भागते नजर आए एल्विश यादव

बिग बॉस ओटीटी 2 इन दिनों काफी मजेदार चल रहा है शो में हर दिन कुछ एंटरटेनिंग देखने को मिल रहा है वही, शो में मनीषा रानी, एल्विश यादव और अभिषेक मल्हान मस्ती करते नजर आते है तीनों की कमेस्ट्री लोगों को खूब पसंद आती है. तीनों अक्सर शो में मस्ती करते हुए देखे जाते है वही, मनीषा रानी एल्विश के साथ हमेशी फ्लर्ट करती हुई नजर आती है हाल ही में, मनीषा ने देर रात एल्विश को परेशान किया उनके साथ फ्लर्ट करती हुई दिखाई दी.

 

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आपको बता दें, कि घर की लाइट बंद हो जाने के बाद एल्विश अपने बेड की तरफ सोने चले जाते है वही, मनीषा रानी उनके पीछे-पीछे जाती है और उनके बेड के पास जाकर कहती है कि देखिए मनचले जी आज तो हम तभी सोने जाएंगे जब आप हमे हग देंगे. इसके बाद एल्विश हाथ जोड़कर कहते है कि मेरी मां मुझे छोड़ दे, मैं कोई हग नहीं देने वाला. तो मनीषा कहती है कि नहीं आपको हग देनी ही होगी और अगर आप सो गए तो हम आपके साइड में आकर सो जाएंगे.मनीषा बार -बार एल्विश के पास आती है और एल्विश भागने लगते है कभी एल्विश बेड के ऊपर चढ़ते है तो कभी हाथ जोड़कर मनीषा को जाने के लिए कहते है.

मनीषा करती है डिमांड

इसके बाद मनीषा कहती है कि सो जाओ आप अब हम आपको परेशान नहीं करेंगे. इसके बाद मनीषा एल्विश को फ्लाइंग किस करती है और कहती है कि फ्लाइंग किस दे दो.रियल लाइफ में तो आपसे किस की उम्मीद नहीं है फिर एल्विश मुठ्ठी बंद करके फ्लाइंग किस देते है ये सब देखना बेहद ही फनी रहा था.

 

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मनीषा रानी एल्विश को लेकर अपनी बातें क्लीयर करती है और कहती है कि हम आपके साथ बस मस्ती करते है हमे ऐसा करना अच्छा लगता है. मुझे गलत मत समझिए. मैं सिर्फ फ्लर्टिंग करती हूं.मुझे पता है कि आप किसी को बहुत चाहते है लेकिन आपकी लाइफ में वह होती नहीं तो भी मैं सीरियसली लव नहीं करती. क्योकि ऐसे किसी को कुछ दिनों में हम दिल नहीं दे सकते है पहले किसी को जानेंगे फिर प्यार करेंगे. लेकिन हम आपके साथ फ्लर्ट करना बंद नहीं करेंगे, हम आखिर तक ऐसे ही करते रहेंगे.

YRKKH: घर पहुंचा अभीर, अभिमन्यु से की ये बड़ी डिमांड

इन दिनों शो ये रिश्ता क्या कहलाता है में ढेर सारा ट्विस्ट देखने को मिल रहा है बीते एपिसोड में अभिनव घर से गायब हो गया था जिससे ढ़ूंढने के लिए अभिमन्यु ने लाखों का इनाम रखा था, लेकिन अब सबके लिए खुशखबरी है कि अभिनव वापस घर आ गया है जिस खुशी में मंजरी कचौडिया बनाएंगी.

एपिसोड़ की शुरुआत में दिखाया जाएंगा कि अभीर एक फुटबॉल पर हेल्प अभीर लिखकर कीक मारता है. जो कि बॉल अभिमन्यु और अक्षरा के पास पहुंच जाएंगी. दोनों ढ़ूढंते-ढूढ़ंते शिव मंदिर पहुंच जाते है जहां उनकी मुलाकात अभिनव से होती है अभीर को देखते ही अक्षरा उसे अपने गले से लगा लेती है. वह अभीर को बताएंगी कि वह और अभिनव उससे बहुत प्यार करते है. इससे के बाद अक्षरा और अभिमन्यु , अभीर को अपने साथ बिडला हाउस ले जाएगें. जिससे सुन अभीर बहुत खुश हो जाता है.

 

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अभीर के घर पहुंचने पर खुश होगा सारा घर

अभीर को देखते ही सबके चहरे पर चमक आ जाती है सभी काफी खुश हो जाते है.सब अभीर का समझाएगे कि ऐसे बिना बताए घर से नहीं जाना है. एक तरफ जहा सभी अभीर को प्यार कर रहे है तो दूसरी तरफ मंजरी को अपनी गलती का एहसास होगा. वह रोने लगेगी और वहा से चली जाएगी.जब अभीर सबसे मिल लेगा तब वह मंजरी को ढ़ूढ़ने लगेगा. वह कहेगा कि दीदी क्या मुझसे गुस्सा है वह मुझसे मिलने नहीं आई. अक्षरा तभी मंजरी को कोने पर खड़ा रोते हुए देख लेगी और अभीर के पास ले जाएगी.

मंजरी अभीर से माफी मांगेगी, लेकिन अभीर माफ करने से मना कर देता है और कहता है कि अगर आप मेरे लिए कचौडिया बनाएंगी तभी माफ करुंगा, ये सब सुनकर सब हंसने लगते है वही कचौड़ी खाते वक्त अक्षरा का मंगसूत्र टूट जाएगा. वह अभिनव के लिए परेशान होने लगेगी, अभिनव का फोन भी नहीं लगेगा, तभी दरवाजे पर अभिनव आ जाता है. वह अभीर को अपने गले से लगा लेगा और डांट भी लगाएंगा. रूही सबको चुप कराएगी और कहेगी कि अभीर के आने की खुशी में केक काटेंगे. अभीर केक काटने से पहले फिश मांगेगा, कि वह अपने मम्मी-पापा के साथ कसौली वाले घर में रहूं. वह अभिमन्यु के पास जाएगा और कहेगा कि सॉरी डैडा , मैं आपसे बहुत प्यार करता हूं, आप बेस्ट हो लेकिन मेरे मम्मी-पापा बेस्ट से भी बेटर है. कोर्ट वाली आंटी मेरी बात नहीं मानेंगी आप तो मान जाओं. इस बात से अभिमन्यु का दिल टूट जाएगा.

एक युग: सुषमा और पंकज की लव मैरिज में किसने घोला जहर?- भाग 1

‘‘कहो सुषमा, तुम्हारे ‘वे’ कहां हैं? दिखाई नहीं दे रहे, क्या अभी अंदर ही हैं?’’

‘‘नहीं यार, मैं अकेली ही आई हूं. उन्हें फुरसत कहां?’’

‘‘आहें क्यों भर रही है, क्या अभी से यह नौबत आ गई कि तुझे अकेले ही फिल्म देखने आना पड़ता है? क्या कोई चक्करवक्कर है? मुझे तो तेरी सूरत से दाल में काला नजर आ रहा है.’’

‘‘नहीं री, यही तो रोना है कि कोई चक्करवक्कर नहीं. वे ऐसे नहीं हैं.’’

‘‘तो फिर कैसे हैं? मैं भी तो जरा सुनूं जो मेरी सहेली को अकेले ही फिल्म देखने की जरूरत पड़ गई.’’

‘‘वे कहीं अपनी मां की नब्ज पकड़े बैठे होंगे.’’

‘‘तेरी सास अस्पताल में हैं और तू यहां? पूरी बात तो बता कि क्या हुआ?’’

‘‘जया, चलो किसी पार्क में चल कर बैठते हैं. मैं तो खुद ही तेरे पास आने वाली थी. इन 3-4 महीनों में मेरे साथ जो कुछ गुजर गया, वह सब कैसे हो गया. मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आता,’’ कहते हुए सुषमा सिसक पड़ी.

‘‘अरे, तू इतनी परेशान रही और मुझे खबर तक नहीं. ब्याह के बाद तू इतनी बदल जाएगी, इस की तो मुझे आशा ही नहीं थी. जिंदगीभर दोस्ती निभाने का वादा इसी मुंह से किया करती थी?’’ सुषमा की ठोड़ी ऊपर उठाते हुए जया ने कहा, ‘‘मैं तो तेरे पास नहीं आई क्योंकि मैं समझ रही थी कि तू अपनी ससुराल जा कर मुझे भूल ही गई होगी. पर तू चिंता मत कर, मुझे पूरी बात तो बता. मैं अभी कोई न कोई हल निकालने का प्रयास करूंगी, उसी तरह जैसे मैं ने तुझे और पंकज को मिलाने का रास्ता निकाल लिया था.’’

अपनी इस प्यारी सहेली को पा कर सुषमा ने आपबीती बता कर मन का सारा बोझ हलका कर लिया.

पार्वती के पति 10 वर्ष पहले लकवा के शिकार हो कर बिस्तर से लग गए थे. इन 10 वर्षों में उस ने बड़े दुख झेले थे. उस के पति सरकारी नौकरी में थे. अत: उन्हें थोड़ी सी पैंशन मिलती थी. पार्वती ने किसी तरह स्कूल में शिक्षिका बन कर बच्चों के खानेपीने और पढ़नेलिखने का खर्च जुटाया था. 2 जोड़ी कपड़ों से अधिक कपड़े कभी किसी के लिए नहीं जुट पाए थे.

उस पर इकलौते बेटे पंकज को पार्वती इंजीनियर बनाना चाहती थी. गांव की थोड़ी सी जमीन थी, वह भी उन्हें अपनी चाह के लिए बेच देनी पड़ी. एकएक दिन कर के उन्होंने पंकज के पढ़लिख कर इंजीनियर बन जाने का इंतजार किया था. बड़ी प्रतीक्षा के बाद वह सुखद समय आया जब पंकज सरकारी नौकरी में आ गया.

पंकज के नौकरी में आते ही उस के लिए रिश्तों की भीड़ लग गई. उस भीड़ में न भटक कर उन्होंने अपने बेटे के लिए बेटे की ही पसंद की एक संपन्न घर की प्यारी सी बहू ढूंढ़ ली. सुषमा बहू बन कर उन के घर आई तो बरसों बाद घर में पहली बार खुशियों की एक बाढ़ सी आ गई.

पार्वती ने बहू को बड़े लाड़प्यार से अपने सीने से लगा लिया. छुट्टी खत्म होने पर पंकज ने सुषमा से कहा, ‘‘सुमी, मां ने बहुत दुख झेले हैं. तुम थोड़े दिन उन के पास रह कर उन का मन भर दो. मैं हर सप्ताह आता रहूंगा. घर मिलते ही तुम्हें अपने साथ ले चलूंगा.’’

पंकज की बहनें दिनभर सुषमा को घेरे रहतीं. वे उसे घर का कोई भी काम न करने देतीं. सुषमा उन की प्यारी भाभी जो थी. सुषमा को प्यास भी लगती तो उस की कोई न कोई ननद उस के लिए पानी लेने दौड़ पड़ती.

पार्वती के तो कलेजे का टुकड़ा ही थी सुषमा. उस के आने से पूरा घर खुशी से जगमगा उठा. पार्वती उसे प्यार से ‘चांदनी’ कहने लगी. सुषमा के सिर में दर्द भी होता तो वे तुरंत बाम ले कर दौड़ पड़तीं.

धीरेधीरे पंकज के विवाह को 2 महीने बीत गए थे. इस बार जब पंकज घर आया तो सुषमा ने कहा, ‘‘मैं भी तुम्हारे साथ ही चलूंगी. अब मुझे यहां अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘बस, अगले महीने ही तो घर मिल जाएगा, मैं ने तुम्हें बताया तो था…फिर तुम्हें यहां कौन छोड़ जाएगा?’’

‘‘तो तब तक हम लोग अपने पिताजी के घर रह लेंगे. मां और पिताजी कितने खुश होंगे. इतना बड़ा बंगला है.’’

‘‘नहीं सुषमा, मैं घरजमाई बन कर नहीं रह सकता. यह मुझ से नहीं होगा. यह मैं ने तुम से पहले भी कह दिया था कि मुझ से कभी इस तरह की जिद न करना.’’

‘‘मैं कुछ नहीं जानती. मैं गैस्ट हाउस में ही तुम्हारे साथ रहूंगी.’’

‘‘सुमी, जिद नहीं करते. वहां सभी अकेले रहते हैं. तुम्हारा वहां साथ चलना ठीक नहीं है. बस, थोड़े ही दिनों की तो बात है. क्या मां और बहनें तुम्हें प्यार नहीं करतीं? बस, मैं यों गया और यों आया,’’ पंकज की गाड़ी का समय हो रहा था. वह सुषमा से विदा ले कर चला गया.

पंकज 4 बहनों का अकेला भाई था. आज छोटी का जन्मदिन था. पंकज को गए 3-4 दिन हो गए थे. पार्वती चौका समेट कर बिस्तर पर जो लेटीं तो लेटते ही उन्हें नींद आ गई.

Raksha Bandhan : बड़े भैया- भाग 1

बड़े भैया ने घूर कर देखा तो स्मिता सिकुड़ गई. कितनी कठिनाई से इतने दिनों तक रटा हुआ संवाद बोल पाई थी. अब बोल कर भी लग रहा था कि कुछ नहीं बोली थी. बड़े भैया से आंख मिला कर कोई बोले, ऐसा साहस घर में किसी का न था.

‘‘क्या बोला तू ने? जरा फिर से कहना,’’ बड़े भैया ने गंभीरता से कहा.

‘‘कह तो दिया एक बार,’’ स्मिता का स्वर लड़खड़ा गया.

‘‘कोई बात नहीं,’’ बड़े भैया ने संतुलित स्वर में कहा, ‘‘एक बार फिर से कह. अकसर दूसरी बार कहने से अर्थ बदल जाता है.’’

स्मिता ने नीचे देखते हुए कहा, ‘‘मुझे अनिमेष से शादी करनी है.’’

‘‘यह अनिमेष वही है न, जो कुछ दिनों पहले यहां आया था?’’ बड़े भैया ने पूछा.

‘‘जी.’’

‘‘और वह बंगाली है?’’ बड़े भैया ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए पूछा.

‘‘जी,’’ स्मिता ने धीमे स्वर में उत्तर दिया.

‘‘और हम लोग, जिस में तू भी शामिल है, शुद्ध शाकाहारी हैं. वह बंगाली तो अवश्य ही मांस, मछली खाता होगा?’’

‘‘जी,’’ स्मिता ने सिर हिलाया.

‘‘यह शादी नहीं हो सकती,’’ बड़े भैया ने गरज कर कहा.

‘‘क्यों बड़े भैया?’’ स्मिता ने साहस जुटा कर पूछा.

‘‘क्यों, क्या दिखाई नहीं देता? एक उत्तर तो दूसरा दक्षिण. एक पूरब तो दूसरा पश्चिम. कहां है मेल इस में?’’ बड़े भैया ने डांट कर पूछा, ‘‘कैसे रह पाएगी उस वातावरण में?’’

‘‘पर हम दोनों ने एकदूसरे से शादी करने का फैसला कर लिया है. क्या यह मेल नहीं है?’’ स्मिता ने दृढ़ता से उत्तर दिया.

‘‘अच्छा तो तू इतनी बड़ी हो गई है कि अपने फैसले स्वयं करेगी. लगता है तू अपने को विश्वसुंदरी समझने लगी है कि जो चाहे, कर लेगी,’’ बड़े भैया ने व्यंग्य से कहा. स्मिता यह सोच कर चुप रही कि उत्तर देगी तो वे और भड़क जाएंगे. उन का

टेप एक बार चालू होता है तो फिर बंद नहीं होता. कोई उत्तर न पा कर बड़े भैया ने पूछा, ‘‘और अगर मैं शादी की मंजूरी नहीं दूं तो?’’

‘‘तो हम कोर्ट में शादी करेंगे,’’ स्मिता का विद्रोह भड़क उठा.

‘‘शाबाश बेटी,’’ भैया ने ताली बजाते हुए कहा, ‘‘तू ने मेरी इज्जत रख ली. अगर मैं शादी के लिए हामी भर देता हूं तो लोग हजार सवाल करेंगे. मैं जवाब देतेदेते थक जाऊंगा.’’ स्मिता को सहसा विश्वास नहीं हुआ कि बड़े भैया समर्थन कर रहे हैं या तीखा व्यंग्यबाण छोड़ रहे हैं. उन से किसी बात की, कभी भी उम्मीद की जा सकती थी. स्मिता दुविधा में पड़ गई.

‘‘अब क्या हुआ? चुप क्यों हो गई?’’ बड़े भैया ने डांट कर पूछा.

स्मिता ने डरतेडरते कहा, ‘‘आप नाराज हो गए.’’

‘‘हां, नाराज होने की बात ही है. अच्छी तरह से फै सला कर लिया है न? ऊंचनीच सब सोच लिया है न?’’ भैया ने कहा, ‘‘बाद में पछताएगी तो नहीं?’’

‘‘जी नहीं,’’ संक्षिप्त उत्तर दिया.

‘‘तो जाओ, कोर्ट में शादी कर आओ. मैं तुम दोनों को आशीर्वाद दे दूंगा,’’ बड़े भैया ने भी अपना निर्णय सुना दिया. स्मिता का दिल डूब गया. स्वीकृति पा कर वह प्रसन्न नहीं हुई. हर लड़की की तरह वह भी वधू बन कर पूरी साजसज्जा और शृंगार के साथ विदा होने की अभिलाषा रखती थी. यह तो बिलकुल ऐसा ही होगा कि टिकट ले कर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर पहुंच गई. जब तक विद्रोह की स्थिति में थी, बहुत ऊंचाऊंचा सोचती थी और अब असलियत सामने आई तो दिल बैठ गया. सारे सपनों का रंग फीका पड़ने लगा. बड़े भैया 7 भाईबहनों में सब से बड़े थे और शायद इसीलिए यह नाम उन के व्यक्तित्व और ऊंचे दरजे के कारण उन के चेहरे पर चिपक गया था. मातापिता के गुजर जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी उन के कंधों पर आ गई थी. 2 भाइयों की शादी तो पिता ने ही कर दी थी. मरने से पहले 2 बहनों की शादी तय कर दी थी. ये सब काम बड़े भैया ने ही किए हैं. इस बात की उन्हें प्रशंसा भी मिली. समय से तीसरी बहन की भी शादी कर दी. इसी समय उन की पत्नी का देहांत हो गया. उन की अपनी कोई संतान न थी. अब रह गई सब से छोटी बहन स्मिता, जो उन से 15 वर्ष छोटी थी. उन के बीच भाईबहन का नहीं, एक पितापुत्री का रिश्ता था. दोनों घर में अकेले थे क्योंकि अन्य बहनें ससुराल चली गई थीं और भाई अपनीअपनी नौकरियों पर अन्य शहरों में थे. स्मिता बड़े भैया से जितनी डांट खाती थी, उतना ही वह उन के सिरचढ़ी भी थी.

कोर्ट की शादी से स्मिता धूमधाम की शादी से वंचित रही जबकि अनिमेष के परिवार वालों को लगा जैसे वे लोग धोखा खा गए. खाली हाथ, बिना दहेज की बहू के आने से उन की नाराजगी चेहरे पर एक बहुत बड़े मस्से की तरह दिखाई देने लगी. चूंकि अनिमेष ही अपनी कमाई से घर चला रहा था, इस कारण कुछ कहने का साहस किसी को न हुआ.

‘‘भाईसाहब,’’ एक परिचित ने व्यंग्य से पूछा, ‘‘यह बेमेल शादी आप ने स्वीकार कैसे कर ली? कहां हम उत्तर भारत के, कहां वह बंगाली?’’बडे़ भैया ने कूटनीति का सहारा लेते हुए कहा, ‘‘भई, मेरी स्वीकृति का प्रश्न ही कहां उठता है? उन दोनों ने अपनी मरजी से कोर्ट में शादी कर ली तो मैं क्या कर सकता था? हां, आप को एक दावत न मिलने का दुख अवश्य होगा.’’ परिचित महोदय ने झेंप कर कहा, ‘‘मेरा मतलब यह नहीं था. पता नहीं कैसे निर्वाह करेंगे. आखिर उन दोनों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि तो बिलकुल अलग है न?’’

‘‘सांस्कृतिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो पर संस्कार तो सब के भारतीय ही हैं न. और फिर सारे विद्वान, जिस में आप भी हैं, कहते हैं न कि विवाह तो जन्म के साथ ही निर्धारित हो जाते हैं,’’ बड़े भैया ने हंसते हुए आगे कहा, ‘‘मैं और आप क्या कर सकते हैं.’’ उन सज्जन का मुंह बंद हो गया. स्मिता ने दर्शनशास्त्र में एमए किया था और साथ ही बीएड भी कर लिया था. पहले एक स्कूल में और फिर एक अच्छे नामी कालेज में व्याख्याता के पद पर काम कर रही थी. अनिमेष दूसरे कालेज में वरिष्ठ व्याख्याता था. अकसर मिलतेजुलते रहते थे. एकदूसरे के प्रति आकर्षण ने अपना रंग जमाना शुरू कर दिया. अंत में शादी करने का भी इरादा कर लिया. दोनों परिवारों के विरोध का भी उन्हें आभास था, पर कोशिश यही थी कि शादी बिना किसी झंझट के हो जाए. बाकी देख लेंगे. आशा के विपरीत बड़े भैया ने कुछ नहीं कहा जबकि अनिमेष ने घर वालों ने कुछ समय तक असहयोग आंदोलन किया. शादी को लगभग 7 महीने हो चुके थे और ऊपरी तौर से सब की जीवनयात्रा सुचारु रूप से चल रही थी.

बड़बोला: कैसे हुई विपुल की बहन की शादी- भाग 1

‘‘गुडमार्निंग सर,’’ केबिन में  प्रवेश करते हुए विपुल ने कहा और मुझे अपना नियुक्तिपत्र दिया. अकाउंट विभाग का हैड होने के नाते मैं ने उसे कुरसी पर बैठने का संकेत किया और इंटरकौम पर अपने सहायक महेश को केबिन में आने को कहा.

महेश ने केबिन में आते ही नमस्ते की और कुरसी पर बैठते हुए बोला, ‘‘सर, आज 2 घंटे पहले मुझे जाना है. श्रीमतीजी शाम की टे्रन से मायके से वापस आ रही हैं.’’

‘‘चले जाना पर पहले इन से मिलो,’’ मैं ने महेश को इशारा करते हुए कहा, ‘‘विपुल, तुम्हारे सहायक रहेंगे. काफी दिनों से तुम शिकायत कर रहे थे कि काम अधिक है, एक आदमी की जरूरत है. विपुल अब तुम्हारे अधीन काम करेंगे. विपुल के अलावा सुरेश को भी अगले सप्ताह ज्वाइन करना है. आफिस में स्टाफ पूरा हो जाएगा, जिस के बाद पेंडिंग काम पूरा हो जाएगा. अच्छा विपुल, तुम अब से महेश के साथ काम करोगे. अब तुम अपनी सीट पर जा कर काम शुरू कर दो.’’

20 साल का विपुल बी.काम. करने के बाद पिछले सप्ताह जब इंटरव्यू देने आया था तो उस को काम का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन एक गजब का आत्मविश्वास उस में जरूर था, जिस को देख कर मैं ने उसे नौकरी पर रखा था. मझले कद का गोराचिट्टा, हंसमुख नौजवान विपुल नवगांव में रहता था.

नवगांव नवयुग सिटी से लगभग 80 किलोमीटर दूर एक छोटा सा कसबा है. बस से एक तरफ का सफर लगभग ढाई घंटे में पूरा होता है. आफिस का समय सुबह 10 से शाम 6 बजे है. 8 घंटे की ड्यूटी के बाद बस पकड़ने के लिए आधा घंटा और फिर लगभग 5 घंटे बस में, यानी लगभग 14 घंटे की ड्यूटी देने की बात जब इंटरव्यू में विपुल को मैं ने बताई और पूछा कि किस तरह वह समय को मैनेज कर पाएगा. कहीं कुछ दिन काम करने के बाद नौकरी तो नहीं छोड़ देगा तो उस के आत्मविश्वास और जवाब देने के ढंग ने मुझे निरुत्तर कर दिया. उस ने कहा कि हर हालत और मौसम में सुबह 10 बजने से 10 मिनट पहले ही आफिस पहुंच जाएगा. और यही हुआ, बिना नागा आफिस खुलने से पहले विपुल पहुंच जाता और 2 महीने के छोटे से समय के अंदर सभी कार्यों में निपुण हो गया. आफिस का पेंडिंग काम समाप्त हो गया और काम रुटीन पर आ गया.

विपुल काम में तेज, स्वभाव में विनम्र लेकिन उस की एक बात मुझे पसंद नहीं थी. वह बात उस के अधिक बोलने की थी. वह चुप नहीं रह सकता था. कई बार मुझे लगता था कि वह बात को बढ़ाचढ़ा कर करता था. विपुल ने अपनी बातों से धीरेधीरे पूरे आफिस को यकीन दिला दिया कि वह एक अमीर घर से ताल्लुक रखता है. अच्छे और महंगे कपड़े, जूते अपनेआप में उस के अमीर होने का एहसास कराते थे. आफिस में अपने सहयोगियोेंको अकसर दावत देना उस का नियम बन गया था.

आफिस में कंप्यूटर आपरेटर श्वेता और टेलीफोन आपरेटर सुषमा के आसपास उसे मंडराते देख कर मुझे ऐसा लगा था कि आफिस की लड़कियों में विपुल की कुछ खास रुचि थी. लंच वह सुषमा और श्वेता के साथ ही करता था. उन दोनों को प्रभावित करने में उस का खाली समय व्यतीत होता था. इन सब बातों को देख कर मैं ने विपुल को कभी टोका नहीं, क्योंकि आफिस का काम उस ने कभी पेंडिंग नहीं किया. इसलिए बाकी सब हरकतों को उस का निजी मामला समझ कर नजरअंदाज करता रहा क्योंकि वह कंपनी के काम में सदा आगे रहता था.

एक दिन मैं आफिस में रिपोर्ट देख रहा था. शाम के 4 बजे चाय के साथ चपरासी समोसा, गुलाबजामुन और पनीर पकौड़ा मेज पर रखता हुआ बोला, ‘‘सर, समोसा पार्टी विपुल की तरफ से है.’’

‘‘किस खुशी में दावत हो रही है?’’ मैं चपरासी से पूछ रहा था, तभी महेश केबिन में आता हुआ बोला, ‘‘सर, विपुल तो छिपा रुस्तम निकला. मोटा असामी है. यह दावत तो कुछ नहीं, बड़ी पार्टी लेनी पड़ेगी विपुल से. ऐसे नहीं छूट सकता. आज उस ने 2 ट्रक खरीदे हैं, 16 ट्रक पहले से ही नवगांव की दाल मिल में चल रहे हैं. टोटल 18 ट्रकों का मालिक है. समोसा पार्टी तो शुरुआत है, फाइव स्टार दावत पेंडिंग है, सर.’’

‘‘महेश, एक बात समझ में नहीं आती कि 18 ट्रकों के मालिक को एक क्लर्क की नौकरी करने की क्या जरूरत है?’’

मनपसंद: मेघा ने परिवार के प्रति कौनसा निभाया था फर्ज- भाग 1

मेघा सही स्थिति का आकलन कर पाने की स्थिति में नहीं है. मां को देखती है तो कलेजा कट के रह जाता है वहीं रिश्तेदारों की चाशनी में लिपटी बेतुकी सलाहें सुनती है तो कटे कलेजे को सिल कर ढाल बनाने को जी चाहता है उस का.

मेघा के लिए आने वाली परिस्थितियां आसान नहीं होंगी, इस का एहसास उसे बखूबी है. लेकिन इन से पार पाने की कोई रणनीति उस के दिमाग में अभी नहीं आ रही है. उस की मां तो साधारण घरेलू महिला रही हैं, पेट के रास्ते से पति के दिल में उतरने की कवायद से आगे कभी कुछ सोच ही नहीं पाईं. पता नहीं वे खुद नहीं सोच पाई थीं या फिर समाज ने इस से अधिक सोचने का अधिकार उन्हें कभी दिया ही नहीं था. जो कुछ भी हो, अच्छीभली गृहस्थी की गाड़ी लुढ़क रही थी. कोई भी कहां जानता था कि ऊंट कभी इस करवट भी बैठ सकता है. लेकिन अब तो बैठ ही चुका है. और यही सच है.

राहत की बात यह थी कि पिता सरकारी कर्मचारी थे और सरकार की यही अदा सब को लुभाती भी है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी प्रतिकूल हो जाएं लेकिन सरकार अपने सेवारत कर्मचारी और उस के बाद उस के आश्रितों का अंतिम समय तक साथ निभाती है. लिहाजा, परिवार के किसी एक सदस्य को अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिल ही जाएगी. और यही नौकरी उन के आगे की लंगड़ाती राह में लकड़ी की टेक बनेगी.

15 बरस की छुटकी माला और 20 साल की मेघा. मां को चूंकि दुनियादारी की अधिक समझ नहीं थी और माला ने अभी अपनी स्कूली पढ़ाई भी पूरी नहीं की है, इसलिए यह नौकरी मेघा ही करेगी, यह तय ही था लेकिन मेघा जानती थी कि परिवार की जिम्मेदारी लेना बिना पैरों में चप्पल पहने कच्ची सड़क पर चलने से कम नहीं होगा.

अनुकंपा की नौकरी दोधारी तलवार होती है. एक तो यह एहसास हर वक्त कचोटता है कि यह नौकरी आप को अपनी मेहनत और काबिलीयत की बदौलत नहीं, बल्कि किसी आत्मीय की मृत्यु की कीमत पर मिली है और दूसरे हर समय एक अपराधबोध सा घेरे रहता है कि जाने कर्तव्य ठीक से निभ भी रहे हैं या नहीं. खुद को अपराधबोध न भी हो, तो कुछ नातेरिश्तेदार होते ही इसलिए हैं. उन का परम कर्तव्य होता है कि समयसमय पर सूखने की कोशिश करते घाव को कुरेद कर उसे हरा बनाए रखें. और वे अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाते हैं.

6 महीने बीततेबीतते उतरती हुई गाड़ी फिर से पटरी पर आने लगी थी. एक परिवार ने अपने मुखिया के बिना जीने की कोशिशें शुरू कर दी थीं. मेघा को भी पिता की जगह उन के औफिस में नौकरी मिल गई. जिंदगी ने ढर्रा पकड़ लिया.

फ़िल्मी और किताबी बातों से परे मेघा बहुत ही व्यावहारिक लड़की है. भविष्य को ले कर उस का दृष्टिकोण बिलकुल स्पष्ट था. वह भलीभांति जानती थी कि माला और मां उस की जिम्मेदारी हैं लेकिन इन जिम्मेदारियों के बीच भी वह खुद अपने लिए भी जीने की चाह पाले हुए थी. बीस की हवाई उम्र में उस के भी कुछ निजी सपने थे जिन्हें पूरा करने के लिए वह बरसों इंतजार नहीं करना चाहती थी. उसे पता था कि उम्र निकलने के बाद सपनों का कोई मोल नहीं रहता.

नौकरी के दरमियान ही मंगल उस की जिंदगी में आया जिसे मेघा ने आदर्शों का रोना रोते हुए जाने नहीं दिया बल्कि खुलेदिल से उस का स्वागत किया. मंगल उस का सहकर्मी. मंगल की एकएक खूबी का विस्तार से बखान करने के बजाय मेघा एक ही शब्द में कहती थी- ‘मनपसंद.’ मनपसंद यानी इस एक विशेषण के बाद उस की शेष सभी कमियां नजरअंदाज की जा सकती हैं.

इधर लोगों ने फिल्में और टैलीविजन के धारावाहिक देखदेख कर मेघा की भी त्याग की मूर्ति वाली तसवीर बना ली थी और वे उसे उसी सांचे में फिट देखने की लालसा भी रखते थे. त्याग की मूर्ति यानी पहले छुटकी को पढ़ाएलिखाए. उस का कैरियर बनाए. उस का घर बसाए. तब कहीं जा कर अपने लिए कुछ सोचे. इन सब के बीच मां की देखभाल करना तो उस का कर्त्तव्य है ही. लोगों का दिल ही टूट गया जब उस ने मंगल से शादी करने की इच्छा जताई.

“अभी कहां वह बूढी हो रही थी. पहले छोटी का बंदोबस्त कर देती, फिर अपना सोचती. अब देखना तुम, पैसेपैसे की मुहताज न हो जाओ तो कहना.” यह कह कर कइयों ने मां को भड़काया भी. मां तो नहीं भड़कीं लेकिन मेघा जरूर भड़क गई.

“आप अपना बंदोबस्त देख लीजिए, हमारा हम खुद देख लेंगे,” यह कहने के साथ ही मेघा ने हर कहने वाले मुंह को बंद कर दिया. लेकिन इस के साथ मेघा को बदतमीज और मुंहफट का तमगा मिल गया.

एक मौका और दीजिए : बहकने लगे सुलेखा के कदम – भाग 1

नीलेश शहर के उस प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट में अपनी पत्नी नेहा के साथ अपने विवाह की दूसरी सालगिरह मनाने आया था. वह आर्डर देने ही वाला था कि सामने से एक युगल आता दिखा. लड़की पर नजर टिकी तो पाया वह उस के प्रिय दोस्त मनीष की पत्नी सुलेखा है. उस के साथ वाले युवक को उस ने पहले कभी नहीं देखा था.

मनीष के सभी मित्रों और रिश्तेदारों से नीलेश परिचित था. पड़ोसी होने के कारण वे बचपन से एकसाथ खेलेकूदे और पढ़े थे. यह भी एक संयोग ही था कि उन्हें नौकरी भी एक ही शहर में मिली. कार्यक्षेत्र अलग होने के बावजूद उन्हें जब भी मौका मिलता वे अपने परिवार के साथ कभी डिनर पर चले जाते तो कभी किसी छुट्टी के दिन पिकनिक पर. उन के कारण उन दोनों की पत्नियां भी अच्छी मित्र बन गई थीं.

मनीष का टूरिंग जाब था. वह अपने काम के सिलसिले में महीने में लगभग 10-12 दिन टूर पर रहा करता था. इस बार भी उसे गए लगभग 10 दिन हो गए थे. यद्यपि उस ने फोन द्वारा शादी की सालगिरह पर उन्हें शुभकामनाएं दे दी थीं किंतु फिर भी आज उसे उस की कमी बेहद खल रही थी. दरअसल, मनीष को ऐसे आयोजनों में भाग लेना न केवल पसंद था बल्कि समय पूर्व ही योजना बना कर वह छोटे अवसरों को भी विशेष बना दिया करता था.

मनीष के न रहने पर नीलेश का मन कोई खास आयोजन करने का नहीं था किंतु जब नेहा ने रात का खाना बाहर खाने का आग्रह किया तो वह मना नहीं कर पाया. कार्यक्रम बनते ही नेहा ने सुलेखा को आमंत्रित किया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है पर उसे इस समय देख कर तो ऐसा नहीं लग रहा है कि उस की तबीयत खराब है. वह उस युवक के साथ खूब खुश नजर आ रही है.

नीलेश को सोच में पड़ा देख नेहा ने पूछा तो उस ने सुलेखा और उस युवक की तरफ इशारा करते हुए अपने मन का संशय उगल दिया.

‘‘तुम पुरुष भी…किसी औरत को किसी मर्द के साथ देखा नहीं कि मन में शक का कीड़ा कुलबुला उठा…होगा कोई उस का रिश्तेदार या सगा संबंधी या फिर कोई मित्र. आखिर इतनेइतने दिन अकेली रहती है, हमेशा घर में बंद हो कर तो रहा नहीं जा सकता, कभी न कभी तो उसे किसी के साथ की, सहयोग की जरूरत पड़ेगी ही,’’ वह प्रतिरोध करते हुए बोली, ‘‘न जाने क्यों मुझे पुरुषों की यही मानसिकता बेहद बुरी लगती है. विवाह हुआ नहीं कि वे स्त्री को अपनी जागीर समझने लगते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है नेहा, तुम ही तो कह रही थीं कि जब तुम ने डिनर का निमंत्रण दिया था तब सुलेखा ने कह दिया कि उस की तबीयत ठीक नहीं है और अब वह इस के साथ यहां…यही बात मन में संदेह पैदा कर रही है…और तुम ने देखा नहीं, वह कैसे उस के हाथ में हाथ डाल कर अंदर आई है तथा उस से हंसहंस कर बातें कर रही है,’’ मन का संदेह चेहरे पर झलक ही आया.

‘‘वह समझदार है, हो सकता है वह दालभात में मूसलचंद न बनना चाहती हो, इसलिए झूठ बोल दिया हो. वैसे भी किसी स्त्री का किसी पुरुष का हाथ पकड़ना या किसी से हंस कर बात करना सदा संदेहास्पद क्यों हो जाता है? फिर भी अगर तुम्हारे मन में संशय है तो चलो उन्हें भी अपने साथ डिनर में शामिल होने का फिर से निमंत्रण दे देते हैं…दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’

नेहा ने नीलेश का मूड खराब होने के डर से बीच का मार्ग अपना लेना ही श्रेयस्कर समझा.

‘‘हां, यही ठीक रहेगा,’’ किसी के अंदरूनी मामले में दखल न देने के अपने सिद्धांत के विपरीत नीलेश, नेहा की बात से सहमत हो गया. दरअसल, वह उस उलझन से मुक्ति पाना चाहता था जो उस के दिल और दिमाग को मथ रही थी. वैसे भी सुलेखा कोई गैर नहीं, उस के अभिन्न मित्र की पत्नी है.

वे दोनों उठ कर उन के पास गए. उन्हें इस तरह अपने सामने पा कर सुलेखा चौंक गई, मानो वह समझ नहीं पा रही हो कि क्या कहे.

‘‘दरअसल सुलेखा, हम लोग यहां डिनर के लिए आए हैं. वैसे मैं ने सुबह तुम से कहा भी था पर उस समय तुम ने कह दिया कि तबीयत ठीक नहीं है पर अब जब तुम यहां आ ही गई हो तो हम चाहेंगे कि तुम हमारे साथ ही डिनर कर लो. इस से हमें बेहद प्रसन्नता होगी,’’ नेहा उसे अपनी ओर आश्चर्य से देखते हुए भी सहजता से बोली.

‘‘पर…’’ सुलेखा ने झिझकते हुए कुछ कहना चाहा.

‘‘पर वर कुछ नहीं, सुलेखाजी, मनीष नहीं है तो क्या हुआ, आप को हमेंकंपनी देनी ही होगी…आप भी चलिए मि…आप शायद सुलेखाजी के मित्र हैं,’’ नीलेश ने उस अजनबी की ओर देखते हुए कहा.

‘‘यह मेरा ममेरा भाई सुयश है,’’ एकाएक सुलेखा बोली.

‘‘वेरी ग्लैड टू मीट यू सुयश, मैं नीलेश, मनीष का लंगोटिया यार, पर भाभी, आप ने कभी इन के बारे में नहीं बताया,’’ कहते हुए नीलेश ने बडे़ गर्मजोशी से हाथ मिलाया.

‘‘यह अभी कुछ दिन पूर्व ही यहां आए हैं,’’ सुलेखा ने कहा.

‘‘ओह, तभी हम अभी तक नहीं मिले हैं, पर कोई बात नहीं, अब तो अकसर ही मुलाकात होती रहेगी,’’ नीलेश ने कहा.

अजीब पसोपेश की स्थिति में सुलेखा साथ आ तो गई पर थोड़ी देर पहले चहकने वाली उस सुलेखा तथा इस सुलेखा में जमीनआसमान का अंतर लग रहा था…जितनी देर भी साथ रही चुप ही रही, बस जो पूछते उस का जवाब दे देती. अंत में नेहा ने कह भी दिया, ‘‘लगता है, तुम को हमारा साथ पसंद नहीं आया.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. दरअसल, तबीयत अभी भी ठीक नहीं लग रही है,’’ झिझकते हुए सुलेखा ने कहा.

बात आईगई हो गई. एक दिन नीलेश शौपिंग मौल के सामने गाड़ी पार्क कर रहा था कि वे दोनों फिर दिखे. उन के हाथ में कुछ पैकेट थे. शायद शौपिंग करने आए थे. आजकल तो मनीष भी यही हैं, फिर वे दोनों अकेले क्यों आए…मन में फिर संदेह उपजा, फिर यह सोच कर उसे दबा दिया कि वह उस का ममेरा भाई है, भला उस के साथ घूमने में क्या बुराई है.

मनीष के घर आने पर एक दिन बातोंबातों में नीलेश ने कहा, ‘‘भई, तुम्हारा ममेरा साला आया है तो क्यों न इस संडे को कहीं पिकनिक का प्रोग्राम बना लें. बहुत दिनों से दोनों परिवार मिल कर कहीं बाहर गए भी नहीं हैं.’’

‘‘ममेरा साला, सुलेखा का तो कोई ममेरा भाई नहीं है,’’ चौंक कर मनीष ने कहा.

‘‘पर सुलेखा भाभी ने तो उस युवक को अपना ममेरा भाई बता कर ही हम से परिचय करवाया था, उसे सुलेखा भाभी के साथ मैं ने अभी पिछले हफ्ते भी शौपिंग मौल से खरीदारी कर के निकलते हुए देखा था. क्या नाम बताया था उन्होंने…हां सुयश,’’ नीलेश ने दिमाग पर जोर डालते हुए उस का नाम बताते हुए पिछली सारी बातें भी उसे बता दीं.

‘‘हो सकता है, कोई कजिन हो,’’ कहते हुए मनीष ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘हां, हो सकता है पर पिकनिक के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’’ नीलेश ने फिर पूछा.

‘‘मैं बाद में बताऊंगा…शायद मुझे फिर बाहर जाना पडे़,’’ मनीष ने कहा.

नीलेश भी चुप लगा गया. वैसे नीलेश की पारखी नजरों से यह बात छिप नहीं पाई कि उस की बात सुन कर मनीष परेशान हो गया है. ज्यादा कुछ न कह कर मनीष कुछ काम है, कह कर उस के पास से हट गया. उस दिन उसे पहली बार महसूस हुआ कि दोस्ती चाहे कितनी भी गहरी क्यों न हो पर कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें व्यक्ति किसी के साथ शेयर नहीं करना चाहता.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

सेक्स के ये अंदाज कर सकते हैं आपको हैरान, पढ़ें खबर

सेक्स के ये विचित्र और मजेदार चलन आपको अचरज से भर देंगे. आइए इन पर एक नजर डालें.

महिलाओं का मास्टबेशन बार

टोकियो के शीबाया जिले में मौजूद लव जूल महिलाओं को समर्पित लव व सेक्स बार है. यह बार महिलाओं को तनावमुक्त होकर कौकटेल के साथ गपशप करने की जगह देता है, साथ ही रंगीन सेक्स टौयज की बड़ी रेंज उपलब्ध कराता है. यहां पुरुषों का प्रवेश वर्जित है. वे यहां सिर्फ तभी आ सकते हैं, जबकि वे किसी महिला के साथ हों. इसका उद्देश्य फीमेल मास्टबेशन (हस्तमैथुन) को लेकर जापानी संस्कृति में मौजूद वर्जना को तोड़ने में सहायता करना है.

500 लोगों का विलासोत्सव

शायद 499 लोगों का विलासोत्सव (और्जी) का विश्व कीर्तिमान काफी नहीं था. इसलिए जापान ने 500 लोगों को इकट्ठा कर इसका एक नया कीर्तिमान स्थापित किया. चूंकि जापान के लोग स्मार्ट उद्यमी भी हैं, उन्होंने इसकी एक डीवीडी भी बनाई, जिसे खरीदा जा सकता है.

आईबौल-लिकिंग

इसे औक्यूलोलिंक्टस के नाम से भी जाना जाता है. यह जापान में कामुकता को उकसाने का लोकप्रिय माध्यम बन गया है. यह पहली बार तब सामने आया, जब एक स्कूल ने पाया कि बच्चे स्कूल में आई-पैचेस पहनकर आ रहे हैं. 12 वर्ष के एक तिहाई बच्चे इसमें संलिप्त पाए गए. माना जा रहा है कि यह चलन एक जापानी बैंड बौर्न के एक म्यूजिक वीडियो से प्रेरित है.

नीदरलैंड्स को सलाम

शारीरिक रूप से विकलांग लोगों को सेक्शुअल अंतरंगता का अनुभव देने के लिए हौलैंड सरकार ने उन्हें मासिक वजीफा देना शुरू किया है, ताकि वे ऐम्स्टरडम के रेड लाइट इलाके डि वौलेन की वेश्याओं के पास जा सकें. जर्मनी भी वयस्क सहचर्य के लिए विकलांगों को सब्सिडी देता है.

इनसे दूर ही रहो

आयरलैंड के समुद्री इलाके में एक छोटा-सा द्वीप है इनिस बीग, जो सेक्शुअली दमित समाज के रूप में जाना जाता है. यहां के लोग सेक्शुअल संबंधों के दौरान अंडरवेयर पहने रहते हैं और मानते हैं कि इंटरकोर्स (संभोग) उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.

महिलाएं और मछलियां

ब्राजील के मेहिनाकू गांव में पुरुषों के बीच महिलाओं को मछलियों का तोहफा देकर मनाने की स्पर्धा होती है.

ये डांस है सबसे अच्छा!

कोलंबिया के ग्वेजीरो लोगों का एक औपचारिक नृत्य होता है. यदि इस नृत्य के दौरान किसी महिला ने किसी पुरुष के पैर पर पैर रख दिया तो उन्हें सेक्स करना होता है. अब आप जरा जल्दी से अपनी दूसरी डांस क्लासेस कैंसल कर दीजिए.

बाबाओं की अंधभक्ति का चक्रव्यूह

कुछ समय पहले की बात है. टैलीविजन के खबरिया चैनल और अखबार चीखचीख कर कह रहे थे कि डेरा सच्चा सौदा के गुरु राम रहीम को दिए जज के फैसले के चलते उन के अनुयायियों ने पंचकुला को धूंधूं कर जला डाला. हर तरफ आग ही आग, हिंसा पसरी हुई थी. सवाल उठा कि ये बाबा के कैसे अनुयायी हैं, जो हिंसक हो उठे? क्या यह भारत की ऐसी पहली घटना थी? क्या इस से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था?

एक जानेमाने अखबार से मालूम हुआ कि अदालतों में चल रहे ऐसे मुकदमों की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

पिछले साल उत्तर प्रदेश में बाराबंकी जिले के एक बाबा परमानंद को गिरफ्तार किया गया था. औरतों के साथ जिस्मानी संबंध बनाते हुए उन के वीडियो सोशल मीडिया पर आए थे. अगर दक्षिण भारत की बात करें, तो स्वामी नित्यानंद की सैक्स सीडी साल 2010 में सामने आई थी.

इस तरह की घटनाएं बारबार होती हैं और हर बार अंधभक्ति की चपेट में आई जनता छली जाती रही है. कैसी धर्मांधता है यह? क्या हमारी सोचनेसमझने की ताकत खत्म हो चुकी है?

जिस उम्र में बच्चे खेलते हैं, जवान होती लड़कियां आनी वाली जिंदगी के सपने बुनती हैं, उस उम्र में उन को धार्मिक जगहों पर सेवा के काम में भेज कर क्या सच में पुण्य कमाया जा सकता है?

सड़क पर घायल पड़े किसी इनसान को देख लोग मुंह मोड़ कर चल देते हैं, मुसीबत में पड़े शख्स से किनारा कर लेते हैं, पर किसी बाबा पर आंच आ जाए, तो बवाल कर देते हैं. क्या यही धर्म है?

क्या वजह है इस धर्मांधता की? इस बारे में कई संस्थानों से जुड़े लोगों से बात की गई, तो मालूम हुआ कि कहीं न कहीं लोग शांति की तलाश में इन आश्रमों का रुख करते हैं.

भेदभाव भरा बरताव

आज समाज में फैले जातिगत भेदभाव, ऊंचनीच व अमीरीगरीबी का फर्क क्या लोगों को मजबूर नहीं करता इन बाबाओं की शरण में जाने को? अमीर दिनोंदिन अमीर व गरीब और गरीब होता जा रहा है. ऐसे में इन आश्रमों से अगर किसी गरीब को मुट्ठीभर अनाज और तन ढकने को कपड़ा मिल जाए, तो ये लोग उसे अपना मंदिर समझने लगते हैं और समाज से कटे हुए दलित, बाबा से मिली इज्जत के बदले व समाज से बदला लेने के लिए हिंसा करने पर उतारू हो जाते हैं.

अमीर अपने काले धन से किसी को दो गज जमीन नहीं देगा, पर इन मठों के नाम पर धर्मशालाएं बनवाएगा व जमीनें दान कर देगा, ताकि उस का काला धन भी ठिकाने लग जाए और समाज में रुतबा भी बढ़ जाए.

इस तरह यहां गरीब व अमीर सभी तरह के अंधभक्तों का स्वागत होता है. पर भेदभाव भी होता है. अमीर झाड़ू ले कर सेवा के नाम पर सिर्फ तसवीरें खिंचवाते हैं और गरीब को तसवीरें दिखा कर वही झाड़ू हमेशा के लिए थमा दी जाती है.

घरेलू हिंसा जिम्मेदार

क्या आएदिन घरपरिवारों में होने वाली हिंसा औरतों व बच्चों को इस अंधभक्ति की तरफ नहीं खींचती है? क्यों कोई अपने बच्चे इन बाबाओं व आश्रमों के सुपुर्द कर देता है? क्यों कोई औरत अपने परिवार को हाशिए पर रख कर इन बाबाओं के मायाजाल में फंसती चली जाती है?

अगर गंभीरता से सोचा जाए, तो शायद वह अपने वजूद की तलाश में यह रफ्तार पकड़ लेती है. जहां परिवारों में औरतों को इज्जत नहीं मिलती, उन्हें यहां प्यार के दो बोल भले महसूस होते हैं और वे सत्संग व प्रवचनों के बहाने इन की ओर खिंची चली जाती हैं और वहां पर हाजिरी देना अपना धर्म समझने लगती हैं.

टूटते परिवार व समाज

कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो इन आश्रमों में जाने वाले ऊंचे तबके के भक्तों की देखादेखी ऐसा करने लगते हैं और इन से जुड़ते चले जाते हैं. अमीर लोग भी इन के कार्यक्रमों व सत्संगों में जाना पसंद करते हैं.

यह सही है कि यह सामाजिक होने का एक जरीया भर है और इनसान सजधज कर कर रहना व संगीत सुनना पसंद करता है, इसलिए इन सत्संगों में उसे क्षणिक खुशी मिलती है.

पर सोचने की बात यह भी है कि यही खुशी वह इन के अनुयायी न बन कर अपने परिवार, दोस्तों व रिश्तेदारो में भी तो ढूंढ़ सकता है? क्या टूटते परिवार, बदलता सामाजिक माहौल इन बाबाओं को राह दिखाने के लिए जिम्मेदार नहीं है?

पीढ़ी दर पीढ़ी अंधभक्ति

कई घरों में इन बाबाओं के लिए खास दर्जा होता है. घर में कुछ अशुभ हुआ, तो बाबा से सलाहमशवरा किया जाता है और अगर कुछ शुभ हुआ, तो भी बाबा को चढ़ावा चढ़ाया जाता है. घर के बड़ेबुजुर्ग यह सब करते हैं व अपनी अगली पीढ़ी को भी मजबूर करते हैं कि वह इस का पालन करे.

ऐसा अकसर अपना कारोबार करने वाले परिवारों में होता है, जहां अगली पीढ़ी पहली पीढ़ी पर निर्भर होती है, इसलिए अगली पीढ़ी न चाहते हुए भी इस अंधभक्ति के चक्रव्यूह में फंस जाती है और इन बाबाओं के आश्रम फलतेफूलते रहते हैं.

कम मेहनत में शौहरत

आजकल इन आश्रमों में दान व चंदे के नाम पर खूब पैसा जमा होता है. इन्हें भी लोगों की जरूरत पड़ती है, ताकि इन का प्रचारप्रसार किया जा सके, इन के नाम के डंके बजाए जा सकें. ऐसे में पढ़ीलिखी बेरोजगार नौजवान पीढ़ी या वे औरतें, जो किसी वजह से नौकरी नहीं कर रही हैं, भी इन संगठनों से खूब जुड़ रही हैं.

जिन औरतों ने कभी सोचा भी न था कि शादी के बाद वे महज घरेलू औरत बन सिर्फ बच्चे ही पालती रह जाएंगी, उन्हें कुछ अलग करने की चाह इन आश्रमों से जुड़ने को मजबूर करती है.

ऐसी औरतें बड़ेबड़े स्टेजों पर खड़ी हो कर भीड़ को संबोधित कर अपनेआप को ऊंचा समझने की गलतफहमी में इन से जुड़ी रहती हैं और इस अंधभक्ति के चक्रव्यूह में फंसती चली जाती हैं.

ऐसी औरतें अपने आसपड़ोस की औरतों के लिए मिसाल बन जाती हैं और देखादेखी दूसरी औरतें भी इन आश्रमों से जुड़ने लगती हैं, जबकि इन के खुद के बच्चे दाइयों के भरोसे पलते हैं. वे भूल जाती हैं कि अपने बच्चे पालने का काम कोई छोटा काम नहीं है, बल्कि बहुत बड़ी जिम्मेदारी है.

हिम्मत हारना

कई बार अपने काम में बारबार नाकाम होने पर भी लोग मठोंमंदिरों का रुख करने लगते हैं. जो काम लगन व मेहनत से होना चाहिए, उस के लिए वे इन बाबाओं से आशीर्वाद लेने पहुंच जाते हैं. वहां आशीर्वाद के साथ मन को बहलाने वाली बातें सुन कर कभीकभार उन के काम बन भी जाते हैं और ऐसे लोग ही इस कामयाबी को बाबा का आशीर्वाद समझ कर उन के अनुयायी हो जाते हैं, जबकि यह हिम्मत, हौसला अगर उन के अपने परिवार से मिला होता, तो वह परिवार एकता के सूत्र में जुड़ जाता और वह सदस्य बाबा से न जुड़ता.

शांति की तलाश में

जब कभी परिवार के किसी सदस्य को कोई लंबी व बड़ी बीमारी का सामना करना पड़ता है, तो पूरा परिवार निराश हो जाता है. ऐसे में जब सभी दरवाजे बंद हों, तो वे इन बाबाओं का दरवाजा खटखटाते हैं और परिवार का सदस्य ठीक हुआ या नहीं, वह तो दूसरी बात है, पर वे अपना समय व दौलत इन आश्रमों में जरूर लुटाते हैं. हो सकता है कि इस से उन्हें शांति मिलती हो, पर यह शांति उन्हें किसी दूसरे नेक काम को कर के भी मिल सकती है.

कुलमिला कर एक इनसान दूसरे इनसान के लिए मददगार साबित हो, तो शायद इन बाबाओं, मठाधीशों का साम्राज्य खत्म हो जाए. धर्म के नाम पर हो रहे इस पाखंड का खात्मा होना चाहिए, तभी सही माने में इनसान अपने इनसानियत के धर्म को समझ सकेगा.

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