लालच : किस ने दिया किस को झांसा?

उ त्तर प्रदेश में बिजनौर जिले के एक गांव में निजाम अपनी बीवी साजिदा के साथ बड़े प्यार से जिंदगी गुजरबसर कर रहा था. निजाम के पास पुरखों की जमीन थी, जिस में वह खेती कर के अच्छाखासा कमा लेता था और बढि़या ढंग से जिंदगी गुजारता था.

निजाम और साजिदा के 2 बेटे थे. घर में काफी खुशहाली थी. बेटों की उम्र महज 7 साल और 5 साल थी.

साजिदा देखने में बहुत खूबसूरत थी. उस की खूबसूरती की चर्चा आसपास के गांवों में भी होती थी. और हो भी क्यों न. साजिदा के सुर्ख गाल, गुलाबी होंठ ऐसे लगते थे मानो गुलाब की पंखुडि़यां खिलने को बेताब हों. उस के काले, घने और लंबे बालों में चमचमाता गोरा चेहरा ऐसा लगता था मानो बादलों को चीर कर चांद बाहर निकल आया हो.

नवंबर का महीना था. दीवाली आसपास ही थी. एक सवेरे जैसे ही निजाम उठा, उस ने देखा कि उस के घर की जमीन अपनेआप ऊपर उठी हुई है.

जब यह सब साजिदा ने देखा, तो वह बोली, ‘‘इस के नीचे जरूर कोई खजाना गड़ा है.’’

निजाम ने उस जगह खोदा तो वहां एक खाली घड़ा मिला. साजिदा बोली, ‘‘माया ऐसे ही नहीं मिल जाती. वह तो जिस की किस्मत में होती है, उसे ही मिलती है.’’

निजाम भी खाली घड़े को देख कर मायूस हो गया.

अभी इस घटना को एक हफ्ता भी नहीं गुजरा था कि घर में फिर से जमीन उभरने लगी. इस बार निजाम ने जल्दबाजी नहीं की. उस ने कुछ दिन इंतजार किया कि गड़ी दौलत खुद बाहर आ जाएगी, लेकिन कई दिन बीत जाने के बाद भी कुछ बाहर नहीं आया. हां, जमीन इन दिनों में और ऊपर उभर गई थी.

निजाम ने जमीन खोदने की सोची तो साजिदा ने उसे रोक लिया और कहा कि हम ऐसे यह दौलत हासिल नहीं कर सकते. इसे हासिल करने के लिए किसी पहुंचे हुए बाबा की मदद लेनी पड़ेगी, जो हमें अपनी तंत्रविद्या से इस दौलत को दिला देगा.

निजाम अब किसी पहुंचे हुए बाबा की तलाश में लग गया. कई दिन बीतने के बाद उसे एक जंगल में एक ऐसा तांत्रिक बाबा मिल गया, जो बीमार लोगों का इलाज करने का दावा करता था. निजाम ने यहां तक सुन रखा था कि यह बाबा पैसा डबल भी कर देता है.

निजाम अगले दिन बाबा के पास गया और बोला, ‘‘बाबा, मेरी घर की जमीन अपनेआप ऊपर उठ जाती है. मुझे लगता है कि उस में कोई खजाना गड़ा है.’’

बाबा को समझते देर न लगी कि निजाम लालची है और बिना मेहनत किए ही दौलत हासिल करना चाहता है.

बाबा ने निजाम से कहा है, ‘‘ऐसा होता है. पुराने लोग जमीन में पैसे गाड़ देते थे, जिस पर कोई माया कब्जा कर लेती थी. उसे हासिल करना इतना आसान नहीं है. माया जिस की किस्मत में होती है, उसी के पास पहुंच जाती है और एक जगह से दूसरी जगह बदलती रहती है.’’

बाबा की बात सुन कर निजाम बोला, ‘‘क्या मैं अपने घर में दबी इस दौलत को हासिल नहीं कर सकता?’’

बाबा बोला, ‘‘ऊपर वाला ही जानता है कि वह किसे मिलेगी. हां, कुछ तंत्रविद्या से उसे और कहीं जाने से रोका जा सकता है और बाद में उसे हासिल किया जा सकता है.

‘‘उसे पाने के लिए तुम्हारे घर जा कर मंत्र पढ़ने पड़ेंगे. और हम बाबा लोग जंगल मे रहते हैं. आज यहां कल कहां, हमें खुद को नहीं पता. हम तो लोगों की मदद करने के लिए एक जगह से दूसरी जगह पर घूमतेफिरते हैं. हम किसी के घर नहीं जाते.’’ निजाम मायूस हो कर वहां से घर लौट आया.

घर आ कर निजाम ने सारी बातें साजिदा को बताईं और कहा कि बाबा ने घर पर आने से मना कर दिया है. पता नहीं, अब यह दौलत हमें कैसे मिलेगी.

यह सुन कर साजिदा बोली, ‘‘हम दोनों कल दोबारा उन के पास चलते हैं. सुना है कि बाबा लोग औरतों पर बड़ा रहम करते हैं. मैं उन से मिन्नत करूंगी, शायद उन का दिल पिघल जाए.’’

अगले दिन निजाम और साजिदा तांत्रिक बाबा के पास पहुंचे. साजिदा जैसी हसीन खूबसूरत औरत को देख कर बाबा के अंदर का शैतान जाग गया. वह मन ही मन साजिदा के जिस्म को पाने के लिए बेकरार हो उठा.

जैसे ही निजाम और साजिदा ने बाबा से घर चल कर उस खजाने को निकालने की मिन्नत की, बाबा पहले तो ऊपरी मन से मना करता रहा, पर फिर साजिदा के हाथ को अपने हाथ में पकड़ते हुए बोला, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे घर चल कर वह खजाना तुम्हें दिलवा दूंगा, पर काम करते समय कोई मु?ा से सवालजवाब नहीं करेगा और इस काम में कम से कम 10 दिन लगेंगे.

‘‘मैं जैसा कहूंगा, तुम दोनों को वैसा ही करना होगा. अगर तुम्हें मेरी यह शर्त मंजूर है, तो मैं तुम्हारे घर चलने के लिए तैयार हूं.’’

निजाम और साजिदा की मानो मन की मुराद ही पूरी हो गई हो. साजिदा ने फौरन कहा, ‘‘हम आप की हर शर्त मानने को तैयार हैं, बस आप किसी भी तरह वह खजाना हमें हासिल करा दो.’’

तांत्रिक बाबा निजाम और साजिदा के साथ उन के घर आ कर रहने लगा. उसे  वहीं कमरा दे दिया गया, जहां जमीन ऊपर उठ रही थी. बाबा 3 दिन तक उस में अपनी तंत्रविद्या का ढोंग करता रहा.

इन 3 दिनों में जमीन और ऊपर उठ चुकी थी. यह देख कर निजाम और साजिदा उस बाबा की काफी सेवा में लगे थे, उसे बढि़याबढि़या खाना परोसा जा रहा था. बाबा सम?ा चुका था कि अब ये दोनों पूरी तरह से उस के चंगुल में फंस चुके हैं. अब बस उसे नया ड्रामा शुरू करना था.

एक दिन कुछ सोच कर बाबा निजाम और साजिदा से बोला, ‘‘तुम्हारे पास कुछ रुपया या जेवर वगैरह हो तो ले आओ. 2 दिन के अंदर सब डबल हो जाएगा. इतने में मैं माया को काबू में कर के उस दौलत को हासिल करूंगा और तुम्हें दूंगा. उस से पहले मैं तुम्हारा सारा धन डबल कर देता हूं, क्योंकि माया पर काबू पाने में अभी समय लगेगा.

‘‘तुम दोनों ने मेरी इतनी खिदमत की है, जिस से मैं बहुत खुश हूं. मै चाहता हूं कि तुम्हारी मदद कर के तुम्हें अमीर बना दूं.’’

दौलत के अंधे लालची वे दोनों बाबा की बातों में आ गए. साजिदा अपने जेवर ले आई और निजाम नकद 30,000 रुपए.

बाबा बोला, ‘‘जो भी डबल होगा, वह एक ही बार हो सकता है, इसलिए मैं पहले ही बता देता हूं कि जितना भी ज्यादा इंतजाम कर सकते हो, कर लो.’’

निजाम बोला, ‘‘अभी हमारे पास इतना ही है. अगर कुछ समय मिलता है, तो हम अपनी जमीन गिरवी रख देते हैं. जब पैसा डबल हो जाएगा, हम उसे अदा कर के अपनी जमीन छुड़ा लेंगे.’’

बाबा बोले, ‘‘ठीक है, तुम जल्दी से पैसे का इंतजाम कर लो.’’ निजाम ने जल्दी में अपनी सारी जमीन गिरवी रख एक ठेकेदार से 10 लाख रुपए एक हफ्ते के लिए उधार ले लिए.

पैसा ले कर निजाम साजिदा के साथ बाबा के कमरे में पहुंचा और बोला, ‘‘मैं 10 लाख रुपए ले आया हूं.’’

बाबा अपनी खुशी छिपाते हुए बोला, ‘‘इन पैसों को एक पोटली में डाल दो और जो जेवर तुम ने मु?ो दिए हैं, उन्हें भी पोटली में रख दो.’’

सब एक जगह कर के बाबा ने निजाम से कहा, ‘‘एक गड्ढा खोदो और दोनों मिल कर अपने हाथ से इस पोटली को उस में दबा दो. सुबह तक सब डबल हो जाएगा.’’

निजाम और साजिदा ने ऐसा ही किया. फिर बाबा बोला, ‘‘अब तुम दोनों नहा कर आ जाओ. रात होते ही मैं मंत्रों का उच्चारण शुरू कर दूंगा. तुम दोनों आज रात यहीं मेरे साथ मंत्रों को दोहराते रहना. तब तक मैं तुम्हारे लिए स्पैशल प्रसाद तैयार करता हूं.’’

ठंड अपने उफान पर थी. रात के 10 बज चुके थे. निजाम और साजिदा बाबा के पासे बैठे उस के बोले हुए मंत्रों को दोहरा रहे थे. ठंड से साजिदा और निजाम थरथर कांप रहे थे, तभी बाबा ने उन्हें अपने झले से प्रसाद निकाल कर खाने के लिए दिया.

आज उन दोनों ने खाना भी नहीं खाया था. इस भागदौड़ और दौलत के लालच में वे इतने ज्यादा अंधे हो चुके थे कि उन्होंने जल्दीजल्दी बाबा का दिया हुआ प्रसाद खाना शुरू कर दिया, लेकिन देखते ही देखते वे दोनों नींद में झुमने लगे, क्योंकि उस प्रसाद में नशा मिला हुआ था.

कुछ ही पलों में वे दोनों बेहोश हो गए. बाबा साजिदा की तरफ बढ़ा, तो उस के गोरे और गदराए बदन को

देख कर हक्काबक्का रह गया. बेहोशी की हालत में उस के जिस्म के कपड़े इधरउधर हो रहे थे. उस का दुपट्टा उस के बदन से अलग हो चुका था.

बाबा ने बिना समय गंवाए साजिदा के बदन से एकएक कर के सारे कपड़े हटा दिए. उस का गोरा बदन देख कर बाबा जल्द ही कामुक हो चुका था. वह अपनेआप पर काबू नहीं रख पा रहा था. उस ने जल्दीजल्दी साजिदा के बदन को रौंदना शुरू कर दिया.

जब बाबा साजिदा की इज्जत लूट कर पूरी तरह शांत हो चका था, तो उस ने सारा सामान उठाया और रात के अंधेरे में वहां से रफूचक्कर हो गया.

सुबह जब साजिदा और निजाम की आंख खुली, तो वे सामने का नजारा देख कर दंग रह गए. जब निजाम ने वह गड्ढा खुदा हुआ देखा, तो उस के होश उड़ चुके थे. उस में से रुपए और जेवर की पोटली गायब थी.

दोनों एकदूसरे के गले लग कर रो रहे थे और एकदूसरे से कह रहे थे कि दौलत के लालच में उन्होंने अपना सबकुछ गंवा दिया.

निजाम ने कई दिन तक उस बाबा को ढूंढ़ने की कोशिश की, उस जंगल में भी गया, पर उसे कुछ न मिला.

निजाम और साजिदा अपनेआप को कोस रहे थे. उन्होंने अंधविश्वास के चलते दौलत के लालच में अपनी जमीन और पैसा तो गंवाया ही, साथ ही साजिदा ने अपनी इज्जत भी उस पाखंडी बाबा को लुटा दी थी.

एक बेरहम हत्या : सपनों के पीछे भागने का नतीजा

29 दिसंबर, 2018. समय सुबह के 4 बजे. स्थान थाणे. मुंबई से सटे जनपद थाणे के सिविल अस्पताल से कासारवाडवली पुलिस को एक महत्त्वपूर्ण सूचना मिली, जिसे थाने में मौजूद इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने गंभीरता से लिया. उन्होंने चार्जरूम की ड्यूटी पर तैनात एसआई संतोष धाडवे को बुला कर अस्पताल से मिली सूचना के बारे में बताया और केस डायरी तैयार करने का निर्देश दिया. साथ ही उन्होंने इस की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा पुलिस कंट्रोलरूम को भी दे दी.

थाने में सूचना दर्ज करवाने के बाद इंसपेक्टर वैभव धुमाल अपने सहायक इंसपेक्टर कैलाश टोकले, एसआई विनायक निबांलकर, संतोष धाडवे, कांस्टेबल राहुल दडवे, दिलीप भोसले, राजकुमार महापुरे और महिला कांस्टेबल मीना धुगे को साथ ले कर थाणे सिविल अस्पताल के लिए रवाना हो गए.

जिस समय पुलिस टीम अस्पताल परिसर में दाखिल हुई, तब तक डाक्टरों ने उस व्यक्ति को मृत घोषित कर दिया था, जिसे संदिग्ध अवस्था में अस्पताल लाया गया था और लाने वाले उसे अस्पताल में छोड़ कर गायब हो गए थे. पूछताछ करने पर पुलिस को पता चला कि मृतक को अस्पताल में उपचार के लिए रात के साढे़ 3 बजे लाया गया था.

उसे लाने वालों में एक सुंदर महिला और एक हट्टाकट्टा युवक था. उन का कहना था कि वह व्यक्ति घायल अवस्था में उन्हें कलवा बांध विलगांव की सुरंग के पास सड़क किनारे तड़पता हुआ मिला था. शायद वह किसी भारी वाहन की चपेट में आ गया होगा. इंसानियत के नाते वे उसे अस्पताल ले आए थे.

घायल की स्थित देख कर डाक्टर उस के उपचार में जुट गए. डाक्टर घायल के बारे में कुछ बताते उस से पहले ही उसे लाने वाली महिला और युवक दोनों अस्पताल से गायब हो गए. मृतक की उम्र 30 साल के आसपास थी. उस के सिर पर घाव और गले पर खरोचों के अलावा काले रंग का एक गहरा निशान भी था.

रहस्यमय लाश और अंजान महिला व युवक

अस्पताल के डाक्टरों और अस्पताल में तैनात पुलिस कांस्टेबल के बयानों के हिसाब से मामला काफी जटिल था. इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने मृतक की लाश का बारीकी से निरीक्षण किया तो उन्हें ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं दिया जो महिला और उस के साथी युवक ने अस्पताल के डाक्टरों और कांस्टेबल को बताया था. बहरहाल प्राथमिक काररवाई के बाद इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने लाश का पंचनामा बना कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और थाने लौट आए.

थाने लौट कर इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने अपने सहायकों के साथ विचारविमर्श कर तफ्तीश की रूप रेखा तैयार की. इस के साथ ही उन्होंने इस बारे में डीसीपी अभिनाश आंमोरे, एसीपी महादेव भोर और थानाप्रभारी दत्तात्रेय ढोले को बता कर तफ्तीश शुरू कर दी.

जांच आगे बढ़ाने के लिए मृतक की शिनाख्त जरूरी थी. वह कौन था, कहां रहता था. उसे अस्पताल लाने वाली महिला और युवक कौन थे. जैसे कई सवाल थे, जिन का जवाब मिले बिना तफ्तीश आगे नहीं बढ़ सकती थी.

अस्पताल के सीसीटीवी के जो फुटेज मिले उन में मृतक और उसे लाने वालों की तसवीरें अस्पष्ट थीं. सारी कडि़यों को जोड़ना आसान तो नहीं था, लेकिन नामुमकिन भी नहीं था. सोचविचार कर इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने अपने स्टाफ के अनुभवी कर्मचारियों की एक टीम तैयार की और उसे 2 भागों में बांट कर अलगअलग जिम्मेदारी सौंप दी.

पहली टीम को उन्होंने कलवा बांध विलगांव सुरंग के पास की सच्चाई का पता लगाने भेज दिया. जिस का जिक्र डाक्टर और कांस्टेबल के बयानों में आया था. दूसरी टीम को उन्होंने अस्पताल से मिले सीसीटीवी के उन फुटेज के आधार पर आसपास के गांवों में जा कर मृतक और उसे अस्पताल लाने वालों के बारे में जानकारी हासिल करने को कहा.कहावत है कि विश्वास का वृक्ष कभी नहीं सूखता. इस मामले में भी यही हुआ.

पहली टीम बांध विलगांव से खाली हाथ लौट आई. बांध विलगांव के पास ऐसा कुछ नहीं हुआ था, जैसा उस महिला और युवक ने डाक्टरों को बताया था. इंसपेक्टर वैभव धुमाल को जो संदेह था सही निकला. इंसपेक्टर वैभव धुमाल को विश्वास था कि कोई न कोई राह जरूर निकलेगी.

शक की सूई सीधे हत्या की तरफ इशारा कर रह थी. यह बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी स्पष्ट हो गई थी. पता चला, उस के सिर पर घातक वार तो किया गया था, लेकिन उस की मौत गला घोंटने से हुई थी. साफ पता चल रहा था कि उस की बेरहमी से हत्या कर के पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की गई थी. इसी वजह से वह महिला और युवक शक के दायरे में आ गए.

पहली टीम को भले ही कोई सुराग नहीं मिला था, लेकिन दूसरी टीम खाली हाथ नहीं लौटी.

इस टीम ने उस औटो वाले को खोज निकाला, जिस के औटो से मृतक को अस्पताल लाया गया था. औटो वाले की निशानदेही पर पुलिस टीम मृतक के परिवार तक पहुंच गई.

उस के परिवार ने मृतक की शिनाख्त गोपी नाइक के रूप में की. गोपी नाइक पत्नी अैर बेटी के सथ घोड़बंदर रोड गायमुख इलाके की टीएमसी कालोनी में रहता था. वह थाणे म्युनिसिपल कारपोरेशन में नौकरी करता था.

इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने तत्काल मृतक गोपी नाइक के भाई दिलीप नाइक और परिवार वालों से पूछताछ की. जब दिलीप नाइक को अस्पताल ले जा कर लाश दिखाई गई तो वह गोपी नाइक का शव देख कर फूटफूट कर रोने लगा.

दिलीप नाइक को अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज दिखाई गई तो उस ने गोपी नाइक को अस्पताल लाने वाली महिला और उस के साथ के युवक को पहचान लिया. वह महिला मृतक की पत्नी प्रिया नाइक थी और उस के साथ वाला युवक उस का बौयफ्रैंड महेश कराले था.

पुलिस ने गोपी नाइक के भाई दिलीप नाइक की तहरीर पर केस दर्ज कर के शव गोपी नाइक को सौंप दिया. इंसपेक्टर वैभव धुमाल अपनी टीम के साथ जब गोपी नाइक के घर पहुंचे तो प्रिया घर में नहीं थी. पूछताछ में आसपड़ोस वालों ने बताया कि उन का घर पिछले 2-3 दिनों से बंद है. जब उन लोगों को यह जानकारी मिली कि गोपी नाइक की हत्या हो गई है, तो वे सन्न रह गए. उन का कहना था कि एक न एक दिन यह तो होना ही था. उन्होंने भी अंगुली प्रिया और महेश कराले की ओर उठाई.

खुलता गया रहस्य

पुलिस टीम को हत्या की सारी कडि़यों को जोड़ने के लिए साक्ष्यों की जरूरत थी. उन्होंने कालोनी के 2 व्यक्तियों को पंच बना कर घर की तलाशी ली तो घर की साफसफाई के बाद भी वहां गुनाह के निशान मिल ही गए, जिन्हें देख कर पुलिस टीम को यह समझने में देर नहीं लगी कि हत्या की साजिश घर के अंदर ही रची गई थी. घर के बैडरूम और बाथरूम के फर्श पर पडे़ खून के धब्बे हत्या की पूरी कहानी बयान कर रहे थे.

पुलिस टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण कर के तेजी से तफ्तीश शुरू कर दी. पुलिस टीम ने प्रिया और महेश के सभी उन ठिकानों पर दबिश दी, जहांजहां उन के मिलने की संभावना थी. घटना को 36 घंटे से अधिक बीत गए थे. ऐसे में इस बात की पूरी संभावना थी कि प्रिया और महेश शहर छोड़ कर कहीं चले गए हों या शहर छोड़ने की कोशिश में हों.

यही सोच कर पुलिस टीमों ने शहर और जनपद की नाकेबंदी करा दी. साथ ही मुखबिरों को भी सचेत कर दिया गया. नतीजा यह निकला कि घटना के एक सप्ताह बाद पुलिस ने मुखबिरों की सूचना पर 5 जनवरी, 2019 की रात प्रिया नाइक और महेश कराले को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वे अपने गांव से पैसों का जुगाड़ कर के महाराष्ट्र से बाहर भागने की तैयारी में थे.

मैट्रिक पास 28 वर्षीय प्रिया नाइक जितनी खूबसूरत और स्मार्ट थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी थी. उस के सपने बहुत ऊंचे थे. शादी से पहले उस ने एक सुंदर स्वस्थ जीवनसाथी की कामना की थी. लेकिन उस के सपने उस समय धराशायी हो गए जब उस का विवाह उस के मनमुताबिक न हो कर दिव्यांग गोपी नाइक से हो गया.

गोपी और प्रिया का कोई मेल नहीं था. लेकिन परिवार की गरीबी और सामाजिक दबाव की वजह से उस ने समझौता कर लिया. गोपी को पति के रूप में स्वीकार कर वह अपनी गृहस्थी में रम गई.

गोपी नाइक थाणे म्युनिसिपल कारपोरेशन में चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी था. वह अपने परिवार के साथ कलवा के अंकलेश्वर नगर में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के मध्यम वर्गीय परिवार में पिता किसान नाइक, मां, बहन और एक भाई दिलीप नाइक था. भाईबहन सभी की शादी हो चुकी थी और सब सेटल थे.

किशन नाइक सीधेसादे प्रतिष्ठित व्यक्ति थे. समाज में उन का मानसम्मान था. प्रिया उन के दूर के एक रिश्तेदार की बेटी थी. जिसे किशन नाइक ने स्वयं अपने बेटे गोपी नाइक के लिए चुना था. प्रिया जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर गोपी नाइक और उस का पूरा परिवार बहुत खुश था.

गोपी नाइक प्रिया को बहुत प्यार करता था और उस की हर खुशी का ध्यान रखता था. पूरे परिवार के दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. शादी के कुछ साल बाद गोपी नाइक को परिवार से अलग रहने के लिए जाना पड़ा.

उसे टीएमसी की तरफ से डा. भीमराव अंबेडकर कालोनी में मकान मिल गया था. यहां आने के कुछ दिनों बाद प्रिया ने एक बेटी को जन्म दिया. इस से गोपी और प्रिया का जीवन और भी हंसीखुशी से बीतने लगा. देखतेदेखते प्रिया की बेटी 7 साल की हो गई. वह सीनियर केजी में पढ़ रही थी. गोपी नाइक नौकरी कर रहा था और प्रिया कुशल गृहिणी की तरह घर संभाल रही थी.

मोबाइल ने बदल दी सोच और दुनिया

सामान्य रूप से चलते उन के दांपत्य जीवन के 8-10 साल कैसे निकल गए पता ही नहीं चला. इस की वजह गोपी का प्रिया के प्रति प्यार और विश्वास था. प्रिया भी गोपी के प्यार और अपनी गृहस्थी में डूबी थी. हालांकि कभीकभी गोपी की दिव्यांगत की सूई प्रिया के दिल में चुभ जाती थी. उस ने जवानी के चौखट पर खड़े हो कर जो सपना देखा था, वह पूरा नहीं हुआ था.

2016 में प्रिया नाइक का यह सपना उस समय अस्तित्व में आने लगा, जब उस के सामने 22 वर्षीय महेश कराले की तसवीर आई. महेश कराले ठीक वैसा ही था, जिस की प्रिया ने कभी कल्पना की थी. सुंदर आंखें, बलिष्ठ बाहें, गठीला बदन, चौड़ी छाती. प्रिया उस की दीवानी हो गई. धीरेधीरे प्रिया की इस दीवानगी ने गोपी और उस के बीच दरार पैदा कर दी. 2018 के मध्य में आ कर दरार इतनी बढ़ गई कि साल पूरा होतेहोते यह दरार गोपी नाइक के पूरे अस्तित्व को ही निगल गई.

22 वर्षीय महेश कराले और प्रिया नाइक की जानपहचान फेसबुक पर हुई थी. प्रिया नाइक जब से टीएमसी कालोनी में रहने आई थी, तब से उस के पास घर का ज्यादा काम नहीं था. बेटी को स्कूल और पति को काम पर भेजने के बाद वह घर में अकेली बोर हो जाती थी. थोड़ाबहुत समय टीवी के साथ जरूर गुजार लेती थी. लेकिन इस से मन को सुकून नहीं मिलता था. ऐसे में गोपी नाइक ने प्रिया को एक महंगा मोबाइल ला कर दे दिया. उस वक्त उस ने सोचा भी नहीं होगा कि वही मोबाइल उस के दांपत्य जीवन के मायने ही बदल देगा.

मोबाइल हाथ में आया तो प्रिया नाइक का दैनिक जीवन ही बदल गया. उस का मन घर के कामों में कम और मोबाइल में ज्यादा लगने लगा. वह फेसबुक पर अपना प्रोफाइल बना कर नएनए दोस्त बनाती और उन से चैटिंग करती. इसी के चलते वह महेश कराले की ओर आकर्षित हो गई. वह भूल गई कि वह 7 साल की बच्ची की मां और उस पर अटूट विश्वास करने वाले पति की पत्नी है.

महेश कराले का परिवार महाराष्ट्र के जनपद रायगढ़ के नेरल गांव का रहने वाला था. उस के पिता गोविंद कराले गांव के सम्मानित किसान थे. महेश कराले उन का सब से छोटा और लाडला बेटा था.

ग्रैजुएशन पूरा करने के बाद जब उसे मुंबई रेलवे बोर्ड में सर्विस मिली तो उस ने गांव से थाणे आ कर उपनगर कर्जत में किराए का एक कमरा ले लिया. प्रिया की तरह महेश भी फुरसत के समय फेसबुक में डूब जाता था. प्रिया का प्रोफाइल और फोटो देख कर वह इतना प्रभावित हुआ कि उस की दोस्ती की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली.

फेसबुक के माध्यम से दोनों की 2 सालों तक दोस्ती चलती रही. दोनों फोन पर भी बातें करने लगे थे. मिलनेमिलाने की बात भी होने लगी. घटना से 6 महीने पहले दोनों एक तयशुदा जगह पर मिले और एकदूसरे के आगोश में सुकून खोज लिया. एक बार जब मर्यादा टूटी तो फिर यह एक आम सी बात हो गई. जब भी मौका मिलता दोनों अपनी जरूरतों को पूरा कर लेते थे.

शुरुआती कुछ दिनों तक प्रिया नाइक और महेश कराले का मिलनाजुलना पार्कों और रेस्टोरेंटों तक सी सीमित था. फिर धीरेधीरे यह सिलसिला प्रिया के घर तक पहुंच गया. चूंकि ऐसी बातें छिपती नहीं हैं, इसलिए इस की भनक आसपड़ोस के लोगों तक पहुंची तो उन में कानाफूसी होने लगी. यह भनक गोपी नाइक के कानों तक भी पहुंच गई.

उस ने जब प्रिया से सच्चाई जानने की कोशिश की तो उस ने बड़ी सफाई से इस बात को ऐसा घुमाया कि गोपी चुप रह गया. महेश कराले को उस ने अपना दूर का भाई बताया, जिस से बात वहीं खत्म हो गई.

प्रिया ने महेश कराले को अपना भाई बता कर अपने पापों को छिपाने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन इस में वह पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाई. उस के कारनामों का सच एक दिन सामने आ ही गया. प्रिया मोबाइल में सेव्ड उस के और महेश कराले के नंबर मैसेज और सेल्फी वगैरह ने हर राज से परदा उठा दिया.

सब कुछ देख कर गोपी नाइक का दिमाग घूम गया. प्रिया से उसे ऐसी उम्मीद नहीं थी. वह प्रिया को बहुत ही प्यार करता था. उस की सारी जरूरतें पूरी करता था. उस ने किसी तरह अपने आप को संभाला और इस मुद्दे पर प्रिया को आडे़ हाथों लिया. यही नहीं उस ने प्रिया का मोबाइल फोन भी ले लिया. इस के साथ ही वह प्रिया को मानसिक और शारीरिक रूप से टौर्चर भी करने लगा.

यह सब प्रिया और महेश की सहनशक्ति से बाहर हो गया था. तंग आ कर उन दोनों ने गोपी नाइक को ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. इसीलिए वह धीरेधीरे पति से दूरियां बढ़ाती गई. लेकिन सीधासादा गोपी इसे समझ नहीं पाया. जब तक यह सब उस की समझ में आया तब तक काफी देर हो चुकी थी.

हत्या की योजना के बाद

अपनी योजना के अनुसार घटना के एक सप्ताह पहले महेश कराले ने गोपी को अपने रास्ते से हटाने के लिए अपने एक परिचित कैमिस्ट की मदद से ढेर सारी नींद की गोलियां खरीदीं और ला कर प्रिया को दे दीं. साथ ही उसे समझा भी दिया कि मौका मिलते ही गोपी को कैसे देगी.

घटना के दिन प्रिया ने वैसा ही किया भी, जैसा महेश कराले ने कहा था. उस ने गोपी नाइक की बीयर में करीब 30 गोलियां डाल दीं. लेकिन पता नहीं क्यों गोपी नाइक पर नींद की गोलियों का उतना असर नहीं हुआ. जितना होना चाहिए था. वह अर्द्धनिद्रा में बैड पर पड़ा करवटें बदलता रहा. प्रिया ने जब यह बात महेश कराले को बताई तो वह गोपी के घर आ गया. उस ने साथ लाए फिनायल का इंजेक्शन गोपी के शरीर में लगा दिया.

जैसेजैसे समय बीत रहा था वैसेवैसे प्रिया और महेश कराले के दिल की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. उन की धड़कनें तब और बढ़ गईं जब गोपी पर फिनाइल के इंजेक्शन का भी कोई खास असर नहीं हुआ. वह बाथरूम में जा कर उल्टियां करने लगा. प्रिया और महेश से यह सब सहन नहीं हुआ तो दोनों ने गोपी को खुद मौत की नींद सुला दिया.

महेश कराले ने गोपी नाइक का गला पकड़ा और प्रिया ने घर के अंदर रखे लोहे की रौड से उस के सिर पर वार किया. इस के बावजूद गोपी अपने आप को बचाने के लिए बाथरूम से भाग कर बैडरूम में आया, लेकिन वह गिर कर बेहोश हो गया. उस के बेहोश होने के बाद भी महेश कराले और प्रिया ने अपनी तसल्ली के लिए एक बार फिर पूरी ताकत से उस का गला दबाया.

गोपी नाइक की बेरहमी से हत्या करने के बाद दोनों ने संतोष की सांस ली. इस के बाद दोनों गोपी के शव को ठिकाने लगाने के बारे में विचारविमर्श करने लगे. काफी सोचविचार के बाद दोनों इस नतीजे पर पहुंचे कि पुलिस को गुमराह करने के लिए गोपी को घायल बता कर थाणे सिविल अस्पताल ले जाएं और उसे डाक्टरों के हवाले कर के वहां से निकल लें.

इसी योजना के तहत रात 2 बजे दोनों मृत गोपी के लहूलुहान शव को स्कूटर पर लाद कर थाणे बांध विलगांव की सड़क पर ले गए. वहां गोपी के शव को लेटा कर महेश ने अपना स्कूटर पास की झाडि़यों में छिपा दिया.

वहां से आटो पकड़ कर दोनों गोपी नाइक के शव को अस्पताल ले गए और डाक्टरों के हवाले कर के वहां से निकल गए. दोनों अस्पताल और पुलिस कांस्टेबल की नजरों से तो बच कर निकल गए. लेकिन अस्पताल की तीसरी आंख से नहीं बच पाए.

अस्पताल से निकल कर प्रिया और महेश कराले गोपी के घर आए. उन्होंने घर के अंदर बैडरूम और बाथरूम के फर्श पर बिखरे खून की साफसफाई कर दी. साढ़े 5 बजे प्रिया ने अपनी बेटी को उठाया और घर में ताला लगा कर महेश कराले के साथ निकल गई. वहां से दोनों सीधे माथेरान हिल चले गए.

लेकिन पैसों की कमी की वजह से महेश प्रिया को ले कर अपने गांव आ गया. ताकि पैसों का जुगाड़ कर के प्रिया को कहीं दूर ले जा सके. दोनों कहीं जा पाते इस से पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गए. दोनों ने योजना तो अच्छी बनाई थी, लेकिन उन का गुनाह छिप नहीं सका.

जांचअधिकारी इंसपेक्टर वैभव धुमाल ने प्रिया नाइक और महेश कराले से पूछताछ के बाद उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 228, 201 और 120बी के तहत मुकदमा दर्ज किया और उन्हें थाणे के मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रैलियों में भीड़ बढ़ाने में दलितपिछड़ों का इस्तेमाल

मध्य प्रदेश में उज्जैन जिले की बड़नगर विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों कांग्रेस उम्मीदवार मुरली मोरवाल की नामांकन रैली का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिस में कुछ नाबालिग बच्चे हाथों में कांग्रेस का झंडा ले कर ‘मुरली मोरवाल जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे हैं और यह भी कह रहे हैं कि हमें झाबुआ, पेटलावद से इस रैली में लाया गया है और रैली में आने के लिए हमें 500-500 रुपए भी दिए गए हैं.

इस पूरे मामले पर मुरली मोरवाल का कहना था कि उन पर जो आरोप लगाए गए हैं, वे सरासर गलत हैं. विधानसभा क्षेत्र में उन के कई व्यापार हैं. ईंटभट्ठे और कंस्ट्रक्शन के क्षेत्र में सैकड़ो लोग उन से जुड़े हुए हैं. इन लोगों को जब पता चला कि उन के सेठ को कांग्रेस पार्टी ने टिकट दिया है तो वे सभी लोग परिवार समेत नामांकन रैली में शामिल हुए थे. झाबुआ, पेटलावद से लोगों को पैसे दे कर बुलाने की बात झूठी है. जो भी ऐसी बात कर रहे हैं, वे गलत कह रहे हैं.

इसी साल जुलाई महीने में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक बस का भीषण ऐक्सीडैंट हो गया है. तेज रफ्तार बस ने हाईवे में खड़े हाइवा ट्रक को पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी, जिस में बस सवार 3 लोगों की मौके पर मौत हो गई थी. वहीं, 6 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

जानकारी के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल होने के लिए बस सवार यात्री अंबिकापुर से रायपुर जा रहे थे. यह सड़क हादसा तड़के हुआ, जब बस अंबिकापुर से रवाना बेलतरा पहुंची थी. इसी दौरान बेलतरा के पास हाईवे पर खड़े हाइवा को तेज रफ्तार बस ने पीछे से जोरदार टक्कर मार दी थी.

अब एक बहुत बड़ी खबर का रुख करते हैं. नवंबर महीने में होने वाले विधानसभा चुनावों में एससीएसटी जातियों को अपने पक्ष में लुभाने के लिए 24 फरवरी, 2023 को मध्य प्रदेश के सतना में कोल जाति का महाकुंभ आयोजित किया गया, जिस में शामिल होने के लिए सीधी और सिंगरौली जिले से बसों में सवार हो कर कोल समाज के लोग शामिल हुए थे.

इस महाकुंभ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह आए हुए थे. उस दिन शाम को तकरीबन 5 बजे इस रैली के खत्म होने के बाद सभी लोग बसों में सवार हो कर सीधीसिंगरौली अपने घर जा रहे थे.

रास्ते में 2 बसें रात के तकरीबन 9 बजे मोहनिया टनल से 300 मीटर दूर बडखरा गांव के पास रुकीं. वहां सवारियों के लिए चायनाश्ते का इंतजाम किया गया था.

कोल समाज के लोगों को बसों में जब नाश्ते के पैकेट दिए जा रहे थे, तभी रीवा की ओर से आ रहे एक तेज रफ्तार ट्रक ने एक बस को पीछे से टक्कर मार दी. टक्कर इतनी तेज थी कि आगे वाली बस बीच सड़क पर पलट गई, जबकि जिस बस में टक्कर लगी थी, वह डिवाइडर से टकरा कर बीच सड़क पर आ गई.

उसी दौरान सीधी की ओर से आ रही एक और बस भी टकरा कर पलट गई. जबकि, ट्रक टक्कर मारते हुए नीचे गिर कर पलट गया. इस हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग घायल हो गए.

अमित शाह के सामने अपनी ताकत दिखाने के लिए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जिस कोल महाकुंभ का आयोजन सतना में किया था, उस में शामिल हुए ये एससीएसटी तबके के लोग चायनाश्ता, भोजनपानी और एक दिन की मजदूरी के बदले बड़ीबड़ी बसों में भर कर लाए गए थे. रैली में भीड़ जुटाने के लिए सरकारी अफसरों और मुलाजिमों की भी ड्यूटी लगाई गई थी.

बताया जाता है कि इस रैली में 10 स्कूल मास्टर और 7 पटवारी भी घायल हुए थे. इन‌ मास्टरों और पटवारियों की ड्यूटी अमित शाह की रैली में भीड़ जुटाने के लिए लगाई गई थी.

रैली में भीड़ जुटाने की यह घटना न‌ई नहीं है. जब भी कहीं किसी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की रैली होती है, सरकारी मुलाजिमों की ड्यूटी इस तरह के कार्यक्रम में लगाई जाती है. वे अपना कामकाज छोड़ कर नेताओं की रैली में भीड़ जुटाने का काम करते हैं. कायदेकानून की अनदेखी कर के एक जिले से दूसरे जिले में बसों को बिना परमिट भेजा जाता है.

इन रैलियों में सब से ज्यादा एससीओबीसी तबके के लोगों का इस्तेमाल किया जाता है. इन जातियों का बड़ा तबका अभी भी रोजीरोटी के‌ लिए जद्दोजेहद करता है. अपने परिवार का पेट पालने के लिए रोज कड़ी मेहनत करता है, तभी उन के घरों का चूल्हा जलता है.

यही वजह है कि जब राजनीतिक दलों के लोग उन्हें दिनभर की मजदूरी और खानेपीने का लालच देते हैं, तो वे यह सोच कर आसानी से तैयार हो जाते हैं कि एक दिन की मजदूरी भी मिल जाएगी.

रैलियों की भीड़ जीत का पैमाना नहीं

राजनीतिक दलों की रैलियों में जुट रही भीड़ से इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता कि वोटर का रुख किस के पक्ष में है. क‌ई बार वोटर सभी दलों की रैलियों में बतौर मेहनताना शामिल होता है.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव के समय भी जब प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाली थी, तब उन की रैलियों में काफी भीड़ जुटती थी. इसी तरह से साल 2017 के विधानसभा चुनाव में भी अखिलेश यादव और राहुल गांधी की रैलियों में भी भीड़ बहुत रहती थी, मगर चुनाव में जीत भारतीय जनता पार्टी की हुई थी. भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटें हासिल की थीं.

दलितों की हिमायती मायावती की रैलियों में भी भारी भीड़ उमड़ती थी. बसपा सुप्रीमो मायावती के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि वे एकलौती ऐसी नेता हैं, जिन के लिए मैदान छोटा पड़़ जाता था, इसलिए किसी की रैली में उमड़ी भीड़़ के आधार पर किसी पार्टी या नेता की जीत का दावा नहीं किया जा सकता.

बिहार में पिछले विधानसभा चुनाव में सभी दल वोटरों को लुभाने में लगे थे, रैलियों में भीड़ भी दिखाई दे रही थी, लेकिन बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैरानपरेशान थे, क्योंकि उन की रैलियों से भीड़ न जाने कहां गायब हो गई थी.

रैलियों से नदारद भीड़ को देख कर नीतीश कुमार यह मान चुके थे कि सत्ता उन के हाथ से फिसल कर राष्ट्रीय जनता दल की की झोली में जा रही है, लेकिन जब वोटिंग मशीनों से नतीजे निकले तो राजनीतिक पंडित ही नहीं, बल्कि नीतीश कुमार भी हैरान रह गए थे.

उस समय नीतीश कुमार की जीत में महिला वोटरों ने अहम रोल निभाया था, जो नीतीश सरकार द्वारा प्रदेश में शराबबंदी किए जाने से नीतीश सरकार की मुरीद हो गई थीं. इस के अलावा कानून व्यवस्था में सुधार भी एक अहम मुद्दा था. बिहार में महिला वोटरों को लगता था कि अगर बिहार में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बन जाएगी, तो बिहार में फिर से जंगलराज कायम हो जाएगा.

नरेंद्र मोदी की भीड़ भी नहीं दिला पाई जीत

आज भी देश के ज्यादातर इलाकों में आदिवासी और दलितपिछड़े तबके के लोग कम पढ़ेलिखे हैं, उस की वजह सरकारी योजनाओं का फायदा उन तक नहीं पहुंच पाना है. इसी वजह से आदिवासी और दलितपिछड़ों के वोट बैंक का इस्तेमाल राजनीतिक पार्टियां अपने लिए आसानी से करती रहती है.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव के वक्त 24 अप्रैल को मध्य प्रदेश के मंडला जिले में भी एक बड़ी रैली का आयोजन सरकार द्वारा किया गया था, जिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आए थे.

रमपुरा गांव में रहने वाले आदिवासी वंशीलाल गौड़ बताते हैं कि उन्हें बस द्वारा मंडला ले जाया गया था. रास्ते में खानेपीने के इंतजाम के साथ रैली से लौटने पर 500 रुपए बतौर मेहनताना दिए गए थे. इस रैली में लाखों की तादाद में आदिवासियों को मध्य प्रदेश के ‌क‌ई जिलों से बसों में भर कर लाया गया था.

इस भीड़ को देख कर भाजपा ने यही अंदाजा लगाया जा कि उस की सरकार फिर से बनेगी, लेकिन उस समय कांग्रेस की सरकार बनी और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने थे. यह अलग बात है कि 15 महीने बाद भाजपा ने सिंधिया समर्थक विधायकों की खरीदफरोख्त कर फिर से सरकार बना ली थी.

पश्चिम बंगाल में साल 2021 में विधानसभा चुनाव के समय भी यही नजारा देखने को मिला था, जहां भाजपा की रैलियों में जनसैलाब उमड़ रहा था. ऐसा लग रहा था कि ममता बनर्जी की सत्ता से विदाई तय है. भाजपा की रैलियों में जनता की मोदी के प्रति दीवानगी देखने लायक थी.

पश्चिम बंगाल के कोलकाता में ब्रिगेड मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में उमड़े जनसैलाब की तसवीरों को कौन भूल सकता है, क्योंकि पिछले कुछ दशकों में यहां किसी भी नेता को सुनने के लिए इतने लोगों की भीड़ एकसाथ जमा नहीं हुई थी.

इस मैदान के बारे में यह कहा जाता रहा है कि केवल कम्यूनिस्टों की रैली में ही यह पूरा भर पाता था. तृणमूल की रैली में भी इस मैदान में काफी भीड़ जमा होती थी, पर भाजपा की यहां हुई रैली में जुटी भीड़ माने रखती थी. इस रैली के जरिए भाजपा ने पश्चिम बंगाल में अपनी ताकत को दिखाया था.

भारतीय जनता पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के लिए 10 लाख लोगों की भीड़़ जुटाने का टारगेट रखा था. इस के लिए भाजपा ने राज्य के हर शहर, हर गांव से कार्यकर्ताओं को कोलकाता पहुंचने का आदेश दिया था.

दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के लिए यह रैली पश्चिम बंगाल में इज्जत का सवाल बन गई थी. इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं ने पश्चिम बंगाल के नेताओं को साफ निर्देश दिया था कि किसी भी कीमत पर इस रैली को कामयाब बनाना है.

मध्य प्रदेश के भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय इस रैली की देखरेख खुद कर रहे थे. उन्हीं के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के लोकल भाजपा नेताओं ने कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में इतनी बड़ी तादाद में जनसैलाब जुटाया था. लेकिन जब नतीजे आए तो भाजपा चारों खाने चित नजर आई और ममता बनर्जी फिर से मुख्यमंत्री बनीं.

वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोलकाता के ब्रिगेड मैदान में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भी साल 2014 और साल 2019 के लोकसभा चुनाव में रैली की थी, जो भीड़ के हिसाब से ऐतिहासिक थी, पर नतीजों के लिहाज से फेल ही रहीं.

एक दौर था जब लोग नेताओं के भाषण सुनने जाते थे और नेता नुक्कड़ सभाओं के जरीए अपनी बात जनता के बीच रखते थे. किसी दल या नेता की रैलियों में जुटने वाली भीड़ से अंदाजा लगा लिया जाता था कि किस दल का पलड़ा हलका या भारी है.

इस के पीछे की मुख्य वजह यही थी कि तब वोटर अपनी मरजी से अपने चहेते नेताओं के भाषण सुनने और उसे देखने आया करते थे, लेकिन अब समय बदल चुका है. धीरेधीरे भीड़ जुटाने के लिए रणनीति बनने लगीं. लोगों को खानेपीने और पैसे का लालच दे कर रैली की जगह पर बुलाया जाने लगा, इसीलिए कई बार भीड़ में जो चेहरे एक पार्टी के रैली में दिखाई देते थे, वही चेहरे दूसरी पार्टी की रैली में भी दिख जाते हैं. अब भीड़ के बिना नेता भाषण भी देना नहीं चाहता.

पंजाब का वाकिआ लोगों को याद ही होगा जब सभा में भीड़ न जुटने के चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुरक्षा में खामी बता कर वापस लौट आए थे.

हैलीकौप्टर और फिल्मी ऐक्टर देखने उमड़ती है भीड़

चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए राजनीतिक दलों के लोग तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हैं. गांवकसबों में भी चुनाव के वक्त बड़े नेताओं, फिल्मी ऐक्टरों की रैली और सभाएं होती हैं, जिन में लोग केवल फिल्म ऐक्टर और हैलीकौप्टर को देखने जाते हैं.

साल 2018 के विधानसभा चुनाव में गाडरवारा विधानसभा में भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने फिल्म हीरोइन हेमा मालिनी आई थीं, जिन्हें देखने के लिए भारी तादाद में भीड़ जुटी थी, लेकिन यह भीड़ भाजपा उम्मीदवार को जीत नहीं दिला सकी.

चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की कोशिश रहती है कि उस के प्रचार में कोई स्टार प्रचारक हैलीकौप्टर से आए और उस बहाने बड़ी तादाद में भीड़ जमा हो जाए. पार्टी आलाकमान के कहने पर स्टार प्रचारक हैलीकौप्टर में सवार हो कर दिनभर में 4-5 सभाएं करते हैं, जिन्हें देखने के लिए भीड़ लगती है और पार्टी उम्मीदवार समझता है कि उस की जीत पक्की हो गई है. कई बार तो इस तरह की रैली में भाषण देने आए इन स्टार प्रचारकों को उम्मीदवार का नाम ही पता नहीं रहता है.

रणनीतिकार बाकायदा दावा करते हैं कि अमुक नेता की रैली में इतने लाख की भीड़ जुटेगी और भीड़ जुटती भी है, लेकिन इस में कौन किस पार्टी को वोट देगा, कोई नहीं जानता. अब रैलियों की भीड़ से किसी दल या नेता की लोकप्रियता का अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया है.

चुनाव का वक्त आते ही सभी राजनीतिक दलों के नेता दलितपिछड़े लोगों के हिमायती बन जाते हैं और चुनाव जीतने के बाद कोई उन की सुध तक नहीं लेता. इसी तरह चुनाव में शराब और पैसे का लालच दे कर इन भोलेभाले लोगों के वोट हासिल किए जाते हैं और फिर पूरे 5 साल तक उन की अनदेखी की जाती है.

विकास की मुख्यधारा से हमेशा दूर रहने वाले इस तबके के लोगों का चुनावी रैलियों में इस तरह से इस्तेमाल करना लोकतंत्र का मजाक नहीं तो और क्या है. दलितपिछड़े तबके के लोगों को जागरूक होने की जरूरत है.

मेरी सेक्सलाइफ अच्छी नहीं चल रही है, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 28 वर्ष है और पति की 32. शादी हुए 2 साल हो गए हैं. अभी हमारा कैरियर पीक पर है, इसलिए बच्चा प्लान नहीं कर रहे. पिछले 2 महीने से नोट कर रही हूं कि मेरे और पति के बीच सैक्स में ठंडापन आ गया है. ऐसा नहीं है कि हम पतिपत्नी में प्यार नहीं है या मैं पति की जरूरतों का ध्यान नहीं रखती. औफिस की व्यस्तता के बावजूद हमारी सैक्सलाइफ अच्छी चल रही थी, लेकिन कुछ समय से ही मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि हमारे बीच कुछ कमी सी आ गई है, ऐसा क्यों महसूस कर रही हूं?

जवाब

ऐसा लगता है आप पतिपत्नी अपने कैरियर बनाने में इतने बिजी हो गए हो कि अपनी सैक्सलाइफ को सिर्फ रूटीन में ले लिया है. बच्चा अभी चाहते नहीं, इसलिए प्रिकौशंस भी लेते होंगे. यानी कि खुल कर सैक्स करने का मन भी होता होगा, तो नहीं करते होंगे. खैर, ये अलग बातें हैं. समस्या है आप दोनों के बीच सैक्स का ठंडापन.

लाइफ में जब हर काम एक ही ढर्रे से चल रहा हो तो जीवन में नीरसता आना लाजिमी है. यही बात सैक्सलाइफ के ऊपर भी लागू होती है. बैडरूम में कपल्स को अपने सैक्सुअल परफौरमैंस में थोड़ा नयापन लाते रहना चाहिए.

सैक्स के लिए पार्टनर का मूड सैट करना जरूरी है. ऐसी बातें करें कि वे उत्तेजित हो जाएं. जितना एक्साइटिड करेंगे, रिजल्ट उतना ही अच्छा मिलेगा. पतिपत्नी के रिश्ते में शुरुआती दिनों में जितनी गर्माहट होती है, धीरेधीरे कम होने लगती है. इस का मतलब यह नहीं कि आप में कुछ कमी है. बस, रिलेशनशिप में नयापन लाने की कोशिश करनी होगी.

इंटिमेट पल के दौरान यह याद रखें कि आप के पार्टनर की कामुकता आप के किस मूव से बढ़ती है. अगर बैड पर जाने के बाद भी आप के अंदर हिचक या शर्म है तो इस से पार्टनर का जोश भी ठंडा हो सकता है. आप दोनों प्लान कर के किसी रात वाइल्ड सैक्स कर सकते हैं और अपने सैशन को रोमांचकारी बना सकते हैं.

आप के पास मास्टरबेशन का भी औप्शन है. मास्टरबेट कर के फिजिकल रिलेशन के लिए खुद का मूड बनाएं. हैल्दी सैक्सलाइफ के लिए अपने खानपान में तरबूज, स्ट्राबैरी, बादाम, डार्क चौकलेट आदि शामिल करें. धूम्रपान से परहेज करें. इन टिप्स को बिंदास अपनाएं, आप खुद फर्क महसूस करेंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

क्या पौर्न फिल्म देखना आप के शरीर को कमजोर कर सकता है?

आमतौर पर जब पॉर्न के बारे में बातचीत को चर्चा में लाया जाता है , तो इसे या तो जल्दी से निपटा दिया जाता है या फिर इसके बारे में बात ही नहीं की जाती. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारी सामाजिक कंडीशन ही ऐसी है जहां लोग पॉर्न देखना तो पसंद करतें है लेकिन उसके बारे में  या उससे होने वाले नुकसानों के बारे में बात करना नहीं चाहते. आज इंटरनेट पर इतनी पॉर्न वेबसाइट्स उपलब्ध हैं जिसको आप जितना चाहें उतना पॉर्न देख सकते है.

साउथ एशियन कंट्री में पॉर्न की बात करना यानी एक तरह का पाप करने जैसा है. सबसे ज्यादा भारत और पाकिस्तान में. या सही मायने में कहे कि यह एक तरह की हिपोक्रेसी है . इन दोनों देशों में लोग सबसे ज्यादा पॉर्न देखते है लेकिन बात करते हुए इसे पाप मानते है.

हालांकि भारत सरकार ने अधिकांश पॉर्न साइट्स पर प्रतिबंध लगा दिया है, लेकिन उन तक पहुंचना कोई मुश्किल बात नहीं. इस बात को ध्यान में रखे कि सेक्स और पॉर्न दोनो ही बहुत अगल हैं एक दूसरे से जैसे: पॉर्न एग्रेसिव सेक्स को दर्शाता है , और सेक्स फिजिकल प्लेजर है जो कि एक स्वाभाविक बात है .

यदि आप अधिक पॉर्न देखते है तो  क्या आप जानते है पॉर्न देखने के कितने नुकसान हो सकते है? कोई भी चीज यदि ज्यादा हद तक की जाये तो वह हानिकारक ही होती है. पॉर्न की लत भी उसी तरह है जो पीछा आसानी से नहीं छोड़ती है . पर आप यह जानने के बाद अपने आप पीछे हट जाएंगे कि पॉर्न से कैसे होता है नुकसान.

अत्यधिक पॉर्न पहुंच सकता है नुकसान :

* रियलिटी से दूर होना :

इंटरनेट पॉर्न की कहानियां घटिया स्टोरी लाइन पर निर्धारित है जो एक पिज्जा डिलीवरी बॉय से ले कर एस्ट्रोनॉट तक ही सीमित है . जैसे ही पॉर्न अनिवार्य रूप से रिग्रेसिव सोसायटी में सेक्स एजुकेशन का एक मात्र स्त्रोत बन जाता है , दर्शक अनियंत्रित रूप से इन हाफ– बेक्ड  स्टोरीलाइन को वास्तविक जीवन का एक हिस्सा समझ लेते है. जिससे लोगों में  कंसेंट  की  गलत समझ  पैदा होती है, और समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है.

* आत्मसम्मान में कमी ना :

अक्सर पॉर्न वीडियो में जो लोग होते है वे कई वर्षो से इस काम को कर रहे होते है , वे अनुभवी हैं और जानते हैं की कैमरे के सामने खुद को कैसे संभालना है. एक युवा दर्शक जो ऐसे पॉर्न नियमित रूप से देखता है , वह खुद की परफॉर्मेंस और फिजिक को उनसे तुलना  करके धीरे धीरे खुद से ही नाराज हो जाते है जो उन्हे अंततः आत्मसम्मान की कमी की ओर ले जाता है.

* सेक्स के दौरान मजा ना :

इंटरनेट पॉर्न के कंटेंट को एक प्रोफेशनल टीम इस तरह दर्शती है जो लोगो को एक अलग तरह का प्लेजर देता है . उसे इस कदर प्रदर्शित करते है जो दर्शकों प्रसन्न करता है. एक मेकअप आर्टिस्ट से लेकर साउंड एडिटर तक पूरी टीम उस वीडियो को इतनी ग्लॉसी बनाती है की दर्शक सोचते है की यही हकीकत है . जबकि वास्तविकता कुछ और ही होती है . इससे आप स्वयं , अपने पार्टनर , और अपने फिजिकल इंटिमेसी से निराश हो जाते हैं.

* रिश्ते टूटने का डर :

एक रेगुलर पॉर्न दर्शक के लिए  पॉर्न वीडियो के कुछ कार्य ,  सेक्स का आदर्श बन जाते है जबकि उनके पार्टनर के सेक्स के प्रति कुछ  अलग विचार रहते है. इससे रिश्ता में दरार पड़ जाती है और शारीरिक परेशानी भी पैदा होती है .

* आदत बन जाना :

एक स्टडी के अनुसार पॉर्न की लत और ड्रग की लत को एक समान माना गया है क्योंकि दोनों एक समान तरीके से मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाते हैं. इंटरनेट पर पॉर्न की आदत लगने की संभावना सबसे ज्यादा पाई गई  है.

इंटरनेट वेबसाइट इस तरह पॉर्न को दर्शाते है की यह दर्शकों की आदत ही बन जाती है. लोग ऐसे विडियोज को पसंद करते हैं और खुद को इन सब में इन्वॉल्व कर लेते हैं . चिंता की बात यह है की पॉर्न लोगों पे इस तरह हावी हो जाता है की लोग खुद की इच्छाओं को भूल जाते  हैं, अपने विचारों को बदल देते हैं, जो उन्हे खुद भी कभी महसूस नहीं होता.

बढ़ती उम्र की औरतों की क्यों बदलती है सोच?

कुछ वर्षों में कमला मल्होत्रा की मानसिकता में काफी बदलाव आया है. भीतर ही भीतर एक आक्रोश सा सुलग रहा है. जराजरा सी बात पर झुंझलाने और क्रोध करने लगती हैं. उन की उम्र होगी 60 वर्ष के करीब. बेटी का विवाह हो चुका है, एक बेटा कनाडा में है, दूसरा मुंबई में. दिल्ली में वे अपने अवकाशप्राप्त पति के साथ एक अच्छे व शानदार फ्लैट में रहती हैं. सबकुछ है, पर इस आभास से मुक्ति नहीं है कि ‘मैं अकेली हूं, मेरा कोई नहीं है.’  एक चिड़चिड़ाहट और तनाव उन के चेहरे पर बराबर दिखाई देता है.

बढ़ती उम्र की शहरी महिलाओं की अब यही एक आम मानसिकता होती जा रही है. पारिवारिक जीवन में जो बदलाव आ रहा है, उस के लिए वे तैयार नहीं होती हैं. बच्चे हाथ से ऐसे छूट जाते हैं जैसे कटोरी से पारा गिर गया हो. पति हर समय सिर पर सवार सा लगने लगता है. जवानी में जो आशा बनी रहती है कि बच्चे बड़े हो कर हमारी सेवा करेंगे, वह टूट जाती है.

घर में काम भी बहुत कम हो जाता है. एक सूनापन सा बराबर बना रहता है. इस बदलाव से महिलाओं को जो पीड़ा होती है, उस से उन के नजरिए में भी फर्क आता है. वे अपनेआप को दुखियारी और बेचारी समझने लगती हैं. उन का आत्मविश्वास, उन की सहनशीलता खत्म हो जाती है.

इस दौरान पति के साथ भी उन का लगाव कम होने लगता है. प्रेम और आकर्षण को बनाए रखने की दिशा में वे कोई पहल नहीं करतीं. तटस्थ और उदासीन हो कर घर के काम करते हुए भावनाओं में डूब जाती हैं.

विशेषज्ञ बताते हैं कि उन की जिंदगी का यही समय होता है उन के लिए सब से अधिक फुरसत का, जिसे वे व्यर्थ की चिंताओं में बिताने में एक अस्वस्थ सुख का अनुभव करती हैं. मनोवैज्ञानिकों की भाषा में इसे ‘स्वपीड़ा का सुख’ कहते हैं. कमला मल्होत्रा का सुखदुख यही है.

लगभग इसी उम्र की हैं गायत्री देवी. अपनी संतान को ही सबकुछ मान लेने की गलत मानसिकता पाल कर जानेअनजाने वे पति की अवहेलना करती रही हैं.

20 वर्षों के इस भावनात्मक अंतराल के चलते पतिपत्नी के बीच पूरा संवाद नहीं हो पाता. एक गैप बराबर बना रहता है. पति को शिकायत है कि उन की जरूरतों की गायत्री को परवा नहीं है. गायत्री के अनुसार, वे मुझे पूछते ही कब हैं.

 

पुरुष बनाम महिला

जाहिर है, यह एक अधेड़ मानसिकता है जिस का शिकार महिलाएं अधिक होती हैं. उन का जीवन कुछ और अधिक सिकुड़ कर आत्मकेंद्रित हो जाता है. खाली समय में कुछ पढ़नेलिखने की आदत भी उन की नहीं होती. पुरुष बाहर की दुनिया से भी कुछ तालमेल रखते हुए जिंदगी की बदली हुई परिस्थिति से समझौता करने का गुर सीख लेते हैं. इस उम्र में जो अडि़यल मानसिकता महिलाओं में पैदा हो जाती है वह पुरुषों में बहुत कम देखी जाती है.

महिला मनोविज्ञान के विश्लेषकों ने इस मानसिकता को काफी खतरनाक बताया है. उन का मानना है कि इस से बीमारियां भी पैदा हो सकती हैं, जिन बीमारियों का जिक्र इस संदर्भ में अकसर किया जाता है उन में अवसाद और उच्च रक्तचाप प्रमुख हैं.

इधर स्ट्रोक और दिल का दौरा भी महिलाओं को अधिक पड़ने लगा है. पहले महिलाओं को यह बहुत कम होता था. बहुत से कारणों में एक कारण अब यह भी बताया जा रहा है कि अधेड़ावस्था में उन का अकेलापन बढ़ जाता है. गृहस्थी में कुछ खास करने को नहीं रह जाता तो खाली दिमाग परेशानी का सबब बन जाता है. पुरानी बातों को याद कर दुखी होने की आदत छोड़नी पड़ेगी.

मनोचिकित्सकों से बात करने पर पता चलता है कि डिप्रैशन की बीमारी भी बढ़ती उम्र की महिलाओं को ही अधिक होती है. अकसर यह इतनी गंभीर हो जाती है कि मनोचिकित्सक के पास जाना अनिवार्य हो जाता है. वे भी उन्हें यही सलाह देते हैं कि आप अपने को किसी काम में उलझाए रखें. कोई अच्छा शौक पालें, पत्रपत्रिकाएं पढ़ें, बागबानी करें और अपनी सोच को सकारात्मकता की ओर उन्मुख करें.

नकारात्मक विचार

देखने में आ रहा है कि महिलाओं को इधर स्ट्रैस व डायबिटीज भी अधिक होने लगी है. कहते हैं, आदमी जब अपने नकारात्मक विचारों को रोक नहीं पाता और यह लंबे समय तक चलता रहे तो उस के शरीर में इंसुलिन की कमी हो जाती है. मधुमेह का यह एक मानसिक कारण है. यह बढ़ती उम्र की महिलाओं को अधिक प्रभावित करता है. इसी बीच अगर आर्थ्राइटिस भी हो गई हो तो कुछ चिकित्सक उसे भी महिलाओं की मानसिक अवस्था से जोड़ देते हैं. इस उम्र में वे अगर जीने का स्वस्थ दृष्टिकोण अपना लें तो अधेड़ होने की बहुत सी कुंठाओं से बच सकती हैं.

आत्महत्या से पीडि़त महिलाओं की संख्या भी इधर बहुत बढ़ी है. वे दूसरों को फलताफूलता देखती हैं तो उन से अपनी तुलना करने की मजबूरी को दबा नहीं पातीं.

पड़ोस की मीरा को यह बात रास नहीं आई कि अर्चना ने गाड़ी खरीद ली है. हम अपने एक इस छोटे से सपने को भी पूरा नहीं कर पाए तो हमारे जीवन में रखा ही क्या है. मीरा की उलझनें बढ़ गईं. पति के जीवनभर की बचतपूंजी लगा कर अर्चना की गाड़ी से भी अच्छी गाड़ी खरीदने की लालसा उन के मन में जाग उठी.

बढ़ती उम्र में आप के मन में अगर इस प्रकार की कोई वेदना पैदा हो तो आप जरा शांति से बैठ कर हिसाब लगाएं. आप को तब मालूम होगा कि आप के अधिकतर सपने पूरे हो चुके हैं और जो बाकी हैं उन के पूरे न होने का दुख मात्र एक असुरक्षा की भावना है, जो उम्र के साथ बढ़ जाती है.

यहां एक मामूली सी समझ यह रखनी होगी कि आप जब 50-55 वर्ष की होती हैं तो आप का पति 60 पार कर रहा होता है. इस उम्र में उस की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं. वह तन और मन की सेहत पर अधिक खर्च करने लगता है, घरेलू चीजों की खरीदारी पर बेकार पैसा गंवाना समझता है. इस से पतिपत्नी के बीच जो विवाद पैदा होता है वह आप दोनों के अडि़यल रुख को बढ़ावा देता है. यह और बात है कि इस का खमियाजा शायद औरतों को ही ज्यादा भुगतना पड़ता है.

बोलचाल की भाषा में जिसे हम अडि़यलपन कहते हैं वह अधेड़ावस्था में अपनी चरमसीमा पर होता है. कुछ लोग इसे सठियाना भी कहते हैं. यह महिलाओं में अधिक होता है या पुरुष में, इस विषय पर कोई रिसर्च शायद न हुई हो पर अनुभव यही बताते हैं कि स्त्रियां इस की शिकार अधिक होती हैं. सासबहू के झगड़ों का एक कारण यह भी है कि सास अड़ जाती है, जबकि ससुर का नजरिया उदारवादी अथवा समझौते वाला होता है.

इच्छाओं की पूर्ति का सवाल जिस मानसिकता से पैदा होता है उस में भावुकता का पुट अधिक होता है जबकि वास्तविक समझदारी बहुत कम होती है. कभीकभी छोटीछोटी जरूरतों को भी इतना तूल दे दिया जाता है कि घर में तनाव पैदा हो जाता है. पुताई हो रही है तो दीवार पर कौन सा रंग लगे, इस पर भी बहस हो जाती है, मुंह फूल जाते हैं.

ऐसा नहीं कि अधेड़ उम्र की कठिन मानसिक दशा से उबरने का कोई रास्ता नहीं. इस समस्या से सरोकार रखने वाले बताते हैं कि आप अपने आपसी प्रेम के रैगुलेटर को जरा बढ़ा दें तो मन में रस का संचार होने लगेगा. महिलाओं के पास तो इतने गुण हैं कि उन का इस्तेमाल करें तो वे बढ़ती उम्र की कुंठाओं से बच सकती हैं. स्वयं को कुतरने वाले काल्पनिक विचारों के चूहों से बचने के लिए आप यह सब करें :

  • कोई आर्थिक समस्या नहीं तो फ्री में बच्चों को ट्यूशन दें.
  • शौकिया कुकिंग करें.
  • इस उम्र में कुछ आर्थिक जिम्मेदारी निभाने का भी प्रयास करें.
  • सिलाईकढ़ाई करें.
  • पति की दुकान या औफिस है तो वहां बैठें.
  • सुविधाजनक लगे तो बिजलीपानी और फोन आदि के बिल भी स्वयं औनलाइन जमा करें.
  • पैसा हो तो कंप्यूटर या लैपटौप खरीदें, उस पर टाइप करें, हिसाबकिताब रखें.
  • गाने सुनें, फिल्में देखें.
  • व्हाट्सऐप पर पत्रव्यवहार करें, बधाई और शुभकामनाओं का लेनदेन करें.

दो रोटी बना कर खा लेने से आत्मविश्वास नहीं पैदा होगा. घर में बुढ़ाएसठियाए  पतिपत्नी की तरह नहीं, 2 प्रेमियों की तरह रहें. अगर स्वयं को बदल नहीं सकते तो कम से कम जिन खुशियों को महसूस कर सकते हैं उन का तो जीभर के अपने जीवन में स्वागत करें. जब हम छोटीछोटी खुशियों का आनंद नहीं लेंगे तो जाहिर है कि बड़ी खुशियां भी हम से मुख मोड़ कर जा सकती हैं.

आखिर क्यों घातक है खुद को बिस्तर पर कमतर समझना?

एक नहीं, बल्कि अनेक बातों से यह साफ है कि सैक्स करने के दौरान शरीर से ज्यादा भावनाएं असरकारी होती हैं, क्योंकि सैक्स भले शरीर के जरीए होता हो, लेकिन उसे तैयार मन ही करता है, भावनाएं करती हैं, इसलिए इस काम में शरीर से ज्यादा मन और भावनाओं की जरूरत होती है.

जब हम किसी बात को ले कर खुद को कमतर आंकने लगते हैं, तो भले मजदूरी कर लें, बो झा उठा लें, गाड़ी चला लें, लेकिन सैक्स नहीं कर सकते, क्योंकि सैक्स में सिर्फ मांसपेशियों की ताकत से काम नहीं चलता, बल्कि इस के लिए मन में एक खास किस्म की भावनात्मक लहर का होना जरूरी है और वह मेकैनिकल नहीं होती. मतलब, कामयाब सैक्स का कोई मेकैनिज्म नहीं है कि हर बार उसे एक ही तरीके से दोहरा दिया जाए.

मन की लहर एक ऐसी आजाद लहर जैसी है, जो भावनाओं के जोर में ही पैदा होती है. यह जोर तकनीकी रूप से पैदा तो नहीं किया जा सकता, पर तकनीकी रूप से इसे कई सामाजिक और दिमागी बाधाएं रोक जरूर देती हैं.

जब हम में डर, अपराध और कमतर होने की सोच पैदा होती है, तो हमारे अंदर खुशी की तरंगें नहीं पैदा होतीं. ऐसे में हम गुस्से की तमाम चीजें तो कर सकते हैं, लेकिन खुशी और प्यार नहीं जता सकते, इसीलिए हम सैक्स भी नहीं कर सकते, क्योंकि सैक्स करना आखिरकार मन को खुशियों और भावनाओं से भरा होना होता है.

नैगेटिव भावनाएं खुशियों को छीन लेती हैं और मन में पैदा होने वाली लहर से हमें वंचित कर देती हैं, इसलिए शरीर में तरंगें नहीं जागती हैं और वह सैक्स के लिए तैयार नहीं होता. नतीजतन, हम डिप्रैशन में, हीन भावनाओं के शिकार होने पर या ऐसे ही दूसरे तनाव के पलों में सैक्स के लिए तैयार नहीं होते हैं.

कुदरत ने इस मामले में अच्छे डीलडौल वाले या बहुत ताकतवर को यह खासीयत नहीं बख्शी है कि वह किसी भी मानसिक और शारीरिक हालात में सेक्स कर सके.

अच्छे से अच्छे पहलवान, बड़े से बड़े एथलीट के दिमाग में भी अगर यह बात बैठ जाए कि वह सही से सैक्स नहीं कर पाएगा, तो फिर चाहे कुछ भी हो जाए, वह ऐसा नहीं कर सकेगा.

सच कहें तो सैक्स भावनाओं की ड्राइव है और इस में जरा सी भी किसी भावना को ठेस लग जाए, जरा सी हिचक आ जाए, शक पैदा हो जाए, तो फिर कुछ नहीं हो सकता.

दरअसल, हीन भावनाएं हमारे दिलोदिमाग में कई तरह से आती हैं. एक वजह तो सामाजिक होती है, जिस में हमें बचपन से ही ठूंसठूंस कर दिमाग में भरा जाता है कि यह छोटा है, यह बड़ा. यह ऊंची जाति का है, यह नीची जाति का है. यह बैस्ट है, यह नहीं है. फिर कर्मकांडों का भी एक बड़ा रोल होता है.

छोटीबड़ी उम्र और सामाजिक रिश्तों की भी एक लक्ष्मण रेखा होती है. कई बार वह सही होती है, कई बार मन का वहम होती है. लेकिन सैक्स के मामले में जो सब से बड़ी हीन भावना होती है, वह ऐसे गलत प्रचारों से आई है, जिन के जरीए कुछ लोग अपनी रोटी सेंकते हैं. मतलब सैक्स की कमजोरी, शारीरिक कद, रंग, हैसियत, ये सब बातें दिमाग में भरी गई ऐसी हीन भावनाएं हैं, जो हमें सैक्स के मामले में कमजोर बनाती हैं.

हीन भावना से छुटकारे के लिए खुद पर यकीन की जरूरत होती है. अपनी हैसियत को पहचानने और अपनी ताकत को सही आंकने से भी कमतर होने की सोच से उबरा जा सकता है.

ऐसे उपाय न करने से कमतर होने के भाव आप की पूरी जिंदगी पर छाए रहेंगे, जो आप की पूरी ताकत को खोखला बनाते रहेंगे.

खुद को कमतर सम झना सैक्स को सब से ज्यादा प्रभावित करता है, क्योंकि इस का शिकार इनसान अपने दिलोदिमाग में एक तनाव लिए रहता है कि वह सही से संबंध नहीं बना पाएगा.

यह चिंता हर समय किसी न किसी रूप में दिमाग में हथौड़ा बजाती रहती है, इसलिए वह मन से पूरी तरह सैक्स नहीं कर पाता, फिर चाहे कितना ही काबिल क्यों न हो.

इस दिमागी कमी को जितनी जल्दी हो खत्म करना चाहिए. अकसर यह बोध भ्रामक सोच से पैदा होता है. ऐसी हालत में मर्द या औरत के मन में यह बात बैठ जाती है कि उस से कामयाब सैक्स नहीं हो पाएगा. इस भ्रामक सोच के चलते  वह हकीकत में सैक्स में कामयाब नहीं हो पाता.

प्रैक्टिकल नजरिए से ऐसी सोच इन बातों से आती है जैसे मर्दाना अंग को छोटा सम झ कर हीन भावना से पीडि़त होना, औरत के बेहतर होने का खयाल करना, उस के अच्छे पद को ले कर हर समय तनाव में रहना, परिवार का अमीर या फिर गरीब होना, अनमेल माली हालात वगैरह.

ये तमाम सोच सैक्स के लिए बेहद नैगेटिव हैं. एक बात सम झ लीजिए कि मर्दाना अंग की लंबाईमोटाई सैक्स पर बिलकुल भी असर नहीं डालती. छोटे अंग वाले मर्द को जान लेना चाहिए कि औरत के अंग की बनावट ऐसी होती है, जिस में हर तरह का मर्दाना अंग पूरा मजा देता है.

मर्द को इस गलत सोच से ध्यान हटा कर सही तकनीक के मुताबिक सैक्स करना चाहिए. अगर मर्द इस सोच को नहीं छोड़ेगा, तो उसे सैक्स में नाकामी ही मिलेगी. वह अपनी साथी को पूरी तरह से संतुष्टि नहीं दे पाएगा. जब औरत संतुष्ट होगी, तब कमतर होने का भाव अपनेआप खत्म हो जाएगा.

सजा के बाद सजा : भाग 2

कोई कहता कि तुम ने यह सोच कर किया होगा कि किसी को पता नहीं चलेगा. लड़की बदनामी के डर से चुप रहेगी. तुम नौकरी, परिवार, बालबच्चेदार आदमी थे, तुम पर कोई आरोप नहीं लगाएगा. तुम डराधमका कर, प्यार से, पैसों से सब का मुंह बंद कर दोगे. लेकिन जब किस्मत खराब होती है, तब कोई काम नहीं आता.

जेल का एक हवलदार विनय से सब से ज्यादा चिढ़ता था, जो खुद उसी लड़की की जाति का था. उसे लगता था कि उस की जाति के साथ आज भी वही नाइंसाफी हो रही है, जो सदियों से होती आई है. वह विनय को गालियां देता रहता था.

जेल के अंदर हर सिपाही और हवलदार की ड्यूटी 4-4 घंटे की होती है. जब वह हवलदार अपनी ड्यूटी कर के चला जाता, तब विनय को राहत मिलती थी.

वह हवलदार पहले सिपाही था, लेकिन आरक्षित कोटे में आने से उस का जल्दी प्रमोशन हो गया था. जनरल कोटे वाले सिपाही के सिपाही ही बने रहे. वे उस हवलदार से चिढ़ते थे. उन के अंदर गुस्सा था कि हम 12 साल से नौकरी कर रहे हैं और सिपाही के सिपाही हैं और यह 5 साल पहले भरती हुआ और आज हवलदार बन गया. अगले 5 सालों में फिर प्रमोशन. वाह रे सरकार… वाह रे संविधान.

उन सिपाहियों की नाराजगी के चलते विनय को एक तरह का सपोर्ट रहता.

4 घंटे में जो कुछ सहना पड़े, वही काफी होता. मांबहन की गालियां. काम का ज्यादा दबाव. कभीकभी लातजूतों से मारपीट भी.

एक दिन एक सिपाही ने विनय को सलाह दी, ‘‘डरते क्यों हो? पोस्टकार्ड मिलता है न. लिख दो मानवाधिकार आयोग को. सारी गरमी उतर जाएगी.’’

एक तरह से विनय असंतोष से भरे उन सिपाहियों का मोहरा भी था और खुद भी पीडि़त था. उस ने अपनी पीड़ा लिख कर एक सिपाही को चिट्ठी दे दी.

कुछ दिनों बाद वही हवलदार विनय के सामने दीन बना हुआ खड़ा था और अपनी गलतियों के लिए माफी मांग रहा था.

वह गुजारिश कर रहा था, ‘‘मानवाधिकार आयोग की टीम आई हुई है. मेरी नौकरी चली जाएगी. तुम कह देना कि जो लिखा, वह गलत है. तुम्हारे साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. आगे से मैं ऐसा कुछ भी नहीं करूंगा.’’

विनय ने वही कह दिया, जैसा हवलदार ने कहा था.

विनय नौकरी छूटने पर घर टूटने का दर्द समझते थे. सब के घर में छेद हैं. कोई किसी के घर में सांप छोड़ने की कोशिश न करे. कोई दूसरा भी कर सकता है. सब के घर में शीशे हैं. पत्थर कोई भी फेंक सकता है. घर किसी का भी टूट सकता है. बेहतर है कि एकदूसरे के घरों की रखवाली करें.

हवलदार एहसानमंद भी था और शर्मिंदा भी. उस ने विनय को परेशान करना बंद कर दिया, बल्कि उन से कभीकभी अच्छे से बात भी कर लेता. अब वह उन से उतना ही काम लेता, जितना दूसरों से. कभीकभी छूट भी दे देता. पूछ भी लेता, ‘‘कैसे हो भाई? सब ठीक है न? घर से कोई आया मिलने?’’

विनय ‘जी हां’, ‘जी नहीं’ में जवाब दे देते.

एक दिन दूसरे सिपाहियों से जेल में खबर फैली कि हवलदार की पत्नी किसी के साथ भाग गई. खबर सही थी. हवलदार की उदासी, पीड़ा, बेइज्जती उस के चेहरे पर साफ दिख रही थी.

जो शख्स कल तक ऊंची जाति का दुश्मन था, आज वह मुसलिमों को कोस रहा था.

कुछ लोगों की आदत होती है. गलती करे एक, भुगतें पूरी जाति के बेकुसूर लोग. फिर वही बेकुसूर सताए हुए लोग हथियार उठाते हैं, तो अपराधी कहलाते हैं. उन्हें अपराधी बनाता कौन है? उस हवलदार जैसी सोच के लोग.

अब वह हवलदार मुसलिमों से चिढ़ता था. उन्हें आतंकवादी कहता था. लेकिन पीठ पीछे. सामने कहने की हिम्मत नहीं पड़ती थी.

इस जेल का जेलर भी मुसलिम था. अगर कहीं शिकायत हो गई, तो आ गई मुसीबत.

खैर, एक बचा तो दूसरा फंसा. मुसलिम बचे, तो सिख विरोधी दंगे हो गए. फिर पंजाब शांत हुआ, तो गोधरा कांड हो गया. यह सिलसिला थमने वाला नहीं लगता था.

विनय से कोई मिलने नहीं आता था. न पत्नी, न बच्चे. न उन्हें यह पता था कि उन की बेटी की शादी हुई या नहीं. बेटे की नौकरी लगी या नहीं. वे कहां हैं और कैसे हैं.

विनय ने जेल से कई चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. आखिर में उन्होंने खुद को अकेला समझ कर इस जेल को ही अपना घर मान लिया.

आज का इंसान ऐसा क्यों : जिंदगी का है फलसफा – भाग 2

‘‘ऐसा जीवन बारबार जीना चाहता हूं मैं. कोई भी ऐसी इच्छा नहीं है मेरी जो पूरी न हुई हो. संतुष्ट हूं मैं. बारबार थोड़े ही मरूंगा. एक बार ही तो मरना है…जब उस की इच्छा हो…मैं तैयार हूं.’’

मित्र का सीधासादा मध्यवर्गीय परिवार है. अपने छोटे से फ्लैट में वह पत्नी के साथ रहता है. बेटा नई पीढ़ी का है… परेशान रहता है. अच्छी कंपनी में नौकरी करता है. जितना पिता ने नौकरी के आखिरी दिनों में कमाया होगा उस से कहीं ज्यादा वह आज हर महीने कमाता है फिर भी सुखी नहीं है.

‘‘पता नहीं आज के बच्चों को चैन क्यों नहीं है. सबकुछ है फिर भी खुश नजर नहीं आते. हम ने जो सब धीरेधीरे बनाया था उस को यह शुरू के 4-5 साल में ही बना लेते हैं. कर्ज पर घर बना लिया, कर्ज पर गाड़ी, कर्ज पर घर का सारा सामान. कभी इस के घर जा कर देखो क्या नहीं है मगर सब कर्ज पर है. महीने के शुरू में ही कंगाल नजर आता है क्योंकि पूरी तनख्वाह तो किस्तों में बंट कर अपनीअपनी जगह पर चली जाती है. अभी अकेला है, खानापीना हमारे पास चल जाता है. कल को शादी होगी तो घर कैसे चलाएगा, मेरी तो समझ में नहीं आता.’’

‘‘बीवी भी तो कमाएगी न. रोजीरोटी वह चला लेगी घर इस ने बना ही लिया है. सब प्लान बना रखा है बच्चों ने, तुम क्यों परेशान…’’

‘‘अरे, नहीं बाबा, मैं परेशान नहीं हो रहा…मैं तो खुश हूं कि आज भी अपने कमाऊ बेटे को पाल रहा हूं. आज भी उस पर बोझ नहीं हूं. इस से बड़ा संतोष मेरे लिए और क्या होगा कि मेरे शरीर में स्थापित कैंसर भी मुझे तंग नहीं कर रहा. इतनी खतरनाक बीमारी पेट में लिए घूम रहा हूं पर क्या मजाल मुझे जरा सी भी तकलीफ हो.

‘‘मुझे जीवन से कोई शिकायत नहीं है. हम पतिपत्नी अपने फ्लैट में आराम से रह रहे हैं. सौरभ ने अपना घर ले रखा है. रात वहीं चला जाता है सोने. मेरी औलाद भी अपने पैरों पर खड़ी है. बेटी अपने घर में खुश है. मेरे बाद मेरी पत्नी भी किसी का मुंह नहीं देखेगी, इतना प्रबंध कर रखा है. सौरभ भी मां का खयाल रखेगा पूरा विश्वास है मुझे.

” देखो विजय, इंसान को अगर खुश रहना है तो उसे अपनी सोच को बदलना होगा. अंधी दौड़ में रहेगा तो कभी भी खुश नहीं रह पाएगा. स्वर्ग मरने के बाद नहीं मिलता और न मरने के बाद नरक ही होता है. सब यहीं है, इसी जन्म में. कुछ हमारे द्वारा बोए गए कर्म कुछ उन का फल, कुछ संयोग और कुछ हादसे यही सब मिला कर ही तो हमारा जीवन बनता है. हमें यह जीवन जीना है और इसे जिए बिना गुजारा नहीं है तो क्यों न इस तरह जिएं कि किसी को हमारी वजह से तकलीफ न हो.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है. कहीं न कहीं, कभी न कभी तो ऐसा होता ही है. समाज में रह कर हम सब के साथ जीते हैं. हम सब को सुख ही दे पाएं ऐसा नहीं होता. यदि कोई हमें पसंद ही न करे तो हम कैसे उसे भी खुश रखें. संसार में रहते हुए सब को सुख देना आसान नहीं होता. लाख यत्न करो, कहीं न कहीं कुछ न कुछ छूट ही जाता है.’’

‘‘जो तुम्हें पसंद नहीं करता तुम उस से दूर रहो ऐसा भी तो हो सकता है न. गुजारे लायक ही उस के पास जाओ. एक जायज और सम्मानजनक दूरी रखो. जितना कम वास्ता पड़ेगा उतनी कम तकलीफ होगी.’’

‘‘यदि रिश्ता ही ऐसा हो कि दूरी रखना संभव न हो…’’

‘‘तो उसे स्वीकार कर लो. उस इंसान की वजह से दुखी होना ही छोड़ दो. उस के सामने चिकने घड़े बन जाओ.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है ढीठ बन जाओ, क्योंकि तुम्हें अपने मन की शांति के साथ जीना है…इस के लिए क्या बदतमीज ही बन जाना पड़ेगा.’’

‘‘बदतमीज और ढीठ बनने को कौन कह रहा है. उस इंसान को एक सीमा तक नकार दो. अपना दायित्व निभाते रहो. एक उचित दूरी रख कर शांति से रहा जा सकता है.’’

‘‘एक स्वार्थी इंसान के साथ शांति से कैसे रहना?’’

‘‘स्वार्थी इंसान तो हर पल अपनी आग में जलता ही रहता है. कम से कम हम उसे नकार कर अपनी जान तो बचा लें, उस की सोच का प्रभाव हम पर क्यों हो. हम उसे बदल नहीं सकते. उसे कुदरत ने ऐसा ही बनाया है तो क्यों उसे बदलने की कोशिश करें. हम भी इन्सान हैं यार…क्यों बिना वजह औरों की गलती की सजा भोगें.

‘‘मेरे बड़े भाई साहब को ही देख लो, सारी उम्र उन्होंने पिताजी की शराफत और कमजोरी का फायदा उठाया और उन की धनसंपदा पर ऐश किया. हम घर से बाहर हैं नौकरी पर. जितनी चादर थी उतने ही पैर पसारे. भाई साहब की तरह शानोशौकत में रहते तो गुजारा ही न चलता. मैं ने कभी पिता से कुछ नहीं मांगा.

‘‘इन दिनों भाई साहब नाराज चल रहे हैं. सारी जायदाद बेच कर खा चुके हैं. मुझ से मदद चाहते हैं. अब तुम्हीं बताओ, मैं उन की मदद कैसे करूं? अपनी मौत का इंतजार करता मैं उस भाई की सहायता कैसे करूं जिस ने सदा मुझे बेवकूफ बनाया और समझा भी. जिस के पैर सदा चादर से बाहर रहे, क्या मैं भी उस भाई के लिए नंगा हो जाऊं.

‘‘सारी उम्र मैं सादगी में जिआ, इसीलिए न कि कभी किसी के आगे हाथ न फैलाना पडे़े…तो क्या उन की मदद कर मैं भी सड़क पर आ जाऊं. सो नकार दिया है मैं ने उन की नाराजगी को. नहीं तो न सही. वह मुझे मिलने नहीं आते न आएं, मैं क्यों अपने मन को जलाऊं. मैं दुखी नहीं होता क्योंकि मैं जानता हूं मेरी सामर्थ्य से बाहर है उन की मदद करना. 3-3 बिगड़े बेटों के पिता हैं वह. परिवार में 4 जन हैं कमाने वाले और मैं अकेला और बीमार. क्या मुझ से मदद मांगना उन्हें शोभा देता है? स्वार्थ की पराकाष्ठा नहीं है यह तो और क्या है?

खुशी का गम : पति ने किया खिलवाड़ – भाग 2

दिन गुजरने के साथ जैसेजैसे उस के व्यक्तित्व का यह पहलू मेरे सामने आ रहा था वैसेवैसे उस के प्रति मेरा मोहभंग होता जा रहा था. जहां वह मानसिक रूप से दिन पर दिन मेरे करीब आती जा रही थी, वहीं मैं जानबूझ कर अपने को उस से दूर करता जा रहा था, क्योंकि मैं जानता था कि उस के और मेरे रिश्ते का कोई भविष्य नहीं है. मुझे एहसास होता जा रहा था कि यदि हम ने शादी कर ली तो मैं उस के साथ कभी सुखी नहीं रह पाऊंगा. यह सोच कर मैं ने धीरेधीरे उस से मिलना कम कर दिया. लेकिन नेहा से मुझे पता चला कि मेरे इस रवैये से वह बहुत दुखी और परेशान रहने लगी थी, क्योंकि वह मुझ से भावनात्मक तौर पर जुड़ चुकी थी.

नेहा ने तो मुझे यह भी बताया कि अगर मैं खुशी से शादी नहीं करूंगा तो वह अपनी जान दे देगी, लेकिन किसी और लड़के से शादी नहीं करेगी. नेहा की इस बात से मैं परेशान हो गया था, और एक दिन खुशी को मैं ने अपने और उस के विरोधाभास के बारे में बताया कि हम दोनों के स्वभाव में जमीनआसमान का अंतर होने की वजह से वह कभी मेरे साथ सुखी नहीं रह पाएगी. इसलिए बेहतर यही होगा कि हम अपने रास्ते  अलग कर लें.

मेरी इस बात को सुन कर खुशी बहुत रोई थी और उस दिन घर जा कर उस ने अपने दोनों हाथों की नसें काट कर खुदकुशी करने का प्रयास किया था.

उस दिन खुशी के घर वालों को मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पता चल गया. अगले ही दिन उस के घर वाले उस की और मेरी शादी का प्रस्ताव ले कर मेरे मातापिता से मिले थे.

नेहा ने मेरी और खुशी की दोस्ती के बारे में पहले ही मेरे मातापिता को सबकुछ बता दिया था, सो मेरे मातापिता ने मेरी राय बिना पूछे उस से मेरा रिश्ता पक्का कर दिया था. बाद में मैं ने अपने मातापिता से इस रिश्ते को तोड़ने की लाख मिन्नतेंकीं लेकिन उन्होंने मेरी बातों पर ध्यान नहीं दिया और आखिरकार मेरी शादी खुशी से हो गई.

विवाह के बाद खुशी ने मुझे वे सारी खुशियां दी थीं जिन की एक पति को अपने पत्नी से अपेक्षा होती है. शादी के बाद के पहले 2-3 वर्ष बहुत अच्छे बीते. वक्त के साथ मैं एक प्यारे से बेटे का पिता बन गया था. उस को गोद में उठा कर मैं बेपनाह खुशियों से भर जाता. उसे लाड़दुलार कर मुझे बहुत सुकून मिलता लेकिन लगभग 3 सालों के विवाहित जीवन के बाद हमारे दांपत्य जीवन में कुछ ठहराव सा आने लगा था. हमारे संबंधों में एकरसता और ऊब की शुष्कता पसरती जा रही थी.

मैं शुरू से ही रसिक स्वभाव का था. नईनई लड़कियों से दोस्ती करना मेरा प्रिय शगल था.

गुवाहाटी में मेरा काफी पुराना अच्छा- खासा साडि़यों का शोरूम था. मुझे व्यापार के लिए अधिक समय नहीं देना पड़ता था, पुराने कर्मचारी मेरी दुकान बहुत अच्छी तरह से संभाल रहे थे. गुवाहाटी के अलावा शिलांग में भी मेरा साडि़यों का एक बड़ा शोरूम था, सो मैं सप्ताह में एक बार शिलांग जरूर जाया करता था. वहां कई लड़कियां मेरी मित्र थीं. शिलांग में एक दोस्त के यहां मेरा परिचय फ्लोरेंस नाम की एक खासी जाति की लड़की से हुआ था. पहली ही नजर में वह लड़की मेरी निगाहों में चढ़ गई थी. उस से पहले मैं जितनी खासी लड़कियों के संपर्क में आया वे सब महज कागजी गुडि़याएं थीं, जिन के जीवन का उद्देश्य सिर्फ मौजमस्ती तथा सैरसपाटा हुआ करता था, लेकिन फ्लोरेंस बेहद जिंदादिल और बिंदास होने के साथसाथ मानसिक रूप से बहुत परिपक्व थी. वह कभी अर्थहीन बातें नहीं करती थी. उस का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था.

एक दिन बातों ही बातों में फ्लोरेंस ने मुझे बताया कि वह एक अच्छी नौकरी की तलाश में है, क्योंकि वह कंपनी, जिस में वह काम कर रही थी, उस की शिलांग की शाखा बंद होने वाली थी.

फ्लोरेंस ने जैसे ही मुझे यह बताया मैं ने उसे अपने शिलांग वाले साड़ी के शोरूम में मैनेजर के पद पर रख लिया था. अब जैसेजैसे मैं उस के संपर्क में आ रहा था, मेरा उस के प्रति खिंचाव बढ़ता ही जा रहा था. दूसरी लड़कियां जहां मेरी अमीरी और आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से मेरे आसपास तितलियों की तरह मंडराया करती थीं वहीं फ्लोरेंस मुझ से पर्याप्त दूरी बनाए रखती, जिस की वजह से मैं उस की ओर शिद्दत से खिंचता जा रहा था.

इधर उस की ओर मेरे खिंचाव का एक कारण और था. फ्लोरेंस के नाम कई एकड़ जमीन थी. अगर मैं फ्लोरेंस से रिश्ता कायम कर लेता तो मैं उस की जमीन का मालिक बन जाता. सो जमीन के लालच में मैं उस से रिश्ता कायम करना चाहता था और एक दिन मुझे वह मौका मिल गया जिस की मुझे चाहत थी.

उस दिन फ्लोरेंस मेरे पास बहुत खराब मूड में आई और मेरे कुरेदने पर रो पड़ी. मुझ से बोली, ‘मेरे भाई बहुत जल्लाद हैं. हम खासियों में मां परिवार की मुखिया होती है. बेटियां वंश आगे चलाती हैं. बेटियों को ही मां की जमीनजायदाद मिलती है. मैं अपनी मां की इकलौती बेटी हूं. इसलिए मां की सारी जमीन मुझे मिली है. मेरे दोनों भाइयों की निगाहें मेरी जमीन पर उगने वाले फलों से होने वाली आमदनी पर गड़ी हुई हैं.

‘मैं तो नौकरी पर आ जाती हूं तो मेरे भाई ही खेतों में मजदूरों से काम करवाते हैं. खेती से होने वाली आमदनी पर अपना नियंत्रण रखने के लिए मेरे भाई मेरी शादी एक निकम्मे, नाकारा खासी आदमी से कराने पर जोर दे रहे हैं.’

उसे इस तरह रोते देख मैं ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उस से बोला, ‘अरे, मेरे होते हुए तुम क्यों चिंता करती हो? मैं तुम्हारे भाइयों से बातें करूंगा और उन्हें धमकाऊंगा. तुम बिलकुल भी मत डरो. मेरे होते हुए कोई तुम पर अपनी मरजी नहीं थोप सकेगा.’

यह कह कर मैं ने उसे चूमना शुरू कर दिया. तब फ्लोरेंस ने मेरे चंगुल से छूटने के लिए बहुत हाथपांव मारे लेकिन उस दिन मेरे ऊपर उस का नशा इस कदर हावी था कि मैं ने उस की एक न सुनी और आखिरकार कुछ प्यार और कुछ जोरजबरदस्ती करते हुए मैं ने उसे आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया. उस दिन मैं ने महसूस किया कि मेरी इस जबरदस्ती से फ्लोरेंस बहुत अधिक नाराज नहीं थी. धीरेधीरे वह मुझे दिलोजान से चाहने लगी थी.

फ्लोरेंस के शोख बिंदास व्यक्तित्व के सामने खुशी का सीधासादा व्यक्तित्व मुझे नीरस लगने लगा था. फ्लोरेंस बातें करने में इतनी वाक्पटु थी कि मामूली बात को भी वजनदार और आकर्षक बना कर सामने रखती. मुझे उस से महज बातें करना बहुत अच्छा लगता था.

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