मैं अपनी बड़ी बहन की दोस्त को पसंद करता हूं, मुझे क्या करना चाहिए?

सवाल-

मेरी उम्र 16 साल है और मैं 12वीं कक्षा में पढ़ता हूं. मेरी एक बड़ी बहन है जो 18 साल की है और कालेज के फर्स्ट ईयर में है. मेरी बहन की एक दोस्त है जो 17 साल की है. वह मुझे बहुत अच्छी लगती है. वह कभीकभी घर आती है तो उस की और मेरी नजरें आपस में टकरा जाती हैं, लेकिन बात आज तक नहीं हो पाई.

जब भी उस से नजरें टकराती हैं तो पता नहीं क्यों ऐसा लगता है जैसे वह भी वही फील कर रही हो जो मैं फील कर रहा हूं. मैं उस से बात करना चाहता हूं, उसे जानना चाहता हूं लेकिन उस के रिस्पौंस से डरता हूं. कहीं वह मुझे खुद से छोटा समझ कर या ‘सहेली का भाई है’ इस कारण मना न कर दे. या हो सकता है कि वह मुझे पसंद करती हो और बाकी सभी लड़कियों की तरह बताने में झिझक रही हो. मैं क्या करूं?

जवाब-

आप की परेशानी जायज है पर आजकल उम्र से ज्यादा लोग सामने वाले की पर्सनैलिटी, पसंदनापसंद और थिंकिंग को इंपोर्टैंस देते हैं. आप का यह सोचना कि आप की बहन की सहेली कहीं आप को छोटा समझ कर या सहेली का भाई समझ कर मना न करे, सही है. लेकिन, इस तथ्य को भी नहीं झुठलाया जा सकता कि अगर आप उसे पसंद होंगे तो वह भी खुद को नहीं रोक पाएगी. वह आप की बहन की दोस्त है तो आप अपनी बहन से इस बारे में बात कर सकते हैं.

आप यदि सीधा उस लड़की से बात करेंगे तो हो सकता है उस की नजर में आप गिर जाएं और साथ ही आप की बहन भी. समझदारी से काम लें. नौर्मल फ्रैंड्स की तरह बात करने की कोशिश करें. उस के हावभाव से आप को उस के मन में क्या है, पता चल जाएगा. उस के बाद ही उस से आगे कुछ बात करने या मन की बात कहने के बारे में सोचें.

कैसे थमे बलात्कार

‘मैं एक घर से काम करके लौट रही थी. पराग चैराहे से थोडा आगे मंदिर के आगे पहुंची तो सामने से कार में सवार 4 लडके आये. उन लोगों ने मेरा मुंह बंद करके मुझे जबरदस्ती कार में चढा लिया. मुझे गाडी की पिछली सीट की गद्दी के नीचे लिटा दिया. मैने शोर मचाया तो उन लोगों ने जोर से बाजा बजा दिया. उनमें से एक गाडी चलाने लगा और 2 लडको ने मेरे साथ जोर जबरदस्ती करनी शुरू कर दी.

मुझे धमकी देकर कहा कि रोओगी तो गोली मार देगे. मैने जब उन से कहा कि भैया मुझे छोड दो तो उन लोगों ने मुझे और मारा. मेरे पैर में लाइटर से जलाया और बट से कमर पर मारा. उनमें से 3 लडको ने मेरे साथ उस समय गलत काम किया.’ 2 मई 2005 को उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ में घटी इस घटना को आशियाना बलात्कार कांड के नाम से जाना जाता है. इस लडकी को शाम के 6 बजे अगवा किया गया था और रात के 11 बजे हाथ में 20 रूपया देकर घायल अवस्था में सडक पर छोड कर युवक भाग गये.

लडकी गरीब परिवार की थी. घरों में मेहनत मजदूरी करके काम चलाती थी. उसके पिता रिक्शा चलाकर अपना परिवार चलाते थे. लडकी किसी तरह उस रात पहले घर फिर पिता के साथ थाने पहुंची, पुलिस ने मुकदमा लिखा. 6 आरोपियों को पुलिस ने पकडा, जिनमें से 4 खुद को नाबालिग बताने लगे. मुख्य आरोपी गौरव शुक्ला लखनऊ के एक बाहुबलि नेता का भतीजा था. बहुत सारी अदालतीय लडाई के बाद अदालत में यह साबित हो गया कि गौरव शुक्ला बालिग था.

5 सितम्बर 2005 को बालिग आरोपी अमन बक्शी और भारतेन्दु मिश्रा को सेशन कोर्ट ने 10 साल की सजा और 10-10 हजार रूपये जुर्माना की सजा दी. इस कांड में शामिल दो आरापियों आसिफ सिद्दकी और सौरभ जैन जमानत पर छूट कर बाहर आये. एक दुर्घटना में दोनो की मौत हो गई. एक आरोपी फैजान को अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई. गौरव शुक्ला ने पूरे मामले को भटकाने के जितने प्रयास कर सकता था किया. अदालत ने उसे 10 साल की सजा और 20 हजार रूपये का जुर्माना सुनाया. फास्ट ट्रैक अदालत के बाद यह मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक जायेगा. न्याय का मूल सिद्वान्त है कि न्याय होना ही नहीं चाहिये न्याय होते दिखना भी चाहिये.

अदालत में पेशी पर जब भी गौरव शुक्ला आता था हमेशा सफेद लकदक कपडों में ही रहता था. उसको जेल में हर सुविध मिले इसके लिये पूरे गठजोड होते रहे. सजा सुनाये जाने के बाद भी उसे विशेष सुविध हासिल थी. यह राजनीतिक और नौकरशाही के गठजोड के बिना संभव नहीं हो सकती.

प्रदेश की राजनीति और नौकरशाही को मुंह चिढाने वाली यह घटना बताती है कि पीडित लडकी और उसके परिवार के साथ मीडिया, अदालत और महिला संगठनों का जोर नहीं होता, तो यह मामला कब का दबा दिया जाता. कई बार पीडित परिवार को केस वापस लेने के लिये लालच और धमकी दी गई. इससे पता चलता है कि हमारे देश में समाज बलात्कार के मामले में आज भी पीडित के बजाय दोषी के साथ खडा होता है. क्या इन परिवारों का समाज ने कोई बायकाट किया ?

जानें आखिर क्यो होनी चाहिए हर लड़के के पास एक फीमेल बेस्ट फ्रेंड

ऐसे कई लड़के होते है जिन्हे अपनी फीमेल फ्रेंड बनाने में शर्मी आती है.वह लड़कियों से बात करने में कतराते है. हालांकि वह अपने लड़के दोस्त बात करने में कभी नहीं शर्माते है लेकिन बात अगर किसी लड़की की आएं तो वह पीछे हो जाते है. इस आर्टिकल में हम आपके लिए लेकर आए है ऐसे ही कुछ बातें जो बताएंगी की एक फीमेल फ्रेंड क्यो ज़रूरी है.

  1. रिश्ते की समस्या हो या करियर की दुविधा, कोई और आपको ऐसी सलाह नहीं देगा, जो आपकी फीमेल फ्रेंड आपको आसानी से दे सकती है. वह आपको अंदर से जानती है. वह आपके बारे में यह तक जानती होगी कि आपके लिए सबसे अच्छा क्या है.
  2. वह आपके साथ शॉपिंग पर जाने के लिए हमेशा तैयार रहती है. वह जानती है कि आप पर क्या अच्छा लगता है। आपको आपकी गर्लफ्रेंड के माता-पिता से मिलने के लिए तैयार करेगी. आप उस पर अपने पर्सनल स्टाइलिस्ट होने पर निर्भर हो सकते हैं. हालांकि इसके विपरीत कभी सच नहीं होता है. हम लोग चेंजिंग रूम के बाहर अश्लील हरकतें करना बंद नहीं कर सकते.
  3. एक लड़की की सबसे अच्छी दोस्त होने से आपके लिए हॉट लड़कियों को स्कोर करने के कई अवसर खुल जाते हैं. न केवल वे उनमें से सौ को जानती हैं, वे आपको किसी न किसी के साथ सेट करने के लिए हमेशा तैयार रहती हैं, भले ही आप में कितनी ही बुराइयां ही क्यों न हो.
  4. हालांकि, सबसे अच्छी बात यह है कि आपकी बॉन्डिंग से कई लोग बुराई करने से भी बचते हैं. क्योंकि वह हमेशा आपके लिए अपनी आवाज उठाएगी.और कभी-कभी, शरारत आप पर होती है!
  5. नाइट क्लब के लिए आपके पास हमेशा ‘डेट’ होती है. आप अपनी ज्यादा खर्चे के बिना सबसे अच्छे क्लबों में पार्टी करते हैं और उसके साथ दूसरी लड़कियों से भी बातचीत कर सकते हैं.
  6. आप जानते हैं कि जब गिफ्ट खरीदने की बात आती है तो ज्यादातर लड़के कितने मुश्किल में पड़ जाते हैं. खैर, यहीं पर लड़की की सबसे अच्छी दोस्त काम आती है. एनिवर्सरी हो, बर्थडे हो या फिर किसी कि की शादी हो वह आपको सबसे बेहतरीन तोहफा दिलाने में मदद करती है.

कोटा में छात्रों की खुदकुशी : खुद को साबित करने का जानलेवा दबाव

आप अपने मन में एक चित्र बनाएं कि किसी दूरदराज गांव का गरीबवंचित परिवार का कोई बच्चा ऊंची पढ़ाई के लिए कोटा, राजस्थान में कोचिंग लेने के सपने देख रहा है. उस का मजदूर पिता अपना अधभरा पेट काट कर पैसे जमा करता है और बच्चे की आंखों में सुनहरे भविष्य की चमक देख कर संतुष्ट हो जाता है.

पर अचानक कोटा से खबर आए कि उस मजदूर का बेटा वहां पढ़ाई का दबाव नहीं झेल पाया और एक नायलौन की रस्सी से फांसी लगा कर मर गया है, तो उस मजदूर पिता पर क्या बीतेगी? हमारे लिए यह एक दुखद खबर हो सकती है, पर वह मजदूर तो जीतेजी मर जाएगा.

इस चित्र को सोचने की वजह क्या है? दरअसल, अब कोटा अपनी पढ़ाई से ज्यादा छात्रों की खुदकुशी के लिए सुर्खियां बन रहा है. एक छात्र की लिखी आखिरी चिट्ठी के अंश से आप को बात समझ में आ जाएगी :

‘अभिनव मेरे भाई, तुम कभी कोटा नहीं आना. मैं नहीं चाहता कि तुम भी मेरी तरह दिमागी रूप से परेशान हो जाओ. मैं यहां सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई करता हूं. अकेला हो गया हूं. मोबाइल है नहीं तो कई दिनों से यह लैटर लिख रहा हूं. जब मौका मिल पाया था तब भेजा.

‘अभिनव, तुम पेंटिंग बनाओ. सोशल मीडिया का इस्तेमाल करो. हो सकता है कि तुम को घर बैठे ही कहीं से और्डर आ जाएं. तुम बहुत बड़े आर्टिस्ट बन जाओ.

‘अंत में मांपापा, एक बात आप से बताना भूल गया. भूला नहीं शायद हिम्मत नहीं जुटा पाया. पिछले हफ्ते एक टैस्ट हुआ था पापा. 50 मार्क्स का था. मैं 35 नंबर ला पाया, जो क्लास में सब से कम थे. सब के नंबर अच्छे थे. कोचिंग वाले बोले कि मार्कशीट घर जाएगी. शायद अब तक पोस्ट भी हो गई होगी, लेकिन उस से पहले मैं आप सभी से माफी मांग रहा हूं. मांपापा, आप का सपना अब अभिनव पूरा करेगा. मैं उस लायक नहीं बना.

‘अभिनव, तुम रोना नहीं. बस यह सोच लेना भैया का सपना भी तुम को पूरा करना है.

‘अलविदा.’

कोटा को आईआईटी और नीट के इम्तिहान को क्रैक करने का हब माना जाता है, पर इस साल वहां 24 छात्र पढ़ाई और मानसिक दबाव में अपनी जान दे चुके हैं. हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि वहां कोचिंग संस्थानों और होस्टलों में ‘ऐंटी सुसाइड फैन’ लगाने के आदेश जारी होने के बाद भी रविवार, 27 अगस्त, 2023 को 4 घंटे के भीतर 2 छात्रों ने अपनी जान दे दी थी.

इन में एक छात्र बिहार के रोहतास का था और दूसरा महाराष्ट्र के लातूर का रहने वाला था. बिहार के रोहतास जिले का 18 साल का आदर्श राज जहां फांसी पर लटक गया, वहीं 16 साल के अविष्कार संभाजी कासले ने इंस्टीट्यूट की छठी मंजिल से छलांग लगा दी.

खतरे की घंटी

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस साल जिन छात्रों ने खुदकुशी की है, उन में से ज्यादातर गरीब या लोअर मिडिल क्लास परिवार से थे. ऐसे छात्रों में किसी के पिता नाई, किसी के पिता गाड़ी साफ करने वाले और कुछ के पिता छोटे किसान थे.

कोटा में बच्चों पर क्या गुजर रही है, यह खुदकुशी करने वाले एक छात्र से समझिए, जिस के पिता ने कहा, “अपने बच्चे को कहीं भी भेजिए, बस कोटा मत भेजिए.”

हमारे ऐजूकेशन सिस्टम के लिए यह कितनी शर्मनाक बात है कि 17 साल के एक छात्र ने कोटा पहुंचने के एक महीने के भीतर ही खुदकुशी कर ली थी.

आंकड़ों पर नजर डालें तो साल 2015 में 17 छात्रों ने सुसाइड किया, जबकि साल 2016 में 16, 2017 में 7, 2018 में 20, 2019 में 8, 2020 में 4 और 2022 में 15 छात्रों ने अपनी जान दे दी.

कोटा में हर साल तैयारी के लिए आने वाले छात्रों का आंकड़ा बढ़ता जाता है. साल 2021-22 में यहां 1,15,000 छात्र कोचिंग के लिए पहुंचे थे, तो वहीं 2022-23 में यह तादाद बढ़ कर 1,77,439 हो गई थी. साल 2023-24 में यह आंकड़ा 2,05000 तक पहुंच गया है.

कोटा में कोचिंग इंडस्ट्री की कुल नैटवर्थ तकरीबन 5,000 करोड़ रुपए है. यहां 3,000 से ज्यादा होस्टल, 1,800 मैस और 25,000 पीजी कमरे हैं.

कहने का मतलब है कि कोटा में पढ़ाई के संसाधन इतने ज्यादा मजबूत हैं कि ‘कोटा मौडल’ अपनेआप में एक मिसाल बन गया है, जहां छात्रों के लिए शानदार कोचिंग सैंटर, पढ़ाने के लिए उम्दा टीचर, एक से बढ़ कर एक लाइब्रेरी, पढ़ने की लाजवाब सामग्री… और भी न जाने क्याक्या मुहैया है. तो फिर ऐसी क्या वजह है कि छात्र ‘पढ़ाई के भूत’ से डर के मारे कंपकंपा रहे हैं? क्यों उन्हें मरने में ही अपना भविष्य उज्ज्वल दिखाई देता है?

दरअसल, कोटा का ऐजूकेशन सिस्टम अब हर तरह से फेल होता नजर आ रहा है. यहां का मैनेजमैंट चरमरा गया लगता है और छात्रों को इनसान कम, फीस भरने की एटीएम ज्यादा समझा जाने लगा है.

छात्रों पर पड़ता दबाव

हिंदी फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में रैंचो अपने साथी छात्र की मौत के बाद प्रिंसिपल से सीधा बोल देता है कि हर छात्र पर पढ़ाई का इतना ज्यादा दबाव रहता है कि उस का दिमाग प्रैशर कुकर सा बनने लगा है.

कुछ ऐसा ही कोटा में देखा जा रहा है. वहां के कोचिंग सिस्टम के अपने ही कायदे बने हुए हैं. वे 9वीं क्लास से ही आईआईटी और नीट के लिए कोर्स शुरू कर देते हैं. बच्चों के मांबाप के मन में यह बैठ जाता है कि अगर उन का नौनिहाल थोड़ा लेट कोचिंग क्लास जौइन करेगा तो पिछड़ जाएगा. लिहाजा, वे भेड़चाल में अपने बच्चे को वहां दाखिल करा देते हैं.

कोटा जैसी जगह पर ऐसा लगता है कि हर बच्चा हर समय पढ़ ही रहा है. वह बंधुआ मजदूर की तरह अपने मांबाप के सपनों को पूरा करने के लिए जुट जाता है कोल्हू के बैल की तरह और जो ‘मेरा समय’ है जैसे घूमनाफिरना, मौजमस्ती करना, दोस्तों और घर वालों से मिलना वगैरह, वह धीरेधीरे ‘दूसरों के सपने पूरे करने का समय’ बन जाता है, जिस में कोचिंग टाइम, स्कूल टाइम, होमवर्क टाइम, टैस्ट टाइम और प्रैक्टिस टाइम ही जरूरी माना जाता है.

यहां सब से जरूरी बात यह है कि खुदकुशी करने वाले ज्यादातर बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं, जहां उन्हीं से जिंदगी को बेहतर करने की उम्मीद लगाई गई होती है. वे अपने घर के हालात से वाकिफ होते हैं, इसलिए उन पर कामयाब होने का दबाव कई गुना बढ़ जाता है. अगर वे पढ़ाई में खुद को कमजोर महसूस करते हैं तो दिमागी तौर पर एकदम से टूट जाते हैं और एक लंबी सी चिट्ठी लिख कर अपनी जिंदगी छोटी कर देते हैं.

च्छे पैकेज का काटा कीड़ा

आजकल पढ़ाई का मतलब हो गया है कि बच्चा नौकरी में सालाना कितने लाख का पैकेज पा रहा है. हैरत की बात तो यह है कि हम कितने ही लाख या करोड़ का पैकेज सुन लें, हमें कोई हैरानी या खुशी ही नहीं होती है.

इस माहौल में अगर किसी का बच्चा राजनीति विज्ञान वगैरह से कालेज में ग्रेजुएशन कर रहा है तो ‘इस घर का तो पानी भी पीने में शर्म महसूस होगी’ वाली सोच मांबाप पर इतनी ज्यादा हावी है कि वे किसी भी हाल में अपने बच्चे को इंजीनियर या डाक्टर ही बनाना चाहते हैं. उन के सपने बच्चे के सपने से बड़े हो जाते हैं. यहीं पर बच्चे मार खा जाते हैं और डिप्रैशन के अंधेरे में खोने लगते हैं.

इस के अलावा बच्चों पर अपनी पढ़ाई के खर्च का भी बहुत ज्यादा दबाव रहता है. कोटा में एक साल में एक बच्चे के रहने का खर्च तकरीबन ढाई लाख रुपए के आसपास का है. एक से डेढ़ लाख रुपए कोचिंग की फीस है. इस के अलावा बच्चों के दूसरे तमाम खर्चे भी होते हैं. सबकुछ जोड़ कर देखें तो एक साल में एक बच्चे पर तकरीबन 4 लाख रुपए तक भी खर्च हो जाते हैं.

फिर क्या है हल

यह समस्या हर साल बड़ी होती जा रही है, पर इस का हल इतना पेचीदा भी नहीं है. अगर बच्चों को पढ़ाई और मनोरंजन की बैलेंस डोज दी जाए तो उन्हें पढ़ाई बोझ लगनी बंद हो जाएगी. उन्हें यह भी समझना होगा कि इंजीनियरिंग या डाक्टरी ही उज्ज्वल भविष्य की गारंटी नहीं है.

कोरोना काल में दुनिया की रेलगाड़ी मानो पटरी से उतर कर डगमगा गई थी, पर फिर भी बहुत से लोगों ने हिम्मत दिखाई और बहुत से ऐसे काम कामयाबी से किए, जिन के बारे में उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. उन्होंने किसी से सीख ली और हिम्मत दिखाते हुए नई राह खोज ली.

ऐसी ही एक सीख पर गौर कीजिए. कोटा में लगातार बढ़ती छात्रों की खुदकुशी करने की घटनाओं को ले कर महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने ट्वीट करते हुए लिखा, ‘इस तरह की खबर से मैं भी उतना ही परेशान हूं जितना आप हैं. देश के इतने उज्ज्वल भविष्यों को खत्म होते देखना मेरे लिए दुखद है. ऐसे मामलों में मेरे पास शेयर करने के लिए कोई बड़ी बातें या ज्ञान नहीं है, लेकिन कोटा के हर छात्र को जिंदगी के इस पड़ाव पर आप का टारगेट खुद को साबित करना नहीं, बल्कि खुद को ढूंढ़ना होना चाहिए…

‘किसी ऐग्जाम में कामयाबी नहीं मिलना खुद को खोजने की यात्रा का एक हिस्सा है. इस का मतलब यह भी हो सकता है कि आप की असली प्रतिभा कहीं और है, इसलिए खोजते रहो, ट्रैवल करते रहो… आप आखिरकार खोज लेंगे कि क्या ऐसी चीज है, जो आप के अंदर सर्वश्रेष्ठ है.’

याद रखिए, हर किसी में कोई न कोई गुण होता है. कोई अगर कम पढ़ालिखा है तो जरूरी नहीं कि वह जिंदगी की रेस में पिछड़ जाए. बहुत से गाड़ी मेकैनिक अपने हाथ के हुनर और तजरबे से अच्छीखासी आमदनी कर लेते हैं.

मांबाप और टीचरों को भी चाहिए कि वे बच्चे पर नजर रखें कि कहीं वह पढ़ाई को कुछ ज्यादा ही दिल पर तो नहीं ले रहा है. अगर ऐसा है तो उस के मन को टटोलें और अपने सपनों की हत्या पहले कर दें, ताकि वह खुदकुशी जैसा संगीन अपराध न कर बैठे.

पछतावा: थर्ड डिगरी का दर्द- भाग 2

‘बंद करो अपनी बकवास. मयंक तुम्हारे जैसा अपराधी नहीं, बल्कि वह एक सच्चा इनसान है. इस की मैं तहेदिल से कद्र करती हूं. तुम यहां से जाते हो कि पुलिस को बुलाऊं…’

‘ओह, मैं तेरे लिए इतना बेगाना हो गया हूं नैना कि पुलिस को बुलाने की धमकी दे रही हो? खैर, जाता हूं मैं. अगर मेरे प्रति थोड़ी सी भी ममता और प्यार हो, तो कल ओम सिनेमा घर के पास दोपहर के शो के दौरान मिलना…’ इतना बोल कर रतन वहां से चला गया.

‘‘अरे रतन, किन खयालों में डूबे हो?’’ अचानक नेता सुरेश राय लौकअप में बंद रतन को देखते ही बोल पड़े.

मंत्री सुरेश राय को देखते ही रतन अपने खयालों की दुनिया से वापस लौटा और अपने ऊपर होने वाले जोरजुल्म से बचने के लिए गुजारिश करते हुए बोला, ‘‘सर, मुझे किसी तरह इंस्पैक्टर से बचा लीजिए, नहीं तो वह मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगा…’’

‘‘अरे रतन, तू बेकुसूर है. मेरे पास तेरी बेगुनाही के पुख्ता सुबूत हैं. एसपी ने इंस्पैक्टर छेत्री को फोन कर तुम्हें छोड़ने के लिए आदेश दे दिया है.’’

ठीक उसी समय इंस्पैक्टर राजन छेत्री आया और लौकअप पर तैनात सिपाही से रतन को छोड़ देने के लिए कहा.

बाहर निकलने के बाद मंत्री ने रतन को अपनी गाड़ी में बिठाया. तब रतन मंत्री के एहसानों के दबाव में बोला, ‘‘सर, मैं आप का यह उपकार जिंदगीभर नहीं भूल पाऊंगा.’’

‘‘अरे, कैसा उपकार? मैं तेरे काम आ गया तो बदले में तू भी तो मेरा काम कर देता है. तेरे जैसे जोशीले नौजवान मुझे बहुत पसंद हैं…’’ गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे हुए मंत्री सुरेश राय ने रतन की पीठ को धीरे से थपथपाया और फिर कहा, ‘‘तुम्हारी मदद से ही तो मैं अपने दुश्मनों के दांत खट्टे करता हूं.’’

उन की गाड़ी बीरपाड़ा शहर से काफी दूर निकल गई थी. अचानक ड्राइवर ने ब्रेक लगाया, दरवाजा खोल कर रतन बाहर निकल गया था. जहां सड़क पर एक बेबस लड़की ‘बचाओ… बचाओ…’ की आवाज लगाते हुए दौड़ रही थी और उस के पीछे 4-5 गुंडे लगे हुए थे.

यह देख कर मंत्रीजी के हाथपैर फूल गए. उन्होंने घबराते हुए रतन को आवाज लगाई, ‘‘अरे रतन, उन के पीछे क्यों भागे जा रहे हो. मेरी जान आफत में डालोगे क्या? ड्राइवर तुम्हें भी कई बार कह चुका हूं कि रात में गाड़ी अनजान जगह पर मत रोको…’

‘‘सौरी सर,’’ ड्राइवर ने माफी मांगी, लेकिन रतन पर मंत्री की बातों का कोई असर नहीं पड़ा.

रतन ने दौड़ रहे एक गुंडे को पकड़ा और उस के पेट में अपनी लात से 2-4 किक जमाई. वह तिलमिला उठा. वार करने की जगह अपनी जान बचा कर चाय बागान में वह भाग गया. रतन दूसरे अपराधियों की ओर बढ़ा, लेकिन वे सब अपने को फंसते देख कर नौ दो ग्यारह हो गए.

सड़क पर दौड़ रही लड़की हांफती हुई धम्म से गिर गई. रतन ने उसे अपने कंधे पर उठाया और गाड़ी की पिछली सीट पर डाल दिया.

‘‘अरे रतन, यह क्या चक्कर है. तुम्हें लड़की की जरूरत थी तो मुझ से बोला होता,’’ मंत्री सुरेश राय ने उस से अपना गुस्सा इजहार किया.

‘‘सर, गलत काम जरूर करता हूं, लेकिन शराब और शबाब से दूर रहता हूं. अनजान जगह पर किसी बेबस लड़की की जान बचाना कोई अपराध तो नहीं है. इनसानियत के नाते मैं ने अपना कर्तव्य निभाया है.’’

‘‘देखो, फालतू बातों के लिए मेरे पास समय नहीं है. हक और धर्म की बातें हम अपने भाषणों में करते हैं, अपनी जिंदगी में नहीं. अब इस लड़की को कहां छोड़ोगे?’’

‘‘इसे सिलीगुड़ी के किसी अस्पताल में ले जाएंगे सर,’’ विधान मार्ग पर बने सुभाषचंद्र नर्सिंग होम में उस अनजान लड़की को इलाज के लिए भरती करा दिया गया. साथ ही, इस की सूचना स्थानीय पुलिस को भी दी गई.

जब लड़की पर रतन की नजर गई, उस का कलेजा धकधक करने लगा. वह तो नैना थापा है, उसे देखने के बाद वह पत्थर की तरह वहीं खड़ा रह गया. कभी खून से लथपथ उस के सलवारसूट को देख रहा था तो कभी उस के मुरझाए चेहरे को. उसे सामूहिक हवस का शिकार बनाया था. दूसरे ही पल रतन के मन ने कहा, ‘यह लड़की तो मुझ से नफरत करती है. कहीं होश में आने के बाद कोई नई मुसीबत न खड़ी कर दे. अब यहां से निकलने में ही भलाई है.’

‘‘रतन, इस लड़की के पीछे तो तू ने अपना सारा काम चौपट कर दिया. पहले इसे उन बदमाशों से बचाया, उस के बाद अस्पताल में भरती कराया और अब इस के चेहरे पर टकटकी लगाए खड़ा है. आखिर क्या बात है?’’ नर्सिंग होम में देर होने पर नेता सुरेश राय ने रतन को टोका. ‘‘नहीं, नहीं सर,’’ वह हड़बड़ा कर बोल उठा और उन के साथ बाहर निकल गया. साथ ही जातेजाते रतन सोचने लगा, ‘इस लड़की का क्या भरोसा, कब क्या आरोप लगा दे, इस से दूर रहने में ही भलाई है.’

जब नैना को होश आया तो एक बार रतन का चेहरा उस के दिमाग में नाच उठा. टाइगर हिल में दी गई उस की चेतावनी उस के मन को झकझोरने लगी. उसे अपनेआप पर पछतावा होने लगा, क्यों उस ने आंख मूंद कर मयंक पर भरोसा किया. जिस ने उस की इज्जत लूट ली. उस के साथियों ने उस का सबकुछ छीन लिया.

नैना की आंखें भर आईं. उस को अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगी. वह सोचने लगी कि उस से शैतान और इनसान को पहचाने में कैसे भूल हो गई?

अचानक नैना के सामने रतन और मयंक की तसवीरें उभर आईं. दोनों ही अपराधी थे. मयंक कई मासूम लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बनाने के बाद उन की हत्या कर देता था, तो रतन कई बार बम धमाके कर चुका था. एक हैवान था, तो दूसरा शैतान. दोनों जनता के दुश्मन थे.

अस्पताल से घर आने के बाद भी नैना को चैन नहीं मिला. लोकलाज के डर से उस ने कालेज जाना बंद कर दिया था. दिनरात उस के घर में जमघट लगाने वाली सहेलियां, अब उस से बात करने में भी कतराती थीं. हमदर्दी जताने के बजाय तरहतरह के ताने देती थीं.

एक दिन नैना के घर रतन पहुंच गया. उस समय नैना की आंखों में आंसू थे. नैना की हालत देख कर रतन भी रोना आ गया.

रतन ने अपनी डबडबाई आंखों को रूमाल से पोंछा और फिर उस से बोला, ‘‘नैना प्लीज… मत रोओ, चाहे मयंक को सजा हो भी गई तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा…’’

विधायक को जवाब : निशा किस वारदात से डरी हुई थी- भाग 2

मगर निशा उस के सीने में चेहरा छिपाए रोती ही रही. तभी निशा के पिता वहां आ पहुंचे. राजन उन्हें देख कर निशा से अलग हो गया. निशा भी आंसू पोंछते हुए सिर झुका कर खड़ी हो गई. कुछ पलों तक वहां शांति छाई रही. फिर निशा के पिता बोले. ‘‘देखो राजन साहब, इस तरह रात में किसी के घर में घुसना अच्छी बात नहीं. आप…’’ राजन उन की बात को काटते हुए बोला, ‘‘आप जो कुछ भी कहिए, मगर मैं निशा से प्यार करता हूं और हम दोनों शादी करना चाहते हैं.

जाति के बंधन तोड़ कर क्या शादी करना बुरी बात है?’’ ‘‘देखिए, निशा मेरी बेटी है और मैं एक हरिजन हूं. आप के पिताजी बारबार कह चुके हैं कि एक हरिजन की बेटी को वह अपनी बहू कभी नहीं बनाएंगे.’’ ‘‘मगर मैं निशा को अपनी पत्नी जरूर बनाऊंगा. मैं घर छोड़ दूंगा. उन की जायदाद से एक कौड़ी नहीं लूंगा.’’ ‘‘राजन बाबू, मेरी पीठ पर आप के पिताजी के आदमियों के डंडों के निशान हैं. अच्छा होगा कि आप यहां से चले जाएं, वरना यदि मेरी बिरादरी के लोग भी यहां आ गए, तो गजब हो जाएगा.’’

‘‘मैं निशा से सच्चा प्यार करता हूं बाबूजी, और प्यार करने वाले मौत से नहीं घबराते, मैं पिताजी की तरफ से…’’ राजन इतना ही बोल पाया था कि 4-5 लोग हाथ में लाठियां लिए अंदर आ गए. एक आदमी बोला, ‘‘राजनजी, हम हरिजन हैं तो क्या, हमारी भी अब इज्जत है. अब हम अपनी इज्जत की नीलामी कभी बरदाश्त नहीं कर सकते. बेहतर होगा कि आप यहां से चले जाएं. पुलिस कुछ नहीं करेगी तो भी हम बहुतकुछ कर सकते हैं.’’ निशा डर गई. राजन भी उस की हालत को समझ गया. राजन बोला, ‘‘भाइयो, इज्जत की नीलामी तो कोई भी बरदाश्त नहीं कर सकता. मगर, आप लोग बताइए कि शादी करना क्या जुर्म है?’’ ‘‘ऐसी बात मत कहिए राजन साहब, जिसे पूरा कर पाना नामुमकिन हो.’’ ‘‘मैं पूरे होश में कह रहा हूं और इस का सुबूत आप लोगों को कल ही मिल जाएगा.’’ तुरंत दूसरे आदमी ने कहा, ‘‘कल क्यों, आज क्यों नहीं?’’ सभी ने देखा कि राजन ने अपनी जेब से कुछ निकाला और निशा की तरफ मुड़ा. देखते ही देखते उस ने निशा की सूनी मांग में सिंदूर भर दिया.

निशा के साथसाथ सभी चौंक गए. निशा हैरानी से उसे देखने लगी. अचानक राजन बोला, ‘‘आज से यह मेरी पत्नी और कल कचहरी में जा कर अप्लाई कर देंगे और महीनेभर में हम दोनों कानूनी तौर पर पतिपत्नी बन जाएंगे. मैं ने वकील से बात कर ली है,’’ इतना कह कर वह निकल गया. राजन जब अपने घर के पास आया, तो गेट पर ही रामू से मुलाकात हो गई, जो उस का सब से वफादार नौकर था. वह उस को देखते ही बोला, ‘‘भैयाजी, बड़े मालिक आप ही की राह देख रहे हैं.’’ ‘‘ठीक?है,’’ कहते हुए राजन आगे बढ़ गया, तो रामू बोला, ‘‘बड़े मालिक आप पर बहुत गुस्सा हो रहे हैं.’’ राजन खड़ा हो गया. रामू की तरफ मुड़ा और मुसकरा कर आगे बढ़ गया. रामू हैरानी से उसे देखता रह गया.

राजन सीधा ठाकुर साहब के कमरे में गया. वह मुंह में सिगार दबाए इधरउधर घूम रहे थे. राजन उन को देखते ही बोला, ‘‘पिताजी…’’ ठाकुर साहब उसे देखते ही गुस्से से बोले, ‘‘कहां गए थे तुम?’’ ‘‘निशा के घर,’’ राजन ने साफ बोल दिया. ठाकुर साहब को इस जवाब की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उन का गुस्सा और बढ़ गया, ‘‘क्यों गए थे?’’ ‘‘पिताजी, आप के आदमियों ने निशा के पिता को आज का तोहफा दिया. फिर भी आप पूछ रहे हैं कि क्यों गए थे?’’ आज बेटे के जवाब देने के इस तरीके पर वे हैरान रह गए, पर खुद पर काबू करते हुए बोले, ‘‘वाह बेटे, वाह. मैं ने तुम्हें मांबाप दोनों का प्यार दिया और आज तू मुझे उस का यह फल दे रहा?है. बड़ी इज्जत बढ़ाई है तू ने अपने बाप की.’’ ‘‘आप की इज्जत करना मेरा फर्ज है पिताजी, मैं जिंदगीभर आप की सेवा करूंगा… मगर मैं निशा को कैसे भूल जाऊं?’’

निशा का नाम सुन कर ठाकुर अपने गुस्से पर काबू न कर सके और चिल्ला कर बोले, ‘‘तो इतना जान लो कि मेरे जीतेजी एक हरिजन की बेटी इस खानदान की बहू कभी नहीं बन सकती.’’ राजन से भी नहीं रहा गया. वह बोला, ‘‘क्यों नहीं बन सकती?’’ ‘‘इसलिए कि नाली का कीड़ा नाली में ही अच्छा लगता है, समझे…’’ ‘‘तो ठीक है पिताजी, मैं निशा से बात तक नहीं करूंगा. मगर इस से पहले आप को मेरे सवालों का जवाब देना पड़ेगा.’’ ‘‘बोलो.’’ ‘‘मेरे खून का रंग कैसा है?’’ ‘‘लाल.’’ ‘‘और निशा के खून का रंग?’’ ‘‘तुम कहना क्या चाहते हो?’’ ‘‘जवाब दीजिए पिताजी.’’ ‘‘लाल.’’ ‘‘अगर मेरे और निशा दोनों के खून का रंग लाल ही है, तो वह नीची जाति की क्यों और मैं ऊंची जाति का क्यों?’’ ‘‘ऐसा सदियों से चलता आ रहा है…’’ ‘‘नहीं पिताजी, यह एक ढकोसला है. और मैं इसे नहीं मानता.’’

‘‘तुम्हारे मानने और न मानने से समाज नहीं बदल जाएगा. हम जिस घर का पानी तक नहीं पीते, उस घर की बेटी को किसी भी शर्त पर अपनी बहू नहीं बना सकते. समाज के रीतिरिवाजों से खिलवाड़ करने की कोशिश मत करो.’’ राजन गुस्से से पागल सा हो गया. वह जोर से चिल्लाया, ‘‘लानत है ऐसे समाज पर, जहां जातपांत और ऊंचनीच की दीवार खड़ी कर के इनसानियत के बंटवारे होते हैं. मैं उस समाज को नहीं मानता पिताजी, जहां इनसान को जात के नाम से अपनी पहचान बतानी पड़ती है.’’ ठाकुर साहब बेटे की इस हरकत से गुस्से से लाल हो रहे थे. वे जोर से चीखे, ‘‘मैं तुम से बहस नहीं करना चाहता. तुम्हारे लिए इतना ही जानना काफी?है कि तुम्हारी शादी उस लड़की से किसी भी हालत में नहीं होगी.’’

राजन भी मानने वाला नहीं था. उस ने साफसाफ शब्दों में बोल दिया कि वह निशा की मांग में सिंदूर भर के उसे अपनी पत्नी बना चुका है और एक महीने बाद कचहरी में जा कर कानूनी तौर पर भी शादी कर लेगा. राजन तेजी से अपने कमरे में चला गया तो ठाकुर साहब को मानो पैरों से धरती खिसकती हुई मालूम पड़ी. मगर ठाकुर साहब ने भी ठान लिया कि राजन और निशा को कचहरी तक पहुंचने ही नहीं देंगे. उन्होंने एक खतरनाक योजना बना डाली. वे निशा को जान से मरवा डालना चाहते थे. निशा और राजन इस बारे में जानते थे. उन्होंने उसी रात शहर छोड़ने का फैसला कर लिया. अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा इस समाज की खोखली शान को मन ही मन कोसने लगा. उस की आंखों से नींद कोसों दूर थी. अचानक ‘छोटे मालिक… छोटे मालिक…’ चिल्लाता हुआ रामू राजन के पास दौड़ा आया. उस ने एमएलए साहब की योजना बताते हुए यह भी कहा कि वे और उन के कुछ आदमी और अभीअभी पुलिस वाले सादा वरदी में निशा के घर की तरफ गए हैं. राजन ने भी तुरंत मेज की दराज से पिस्तौल और कुछ गोलियां निकालीं और गिरतापड़ता निशा के घर की तरफ दौड़ पड़ा. पूरी बस्ती रात के अंधेरे में डूबी थी.

राजन जब कुछ दूर पहुंचा तो ‘भागोभागो’ की आवाजें उस के कानों में गूंजने लगीं. कहीं टौर्च, तो कहीं लालटेन की रोशनी नजर आने लगी. चारों तरफ कुत्तों के भूंकने की आवाजें सुनाई देने लगीं. राजन डर से कांप गया. अभी वह कुछ ही दूर आगे बढ़ा था कि देखा बस्ती के कई हरिजन हाथों में लाठियां लिए चिल्लाते हुए निशा के घर की तरफ बढ़ रहे हैं. वह भी उन लोगों से छिपता हुआ उसी ओर भागा. जैसे ही राजन निशा के घर के नीचे पहुंचा, उसे उस के पिता के कराहने की आवाज सुनाई पड़ी. वह उधर ही लपका. विधायक के पालतू गुंडों ने निशा के बापू को मारमार कर बुरा हाल बना दिया था. निशा के पिता राजन को अंधेरे में भी पहचान गए. उसे देखते ही चिल्लाने लगे, ‘‘राजन, मेरी बेटी को बचा लीजिए. विधायक साहब और उन के आदमी उसे मार डालेंगे.’’ राजन ने घबराई आवाज में पूछा, ‘‘निशा कहां है?’’ ‘‘वे लोग…’’ तब तक राजन अपने पिताजी की गर्जन सुन कर उधर ही भागा. टौर्च और लालटेन की रोशनी में वहां का नजारा देख कर वह सिर से पैर तक कांप गया. विधायक कृपाल सिंह के आदमी हरिजनों की तरफ बंदूकों की नालें किए खड़े थे.

काले घोड़े की नाल: आखिर क्या था काले घोड़े की नाल का रहस्य ?- भाग 2

शादी के बाद सीमा को घर में मेहमानों के होने के कारण मुखियाजी से मिलने में बहुत परेशानी हो रही थी. ऐसे में उसे अपने पति संजय का साथ और सुख मिला. संजय भी बिस्तर पर ठीक ही था, पर मुखियाजी की ताकत के आगे वह फीका ही लगा था, इसीलिए सीमा मन ही मन सभी मेहमानों के जाने का इंतजार करने लगी, ताकि वह फिर से मुखियाजी के साथ रात गुजार सके.

सारे मेहमान चले गए थे. संजय और विनय को आज ही शहर जाना पड़ गया था.

अगले दिन से सीमा ने ध्यान दिया कि मुखियाजी उस के बजाय नई बहू रानी का अधिक मानमनुहार करते हैं. उन की आंखें रानी के कपड़ों के अंदर घुस कर कुछ तौलने का प्रयास करती रहती हैं. सीमा मुखियाजी की मनोभावना समझ गई थी.

‘‘तो क्या मुखियाजी ने अपने भाइयों को इसलिए पालापोसा है, ताकि वे हमारे पतियों को हम से दूर कर के हमें भोग सकें… पर मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती, क्योंकि मेरे पति ही अपने बड़े भाई के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनना चाहते हैं…‘‘ ऐसा सोच कर सीमा को नींद न आ सकी.

रानी के कमरे से सीमा को कुछ आवाज आती महसूस हुई, तो आधी रात को वह उठी और नई बहू रानी के कमरे के बाहर जा कर दरवाजे की झिर्री में आंख गड़ा दी. अंदर रानी बेसुध हो कर सो रही थी, जबकि मुखियाजी उस के बिस्तर के पास खड़े हो कर उस के बदन को किसी भूखे भेड़िए की तरह घूरे जा रहे थे. अभी मुखियाजी रानी के सीने की तरफ अपना हाथ बढ़ाने ही जा रहे थे कि उन की हरकत देख कर सीमा को गुस्सा आया और उस ने पास में रखे बरतन नीचे गिरा दिए, जिस की आवाज से रानी जाग गई, “मु… मुखियाजी आप यहां… इस समय…”

“हां… बस जरा देखने चला आया था कि तुझे कोई परेशानी तो नहीं है,” इतना कह कर मुखियाजी बाहर निकल गए.

रानी भी मुखियाजी की नजर और उन के मनोभावों को अच्छी तरह समझ गई थी, पर प्रत्यक्ष में उस ने अनजान बने रहना ही उचित समझा.

“कल तो आप रानी के कमरे में ही रहे… हमें अच्छा नहीं लगा,” सीमा ने शिकायती लहजे में कहा, तो मुखियाजी ने बात बनाते हुए कहा, “दरअसल, अभी वह नई है… विनय शहर गया है, तो रातबिरात उस का ध्यान तो रखना ही है न.”

एक शाम को मुखियाजी सीधा रानी के कमरे में घुसते चले गए. रानी उन्हें देख कर सिर से पल्ला करने लगी, तो मुखियाजी ने उस के सिर से साड़ी का पल्ला हटाते हुए कहा, “अरे, हम से शरमाने की जरूरत नहीं है… अब विनय यहां नहीं है, तो उस की जगह हम ही तुम्हारा ध्यान रखेंगे… विश्वास न हो, तो अपने पिता से पूछ लेना. वो तुम से हमारी हर बात का पालन करने को ही कहेंगे,” रानी की पीठ को सहला दिया था मुखियाजी ने और मुखियाजी की इस बात पर रानी के पिताजी ने ये कह कर मोहर लगा दी थी कि ‘‘बेटी, तुम मुखियाजी की हर बात मानना. उन्हें किसी भी चीज के लिए मना मत करना.‘‘

एक अजीब संकट में थी रानी.नई बहू रानी ने आज खाना बनाया था. पूरे घर के लोग खा चुके तो घर के नौकरों की बारी आई. घोड़ो की रखवाली करने वाला चंद्रिका भी खाना खाने आया. उस की और रानी की नजरें कई बार टकराईं. हर बार चंद्रिका नजर नीचे झुका लेता.

खाना खा चुकने के बाद चंद्रिका सीधा रानी के सामने पहुंचा और बोला, “बहुत अच्छा खाना बनाया है आप ने… हम कोई उपहार तो दे नहीं सकते, पर ये हमारे काले घोड़े की नाल है… इसे आप घर के दरवाजे पर लगा दीजिए, बुरे वक्त और भूतप्रेत से आप की रक्षा करेगी ये,” सकुचाते हुए चंद्रिका ने कहा.

“अरे, ये सब भूतप्रेत, घोड़े की नाल वगैरह कोरा अंधविश्वास होता है… मेरा इन पर भरोसा नहीं है,” रानी ने कहा, पर उस ने देखा कि उस के ऐसा कहने से चंद्रिका का मुंह उतर गया है.

“अच्छा… ये तो बताओ कि तुम मुझे घुड़सवारी कब सिखाओगे?” रानी ने कहा, तो चंद्रिका बोला, “जब आप कहें.”

“ठीक है, 1-2 दिन में अस्तबल आती हूं.”

घर की छत से अकसर रानी ने चंद्रिका को घोड़ों की मालिश करते देखा था. 6 फुट लंबा शरीर था चंद्रिका का. जब वह अपने कसरती बदन से घोड़ों की मालिश करता, तो वह एकदम अपने काम में तल्लीन हो जाता, मानो पूरी दुनिया में एकमात्र यही काम रह गया हो.

2 दिन बाद रानी मुखियाजी के साथ अस्तबल पहुंची. चंद्रिका ने काला वाला घोड़ा एकदम तैयार कर रखा था. मुखियाजी वहीं खड़े हो कर रानी को घोड़े पर सवार हो कर घूमते जाते देख रहे थे. चंद्रिका पैदल ही घोड़े की लगाम थामे हौलहौले चल रहा था.

“तुम ने सवारी के लिए वो सफेद वाली घोड़ी धन्नो क्यों नहीं चुनी?”

“जी, क्योंकि धन्नो इस समय उम्मीद से है न (गर्भवती है)… ऐसे में हम घोड़ी पर सवार नहीं होते,” चंद्रिका का जवाब दिलचस्प लगा रानी को.

“अच्छा… तो वो धन्नो मां बनने वाली है, तो फिर उस के बच्चे का बाप कौन है?”

“यही तो है… बादल, जिस पर आप बैठी हुई हैं. बहुत प्रेम करता है ये अपनी धन्नो से,” चंद्रिका ने उत्तर दिया.

“प्रेम…?” एक लंबी सांस छोड़ी थी रानी ने.

“इस घोड़े को जरा तेज दौड़ाओ… जैसा फिल्मों में दिखाते हैं.”

“जी, उस के लिए हमें आप के पीछे बैठना पड़ेगा,” चंद्रिका ने शरमाते हुए कहा.

“तो क्या हुआ… आओ, बैठो मेरे पीछे.”

चंद्रिका शरमातेझिझकते रानी के पीछे बैठ गया और बादल को दौड़ाने के लिए ऐंड़ लगाई. बादल सरपट भागने लगा. घोड़े की लगाम चंद्रिका के मजबूत हाथों में थी. चंद्रिका और रानी के जिस्म एकदूसरे से रगड़ खा रहे थे. रानी और चंद्रिका दोनों ही रोमांचित हो रहे थे. एक अनकहा, अनदेखा, अनोखा सा कुछ था, जो दोनों के बीच में पनपता जा रहा था.

हां… पर, चंद्रिका के स्पर्श में कितनी पवित्रता थी, कितनी रूहानी थी उस की हर छुअन.

थोड़ी सी जमीं थोड़ा आसमां: जिंदगी की राह चुनती स्त्री- भाग 2

शाम के नारंगी रंग, स्याह रंग ले चुके थे. आकाश में तारों का झुरमुट झिलमिलाने लगा था, पर रंजन नहीं आया. अकेली बैठी कविता फोन की ओर देख रही थी. तभी फोन की घंटी बजी, ‘‘हैलो, कविता, राघव बोल रहा हूं, कैसी हो? और रंजन कहां है?’’

‘‘वह तो अब तक आफिस से नहीं लौटे.’’

‘‘चलो, आता ही होगा, तुम अपना और रंजन का खयाल रखना.’’

‘‘जी,’’ कहते हुए कविता ने फोन रख दिया.

न चाहते हुए भी कविता दोनों भाइयों की तुलना कर बैठी, कितना फर्क है दोनों में. एक नदी सा शांत तो दूसरा सागर सा गरजता हुआ. मेरी शादी रंजन से नहीं राघव से हुई होती तो…वह चौंक पड़ी, यह कैसा अजीब विचार आ गया उस के मन में और क्यों?

तभी रंजन घर में दाखिल हुआ. कविता ने घड़ी की ओर देखा तो रात के 10 बज चुके थे.

‘‘कविता, मुझे खाना दे दो, मैं बहुत थक गया हूं, सोना चाहता हूं.’’

कविता ने चौंक कर कहा, ‘‘मैं ने तो खाना बनाया ही नहीं.’’

‘‘क्यों…’’ रंजन ने पूछा.

‘‘तुम्हीं तो कह कर गए थे न कि खाना मत बनाना, कहीं बाहर चलेंगे.’’

‘‘ओह, मुझे तो इस का ध्यान ही नहीं रहा…आज तो मैं इतना थका हूं कि कहीं जाना नहीं हो सकता. चलो, तुम जल्दी से मेरे लिए कुछ बना दो,’’ इतना कह कर रंजन कमरे की ओर बढ़ गया और कविता अपना होंठ काट कर रसोई में चली गई.

एक सप्ताह में ही कविता अकेलेपन से घबरा उठी. रंजन रोज घर से जल्दी जाता और बहुत देर से वापस आता. कभी थकान से चूर हो कर सो जाता तो कभी अपने शरीर की जरूरत पूरी कर के. जब यह सब कविता के लिए असहाय हो जाता तो वह अनायास ही राघव की यादों में खो जाती. राघव ने उस से कहा था कि जब बहुत परेशान हो और किसी काम में मन न लगे तो वह करो जो तुम्हें सब से अच्छा लगता हो, यह तुम्हें मन और तन की सारी परेशानियों से मुक्त कर देगा. वह यही करती और सारीसारी शाम नाचते हुए बिता देती थी.

एक शाम रंजन को जल्दी घर आया देख कविता खुशी से चहक कर बोली, ‘‘अरे, आज तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए? क्या मेरे बिना मन नहीं लग रहा था?’’

रंजन ने हंस कर कहा, ‘‘ज्यादा खुश मत हो और जल्दी से मेरा सामान पैक कर दो, आफिस के काम से मुझे आज शाम क ो ही दिल्ली जाना है.’’

कविता मायूस हो कर बोली, ‘‘रंजन, तुम भूल गए क्या, कल हमारी शादी की सालगिरह है.’’

रंजन अपने सिर पर हाथ मारते हुए बोला, ‘‘ओह…मैं तो भूल ही गया था, कोई बात नहीं, मेरे वापस आने पर हम सालगिरह मना लेंगे.’’

कविता ने पति को मनाते हुए कहा, ‘‘आप प्लीज, मत जाओ, मैं घर में अकेली कैसे रहूंगी?’’

रंजन ने झल्लाते हुए कहा, ‘‘तुम कोई छोटी सी बच्ची नहीं हो, जो अकेली नहीं रह सकतीं, मेरा जाना जरूरी है.’’

रंजन को जाना था सो वह चला गया. कविता अपनी उम्मीदों और सपनों के साथ अकेली रह गई. सालगिरह के दिन राघव ने फोन किया तो कविता की बुझी आवाज को भांपते हुए उन्होंने पूछा, ‘‘क्या हुआ, कविता, तुम उदास हो? रंजन कहां है?’’

राघव की बातें सुन कर कविता बोली, ‘‘वह आफिस के काम से दिल्ली गए हैं.’’

कविता को धैर्य बंधाते हुए राघव ने कहा, ‘‘तुम परेशान मत हो, मैं और मां कल ही वापस आ रहे हैं.’’

अगली शाम ही राघव और मां को घर के दरवाजे पर देख कविता खिल उठी. सामान रखते हुए राघव बोले, ‘‘कैसी हो कविता?’’ तो कविता ने उन के जाने के बाद रंजन से हुई सारी बातें बता दीं. राघव एक लंबी सांस ले कर बोले, ‘‘मैं तो यहां से यह सोच कर गया था कि इस तरह तुम दोनों को करीब आने का मौका मिलेगा, पर यहां तो सारा मामला ही उलटा दिखता है.’’

कविता ने चौंक कर कहा, ‘‘इस का मतलब आप बिना कारण यहां से गए थे? अब आप मुझे अकेला छोड़ कर कभी मत जाना. आप के होने से मुझे यह एहसास तो रहता है कि कोई तो है, जिस से मैं अपनी बात कह सकती हूं.’’

‘‘अच्छा बाबा, नहीं जाऊं गा.’’

कविता ने हंस कर कहा, ‘‘पर इस बार जाने की सजा मिलेगी आप को.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘आज आप को हमें आइसक्रीम खिलानी होगी.’’

उस शाम बहुत अरसे बाद कविता खुल कर हंसी थी. वह अपने को बहुत हलका महसूस कर रही थी. दोचार दिन में रंजन भी वापस आ गया. आते ही उस ने कविता को मनाने के लिए एक शानदार पार्टी दी. अब वह कविता को भी वक्त देने लगा था. कविता को लगा मानो अचानक सारे काले बादल कहीं खो गए और कुनकुनी धूप खिल आई हो.

तभी एक शाम आफिस से आते ही रंजन ने कहा, ‘‘कविता, मेरा सामान पैक कर दो. मुझे आफिस के काम से लंदन जाना है.’’

कविता ने खुश हो कर पूछा, ‘‘अरे, वाह, कितने दिन के लिए?’’

रंजन नजरें झुका कर बोला, ‘‘6 माह के लिए.’’

कविता के साथ राघव और मां भी अवाक् रह गए.

मां ने रंजन से कहा भी कि 6 माह बहुत होते हैं बेटा, कविता को इस वक्त तेरी जरूरत है और तू जाने की बात कर रहा है, ऐसा कर, इसे भी साथ ले जा.

रंजन ने झल्ला कर कहा, ‘‘ओह मां, मैं वहां घूमने नहीं जा रहा हूं, कविता वहां क्या करेगी? और फिर 6 माह कैसे बीत गए पता भी नहीं चलेगा.’’

कविता कमरे में जा कर शांत स्वर में बोली, ‘‘रंजन, प्लीज मत जाओ. इस वक्त मुझे तुम्हारी बहुत जरूरत है.’’

‘‘क्यों, इस वक्त में क्या खास है?’’

कविता ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं.’’

रंजन चौंक कर बोला, ‘‘क्या… इतनी जल्दी…’’ फिर कुछ पल खामोश रह कर उस ने कहा, ‘‘सौरी कविता, इस के लिए मैं तैयार नहीं था, लेकिन अब किया क्या जा सकता है.’’

कविता रंजन के सीने पर अपना सिर टिकाती हुई बोली, ‘‘तभी तो कह रही हूं कि मुझे छोड़ कर मत जाओ.’’

रंजन ने उसे अपने से अलग किया और फिर बोला, ‘‘तुम अकेली कहां हो कविता, यहां तुम्हारा ध्यान रखने को मां हैं, भैया हैं.’’

कविता ने चिढ़ते हुए कहा, ‘‘तुम क्यों नहीं समझते कि औरत का घर परिवार उस के पति से होता है, वही न हो तो क्या घर, क्या घर वाले? तुम्हारी कमी कोई पूरी नहीं कर सकता, रंजन.’’

‘‘तुम्हारे साथ बिताने को तो सारी उम्र पड़ी है, कविता,’’ रंजन बोला, ‘‘पर विदेश जाने का यह मौका फिर नहीं आएगा.’’

इस के बाद कविता कठपुतली की तरह रंजन का सारा काम करती रही, पर उस से एक बार भी रुकने को नहीं कहा. रंजन को एअरपोर्ट छोड़ने भी राघव अकेले ही गए थे. रंजन के जाने के बाद कविता सारा दिन काम करती और खुश रहने का दिखावा करती पर उस की आंखों की उदासी को भांप कर राघव उस से कहते, ‘‘कविता, तुम मां बनने वाली हो, ऐसे समय में तो तुम्हें सदा खुश रहना चाहिए. तुम उदास रहोगी तो बच्चे की सेहत पर इस का असर पड़ेगा.’’

जवाब में कविता हंस कर कहती, ‘‘खुश तो हूं, आप नाहक मेरे लिए परेशान रहते हैं.’’

मां और राघव भरसक कोशिश करते कि कविता को खुश रखें, पर रंजन की कमी को वे पूरा नहीं कर सकते थे. राघव कविता के मुंह से निकली हर इच्छा को तुरंत पूरी करते. इस तरह कविता को खुश रखने की कोशिश में वह कब उस को चाहने लगे, उन्हें खुद पता नहीं चला.

अपने ही छोटे भाई की पत्नी के प्रति मन में पनपते अनुराग ने उन्हें एक अपराधभाव से भर दिया. वह चाह कर भी इस समय कविता से दूर नहीं जा सकते थे. लेकिन मन ही मन राघव ने निर्णय कर लिया था कि रंजन के आते ही वह उन दोनों के जीवन से कहीं दूर चले जाएंगे.

अचानक एक शाम काम करतेकरते कविता आंगन में फिसल कर गिर गई. राघव तुरंत उसे ले कर अस्पताल भागे पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कविता अपने बच्चे को खो चुकी थी. राघव ने जब रंजन को इस बारे में बता कर उसे लौट आने को कहा तो रंजन बोला, ‘‘भैया, जो होना था सो हो गया. इस वक्त तो मेरा आ पाना संभव नहीं, पर जल्दी आने की कोशिश करूंगा.’’

सैक्स पावर : आनंद में पावर और पार्टनर का खेल

दिक्कत तो यह है कि हर किसी ने सैक्स को जंग का मैदान मान लिया है, जिस में जीत के माने होते हैं पार्टनर पर बेवजह ताकत आजमाना, जबकि सैक्स के सही माने हैं हारजीत से परे संतुष्टि के लिए एक जरूरी और कुदरती काम हमबिस्तरी करना, जिस में मजा और सुख भी कुदरती ही होता है. एक लंबा तगड़ा मर्द भी कई बार अपनी बीवी को वह संतुष्टि और सुख नहीं दे पाता, जो दुबलापतला आम मर्द, जिसे बोलचाल की जबान में ‘सिंगल फ्रेम’ कहा जाता है, दे देता है.

24 साला शीला का पति खासा पहलवान टाइप दिखता है, लेकिन बिस्तर में जल्द पस्त पड़ जाता है. शीला बेचारी आधीअधूरी रह जाती है. उस समय तो उस का गुस्सा और बढ़ जाता है, जब पति करवट बदल कर 5-10 मिनट में खर्राटे भरने लगता है और वह घंटों नींद के इंतजार में नदी में प्यासी मछली की तरह तड़पती रहती है.

कई बार तो शीला का मन करता है कि वह सोते हुए पति की कमर पर एक जोरदार लात मारते हुए कहे कि जब बुझाते नहीं बनता तो यह आग लगाते ही क्यों हो. लेकिन सुबह वह सब भूलने लगती है, क्योंकि पति उस का पूरा खयाल रखता है, छोटेबड़े हर काम में हाथ बंटाता है और उस की हर फरमाइश पूरी करने की कोशिश करता है.

शीला की पड़ोसन रुक्मिणी अकसर उसे छेड़ा करती है कि यार, तुम तो किस्मत वाली हो, जो पति तुम्हें इतना प्यार करता है. असली रानी तो वही होती है, जिस का पति उस के आगेपीछे मंडराता रहे.

रुक्मिणी का पति ‘सिंगल फ्रेम’ है, लेकिन बिस्तर में डेढ़ से 2 घंटे उसे छकाता है कि खुद रुक्मिणी को उस का अंगअंग सहलाते हुए कहना पड़ता है कि अब बस भी करो… क्या पीस ही डालोगे.

शीला रुक्मिणी को खुश देख कर हैरान होती थी कि जब मेरा लंबातगड़ा शौहर एक डेढ़ मिनट में टें बोल जाता है, तो इस का सींकिया पहलवान तो आधा मिनट में फुस हो जाता होगा, फिर भी यह हंसतीमुसकराती रहती है, तो मैं क्यों बातबात में चिढ़चिढ़ा जाती हूं?

मजा पावर और पार्टनर का

हकीकत कुछ और निकली. जब शीला और रुक्मिणी दोनों एकदूसरे से खुलने लगीं और सैक्स की भी बातें करने लगीं, तो शीला ने अपना दुखड़ा रुक्मिणी को बताया.

जवाब में पहले तो रुक्मिणी ने अपने पति के बारे में बताया कि वे देखने में भले ही दुबलेपतले हों, लेकिन बिस्तर में ऐसा हाहाकार मचा देते हैं कि मैं तो

घंटे 2 घंटे के लिए सीधे जन्नत पहुंच जाती हूं.

फिर रुक्मिणी ने बड़ेबूढ़ों और सयानों की तरह शीला को समझाया कि टैंशन मत लो, सैक्स में पावर अपनी जगह है, लेकिन प्यार करने का तरीका उस से भी अहम है.

रुक्मिणी द्वारा ली गई शीला की यह फ्री कोचिंग क्लास तब हफ्तेभर दोपहर में चली, जब दोनों के शौहर काम पर चले जाते थे, जिस से शीला के ज्ञानचक्षु के साथसाथ दूसरे चक्षु भी खुल गए.

सैक्स से ताल्लुक रखते कई वीडियो भी रुक्मिणी ने शीला को दिखाए थे और चुपचाप से ला कर एक किताब और मैगजीन भी दी, जिस में सैक्स के कई लेख छपे थे.

इन्हें देख और पढ़ कर शीला को समझ आया कि गड़बड़ कहांकहां है और उन्हें कैसेकैसे दूर कर सैक्स का आनंद लिया जा सकता है.

शीला को अब लग रहा था कि वह और उस का शौहर कहां चूक कर रहे थे और सैक्स शरीर से ज्यादा दिमाग का खेल है. एक हुनर है, जिस में पहले सब्र और बाद में उतावलापन होना चाहिए, जबकि उस का पति एकदम उतावला हो कर टूट पड़ता था.

खैर, पूरी गलती पति की भी नहीं थी, क्योंकि शीला ने तो कभी पति को अपनी ख्वाहिश बताई ही नहीं. यह वह गलती है, जो सैक्स में अकसर होती है कि सारी जिम्मेदारी मर्द के कंधों पर डाल दी जाती है.

शादी के शुरुआती दिनों से ही पैदा हुई यह समस्या अगर समय रहते न सुलझाई जाए, तो सैक्स बेहद उबाऊ और रस्मी होता जाता है और दोनों को वह मजा नहीं आता, जो उन्होंने सुना, पढ़ा और देखा होता है.

खासतौर से मर्दों की हालत खस्ता हो जाती है और वे खुद को कमजोर समझते हुए सैक्स इश्तिहारों, टैंटों और यहांवहां नीमहकीमों से सैक्स पावर के तरीके और दवाएं ट्राई करने लगते हैं, जिन से फायदा तो कोई होता नहीं, उलटे नुकसान सैकड़ों होने लगते हैं.

यह जरूर करें

शीला ने हफ्तेभर में रुक्मिणी से जो सीखा और फिर उसे आजमा कर अपनी सैक्स लाइफ भी जन्नत वाली बना ली. वे टिप्स और ट्रिक्स हर उस मर्दऔरत को आजमानी चाहिए, जिन से लगता है कि वे कमजोरी के चलते पार्टनर को संतुष्टि नहीं दे पा रहे या पार्टनर उन्हें संतुष्टि नहीं दे पा रहा, जैसे :

* सैक्स में एकदूसरे से खुल कर बातचीत करें और हमबिस्तरी के दौरान अपनी पोजीशन पार्टनर को बताते रहें और सैक्स पोजीशन बदलते भी रहें.

* दिल में जो भी फीलिंग्स आएं, उन्हें अपने पार्टनर को बताते रहने से उस की उत्तेजना और ड्राइव बढ़ती है. खासतौर से मर्दों को लगता है कि अभी तो 2-4 सीढि़यां ही चढ़ी हैं, छत तक पहुंचतेपहुंचते तो लुत्फ और बढ़ जाएगा.

* सैक्स की शुरुआत धीमेधीमे करनी चाहिए. पार्टनर पर एकदम भूखे भेडि़ए की तरह नहीं टूट पड़ना चाहिए. इस से जल्द डिस्चार्ज होने की गुंजाइश बढ़ जाती है.

* सभी मर्दों और खासतौर से लड़कों को चाहिए कि वे फोरप्ले को जितना हो सके, लंबा खींचें. लड़कियों को भी उन का पूरा साथ देना चाहिए. इस के लिए दोनों शर्तें लगा सकते हैं कि देखें, पहले कौन हथियार डालता है. इस दौरान दोनों एकदूसरे को उत्तेजित करने वाली सैक्स क्रियाएं करते रहें.

* अकसर मर्दों को जल्दी डिस्चार्ज होने की शिकायत रहती है, जिसे वे कमजोरी समझने की भूल कर बैठते हैं. इसे ही एरैक्टाइल डिस्फंक्शन यानी ईडी कहते हैं.

* मर्दों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उन का अंग बाहर होने की वजह से यह बेहद कुदरती बात है, जिसे हमेशा किसी दवा या बाहरी तरीके से दूर नहीं किया जा सकता. इस के लिए उन्हें अपने अंग पर नहीं, बल्कि दिमाग पर कंट्रोल रखना चाहिए. हर 5-7 मिनट में एक छोटा सा ब्रेक ले कर फिर से फोरप्ले शुरू करना जल्द डिस्चार्ज होने से बचने का बेहतर तरीका है.

* रोजाना की कसरत और खानपान से सैक्स लाइफ पर भी फर्क पड़ता है, लेकिन यह सोचना बेमानी है कि रात को छुआरे या जीरासौंफ, मूसली वगैरह खाने से सैक्स पावर बढ़ती है. ऐसे टोनेटोटकों और उपायों को करने से खुद पर से भरोसा और उठता जाता है, क्योंकि ये कारगर नहीं होते. हां, खाना जरूर ताकत बढ़ाने वाला खाते रहना चाहिए और शराब, ज्यादा चाय और दूसरे नशों से बचना चाहिए.

* इस पर भी बात न बने, तो किसी माहिर सैक्सोलाजिस्ट को दिखाना चाहिए. लेकिन उस से भी पहले एक बार वह तरीका आजमा कर देख लेना चाहिए, जो रुक्मिणी के कहने पर शीला और उस के पति ने आजमाया था. यह तरीका सैक्स की सत्ता पार्टनर को सौंप देने और मुख मैथुन का है. शीला ने पति के जल्द पस्त पड़ने के कुछ देर बाद पति का अंग देर तक सहलाया और उस का मुख मैथुन किया तो दूसरा राउंड लंबा चला. लेकिन इस के लिए साफसफाई का खास ध्यान रखना चाहिए और दोनों की रजामंदी इस में होनी चाहिए.

* पत्नियों को भी खास एहतियात बरतने की जरूरत है कि वे पति की सैक्स पावर कम होने पर बजाय लात मारने की बात सोचने के उस से प्यार से बात करें, उस का साथ दें और उस का हौसला बढ़ाती रहें.

कसरत ही है कारगर

अव्वल तो सैक्स अपनेआप में ही एक ऐसी कसरत है, जिस से कभी जी नहीं भरता, इसीलिए 80-85  साल के बूढ़े की भी हसरतें जवान होती हैं. लेकिन इस खेल में वह बहुत ज्यादा देर और दूर तक दौड़ नहीं सकता. 20-25 की उम्र में जब फर्राटा लगा कर दौड़ा जा सकता है, तब अगर कुछ कदमों के बाद ही हांफने लगे और आप दौड़ते हुए मंजिल तक पहुंचने में खुद को नाकाम पाने लगें तो तय है कि न तो आप सही खुराक ले रहे हैं और न ही कसरत कर रहे हैं.

सैक्स और हमबिस्तरी के ट्रैक पर अगर आप आखिर तक दौड़ना चाहते हैं, और पार्टनर को पहले थका देना चाहते हैं तो कुछ कसरत जरूर रोजाना करिए. ये आप को बिस्तर में समय से पहले हांफने नहीं देंगी.

कसरत सेहत के साथसाथ सैक्स में भी कारगर साबित होती है, यह माहिर अकसर बताते रहते हैं. एक बार भी सैक्स कर चुके किसी भी शख्स को यह तजरबा हो जाता है कि हमबिस्तरी के क्लाइमैक्स पर हांफने लगता है, लेकिन इस हांफने में कोफ्त नहीं, बल्कि आनंद होता है, जिस के लिए जरूरी है कि रोज नियम से कम से कम 3 किलोमीटर दौड़ा या तेज कदमों से चला जाए. इस से शरीर में खून उतनी ही तेजी से दौड़ता है, जितना कि हमबिस्तरी के दौरान दौड़ता है.

दौड़ने से शरीर के पूरे अंग अपना काम सलीके से करते हैं और हाजमा भी दुरुस्त होता है, लेकिन अहम बात इस से स्टैमिना बढ़ता है, जो सैक्स के दौरान हर किसी के लिए जरूरी होता है, इसलिए खुद भी दौड़ें और साथ में अपने पार्टनर को भी दौड़ाएं.

मोटे होते लोगों के लिए तो दौड़ना बेहद कारगर होता है, क्योंकि इस से न केवल गैरजरूरी चरबी छंटती है, बल्कि सभी मसल्स भी मजबूत होती हैं और शरीर में चुस्तीफुरती बनी रहती है.

दौड़ने के बाद अहम कसरत तैरना है, जो सैक्स पावर बढ़ाने में मददगार साबित होता है. तैरने से भी नसों में खून तेजी से दौड़ता है, जिस से उन में बेवक्त ढीलापन नहीं आता. रोजाना कम से कम आधा घंटा तैरना हमबिस्तरी में भी इतनी ही देर टिकाए रखने में मदद करता है, इसलिए जितना ज्यादा हो सकता है, अगर रोज मुमकिन न हो, तो हफ्ते में 4 दिन तैरना भी फुरती देता है.

यों तो हरेक तरह की कसरत से सैक्स पावर बढ़ती है, लेकिन पुशअप्स से कुछ ज्यादा बढ़ती है, क्योंकि इस में हाथपैरों और जांघों की मसल्स को ज्यादा मजबूती मिलती है, दूसरे इस में आप हमबिस्तरी के आम आसन में यानी ऊपर होते हैं. पुशअप सैक्स के दौरान ज्यादा देर टिके रहने में मदद करते हैं. रोजरोज एक ही पोजीशन में सैक्स करने से ऊब चुके लोगों के लिए पुशअप पोजीशन बदल कर सैक्स करने में मदद करते हैं.

रस्सी कूदना भी सैक्स पावर बढ़ाने वाली कारगर कसरत है. कई रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि मोटे लोगों को ज्यादा देर तक टिके रहने में दिक्कत होती है, हालांकि इसे कमजोरी नहीं कहा जा सकता, लेकिन जो फुरती और स्टैमिना कम वजन वाले लोगों में होता है, वह ज्यादा वजन वाले लोगों में नहीं होती, इसलिए रोजाना थकने तक रस्सी कूदें, जो अपने कमरे में भी आसानी से मुमकिन है.

सैक्स पावर को ले कर फिक्रमंद लोगों को तुरंत ही कसरत शुरू कर देनी चाहिए, लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि इस का असर रातोंरात नहीं दिखता, बल्कि थोड़ा समय लगता है.

लिली: उस लड़की पर अमित क्यो प्रभावित था ?-भाग 2

अमित ने इस बार कोई सवाल नहीं किया, क्योंकि वह जान चुका था कि लिली इसे अपना पर्सनल मामला कह कर चुप करा देगी.

अमित सोचने लगा यह कैसा संबंध है कि मेरी हर चीज पर लिली का हक है. बदले में कुछ पूछता हूं तो यह कह कर मुंह बंद करा देती है कि मैं तुम्हारी बीवी नहीं?

एकबारगी अमित का मन हुआ कि वह लिली से साफ साफ  कह दे कि या तो वह उस से शादी कर ले, नहीं तो अपना बोरियाबिस्तर समेट कर चली जाए.

ऐसा करने की वह सोच ही रहा था कि अगली शाम लिली ने उसे एक शर्ट खरीद कर तोहफे में दी.

‘‘यह क्या…?’’ अमित ने सवाल किया.

‘‘आज तुम्हारा जन्मदिन है,’’ लिली बोली, तो अमित जज्बाती हो गया.  उस ने लिली को बांहों में भर लिया. अमित का सवाल सवाल ही रह गया.

अगले दिन रविवार था. लिली अपनी मां के पास जाने लगी.

‘‘क्या मैं तुम्हारी मां से नहीं मिल सकता?’’ अमित बोला, तो लिली सकपका गई.

‘‘अभी समय नहीं आया है,’’ कह कर लिली चली गई. एक ही छुट्टी मिलती थी, वह भी लिली अपनी मां के पास गुजार देती थी. अमित दिनभर बोर होता. आज उस ने अकेले ही घूमने का मन बनाया. मरीन ड्राइव पर बैठा वह समुद्र की लहरों को निहार रहा था कि लिली का फोन आया.

‘अमित मु झे एक लाख रुपए की सख्त जरूरत है. अभी और इसी वक्त मेरे खाते में डाल दो. सारी बातें आने पर बताऊंगी,’ कह कर लिली ने फोन काट दिया. लिली ने अपने एकाउंट की डिटेल भेजी थी.

अमित ने बिना देर किए उतने रुपए ट्रांसफर कर दिए.

लिली जब लौटी, तो बदहवास थी मानो किसी बहुत बड़ी मुसीबत से छूट कर आई हो.

‘‘तबीयत तो ठीक है न…?’’ अमित ने पूछा.

‘‘नहीं, आज मैं औफिस नहीं जाऊंगी,’’ कह कर लिली सो गई.

अमित अकेले ही काम पर चला गया. शाम को वह लौटा, तो लिली के लिए पिज्जा लेता आया. पिज्जा देख कर लिली खुश हो गई.

दोनों पिज्जा खाने लगे. बीच में अमित ने रुपयों की बात छेड़ी.

‘‘रुपए तुम को वापस मिल जाएंगे,’’ लिली के इस कथन से अमित संतुष्ट नहीं था. लिली ने भांप लिया. उस ने उस के मुंह में पिज्जा डालते हुए कहा, ‘‘डार्लिंग, क्यों परेशान होते हो? क्या अपनी लिली के लिए इतना भी नहीं कर सकते?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. मैं सोच रहा था कि ऐसे कब तक चलेगा?’’

‘‘मैं सम झी नहीं?’’ लिली बोली.

‘‘मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘फिर वही शादी का रोना. अमित तुम सम झने की कोशिश करो. जब तक हम दोनों एकदूसरे को सम झ नहीं लेते, शादी का कोई मतलब नहीं है.’’

तभी लिली के मोबाइल की घंटी बजी. वह पिज्जा बीच में खाना छोड़ कर बरामदे में आई. अमित सोफे पर बैठा लिली का इंतजार करने लगा. तकरीबन 15 मिनट बाद वह आई.

‘‘किस का फोन था?’’ अमित से रहा न गया.

‘‘मेरे एक्स बौयफ्रैंड का फोन था.’’

‘‘क्या तुम्हारा किसी और से भी संबंध था?’’

‘‘हां, यह तो आम बात है. मैं उस के साथ एक साल तक रिलेशन में थी.’’

अमित को यह जान कर धक्का  सा लगा.

दोनों को एकसाथ रहते हुए सालभर से ऊपर हो चुका था. न लिली अमित को अपने मांबाप से मिलवाती, न ही शादी के लिए उस के मन में कोई  खयाल आता.

आजिज आ कर एक दिन अमित ने साफसाफ लफ्जों में शादी करने के  लिए कहा.

‘‘ठीक है, मैं शादी करने के लिए तैयार हूं, मगर हम रहेंगे कहां? क्या हमारे पास कोई अपना फ्लैट है?’’

‘‘शादी से फ्लैट का क्या ताल्लुक?’’ अमित के सवाल पर लिली तुनक उठी, ‘‘जब तक अपना फ्लैट नहीं होगा, मैं शादी नहीं करूंगी.’’

अमित की लिली के बगैर जिंदगी की कल्पना भी बेमानी थी. वह उस के दिलोदिमाग पर छा चुकी थी. उस ने काफी दिमाग दौड़ाया. बनारस में पुश्तैनी मकान था. क्यों न उसे बेच कर मुंबई में फ्लैट खरीद लिया जाए? विचार बुरा नहीं था. लिली को अमित का आइडिया पसंद आया.

अमित अगले दिन औफिस से छुट्टी ले कर बनारस आया.

‘‘तुम ने कैसे सोच लिया कि हम पुश्तैनी मकान बेच कर मुंबई में रहने लगेंगे? रही शादी की बात, तो यहीं कोई लड़की देख कर शादी कर लो. मु झे वह लड़की बिलकुल पसंद नहीं है,’’ अमित के पापा ने साफ शब्दों में कहा.

‘‘पापा, हम कई महीनों से लिव  इन रिलेशनशिप में हैं,’’ सुनते ही पापा भड़क गए.

‘‘शर्म नहीं आती ऐसी बातें करते हुए. कैसी बेशर्म लड़की है, जो बिना शादी किए तुम्हारे साथ रहती है? और कैसे मांबाप हैं उस के, जो लड़की को बिना शादी किए किसी गैर लड़के के साथ रहने की इजाजत दे दी?’’

अमित अपनी मां की तरफ देख कर लाचार भरे लहजे में बोला, ‘‘मम्मी, तुम्हीं पापा को सम झाओ. आजकल ऐसे ही चलता है. पहले हम साथ रह कर एकदूसरे को सम झते हैं, फिर ठीक लगता है तो शादी करते हैं, वरना एकदूसरे से अलग हो जाते हैं.’’

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