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वार पर वार : भाग 3

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था :

सरकारी नौकरी कर रही नमिता का बौस भूषण राज उसे पाना चाहता था. नमिता ने यह बात अपनी एक साथी प्रीति को बताई तो वह नमिता से बोली कि तुम्हें भी रुपएपैसे के साथसाथ जवानी का मजा उठाना चाहिए. यह सुन कर नमिता हैरान रह गई, लेकिन फिर नमिता ने सोचा कि क्यों न वह अपना ट्रांसफर कहीं और करा ले, पर इस बारे में भी भूषण राज को पता चल गया और मामला बिगड़ गया.

अब पढि़ए आगे…

प्रीति आगे बोली, ‘‘अगर तुम्हारी नौकरी बनी रहेगी तो सारी सुखसुविधाएं तुम्हारे कदमों में बिछी रहेंगी. तुम्हारी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. अच्छे घर में शादी हो जाएगी. और क्या चाहिए तुम्हें?’’

नमिता की समझ में नहीं आया कि वह अपनी नौकरी कैसे बचा सकती थी? लेकिन पूछा नहीं… प्रीति खुद ही बताने लगी, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दोगी तो दूसरी नौकरी जल्दी कहां मिलेगी? वह भी सरकारी नौकरी… प्राइवेट नौकरी भले ही मिल जाए.

‘‘पर, हर जगह एक ही से हालात हैं नमिता. इनसानरूपी मगरमच्छ हर जगह मुंह खोले जवान लड़कियों को निगलने के लिए तैयार रहते हैं. समझौता कर लो. किसी को पता भी नहीं चलेगा. सुख तुम्हारी झोली में भर जाएंगे और नौकरी भी बची रहेगी.’’

नमिता का शक सच में बदल गया. कई बार उसे लगता था कि प्रीति उसे किसी न किसी जाल में फंसाएगी… वह बौस भूषण राज की दलाल थी.

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उस ने प्रीति को गौर से देखा, तो वह हलके से मुसकराई. प्रीति बोली, ‘‘तुम अपने मन में कोई शक मत पालो. उस से तुम्हारी समस्या का समाधान नहीं होगा.

तुम मुझे भले ही बुरा समझो, पर इस में तुम्हारी ही भलाई है. सोचो, खूबसूरती और जवानी का क्या इस्तेमाल…?’’

नमिता अच्छी तरह समझ गई थी कि इस दुनिया में मर्द ही नहीं, बल्कि औरतें भी एकदूसरे की दुश्मन होती हैं. औरतें कब नागिन बन कर किसी को डस लें, पता ही नहीं चलता. उस ने एक कठोर फैसला किया.

प्रीति अभी तक नमिता के दिमाग की सफाई करने में जुटी हुई थी, ‘‘औरत और मर्द के संबंध में किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, पर सुख दोनों को मिलता है… तुम ठीक से समझ रही हो न? जा कर एक बार बौस से माफी मांग लो. वे जैसा कहें, कर दो.’’

अब नमिता को किसी और प्रवचन की जरूरत नहीं थी. वह झटके से उठी और धीरेधीरे कदमों से बौस भूषण राज के चैंबर में चली गई. आज न तो उस के मन में डर था, न वह कांप रही थी. उस की आंखें भी झुकी हुई नहीं थीं. वह भूषण राज की आंखों में आंखें डाल कर देख रही थी.

पहले तो भूषण राज चौंका, फिर कुरसी से उठ कर बोला, ‘‘आओआओ, निम्मी. कैसी हो?’’ उस के मुंह से लार टपकने लगी थी.

‘‘मैं ठीक हूं सर…’’ नमिता ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘मैं आप से माफी मांगने आई हूं, उस सब के लिए, जो अभी

तक हुआ है और उस सब के लिए, जो अभी तक नहीं हुआ, पर कभी भी हो सकता है.’’

नमिता का अंदाज ऐसा था, जैसे वह कह रही हो, ‘भूषण साहब, मैं आप को देखने आई हूं कि कितने खूंख्वार भेडि़ए हैं आप. किसी तरह आप औरत के शरीर को खाते हैं, नोंच कर या पूरा… चलिए दिखाइए अपनी ताकत.’

भेडि़ए की खुशी का ठिकाना न रहा. शिकार अपनेआप उस के जाल में फंस गया था. वह अपनी जगह से उठा और इस तरह अंगड़ाई ली, जैसे वह अच्छी तरह जानता था कि अब शिकार उस के पंजे से बच कर कहीं नहीं जा सकता. उसे अपनी चालों पर पूरा भरोसा था. वह धीरेधीरे मुसकराते हुए आगे बढ़ रहा था.

भेड़ को डर नहीं लग रहा था. वह सीधे तन कर खड़ी थी. भेडि़या नजदीक आ गया था, वह फिर भी नहीं डरी.

भेडि़या थोड़ा सहमा… इस भेड़ को आज क्या हो गया. वह उस के भयानक मुंह के तीखे दांतों और नुकीले पंजों से भी नहीं डर रही थी.

भेडि़या भेड़ को जिंदा निगलने की जल्दबाजी में था. भेड़ अगर तन कर खड़ी रही, उस से डर कर भागी नहीं, तो फिर शिकार करने का फायदा क्या?

भेडि़ए ने अपने नुकीले पंजे भेड़ के कंधे पर रखे और दर्दनाक हालत तक उस के नरम गोश्त में चुभाया, पर भेडि़ए को भेड़ के कंधे पत्थर के लगे. उस ने अपना चेहरा भेड़ के खूबसूरत लपलपाते चेहरे की तरफ बढ़ाया तो उसे लगा जैसे वह एक आग का गोला निगल रहा हो.

नमिता ने बालों को मादक झटका दे कर और छातियों को हलका उभार देते हुए कहा, ‘‘शाम को 7 बजे घर पर आइएगा. घर पर और कोई नहीं है. बस, मैं, आप और पूरी रात.’’

भूषण राज भौचक्का रह गया, पर उस का विवेक तो मर चुका था. वह समझ नहीं सकता था कि ऐसी लड़की जो इतने दिन से उस के हर प्रस्ताव को ठुकरा रही थी, अचानक कैसे बदल गई.

भूषण राज ने दिन कैसे बिताया, यह बताना आसान नहीं, पर नमिता आधे दिन की छुट्टी ले कर यह कह कर चली गई थी कि घर को ठीक करना है.

शाम 6 बजे से ही भूषण राज को बेचैनी होने लगी थी. फिर भी उस ने 7 बजाए. औफिस में नहाया, कपड़ों की 1-2 जोड़ी वह हमेशा अपनी दराज में रखता था. पत्नी को कहा कि देर रात तक मीटिंग चलेगी, वह सो जाए.

शबाब मिल रहा था तो शराब भी होनी चाहिए. 2 बोतलें खरीदीं. शायद नमिता भी पी ले तो रात पूरी मस्त हो जाए.

भूषण राज नमिता के बताए पते पर पहुंचा तो थोड़ा मन खट्टा हुआ. बेहद मिडिल क्लास इलाका था. छोटे मैले मकानों में एक संकरे जीने पर चढ़ कर पुराने से दरवाजे को खटखटाया.

दरवाजा नमिता ने ही खोला था. वह पूरी तरह सजीधजी थी. बढि़या मेकअप. पोशाक जो उस के बदन को ढक कम रही थी, दिखा ज्यादा रही थी. घर में खुशबू फैली थी. रोशनी केवल मोमबत्तियों की थी या 2 टेबल लैंपों की.

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नमिता ने उसे बांहों में जकड़ लिया. इसी का तो इंतजार वह महीनों से कर रहा था.

‘‘आज तो बड़े स्मार्ट लग रहे हो सर,’’ कहते हुए वह उसे सोफे पर ले गई. सामने मेज पर खाने का सामान और कई गिलास थे. शायद नमिता जान गई थी, भूषण राज क्या चीज है. उस ने उस के हाथ से बोतलें लीं और कहा कि लाइए, इन्हें मैं फ्रिज में रख दूं.

‘यह कबूतरी तो खुद ही शिकारी के तीर तेज कर रही है…’ भूषण राज ने सोचा. उसे अपने पर गर्व हुआ. है ही वह ताकतवर. कौन चिडि़या है जो उस के जाल से निकल सकती है.

नमिता ने सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘सर, आप कपड़े तो उतारिए, मैं अभी आई.’’

भूषण राज तो सब सावधानियां छोड़ कर कपड़े उतारने लगा और सोफे पर आराम से पसर गया. फिर तसल्ली से खाना ठूंसा? नमिता शायद नहा रही थी.

‘आज तो मजा आ जाएगा… ऐसा सुख तो उसे कभी न मिला था.’

तभी दरवाजे पर खटखट हुई. भूषण राज ने सोचा, ‘कौन हो सकता है इस समय? नमिता ने तो कहा था कि वह अकेली है?’

बिना कपड़ों के किसी के घर में आ जाने पर क्या हो सकता है, वह जान सकता था. पर इस से पहले कि वह कुछ कहता, नमिता दूसरे कमरे से तकरीबन भागती हुई आई और दरवाजा खोल डाला.

बाहर पूरा स्टाफ खड़ा था. कुछ लोग कैमरे भी लिए थे.

‘हैप्पी बर्थडे नमिता’ की आवाज गूंजी और 10-15 लोग कमरे में घुस गए.

भूषण राज फटीफटी आंखों से देख रहा था. उस ने अपने कपड़े उठाने चाहे थे कि नमिता ने झपट कर छीन लिए.

उस के बाद बहुतकुछ हुआ. बहुत सारे फोटो ले लिए गए. भूषण राज की पत्नी को बुला लिया गया. नमिता को ट्रांसफर करने का आदेश पास हो गया. छोटे से घर में हंगामा हो गया. नमिता के घर वाले भी उसी समय पहुंच गए थे.

अब नमिता शान से काम कर रही थी उसी दफ्तर में. भूषण राज ने इस्तीफा दे दिया था और वह शहर बदल कर जा चुका था.

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नमिता की हिम्मत और आंखों की अनोखी चमक ने भूषण राज के सारे हौसलों को मात कर दिया. उस को अपने जाल में फंसाने के लिए भूषण राज ने न जाने कितने जतन किए थे, पर अब वह उस के फंदे में आ कर फंस गया था.

Best of Manohar Kahaniya: कर्ज चुकाने के लिए जुर्म

गरमी का मौसम होने की वजह से पथरीला शहर कोटा जैसे तंदूर की तरह तप रहा था. मंगलवार 19 जून, 2018 का दिन भी कमोबेश ऐसा ही था. दोपहर ढल चुकी थी. इस के बावजूद कोटा के तापमान में कमी नहीं आई थी. अपराह्न के लगभग 4 बज चुके थे, सीओ नरसीलाल मीणा अपने चैंबर में बैठे बड़े गौर से ग्यारसीराम शृंगी नाम के शख्स की बातें सुन रहे थे.

लगभग 50 साल की उम्र पार कर चुका ग्यारसीराम बड़ौदा-राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की गुमानपुरा शाखा में कैशियर के पद पर कार्यरत था. लेकिन वक्ती तौर पर वह इसी बैंक की कंसुआ शाखा में कैशियर का काम संभाल रहा था. कंसुआ अनंतपुरा थाना क्षेत्र में आता है.

अनंतपुरा पुलिस स्टेशन पर सीओ अमर सिंह राठौड़ थानाप्रभारी के पद पर तैनात थे. संयोग से उस वक्त राठौड़ भी मीणा साहब के चैंबर में बैठे थे. ग्यारसीराम जो समस्या ले कर उन के पास आया था, वह काफी गंभीर थी. इतनी गंभीर कि ग्यारसीराम की नौकरी और इज्जत दोनों ही दांव पर लग गई थीं.

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ग्यारसीराम ने नरसीलाल मीणा को बताया कि 3 बजे वह बैंक का अस्थाई कर्मचारी देवप्रकाश के साथ बैंक से 8 लाख रुपए ले कर रवाना हुआ था. मोटरसाइकिल वह खुद चला रहे थे जबकि पीछे बैठे देवप्रकाश ने रुपयों से भरा बैग थाम रखा था.

यह रकम भामाशाह मंडी स्थित बैंक की दूसरी शाखा में जमा करनी थी. जैसे ही वे भामाशाह मंडी की पुलिया तक पहुंचे, अचानक एक स्कूटी पर सवार 2 लोग आए और बड़ी फुरती से देवप्रकाश के हाथों से नोटों का बैग छीन कर भाग गए.

दोनों ने शोर मचाते हुए काफी दूर तक उन का पीछा भी किया, लेकिन बदमाश तेज रफ्तार के साथ भाग निकले. ग्यारसीराम ने बताया कि यह सब इतने अचानक हुआ कि वह ठीक से स्कूटी का नंबर और बदमाशों का हुलिया तक नहीं देख पाए. दोनों बदमाश 24-25 साल के आसपास के थे और स्कूटी काले रंग की थी.

‘‘जब रकम आप के बैंक में सुरक्षित थी तो उसे दूसरी शाखा में जमा कराने का क्या मतलब?’’ सीओ मीणा ने सवाल किया.

कैशियर ग्यारसीराम ने उन्हें बैंकिंग प्रक्रिया समझाते हुए कहा, ‘‘सर, बैंक की कंसुआ शाखा में 5 लाख से ज्यादा रकम रखने का प्रावधान नहीं है. जब बैंक में 8 लाख की रकम जमा हो गई तो बैंक की मुख्य ब्रांच भामाशाह मंडी शाखा में जमा कराना जरूरी हो गया था.’’

सीओ नरसीलाल मीणा ने ग्यारसीराम के चेहरे पर नजर गड़ाते हुए पूछा, ‘‘आप बैंक से कितने बजे रवाना हुए थे और वारदात कितने बजे हुई?’’

‘‘जी, यही कोई पौने 3 बजे…’’ हड़बड़ाते हुए ग्यारसीराम ने कहा.

‘‘मतलब वारदात 15 मिनट बाद ही हो गई, क्यों?’’ सीओ ने सवाल किया.

‘‘जी.’’ ग्यारसीराम के मुंह से निकला.

सीओ मीणा की आंखों में जैसे गहरी चमक कौंध गई. उन्होंने टेबल पर रखे पेपरवेट को घुमाते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब किसी को आप के पूरे रूटीन की जानकारी थी.’’

ग्यारसीराम हक्काबक्का हो कर सीओ नरसीलाल मीणा की तरफ देखता रह गया.

वारदात जिस ढंग से हुई थी, उस का केंद्र भामाशाह मंडी की पुलिया थी और यह जगह वीरान नहीं बल्कि आमदरफ्त वाला चहलपहल भरा इलाका था.

मीणा ने तत्काल एसपी अंशुमान भोमिया को घटना का ब्यौरा दिया तो वह भी चौंके. उन के मुंह से बरबस निकला पड़ा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’

इस मामले का खुलासा करने के लिए भोमिया साहब ने एडीशनल एसपी समीर कुमार दुबे की अगुवाई में स्पैशल टीम का गठन किया. इस टीम में सीओ नरसीलाल मीणा के अलावा अनंतपुरा थानाप्रभारी अमर सिंह राठौड़, एएसआई आनंद यादव, दिनेश त्यागी, हैडकांस्टेबल कमल सिंह, कांस्टेबल रामकरण आदि को शामिल किया गया.

भामाशाह मंडी के पास जहां वारदात हुई थी, उधर जाने वाला रास्ता एकदम सुनसान नहीं था. वहां आसपास दुकानें और छोटेबडे़ कई मकान भी थे. दुकानें भी छोटेमोटे बाजारनुमा थीं.

पुलिस की शुरुआती तहकीकात का नतीजा ही चौंकाने वाला निकला. दुकानदारों से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने यहां ऐसी कोई वारदात होती नहीं देखी.

घटनास्थल के पास स्थित स्टाल पर चाय बेचने वाले ने बताया कि यहां लूट की कोई वारदात हुई ही नहीं है और न ही उस ने यहां लूट को ले कर किसी का शोर सुना. जबकि ग्यारसीराम ने शोर मचाने की बात पुलिस को बताई थी.

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पुलिस ने सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. एएसपी दुबे के मन में शक तब हुआ, जब ग्यारसीराम ने उन्हें बताया कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए देवप्रकाश उस के साथ नहीं आया, जबकि वारदात के दौरान रकम का बैग उसी के पास था.

घटना को ले कर संदेहास्पद स्थितियों ने कई सवाल खड़े कर दिए थे. जैसे लूट की वारदात अचानक हुई थी, ऐसी स्थिति में बाइक का गिरना तो दूर की बात, उस का संतुलन तक नहीं बिगड़ा था. चौंकाने वाला सवाल यह भी था कि लूट दोपहर 3 बजे हुई लेकिन उन्होंने तत्काल पुलिस को सूचित करने के बजाए एक घंटे बाद यानी 4 बजे खबर की.

पुलिस ने अब यह पता लगाने की कोशिश की कि इस पूरे मामले में कैशियर ग्यारसीराम की क्या भूमिका थी. एएसपी समीर कुमार दुबे ने एक बार फिर ग्यारसीराम से बात की.

इस बार उस ने जो बताया, उस ने तहकीकात का नया खाका खींच दिया. उस ने कहा, ‘‘वारदात के दिन कंसुआ बैंक शाखा के मैनेजर और नियमित कैशियर दोनों छुट्टी पर थे. मेरी तैनाती तो बैंक की गुमानपुरा शाखा में है. मुझे वक्ती तौर पर एवजी कैशियर के रूप में बैंक में रकम जमा करवाने के लिए बुलवाया गया था.’’

‘‘लेकिन पुलिस को इत्तला करने में एक घंटा क्यों जाया किया गया? क्या वारदात की जानकारी पुलिस को तुरंत नहीं दी जानी चाहिए थी?’’ एएसपी दुबे ने सवाल किया.

‘‘सर, हम ने पहले अपने स्तर पर कोशिश की. गोबरिया बावड़ी तक हम ने दौड़ भी लगाई. फिर वापस बैंक आए. लेकिन जब कोई नतीजा नहीं निकला तो पुलिस के पास तो आना ही था.’’ उस ने बताया.

एएसपी दुबे को लगा कि ग्यारसीराम जो कह रहा है, शायद सच हो. इसलिए उस से कहा, ‘‘ठीक है, आप अभी घर चले जाइए लेकिन कहीं बाहर मत जाना. पूछताछ के लिए जरूरत पड़ सकती है.’’

एएसपी दुबे का संदेह अब पूरी तरह देवप्रकाश पर टिक गया. इस की वजह भी साफ थी कि वारदात के दौरान वह बाइक के पीछे बैठा था और लुटेरों ने रकम से भरा बैग उसी से छीना था. ऐसे में उसे भी ग्यारसीराम के साथ थाने आना चाहिए था, लेकिन नहीं आया.

एएसपी दुबे अभी इस बारे में सोच ही रहे थे कि उसी समय सीओ नरसीलाल मीणा और इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ ने उन के चैंबर में प्रवेश किया. सीओ मीणा ने आते ही कहा, ‘‘सर, बैंक की गतिविधियों से पूरी तरह वाकिफ अंदर का आदमी तो देवप्रकाश ही है, क्या आप इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे?’’

‘‘नहीं, मुझे पूरा यकीन है लेकिन ऐसे मामलों में जल्दबाजी ठीक नहीं होती.’’ एएसपी दुबे ने बात का खुलासा करते हुए कहा, ‘‘मुझे शक ही नहीं, पूरा विश्वास है कि इस वारदात का मास्टरमाइंड देवप्रकाश के अलावा और कोई नहीं हो सकता. लेकिन वारदात को तो उस के 2 साथियों ने अंजाम दिया था न?

‘‘अब अगर सीधे देवप्रकाश को गिरफ्तार किया जाता है तो उस के दोनों साथी भाग जाएंगे और हमें ऐसा नहीं होने देना है. हमें उसे अंधेरे में रखना है कि पुलिस को उस पर शक नहीं है. इस का नतीजा यह होगा कि वह बेफिक्र हो कर रकम के बंटवारे के लिए अपने साथियों से मिलने की कोशिश करेगा. तभी हम आसानी से उसे और उस के साथियों को दबोच लेंगे.’’

‘‘और हां, आप ने देवप्रकाश की जन्मकुंडली तो खंगाल ली होगी?’’ एएसपी दुबे ने पूछा.

‘‘यस सर,’’ सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ ने बताया, ‘‘देवप्रकाश पिछले 4 सालों से बतौर अस्थाई कर्मचारी बैंक में चपरासी तैनात है, इसलिए बैंक की तमाम गतिविधियों से वह पूरी तरह वाकिफ है. आदमी खुराफाती किस्म का है. उस की संगत भी कुछ गड़बड़ नजर आती है. बैंक के सामने ही एक मोबाइल की दुकान है. दुकान अरुण कुमार बुलीवाल की है. देवप्रकाश और अरुण में अच्छी दोस्ती है.’’

‘‘हां, अब बात का सिरा नजर आ गया है.’’ एएसपी ने अमर सिंह राठौड़ की बात बीच में ही काट कर सीओ मीणा की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘फौरन इस अरुण कुमार को थामो. बिल्ली की पूंछ पर पैर पड़ेगा तो उस के गले में घंटी बांधने में देर नहीं लगेगी.’’

योजना के मुताबिक, सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ अगले दिन सादे कपड़ों में बैंक के सामने स्थित अरुण की मोबाइल की दुकान पर पहुंच गए. ग्राहक के रूप में मोबाइल खरीदारी की बात कर के उन्होंने तसल्ली कर ली कि जिस से वह रूबरू हुए हैं, वह अरुण बुलीवाल ही है. दुकान पर राठौड़ कुछ इस तरह खड़े थे कि बैंक में लोगों की आवाजाही साफ दिखाई दे.

लगभग आधे घंटे बाद देवप्रकाश अरुण की दुकान पर आया. उस की दुकान में दाखिल होते ही अरुण अमर सिंह राठौड़ को छोड़ कर देवप्रकाश को गली के दूसरे मुहाने पर ले जाने लगा. जाते समय वह सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ से बोला, ‘‘मैं अपने दोस्त से कोई जरूरी बात कर लूं, तब तक आप मोबाइल सैट पसंद कर लीजिए.’’

‘‘ठीक है, तुम बात कर लो. मुझे कोई जल्दी नहीं है. लेकिन तुम इस तरह हड़बड़ाए हुए क्यों हो?’’ राठौड़ ने बड़े सहज भाव से अरुण की कलाई थामते हुए कहा.

‘‘कहां साब, आप अपना मोबाइल खरीदो और चलते बनो.’’ अनजान शख्स की मौजूदगी से अरुण हड़बड़ा गया था. फिर भी उस ने साहस बटोरते हुए कहा, ‘‘अब तुम फूटो यहां से, मुझे तुम्हें कोई मोबाइल नहीं देना है. पता नहीं कैसेकैसे लोग चले आते हैं.’’

‘‘तो चलो एक बात बताओ, जिस के साथ तुम जा रहे हो वह बैंक में काम करने वाला देवप्रकाश ही है न, तुम्हारा जिगरी दोस्त.’’

शेर बनने की कोशिश करने वाला अरुण अब सकपकाते हुए बोला, ‘‘भाई, तुम क्यों पंगा कर रहे हो? जरूर तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है.’’

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‘‘कोई बात नहीं, गलतफहमी हो गई है तो अभी दूर कर देते हैं.’’ राठौड़ ने अरुण के गले में बांह डालते हुए गली के मुहाने की तरफ घसीटते हुए कहा, ‘‘चलो, तुम्हें कुछ दिखाते हैं.’’

यह सुन कर अरुण के होश फाख्ता हो गए. उस ने सामने जो नजारा देखा उसे देख वह बुरी तरह थरथराने लगा. देवप्रकाश को 2 सिपाही पकड़े हुए खड़े थे. सीआई राठौर ने उसे घुड़कते हुए कहा, ‘‘अरुण, तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम सब सचसच बता दो. तुम ने देवप्रकाश के साथ मिल कर कैसे बैंक की रकम लूटने की योजना बनाई और  तुम्हारे इस खेल में कौनकौन शामिल था?’’

तब तक दोनों सिपाही देवप्रकाश को राठौड़ के पास ले आए. देवप्रकाश का खेल खत्म हो चुका था. सीआई राठौड़ ने वहीं पर देवप्रकाश के 2-3 थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘2 तो तुम हो गए, अब और साथियों के नाम बता दो.’’

थप्पड़ और राठौड़ के पुलिसिया खौफ से थर्राए देवप्रकाश ने राहुल राठौड़ का नाम बताया. पुलिस ने तत्काल राहुल राठौड़ के घर छापा मारा. पुलिस को देखते ही राहुल के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पुलिस पूछताछ में देवप्रकाश ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया, ‘‘सर, बैंक से रकम लूटने की योजना मैं ने ही बनाई थी.’’ इस के साथ ही अरुण की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘इस पर अमल करने का तरीका अरुण ने बताया था. बैग छीनने के लिए स्कूटी अरुण ने ही ड्राइव की थी.’’

‘‘…और तीसरा कौन था, जिस ने देवप्रकाश से बैग छीनैती को अंजाम दिया?’’ एसपी भोमिया साहब ने घुड़कते हुए पूछा.

‘‘साहब, यह काम राहुल ने किया था.’’ उस ने राहुल की तरफ इशारा किया.

पुलिस को देवप्रकाश ने जो कुछ बताया, उस के मुताबिक मौजमजे में उस ने काफी लोगों से कर्ज ले लिया था और अब वह उन के तकाजों से परेशान था. बैंक के सामने स्थित मोबाइल की दुकान के मालिक अरुण बुलीवाल से उस की गहरी दोस्ती थी. आर्थिक दृष्टि से अरुण भी तंगहाली में था.

बैंक से रकम निकालने जमा कराने के काम में कैशियर के साथ उसी को आनाजाना होता था. देवप्रकाश को अपनी तंगहाली से उबरने का एक ही उपाय सूझा कि लूट का ऐसा नाटक रचा जाए ताकि किसी को शक भी न हो और अच्छीखासी रकम भी हाथ लग जाए. लेकिन कोई मुनासिब मौका हाथ नहीं आ रहा था.

वारदात के लिए मंगलवार 19 जून, 2018 का दिन उस ने इसलिए चुना क्योंकि बैंक का नियमित कैशियर तो छुट्टी पर था ही, बैंक मैनेजर के परिवार में किसी की मौत की वजह से वह भी छुट्टी पर थे. कैश जमा करवाने के लिए बैंक की गुमानपुरा शाखा के कैशियर ग्यारसीराम को बुलवाया गया था.

वारदात के मास्टरमाइंड देवप्रकाश ने सारी प्लानिंग कर रखी थी. मौका मिला तो वारदात को अंजाम भी दे दिया. योजना बनाते समय देवप्रकाश ने तीनों का हिस्सा तय कर रखा था. पुलिस ने तीनों से 8 लाख रुपए बरामद कर लिए. देवप्रकाश की गरदन शर्म से झुक गई. कथा लिखने तक देवप्रकाश, राहुल और अरुण तीनों न्यायिक अभिरक्षा में थे.

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– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

वार पर वार : भाग 2

पिछले अंक में आप ने पढ़ा था :

सरकारी नौकरी कर रही नमिता का बौस भूषण राज उसे पाना चाहता था. नमिता ने यह बात अपनी एक साथी प्रीति को बताई कि भूषण राज केबिन में बुला कर उसे यहांवहां छूता है. प्रीति ने पहले तो गुस्सा दिखाया पर कुछ दिनों बाद वह नमिता से बोली कि तुम्हें भी रुपएपैसे के साथसाथ जवानी का मजा उठाना चाहिए. यह सुन कर नमिता हैरान रह गई.

अब पढि़ए आगे…

प्रीति ने तुरंत एतराज किया, ‘‘नहींनहीं, मेरा यह मतलब नहीं… मैं एक आम बात कह रही थी. तुम्हारे जैसी लड़कियां आजकल कहां मिलती हैं. आज बाहर की दुनिया में इतनी चमक है और पैसों की इतनी खनक है कि इस सब के लिए कोई भी लड़की अपनी इज्जत बेचने के लिए आमादा रहती है.

‘‘तुम बुरा मत मानो, मैं सच कहती हूं, आजकल की पढ़ीलिखी लड़कियों के लिए कुंआरापन बेकार का शब्द है. मौजमस्ती करना, ढेर सारा रुपया कमाना, चाहे जिस रास्ते से और समाज में एक हैसियत बनाना उन का मकसद होता है.’’

‘‘मैं क्या करूं?’’ नमिता ने अपने हाथ मलते हुए पूछा.

प्रीति मुसकराते हुए बोली, ‘‘हताश होने की जरूरत नहीं है, कुदरत किसी को भी इतना कमजोर नहीं बनाती कि उस के जिंदा रहने के सारे रास्ते बंद कर दे. जो उम्मीद का दामन उलट हालात में भी थामे रहते हैं, वे अपना लक्ष्य जरूर हासिल करते हैं.’’

प्रीति की बातों से नमिता को भले ही कोई राहत न मिली हो, पर बाद में उस ने जो सलाह दी, उस से नमिता को धुंधले अंधेरे में रोशनी की किरण दिखाई देने लगी. फिर भी एक डर बना रहा.

नमिता ने पूछा, ‘‘अगर मैं तबादले की अर्जी देती हूं तो उसे औफिस में ही देना पड़ेगा न? तब यह बौस का बच्चा क्यों उसे आगे भेजेगा?’’

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‘‘बात तो तुम्हारी सही है, पर एक रास्ता फिर भी है. अर्जी की एक प्रति हम रजिस्टर्ड डाक से सीधे डायरैक्टर को भेज सकते हैं. दूसरी प्रति प्रौपर चैनल के जरीए भेजने के लिए औफिस में देंगे. झक मार कर उसे हैडर्क्वाटर भेजना पड़ेगा,’’ प्रीति ने बताया.

उन दोनों ने बहुत सोचसमझ कर एकएक शब्द चुन कर तबादले की अर्जी बनाई. एक प्रति डाक से हैडक्वार्टर भेज दी. हालांकि वह दिल्ली में ही था. दूसरी प्रति उसी दिन उस ने औफिस में जमा कर दी… धड़कते दिल से कि जब उस की अर्जी भूषण राज के सामने होगी तो वह क्या सोचेगा? क्या वह भड़क उठेगा और उसे बुला कर अनापशनाप कुछ सुनाएगा या फिर शांत रह कर कोई ऐसी चाल चलेगा कि नमिता धराशायी हो जाएगी और उस की उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा?

उस दिन नमिता बहुत बेचैन रही. औफिस के साथियों से बातें करती थी, पर मन कहीं और अटका हुआ था. न उस के दिल की धड़कन की रफ्तार कम हो रही थी, न उस की बेचैनी. रहरह कर मन भूषण राज के इर्दगिर्द ही घूमने लगता था.

दुष्ट आदमी चाहे ऊपर से कितना ही मीठा दिखाई देता हो, प्यारीप्यारी बातें करता हो, पर अपनी दुष्टता से कभी बाज नहीं आता.

नमिता की अर्जी को देखते ही भूषण राज की नसों में खून की जगह आग बहने लगी. थोड़ी देर बाद ही उस ने नमिता को अपने चैंबर में बुलाया. वह डरतीकांपती उस के सामने पहुंची…

अपनी नजरों से नमिता के सारे बदन को नंगा करता हुआ वह बोला, ‘‘तो उड़ने का ख्वाब देख रही हो…’’

डर के मारे नमिता अपनी आंखें नहीं उठा पा रही थी.

‘‘तुम यह अवार्ड देने से पहले यह क्यों भूल गई कि तुम्हारी हालत पिंजरे में कैद पंछी की तरह है. बाज तुम्हारी रखवाली कर रहा है. पिंजरे का दरवाजा खुल भी जाएगा तो बाज की तेज निगाहों और उस की तेज रफ्तार से खुद को कैसे बचा पाओगी?’’

नमिता की रूह कांप कर रह गई. उस की आंखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा था. उस की समझ में कुछ नहीं आया तो लरजती आवाज में उस ने दया की भीख मांगी, ‘‘मैं आप की बेटी जैसी हूं, मुझ पर दया कीजिए.’’

‘‘दया… क्या तुम मुझ पर दया कर सकती हो? बोलो, तुम भी एक लड़की हो, तुम्हारे पास भी भावनाएं हैं. क्या तुम मेरे दिल का हाल नहीं समझ सकती? तुम अपनी थोड़ी सी दया और प्यार की एक छोटी बूंद मेरे ऊपर टपका दो, फिर देखो, मैं तुम्हारे ऊपर दया की इतनी बारिश करूंगा कि तुम्हारी जिंदगी बदल जाएगी. बोलो, मंजूर है?’’ कह कर वह हंसा.

नमिता के पास उस की बात का कोई जवाब नहीं था. वह चुपचाप उस के चैंबर से बाहर निकल आई.

नमिता को हैडक्वार्टर में बैठे अफसरों पर पूरा भरोसा था. वहां के सारे अफसर पत्थरदिल नहीं हो सकते थे. संबंधित अफसर उस की अर्जी पर जरूर विचार करेंगे.

कई दिन बीत गए. नमिता की चिंता बढ़ती जा रही थी. वह औफिस का काम भी ढंग से नहीं कर पाती थी. भूषण राज उस की हालत को समझ रहा था. नमिता अभी मर्यादा की बाढ़ में बह रही थी. वह जानता था कि बाढ़ का पानी एक न एक दिन कम जरूर होगा.

नमिता की परेशानी के मद्देनजर भूषण राज ने उसे एक दिन समझाते हुए कहा, ‘‘क्यों अपनी जान सुखा रही हो तुम? कंचन काया को पत्थर मत बनाओ. मेरा कहना मान लो, तुम्हारा कुछ बिगड़ेगा नहीं…’’

नमिता फिर भी नहीं समझी. वह समझ कर भी नहीं समझना चाहती थी.

एक महीने बाद नमिता को पता चला कि बौस ने उस की अर्जी को हैडक्वार्टर भेज तो दिया है, लेकिन नोट में जोकुछ लिखा है, उसे सुन कर नमिता के पैरों तले जमीन ही खिसक गई. वह इनसान जो उस से प्यार करने का दावा करता था, उस के शरीर को भोगना चाहता था, बौस के मन में उस के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने और उसे पूरी तरह से बरबाद कर देने के लिए ये विचार किस तरह आए होंगे, यह नमिता की समझ से परे था.

प्रीति ने फाइल देखने के बाद नमिता को बताया था कि बौस ने उस की अर्जी पर क्या नोट दिया था. नमिता के कानों में कुछ शब्द पड़े, कुछ नहीं… वह बेहोश सी हो गई थी…

बस इतना समझ में आया कि वह कामचोर थी, अपना काम ढंग से नहीं कर पाती थी. अंगरेजी अच्छी नहीं थी. स्टेनोग्राफर होने के बावजूद डिक्टेशन नहीं ले पाती थी. टाइपिंग में भी ढेर सारी गलतियां करती थी. उसे सुधारने और ढंग से काम करने के तमाम मौके मुहैया कराए गए, पर वह अपने काम में सुधार लाने के बजाय और ज्यादा लापरवाही बरतने लगी थी.

शायद वह किसी अनजान लड़के के प्यार में गिरफ्तार थी, जिस से हमेशा मोबाइल फोन पर बातें करती रहती थी.

बौस ने आगे अपने नोट में लिखा था कि समझाने के साथसाथ उसे काम में सुधार लाने के तरीके भी सुझाए गए थे, पर सारी कोशिशें नाकाम हो गईं और नमिता में जरूरी सुधार नहीं आने के बाद उसे चेतावनी दी जाने लगी, जिस से घबरा कर उस ने दूसरे दफ्तर में अपने तबादले के लिए अर्जी दे दी थी.

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नमिता की उम्मीद के सारे चिराग बुझ गए. दफ्तर के सारे साथियों की हमदर्दी उस के साथ थी, पर वे भी नमिता की तरह लाचार थे.

बौस के दुष्ट स्वभाव, गंदी हरकतों और भेडि़ए जैसी चालाकी से परिचित थे. उस ने बड़े अफसरों को अपनी मुट्ठी में कर रखा था. बेईमान था, पर अकेला सब माल हजम नहीं करता था. नियमित रूप से हैड औफिस जा कर अफसरों की सेवा करता रहता था. पैसे के बल पर सभी को उस ने अपने वश में कर रखा था. सालों से वह एक ही दफ्तर में जमा हुआ था. जिस के बारे में जो कुछ लिखता था, हैड औफिस के अफसर तुरंत उसे मान लेते थे.

नमिता के मामले में भी यही हुआ. एक हफ्ता भी नहीं बीता था कि हैड औफिस से नमिता की अर्जी का जवाब आ गया. उस के तबादले की अर्जी को खारिज करते हुए उस के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी गई थी और मजे की बात यह कि जांच अफसर भूषण राज को ही बनाया गया था.

नमिता इतनी थक चुकी थी कि वह बीमार रहने लगी थी. 2-3 दिनों तक वह औफिस नहीं आई. पर उस से क्या फायदा होगा? बीमारी के बहाने वह कितनी छुट्टी ले सकती थी. छुट्टी भी तो भूषण राज को ही मंजूर करनी थी. वह कोई और अड़ंगा लगा देता तो… नमिता के हाथ में क्या था? वह क्या कर सकती थी?

3 दिन तक छुट्टी पर रहने पर नमिता ने बहुतकुछ सोचा और बहुतकुछ समझने की कोशिश की. घर में किसी से बात नहीं की. पर क्या ज्यादतियों की कोई सीमा नहीं है… उस की भी कोई सीमा होगी. कोई किसी पर कितना जुल्म कर सकता है. हम जुल्म सहते चले जाते हैं, इसीलिए हमें और ज्यादा जुल्मों का सामना करना पड़ता है. अगर हम उस का मुकाबला डट कर करें तो शायद इस से छुटकारा मिल जाए. तुरंत नहीं तो थोड़े समय बाद…

जब नमिता 3 दिन बाद वापस दफ्तर आई तो खुश लग रही थी. मन को काफी हद तक उस ने काबू में कर लिया था. खुद को उस ने समझा लिया था कि चिंता करने से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता था.

प्रीति ने नमिता को समझाया, ‘‘देखो नमिता, हालात अब गंभीर हो चुके हैं. भेडि़ए को ही अगर भेड़ की रखवाली के लिए नियुक्त किया जाए तो तुम समझ सकती हो कि भेड़ का क्या हश्र होगा. यहां तो भेडि़ए को भेड़ के खिलाफ कार्यवाही करने के लिए कहा गया है.’’

‘‘तब…?’’ नमिता ने प्रीति से पूछा, शायद वह कोई राह बता सके. प्रीति पर वह बहुत ज्यादा यकीन करने लगी थी.

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‘‘समझदारी से काम लो नमिता… अगर तुम नौकरी छोड़ती हो या जांच के बाद तुम्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है तो दोनों में फर्क क्या है? दोनों हालात में तुम बेरोजगार हो जाओगी. तब तुम्हारे घर का सुखचैन, दो जून की रोटी, भाईबहनों की पढ़ाईलिखाई, तुम्हारी शादी, एक सुखभरी जिंदगी… सब खटाई में पड़ सकता है,’’ प्रीति बहुत धीरेधीरे उसे समझाने के अंदाज में बता रही थी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

मुट्ठी भर राख

मुट्ठी में जो था वह राख थी, दूसरों के लिए चमकते सितारे थे, झिलमिलाते, दमकते. पहले मन में कितनी साध थी कि दूर गगन में दमकते इन सितारों को झट से झपट कर मुट्ठी में भर लें. ज्यादा कोशिश न करनी पड़ी, न ही पंजों के बल ज्यादा उचकना पड़ा. आसमान ही इतना झुक आया कि हाथ भी न बढ़ाने पड़े और झोली सितारों से भर गई.

आंचल में आने को सितारे तैयार थे. बस, अपने ही पग मैं ने पीछे हटा लिए. एक उम्र होती है जिस में सितारों के सपने आते हैं. फूलों से लदी डालियां लचक- लचक कर हवाओं को खुशबू से भर देती हैं. ठीक इसी वक्त मुंहमांगी मुराद कुबूल होने के समय पांव अपनेआप पीछे हो गए.

बेटी के लिए वर तलाश करें तो गुणों की एक अदृश्य लंबी सूची साथ रहती है. पढ़ालिखा, बारोजगार, सुंदर, सुदर्शन, सुशील, अच्छे कुलखानदान का सभ्य, संभ्रांत. अपना मकान, छोटा परिवार. छोटा भी इतना कि न सास न ननद. लड़के की बहन कोई है ही नहीं और मां का 4 साल पहले इंतकाल हो गया. यह आखिरी वाक्य इस ठसक के साथ मुंह से बाहर आया कि यह गुणों का कोई बोनस है, सोने पर सुहागा है.

बापबेटे 2 जन ही हैं. दोनों कामकाजी हैं. मां की तसवीर पर माला लटक रही है, ड्राइंगरूम में ही. बस, लड़की तो पहले ही दिन से राज करेगी, राज. सासननदों की झिकझिक उस परिवार में नहीं है.

बताने वाली चहक रही थी, ‘‘क्या राजकुमार सा वर मिला है. लड़की तकदीर वाली है.’’

मां ने बेटी की आंखों में चमक देखी, ‘यही ठीक है.’

‘‘लड़का सुंदर है. दोनों ही परिवारों ने एकदूसरे को देख लिया है, पसंद कर लिया है. ऐसे लड़के को तो झट से घेर लेना चाहिए. देर करोगी तो रिश्ता हाथ से निकल जाएगा. अब सोच क्या रही हो?’’

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‘‘मैं सोच रही हूं कि लड़के की मां नहीं है…’’

‘‘यह तो और अच्छी बात है. फसाद की जड़ ही नहीं है,’’ बताने वाली को लड़के के गुण को कम कर के आंकने की जरूरत न समझ आई. बेटी की मां है, बेटी का हित नहीं देख पा रही. अरे, सास नहीं है. लड़की पहले ही दिन से राज करेगी. अपने घर को अपने हिसाब से चलाएगी. बापबेटे दोनों चाहते हैं कि जल्दी से रिश्ता पक्का हो, घर में रौनक आए.

मां की आंखों में रौनक की जगह उदासी का सागर दिखा. पहले दिन से होने वाला राज दिखा कि लाड़चाव करने, बोलनेबतियाने के लिए परिवार में कोई नहीं. लड़की जाते ही गृहस्थी का बोझ संभालेगी और बापबेटे हर घड़ी उस की तुलना अपनी पत्नी व मां से करेंगे. जिंदा मां धूरि बराबर और मरी मां देवी समान. हर घड़ी पूजित. मां ऐसा करती थीं, वैसा करती थीं. होतीं तो उन के साथ देखसुन कर लड़की गृहस्थी सीखसमझ लेती कि क्या करना है, कैसे करना है. अब ऐसे में तो तुलना मात्र ही शेष रहती है.

काम की तुलना, उठनेबैठने, चलने- फिरने की तुलना. बेटेबहू का सुख बाप से न सहा जाएगा. न हंसना न बोलना, न घूमना न फिरना. बेटे को पापा…पापा का राग रहेगा. पापा घर में अकेले हैं, पापा उदास हैं…पापा के दुख के सागर में गोते लगाता रहेगा.

जमाना जालिम होता रहेगा और ध्यानाकर्षण के लिए तरहतरह की बीमारियां, पापाजी को सिरदर्द, पापाजी को ब्लड प्रेशर…मां होती तो पापाजी की देखभाल करती रहती और बेटेबहू अपने में मगन रहते. दुखी आदमी के सामने सुखी होना भी तो मुसीबत ही है. ऐसे में परपीड़न का आनंद लेने वाला कैसे उसे बेटी समझेगा? मां होती तो यह आशंका शायद न होती.

मां का न होना कोई गुण नहीं बल्कि कमी है, ऐसा बेटी की मां को लग रहा था. परिवार एक ऐसे शीशे का सामान था जिस पर ‘हैंडिल विद केअर’ तो लगा ही होता है. यहां तो यह न केवल शीशे का था बल्कि चटका भी हुआ था. हाथ में लग जाए तो खून निकल आए.

सास नहीं है, यानी कि वर की मां नहीं है. इस बात पर हाथ आया रिश्ता छोड़ने वाली कन्या की मां को जिस ने कहा, मूर्ख ही कहा. बताइए सास नहीं है लड़ने को, इस बात पर प्रसन्न नहीं हो सकती. ज्यादा सोचनेसमझने की जरूरत नहीं होती, इस को कहते हैं भाग्य को ठोकर मारना.

कब से बेटी हंसीहंसी में कहती कि कितना अच्छा है. मांबाप फोटो वाले हों. मतलब फोटो माला पहन कर दीवार पर लटकी हो. सास की ‘नो किचकिच.’

किचकिच, झिकझिक नहीं किंतु इस का अर्थ स्नेह की कमी, नियंत्रण का अभाव. ननद नहीं है, लड़का अकेला है. मान लें कि वह शेयर करना जानता ही न होगा. स्वकेंद्रित होगा. बिना नियंत्रण के या तो उच्छृंखल होगा या दब्बू. पिता के स्नेह में सहानुभूति का अनुपात अधिक. जो कहो, सो मान लो. बच्चा कहीं उदास न हो. उस की आदत अपनी बात मनवाने की होगी बजाय मानने की.

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सास का न होना कोई बोनस नहीं हो सकता. न ही सोने पर सुहागा. दुख की छाया यों कि लड़की के तन पर गहने तक सास के पुराने होंगे. मोह के मारे तुड़वा कर फिर न गढ़वाए जाएंगे. मां होती तो यह फैसला मां का होता कि नए गढ़वाए जाएंगे कि पुरानों को बदला जाएगा. अब चूंकि है नहीं इसलिए मां को तो उन्हें पहनना नहीं है. सब बहू पहनेगी. वैसे के वैसे ही पहने तो अच्छा. अनुपस्थित होते हुए भी वह सदा उपस्थित रहेगी. इस में सुलहसंवाद की संभावना नहीं है.

बेटी की मां की रात करवटें बदलते बीती. ऐसे झंझटों में क्यों डालें बेटी को. परिवार ठीक है, अच्छा है लेकिन सामान्य नहीं है. खोज के पैरामीटर में एक शब्द और जुड़ा. परिवार छोटा और सामान्य और बेटा पढ़ालिखा, बारोजगार, सुंदर, सुदर्शन, सुशील, अच्छे कुलखानदान का, सभ्य, संभ्रांत. सास का न होना मुट्ठी की राख भर है, आसमान के चमकते सितारे नहीं, जिस की कोई साध करे.

Manohar Kahaniya: बेगम बनने की चाह में

सौजन्य- मनोहर कहानियां

28 अक्तूबर, 2018 की बात है. सुबह के 11 बज चुके थे. देवास शहर के थाना सिविल लाइंस के टीआई  विवेक कनोडिया अपने औफिस में बैठे थे, तभी एक महिला उन के पास आई. उस ने टीआई को अपने  पति के गुम होने की बात बताई. उस युवती ने अपना नाम पिंकी बता कर कहा कि वह विशाल सोसायटी में अपने पति सुनील कुमार के साथ रहती है. कल करवाचौथ का त्यौहार था. त्यौहार के बाद पति और मैं एक ही कमरे में सोए हुए थे. सुबह जब मेरी आंख खुली तो पति बिस्तर पर नहीं थे. हमारे मेनगेट की कुंडी भी बाहर से बंद थी, जो पड़ोसी से खुलवाई. पति को कई जगह ढूंढा, जब कहीं पता नहीं चला तो थाने चली आई.

मामला गंभीर था. टीआई को लगा कि या तो पति-पत्नी के बीच कोई झगड़ा हो गया होगा या फिर सुनील का किसी दूसरी औरत से चक्कर चल रहा होगा. लेकिन पिंकी ने लड़ाई झगड़े या पति का किसी दूसरी औरत से चक्कर की जानकारी होने से न केवल इनकार किया, बल्कि बताया कि कल करवाचौथ की रात हम दोनों काफी खुश थे.

पिंकी ने यह भी बताया कि सुनील अपना मोबाइल तो छोड़ गए लेकिन घर में रखे 20 हजार रुपए और कुछ चैक अपने साथ ले गए. मामला समझ से परे था. टीआई विवेक कनोडिया ने सुनील कुमार की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद पास के गांव बामनखेड़ा में रहने वाले सुनील के मातापिता को बुलवा कर उन से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि बहू-बेटे हंसी-खुशी साथ रह रहे थे.

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सुनील देवास की एक दुकान पर काम करता था. उस ने 3 साल पहले विशाल नगर में 3 कमरे का अपना मकान बनवा लिया था. इस के बावजूद वह विशालनगर की सोसायटी में ही रहता था. मातापिता ने अपने गांव में रहने वाले अयूब नाम के युवक पर शक जाहिर किया.

टीआई विवेक कनोडिया ने पुलिस टीम भेज कर अयूब को थाने बुलवा लिया. उन्होंने अयूब से पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी निकल कर सामने नहीं आई. इस के बाद पुलिस ने सुनील के दुकान मालिक भंवर जैन से सुनील के चरित्र आदि के बारे में जानकारी जुटाई.

भंवर जैन ने बताया कि सुनील उन की दुकान में कई साल से काम कर रहा है. वह काफी ईमानदार व भरोसे का आदमी है. दुकानदार ने सुनील के प्रेमप्रसंग व नशाखोरी की आदत से भी इनकार किया.

पिंकी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पास कोई पर्सनल फोन नहीं है. पति ही अपने पास मोबाइल रखते थे जो वह घर पर छोड़ गए. टीआई ने सुनील के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस से कोई लाभ नहीं हुआ. इस से मामला धीरेधीरे अंधकार से घिरने लगा.

इधर सुनील के मातापिता 10 दिन तक थाने के चक्कर लगाते रहे. बेटे के बारे में कोई पता नहीं लगने की बात पर वह उदास मन से गांव लौट जाते. इसी तरह 3 महीने बीत गए.

एक रोज जब सुनील के पिता मायाराम थाना सिविल लाइंस पहुंचे तो टीआई विवेक कनोडिया ने इस बात पर गौर किया कि सुनील के पिता तो अपने बेटे की खोजखबर के लिए थाने आते हैं, लेकिन सुनील की पत्नी पिंकी गुमशुदगी दर्ज करवाने के बाद एक बार भी थाने नहीं आई.

इस पर उन्होंने मायाराम से सुनील की पत्नी पिंकी के बारे में पूछा तो वह बोले, ‘‘उसे क्या फर्क पड़ना है, साहब. उसे तो कोई दूसरा मर्द मिल जाएगा. वह तो अपने मांबाप के घर जा कर बैठी है और बुलाने पर भी नहीं आ रही है.’’

मायाराम की बात सुन कर टीआई विवेक कनोडिया समझ गए कि इस मामले की बागडोर पिंकी के हाथ में है. उन्होंने तुरंत कांस्टेबल कनेश को भेज कर पिंकी को थाने बुलवा लिया. पूछताछ के बाद उन्होंने पिंकी को हिदायत दी कि जब तक इस केस की जांच न हो जाए, तब तक वह देवास छोड़ कर कहीं न जाए. न मायके और न ही कहीं और.

टीआई गोपनीय तरीके से पिंकी पर नजर गड़ाए हुए थे. उन्हें उस की एकएक हरकत की खबर मिल रही थी. उन्होंने अपने खबरी पिंकी के आसपास लगा रखे थे. टीआई के खबरी ने उन्हें बताया कि पिंकी दिन भर किसी से फोन पर बात करती रहती है.

यह सूचना मिलने के बाद टीआई ने सुनील के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस मोबाइल पर तो किसी का फोन आया ही नहीं था. फिर पिंकी किस फोन पर बात करती है. पिंकी ने यह पहले ही बता दिया था कि उस के पास कोई दूसरा मोबाइल नहीं है.

टीआई समझ गए कि सुनील के लापता होने का राज पिंकी के दूसरे मोबाइल में छिपा हो सकता है. इसलिए 5 जनवरी, 2019 को उन्होंने यह सारी जानकारी एसपी देवास को दे दी. फिर एसपी के निर्देश पर उन्होंने एक टीम पिंकी के घर भेजी.

पुलिस टीम ने पिंकी के घर की तलाशी ली तो गेहूं की बोरी में छिपा कर रखा गया एक मोबाइल पुलिस के हाथ लग गया. मोबाइल हाथ आते ही पिंकी का चेहरा उतर गया. पुलिस ने उस मोबाइल फोन का काल लौग चैक किया तो पता चला कि उस मोबाइल पर दिन भर में बीसियों बार केवल एक ही नंबर से फोन आताजाता था.

जांच के बाद वह नंबर पड़ोस में रहने वाले अनवर शाह का निकला. इस आधार पर जब पुलिस ने पिंकी से थोड़ी सख्ती की तो वह टूट गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि प्रेमी अनवर शाह के साथ मिल कर उस ने पति की हत्या कर लाश एक खेत में दबा दी है.

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पुलिस ने उसी समय अनवर शाह को भी उस ने घर से उठा लिया. चूंकि पिंकी पहले ही पूरी बात बता चुकी थी, इसलिए अनवर ने भी बिना किसी टालमटोल के अपना अपराध स्वीकार करते हुए पास के गांव नारायणपुर स्थित अपने खेत में दफन सुनील की लाश बरामद करवा दी.

पुलिस ने अनवर और पिंकी से विस्तार से पूछताछ की तो सुनील की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

मध्य प्रदेश के भैंसोड़ा गांव की रहने वाली पिंकी बचपन से ही काफी खूबसूरत और चंचल स्वभाव की थी. उस का काम दिन भर गांव की गलियों में धमाचौकड़ी मचाना था. बताते हैं कि इस दौरान किशोरावस्था में ही गांव के कुछ युवकों ने उस के चंचल स्वभाव का फायदा उठा कर उस के साथ यौन संबंध बनाने शुरू कर दिए थे. पिंकी को भी यह सब अच्छा लगता था. इसी वजह से उस के मांबाप ने काफी कम उम्र में ही उस की शादी बामनखेड़ा में रहने वाले सुनील कुमार के संग कर दी थी.

सुनील सीधा सच्चा युवक था. पत्नी को वह जितना प्यार करता था, उतना ही अपने मातापिता का सम्मान भी करता था. यह बात पिंकी को अच्छी नहीं लगती थी. वह सासससुर से दूर रहना चाहती थी, इसलिए सुनील पर गांव छोड़ कर शहर में रहने के लिए दबाव बनाने लगी. जिस के चलते करीब 10 साल पहले सुनील देवास में आ कर विजय रोड स्थित एक दुकान पर नौकरी करने लगा.

धीरेधीरे पैसे जोड़ कर उस ने विशाल नगर में एक मकान भी बनवा लिया. पिंकी अब तक 2 बच्चों की मां बन चुकी थी. उम्र भी 30 के आसपास पहुंच गई थी. लेकिन उस की सुंदरता में वह कसक अभी बाकी थी जो किसी को भी अपना दीवाना बनाने की कूवत रखती थी.

विशाल नगर में पिंकी के पड़ोस में अनवर शाह रहता था. अनवर खेती के अलावा ट्रैक्टर चलाने का काम करता था. कोई 2 साल पहले एक रोज उस की नजर सुबहसुबह धूप में बैठ कर बाल सुखाती पिंकी पर पड़ी तो वह उस के हुस्न पर फिदा हो गया.

अनवर औरतों का पुराना खिलाड़ी था. अपने खेत में काम करने वाली कई महिलाओं के साथ उस के यौनसंबंध थे. जिस दिन उस ने पिंकी को देखा, उसी दिन से उसे पाने की कोशिश करने लगा. इस के लिए उस ने सब से पहले सुनील से दोस्ती बढ़ाई और इस बहाने उस के घर आनेजाने लगा.

यही नहीं, वह जब भी सुनील के घर आता, उस के बच्चों के लिए खानेपीने की चीजें जरूर ले जाता. इस का नतीजा यह निकला कि कुछ समय बाद वह बच्चों को टौफी, चौकलेट देने के बहाने ऐसे समय पर भी सुनील के घर आने लगा, जब पिंकी घर पर अकेली होती थी.

अनवर था औरतों का शिकारी……………..

पिंकी के साथ भाभी का रिश्ता तो वह पहले ही बना चुका था, सो कभीकभी 2-4 मिनट रुक कर उस से बात भी करने लगा. अनवर जानता था कि कहानी 2-4 मिनट से ही शुरू हो कर पूरी रात तक पहुंचती है. इसलिए इस दौरान मौका मिलने पर वह पिंकी की सुंदरता की तारीफ करने से भी पीछे नहीं रहता था.

इतना ही नहीं, कभीकभार पिंकी की गोद से उस का बच्चा अपनी गोद में लेने के बहाने वह उस के नाजुक अंगों को छूने की भी कोशिश करता था. इस से पिंकी को जल्द ही अनवर के मन की बात समझ में आ गई.

इस के बाद उस के दिमाग में अनवर की चाहत लावा बन कर फूटने लगी. इसलिए उस ने भी अनवर के लिए अपने मन की लगाम को ढील देनी शुरू कर दी. इस से अनवर समझ गया कि मछली दाना निगल चुकी है.

2 साल पहले वह ईद के दिन जानबूझ कर ऐसे समय में पिंकी के घर गया, जब सुनील घर पर नहीं था. अनवर को देख कर पिंकी ने मुसकराते हुए उसे ईद की बधाई दी.

‘‘अपनी मुबारकबाद अपने पास ही रखिए, मुझे नहीं चाहिए.’’ अनवर ने गुस्सा होने का नाटक करते हुए कहा. ‘‘क्यों, मेरी मुबारकबाद में ऐसा क्या खोट है जो तुम्हें नहीं चाहिए?’’ पिंकी ने पूछा.

‘‘अरे, मुबारकबाद देनी ही है तो गले मिल कर दो. मालूम है आज सुबह से मैं ने किसी को मुबारकबाद नहीं दी. छिप कर घर में बैठा था कि सब से पहले आप से ही मुबारकबाद लूंगा. इसलिए मुबारकबाद देनी है तो गले मिल कर दो.’’

‘‘अच्छा बाबा, अंदर आ जाओ या बाहर दुनिया के सामने गले लगूंगी.’’ कहते हुए पिंकी उसे अपने साथ अंदर ले आई. फिर गहरी सांस लेते हुए उस के गले से लिपट गई.

अनवर को इसी मौके का इंतजार था. इस के बाद वह समझ गया कि पिंकी पूरी तरह उस के जाल में फंस चुकी है. इसलिए उस ने पिंकी को तभी अपनी बांहों से दूर किया, जब उस ने अगले दिन दोपहर में मिल कर उस के साथ एकांत में कुछ पल बिताने का वादा किया.

पिंकी की हां सुनते ही अनवर ने जेब से नया चमचमाता मोबाइल फोन निकाल कर उस के हाथ में देते हुए कहा, ‘‘ये लो दीवाने का ईद का पहला तोहफा. जब भी मौका मले मुझे फोन लगा दिया करो.’’

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पिंकी ने उस के हाथ से मोबाइल ले कर चुपचाप छिपा कर रख दिया. ताकि उस पर सुनील की नजर न पड़े. पूरी रात पिंकी और अनवर ने अपनेअपने घरों में बेचैनी से काटी दूसरे दिन सुबह होते ही जब सुनील दुकान पर जाने के लिए घर से निकला, पिंकी ने नए मोबाइल से अनवर को फोन लगा कर कह दिया कि वह दोपहर होने का इंतजार नहीं कर सकती, इसलिए वह अभी घर आ जाए.

अनवर को भला क्या ऐतराज हो सकता था, इसलिए वह उसी वक्त पिंकी के पास पहुंच गया. घर का दरवाजा बंद कर के उन्होंने 2 घंटे तक मौजमस्ती की. इस के बाद तो यह रोज का सिलसिला हो गया. कभी सुबह तो कभी शाम को तो कभी दोपहर में मौका मिलते ही पिंकी अनवर को फोन लगा कर घर आने का न्यौता दे देती थी. कभीकभी फोन कर के अनवर खुद उस के पास पहुंच जाता था.

कहानी 2 साल तक नियमित रूप से चलती रही. नतीजतन पहले मोहल्ले वालों को और फिर सुनील को पिंकी और अनवर के रिश्ते पर शक होने लगा. सुनील को जब यह लगने लगा कि पिंकी और अनवर के बीच में कुछ चल रहा है तो उस ने पिंकी से साफ कह दिया कि मेरी गैरमौजूदगी में अनवर को घर की चौखट के अंदर न बुलाए. अगर वह आए भी तो बाहर से ही बात कर उसे चलता कर दे.

सुनील के इस फरमान के बाद अनवर और पिंकी की मौजमस्ती पर ब्रेक लग गया. क्योंकि पिंकी को शक था कि उस ने अगर अनवर को कमरे में अंदर आने दिया तो इस की खबर सुनील तक जरूर पहुंच जाएगी. इसलिए कुछ दिनों तक दोनों फोन पर ही बातें कर के मन को समझाते रहे.

लेकिन ऐसा कब तक चलता. अंतत: अनवर ने ही एक रास्ता निकाला. उस ने पिंकी के मिलन के लिए एक जगह तय कर ली. फिर तो पति का डर छोड़ कर पिंकी अनवर के पास उस जगह जाने लगी.

लेकिन इस दौरान पिंकी और अनवर दोनों ही डरे हुए रहते थे. इसी के मद्देनजर अनवर ने एक दिन पिंकी को सलाह दी कि यदि वह किसी तरह सुनील से छुटकारा पा ले तो वह उसे अपनी बेगम बनाने को राजी है. इतना ही नहीं, उस ने यह भी वादा किया कि वह उस से शादी करने के लिए अपना धर्म तक बदलने को तैयार है. पिंकी अनवर की बातों में आ गई. जिस के बाद दोनों ने सुनील से छुटकारा पाने के लिए उस की हत्या करने की ठान ली.

इसी बीच करवाचौथ का त्यौहार पास आ गया. पिंकी इस बार करवाचौथ अनवर के साथ मनाना चाहती थी, इसलिए उस ने अनवर से कहा कि करवाचौथ से पहले वह सुनील को रास्ते से हटा दे. लेकिन दोनों को मौका नहीं मिल पाया तो पिंकी ने करवाचौथ की रात में सुनील की हत्या करने की योजना अनवर को समझा दी. पिंकी की योजना अनवर को सही लगी. योजनानुसार अनवर ने नींद की गोलियां ला कर पिंकी को दे दीं.

करवाचौथ की रात पोंछा सिंदूर…

करवाचौथ की रात पिंकी ने दुलहन की तरह शृंगार किया और पूजा के बाद सुनील को नींद की गोलियां मिला दूध पीने को दिया. सुनील को दूध पीने की आदत नहीं थी, सो उस ने मना किया तो पिंकी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘हर करवाचौथ पर औरत की नई सुहागरात होती है, इसलिए कम से कम आज तो दूध पीने को मना मत करो.’’

जाहिर है पत्नी की ऐसी बात सुनील कैसे टालता. उस ने मुसकराते हुए एक ही बार में दूध का पूरा गिलास खाली कर दिया. यह देख कर पिंकी खुश हो गई और उसे बिस्तर पर लिटा कर बच्चों को सुलाने के बहाने दूसरे कमरे में चली गई. सुनील से उस ने कह दिया था कि बच्चों सुला कर आती है.

गोलियों के असर से सुनील कुछ ही देर में गहरी नींद में सो गया. यह देख कर पिंकी ने अनवर को फोन कर घर आने को कहा. अनवर ने सुनील की हत्या करने के बाद उस की लाश ठिकाने लगाने का भी प्लान बना लिया था, इसलिए योजना के अनुसार वह अपने ही घर के पास रहने वाले रफीक (परिवर्तित) नाम के नाबालिग लड़के को बुला कर पिंकी के यहां ले गया. पिंकी और अनवर ने गहरी नींद में सो रहे सुनील की गला दबा कर हत्या कर दी.

सुनील की हत्या करने के बाद अनवर को पिंकी के साथ मौजमस्ती करनी थी, इसलिए उस ने तब तक के लिए रफीक को दूसरे कमरे में भेज दिया. इस के बाद सुनील का शव पलंग से नीचे उतार कर पिंकी उसी पलंग पर अनवर को ले कर लेट गई.

लगभग घंटे भर बाद अनवर ने बिस्तर से उठ कर अपने कपड़े पहने और सुनील की लाश बोरे में भरी. फिर उस बोरे को वह रफीक की मदद से अपने खेत पर ले गया. जाने से पहले उस ने पिंकी को पूरा पाठ पढ़ा दिया कि पुलिस को क्या बोलना है. उस के घर का दरवाजा बाहर से बंद करता गया.

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अनवर ने नारायणपुर के अपने खेत में पहले ही शव दफन करने के लिए गड्ढा खोद रखा था, इसलिए उस ने लाश को खेत पर ले जा कर दफन करने के बाद पिंकी को मोबाइल पर काम हो जाने की खबर दे दी.

यह खबर पा कर पिंकी अनवर की बेगम बनने के सपने देखते हुए गहरी नींद में सो गई. योजना अनुसार पिंकी ने दूसरे दिन सुबह होने पर पड़ोसियों को आवाज लगा कर अपना दरवाजा खुलवाने के बाद सुनील के रात में लापता हो जाने की बात बता दी.

लोगों के दिमाग से सुनील के गायब होने की बात उतर जाए, इसलिए वह देवास छोड़ कर अपने बच्चों के साथ मायके में जा कर रहने लगी थी. उस की योजना 4-6 महीने बाद देवास वापस आ कर अनवर की बेगम बन कर रहने की थी, लेकिन सिविल लाइंस टीआई की टीम ने उस का सपना पूरा होने से पहले ही उसे और उस के प्रेमी के साथ गिरफ्तार कर लिया.

पिंकी और उस के प्रेमी अनवर शाह से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. नाबालिग रफीक से पूछताछ कर उसे बाल न्यायालय में पेश कर बाल सुधारगृह भेजा गया.

गांठ खुल गई: भाग 2

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‘‘यह कहने के लिए बुलाया है कि जो होना था वह हो गया. अब मुद्दे की बात करते हैं. सचाई यह है कि हम अब भी एकदूसरे को चाहते हैं. तुम मेरे लिए बेताब हो, मैं तुम्हारे लिए.

‘‘इसलिए शादी होेने तक हम रिश्ता बनाए रख सकते हैं. चाहोगे तो शादी के बाद भी मौका पा कर तुम से मिलती रहूंगी. ससुराल कोलकाता में ही है. इसलिए मिलनेजुलने में कोई परेशानी नहीं होगी.’’

श्रेया का चरित्र देख कर गौतम को इतना गुस्सा आया कि उस का कत्ल कर फांसी पर चढ़ जाने का मन हुआ. लेकिन ऐसा करना उस के वश में नहीं था. क्योंकि वह उसे अथाह प्यार करता था. उसे लगता था कि श्रेया को कुछ हो गया तो वह जीवित नहीं रह पाएगा.

उसे समझाते हुए उस ने कहा, ‘‘मुझे इतना प्यार करती हो तो शादी मुझ से क्यों नहीं कर लेतीं?’’

‘‘इस जमाने में शादी की जिद पकड़ कर क्यों बैठे हो? वह जमाना पीछे छूट गया जब प्रेमीप्रेमिका या पतिपत्नी एकदूसरे से कहते थे कि जिंदगी तुम से शुरू, तुम पर ही खत्म है.

‘‘अब तो ऐसा चल रहा है कि जब तक साथ निभे, निभाओ, नहीं तो अपनेअपने रास्ते चले जाओ. तुम खुद ही बोलो, मैं क्या कुछ गलत कह रही हूं? क्या आजकल ऐसा नहीं हो रहा है?

‘‘दरअसल, मैं सिर्फ कपड़ों से ही नहीं, विचारों से भी आधुनिक हूं. जमाने के साथ चलने में विश्वास रखती हूं. मैं चाहती हूं कि तुम भी जमाने के साथ चलो. जो मिल रहा है उस का भरपूर उपभोग करो. फिर अपने रास्ते चलते बनो.’’

श्रेया जैसे ही चुप हुई, गौतम ने कहा, ‘‘लगा था कि तुम्हें गलती का अहसास हो गया है. मुझ से माफी मांगना चाहती हो. पर देख रहा हूं कि आधुनिकता के नाम पर तुम सिर से पैर तक कीचड़ से इस तरह सन चुकी हो कि जिस्म से बदबू आने लगी है.

‘‘यह सच है कि तुम्हें अब भी अथाह प्यार करता हूं. इसलिए तुम्हें भूल जाना मेरे वश की बात नहीं है. लेकिन अब तुम मेरे दिल में शूल बन कर रहोगी, प्यार बन कर नहीं.’’

श्रेया ने गौतम को अपने रंग में रंगने की पूरी कोशिश की, परंतु उस की एक दलील भी उस ने नहीं मानी.

उस दिन से गौतम पहले से भी अधिक गमगीन हो गया.

इस तरह कुछ दिन और बीत गए. अचानक इषिता ने फोन पर बताया कि उस ने कोलकाता में ट्रांसफर करा लिया है. 3-4 दिनों में आ जाएगी.

3 दिनों बाद इषिता आ भी गई. गौतम के घर गई तो वह गहरी सोच में था.

उस ने आवाज दी. पर उस की तंद्रा भंग नहीं हुई. तब उसे झंझोड़ा और कहा, ‘‘किस सोच में डूबे हुए हो?’’

‘‘श्रेया की यादों से अपनेआप को मुक्त नहीं कर पा रहा हूं,’’ गौतम ने सच बता दिया.

इषिता गुस्से से उफन उठी, ‘‘इतना सबकुछ होने के बाद भी उसे याद करते हो? सचमुच तुम पागल हो गए हो?’’

‘‘तुम ने कभी किसी को प्यार नहीं किया है इषिता, मेरा दर्द कैसे समझ सकती हो.’’

‘‘कुछ घाव किसी को दिखते नहीं. इस का मतलब यह नहीं कि उस शख्स ने चोट नहीं खाई होगी,’’ इषिता ने कहा.

गौतम ने इषिता को देखा तो पाया कि उस की आंखें नम थीं. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारी आंखों में आंसू हैं. इस का मतलब यह है कि तुम ने भी प्यार में धोखा खाया है?’’

‘‘इसे तुम धोखा नहीं कह सकते. जिसे मैं प्यार करती थी उसे पता नहीं था.’’

‘‘यानी वन साइड लव था?’’

‘‘कुछ ऐसा ही समझो.’’

‘‘लड़का कौन था. निश्चय ही वह कालेज का रहा होगा?’’

इषिता उसे उलझन में नहीं रखना चाहती थी, रहस्य पर से परदा हटाते हुए कह दिया, ‘‘वह कोई और नहीं, तुम हो.’’

गौतम ने चौंक कर उसे देखा तो वह बोली, ‘‘कालेज में पहली बार जिस दिन तुम से मिली थी उसी दिन तुम मेरे दिल में घर कर गए थे. दिल का हाल बताती, उस से पहले पता चला कि तुम श्रेया के दीवाने हो. फिर चुप रह जाने के सिवा मेरे पास रास्ता नहीं था.

‘‘जानती थी कि श्रेया अच्छी लड़की नहीं है. तुम से दिल भर जाएगा, तो झट से किसी दूसरे का दामन थाम लेगी. आगाह करती, तो तुम्हें लगता कि अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए उस पर इलजाम लगा रही हूं. इसलिए तुम से दोस्ती कर ली पर दिल का हाल कभी नहीं बताया.

‘‘श्रेया के साथ तुम्हारा सबकुछ खत्म हो गया, तो सोचा कि मौका देख कर अपनी मोहब्बत का इजहार करूंगी और तुम से शादी कर लूंगी. पर देख रही हूं कि आज भी तुम्हारे दिल में वह ही है.’’

दोनों के बीच कुछ देर तक खामोशी पसर गई. गौतम ने ही थोड़ी देर बार खामोशी दूर की, ‘‘उसे दिल से निकाल नहीं पा रहा हूं, इसीलिए कभी शादी न करने का फैसला किया है.’’

‘‘तुम्हें पाने के लिए मैं ने जो तपस्या की है उस का फल मुझे नहीं दोगे?’’ इषिता का स्वर वेदना से कांपने लगा था. आंखें भी डबडबा आई थीं.

‘‘मुझे माफ कर दो इषिता. तुम बहुत अच्छी लड़की हो. तुम से विवाह करता तो मेरा जीवन सफल हो जाता. पर मैं दिल के हाथों मजबूर हूं. किसी से भी शादी नहीं कर सकता.’’

इषिता चली गई. उस की आंखों में उमड़ा वेदना का समंदर देख कर भी वह उसे रोक नहीं पाया. वह उसे कैसे समझाता कि श्रेया ने उस के साथ जो कुछ भी किया है, उस से समस्त औरत जाति से उसे नफरत हो गई है.

3 दिन बीत गए. इषिता ने न फोन किया न आई. गौतम सोचने लगा, ‘कहीं नाराज हो कर उस ने दोस्ती तोड़ने का मन तो नहीं बना लिया है?’

उसे फोन करने को सोच ही रहा था कि अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. उस समय शाम के 6 बज रहे थे. फोन किसी अनजान का था.

उस ने ‘‘हैलो’’ कहा तो उधर से किसी ने कहा, ‘‘इषिता का पापा बोल रहा हूं. तुम से मिलना चाहता हूं. क्या हमारी मुलाकात हो सकती है?’’

उस ने झट से कहा, ‘‘क्यों नहीं अंकल. कहिए, कहां आ जाऊं?’’

‘‘तुम्हें आने की जरूरत नहीं है बेटे. 7 बजे तक मैं ही तुम्हारे घर आ जाता हूं.’’

इषिता उसे 3-4 बार अपने घर ले गई थी. वह उस के मातापिता से मिल चुका था.

उस के पिता रेलवे में उच्च पद पर थे. बहुत सुलझे हुए इंसान थे. वह उन की इकलौती संतान थी. मां कालेज में अध्यापिका थीं. बहुत समझदार थीं. कभी भी उस के और इषिता के रिश्ते पर शक नहीं किया था.

इषिता के पापा समय से पहले ही आ गए. गौतम के साथसाथ उस की मां और बहन ने भी उन का भरपूर स्वागत किया.

उन्होंने मुद्दे पर आने में बहुत देर नहीं लगाई. पर उन चंद लमहों में ही अपने शालीन व्यक्तित्व की खुशबू से पूरे घर को महका दिया था. इतनी आत्मीयता उड़ेल दी थी वातावरण में कि उसे लगने लगा कि उन से जनमजनम का रिश्ता है.

कुछ देर बाद इषिता के पापा को गौतम के साथ कमरे में छोड़ कर मां और बहन चली गईं तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, इषिता तुम्हें प्यार करती है और शादी करना चाहती है. उस ने श्रेया के बारे में भी सबकुछ बता दिया है.

‘‘श्रेया से तुम्हारा रिश्ता टूट चुका है तो इषिता से शादी क्यों नहीं करना चाहते? वैसे तो बिना कारण भी कोई किसी को नापसंद कर सकता है. यदि तुम्हारे पास इषिता से विवाह न करने का कारण है तो बताओ. मिलबैठ कर कारण को दूर करने की कोशिश करें.’’

उसे लगा जैसे अचानक उस के मन में कोई बड़ी सी शिला पिघलने लगी है. उस ने मन की बात बता देना ही उचित समझा.

‘‘इषिता में कोई कमी नहीं है अंकल. उस से जो भी शादी करेगा उस का जीवन सार्थक हो जाएगा. कमी मुझ में है. श्रेया से धोखा खाने के बाद लड़कियों से मेरा विश्वास उठ गया है.

‘‘लगता है कि जिस से भी शादी करूंगा वह भी मेरे साथ बेवफाई करेगी. ऐसा भी लगता है कि श्रेया को कभी भूल नहीं पाऊंगा और पत्नी को प्यार नहीं कर पाऊंगा,’’ गौतम ने दिल की बात रखते हुए बताया.

‘‘इतनी सी बात के लिए परेशान हो? तुम मेरी परवरिश पर विश्वास रखो बेटा. तुम्हारी पत्नी बन कर इषिता तुम्हें इतना प्यार करेगी कि तुम्हारे मन में लड़कियों के प्रति जो गांठ पड़ गई है वह स्वयं खुल जाएगी.’’

वे बिना रुके कहते रहे, ‘‘प्यार या शादी के रिश्ते में मिलने वाली बेवफाई से हर इंसान दुखी होता है, पर यह दुख इतना बड़ा भी नहीं है कि जिंदगी एकदम से थम जाए.

‘‘किसी एक औरतमर्द या लड़कालड़की से धोखा खाने के बाद दुनिया के तमाम औरतमर्द या लड़केलड़की को एकजैसा समझना सही नहीं है.

‘‘यह जीवन का सब से बड़ा सच है कि कोई भी रिश्ता जिंदगी से बड़ा नहीं होता. यह भी सच है कि हर प्रेम संबंध का अंजाम शादी नहीं होता.

‘‘जीवन में हर किसी को अपना रास्ता चुनने का अधिकार है. यह अलग बात है कि कोई सही रास्ता चुनता है कोई गलत.

‘‘श्रेया के मन में गलत विचार भरे पड़े थे. इसलिए चंद कदम तुम्हारे साथ चल कर अपना रास्ता बदल लिया. अब तुम भी उसे भूल कर जीने की सही राह पर आ जाओ. गिरते सब हैं पर जो उठ कर तुरंत अपनेआप को संभाल लेता है, सही माने में वही साहसी है.’’

थोड़ी देर बाद इषिता के पापा चले गए. गौतम ने मंत्रमुग्ध हो कर उन की बातें सुनी थीं.

श्रेया के कारण लड़कियों के प्रति मन में जो गांठ पड़ गई थी वह खुल गई.

अब देर करना उस ने मुनासिब नहीं समझा. इषिता के पापा को फोन किया, ‘‘अंकल, कल अपने घर वालों के साथ इषिता का हाथ मांगने आप के घर आना चाहता हूं.’’

उधर से इषिता के पापा ने कहा, ‘‘वैलकम बेटे. देर आए दुरुस्त आए. अब तुम्हें आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. तुम ने अपने भीतर के डर पर विजय जो प्राप्त कर ली है.’’

गांठ खुल गई: भाग 1

श्रेया से गौतम की मुलाकात सब से पहले कालेज में हुई थी. जिस दिन वह कालेज में दाखिला लेने गया था, उसी दिन वह भी दाखिला लेने आई थी.

वह जितनी सुंदर थी उस से कहीं अधिक स्मार्ट थी. पहली नजर में ही गौतम ने उसे अपना दिल दे दिया था.

गौतम टौपर था. इस के अलावा क्रिकेट भी अच्छा खेलता था. बड़ेबड़े क्लबों के साथ खेल चुका था. उस के व्यक्तित्व से कालेज की कई लड़कियां प्रभावित थीं. कुछ ने तो खुल कर मोहब्बत का इजहार तक कर दिया था.

उस ने किसी का भी प्यार स्वीकार नहीं किया था. करता भी कैसे? श्रेया जो उस के दिल में बसी हुई थी.

श्रेया भी उस से प्रभावित थी. सो, उस ने बगैर देर किए उस से ‘आई लव यू’ कह दिया.

वह कोलकाता के नामजद अमीर परिवार से थी. उस के पिता और भाई राजनीति में थे. उन के कई बिजनैस थे. दौलत की कोई कमी न थी.

गौतम के पिता पंसारी की दुकान चलाते थे. संपत्ति के नाम पर सिर्फ दुकान थी. जिस मकान में रहते थे, वह किराए का था. उन की एक बेटी भी थी. वह गौतम से छोटी थी.

अपनी हैसियत जानते हुए भी गौतम, श्रेया के साथ उस के ही रुपए पर उड़ान भरने लगा था. उस से विवाह करने का ख्वाब देखने लगा था.

कालांतर में दोनों ने आधुनिक रीति से तनमन से प्रेम प्रदर्शन किया. सैरसपाटे, मूवी, होटल कुछ भी उन से नहीं छूटा. मर्यादा की सारी सीमा बेहिचक लांघ गए थे.

2 वर्ष बीत गए तो गौतम ने महसूस किया कि श्रेया उस से दूर होती जा रही है. वह कालेज के ही दूसरे लड़के के साथ घूमने लगी थी. उसे बात करने का भी मौका नहीं देती थी.

बड़ी मुश्किल से एक दिन मौका मिला तो उस से कहा, ‘‘मुझे छोड़ कर गैरों के साथ क्यों घूमती हो? मुझ से शादी करने का इरादा नहीं है क्या?’’

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श्रेया ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘कभी कहा था कि तुम से शादी करूंगी?’’

वह तिलमिला गया. किसी तरह गुस्से को काबू में कर के बोला, ‘‘कहा तो नहीं था पर खुद सोचो कि हम दोनों में पतिपत्नी वाला रिश्ता बन चुका है तो शादी क्यों नहीं कर सकते हैं?’’

‘‘मैं ऐसा नहीं मानती कि किसी के साथ पतिपत्नी वाला रिश्ता बन जाए तो उसी से विवाह करना चाहिए.

‘‘मेरा मानना है कि संबंध किसी से भी बनाया जा सकता है, पर शादी अपने से बराबर वाले से ही करनी चाहिए. शादी में दोनों परिवारों के आर्थिक व सामाजिक रुतबे पर ध्यान देना अनिवार्य होता है.

‘‘तुम्हारे पास यह सब नहीं है. इसलिए शादी नहीं कर सकती. तुम्हारे लिए यही अच्छा होगा कि अब मेरा पीछा करना बंद कर दो, नहीं तो अंजाम बुरा होगा.’’

श्रेया की बात गौतम को शूल की तरह चुभी. लेकिन उस ने समझदारी से काम लेते हुए उसे समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी.

आखिरकार, उसे लगा कि श्रेया किसी के बहकावे में आ कर रिश्ता तोड़ना चाहती है. उस ने सोचा, ‘उस के घर वालों को सचाई बता दूंगा तो सब ठीक हो जाएगा. परिजनों के कहने पर उसे मुझ से विवाह करना ही होगा.’

एक दिन वह श्रेया के घर गया. उस के पिता व भाई को अपने और उस के बारे में सबकुछ बताया.

श्रेया अपने कमरे में थी. भाई ने बुलाया. वह आई. भाई ने गौतम की तरफ इंगित कर उस से पूछा, ‘‘इसे पहचानती हो?’’

श्रेया सबकुछ समझ गई. झट से अपने बचाव का रास्ता भी ढूंढ़ लिया. बगैर घबराए कहा, ‘‘यह मेरे कालेज में पढ़ता है. इसे मैं जरा भी पसंद नहीं करती. किंतु यह मेरे पीछे पड़ा रहता है. कहता है कि मुझ से शादी नहीं करोगी तो इस तरह बदनाम कर दूंगा कि मजबूर हो कर शादी करनी ही पड़ेगी.’’

वह कहता रहा कि श्रेया झूठ बोल रही है परंतु उस के भाई और पिता ने एक न सुनी. नौकरों से उस की इतनी पिटाई कराई कि अधमरा हो गया. पैरों की हड्डियां टूट गईं.

किसी पर किसी तरह का इलजाम न आए, इसलिए गौतम को अस्पताल में दाखिल करा दिया गया.

थाने में श्रेया द्वारा यह रिपोर्ट लिखा दी गई, ‘घर में अकेली थी. अचानक गौतम आया और मेरा रेप करने की कोशिश की. उसी समय घर के नौकर आ गए. उस की पिटाई कर मुझे बचा लिया.’

थाने से खबर पाते ही गौतम के पिता अस्पताल आ गए. गौतम को होश आया तो सारा सच बता दिया.

सिर पीटने के सिवा उस के पिता कर ही क्या सकते थे. श्रेया के परिवार से भिड़ने की हिम्मत नहीं थी.

उन्होंने गौतम को समझाया, ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ. अस्पताल से वापस आ कर पढ़ाई पर ध्यान लगाना. कोशिश करूंगा कि तुम पर जो मामला है, वापस ले लिया जाए.’’

उन्होंने सोर्ससिफारिश की तो श्रेया के पिता ने मामला वापस ले लिया.

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अस्पताल में गौतम को 5 माह रहना पड़ा. वे 5 माह 5 युगों से भी लंबे थे. कैलेंडर की तारीखें एकएक कर के उस के सपनों के टूटने का पैगाम लाती रही थीं.

उसे कालेज से निकाल दिया गया तो दोस्तों ने भी किनारा कर लिया. महल्ले में भी वह बुरी तरह बदनाम हो चुका था. कोई उसे देखना नहीं चाहता था.

श्रेया के आरोप पर किसी को विश्वास नहीं हुआ तो वह थी इषिता. वह उसी कालेज में पढ़ती थी और गौतम की दोस्त थी. वह अस्पताल में उस से मिलने बराबर आती रही. उसे हर तरह से हौसला देती रही.

गौतम घर आ गया तो भी इषिता उस से मिलने घर आती रही. शरीर के घाव तो कुछ दिनों में भर गए पर आत्मसम्मान के कुचले जाने से उस का आत्मविश्वास टूट चुका था.

मन और आत्मविश्वास के घावों पर कोई औषधि काम नहीं कर रही थी. गौतम ने फैसला किया कि अब आगे नहीं पढ़ेगा.

परिजनों तथा शुभचिंतकों ने बहुत समझाया लेकिन वह फैसले से टस से मस नहीं हुआ.

इस मामले में उस ने इषिता की भी नहीं सुनी. इषिता ने कहा था, ‘‘ पढ़ना नहीं चाहते हो तो कोई बात नहीं. क्रिकेट में ही कैरियर बनाओ.’’

‘‘मेरा आत्मविश्वास टूट चुका है. कुछ नहीं कर सकता. इसलिए मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो,’’ उस ने दोटूक जवाब दिया था.

वह दिनभर चुपचाप घर में पड़ा रहता था. घर के लोगों से भी ठीक से बात नहीं करता था. किसी रिश्तेदार या दोस्त के घर भी नहीं जाता था. हर समय चिंता में डूबा रहता.

पहले छुट्टियों में पिता की दुकान संभालता था. अब पिता के कहने पर भी दुकान पर नहीं जाता था. उसे लगता था कि दुकान पर जाएगा तो महल्ले की लड़कियां उस पर छींटाकशी करेंगी तो वह बरदाश्त नहीं कर पाएगा.

इसी तरह घटना को 2 वर्ष बीत गए. इषिता ने ग्रैजुएशन कर ली. जौब की तलाश की, तो वह भी मिल गई. बैक में जौब मिली थी. पोस्टिंग मालदह में हुई थी.

जाते समय इषिता ने उस से कहा, कोलकाता से जाने की इच्छा तो नहीं है पर सवाल जिंदगी का है. जौब तो करनी ही पड़ेगी, पर 6-7 महीने में ट्रांसफर करा कर आ जाऊंगी. विश्वास है कि तब तक श्रेया को दिल से निकाल फेंकने में सफल हो जाओगे.

इषिता मालदह चली गई तो गौतम पहले से अधिक अवसाद में आ गया. तब उस के मातापिता ने उस की शादी करने का विचार किया.

मौका देख कर मां ने उस से कहा, ‘‘जानती हूं कि इषिता सिर्फ तुम्हारी दोस्त है. इस के बावजूद यह जानना चाहती हूं कि यदि वह तुम्हें पसंद है तो बोलो, उस से शादी की बात करूं?’’

‘‘वह सिर्फ मेरी दोस्त है. हमेशा दोस्त ही रहेगी. रही शादी की बात, तो कभी किसी से भी शादी नहीं करूंगा. यदि किसी ने मुझ पर दबाव डाला तो घर छोड़ कर चला जाऊंगा.’’

गौतम ने अपना फैसला बता दिया तो मां और पापा ने उस से फिर कभी शादी के लिए नहीं कहा. उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

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लेकिन एक दोस्त ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘श्रेया से तुम्हारी शादी नहीं हो सकती, यह अच्छी तरह जानते हो. फिर जिंदगी बरबाद क्यों कर रहे हो? किसी से विवाह कर लोगे तो पत्नी का प्यार पा कर अवश्य ही उसे भूल जाओगे.’’

‘‘जानता हूं कि तुम मेरे अच्छे दोस्त हो. इसलिए मेरे भविष्य की चिंता है. परंतु सचाई यह है कि श्रेया को भूल पाना मेरे वश की बात नहीं है.’’

दोस्त ने तरहतरह से समझाया. पर वह किसी से भी शादी करने के लिए राजी नहीं हुआ.

इषिता गौतम को सप्ताह में 2-3 दिन फोन अवश्य करती थी. वह उसे बताता था कि जल्दी ही श्रेया को भूल जाऊंगा. जबकि हकीकत कुछ और ही थी.

हकीकत यह थी कि इषिता के जाने के बाद उस ने कई बार श्रेया को फोन लगाया था. पर लगा नहीं था. घटना के बाद शायद उस ने अपना नंबर बदल लिया था.

न जाने क्यों उस से मिलने के लिए वह बहुत बेचैन था. समझ नहीं पा रहा था कि कैसे मिले. अंजाम की परवा किए बिना उस के घर जा कर मिलने को वह सोचने लगा था.

तभी एक दिन श्रेया का ही फोन आ गया. बहुत देर तक विश्वास नहीं हुआ कि उस का फोन है.

विश्वास हुआ, तो पूछा, ‘‘कैसी हो?’’

‘‘तुम से मिल कर अपना हाल बताना चाहती हूं. आज शाम के 7 बजे साल्ट लेक मौल में आ सकते हो?’’ उधर से श्रेया ने कहा.

खुशी से लबालब हो कर गौतम समय से पहले ही मौल पहुंच गया. श्रेया समय पर आई. वह पहले से अधिक सुंदर दिखाई पड़ रही थी.

उस ने पूछा, ‘‘मेरी याद कभी आई थी?’’

‘‘तुम दिल से गई ही कब थीं जो याद आतीं. तुम तो मेरी धड़कन हो. कई बार फोन किया था, लगा नहीं था. लगता भी कैसे, तुम ने नंबर जो बदल लिया था.’’

उस का हाथ अपने हाथ में ले कर श्रेया बोली, ‘‘पहले तो उस दिन की घटना के लिए माफी चाहती हूं. मुझे इस का अनुमान नहीं था कि मेरे झूठ को पापा और भैया सच मान कर तुम्हारी पिटाई करा देंगे.

‘‘फिर कोई लफड़ा न हो जाए, इस डर से पापा ने मेरा मोबाइल ले लिया. अकेले घर से बाहर जाना बंद कर दिया गया.

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‘‘मुंबई से तुम्हें फोन करने की कोशिश की, परंतु तुम्हारा नंबर याद नहीं आया. याद आता तो कैसे? घटना के कारण सदमे में जो थी.

‘‘फिलहाल वहां ग्रैजुएशन करने के बाद 3 महीने पहले ही आई हूं. बहुत कोशिश करने पर तुम्हारे एक दोस्त से तुम्हारा नंबर मिला, तो तुम्हें फोन किया. मेरी सगाई हो गई है. 3 महीने बाद शादी हो जाएगी.

लाश को मिला नाम

पंचकूला के थाना मनसादेवी के पास सेक्टर-5 के निकट मजदूरों और कामगारों ने अपने रहने के लिए कच्चे झोपड़ीनुमा मकान बना रखे हैं. 27 अप्रैल, 2019 की सुबह 6 बजे इन्हीं झुग्गियों की कुछ महिलाएं जंगल की तरफ गईं तो उन्होंने झाडि़यों के बीच एक लाश से धुआं उठते देखा.

यह देखते ही महिलाएं उलटे पांव भागती हुई बस्ती में लौट आईं. उन्होंने शोर मचा कर यह बात सब को बताई. लाश के जलने की बात सुन कर बस्ती के लोग महिलाओं द्वारा बताई जगह पर पहुंच गए. उन्होंने भी वहां एक लाश से धुआं उठते देखा. लाश बुरी तरह झुलस चुकी थी.

इसी दौरान किसी ने पुलिस कंट्रोलरूम को फोन किया. चंडीगढ़ पुलिस कंट्रोलरूम ने घटना की सूचना संबंधित थाना मनीमाजरा को भेज दी. थोड़ी देर बाद थाना मनीमाजरा पुलिस मौके पर पहुंची तो उस ने बताया कि जिस जगह लाश पड़ी है, वह क्षेत्र हरियाणा के पंचकूला इलाके में आता है.

मनीमाजरा पुलिस ने यह खबर पंचकूला के थाना मनसादेवी को भेज दी. सूचना मिलने पर थाना मनसादेवी के एसएचओ विजय कुमार अपनी टीम के साथ तुरंत मौके पर पहुंच गए. साथ ही उन्होंने घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी दी.

कुछ ही देर में डीसीपी कमलदीप गोयल, एसीपी (क्राइम) नुपूर बिश्नोई, पंचकूला क्राइम इनवैस्टीगेशन एजेंसी के प्रभारी अमन कुमार फोरैंसिक टीम सहित मौके पर पहुंच गए. जिस लाश के बारे में सूचना दी गई थी, वह मनसादेवी कौंप्लेक्स, विश्वकर्मा मंदिर की बैक साइड पर थाना मनसादेवी से मात्र 500 मीटर की दूरी पर झाडि़यों में पड़ी थी.

पुलिस जब वहां पहुंची, तब भी शव से धुआं उठ रहा था. इस से पुलिस को लगा कि कुछ देर पहले ही शव में आग लगाई गई थी. वह लाश किसी युवती की थी. पुलिस ने मौके पर देखा कि उस के गले में फंदा लगा हुआ था. युवती की जीभ भी बाहर निकली हुई थी और टांगें पूरी तरह फैली हुई थीं. यह सब देख कर दुष्कर्म की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता था.

मौके पर पहुंची फोरैंसिक टीम ने भी वहां से कुछ सबूत जुटाए. झाडि़यों पर पड़ी बोरी भी कब्जे में ले ली गई. पुलिस की प्राथमिक जांच में सामने आया कि युवती की किसी अन्य जगह पर गला घोंट कर हत्या करने के बाद शव को यहां ठिकाने लगाने की कोशिश की गई थी.

शिनाख्त जरूरी थी

झाडि़यों के पास कच्चे रास्ते पर किसी दोपहिया वाहन के टायरों के निशान भी मिले. ऐसा लगता था, युवती का शव किसी वाहन से वहां तक लाया गया होगा. पुलिस को लगा, जब हत्यारे शव लाए होंगे तो कहीं न कहीं किसी सीसीटीवी कैमरे में कैद जरूर हुए होंगे. युवती के शरीर पर घाव के कई निशान भी मिले.

बहरहाल, मनसादेवी थाना पुलिस ने घटनास्थल पर सब से पहले पहुंचे पीसीआर में तैनात हैडकांस्टेबल सतीश की सूचना पर हत्या और लाश को ठिकाने लगाने की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. शव को सेक्टर-6 जनरल अस्पताल की मोर्चरी में 72 घंटों के लिए सुरक्षित रखवा दिया गया.

लाश इतनी बुरी तरीके से जल चुकी थी कि उस की शिनाख्त करनी बहुत मुश्किल थी. पुलिस के सामने पहला अहम काम था शव की शिनाख्त कराना. उस के बाद ही हत्यारों तक पहुंचा जा सकता था.

पुलिस ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों को चैक किया. चंडीगढ़ पुलिस से भी घटनास्थल के रास्ते की तरफ आने वाले क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों को चैक करने की सहायता मांगी गई. इस काम में सीआईए, सेक्टर-19, क्राइम ब्रांच और कई थानों की टीमें लगी थीं.

मृतका के फोटो भी सभी थानों में भिजवा दिए गए थे और पिछले माह लापता हुई 20 से 30 साल की युवतियों के रिकौर्ड भी खंगाले गए. इस के अलावा अधजले शव की पहचान के लिए डीसीपी कमलदीप गोयल के आदेश पर पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू कश्मीर की पुलिस को भी सूचना भेज दी गई.

सीआईए इंसपेक्टर अमन कुमार ने सीसीटीवी कैमरे में दिखने वाली एक कार के चालक को हिरासत में ले लिया था, लेकिन लंबी पूछताछ के बाद जब उस से हत्या के संबंध में कोई क्लू नहीं मिला तो उसे छोड़ दिया गया. वहीं मनसादेवी थाना पुलिस ने भी इस मामले में कई संदिग्ध लोगों को हिरासत में ले कर उन से पूछताछ की, पर कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस इस मामले की हर पहलू से जांच कर रही थी.

कार चालक को सीआईए ने भले ही छोड़ दिया था, लेकिन उसे क्लीन चिट नहीं दी थी क्योंकि उस की काले रंग की अल्टो कार की लोकेशन आईटी पार्क से मनसादेवी कौंप्लेक्स के बीच रात एक से 3 बजे के बीच ट्रेस की गई थी.

पुलिस ने मृतका की शिनाख्त के लिए गलीगली में उस के पोस्टर लगवा दिए थे, इस के अलावा विभिन्न अखबारों, लोकल टीवी चैनलों पर भी उस की फोटो दिखाई गई थी. इस का नतीजा यह निकला कि लाश मिलने के 2 दिन बाद अखबार से खबर पढ़ कर इंदिरा कालोनी निवासी लल्लन प्रसाद थाना मनसादेवी पहुंच गया. उस ने एसएचओ से कहा, ‘‘साहब, अखबार में जो अधजली लाश बरामद होने की खबर छपी है, वह लाश मेरी बेटी गुरप्रीत की है.’’

लल्लन की बात सुन कर एसएचओ ने उस से पूछा, ‘‘आप को किसी पर शक है?’’

‘‘हां साहब, मुझे शक नहीं विश्वास है कि यह काम मेरी बेटी के प्रेमी ने किया होगा.’’ लल्लन ने फूटफूट कर रोते हुए यह बात पुलिस को बताई.

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लल्लन ने बताया कि उस की बेटी गुरप्रीत नौवीं कक्षा में पढ़ती थी. उस का प्रेम प्रसंग इंदिरा कालोनी के ही रहने वाले एक लड़के से चल रहा था. वह लड़का दूसरी बिरादरी का था, इसलिए हम ने अपनी बेटी को समझाया और जब वह नहीं मानी तो हम ने 2 महीने पहले उस की मंगनी अपनी रिश्तेदारी के एक लड़के के साथ तय कर दी थी.

वह 23 मार्च, 2019 को सुबह 8 बजे स्कूल जाने के लिए घर से निकली थी. लेकिन शाम तक नहीं लौटी. हम ने भी इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया, क्योंकि गुरप्रीत इस से पहले भी अपने प्रेमी के साथ घर से चोरीछिपे कई बार जा चुकी थी. लेकिन 1-2 दिन बाद वह अपने आप ही घर लौट आती थी. उन्हें उम्मीद थी कि इस बार भी वह 1-2 दिन में लौट आएगी. पर इस बार ऐसा नहीं हुआ.

जब 2 दिन तक वह घर नहीं लौटी तो हम ने पहले तो रिश्तेदारी में बेटी की तलाश की, लेकिन जब उस का कहीं कुछ पता नहीं चला तो चंडीगढ़ के मनीमाजरा थाने में उस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी. वह तो नहीं मिली लेकिन इस बार उस की मौत की खबर जरूर मिल गई.

हालांकि पहले तो पुलिस ने उस की बातों पर विश्वास नहीं किया, लेकिन जब युवती की फोटो सीआईए प्रभारी के पास पहुंची तो वह भी दंग रह गए.

पहचान ली गई लाश

उन्होंने तुरंत वह फोटो मनसादेवी थानाप्रभारी को भेजी और दावा करने वाले व्यक्ति को एसएचओ विजय कुमार के पास भेज दिया. विजय कुमार ने उसे मोर्चरी में रखी झुलसी हुई लाश को पहचानने के लिए अस्पताल चलने को कहा. इस पर लल्लन अपनी पत्नी प्रभा के साथ अस्पताल पहुंच गया.

दोनों को मोर्चरी में रखी लाश दिखाई दी तो लल्लन प्रसाद और उस की पत्नी प्रभा ने लाश को पहचान कर उस की शिनाख्त अपनी बेटी गुरप्रीत के रूप में की. अखबारों से मिली जानकारी के बाद उसी दिन अधजले शव की पहचान के लिए अस्पताल में 60 से अधिक लोग पहुंचे थे, जिस में ट्राइसिटी के अलावा पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर आदि जगहों के लोग भी शामिल थे, जिन की बेटियां, पत्नियां पिछले कुछ महीनों से लापता थीं. लेकिन शव की शिनाख्त उन में से किसी ने भी नहीं की थी.

30 अप्रैल, 2019 को डाक्टरों के पैनल ने लाश का पोस्टमार्टम किया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया कि मृतका की हत्या गला घोंट कर की गई थी और उस के पेट में चाकू से 3 वार भी किए गए थे. महिला 5 माह की गर्भवती थी. अंत में कागजी काररवाई करने के बाद उस की लाश लल्लन के हवाले कर दी गई थी. उसी दिन उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया गया था.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस को अब लल्लन की बेटी के हत्यारों और हत्या के कारण का पता लगाना था. इस के पहले कि इस मामले में पुलिस आगे कुछ कर पाती, अगले दिन दिनांक 30 अप्रैल को कहानी में एक नया मोड़ आ गया.

कहानी में आया नया मोड़

इस ट्विस्ट से पंचकूला पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई. लल्लन अपनी जिस बेटी गुरप्रीत का अंतिम संस्कार कर चुका था, वही गुरप्रीत अपने गायब होने के करीब 38 दिनों बाद 30 अप्रैल को रात करीब 9 बजे आईटी थाने में अचानक पहुंच गई. उस ने पुलिस को बताया कि मैं जिंदा हूं, मेरे प्रेमी को बेवजह मेरी हत्या के आरोप में फंसाया जा रहा है. इस में मेरे पिता की कोई चाल हो सकती है. गुरप्रीत ने बताया कि वह जहां भी गई थी, अपनी मरजी से गई थी. जब उस ने समाचारपत्रों में अपनी हत्या की खबर पढ़ी तो वह हैरान रह गई. इसलिए सच्चाई बताने के लिए वह सीधे थाने चली आई.

आईटी थानाप्रभारी लखबीर सिंह ने इस बात की सूचना एसएचओ मनसादेवी को देने के बाद देर रात तक गुरप्रीत से पूछताछ की. अगले दिन यानी पहली मई को उस का मैडिकल करवाने के बाद उसे सिटी मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर उस का इकबालिया बयान दर्ज करवाया.

एसएचओ मनसादेवी विजय कुमार ने जब लल्लन और उस की पत्नी प्रभा को थाने बुला कर इस बारे में पूछा तो वह गिड़गिड़ा कर कहने लगा, ‘‘साहब, आप ने लाश और उस के जो फोटो हमें दिखाए थे, उस के नाक और कान मेरी बेटी से बिलकुल मिलते थे. इसीलिए हम ने उसे अपनी बेटी की लाश समझा.’’

लल्लन तो इतनी बात कह कर बच निकला पर पंचकूला पुलिस को इस मामले से बचना इतना आसान नहीं था. उस की खिल्ली उड़ रही थी. बहरहाल, गुरप्रीत के लौट आने से लल्लन और चंडीगढ़ पुलिस ने तो चैन की सांस ली पर पंचकूला पुलिस की मुश्किलें बढ़ गई थीं.

लल्लन के गलत शिनाख्त करने के बाद पुलिस ने मृतका को गुरप्रीत मान कर उस का अंतिम संस्कार करवा दिया था और आस लगाए बैठी थी कि लाश की शिनाख्त हो गई है तो उस के हत्यारे भी जल्द पकड़े जाएंगे, पर नए हालात में पुलिस के हाथ खाली थे.

पुलिस एक ऐसी अंधेरी खाई में घुस चुकी थी, जहां से जल्दी निकलना संभव नहीं था. न तो पुलिस के पास मृतका के बारे में कोई जानकारी थी और न हत्यारों का कोई सुराग. कुल मिला कर पुलिस को इस ब्लाइंड केस को सुलझाने के लिए नए सिरे से तहकीकात करनी थी. क्योंकि मृतका गर्भवती थी, इसलिए पुलिस अब इसे औनर किलिंग के एंगल से भी देख रही थी.

दूसरी ओर लल्लन की बेटी के वापस आने से उस के तथाकथित प्रेमी की मां ताज ने अपने रिश्तेदारों और मोहल्ले वालों के साथ थाने जा कर हंगामा खड़ा कर दिया और थाने में बैठे लल्लन और उस की पत्नी प्रभा को आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘मैं कहती थी न कि मेरा बेटा ऐसा कभी नहीं कर सकता, वह गुरप्रीत से सच्ची मोहब्बत करता है, उस की हत्या नहीं कर सकता. लल्लन और उस के परिवार ने पुरानी रंजिश निकालने के  लिए मेरे बेटे को फंसाने की कोशिश की है.’’

आखिर लाश की हो गई शिनाख्त

अब थाना मनसादेवी पुलिस इस की जांच करने में जुट गई कि आखिर वह युवती कौन थी, जिस का अंतिम संस्कार लल्लन ने अपनी बेटी गुरप्रीत जान कर किया. थोड़ी कोशिश के बाद मनसादेवी पुलिस को मृतका के बारे में एक छोटी सी जानकारी मिली.

पता चला कि वह लाश सूरजपुर की रहने वाली किसी युवती की थी. पुलिस जब सूरजपुर पहुंची तो वहां मृतका का पिता ऋषिपाल मिला. मनसादेवी पुलिस ने ऋषिपाल से बात की तो उस ने बताया कि उस की बेटी आरती 26 अप्रैल की रात से लापता है. उस ने पुलिस में गुमशुदगी दर्ज करा दी है.

इस बार पुलिस कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. पुलिस ने युवती की झुलसी हुई लाश के जो सैंपल सुरक्षित रखे हुए थे, उन से ऋषिपाल का डीएनए मैच करवा कर देखा तो वह मिल गया. इस से यह बात भी साबित हो गई कि मृतका ऋषिपाल की ही बेटी थी. अब इस बात की पुष्टि हो गई कि वह अधजला शव ऋषिपाल की 28 वर्षीय बेटी सुनीता उर्फ आरती का था.

सुनीता शादीशुदा महिला थी. उस की 11 साल की एक बेटी भी है. सुनीता की शादी लगभग 12 साल पहले हुई थी. पिछले 3-4 सालों से उस की अपने पति से अनबन चल रही थी, जिस कारण वह अपने मातापिता और भाईभाभी के साथ सूरजपुर में ही रह रही थी.

पुलिस ने मृतका के परिजनों से उस का मोबाइल नंबर ले कर उस के नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उस में एक ऐसा नंबर हाथ लगा, जिस से मृतका की घंटों तक बातें हुआ करती थीं. वह नंबर चेक टाउन के रहने वाले 26 वर्षीय आनंद नाम के युवक का था.

पुलिस ने आनंद के नंबर की जांच की तो 27 अप्रैल, 2019 को उस के फोन की लोकेशन भी उसी जगह की मिली, जहां सुनीता उर्फ आरती की झुलसी हुई लाश मिली थी. सारे सबूत मिल जाने के बाद 3 मई, 2019 को सीआईए इंचार्ज इंसपेक्टर अमन कुमार ने अपनी टीम के साथ मनीमाजरा, पीपली से आनंद और उस के छोटे भाई आजाद को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ के दौरान आनंद ने बिना कोई नौटंकी किए अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उस ने ही सुनीता उर्फ आरती की हत्या की थी, क्योंकि वह उसे शादी करने के लिए ब्लैकमेल कर रही थी.

हालांकि बाद में ब्लैकमेल वाली बात झूठी साबित हुई थी. बहरहाल, उसी दिन डीएसपी कमल गोयल ने प्रैसवार्ता कर इस हत्याकांड का खुलासा कर दिया था. अगले दिन आनंद और आजाद को अदालत में पेश कर 2 दिन के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान की गई विस्तृत पूछताछ में इस हत्याकांड की कहानी कुछ इस प्रकार सामने आई.

जिस प्रकार मृतका सुनीता उर्फ आरती का अपने पति से विवाद चल रहा था और वह अपनी बेटी के साथ अपने भाई के घर अकेली रह रही थी, ठीक उसी तरह से आनंद भी अपनी पत्नी के साथ विवाद के चलते अकेला अपने मांबाप के साथ रह रहा था.

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आज से लगभग 9 महीने पहले सुनीता अपनी भाभी के साथ किसी शादी में जाने के लिए लहंगा खरीदने सेक्टर-19 की मार्केट स्थित एक शोरूम में गई थी. आनंद भी उसी शोरूम पर काम करता था. यहीं दोनों की पहली मुलाकात हुई थी और पहली नजर में ही दोनों एकदूसरे को अपना दिल दे बैठे थे. दोनों ने अपनेअपने फोन नंबर एकदूसरे को दे दिए थे और अकसर रात को फोन पर घंटों बातें किया करते थे.

अकेले रहने के कारण दोनों देहसुख पाने के लिए तड़प रहे थे. सो इस के बाद दोनों के बीच संबंध बन गए थे. पहले तो दोनों बाहर कहीं होटल आदि में मिल कर अपनी प्यास बुझा लिया करते थे, लेकिन बाद में मृतका आनंद के घर पीपली टाउन जाने लगी थी.

वैसे इन दोनों के संबंधों का दोनों के घर वालों को पता था. उन दोनों के बीच सब ठीकठाक ही चल रहा था. दोनों खुश भी थे और आपस में शादी कर लेना चाहते थे.

एक दिन अचानक सुनीता को पता चला कि वह गर्भवती हो गई है तो उस ने यह बात आनंद को बताते हुए कहा कि वह उस के बच्चे की मां बनने वाली है और अब हमें शादी कर लेनी चाहिए. आनंद को यह बात अच्छी नहीं लगी. उस ने बात टालते हुए कहा, ‘‘इस बारे में बाद में बात करेंगे.’’

सुनीता को उस का यह रूखा व्यवहार अच्छा नहीं लगा. कहां तो उस ने सोचा था कि बच्चे वाली बात सुन कर आनंद खुश हो जाएगा, लेकिन यहां तो बात उलटी ही निकली. बच्चे की बात को ले कर दोनों के बीच तनाव पैदा हो गया था. आरती जब भी आनंद से शादी की बात करती तो वह टाल देता था. इसी तरह तनाव भरे माहौल में समय बीतता गया और आरती के पेट में पल रहा बच्चा 5 माह का हो गया था.

अब तो आरती के शरीर में भी परिवर्तन आ गया था. दूसरी ओर आनंद शादी से साफ इनकार करने लगा था. दरअसल आनंद शुरू से ही शादीवादी के लिए तैयार नहीं था. वह बस मुफ्त में मजे लेने के पक्ष में था. उस का कहना था कि हम दोनों केवल अपनेअपने शरीर की जरूरतें पूरी करते हैं. जबकि सुनीता इस मामले में गंभीर थी.

छली गई थी सुनीता

आनंद हर समय सुनीता पर इस बात का दबाव डालता था कि वह अबार्शन करवा कर इस मुसीबत से छुटकारा पा ले. एक दिन तो शादी को ले कर हो रही बहस के दौरान उस ने आरती से यहां तक कह दिया, ‘‘मैं कैसे मान लूं कि यह बच्चा मेरा ही है. क्या पता मेरे अलावा तुम्हारे संबंध न जाने किनकिन लोगों के साथ होंगे.’’

यह बात आरती को बहुत बुरी लगी. इस बात को ले कर दोनों में काफी नोकझोंक हुई. आनंद सुनीता से अपना पीछा छुड़ाने की पहले से ही योजना बना चुका था. अब उसे अपनी योजना को अमली जामा पहनाना था. 26 अप्रैल को दोनों की फोन पर शादी वाली बात को ले कर काफी बहस हुई. अंत में आनंद ने उसे रात 8 बजे घर पर मिलने के लिए बुलाया.

जब सुनीता वहां पहुंची तो आनंद के साथ उस का छोटा भाई आजाद भी था. आनंद ने फिर से उसे गर्भपात कराने के लिए कहा, जबकि सुनीता किसी भी कीमत पर गर्भपात कराने के लिए तैयार नहीं थी. वह अपनी बात पर अड़ी थी. इसे ले कर आनंद और सुनीता के बीच झगड़ा हो गया.

आनंद ने सुनीता पर अबार्शन का दबाव बनाने के लिए गुस्से में आ कर कई थप्पड़ मारे. इस पर सुनीता ने गुस्से में आ कर अपना गला अपनी चुन्नी से दबा लिया, जिस से वह बेहोश हो कर जमीन पर पड़ी थी. तभी दोनों भाइयों ने वह चुन्नी और खींच दी, जिस से उस का गला घुटने से मौत हो गई और उस की जीभ भी बाहर निकल आई. इस के बाद आनंद ने चाकू से पेट और आसपास के हिस्से में 3 वार किए.

हत्या करने के बाद दोनों भाइयों ने सुनीता के शव को जूट की बोरी में डाला और लाश को सुनीता की ही एक्टिवा पर अगले हिस्से में रख लिया. मनीमाजरा से चल कर दोनों भाई मनसादेवी थाने के क्षेत्र में पहुंचे, जहां उन्होंने सुनीता का शव झाडि़यों में डाल दिया. वहां घुप्प अंधेरा था और जगह भी एकदम सुनसान थी.

लाश को ठिकाने लगाने के लिए उन्हें यह जगह ठीक लगी. इस के बाद दोनों भाई मनीमाजरा स्थित पैट्रोल पंप पर पहुंचे, जहां उन्होंने एक्टिवा की टंकी फुल करवाई और वापस लाश के पास पहुंच गए.

एक्टिवा की टंकी से पैट्रोल निकाल कर उन्होंने लाश पर छिड़का और आग लगा कर वहां से अपने घर चले आए. यह बात 26-27 अप्रैल की रात की है. हालांकि आरोपियों ने अपनी तरफ से हत्या का कोई सबूत नहीं छोड़ा था, फिर भी पुलिस मोबाइल डिटेल्स के सहारे दोनों हत्यारोपियों तक पहुंच ही गई.

दोनों भाइयों से पूछताछ करने के बाद उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड अवधि के दौरान सीआईए पुलिस ने मृतका की एक्टिवा और हत्या में प्रयुक्त चाकू भी बरामद कर लिया. मामले की तफ्तीश चल रही है. पुलिस महिला की हत्या के आरोपी आनंद और आजाद को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी है.

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पुलिस को संदेह है कि इस हत्याकांड में कोई और भी शामिल हो सकता है. पुलिस सभी पहलुओं पर जांच कर रही है. इस के अलावा पुलिस यह भी जांच कर रही है कि 38 दिनों तक गुरप्रीत आखिर कहां और किस के साथ रही थी.

कहानी सौजन्य:  मनोहर कहानी

परिवर्तन : शिव आखिर क्यों था शर्मिंदा

शेव बनाते हुए शिव सहाय ने एक उड़ती नजर पत्नी पर डाली. उसे उस का बेडौल शरीर और फैलता हुआ सा लगा. वह नौकरानी को धुले कपड़े अच्छी तरह निचोड़ कर सुखाने का आदेश दे रही थी. उस ने खुद अपनी साड़ी झाड़ कर बताई तो उस का थुलथुल शरीर बुरी तरह हिल गया, सांस फूलने से स्थिति और भी बदतर हो गई, और वह पास पड़ी कुरसी पर ढह सी गई.

क्या ढोल गले बांध दिया है उस के मांबाप ने. उस ने उस के जन्मदाताओं को मन ही मन धिक्कारा-क्या मेरी शादी ऐसी ही औरत से होनी थी, मूर्ख, बेडौल, भद्दी सी औरत. गोरी चमड़ी ही तो सबकुछ नहीं.
‘तुम क्या हो?’ वह दिन में कई बार पत्नी को ताने देता, बातबात में लताड़ता, ‘जरा भी शऊर नहीं, घरद्वार कैसे सजातेसंवारते हैं? साथ ले जाने के काबिल तो हो ही नहीं. जबतब दोस्तयार घर आते हैं तो कैसी शर्मिंदगी उठानी पड़ती है.’

जब देखो सिरदर्द, माथे पर जकड़ कर बांधा कपड़ा, सूखे गाल और भूरी आंखें. उस के प्रति शिव सहाय की घृणा कुछ और बढ़ गई. उस ने सामने लगी कलाकृतियों को देखा.

वार्निश के डब्बों और ब्रशों पर सरसरी निगाह डाली. बिजली की फिटिंग के सामान को निहारा. कुछ देर में मिस्त्री, मैकेनिक सभी आ कर अपना काम शुरू कर देंगे. उस ने बेरहमी से घर की सभी पुरानी वस्तुओं को बदल कर एकांत के उपेक्षित स्थान में डलवा दिया था.

क्या इस औरत से भी छुटकारा पाया जा सकता है? मन में इस विचार के आते ही वह स्वयं सिहर उठा.

42 वर्ष की उम्र के करीब पहुंची उस की पत्नी कमला कई रोगों से घिर गई थी. दवादारू जान के साथ लगी थी. फिर भी वह उसे सब तरह से खुश रखने का प्रयत्न करती लेकिन उन्नति की ऊंचाइयों को छूता उस का पति उसे प्रताडि़त करने में कसर नहीं छोड़ता. अपनी कम्मो (कमला) के हर काम में उसे फूहड़पन नजर आता. सोचता, ‘क्या मिला इस से, 2 बेटियां थीं जो अब अपना घरबार बसा चुकी हैं. बाढ़ के पानी की तरह बढ़ती दौलत किस काम आएगी? 58 वर्ष की उम्र में वह आज भी कितना दिलकश और चुस्तदुरुस्त है.

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कुरसी पर निढाल सी हांफती पड़ी पत्नी के रंगे बाल धूप में एकदम लाल दिखाई दे रहे थे. वह झल्लाता हुआ बाथरूम में घुस गया और देर तक लंबे टब में पड़ा रहा. पानी में गुलाब की पंखडि़यां तैर रही थीं. हलके गरम, खुशबूदार पानी में निश्चल पड़े रहना उस का शौक था.

कमला उस के हावभाव से समझ गई कि वह खफा है. उस ने खुद को संभाला और कमरे में आ कर दवा की पुडि़या मुंह में डाल ली.

बड़ी बेटी का बच्चा वैभव, उस ने अपने पास ही रख लिया था. बस, उस ने अपने इस लाड़ले के बचपन में अपने को जैसे डुबो लिया था. नहीं तो नौकरों से सहेजी इस आलीशान कोठी में उस की राहत के लिए क्या था? ढाई दशकों से अधिक समय से पत्नी के लिए, धनदौलत का गुलाम पति निरंतर अजनबी होता गया था. क्या यह यों ही आ गई? 18 वर्ष की मोहिनी सी गोलमटोल कमला जब ससुराल में आई थी तो क्या था यहां?

तीनमंजिले पर किराए का एक कमरा, एक बालकनी और थोड़ी सी खुली जगह थी. ससुर शादी के 2 वर्षों पहले ही दिवंगत हो चुके थे. घर में थीं जोड़ों के दर्द से पीडि़त वृद्धा सास और 2 छोटी ननदें.
पिता की घड़ीसाजी की छोटी सी दुकान थी, जो पिता के बाद शिव सहाय को संभालनी पड़ी, जिस में मामूली सी आय थी और खर्च लंबेचौड़े थे. उस लंबे से कमरे में एक ओर टीन की छत वाली छोटी सी रसोई थी.

दूसरी ओर, एक किनारे परदा डाल कर नवदंपती के लिए जगह बनाई गई थी. पीछे की ओर एक अलमारी और एक दीवारघड़ी थी. यही था उस का सामान रखने का स्थान. दिन में परदा हटा दिया जाता. शैय्या पर ननदें उछलतीकूदती अपनी भाभी का तेलफुलेल इस्तेमाल करने की फिराक में रहतीं.
कमला मुंहअंधेरे रसोई में जुट जाती. बच्चों को स्कूल जाना होता था, और पति को दुकान. जल्दी ही वह भी एक प्यारी सी बच्ची की मां बन गई

शुरू में शिव सहाय अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था. उसे लगता, उस की उजलीगुलाबी आभा लिए पत्नी कम्मो गृहस्थी की चक्की में पिसती हुई बेहद कमजोर और धूमिल होती जा रही है. रात को वह उस के लिए कभी रबड़ी ले आता तो कभी खोए की मिठाई.
कमला का आगमन इस परिवार के लिए समृद्धि लाने वाला सिद्ध हुआ. दुकान की सीमित आय धीरेधीरे बढ़ने लगी.

कमला ने पति को सलाह दी कि वह दुकान में बेचने के लिए नई घडि़यां भी रखे, केवल पुरानी घडि़यों की मरम्मत करना ही काफी नहीं है. चुपके से उस ने पति को अपने कड़े और गले की जंजीर बेचने के लिए दे दीं ताकि वह नई घडि़यां ला सके. इस से उस की आय बढ़ने लगी. काम चल निकला.

किसी कारण से पास का दुकानदार अपनी दुकान और जमीन का एक टुकड़ा उस के हाथों सस्ते दामों में बेच कर चला गया. दुकान के बीच का पार्टीशन निकल जाने से दुकान बड़ी हो गई. उस की विश्वसनीयता और ख्याति तेजी से बढ़ी. घड़ी के ग्राहक दूरपास से उस की दुकान पर आने लगे. मौडर्न वाच शौप का नाम शहर में नामीगिरामी हो गया.

मौडर्न वाच शौप से अब उसे मौडर्न वौच कंपनी बनाने की धुन सवार हुई. उस के धन और प्रयत्न से घड़ी बनाने का कारखाना खुला, बढि़या कारीगर आए. फिर बढ़ती आमदनी से घर का कायापलट हो गया. बढि़या कोठी, एंबेसेडर कारें और सभी आधुनिक साजोसामान.

बस पुरानी थी, तो पत्नी कमला. दौलत को वह अपने प्रयत्नों का प्रतिफल समझने लगा. लेकिन दिल के किसी कोने में उसे कमला के त्याग व सहयोग की याद भी उजागर हो जाती. अभावों की दुनिया में जीते उस के परिवार और उसे, आखिर इसी औरत ने तो संभाल लिया था. उस ने खुद भी क्याकुछ नहीं किया, घर सोनेचांदी से भर दिया है. इस बदहाल औरत के लिए रातदिन डाक्टर को फोन खटखटाते, मोटे बिल भरते खूबसूरत जिंदगी गंवा रहा है.

यदाकदा उस के मन में तूफान सा उठने लगता, वह अर्द्ध बीमार सी पत्नी पर गालियों की बौछार कर देता. कितनी सीधी और शांत औरत है. किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया नहीं. बस, एक मुसकान चिपकाए खाली सा चेहरा और उस की सुखसुविधाओं का ध्यान.

गृहस्थी की गाड़ी यों ही हिचकोले खाती चल रही थी. कभीकभी एक दुष्ट विचार उस के मन में गहरा जाता. काश, कोई अच्छी सी पत्नी आ सकती इस घर में. पर नई गृहस्थी बसाने की बात क्या सोची भी जा सकती है? वह नाना बन चुका है. नवासा 21 वर्ष का होने को आया. इंजीनियर बनने में कुल 2 साल ही तो शेष हैं. वही तो संभालेगा उस का फलताफूलता धंधा. रिश्ते के लिए अभी से लोग चक्कर लगाने लगे हैं. ऊपर की मंजिल उस के लिए तैयार कराई गई है, उस का एअरकंडीशंड बैडरूम और अनोखी साजसज्जा का ड्राइंगरूम. उस के लिए पत्नी के चुनाव के बारे में वह बहुत सजग है.

नाश्ते की मेज पर बैठा वह पत्नी से वैभव के संबंध के बारे में सलाहमशवरा करना चाहता था लेकिन आज वह और भी पुरानी व बीमार दिखाई दे रही थी. उस की मेज की दराज में अनेक फोटो और पत्र वैभव के संबंध में आए पड़े हैं. लेकिन क्या इस फूहड़ स्त्री से ऐसे नाजुक प्रसंग को छेड़ा जा सकता है?

वह कुछ देर तक चुप बैठा ब्रैड के स्लाइस का टुकड़ा कुतरता रहा. मन ही मन अपनेआप पर झुंझलाता रहा. न जाने क्यों व्यर्थ का आवेश उस की आदत बन चुकी है. उस की दरिद्रता के दिनों की साथी, उस की सहायिका ही नहीं, अर्द्धांगिनी भी, न जाने क्यों आज उस के लिए बेमानी हो चुकी है? कभीकभी अपनी सोच पर वह बेहद शर्मिंदा भी होता.

कमला को पति की भारी डाक देखने तक में कोई रुचि नहीं थी. नौकर गेट पर लगे लैटरबौक्स से डाक निकाल कर अपने साहब की मेज पर रख आता था. लेकिन आज नाश्ते के बाद बाहर टंगे झूले पर बैठी कमला ने पोस्टमैन से डाक ले कर झूले के हत्थे पर रख लिया.

2-3 मोटे लिफाफे झट से नीचे गिर पड़े. उस ने उन्हें उठाया तो उसे लगा लिफाफों में चिट्ठी के साथ फोटो भी हैं. सोचने लगी, किस के फोटो होंगे? उस ने उन्हें उलटापलटा, तो कम चिपका एक लिफाफा यों ही खुल गया. एक कमसिन सी लड़की की फोटो उस में से झांक रही थी. उस ने पत्र पढ़ा. वैभव के रिश्ते की बात लिखी थी. तो यह बात है, चुपचाप बहू लाने की योजना चल रही है. और उसे कानोंकान खबर तक नहीं.

क्या हूं मैं, केवल एक धाय मात्र? उस की आंखों से टपटप आंसू गिरने लगे. सदा से सब की झिड़कियां खाती आई हूं. पहले सास की सुनती रही. उन से डरडर कर जीती रही. यहां तक कि छोटी ननदें भी जो चाहतीं, कह लेती थीं. उसे सब की सहने की आदत पड़ गई है. उस की अपनी बेटियां भी उस की परवा नहीं करतीं और अब यह व्यक्ति, जो कहने को पति है, उसे निरंतर तिरस्कृत करता रहता है.

आखिर क्या दोष है उस का? कल घर में धेवते की बहू आएगी तो क्या समझेगी उसे? घर की मालकिन या कोने में पड़ी एक दासी? उस की दशा क्या होगी? उस की आज जो हालत है उस का जिम्मेदार कौन है? क्यों डरती है वह हर किसी से?

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उस के पति ने भी कभी उस के रूप की सराहना की थी. उसे प्यार से दुलराया था. छाती से चिपटा कर रातें बिताई थीं. अब वह एक खाली ढोल हो कर रह गई है.

साजसज्जा की सामग्री से अलमारियां भरी हैं. साडि़यों और सूटों से वार्डरोब भरे पड़े हैं. लेकिन इस बीमार थुलथुल देह पर कुछ सोहता ही नहीं.

कम्मो झूले से उठ खड़ी हुई और ड्रैसिंग मेज पर जा कर खुद को निहारने लगी. क्या इस देह में अब भी कुछ शेष है? उसे लगा, उस के अंदर से एक धीमी सी आवाज आ रही है, ‘कम्मो, अपनी स्थिति के लिए केवल तू ही जिम्मेदार है. तू अपने पति की उन्नति में सहायक बनी लेकिन उस की साथी नहीं बनी. वह ऊंचाइयां छूता गया और तू जमीन का जर्रा बनती गई. वह आधी रात को घर में घुसा, तू ने कभी पूछा तक नहीं. बस, उस के स्वागत में आंखें बिछाए रही.’

उस की इच्छा हुई वह भी आज गुलाब की पंखडि़यों में नहाए. उस ने बाथरूम के लंबे टब में गुलाब की पंखडि़यां भर दीं, गीजर औन कर दिया. गरम फुहारों से टब लबालब भर गया तो उस में जा कर लेटी रही. उस में से कुछ समय बाद निकली तो काफी हलका महसूस कर रही थी. आज उस ने अपनी मनपसंद साड़ी पहनी और हलका मेकअप किया.

अब वह जिएगी तो अपने लिए, कोई परवा करे या न करे. एक आत्मविश्वास से वह खिलने लगी थी. स्नान के बाद ऊपर जा कर धूप में जाने की इच्छा उस में प्रबल हो उठी, लेकिन एक अरसे से वह सीढि़यां नहीं चढ़ी थी. घर की ड्योढ़ी लांघती तो उस की सांस बेकाबू हो जाती है, फिर इतनी अधिक सीढि़यां कैसी चढ़ेगी? फिर भी, आज उसे स्वयं को रोक पाना असंभव था. उस ने धीरेधीरे 3-4 सीढि़यां चढ़ीं, तो सांस ऊपरनीचे होने लगी.

वह बैठ गई. सामान्य होने पर फिर चढ़ने लगी. कुछ समय बाद वह छत पर थी. नीले आसमान में सूर्य चमक रहा था. उसे अच्छा लगा. वह आराम से झुक कर सीधी हो सकती है. बिना कष्ट के उस ने आगेपीछे, फिर दाएंबाएं होने का यत्न किया तो एक लचक सी शरीर में दौड़ गई. तत्पश्चात थोड़ी देर बाद वह बिना किसी परेशानी के नीचे उतर आई.

रसोई में रसोइया खाना बनाने की तैयारी कर रहा था. कमला काफी समय से वहां नहीं झांकी थी. नंदू पूछता, ‘क्या बनेगा’ तो बेमन से कह देती, ‘साहब की पसंद तू जानता ही है.’ पुराना नौकर मालिकों की आदतें जान गया था. इसलिए बिना अधिक कुछ कहे वह उन के लिए विभिन्न व्यंजन बना लेता. समय पर नाश्ता और खाना डायनिंग टेबल पर पहुंच जाता. घी, मसालों में सराबोर सब्जियां, चावल, रायता, दाल, सलाद सभी कुछ. कमला तो बस 2-4 कौर ही मुंह में डालती थी, पर फिर भी काया फूलती ही गई. उस का यही बेडौल शरीर ही तो उसे पति से दूर कर गया है.

कमला नीचे आई तो रसोईघर में घुस गई. उसे आज स्वयं भोजन बनाने की इच्छा थी. कमला ने हरी सब्जियां छांट कर निकालीं, फिर स्वयं ही छीलकाट कर चूल्हे पर रख दीं. आज से वह उबली सब्जियां खाएगी.

शिव सहाय कुछ दिनों के लिए बाहर गया था. कमला एक तृप्ति और आजादी महसूस कर रही थी. आज की सी जीवनचर्या को वह लगातार अपनाने लगी. शारीरिक श्रम की गति और अधिक कर दी. उसे खुद ही समझ में नहीं आया कि अब तक उस ने न जाने क्यों शरीर के प्रति इतनी लापरवाही बरती और मन में क्यों एक उदासी ओढ़ ली.

शिव सहाय दौरे से वापस आया और बिना कमला की ओर ध्यान दिए अपने कामों में व्यस्त हो गया. पतिपत्नी में कईकई दिनों तक बातचीत तक नहीं होती थी.

शिव सहाय कामकाज के बाद ड्राइंगरूम की सामने वाली कुरसी पर आंख मूंद कर बैठा था. एकाएक निगाह उठी तो पाया, एक सुडौल नारी लौन में टहल रही है. उस का गौर पृष्ठभाग आकर्षक था. कौन है यह? चालढाल परिचित सी लगी. वह मुड़ी तो शिव सहाय आश्चर्य से निहारता रह गया. कमला में यह परिवर्तन, एक स्फूर्तिमय प्रौढ़ा नारी की गरिमा. वह उठ कर बाहर आया, बोला, ‘‘कम्मो, तुम हो, मैं तो समझा था…’’

कम्मो ने मुसकान बिखेरते हुए कहा, ‘‘क्या समझा आप ने कि कोई सुंदरी आप से मिलने के इंतजार में टहल रही है?’’

शिव सहाय ने बोलने का और मौका न दे कम्मो को अपनी ओर खींच कर सीने से लगाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी बहुत उपेक्षा की है मैं ने. पर यकीन करो, अब भूल कर भी ऐसा नहीं होगा. आखिर मेरी जीवनसहचरी हो तुम.’’ कम्मो का मन खुशी से बांसों उछल रहा था वर्षों बाद पति का वही पुराना रूप देख कर. वही प्यार पा कर उस ने निर्णय ले लिया कि अब इस शरीर को कभी बेडौल नहीं होने देगी, सजसंवर कर रहेगी और पति के दिल पर राज करेगी.

वैभव की शादी के लिए वधू का चयन दोनों की सहमति से हुआ. निमंत्रणपत्र रिश्तेदारों और परिचितों में बांटे गए. शादी की धूम निराली थी.

सज्जित कोठी से लंबेचौड़े शामियाने तक का मार्ग लहराती सुनहरी, रुपहली महराबों और रंगीन रोशनियों से चमचमा रहा था. स्टेज पर नाचरंग की महफिल जमी थी तो दूसरी ओर स्वादिष्ठ व्यंजनों की बहार थी. अतिथि मनपसंद पेय पदार्थों का आनंद ले कर आते और महफिल में शामिल हो जाते.

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आज कमला ने भी जम कर शृंगार किया था. वह अपने अनूठे सौंदर्य में अलग ही दमक रही थी. कीमती साड़ी और कंधे पर सुंदर पर्र्स लटकाए वह इष्टमित्रों की बधाई व सौगात ग्रहण कर रही थी. वह थिरकते कदमों से महफिल की ताल में ताल मिला रही थी.

लोगों ने शिव सहाय को भी साथ खींच लिया. फिर क्या था, दोनों की जोड़ी ने वैभव और नगीने सी दमकती नववधू को भी साथ ले लिया. अजब समां बंधा था. कल की उदास और मुरझाई कमला आज समृद्धि और स्वास्थ्य की लालिमा से भरपूर दिखाई दे रही थी. ऐसा लग रहा था मानो आज वह शिव सहाय के घर और हृदय पर राज करने वाली पत्नी ही नहीं, उस की स्वामिनी बन गई थी.

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