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औलाद की खातिर : भाग 1

35 वर्षीय शिवकुमार सिंह उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के गांव लखनेपुर का निवासी था. उस के पिता उदयभान सिंह खेतीबाड़ी का काम करते थे. शिवकुमार के 3 भाई थे. एक बड़ा राजकुमार और 2 छोटे नरेश और देवकुमार. राजकुमार का विवाह हो चुका था, वह पिता के साथ खेती के काम में हाथ बंटाता था.

शिवकुमार का विवाह करीब 12 साल पहले उमा से हुआ था. बाद में वह 2 बेटियों की मां बनी.

उमा जब पहली बार गर्भवती हुई, तब उस की चाह बेटे की थी. यह चाहत दूसरी बार भी बनी रही. दोनों बार उमा को निराश होना पड़ा.

शिवकुमार को पता था कि बेटा न होने से उमा दुखी है. वह उसे समझाता भी था, लेकिन वह बेटा न होने के गम में घुलती रहती है. यह अलग बात है कि कई मायनों में बेटियां बेटों से लाख गुना बेहतर होती हैं.

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उमा के जी में तो आग लगी रहती कि सब के बेटे हुए, पर उसे नहीं हुआ. उस में ऐसी कौन सी कमी है, जो बेटी पर बेटी हो गई.

बच्चों के बड़े होने पर खर्च तो बढ़ा, लेकिन आमदनी उस हिसाब से नहीं बढ़ी. शिवकुमार बाहर जा कर काम करने की सोचने लगा. उस के गांव के कुछ लोग फरीदाबाद में काम करते थे. शिवकुमार ने उन से बात की तो दोस्तों ने काम पर लगवाने का वादा कर उसे फरीदाबाद बुला लिया. शिवकुमार पत्नी और बच्चों को छोड़ कर फरीदाबाद चला गया.

फरीदाबाद में एक फैक्ट्री में उस की नौकरी लग गई. वहां काम पर लगने के कुछ दिन बाद ही उस ने किराए पर कमरा ले लिया. रहने का सही ठिकाना हुआ तो वह गांव आ कर पत्नी उमा और दोनों बेटियों को अपने साथ फरीदाबाद ले गया. इस तरह उस की गृहस्थी की गाड़ी ठीकठाक चलने लगी.

शिवकुमार का छोटा भाई देवकुमार गांव में बेरोजगार घूमता था. उस ने कुछ दिनों बाद देवकुमार को भी फरीदाबाद बुला लिया. उस ने उसे भी काम पर लगवा दिया. दोनों भाई अच्छा कमाने लगे.

उमा के लिए फरीदाबाद अजनबी शहर था. वह दिन भर कमरे में ही रहती थी और कमरे में 2 ही इंसान थे, जिन से वह बात कर सकती थी, एक पति और दूसरा देवर.

पति से तो उमा सीमित बात करती लेकिन देवर देवकुमार से खूब गपशप करती थी. देवकुमार उमा से आयु में छोटा था और अविवाहित भी. वैसे भी देवरभाभी का रिश्ता होने के कारण उन में खूब पटती थी.

पहले तो उमा के प्रति देवकुमार की नीयत में खोट नहीं थी. लेकिन जब से उमा ने उस के सामने बेटा न होने का राग अलापना शुरू किया, तब से देवकुमार की नीयत डोलने लगी. भाभी की इसी कमजोरी का लाभ उठा कर देवर देवकुमार अपना उल्लू सीधा करने की सोचने लगा.

एक दिन काम से वापस आ कर देवकुमार जब उमा के पास बैठा तो उमा ने फिर अपने दुखड़े का पुलिंदा खोल दिया, ‘‘पता नहीं, मैं ने ऐसा कौन सा अपराध किया था, जिस का दंड बेटियों के तौर पर मुझे मिल रहा है.’’

देवकुमार को अपना उल्लू सीधा करने की दिशा मिल गई, ‘‘भाभी, बेटा और बेटी तो समान होते हैं, फिर तुम्हें बेटियों से चिढ़ क्यों है.’’

‘‘मुझे बेटियों से चिढ़ नहीं, अपने नसीब से शिकायत है.’’ उमा बोली, ‘‘2 बेटियों में से एक भी बेटा हो गया होता तो आज मेरे कलेजे में आग न लगी होती. कम से कम बुढ़ापे का सहारा और चिता में आग देने वाला भी तो कोई होना चाहिए. बेटा न होने से हमारे बाद तुम्हारे भैया का वंश ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘भाभी, विश्वास रखो,’’ देवकुमार ने आकाश की ओर उंगली उठाई, ‘‘नीली छतरी वाले के घर देर है, अंधेर नहीं. भाभी, लगातार 2 बेटियां होने से तुम खुद को दोषी क्यों मानती हो,’’ देवकुमार ने स्वार्थ की बिसात पर शातिर चाल चली, ‘‘तुम्हारी यह इच्छा जरूरी पूरी होगी.’’

उमा ने उस की आंखों में देखा, ‘‘यह तुम किस आधार पर कह रहे हो?’’

‘‘इसलिए कि शायद तुम्हें पता नहीं कि बेटा हो या बेटी, उस के लिए जिम्मेदार मां नहीं पिता होता है.’’

उमा ने चौंक कर उस की ओर देखा,‘‘मैं समझी नहीं, खुल कर बोलो.’’

‘‘भाभी जमीन को जोत कर उस में जिस पौधे का बीज डाला जाए, वही पौधा उगता है.’’ देवकुमार ने कायदे से समझाया, ‘‘अगर बीज खराब हो तो वह अंकुरित नहीं होता, मिट्टी में ही पड़ा रह कर सड़ जाता है.’’

‘‘हां, सड़ जाता है.’’

‘‘और बीज कमजोर होता है, तो उस से निकला पौधा भी कमजोर होता है न.’’

‘‘हां, होता है.’’

‘‘बस बेटियां होने की भी यही वजह है.’’ देवकुमार ने उमा को अपने शब्दों में समझा कर उस की दुखती रग पर उंगली रखी, ‘‘शिवकुमार भैया अंदर से कमजोर हैं. दरजन भर बच्चे पैदा कर लो, लड़की ही होगी. और तुम लड़के के लिए तरसती रहोगी.’’

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उमा गहरी सोच में डूब गई. देवकुमार ने उस की भावनाओं पर एक और चोट की, ‘‘मेरी बात का विश्वास न हो तो किसी पढ़े लिखे समझदार व्यक्ति से पूछ लो.’’

उमा की सोच और गहरी हो गई. उमा को इसी भंवर में फंसा छोड़ कर देवकुमार सोने चला गया. मन ही मन खुश होते हुए वह सोच रहा था कि तीर सही निशाने पर लगा है, असर जरूर देखने को मिलेगा. देवकुमार का सोचना सही था. उस की बात ने उमा के दिल पर गहरा असर किया था.

उमा कुछ देर बाद सोच के भंवर से निकली और उस ने तय किया कि वह पता करेगी कि क्या वास्तव में संतान के लिंग धारण का जिम्मेदार पिता होता है.

अगले ही दिन बीमारी का बहाना बना कर उमा एक लेडी डाक्टर के यहां गई. उस ने डाक्टर से पूछा तो उस ने कहा कि संतान के लिंग निर्धारण का उत्तरदायी पिता होता है. डाक्टर ने उमा को एक्सवाई की थ्योरी भी समझा दी.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

औलाद की खातिर

डस्ट: अपना मन हम कैसे साफ करेंगे

दरिंदगी की पराकाष्ठा : भाग 3

इंस्पेक्टर परवेज आलम ने माही का केस लेने के बाद झारखंड पुलिस द्वारा दिए गए दस्तावेजों व साक्ष्यों का पूरा अध्ययन किया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों से पूरी रिपोर्ट पर चर्चा की.

डाक्टरों ने सीबीआई को बताया कि मृतका के नाखूनों और वैजाइनल स्वैब राज्य विधिविज्ञान प्रयोगशाला भेजे गए हैं. इंसपेक्टर परवेज आलम ने एफएसएल की रिपोर्ट में पाया कि नाखून व वैजाइनल स्वैब में केवल एक ही पुरुष होने के सबूत मिले हैं.

इस से जांच टीम आश्वस्त हो गई थी कि केवल एक ही व्यक्ति ने इस घटना को अंजाम दिया है. घटना की तह तक जाने के लिए इंसपेक्टर परवेज आलम ने अपने अधिकारियों से बूटी बस्ती में रहने की इजाजत मांगी.

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सीबीआई मुख्यालय के आदेश पर परवेज आलम अपनी टीम के साथ बूटी बस्ती में किराए पर कमरा ले कर रहने लगे. वहीं रह कर वह गुप्त तरीके से हत्यारोपी के बारे में छानबीन करने में जुट गए.

बूटी बस्ती की रहने वाली एक बूढ़ी महिला ने उन्हें बताया कि एक युवक यहां अकसर घूमता था, जो मंदिर परिसर के एक कमरे में रहता था. वह अब दिखाई नहीं दे रहा.

इंसपेक्टर आलम के लिए यह सुराग महत्त्वपूर्ण साबित हुआ. इसी सुराग के आधार पर उन्होंने 300 से अधिक लोगों के काल डंप डाटा के आधार पर छानबीन की. जांच में पता चला कि उन में से करीब 150 नंबर घटनास्थल के आसपास के हैं, उन में कुछ नंबर मृतका के संबंधियों और दोस्तों के भी थे.

सीबीआई ने शक के आधार पर 150 संदिग्धों में से 11 लोगों के खून के नमूने ले कर जांच के लिए केंद्रीय विधिविज्ञान प्रयोगशाला, दिल्ली भेजे. इस बीच सीबीआई राहुल उर्फ राज के दोस्त बंटी तक पहुंच गई. बंटी से उस संदिग्ध युवक यानी राज के बारे में पूछताछ की गई जो मंदिर के पास अकसर घूमता था.

बंटी ने बताया कि उस का नाम राहुल उर्फ राज है. वह बिहार के नालंदा जिले के एकंगर सराय के गांव धुर का रहने वाला है. इंसपेक्टर परवेज आलम की मेहनत रंग लाई. उन्हें संदिग्ध युवक राहुल का पता मिल चुका था. वह टीम के साथ नालंदा स्थित उस के घर जा पहुंचा. वहां से पता चला कि राहुल फरार है.

वहां उन्हें एक और चौंकाने वाली बात पता चली कि राहुल दुष्कर्म के आरोप में पटना की बेउर जेल में बंद था. चाचा की मौत पर वह जेल से पैरोल पर घर आया था और चकमा दे कर पुलिस हिरासत से भाग गया था. तब से वह फरार है. इस के बाद सीबीआई की टीम ने राहुल की मां निर्मला देवी व पिता उमेश प्रसाद को बुलाया.

संदिग्ध आरोपी राहुल उर्फ राज की सच्चाई पता लगाने के लिए उन्होंने उस के मातापिता के खून के नमूने लिए और जांच के लिए केंद्रीय विधिविज्ञान प्रयोगशाला दिल्ली भेज दिए. वहां माही के नाखून व वैजाइनल स्वैब से मिले पुरुष के डीएनए से संदिग्ध आरोपी राहुल उर्फ राज की मां निर्मला देवी का डीएनए मैच कर गया. जबकि पिता उमेश प्रसाद का मैच नहीं किया.

डीएनए रिपोर्ट के आधार पर यह तय हो गया कि माही का कातिल राहुल उर्फ राज ही है. राहुल उर्फ राज की तलाश में सीबीआई ने कोलकाता, वाराणसी सहित कई जगहों पर छापेमारी की, लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं चला.

इसी बीच 15 जून, 2019 को राहुल उर्फ राज लखनऊ में मोबाइल चोरी के एक केस में पकड़ा गया. सीबीआई इंसपेक्टर परवेज आलम राहुल के पीछे पड़े ही थे. उन्हें उस की गिरफ्तारी की सूचना मिली, तो वह लखनऊ पहुंच गए. वहां से राहुल उर्फ राज को ट्रांजिट रिमांड पर 22 जून, 2019 को रांची लाया गया. उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गया. उस ने माही हत्याकांड की पूरी कहानी बयां कर दी.

राहुल ने सीबीआई को बताया कि पटना में 11 साल की नेहा से दुष्कर्म करने के मामले में वह पकड़ा गया था. तभी उसे पता चला नेहा के अंडरगारमेंट में उस का सीमेन मिला था, जिस से वह पकड़ा गया था. सीख लेते हुए उस ने माही से दुष्कर्म करने के बाद उस के कपड़े जला दिए थे.

यही नहीं, उस ने फरारी के दौरान इसी जिले की अगस्त 2018 की एक घटना का भी राजफाश किया. जिस घर में वह चोरी की नीयत से घुसा तो वहां 9 वर्षीय सोनी को अकेली सोता देख कर वह उस पर टूट पड़ा. बेटी की चीख सुन कर मां के बेटी के कमरे में आ जाने से सोनी की अस्मत लुटने से तो बच गई लेकिन उस दिन की घटना के बाद से वह आज तक सदमे से उबर नहीं पाई है.

सीबीआई की पूछताछ में क्रूर दरिंदे राहुल उर्फ राज ने कबूल किया कि उस ने हर घटना में अपना नाम बदल कर अपराध किया था. अब तक उस ने 10 मासूमों की जिंदगी तबाह की थी, जिस में कई तो असमय कल का ग्रास बन गई थीं और कई विक्षिप्त अवस्था में पहुंच गई थी.

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राहुल उर्फ राज की शिनाख्त माही की बड़ी बहन रवीना से कराई गई तो उस ने आरोपी राहुल उर्फ राज को देख कर शिनाख्त कर ली. रवीना से इस मामले में अदालत में अपनी गवाही दर्ज कराई. रवीना ने अदालत को बताया कि घटना के कुछ दिन पहले राहुल किराए का कमरा लेने के लिए उस के घर आया था.

हम ने उसे कमरा देने से मना कर दिया था. उस दिन के बाद कई बार अहसास हुआ कि राहुल उस की बहन का पीछा करता है. घटना से पहले उसे घर के आसपास घूमते हुए भी देखा था. जबकि घटना के बाद से उसे कभी नहीं देखा गया.

इस केस के जांच अधिकारी इंसपेक्टर परवेज आलम ने सूक्ष्मता से एकएक सबूत जुटाया. फिर विशेष अदालत में चार्जशीट पेश की. जज ए.के. मिश्र ने सजा सुनाए जाने से पहले केस की फाइल पर नजर डाली. तभी शासकीय अधिवक्ता ने कहा कि योर औनर, मुजरिम राहुल कुमार ने जो अपराध किया है, वह रेयरेस्ट औफ रेयर है. ऐसे व्यक्ति का समाज में रहना ठीक नहीं है. यह समाज के लिए जहर के समान है. ऐसे पेशेवर अपराधी को फांसी की सजा देनी चाहिए.

बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने कहा कि मुजरिम राहुल को अपने किए पर पछतावा है, इसलिए उसे सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए. उन्होंने उसे कम से कम सजा सुनाए जाने की अपील की.

दोनों वकीलों की दलीलें सुनने के बाद जज ए.के. मिश्र ने कहा कि कटघरे में खड़ा यह अपराधी समाज के लिए एक कलंक है. इस ने योजनाबद्ध तरीके से घटना को अंजाम दिया था.

इस के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है. इस का अपराध रेयरेस्ट औफ रेयर है. इसे मृत्यु होने तक फांसी पर लटकाया जाए.

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फैसला सुनाने के बाद पुलिस ने मुजरिम राहुल कुमार को हिरासत में ले कर जेल भेज दिया. वहीं फैसला आने के बाद कोर्ट में मौजूद मृतका के पिता संजीव कुमार घटना को याद कर रोने लगे. उन्होंने कहा कि फांसी की सजा भी अपराधी के लिए कम ही है, परंतु संतोष है कि अदालत ने न्याय किया है. इस प्रकार के फैसले से समाज को शुभ संदेश जाएगा.

– कथा में माही, नेहा और सोनी परिवर्तित नाम हैं.

दरिंदगी की पराकाष्ठा : भाग 2

बहरहाल, रिजल्ट देखने के बाद माही जब कालेज से बूटी बस्ती स्थित अपने आवास जाने लगी तो पहले से घात लगाए बैठा राज पीछेपीछे उस के घर तक पहुंच गया. माही घर में बैग रख कर वापस बाहर आई. उस ने अपने घर के पास एक दुकान से मैगी खरीदी और वापस चली गई.

इस से राज आश्वस्त हो गया था कि घर में माही अकेली है. घर में अगर कोई और होता तो माही के बजाए वही सामान खरीदने आता. इत्तफाक की बात यह थी कि कुछ दिनों पहले बड़ी बहन रवीना किसी जरूरी काम से अपने गांव बरकाकाना चली गई थी.

माही के घर पर अकेला होने की जानकारी शातिर राज को पहले ही मिल चुकी थी, इसलिए वह निश्चिंत हो गया और उस ने फैसला कर लिया कि आज रात माही को अपनी हवस का शिकार बनाएगा.

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उसी रात करीब साढ़े 10 से 11 बजे के बीच राहुल कुमार उर्फ राज माही के घर पहुंचा. उस के मुख्य दरवाजे पर लोहे का मजबूत ग्रिल लगा था. ग्रिल पर भीतर की ओर से बड़ा ताला लगा था. उस के पास मास्टर चाबी रहती थी, जिस से वह कोई भी ताला खोल सकता था. मास्टर चाबी से उस ने माही की ग्रिल का ताला खोल लिया.

माही जिस कमरे में सो रही थी, उस में सिटकनी नहीं लगी थी. दबेपांव वह उस के कमरे में आसानी से पहुंच गया और गहरी नींद में सोई माही का गला दबाने लगा. तभी माही की आंखें खुल गईं. उसे देख कर वह डर गई.

इस से पहले कि वह शोर मचाती, राज ने उसे धमका दिया. डर की वजह से माही चुप हो गई. राहुल ने उस के साथ रेप किया. उस ने दरिंदगी की सारी हदें पार कर दीं. इस दरम्यान माही के नाजुक अंग से रक्तस्राव हुआ, जिस से वह बेहोश हो गई.

उस के बाद दरिंदे राहुल उर्फ राज ने मोबाइल के चार्जर वाले तार से उस का गला घोंट दिया ताकि वह किसी को कुछ बता न सके. हैवानियत पर उतरे राज ने सबूत मिटाने के लिए माही को निर्वस्त्र कर दिया, फिर उस के कपड़ों को एक जगह रख कर उस पर मोबिल औयल डाल कर आग लगा दी. आग लगाने के बाद वह वहां से फरार हो गया. दरअसल, साक्ष्य मिटाने का यह तरीका उस ने अपने ही एक जुर्म से सीखा था.

अपराध की दुनिया में कदम रखते समय राहुल पहली बार पटना में एक घर में चोरी करने की नीयत से घुसा था. यह भी इत्तफाक था कि घर के एक कमरे में 11 वर्षीय नेहा अकेली सो रही थी. बाकी के लोग दूसरे कमरे में सो रहे थे. उस समय रात के करीब 3 बज रहे थे. अकेली नेहा को देख कर उस के जिस्म में वासना की आग धधक उठी. हैवान राहुल जिस्म की आग ठंडी करने के लिए मासूम नेहा की जिंदगी तारतार कर के भाग गया.

लेकिन कानून के लंबे हाथों से कुकर्मी राहुल ज्यादा दिनों तक नहीं बच सका. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. तब राहुल को पता चला कि नेहा के अंडरगारमेंट में उस का सीमेन (वीर्य) मिला था, जिस से वह दोषी पाया गया था. इस घटना से ही सीख लेते हुए उस ने बीटेक की छात्रा माही से दुष्कर्म के बाद उस के अंडरगारमेंट के साथ अन्य कपड़े भी जला दिए थे ताकि वह पकड़ा न जा सके.

खैर, अगली सुबह यानी 16 दिसंबर, 2019 की सुबह रहस्यमय तरीके से जली हुई माही की लाश उस के कमरे में पाई गई थी. दरअसल, रात में उस के पिता संजीव कुमार फोन कर के उस का हालचाल लेना चाहते थे.

चूंकि दिन में कालेज का रिजल्ट आ चुका था. वह कालेज तक उस के साथ गए भी थे, इसलिए वह फोन कर उसे घर आने के लिए कहना चाहते थे. लेकिन उस का फोन नहीं लग रहा था.

फोन बारबार स्विच्ड औफ बता रहा था. बेटी का फोन स्विच्ड औफ होने से वह परेशान हो गए. रात भी काफी गहरा चुकी थी, इसलिए किसी और के पास फोन भी नहीं कर सके थे, जिस से माही का हालचाल मिल पाता. अगली सुबह जब सदर थाने के थानेदार बांकेलाल का फोन उन के पास पहुंचा तो बेटी की मौत की सूचना पा कर संजीव सकते में आ गए.

बेटी की मौत की सूचना मिलते ही घर में कोहराम मच गया था. परिवार के लोगों को साथ ले कर संजीव रांची पहुंचे. शराफत का चोला पहने दरिंदा राज भी अपने दोस्त बंटी के साथ घटनास्थल पर पहुंचा था.

वहां पहुंच कर वह यह जानना चाहता था कि पुलिस क्या काररवाई कर रही है. तब उस के दोस्त बंटी ने उस के सामने ही अज्ञात दरिंदे को भद्दीभद्दी गालियां देनी शुरू कर दीं तो राज ने बंटी को समझाया कि किसी को भी इस तरह गालियां देना ठीक नहीं है.

उस दिन के बाद से वह बंटी से पुलिस की गतिविधि पूछता था कि माही के हत्यारों तक पुलिस पहुंची या नहीं. उस के केस में क्या हो रहा है. यह बात बंटी को बड़ी अटपटी लगती थी कि राहुल उर्फ राज माही के केस में इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहा है.

बहरहाल, पुलिस ने अपनी काररवाई कर माही की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. अगले दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई. रिपोर्ट पढ़ कर थानाप्रभारी बांकेलाल दंग रह गए. रिपोर्ट में बताया गया था कि पहले पीडि़ता के साथ बलात्कार किया गया था, फिर किसी पतले तार से गला कस कर उस की हत्या की गई थी.

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ने के बाद पुलिस ने अज्ञात हत्यारे के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 376, 499, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की छानबीन शुरू कर दी. घटना के करीब 6 महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस जहां की तहां खड़ी रही. न तो वह हत्या का कारण जान सकी और न ही हत्यारों का पता लगा पाई.

माही हत्याकांड को ले कर रांची समेत समूचे झारखंड में बवाल मचा हुआ था. पुलिस की कार्यप्रणाली पर लोग अंगुलियां उठा रहे थे. पीडि़ता के पिता संजीव ने इस मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की. यह आवाज प्रदेश सरकार के कानों तक पहुंची तो सरकार ने जांच सीबीआई से कराने की अनुशंसा कर दी.

जब मामला सीबीआई के पास पहुंचा तो सीबीआई के तेजतर्रार इंसपेक्टर परवेज आलम के नेतृत्व में पुलिस टीम बनाई गई. टीम में एसआई नीरज कुमार यादव, कांस्टेबल प्रभात कुमार, आरिफ हुसैन, नैमन टोप्पो, अशोक कुमार, रितेश पाठक, महिला सिपाही जूही खातून आदि को शामिल किया गया.

इंस्पेक्टर परवेज आलम झारखंड पुलिस में सन 1994 में एसआई पद पर भरती हुए थे. वह ड्यूटी मीट के ओवरआल चैंपियन भी रह चुके थे. झारखंड पुलिस में उन का डीएसपी पद पर प्रमोशन हो चुका था. फिर भी सीबीआई में इंसपेक्टर हैं.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

दरिंदगी की पराकाष्ठा : भाग 1

दरअसल, उस दिन रांची के बहुचर्चित बीटेक की छात्रा माही हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. करीब 3 साल पहले हुई हत्या की यह वारदात काफी दिनों तक मीडिया की सुर्खियों में रही थी. जब थाना पुलिस इस केस को नहीं खोल सकी तो यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया था.

सीबीआई इंसपेक्टर परवेज आलम की टीम ने लंबी जांच के बाद न सिर्फ इस केस का परदाफाश किया, बल्कि आरोपी राहुल कुमार उर्फ राहुल राज उर्फ आर्यन उर्फ रौकी राज उर्फ अमित उर्फ अंकित को भी गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की.

पता चला कि रेप की वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी फरार हो जाता था या नाम बदल कर कहीं दूसरी जगह रहने लगता था. इस तरह वह एकदो नहीं, बल्कि 10 लड़कियों को अपनी हवस का शिकार बना चुका था. एक तरह से वह साइको किलर बन चुका था.

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इस वहशी दरिंदे के खिलाफ सीबीआई की विशेष अदालत में केस चल रहा था. सीबीआई की ओर से इस मामले में 30 गवाह पेश किए गए थे. जज ए.के. मिश्र ने तमाम गवाह और सबूतों के आधार पर 30 अक्तूबर, 2019 को छात्रा माही हत्याकांड में आरोप तय करते हुए राहुल कुमार को दोषी ठहराया. उन्होंने सजा सुनाए जाने के लिए 22 दिसंबर, 2019 का दिन निश्चित किया.

सीबीआई की विशेष अदालत में 22 दिसंबर को जितने भी लोग बैठे थे, उन सभी के दिमाग में एक ही सवाल घूम रहा था कि जज साहब साइको किलर राहुल कुमार को क्या सजा सुनाएंगे. इस वहशी दरिंदे ने जिस तरह कई लड़कियों की जिंदगी तबाह की थी, उसे देखते हुए उन्हें उम्मीद थी कि उसे फांसी की सजा दी जानी चाहिए.

25 वर्षीय राहुल कुमार कौन है और वह कामुक दरिंदा कैसे बना, यह जानने के लिए उस के अतीत को जानना होगा.

25 वर्षीय राहुल कुमार बिहार के नालंदा जिले के एकंगर सराय थाना क्षेत्र के गांव धुर का रहने वाला है. उस के पिता उमेश प्रसाद पेशे से आटो चालक हैं. 3 भाईबहनों में राहुल सब से बड़ा था.

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं. ऐसा ही कुछ राहुल के साथ भी हुआ. बचपन से ही राहुल जिद्दी और झगड़ालू किस्म का था. वह एक बार जो करने की ठान लेता था, उसे पूरा कर के ही मानता था. इस दौरान वह किसी की भी नहीं सुनता था. मांबाप की डांटफटकार का भी उस पर कोई असर नहीं होता था.

राहुल जैसेजैसे बड़ा होता गया, उस की संगत आवारा किस्म के लड़कों से होती गई. घर से उस का मतलब केवल 2 वक्त की रोटी से होता था. जब उस के पिता उमेश प्रसाद आटो ले कर शहर की ओर निकलते, वह भी घर से निकल जाता था. फिर दिन भर आवारा दोस्तों के साथ घूमता रहता था.

मटरगश्ती करने के लिए वह मां से जबरन पैसे लिया करता था. अगर मां उसे पैसे नहीं देती तो वह लड़झगड़ कर पैसे छीन लेता था. दिन भर दोस्तों के बीच घूमनेफिरने के बाद वह शाम होते ही घर लौट आता था.

घर का वह एक काम तक नहीं करता था, रात को जब आटो चला कर उमेश प्रसाद घर लौटता तो उस की पत्नी राहुल की दिन भर की शिकायतों की पोटली खोल कर बैठ जाती. उमेश राहुल को डांटता और समझाता, पर पिता की बातों को वह अनसुना कर देता. ऐसे में उमेश माथे पर हाथ रख कर चिंता में डूब जाता.

उमेश प्रसाद ने राहुल को समझाने और सही राह पर लाने के बहुत उपाय किए, लेकिन राहुल सुधरने के बजाए दिनबदिन जरायम की दलदल में उतारता गया. शुरुआत उस ने अपने घर के पैसे चुराने से की थी.

इस के बाद उस ने औरों के घरों में भी चोरी करनी शुरू की. भेद न खुलने पर उस की हिम्मत बढ़ती गई. चोरी के साथसाथ राहुल लड़कियों को अपनी हवस का शिकार भी बनाने लगा.

बात सन 2012 की है. राहुल ने पटना के जीरो रोड पर स्थित एक घर में चोरी की. इतना ही नहीं, उस ने वहां एक युवती को अपनी हवस का शिकार भी बनाया. युवती से दुष्कर्म के मामले में 29 जून, 2012 को उसे बेउर जेल भेजा गया.

जब वह जेल में था, तभी उस के चाचा की मौत हो गई. श्राद्धकर्म में शामिल होने के लिए वह 4 सितंबर, 2016 को पैरोल पर अपने गांव गया, उस समय वह पुलिस की सुरक्षा में था.

श्राद्धकर्म के बाद शातिर राहुल ने सिपाहियों को शराब पिलाई और अनुष्ठान का बहाना बना कर फरार हो गया. इस के बाद पुलिस उसे छू तक नहीं सकी. पुलिस अभिरक्षा से फरार होने के बाद उस ने जो कांड किया, उस ने समूचे झारखंड को हिला कर रख दिया.

राहुल नालंदा से भाग कर रांची आ गया था और वहां वह नाम बदल कर राज के नाम से रहने लगा. राहुल हर बार जुर्म करने के बाद अपना नाम बदल लेता था, ताकि पुलिस उस तक आसानी से न पहुंच सके. खैर, वह राहुल से राज बन कर रांची की बूटी बस्ती में पीतांबरा पैलेस के सामने वाली गली में स्थित दुर्गा मंदिर के कमरे में रहने लगा. यहां उस ने कमेटी से आग्रह किया था. कमेटी के बंटी नामक युवक ने उस पर तरस खा कर वहां रखवाया था.

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यहां रह कर राहुल उर्फ राज दूसरा कमरा खोजने लगा. कमरे की तलाश में वह बीटेक की छात्रा माही के घर पहुंच गया. लेकिन वहां कमरा किराए पर नहीं मिला. राहुल का मुख्य पेशा चोरी था. उसे घूमतेघूमते पता चल गया कि माही के घर में सिर्फ लड़कियां रहती हैं. उस दिन के बाद से वह आतेजाते माही का पीछा करने लगा. माही इतनी खूबसूरत थी कि एक ही नजर में वह उस पर मर मिटा था.

23 वर्षीया माही मूलरूप से झारखंड के बरकाकाना जिले के थाना सिल्ली क्षेत्र की रहने वाली थी. उस के पिता संजीव कुमार बरकाकाना में सेंट्रल माइन प्लानिंग ऐंड डिजाइन इंस्टीट्यूट लिमिटेड (सीएमपीडीआई) में नौकरी करते थे.

संजीव कुमार की 2 बेटियां रवीना और माही थीं. दोनों पढ़ने में अव्वल थीं. इसीलिए पिता संजीव भी उन्हें उन के मनमुताबिक पढ़ाना चाहते थे. वह उन पर पानी की तरह पैसे बहा रहे थे.

बच्चों के भविष्य के लिए संजीव कुमार ने सन 2005 में रांची की बूटी बस्ती में एक प्लौट खरीदा था. उस पर उन्होंने घर भी बनवा दिया था. घटना से करीब 2 साल पहले यानी 2017 में उन की दोनों बेटियां रवीना और माही वहीं रह कर पढ़ाई करती थीं. संजीव और परिवार के अन्य सदस्य बरकाकाना में रहते थे.

बड़ी बेटी रवीना रांची शहर के एक प्रतिष्ठित कालेज से स्नातक कर रही थी, जबकि छोटी बेटी माही ओरमांझी के एक इंजीनियरिंग कालेज से बीटेक के चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा थी. माही का 15 दिसंबर, 2016 को रिजल्ट आने वाला था. उस के पिता रिजल्ट देखने बरकाकाना से रांची आए थे. रिजल्ट देख कर वह माही के कालेज गए और वहीं से बरकाकाना वापस लौट गए.

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दरिंदगी की पराकाष्ठा

बकरा : भाग 3- क्या अधीर को मिला वैवाहिक जीवन का सुख

अंकुश उस के मना करने पर भी अंदर मीनू की खबर ले आया कि मम्मी जो खाना ले के आई थीं, वह अकेले ही खा रही हैं.

अधीर मीनू पर गुस्सा होने के बजाय अंकुश के बचकानेपन पर ही रहम खाने लगा. वह बुदबुदाए बगैर नहीं रह सका, ‘‘कैसी भुक्खड़ मां है.’’

शाम को अधीर ने बच्चों के साथ खाना खाया. जब तक वह बच्चों के सोने का प्रबंध करता रहा तब तक मीनू से न तो अधीर की, न ही बच्चों की बातचीत हुई थी. अधीर ने बच्चों से फुसफुसा कर कह दिया था, ‘‘इस समय तुम्हारी मम्मी बहुत गुस्से में हैं, इसलिए उन से बात करने की गलती मत करना.’’

पिछली रात को नींद पूरी न होने के कारण और आफिस में काम को निबटाने की जद्दोजहद में अधीर इतना थक कर चूर हो गया था कि वह तकिए पर सिर रखते ही गहरी नींद में सो गया.

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कोई 11 बजे होंगे कि एक हृदयविदारक चीख से अधीर और बच्चे जग गए. चीख मीनू के बेडरूम से आई थी, इसलिए वे उधर ही भागे. वहां मीनू अपने पेट को दोनों हाथों से जोर से दबाए हुए कांप रही थी. असहनीय दर्द के मारे उस का सारा शरीर पसीने से नहा गया था. बच्चे मां की यह हालत देख कर जोरजोर से रोने लगे.

अधीर ने झटपट उसे अस्पताल में दाखिल कराया. रात भर वह उसी तरह रुकरुक कर दर्द से चीखती रही. अधीर ने रात में ही ससुराल में उस की हालत के बारे में फोन पर सूचित कर दिया था. सुबह जब उस के फोन करने पर मीनू के आफिस वाले उसे देखने आए तब तक सारी मेडिकल रिपोर्टें आ गई थीं. डाक्टर की इस सूचना ने अधीर को सुन्न कर दिया कि मीनू के दोनों गुर्दे अत्यधिक शराब पीने के कारण खराब हो गए हैं और उन से लगातार रक्तस्राव हो रहा है.

डाक्टर ने अधीर से कहा, ‘‘आज शाम तक उस के लिए एक गुर्दे का बंदोबस्त हो जाना चाहिए ताकि उस का ट्रांसप्लांट किया जा सके.’’

अधीर के तो हाथपांव फूल गए. गुर्दे बदलने में कम से कम 10 लाख रुपए का खर्च आने वाला था, जबकि अधीर इतने रुपए का बंदोबस्त करने में एकदम असमर्थ था. लेकिन उसे यह उम्मीद थी कि ससुराल वाले अपनी बेटी के लिए रुपए का इंतजाम तो कर ही देंगे.

दोपहर तक मीनू के मांबाप और भाई पहुंच चुके थे. अधीर ने उन को हालात से अवगत कराते हुए कहा, ‘‘मीनू के इलाज के लिए 10 लाख रुपए की जरूरत है.’’

पर आश्चर्य कि उस की सास बड़े बेहूदे ढंग से बोलीं, ‘‘अभी तक तुम्हारी दहेज की चाह पूरी नहीं हुई? मेरी बेटी को मौत के मुंह में धकेल कर भी तुम अपने लालचीपन से बाज नहीं आ रहे हो?’’

मीनू के कुछ आफिस वालों के समझानेबुझाने पर ससुराल वाले यह मानने को तैयार हुए कि मीनू की जान बचाने की कीमत लगभग 10 लाख है.

अधीर के ससुर ने कहा, ‘‘अरे, इतने पैसों की क्या जरूरत है? हम में से कोई अपना गुर्दा मीनू को दे देगा.’’

उन की बात सुनते ही अधीर की सास छाती पकड़ कर गिर पड़ीं. उन्हें आई सी यू वार्ड में भरती कराने के लिए स्ट्रेचर मंगाना पड़ा.

ससुर ने कहा, ‘‘मैं तो खुद ही बी.पी. और शुगर से अधमरा हूं. गुर्दा निकलने के बाद तो बचूंगा ही नहीं…तुम लोग जवान हो, तुम्हारे गुर्दे ही उस में ज्यादा फिट बैठेंगे. आखिर तुम उस के शौहर हो.’’

अभी गुर्दे के बंदोबस्त के संबंध में चर्चा चल ही रही थी कि मीनू का भाई टहलते हुए दूर निकल गया. जब हताश अधीर ने मीनू के खिदमतगार बौस बिरजू की ओर रुख किया तो वह तेजी से चलता हुआ अपनी कार में बैठ कर चला गया.

अधीर ने फिर किसी की ओर नहीं देखा. वह तेज कदमों से चलते हुए डाक्टर के कमरे में आ गया. उस ने अपने दोनों बच्चों को टाफी, बिस्कुट और चिप्स के कई पैकेट थमाते हुए कहा, ‘‘मैं काफी देर तक तुम्हारी मम्मी के पास रहूंगा. तब तक तुम इसी कमरे में मेरा इंतजार करना. ध्यान रहे, मैं तुम्हारी मम्मी की जान बचाने जा रहा हूं. अगर तुम दोनों ने सहयोग नहीं किया तो तुम्हारी मम्मी का भला नहीं होगा.’’

दोनों बच्चों ने कान पकड़ कर वादा किया.

लगभग 2 घंटे के आपरेशन के बाद अधीर का एक गुर्दा निकाल लिया गया. उस ने बच्चों को बुलवा कर बेड पर लेटेलेटे बताया, ‘‘अब रोना मत. मैं ने तुम्हारी मम्मी को बचाने का पुख्ता इंतजाम कर रखा है.’’

तभी अंकुश ने यह जानकारी दी कि पापा, नानी को हार्ट अटैक नहीं पड़ा था. वह तो नाटक कर रही थीं ताकि उन्हें अपना गुर्दा न देना पड़े. डाक्टर ने उन्हें एकाध गोली दे कर रफादफा कर दिया है.

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पिछले 8 सालों से मीनू भलीचंगी चल रही है. उस के स्वभाव में कोई खास बदलाव नहीं आया है सिवा इस के कि वह लड़नेझगड़ने के बाद कोर्ट से कोई काररवाई करने की धौंस नहीं देती. बड़ी से बड़ी लड़ाई लड़ने के बाद भी वह रात को अधीर के बेड के किनारे आ कर सो जाती है. अधीर के खर्राटे लेने के बावजूद वह बेड नहीं छोड़ती है, बल्कि भुनभुना कर रह जाती है, ‘बकरा कहीं का.’

हां, शराब के साथसाथ बिरजू से भी तौबा कर लिया है. अस्पताल से छूट कर वह सीधे बिरजू के पास गई थी और अपना त्यागपत्र सौंपते हुए उस से जोरजोर से झगड़ आई थी कि उस ने उस का मुसीबत में क्यों नहीं साथ दिया.

एक और बदलाव मीनू में यह आया है कि वह बच्चों को डांटनेफटकारने के बाद उन्हें प्यार से सबक भी देने लगी है. पर अधीर की दिनचर्या में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है. वह आज भी आफिस जाने से पहले और वहां से लौटने के बाद किचन में लगा रहता है. महरी के न आने पर वह बरामदे से बेडरूम तक बड़े मन से झाड़ूपोछा लगाता है क्योंकि डाक्टर ने उसे खास हिदायत दे रखी है कि अपने इकलौते गुर्दे को चुस्तदुरुस्त रखने के लिए उस के लिए व्यायाम करना बहुत जरूरी है और उसे मेहनत से कतई जी नहीं चुराना चाहिए. जब वह थक कर आराम करने लगता है तो अपने सामने मीनू को हाथ में छड़ी लिए हुए खड़ा पाता है, ‘‘अगर जिंदा रहना चाहते हो तो काम करो.’’

अधीर को कुछ वर्षों पहले का वह सपना याद आ जाता है जिस में मीनू उसे जादुई छड़ी घुमा कर बकरा बना देती है.

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बकरा : भाग 2- क्या अधीर को मिला वैवाहिक जीवन का सुख

विवाह के बाद जो सुकून मिलना चाहिए था, वह अधीर को कभी नहीं मिला. मीनू की परवरिश ही कुछ ऐसे माहौल में हुई थी कि उस के लिए अपने मांबाप, भाईबहन आदि के अलावा किसी दूसरे से तालमेल बैठा पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव सा था.

पहले अधीर मीनू के ताना मारने पर प्रतिक्रियाएं व्यक्त करता था, जिस से बात बढ़ कर बतंगड़ बन जाती थी और फिर धुआंधार बहस में माहौल इतना गरम हो जाता कि तलाक के लिए वकील का दरवाजा खटखटाने तक की नौबत आ जाती थी.

पर अधीर बड़े धीरज से काम लेता था. सो उस ने मीनू से जबानजोरी करनी छोड़ दी और उस को शांत करने के लिए सारी हिकमत अपनानी शुरू कर दी. सुबह उस से पहले उठ कर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, सुबह की चाय बनाना और लंच के लिए खाना तैयार करने में उस का हाथ बंटाना आदि.

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बहरहाल वह मीनू के स्वभाव को बदलने में हमेशा नाकामयाब रहा. मीनू सारी हदें लांघ कर अमर्यादित तरीके से बरताव करने लगी थी. बच्चों और पति को झिड़कना और डांटना तो मामूली बात थी, अब तो वह गालीगलौज करने पर आमादा हो गई थी. उसे बेलगाम विस्फोटक होने से बचाने के लिए अधीर सुबह से ही ऐसे कामों को निबटाने में जुट जाता था जिन्हें करने से मीनू जी चुराती थी.

उसे संतुष्ट करने के लिए वह अपनी नौकरी को भी दांव पर लगा बैठा था. आफिस देर से पहुंचना, पहले लौट आना और काम को गंभीरतापूर्वक न लेना उस की आदत बन गई थी. इतने पर भी मीनू को अधीर की हर बात से शिकायत थी.

कई बार अधीर को एहसास होता था कि वह घर का काम करतेकरते औरत बनता जा रहा है. उसे यह भी लगता था कि वह अपनी मां की तरह कोई 70 प्रतिशत सहनशील और अंतर्मुखी हो गया है. उसे याद है कि पापाजी की यातनाओं को मां किस खामोशी से सहन कर लेती थीं.

अधीर की तंद्रा तब टूटी जब उस के दोनों बच्चे अंकुश और अलि घर में दाखिल हुए. वे एक ही स्कूल में पढ़ते थे और एक ही बस में साथसाथ आया करते थे. बच्चों को आश्चर्य हो रहा था कि पापा आफिस जाने के बजाय आज घर पर ही हैं. दरअसल, उन्हें यह नहीं पता था कि आज पापामम्मी के बीच कुछ ज्यादा ही छिड़ गई थी. वे तो उन के बीच जंग छिड़ने से पहले ही स्कूल जा चुके थे.

अंकुश रोज की तरह सीधे किचन में गया और वहां खाना नदारद पा कर भूख से बिलबिला उठा. अधीर ने उस की पीठ थपथपाई और बोला, ‘‘मैं अभी खाने का बंदोबस्त करता हूं.’’

उस ने फोन कर के रेस्तरां से तत्काल भोजन मंगा लिया और बच्चों के हाथपैर धुलाते हुए उन का खाने की मेज पर स्वागत किया. जब दोनों बच्चे अपने कमरे में टीवी पर कार्टून फिल्म देखने में खो गए तो वह रात का खाना बनाने की तैयारी करने में जुट गया. सोच रहा था कि शायद आज मीनू का मूड ठीक हो जाए.

तभी मोबाइल की घंटी बजी. उसे यह जान कर कोई खास आश्चर्य नहीं हुआ कि मीनू के मोबाइल से बिरजू की आवाज आ रही थी और वह अंकुश से बात करना चाह रहा था. मोबाइल पर मीनू ने अंकुश को बताया कि वह आज घर नहीं आएगी. अधीर को यह जान कर कोफ्त हुई और उस ने खाना बनाने का कार्यक्रम स्थगित कर के बच्चों को यह समाचार दिया कि वे आज बाहर जा कर खाना खाएंगे.

होटल से लौट कर अधीर को चैन नहीं था. उस के लिए यह बात अब छिपी नहीं रही थी कि मीनू एक तरह से बिरजू की रखैल बन चुकी है. बिरजू उस का बौस है, जो उस का यौन शोषण करता है और बदले में उस की वे सारी जरूरतें पूरी करता है जो वह नहीं कर सकता. वह ऐसी स्थिति में नहीं है कि मीनू को मोटी पाकेट मनी दे सके, विदेशी सौंदर्य प्रसाधन, कपड़े व घूमनेफिरने के लिए उसे एक लग्जरी कार मुहैया करा सके.

देर रात तक अधीर को नींद नहीं आई. वह बेहद मायूस था. उसे मीनू के साथ एक ही बिस्तर पर सोए हुए कोई साल भर तो गुजर ही गया होगा. मीनू की लानत सुनते हुए जोरजबरदस्ती कर के उस के साथ हमबिस्तर होना अब उसे रास नहीं आता था. जी करता था कि वह भी अपनी किसी आफिससहकर्मी के साथ गुलछर्रे उड़ाए, मौजमस्ती में बाकी जिंदगी को हंसीठट्ठा से गुजार दे, लेकिन वह किसी प्रकार की नाजायज हरकत कर के खुद को या अपने घर को कलंकित नहीं करना चाहता था.

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उस ने घड़ी की ओर सिर घुमाया. रात के डेढ़ बज चुके थे. तभी उसे कुछ याद कर के हंसी आ गई. कोई 2 साल पहले वह अपने साले की शादी में शामिल होने ससुराल गया था तो एक शाम सोते हुए वह अचानक जग गया था. मीनू उस के सामने खड़ी, अपने रिश्तेदारों से कह रही थी कि आओ, मैं तुम्हें बकरे का मिमियाना सुना रही हूं.

वह तो इस मजाक पर रिश्तेदारों के सामने झेंप गया था, पर मीनू ठठा कर हंस रही थी.

अधीर सोच रहा था कि अगर उस के खर्राटे को टेप कर के सुनाया जाए तो वह यह तय करना चाहेगा कि वाकई उस के खर्राटे बकरे के टेंटें जैसे ही सुनाई देते हैं.

देर रात सोने के बाद सुबह जब उस की नींद खुली तो उसे बड़ा अचंभा हो रहा था. उस ने एक लंबा सपना देखा था जिस में मीनू ने उसे जादू की छड़ी से छू कर बकरा बना कर उस के गले में एक पट्टा डाल दिया है. वह उसे डंडे से मारमार कर घर का सारा कूड़ाकचरा जबरन खिला रही है और उस के मेंमें करने पर उस पर डंडे बरसा रही है.

सुबह अधीर बच्चों को स्कूल न भेज कर उन्हें अपने साथ आफिस ले गया. उन्हें पार्क में बैठा दिया और अपनी स्टेनो को हिदायत दे दी कि वह आज उस के बच्चों का खयाल रखेगी. उस का काम वह खुद कर लेगा.

मीनू ने जैसे ही घर में अपने कदम रखे, दोनों बच्चे टेलीविजन बंद कर के अधीर के साथ बाहर निकल आए और लान में कुरसी पर बैठ गए. मीनू ने सीधे किचन में जा कर पैक्ड फूड के पैकेट को डाइनिंग टेबल पर फेंक दिया. कुछ देर तक वह अंदर ही व्यस्त रही. अधीर ने सोचा कि वह कपड़े बदल रही होगी.

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बकरा : भाग 1- क्या अधीर को मिला वैवाहिक जीवन का सुख

मीनू ने आफिस जाते वक्त मेज पर परोसी गई थाली को हाथ मार कर नीचे गिरा दिया और जातेजाते अधीर से गुर्रा गई थी, ‘‘आइंदा मेरे लिए खाना मेज पर मत लगाना, वरना…’’

हुआ यह कि सुबह मीनू ने केवल अपने लिए चाय बनाई थी. अधीर को बड़ी कोफ्त हुई कि थोड़ी सी और चाय बढ़ा कर बनाई होती तो उस का क्या चला जाता. खैर, ऐसी टुच्ची हरकत तो वह रोज ही किया करती है.

उस के बाद वह किचन में घुस गया था. बाकायदा दालचावल के साथसाथ गोभी, आलू, मटर का दोपियाजा बनाया था. सोचा था कि मीनू का मूड दोपियाजे की खुशबू से बदल जाएगा पर उस की रसोईगीरी की मशक्कत का अंजाम यह हुआ कि मीनू ने सारा खाना ही जमीन पर छितरा दिया.

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इस घटना के बाद अधीर का मूड इतना खराब हुआ कि उस ने एक दाना भी हलक से नीचे नहीं उतारा.

उस ने छितरे खाने को बटोर कर डस्टबिन में डाला. फिर बचाखुचा खाना एक पालिथीन बैग में डाल कर नीचे पार्क के एक कोने में रख आया. महल्ले के कुत्तों को लगातार तीसरे दिन भी अच्छी दावत मिल गई थी. बहरहाल, अधीर को कुत्ते- बिल्लियों को खाना खिला कर बेहद सुकून मिलता था. कम से कम वे उस के खाने को पर्याप्त सम्मान तो देते थे.

सीढि़यां चढ़ते वक्त ही उस ने तय कर लिया कि वह आज भी दफ्तर नहीं जाएगा बल्कि घर में बैठ कर कुछ लिखेगापढ़ेगा. पिछले कई महीनों से उस ने न तो कोई कविता लिखी थी, न ही कोई कहानी. शायद कुछ लिखने के बाद उस का मूड भी ठीक हो जाए. इसलिए उस ने अपने अफसर रेड्डी को फोन कर दिया, ‘‘सर, मेरा फीवर अभी तक नहीं उतरा है, मैं आज भी…’’

रेड्डी ने उसे 1 दिन की और छुट्टी दे दी थी.

अधीर पहले से कहीं ज्यादा हताश होता जा रहा था. पहले उस के मन में उम्मीद की एक धुंधली किरण टिमटिमाती रहती थी कि एक न एक दिन मीनू के खयालात जरूर बदलेंगे और उन के गृहस्थ जीवन में रस पैदा होगा. पर आज की इस घटना ने उस की उम्मीद को और भी धुंधला किया है. मीनू जिस दिन से उस के आंगन में बहू के रूप में उतरी थी, वह हर रोज उग्र से उग्रतर होती जा रही थी. पिछले 10 सालों से संबंधों में कड़वाहट बढ़ती ही जा रही थी. इस का अन्य बातों के साथसाथ, एक मुख्य कारण यह भी था कि अधीर को जो कुछ भी दहेज में मिला था, उसे वह या तो अपने घर छोड़ आया था या अपनी छोटी बहन की शादी में दे चुका था.

शादी के 2 दिन बाद ही जब दहेज में मिला स्कूटर उस ने अपने छोटे भाई के हवाले किया तो मीनू ने पहली बार यह कह कर अपनी नाकभौं सिकोड़ी थी कि एक दिन तुम मुझे भी अपने भाइयों के हवाले कर देना.

तब वह यह सोचते हुए चुप रह गया था कि जब मीनू उस की रौ में बहेगी तो उस का सामान के प्रति प्रेम का बुखार उतर जाएगा और वह भौतिक जीवन से उचट कर उस की बौद्धिक दुनिया में कदम रखेगी, जहां सुकून है, जिंदगी का असल माने है.

शादी के बाद वह मीनू के साथ खाली हाथ ही हैदराबाद चला आया था. मीनू ने चलतेचलते कहा भी था कि तुम ने शादी का सारा सामान अपने लालची परिवार वालों के हवाले कर के अच्छा नहीं किया.

तब पहली बार अधीर उस की बात को बीच में काटते हुए झल्ला कर बोला था, ‘मीनू, मेरे घर वाले तो तुम्हारे घर वाले भी हैं. फिर उन्हें अपशब्द कह कर अपनी किस बैकग्राउंड का परिचय दे रही हो? पढ़ीलिखी लड़की हो, कम से कम कुछ तो शालीनता से पेश आओ.’

उस पल मीनू का चेहरा एकदम तमतमा गया था. अधीर को पहली बार एहसास हुआ कि वह बेइंतहा हिंसक भी हो सकती है. दोनों ने एकदूसरे की ओर पीठ किए हुए ही अपनी यात्रा पूरी की. सुबह जब टे्रन सिकंदराबाद पहुंची तो अधीर ने उठ कर उस की पीठ पर हाथ रख कर कहा था, ‘डियर, रेडी हो जाओ. हैदराबाद आने ही वाला है.’

अधीर ने तब बर्थ पर बिखरे कंबल, चादर खुद समेट कर बैग और अटैची में रखे थे. मीनू तो उठ कर आईने के सामने सिर्फ अपने मेकअप को फाइनल टच देने में मशगूल थी.

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अधीर ने अपनी नवविवाहिता पत्नी को खुश करने के लिए हैदराबाद के उस किराए के फ्लैट में सारे इंतजाम कर रखे थे. कुंआरा रहते हुए भी उस ने किचन, बेडरूम और ड्राइंगरूम को जरूरी सामान से सुसज्जित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी, लेकिन उसे आश्चर्य हो रहा था कि मीनू ने उस के सलीकेदार बंदोबस्त के बारे में एक भी तारीफ भरा लफ्ज नहीं बोला.

समय दिन, हफ्ते, महीने और साल के रास्ते सरकता चला जा रहा था. 3 साल तक कोई संतान न होने का सारा लांछन अधीर को ही झेलना पड़ा, क्योंकि मीनू हर किसी को रटारटाया उत्तर देती, ‘लगता है इन में ही कोई कमी है.’

अधीर की दबंग सास जब हैदराबाद आईं तो वह दामाद को बाकायदा यह मशविरा दे बैठीं, ‘इस हैदराबाद में हमारे रिश्ते का एक डाक्टर है, तुम उसी से अपना चेकअप करा लो. उस ने कई बेऔलादों की तकदीर बदली है.’ और जब उस डाक्टर ने अपनी रिपोर्ट में यह बताया कि अधीर में कोई कमी नहीं है, तो मीनू और उस की सास का चेहरा गुस्से से सूज गया. मीनू का गुस्सा तब तक खत्म नहीं हुआ जब तक कि वह मेडिकल जांच और इलाज के बाद गर्भवती नहीं हो गई.

पहले बेटे के बाद दूसरी बिटिया हुई. अफसोस कि अधीर के घर वाले दोनों बच्चों के पैदा होते समय वहां नहीं आ सके. मीनू ने तो इस बात पर खूब ताने दिए. जब अधीर सफाई पेश करता तो वह और विस्फोटक हो जाती.

अधीर ने शादी केवल इसलिए की थी कि वह हैदराबाद में नौकरी करते हुए अपने एकाकीपन से बोर हो गया था. उस के लिए घर का काम निबटा कर आफिस की ड्यूटी करना भारी पड़ रहा था, वरना तो वह अपनी जिंदगी से खुश था.

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