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News Story In Hindi: सोने की खतरनाक चमक

News Story In Hindi: आज विजय ने अनामिका के घर पर रुकने का प्लान बनाया था. दीवाली बीत चुकी थी. तब अनामिका अपने गांव गई थी. पूरे 15 दिन के बाद लौटी थी.

जिस इलाके में अनामिका रहती थी, वहां के ज्यादातर लोग बिहार से थे. उन में से बहुत से लोग दीवाली और छठ पूजा मनाने के लिए अपनेअपने घर जा चुके थे. अनामिका छठ पूजा से पहले ही लौट आई थी. उसी का प्लान था कि विजय उस के साथ रात बिताए.

अनामिका का वन रूम फ्लैट था. उस ने करीने से सब सजा रखा था. बिस्तर पर नई चादर बिछी थी और ‘एलैक्सा’ पर अरिजीत सिंह का एक रोमांटिक गाना ‘फिर भी तुम को चाहूंगा…’ बज रहा था.

अनामिका किचन में मैगी बना रही थी. उस ने ब्लैक कलर का झीना गाउन पहना हुआ था. विजय बनियान और शौर्ट्स में था. वह अनामिका की जुल्फों से खेल रहा था और उसे यहांवहां छेड़ रहा था.

‘‘विजय, मु झे मैगी बनाने दो न प्लीज,’’ अनामिका ने अपने बालों को ठीक करते हुए कहा.

‘‘पर मु झे तो मोमो खाने हैं,’’ विजय ने अनामिका को अपने आगोश में लेते हुए कहा.

‘‘मुझे सब पता है तुम्हारा ‘मोमो’ वाला इशारा किस तरफ है. जब देखो, दिमाग में हवस भरी रहती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘तो फिर इस हवस को मिटाते हैं. न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी,’’ विजय ने कहा.

‘‘यह बांसुरी वाला राग किसी और को सुनाना. आज जो शरारत तुम्हारी आंखों में दिख रही है, मुझे लगता नहीं कि तुम यहां सोने आए हो,’’ अनामिका ने गैस बंद करते हुए कहा.

अब वे दोनों बैडरूम में थे और मैगी खा रहे थे. इतने में विजय ने कहा, ‘‘यार, अब रहा नहीं जाता. सोचता हूं कि तुम्हें अपने ले ही आऊं.’’

‘‘तो मैं ने कब मना किया है. कर लेते हैं शादी,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर हम ज्यादा महंगी शादी नहीं करेंगे,’’ विजय ने कुछ सोच कर कहा.

‘‘लेकिन मु झे सोने की अंगूठी तो दोगे न?’’ अनामिका ने हैरत से कहा.

‘‘अरे, सोने की अंगूठी खरीदना कौन सी बड़ी बात है. ऐसा करते हैं कि जल्दी ही सगाई कर लेते हैं. रिंग सैरेमनी में एकदूसरे को अंगूठी पहना देंगे,’’ विजय ने अनामिका को अपनी बांहों में भरते हुए कहा.

‘‘यह ठीक रहेगा. इसी संडे चलते हैं अंगूठी खरीदने,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर उस से पहले आज की रात का तो मजा ले लें,’’ इतना कह कर विजय ने अनामिका को दबोच लिया.

अगले संडे विजय और अनामिका एक सुनार की दुकान पर थे. सुनार ने उन्हें अंगूठी के कई डिजाइन दिखाए. अनामिका को 22 कैरेट की 3 ग्राम से थोड़े ज्यादा की एक अंगूठी पसंद आई.

‘‘जी, आप की पसंद बहुत अच्छी है,’’ सुनार बोला.

‘‘कितने की है?’’ विजय ने सवाल किया.

‘‘जी, सिर्फ 50,000 रुपए की है,’’ सुनार बोला.

‘‘इतनी हलकी अंगूठी भी 50,000 रुपए की?’’ अनामिका के तो होश ही उड़ गए.

‘‘जी, आप को पता नहीं सोने के भाव आसमान छू रहे हैं. सोना पिछले एक साल में 79,000 प्रति 10 ग्राम से 1.31 लाख प्रति 10 ग्राम के लैवल पर आ चुका है. अक्तूबर, 2024 में 24 कैरेट सोने की कीमत 79,681 रुपए प्रति 10 ग्राम थी, जबकि अक्तूबर, 2025 तक सोने की कीमत बढ़ कर 1,14,314 रुपए प्रति 10 ग्राम हो गई थी,’’ सुनार ने कहा.

सोने के इतना ज्यादा दाम देख कर अनामिका का मूड खराब हो गया. उस ने इशारे से विजय को वहां से चलने को कहा.

अब वे दोनों एक कैफे में बैठे कौफी पी रहे थे. अनामिका ने अपने मोबाइल पर देखा कि पिछले कुछ समय से लोगों में सोना खरीदने की दिलचस्पी ज्यादा ही थी.

‘‘विजय, एक बताओ कि यह सोना खरीद कर घर में या बैंक के लौकर में रखने से होता क्या है? लोगों को सोने से इतना लगाव क्यों है?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘देखो, और देशों का तो पता नहीं, पर भारत में सोने को ‘देवताओं की करेंसी’ कहा जाता है और लोगों का ऐसा विश्वास है कि यह ‘पीला धातुई धागा’ जिस के बदन पर होगा, वह कभी गरीब नहीं रहेगा, हमेशा सौभाग्यशाली बना रहेगा,’’ विजय ने कहा.

‘‘हाल ही में मैं बीबीसी की एक खबर खंगाल रहा था, तो उस में पता चला कि मौर्गन स्टैनली, जो एक अमेरिकी ग्लोबल फाइनैंशियल सर्विस कंपनी है, ने हाल ही में एक रिपोर्ट जारी की जिस में कहा गया है कि जून, 2025 तक भारतीय परिवारों के पास 34,600 टन गोल्ड है, जिस की कीमत तकरीबन 3.8 ट्रिलियन डौलर है. यह वैल्युएशन भारत की जीडीपी का तकरीबन 88.8 फीसदी है.’’

यह सुन कर अनामिका की आंखें खुली की खुली रह गईं.

विजय ने आगे बताया, ‘‘मौर्गन स्टैनली की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने भी अपना गोल्ड भंडार बढ़ाया है और साल 2024 में 75 टन सोना खरीदा. इस के साथ ही भारत का गोल्ड भंडार तकरीबन 880 टन पहुंच गया है जो कि भारत के कुल विदेशी मुद्रा भंडार का 14 फीसदी है.

‘‘यह तो रही बात भारत में गोल्ड के बढ़ते रुतबे की, लेकिन सोने की बढ़ती कीमतें देश की इकोनौमी पर भी असर डालती हैं और इस का सीधा असर पड़ता है करेंसी पर.

‘‘सोने की कीमतों में उतारचढ़ाव कई वजह से होता है. उन में से एक अहम वजह है गोल्ड का इंपोर्ट और ऐक्सपोर्ट. गोल्ड के इंपोर्ट में बढ़ोतरी का सीधा असर महंगाई के रूप में देखने को मिल सकता है.’’

‘‘मैं कुछ सम झी नहीं?’’ अनामिका धीरे से बोली.

‘‘मान लो देश में सोने की मांग बढ़ती है तो इस बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विदेशों से सोना इंपोर्ट करना पड़ेगा और इस सोने की कीमत को चुकाने के लिए और करेंसी नोट छापने पड़ेंगे, जिस से रुपए की वैल्यू पर असर पड़ेगा. नतीजा, महंगाई बढ़ने का डर बना रहेगा,’’ विजय ने एक खबर का हवाला देते हुए कहा.

‘‘तो क्या ऐसा पहली बार हुआ कि जब सोने की कीमतों ने इतनी लंबी छलांग लगाई है?’’ अब अनामिका का ध्यान कौफी पीने में बिलकुल नहीं था.

‘‘ऐसा नहीं है. खबरों की मानें तो साल 1930 के आसपास और 1970-80 में गोल्ड ने ऐसा ही ‘बुल रन’ (तेजी) दिखाया था. साल 1978 और 1980 के बीच सोने की कीमतें दुनियाभर में 4 गुना हो गई थीं और सोना 200 डौलर प्रति ओंस से बढ़ कर तकरीबन 850 डौलर प्रति ओंस तक पहुंच गया था.

‘‘तब माहिरों ने कीमतों से इस उछाल की वजह दुनियाभर में बढ़ती महंगाई, ईरान में क्रांति और अफगानिस्तान पर सोवियत हमले से बनी अनिश्चितता को बताया था.

‘‘हालांकि, तब भारत में सोने का इंपोर्ट कानून के तहत कंट्रोल में था. इस के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि भारत में 10 ग्राम सोने के दाम साल 1979 में 937 रुपए से बढ़ कर साल 1980 में 1,330 रुपए हो गए थे. मतलब, कीमतों में यह उछाल तकरीबन 45 फीसदी का था.

‘‘पर अब मु झे लगता है और खबरें भी इसी तरफ इशारा करती हैं कि हमारे देश में सोना खरीदने के ट्रैंड में भी बदलाव आया है. ज्वैलरी की बजाय कई लोग अब फिजिकल गोल्ड (जैसे सोने की ब्रिक्स या बिसकुट) में पैसा लगा रहे हैं. जहां देखो लोग धड़ल्ले से सोना खरीद रहे हैं. बड़े शहरों की तुलना में छोटे शहरों और कसबों में लोग सोना ज्यादा खरीद रहे हैं.’’

‘‘पर इस का कोई तो नुकसान भी होता होगा न?’’ अनामिका ने सवाल दागा.

‘‘जहां तक मु झे लगता है कि बढ़ती कीमतों के बावजूद अगर लोग सोना खरीद रहे हैं तो इस से उन की फाइनैंशियल सेविंग्स कम हो सकती हैं. बैंक में डिपौजिट घट सकते हैं. इस से बैंकिंग सिस्टम में पैसा घट सकता है और लोन देने लायक रकम कम हो सकती है.

‘‘कुलमिला कर इस का असर कौर्पोरेट या एग्रीकल्चर सैक्टर को दिए जाने वाले लोन पर पड़ सकता है
और फाइनैंशियल ग्रोथ पर असर पड़ सकता है.’’

‘‘तो क्या सोना खरीदने की इस आपाधापी में सोने की स्मगलिंग भी बढ़ सकती है?’’ अनामिका तो सवाल पर सवाल दागे जा रही थी.

‘‘हाल ही में देश में दीवाली की धूम रही है और फैस्टिव सीजन में सोने की चमक भी लगातार बढ़ी है. साल 2025 के जनवरी महीने से दीवाली तक सोने की कीमत में 67 फीसदी की बढ़ोतरी दिखी. इस से साफ जाहिर है कि जिस रफ्तार से सोने का भाव बढ़ रहा है, तो सोने की स्मगलिंग के मामलों में भी जोरदार इजाफा हो रहा है.

‘‘रौयटर्स की एक रिपोर्ट में अफसरों के हवाले से कहा गया है कि गैरकानूनी सोने की स्मगलिंग के मामलों में जबरदस्त बढ़ोतरी देखने को मिली है. सर्राफा व्यापारी भी इस बात को कुबूल कर रहे हैं कि लिमिटेड सप्लाई के चलते इस में इजाफा हो रहा है.

‘‘रिपोर्ट में बताया गया है कि धनतेरस और दीवाली से पहले ही सोने की घरेलू कीमतें रिकौर्ड हाई पर दिखीं और इस के साथ ही पूरे भारत में सोने की स्मगलिंग में तेजी से बढ़ोतरी हुई. त्योहारी सीजन में पारंपरिक रूप से सोने के जेवरों, सिक्कों और बार (छड़) की डिमांड बढ़ जाती है, लेकिन बढ़ती कीमतों और लिमिटेड सप्लाई ने स्मगलिंग को बढ़ावा देने का काम किया. इस स्मगलिंग के खेल में खूब पैसा बनाया जा रहा है.

‘‘एक रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा बाजार लैवल पर हर एक किलोग्राम सोने की स्मगलिंग से स्मगलर अंदाजन 11.5 लाख रुपए से ज्यादा का मुनाफा कमा रहे हैं. यह आंकड़ा जुलाई, 2024 में आयात शुल्क कटौती के बाद के मुनाफे से तकरीबन दोगुना है,’’ विजय ने बताया.

‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्या इंटरनैशनल दबाव से भी सोने के भाव ऊपर नीचे हो सकते हैं?’’ अनामिका
ने पूछा.

‘‘देखा जाए तो इस समय पूरी दुनिया में अफरातफरी का माहौल बना हुआ है. कितने ही देश जंग की आग में झुलस रहे हैं या फिर जनता का विरोध झेल रहे हैं.

‘‘वैसे, इस साल फरवरी महीने के बाद से अमेरिका की तरफ टैरिफ नीति में बदलाव के बाद भारत में अनिश्चितता और बढ़ती गई, जिस से लोग शेयर बाजार की जगह सोने की तरफ शिफ्ट होने लगे, क्योंकि इसे सेफ इन्वैस्टमैंट माना जाता है.

‘‘भारत और चीन में सोने की खुदरा इन्वैस्टमैंट बढ़ गई है. इन दोनों देशों में सोने के लिए लोगों में ज्यादा चाहत है और दुनिया में सोने की सब से ज्यादा खपत इन्हीं दोनों देशों में होती है.

‘‘एक बात और भी कि भारत में इन दिनों बैंकों में जमा रकम पर काफी कम ब्याज मिल रहा है और इस से भी सोने में इन्वैस्टमैंट के प्रति लोगों का रु झान बढ़ा है. लोग सेविंग एकाउंट में जमा रखने से बेहतर सोने की खरीदारी को मान रहे हैं.

‘‘गोल्ड के ऐक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीए) के प्रति भी लोगों का आकर्षण तेजी से बढ़ रहा है. इस के जरीए कम रकम भी सोने पर लगाई जा सकती है और उस का फायदा सोने की दर के हिसाब से मिलता है.

‘‘देखा जाए तो आजकल अपनी इन्वैस्टमैंट के पोर्टफोलियो में सोना बहुत खास हिस्सा बन गया है. इन सब बातों के अलावा दुनिया के विभिन्न सैंट्रल बैंकों की तरफ से सोने की खरीदारी में तेजी से सोने की मांग बढ़ रही है.

‘‘यूक्रेन और रूस की लड़ाई के बाद से इस खरीदारी में तेजी आई है. अमेरिका, चीन, पोलैंड, भारत जैसे कई देश के सैंट्रल बैंक सोने की ज्यादा खरीदारी कर रहे हैं. मु झे लगता है कि इन्हीं वजहों से सोने की कीमतों में बढ़ोतरी चल रही है.’’

‘‘पर जब से अमेरिका में वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का विरोध शुरू हुआ है, तब से डौलर भी थोड़ा कमजोर सा होता दिख रहा है. क्या इस वजह से भी सोने पर कोई असर पड़ा है?’’ अनामिका ने पूछा.

‘‘ऐसा कहा जा सकता है. पिछले कुछ दिनों से डौलर में कमजोरी देखी जा रही है और जब भी डौलर कमजोर होगा, सोने के दाम बढ़ेंगे. अमेरिका में अभी काफी उथलपुथल है जिस से डौलर के कमजोर होने का डर है. ऐसे में सोने की मांग में तेजी जारी रह सकती है,’’ विजय बोला.

‘‘एक खास वजह यह भी तो है कि सोना धरती पर जितना है, उतना ही रहेगा. इस की प्रोडक्शन बढ़ाई नहीं जा सकती. सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा. दाम तो बढ़ेंगे ही…’’ अनामिका ने अपनी बात रखी.

‘‘तुम ने बिलकुल सही कहा. मांग के मुताबिक कच्चे तेल और सोने जैसे आइटम का प्रोडक्शन नहीं बढ़ाया जा सकता है, क्योंकि निश्चित जगहों पर सोने का खनन हो रहा है,’’ विजय बोला.

‘‘कुछ भी हो, हमारा आज का दिन बड़ा खराब गया. कहां तो हम एंगेजमैंट रिंग खरीदने निकले थे और कहां अब कौफी पर सोने के भाव की चर्चा कर रहे हैं,’’ अनामिका ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘सही कहा तुम ने. मूड का मट्ठा हो गया. एकदम खट्टे वाला,’’ विजय ने हंसते हुए कहा.

‘‘तुम भी न… हर बात में कौमेडी घुसेड़ देते हो. चलो, अब चलते हैं. सोना तो नहीं मिला, अब घर चल कर सोते हैं. अब तो बस यही सोना रह गया है हमारी जिंदगी में,’’ अनामिका ने चुटकी ली.

विजय हैरान सा अनामिका को देखता रह गया. News Story In Hindi

Story In Hindi: आजादी का रंग

Story In Hindi: मीनाक्षी को आज भी अच्छी तरह याद है जब वह लाल जोड़ा पहन कर राजवीर की नईनवेली दुलहन बन कर जटपुर गांव से मेरठ जैसे बड़े शहर में आई थी, तो उस का उस घर में कितना शानदार स्वागत हुआ था.

मुंह दिखाई के समय कैसे राजवीर की पड़ोसनों ने उस की खूबसूरती की तारीफ के पुल बांध दिए थे. राजवीर की मां तो अपनी बहू की तारीफ सुनसुन कर निहाल हो गई थीं. कई दिन तक उसे रसोईघर में भी नहीं घुसने दिया था.

खुशी का पारावार जितना ज्यादा होता है, वहां दुख का वेग भी उतना ही तेज होता है.

राजवीर आईटीआई का डिप्लोमा कर के एक पेपर मिल में इलैक्ट्रिशियन लगा ही था, तभी उस के लिए शादी के रिश्ते आने लगे थे. उस के मांबाप ने अपने एकलौते बेटे की शादी एक खानदानी लड़की मीनाक्षी से करा दी थी.

मीनाक्षी ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, बस इंटर पास. गांव में लड़की इतना भी पढ़लिख जाए तो बहुत. इस के बाद तो मातापिता को उस की शादी की चिंता सताने लगती है.

मीनाक्षी की शहर में आते ही जिंदगी बदल गई. मेरठ शहर की चकाचौंध उसे बहुत रास आई. राजवीर उसे मल्टीप्लैक्स में फिल्म दिखाने ले जाता, बड़ेबड़े मौल में उसे शौपिंग कराता, जबकि गांव में वह भैंस के लिए बड़ी नांद में सानी करती थी, उसे चारा डालती थी. भैंस के नीचे सफाई करना, उसे नहलाना, गोबर उठा कर डालना, बस वह ऐसे ही कामों में तो बिजी रहती थी.

लेकिन शहर के तो जलवे ही अलग थे. हर समय बनठन कर रहना. खाली समय में सोफे पर बैठ कर बड़ी स्क्रीन वाली एलईडी पर सासबहू के सीरियल देखना. अब तो मीनाक्षी के मजे ही मजे थे. उस के सब ख्वाब पूरे हो रहे थे.

अगले ही साल घर में एक बिटिया की किलकारी गूंज उठी. मीनाक्षी ने उस का नाम सपना रखा. सचमुच, उस ने ऐसी ही जिंदगी का सपना तो देखा था. लेकिन इस दुनिया में आने और जाने वालों का तांता लगा ही रहता है.

सपना दुनिया में आई, तो कुछ ही महीनों के बाद उस की दादी इस दुनिया से चल बसीं.

मां के चल बसने पर राजवीर ने घर के कामकाज के लिए एक नौकरानी लगवा दी. कुछ सालों तक सबकुछ ठीक चलता रहा, लेकिन एक दिन बड़ा हादसा हो गया. पेपर मिल में लापरवाही के चलते राजवीर को बिजली का करंट लग गया. मिल के मुलाजिम उसे अस्पताल ले कर गए, लेकिन उसे बचाया न जा सका. घर की आमदनी का मेन जरीया राजवीर ही था. उस के जाते ही घर की आमदनी जीरो हो गई.

राजवीर के पिताजी इतने ज्यादा बूढ़े हो गए थे कि किसी काम के नहीं बचे थे. बेटे के जाने का सदमा उन्हें इतना गहरा लगा कि एक दिन उन का भी हार्ट फेल हो गया.

अब घर की सारी जिम्मेदारी मीनाक्षी के कमजोर कंधों पर आ गई. वह इतनी पढ़ीलिखी तो थी नहीं कि उसे अच्छे ओहदे वाली कोई नौकरी मिल सके. पेपर मिल से मिली मुआवजे की रकम भी कब तक चलती. रिश्तेदारों ने भी जल्दी ही अपने हाथ खड़े कर दिए. आखिर वे भी कब तक मदद करते.

ऐसे ही एक आदमी की सिफारिश पर मीनाक्षी की एक स्कूल में औफिस असिस्टैंट की नौकरी लग गई. मीनाक्षी अभी खूबसूरत और जवान थी. कइयों की निगाहें उस पर टिकने लगी थीं.

मीनाक्षी को नौकरी का सहारा तो मिल गया था, लेकिन 8,000 रुपल्ली की तनख्वाह में बिजली का बिल, राशनपानी, दूध का बिल, घर के और तमाम खर्चे और ऊपर से सपना की पढ़ाई का खर्चा… सब बड़ी मुश्किल से पूरे हो पा रहे थे. जैसेतैसे गृहस्थी चल रही थी. वह आमदनी बढ़ाना चाहती थी, लेकिन चाह कर भी उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.

तभी मीनाक्षी की जिंदगी में सुबोधिनी नाम की एक औरत आई. उस के बच्चे उसी स्कूल में पढ़ते थे, जिस में मीनाक्षी काम करती थी.

सुबोधिनी की नजर बड़ी पारखी थी. वह हमेशा ऐसी औरतों की तलाश में रहती थी, जो बेसहारा हों, लाचार हों, मगर खूबसूरत और जवान हों. वह ऐसी औरतों का ब्रेनवाश करने में माहिर थी.

धीरेधीरे सुबोधिनी ने मीनाक्षी की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया. मीनाक्षी को तो सहारे की जरूरत ही थी. उसे लगा चलो दुनिया में कोई तो है, जो उस से दोस्ती करना चाहती है. सुबोधिनी उसे अच्छी लगने लगी, अपनी रहनुमा लगने लगी.

सुबोधिनी जानती थी कि गरम लोहे पर चोट कब करनी है. जब वह सम झ गई कि मीनाक्षी उस पर भरोसा करने लगी है. तब एक दिन उस ने चाय पीने के बहाने मीनाक्षी से मुलाकात करने का समय मांगा.

सुबोधिनी चाय पीते हुए बोली, ‘‘मीनाक्षी, मु झे बड़ा अफसोस है, तुम इतनी कम उम्र में विधवा हो गई.’’

‘‘दीदी, यह किसी के हाथ में तो था नहीं. जो भाग्य में बदा था, वह हो गया.’’

‘‘अरे पगली, यह कैसी दकियानूसी बातें कर रही है. भाग्य तो चुटकियों में बदल जाता है,’’ सुबोधिनी बोली.

‘‘वह कैसे दीदी?’’ मीनाक्षी ने पूछा.

‘‘आजादी के रंग से,’’ सुबोधिनी ने कहा.

‘‘आजादी के रंग से? दीदी, मैं कुछ समझी नहीं,’’ मीनाक्षी बोली.

‘‘हांहां, आजादी के रंग से. बस, थोड़ी सी हिम्मत होनी चाहिए,’’ सुबोधिनी ने बताया.

‘‘दीदी, ठीक से सम झाओ. पहेलियां सी मत बु झाओ,’’ मीनाक्षी ने हलकी मुसकान के साथ कहा. इस से उस के चेहरे की रंगत और बढ़ गई.

‘‘देखो मीनाक्षी, पुरानी सड़ीगली सोच से छुटकारा पाना ही हम औरतों के लिए बड़ी आजादी है. फिर सम झ लो तुम्हारा जीवन सुनहरा ही सुनहरा है,’’ सुबोधिनी थोड़ा खुल कर बोली.

‘‘लेकिन दीदी, मेरी सोच तो दकियानूसी नहीं है, लेकिन समाज का खयाल तो रखना ही पड़ता है,’’ मीनाक्षी ने अपनी बात रखी.

‘‘वाह मीनाक्षी, वाह. तुम उस समाज का खयाल रखती हो जो सुबह तुम्हारी शक्ल देखना भी पसंद नहीं करता,’’ सुबोधिनी ने ताना मारा.

यह सुन कर मीनाक्षी सोच में पड़ गई.

मौका देखते ही सुबोधिनी ने मीनाक्षी के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘देखो मीनाक्षी, मैं अच्छे से जानती हूं कि 8,000 रुपल्ली में घर का खर्चा भी ठीक से नहीं चलता.’’

‘‘वह तो है दीदी,’’ कहते हुए मीनाक्षी उदास हो गई.

‘‘मीनाक्षी, अगर तुम जरा सी हिम्मत दिखाओ, आजादी के पंख पसारो तो तुम्हारे इन 8,000 रुपए को 80,000 या उस से भी ज्यादा में बदलने में देर नहीं लगेगी.’’

‘‘नहीं दीदी, मैं कोई ऐसावैसा काम नहीं कर सकती,’’ मीनाक्षी ने सुबोधिनी के हाथ से अपना हाथ दूर करते हुए कहा.

‘‘अरे पगली, यह ऐसावैसा क्या होता है? यही तो दकियानूसी है. यह शरीर तुम्हारा है, यह जवानी तुम्हारी है. इस पर तुम्हारा हक है. यह किसी के बाप की जागीर नहीं. बड़ेबड़े रईस और हवस के शिकारी औरतों के तलवे चाटते हैं. नाक रगड़ते हैं औरत के सामने.

‘‘समाज का क्या, वह तो पैसे वालों और रसूखदारों की उंगलियों पर नाचता है. यह ससुरा समाज बेईमानों, निकम्मों और रईसजादों को सलाम ठोंकता है. गरीब को कौन पूछता है. एक बार इस गरीबी और लाचारी के दलदल से बाहर निकल कर तो देख मीनाक्षी, अगर यही समाज तेरे सामने न झुका तो कहना.

‘‘तुम्हारे पास सबकुछ होगा मीनाक्षी, सबकुछ. दौलत, शोहरत, बंगला, गाड़ी सबकुछ,’’ सुबोधिनी ने वहां से उठते हुए कहा.

मीनाक्षी सुबोधिनी की बातें सुन कर सोच में पड़ गई थी. एक तरफ सुबोधिनी की बताई आजादी का रंग था,तो दूसरी तरफ समाज.

सुबोधिनी ने 2-3 बार और ब्रेनवाश कर के मीनाक्षी की इस कशमकश को भी खत्म कर दिया.

फिर एक दिन. देहरादून का एक नामचीन होटल. एक रात. 20,000 रुपए. 15,000 मीनाक्षी के, 5,000 की दलाली सुबोधिनी के.

मीनाक्षी को यकीन ही नहीं हो रहा था. एक रात की कमाई 15,000 भी हो सकती है. उस ने 8,000 रुपल्ली की नौकरी को ठोकर मारी. सपना को स्कूल के होस्टल में डाला और आजादी के रंगीले रंग में डूब गई.

तभी मीनाक्षी की जिंदगी में रतन आया. वह उस का नियमित ग्राहक था, लेकिन दोनों की नजदीकियां इतनी बढ़ीं कि मीनाक्षी उस के साथ जिंदगी गुजारने का सपना देखने लगी.

रतन के पास पैसे की कोई कमी न थी. आखिरकार दोनों ने लिवइन रिलेशनशिप में रहना शुरू कर दिया.
मीनाक्षी रतन को अपने पति की तरह मानने लगी. रतन भी उस का पूरा खर्च उठा रहा था. इस से मीनाक्षी बेफिक्र हो गई.

लेकिन एक दिन रतन गया, तो लौट कर ही नहीं आया. कुछ दिन बाद जब मीनाक्षी ने उसे फोन किया, तो रतन का जवाब सुन कर वह अवाक रह गई.

रतन बोल रहा था, ‘मीनाक्षी, तुम्हारे साथ बहुत अच्छा समय गुजरा. बड़ा मजा आया. अब मैं ने अपनी ही बिरादरी की लड़की से शादी कर ली है. लेकिन तुम्हारे पास भी आता रहूंगा.

तुम मेरे लिए भरपूर बाजार हो. बाय… लव यू,’ इतना कह कर रतन ने फोन काट दिया.

मीनाक्षी के मन में ‘भरपूर बाजार’ शब्द हथौड़े की तरह चोट कर रहा था. वह मन ही मन सोचने लगी, ‘एक बार ‘बाजारू’ होने का कलंक माथे पर लग जाए, तो यह कलंक लाख कोशिश करने पर भी उतरता नहीं.

औरत को बाजारू बनाने वालों को भी लड़की सती सावित्री ही चाहिए, चाहे खुद ने सौ जगह मुंह मार रखा हो.’

मीनाक्षी पुराने ग्राहकों के नंबर तलाशने लगी. रतन से बंधन टूटा, तो आजादी का रंग और निखरा. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: बांगुर बाबा और कमली

Best Hindi Kahani: कमली ने आसमान की ओर देखा. उस ने अंदाजा लगाया कि शायद शाम के 4 बजे हैं. उस का पति कलुआ थकहार कर 5 बजे तक घर आएगा.

यह सोच कर दीवार की ओर लगे एक आईने के सामने खड़े हो कर कमली ने सिंगार करना शुरू कर दिया. सिंगार के बाद कमली ने अपनेआप को आईने में देखा, तो खुद ही शरमा गई.

कमली की उम्र 28 साल के आसपास थी. उस का शरीर लंबा और इकहरा था. पतली कमर और पेट के बीच गहरी नाभि कमली को और भी मादक बनाती थी.

कमली का रंग सांवला जरूर था, पर उस का पतला चेहरा, सुतवां नाक और नशीली आंखें उसे बहुत खूबसूरत बनाती थीं.

आसपास के कई गांवों में भी कमली जैसी मदमस्त औरत नहीं थी. गांव के सभी नौजवान यहां तक कि बड़ी उम्र के मनचले भी कमली को देख कर आहें भरते थे. पर मजाल है कि कमली किसी के फेर में आ जाए.

स्वभाव से कमली एक तेजतर्रार औरत थी, जो मर्दों की नजरों को पढ़ना अच्छी तरह जानती थी. तभी तो जब भी वह गांव के बाजार में सौदा लेने जाती, तो मनचलों की नजरें उस के खूबसूरत जिस्म और उभरे और सुडौल सीने को घूरती रहतीं. लोगों का घूरना कमली अच्छी तरह समझती थी.

कमली के उभार उस की चोली से झांकते तो वह अपने सीने पर धीरे से आंचल डाल लेती, जिस से ‘आह’ भरते मर्द मन मसोस कर रह जाते थे.

अभी कमली अपने रूप को आईने में निहार कर खुद पर मोहित हो ही रही थी कि कलुआ घर आ गया. उस ने सिर पर पगड़ी के रूप में बंधा कपड़ा निकाल फेंका और खटिया पर बैठ गया.

कमली उसे देख कर मुसकराई, पर कलुआ से मुसकराया भी नहीं गया. कमली रसोई से गुड़ और पानी ले कर आई. कलुआ से बैठा नहीं जा रहा था, सो वह खटिया पर ही पसर गया.

कमली ने पानी पीने के लिए बारबार कहा, तो कलुआ ने थोड़ा गुड़ और पानी पिया और फिर खटिया पर लेट गया.

लोटा एक ओर सरका कर कमली भी खटिया पर कलुआ के बगल में ही लेट गई और अपना सिर कलुआ के सीने पर रख दिया. वह अपनी उंगलियां कलुआ के जिस्म पर घुमाने लगी. ऐसा कर के कमली कलुआ के साथ प्यार करना और संबंध बनाना चाह रही थी, पर कलुआ के शरीर में कोई हलचल नहीं हुई. ठंडा सा पड़ा रहा वह. मर्दाना शरीर में कोई तनाव भी नहीं आया.

कमली सम झ गई थी कि आज भी ठाकुर ने कलुआ को बुराभला कहा है.

‘‘ठाकुर ने कुछ कहा क्या?’’ कमली ने पूछा.

‘‘बारबार कर्जा चुकता करने को कहते हैं, जबकि पैसे तो मैं कई बार लौटा चुका हूं, पर,’’ आगे कुछ नहीं बोल सका था कलुआ.

एक बार कमली के बीमार पड़ने पर कलुआ ने गांव के ठाकुर से 1,000 रुपए उधार लिए थे, जिन्हें बाद में धीरेधीरे कर के चुका भी दिया था, पर ठाकुर के मुताबिक अभी तक उस ने आधी रकम ही चुकता की थी, इसलिए वे बाकी के पैसों की मांग किए जा रहे थे.

कमली मन ही मन विचार करने लगी थी कि उसे ही इस समस्या के समाधान के लिए कुछ करना होगा.
अगले दिन सुबह के तकरीबन 11 बजे कमली ठाकुर की कोठी पर पहुंच गई. आंगन के बाहर ही 40 साल की खूबसूरत ठकुराइन दिख गईं. कमली ने ठकुराइन को ‘नमस्ते’ किया.

‘‘आओ कमली, कैसे आना हुआ?’’ ठकुराइन नरम स्वभाव की थीं. उन की मीठी आवाज सुन कर कमली को अच्छा लगा, तो उस ने बताया कि वह कर्जे के बारे में ठाकुर साहब से कुछ बात करना चाहती है.

अभी ठकुराइन कुछ कह पातीं कि इतने में ठाकुर अंदर से आ गए. उन की उम्र तकरीबन 50 साल थी, पर शक्ल से वे अभी जवान ही दिखते थे.

ठाकुर अकसर ठकुराइन से नाराज रहते थे, क्योंकि अब तक ठकुराइन के कोई बच्चा नहीं था. ठाकुर इस बात की जिम्मेदार ठकुराइन को मानते थे और इसी वजह से वे उन्हें खरीखोटी सुनाते और परेशान करते थे.

ठाकुर को आता देख कर ठकुराइन झट से अंदर चली गईं.

कमली की कर्जे वाली बात ठाकुर ने सुनी और उन्होंने एक हवस भरी नजर कमली के सीने और पेट पर डाली और कहा, ‘‘अगर तू मेरे साथ एक रात बिताने को तैयार हो जाए, तो मैं कलुआ का सारा कर्जा माफ कर दूंगा.’’

‘‘वाह, ठाकुर साहब वाह, ऐसे तो तुम लोग हम अछूतों का छुआ पानी भी नहीं पीते, पर हमारे बदन को चाटने से भी तुम्हें परहेज नहीं,’’ कमली गुस्से में भर कर बोली और पैर पटकते हुए वापस चली आई.

ठाकुर को कमली की इस अदा पर गुस्सा नहीं आया, बल्कि वे कमली के तेजी से ऊपरनीचे होते कूल्हों को देख कर निहाल हुए जा रहे थे. वे जानते थे कि परेशान हो कर एक दिन कमली उन के पास आ ही जाएगी.

और सच भी यही था कि कलुआ की परेशानी को देखते हुए कमली ने सोचा कि अपना शरीर एक रात के लिए ठाकुर को सौंप देने में कोई बुराई तो नहीं है. सुबह उठ कर नहाधो लेगी, कम से कम कलुआ को तो ठाकुर परेशान तो नहीं करेंगे.

कमली इसी उधेड़बुन में थी कि उस ने सामने से एक भीड़ को आते देखा. ‘बांगुर बाबा की जय, बांगुर बाबा की जय’ के नारे लग रहे थे. गुलाबी रंग के कपड़े पहने हुए कुछ लोग हाथ में बैनर उठाए हुए थे और एक आदमी परचे बांट रहा था.

कमली को भी परचा मिला, पर वह तो अनपढ़ थी, इसलिए कुछ न पढ़ सकी. भीड़ में से एक आदमी से पूछने पर उस ने बताया कि इसी गांव के बाहरी छोर पर बांगुर बाबा ने अपना पंडाल लगाया है, जहां पर वे गरीबों की मदद करेंगे और बेऔलाद औरतों को ऐसा मंत्र देंगे, जिस से उन के औलाद हो जाएगी. सभी लोगों के कष्ट हरने का तरीका भी है बांगुर बाबा के पास.

कमली बांगुर बाबा की इन शक्तियों के बारे में सुन कर बहुत खुश हो गई और मन ही मन उन के पास जाने का विचार करने लगी.

अगले दिन जब कलुआ काम पर चला गया तो कमली उसे बिना बताए गांव के बाहर लगे बांगुर बाबा के पंडाल में पहुंच गई.

भीड़ अभी आनी शुरू हुई थी. बांगुर बाबा के आदमी एक ओर मेजकुरसी डाल कर कागज पर आने वाले लोगों का नामपता और उन की समस्याएं लिख रहे थे और बारीबारी बांगुर बाबा के पास एक दूसरे छोटे से पंडालनुमा कमरे में भेज रहे थे. वे अंदर जाने वाले के सिर पर एक गुलाबी रंग का कपड़ा भी बांध रहे थे.

कमली भी बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार कर रही थी. उस की बारी आई तो धड़कते दिल के साथ उस ने अपना नामपता और समस्या लिखवा दी.

‘हम गरीब हैं और हम पर ठाकुर का कर्जा है…’ कमली की यह समस्या लिख दी गई और उस के सिर पर गुलाबी कपड़ा बांध दिया गया. फिर कमली को अंदर भेज दिया गया.

अंदर जा कर कमली ने देखा कि बांगुर बाबा कोई बूढ़ा आदमी तो नहीं, बल्कि यही कोई 50-52 साल का आदमी था, पर उस ने किसी बाबा की तरह अपने चेहरे पर दाढ़ी जरूर बढ़ा रखी थी.

बाबा के पास ही एक बरतन में आग सुलग रही थी, जिस पर वह बीचबीच में कोई पाउडर सा डाल देता था.

बांगुर बाबा ने कमली को ऊपर से नीचे तक जम कर घूरा और कहा कि उस की गरीबी जरूर दूर होगी, बस वह शांत बैठी रहे.

बांगुर बाबा कुछ देर तक पता नहीं क्या बुदबुदाता रहा और उस के आगेपीछे घूमने लगा और फिर उस ने कमली की पीठ पर हाथ रख दिया. बांगुर बाबा की इस छुअन से कमली चौंक गई. उसे लगा कि बांगुर बाबा की नीयत में कुछ खोट है.

कमली ने विरोध करते हुए खड़े हो कर भागना चाहा, पर वह ऐसा कर नहीं सकी, बल्कि उस का सिर भारी हो जाने के चलते उसे नींद सी आने लगी और वह बेहोश हो कर एक ओर लुढ़क गई.

जब कमली होश में आई, तो उस के बदन पर एक भी कपड़ा नहीं था. बांगुर बाबा एक ओर बैठा हुआ चिलम फूंक रहा था.

कमली ने तेजी से कपड़े पहनने शुरू कर दिए और खा जाने वाली नजरों से बांगुर बाबा को घूरने लगी. हालांकि, कमली का शरीर अभी भी बो िझल सा था, पर फिर भी उस ने पास में रखी हुई एक सुराही को उठा कर बांगुर बाबा के सिर पर मारना चाहा, पर बांगुर बाबा पहले से ही सतर्क था.

‘‘ज्यादा शोर मचाने की जरूरत नहीं है. यह देख तेरे नंगे जिस्म की वीडियो फिल्म कैद है इस में,’’ कहते हुए बांगुर बाबा ने एक बड़े से मोबाइल की स्क्रीन को कमली की तरफ दिखाया.

कमली ने देखा कि उस मोबाइल में उस का नंगे जिस्म के हर हिस्से की वीडियो फिल्म कैद थी.

कमली फफक पड़ी. उस की इज्जत लुट चुकी थी. अपने शरीर को तो उस ने ठाकुर को भी नहीं छूने दिया जो उस का कर्जा माफ कर देता, पर बांगुर बाबा ने उस के भरोसे का कत्ल कर दिया. उसे बेहोश कर के उस की इज्जत लूटी और वीडियो फिल्म भी बना ली.

कमली रोने लगी थी और तेजी से बाहर की ओर भागी. कुछ भी हो अब वह कलुआ को अपनी यह शक्ल
नहीं दिखाएगी. तेज कदमों से वह गांव के बाहर नदी की ओर बढ़ती जा रही थी.

नदी के पुल पर पहुंच कर कमली ने नीचे बहती धार को देखा, तो वह ठिठक गई.

कमली ने सोचा कि वह तो मर जाएगी, पर उस के बाद कलुआ का क्या होगा. इस भरी दुनिया में उसे तो दो रोटी देने वाला भी कोई नहीं है. ठाकुर जब उस पर जुल्म करेगा, तो किस के आंचल में मुंह छिपाएगा कलुआ? और फिर उस के साथ गलत काम तो बांगुर बाबा ने किया है, सजा तो उसे मिलनी चाहिए, तो वह भला अपनी जिंदगी क्यों खत्म करे?

कमली इसी ऊहापोह के बीच वापस अपने घर पहुंची और अपने घर के आंगन में लगे नल से 2-3 बालटी पानी भरा और अपने बदन को रगड़रगड़ कर साफ कर के नहाने लगी.

शाम को आज कलुआ फिर परेशान दिखा. उसे ठाकुर ने बुराभला कहा था और तमाचे भी रसीद किए थे. कमली का सब्र जवाब दे रहा था. उस के दिमाग में ठाकुर का जुल्म, बांगुर बाबा और ठकुराइन के चेहरे लगातार घूम रहे थे. वह मन ही मन कोई योजना बना रही थी.

इस घटना को 2-3 बीत गए थे. कमली जानती थी कि हर शनिवार को ठाकुर शहर जाते हैं, इसलिए वह ठाकुर के जाने के बाद ठकुराइन से मिलने जा पहुंची और उन का दुख बांटने लगी, ‘‘अब तो ठाकुर साहब की उम्र भी हो चली है. एकाध साल में बच्चा नहीं हुआ तो जिंदगीभर बां झ होने का ठप्पा लगा रहा जाएगा आप पर.’’

ठकुराइन के चेहरे पर आई उदासी और निराशा को पढ़ते हुए कमली ने उन्हें बांगुर बाबा के बारे में बताया और यह भी कहा कि बांगुर बाबा किसी भी समस्या को हल कर देते हैं.

‘‘अच्छा, पर कैसे?’’ पूछते हुए ठकुराइन के चेहरे की चमक बढ़ गई.

‘‘अलगअलग समस्या के हल के लिए अलगअलग दाम है. मसलन, पति किसी दूसरी औरत के चक्कर में फंसा हो तो 2,000 रुपए और बच्चा होने के लिए वे 5,000 रुपए लेते हैं. और ये सारे काम वे शनिवार की शाम को होते हैं,’’ कमली ने जोश के साथ बताया.

ठकुराइन किसी भी तरह से एक औलाद चाहती थीं. वे कमली की बातें सुन कर राजी हो गईं.

‘‘ठीक है कमली, मैं बांगुर बाबा के पास जाऊंगी… तुम रुको,’’ ठकुराइन अंदर जा कर 5,000 रुपए ले आईं.

‘‘ये पैसे आप मत रखो. मु झे दे दो. मैं बांगुर बाबा को दे दूंगी, क्योंकि मैं इस से पहले भी उन के पास जा चुकी हूं और वे मु झे अच्छी तरह से जानते हैं,’’ कमली ने कहा तो ठकुराइन ने तुरंत ही पैसे उसे दे दिए.

कमली ने पैसों को अच्छी तरह से अपनी चोली में छिपा लिया था. ठकुराइन किसी भी हाल में आज शनिवार की शाम को ही बांगुर बाबा से मिल लेना चाहती थीं.

कमली और ठकुराइन सब की नजरों से बचतेबचाते हुए बांगुर बाबा के पंडाल पर पहुंचीं और कमली ने बांगुर बाबा के चेलों को ठकुराइन की समस्या लिखवा दी.

चेलों ने ठकुराइन के सिर पर गुलाबी रंग का कपड़ा बांध दिया, जिस के बाद ठकुराइन अंदर चली गईं और कमली कुछ देर रुक कर मुसकराती हुई वापस अपने घर चली गई. अपनी योजना के पहले चरण में तो वह कामयाब हो गई थी.

2-3 दिन के बाद कलुआ और कमली ने पंचायत के सदस्यों से अर्ज किया कि वे पंचायत के सामने अपनी कुछ फरियाद रखना चाहते हैं और पंचायत में ठाकुर साहब को भी बुलाया जाए.

पंचों ने ठाकुर को बुला भेजा, पर ठाकुर अपनी अकड़ में थे, सो पंचों के बुलाने पर नहीं आए. पर पंचों के बारबार कहने और पंचायत का मान रखने के लिए आखिरकार ठाकुर पंचायत में आ गए. गांव के बड़ेबूढ़े, मर्दऔरतें और बच्चे वहां जमा हुए और पंच एक आसन पर विराजे.

एक पंच ने कहना शुरू किया, ‘‘यह पंचायत कमली और कलुआ की अर्ज पर बुलाई गई है. तो बताओ कमली, तुम्हें क्या कहना है?’’

कमली खड़ी हुई और तेज आवाज में उसने कहा, ‘‘मेरे पति ने कई साल पहले ठाकुर साहब से 500 रुपए बतौर कर्ज लिए थे, जिन्हें पूरे ब्याज के साथ हम लौटा भी चुके हैं, पर फिर भी ठाकुर साहब नहीं मानते कि हम ने पैसे लौटाए हैं और वे लगातार मेरे मर्द पर जुल्म करते रहते हैं.’’

‘‘तुम ने कर्जा लौटा दिया है, इस का क्या सुबूत है तुम्हारे पास?’’ ठाकुर बीच में ही दहाड़ पड़े.

कमली ने जवाब दिया, ‘‘हम अनपढ़ लोग हैं और हमारे पास कोई सुबूत नहीं है कि हम कर्जा दे चुके हैं, इसलिए अपनी गलती को संभालते हुए हम आज भरी पंचायत में दोबारा अपना कर्जा चुकता करने को तैयार हैं. पर इस शर्त के साथ कि कलुआ आज के बाद ठाकुर के घर बंधुआ मजदूरी नहीं करेगा और ठाकुर हम से दोबारा पैसे नहीं मांगेंगे.’’

कमली की बात सुन कर किसी को भला क्या एतराज होता. कलुआ ने अपनी जेब से पूरे 1,000 रुपए निकाले और पंचों के सामने गिन कर ठाकुर की ओर बढ़ा दिए.

ठाकुर दांत पीसते हुए सोचने लगे, ‘‘इन लोगों के पास एकदम से इतना पैसा कहां से आ गया?’’ पर बात पंचायत और सब के सामने थी, इसलिए उन्होंने पैसे ले लिए और यह ऐलान कर दिया कि अब कलुआ उन का कर्जदार नहीं है और न ही वह उन का बंधुआ मजदूर है.

कलुआ को अपने कानों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था कि अब उसे ठाकुर की गालियां नहीं सुननी पड़ेंगी और न ही उन के घर पर काम करना पड़ेगा. आज वह ठाकुर के कर्ज से छुटकारा पा गया था.

रात को कमली ने चिलम में तंबाकू भरी और कलुआ ने चिलम जलाई. कलुआ ने भी दम मारा और कमली
ने भी. दोनों आंगन में खटिया डाल कर लेट गए.

‘‘तू यह तो बता कि 1,000 रुपए लाई कहां से? क्या ठाकुर से अपने जिस्म का सौदा कर किया है?’’

कलुआ ने कमली के उभारों पर अपने हाथ का दबाव बढाते हुए पूछा तो कमली ने मुसकराते हुए कहा कि वह खाली आम खाए पेड़ गिनना छोड़ दे.

कलुआ कमली की बात सुन कर मुसकराने लगा और अपने चेहरे को कमली के उभरे सीने के बीच रख दिया और उस के हाथ कमली के चिकने जिस्म पर फिसलने लगे.

कमली ने महसूस किया कि आज कलुआ उसे जी भर कर प्यार कर रहा था. आज कलुआ के बदन में बहुत तनाव था. कलुआ और कमली के जोर से खटिया भी मधुर शोर करने लगी थी.

आज अचानक तकरीबन 4 महीने के बाद ठकुराइन और कमली की मुलाकात हुई. दोनों की नजरों में जो बात हुई उसे वे दोनों ही सम झ सकीं. ठकुराइन की शरमाती नजरें यह बताने के लिए काफी थीं कि बांगुर बाबा से उस शाम की मुलाकात के बाद वे पेट से हो गई हैं.

‘‘ठाकुर साहब को उन के पिता बनने की खबर बता दी है. वे बहुत खुश हैं,’’ ठकुराइन ने फुसफुसाते हुए कहा, तो कमली भी मुसकराए बिना नहीं रह सकी.

‘‘पर बांगुर बाबा ने हमारी वीडियो फिल्म बना ली है. यह बात हम किसी को नहीं बताएंगे,’’ कमली ने कहा तो ठकुराइन ने भी कमली से फुसफुसाते हुए कहा, ‘‘हां भई, नदी के घाट पर नहाते समय तो सब नंगे ही होते हैं.’’

दोनों ने एकदूसरे के हाथों को जोर से दबाया और अपनेअपने रास्ते चल पड़ीं. कमली यह सोच कर खुश हो रही थी कि किस तरह से उस ने एक तीर चला कर कई शिकार कर लिए हैं.

समय आने पर ठकुराइन ने एक बच्चे को जन्म दिया. ठाकुर ने पूरे गांव में दावत दी और जम कर मजा किया. पड़ोस के गांव से नाचनेगाने वाली बुलाई गई और रातभर नौटंकी के मजे लिए गए. रातभर यह गाना बजता रहा, ‘लौंडिया लंदन से लाएंगे, रातभर उसे नचाएंगे…’

आखिरकार ठाकुर को उन का वारिस मिल ही गया था. भले ही वे यह नहीं जान सके थे कि वे उस बच्चे के असली पिता नहीं हैं.

कलुआ को अपनी जीविका चलाने के लिए कुछ काम तो करना ही था और कमली के पास ठकुराइन के दिए हुए पूरे 4,000 रुपए बाकी थे. इन पैसों से कमली ने घर के लिए 2-3 महीने का राशन लिया और एक लकड़ी का खोखा बनवाया, जिसे गांव के बाहर जाने वाली सड़क के किनारे रखवा दिया गया, जिस में टौफी, बिसकुट, तंबाकू, पानी की बोतल, गुटका वगैरह रख कर वे दोनों अपनी जीविका चलाने लगे.

ठाकुर को औलाद मिल गई थी. ठकुराइन को ठाकुर की नजरों में इज्जत मिल रही थी. कलुआ को कमाई का साधन और मजदूरी से छुटकारा मिल गया था, पर बांगुर बाबा किसी और गांव में समस्याओं को हल करने की आड़ में गरीब और भोलेभाले लोगों का शोषण कर रहा था.

ऐसे न जाने कितने बांगुर बाबा अभी भी समाज में हैं और अंधविश्वास का फायदा उठा रहे हैं. केवल पढ़ाईलिखाई और जागरूकता ही लोगों को ऐसे बांगुर बाबाओं से बचा सकती है. Best Hind Kahani

Hindi Romantic Story: प्यार की कोई हद नहीं

Hindi Romantic Story: मेरा नाम धीरज है. वह दिन मेरी यादों में अब भी ताजा है, जैसे कल ही की बात हो. उस समय मैं एक अल्हड़, नासमझ नौजवान था. सपनों की दुनिया में जीने वाला, जिसे प्यार के गहरे मतलब का पता तक न था. गांव के सालाना मेले में, भीड़भाड़ और ढोलनगाड़ों के बीच, मेरी नजर अचानक सीमा पर ठहर गई.

सीमा अपने दोस्तों के साथ हंसते हुए बातें कर रही थी. उस की हंसी में इतनी कशिश थी कि आसपास की रौनक भी फीकी लगने लगी. वह बस मुसकरा रही थी और मैं उस मुसकान में अपने भविष्य का कोई अक्स देखने लगा.

पहली नजर के बाद, हमारी मुलाकातें धीरेधीरे आम हो गईं. कभी कुएं से पानी भरते हुए वह मेरे पास से गुजर जाती, कभी आम के बगीचे के रास्ते पर अचानक सामना हो जाता.

शुरू में मैं दूर से उसे निहारने तक ही सीमित था, पर समय के साथसाथ हमारी आंखें बोलने लगीं. उन चोरीचुपके पलों में हम ने सपने बुने.

सीमा कहती, ‘‘धीरज, हमारा एक छोटा सा घर होगा, उस का दरवाजा नीला होगा. खिड़की से धूप और हवा भरपूर आएगी. पिछवाड़े तुलसी का पौधा होगा.’’

हम दोनों अपनी ही बनाई दुनिया में खोए रहते. मुझे लगता था, अगर हमारे दिल साफ हैं, तो पूरा संसार हमारे साथ खड़ा होगा. पर मैं गलत था.

एक शाम हम खेतों के किनारे बैठे थे. आकाश में डूबता सूरज था और दूर से बैलों की घंटियां सुनाई दे रही थीं.

सीमा अपनी चूडि़यों से खेल रही थी और मैं उस के चेहरे को चुपचाप देख रहा था. तभी कदमों की तेज आहट सुनाई दी. उस के पिता और उस का भाई वहां आ गए थे. चेहरे पर गुस्सा, आंखों में समाज की पुरानी दीवारें.

सीमा के पिता की आवाज भारी थी, जैसे किसी ने पत्थर फेंका हो, ‘‘कौन हो तुम? अपनी औकात भूल गए हो? हमारी जाति से बाहर का हो कर भी हमारी बच्ची पर अपनी नजरें उठाने की हिम्मत कैसे की?’’

सीमा के भाई ने एक कदम आगे बढ़ा कर उंगली मेरे सीने पर टिका दी, ‘‘अगली बार सीमा के आसपास भी दिखे, तो याद रखना कि अंजाम बहुत बुरा होगा.’’

उस पल मेरी सांसें थम सी गईं. मैं कुछ कहना चाहता था. शायद यह कि प्यार जाति नहीं देखता या कि सीमा और मैं बस सपने देख रहे थे. लेकिन मेरे होंठ सूख गए. दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि लगा वे लोग आवाज भी सुन लेंगे. मेरा गला खुश्क हो गया, जैसे किसी ने वहां कांटे भर दिए हों.

मैं ने उन की आंखों में देखना चाहा, पर हिम्मत नहीं जुटा पाया.

सीमा मेरी ओर देख रही थी. उस की आंखों में डर था, पर एक उम्मीद भी. शायद वह चाहती थी कि मैं कुछ कहूं, कुछ बोलूं. लेकिन मैं खामोश खड़ा रहा. उस खामोशी ने हमारे सपनों की बुनियाद को हिला दिया.

उस रात मैं बहुत देर तक जागता रहा. हर बार सोचा कि कल जा कर सीमा से कह दूंगा कि डरना नहीं चाहिए. पर सुबह होतेहोते मेरा साहस बुझ गया. गांव के लोगों की निगाहें, उन की बातें, उस के पिता और भाई के गुस्से का खौफ सब मिल कर मेरे सीने पर पत्थर सा दबाव डाल रहे थे.

दिन बीतते गए. मैं अब वे रास्ते बदलने लगा, जहां सीमा दिख सकती थी. मेरे भीतर अपराधबोध कचोटता रहा. हर बार जब मैं कुएं के पास से गुजरता, तो लगता कि वहां हमारी हंसी की गूंज अब मुझे डांट रही है. रातों को, जब अकेला होता, तो खुद को कोसता. ‘तुम ने क्यों नहीं कुछ कहा? क्यों नहीं खड़े हुए उस के लिए?’ लेकिन सुबह होते ही वही डर मुझे जकड़ लेता.

सीमा की शादी की खबर बिजली सी गिरी मेरे ऊपर. गांव में ढोलनगाड़े गूंज रहे थे, लोग शादी के भोज के मजे ले रहे थे, पर मेरे भीतर एक सन्नाटा था. शादी के दिन मैं अपने घर की छत पर खड़ा था.

मैं ने उसे दुलहन के लिबास में देखा… वह बहुत खूबसूरत लग रही थी, पर उस की मुसकान में एक अजीब सी थकान थी या शायद यह मेरे टूटे हुए दिल की कल्पना थी. बरात आई, शहनाइयां बजीं. जब उस की डोली उठी, तो मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे भीतर से कुछ खींच लिया हो.

सीमा के जाने के बाद, गांव वैसा नहीं रहा. आम के बगीचे अब सूने लगते, मेले की भीड़ में अब संगीत नहीं, शोर सुनाई देता था.

मैं अकसर उन रास्तों पर भटकता जहां हमने सपने देखे थे. हर जगह मुझे अपनी ही बुजदिली का अक्स दिखाई देता.

मैं ने कभी उसे अपने प्यार का इजहार नहीं किया और शायद यही मेरी सब से बड़ी भूल थी. न कि समाज
की दीवारें.

अब, सालों बाद भी, जब मैं उन दिनों को याद करता हूं, तो एक कसक उठती है. सीमा मेरी जिंदगी का वह अध्याय है जिसे मैं न तो मिटा सकता हूं, न ही जी सका हूं. मैं जानता हूं, प्यार शायद अब उस की जिंदगी में किसी और रूप में बसा होगा, पर मेरे दिल में वह अब भी वही लड़की है. नीले दरवाजे वाले घर के सपने देखने वाली.

मेरे लिए वह प्यार एक अनदिखे धागे की तरह है, जिसे समाज की सीमाएं तोड़ नहीं सकीं, पर मेरे अपने डर ने उसे अधूरा छोड़ दिया. Hindi Romantic Story

Hindi Story: नया खिलौना – जब खेल बना श्रुति का प्यार

Hindi Story: आज श्रुति की खुशी का ठिकाना न था. स्कूल से आते समय उस लड़के ने मुसकरा कर उसे फ्लाइंग किस जो दी थी. 16 साल की श्रुति के दिल की धड़कनें बेकाबू हो उठी थीं. वह पल ठहर सा गया था. वैसे उस लड़के के साथ श्रुति की नजरें काफी दिनों पहले ही चार हो चुकी थीं. आतेजाते वह उसे निहारा करता. श्रुति को भी ऊंचे और मजबूत कदकाठी का करीब 18 साल का वह लड़का पहली नजर में भा गया था. लड़का श्रुति के घर से कुछ दूर मेन रोड पर बाइक सर्विसिंग सैंटर में काम करता था.

श्रुति की एक सहेली उस लड़के को जानती थी. उसी सहेली ने बताया था कि जतिन नाम का एक लड़का अपने घर का इकलौता बेटा है और 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद कुछ घरेलू परेशानियों के कारण काम करने लग गया है.

घर में सब के होने के बावजूद श्रुति बारबार बरामदे में आ कर खड़ी हो जाती ताकि उस लड़के को एक नजर फिर से देख सके. श्रुति के दिल की यह हालत करीब 2 महीने से थी पर  आज इस प्रेम की गाड़ी को रफ्तार मिली जब उस लड़के ने उस से साफ तौर पर अपनी चाहत जाहिर की.

अब श्रुति का ध्यान पढ़ाई में जरा सा भी नहीं लग रहा था. उस की नजरों के आगे बारबार वही चेहरा घूम जाता. हाथ में मोबाइल थामे वह लगातार यही सोच रही थी कि उस लड़के का मोबाइल नंबर कैसे हासिल करे.

बहन की उलझन भाई ने तुरंत भांप ली. श्रुति को भी तो कोई राजदार चाहिए ही था. उस ने अपने मन की हर बात खुद से 2 साल छोटे भाई गुड्डू से कह दी. भाई ने भी अपना फर्ज अच्छी तरह निभाते हुए झट श्रुति का फोन नंबर एक कागज पर लिखा और उस लड़के के पास पहुंच गया.

‘यह क्या है?’ उस के सवाल पूछने पर गुड्डू ने बड़ी तेजी से जवाब दिया, ‘खुद समझ जाओ.’

कागज थमा कर वह घर चला आया और श्रुति मोबाइल हाथ में ले कर बड़ी बेचैनी से कौल का इंतजार करने लगी. मोबाइल की घंटी बजते ही वह दौड़ कर छत पर चली जाती ताकि अकेले में उस से बातें कर सके. मगर नंबर दिए हुए 3 घंटे बीत गए, पर उस लड़के की कोई कौल नहीं आई.

उदास सी श्रुति छत पर टहलती रही. उस की निगाहें लगातार उस लड़के पर टिकी थीं जो अपने काम में मशगूल था. थक कर वह किचन में मम्मी का हाथ बंटाने लगी कि मोबाइल पर छोटी सी रिंग हुई. श्रुति फोन के पास तक पहुंचती तब तक मोबाइल खामोश हो चुका था. गुस्से में  वह फोन पटकने ही वाली थी कि फिर उसी नंबर से कौल आई. पक्का वही होगा, सोचती हुई वह कूदती हुई छत पर पहुंच गई. अपनी बढ़ी धड़कनों पर काबू करते हुए हौले से ‘हैलो’ कहा तो उधर से ‘आई लव यू’ सुन कर उस का चेहरा एकदम से खिल उठा.

‘‘मैं भी आप को बहुत पसंद करती हूं. मुझे आप की हाइट बहुत अच्छी लगती है,’’ श्रुति ने चहक कर कहा.

‘‘बस हाइट और कुछ नहीं,’’ कह कर जतिन हंसने लगा. श्रुति शरमा गई फिर तुनक कर बोली, ‘‘फोन करने में इतनी देर क्यों लगाई?’’

‘‘अच्छा, इतना इंतजार था मेरी कौल का?’’ वह भी मजे ले कर बातें करने लगा.

श्रुति और जतिन देर तक बातें करते रहे. रात में श्रुति ने फिर से उसे कौल लगा दी. अब तो यह रोज की कहानी हो गई. श्रुति जब तक दिन में 10 बार उस से बातें नहीं कर लेती, उस का दिल नहीं भरता. एग्जाम आने वाले थे पर श्रुति का ध्यान पढ़ाई में कहां लग रहा था. वह तो खयालों की दुनिया में उड़ रही थी.

अकसर वह जतिन से मिलने जाती. जतिन श्रुति को चौकलेट्स और शृंगार का सामान ला कर देता तो वह फूली नहीं समाती. उस से बातें करते समय वह सबकुछ भूल जाती. ठीक उसी प्रकार जैसे बचपन में अपने खिलौने से खेलते हुए दुनिया भूल जाती थी.

उस लड़के का प्यार एक तरह से श्रुति के लिए खिलौने जैसा लुभावना था जिसे वह दुनिया से छिपा कर रखना चाहती थी. उसे डर था कि कहीं किसी को पता लग गया तो वह प्यार उस से छीन लिया जाएगा. पापा से वह खासतौर पर डरती थी. पापा ने एक बार गुस्से में उस का सब से पहला खिलौना तोड़ दिया था. तब से वह उन से खौफजदा रहने लगी थी. अपनी जिंदगी में जतिन की मौजूदगी की भनक तक नहीं लगने देना चाहती थी.

और फिर वही हुआ जिस का डर था. उस का 9वीं कक्षा का फाइनल रिजल्ट अच्छा नहीं आया. पापा ने रिजल्ट देखा तो बौखला गए. चिल्ला कर बोले, ‘‘बंद करो इस की पढ़ाईलिखाई. बहुत पढ़ लिया इस ने. अब शादी कर देंगे.’’

श्रुति सहम गई. कहीं यह खिलौना भी पापा छीन न लें. यह सोच कर रोने लगी. अब वह 10वीं कक्षा में आ गई थी. फाइनल एग्जाम में किसी भी तरह उसे अच्छे नंबर लाने थे. वह मन लगा कर पढ़ने लगी ताकि एग्जाम तक उस की परफौर्मैंस सुधर जाए. इधर जतिन भी दूसरी जौब करने लगा था. अब वह श्रुति को हर समय नजर नहीं आ सकता था. वह कभीकभार ही मिलने आ पाता. श्रुति भी उस से कम से कम बातें करती. एग्जाम में वह अच्छे नंबर ले कर पास हो गई. समय धीरेधीरे बीतता गया और अब श्रुति उस लड़के से बातचीत भी बंद कर चुकी थी. देखतेदेखते वह 12वीं की भी परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर गई. अच्छे अंकों से पास करने से उसे अच्छे कालेज में दाखिला भी मिल गया.

कालेज के पहले दिन वह बहुत अच्छे से तैयार हुई. कुछ दिनों पहले ही बालों में रिबौंडिंग भी करा चुकी थी. जींस और टीशर्ट के साथ डैनिम की जैकेट और खुले बालों में काफी स्मार्ट लग रही थी. उस ने खुद को मिरर में निहारा और इतराती हुई सहेली के साथ निकल पड़ी.

कालेज गेट के पास अचानक वह सामने से आते एक लड़के से टकरा गई. सौरी कहते हुए उस लड़के ने श्रुति के हाथ से गिरा हैंडबैग उसे थमाया और एकटक उसे निहारने लगा. श्रुति का दिल तेजी से धड़कने लगा. बेहद आकर्षक व्यक्तित्व वाला वह लड़का श्रुति को पहली नजर में भा गया था. वह दूर तक पलटपलट कर उस लड़के को देखती रही.

कालेज में पूरे दिन श्रुति की नजरें उसी लड़के को ढूंढ़ती रहीं. लंच में वह कैंटीन में दिखा तो श्रुति मुसकरा उठी. वह लड़का भी हैलो कहता हुआ उस के पास आ गया. दोनों ने देर तक बातें कीं और एकदूसरे का फोन नंबर भी ले लिया. घर जा कर भी उन के बीच बातें होती रहीं. कालेज के पहले दिन हुई दोस्ती जल्दी ही प्यार में बदल गई.

श्रुति के पास जब से आकाश नाम का यह नया खिलौना आया वह पुराना खिलौना यानी जतिन को भूल गई. अब कभी जतिन उसे फोन कर बात करने की कोशिश भी करता तो वह उसे इग्नोर कर देती, क्योंकि वह अपना सारा समय अब अपने बिलकुल नए और आकर्षक खिलौने यानी आकाश के साथ जो बिताना चाहती थी. Hindi Story

Story In Hindi: पानी चोर – क्या हुआ जब पकड़ी गई कल्पना

Story In Hindi: रात के तकरीबन 2 बजे थे. कल्पना ने अपना कई दिनों से खाली पड़ा घड़ा उठाया और उसे साड़ी के पल्लू से ढक कर दबे पैर घर से चल पड़ी. करीब 15 मकानों के बाद वह एक कोठी के सामने रुक गई.

कल्पना को कोठी की एक खिड़की अधखुली नजर आई. उस ने धीरे से पल्ला धकेला, तो खिड़की खुल गई. उस की आंखें खुशी से चमक उठीं. वह उस खिड़की को फांद कर कोठी में घुस गई. कोठी के अंदर पंखों व कूलरों की आवाजों के अलावा एकदम खामोशी थी. लोग गहरी नींद में सो रहे थे.

कल्पना एक कमरा पार कर के दूसरे कमरे में पहुंची. वहां अलमारी अधखुली थी, जिस में से नोटों की गड्डियां व सोने के गहने साफ दिखाई दे रहे थे. कल्पना उन्हें नजरअंदाज करती हुई आगे बढ़ गई और तीसरे कमरे में पहुंची. वहां कई टंकियों में पानी भरा हुआ था.

कल्पना ने अपना घड़ा एक टंकी में डुबोया और पानी भर कर जिस तरह से कोठी में दाखिल हुई थी, उसी तरह से पानी ले कर अपने घर लौट आई.

‘‘पानी ले आई कल्पना. जब मैं ने देखा कि घड़ा घर पर नहीं है, तो सोचा कि तू पानी लेने ही गई होगी,’’ कल्पना के अधेड़ पति शंकर ने कहा, जो 2 महीने से मलेरिया से पीडि़त हो कर चारपाई पर पड़ा था.

‘‘जी, पानी मिल गया. आप पानी पी कर अपनी प्यास बुझाएं. मैं दूसरा घड़ा भर कर लाती हूं. अजीत उठे, तो उसे भी पानी पिला दीजिएगा,’’ कल्पना ने पानी से भरा गिलास देते हुए कहा.

शंकर ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई. 2 दिनों से इस घर के तीनों लोगों ने एक बूंद पानी भी नहीं पीया था. अजीत तो कल्पना का दूध पी लेता था, मगर कल्पना और शंकर प्यास से बेचैन हो गए थे.

कल्पना ने पानी से भरा हुआ दूसरा घड़ा भी ला कर रख दिया. जब वह तीसरा घड़ा उठा कर बाहर जाने लगी, तब शंकर ने पूछा, ‘‘आज भीड़ नहीं है क्या? तू ने पानी पीया? टैंकर कहां खड़ा है? क्या आज सरपंच ने टैंकर अपने घर में खाली नहीं किया?’’

‘‘आप आराम कीजिए, मैं अभी यह घड़ा भी भर कर लाती हूं,’’ कह कर कल्पना तीसरा घड़ा उठा कर चली गई.

इस बार भी कल्पना उसी तरह कोठी में दाखिल हुई और घड़ा टंकी में डुबोया. घड़े में पानी भरने की आवाज से अब की बार कोठी का कुत्ता जाग कर भूंकने लगा.

तभी कल्पना को बासी रोटी के टुकड़े एक थाली में पड़े दिखाई दिए. कल्पना ने रोटी का टुकड़ा उठा कर कुत्ते की ओर फेंका और घड़ा उठा कर तीर की मानिंद कोठी के बाहर हो गई.

तभी एक काले से आदमी ने वहां आ कर तेज आवाज में कल्पना से पूछा, ‘‘कौन हो?’’

कल्पना बिना कुछ कहे आगे बढ़ती गई. वह आवाज पहचान गई थी. वह सरपंच राम सिंह ठाकुर की आवाज थी.

सरपंच ने कल्पना का पीछा करते हुए कहा, ‘‘चोर कहीं की, पानी चोर. शर्म नहीं आती पानी चुराते हुए.’’

इतना कह कर सरपंच ने कल्पना को दबोच लिया. उस ने खुद को छुड़ाना चाहा, तो सरपंच बोला, ‘‘मैं अभी ‘पानी चोर’ कह कर शोर मचा कर सारे गांव वालों को जमा कर दूंगा. भलाई इसी में है कि तू वापस कोठी चल और मुझे खुश कर दे. मैं तेरी हर मुराद पूरी करूंगा.’’

‘‘चल हट,’’ हाथ छुड़ाते हुए कल्पना ने कहा.

सरपंच ने जब देखा कि कल्पना नहीं मान रही है, तो उस ने ‘चोरचोर, पानी चोर’ कह कर जोरजोर से आवाजें लगानी शुरू कर दीं.

आवाज सुन कर गांव वाले लाठी व फरसा ले कर कोठी के पास जमा हो गए. कुछ लोग लालटेनें ले कर आए.

मामला जानने के बाद कुछ लोग कल्पना से हमदर्दी जताते हुए कह रहे थे कि बेचारी क्या करती, 2 दिनों से उसे पानी नहीं मिला था. दूसरी ओर सरपंच के चमचे कह रहे थे कि इस पानी चोर को पुलिस के हवाले करो.

‘‘ऐसा मत करो, बेचारी गरीब है. छोड़ दो बेचारी को,’’ एक बूढ़ी औरत ने हमदर्दी जताते हुए कहा.

किसी ने कल्पना के पति शंकर को जा कर बताया कि कल्पना सरपंच के घर से पानी चुराते हुए पकड़ ली गई है और उसे थाना ले जा रहे हैं.

बीमार शंकर भागाभागा आया और सरपंच के पैरों पर गिर कर कल्पना की ओर से माफी मांगने लगा. मगर ठाकुर ने उसे पैरों की ठोकर मार दी और कल्पना को ले कर थाने की ओर चल पड़ा. बेचारा शंकर यह सदमा बरदाश्त न कर सका और वहीं हमेशा के लिए सो गया.

कल्पना को ले कर जब सरपंच और उस के चमचे थाने पहुंचे, तो थानेदार ने पूछा, ‘‘क्या हो गया? यह लड़की कौन है? इसे बांध कर क्यों लाए हो?’’

सरपंच ने थानेदार को नमस्ते करते हुए कहा, ‘‘जी, मैं गांव डोगरपुर का सरपंच ठाकुर राम सिंह हूं. इस औरत ने मेरी हवेली में घुस कर चोरी की है. मैं ने इसे रंगे हाथों पकड़ा है और आप के पास शिकायत करने आया हूं,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘कितना माल यानी मेरा मतलब है कि कितना सोनाचांदी व रुपए चोरी किए हैं इस ने?’’ थानेदार ने पूछा.

‘‘जी, रुपए या सोनाचांदी नहीं, इस ने तो एक घड़ा पानी मेरे घर में घुस कर चुराया है.

‘‘समूचे इलाके के लोग बूंदबूंद पानी के लिए तरस रहे हैं, वे 15 किलोमीटर पैदल चल कर मुश्किल से एक घड़ा पानी ले कर लौटते हैं.

‘‘इस की हिम्मत तो देखिए साहब, खिड़की फांद कर पानी चुरा कर ले जा रही थी,’’ सरपंच ने बताया.

‘‘क्या चाहते हो तुम?’’

‘‘आप रिपोर्ट लिख कर इस औरत को जेल भेज दो,’’ सरपंच ने कहा.

‘‘जाओ मुंशीजी के पास रिपोर्ट लिखवा दो.’’

‘‘मुंशीजी, रिपोर्ट लिखाने से पहले सरपंच को अच्छी तरह समझा देना,’’ थानेदार ने मुंशीजी को आवाज लगा कर कहा.

मुंशीजी ने सरपंच को एक ओर ले जा कर उस के कान में कुछ कहा.

‘‘अरे हैड साहब, मैं कई सालों से सरपंच हूं. मैं यह अच्छी तरह जानता हूं कि बिना लिएदिए आजकल कोई काम नहीं होता है,’’ सरपंच ने जेब से नोटों की 2 गड्डियां निकाल कर मुंशीजी के हवाले कर दीं.

मुंशीजी ने सरपंच की एफआईआर दर्ज कर ली. कल्पना को थानेदार के सामने पेश किया, ‘‘श्रीमानजी, यह वही लड़की है, जिस ने मेरे घर से एक घड़ा पानी चुराया है.’’

थानेदार ने कल्पना को नीचे से ऊपर तक घूरा और बोला, ‘‘क्या तू ने चोरी की? चोरी करते वक्त तुझे शर्म नहीं आई?’’

कल्पना पत्ते की तरह कांप रही थी. उस के रोने से मुरझाए हुए चेहरे पर आंसुओं की लाइनें नजर आ रही थीं.

दूसरे दिन कल्पना को अदालत में पेश किया गया. वहां सरपंच के साथ उस के चमचे कल्पना के खिलाफ गवाही देने के लिए आए हुए थे.

पुलिस ने पानी से भरा हुआ वह घड़ा अदालत में पेश किया, जो कल्पना के पास से जब्त किया गया था.

जज ने सब से पहले कल्पना की ओर देखा, जो कठघरे में सिर नीचा किए खड़ी थी.

अदालत ने गवाहों के लिए पुकार लगवाई. सरपंच के चमचों ने अदालत को बताया कि कल्पना ने पानी चुराया, जिसे सरपंच ने रंग हाथों पकड़ लिया. मगर मौके पर कोई गवाह नहीं था. सभी गवाहों ने यही बताया कि सरपंच ने उन्हें बताया.

जज ने कल्पना से पूछा, ‘‘क्यों, क्या तुम ने एक घड़ा पानी सरपंच के घर से चुराया?’’

‘‘जी, एक घड़ा नहीं, बल्कि 3 घड़े पानी मैं सरपंच के घर से लाई. पर उसे चुराया नहीं, बल्कि अपने हिस्से का ले कर आई,’’ कल्पना ने बेधड़क हो कर बताया.

‘‘अपने हिस्से का… चुराया नहीं, लाई का क्या मतलब है?’’ जज ने पूछा.

‘‘इस भयंकर गरमी में गांव के सारे कुएं, हैंडपंप व तालाब सूख गए हैं. एकएक बूंद पानी के लिए गांव वाले तरस रहे हैं. प्यास से मर रहे हैं.

‘‘पंचायत ने गांव में पानी का इंतजाम किया है. हमारे गांव में पानी के लिए सिर्फ 2 टैंकरों का इंतजाम है, जिस में से एक टैंकर सरपंच अपने घर खाली करा लेता है, जिसे वह चोरी से बेचता है. दूसरे टैंकर का पानी गांव वाले छीनाझपटी कर के लेते हैं.

‘‘मैं वह अभागी औरत हूं, जिसे कई दिनों से एक बूंद पानी नहीं मिला. बीमार पति घर में हैं. मैं सरपंच के घर से अपने हिस्से का पानी ही लाई हूं.

‘‘मेरी बातों पर यकीन न हो, तो इन गांव वालों से पूछ लीजिए. मैं अदालत से गुजारिश करती हूं कि मैं पानी चोर नहीं हूं, बल्कि असली पानी चोर तो सरपंच है. सरपंच के घर की टंकियां पानी से भरी पड़ी हैं.’’

अदालत में गांव वालों ने भी कहा कि यह बात सच है. कल्पना सही कह रही है.

वह 50 रुपए प्रति घड़े की दर से पानी बेचता है. अभी इस वक्त भी सरपंच के घर पानी के लिए ग्राहकों की लंबी कतार लगी है.

सरपंच बगलें झांकने लगा. जज को सरपंच व पुलिस की जालसाजी की बू इस मुकदमे में आने लगी. कल्पना को अदालत ने बाइज्जत बरी कर दिया और असली चोर को पकड़ने के लिए जांच के आदेश जारी कर दिए गए.

कल्पना जब अपने गांव पहुंची, तो उसे पता चला कि किसी ने रात में ही उस के पति शंकर, जो सदमे से उसी दिन चल बसा था, की लाश फूंक दी थी.

जब कल्पना अपने घर पहुंची, तो उस का अबोध लड़का अजीत भी हमेशा के लिए सोया हुआ मिला. कल्पना ने जैसे ही अपने बेटे की लाश को देखा, तो उस की जोर से चीख निकल पड़ी.

‘‘अजीत… अजीत…’’ कह कर वह बेहोश हो गई. गांव वाले जो कल्पना के खिलाफ थे, अब सरपंच के खिलाफ नारेबाजी करने लगे, ‘पानी चोर… सरपंच पानी चोर… असली चोर सरपंच…’

कल्पना पागल हो चुकी थी. वह अपने बेटे की लाश को बता रही थी, ‘‘बेटे, मैं पानी चोर नहीं हूं, असली पानी चोर सरपंच है.’’

इतना कह कर कल्पना कभी हंसती, तो कभी रोने लगती थी.

पुलिस ने सरपंच के घर से लबालब भरी पानी की कई टंकियों को जब्त किया. जो पानी खरीदने आए थे, उन्हें गवाह बना कर ठाकुर को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. Story In Hindi

Story In Hindi: क्या जादू कर दिया – चंपा बनी ‘चंपालाल’

Story In Hindi: चंपा अपने गांव के बसअड्डे पर बस से उतर कर गलियां पार कर के अपने घर की ओर जा रही थी. वह रोजाना सुबह कालेज जाती थी, फिर दोपहर तक वापस आ जाती थी.

चंपा इस गांव के बाशिंदे भवानीराम की बेटी थी. वे चंपा को कालेज पढ़ाना नहीं चाहते थे, मगर चंपा की इच्छा थी और उस के टीचरों के दबाव देने पर वे उसे पढ़ाने के लिए शहर भेजने को राजी हो गए.

जैसे ही चंपा का कालेज में दाखिला हुआ, उस की सहेलियों ने खुशियां मनाईं. वे सब चंपा को पढ़ाकू सम झती थीं और उसे चाहती भी खूब थीं.

जब चंपा गांव के हायर सैकेंडरी स्कूल में पढ़ती थी, तब पूरी जमात में उस का दबदबा था. अगर कोई लड़का ऊंची आवाज में बोल देता था, तब वह उसे ऐसी नसीहत देती थी कि वह चुप हो जाता था. इसी वजह से वह अपनी सहेलियों की चहेती बनी हुई थी.

गांव में भी चंपा की धाक थी. कोई भी बदमाश लड़का उस से कुछ नहीं कहता था. कहने वाले दबी जबान में कहते थे कि यह चंपा नहीं, बल्कि ‘चंपालाल’ है.

अभी चंपा गली का नुक्कड़ पार कर ही रही थी कि दिनेश, जो गांव का एक आवारा लड़का था और शहर के कालेज में पढ़ता था, न जाने कब से उस के पीछेपीछे आ रहा था.

दिनेश उस का रास्ता रोकते हुए बोला, ‘‘कहां जा रही हो चंपा?’’

‘‘अपने घर,’’ हंसते हुए चंपा बोली.

‘‘कभी हमारे घर भी चलो,’’ उस के जिस्म को घूरते हुए दिनेश बोला.

‘‘तुम्हारे घर क्यों भला?’’ चंपा ने हैरानी से पूछा.

‘‘मेरा कहना मानोगी, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा,’’ दिनेश ने लालच देते हुए कहा.

चंपा जानती थी कि दिनेश गांव के रईस मांगीलाल का बिगड़ैल बेटा है. उसे पैसों का खूब घमंड है, इसलिए सारा दिन गांव में आवारागर्दी करता है. लड़कियों को छेड़ना उस की आदत है. उस की करतूत जगजाहिर है, मगर अपनी इज्जत के डर से कोई भी गांव का आदमी उस के मुंह नहीं लगता है.

चंपा को चुप देख कर दिनेश बोला, ‘‘क्या सोच रही हो चंपा? मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया?’’

चंपा ने देखा कि जिस मोड़ पर वे दोनों खड़े थे, उस के आसपास जितने भी मर्दऔरत अपने घरों में बैठ कर बातें कर रहे थे, उन्होंने अपने दरवाजेखिड़कियां बंद कर ली थीं. दिनेश का डर उन के भीतर बैठा हुआ था. ऐसा लग रहा था कि कर्फ्यू लगा हुआ है.

दिनेश जब भी शहर से गांव में आता था और वहां की गलियों में घूमता था, तो उस के डर से सन्नाटा छा जाता था.

आज चंपा का उस से पहली बार सामना हुआ था, इसलिए उस ने भीतर ही भीतर उस से सामना करने के लिए अपने को तैयार कर लिया था.

‘‘चंपा, तू क्या सोचने लगी?’’ उसे चुप देख कर दिनेश ने फिर कहा, ‘‘तू ने जवाब नहीं दिया?’’

‘‘मैं ने जवाब दे तो दिया, शायद तुम ने सुना नहीं. बहरे हो क्या?’’

‘‘क्या कहा, मैं बहरा हूं? शायद तू मु झे जानती नहीं है?’’

‘‘अरे, तु झे तो सारा गांव जानता है,’’ चंपा ने कहा.

‘‘तब फिर क्यों तू दादागीरी कर

रही है?’’

‘‘मैं एक लड़की हूं. मैं क्या दादागीरी करूंगी. गांव का दादा तो तू है,’’ चंपा उसी तरह से जवाब देते हुए बोली.

‘‘जैसा मैं ने सुना था, तू वैसी ही निकली. सुना है, कालेज में भी तू दादा बन कर रहती है?’’ दिनेश ने पूछा.

‘‘मैं ने पहले ही कहा, मैं क्या दादागीरी करूंगी. मगर अब लड़कियां इतनी कमजोर भी नहीं हैं कि हर कोई उन की कमजोरी का फायदा उठा सके,’’ कह कर चंपा ने अपने इरादे जाहिर कर दिए.

दिनेश कोई जवाब नहीं दे पाया. गली में पूरी तरह सन्नाटा था. मगर फिर भी लोग खिड़की खोल कर  झांकने की कोशिश कर रहे थे. उन के भीतर एक डर बैठा हुआ था कि आज चंपा दिनेश के सामने आ गई है.

दिनेश बोला, ‘‘बहुत अकड़ कर बात कर रही है. मैं तेरी यह अकड़ निकाल दूंगा. चल, मेरे साथ. बहुत जवानी का जोश है तु झ में,’’ कह कर दिनेश ने चंपा का हाथ पकड़ लिया.

चंपा गुस्से में चीखते हुए बोली, ‘‘छोड़ दे मेरा हाथ. मैं वैसी लड़की नहीं हूं, जैसा तू सम झ रहा है.’’

‘‘मैं एक बार जिस लड़की का हाथ पकड़ लेता हूं, फिर छोड़ता नहीं हूं,’’ दिनेश ने कहा.

‘‘ये फिल्मी डायलौग मत बोल. चुपचाप मेरा हाथ छोड़ दे.’’

‘‘यह तू नहीं, तेरी जवानी बोल रही है. चल मेरे साथ, जवानी का सारा जोश ठंडा कर देता हूं,’’ कह कर दिनेश उस को घसीट कर ले जाने लगा.

तब चंपा चिल्ला कर बोली, ‘‘मर्द है तो मर्द की तरह बात कर. यों कमरे में बंद कर के क्यों अपनी मर्दानगी दिखा रहा है. अगर तुझे अपनी मर्दानगी दिखानी है, तो यहीं दिखा. उतारूं कपड़े?’’ कहते हुए उस ने अपनी टीशर्ट उतार दी.

दिनेश थोड़ा ढीला पड़ गया. तब चंपा अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘क्या सोच रहा है, और उतारूं कपड़े? बुझा ले अपनी प्यास,’’ कहते हुए उस ने टीशर्ट घुमा कर दिनेश को दे मारी.

‘‘मगर एक बात याद रख, गांव की किसी लड़की पर बुरी नजर नहीं रखनी चाहिए. लड़की कमजोर नहीं है. छोड़

दे बुरी नजर. फिर हर औरत को कमजोर भी मत सम झ. इसलिए कहती हूं

कि पैसों का घमंड छोड़ दे. यह एक

दिन तु झे ले डूबेगा,’’ चंपा ने सम झाते हुए कहा.

सारा महल्ला देखता रह गया. लोग बाहर निकल आए. लड़की के हाथों पिटे दिनेश का मुंह छोटा हो गया.

इतना कह कर चंपा वहां से

चली गई.

दिनेश गुस्से से भरा वहीं खड़ा रह गया. आज एक लड़की से हार गया, जो उसे चुनौती दे गई. चुनौती भी ऐसी, जिसे वह पूरा नहीं कर सके. आज तक गांव वालों में से किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि कोई उस के खिलाफ बोले, उसे चुनौती दे, मगर आज चंपा ने इस कदर उस को चुनौती दे डाली. वह उस का विरोध नहीं कर सका.

दिनेश ने जब गली की तरफ देखा, तो सभी मर्दऔरत दरवाजा खोल कर उसे हैरत भरी नजरों से देख रहे थे. वह उन से नजरें नहीं मिला सका और चुपचाप अपनी हवेली की तरफ चल दिया.

सारे गली वाले मानो एक ही सवाल अपनेआप से पूछ रहे थे कि चंपा ने दिनेश पर ऐसा क्या जादू किया, जो नीची गरदन कर के चला गया? सभी एकदूसरे से आंखों ही आंखों में इशारा कर रहे थे, मगर कुछ समझ नहीं पा रहे थे. सभी के दिमाग में एक ही बात बैठ चुकी थी कि चंपा की अब खैर नहीं. उस ने दिनेश

से पंगा ले कर अपने ऊपर मुसीबत मोल ले ली है. वह गांव का बहुत बड़ा गुंडा है. पैसों के बल पर वह कुछ भी कर सकता है.

इस घटना से गांव में दहशत फैल गई. सभी गांव वाले खामोश हो गए.

अगले दिन चंपा कालेज पहुंची, तो हीरो बन गई थी. दिनेश की हिम्मत अब टूट चुकी थी.

चंपा कालेज नहीं छोड़ना चाहती थी, इसलिए उस ने भी हालात से सम झौता कर लिया.

इस घटना के कुछ दिनों बाद दिनेश में बहुत बड़ा बदलाव दिखा. पहले वह हमेशा गुंडा बन कर रहा करता था, अपने को सब से बड़ा सम झता था.

आमतौर पर अब वह चंपा के साथ कैंटीन में चाय पीता दिखता. वह अपने दोस्तों से कहता, ‘‘यह रही टीशर्ट… मार चंपा.’’

यह सुन कर चंपा शर्म से लाल हो जाती.

दिनेश शरीफ हो चुका था. गांव की किसी लड़की या किसी बहू को अब वह बुरी नजर से नहीं देखता था. उस पर चंपा ने उस दिन ऐसा क्या जादू कर दिया, यह आज तक राज बना हुआ था. Story In Hindi

Best Hindi Kahani: मिस्टर बेचारा – क्या पूरा हो पाया चंद्रम का प्यार

Best Hindi Kahani: दरवाजा खुला. जिस ने दरवाजा खोला, उसे देख कर चंद्रम हैरान रह गया. वह अपने आने की वजह भूल गया. वह उसे ही देखता रह गया.

वह नींद में उठ कर आई थी. आंखों में नींद की खुमारी थी. उस के ब्लाउज से उभार दिख रहे थे. साड़ी का पल्लू नीचे गिरा जा रहा था.

उस का पल्लू हाथ में था. साड़ी फिसल गई. इस से उस की नाभि दिखने लगी. उस की पतली कमर मानो रस से भरी थी.

थोड़ी देर में चंद्रम संभल गया, मगर आंखों के सामने खुली पड़ी खूबसूरती को देखे बिना कैसे छोड़ेगा? उस की उम्र 25 साल से ऊपर थी. वह कुंआरा था. उस के दिल में गुदगुदी सी पैदा हुई.

वह साड़ी का पल्लू कंधे पर डालते हुए बोली, ‘‘आइए, आप अंदर आइए.’’

इतना कह कर वह पलट कर आगे बढ़ी. पीछे से भी वह वाकई खूबसूरत थी. पीठ पूरी नंगी थी.

उस की चाल में मादकता थी, जिस ने चंद्रम को और लुभा दिया था.

उस औरत को देखने में खोया चंद्रम बहुत मुश्किल से आ कर सोफे पर बैठ गया. उस का गला सूखा जा रहा था.

उस ने बहुत कोशिश के बाद कहा, ‘‘मैडम, यह ब्रीफकेस सेठजी ने आप को देने को कहा है.’’

चंद्रम ने ब्रीफकेस आगे बढ़ाया.

‘‘आप इसे मेज पर रख दीजिए. हां, आप तेज धूप में आए हैं. थोड़ा ठंडा हो जाइएगा,’’ कहते हुए वह साथ वाले कमरे में गई और कुछ देर बाद पानी की बोतल, 2 कोल्ड ड्रिंक ले आई और चंद्रम के सामने वाले सोफे पर बैठ गई.

चंद्रम पानी की बोतल उठा कर सारा पानी गटागट पी गया.

वह औरत कोल्ड ड्रिंक की बोतल खोलने के लिए मेज के नीचे रखे ओपनर को लेने के लिए  झुकी, तो फिर उस का पल्लू गिर गया और उभार दिख गए. चंद्रम की नजर वहीं अटक गई.

उस औरत ने ओपनर से कोल्ड ड्रिंक खोलीं. उन में स्ट्रा डाल कर चंद्रम की ओर एक कोल्ड ड्रिंक बढ़ाई.

चंद्रम ने बोतल पकड़ी. उस की उंगलियां उस औरत की नाजुक उंगलियों से छू गईं. चंद्रम को जैसे करंट सा लगा.

उस औरत के जादू और मादकता ने चंद्रम को घायल कर दिया था. वह खुद को काबू में न रख सका और उस औरत यानी अपनी सेठानी से लिपट गया.

इस के बाद चंद्रम का सेठ उसे रोजाना दोपहर को अपने घर ब्रीफकेस दे कर भेजता था. चंद्रम मालकिन को ब्रीफकेस सौंपता और उस के साथ खुशीखुशी हमबिस्तरी करता. बाद में कुछ खापी कर दुकान पर लौट आता. इस तरह 4 महीने बीत गए.

एक दोपहर को चंद्रम ब्रीफकेस ले कर सेठ के घर आया और कालबेल बजाई, पर घर का दरवाजा नहीं खुला. वह घंटी बजाता रहा. 10 मिनट के बाद दरवाजा खुला.

दरवाजे पर उस की सेठानी खड़ी थी, पर एक आम घरेलू औरत जैसी. आंचल ओढ़ कर, घूंघट डाल कर.

उस ने चंद्रम को बाहर ही खड़े रखा और कहा, ‘‘चंद्रम, मु झे माफ करो. हमारे संबंध बनाने की बात सेठजी तक पहुंच गई है. वे रंगे हाथ पकड़ेंगे, तो हम दोनों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी.

‘‘हमारी भलाई अब इसी में है कि हम चुपचाप अलग हो जाएं. आज के बाद तुम कभी इस घर में मत आना,’’ इतना कह कर सेठानी ने दरवाजा बंद कर दिया.

चंद्रम मानो किसी खाई में गिर गया. वह तो यह सपना देख रहा था कि करोड़पति सेठ की तीसरी पत्नी बांहों में होगी. बूढ़े सेठ की मौत के बाद वह इस घर का मालिक बनेगा. मगर उस का सपना ताश के पत्तों के महल की तरह तेज हवा से उड़ गया. ऊपर से यह डर सता रहा था कि कहीं सेठ उसे नौकरी से तो नहीं निकाल देगा. वह दुकान की ओर चल दिया.

सेठानी ने मन ही मन कहा, ‘चंद्रम, तुम्हें नहीं मालूम कि सेठ मुझे डांस बार से लाया था. उस ने मुझसे शादी की और इस घर की मालकिन बनाया. पर हमारे कोई औलाद नहीं थी. मैं सेठ को उपहार के तौर पर बच्चा देना चाहती थी. सेठ ने भी मेरी बात मानी. हम ने तुम्हारे साथ नाटक किया. हो सके, तो मु झे माफ कर देना.’ इस के बाद सेठानी ने एक हाथ अपने बढ़ते पेट पर फेरा. दूसरे हाथ से वह अपने आंसू पोंछ रही थी. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: हवस का नतीजा – देवर और भाभी की रासलीला

Story In Hindi: मुग्धा का बदन बुखार से तप रहा था. ऊपर से रसोई की जिम्मेदारी. किसी तरह सब्जी चलाए जा रही थी तभी उस का देवर राज वहां पानी पीने आया. उस ने मुग्धा के हावभाव देखे तो उस के माथे पर हाथ रखा और बोला, ‘‘भाभी, आप को तो तेज बुखार है.’’

‘‘हां…’’ मुग्धा ने कमजोर आवाज में कहा, ‘‘सुबह कुछ नहीं था. दोपहर से अचानक…’’

‘‘भैया को बताया?’’

‘‘नहीं, वे तो परसों आने ही वाले हैं वैसे भी… बेकार परेशान होंगे. आज तो रात हो ही गई… बस कल की बात है.’’

‘‘अरे, लेकिन…’’ राज की फिक्र कम नहीं हुई थी. मगर मुग्धा ने उसे दिलासा देते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं. मामूली बुखार ही तो है. तुम जा कर पढ़ाई करो, खाना बनते ही बुला लूंगी.’’

‘‘खाना बनते ही बुला लूंगी…’’ मुग्धा की नकल उतार कर चिढ़ाते हुए राज ने उस के हाथ से बेलन छीना और बोला, ‘‘लाइए, मैं बना देता हूं. आप जा कर आराम कीजिए.’’

‘‘न… न… लेट गई तो मैं और बीमार हो जाऊंगी,’’ मुग्धा बैठने वालियों में से नहीं थी. वह बोली, ‘‘हम दोनों मिल कर बना लेते हैं,’’ और वे दोनों मिल कर खाना बनाने लगे.

मुग्धा का पति विनय कंपनी के किसी काम से 3 दिनों के लिए बाहर गया हुआ था. वह कर्मचारी तो कोई बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बौस का भरोसेमंद था. सो, किसी भी काम के लिए वे उसे ही भेजते थे.

मुग्धा का 21 साल का देवर राज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. विनय जैसा प्यार करने वाला पति पा कर मुग्धा भी खुश रहती थी. कुछ पति की तनख्वाह और कुछ वह खुद जो निजी स्कूल में पढ़ाती, दोनों से मिला कर घर का खर्च अच्छे से निकल आता. सासससुर गांव में रहते थे. देवर राज अपनी पढ़ाई के चलते उन के साथ ही रहता था.

जिंदगी में कमी थी तो बस यही कि खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के 10 सालों के बाद भी उन के कोई औलाद नहीं थी. अब मुग्धा 35 साल की हो चुकी थी. अपनी हमउम्र बाकी टीचरों को उन के बच्चों के साथ देखती तो न चाहते हुए भी उसे रोना आ ही जाता. वह अपनी डायरी के पन्ने इसी पीड़ा से रंगती जाती.

रोटियां बन चुकी थीं. राज ने उसे कुरसी पर बैठने को बोला और सामान समेटने लगा. मुग्धा ने सिर पीछे की ओर टिकाया और आंखें बंद कर लीं. वातावरण एकदम शांत था. तभी वहां वही तूफान फिर से गरजने लगा जिस का शोर मुग्धा आज तक नहीं भांप पाई थी.

राज की गरदन धीरे से मुग्धा की ओर घूम चुकी थी. वह कनखियों से मुग्धा की फिटिंग वाली समीज में कैद उस के उभारों को देखने लगा था. मुग्धा की सांसों के साथ जैसेजैसे वे ऊपरनीचे होते, वैसेवैसे राज के अंदर का शैतान जागता जाता.

‘‘हो गया सब काम…?’’ बरतनों की आवाज बंद जान कर मुग्धा ने अचानक पूछते हुए अपनी आंखें खोल दीं.

राज हकबका गया और बोला, ‘‘हां भाभी, बस हो ही गया…’’ कह कर राज ने जल्दीजल्दी बाकी काम निबटाया और खाने की चीजों को उठा कर मेज पर ले गया.

मुग्धा ने मुश्किल से 2 रोटियां खाईं, वह भी राज की जिद पर. वह जबरदस्ती सब्जी उस की प्लेट में डाल दे रहा था. खाने के बाद मुग्धा सोने जाने लगी तो राज बोला, ‘‘भाभी, 15 मिनट के लिए आगे वाले कमरे में बैठिए न… मैं आप के लिए दवा ले आता हूं.’’

‘‘अरे नहीं, रातभर में उतर जाएगा…’’ मुग्धा ने मना किया लेकिन राज कहां मानने वाला था.

‘‘मैं पास वाले कैमिस्ट से ही दवा ले कर आ रहा हूं भाभी… जहां से आप मंगाती हैं हमेशा… दरवाजा बंद कर लीजिए… मैं अभी आया…’’ कहता हुआ वह निकल गया.

मुग्धा ने दरवाजा बंद किया और सोफे पर पैर ऊपर कर के बैठ गई.

राज ने तय कर लिया था कि आज तो वह अपने मन की कर के ही रहेगा. इस बीच कैमिस्ट की दुकान आ गई.

‘‘क्या बात है राज बाबू?’’ कैमिस्ट ने राज को खोया सा देखा तो पूछा. राज का ध्यान वापस दुकान पर आया.

‘‘दवा चाहिए थी,’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘अबे तो यहां क्या मिठाई मिलती है?’’ कैमिस्ट उसे छेड़ते हुए बोला. वह उस का पुराना दोस्त था.

राज मुसकरा उठा और कहा, ‘‘अरे, जल्दी दे न…’’

‘‘जल्दी दे न…’’ बड़बड़ाते हुए कैमिस्ट ने हैरत से उस की ओर देखा, ‘‘कौन सी दवा चाहिए, यह तो बता?’’

राज को याद आया कि उस ने तो सचमुच कोई दवा मांगी ही नहीं है. उस ने ऐसे ही बोल दिया, ‘‘भाभी की तबीयत ठीक नहीं है. उन्हें बुखार है. जरा नींद की गोली देना.’’

‘नींद की गोली बुखार के लिए…’ सोचते हुए कैमिस्ट ने उसे देखा. वह खुद भी मुग्धा के हुस्न का दीवाना था. हमेशा उस के बारे में चटकारे लेले कर बातें किया करता था. उस ने राज के मन की बात ताड़ ली. ऐसी बातों का उसे बहुत अनुभव जो था. उस ने नींद की गोली के साथ बुखार की भी दवा दे दी.

राज ने लिफाफा जेब में रखा और तेजी से वापस चलने को हुआ कि तभी कैमिस्ट चिल्लाया, ‘‘अरे भाई, खुराक तो सुन ले.’’

राज को अपनी गलती का अहसास हुआ. वह काउंटर पर आया. कैमिस्ट ने उसे डोज बताई और आंख मारते हुए बोला, ‘‘यह नींद वाली एक से ज्यादा मत देना… टाइट चीज है…’’

‘‘अबे, क्या बकवास कर रहा है,’’ राज के मन का डर उस की जबान से बोल पड़ा. उस की तो चोर की दाढ़ी में तिनका वाली हालत हो गई. वह जाने लगा.

कैमिस्ट पीछे से कह रहा था, ‘‘अगली बार हम को भी याद रखना दोस्त…’’

राज उस को अनसुना करता हुआ आगे बढ़ गया. घर लौटने पर डोर बैल बजाते ही मुग्धा ने दरवाजा खोल दिया और बोली, ‘‘यहीं बैठी थी लगातार…’’

‘‘जी भाभी, आइए अंदर चलिए…’’ राज ने अपने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा.

मुग्धा अपने कमरे में आ कर लेट गई. राज ने उसे पहले बुखार की दवा दी. मुग्धा दवा ले कर सोने के लिए लेटने लगी तो राज ने उसे रोका, ‘‘भाभी, अभी एक दवा बाकी है…’’

‘‘कितनी सारी ले आए भैया?’’ मुग्धा ने थकी आवाज में बोला और बाम ले कर माथे पर लगाने लगी.

‘‘भाभी दीजिए, मैं लगा देता हूं,’’ कह कर राज ने उस से बाम की डब्बी ले ली और उस के माथे पर मलने लगा. थोड़ी देर बाद उस ने मुग्धा को नींद वाली गोली भी खिला दी और लिटा दिया.

राज उस का माथा दबाता रहा. थोड़ी देर बाद उस ने पुष्टि करने के लिए मुग्धा को आवाज दी. ‘‘भाभी सो गईं क्या?’’

कोई जवाब नहीं मिला. राज ने उस के चेहरे को हिलाडुला कर भी देख लिया. कोई प्रतिक्रिया न पा कर वह समझ गया कि रास्ता साफ हो चुका है.

राज की कनपटियों में खून तेजी से दौड़ने लगा. वह बत्ती जलती ही छोड़ मुग्धा के ऊपर आ गया. मर्यादा के आवरण प्याज के छिलकों की तरह उतरते चले गए. कमरे में आए भूचाल से मेज पर रखी विनयमुग्धा की तसवीर गिर कर टूट गई.

सबकुछ शांत होने पर राज थक कर चूरचूर हो कर मुग्धा के बगल में लेट गया.

‘‘बस अब बुखार उतर जाएगा भाभीजी… इतना पसीना जो निकलवा दिया मैं ने आप का,’’ राज बेशर्मी से बड़बड़ाया और मुग्धा की कुछ तसवीरें खींचने के बाद उसे कपड़े पहना दिए.

मुग्धा अब तक धीमेधीमे कराह रही थी. राज पलंग से उतरा और खुद भी कपड़े पहनने लगा. तभी उस की नजर आधी खुली दराज पर गई. भूल से मुग्धा अपनी डायरी उसी में छोड़ी हुई थी. राज ने उसे निकाला और कपड़े पहनतेपहनते उस के पन्ने पलटने लगा.

अचानक एक पेज पर जा कर उस की आंखें अटक गईं. वह अभी अपनी कमीज के सारे बटन भी बंद नहीं कर पाया था लेकिन उस को इस बात की परवाह नहीं रही. वह अपलक उस पन्ने में लिखे शब्दों को पढ़ने लगा. उस में मुग्धा ने लिखा था, ‘बस अब बहुत रो लिया, बहुत दुख मना लिया औलाद के लिए. मेरा बेटा मेरे पास था और मैं उसे पहचान ही नहीं पाई. जब से मैं यहां आई, उसे बच्चे के रूप में देखा तो आज अपनी कोख के बच्चे के लिए इतनी चिंता क्यों? मैं बहुत जल्दी राज को कानूनी रूप से गोद लूंगी.’

राज की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया और जोरजोर से रोने लगा, फिर भाग कर मुग्धा के पैरों को पकड़ कर अपना माथा उस से रगड़ते हुए रोने लगा, ‘‘भाभी, मुझे माफ कर दो… यह क्या हो गया मुझ से.’’

अचानक राज का ध्यान मुग्धा के बिखरे बालों पर गया. उस ने जल्दी से जमीन पर गिरी उस की हेयर क्लिप उठाई और मुग्धा का सिर अपनी गोद में रख कर बालों को संवारने लगा. वह किसी मशीन की तरह सबकुछ कर रहा था. हेयर क्लिप अच्छे से उस के बालों में लगा कर राज उठा और घर से निकल गया.

अगली सुबह तकरीबन 8 बजे मुग्धा की आंखें खुलीं. उस का सिर अभी तक भारी था. घर में भीड़ लग चुकी थी.

एक आदमी ने आखिरकार बोल ही दिया, ‘‘देवरभाभी के रिश्ते पर भरोसा करना ही पागलपन है…’’

मुग्धा के सिर में जैसे करंट लगा. वह सवालिया नजरों से उसे देखने लगी. तभी इलाके के पुलिस इंस्पैक्टर ने प्रवेश किया और बताया, ‘‘आप के देवर राज की लाश पास वाली नदी से मिली है. उस ने रात को खुदकुशी कर ली…’’

मुग्धा का कलेजा मुंह को आने लगा. वह हड़बड़ा कर पलंग से उठी लेकिन लड़खड़ा कर गिर गई.

एक महिला सिपाही ने राज के मोबाइल फोन में कैद मुग्धा की कल रात वाली तसवीरें उसे दिखाईं और कड़क कर पूछा, ‘‘कल रंगरलियां मनातेमनाते ऐसा क्या कह दिया लड़के से तू ने जो उस ने अपनी जान दे दी?’’

तसवीरें देख कर मुग्धा हैरान रह गई. अपनी शारीरिक हालत से उसे ऐसी ही किसी घटना का शक तो हो रहा था लेकिन दिल अब तक मानने को तैयार नहीं था. वह फूटफूट कर रोने लगी.

इंस्पैक्टर ने उस महिला सिपाही को अभी कुछ न पूछने का इशारा किया और बाकी औपचारिकताएं पूरी कर वहां से चला गया. धीरेधीरे औरतों की भीड़ भी छंटती गई.

विनय का फोन आया था कि वह आ रहा है, घबराए नहीं, लेकिन मुग्धा बस सुनती रही. उस की सूनी आंखों के सामने राज का बचपन चल रहा था. जब वह नईनई इस घर में आई थी.

दोपहर तक विनय लौट आया और भागते हुए मुग्धा के पास कमरे में पहुंचा. वह जड़वत अभी भी पलंग पर बैठी शून्य में ताक रही थी. विनय ने उस के कंधे पर हाथ रखा लेकिन मुग्धा का शरीर एक ओर लुढ़क गया.

‘‘मुग्धा… मुग्धा…’’ चीखता हुआ विनय उसे झकझोरे जा रहा था, पर मुग्धा कभी न जागने वाली नींद में सो चुकी थी. Story In Hindi

Hindi Family Story: नैरो माइंड – तृप्ति के अधूरे सपने

Hindi Family Story: ‘‘मौम, आप कब से इतनी नैरो माइंड हो गई हैं, ऐसा क्या हुआ है? क्यों इतनी परेशान हो रही हैं? सब ठीक हो जाएगा, आजकल यह इतनी बड़ी बात नहीं है. सोसायटी में यह सब चलता रहता है. मैं आज ही विपुल से बात करूंगी.’’

तरू के एकएक शब्द ने तृप्ति के रोमरोम को घायल कर दिया. कितनी मुश्किलों और नाजों से उस ने दोनों बेटियों को पाला था.

तृप्ति और तपन ने तिनकेतिनके जोड़ कर यह घर बसाया था. उस ने अपने सारे अरमानों एवं इच्छाओं का गला घोंट कर इन्हीं बेटियों की खुशी के लिए अपना जीवन कुर्बान कर दिया था.

साधारण परिवार में जन्मी तृप्ति को पढ़ाई के साथ डांस और एक्ंिटग का जन्मजात शौक था. स्कूल में उस की प्रतिभा निखारने में उस की डांस टीचर मिस गोयल का बड़ा हाथ था. उन्होंने तृप्ति के गुण को परख कर उसे निखारा. तृप्ति ने भी उन्हें निराश नहीं किया और स्कूली शिक्षा के दौरान ही शील्ड और मेडल के ढेर लगा दिए.

वह विश्वविद्यालय में पहुंची तो सहशिक्षा के कारण उस के मातापिता ने इस तरह के कार्यक्रम से उसे दूर रहने की हिदायत दे दी, साथ ही कह दिया, ‘बहुत हुआ, अब जो करना हो अपने घर में करना.’ वह मन मार कर डांस और एक्ंिटग से दूर हो गई, लेकिन मन में एक कसक थी तभी उस का विवाह तपन से हो गया.

तपन बैंक में क्लर्क थे. सामान्य तौर पर घर में कोई कमी नहीं थी, लेकिन उस का शौक मन में हिलोरे मार रहा था. उस ने डांस स्कूल में काम करने के लिए तपन को किसी तरह से तैयार किया था तभी तन्वी के आगमन का एहसास हुआ. तन्वी छोटी ही थी तभी गोलमटोल तरू आ गई और वह इन दोनों बेटियों की परवरिश में सब भूल गई. 5-6 साल कब निकल गए, पता ही नहीं लगा. अब तृप्ति को अपनी खुशहाल जिंदगी प्यारी लगने लगी.

धीरेधीरे तन्वी और तरू बड़ी होने लगीं. जब दोनों छोटेछोटे पैरों को उठा कर नाचतीं तो तृप्ति का मन खिल उठता और अनायास ही अपनी बेटियों को स्टेज पर नृत्य करते हुए देखने की वह कल्पना करती. तन्वी एवं तरू को तृप्ति ने डांस स्कूल में दाखिला दिलवा दिया. जल्द ही उन की प्रतिभा रंग दिखाने लगी. वे नृत्य में पारंगत होने लगीं और इसी के साथ तृप्ति के सपने साकार होने लगे.

एक दिन तपन ने टोक दिया, ‘अब ये दोनों बड़ी हो गई हैं, डांस आदि छोड़ कर पढ़ाई पर ध्यान दें.’ तपन के टोकने से तृप्ति नाराज हो उठी और समय बदलने की दुहाई देने लगी. दोनों का आपस में अच्छाखासा झगड़ा भी हुआ और अंत में जीत तृप्ति की ही हुई. तपन चुप हो गए. उन्होंने दोनों लड़कियों को डांस और एक्ंिटग में आगे बढ़ने की इजाजत दे दी.

तन्वी का रुझान अपनेआप ही डांस से हट गया. वह पढ़ाई में रुचि लेने लगी. प्रोफेशनल कोर्स के लिए तन्वी होस्टल चली गई. तरू अकेली हो गई. चूंकि उस पर मां का वरदहस्त था, अत: वह डांस एवं एक्ंिटग के साथ ग्लैमर से भी प्रभावित हो गई थी.

अब तरू के आएदिन स्टेज प्रोग्राम होते. तृप्ति बेटी में अपने सपने साकार होते देख मन ही मन खुश होती रहती. तपन को तरू का काम पसंद नहीं आता था. तरू अकसर ग्रुप के साथ कार्यक्रम के लिए बाहर जाया करती थी. उस को अब बाहर की दुनिया रास आने लगी थी. उस के उलटेसीधे कपड़े तपन को पसंद न आते. अकसर तृप्ति से कहते, ‘तरू, हाथ से निकल रही है.’ इस पर वह दबी जबान से तरू को समझाती लेकिन उस ने कभी भी मां की बातों पर ध्यान नहीं दिया.

‘‘मौम, मुझे 1 हजार रुपए चाहिए.’’

‘‘क्यों? अभी कल ही तो तुम ने पापा से रुपए लिए थे.’’

‘‘मौम, सब मुझ से पार्टी मांग रहे थे… उसी में पैसे खर्च हो गए.’’

‘‘मैं तुम्हारे पापा से कहूंगी.’’

तरू तृप्ति से लिपट गई…तृप्ति पिघल गई. रुपए लेते ही वह फुर्र हो गई.

‘‘मौम, आजकल थिएटर में मेरा रिहर्सल चल रहा है, इसलिए देर से आऊंगी.’’

तृप्ति का माथा ठनका, ‘कल तो तरू ने कहा था कि इस हफ्ते मेरा कोई शो नहीं है.’

अभी वह इस ऊहापोह से निकल भी न पाई थी कि तपन पुकारते हुए आए.

‘‘तरू… तरू…’’

तृप्ति ने उत्तर दिया, ‘‘तरू का आज रिहर्सल है.’’

‘‘वह झूठ पर झूठ बोलती रहेगी, तुम आंख बंद कर उस पर विश्वास करती रहना. वह किसी लड़के की बाइक पर पीछे बैठी हुई कहीं जा रही थी, लड़का बाइक बहुत तेज चला रहा था,’’ तपन क्रोधित हो बोले थे.

तृप्ति घबरा कर चिंतित हो उठी. वह सोचने को मजबूर हो गई कि क्या तरू गलत संगत में पड़ गई है. मन ही मन घुटती हुई वह तरू के आने का इंतजार करने लगी.

लगभग रात में 11 बजे घंटी बजी. तृप्ति सोने की कोशिश कर रही थी. घंटी की आवाज सुन वह गुस्से में तेजी से उठी. दरवाजा खोलते ही तरू की हालत देख कर वह सन्न रह गई.

तरू की आंखें लाल हो रही थीं, एक लंबे बालों वाला लड़का उसे पकड़ कर खड़ा था. तृप्ति तपन से छिपाना चाह रही थी, इसलिए चुपचाप उस को सहारा दे कर उस के कमरे में ले गई और उसे बिस्तर पर लिटा दिया. तरू के मुंह से शराब की दुर्गंध आ रही थी.

तृप्ति की आंखों की नींद उड़ चुकी थी. वह मन ही मन रो रही थी और अपने को कोस रही थी. तरू को किस तरह सुधारे, वह क्या करे, कुछ सोच नहीं पा रही थी. उस का मन आशंकाओं से घिरा हुआ था. उसे तन्वी की याद आ रही थी. उस के मन में छात्रावास के प्रति अच्छे विचार नहीं थे लेकिन तरू तो उस की आंखों के सामने थी फिर कहां चूक हुई जो वह गलत हो गई. तपन ने तो सदैव उसे आगाह किया था, ‘लड़कियों को आजादी दो परंतु आजादी पर निगरानी आवश्यक है. नाजुक उम्र में बच्चे आजादी का नाजायज फायदा उठा कर खतरे में पड़ जाते हैं.’

तृप्ति ने रात पलकों में गुजारी. सुबह जब तरू उठी तो रात के बारे में पूछने पर अनजान बनती हुई बोली, ‘‘कल पार्टी में किसी ने उस की डिं्रक में कुछ मिला दिया था.’’

मां की ममता फिर से हावी हो गई. तृप्ति फिर से उस की बातों में आ गई थी.

अब जब हालात नियंत्रण से बाहर हो चुके थे तो तृप्ति उस पर रोक लगाना चाह रही थी. तरू एक न सुनती. एक दिन तृप्ति प्यार से उस का हाथ सहला रही थी, तभी उस के हाथों के काले निशान पर उस की नजर पड़ी. तुरंत तरू ने सफाई दी, ‘‘कुछ नहीं मौम. मैं स्कूटी ड्राइव करती हूं न, उसी का निशान है,’’ लेकिन उस के बहाने तृप्ति को विचलित कर चुके थे…उंगलियों के बीच में जले के निशान केवल सिगरेट के हो सकते हैं.

तृप्ति अब उस पर नजर रखने लगी. उसे तरहतरह से समझाने का प्रयास करती लेकिन तरू की आंखों पर तो ग्लैमर का चश्मा चढ़ा हुआ था. मोबाइल की घंटी सुनते ही वह भाग जाती थी. तृप्ति हालात को स्वयं ही सुधारने में लगी थी लेकिन तरू उस की एक न मानती.

निराशा एवं हताशा में तृप्ति बीमार रहने लगी तो तपन को चिंता हुई. उन्होंने तरू से कहा, ‘‘तुम कुछ दिन छुट्टी ले कर घर में रहो और मां की देखभाल करो, फिर कुछ दिन मैं छुट्टी ले लूंगा. लेकिन तरू ने एक न सुनी. तपन बहुत नाराज हुए और तृप्ति को ही कोसने लगे. तरू की बरबादी के लिए उसे ही जिम्मेदार बताने लगे. दिन और रात ठहर गए थे. अभी तक तृप्ति परेशान रहती थी अब तपन भी चिंतित और दुखी रहने लगे.

आज तो तरू को बेसिन पर उलटी करते देख कर तृप्ति सिहर गई. उस की बातों ने तो आग में घी का काम किया.

‘‘क्या हुआ, मौम? कोई पहाड़ टूट पड़ा है, क्यों मातम मना रही हो, क्या कोई मौत हो गई है. मैं डाक्टर के पास जा रही हूं, 1 घंटे की बात है, बस, सब नार्मल.’’

तृप्ति फूटफूट कर रो पड़ी. क्या हो गया इस नई पीढ़ी को. यह युवा वर्ग किधर जा रहा है, कहां गईं हमारी मान्यताएं. कहां गई शिक्षा. इतनी जल्दी इतना परिवर्तन. इतनी भटकन, क्या ऐसा संभव है? Hindi Family Story

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