श्यामली की करतूत : भाग 3

समीर के समझाने के बाद भी वह प्रेमी से मोबाइल पर घंटों बात करती थी. बात करने के तुरंत बाद ही विश्वजीत की काल हिस्ट्री को डिलीट भी कर देती थी. उसी दौरान एक दिन श्यामली से वही गलती हुई जो मियांबीवी में विवाद का कारण बनी. जिस के कारण दोनों की बसीबसाई गृहस्थी में पूरी तरह से आग लग गई. श्यामली के प्रति समीर का विश्वास टूटा तो दोनों की जिंदगी में प्रलय आ गई. लिहाजा अगली सुबह समीर उसे उस के मायके छोड़ आया.

श्यामली को मायके छोड़ने के कुछ समय बाद तक उस ने उसे कोई बात भी नहीं की. उस के कई महीनों बाद उस के ससुराल वालों ने उसे बुला कर ले जाने को कहा तो समीर ने उसे लाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद उस की ससुराल वालों ने समीर के परिवार वालों को बुला कर गांव में ही पंचायत की. श्यामली ने भरी पंचायत में अपनी गलती की माफी मांगते हुए भविष्य में ऐसी गलती न करने की बात कही.

उस के बाद श्यामली फिर से समीर के साथ रहने लगी थी. मायके से आने के कुछ दिनों तक तो श्यामली ठीकठाक रही. लेकिन एक बार 2 दिलों में आ चुकी दरार पूरी तरह से भर नहीं पाई. और समीर भी उसे पहला प्यार नहीं दे पा रहा था. जिस के कारण उस के मन में समीर के प्रति बसी छवि धूमिल होती चली गई.

ये भी पढ़ें- फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 1

वहीं दूसरी ओर विश्वजीत उस की जिंदगी में बहार बन कर उस के सपनों का राजकुमार बन गया. यही कारण रहा है कि कुछ समय बाद ही फिर से वह चोरीछिपे विश्वजीत राय से  मिलनेजुलने लगी थी.

उसी मिलनेजुलने के दौरान श्यामली ने विश्वजीत के सामने प्यार के आंसू बहाते हुए किसी भी तरह से समीर को अपनी जिंदगी से निकालने वाली बात कही. विश्वजीत भी श्यामली को हद से ज्यादा प्रेम करने लगा था. वह किसी भी कीमत पर उसे अपनी बीवी के रूप में देखना चाहता था. लिहाजा वह समीर रूपी कांटे को हटाने के लिए तैयार हो गया.

इस हत्याकांड को अंजाम देने से एक सप्ताह पूर्व ही श्यामली ने अपने प्रेमी विश्वजीत के साथ मिल कर समीर की हत्या का तानाबाना बुना. इस अंजाम को अमलीजामा पहनाने के लिए श्यामली ने घर में रखे 50 हजार रुपए खर्च वास्ते विश्वजीत को दिए.

विश्वजीत ने उन्हीं 50 हजार रुपए में से दिनेशपुर से 315 बोर का एक तमंचा और कारतूस खरीदे. हालांकि श्यामली ने विश्वजीत के साथ मिल कर समीर की हत्या का तानाबाना बुन तो लिया था.

लेकिन अंजाम को सोच कर वह बारबार परेशान हो रही थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि इतनी बड़ी बारदात को अंजाम देने के बाद अपने में कैसे हिम्मत जुटाएगी.

उसी समय 18 जून, 2020 को उस की मुलाकात उस की एक पुरानी सहेली प्रियंका से हुई. प्रियंका कई दिन से उसी के नजदीक रहने वाली राधिका नाम की सहेली के साथ रह रही थी. वह प्रियंका से मिली तो उस ने श्यामली के सामने अपनी दिल की पीड़ा सुनाते हुए उसे अपने साथ रखने वाली बात कही. श्यामली उस की परेशानी सुन कर उसे अपने घर ले आई.

प्रियंका के आ जाने से श्यामली का मनोबल भी बढ़ गया था. एक सप्ताह पहले समीर की हत्या की साजिश रचने के बाद श्यामली पूरी तरह से सतर्क हो गई थी. 19 जून 2020 की शाम को श्यामली ने समीर के मोबाइल पर फोन कर कहा कि उस की सहेली प्रियंका भी बीयर पीती है. आज रात वह हमारे ही साथ रहेगी. इसीलिए वह बीयर की 3 केन ले कर आए. श्यामली के कहने पर समीर उस शाम वियर की 3 केन ले कर आया.

उस दिन समीर के साथ काम करने वाले युवक सूरज और छोटू भी घर पर ही रुक थे. उस दिन श्यामली ने शाम को जल्दी ही खाना बनाया और समीर के आते ही उस ने सूरज और छोटू को खाना खिला कर ऊपर छत पर सोने के लिए भेज दिया था. उस के बाद समीर, श्यामली और प्रियंका तीनों ने एक साथ बैठ कर खाना खाया. खाना खाने के बाद तीनों ने एक जगह बैठ कर बीयर पी.

बीयर पीने के कुछ समय बाद ही समीर नींद में झूमने लगा. श्यामली ने समीर की बीयर में नींद की गोलियां मिला दी थीं. समीर के गहरी नींद में सोने के बाद ही उस ने विश्वजीत को फोन कर के उस की लोकेशन का पता किया. उस के बाद भी वह बारबार छत पर जा कर सूरज और छोटू के सोने का जायजा लेती रही.

उस समय सूरज और छोटू भी शराब पी कर सोए थे. नशे में होने के कारण वह दोनों भी शीघ्र ही सो गए थे. उन दोनों के सोते ही जब श्यामली को पूरा विश्वास हो गया कि वह दोनों भी गहरी नींद में सो चुके हैं तो उस ने जीने का दरबाजा अंदर से बंद कर दिया.

उस के बाद उस ने अपने प्रेमी विश्वजीत राय को फोन कर शीघ्र आने को कहा. श्यामली का फोन आने के तुरंत बाद ही विश्वजीत अपने 2 साथियों शिबू अधिकारी और महेश सरकार के साथ रात के कोई 2 बजे के आसपास उस के घर के पास पहुंचा. उस के घर के पास पहुंचते ही मछली बाजार के नजदीक विश्वजीत ने अपनी बाइक रोकी और फिर से श्यामली से फोन पर बात कर स्थिति का सही आंकलन किया.

उस के बाद विश्वजीत अपने साथियों शिबू अधिकारी और महेश सरकार के साथ समीर के घर पहुंचा. श्यामली ने पहले से ही घर की दूसरी ओर खुलने वाला दरवाजा खुला छोड़ दिया था.

उसी रास्ते से तीनों अंदर आ गए. अंदर जाते ही विश्वजीत ने गहरी नींद में सोए समीर के माथे पर तमंचा सटा कर गोली चला दी. माथे पर गोली लगते ही समीर की तुरंत ही मौत हो गई.

ये भी पढ़ें- पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 1

समीर की हत्या करने के बाद विश्वजीत अपने साथियों के साथ पीछे वाले दरवाजे से ही निकल गया. समीर की हत्या हो जाने के बाद श्यामली की हिम्मत जवाब दे गई. जब उस ने समीर को रक्तरंजित हालत में देखा तो वह बुरी तरह से घबरा गई थी. उस के बाद प्रियंका ने उसे हिम्मत बंधाई और धैर्य रखने वाली बात कही.

उस समय तक घर में गोली चलने की आवाज सुन कर छत पर सो रहे सूरज और छोटू भी पड़ोसी की छत से कूद कर नीचे आ गए थे. सूरज और छोटू के पूछने पर श्यामली ने बताया कि अभी थोड़ी देर पहले ही कुछ बदमाश घर में घुस आए थे, जिन्होंने आते ही समीर को गोली मार उस की हत्या कर दी और फिर फरार हो गए.

कुछ समय बाद ही पड़ोसी और समीर के मातापिता भी घर पहुंच गए थे. जब श्यामली कोई निर्णय नहीं ले पाई तो उस ने दूसरे कमरे में जा कर पंखे से चुन्नी बांधी और आए लोगों को उलझाने के लिए उस ने अपने को भारी सदमे में दिखा कर खुदकुशी करने का ड्रामा किया. लेकिन पुलिस की जांचपड़ताल के दौरान पंखे से लटकने वाली बात केवल उस का दिखावा ही था.

श्यामली द्वारा अपना जुर्म कबूलते ही पुलिस ने इस केस में तीव्रता दिखाते हुए मात्र 9 घंटे में ही उस के प्रेमी विश्वजीत राय, उस के साथी शिबू अधिकारी और महेश सरकार को गिरफ्तार कर लिया था. साथ ही पुलिस ने हत्यारोपियों की निशानदेही पर घटना में इस्तेमाल तमंचा, एक खोखा, बीयर में डाली गई नशे की बाकी बची 3 गोलियां और घटना में इस्तेमाल बाइक भी बरामद कर ली थी.

केस का खुलासा होते ही पुलिस ने इस मामले में हत्याकांड के मुख्य आरोपी श्यामली के प्रेमी विश्वजीत राय पुत्र शिबू अधिकारी, महेश सरकार, मृतक की बीवी श्यामली बिस्वास के खिलाफ आईपीएस की धारा 302/3/25 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर उन्हें 20 जून को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

इस मामले के खुलासे के बाद एसएसपी बरिंदरजीत सिंह ने इस केस की जांचपड़ताल में लगी पुलिस टीम में शामिल सीओ अमित कुमार, थानाप्रभारी विद्यादत्त जोशी, एसआई विजय सिंह, प्रदीप शर्मा, कौशल भाकुनी, अर्जुन गिरि, मनोज कुमार, धीरज वर्मा, नीरज शुक्ला, नरेश जोशी, नीरज भोज, दिनेश चंद्र, राकेश उप्रेती, जितेंद्र चौहान, मुकेश मेहरा, गोकुल टम्टा आदि को ढाई हजार रुपए का ईनाम दे कर सम्मानित किया. इस केस की तफ्तीश स्वयं थानाप्रभारी विद्यादत्त जोशी कर रहे थे.

ये भी पढ़ें- हैवानियत की हद पार : एक डाक्टर ने इनसानियत पर किया वार

श्यामली की करतूत : भाग 1

रात के कोई 2 बजे का वक्त रहा होगा. उस समय तक अधिकांश लोग गहरी नींद में खर्राटे भरते नजर आते हैं. लेकिन उस समय भी अगर किसी के घर से अचानक ही गोली चलने की आवाज आए तो नींद में खलल तो पड़ ही जाती है और उन लोगों की नींद उड़ ही जाती है, गोली की आवाज सुन कर अच्छेअच्छों के हौसले पस्त हो जाते हैं. उस समय जिस घर में गोली चली थी, वह समीर बिस्वास का घर था.

जिला ऊधमसिंह नगर के रुद्रपुर ट्रांजिट कैंप मुखर्जी नगर में 25 वर्षीय समीर बिस्वास अपनी पत्नी श्यामली और अपने 3 वर्षीय बेटे देव के साथ रहता था. जबकि उस के पिता निताई बिस्वास ट्रांजिट कैंप के नजदीक ही अरविंद नगर में अपनी बीवी अनीता बिस्वास और 2 बेटों सुकीर्ति और विष्णु के साथ रहते थे.

ये भी पढ़ें- हैवानियत की हद पार : एक डाक्टर ने इनसानियत पर किया वार

उस समय समीर बिस्वास अपने मकान के एक कमरे में अकेला ही सोया था. उस की बीवी अपने बेटे देव को साथ ले कर अपनी सहेली के साथ ही अपने बैडरूम में सोई थी. घर में अचानक गोली चली तो सब से पहले श्यामली ही चीखी थी. उस की चीख सुन कर लोगों को लगा कि समीर के घर में बदमाश घुस आए हैं और बदमाशों ने किसी को गोली मार दी.

घर में कोहराम मचा तो समीर बिस्वास की छत पर सो रहे उस के 2 दोस्त सूरज और छोटू भी छत से नीचे जाने वाली सीढि़यों की ओर दौड़े. लेकिन उन सीढि़यों पर नीचे से कुंडी लगी होने के कारण उन के सामने मजबूरी आ खड़ी हुई. फिर दोनों पड़ोसी के घर में प्रवेश कर उस की दीवार फांद कर समीर के कमरे  में जा पहुंचे.

सूरज और छोटू ने देखा कि समीर अपने बैड पर खून से लथपथ पड़ा हुआ था. जबकि उस की पत्नी श्यामली उसी के पास खड़ी बुरी तरह से दहाड़ मार कर रो रही थी. समीर के घर में रात में चीखनेचिल्लाने की आवाज सुन कर मोहल्ले वाले भी इकट्ठे हो गए थे. लेकिन कोई भी यह नहीं समझ पा रहा था कि बदमाशों ने समीर की हत्या क्यों कर दी.

अभी लोग इस मामले को पूरी तरह से समझ भी नहीं पाए थे कि उसी समय श्यामली रोतीबिलखती दूसरे कमरे में बंद हो गई. उस को कमरे में इस तरह से बंद होते देख सभी लोग हैरत में पड़ गए. लोगों की समझ में नहीं आ रहा था कि  उसे अचानक क्या हो गया.

तभी किसी ने खिड़की से झांक कर देखा तो श्यामली अपनी चुनरी को पंखे से बांध रही थी. जिस से लोगों को समझने में देर नहीं लगी कि वह पंखे से लटक कर आत्महत्या करने की कोशिश कर रही है. श्यामली की हरकतों को देख कर मौके पर मौजूद लोगों ने जैसेतैसे कर दरवाजा तोड़ कर उसे बाहर निकाला. उस के बाद उसे समझाने की कोशिश की.

मृतक समीर बिस्वास के चाचा अर्जुन बिस्वास कांग्रेस पार्टी के नेता थे. अपने भतीजे की हत्या होने की बात सुनते ही अर्जुन बिस्वास भी तुरंत समीर के घर पर पहुंचे और थाना ट्रांजिट कैंप में इस सब की जानकारी दी. हत्या की सूचना पाते ही थानाप्रभारी विद्यादत्त जोशी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस को यह सूचना सुबह लगभग 4 बजे मिली थी.

थानाप्रभारी ने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को भी दे दी थी सूचना पाते ही एसएसपी बरिंदरजीत सिंह, एसपी (सिटी) देवेंद्र पिंचा, एसपी (क्राइम) प्रमोद कुमार और सीओ अमित कुमार भी घटना स्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने काररवाई करते हुए समीर के कमरे की बारीकी से जांचपड़ताल की. समीर के माथे पर गोली लगी थी. समीर के शव को देख कर साफ जाहिर हो रहा था कि हत्यारों ने समीर के गहरी नींद में सोने के दौरान ही गोली मारी थी. खून उस के चेहरे से होते हुए सारे बिस्तर पर फैल चुका था.

पुलिस ने उस कमरे की पड़ताल की जिस में श्यामली ने पंखे में चुनरी बांध कर खुदकुशी करने का ढोंग ही किया था. पुलिस ने उस के परिवार वालों से समीर और उस की बीवी के बारे में जानकारी जुटाई तो इस केस ने अलग ही मौड़ ले लिया.

समीर के परिवार वालों ने पुलिस को जानकारी देते हुऐ बताया कि समीर और श्यामली ने अब से लगभग 7 वर्ष पूर्व प्रेमविवाह किया था.

ये भी पढ़ें- फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन

शादी के बाद इन दोनों के बीच कुछ समय तक तो सब कुछ सही रहा, लेकिन बाद में उन दोनों के बीच खटपट रहने लगी थी. उसी के चलते समीर की बीवी ने उसे परिवार से भी अलगथलग कर दिया था. उस के बाद वह न तो उसे किसी परिवार वाले से मिलनेजुलने देती थी और न ही किसी को अपने घर आने देती थी.

परिवार वालों ने बताया कि श्यामली का चरित्र ठीक नहीं था. समीर की गैरमौजूदगी में उस के घर पर कुछ संदिग्ध लोगों का आनाजाना था. उस के किसी अन्य युवक के साथ अवैध संबंध थे. जिस का समीर विरोध करता था. जिस के कारण ही समीर की हत्या हुई.

यह सब जानकारी जुटाने के बाद पुलिस ने अपनी काररवाई करते हुए लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. समीर की लाश को पोस्टमार्टम भेजने के बाद ही पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए छानबीन शुरू की.

उसी दौरान पुलिस ने श्यामली के साथ रात गुजारने वाली उस की सहेली प्रियंका से भी पूछताछ की. लेकिन प्रियंका ने बताया कि वह स्वयं ही अपनी सहेली के घर मिलने के लिए आई थी. जिस के बाद वह रात का खाना खा कर सो गई थी. उस के सोने के बाद समीर के साथ क्या घटना घटी उसे कुछ नहीं मालूम.

इस मामले की बाबत पुलिस ने श्यामली से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस रात समीर और उस के दोस्तों सूरज और छोटू ने खाना खाया और उस के बाद सूरज और छोटू मकान की छत पर जा कर सो गए. वह अपने बेटे देव को अपने साथ ले कर सहेली प्रियंका के साथ अलग कमरे में सो गई थी. जबकि समीर अपने कमरे में अकेला ही सोया था.

रात के समय उस ने अपने घर में  गोली चलने की आवाज सुनी तो वह बुरी तरह से घबरा गई. उस के बाद वह अपनी सहेली प्रियंका के साथ कमरे से बाहर निकली तो उस ने घर से बाहर कुछ लोगों को भागते हुए देखा था.

समीर को मरा देख कर वह खुद पर भी कंट्रोल नहीं कर पाई थी, जिस के बाद उस ने भी आत्महत्या करने की कोशिश की, लेकिन वहां पर मौजूद लोगों ने उसे बचा लिया.

उसी दौरान पुलिस ने श्यामली का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया. उस की काल डिटेल्स देखी तो आखिरी बार रात के 2 बजे के समय एक नंबर पर उस की बातचीत हुई थी, वह नंबर किसी विश्वजीत राय के नाम से फीड था.

पुलिस ने श्यामली से विश्वजीत राय से रात में बात करने का कारण पूछा तो वह कोई संतोषजनक जबाव नहीं दे पाई. विश्वजीत का नाम सुनते ही उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. उस के बाद पुलिस श्यामली को पूछताछ के लिए थाने ले आई. थाने में पहुंचते ही श्यामली डर गई और सब कुछ बताने को राजी हो गई.

श्यामली ने बताया कि उस के विश्वजीत से नाजायज संबंध थे. उन्हीं संबंधों के चलते उस ने प्रेमी के सहयोग से पति की हत्या करा दी. हत्या के इस केस की जो सच्चाई उभर कर सामने आई वह दोस्ती, प्यार, शादी और उस के बाद बेवफाई से जुड़ी एक हैरतअंगेज कहानी थी –

अब से कई साल पहले श्यामली के पिता प्रवास बिस्वास का परिवार बंगाल से आ कर रुद्रपुर और गदरपुर के बीच बसे दिनेशपुर में आ कर रहने लगा था. दिनेशपुर आने के बाद उस की बीवी अपर्णा बिस्वास 2 बच्चों, बेटी श्यामली और बेटे संजीत की मां बन गई.

दिनेशपुर में बाहुल्य आबादी बंगालियों की ही है. बंगाल से आने के बाद इन लोगों ने यहां पर स्थानीय लोगों के यहां पर मेहनतमजदूरी करनी शुरू की. इन लोगों में ही कुछ लोग इतने समर्थ थे कि उन्होंने यहां पर कुछ जमीनें खरीदीं और कुछ ने सरकारी जमीनों पर कब्जा कर खेतीबाड़ी का काम शुरू किया. जिस के साथ ही इन लोगों की आर्थिक स्थिति भी सुधरती गई.

ये भी पढ़ें- पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 1

इन के आने से पहले यहां के किसान अपनी जमीन से 2 ही फसलें लेते थे. रवि और खरीफ की. इन लोगों ने यहां पर तीसरी फसल को जन्म दिया. वह थी बेमौसमी धान की फसल. गेहूं की फसल कटते ही धान को लगाया जाता था. जिस के कारण किसानों को एक और फसल से आमदनी बढ़ गई थी. उसी धान की पौध लगाई के दौरान समीर बिस्वास की मुलाकत श्यामली से हुई थी.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

हैवानियत की हद पार : एक डाक्टर ने इनसानियत पर किया वार

याद है न बदन में सिरहन पैदा कर देने वाला निठारी कांड? साल था 2006 और जगह थी नोएडा का निठारी गांव. वहां की कोठी नंबर डी-5 दूसरी आम कोठियों की तरह ही थी. लेकिन जब इस कोठी के आसपास से नरकंकाल मिलने शुरू हुए, तो पूरा देश सकते में आ गया था. सीबीआई को जांच के दौरान इनसानी हड्डियों के हिस्से और 40 ऐसे पैकेट मिले थे, जिन में इनसानी अंगों को भर कर जमीन में गाड़ दिया था या पास के नाले में फेंक दिया था.

इस के बाद कोठी के मालिक मोनिंदर सिंह पंढेर और उस के नौकर सुरेंद्र कोली को पुलिस ने धर दबोचा. इस तरह से निठारी के कांड का काला सच सब के सामने आ गया.

सुरेंद्र कोली के मुताबिक उस का मालिक (मोनिंदर सिंह पंढेर) कई वेश्याएं घर पर लाया करता था. उन्हें आतेजाते देखते हुए उस के मन में सैक्स और इनसानी शरीर को काटने की प्रबल इच्छा पैदा होने लगी.

ये भी पढ़ें- फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन

बाद में खुलासा हुआ कि सुरेंद्र कोली अपने शिकारों को पहले फंसाता था, फिर पीड़ित को बेहोश कर देता था. उस के बाद रेप की कोशिश करता था. आखिर में पीड़ित को मार कर उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े कर देता था, फिर उन्हें जमीन में गाड़ देता था या नाले में बहा देता था.

पहले तो सीबीआई ने मई, 2007 में मोनिंदर सिंह पंढेर को अपनी चार्जशीट में एक पीड़िता रिम्पा हलदर के अपहरण, बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपमुक्त कर दिया था, पर इस के 2 महीने बाद अदालत की फटकार के बाद सीबीआई ने मोनिंदर सिंह पंढेर को इस मामले में सहआरोपी बनाया था.

तब इस मामले में इनसानी अंगों की तस्करी का मुद्दा भी उछला था. अब फिर एक दिल दहला देने वाला कांड सामने आया है और इसे अंजाम देने वाला कोई कसाई नहीं, बल्कि एक डाक्टर है जिस पर दूसरों की जान बचाने की जिम्मेदारी होती है.

इस डाक्टर का नाम देवेंद्र शर्मा है, पर है पूरा सीरियल किलर. उस ने कबूल किया है कि साल 2002 से 2004 के बीच दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान में अब तक वह 100 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है, जिन में से ज्यादातर को उस ने उत्तर प्रदेश की एक नहर में मौजूद मगरमच्छों का खाना बना दिया.

गुरुग्राम किडनी कांड में शामिल अलीगढ़ के डाक्टर देवेंद्र शर्मा को हाल ही में दिल्ली से पकड़ा गया गया था. इस से पहले वह किडनी केस में पिछले 16 साल से सजा काट रहा था और अब परोल पर बाहर था. मीआद पूरी होने के बाद उसे वापस जेल जाना था, लेकिन वह अंडरग्राउंड हो गया था. पर अब पकड़े जाने के बाद उस की काली करतूतों की परतें खुल रही हैं.

ये भी पढ़ें- पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई : भाग 1

ऐसे बना अपराधी

कोई डाक्टर अपराधी कैसे बन गया? यह सवाल अब हर किसी के मन में उठ रहा है. जानकारी हासिल हुई है कि एक निवेश में धोखे के बाद देवेंद्र शर्मा ने जुर्म का रास्ता चुना था, फिर वह डाक्टरी के साथसाथ किडनी ट्रांसप्लांट रैकेट, फर्जी गैस एजेंसी भी चलाने लगा था. इतना ही नहीं वह चोरी की गाड़ियां भी बेचता था. अपनी फर्जी गैस एजेंसी के लिए जब उसे सिलेंडर चाहिए होते थे, तब वह गैस डिलीवरी वाले ट्रक लूट लेता था और उस के ड्राइवर को मार देता था.

यह भी खुलासा हुआ है कि दिल्ली से उत्तर प्रदेश जाने के लिए डाक्टर देवेंद्र शर्मा के गैंग के लोग जिस टैक्सी को बुक करते थे बाद में उसे ही लूट लेते थे.

हाल ही में पकड़े जाने के बाद डाक्टर देवेंद्र शर्मा ने बताया कि उस ने ज्यादातर लाशों को उत्तर प्रदेश के कासगंज इलाके की हजारा नहर में फेंक दिया था. इस नहर में बड़ी तादाद में मगरमच्छ रहते हैं.

डाक्टर देवेंद्र शर्मा को बुधवार, 29 जुलाई को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया था. वह कोई एमबीबीएस डाक्टर नहीं था, बल्कि साल 1984 में उस ने बिहार के सिवान से बैचलर औफ आयुर्वेद मैडिसिन ऐंड सर्जरी की डिगरी पूरी कर के राजस्थान में क्लिनिक खोला था, फिर साल 1994 में उस ने गैस एजेंसी के लिए एक कंपनी में 11 लाख रुपए लगाए थे, लेकिन वह कंपनी अचानक गायब हो गई. इस नुकसान के बाद उस ने साल 1995 में एक फर्जी गैस एजेंसी खोल ली थी.

बनाया अपना गैंग

इस के बाद डाक्टर देवेंद्र शर्मा ने एक गैंग बनाया जो एलपीजी सिलेंडर ले कर जाते ट्रकों को लूट लेता था. इस के लिए वे लोग ड्राइवर को मार देते थे और ट्रक को भी कहीं ठिकाने लगा देते थे. इस दौरान उस ने अपने गैंग के साथ मिल कर तकरीबन 24 लोगों का खून किया था. फिर देवेंद्र शर्मा किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह में शामिल हो गया था और उस ने 5 लाख से 7 लाख रुपए प्रति ट्रांसप्लांट के हिसाब से 125 ट्रांसप्लांट करवाए थे. इतना ही नहीं ये लोग कैब ड्राइवरों को मार कर उन की कैब लूट लेते थे और ड्राइवर की लाश को नहर में फेंक देते थे. बाद में कैब को सैकंडहैंड कार बता कर बेच दिया जाता था.

इस के बाद साल 2004 में डाक्टर देवेंद्र शर्मा पकड़ा गया था और 16 साल जयपुर जेल में रहा था, फिर अच्छे बरताव के लिए उसे जनवरी, 2020 को 20 दिन की परोल मिली थी, लेकिन वह भाग कर अंडरग्राउंड हो गया था.

ये भी पढ़ें- विकास दुबे एनकाउंटर : कई राज हुए दफन

दीदी : भाग 3- किस के लिए दीदी हार गईं

दीदी अपना वैधव्य बोझ लिए फिर घर लौट आईं. वैधव्य दुख हृदय में होने पर भी अब की बार दीदी के चेहरे पर एक गहन आत्मविश्वास का भाव था, क्योंकि अब वे घर का बोझ बन कर नहीं, घर के बोझ को हलका करने की शक्ति हाथों में लिए आई थीं.

जीजाजी के पैसों से दीदी ने अपना क्लिनिक बनवाना आरंभ कर दिया. साथ ही, एक दुकान किराए पर ले कर महिलाओं व बच्चों का इलाज भी करने लगीं. गृहस्थी की जो गाड़ी हिचकोले खाती चल रही थी, वह फिर से सुचारु रूप से चलने लगी. पापा की जगह दीदी ने संभाल ली. हर कार्य दीदी की सलाह से होने लगा.

ये भी पढ़ें- आज का इंसान : ठगा सा महसूस क्यों कर रहा था विजय

दीदी के प्रति मां के बरताव में धीरेधीरे अंतर आने लगा. वे उन्हें अपने बड़े लड़के की उपाधि देने लगीं. सभी खुश थे, परंतु मझली दीदी अपना स्थान छिन जाने के कारण रुष्ट सी रहतीं, यद्यपि रागिनी दीदी ने अपने अधिकार का दुरुपयोग कभी नहीं किया. हम सब की खुशी को ही उन्होंने अपनी खुशी समझा था. दीपा दीदी के ढेर सारे पुरस्कारों को देख कर उन्होंने खुशी से कहा था, ‘‘अरे, दीपा, तूने तो कमाल कर दिया. इतने पुरस्कार जीत लिए. तू तो वास्तव में ही छिपी रुस्तम निकली.’’

‘‘सच पूछो तो दीदी, इस का श्रेय अमित को है. जानती हो वह आजकल अच्छेअच्छे ड्रामों का निर्देशक है. पुणे से कोर्स कर के आया है. उसी के सही निर्देशन में मैं ने ये ढेर सारे पुरस्कार …’’

बीच में ही दीदी ने दीपा दीदी को अपने अंक में भर लिया था, ‘‘मैं तो पहले ही जानती थी कि अमित के लिए उस की कला केवल शौक ही नहीं, नशा है. कितनी प्रसन्नता की बात है कि वही अमित तुझे साथ ले कर चला है.’’

अमित तब अकसर घर आने लगा था. जब भी किसी ड्रामे या प्रोग्राम की तैयारी करनी होती वह दीपा दीदी को लेने आ पहुंचता और फिर छोड़ जाता. सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी में रात को कभी एक बजा होता तो कभी इस से भी अधिक देर हो जाती.

महल्लेभर में दीपा दीदी और अमित के बारे में बातें होने लगी थीं. एक दिन मां ने ही रागिनी दीदी से कहा, ‘‘बहुत दिनों से सुनती आ रही हूं, रागिनी ये सब बातें. लोग ठीक ही तो कहते हैं, जवान लड़की है, इतनी रात गए तक वह इसे छोड़ने आता है. सोचती हूं, अब दीपा के हाथ भी पीले कर देने चाहिए.’’

दीदी ने लापरवाही से एक हंसी के साथ कहा था, ‘‘मां, लोग जिस ढंग से सोचते हैं न, एक कलाकार उस ढंग से नहीं सोच सकता, क्योंकि उसे तो केवल अपनी कला की ही धुन होती है. अमित को मैं अच्छी तरह जानती हूं, रात को दीपा यदि उस के संरक्षण में घर लौटती है तो ठीक ही करती है.’’

‘‘तू तो अपने बाप से भी दो अंगुल बढ़ कर है. उन्होंने क्या कभी सुनी थी मेरी, जो तू सुनेगी?’’ मां ने खीझ कर कहा था.

‘‘पापा ने भी तो कभी गलत नहीं सोचा था. जो कुछ भी वे सोचते थे, कितना सही होता था.’’ दीदी के उत्तर से मां निरुत्तर हो गई थीं.

एक दिन पापा की ही तरह उन्होंने मुझ से और दीपा से डांस प्रोग्राम करने का अनुरोध किया. वे मेरी छूटी हुई कला को मुझ से फिर जोड़ना चाहती थीं. दूसरे अमित व दीपा के डांस के समय पारस्परिक हावभाव कैसे रहते हैं, इस का अंदाजा भी करना चाहती थीं.

दीपा दीदी ने अमित से दीदी की इच्छा बताई तो वह पूर्ण उत्साह से तैयारी में जुट गया. एक छोटे से ड्रामे की तैयारी भी साथ ही होने लगी. महल्लेभर में खुशी की लहर दौड़ गई.

हीरोइन थी दीपा दीदी. उन के मेकअप के लिए अमित के वही सुझाव. दीपा दीदी के मुख पर विजयभरी मुसकान दौड़ जाती. उधर मेरी आंखों के आगे रागिनी दीदी का लाज से सकुचाया वही चेहरा घूम जाता, जब वे स्वयं दीपा दीदी के स्थान पर होती थीं. मैं कई बार सोच कर रह जाती, ‘रागिनी दीदी चाहें तो अब भी अमित को पा सकती हैं.’

परंतु दीदी को अपने से ज्यादा चिंता हम सब की थी, इसलिए उन्होंने उस ओर कभी सोचा ही नहीं. कभी सोचा भी होगा तो दीपा की खुशी उन्हें अपनी खुशी से भी अधिक प्यारी लगी होगी. अपने को भुला कर वे सादी सी सफेद साड़ी में, हाथ में स्टेथोस्कोप लिए घर से क्लिनिक और क्लिनिक से घर भागती रहतीं. केवल कुछ क्षणों का विश्राम. रात को भी पूरी नींद नहीं सोतीं, कभी कोई डिलिवरी केस अटैंड कर रही हैं तो कभी कोई सीरियस केस.

ये भी पढ़ें- दामाद : अमित के सामने आई आशा की सच्चाई

हमारा सब का जीवन पटरी पर लौट आया था. वही सब पुराने ठाटबाट. घर में नौकरचाकरों की व्यवस्था, मां के लिए अच्छी से अच्छी खुराक व दवाई का प्रबंध, मेरी व अमर की पढ़ाई फिर से सुचारु रूप से चालू हो गई थी. घर में ट्यूशन का प्रबंध हो गया. दीपा दीदी की प्रतिदिन की नईनई पोशाकों व शृंगार प्रसाधनों की मांग की पूर्ति हो जाती, परंतु रागिनी दीदी?

उन्हें एक दिन अमित के साथ कहीं बाहर जाते देखा था. मरीजों से जबरदस्ती छुट्टी पा कर वे अमित के साथ उस की गाड़ी में गई थीं और कुछ ही घंटों बाद लौट भी आई थीं. तब दीपा दीदी को बहुत बुरा लगा था, ‘‘मैं तो कार्यवश उस के साथ जाती हूं. इन्हें भला दुनिया क्या कहेगी कि विधवा हो कर एक कुंआरे लड़के के साथ…’’ उस दिन मां का गुस्से से कांपता हाथ दीपा दीदी के गाल पर चटाख से पड़ा था, ‘‘ऐसी बातें कहती है बेशर्म उस के लिए? तू अभी भी समझ नहीं पाई है उसे. मैं जानती हूं वह क्यों गई है.’’

सप्ताहभर बाद ही जब रागिनी दीदी ने घर में यह घोषणा की कि वे दीपा का विवाह अमित से करेंगी तो मझली दीदी का चेहरा आत्मग्लानि से स्याह पड़ गया था.

दीदी ने बड़े चाव और उत्साह से दीपा दीदी के साथ जा कर एकएक चीज उस की पसंद की खरीदी. अम्मा व हम सब देखते रहते. दीदी कभी बाजार जा रही हैं तो कभी क्लिनिक, कभी इधर भाग रही हैं तो कभी उधर. उन के थके चेहरे को देख कर अम्मा बोली थीं, ‘‘ऐसे तो तू चारपाई पकड़ लेगी. इतना क्यों थकती है? दीपा तो अपना सामान स्वयं खरीद कर ला सकती है.’’

‘‘उस के लिए यह दिन फिर कभी नहीं आने वाला है, मां. वह लाएगी तो ऐसे ही लोभ कर के सस्ता सामान उठा लाएगी, मैं जानती हूं इस कंजूस को.’’ दीपा दीदी के सब से अधिक फुजूलखर्च होते हुए भी दीदी ने ठीक पिताजी वाले अंदाज से कंजूस बना दिया था.

मेहमानों से घर भर गया. चारों ओर चहलपहल थी. दीदी ने सब इंतजाम कर दिए थे. सभी रिश्तेदार दीदी की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे, ‘ऐसी बेटी के सामने तो अच्छेअच्छे लड़के भी नहीं ठहर पाएंगे.’

‘कौन लड़का करता है आजकल मां व बहनभाइयों की इतनी परवाह?’ चारों ओर यही चर्चा.

विवाह संपूर्ण रीतिरिवाजों के साथ संपन्न हो गया. विदाई का समय हो गया है. दीपा दीदी कार में अमित के पास बैठीं तो उन्होंने एक विजयभरी मुसकान लिए दीदी की आंखों में झांका. उस मुसकान से दीदी का चेहरा एक अद्भुत प्रसन्नता से खिल उठा, जिसे दीपा दीदी आजीवन समझ न पाएंगी. वह प्रसन्नता एक ऐसे खिलाड़ी की प्रसन्नता थी जो अपने साथी की जीत को खुशी प्रदान करने के लिए स्वयं अपनी हार स्वीकार कर लेता है, परंतु अपने साथी को यह विदित भी नहीं होने देता कि वह जानबूझ कर हारा है.

ये भी पढ़ें- ईद का चांद : हिना को किस का था इंतजार

दीदी : भाग 2- किस के लिए दीदी हार गईं

मां को एक दिन पापा के कान में कहते सुना था, ‘इस लड़की को आप इतनी छूट दे रहे हैं, फिर वह लड़का भी तो अपनी जातबिरादरी का नहीं है.’

‘अरे, बच्चे हैं, उन के हंसनेखेलने के दिन हैं. हर बात को गलत तरीके से नहीं लेते,’ पापा इतनी लापरवाही से कह रहे थे जैसे उन्होंने कुछ देखा ही न हो.

सचमुच पापा की मृत्यु के बाद ही दीदी ने भी अमित के प्रति ऐसा रुख अपनाया था जैसे कि कभी कुछ हुआ ही न हो. एकदम उस से तटस्थ, अमित कभी घर में आता तो दीदी को उस के सामने तक आते नहीं देखा.

दिल में आता उन्हें पकड़ कर झकझोर दूं. ‘क्या हो गया है दीदी, तुम्हें? तुम्हारे अंदर की हंसने, नाचने व गाने वाली रागिनी कहां मर गई है, पापा के साथ ही?’ विश्वास ही नहीं होता था कि यह वही दीदी हैं.

ये भी पढ़ें- नई सुबह : जिंदगी के दोराहे पर खड़ी अमृता

अमित के आने में जरा सी देर हो जाती तो वे बेचैन हो उठतीं. तब वे मुझे प्यार से दुलारतीं, फुसलातीं, ‘सुधी, जा जरा अमित को तो देख क्या कर रहे हैं?’ मैं मुंह मटका कर, नाक चढ़ा कर उन्हें चिढ़ाती, ‘ऊंह, मैं नहीं जाती. कोई जरूरी थोड़े ही है कि अमित डांस देखें.’

‘देख सुधी, बड़ी अच्छी है न तू, जा चली जा मेरे कहने से. मेरी प्यारी सी, नन्ही सी बहन है न तू.’

वे खुशामद पर उतर आतीं तो मैं अमित के घर दौड़ जाती. वहीं दीदी अमित से तटस्थ रह कर चाचाजी द्वारा भेजे गए लड़कों की तसवीरों को बड़े चाव से परखतीं और अपनी सलाह देतीं. मेरे मस्तिष्क में 2 विपरीत विचारों का संघर्ष चलता रहता. क्या दीदी विवश हो कर ऐसा कर रही हैं या फिर पापा के मरते ही उन्हें इतनी समझ आ गई कि अपना जीवनसाथी चुनने के उचित अवसर पर यदि वे जरा सी भी नादानी दिखा बैठीं तो उन का पूरा जीवन बरबाद हो सकता है?

एक दिन उन के हृदय की थाह लेने के लिए मैं कह ही बैठी, ‘दीदी, क्या इन तसवीरों में अमित का चित्र भी ला कर रख दूं?’

उन्होंने अत्यंत संयत मन से मेरे गाल थपथपा दिए थे, ‘सुधी, हंसीखेल अलग वस्तु होती है और जीवनसाथी चुनने का उत्तरदायित्व अलग होता है. अमित अभी मेरा भार वहन करने योग्य नहीं है.’

तब मैं समझ पाई थी कि दीदी ने अपने बोझ से हम सब को मुक्त करने के लिए, उन के बोझ को वहन न कर सकने योग्य अमित की तसवीर को अपने मानसपटल से पोंछ दिया था.

उन्होंने अपनी कुशाग्र बुद्धि से ऐसे योग्य, स्वस्थ, सुंदर व कमाऊ पति का चुनाव किया था कि सभी ने उन की रुचि की प्रशंसा की थी. दुलहन बनी दीदी जिस समय जीजाजी के साथ अपना जीवनरूपी सफर तय करने को कार में बैठीं, उन के चेहरे पर कहीं भी कोई ऐसा भाव नहीं था, जिस से किंचित मात्र भी प्रकट होता कि वे विवश हो कर उन की दुलहन बनी हैं.

उन के विदा होते ही अम्मा के घुटे निश्वासों को स्वतंत्रता मिल गई थी, ‘‘यही तो अंतर है लड़का लड़की में. बाप की सारी कमाई खर्च करवा कर चली गई. इस की जगह लड़का होता तो कुछ ही वर्षों में सहारे योग्य हो जाता.’’

उधर, दीपा दीदी का पार्ट घर में प्रमुख हो गया. पापा ने वास्तव में ही कहीं गड़बड़ की तो दोनों दीदियों के नाम रखने में. दीपा तो बड़ी दीदी का नाम होना चाहिए था जो आज भी घर के लिए प्रकाशस्तंभ हैं. दीपा दीदी तो अपने नाम का विरोधाभास हैं. उन के मन में तो अंधकार ही रहता है.

रागिनी दीदी घर से क्या गईं, मेरे लिए तो सबकुछ अंधकारमय हो गया था. अम्मा ने तो बचपन से ही मुझे प्यार नहीं दिया. अमर भैया के बाद वे मेरी जगह एक और लड़के की आशा लगाए बैठी थीं. उधर, मझली दीदी उन्हें इसलिए प्यारी थीं कि वे अमर भैया को आसमान से धरती पर हमारे घर में खींच लाई थीं. मझली दीदी समय की बलवान समझी जाती थीं, इसलिए उन्हें दीपा नाम भी दिया गया. अम्मा द्वारा रखा गया मेरा नाम ‘अपशकुनी’ है.

दीपा दीदी की आजादी दीदी के जाने के बाद प्रतिदिन बढ़ती गई और सारे घर के कार्य का बोझ मुझ पर ही लाद दिया गया. रागिनी दीदी के डांस प्रोग्राम घर पर ही होते थे. उन में हम सब की प्रसन्नता सम्मिलित थी. पर दीपा दीदी तो अधिकतर बाहर ही रहतीं. एक कार्यक्रम समाप्त होता तो दूसरे में जुट जातीं. उन्हें खूब पुरस्कार मिलते तो मां उन की प्रशंसा के पुल बांध देतीं. मुझे प्रोत्साहित करने वाला घर में कोई न था. नाचगाने से मेरा संबंध छूट कर केवल रसोईघर से रह गया. बस, कभी विवश हो जाती तो दीदी को याद कर के रोती. मन हलका हो जाता.

बाद के 5 वर्षों में मेरे लिए कुछ सहारा था तो दीदी से फोन पर बात करना. कितनी तसल्ली होती थी जब दीदी प्यार से फोन पर मुझ से बात करतीं. एक बार उन्होंने मुझ से फोन कर के कहा, ‘सुधी, मैं जानती हूं कि तू मेरे बिना कैसी जिंदगी जी रही होगी, परंतु तू धैर्य मत खोना, जिंदगी में हर स्थिति का सामना करना ही पड़ता है. उस से भागना कायरता है. मैं यह कभी सुनना नहीं चाहूंगी कि सुधी कायर है.’

सच पूछो तो दीदी का जीवन ही मेरे लिए प्रेरणास्रोत था. सब से अधिक प्रेरणा तो मुझे तब मिली जब मुझे यह पता चला कि विवाह के बाद भी दीदी अपनी पढ़ाई कर रही थीं. जीजाजी के रूप में उन्हें ऐसा जीवनसाथी मिला जो केवल पति नहीं था, बल्कि पापा की भांति उन्होेंने दीदी को संरक्षण दे कर पापा के सपने को साकार करना चाहा था.

ये भी पढ़ें- अनजाने पल: सावित्री से क्यों विमुख होना चाहता था आनंद?

इंटर तक दीदी के पास साइंस तो थी ही, उन्होंने मैडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर ली और उन्हें आगरा के मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया और वे अपनी प्रतिभा के कारण हर वर्ष एकएक सीढ़ी चढ़ती चली गईं. जीजाजी इंडियन एयरलाइंस में पायलट के पद पर कार्यरत थे. अकसर कईकई दिनों तक वे बाहर चले जाते. दीदी का समय अपनी पढ़ाई व कालेज में बीतता. कितने सुचारु ढंग से चल रहा था दीदी का जीवन.

डाक्टर बन र दीदी कालेज से निकलीं तो जीजाजी ने उस खुशी में एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया था. उस दिन जीजाजी खुशी के कारण अपने होशोहवास भी खो बैठे थे. सब के बीच दीदी को बांहों में भर कर उठा लिया था, ‘आज मुझे लग रहा है, मैं खुशी से पागल हो जाऊंगा. इसलिए नहीं कि हमारी श्रीमतीजी डाक्टर बनी हैं, बल्कि इसलिए कि हमारे दिवंगत ससुरजी की इच्छा पूर्ण हो गई है. उन की बेटी डाक्टर बन गई है. वे रागिनी को डाक्टर बनाना चाहते थे.’

सभी लोगों ने उन के हृदय की सद्भावना को देख कर तालियां बजाई थीं. दीदी लाज के मारे दोहरी हुई जा रही थीं. उस समय जीजाजी ने अमर व हम दोनों बहनों को भी बुलाया था. कितने ही ढेर सारे उपहार लिए हम प्रसन्नतापूर्वक लौट आए थे.

फिर एक घटना और घटी, कितनी अनचाही, कितनी अवांछित. जीजाजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो कर आग की लपटों में समां गया था, साथ ही, सभी यात्री और जीजाजी की कंचन काया भी. जिस ने भी सुना वही जड़ हो गया. अम्मा ने माथा पीट लिया. हम सब बहनभाई एकदूसरे को ताकते भर रह गए, एकदम जड़ और शून्य हो कर.

ये भी पढ़ें- आज का इंसान : ठगा सा महसूस क्यों कर रहा था विजय

दीदी : भाग 1- किस के लिए दीदी हार गईं

न जाने जीवन में कभी कुछ इतना अप्रत्याशित व असामयिक क्यों घट जाता है कि जिंदगी की जो गाड़ी अच्छीखासी अपनी पटरी पर चल रही होती है वह एक झटके से धमाके के साथ उलटपलट जाती है. जिस गाड़ी में बैठ कर हम आनंदपूर्वक सफर कर रहे होते हैं, वही हमें व हमारे अरमानों को कुचल कर कितना असहाय व लंगड़ा बना देती है.

ऐसा ही कुछ उस दिन घटा था जब पापा की बस दिल्लीकानपुर मार्ग पर एक पेड़ से टकरा गई थी और इधर हमारे पूरे 5 प्राणियों की जीवनरूपी गाड़ी अंधड़ों व तूफानों से टकराने के लिए शेष रह गई थी. पापा थे, तो यही सफर कितना आनंददायक लगता था. उन की मृत्यु के बाद लगने लगा था कि जिस गाड़ी में हम बैठे हैं उस का चालक नहीं है और टेढे़मेढे़ रास्तों से गुजरती हुई यह गाड़ी हमें खींचे ले जा रही है.

ये भी पढ़ें- दामाद : अमित के सामने आई आशा की सच्चाई

समाचार पाते ही सब नातेरिश्तेदार इकट्ठे हो गए थे. सभी ओर दार्शनिकताभरे दिलासों की भरमार थी, ‘जिंदगी का कोई भरोसा नहीं. बेचारे अच्छेखासे गए थे, क्या मालूम था लौटेंगे ही नहीं आदि.’

जो कोई भी घर में आता, हम बच्चों को छाती से चिपका कर रो उठता. घर की दीवारों को भी चीरने वाला क्रंदन कई दिनों तक घर में छाया रहा.

लेकिन दीदी को न तो किसी ने छाती से लगाया, न ही वे दहाडें मार कर रोईं. उन का विकसित यौवन, गदराई देह और मांसल मांसपेशियां उन्हें छाती से चिपकाने के लिए प्रत्येक परिचितजनों को कुछ देर सोचने को विवश कर देतीं और छाती से दीदी को चिपकाने के लिए उठे उन के हाथ सहसा ही पीछे हट जाते. न तो दीदी को किसी ने दुलरायाचिपकाया, न ही वे दहाड़ें मारमार कर रो सकीं, सूनीसूनी आंखें, उदास व भावहीन चेहरा लिए वे जहां बैठी होतीं, वहीं बैठी रहतीं.

जिस किसी को भी नजर उन पर पड़ती, उन्हें देख कर कुछ चिंतित सा हो उठता. किसी दूसरे के कान में जा कर कुछ फुसफुसाता. दीदी के कानों में यद्यपि कुछ न पड़ता पर उस फुसफुसाहट की अस्पष्ट भाषा वे अच्छी तरह समझ लेतीं. उन्हें लगने लगा था जैसे कि अपने घर की चारदीवारी में वही सब से अधिक पराई हो गई हैं.

तेरहवीं तक यह फुसफुसाहट कुछ गुमसुम सी भाषा में रही, पर 14वें दिन में ही वह स्पष्ट शब्दों में सुनाई देने लगी, ‘जवान लड़की है, इस के हाथ पीले हो जाते तो सरला का एक भारी बोझ उतर जाता.’ तब निश्चय ही दीदी के अकेलेपन को घर के सदस्यों के बीच पैदा होते हुए मैं ने देखा था. पापा के बिना दीदी एकदम अकेली पड़ गई थीं. मां को तसल्ली देने वाले बहुत थे पर उन का सहयोग कभी भी दीदी को नहीं मिल पाया था.

पापा के जाते ही मां की आंखों में घर के आंगन के बीच दीदी एक बड़ा भारी पत्थर बन गई थीं. लगता था, दीदी के भार का गम मां के लिए पापा की मृत्यु के भार से भी अधिक असहनीय हो गया था. यही कारण था कि दीदी के लिए सबकुछ अचानक ही पराया हो गया था, शायद दूसरों पर अपने बोझ का एहसास भी वे स्वयं करने लगी थीं.

मझली दीदी भी तो थीं. पापा तो उन के भी चले गए थे, मेरे भी और अमर के भी. हम सब के पापा नहीं थे तो घरआंगन तो वही था. पर दीदी के लिए तो घरआंगन भी पराए हो गए थे, इसीलिए कुछ ही दिनों में दीदी अपनी सारी चंचलता खो कर जड़ हो गई थीं.

परंतु जड़ होने का मतलब दीदी के लिए जीवन के प्रति निष्क्रिय होना नहीं था. यह बात दूसरी थी कि वे अपने बोझ को मां के सिर से उतारने की चिंता में अपनी उम्र से कहीं अधिक समझदार व परिपक्व हो गई थीं, इसीलिए घर में चर्चा किए जाने वाले किसी  भी सुझाव का विरोध उस समय उन्होंने नहीं किया. ताऊजी बैठते, चाचाजी भी साथ देते, चाची व ताई भी राय देतीं, मां गुमसुम उन की हां में हां मिलातीं.

‘‘इंश्योरैंस कितना है?’’

‘‘पीएफ?’’

‘‘बैंक बैलेंस कुछ है?’’ आदि प्रश्न पूछे जाते.

‘‘सब जोड़ कर 20 लाख रुपए होते थे. यह तो अच्छा है कि सिर छिपाने को बापदादा का बनाया यह पुराना मकान है. अब इन 20 लाख रुपयों में से खींचतान कर के भले घर का कोई लड़का देख कर रागिनी के हाथ पीले कर ही दो. एक की नैया तो पार लगे. जवान लड़की है, तुम कहां तक देखभाल करोगी? दीपा तो अभी 4-5 साल तक ठहर सकती है, सुधी के वक्त तक अमर संभाल ही लेगा,’’ ताऊजी इन शब्दों के साथ ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते.

मां केवल गरदन हिला कर स्वीकृति दे देतीं. मेरे अंदर बोलने को कुछ कुलबुलाता, परंतु इतने बुजुर्गों के सम्मुख हिम्मत न होती. ‘आज क्या दीदी ही सब से बड़ा बोझ बन गई हैं, केवल 17 साल की उम्र में ही? क्या होगा उन के उन सपनों का जो पापा ने उन्हें दिखाए थे?’

ये भी पढ़ें- ईद का चांद : हिना को किस का था इंतजार

पापा थे, तो दीदी का अस्तित्व ही घर में सर्वोपरि था. क्याक्या नहीं सोच डालते थे पापा दीदी को ले कर, ‘अपनी बेटी को डाक्टर बनाऊंगा, फिर लंदन भेजूंगा, वहां से स्पैशलिस्ट बन कर आएगी. खूब औपरेशन किया करेगी. महिलाओं की भीड़ से घिरी रहेगी मेरी बिटिया. एक शानदार प्राइवेट अस्पताल बनाएगी अपने लिए. बस, फिर यह सभी को संभाल लेगी. एक से बढ़ कर एक होंगे मेरे बच्चे.’

‘रहने भी दो, किस दूसरी दुनिया में घूमते रहते हैं आप भी, क्यों भूल जाते हैं कि बेटी तो पराया धन होती है.’

‘ऊंह, मैं अपनी रागिनी को कहीं नहीं भेजूंगा. जिसे गरज होगी वही शादी करेगा इस से. मैं थोड़े ही किसी की खुशामद करने वाला हूं. फिर वह रहेगा भी यहीं, इसी के साथ.’ वे दीदी को झटक कर अपनी गोद में बैठा लेते और उन के बाल सहलाने लगते. तब दीदी रही होंगी यही 12-13 वर्ष की. तब पापा के चेहरे से लगता उन की हर खुशी वही थीं. इतने संतुष्ट और प्रसन्न दिखाई देते जैसे कि उस खुशी से परे उन्हें कुछ और चाहिए ही नहीं था.

सतत ही तो थी पापा की वह खुशी. संतान जब गुणवान हो तो किसे प्रसन्नता नहीं होती? रागिनी दीदी को तो न जाने किन हाथों से रचा गया था कि किसी भी गुण से अछूती नहीं हैं. वे देखने में सुंदर, पढ़ाई में निपुण व कलाओं में प्रवीण, क्या घर क्या बाहर, सब जगह ही दीदी की धाक रहती.

पापा अकसर डांस प्रोग्राम करवाते, जिस में रागिनी दीदी स्टार डांसर होती थीं. उन के साथ दीपा दीदी व महल्ले की अन्य लड़कियां भी डांस प्रस्तुत करती थीं.

हमारे पड़ोसी डा. दीपक का सब से बड़ा बेटा अमित इस प्रोग्राम में विशेष रुचि लेने लगा था. धीरेधीरे अमित दीदी को स्वयं सुझाव देता. ‘यह रंग तुम पर अधिक सूट नहीं करेगा. कोई सोबर कलर पहनो. इस साड़ी के साथ यह ब्लाउज मैच करेगा. ऊंह, लिपस्टिक ठीक नहीं लगी, जरा और डार्क कलर यूज करो. काजल की रेखा जरा और लंबी होनी चाहिए. बाल ऐसे नहीं, ऐसे बनने चाहिए.’ प्रोग्राम के समय भी अमित की आंखें दीदी के चेहरे पर ही टिकी रहतीं, और यदि दीदी की नजरें कभी अकस्मात उस की नजर से टकरा जातीं तो उन के चेहरे पर हजारों गुलाबों की लाली छा जाती.

यह सब किसी से छिप सकता था भला? बस, मझली दीदी कुछ तो यह ईर्ष्या दीदी के प्रति पाले हुए थीं कि अमित उन की ओर ध्यान न दे कर रागिनी दीदी को ही आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनाए रहता है. दूसरे, मां की आंखों में अपनेआप को ऊंचा उठाने का अवसर भी वे कभी अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं. उन्होंने दीदी के विरुद्ध अम्मा के कान भरने आरंभ कर दिए.

ये भी पढ़ें- नई सुबह : जिंदगी के दोराहे पर खड़ी अमृता

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 5

सर्विलांस टीम ने जब अपना काम शुरू किया तो उसे लोइया गांव या आसपास के इलाके में किसी भी महिला अथवा युवती के लापता होने की जानकारी नहीं मिली. अलबत्ता यह जरूर पता चला कि लोइया गांव के ज्यादातर नौजवान पंजाब व हरियाणा के अलगअलग स्थानों पर तंत्रमंत्र झाड़फूंक और टोनेटोटके, वशीकरण का काम करते हैं.

एसएसपी के निर्देश पर सर्विलांस टीम ने एक साथ 2 तरह से विवेचना के काम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. टीम ने सब से पहले लोइया गांव से 13 जून से एक महीने पहले तक के उन तमाम फोन नंबरों का डं डाटा एकत्र किया जो उस वक्त वहां सक्रिय थे.

ये भी पढ़ें- पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई

सर्विलांस टीम ने पंडित ईश्वर चंद के खेत के आसपास से मिले मोबाइल फोनों के डंप डाटा की जांच शुरू करनी शुरू कर दी जो एक थका देने वाली प्रक्रिया थी.

इसी के साथ सर्विलांस टीम ने डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो और स्टेट क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो में दर्ज लापता युवतियों के बारे में सूचना एकत्र करनी शुरू की. लेकिन ब्यूरो से मिले कोई तथ्य शव से मेल नहीं खा रहे थे.

इस के बाद पुलिस ने यह पता लगाना शुरू किया कि इस गांव के कौनकौन से लोग दूसरे राज्यों में काम करते हैं. क्योंकि अगर मेरठ या आसपास के इलाकों की मृतक महिला होती तो अब तक उस के परिजन पुलिस से संपर्क कर चुके होते.

पुलिस ने जब इस ऐंगल पर पड़ताल शुरू की तो पता चला कि करनाल और लुधियाना भी ऐसे शहर हैं, जहां इस गांव के युवक तंत्रमंत्र और वशीकरण का काम करते हैं. पुलिस की पड़ताल जब लुधियाना तक पहुंची तो उन शहरों में महिलाओं की रिपोर्ट खंगाली गई.

आखिरकार, लुधियाना पहुंची मेरठ की सर्विलांस टीम के हाथ सफलता लग गई. पुलिस को पता चला कि लुधियाना के मोतीनगर इलाके में रहने वाली करीब 20 साल की एक युवती जिस का नाम एकता है, उस के परिवार वालों ने उस की मिसिंग रिपोर्ट दर्ज कराई है.

युवती की मिसिंग रिपोर्ट के साथ उस का फोटो भी था और उस के परिजनों का पता व फोन नंबर भी थे. पुलिस ने परिजनों से जब संपर्क साधा तो उन्हें पता चला कि उन की बेटी एकता ने तो अमन नाम के एक लड़के से शादी कर ली है.

परिजनों ने बताया कि उन की बेटी को कुछ नहीं हुआ है क्योंकि वह तो वाट्सऐप पर उन से चैटिंग करती रहती है और अपना स्टेटस भी चेंज करती रहती है.

हालांकि पुलिस निराश जरूर हो गई थी लेकिन फिर भी उस ने एकता और उस के प्रेमी अमन का मोबाइन नंबर उस के परिवार वालों से हासिल कर लिया.

मेरठ आने के बाद पुलिस ने इन दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकाल कर पड़ताल शुरू कर दी तो पता चला कि एकता का फोन तो कई महीनों से एक्टिव ही नहीं है. अलबत्ता उस के नंबर पर वाट्सऐप जरूर चल रहा है. जबकि अमन का जो नंबर है वह भी लुधियाना के ही किसी फरजी पते से लिया गया था. इसलिए पुलिस ने एक बार फिर लुधियाना का रुख किया.

पुलिस ने लुधियाना में उन दफ्तरों की खाक छाननी शुरू की, जहां एकता काम करती थी. पुलिस का एकता के आखिरी दफ्तर में काम करने वाली उस की एक खास सहेली प्रीति (परिवर्तित नाम) से पता चला कि एकता जब वहां काम करती थी तो वह मोतीनगर में ही दिलशाद नाम के एक तांत्रिक के यहां काम करने वाले अमन से मिलने जाती थी.

तांत्रिक दिलशाद से मिली खास जानकारी

अमन के बारे में यह सुराग मिलते ही सर्विलांस टीम की बांछें खिल गईं. बस फिर क्या था, पुलिस टीम ने दिलशाद को उठा लिया. दिलशाद से अमन के बारे में पूछा गया तो उस ने बता दिया कि उस के यहां अमन नाम का जो लड़का काम करता था, उस का असली नाम शाकेब था और वह अब उस के यहां काम नहीं करता. हां, दिलशाद ने इतना जरूर बताया कि अमन उर्फ शाकेब मेरठ के दौराला में लोइया गांव का रहने वाला है.

ये भी पढ़ें- विकास दुबे एनकाउंटर : कई राज हुए दफन

इतनी जानकारी मिलते ही पुलिस टीम उछल पडी. क्योंकि जिस कातिल को वह दुनिया भर में ढूंढ रही थी, वह तो लोइया गांव में ही मौजूद था. इस के बाद का काम बहुत आसान था. दिलशाद से जो जानकारी मिली थी, उस के आधार पर पुलिस ने लोइया गांव के शाकेब के बारे में जानकारी हासिल कर ली.

20 मई, 2020 को सर्विलांस टीम ने शाकेब को उस वक्त उस के घर से उठा लिया जब वह परिवार से मिलने के लिए गांव की तरफ जा रहा था.

बाद में शाकेब ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और एकता की हत्या में सहयोग करने वाले अन्य नामों का खुलासा कर दिया. जिस के बाद पुलिस ने उसी रात को दबिश दे कर शाकेब के पिता, भाई, दोनों भाभियों और उस के दोस्त अयान को गिरफ्तार कर लिया.

उसी रात पुलिस ने काल कर के एकता के घर वालों को भेज कर एकता की हत्या और उस के कातिलों के पकड़े जाने की पूरी जानकारी दे दी. घर वाले अगले ही दिन कांगड़ा से मेरठ पहुंच गए.

पुलिस ने सभी आरोपियों को साथ में ले जा कर उन स्थानों की पहचान की, जहां एकता के शव के दूसरे अंग ठिकाने लगाए थे. पुलिस टीम ने उन जगहों की गहराई से छानबीन की, लेकिन एकता के शव के बाकी हिस्से कहीं नहीं मिले.

दरअसल वक्त इतना बीत चुका था कि शरीर के बाकी हिस्सों का मिलना अब वैसे भी नामुमकिन था. एकता के शव की सच्चाई स्थापित करने के लिए पुलिस ने उस के परिवार के लोगों के ब्लड सैंपल लिए. पुलिस ने एकता के शव के रिजर्व रखे गए अंश से फोरैंसिक जांच के बाद डीएनए कराने की प्रक्रिया शुरू की है ताकि यह साबित किया जा सके कि लोइया गांव में जो शव मिला था वह एकता का ही था.

पुलिस ने सभी आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उन की निशानेदही पर एकता का मोबाइल फोन, शाकेब का मोबाइल फोन, एकता के शव के टुकड़े करने में इस्तेमाल बलकटी और गड्ढा खोदने में इस्तेमाल फावड़ा बरामद कर लिया है.

आरोपियों से विस्तृत पूछताछ व जांच के बाद मामले की जांच कर रहे विवेचक ने एकता हत्याकांड के मुकदमे में सबूत मिटाने की धारा 201, 147,148 व 149 भी जोड़ दी. पुलिस ने सभी आरोपियों को मेरठ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

एक साल पुराने इस ब्लाइंड मर्डर केस की गुत्थी सुलझाने वाली सर्विलांस टीम को एसएसपी अजय साहनी ने 20 हजार रुपए का पुरस्कार दिया है.

जब एकता के हत्यारे को लगी गोली

एकता हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के बाद सभी आरोपियों को प्रैसवार्ता में लाया गया था, उस के बाद पुलिस शाकेब और अन्य लोगों को मैडिकल जांच के लिए अस्पताल ले कर जा रही थी.

तभी रास्ते में शाकेब ने एक सिपाही की पिस्टल छीन कर गोली चला दी. गोली लगने से सिपाही सुधीर मलिक घायल हो गया. पिस्टल ले कर भाग रहे शाकिब को पुलिस ने घेराबंदी कर भराला गांव के जंगल में घेर लिया, जहां मुठभेड़ में उस के पैर में पुलिस की 3 गोलियां लगीं.

ये भी पढ़ें- शक की फांस बनी नासूर

घायल शाकेब को ले कर पुलिस जिला अस्पताल पहुंची, जहां उस का इलाज किया गया. पुलिस का कहना है कि हत्या के आरोप में गिरफ्तार सभी 6 आरोपियों के खिलाफ आवश्यक काररवाई की जा रही है.

शाकिब, उस के भाई मुशर्रत, पिता मुस्तकीम, भाभी रेशमा, इस्मत और दोस्त अयान को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस लाइन में प्रैस कौन्फ्रैंस की गई थी. वहां से सभी मुलजिमों को गाड़ी में बैठा कर दौराला थाने लाया जा रहा था. सिवाया टोलप्लाजा के पास शाकेब के परिवार ने उसे पानी पिलाने की बात कह कर गाड़ी रुकवा ली.

इसी बीच शाकेब ने सिपाही सुधीर की पिस्टल छीन ली. पुलिस पर फायरिंग करता हुआ शाकेब सिवाया के जंगल में घुस गया. शाकेब के फायर करने पर एक गोली कांस्टेबल सुधीर के सीने में लगी. उस के बाद ग्रामीणों की मदद से शाकेब का पीछा किया गया.

शाकेब की फरारी की सूचना के बाद एसपी सिटी और एसएसपी भी मौके की ओर दौड़ गए. घंटों की मशक्कत के बाद सिवाया के जंगल में शाकिब को घेर लिया. जवाबी फायरिंग में शाकिब को कई गोलियां लग गईं.

घायल अवस्था में उसे जिला अस्पताल लाया गया. साथ ही घायल सिपाही को भी अस्पताल में भरती करा दिया है. पुलिस ने हत्या के बाद अब शाकिब के खिलाफ हत्या की कोशिश करने के लिए भादंसं की धारा 307, 392 और 411 का मुकदमा पंजीकृत किया है. अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद उसे मेरठ जेल भेज दिया गया.

दीदी: किस के लिए दीदी हार गईं

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 4

दूसरी तरफ शाकेब जो अब तक खुद को अमन के रूप में पेश करता रहा था. उसे लग गया कि एकता के ऊपर चढ़ा उस के सम्मोहन का जादू अब टूट गया है और मामला बिगड़ चुका है. उस ने एक ही क्षण में फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है.

उस ने किसी तरह सब से पहले एकता को शांत कराया और उस से कहा कि वह उस के साथ किसी तरह की जोरजबरदस्ती नहीं करेगा. अगर वह उस के साथ नहीं रहना चाहती तो वह ईद से अगले दिन उस के घर भेज देगा और उस ने जो गहने और पैसे दिए हैं, उसे वापस दे देगा.

शाकेब उर्फ अमन ने एक दिन शांति के साथ एकता को अपने घर पर ही एक मेहमान की तरह रुकने का अनुरोध किया तो एकता भी विरोध न कर सकी. शाकेब के इरादों से अनजान एकता एक दिन के लिए उसी घर में रुकने के लिए मान गई.

ये भी पढ़ें- शक की फांस बनी नासूर

इस के बाद शाकेब ने एकता का अपने पूरे परिवार से बेहद सलीके से परिचय कराया.

शाकेब के परिवार में उस के पिता मुस्तकीम के अलावा 4 भाई थे, जिन में शाकेब खुद सब से छोटा था. मां का इंतकाल हो चुका था. उस से बड़े 3 भाई मुशर्रत, नावेद और जावेद हैं. शाकेब के पिता पेशे से ड्राइवर हैं जबकि चारों भाई दौराला से बाहर अलगअलग शहरों में तंत्रमंत्र और झाड़फूंक का काम करते हैं.

मुशर्रत की शादी इस्मत से हुई थी, जबकि नावेद की पत्नी रेशमा है, आशिया तीसरे नंबर के भाई जावेद की पत्नी थी, जो अपनी पत्नी के साथ अपनी ससुराल गया हुआ था. नावेद भी इन दिनों किसी अपराध में शामिल होने के कारण मेरठ जेल में बंद था.

एकता ने की अपने घर जाने की जिद

एकता शाकेब के परिवार के बारे में जानने के बाद यह तो समझ गई थी कि उस का परिवार अच्छा नहीं है. शाकेब के साथ उस के गांव आने के बाद एकता को पूरी तरह आभास हो चुका था कि वह तथाकथित अमन के सम्मोहन में पड़ कर बुरी तरह फंस चुकी थी.

लेकिन जिस तरह शाकेब ने उसे भरोसा दिया था कि वह ईद के अगले दिन उसे उस के पैसों के साथ सकुशल घर वापस पहुंचा देगा, उसे जानने के बाद वह सुकून महसूस कर रही थी कि चलो उसे अपनी भूल सुधारने का मौका मिल गया है.

वह किसी तरह अगले दिन मनाई जाने वाली ईद का इंतजार करने लगी, ताकि उस के खत्म होते ही वह अपने परिवार के पास वापस लौट सके. रात में एकता ने शाकेब के पूरे परिवार के साथ मिल कर खाना खाया.

खाना खाने के बाद परिवार के सभी लोगों ने सोने से पहले कोल्डड्रिंक पी. शाकेब की भाभी रेशमा ने एकता को भी एक गिलास में डाल कर कोल्डड्रिंक पीने के लिए दी, जिस के बाद सभी लोग खुशनुमा माहौल में कुछ देर बात करने लगे.

चंद मिनटों बाद एकता को नींद की उबासी आने लगी तो उस ने कहा कि उसे सोना है. यह सुनने के बाद सभी लोग उसे कमरे में सोने के लिए छोड़ कर बाहर चले गए.

दरअसल अब तक जो घटनाक्रम हो रहा था, वह एक एक साजिश का हिस्सा था जिसे अब अंजाम दिया जाना था. जिन दिनों अमन बना शाकेब दौराला में एकता के साथ किराए का घर ले कर रह रहा था, उस वक्त वह रोज अपने घर वालों से मिलने के लिए आता था.

उस ने घर वालों को बता दिया था कि उस ने एक हिंदू लडकी को अपने जाल में फंसाया है और उस से दिखावे के लिए शादी भी कर ली है. क्योंकि उस ने लड़की को अपने बारे में यही बताया था कि वह हिंदू है.

परिवार वालों को जब ये पता चला कि एकता शाकेब के प्यार में फंसने के बाद अपने घर से करीब 25 लाख रुपए के गहने व नकदी भी चुरा कर ले आई है तो सब बहुत खुश हुए. चूंकि एक दिन तो एकता के ऊपर अमन उर्फ शाकेब के मुसलिम होने की हकीकत पता चल ही जानी थी और उस के परिवार की हकीकत भी उजागर हो जानी थी.

शाकेब का परिवार यह भी जानता था कि अगर शाकेब से हिंदू लड़की एकता निकाह के लिए राजी भी हो गई तो उन की बिरादरी के लोग उन का गैरमजहब में शादी के कारण जीना हराम कर देंगे. अगर शाकेब और एकता की शादी नहीं हुई तो यह भी तय था कि वह शाकेब को दी गई अपनी सारी रकम मांग लेगी.

इसलिए शाकेब ने अपने पिता, भाई और भाभियों के साथ मिल कर पहले ही यह साजिश तैयार कर ली थी कि एकता को अपने घर ला कर उस की हत्या कर दी जाए. इस से उसे एकता की रकम भी नहीं लौटानी पड़ेगी और उस से छुटकारा भी मिल जाएगा.

एकता के नशे में बेसुध हो जाने के बाद शाकेब ने उस के कपड़े उतारे और नशे की अवस्था में ही उस के शरीर से अपनी हवस की भूख शांत की. एकता के शरीर से खिलवाड़ करने के बाद बिस्तर से उठ कर अंगड़ाई लेने के बाद शाकेब बुदबुदाया, ‘‘मूर्ख लड़की तुझे मेरे साथ सुहागरात मनाने की बड़ी जल्दी थी न…चल मरने से पहले मैं ने तेरी ये ख्वाहिश भी पूरी कर दी. अब अगले जन्म में हमारी मुलाकात होगी.’’

शाकेब ने उस के बाद दूसरे कमरों में बेसब्री से इंतजार कर रहे अपने भाई, भाभियों और पिता को बुलाया. इस के बाद उन्होंने मिल कर एकता की गला दबा कर हत्या कर दी.

चूंकि पूरी साजिश पहले ही तैयार कर ली गई थी. एकता की लाश को भी ठिकाने लगाना था. इस काम के लिए शाकेब ने अपने ही गांव में रहने वाले एक कम उम्र के लड़के अयान को भी अपने साथ मिला लिया था. अयान कुछ दिनों से शाकेब के साथ मिल कर तंत्रमंत्र का काम सीख रहा था. शाकेब ने उसे 20 हजार रुपए भी देने का वायदा किया.

ये भी पढ़ें- प्रीति की कड़वी गोली : भाग 3

एकता की हत्या करने के बाद शाकेब ने अपने भाई, पिता और अयान के साथ मिल कर ईद पर दी जाने वाली बलि की पहले बलकटी से एकता की गरदन काट कर उसे धड़ से अलग किया. उस के बाद दोनों हाथों को कंधे से काट कर अलग किया.

दरअसल सिर और दोनों हाथ काटने की खास वजह थी. शाकेब को डर था कि अगर कल को किसी वजह से एकता का शव बरामद भी हो जाए तो उस की पहचान न हो सके. क्योंकि उस के हाथ पर उस का अपना नाम गुदा हुआ था और दूसरे पर उस ने अमन का नाम गुदवाया हुआ था. इसीलिए शाकेब ने उस के दोनों हाथ भी धड़ से अलग कर दिए थे.

एकता की हत्या के बाद उस के शरीर के चारों टुकड़ों को 4 अलगअलग बोरियों में भर कर उसी रात शाकेब अपने भाई व दोस्त के साथ मोटरसाइकिल पर लाद कर उन्हें ठिकाने लगाने के लिए ले गए.

सब से पहले लोइया गांव में ही ईश्वर पंडित के खेत में गड्ढा खोद कर एकता के धड़ वाले हिस्से को दफना दिया गया. शव जल्द से गल जाए, इस के लिए शाकेब ने शव के ऊपर 5 किलो नमक डाल दिया और ऊपर से मिट्टी डाल दी.

धड़ को ठिकाने लगाने के बाद शाकेब ने भाई व दोस्त के साथ मिल कर एकता के सिर व दोनों कटे हुए हाथों को बोरी समेत गांव के आसपास के कीचड़ भरे तालाबों के किनारे दफना दिया.

अगले दिन शाकेब के पूरे परिवार ने धूमधाम से ईद मनाई. उस दिन 5 जून, 2019 थी. ईद मनाने के कुछ दिन बाद ही शाकेब फिर से करनाल में आ कर अपने दोस्तों के साथ तंत्रमंत्र के काम में लग गया.

लेकिन इस दौरान कहीं न कहीं उस के मन में एक डर भी बना रहा. वह जानता था कि एकता ने अपने परिवार को उस के बारे में बता रखा है और यह भी बता दिया है कि उस ने अमन से शादी कर ली है. इसलिए उस ने एकता के मोबाइल का सिम निकाल कर उस के वाट्सऐप तथा फेसबुक को खुद ही अपडेट करने का काम शुरू कर दिया. ताकि उस के परिवार को लगे कि एकता ठीक है.

शाकेब अमन बन कर एकता के वाट्सऐप तथा फेसबुक की गैलरी में पड़ी प्रोफाइल फोटो भी चेंज करता रहता था, जिस से एकता के परिवार को लगता कि वह खुश है. कभीकभी एकता की मां उसे मैसेज करती थी, जिस का वह चैटिंग के जरिए तो एकता बन कर जवाब देता मगर जब वह उस से फोन पर बात करने के लिए कहती तो वह एकता बन कर कह देता कि सौरी मम्मी, मैं फोन पर बात नहीं करूंगी.

इधर कुछ दिन बाद 13 जून को कुत्तों ने ईश्वर पंडित के खेत में उस जगह को खोद दिया, जहां एकता की लाश को दबाया गया था. कुत्ता शव के एक हिस्से को मुंह में दबा कर जा रहा था तो गांव वालों पर ये भेद खुल गया और मामला पुलिस तक पहुंच गया.

ये भी पढ़ें- पुरानी मोहब्बत नई अंगड़ाई

सर्विलांस टीम ने खोला केस

चूंकि पुलिस को एकता की लाश का केवल धड़ मिला था, इसलिए पुलिस के सामने सब से बडी चुनौती थी कि शव की शिनाख्त कैसे की जाए. इसलिए एसएसपी अजय साहनी ने अपनी सर्विलांस टीम को जांच के काम में लगा दिया. ये टीम एसएसपी के कैंप औफिस में उन्हीं की निगरानी में काम करती है और छोटी से छोटी जानकारी के बारे में एसएसपी को ही रिपोर्ट करती है.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें