छोटे शहर की लड़की : जब पूजा ने दी दस्तक- भाग 4

‘‘आसमान से भी ऊंचे सपने व्यक्ति देख सकता है, परंतु न तो वह आसमान में उड़ सकता है, न आसमान में घर बना कर रहना उस के लिए संभव है. तो क्या तुम इस छोटे शहर से अलग हो गए?’’ ‘‘नहीं, परंतु यहां मेरे सपनों के लिए कोई जगह नहीं है,’’ उस ने साफ किया.

‘‘क्या प्यार के लिए भी नहीं…’’ ‘‘प्यार तो समय और परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है.’’

‘‘तुम बहुत कठोर हो.’’ ‘‘हो सकता है.’’

‘‘पहले तो ऐसे नहीं थे.’’ ‘‘पहले मैं छोटे शहर में रहता था और यहां की लड़कियां मुझे डराती थीं.’’

‘‘तो तुम ने डर कर मुझ से प्यार किया था? लेकिन अब तुम बड़े शहर में रहते हो. वहां की लड़कियां तो छोटे शहर की लड़कियों से भी अधिक तेज होती हैं. क्या वहां की लड़कियों से तुम्हें डर नहीं लगता?’’ ‘‘लड़कियों से मुझे डर नहीं लगता, बस उन के प्यार से डर लगता है.’’

‘‘तो तुम मुझे प्यार नहीं करते?’’ ‘‘शायद… मुझे संदेह है,’’ उस ने पूजा की भावनाओं की परवा न करते हुए स्पष्ट रूप से कहा.

‘‘तो क्या तुम मुझे छोड़ दोगे?’’ वह लगभग रोंआसी हो गई थी. ‘‘मुझे मेरा सपना पूरा करने दो. उस के बाद ही मैं कुछ कह पाऊंगा. अभी मेरे और मेरे सपनों के बीच में और कुछ नहीं है.’’

‘‘पूजा का दिल टूट गया. उसे लगा कि सबकुछ समाप्त हो गया है.’’ छुट्टियां भी एक दिन समाप्त होनी थीं. पूजा हताश और निराश हो गई थी. उस ने विनोद के घर आना बंद कर दिया था. उस से फोन पर भी बात नहीं करती थी और न उस से बाहर मिलने के लिए जिद करती थी.

दिल्ली जाने से एक दिन पहले विनोद ने पूजा को फोन किया, ‘‘क्या कर रही हो?’’ ‘‘कुछ नहीं… मेरे पास करने के लिए है भी क्या?’’

‘‘तो फिर वहीं आ जाओ. जहां हम मिलते हैं.’’ ‘‘क्या जरूरी है, मेरा मन नहीं कर रहा है,’’ उस ने उपेक्षा जाहिर की.

‘‘बहुत जरूरी है, नहीं आओगी तो जीवनभर पछताओगी.’’ ‘पता नहीं क्या बात है‘, सोच कर पूजा मिलने के लिए आ गई. वह उदास थी, अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए वह उसे देखने लगी. विनोद मुसकरा रहा था. पूजा को उस की मुसकराहट का भेद समझ में नहीं आया. विनोद ने बेझिझक उस के कंधों पर हाथ रख दिया और उसे लगभग अपनी तरफ खींचता हुआ बोला, ‘‘तुम बहुत दुखी हो.’’

वह कुछ नहीं बोली. उस ने अपना एक हाथ उस के सिर के पीछे रख उस का सिर अपने सीने पर दबा लिया और उस के बालों को सहलाते हुए बोला, ‘‘स्वाभाविक है, मेरी तरफ से तुम्हारा मन उचट गया हो, परंतु मैं भी क्या करता? एक डरपोक लड़के को तुम ने प्यार किया. मैं तुम्हारे लायक नहीं था. मैं एक किताबी कीड़ा था और समझता था इन्हीं में मेरा जीवन है.

जीवन में सपने देखने के सिवा मैं ने और कुछ नहीं किया. जब तुम ने मुझे प्यार किया तो मैं इतना डर गया था कि समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं. तुम्हारे प्यार में पड़ कर कहीं मेरे सपने चकनाचूर न हो जाएं. इसी असमंजस में दिन गुजर रहे थे. दिल्ली गया तो लगा कि मेरा सपना मेरी पकड़ से बहुत दूर नहीं है, परंतु तुम्हारी यादें बीच में बाधा उत्पन्न कर रही थीं,’’ वह चुप हो कर अपनी सांसों को संयत करने लगा.

पूजा ने अपना सिर उठा कर उस के चेहरे की तरफ देखा. ‘‘परंतु इन छुट्टियों में मेरे प्रति तुम्हारी दीवानगी और प्यार ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. मैं नहीं समझता कि जीवन में बिना प्यार के कोई भी सपना पूरा हो सकता है. मैं अपने चाहे जितने सपने पूरे कर लूं, वे सभी अधूरे रहेंगे, अगर मेरे जीवन में किसी का प्यार नहीं है. तुम्हारा अपने प्रति अटूट प्यार देख कर मेरा आत्मबल और विश्वास दोगुना हो गया है. मुझे लगता है कि तुम्हारा प्यार पा कर मैं अपना सपना जल्दी ही पूरा कर लूंगा. इस में ज्यादा दिन नहीं लगेंगे.’’

अब पूजा उस से अलग हो कर उस की तरफ तीखी नजरों से देखने लगी थी. विनोद की आंखों में प्रेम का गहरा समुद्र हिलोरें मार रहा था. पूजा का हृदय अनायास धड़क उठा, बिलकुल उसी तरह जिस प्रकार पहली बार विनोद के लिए धड़का था. ‘‘मैं ने तुम्हें बहुत सताया है,’’ उस ने भावुक हो कर कहा.

उस का सिर नीचे झुक गया. वह सुबकने लगी. ‘‘आशा है, तुम मेरी बात का मतलब समझ गई होगी. मैं अधिक कुछ नहीं कह सकता. बस, एक बात पूछना चाहता हूं, क्या मेरा सपना पूरा होने तक तुम मेरा इंतजार कर सकती हो?’’

पूजा ने अपना मुंह उस के सीने में छिपा लिया और उस की पीठ पर अपनी बांहें कसती हुई बोली, ‘‘आज तुम ने मुझे पूरी तरह से जीत लिया. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. मैं छोटे शहर की लड़की हूं और सच्चे मन से तुम्हें प्यार करती हूं, तुम अपना सपना पूरा कर के आओ, फिर हम दोनों घर वालों की सहमति से विवाह कर के अपना घर बसा लेंगे.’’ विनोद ने भी उसे अपनी बांहों में कस लिया, ‘‘ऐसा मत कहो कि तुम छोटे शहर की लड़की हो. तुम्हारा दिल बहुत बड़ा है.’’

‘‘तुम ने एक दिन कहा था कि छोटे शहर की लड़कियों की सोच ऐसी ही होती है. यह तुम्हारी बात का जवाब था.’’ ‘‘लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल छोटे शहर की लड़कियां ही सच्चा प्यार करती हैं. बड़े शहर की लड़कियां भी अपने प्रेमियों का इंतजार करती हैं. प्रेम सच्चा हो, तो सब कुछ संभव है. हां, जीवन का बड़ा सपना केवल बड़े शहरों में ही पूरा होता है, परंतु प्यार का सपना तो कहीं भी, किसी भी जगह पूरा हो सकता है.’’

‘‘सचमुच… आज मैं इस बात को समझ गई हूं. तुम ने मेरे सारे भ्रम दूर कर दिए.’’ ‘‘और मेरे मन से भी सारी दुविधाएं दूर हो गई हैं. मुझे पूरी आशा है कि मेरे दोनों सपने… आईएएस बनने का और तुम से शादी करने का… जल्दी ही पूरे हो जाएंगे. फिर तुम्हें ज्यादा दिन तक विरह के आंसू नहीं बहाने होंगे.’’

…और उन के मन में हजारों दीपक जल कर मुसकराने लगे, जिन का प्रकाश चारों तरफ फैल गया.

सफेद बाल हो सकता है दिल की बीमारी का संकेत

हमारे आसपास ऐसे काफी लोंग होते है जिनके उम्र के पहले ही सफेद बाल हो जाते हैं. हैरानी की बाल ये है की इस समस्या से ज्यादा परेशान पुरुष हैं. झड़ते बालों और सफेद बालों की समस्या आए दिन पुरुषों में बढ़ती दिखाई दे रही है. ऐसे में वे कई घरेलू नुस्खे आजमाते हैं, लेकिन फिर भी कुछ भी ठीक होता दिखाई नहीं देता है. इससे शर्मिंदगी के साथ-सात सेल्फकौनफिडेंस भी प्रभावित होता हैं. ऐसे लोग मजाक का पात्र बनकर पब्लिक में आना जाना भी कम कर देते है पर क्या आप जानते है की सफेद बाल को अनदेखा करना कितना खतरनाक हो सकता है. सफेद बाल होना दिल से संबंधित कई बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.

सफेद बाल मतलब दिल की बीमारी

एक रिसर्च के अनुसार पता चला है कि 500 से अधिक लोगों में दिल से संबंधित बीमारियां हो रही हैं. सफेद बाल होना कई बाल साधारण हो सकता है, लेकिन ज्यादातर समय में सफेद बाल, वह भी पुरुषों में कोई आम बात नहीं है. अगर किसी पुरुष को सफेद बालों की शिकायत है, तो उसे जल्द डाक्टर से सलाह लेकर ह्रदय संबंधी चेकअप करा लेना चाहिए जिससे समय रहते इलाज हो सकें.

एथेरोस्केलेरोसिस का निर्माण धमनियों (Arteries) के अंदर की फेट सामग्री से होती है और बालों में सफेदी आ  जाती है. दोनों ही कारण में बिगड़ा हुआ डीएनए, औक्सीडेटिव तनाव, सूजन, हार्मोन में बदलाव और कार्यात्मक कोशिकाओं की तन्यता है.

तो अगर आप भी सफेद बालों से परेशान है तो उनके कैल्शियम की से जोड़ कर ना देखें और जल्द से जल्द डाक्टर से सलाह लेकर अपने दिल की सभी जरुरू चेकअप कराएं.

शोर करती चुप्पी : कैसा थी मानसी की ससुराल- भाग 4

वह पहले से जल्दी उठता. दोनों भागदौड़ कर तैयार होते. बैडरूम ठीक करते. अपनेअपने कपड़े प्रैस करते, उन्हें अलमारियों में लगाते. नाश्ते के लिए एक टोस्ट सेंकता तो दूसरा कोल्ड कौफी बनाता. एक कौर्नफ्लैक्स बाउल में डालता तो दूसरा दूध गिलास में. एक औमलेट बनाता तो दूसरा टोस्ट पर बटर लगाता. सुजाता खुद कामकाजी थीं. इसलिए उन की बहुत अधिक मदद नहीं कर सकती थीं. बस, घर की व्यवस्था उन्हें ठीकठाक मिल रही थी. राशनपानी, सब्जी कब कहां से आएगा, कामवाली कब काम करेगी, खाना कब बनेगा, इस का सिरदर्द न होना भी बहुत बड़ी मदद थी. इसलिए व्यक्तिगत स्तर पर मदद को ले कर वे चुप ही रहती थीं.

लेकिन परिमल को हर कदम पर अवनी का साथ व स्वतंत्रता देते देख, सुजाता को अपना जीवन व्यर्थ जाया जाने जैसा लगता. वे खुद तो कभी नौकरी व घर के बीच पूरी ही नहीं पड़ीं. ऊपर से सारे रिश्तेनाते. अवनी को तो रिश्तेनाते निभाने की कोई फिक्र ही नहीं थी. यहां तक तो उस की न तो सोच जाती न ही समय था. उस पर भी अब परिवार छोटे. एक टाइम की चाय भी नहीं पिलानी है. और फिर व्हाट्सऐप…चाय की प्याली भी गुडमौर्निंग के साथ व्हाट्सऐप पर भेज दो, और जरूरत पड़ने पर बर्थडे केक भी, यह सब सोच कर सुजाता मन ही मन मुसकराईं.

अवनी की पीढ़ी की लड़कियों ने जैसे एक युद्ध छेड़ रखा है. वर्षों से आ रही नारी की पारंपरिक छवि के विरुद्ध सुजाता सोचतीं, भले ही कितना कोस लो आजकल की लड़कियों को, सच तो यह है कि सही मानो में वे अपना जीवन जी रही हैं. मुखरित हो चुकी हैं, यह पीढ़ी ऐसा ही जीवन शायद उन की पीढ़ी या उन से पहले और उन से पहले की भी पीढ़ी की लड़कियों ने चाहा होगा पर कायदे और रीतिरिवाजों में बंध कर रह गईं. पुरुषों के बराबर समानता स्त्रियों को किसी ने नहीं दी. लेकिन यह पीढ़ी अपना वह अधिकार छीन कर ले रही है.

फिर विकास तो अपने साथ कुछ विनाश तो ले कर आता ही है. गेहूं के साथ घुन तो पिस ही जाता है. अवनी और परिमल दोनों आजकल अत्यधिक व्यस्त थे. रात में भी देर से लौट रहे थे. वर्कलोड बहुत था. दोनों के रिव्यू होने वाले थे. घर आ कर दोनों जैसातैसा खा कर दोचार बातें कर के औंधे मुंह सो जाते. छुट्टी के दिन भी दोनों लैपटौप पर आंखें गड़ाए रहते.

मानसी की बेचैनी सीमा पार कर रही थी. उस में सुजाता जैसा धैर्य नहीं था. न ही वह सुजाता की तरह व्यस्त थी. इसलिए नई पीढ़ी की अपनी बहू के क्रियाकलापों को भी सहजता से नहीं ले पाती और अपनी भड़ास निकालने के लिए बेटी के कान भी उपलब्ध नहीं थे. मां के दुखदर्द सुनना अवनी की पीढ़ी की लड़कियों की न आदत है न फुरसत. पर बेटी से मोह कम कर बहू से मोह बढ़ाना मानसी जैसी महिलाओं को भी नहीं आता.

यदि अवनी ससुराल में न रह कर कहीं अलग रह रही होती तो मानसी अब तक आ धमकती. पर नएनए समधियाने में जा कर रहने में पुराने संस्कार थोड़े आड़े आ ही जाते थे. बेटी तो 2-4 बातें कर के फोन रख देती पर जबतब सुजाता से बात कर वह अपनी भड़ास निकाल लेती.

उन का इस कदर पुत्रीमोह देख कर सुजाता को अजीब तरह का अपराधबोध सालने लगता. जैसे उन की बेटी को उन से अलग कर के उन्होंने कोई गुनाह कर दिया हो. उन्हें कभी मानसी की फोन पर कही अजीबोगरीब बातों से चिड़चिड़ाहट होती तो कभी खुद भी एक बेटी की मां होने के नाते द्रवित हो जातीं.

बेटी से प्यार तो सुजाता को भी बहुत था. पर उस की व्यस्तता उन्हें प्यार जताने तक का समय नहीं देती, मोह की कौन कहे. पर मानसी की हालत देख कर उन्हें लगता कि सच ही कहते हैं, ‘खाली दिमाग शैतान का घर.’ हर इंसान को कहीं न कहीं व्यस्त रहना चाहिए. नौकरी ही जरूरी नहीं है और भी कई तरीके हैं व्यस्त रहने के. उस का दिल करता किसी दिन इतमीनान से समझाए मानसी को कि बच्चों से मोह अब कुछ कम करे और खुद की जिंदगी से प्यार करे.

अभी 55-56 वर्ष की उम्र होगी उन की. बहुत कुछ है जिंदगी में करने के लिए अभी. हर समय बेटीबेटी कर के, उस के मोह में फंस कर, वह खुद की भी जिंदगी बोझ बना रही है और बेटी की जिंदगी में भी उलझन पैदा कर रही है. अवनी की पीढ़ी की लड़कियों की जिंदगी व्यस्तताभरी है. इस पीढ़ी को कहां फुरसत है कि वह मातापिता, सासससुर के भावनात्मक पक्ष को अंदर तक महसूस करे. लेकिन समझा न पाती, रिश्ता ही ऐसा था.

इसी बीच, कंपनी ने अवनी को 15 दिन की ट्रेनिंग के लिए चेन्नई भेज दिया. अवनी जाने की तैयारी करने लगी. घर में किसी के मन में दूसरा विचार ही न आया. एक आत्मनिर्भर लड़की को औफिस के काम से जाना है, तो बस जाना है. लेकिन अवनी की मम्मी बेचैन हो गई.

‘‘कैसे रहेगी तू वहां अकेली इतने दिन. कभी अकेली रही नहीं तू. दिल्ली में भी तू अपनी फ्रैंड के साथ रहती थी,’’ मानसी कह रही थी. सुजाता को भी मोबाइल की आवाज सुनाई दे रही थी.

‘‘अकेले का क्या मतलब मम्मी. नौकरी में तो यह सब चलता रहता है. कंपनी मुझे भेज रही है. आप हर समय चिंता में क्यों डूबी रहती हैं. ऐसा करो आप और पापा कुछ दिनों के लिए कहीं घूम आओ या ऐसा करो गरीब बच्चों को इकट्ठा कर के आप पढ़ाना शुरू कर दो,’’ अवनी भन्नाती हुई बोली. अवनी की बात सुन कर सुजाता की हंसी छूटने को हुई.

‘‘तू हर समय बात टाल देती है. मैं तुझे अकेले नहीं जाने दे सकती. मैं चलती हूं तेरे साथ.’’

‘‘ओफ्फो मम्मी, आप का वश चले तो मुझे वाशरूम भी अकेले न जाने दो. मेरी शादी हो गई है अब. जब यहां किसी को एतराज नहीं तो आप क्यों परेशान हो रही हैं. मेरे साथ जाने की कोई जरूरत नहीं.’’

‘‘मां की चिंता तू क्या जाने. जब मां बनेगी तब समझेगी,’’ मानसी की आवाज भर्रा गई.

‘‘मां, अगर इतनी चिंता करती हैं तो मुझे मां ही नहीं बनना. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. मैं फोन औफ कर रही हूं. मुझे औफिस का जरूरी काम खत्म करना है.’’

‘‘अच्छा, फोन औफ मत कर. जरा मम्मी से बात करा अपनी.’’

अवनी ने फोन सुजाता को पकड़ा दिया. आज मानसी की बातें सुन कर सुजाता का दिल किया कि बुरा ही मान जाए मानसी पर वे अब चुप नहीं रहेंगी, अपनी बात बोल कर रहेंगी. वे फोन पर बात करतेकरते अपने कमरे में आ कर बैठ गईं.

‘‘देख रही हैं आप. कैसे रहेगी वहां अकेली. मुझे भी मना कर रही है. आप परिमल से कहिए न कि छुट्टी ले कर उस के साथ जाए.’’ उस की बेसिरपैर की बात पर झुंझलाहट हो गई सुजाता को.

‘‘परिमल के पास इतनी छुट्टी कहां है मानसीजी. और फिर यह तो शुरुआत है. जैसेजैसे नौकरी में समय होता जाएगा, ऐसे मौके तो आते रहेंगे. आप चिंता क्यों कर रही हैं. आप ने उच्च शिक्षा दी है बेटी को तो कुछ अच्छा करने के लिए ही न. घर बैठने के लिए तो नहीं. समझदार व आत्मविश्वासी लड़कियां हैं आजकल की. इतनी चिंता करनी छोड़ दीजिए आप भी.’’

‘‘कैसी बात कर रही हैं आप. कैसे छोड़ दूं चिंता. आप नहीं करतीं अपनी बेटी की चिंता?’’

‘‘मैं चिंता करती हूं मानसीजी, पर अपनी चिंता बच्चों पर लादती नहीं हूं.’’ सुजाता का दिल किया, अगला वाक्य बोले, ‘और न बेटी की सास को जबतब कुछ ऐसावैसा बोल कर परेशान करती हूं,’ पर स्वर को संभाल कर बोलीं, ‘‘बच्चों की अपनी जिंदगी है. यदि बच्चे अपनी जिंदगी में खुश हैं तो बस मातापिता को चाहिए कि दर्शक बन कर उन की खुशी को निहारें और खुद को व्यस्त रखें. आज की पीढ़ी बहुत व्यस्त है, इन की तुलना अपनी पीढ़ी से मत कीजिए. इस का मतलब यह नहीं कि बच्चों को हम से प्यार नहीं, पर उन की दिनचर्या ही ऐसी है कि कई छोटीछोटी खुशियों के लिए उन के पास समय ही नहीं है या कहना चाहिए खुशियों के मापदंड ही बदल गए हैं उन की जिंदगी के.’’

मानसी एकाएक रो पड़ी फोन पर. सुजाता का दिल पसीज गया. लेकिन सोचा, आखिर बेटी से मोह भंग तो होना ही चाहिए मानसी का.

‘‘मानसीजी, क्यों दिल छोटा कर रही हैं. अवनी आप की बेटी है और जिंदगीभर आप की बेटी रहेगी. लेकिन एक बच्ची आप के पास भी है. उसे भी अवनी के नजरिए से देखेंगी तो वह भी उतनी ही अपनी लगेगी. प्यार कीजिए बच्चों से, पर अपना प्यार, अपना रिश्ता लाद कर उन की जिंदगी नियंत्रित मत कीजिए. बल्कि, अपनी जिंदगी खुशी से जीने के तरीके ढूंढि़ए. अभी हमारी ऐसी उम्र नहीं हुई है. खूबसूरत उम्र है यह तो. सब जिम्मेदारियों से अब जा कर फारिग हुए हैं. अपने छूटे हुए शौक पूरे कीजिए. अब वे दिन लद गए कि बच्चों की शादी की और बुढ़ापा आ गया. अब तो समय आया है एक नई शुरुआत करने का.’’

मानसी चुप हो गई. सुजाता को समझ नहीं आ रहा था कि मानसी उन की बात कितनी समझी, कितनी नहीं. उसे अच्छा लगा या बुरा. ‘‘आप सुन रही हैं न,’’ वे धीरे से बोलीं.

‘‘हूं…’’

‘‘मैं आप का दिल नहीं दुखाना चाहती, बल्कि बड़ी बहन की तरह आप का साथ देना चाहती हूं. अवनी खुश है अपनी जिंदगी में. व्यस्त है अपनी नौकरी में. आप के पास कम आ पाती है, कम बात कर पाती है तो क्या आप सोचती हैं कि वह हमारे पास रहती है, तो हमारी बहुत बातें हो जाती हैं. आप दूर हैं, फिर भी फोन पर बात कर लेती हैं, लेकिन मैं तो जब उसे अपने सामने थका हुआ देखती हूं तो खुद ही बातों में उलझाने का मन नहीं करता. छुट्टी के दिन बच्चे काफी देर से सो कर उठते हैं. फिर उन के हफ्ते में करने वाले कई काम होते हैं. शाम को थोड़ाबहुत इधरउधर घूमने या मूवी देखने चले जाते हैं.

‘‘यदि इस तरह से हम हर समय अपनी खुशियों के लिए बच्चों का मुंह देखते रहेंगे तो हमारी खुशियां रेत की तरह फिसल जाएंगी मुट्ठी से और हथेली में कुछ भी न बचेगा. इसीलिए कहा इतना कुछ. अगर मेरी बात का बुरा लगा हो तो क्षमा चाहती हूं.’’

‘‘नहींनहीं, आप की बात का बुरा नहीं लगा मुझे. बल्कि आप की बात पर सोच रही हूं. बहुत सही कह रही हैं. अवनी भी जबतब कुछ ऐसा ही समझाती है मगर झल्ला कर. मैं भी कोई नई राह ढूंढ़ती हूं. आप नौकरी में व्यस्त हैं, इसीलिए जिंदगी को सही तरीके से समझ पा रही हैं शायद.’’

‘‘नौकरी के अलावा भी बहुत से रास्ते हैं जिंदगी में व्यस्त रहने के. मैं भी रिटायरमैंट के बाद कोई नया रास्ता ढूंढ़ूंगी. आप भी सोच कर ढूंढि़ए और ढूंढ़ कर सोचिए,’’ कह कर सुजाता हंस दी.

‘‘हां जी, आप बिलकुल ठीक कह रही हैं. कब जा रही है अवनी?’’

‘‘परसों सुबह की फ्लाइट से.’’

‘‘ठीक है. कल रात उसे ‘गुड विशेज’ का मैसेज कर दूंगी,’’ कह कर मानसी खिलखिला कर हंस पड़ी और साथ ही सुजाता भी.

पार्क वाली लड़की : यौवन वाली नवयौवना की कहानी

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रिश्तेदार: अकेली सौम्या, अनजान शहर और अनदेखे चेहरे- भाग 4

अगले ही दिन नितिन की मां नेहा को देखने सौम्या के घर आ गईं. नेहा पहले से ही वहां तैयार हो कर पहुंच चुकी थी. नेहा का बातव्यवहार, उस की पढ़ाईलिखाई और खूबसूरती नितिन की मां को काफी पसंद आई. हर तरह से नेहा को परखने के बाद उन्होंने सौम्या से इस रिश्ते की सहमति देते हुए जल्द सगाई करने का वादा भी किया. एक बार वे नेहा को अपने पति और नितिन से भी मिलाना चाहती थीं.

सौम्या ने तुरंत बाजी अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं समधनजी. एकदो दिनों में मैं खुद ही अपनी बच्ची को आप के यहां भेज दूंगी. अब तो यह आप की बच्ची भी है. नितिन से मिलवा दीजिएगा. आप चाहें तो नितिन और उस के पापा यहां आ कर भी बच्ची को देख सकते हैं.’’

‘‘जी जरूर,’’ खुश होते हुए नितिन की मां ने कहा. इस बीच नितिन की मां ने यह कह कर नितिन को सौम्या के यहां भेजा कि अपनी आंखों से लड़की देख ले. नितिन और नेहा उस दिन सुबह से शाम तक सौम्या के यहां ही थे और जी भर कर इस बात का मजा ले रहे थे.

घर जा कर नितिन ने औपचारिक रूप से लड़की के लिए अपनी सहमति दे दी. अब तो नेहा 4-6 दिन में एक बार नितिन के यहां हो ही आती थी. इधर उन की सगाई का दिन एक महीने बाद का तय कर दिया गया था. नितिन चाहता था कि सगाई से पहले वह मां को हर बात सचसच बता दे. पर सौम्या ने उसे फिलहाल खामोश रहने की सलाह दी.

इस घटना के करीब 20-22 दिन बाद की बात है. उस दिन नितिन औफिस के काम से शहर के बाहर था. अचानक शाम के समय औफिस से लौटते ही नितिन के पिता के सीने में तेज दर्द होने लगा. नितिन की मां के हाथपैर फूल गए. उन्हें सम झ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें. वे बहुत घबरा गई थीं. रोतेरोते उन्होंने नितिन को फोन किया. नितिन ने तुरंत नेहा से अपने घर पहुंचने की गुजारिश की. नेहा दौड़ीदौड़ी नितिन के घर पहुंची. रास्ते में ही उस ने एंबुलैंस वाले को फोन कर दिया था.

घर पहुंच कर उस ने एक तरफ नितिन की मां को संभाला तो दूसरी तरफ पिता को. उस ने पिता के टाइट कपड़े ढीले कर उन्हें आराम से बिस्तर पर लिटा दिया. पैर नीचे की तरफ और सिर थोड़ा ऊपर की ओर उठा कर रखा ताकि ब्लड की सप्लाई हार्ट तक होती रहे.

तब तक एंबुलैंस पहुंच गई. वह तुरंत उन्हें एंबुलैंस में ले कर अस्पताल पहुंची और आईसीयू में ऐडमिट करवाया. उन्हें हार्टअटैक आया था. नेहा सब से सीनियर डाक्टर से रिक्वैस्ट करने लगी कि वे ही इस केस को हैंडल करें. आननफानन  सारे इंतजाम हो गए. नितिन की मां एक कोने में बैठी नेहा की दौड़भाग देखती रहीं. नेहा नितिन के पिता की केयर अपने पिता जैसी कर रही थी. यह सब देख कर नितिन की मां की आंखें भर आई थीं.

नेहा रातभर जाग कर पिता का ध्यान रखती रही. हर तरह की दौड़भाग करती रही. अगले दिन उन की सर्जरी की बात उठी. नेहा ने रुपयों का इंतजाम किया. कुछ नितिन की मां से लिया और कुछ अपनी तरफ से मिला कर फटाफट रुपए जमा करा दिए. औपरेशन कामयाब रहा. शाम तक नितिन भी आ गया.

2 दिनों बाद जब नितिन के पिता थोड़े नौर्मल हुए तो उन्होंने रुंधे गले से नेहा की तारीफ की. उसे बेटी कह कर गले लगा लिया. 4-6  दिन में उन्हें छुट्टी दे दी गई. वे घर आ गए. अब तक सगाई का दिन भी नजदीक आ गया था. सगाई से 2 दिन पहले नितिन ने अपने पेरैंट्स को सचाई बताने की सोची.

नितिन ने कांपती जबान से कहा, ‘‘पापा, मां, मैं आप लोगों से  झूठ बोल कर शादी नहीं कर सकता. दरअसल,  नेहा हमारी जाति की नहीं है और वह सौम्या दीदी की बेटी भी नहीं है. नेहा तो वही लड़की है जिसे मैं… प्यार करता था.’’

नितिन ने सच बता कर निगाहें झुका लीं. वह डर रहा था कि शायद अब उस के पेरैंट्स नाराज हो उठेंगे. पर ऐसा नहीं हुआ. दोनों मुसकरा रहे थे.

नितिन के पिता ने कहा, ‘‘बेटा, इस बात का एहसास हमें हो गया था. जिस प्यार और अपनेपन से नेहा हमारी देखभाल कर रही थी और फिक्रमंद थी, उसी से पता चल रहा था कि वह तुम से कितना प्यार करती है. तुम दोनों के इस प्यार के बीच हम कतई नहीं आ सकते. वैसे भी, नेहा किसी भी जाति की हो, उसे हम ने बेटी तो मान ही लिया है न.’’

नितिन की आंखें खुशी से भर उठीं. उस की मां ने स्नेह के साथ कहा, ‘‘बेटे, तुम दोनों की जोड़ी बहुत खूबसूरत है और इस खूबसूरत रिश्ते को जोड़ने में मदद करने वाली सौम्याजी भी हमारी रिश्तेदार हैं. कल हम सब उन के घर मिठाई ले कर चलेंगे.’’

अगले दिन सौम्या का घर हंसी और ठहाकों से गूंज रहा था. खिलेखिले चेहरों के बीच बैठी सौम्या के पास अब रिश्तेदारों की कमी नहीं थी.

रेड ड्रेस में शिल्पा शेट्टी ने दिखाया क्लासी लुक, फैंस लुटा रहे है प्यार

इन दिनों शिल्पा शेट्टी अपनी फिल्म ‘सुखी’ को ले कर काफी सुर्खियों में थीं, लेकिन अब वे सोशल मीडिया पर अपने नए लुक को ले कर चर्चाओं में बनी हुई हैं. एक्ट्रेस ने अपने इंस्टाग्राम पर नया पोस्ट शेयर किया है जिसे देख कर उन के फैंस घायल हो रहे हैं. दरअसल, शिल्पा शेट्टी रेड कलर की ड्रेस में काफी बोल्ड लग रही हैं जो देखतेदेखते सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है.


आप को बता दें कि खूबसूरत और ग्लैमरस एक्ट्रेस शिल्पा शेट्टी अपने स्टाइल के लिए जानी जाती हैं. उन का हर एक स्टाइल मीडिया की हेडलाइन में छाया रहता है. ऐसा ही हाल में उन का रेड कलर की ड्रेस में क्लासी लुक धड़ल्ले से वायरल हो रहा है.

शिल्पा शेट्टी अक्सर साड़ी लुक में ज्यादा नजर आती हैं, पर अब काफी समय बाद वे ऐसे क्लासी लुक में दिखी हैं. अब इस फोटो को देख कर उन के फैंस तारीफ करते नहीं थक रहे हैं, वे लगातार उन की फोटो पर कमेंट बरसा रहे हैं.


शिल्पा शेट्टी ने अपने इस पोस्ट को शेयर करते हुए कैप्शन भी दिया है. उन्होंने लिखा है ‘रेड हॉट’ और एक हॉट इमोजी के साथ फायर इमोजी भी शेयर किया है. इस ड्रेस में शिल्पा शेट्टी गोर्जियस लग रही हैं. इस से पहले भी शिल्पा कई बार नएनए लुक्स के पोस्ट शेयर कर फैंस के दिलों पर वार कर चुकी हैं. एक्ट्रेस कभी ट्रेडिशनल लुक तो कभी बोल्ड लुक में धमाल मचाती नजर आती हैं.

ब्लैक साड़ी में कहर ढाती दिखीं भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा, फैंस हुए घायल

भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा अपनी हॉट फोटोज के लिए अक्सर चर्चाओं में बनी रहती हैं. एक्ट्रेस सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव हैं और उन की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती हैं.

इन दिनों मोनालिसा की एक फोटो ने सोशल मीडिया पर तहलका मचा दिया है. जी हां, एक्ट्रेस ब्लैक साड़ी में कहर ढाती हुई नजर आ रही हैं. उन के फैंस उन्हें देख कर घायल हो रहे हैं.

 

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आप को बता दें कि एक्ट्रेस मोनालिसा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को अपडेट करते हुए एक पोस्ट शेयर किया है जिस के आते ही सोशल मीडिया पर तहलका मच चुका है. इस पोस्ट में एक्ट्रेस ब्लैक साड़ी में नजर आ रही हैं. उन का यह लुक काफी बोल्ड है. वे अलगअलग तरह के पोज देती हुई नजर आ रही हैं.

भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा की इन फोटोज पर फैंस जम कर प्यार बरसा रहे हैं. साथ ही लोग एक्ट्रेस की इन बेहतरीन फोटोज पर जम कर कमेंट कर रहे हैं.

भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. एक्ट्रेस अक्सर अपने फैंस के साथ तस्वीरें और वीडियोज शेयर करती रहती हैं. एक्ट्रेस के हर पोस्ट पर फैंस प्यार बरसाते हैं.

 

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बताते चलें कि भोजपुरी एक्ट्रेस मोनालिसा ने कई फिल्मों में अपने अभिनय का जलवा बिखेरा है. उन्होंने निरहुआ से लेकर पवन सिंह तक के साथ काम किया हैं.

एक्ट्रेस मोनालिसा सलमान खान के शो ‘बिग बॉस’ में नजर आई थीं. इसी शो से मोनालिसा को असल पहचान मिली थी. इस के बाद अब एक्ट्रेस मोनालिसा टीवी की दुनिया में धमाल मचा रही हैं. मोनालिसा ने कई टीवी सीरियल्स में काम किया है. इस लिस्ट में ‘नजर’, ‘बेकाबू’ जैसे टीवी शोज के नाम शामिल हैं.

जवाब : अनसुलझे सवालों के घेरे में माधुरी- भाग 3

‘मम्मा, मेरा नाम सप्तक क्यों है?’

‘बेटा, सप्तक अर्थात सात सुर सा रे गा मा पा धा नी, तुम मेरे जीवनरूपी गीत के सुर हो.’

‘मां, आप गाती क्यों नहीं?’

‘वो बेटा, कभीकभी जीवन में कुछ फैसले मानने पड़ते हैं.’

‘मम्मा, आप कोई भी बात ऐसे ही मान लेती हो. ऐसा होता आया है, इसलिए हम बात क्यों मानें? हमें पहले यह जानना चाहिए की जो हो रहा है वह क्यों हो रहा है.’

‘पापा और दादी मुझे होस्टल भेजना चाहते हैं, पर मैं नहीं चाहता, उन्हें मेरा नाम भी पसंद नहीं है. वह भी बदल देंगे शायद. मम्मा, आप दादी से बात करोगी?’

सुमित ने मुझे इस विषय में कुछ नहीं बताया था. शादी के वचन आज कानों में तेज चिल्ला रहे थे, ‘आप अपने हर निर्णय में मुझे शामिल अवश्य करें.’

परंतु मैं फिर भी जाग नहीं पाई.

‘बेटा, दादी जो कहती हैं…’

‘मैं जानता था आप से नहीं होगा. मैं दादी से बात खुद कर लूंगा.’

फिर मुंह फेर कर सप्तक तो सो गया था, परंतु 13 साल से सोई अपनी मां को जगा दिया था उस ने. मेरा 10 साल का बेटा इतना बड़ा कब हो गया, मैं जान ही न पाई. शादी के जो वचन मेरे कानों में आ कर फुसफुसाते थे, आज वे पूरी तरह से आ कर सामने खड़े हो गए थे.

कितने पुरुष निभाते हैं ये सारे वचन? शायद एक भी नहीं, उन से तो निभाने की उम्मीद तक नहीं की जाती. मेरे अब तक के जीवन में समझौता केवल मैं ने किया है, वचन केवल मैं ने निभाए हैं. सुमित को तो शायद याद भी नहीं कि उन्होंने कोई वचन भी दिया था.

वह इसलिए क्योंकि पुरुष बड़ी चतुराई से इन वचनों को भूल जाता है परंतु स्त्री को ये वचन भूलने ही नहीं दिए जाते. अपने सासससुर की सेवा न करने पर क्या किसी दामाद को कभी कठघरे में खड़ा करता है यह समाज? उस की लाख बुराइयों को भी छिपा लिया जाता है. परंतु एक बहू जब ऐसा करती है तो बिना कारण जाने उसे अनगिनत गलत संबोधनों से नवाजा जाता है. तानेउलाहने सुन कर भी जो चुप रहे उसी स्त्री को अच्छी बहू का मैडल मिलता है. कभीकभी तो वह भी नहीं मिलता.

उस दिन समझ पाई थी मैं, शादी के इन वचनों को बनाया ही इसलिए गया था ताकि स्त्रियों को पुरुषों के ऊपर निर्भर रखा जा सके. यह पूरी प्रथा ही पितृसत्तात्मक सोच के अहं को संतुष्ट करने के लिए बनाई गई थी. स्त्री को अपने सुखों के लिए किसी पर निर्भर क्यों रहना पड़ता है?

पंडितों ने अपनी तथा पुरुष संप्रभुता को बनाए रखने के लिए ये सारे नियमकानून बनाए थे.

मैं अपने बेटे को पुरुष होने का दंभ भरते हुए नहीं देख सकती थी. मैं उसे इस सोच के साथ बड़ा होता नहीं देख सकती कि हर स्त्री को अपनी रक्षा अथवा अपने फैसले लेने के लिए पुरुष की आवश्यकता होती है. अपने लिए तो फैसला अब मैं खुद लूंगी.

अगले दिन सुबह ही मैं ने सुमित को बता दिया था कि मैं ने नोएडा में रहने का निर्णय लिया है. घर में तूफान आ गया था. सबकुछ बहुत कठिन था, परंतु मेरे ससुर, देवर और छोटी ननद इस बार चट्टान की तरह मेरे साथ खड़े थे. अगर वे साथ न भी होते तो भी मैं पीछे हटने वाली नहीं थी.

मेरी सास ने मुझे इस के लिए कभी भी माफ नहीं किया था. परंतु पिछले 15 सालों से भी तो वे मुझे अकारण ही सजा दे रही थीं.

जया की शादी के अगले ही दिन हम नोएडा आ गए थे. सुमित का असहयोग आंदोलन यहां आ कर भी जारी था. मांबेटे की जुगलबंदी मुझे परेशान करने के तरीके निकालती रहती थी.

मैं ने कुछ दिनों बाद ही एक स्कूल में संगीत की शिक्षा देनी शुरू कर दी थी. धीरेधीरे सुमित भी समझने लगे थे कि अब मेरा पीछे लौटना नामुमकिन था.

समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सप्तक जब फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने कनाडा गया, तो उसी दौरान मैं ने अपने संगीत स्कूल की नींव डाली थी.

सप्तक ने जब अलीना से विवाह का निर्णय लिया तब भी सारे परिवार के विरुद्ध खड़े हो कर मैं ने अपने बेटे के सही कदम का साथ दिया था. अलीना एक ईसाई परिवार की लड़की थी परंतु मेरे लिए यह बात कोई माने नहीं रखती थी.

धर्मजाति पर पता नहीं क्यों लोग इतना घमंड करते हैं. आप कहां पैदा होंगे, इस पर आप का क्या अधिकार? इसलिए कोई उच्च और कोई नीच कैसे हो सकता है?

सप्तक ने कोर्टमैरिज करने का निर्णय लिया था. इन झूठे कर्मकांडों और व्यर्थ के आडंबरों से मेरा भरोसा भी उठ चुका था. सुमित को भी सप्तक ने अपनी दलीलों से चुप करा दिया था. शादी के बाद हम ने एक छोटी सी पार्टी दे दी थी.

जब सारी उम्र मैं ने सप्तक को सही का साथ देना सिखाया, फिर आज जब वह अलीना का साथ दे रहा है तो मुझे बुरा क्यों लगा? हर प्रश्न का सही प्रतिवचन दिया था उस ने. मैं भी जानती थी कि अलीना और सप्तक  सही हैं.

क्या अपने बेटे को मुझे अलीना के साथ बांटना असहनीय लग रहा है? क्या मुझे उस का अलीना को सही और मुझे गलत कहना तकलीफ दे रहा है?

नहीं, शायद अपनी कल्पना को यथार्थरूप में देख कर मैं अभिभूत हो गई हूं. सप्तक मेरी कल्पना का ही तो मूर्तरूप है.

‘‘मम्मा, अंदर आ सकता हूं.’’

सप्तक की आवाज मुझे वर्तमान में खींच लाई थी.

‘‘हां बेटा, आ जाओ, अंदर आ जाओ.’’

‘‘आप मुझ से नाराज हैं न मां?’’

‘‘क्यों, क्या तुम ने कुछ गलत किया है?’’

‘‘नहीं, पर वो आज…’’

‘‘जो सत्य है वह अप्रिय हो सकता है परंतु वह गलत नहीं हो सकता. यदि आप किसी से प्रेम करते हैं तो उस के गलत को भी सही कहने के लिए बाध्य नहीं हैं. इसलिए मैं तुम से नाराज नहीं हूं बल्कि आज मुझे तुम पर गर्व हो रहा है.

‘‘मैं जैसे पुरुष की कल्पना किया करती थी, तुम ने उसे साकार कर के मेरे सामने खड़ा कर दिया है. मेरा बेटा एक ऐसा पुरुष है जो अपने पुरुष होने को मैडल की तरह नहीं पहनता.

‘‘जिस प्रकार वह सिर झुका कर अपनी मां का आदर करता है उसी प्रकार अपनी मां द्वारा लिए गए गलत निर्णय का विरोध भी करता है.’’

‘‘यह सब क्या कह रही हो तुम, मधु? क्या तुम्हें सप्तक की बात बिलकुल बुरी नहीं लगी?’’

‘‘सुमित, इस में बुरा लगने जैसा क्या है? मेरा बेटा किसी भी प्रश्न का प्रतिवचन देने से न स्वयं डरता है और न अपनी साथी, अपनी पत्नी को रोकता है.’’

‘‘हां, सही कह रही हो,’’ इतना कह कर सुमित चुप हो गए थे.

‘‘तो इस का मतलब है मैं ट्रेकिंग पर जा रही हूं,’’ अलीना भी मेरे कमरे में आ गई थी.

‘‘ट्रेकिंग पर बाद में जाना है, अभी तुम दोनों सोने जाओ. मुझे भी नींद आ रही है.’’

‘‘मम्मापापा, चलिए पहले आइसक्रीम पार्टी करते हैं,’’ सप्तक ने हंसते हुए कहा, ‘‘चलो, सब चलते हैं.’’

‘‘मैं फ्रिज से आइसक्रीम निकालती हूं, सप्तक तुम कोई अच्छी सी मूवी लगा लो,’’ यह कह कर अलीना चली गई.

हम सब भी उस के पीछे कमरे से निकल ही रहे थे कि अचानक सुमित मेरी तरफ मुड़ कर बोले, ‘‘वैसे तुम लिख क्या रही थी, मधु?’’

‘‘कुछ नहीं, एक समाज की कल्पना कर रही थी.’’

‘‘कैसे समाज की, मम्मा?’’

‘मैं तो बस, एक ऐसे समाज की कल्पना करती हूं जहां-

‘‘पुत्रजन्म पर अभिमान न हो

‘‘पुत्री का कहीं दान न हो

‘‘मानवता के धर्म का हो नमन

‘‘सत्यकथन पर न लगे ग्रहण

‘‘रिश्ते निभें बिना लिए वचन

‘‘हर प्रश्न को मिले प्रतिवचन.’’

खूनी पेंच: आखिर क्यों साधना को गंवानी पड़ी जान

रात का तीसरा पहर था. जाहिर है इस वक्त नींद अपने चरम पर होती है. तभी अचानक गोली चलने की आवाज के साथ एक चीख उभरी. मुझे लगा जैसे गैस का सिलेंडर फट गया हो. लाइट जला कर मैं किचन की ओर भागा, वहां सबकुछ ठीकठाक था. तभी मेरी नजर अपने घर के सामने वाले मकान पर पड़ी, जो कैप्टन अनूप का था. वहां से किसी के रोने की आवाज आ रही थी.

देखतेदेखते आसपास के सारे लोग जाग गए थे. एकाध हिम्मत दिखा कर बाहर आया. अमूमन कालोनी के लोग एकदूसरे से दूरी बना कर रखते हैं. इसलिए लोग अपनेअपने हिसाब से अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे. जब मैं ने देखा कि एक पड़ोसी तहकीकात में लगा है तो मैं भी बाहर आ गया.

‘‘यह चीख कहां से उभरी?’’ मैं ने वहां मौजूद पड़ोसी से पूछा.

‘‘कुछ समझ में नहीं आ रहा. मेरा खयाल है गोली की आवाज इसी घर से आई थी.’’

उन का भी वही अनुमान था, जो मेरा था. वह मकान कैप्टन अनूप का था. मेरी अनूप से ज्यादा बोलचाल नहीं थी. वैसे भी वह यहां कम ही रहता था. उस की फैशनेबल बीवी साधना भी कालोनी वालों से ज्यादा वास्ता नहीं रखती थी. वह अपने आप में ही खोई रहती थी.

अनूप ने इस मकान को 5 साल पहले खरीदा था. बाद में उसे तुड़वा कर आधुनिक शैली का बनवाया. घर में 2 बेटे उस की बूढ़ी मां व साधना के अलावा कोई नहीं था. बाकी नौकरचाकर कितने थे मुझे पता नहीं था. बड़ा बेटा 16 साल का था और छोटा 14 साल का.

उसी दौरान किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था, सो पुलिस आ गई. वहां मौजूद सभी लोग जानने के लिए उत्सुक थे कि आखिर गोली किसे लगी. मरा कौन और वजह क्या थी? तभी पुलिस वाले खून से लथपथ एक महिला को स्ट्रेचर पर लाद कर बाहर आए. जिसे वह अस्पताल ले गए. वह महिला कैप्टन अनूप की पत्नी साधना थी. पुलिस साधना के बड़े बेटे अर्नव से पूछताछ करने लगी.

‘‘क्या कोई अंदर आया था?’’ पुलिस इंस्पेक्टर ने पूछा.

‘‘मुझे नहीं मालूम. मैं सो रहा था.’’ अर्नव डरते हुए बोला

‘‘डरो मत. तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा. सचसच बता दो. पुलिस तुम्हारी मां के हत्यारे का जरूर पता लगा लेगी.’’अधेड़ पुलिस इंस्पेक्टर ने अर्नव को पुचकारा तो वह फफक कर रो पड़ा. उस के छोटे भाई का तो पहले से ही रोरो कर बुरा हाल था. वह दादी की गोद में बैठा था. खबर पा कर साधना का एक चचेरा देवर तेजबहादुर भागते हुए वहां आया. वह सरकारी विभाग के किसी ऊंचे ओहदे पर था.

‘‘अचानक यह सब कैसे हो गया?’’ तेज बहादुर ने हैरत से पूछा.

‘‘आप इस परिवार को जानते हैं?’’ इंस्पेक्टर ने उस से पूछा.

‘‘सर, साधना मेरी भाभी थीं.’’ तेज बहादुर ने बताया, ‘‘मैं इस परिवार का स्थानीय गार्जियन हूं…’’ तेज बहादुर अपनी बात पूरी करते उस से पहले अस्पताल से खबर आ गई कि साधना की मौत हो गई. यह खबर सुन कर सब सदमे में आ गए. तेजबहादुर की आंखें भर आईं. अनूप उस समय लंदन में था. खबर मिली तो जल्दबाजी कर के वह भी घर लौट आया. अनूप भी नहीं समझ पाया कि साधना का कत्ल क्यों हुआ?

पुलिस ने अनूप से सवाल किया,‘‘आप को किसी पर शक है?’’

‘‘मैं यहां रहता ही कितना हूं, जो किसी पर शक करूं.’’ वह बोला.

‘‘हो सकता है किसी से पुश्तैनी जमीन जायदाद का झगड़ा हो?’’ इंस्पेक्टर ने कहा.

‘‘ऐसा कुछ नहीं है.’’ अनूप बोला. तभी एक बूढ़ी महिला नजर आई. इंस्पेक्टर ने उस की तरफ इशारा कर के पूछा, ‘‘ये कौन हैं?’’

‘‘मेरी मां हैं.’’ अनूप ने जवाब दिया.

‘‘यहीं रहती हैं?’’

‘‘हां, मेरी गैरमौजूदगी में घर की देखभाल यही करती हैं.’’

‘‘तेजबहादुर कौन है, क्या यह आप की मरजी से यहां रहता है?’’ तेजबहादुर का नाम सुनते ही अनूप का चेहरा बन गया. जिसे इंस्पेक्टर की पारखी नजर ताड़ गई.

अनूप ने सफाई दी, ‘‘वह मेरा चचेरा भाई है. उसे इजाजत की क्या जरूरत है. अगर मेरे परिवार को रातबिरात डाक्टर या दवा की जरूरत हुई तो कौन ला कर देगा?’’

इंस्पेक्टर ने घर में मौजूद अनूप की मां से पूछा, ‘‘मांजी, साधना की दिनचर्या क्या थी?’’ जवाब देने की जगह वह सुबकने लगीं. वह उठ कर जाने लगीं. अनूप ने रोकने की कोशिश की मगर रुकी नहीं. इंस्पेक्टर को अटपटा लगा. कहां लोग हत्यारों की तलाश के लिए पुलिस की मदद करते हैं वही यहां कोई कुछ भी बताने के लिए तैयार नहीं था.

कम पढ़ेलिखे लोग ज्यादा दिमाग नहीं लगाते. इसलिए इंस्पेक्टर साधना की आया को थाने ले आए. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘तुम साधना के यहां कब से हो?’’

‘‘पिछले 2 सालों से.’’ वह सहमी हुई थी.

‘‘साधना के यहां कौनकौन आता था.’’ इस सवाल पर वह नजरें चुराने लगी. तभी इंस्पेक्टर ने अपना पुलिसिया रौब दिखाया तो वह असलियत पर आ गई.

‘‘ज्यादातर तेज साहब.’’ उस ने बताया.

‘‘उन के अलावा और कौनकौन आता था?’’

‘‘और लोग आते थे तो नीचे ड्राइंगरूम में बैठते थे. मेरा काम था उन्हें चायपानी देना. मैं उन्हें शायद ही पहचानूं.’’

‘‘तेज अंकल कब आते थे?’’

‘‘अकसर सुबह आते थे. कभीकभी रात में भी आ जाते थे.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चलता कि वे रात में भी आते थे?’’

‘‘मैं काम खत्म कर के रात 9 बजे के आसपास चली जाती हूं. उस समय उन्हें कई बार मेमसाहब के कमरे में आते देखती थी. मेमसाहब उन्हें देख कर खुश हो जाती थीं. उन्हें अपने बेडरूम में बिठातीं, वह बेडरूम जहां बिना पूछे उन के बेटों को भी जाने की इजाजत नहीं थी. कहती थीं यह उन का निजी कमरा है.’’

‘‘बच्चे कहां रहते थे?’’

‘‘उन का अलग कमरा है.’’

‘‘और उन की बूढ़ी सास?’’

‘‘उन का भी अपना अलग कमरा है.’’

यहां भले ही हाई सोसाइटी के लोग रहते थे, मगर अंदर से परिवार बिखरा हुआ था. पति शिप पर था. पत्नी की अलग दुनिया. बच्चों को हर सुखसुविधा दे कर साधना उन का मुंह बंद कराने की भरसक कोशिश करती. बातोंबातों में आया ने बताया कि एक नेपाली कुक भी है, जो मकान में ही बने सर्वेंट क्वार्टर में रहता था.

कुक लापता था. उस की तलाश जारी थी. साधना का हार गायब था, जिस की कीमत 5 लाख रुपए थी. तफ्तीश में पता चला कि कुक एक दिन पहले ही छुट्टी ले कर चला गया था. पुलिस पेशोपेश में पड़ गई. अब शक करे तो किस पर. पुलिस को साधना की मित्रमंडली पर भी शक था.

पुलिस ने उन की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला वे सब की सब शहर के नामीगिरामी उच्चपदाधिकारियों की पत्नियां थीं. पूछताछ में पुलिस को उन से सुराग नहीं मिला. अलबत्ता पुलिस को यह जरूर पता चला कि तेजबहादुर और साधना ने साझे में एक जिम खोल रखा था.

वह शहर का मशहूर जिम था. साधना के उच्च संपर्कों के चलते वहां सिर्फ धनाढ्य लोगों की भीड़ रहती थी. पुलिस को लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि जिम के पैसों को ले कर दोनों में विवाद बढ़ गया हो और बात हत्या तक जा पहुंची हो. इसलिए इंस्पेक्टर ने तेजबहादुर से पूछा, ‘‘जिम आप लोगों के साझे में था?’’

‘‘हां.’’ तेज ने जवाब दिया.

‘‘सालाना कितनी आमदनी हो जाती है?’’

‘‘इनकम टैक्स वालों से पूछो,’’ वह चिढ़ गया. जाहिर था वह ऐसी कोई निजी जानकारी साझा नहीं करना चाहता था.

‘‘वही बता दीजिए जो इनकम में दिखाते हैं?’’ इंस्पेक्टर ने कहा.

‘‘10 लाख.’’

‘‘आप का हिस्सा कितना था?’’

‘‘हिस्से को ले कर कोई समस्या नहीं थी. साधना मेरी भाभी थीं. वह जो हिसाब लगा कर देती थीं, वह मुझे मंजूर था.’’ कहने को तो तेज ने कह दिया मगर वह यह भूल गया कि शायद ही कोई हिसाबकिताब के मामले में कोताही बरतता हो. यदि बरतता है तो उस की कोई मजबूरी होगी.

इंस्पेक्टर के लिए यह पता लगाना बेहद जरूरी था कि तेजबहादुर की ऐसी क्या मजबूरी थी, जो वह पैसों के मामले में हुज्जत नहीं करता था. एकबारगी पुलिस को लगा कि हो न हो इस कत्ल के पीछे अनूप का हाथ हो? उस की चुप्पी यही साबित कर रही थी. इंस्पेक्टर ने उस से पूछा, ‘‘आप अपनी पत्नी के बारे में कुछ बताएंगे.’’

यह सुन कर अनूप के माथे पर बल पड़ गए. तभी इंस्पेक्टर ने कहा, ‘‘मसलन उन का बैकग्राउंड क्या था, आप लोगों के बीच सब ठीक चल रहा था न?’’

‘‘मैं ने उस से प्रेमविवाह किया था. वह मेरे एक सीनियर अधिकारी की बेटी थी.’’ अनूप ने बताया.

‘‘वह आजादखयाल की थीं. उन के तौरतरीकों को ले कर आप को कोई ऐतराज नहीं था?’’ इंस्पेक्टर ने अगला सवाल किया.

‘‘जी बिलकुल नहीं, घर में अकेले रह कर वह क्या करती. उस की एक मित्रमंडली थी, जिम था. वह अपना समय उन लोगों के बीच गुजारती थी.’’

‘‘महीनों बाद जब आप आते थे, तब उन का व्यवहार कैसा होता था?’’
‘‘सामान्य रहता था.’’

‘‘उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद भी उन का उन्मुक्त लिबास जैसे जींसटौप पहनना, घर में बच्चों से ज्यादा न घुलनामिलना, अपने निजी कमरे में बच्चों को बिना इजाजत न आने देना. इस से आप को नहीं लगता कि सब कुछ सामान्य नहीं था.’’ इंस्पेक्टर ने कहा.

‘‘वह क्या पहनती थी क्या नहीं, इस से आप को कोई मतलब नहीं होना चाहिए. उस की पसंद और नापसंद पर जब मुझे कोई ऐतराज नहीं था तो आप को भी नहीं होना चाहिए.’’ अनूप उखड़ा.

‘‘अच्छा यह बताइए कि आप रिवौल्वर रखते हैं?’’ इंस्पेक्टर ने प्रसंग बदला.

‘‘हां, मेरे पास लाइसेंसी रिवौल्वर है.’’ अनूप ने बताया.

‘‘क्या मैं उसे देख सकता हूं.’’

“क्यों नहीं.’’ अनूप ने अपने बड़े बेटे से अलमारी में रखा रिवौल्वर मंगा लिया.

इंस्पेक्टर रिवौल्वर को उलट पलट कर देखने लगे. उसी समय इंस्पेक्टर के मोबाइल पर थाने से फोन आया. उन्हें बताया गया कि साधना वाले केस से संबंधित एक शख्स को हिरासत में लिया गया है.

यह सुनते ही इंस्पेक्टर जीप ले कर थाने लौट गए. जब वह थाने पहुंचे तो उन्हें थाने में एक आदमी बैठा मिला. देखने से वह नेपाली लग रहा था. एक कांस्टेबल ने बताया कि यह वही नेपाली है जो साधना के यहां खाना बनाने का काम करता था. एसएसआई साहब इसे लखनऊ से ढूंढ़ कर लाए हैं.

‘‘मेम साहब के यहां कब से काम करते हो?’’ इंस्पेक्टर ने कुक से पूछा.

2 साल से साहब,’’ उस का जवाब था.

‘‘मेमसाहब कैसी महिला थीं? सचसच बताना नहीं तो तुम्हें ही खून के इल्जाम में जेल भेज दूंगा.’’ इंस्पेक्टर ने धौंस जमाई.

वह घबरा गया और बोला, ‘‘साहबजी, मैं आप के हाथ जोड़ता हूं इस खून से मेरा कोई लेनादेना नहीं है. घटना से एक दिन पहले मैं मेमसाहब से छुट्टी ले कर लखनऊ अपने रिश्तेदारों से मिलने गया था.’’

‘‘झूठ बोल रहे हो तुम. तुम ने 5 लाख के हीरे के हार के लिए मेमसाहब का कत्ल कर दिया.’’ इंस्पेक्टर उस पर गरजे.

‘‘हीरे, कौन से हीरे का हार साहब?’’ वह बोला, ‘‘मैं सच कह रहा हूं. मैं किसी हार के बारे में नहीं जानता. मेरा तो मेमसाहब के कमरे में घुसना भी मना था. मेरा काम था खाना बनाना. उन के कमरे में फूलमती ही नाश्तापानी ले जाती थी.’’

कुछ सोच कर इंस्पेक्टर ने आगे कहा, ‘‘चलो मान लेते हैं फिर यह बताओ कि कौन हो सकता है? तुम्हें किसी पर शक है?’’

डरतेडरते उस ने एक राज उगल कर सब को सकते में डाल दिया, ‘‘मेमसाहब का तेजबहादुर से चक्कर था. जब भी वह मेमसाहब से मिलने आते थे तो बहुत देर तक उन के कमरे में बैठ कर खुसुरफुसुर करते थे.’’

‘‘तुम ने उन्हें कभी आपत्तिजनक अवस्था में देखा था?’’

‘‘नहीं, पता नहीं दोनों बंद कमरे में अकेले क्या करते थे?’’

‘‘उस समय उन के बेटे कहां रहते थे.’’

‘‘साहबजी, वे तो सुबह ही स्कूल चले जाते थे. तेजबहादुर तभी आते थे जब बाबा लोग घर पर नहीं रहते थे.’’

नेपाली साधना के बच्चों को बाबा कहता था. इंस्पेक्टर ने सोचा कि मान भी लिया जाए कि दोनों में अवैध संबंध थे तो भी हत्या की वजह उन की समझ में नहीं आ रही. हो न हो इस हत्या के पीछे किसी और का हाथ हो.

वह दूसरे बिंदु से हत्या का कारण तलाशने लगे. क्या अनूप को अपनी बीवी के चालचलन की जानकारी नहीं थी? जरूर होगी क्योंकि उस की मां साधना के साथ रहती थी. वह जरूर बहू के चालचलन से उसे अवगत कराती होगी. हो सकता है अनूप ने ही भाड़े के हत्यारे से उस की हत्या करवा दी हो?

पत्नी की चरित्रहीनता भला कौन पति स्वीकारेगा. इंस्पेक्टर पुन: अनूप के पास पहुंच गए. उन्होंने उस से पूछा, ‘‘कैप्टन साहब, तेज साहब का कितना दखल है आप के घर में यानी आप लोग उन पर कितना भरोसा करते थे?’’

अजीब सवाल करते हैं. कल को आप मेरे ही घर में मुझ से ही ऐसा सवाल करने लगेंगे.’’ अनूप को बुरा लगा. उस ने आगे कहा, ‘‘तेज मेरा चचेरा भाई है. वह इस घर का एक तरह से केयरटेकर था. मेरी गैरमौजूदगी में वही सब कुछ देखता था.’’

‘‘सब का मतलब क्या?’’

‘‘इमरजेंसी में जब भी मेरी मां या घर का कोई सदस्य उसे बुलाता था वह तुरंत आ जाता था.’’

‘‘वह इतने बड़े अधिकारी हैं, क्या उन्हें यह असम्मानजनक नहीं लगता था?’’

‘‘होगा अधिकारी अपने औफिस का. मगर हमारे लिए तो वह सिर्फ तेज था.’’

‘‘आप ने एक बार भी अपनी बीवी के हत्यारे के बारे में जानने की पहल नहीं की. न ही आप को कोई गरज है.’’

‘‘मैं भला क्यों नहीं जानना चाहूंगा. साधना मेरी बीवी थी. जब से वह गई है, मैं पूरी तरह से टूट चुका हूं. कौन पति नहीं चाहेगा कि उस की पत्नी के कातिल का पता चले.’’

‘‘आप मुझे सहयोग दीजिए. मैं आप की मां से कुछ पूछना चाहता हूं.’’ इंस्पेक्टर को लगा लोहा गरम है. अनूप ने मां को बुलाया. इंस्पेक्टर ने पूछा, ‘‘मांजी रात क्या हुआ था?’’

सुन कर वह कहीं खो गईं. मानो उस रात की घटना उन की नजरों के सामने तैर गई हो. वह बोली,‘‘मैं सो रही थी तभी अचानक चीख की आवाज आई. मैं कुछ समझ पाती तभी अर्नव भागते हुए मेरे पास आया. बोला मां को किसी ने गोली मार दी है. इतना सुनते ही मैं घबरा कर उठी. साधना के कमरे में गई तो देखा वह बेसुध जमीन पर पड़ी थी.’’

‘‘किसी को आप ने भागते हुए देखा था?”

‘‘कहां से देखती अंधेरा था.’’ मां की बात सुन कर इंस्पेक्टर के दिमाग में आया कि पहला चश्मदीद व्यक्ति अर्नव ही है. कोई सुराग न मिलने पर इंस्पेक्टर ने अर्नव से पूछा तो उस का भी वही जवाब था. जब गोली के साथ चीख उभरी तब उस की नींद टूटी. मां के कमरे में भागते हुए पहुंचा तो वह दर्द से छटपटा रही थी. घबरा कर वह दादी के कमरे में आया.

‘‘तुम ने किसी को भागते हुए देखा?’’ इंस्पेक्टर ने अर्नव से दूसरा सवाल किया.

‘‘नहीं.’’

कोई जानकारी न मिलने पर वह थाने लौट आए. उन्हें भरोसा था कि साधना की सास ही कोई सुराग बता सकती है. मगर वह भी दिग्भ्रमित थीं. बहरहाल इंस्पेक्टर ने हार नहीं मानी. उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. उन्हें वह गोली भी मिल गई. जिस से साधना का जिस्म छलनी किया गया था. उन्होंने उस गोली को अच्छी तरह से देखा. कुछ सोच कर उन की बांछें खिल गईं. वह तुरंत अनूप के पास पहुंच गए. अनूप कहीं जाने की तैयारी कर रहा था.

‘‘कहां जा रहे हैं?’’ इंस्पेक्टर ने पूछा.

‘‘मुंबई.’’

‘‘इतनी जल्दी. मुझे आप से कुछ और जानकारियां चाहिए.’’

‘‘सब तो जान चुके हैं. अब क्या बाकी रह गया है. कितने दिन मैं यहां अपनी नौकरी छोड़ कर रहूंगा?’’

‘‘आज के बाद आप को परेशान नहीं करूंगा. क्या आप उस रिवौल्वर को दोबारा दिखा सकते हैं?’’

अनूप ने अर्नव को रिवौल्वर लाने के लिए कहा. रिवौल्वर देखने के बाद इंस्पेक्टर ने कहा, ‘‘यह वह रिवौल्वर नहीं है जिसे कुछ दिन पहले आप ने मुझे दिखाया था.’’

अनूप इस बार अपनी बात दोहराता रहा. अंत में जब कोई हल निकलता दिखाई नहीं दिया तब इंस्पेक्टर ने धमकी दी, ‘‘आप उस रिवौल्वर को नहीं दिखा रहे तो मैं यही समझूंगा कि हत्या में आप का ही हाथ है.’’

‘‘आप के पास सबूत क्या है?’’ अनूप बोला.

‘‘सबूत मिल चुका है.’’ सुन कर अनूप सिहर गया.

‘‘आप रिवौल्वर मुझे देते हैं या फिर…’’ इंस्पेक्टर की बात पूरी होने से पहले ही तेजबहादुर वहां आ गया. वह बोला, ‘‘इंस्पेक्टर साहब, आप इन पर दबाव क्यों बना रहे हैं?’’

‘‘मैं दबाव नहीं बना रहा. मुझे सिर्फ वही रिवौल्वर चाहिए जिसे कुछ दिन पहले इन्होंने मुझे दिखाया था.’’

‘‘वह रिवौल्वर यही था.’’ तेज बहादुर बोला.

‘‘आप को कैसे पता?’’ इंस्पेक्टर का इतना कहना था कि वह बगलें झांकने लगा. इंस्पेक्टर को वह संदिग्ध लगा. संदिग्ध तो पहले से ही था मगर सरकारी अधिकारी होने के नाते बिना पर्याप्त सुबूत के उस पर हाथ डालना सही नहीं था.

‘‘इस का मतलब यह है कि आप दोनों को पता है कि असली रिवौल्वर कोई और है. देखिए, जितना जल्दी हो सच्चाई बता दीजिए वरना मुझे सख्ती करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा.’’

अचानक अनूप ने अपनी जेब से रिवौल्वर निकाला. जब तक तेज बहादुर संभलता उस ने तड़ातड़ कई गोलियां उस के सीने में उतार दीं. इंस्पेक्टर ने तुरंत अनूप को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जब अनूप को ले जाने लगी तो उस का बेटा अर्नव फफकफफक कर रोने लगा, ‘‘पापा, हम दोनों भाइयों का अब क्या होगा?’’

‘‘बेटा तुम्हें जेल हो जाती तो मैं अपने आप को कभी माफ नहीं कर पाता. मुझे गर्व है कि तुम ने जो किया ठीक किया. तुम्हारी मां ने न केवल मेरे साथ बेवफाई की बल्कि अपने जवान होते बेटों को भी नहीं बख्शा. ऐसी औरत को तुम ने जो सबक सिखाया उस पर मुझे फख्र है. याद रखना दोनों कत्ल मैं ने ही किए हैं. इसे सिर्फ मैं और तुम ही जानते हैं. यह राज कभी मत खोलना.’’ अर्नव ने सिर हिला कर हामी भरी. क्षण भर में अच्छाखासा परिवार छिन्नभिन्न हो गया.

अब इंस्पेक्टर की समझ में सब कुछ आ चुका था. क्या नहीं था उस घर में. रुपयापैसा, आलीशान घर, लग्जरी कार, ऐशोआराम की सभी आधुनिक चीजें वहां थीं, जिन्हें पा कर कोई भी बच्चा निहाल हो जाता. आज के बच्चों को और क्या चाहिए? सारी भौतिकवादी सुविधाएं पाने वाली साधना के लिए सिर्फ रुपया ही सब कुछ नहीं था, उसे तेजबहादुर जैसे लोगों के साथ की भी जरूरत थी.

आजाद ख्याल की साधना को उस के बेटे ने जो दंड दिया था वह अकल्पनीय था. अर्नव को अपनी मां का चालचलन पसंद नहीं था. वह अच्छी तरह जानता था कि तेज का उस की मां से क्या संबंध था. अनूप आखिरी वक्त तक अर्नव को बचाने का प्रयास करता रहा. हार को गायब करने के पीछे अनूप का यही मकसद था. ताकि पुलिस अपनी तफ्तीश का रुख बदल दे.

मगर जब उसे आभास हो गया कि पुलिस के पास वह गोली है जिस का रिवौल्वर उस के पास है तब अनूप ने तेज को मारने का प्लान बनाया. ताकि दोनों कत्ल का जिम्मेदार उसे ठहराया जाए. वह अर्नव की जिंदगी बरबाद करना नहीं चाहता था.

मेरा मंगेतर सेक्स करना चाहता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 25 वर्षीय युवती हूं. 2-3 महीने बाद मेरी शादी होने वाली है. मंगेतर एक बड़ी कंपनी में अच्छे ओहदे पर कार्यरत है. मगर इस के बावजूद एक चिंता भी है. दरअसल, मंगेतर शादी से पहले संबंध बनाना चाहता है. इतना ही नहीं वह मोबाइल पर पोर्न वीडियो भी भेजता रहता है और जब भी बात करो तो सैक्स पर बातचीत अधिक करना चाहता है. वीडियो कौल के दौरान वह मुझे न्यूड होने के लिए भी बोलता है. कहीं मेरा मंगेतर किसी मानसिक विकृति का शिकार तो नहीं है? मुझे क्या करना चाहिए, कृपया सलाह दें?

जवाब

शादी से पहले सैक्स संबंध बनाना कतई उचित नहीं है. अगर आप का मंगेतर आप पर इस के लिए दबाव डाल रहा है, तो उसे साफ मना कर दें. रही बात उस के किसी मानसिक विकृति से ग्रस्त होने की तो यह तभी जाना जा सकता है जब कोई उस के नजदीक रहे.

अगर आप का मंगेतर सिर्फ सैक्स की ही बात करता है, पोर्न फिल्में देखने का शौकीन है, तो जाहिर है यह एक विकृति ही है, जिसे सैक्स ऐडिक्शन कहते हैं.

सैक्स ऐडिक्शन यानी सैक्स की लत एक मानसिक रोग है, जो न सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि कैरियर के साथसाथ रिश्तों को भी प्रभावित करता है.

शोधकर्ता मानते हैं कि इस से पीड़ित व्यक्ति सैक्स फैंटेसी में खोया रहता है और उसे सैक्स पर बातें करना, पोर्न मूवी देखना, सैक्स करना अच्छा लगता है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि सैक्स के मामले में खुद पर काबू नहीं रखने वाले लोग अपने साथसाथ दूसरों की जिंदगी भी प्रभावित कर देते हैं. यदि ऐसा व्यक्ति खुद को परेशान या तनाव में महसूस करता है तो वह बारबार सैक्स करना चाहता है ताकि उस का तनाव यानी स्ट्रैस कम हो सके. आप का मंगेतर सैक्स ऐडिक्शन से पीड़ित है, यह तभी जाना जा सकता है जब वह खुद बताए या उस का कोई नजदीकी.

आप जो भी करें सोचसमझ कर और सावधानीपूर्वक. शादी गुड्डेगुड़ियों का खेल नहीं है. अगर आप को मंगेतर के व्यवहार से किसी विकृति का पता लग रहा हो तो आप यह खुद निर्णय लें कि आप को उस के साथ शादी करनी है अथवा नहीं.

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