सावधान! मूर्खता है धर्मगुरु बनाना और सत्संग में जाना

लंबेचौड़े और ऊंचे मंच पर हजारों की भीड़ के सामने रेशमी गेरुआ वस्त्र धारण किए, रुद्राक्ष, मोती व चंदन की माला पहने, गुलाब के फूलों से महकते सिंहासन पर बैठ, सुंदर रूपसी बालाओं से घिरे हुए धर्मगुरु का देश की गरीबी पर कंरदन करते हुए यह कहना कि संसार मिथ्या है, घरपरिवार माया है, धन की इच्छा लोभ है, मोहमाया के बंधन से मुक्त हो जाओ…और फिर प्रवचन समाप्त कर के उन का अपने भक्तों की भीड़ के बीच से हो कर गुजरना, भक्तों का उन्हें देख कर जयकारा लगाना…इस धर्मगुरु के पैर छूने में एकदूसरे को कुचल डालने की होड़ और अंत में अपनी चमचमाती लग्जरी गाडि़यों के बेड़े से स्टैंडर्ड बढ़ाते चेलों की लंबी लाइन के साथ अपने आलीशान पांचसितारा सुविधाओं वाले आश्रम की तरफ प्रस्थान कर जाने का यह दृश्य किसी फिल्म का नहीं बल्कि किसी भी धर्मगुरु के सत्संग में होने वाली फुजूलखर्ची का नजारा है.

धर्मगुरु बनाने का यह चलन कोई नया नहीं, बल्कि बहुत पुराना है. समाज में इस तरह का प्रचार कर दिया गया है कि भगवान से बड़ा ‘गुरु’ है और लोग भी भगवान को भूल कर गुरु की शरण में आ रहे हैं. शिष्य आजकल गुरुओं की पूजा करने लगे हैं.

इस तरह के प्रचार के चलते ही धर्मभीरु जनता भयभीत हो गुरु को ढूंढ़ती है और गुरु मिल जाने पर उस के द्वारा गुरुमंत्र दिया जाता है, जिस के बदले दीक्षा लेने वाले को मोटी दक्षिणा गुप्त दान के रूप में देनी होती है. इन तथाकथित गुरुओं द्वारा बताया जाता है कि जो जितनी अधिक दक्षिणा देगा उसे उतना ही अधिक लाभ होगा. दक्षिणा के साथ फल का संबंध एक प्रकार का व्यावसायिक संबंध ही है और इस के बाद तो यह सिलसिला जीवन भर चलता रहता है.

हिंदू धर्मग्रंथों में गुरु की महिमा का बढ़चढ़ कर बखान किया गया है. भक्तिकाल के कवियों ने तो जम कर गुरु को महिमामंडित किया है. गुरु के बारे में कई उक्तियां प्रसिद्ध हैं, जैसे :

गुरुर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुगुरूर्देवो महेश्वर:।

गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नम:॥

-स्कंदपुराण, गुरुगीता

(अर्थात गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है, गुरु ही परब्रह्म है, उस गुरु के लिए नमस्कार.)

गुरु बिन पंथ न पावै कोई।

केतिकौ ज्ञानी ध्यानी होई॥

-नूरमुहम्मद अनुराग बांसुरी, पृ. 33

पहले धार्मिक गुरु ब्राह्मण होते थे और इन्हीं ब्राह्मणों ने धर्म के मुख्य उद्देश्य नैतिकता को ताक पर रख कर दूसरे उद्देश्यों पर पूरा जोर दिया. ब्राह्मणों ने अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए आत्मापरमात्मा, स्वर्गनरक, जन्ममरण की भूलभुलैया भरे सिद्धांतों के जाल में समाज को फंसा कर उस का खूब शोषण किया.

शोषण का साधन यज्ञ को बनाया. यज्ञ को ले कर धर्मग्रंथों में इस का गुणगान भरा पड़ा है. अथर्ववेद की घोषणा है :

‘अयं यज्ञो भुवनस्य नाभि’

(अर्थात विश्व की उत्पत्ति का स्थान यह यज्ञ है.)

गीता का उद्घोष है :

‘यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्रे लोकोऽयं कर्म बन्धन:’

(अर्थात यज्ञ के लिए जो कर्म किए जाते हैं, उन के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह लोक बंधा है.)

इसी में आगे कहा गया है :

‘नायं लोकोऽस्त्य यज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरूसतम’

(अर्थात यज्ञ करने वाले को जब इस लोक में ही कोई सफलता नहीं मिलती तब उसे परलोक कहां मिलेगा.)

राजामहाराजा राजसूर्य या कहें अश्वमेध यज्ञ करते थे, जिन में हजारों ब्राह्मणों को धनदौलत, वस्त्र, दासदासी, घोड़े, रथ आदि दानस्वरूप दिए जाते थे क्योंकि यह यज्ञ पूरे ही तब होते थे जब उन्हें भरपूर दानदक्षिणा मिल जाती थी. यह यज्ञ पूरे साल चलते रहते थे. हां, इन के नाम व उद्देश्य जरूर बदले होते थे पर राजाओं को प्रतिदिन दान करना होता था और तलवार के बल पर जमा की गई धनदौलत से भरे खजाने खाली हो कर ब्राह्मणों के घर चले जाते थे. राजाओं को अश्वमेध यज्ञ के फलस्वरूप इस जन्म में कीर्ति तथा अगले जन्म में पुन: राजा बनने का झूठा आश्वासन मिलता था और ब्राह्मणों के घर ठगी के धन से भर जाते थे. इस दान के प्रमाण ऋग्वेद में मिलते हैं.

‘‘हे अग्ने, देवभक्त के पौत्र पिजवन के पुत्र सुदास ने 200 गाएं, बधुओं सहित 2 रथ दान किए. इस दान की प्रशंसा करते हुए मैं योग्य होता यज्ञ गृह में जाता हूं.’’

-ऋग्वेद 7-18-22.

धर्म के धंधे में पैसा है इसलिए देश में ऐसे निकम्मे लोगों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई है. साधुसंत नामधारी ये जीव गृहत्याग का बहाना बना कर घुमक्कड़ जीवन अपना, एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं. इन सभी का उद्देश्य एक ही होता है कि जीविका के लिए कर्म न करना पड़े और चढ़ावे व भिक्षा के द्वारा ही जीवन निर्वाह होता रहे, यानी धर्म की आड़ में बिना हाथपांव हिलाए पेट भरना, जबकि हकीकत में धर्मकर्म से वे कोसों दूर रहते हैं और इन में बहुत से दुर्व्यसनों व दुराचारों में लीन रहते हैं.

धर्मगुरुओं में आज आपस में ही होड़ मची हुई है कि किस के चेले ज्यादा हैं, कौन छोटा कौन बड़ा है. कौन ज्यादा भीड़ जुटा पाता है और किस के कितने अमीर शिष्य हैं. ये तथाकथित गुरु दुनिया के बैरभाव कहां दूर करेंगे, खुद इन के अपने मठ में ही गद्दी हथियाने की लड़ाइयां चलती रहती हैं, मारकाट मची रहती है.

मठों, आश्रमों में अपार धन आता है. गुरुशिष्य के बीच इस को ले कर लड़ाईझगड़े शुरू हो जाते हैं. इस में सब से ज्यादा चालाक और ताकतवर शिष्य गुरु की गद्दी पर विराजमान होता है. इस का एक ताजा उदाहरण बाबा रामदेव है जो पतंजलि योग पीठ के संस्थापक शंकरदेव को पीछे धकेल कर खुद गद्दी पर बैठ गया.

प्रवचनों का हाईटेक रूप

जिस भी धार्मिक गुरु का प्रवचन जिस शहर में होना होता है वहां उन के शिष्य कई दिन पहले पहुंच कर अपने गुरु की महिमा का बखान शुरू कर उन के नाम के परचे बांटते हैं, बड़ेबड़े होर्डिंग शहर भर के चौराहों पर लगते हैं. अपने गुरु का प्रचार कर बड़ी संख्या में भीड़ जुटाने का काम ये चेले ही करते हैं.

बड़े घरों की महिलाएं सजसंवर कर प्रवचन का लाभ लेने सब से आगे बैठने की होड़ में लगी रहती हैं. अब यह बात अलग है कि उन का मकसद प्रवचन नहीं, वीडियो रिकार्डिंग होती है क्योंकि प्रवचन के वीडियो कैसेट साल भर दिखाए जाते हैं.

चूंकि समय के साथसाथ धर्म का व्यापार भी आधुनिक करवट ले रहा है इसलिए धर्म के क्षेत्र में भी इलेक्ट्रोनिक समावेश अपनी पहचान बना चुका है हिंदुओं की धर्मांधता को भुनाने के लिए कई धार्मिक चैनल आ गए हैं. जैसे, श्रद्धा, संस्कार, आस्था आदि. बाकी के लोकप्रिय चैनल भी दिन में कुछ घंटे प्रवचन जरूर दिखाते हैं.

आम जनता के बीच बड़े पंडाल में जब ये धार्मिक गुरु प्रवचन करते हैं तो उसे प्रवचन कहते हैं और जब वातानुकूलित सभागार में बैठ कर बोलते हैं तो वह आध्यात्मिक उपदेश में तबदील हो जाता है. इन का लक्ष्य विदेशों में रह रहे प्रवासी भारतीय भी हैं. ये प्रवासी भारतीय जम कर दानदक्षिणा देते हैं. धर्म के नाम पर ये गुरु और चैनल वाले दोनों ही जनता की जेब काट रहे हैं.

प्रवचन बिजनेस के ब्रांड नाम का काम

आसाराम बापू, मोरारी बापू, सुधांशु महाराज तो अब प्रवचन बिजनेस के ब्रांड नाम बन चुके हैं. इन के नाम पर लोग अपना सारा कामधंधा छोड़ कर इन का प्रवचन सुनने पहुंचते हैं. इन के प्रवचन का नशा किसी अफीम से कम नहीं है इसीलिए धर्म के नाम पर इन संतों के शिविर हर शहर में लगाए जाते हैं.

इन भव्य पंडालों को लगाने में लाखों रुपए खर्च होते हैं. भक्तों द्वारा आवास समिति, स्वागत समिति, भोजन समिति, पंडाल समिति, स्वामीजी रक्षक समिति, प्रचार समिति व धन संग्रह समिति प्रमुखता से गठित कर दी जाती हैं. यहां पर बड़े दानदाता स्वागत समिति में, व्यापारी भोजन समिति में, पत्रकार, समाजसेवी व खासखास सरकारी विभागों के अधिकारी धनसंग्रह समिति में लिए जाते हैं. शहर के दबंगों को रक्षक समिति में लिया जाता है व बाकी समर्पित कार्यकर्ताओं को पंडाल, सेवा, साफसफाई व प्रचार समिति में रखा जाता है.

ये सभी अपना कामधंधा छोड़ कर जितने दिन प्रवचन होते हैं धार्मिक गुरु की चाकरी में लगे रहते हैं. इस के बदले में इन्हें मिलता है स्वामीजी का आशीर्वाद, जिसे पा कर ये अपने को धन्य समझ लेते हैं और मान लेते हैं कि स्वामीजी का हाथ इन के सिर पर है.

बिजली, माइक, क्लोज सर्किट टीवी और सजावट के दूसरे सामानों पर भी खर्च आता है. हर एक शिविर पर लाखों रुपए का खर्च आता है, जो प्रवचन के ये ब्रांड नाम अपनी जेब से नहीं देते बल्कि इन के प्रवचन के आयोजन- कर्ता खर्च करते हैं और इन के भक्त अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई लुटाने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

आगरा में रहने वाले जगमोहन गुप्ता का कहना है कि अभी कुछ साल पहले वृंदावन में मोरारी बापू के प्रवचन का भव्य आयोजन किया गया. यहां पर पंडाल में विशेष भक्तों, पत्रकारों, महिलाओं व विशेष दानदाताओं के लिए अलगअलग स्थान तय थे. भक्तों से मंच पर बैठ कर कथा सुनने की फीस बनाम दक्षिणा 3,100 से 5,100 रुपए तक वसूल की गई. गद्दा और सफेद धुली चादर पर आगे की पंक्ति में बैठ कर कथा सुनने की फीस 2,100 से 3,100 रुपए तक वसूली गई. बढ़ती महंगाई को देख कर कहा जा सकता है कि कथा सुनने की यह फीस अब और भी बढ़ गई होगी.

इस तरह की कथा का आयोजन जहां भी होता है कथा के दौरान लगभग 30-40 अस्थायी दुकानें भी लग जाती हैं. इन दुकानों में गुरुओं की कथा के कैसेट, संतों के प्रवचन के कैसेट और पुस्तकें 30 से ले कर 50 रुपए तक में बिकती हैं. इन के हजारों अनुयायी गुरुओं द्वारा प्रकाशित पत्रिका के स्थायी ग्राहक बनते हैं. प्रत्येक दुकान 11 दिन के लिए 1 हजार से ले कर 2 हजार रुपए तक ठेके पर उठाई जाती है. यहां संतों की तसवीरें भी 100 से 300 रुपए तक में खूब बिकती हैं.

यह आमदनी लाखों में होती है. जहां प्रवचन होते हैं वहां थोड़ीथोड़ी दूरी पर दानदाता की सुविधा के लिए दानपात्र रखे होते हैं, जिन पर लिखा होता है, ‘रुपएपैसे दानपात्र में ही डालें और आभूषण व कपड़े पंडित के पास जमा कराएं.’ सोचने की बात यह है कि ये धर्मगुरु तो संत हैं और संत तो कुछ लेते नहीं हैं या यों कहें कि इन्हें तो कुछ लेना नहीं चाहिए. फिर चढ़ावे की रकम कहांकहां आपस में बंटती है और किस को कितना मिलता है यह खोज का विषय है. यह सबकुछ हर धर्मगुरु के सत्संग में देखने को मिलता है.

मलीमसानपि जनान संत:

कुर्वन्ति निर्मलान।

(अर्थात संत मलिन चित्त वाले मनुष्यों को भी निर्मल कर देते हैं.)

-अचिंत्यानंद वर्णी, विवेकशतक, 55

लेकिन आजकल के ये संत कितने सुचरित्र वाले हैं इस का पता तो इन कुछ उदाहरणों से ही चल जाएगा. अपने प्रवचन में लाखों की भीड़ जुटाने वाला संत ज्ञानेश्वर खुद को भक्तों के बीच भगवान बतलाता था. इस स्वघोषित भगवान की जिस समय गोली मार कर हत्या की गई उस समय उस पर हत्या करने, बिजली की चोरी, सरकारी जमीन पर कब्जा, विस्फोटक पदार्थ एक्ट, अवैध हथियार रखने, जैसे अनेक मुकदमे चल रहे थे. उस के वाराणसी व बाराबंकी आश्रम में बड़ी संख्या में स्त्रियों का शारीरिक शोषण होता था.

करौंथा स्थित सतलोक आश्रम का स्वामी संत रामपाल अब जेल में है. उस की काली करतूतों से परदा उठ चुका है. रामपाल और उस के चेलों पर हत्या और जमीन पर जबरन कब्जा, डरानेधमकाने के अन्य मामले भी दर्ज किए गए हैं. लोगों को मोहमाया से दूर रहने का उपदेश देने वाला रामपाल खुद किस कदर मोहमाया से जकड़ा था यह उस का आलीशान आश्रम देखने से ही पता चल जाता है.

48 साल के पाखंडी साधु विकासानंद को पुलिस ने छापा मार कर जबलपुर के एक होटल से उस वक्त गिरफ्तार किया जब वह कुछ लड़कियों के साथ आपत्तिजनक स्थिति में था.

उस का फाइव स्टार आश्रम जबलपुर में ऐय्याशी, ब्लैकमेलिंग, स्मगलिंग व ब्लू फिल्म बनाने का अड्डा बना हुआ था.

खुद को कृष्ण व शिव का अवतार बता कर एक तांत्रिक नारायण दत्त श्रीमाली व उस के पुत्रों ने हरियाणा के सैकड़ों लोगों से 4 करोड़ के लगभग ठग लिए थे. 2001 में नारायण दत्त के खिलाफ कई आपराधिक मामले भी दर्ज किए गए.

धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने अपनी राजनीतिक पहुंच के कारण अरबों की संपत्ति जमा कर ली. उस का अपना हवाई जहाज और हवाई अड्डा था. ऐसे स्वामी से सदाचार की क्या उम्मीद की जा सकती है?

रामदेव पर भी आयुर्वेद की आड़ में आम लोगों की सेहत से खिलवाड़ करने का आरोप लगा. लेकिन लोगों में उस की पहुंच को देख कर सरकार खामोश हो गई.

शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी के बाद विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समेत तमाम हिंदूवादी संगठनों और नेताओं ने उन की गिरफ्तारी के तरीकों पर ऐतराज जताते हुए पृथक कानून व्यवस्था बनाने की मांग उठाई.

धर्म के इन ठेकेदारों की मानें तो शंकराचार्य या अन्य किसी धार्मिक व्यक्ति को गिरफ्तार न करना ही धर्म का सम्मान है. ये चाहते हैं कि धर्माचार्यों को अपराध करने की छूट दे दी जाए यानी धर्म को कानून के नीचे रखा जाए. अब सवाल यह उठता है कि हिंदू धर्म की सब से ऊंची गद्दी पर बैठे ये लोग अगर अपराध करते हैं तो इन्हें सजा क्यों न दी जाए?

अब यह साबित हो चुका है कि ये धर्मगुरु खुद ही परले दर्जे के ऐय्याश, धोखेबाज, कुचरित्र, हत्या जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त पाए जाते हैं, तो जनता को अपने सत्संग में कौन सा मुक्ति का पाठ पढ़ाएंगे? धार्मिक गुरुओं द्वारा जनता को बेवकूफ बना कर माल बटोरने का यह धंधा सदियों से चला आ रहा है इसलिए अब समय आ गया है कि जनता जागरूक हो जाए और धर्म के ठेकेदार बने इन संतों, गुरुओं की दुकानदारी पर रोक लगाए.

खून में डूबा प्यार का दामन : किस ने उजाड़ी दो दिलों की दुनिया

18 वर्ष की वैष्णवी दरमियाने कद की सुंदर युवती थी. उस के पिता हरीराम गुप्ता अपने सब बच्चों से ज्यादा उसे प्यार करते थे. चूंकि वह जवान थी, इसलिए सतरंगी सपने उस के दिल में आकार लेने लगे थे. वह अपने भावी जीवनसाथी के बारे में सोचती रहती थी. कभी खयालों में तो कभी कल्पनाओं में वह उस के वजूद को आकार देने की कोशिश करती रहती.

वैष्णवी उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के संडीला कस्बे के मोहल्ला इमलिया बाग में रहने वाले हरीराम गुप्ता की बेटी थी. हरीराम के 3 बेटे थे, वेद प्रकाश उर्फ उत्तम, ज्ञानप्रकाश उर्फ ज्ञानू, सर्वेश उर्फ शक्कू और 2 बेटियां वैष्णवी और लक्ष्मी थीं.

वेदप्रकाश उर्फ उत्तम ने घर में ही बनी दुकान में किराने की दुकान खोल रखी थी. हरीराम और ज्ञानू उस की मदद करते थे. हरीराम ने तीसरे बेटे सर्वेश को एक पिकअप गाड़ी खरीद कर दे दी थी. वह उसी में सवारियां ढो कर अच्छेखासे पैसे कमा लेता था.

एक दिन वैष्णवी की मुलाकात गांव के ही रहने वाले गोविंदा से हुई तो वह उसे देखती रह गई. वह बिलकुल वैसा ही था, जैसा अक्स उस के ख्वाबोंखयालों में उभरता था. गोविंदा से निगाहें मिलते ही उस के शरीर में सनसनी सी फैल गई.

उधर गोविंदा का भी यही हाल था. वैष्णवी के मुसकराने का अंदाज देख कर उस का दिल भी जोरों से धड़क उठा. मन हुआ कि वह आगे बढ़ कर उसे अपनी बांहों में ले ले, मगर यह मुमकिन नहीं था, इसलिए वह मन मसोस कर रह गया. होंठों की मुसकराहट ने दोनों को एकदूसरे के आकर्षण में बांध दिया था. उस दिन के बाद उन के बीच आंखमिचौली का खेल शुरू हो गया.

गोविंदा भी संडीला के मोहल्ला अशरफ टोला में रहने वाले दिलीप सिंह का बेटा था. दिलीप सिंह के परिवार में पत्नी सुशीला के अलावा 2 बेटियां और 2 बेटे थे, जिस में गोविंदा तीसरे नंबर का था. दिलीप सिंह चाय का स्टाल लगाते थे.

सन 2002 में दिलीप बीमार हो कर बिस्तर से लग गए. उस समय उन के दोनों बेटे गोविंदा और आकाश पढ़ रहे थे. पिता के बीमार होने से घर की आर्थिक स्थिति खस्ता हो गई तो दोनों भाइयों को पढ़ाई छोड़नी पड़ी.

घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए दोनों भाई कस्बे की एक गारमेंट शौप पर नौकरी करने लगे. दिलीप सिंह की बड़ी बेटी का विवाह हो चुका था. 2 बेटे और एक बेटी अविवाहित थे.

नजरें चार होने के बाद गोविंदा रोजाना वैष्णवी के घर के कईकई चक्कर लगाने लगा. वैष्णवी को भी चैन नहीं था. वह भी उस का दीदार करने के लिए जबतब बाहरी दरवाजे की चौखट पर आ बैठती.

जब नजरें मिलतीं तो दोनों मुसकरा देते. इस से उन के दिल को सुकून मिल जाता था. यह उन की दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गया था.

दिन यूं ही गुजरते जा रहे थे. दिलों ही दिलों में मोहब्बत जवान होती जा रही थी. लब खामोश थे, मगर निगाहें बातें करती थीं और दिल का हाल बयान कर देती थीं. लेकिन आखिर ऐसा कब तक चलता.
गोविंदा चाहता था कि वह वैष्णवी से बात कर के अपने दिल का हाल बता दे. पर यह बात सरेआम नहीं कही जा सकती थी. आखिर एक दिन गोविंदा को मौका मिल गया तो उस ने अपने दिल की बात उस से कह दी. चूंकि वैष्णवी भी उसे चाहती थी इसलिए मुसकरा कर उस ने नजरें झुका लीं.

प्यार स्वीकार हो जाने पर वह बहुत खुश हुआ. जैसे आजकल अधिकांश लड़के लड़कियों के पास स्मार्टफोन होता है तो वे दूसरों को दिखाने के लिए उसे हाथ में पकड़े रहते हैं. ऐसा करते हुए उस ने वैष्णवी को नहीं देखा था. फिर भी उस ने मौका मिलने पर एक दिन वैष्णवी से उस का मोबाइल नंबर मांगा. वैष्णवी ने उसे बता दिया कि उस के पास फोन नहीं है.

‘‘कोई बात नहीं, मैं जल्द ही एक फोन खरीद कर तुम्हें दे दूंगा.’’ गोविंदा ने कहा.

इतना सुन कर वैष्णवी मन ही मन खुश हुई. अगले ही दिन गोविंदा ने एक मोबाइल खरीद कर वैष्णवी को दे दिया. वैष्णवी ने उसे पहले ही बता दिया था कि मोबाइल इतना बड़ा ले कर आए, जिसे वह आसानी से छिपा कर रख सके, इसलिए गोविंदा उस के लिए बटन वाला फीचर मोबाइल ले कर आया था. उस मोबाइल को वैष्णवी ने छिपा कर रख लिया. जब उसे समय मिलता, वह गोविंदा से बात कर लेती.

दोनों ही फोन पर काफीकाफी देर तक प्यारमोहब्बत की बातें करते थे. उन की मोहब्बत दिनोंदिन बढ़ती गई. दोनों जब तक बात नहीं कर लेते, तसल्ली नहीं होती थी. उन्हें मोहब्बत के सिवाय कुछ और नजर नहीं आता था. दोनों शादी के फैसले के अलावा यह भी तय कर चुके थे कि वे साथ जिएंगे, साथ ही मरेंगे.
बात 2 जनवरी, 2019 की है. दोपहर के समय गोविंदा अपने घर आया. उस समय वह कुछ परेशान था. उस ने खाना भी नहीं खाया. गोविंदा ने अपनी छोटी बहन सोनम से सारी बातें बता देता था. उस ने वैष्णवी और अपने प्यार की बात सोनम को बता दी थी. उस दिन छोटी बहन ने गोविंदा से उस की परेशानी की वजह पूछी तो उस ने अपनी परेशानी बता दी. साथ ही उसे कसम दी कि इस बारे में घर वालों को कुछ न बताए.

इतना कह कर वह अपराह्न 3 बजे के करीब घर से चला गया. जब वह देर रात तक घर नहीं लौटा तो मां सुशीला और भाई आकाश ने उसे सारी जगह खोजा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.

4 जनवरी, 2019 को सीतापुर के थाना संदना की पुलिस ने एक अज्ञात युवक की लाश बरामद की. चूंकि लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी थी, इसलिए इस की सूचना आसपास के जिलों की पुलिस को भी भेज दी गई.

गोविंदा के भाई आकाश के किसी दोस्त को वाट्सऐप पर एक लाश की फोटो मिली तो वह उस फोटो को पहचान गया. वह लाश गोविंदा की थी. उस ने वह फोटो आकाश को वाट्सऐप कर के फोन भी कर दिया. आकाश ने जैसे ही भाई गोविंदा की लाश देखी तो वह फफक कर रो पड़ा. घर के सदस्यों को पता चला तो वह भी गमगीन हो गए.

गोविंदा की छोटी बहन सोनम ने रोते हुए मां और भाई को बताया कि गोविंदा इमलिया बाग मोहल्ले में रहने वाले हरीराम की बेटी वैष्णवी से प्यार करता था. 2 जनवरी को वैष्णवी का मोबाइल उस के घर वालों ने छीन लिया था. यह बात गोविंदा को पता चली तो वह वैष्णवी के घर गया था. गोविंदा ने सोनम को कसम दी थी कि वह यह बात किसी को न बताए.

आकाश पता कर के किसी तरह वैष्णवी के घर पहुंचा तो हरीराम घर पर ही मिल गया. उस ने गोविंदा के घर पर आने की बात से साफ इनकार कर दिया.

तब गोविंदा की मां सुशीला कोतवाली संडीला पहुंच गई. उस ने इंसपेक्टर जगदीश यादव को पूरी बात बता दी. इंसपेक्टर यादव ने सुशीला से कहा कि पहले सीतापुर के संदना थाने जा कर बरामद की गई लाश देख लें. हो सकता है वह गोविंदा की न हो कर किसी और की लाश हो.

सुशीला अपने बेटे आकाश को ले कर थाना संदना, सीतापुर पहुंच गई. थानाप्रभारी ने मांबेटों को मोर्चरी में रखी लाश दिखाई तो उन्होंने उस की शिनाख्त गोविंदा के रूप में कर दी. पोस्टमार्टम के बाद गोविंदा की लाश उन्हें सौंप दी गई.

5 जनवरी की देर रात सुशीला ने संडीला कोतवाली के इंसपेक्टर जगदीश यादव को एक तहरीर दी. तहरीर के आधार पर पुलिस ने हरीराम गुप्ता और उस के बेटों वेदप्रकाश गुप्ता, ज्ञानप्रकाश गुप्ता, सर्वेश गुप्ता के अलावा दोनों बेटियों वैष्णवी और लक्ष्मी के खिलाफ भादंवि की धाराओं 147, 148, 302, 201, 342 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

चूंकि रिपोर्ट नामजद थी, इसलिए अगले ही दिन एएसपी ज्ञानंजय सिंह के निर्देश पर इंसपेक्टर यादव ने हरीराम गुप्ता, वेदप्रकाश गुप्ता और ज्ञानप्रकाश गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया. उन से सख्ती से पूछताछ की गई तो उन्होंने आसानी से स्वीकार कर लिया कि उन्होंने ही गोविंदा की हत्या की थी. इस के बाद उन्होंने उस की हत्या के पीछे की सारी कहानी बता दी.

गोविंदा और वैष्णवी एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. उन्होंने अपनी मोहब्बत की कहानी को घर वालों और जमाने से छिपाने की बहुत कोशिश की थी, परंतु कामयाब नहीं हो सके. उन के प्रेम संबंधों की खबर किसी तरह वैष्णवी के घर वालों को लग गई. इस के बाद वे उस पर निगाह रखने लगे.

एक दिन वैष्णवी घर पर अकेली थी. गोविंदा ने वैष्णवी को मोबाइल दे ही रखा था. उस दिन वैष्णवी ने गोविंदा को फोन कर के घर आने को कह दिया. गोविंदा उस के दरवाजे पर पहुंच गया. जैसे ही गोविंदा ने दस्तक दी, वैष्णवी ने दरवाजा खोल दिया. गोविंदा को सामने देख वह खुशी से झूम उठी.

वह उसे घर के अंदर ले गई. गोविंदा के अंदर दाखिल होते ही वैष्णवी ने दरवाजा बंद कर दिया और उस से लिपट गई. वैष्णवी की आंखों में आंसू छलक आए. गोविंदा ने उस से पूछा, ‘‘क्या हुआ वैष्णवी?’’

‘‘गोविंदा, घर में सब को हमारे संबंधों का पता चल गया है. मेरे घर वाले हमें कभी एक नहीं होने देंगे.’’ वह बोली.

‘‘ऐसा नहीं होगा वैष्णवी. तुम मेरे ऊपर विश्वास रखो. मैं जल्द तुम्हें यहां से कहीं दूर ले जाऊंगा. वहां सिर्फ हम दोनों होंगे, हमारा प्यार होगा और हमारी खुशियां होंगी.’’ गोविंदा ने भरोसा दिया.

‘‘सच कह रहे हो?’’ आश्चर्यचकित होते हुए बोली.

‘‘एकदम सच.’’ गोविंदा ने कहा. इस के बाद दोनों ने एकदूसरे को बांहों में लिया तो तनहाई के आलम में उन्हें बहकते देर नहीं लगी.

उस दिन गोविंदा काफी देर तक वैष्णवी के घर में रहा. दोनों ने जी भर कर बातें कीं और भावी जिंदगी के सपने बुने. फिर गोविंदा अपने घर चला गया.

उन की इस मुलाकात की जानकारी किसी तरह हरीराम और उस के बेटों को हो गई. वे सभी गुस्से से भर उठे और अपने घर की इज्जत नीलाम करने वाले को सबक सिखाने की ठान ली.

2 जनवरी, 2019 को हरीराम ने वैष्णवी को मोबाइल पर बात करते पकड़ लिया. हरीराम को समझते देर नहीं लगी कि वह गोविंदा से बात कर रही है और मोबाइल भी उसी का दिया हुआ है. हरीराम ने उस से मोबाइल छीन कर तोड़ दिया और उसे कई तमाचे जड़ दिए.

दूसरी ओर गोविंदा को फोन पर वैष्णवी के पिता की गुस्से से भरी आवाज सुनाई दे गई थी, क्योंकि जिस समय वैष्णवी की गोविंदा से बात चल रही थी, उसी समय हरीराम कमरे में आया था. बेटी को फोन पर बात करते देख वह दरवाजे से ही दहाड़ा था.

पिता के दहाड़ने की आवाज सुन कर गोविंदा को समझते देर नहीं लगी कि वैष्णवी के पिता ने उसे बातें करते पकड़ लिया है. वह परेशान हो उठा.

वह घर पहुंचा तो काफी परेशान था. मां सुशीला ने गोविंदा से खाना खा लेने को कहा, लेकिन उस ने खाना नहीं खाया. छोटी बहन सोनम को समझते देर नहीं लगी कि जरूर कोई बात है.

उस ने पूछा तो गोविंदा ने वैष्णवी के मोबाइल पर बात करते पकड़े जाने की बात बता दी और कहा कि वह वैष्णवी के घर जा रहा है. जाते समय उस ने सोनम को कसम दी कि यह बात किसी को न बताए. इस के बाद वह घर से निकल गया.

गोविंदा सीधे वैष्णवी के घर पहुंचा. घर पर हरीराम मिला तो वह उस से लड़ने लगा. शोर सुन कर हरीराम के तीनों बेटे वेदप्रकाश, ज्ञानप्रकाश और सर्वेश बाहर निकल आए. उन्होंने उसे दबोच लिया और पिटाई शुरू कर दी. फिर उस के मुंह पर टेप चिपकाने के बाद उस के हाथपैर बांध कर जिंदा ही बोरे में बंद कर दिया. यह सब वैष्णवी और लक्ष्मी के सामने हुआ था.

देर रात साढ़े 10 बजे सभी ने बोरे में बंद गोविंदा को सर्वेश की पिकअप गाड़ी में रख लिया. फिर वे सीतापुर की तरफ रवाना हो गए. सीतापुर के संदना थाना क्षेत्र में एक सुनसान जगह पर उन्होंने हाथपैर बंधे गोविंदा को बोरे से निकाला और साथ लाए बांके से उस का गला रेत दिया. उस की हत्या करने के बाद उन लोगों ने उस का पर्स, आधार कार्ड और बोरे को जला दिया. लेकिन वह पूरी तरह नहीं जल पाए थे.

हरीराम, वेदप्रकाश व ज्ञानप्रकाश से पूछताछ करने के बाद इसंपेक्टर यादव ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त बांका और पिकअप गाड़ी भी बरामद कर ली. इस के बाद तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया.

फिर 23 जनवरी, 2019 को इंसपेक्टर यादव ने वैष्णवी और सर्वेश को भी गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक लक्ष्मी की गिरफ्तारी नहीं हुई थी. बाकी अभियुक्त जेल में थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

किसी का किसी से प्यार करना गलत नहीं है, लेकिन प्यार करने वाले सोचते हैं कि वे अपनेअपने घर वालों की आंखों में धूल झोंक कर अपने प्यार की मंजिल तक पहुंच जाएंगे. उन की यही भूल कई बार…

रिलेशनशिप में सेक्स है बहुत जरूरी, पर रखें ध्यान

संबंधों में एक-दूसरे का साथ बेहद जरूरी है. आपसी संबंधों में जहां एक साथी का दूसरे साथी से मानसिक जुड़ाव होता है ऐसे में शारीरिक देह को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मानसिक जुडा़व के साथ-साथ शारीरिक जुड़ाव भी संबंधों में मधुरता लाता है. पति-पत्नी के संबंधों में सेक्स का अपना अलग महत्व है. न सिर्फ पति-पत्नी बल्कि वैवाहिक जीवन में सेक्स का महत्व बहुत अधिक होता है.

इससे पति-पत्नी न सिर्फ एक-दूसरे के नजदीक रहते हैं बल्कि सेक्स संबंधों में खटास को भी दूर करता है. जिस प्रकार जीवन में भोजन की आवश्यकता होती है, ठीक उसी तरह से वैवाहिक जीवन में सेक्स की आवश्यकता होती है. आइए जानते हैं संबंधों में सेक्स के महत्व के बारे में.

सही मायने में सेक्स सिर्फ भौतिक सुख ही नहीं बल्कि मानसिक सुख भी देता है, इसके साथ ही ये तनाव दूर करने में भी बहुत कारगर है. सेक्स के माध्यम से ही पति-पत्नी के संबंधों में भावनात्मक जुड़ाव अधिक दिखाई देता है.

सेक्स न करने के कारण पति और पत्नी दोनों के मन में ही ये भावना पनपने लगती है कि उनका पार्टनर उन्हें प्यार नहीं करता. जिससे घर में छोटे-छोटे कलेश भी भयंकर रूप ले लेते हैं.

पुरूषों के मन में संबंधों में खटास की बात तभी आती है, जब वो अकेले बैठकर अपनी सेक्सुअल लाइफ के बारे में सोचते हैं.

यदि पती-पत्नी  के बीच सेक्सुअल रिलेशन अच्छे होंगे तो परिवार में भी सुख-शांति होगी.

संबंधों में सेक्स की महत्ता को बरकरार रखने के लिए कुछ टिप्स

– हर समय पत्नी से सेक्स, संभोग इत्यादि की बात न करें नहीं तो इससे ऊब हो सकती हैं या फिर हमेशा ही संभोग के लिए तैयार न रहें बल्कि ओरल सेक्स भी कई बार मानसिक शांति देता है.

– अपने साथी के करीब खुशी-खुशी जाएं किसी तरह का कोई तनाव न रखें.

– करीब आने पर सिर्फ एक-दूसरे के बारे में ही बात करें किसी तीसरे व्यक्ति को अपने बीच न लाएं.

– जब भी अपने साथी के पास जाएं साफ-सुथरे रहें नहीं तो आपके साथी का मूड खराब हो सकता है.

– जरूरी नहीं कि एक ही पार्टनर हमेशा पहल करें, कभी-कभी दूसरा पार्टनर पहल करेगा तो संबंधों में प्रगाढ़ता बढ़ेगी.

– यदि किसी बात को लेकर तनाव हो गया था तो सेक्स के दौरान उन बातों का जिक्र बिल्कुल न करें जिससे आपका साथी नाराज हो गया था.

– पति-पत्नी का केवल अपने बिस्तर पर एक साथ सोना और सेक्स करना ही वैवाहिक जीवन नहीं कहलाता बल्कि उन दोनों के बीच एक-दूसरे के प्रति संपूर्ण समर्पण की भावना होना तथा संतुष्टि प्राप्त होना भी जरूरी होता है.

– पति-पत्नी किसी में भी सेक्स से संबंधित कोई दोष है तो उसका उपचार ठीक प्रकार से करना चाहिए ताकि अपने संबंध को गहरा बनाया जा सके.

– पति-पत्नी दोनों को वैवाहिक जीवन में सेक्स के महत्व को ठीक प्रकार से समझना चाहिए क्योंकि इसके बिना उनका वैवाहिक संबंध गहरा नहीं हो सकता है. विवाहित जीवन सुखी, संतुलित और आनंदपूर्ण बना रहे इसके लिए पति-पत्नी को चाहिए कि वह सेक्स के ज्ञान को ठीक प्रकार से समझ लें.

43 साल की श्वेता तिवारी के इस पोज ने लगा दी सोशल मीडिया पर आग

टीवी एक्ट्रेस श्वेता तिवारी इन दिनों अपनी बोल्ड फोटोज को ले कर चर्चा में बनी हुई हैं. ऐसा नहीं है कि ऐसा पहली बार हुआ है, बल्कि वे तो अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर हर दिन एक से बढ़ कर एक हौट फोटोज और वीडियोज अपलोड़ करती नजर आ ही जाती हैं. यही वजह है कि कभी उन का बाथरूम वीडियो वायरल होता है तो कभी उन की बोल्ड ड्रैस में फोटो.

 

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इन दिनों भी श्वेता तिवारी सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं. उन्होंने एक ऐसी स्कीन टाइट ड्रैस पहनी है जिस में वे बेहद ही बोल्ड लग रही हैं. उन्हें देख कर कोई भी उन की उम्र का अंदाजा नहीं लगा सकता है, जबकि वे 43 साल की हो चुकी हैं.

इन फोटोज में श्वेता तिवारी ने सिल्वर कलर का शिमरी वनपीस पहना हुआ है, जिस में वह कैमरे के सामने एक से बढ़ कर एक पोज देती हुई कातिलाना लुक दे रही हैं. इन फोटोज में श्वेता तिवारी ने बेहद ही टाइट ड्रैस पहनी हुई है जिस में वे एकदम हौट नजर आ रही हैं.

 

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इन तसवीरों में श्वेता अपने लुक को पूरा करने के लिए पैर में सेम शिमरी सिल्वर कलर के शूज पहने हुए हैं. इसे पहन कर एक्ट्रेस कैमरे के सामने अपनी अदाओं से ऐसा जादू चला रही हैं कि फोटो को एक नजर जिसजिस ने भी देखा, वह नजरें नहीं हटा पा रहा है.

अपने लुक को पूरा करने के लिए एक्ट्रेस श्वेता तिवारी गले में पतली सी चेन, सटल मेकअप और बालों को ओपन किए हुए दिखीं. इस के साथ ही अपने चेहरे पर ऐसे सैक्सी एक्सप्रेशन दिए जिसे देखने के बाद हर कोई उन की खूबसूरती का कायल हो गया. श्वेता तिवारी ने जैसे ही ये फोटोज शेयर कीं, तो फैंस उनबके लुक की तारीफ करने से खुद को रोक नहीं पाए. इस तसवीरों को श्वेता तिवारी ने अपने आधिकारिक इंस्टाग्राम पर खुद शेयर किया है.

 

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आप को बता दें कि श्वेता तिवारी की बेटी पलक तिवारी फिल्मों में एंट्री कर चुकी हैं. पलक की पहली फिल्म ‘किसी का भाई किसी की जान है’. इस में सलमान खान ने लीड रोल निभाया है.

इन फिल्म सितारों ने चूमने की कर दी थीं हदें पार

आजकल वैब सीरीज पर यह इलजाम लगता है कि उन में बहुत से ऐसे बोल्ड सीन होते हैं, जो दर्शकों की गरमी बढ़ देते हैं. पर यह भी सच है कि हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने कई ऐसी फिल्में दी हैं, जिन में काफी बोल्ड सीन देखने को मिले हैं. इतने लंबे किसिंग सीन कि लगे हीरो हीरोइन के होंठ आपस में परमानैंट चिपक गए हों.

बैंड बाजा बारात

 

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‘बैंड बाजा बारात’ मूवी तो आपको बखूबी याद होंगी. जिस फिल्म में अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह ने लीड रोल प्ले किया था. इस फिल्म  में अनुष्का शर्मा और रणवीर सिंह के बीच काफी लंबा किसिंग सीन दिखाया गया था. इसकी वीडियो खूब वायरल हुई थी.

जांबाज

 

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फिल्म ‘जांबाज’ भी एक किसिंग सीन की वजह से चर्चा में रही थी. ये किसिंग सीन अनिल कपूर और डिंपल कपाड़िया के बीच फिल्माया गया था. इसको सबसे लंबे किसिंग सीन्स में गिना जाता है.

दयावान

 

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माधुरी दीक्षित और विनोद खन्ना के फिल्म ‘दयावान’ से कई बोल्ड सीन्स वायरल हुए थे. लेकिन इस फिल्म का किसिंग चर्चा में रहा था. ‘दयावान’ फिल्म का किसिंग सीन खूब वायरल हुआ था.

राजा हिंदुस्तानी

फिल्म ‘राजा हिंदुस्तानी’ का किसिंग कोई कैसे भूल सकता है. इस फिल्म में आमिर खान और करिश्मा कपूर के बीच एक लंबा किसिंग सीन था.

मर्डर

 

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इमरान हाशमी कई फिल्मों बोल्ड सीन्स दिए है. लेकिन फिल्म ‘मर्डर’ उनकी सबसे बोल्ड फिल्मों में से एक है. इस फिल्म में इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत का एक किसिंग था, जो आज भी चर्चा में रहता है.

जिंदगी न मिलेगी दोबारा

 

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साल 2011 में आई फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’ में रितिक रोशन और कटरीना कैफ एक किंसिंग था, जो काफी वायरल हुआ था.

राज 3

 

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फिल्म ‘राज 3’ साल 2012 में आई थी, जिस में इमरान हाशमी और बिपाशा बसु एक काफी लंबा किसिंग सीन था. जिसे देखने के बाद लोग आहें भरते रह गए थे.

धूम 2

 

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साल 2006 में आई फिल्म ‘धूम 2’ में ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय बच्चन के बीच एक लंबा किसिंग था. तब इस सीन ने तहलका सा मचा दिया था.

परीक्षा से डर कैसा : यह रिजल्ट आखिरी तो नहीं

मनोवैज्ञानिक और काउंसलर अब्दुल माबूद कहते हैं, ‘‘यह काफी नाजुक दौर होता है, बच्चों को उन की जिंदगी की कीमत समझाना अभिभावकों का पहला काम होना चाहिए.’’

अब्दुल माबूद ने यह बात बच्चों की परीक्षा और उन के मानसिक दबाव को ले कर कही है. दरअसल,  परीक्षाओं का दौर खत्म होने के बाद छात्रों को कुछ दिनों की राहत तो मिलती है पर साथ ही रिजल्ट का अनचाहा दबाव बढ़ने लगता है. बच्चे भले ही हम से न कहें पर उन्हें दिनरात अपने रिजल्ट की चिंता सताती रहती है. बोर्ड एग्जाम्स को तो हमारे यहां हौआ से कम नहीं माना जाता, जबकि यह इतना गंभीर नहीं होता जितना हम इसे बना देते हैं.

आजकल तो छोटी क्लास के बच्चों पर भी रिजल्ट का दबाव रहता है और इस दबाव की वजह सिर्फ और सिर्फ उन के पेरैंट्स होते हैं. ज्यादातर पेरैंट्स बच्चों के रिजल्ट को अपने मानसम्मान और प्रतिष्ठा से जोड़ कर देखते हैं. यही वजह है कि वे खुद तो तनाव में रहते हैं, बच्चों को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तनाव का शिकार बना देते हैं.

छात्रों पर बढ़ता दबाव

एग्जाम्स के रिजल्ट आने से पहले ही छात्रों के मनमस्तिष्क पर अपने रिजल्ट को ले कर दबाव पड़ने लगता है. एक तो स्वयं की उच्च महत्त्वाकांक्षा और उस पर प्रतिस्पर्धा का दौर छात्रों के लिए कष्टकारक होता है.

वैसे तो छात्रों को पता होता है कि उन के पेपर कैसे हुए और अमूमन रिजल्ट के बारे में उन्हें पहले से ही पता होता है, इसीलिए कुछ छात्र तो निश्चिंत रहते हैं पर कुछ को इस बात का भय सताता रहता है कि रिजल्ट खराब आने पर वे अपने पेरैंट्स का सामना कैसे करेंगे.

आत्महत्याएं चिंता का विषय

प्रतिस्पर्धा के दौर में सब से आगे रहने की महत्त्वाकांक्षा और इस महत्त्वाकांक्षा का पूरा न हो पाना छात्रों को अवसाद की तरफ धकेल देता है, जिस पर पेरैंट्स हर वक्त उन की पढ़ाई पर किए जाने वाले खर्च की दुहाई देते हुए उन पर लगातार दबाव डालते रहते हैं. इस से कभीकभी छात्र यह सोच कर हीनभावना के शिकार हो जाते हैं कि वे अपने पेरैंट्स की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर सके. यही वजह कभीकभी उन्हें अवसाद के दलदल में धकेल देती है और वे नासमझी में आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं.

पेरैंट्स के पास सिवा पछतावे के कुछ नहीं बचता. ऐसे में उन्हें यह विचार सताने लगता है कि काश, उन्होंने समय रहते अपने बच्चे की कद्र की होती. जिसे इतने अरमानों से पालापोसा, बड़ा किया वह उन के कंधों पर दुख का बोझ छोड़ कर चला गया. पिछले 15 सालों में 34,525 छात्रों ने केवल अनुत्तीर्ण होने की वजह से आत्महत्या की. ये आंकड़े सच में निराशाजनक और चिंतनीय हैं जिन पर सभी को विचार करने की जरूरत है.

बच्चों के साथ फ्रैंडली रहें

पेरैंट्स यदि बच्चों के साथ ज्यादातर सख्ती से पेश आएंगे तो बच्चे उन्हें अपने मन की बात नहीं बताएंगे. अगर वे रिजल्ट को ले कर तनाव में हैं तो भी डर के कारण नहीं बता पाएंगे. बच्चों के साथ आप का दोस्ताना व्यवहार उन्हें आप के नजदीक लाएगा और वे खुल कर आप से बात करना सीखेंगे. इस से न केवल वे तनावमुक्त रहेंगे बल्कि उन का आत्मविश्वास भी बढ़ेगा. उन्हें इस एहसास के साथ जीने दें कि चाहे जो भी रिजल्ट आए, पेरैंट्स उन के दोस्त के रूप में उन के साथ हैं.

तुम हमारे लिए सब से कीमती

बच्चों को इस बात का एहसास कराएं कि इस दुनिया में आप के लिए सब से कीमती वे हैं न कि बच्चों का रिजल्ट. अपने मानसम्मान को बच्चों के कंधों का बोझ न बनाएं. बच्चों के सब से पहले काउंसलर उन के पेरैंट्स ही होते हैं. यदि वे उन्हें नहीं समझेंगे तो हो सकता है बच्चे अवसाद के शिकार हो जाएं. उन्हें यह एहसास दिलाना होगा कि कोई भी परिणाम हमारे लिए तुम्हारी सलामती से बढ़ कर नहीं है.

शिक्षा को अहमियत देना गलत नहीं है लेकिन शिक्षा व परीक्षा के नाम व्यक्तिगत जिंदगी से सबकुछ खत्म कर लेना और उसे ही जीवन का अंतिम सत्य मान लेना खुद को कष्ट पहुंचाना ही है. अगर जीवन के हर भाव व पहलुओं का आनंद लेना है तो बच्चों की खुशी का भी ख्याल रखना होगा.

रिजल्ट के दिनों में पैरेंट्स के लिए बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखना बेहद जरूरी है. यह देखें कि कहीं वे गुमसुम या परेशान तो नहीं, ठीक से खाना खाते हैं या नहीं, जीवन के बारे में निराशावादी तो नहीं हो रहे हैं. इस समय पेरैंट्स को धैर्य का परिचय दे कर बच्चों के लिए संबल बनना चाहिए, न कि उन पर दबाव डालना चाहिए. उन्हें यह विश्वास दिलाएं कि उन का रिजल्ट चाहे जैसा रहे, उन के पेरैंट्स हमेशा उन के साथ हैं.

जीवन चलने का नाम है. एक बार गिर कर दोबारा उठा जा सकता है. जीवन में न जाने कितनी परीक्षाएं आतीजाती रहेंगी. उठो, चलो और आगे बढ़ो. अपनी क्षमताओं को पहचानो.

दुनिया ऐसे उदाहरणों से भरी पड़ी है जिन में बचपन में पढ़ाई में कमजोर रहे छात्रों ने बाद में सफलता के कई नए रिकौर्ड कायम किए हैं, आविष्कार किए हैं. यह परीक्षा जीवन की आखिरी परीक्षा नहीं है. जीवन चुनौतियों का नाम है. फेल होने का मतलब जिंदगी का अंत नहीं होता. इंसान वह है जो अपनी गलतियों से सीख कर आगे बढ़े.

मेरी पत्नी के सेक्स संबंध उसी के औफिस में एक सहकर्मी के साथ हैं, मैं क्या करूं?

सवाल-

मैं 34 वर्षीय और 5 साल की एक बेटी का पिता हूं. शादी के कुछ सालों तक हमारी वैवाहिक जिंदगी आराम से चली. इधर 1-2 साल से पत्नी कुछ बदलीबदली सी लगती है. सेक्स संबंध बनाए महीनों हो जाते हैं. मेरी इच्छा होती भी है तो पत्नी बहाना बना जाती है. उस के बदले व्यवहार को देखते हुए मैं ने पड़ताल की, तो पता चला कि पत्नी के संबंध उसी के औफिस में एक सहकर्मी से हैं. मैं ने पत्नी को रास्ते पर लाने की पूरी कोशिश की पर असफल रहा. अब मैं चाहता हूं कि इस रिश्ते को खत्म कर दूं और पत्नी से तलाक ले लूं. कृपया सलाह दें?

जवाब-

वैवाहिक जीवन में पति अथवा पत्नी द्वारा सेक्स के प्रति उदासीनता, सेक्स संबंध बनाने से इनकार करना तलाक का आधार बनता है. आप ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की पर पत्नी नहीं मानी, इसलिए आप चाहें तो तलाक ले सकते हैं पर यह आप की निजी राय हो सकती है.

जो भी निर्णय करें सोचसमझ कर करें, क्योंकि आप की 5 साल की बेटी भी आप दोनों की जिम्मेदारी है. उस पर तलाक का बुरा असर पड़ सकता है. तलाक आसान नहीं और आप को अधर में टांग सकता है. जिस हक की चाह आप को है, संभव है मिले ही नहीं.

जब पति ना लगाना चाहे कंडोम तो क्या करें

रीना और दिनेश की शादी को 3 महीने ही हुए हैं. उन की सेक्स लाइफ मस्त है बस एक ही दिक्कत है कि सेक्स के दौरान दिनेश को कंडोम का इस्तेमाल सिरदर्द लगता है, जबकि रीना ऐसा कोई रिस्क नहीं लेना चाहती, जिस से वह समय से पहले गर्भवती हो जाए. वह कम से कम 2 साल तक मां नहीं बनना चाहती है.

इस बारे में रीना और दिनेश की खूब बातें हो चुकी है, बहस भी हो चुकी है पर दिनेश को रीना की समस्या समझ नहीं आ रही है या वह जानबूझ कर उस के अरमानों की अनदेखी कर रहा है.

ऐसा अकसर होता है कि सेक्स संबंधों में भी औरत को ही समझौता करना पड़ता है कि वही गर्भनिरोधक का कोई साधन इस्तेमाल करे, मर्द को तो खुला खेल चाहिए, किसी तरह की रुकावट न आए रात को बिस्तर पर.

लेकिन कंडोम केवल बच्चा रोकने के लिए ही नहीं बनाया गया है, बल्कि यह सेक्स संबंधों के दौरान होने वाली बीमारियों की भी रोकथाम करता है. एड्स जैसी जानलेवा बीमारी को यह कम कीमत की रबड़ की पतली दीवार पनपने से पहले ही रोक देती है. यह ठीक है कि बिना इस के इस्तेमाल से सेक्स का मजा शानदार रहता है पर यह है बड़े काम की चीज.

अब तो कई वैरायटी के कंडोम

कंडोम का बाजार बहुत बड़ा है और कौम्पिटिशन भी ज्यादा है इसलिए अपने ग्राहकों को लुभाने के लिए कंडोम बनाने वाली कंपनियां पतले से पतले कंडोम बाजार में उतार रही हैं, ताकि उस के पहने जाने का अहसास ही न हो. इतना ही नहीं बाजार में तरह तरह के ऐसे कंडोम बिक रहे हैं जिन में डौट लगे होते हैं ताकि रगड़ का अनूठा अहसास हो.

इस के अलावा अब बाजार में अलग अलग फ्लेवर के कंडोम बिक रहे हैं जैसे स्ट्रौबेरी, बनाना, चौकलेट, वनीला, बबल गम कौफी और न जाने क्या क्या. पैकेट से इन के खुलते है माहौल में मस्त खुशबू घुल जाती है जिस से सेक्स करना और भी मादकता भरा हो जाता है.

अगर खुशबू वाले कंडोम न भाएं तो अन्फ्लेवर्ड, रिब्ड, लौन्ग लास्टिंग, बिग हेड, एक्स्ट्रा लुब्रिकेटेड, वार्म, अल्ट्रा थिन और एलोवेरा कंडोम भी बाजार में आप की राह देख रहे हैं.

सौ बात की बात, मर्दों को सेक्स संबंध बनाते समय कंडोम का इस्तेमाल हौव्वा नहीं समझना चाहिए, बल्कि एक बार इस की आदत पड़ जाए तो यह सेक्स का समय भी बढ़ा देता और पत्नी खुश रहती है सो अलग.

अगर सुरक्षित होने के नजरिए से भी देखा जाए तो कंडोम का कोई बुरा असर नहीं पड़ता है. अगर कभी किसी कंडोम के इस्तेमाल से कोई एलर्जी हो तो माहिर डौक्टर की सलाह लें.

जानें टेंशन से कैसे रहे दूर

टेंशन एक ऐसी समस्या है जिसको आज कल एक सामान्य बात सी हो गई है. घर, औफिस और पर्सनल लाइफ की उधेड़बुन में टेंशन हो ही जाती है. हमारे शरीर के लिए टेंसन किसी खतरनाक बीमारे से कम नही है जो इंसान को अंदर तक खत्म कर देती है. सबसे ज्यादा ये समस्या पुरुषों में देखी जाने लगी है इसका सबसे बड़ा कारण है तेजी से बदलती जीवनशैली और इस भागदौड़ भरी जिदंगी. अपने रोजमर्या के जीवन में  पुरष अक्सर छोटी-छोटी बातों पर तनाव ले लेते हैं, जो कि उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तो है ही साथ ही उनके वैवाहिक जीवन के लिए चिंता की बात है. इसलिए कुछ सावधानियां हमें जरुर बरतनी चाहिए जिससे इस तनाव से थोड़ी राहत जरुर मिले.

 आखिर किन कारणों से पुरुषों में होता है तनाव

कैरियर-  ये एक ऐसी समस्या है किसके कारण पुरुष काफी जल्दी अपना आपा खो देते है और टेशन लेना शुरु कर देते है.

काम का प्रेशर – आज कल सभी में आगे बढ़ने की चाह है जिसके चलते लोग एक्सट्रा काम करते है और जब वो काम भी उनको सफलता की ओर नही पहुंचा पाता तो उनको तनाव घेर लेता है.

पारिवारिक समस्या- पुरुषों में एक बात देखी जाती है की वो अपने इमोशन छिपाने में काफी माहिर होते है. इसी के चलते वो घरेलू परेशानियों किसी को बता नहीं पाते और अंदर ही अंदर घुटते चले जाते है.

आर्थिक परेशानीऐसा माना जाता है की पुरुष की कमाई समाज में काफी अहम है. अगर शादी बियाह की बात भी होती है तो पुछा जाता है की लड़का कमाता कितना है. इस आर्थिक स्थिती को ही आधार मना कर पुरुष इसे अपने स्वाभिमान पर ले लेते है और जब उनको वाकई मे किसी आर्थिक की जरुरत होता है तो वो किसी से कह नही पाते और तनाव में आ जाते है.

पुरुष अकेलापन, जल्दी या देर से शादी होना या शादी ही न कारणों में भी तनाव के घेरें में आ जाते है.

तनाव पुरुषों के जीवन के लगभग सभी क्षेत्र को प्रभावित करता है, इसलिए जीवनशैली में बदलाव तनाव की समस्या को कम करने में मदद करता है. तनाव के कारण पुरुषों के स्वास्थ्य में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते है जैसे

ब्लड प्रेशर का बढ़ना.

थका हुआ महसूस करना.

दिल तेजी से धड़कना.

इम्यूनिटी सिस्टम कमजोर होना.

 टेंशन से बचने के उपाय

योग और मेडिटेशन का करें इससे मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के तनाव दूर करने में मदद मिलती है,

तनाव से बचाव के लिए पर्याप्त नींद लें.

अपनी परेशानियों को दोस्तों और परिवार के साथ साझा करें.

तनाव को कम करने के लिए आप अपनी पसंद का गाना सुनें.

लाफ्टर थेरेपी का इस्तेमाल भी कर सकते है.

शोर करती चुप्पी : कैसा थी मानसी की ससुराल

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