Story In Hindi: खुशामद का कलाकंद – क्या आप में है ये हुनर

Story In Hindi: जीवन जीना अपनेआप में एक कला है. जिसे यह कलाकारी नहीं आती वह बेचारा कुछ इस तरह से जीता है कि उसे देख कर कोई भी कह सकता है, ‘ये जीना भी कोई जीना है लल्लू.’ सफलतापूर्वक जीवन जीने वाले नंबर एक के कलाकार होते हैं. उन के सामने हर बड़े से बड़ा कलाकार पानी भरता नजर आता है. चमचागीरी या खुशामद करना शाश्वत कला है और जिस ने इस कला में स्वर्ण पदक प्राप्त कर लिया या फिर जिसे ‘पासिंग मार्क’ भी मिल गया, तो उस की जिंदगी आराम से गुजर जाती है.

खुशामद इस वक्त राष्ट्र की मुख्य धारा में है. इस धारा में बहने वाले के हिस्से की सुखसुविधाएं खुदबखुद दौड़ी चली आती हैं. हमारे मित्र छदामीजी कहां से कहां पहुंच गए. साइकिल पर चलते थे, आज कार में चलते हैं. यह खुशामद का ही चमत्कार है. खुशामद की कला के विशेषज्ञ हर कहीं पाए जाते हैं. कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक खुशामद करने वालों की भरमार है.

दरअसल, जीवन की हर सांस खुशामद की कर्जदार है. खुशामद और चमचागीरी में बड़ा बारीक सा अंतर है. चमचागीरी बदनामशुदा शब्द है, खुशामद अभी उतना बदनाम नहीं हुआ है, इसलिए लोग चमचागीरी तो करते हैं, लेकिन सफाई देते हैं कि भई थोड़ी सी खुशामद कर दी तो क्या बिगड़ गया. खुशामद कामधेनु गाय है, जिस की पूंछ पकड़ क र जाने कितने गधे घोड़े बन कर दौड़ रहे हैं. पद, पैसा या सुख आदि पाने की ललक में लोग खुशामद जैसे सात्विक हथियार का सहारा लेते हैं.

खुशामद एक तरह का अहिंसक हथियार है. सोचता हूं कि खुशामद की कला का इस्तेमाल कर के अगर कोई कुछ प्राप्त कर ले तो क्या बुराई है? यह तो जीवन जीने की कला है. इस के बिना आप जहां हैं, वहीं पड़े रह जाएंगे. जो लोग सड़ना नहीं चाहते हैं, वे कुछ करने के लिए खुशामद का सहारा ले कर आगे बढ़ते हैं.

इस के लिए पावरफुल लोगों का सम्मान करो, अकारण दाएंबाएं होते रहो, अभिनंदन करो और ऐश करो.  पिछले दिनों ऐसे ही एक सज्जन के बारे में पता चला. जब देखो वह आयोजनों में भिड़े रहते थे. मुझे लगा, बड़े महान प्राणी हैं. बड़े बिजी रहते हैं. देश और समाज की चिंता में निरंतर मोटे भी होते जा रहे हैं. यह देख कर मैं उन के नागरिक अभिनंदन के ‘मूड’ में आ गया. मैं उन से टाइम लेने जा रहा था कि रास्ते में एक महोदय मिल गए. पूछा, ‘‘कहां चल दिए?’’

मैं ने कहा, ‘‘फलानेजी का सम्मान करना चाहता हूं.’’ मेरी बात को सुन कर महोदय हंस पड़े तो मैं चौंका. मैं ने कहा, ‘‘हंसने की क्या बात है? फलानेजी समाजसेवी हैं. चौबीसों घंटे कुछ न कुछ करते रहते हैं. ऐसे लोगों का अभिनंदन तो होना ही चाहिए.’’ महोदय बोले, ‘‘चलिए, मैं सज्जन की पोल खोलता हूं, तब भी आप को लगे कि उन का अभिनंदन होना चाहिए तो ठीक है.’’ मेरे कान खड़े हो गए. महोदय बताने लगे कि इन्होंने पिछले साल मजदूरों का एक सम्मेलन करवाया था.

खूब चंदा एकत्र किया. एक मंत्री को बुलवा कर भाषण भी करवा दिया. सम्मेलन के बाद उन्हें 2 फायदे हुए, मंत्रीजी ने उन्हें एक समिति का सदस्य बनवा दिया और उन के घर पर दूसरी मंजिल भी तन गई. यह सज्जन हर दूसरे दिन किसी मंत्री का, किसी विधायक का या किसी अफसर का अभिनंदन करते रहते हैं. ऐसा करने से लोगों में धाक जमती चली जाती है.

पावरफुल आत्माओं से निकटता बढ़ती है तो सुविधाओं की गंगा अपनेआप बहने लगती है. देखते ही देखते कंगाल भी मालामाल हो जाता है. महोदय की बातें सुन कर मेरा माथा घूम गया और मैं ने अभिनंदन वाला आइडिया ड्राप कर दिया. अब यह और बात है कि सज्जन अपना अभिनंदन कराने के लिए मेरी खुशामद पर आमादा हैं तो भाई साहब, खुशामद के एक से एक रूप हैं, जुआ की तरह.

हम और आप कर रहे होते हैं और हमें पता नहीं चलता कि खुशामद कर रहे हैं, इसलिए कदम फूंकफूंक कर रखिए, वरना कब खुशामद की कीचड़ आप के मुंह पर लग जाए, कहना कठिन है. खुशामद की कला को अब तो सामाजिक स्वीकृति भी मिल गई है. इसे क्या कहें जो खुशामद के जरिए घरपरिवार को खुश रखता है.

उस की आमद भी सब को खुश कर देती है, लेकिन जो खुशामद से दूर रहता है, उस की आमद घर वालों को नागवार गुजरने लगती है. हर कोई मुंह बनाते हुए बड़बड़ाता है, ‘आ गया आदर्शवादी, हुंह.’ तो साहबान, खुशामद ही जीवन का सार है. घरबाहर अगर इज्जत चाहिए तो खुशामदखोरों की बिरादारी में शामिल हो जाइए. खुशामद की कला में माहिर आदमी का बी.ए. पास होना भी जरूरी नहीं. आप खुशामद पास हैं तो कहीं भी टिक सकते हैं.

समाजवाद, पूंजीवाद, अध्यात्मवाद और बाजारवाद, न जाने कितने तो वाद हैं. सब का अपनाअपना महत्त्व है, लेकिन आजकल के जमाने में ‘खुशामदवाद’ तो वादों का वाद है. सारे वाद बारबार खुशामदवाद एक बार. एक बार जो खुशामद की सुरंग में घुसा, वह मालामाल हो कर ही लौटा. यह और बात है कि आत्मा पर थोड़ी कालिख पुत जाती है, लेकिन उस को क्या देखना? जिस ने की शरम, उस के फूटे करम. आत्मा के चक्कर में न जाने कितने महात्माओं ने आत्महत्याएं कर लीं, इसलिए आत्मा को घर के पिछवाड़े में कहीं दफन कर के खुशामदवाद का सहारा लो.

इस दिशा में जिस ने भी कदम बढ़ाए हैं, वह जीवन भर सुखी रहा है, इसीलिए तो धीरेधीरे खुशामद लोकप्रिय कला बनती जा रही है और जब कला बन रही है या बन चुकी है तो इस का पाठ्यक्रम भी तैयार कर दिया जाना चाहिए. किसी की प्रशस्ति में गीत, कविता लिखना, चालीसा लिखना, क्या है? मतलब यह कि साहित्य में खुशामद कला ने घुसपैठ कर ली है. आजकल विश्वविद्यालयों में नएनए पाठ्यक्रमों की पढ़ाई शुरू हो रही है.

फलाना मैनेजमेंट, ढिकाना मैनेजमेंट तो खुशामद मैनेजमेंट का नया कोर्स भी शुरू हो जाए. इस का बाकायदा ‘पाठ्यक्रम’ तैयार हो. सुव्यवस्थित तरीके से यह कोर्स लांच हो. इस के पढ़ाने वाले सैकड़ों इस शहर में मिल जाएंगे. ऐसे लोगों की तलाश की जाए जो ‘खुशामद वाचस्पति’ हों, ‘खुशामदश्री’ खुशामद कला में पीएच.डी. की उपाधि भी दी जा सकती है और यह मानद भी हो सकती है.

आप के शहर में ऐसी प्रतिभाओं की कमी नहीं होगी. इधर तो खुशामद की प्रतिभा से लबालब लोगों की ऐसी नस्लें लहलहा रही हैं कि मत पूछिए. इसलिए समय के साथ दौड़ने वालों को इस सुझाव पर विचार करना चाहिए, क्योंकि यह सदी खुशामद को कला बनाने पर उतारू होने की सदी है, जो कोई खुशामद के विरोध में खड़ा हो, वह धकिया दिया जाएगा. वक्त के साथ चलो, खुशामद के साथ चलो.

छदामीजी हर दूसरे दिन अभिनंदन करते हैं. अभिनंदन प्रतिभाशाली लोगों का हो तो कोई बात नहीं, लेकिन अब ऐसे लोगों का अभिनंदन करता ही कौन है? अभिनंदन होता है मंत्री, नेता या अफसरों का या फिर ऐसे व्यक्ति का जिस के सहारे सुविधाओं के टुकड़े प्राप्त हो जाएं.

अभिनंदन करना भी खुशामद का ही एक तरीका है. कुछ लोग जीवन भर इसी को पवित्र काम मान कर दिनरात भिड़े रहते हैं. अभिनंदन करना और अभिनंदन कराना ऐसा शौक है कि मत पूछिए. जिसे इस का चस्का लगा, वह गया काम से. अभिनंदन के बगैर वह ठीक उसी तरह तड़पता है, जिस तरह मछली पानी के बगैर. खुशामद करना और खुशामदपसंद होना सब के बस की बात भी तो नहीं है.

खुशामदपसंद आदमी की चमड़ी मोटी होनी चाहिए और जेब भी हर वक्त ‘भरी’ रहे. जब तक जेब भरी रहेगी, अभिनंदन या सम्मान की झड़ी रहेगी. खुशामद करने वाला कंगाल हो तो चलेगा, लेकिन खुशामदपसंद का मालामाल होना जरूरी है. ऐसी जब 2 आत्माएं मिलती हैं, तब यही गीत बजना चाहिए, ‘दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात.’ सोचिए, खुशामद कितनी बड़ी चीज है कि इस नाचीज को इस पर कागज काले करने पड़ रहे हैं, लेकिन हालत यह है कि मर्ज बढ़ता गया ज्योंज्यों दवा की. खुशामद को ले कर आप लाख नाराजगी जाहिर करें, यह खत्म होने से रही.

यह तो द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ती जा रही है, और क्यों न बढ़े साहब? जब हर दूसरातीसरा शख्स इस कला में हाथ आजमा रहा है, तब आप क्या कर लेंगे? आप को इस कला से प्रेम नहीं है तो न सही, और दूसरे लोग तो हैं, जिन की गाड़ी खुशामद के भरोसे ही चलती है. सत्ता के गलियारों में जा कर देखिए, खुशामद करने वाले कीड़ेमकोड़े की तरह बिलबिलाते हुए मिल जाएंगे.

वक्त की मार केवल मूर्तियों या स्मारकों पर ही नहीं पड़ती, शब्दों पर भी पड़ती है. ‘खुशआमद’ ऐसा बदनाम हो गया है कि शब्द का प्रयोग करते हुए डर लगता है. किसी को ‘नेताजी’ कह दो, ‘गुरु’ कह दो तो लगता है, व्यंग्य किया जा रहा है. खुशामद शब्द का यही हाल है लेकिन हाल है तो है. अब तो इसे लोग कला बनाने पर तुले हुए हैं.

वक्तवक्त की बात है, इसलिए साहेबान, मेहरबान, कद्रदान, वक्त की धड़कन को सुनो और इस नई कला को गुनो. सफल होना है तो खुशामद ही अंतिम चारा है. बिना खुशामद के हर कोई बेचारा है. यह और बात है कि जो इस जीवन को संघर्षों के बीच ही जीने के आदी हैं, जिन को मुसीबत झेलने में ही मजा आता है, जो सूखी रोटी खा कर, ठंडा पानी पी कर भी खुश रहते हैं, उन के लिए खुशामद कला विषकन्या के समान त्याज्य है, लेकिन जिन को ऐसेवैसे कैसे भी चाहिए सुविधा सम्मान और पैसे, वे खुशामद के बिना एक कदम नहीं चल सकते.

ऐसे लोग ही प्रचारित कर रहे हैं कि खुशामद एक कला है. इस की मार्केटिंग कर रहे हैं, नएनए आकर्षक रैपरों में. हर सीधासादा आदमी खुशामद के चक्कर में फंस जाता है, लेकिन खुशामद एक ऐसा भंवर है, जिस में कोई एक बार फंसा तो निकलना मुश्किल हो जाता है.  इस कला में बला का स्वाद है. जिस ने एक बार भी इस का स्वाद चख लिया, वह दीवाना हो गया.

नैतिकता से बेगाना हो गया. पता नहीं, आप ने खुशामद की कला का आनंद लिया है या नहीं, न लिया हो तो कोई बात नहीं, अगर इच्छा हो तो अपने ही शहर के किसी नेतानुमा प्राणी से मिल लीजिएगा या फिर ऐसे शख्स से, जिसे लोग ‘मिठलबरा’ (ऐसा व्यक्ति जो बड़ी ही मधुरता के साथ झूठा व्यवहार करता है) के नाम से जानते हों. ये लोग आप को बताएंगे कि खुशामद रूपी कलाकंद खाने का आनंद कैसे मनाएं?

बहरहाल, खुशामद को अगर कला का दर्जा मिल जाए तो कोई बुराई नहीं. कुछ लोग तो जेब काटने तक को कला मानते हैं. कला हमेशा भला काम ही कराए जरूरी नहीं. क्या कहा, आप खुशामद को कला नहीं, बला मानते हैं? तो भई, आप जैसे लोगों के कारण ही गलतसलत परंपराएं अपना स्थान नहीं बना पातीं.

आज कदमकदम पर खुशामदखोर मिल जाएंगे, चलतेपुर्जे, अपना काम निकालने में माहिर. आप अगर अब तक हम लोगों से कुछ नहीं सीख पाए हैं तो ठीक है, पड़े रहिए अपनी जगह. सारे लोग आप से आगे निकल जाएंगे तो फिर मत कहिएगा कि हम पीछे रह गए. आगे बढ़ना है तो शर्म छोडि़ए और खुशामदखोरी में भिड़ जाइए. शरमाइए मत, उलटे कहिए, ‘खुश-आमद-दीन’. Story In Hindi

Hindi Story: झूठी शान – शौर्टकट काम की वारंटी वाकई काफी शौर्ट होती है!

Hindi Story: सवेरेसवेरे किचन में नाश्ता बना रही निर्मला के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘भई, आजकल तो लड़कियां क्या लड़के भी महफूज नहीं हैं. एक महीने में अपने शहर से 350 बच्चे गायब…’’ आवाज हाल में बैठ कर समाचार देख रहे निर्मला के पति परेश की थी.

निर्मला परेश को नाश्ता दे कर बाहर की ओर बढ़ गई. परेश को मालूम था कि उसे बच्चों की स्कूल की फीस जमा करवाने के लिए जाना है, फिर भी एक बार फर्ज के तौर पर ध्यान से जाने की हिदायत देते हुए नाश्ता करने में जुट गए.

इस पर निर्मला ने भी आमतौर पर दिए जाने वाला ही जवाब देते हुए कहा, ‘‘जी हां…’’ और बाहर का गरम मौसम देख कर बिना छाता लिए ही घर से निकल गई.

निर्मला आमतौर पर रिकशे से ही सफर किया करती, क्योंकि उस के पास और कोई साधन भी न था. स्कूल में सारे पेरेंट्स तहजीब से खुद ही सार्वजनिक दूरी बनाए अपनीअपनी कुरसियों पर बैठे अपना नंबर आने का इंतजार कर रहे थे.

निर्मला का नंबर सब से आखिर में था. उस के अकेलेपन की बोरियत को मिटाने के लिए न जाने कहां से उस की पुरानी सहेली मेनका भी उसी वक्त अपने बेटे की फीस जमा कराने वहां आ टपकी.

चेहरे पर मास्क की वजह से निर्मला ने उसे पहचाना नहीं, पर मेनका ने उस के पहनावे और शरीर की बनावट से उसे झट से पहचान लिया और दोनों में सामान्य हायहैलो के बाद लंबी बातचीत शुरू हो गई. दोनों सहेली एकदूसरे से दोबारा पूरे 5 महीने बाद मिल रही थीं.

यों तो दोनों का आपस में एकदूसरे से दूरदूर तक कोई संबंध नहीं था, पर दोनों के बच्चे एक ही जमात में पढ़ते थे. घर पास होने की वजह से निर्मला और मेनका की मुलाकात कई बार रास्ते में एकदूसरे से हो जाया करती.

धीरेधीरे बच्चों की दोस्ती निर्मला और मेनका तक आ गई. दोनों ही अकसर छुट्टी के समय अपने बच्चों को लेने आते, तब उन की भी मुलाकात हो जाया करती. दोनों एक ही रिकशा शेयरिंग पर लेते, जिस पर उन के बच्चे पीछे बैठ जाया करते.

निर्मला ने मेनका को देख कर खुशी से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे, ये मास्क भी न, मैं तो बिलकुल ही पहचान ही नहीं पाई तुम्हें.’’

पर, असलियत तो यह थी कि वह उस के पहनावे से धोखा खा गई थी, क्योंकि जिस मेनका के लिबास पुराने से दिखने वाले और कई दिनों तक एक ही जैसे रहते. वह आज एक महंगी सी नई साड़ी और कई साजोसिंगार के सामान से लदी हुई थी. इस के चलते उसे यकीन ही नहीं हुआ कि यह मेनका हो सकती?है.

निर्मला ने उस की महंगी साड़ी को हाथ से छूने की चाह से जैसे ही उस की तरफ हाथ बढ़ाया, मेनका ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘अरे भाभी, ये क्या कर रही हो? हाथ मत लगाओ.’’

भले ही मेनका ने सार्वजनिक दूरी को जेहन में रख कर यह बात कही हो, पर उस के शब्द थोड़े कठोर थे, जिस का निर्मला ने यह मतलब निकाला कि ‘तुम्हारी औकात नहीं इस साड़ी को छूने की, इसलिए दूर ही रहो’.

निर्मला ने उस से चिढ़ते हुए पूछा, ‘‘यह साड़ी कहां से…? मेरा मतलब, इतनी महंगी साड़ी पहन कर स्कूल में आने की कोई वजह…?’’

‘‘महंगी… यह तुम्हें महंगी दिखती है. अरे, ऐसी साडि़यां तो मैं ने रोज पहनने के लिए ले रखी हैं,’’ मेनका ने बड़े घमंड में कहा.

निर्मला अंदर ही अंदर कुढ़ने लगी. उसे विश्वास नहीं हुआ कि ये वही मेनका हैं, जो अकसर मेरे कपड़ों की तारीफ करती रहती थी और खुद के ऊपर दूसरे लोगों से हमदर्दी की भावना रखती थी. ये तो कुछ महीनों पहले उम्र से ज्यादा बूढ़ी और बेकार दिखती थी, पर आज अचानक ही इस के चेहरे पर इतनी चमक और रौनक के पीछे क्या वजह है?

पहले तो अपने पति के कुछ काम न करने की मुझ से शिकायत करती थी, पर आज यह अचानक से चमकधमक कैसे? हां, हो सकता है कि विजेंदर भाई को कोई नौकरी मिल गई हो. हो सकता?है कि उन्होंने कोई धंधा शुरू किया हो, जिस में उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ हो या कोई लौटरी लग गई हो तो क्या…?

मैं इतना क्यों सोचने लगी? अब हर किसी की किस्मत एक बार जरूर चमकती है, उस में मुझे इतनी जलन क्यों हो रही है?

जिन के पास पहले पैसा नहीं, जरूरी थोड़े ही न है कि उन के पास कभी पैसा आएगा भी नहीं. भूतकाल की अपनी ही उधेड़बुन में कोई निर्मला को मेनका उस के मुंह के सामने एक चुटकी बजा कर वर्तमान में ले कर आई और कहा, ‘‘अरे भई, कहां खो गईं तुम. लाइन तो आगे भी निकल गई.’’

निर्मला और मेनका दोनों एकएक कुरसी आगे बढ़ गए.

‘‘वैसे, एक बात पूछूं मेनका, तुम्हारी कोई लौटरी वगैरह लगी है क्या?’’ निर्मला ने बड़े ही सवालिया अंदाज में पूछा, जिस का मेनका ने बड़े ही उलटे किस्म का जवाब दिया, ‘‘क्यों, लौटरी वाले ही ज्यादा पैसा कमाते हैं क्या? अब उन्होंने मेहनत के साथसाथ दिमाग लगाया है, तो पैसा तो आएगा ही न?

‘‘अब परेश भाई को ही देख लो, दिनभर अपने साहब के कहने पर कलम घिसते हैं, ऊपर से उन की खरीखोटी सुनते हैं, पूरे दिन खच्चरों की तरह दफ्तर में खटते हैं, फिर भी रहेंगे तो हमेशा कर्मचारी ही.’’

‘‘नहीं, ऐसा नहीं है. मेहनत के नाम पर ये कौन सा पहाड़ तोड़ते हैं सिर्फ दिनभर पंखे के नीचे बैठ कर लिखापढ़ी का काम ही तो करना होता है. इस से ज्यादा आराम और इज्जत की नौकरी और किस की होगी.’’

निर्मला ने मेनका को और नीचा दिखाने की चाह में उस से कहा, ‘‘पढ़ेलिखे हैं. आराम की नौकरी करते हैं. यों धंधे में कितनी भी दौलत कमा लो, पर समाज में सिर्फ पढ़ेलिखे और नौकरी वाले इनसान की ही इज्जत होती?है, बाकियों को तो सब अनपढ़ और गंवार ही समझते हैं.’’

इस पर मेनका अकड़ गई और अपने पास अभीअभी आए चार पैसों की गरमी का ढिंढोरा निर्मला के आगे पीटने लगी.

काउंटर पर निर्मला का नंबर आया. काउंटर पर बैठी रिसैप्शनिस्ट ने फीस  की लंबीचौड़ी रसीद, जिस में दुनियाभर के चार्जेज जोड़ दिए गए थे, निर्मला  को पकड़ाई.

निर्मला ने घर पर पैसे जोड़ कर जो हिसाब लगाया था, उस से कहीं ज्यादा की रसीद देख कर उन की आंखों से धुआं निकल आया. इतने पैसे तो उस के पर्स में भी न थे, पर इस बात को वह सब के सामने जताना नहीं चाहती थी, खासकर उस मेनका के सामने तो बिलकुल नहीं.

मेनका ने कहा, ‘‘मैडम, आप सिर्फ 3 महीने की ही फीस जमा कीजिए, बाकी मैं बाद में दूंगी.’’

तभी निर्मला के हाथ से परची लेते हुए मेनका ने निर्मला पर एहसान करने की चाह से अपने पर्स से एक चैकबुक निकाल अपने और उस के बच्चे की फीस खुद ही जमा कर दी.

निर्मला को यह बलताव ठीक न लगा, जिस के चलते उस ने उसे बहुत मना भी किया.

इस पर मेनका ने कहा, ‘‘अरे, भाईसाहब को जब पैसे मिल जाएं, तब आराम से दे देना. मैं पैनेल्टी नहीं लूंगी,’’ और वह हंसते हुए बाहर की ओर निकल गई.

स्कूल के बाहर निकल कर देखा, तो मालूम हुआ कि छाता न ले कर बहुत बड़ी गलती हुई. गरम मौसम की जगह तेज बारिश ने ले ली. इतनी तेज बारिश में कोई भी रिकशे वाला कहीं जाने को राजी न था.

निर्मला स्कूल के दरवाजे पर खड़ी बारिश रुकने का इंतजार कर रही थी, पर मन में यह भी डर था कि आखिर अभी तुरंत मेरे आगे निकली मेनका कहां गायब हो गई? वह भी इतनी तेज बारिश में.

‘चलो, अच्छा है, चली गई, कौन सुनता उस की ये बातें? चार पैसे क्या आ गए, अपनेआप को कहीं की महारानी समझने लगी. सारे पैसे खर्च हो जाएंगे, तब फिर वही एक रिकशा भी मेरे साथ शेयरिंग पर ले कर चला करेगी.

मन ही मन खुद को झूठी तसल्ली देती निर्मला के आगे रास्ते पर जमा पानी को चीरते हुए एक शानदार काले रंग की कार आ कर रुकी.

गाड़ी का दरवाजा खुला. अंदर बैठी मेनका ने बाहर निर्मला को देखते हुए कहा, ‘‘गाड़ी में बैठो निर्मला. इस बारिश में कोई रिकशे वाला नहीं मिलेगा.’’

निर्मला को न चाहते हुए भी गाड़ी में बैठना पड़ा, पर उस का मन अभी भी यकीन करने को तैयार नहीं था कि यह वही मेनका है, जो पैसे न होने के चलते एक रिकशा भी मुझ से शेयरिंग पर लिया करती थी?

‘‘सीट बैल्ट लगा लो निर्मला,’’ मेनका ने ऐक्सीलेटर पर पैर जमाते हुए कहा.

निर्मला ने सीट बैल्ट लगाते हुए पूछा, ‘‘कब ली? कैसे…? मेरा मतलब कितने की…?’’

‘‘कैसे ली का क्या मतलब? खरीदी है, वह भी पूरे 40 लाख रुपए की,’’ मेनका ने बड़े बनावटी लहजे में कहा.

निर्मला के अंदर ईष्या का भी अंकुर फूट पड़ा. आखिर कैसे इस ने इतनी जल्दी इतने पैसे कमाए, आखिर ऐसा कैसा दिमाग लगाया, विजेंदर भाई ने कि इतनी जल्दी इतने पैसे कमा लिए. और एक परेश हैं कि रोज 13-13 घंटे काम करने के बावजूद मुट्ठीभर पैसे ही ले कर आते हैं, वह भी जब घर के सारे खर्चे सिर पर सवार हों. एक इसी के साथ तो मेरी बनती थी, क्योंकि एक यही तो थी मुझ से नीचे. अब तो सिर्फ मैं ही रह गई, जो रिकशे से आयाजाया करूंगी. इस का भी तो कहना ठीक ही है कि किसी काम में दिमाग लगाए बिना सिर्फ मेहनत करने से जिस तरह गधे के हाथ कभी भी गाजर नहीं आती, उसी तरह हर क्षेत्र में मेहनत से ज्यादा दिमाग लगाना पड़ता है.

विजेंदर भाई ने दिमाग लगाया तो पैसा भी कमाया, वहीं परेश की जिंदगी तो सिर्फ खाने में ही निकल जाएगी, आज ये बना लेना कल वो बना लेना.

अपना घर नजदीक आता देख निर्मला ने सीट बैल्ट खोल दी और उतरने के लिए जैसे ही उस ने दरवाजा खोलना चाहा, उस से उस महंगी गाड़ी का दरवाजा न खुला. इस पर मेनका ने हंसते हुए अपने ही वहां से किसी बटन से दरवाजा अनलौक करते हुए निर्मला को अलविदा किया.

दरवाजा न खुलने वाली बात पर निर्मला को खूब शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा था.

घर पहुंचते ही परेश ने एक पत्रिका में छपी डिश की तसवीर सामने रखते हुए वही डिश बनाने का आदेश दे डाला, जिस पर निर्मला ने परेश पर बिफरते हुए कहा, ‘‘पूरी जिंदगी तुम ने और किया ही क्या है, पूरे दिन गधों की तरह मेहनत करते हो और ऊपर से दफ्तर में बैठेबैठे फरमाइश और कर डालते हो कि आज यह बनाना और कल यह…

‘‘खाने के अलावा कभी सोचा है कि बाकी लोग तुम से कम मेहनत करते हैं, फिर भी किस चीज की कमी है उन्हें. घूमने को फोरव्हीलर हैं, पहनने को ब्रांडेड कपड़े हैं, कुछ नहीं तो कम से कम बच्चों की फीस का तो खयाल रखना चाहिए.

‘‘आज अगर मेनका न होती, तो फीस भी आधी ही जमा करानी पड़ती और बारिश में भीग कर आना पड़ता  सो अलग.’’

परेश समझ गया कि यह सारी भड़ास उस मेनका को देख कर निकाली जा रही है. परेश ने बात को और आगे न बढ़ाना चाहा, जिस के चलते उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा.

दोपहर को गुस्से के कारण निर्मला ने कुछ खास न बनाया, सिर्फ खिचड़ी बना कर परेश और बेटे पारस के आगे रख दी.

परेश चुपचाप जो मिला, खा कर रह गया. उस ने कुछ बोलना लाजिमी न समझा.

रात तक निर्मला ने परेश से कोई बात नहीं की. उस के मन में तो सिर्फ मेनका और उस के ठाटबाट के नजारे ही रहरह कर याद आ जाया करते और परेश की काबिलीयत पर उंगली उठा जाते.

डिनर का वक्त हुआ. परेश ने न तो खाना मांगा और न ही निर्मला ने पूछा. देर तक दोनों के अंदर गुस्से का जो गुबार पनपता रहा, मानो सिर्फ इंतजार कर रहा हो कि सामने वाला कुछ बोले और मैं फट पडं़ू.

दोनों को ज्यादा इंतजार न कराते  हुए ठीक उसी वक्त भूख से बेहाल  बेटा पारस निर्मला से खाने की मांग करने लगा.

पारस को डिनर के रूप में हलका नाश्ता दे कर निर्मला ने परेश पर तंज कसते हुए कहा, ‘‘बेटा, आज घर में कुछ था ही नहीं बनाने को, इसीलिए कुछ नहीं बनाया. तू आज यही खा ले, कल देखती हूं कुछ.’’

परेश ने हैरानी से पूछा, ‘‘घर में कुछ था नहीं और तुम ने मुझे बताया क्यों नहीं? आखिर किस बात पर तुम ने दोपहर से अपना मुंह सिल रखा है और सुबह क्या देखोगी तुम?’’

‘‘मैं ने नहीं बताया और तुम ने क्या सिर्फ खाने का ठेका ले रखा है? सब से ज्यादा जीभ तुम्हारी ही चलती है, तो इंतजाम देखना भी तो तुम्हारा ही फर्ज बनता है न? और वैसे भी मालूम नहीं हर महीने राशन आता है, तो इस महीने कौन लाएगा?’’

परेश बेइज्जती के ये शब्द बरदाश्त न कर सका. इस वजह से वह उस रात भूखा ही सोया रहा मगर निर्मला से कुछ बोला नहीं.

सवेरे होते ही राशन के सामान से भरा हुआ एक थैला जमीन पर पटक कर उस में से जरूरी सामान निकाल कर परेश खुद ही अपने और बेटे पारस के लिए चायनाश्ता बनाने में जुट गया.

रसोई के कामों से फारिग हो कर दोनों बापबेटे सोफे पर बैठ कर नाश्ता करने में मगन हो गए.

परेश रोज की तरह समाचार चैनल लगा कर बैठ गया. आज सब से बड़ी खबर की हैडलाइन देख कर उस के होश उड़ गए और उस से भी ज्यादा उस के पीछे से गुजर रही निर्मला के.

सब से बड़ी खबर की हैडलाइन में लिखा था, ‘शहर में पिछले महीनों से गायब हो रहे बच्चों के केस का आरोपी शिकंजे में, जिस का नाम विजेंदर बताया जा रहा है. कल ही चौक से एक बच्चे को बहला कर अगुआ करते हुए वह पकड़ा गया.’

मुंह काले कपड़े से ढका हुआ था, पर इतनी पुरानी पहचान के चलते परेश और निर्मला को आरोपी को पहचानते देर न लगी.

निर्मला को अपनी गलती का एहसास हो चुका था. वह जान चुकी थी कि जल्दी से जल्दी ज्यादा ऐशोआराम पाने के चक्कर में लोगों को कोई शौर्टकट ही अपनाना पड़ता है, जिस काम की वारंटी वाकई में काफी शौर्ट होती है.

आज अपनी मरजी से ही निर्मला ने दोपहर का खाना परेश की पसंद का बनाया था, जिस की उसे कल तसवीर दिखाई गई थी. Hindi Story

Family Story In Hindi: घर का सादा खाना – प्रिया की उलझन

Family Story In Hindi: अनिल और बच्चे शुभम व शुभी औफिस चले गए तो प्रिया कुछ देर बैठ कर पत्रिका के पन्ने पलटने लगी. अचानक नजर नई रैसिपी पर पड़ी. पढ़ते ही मुंह में पानी आ गया. सामग्री देखी. सारी घर में थी. प्रिया को नईनई चीजें ट्राई करने का शौक था.

खानेपीने का शौक था तो ऐक्सरसाइज कर के अपने वेट पर भी पूरी नजर रखती थी. एकदम बढि़या फिगर थी. कोई शारीरिक परेशानी भी नहीं थी. वह अपनी लाइफ से पूरी तरह संतुष्ट थी. बस आजकल अनिल और बच्चों पर घर का सादा खाना खाने का भूत सवार था.

प्रिया अचानक अपने परिवार के बारे में सोचने लगी. अनिल हमेशा से बिग फूडी रहे हैं पर अब अचानक अपनी उम्र की, अपनी सेहत की कुछ ज्यादा ही सनक रहने लगी है. हैल्दी रहने का शौक तो पूरे परिवार को है पर यह कोई बात थोड़े ही है कि इंसान एकदम उबली सब्जियों पर ही जिंदा रहे और वह भी तब जब कोई तकलीफ भी न हो. उस पर मजेदार बात यह हो कि औफिस में सब चटरपटर खा लें पर घर पर कुछ टेस्टी बन जाए तो सब की नजर तेल, मसाले, कैलोरीज पर रहे.

अब टेस्टी चीजें कैलोरीज वाली होती हैं तो प्रिया की क्या गलती है. उस के पीछे पड़ जाते हैं सब कि कितना हैवी खाना बना दिया है. आप को पता नहीं कि हैल्दी खाना चाहिए. भई, मुझे तो यह भी पता है कि कभीकभी खा भी लेना चाहिए. इस बात पर आजकल प्रिया का मूड खराब हो जाता है. भई, तुम लोग इतने हैल्थ कौंशस हो तो औफिस में भी उबला खाओ.

शाम को कभी किसी से पूछ लो कि आज औफिस में क्या खाया तो ऐसीऐसी चीजें बताई जाती हैं कि प्रिया की नजरों के सामने घूम जाती हैं और उस के मुंह में पानी आ जाता है.

मन में दुख होता है कि मैं जब मूंग की दाल और लौकी की सब्जी खा रही थी, तो ये लोग पिज्जा और बिरयानी खा रहे थे और अनिल का यह ड्रामा रहता है कि टिफिन घर से ही ले कर जाना है, उन्हें घर का सादा खाना ही खाना है.

वह सुबह उठ कर 3-3 हैल्दी टिफिन तेयार करती है और शाम को पता चलता है कि लजीज व्यंजन उड़ाए गए हैं. खून जल जाता है प्रिया का. यह उस की गलती है न कि वह एक हाउसवाइफ है, घर में रहती है, रोज बाहर जा कर कभी कुछ डिफरैंट नहीं खा पाती. उसे तो वही खाना है न जो टिफिन के लिए बना हो. वह कहां जा कर अपना टेस्ट बदले.

किट्टी पार्टी एक दिन होती है, अच्छा लगता है. आजकल तो कभी जब वीकैंड में बाहर खाना खाने जाते हैं, तो प्रिया मेनू कार्ड देखते हुए मन ही मन एक से एक बढि़या नई डिशेज देख ही रही होती है कि अनिल फरमाते हैं कि सूप और सलाद खाते हैं. प्रिया को तेज झटका लगता है. सूप तो पसंद है उसे पर सलाद? यह क्या है, क्यों हो रहा है उस के साथ ऐसा?

पास्ता, वैज कबाब, कौर्न टिक्की और दही कबाब, जो उस की जान हैं, इन में आजकल अनिल को ऐक्स्ट्रा तेल नजर आ रहा है. भई, जब वह अब तक अपने परिवार की हैल्थ का ध्यान रखती आई है तो फिर कभीकभी तो ये सब खाया जा सकता है न? सलाद खाने तो वह नहीं आई है न 20 दिन बाद बाहर?

बच्चों ने भी जब अनिल की हां में हां मिलाई तो प्रिया सुलग गई और सूप व सलाद खाती रही. मन में तो यही चल रहा था कि ढोंगी लोग हैं ये. यह शुभम अभी 2 दिन पहले अपने फ्रैंड्स के साथ बारबेक्यू नेशन में माल उड़ा कर आया है और यह शुभी की बच्ची औफिस में तरहतरह की चीजें खा कर आती है.

शाम को घर आ कर कहती है कि मौम, डिनर हलका दिया करो, स्नैक्स हैवी हो जाते हैं. अरे भई, मेरी भी तो सोचो तुम लोग, घर का सादा खाना खाने का गाना मुझे क्यों सुनाते हो… मेरी जीभ रो रही है… अब क्या टेस्टी, मजेदार खाना खाने के लिए तुम लोगों को सचमुच रो कर दिखाऊं… अगर अच्छीअच्छी चीजें खाने के लिए सचमुच किसी दिन रोना आ गया न मुझे तो पता है मुझे, सारी उम्र मेरा मजाक उड़ाया जाएगा.

अभी अनिल की 5 दिन की मीटिंग थी. रोज शानदार लंच था. सुबह ही बता जाते कि शाम को कुछ खिचड़ी टाइप चीज बना कर रखना. कुछ दिन लंच बहुत हैवी रहेगा. मेरी आंखों में आंसू आतेआते रुके. शुभम और शुभी वीकैंड में अपने दोस्तों के साथ बाहर ही लाइफ ऐंजौय कर लेते हैं. बचा कौन? मैं ही न?

अब खाने के लिए रोना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा है पर क्या करे, मन तो होता है न कभीकभी कुछ बाहर टेस्टी खाने का… कभीकभी अनहैल्दी भी चलता है न… यहां तक कि इन तीनों ने चाट खाना भी बंद कर दिया है, क्योंकि तीनों का औफिस में कुछ न कुछ बाहर का खाना हो ही जाता है.

अब बताइए, 6 महीनों में कभी छोलों के साथ भठूरे नहीं बन सकते? पर नहीं, रात में जैसे ही छोले भिगोती हूं, तीनों में से कोई भी शुरू हो जाता है कि भठूरे मत बनाना, बस रोटी या राइस… मन होता है छोलों का पतीला बोलने वाले के सिर पर पलट दूं… यह जरूरी क्यों हो कि घर में बस सादा ही खाना बने?

घर में भी तो कभी टेस्ट चेंज किया जा सकता है न?

पता नहीं तीनों कौन से प्लैनेट के निवासी बनते जा रहे हैं. यही फलसफा बना लिया है कि घर में खाएंगे तो सादा ही (बाकी माल तो बाहर उड़ा ही लेंगे.

पिछली किट्टी पार्टी में अगर अंजलि के घर खाने में पूरियां न होतीं, तो पूरियां खाए उसे साल हो जाता. बताओ जरा, उत्तर भारतीय महिला को अगर पूरियां खाए साल हो रहा हो तो यह कहां का न्याय है? अब कभी रसेदार आलू की सब्जी या पेठे की सब्जी, रायते के साथ पूरी नहीं खा सकते क्या? अहा, मन तृप्त हो जाता था खा कर. अब ये ढोंगी लोग कहते हैं कि हमारे लिए तो रोटी ही बना देना. अब अपने लिए 2-3 पूरियों के लिए कड़ाही चढ़ाती अच्छी लगूंगी क्या?

बस अब प्रिया के हाथ में था गृहशोभा का सितंबर, द्वितीय अंक और रैसिपी थी सामने गोभी पकौड़ा और अचारी मिर्च पकौड़ा. 2-3 बार दोनों रैसिपीज पढ़ीं. मुंह पानी से भर गया. पढ़ कर ही इतना खुश हुआ दिल… खा कर कितना मजा आएगा… बहुत हो गया घर का सादा खाना और सब से अच्छी बात यह है कि गोभी, समोसे बेक करने का भी औप्शन था तो वह बेक कर लेगी. तीनों कम रोएंगे, थोड़ा पुलाव भी बना लेगी, परफैक्ट, बस डन.

तीनों लगभग 8 बजे आए. आज प्रिया का चेहरा डिनर के बारे में सोच कर ही चमक रहा था. वैसे तो बनातेबनाते भी 2-3 समोसे खा चुकी थी… मजा आ गया था. पेट और जीभ बेचारे थैंक्स ही बोलते रहे थे जैसे तरसे हुए थे दोनों मुद्दतों से…

चारों इकट्ठा हुए तो प्रिया ने ‘आज फिर जीने की तमन्ना है…’ गाना गाते हुए खाना लगाया तो तीनों ने टेबल पर नजर दौड़ाई. अनिल के माथे पर त्योरियां पड़ गईं, ‘‘फ्राइड समोसे डिनर में? प्रिया, क्यों तुम सब की हैल्थ के लिए केयरलैस हो रही हो?’’

‘‘अरे, समोसे बेक्ड हैं, डौंट वरी.’’

‘‘पर मैदे के तो हैं न?’’

प्रिया का मन हुआ बोले कि कल जो पिज्जा उड़ाया था वह किस चीज का बना था? पर लड़ाईझगड़ा उस की फितरत में नहीं था. इसलिए चुप रही.

शुभम ने कहा, ‘‘मां, पकौड़े तो फ्राइड हैं न? मैं सिर्फ पुलाव खाऊंगा.’’

प्रिया ने शुभी को देखा, तो वह बोली, ‘‘मौम, आज औफिस में रिया ने बहुत भुजिया खिला दी… अब भी खाऊंगी तो बहुत फ्राइड हो जाएगा… मैं पुलाव ही खाऊंगी.’’

डिनर टाइम था. सब सुबह के गए अब एकसाथ थे. शांत रहने की भरसक कोशिश करते हुए प्रिया ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम लोग सिर्फ पुलाव खा लो,’’

अनिल ने एक समोसा उस का मूड देखते हुए चख लिया, बच्चों ने पुलाव लिया. प्रिया ने जब खाना शुरू किया, सारा तनाव भूल उस का मन खिल उठा. जीभ स्वाद ले कर जैसे लहलहा उठी. आंसू भर आए, इतना स्वादिष्ठ घर का खाना. वाह, कितने दिन हो

गए, वह खुद रोज कौन सा तलाभुना खाना चाहती है, पर घर में भी कभी कुछ स्वादिष्ठ बन सकता है न… महीने में एक बार ही सही, पर यहां तो हद ही हो गई थी. वह जितनी देर खाती रही, स्वाद में डूबी रही. उस ने ध्यान ही नहीं दिया कौन क्या खा रहा है. उस का तनमन संतुष्ट हो गया था.

सब आम बातें करते रहे, फिर अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए. उस दिन जब प्रिया सोने के लिए लेटी, वह मन ही मन बहुत कुछ सोच चुकी थी कि नहीं करेगी वह सब के लिए इतनी चीजों में मेहनत, उसे कभीकभी अकेले ही खाना है न, ठीक है, उस का भी जब मन होगा, खा लेगी. बस एक फोन करने की ही देर है. अपने लिए और्डर कर लिया करेगी… यह बैस्ट रहेगा. उसे कौन सा कैलोरीज वाला खाना रोज चाहिए… कभीकभी ही तो मन करता है न… बस प्रौब्लम खत्म.

उस के बाद प्रिया यही करने लगी. कभी महीने में एक बार अपने लिए पास्ता और्डर कर लिया, कभी सिर्फ स्टार्टर्स और घर में सब खुश थे कि घर में अब सादा खाना बन रहा है. प्रिया तो बहुत ही खुश थी.

उस का जब जो मन होता, खा लेती थी. अपने प्यारे, ढोंगी से लगते अपनों के बारे में सोच कर उसे कभी हंसी आती थी, तो कभी प्यार, क्योंकि उन के निर्देश तो अब भी यही होते थे कि बाहर हैवी हो जाता है, घर में सादा ही बनाना. Family Story In Hindi

Hindi Family Story: चीनी कम – जो आज की सोचे, जीत उसी की!

Hindi Family Story: ‘‘ढेर सारे पकवान बनाए हैं मैं ने, बहुतकुछ बाजार से भी मंगवा रखा है. तुम्हारा दोस्त निराश नहीं होगा. विकेश तुम्हारा दोस्त है, तो मेरे लिए भी कुछ है न.’’

‘‘कुछ…’’ बृजेश के कान खड़े हो गए, ‘‘तुम उसे पहले से जानती हो क्या?’’

‘‘अरे नहीं जी, मैं तो उसे पहली बार देखूंगी. तुम बेकार की बकवास सोचने लगे,’’ सरला हंसते हुए बृजेश को रसोईघर में ले गई. वहां दहीबड़े, समोसे, रसगुल्ले और गुलाबजामुन से ले कर छोलेभटूरे तक का इंतजाम था. कई तरह की नमकीन, पापड़ और मिठाइयां भी थीं. आखिर बड़े लोगों की किट्टी पार्टी जो ठहरी. सरला घर बैठे ही चिटफंड वगैरह चला कर अच्छी कमाई भी कर लेती है, फिर एक दिन सब को बढि़या खिलानेपिलाने में हर्ज किस बात का था.

अब यह इत्तिफाक की बात थी कि बृजेश का दोस्त विकेश शाम को 4 बजे आने वाला था. किट्टी पार्टी तो 6 बजे से थी. तब तक तो वह आराम से उसे खिलापिला कर विदा कर सकती थी.

तय समय पर बृजेश अपने दोस्त विकेश के साथ आया, तो सरला ने उस का भरपूर स्वागत किया. बृजेश फ्रैश होने के लिए बाथरूम चला गया.

नमस्ते करने के बाद सरला सीधे अपने मतलब पर आ गई, ‘‘अरे भाई साहब, आप इतनी बड़ी एयरलाइंस कंपनी में पायलट हैं. आप को तो अच्छी तनख्वाह मिलती होगी. तो आप को अपनी आमदनी का एक हिस्सा बचत के लिए भी इंवैस्ट करना चाहिए.

‘‘देखिए, मैं एक इंश्योरैंस सर्विस की एजेंट हूं और चाहती हूं कि आप अपनी बचत को मेरी इस कंपनी में लगाएं.’’

‘‘अरे भाभीजी, ऐसा कुछ नहीं है…’’ विकेश हंसते हुए बोला, ‘‘मेरी कंपनी दिवालिया हो चुकी है और मुझे 6 महीने से तनख्वाह भी नहीं मिली है. इस से आप मेरी हालत का अंदाजा लगा सकती हैं. मैं तो आप के शहर में एक इंटरव्यू के सिलसिले में आया हूं. बृजेश मेरा बचपन का दोस्त है. उस ने इतना कहा, इसलिए मैं मिलने चला आया.’’

विकेश की इस बात से सरला के भाव एकदम से बदल गए थे. वह सपाट चेहरा लिए वहां से उठी और अपने कमरे में चली गई.

उधर ड्राइंगरूम में दोनों दोस्त दुनियाजहान की बातें करते रहे.

अचानक बृजेश को कुछ खयाल आया. वह उठ कर सरला के पास आ कर बोला, ‘‘अरे, मेरा दोस्त बैठा है. कुछ चायपानी तो दो.’’

सरला उठी. चाय बना कर ट्रे में कुछ बिसकुट के साथ ड्राइंगरूम में रख आई.

चाय पीते हुए विकेश बोला, ‘‘चाय में चीनी कम है. तुम्हें ब्लड शुगर तो नहीं, जो चीनी कम लेते हो?’’

बृजेश ने चाय का घूंट भरा, तो उसे महसूस हुआ कि चाय फीकी लग रही है. वह हंसते हुए बोला, ‘‘दरअसल, सरला तुम्हें बढि़या मिठाई खिलाना चाहती है, इसलिए उस ने चाय में कम चीनी डाली है. रुको, मैं उसे चीनी लाने को कहता हूं.’’

‘‘अरे छोड़ो यार, चीनीवीनी…’’ विकेश हंसते हुए बाला, ‘‘मैं तो बस ऐसे ही मजाक कर रहा था.’’

चाय के दौर में पहले एक घंटा हुआ, फिर दूसरा घंटा भी बीत रहा था. मगर सरला का कहीं पता नहीं था. बृजेश इस बीच 1-2 बार टहल कर देख चुका था कि सरला शायद अब कुछ खाने को लाएगी. मगर वह जब भी बैडरूम में गया, वह अपने मोबाइल फोन में मसरूफ थी.

‘‘अब मैं चलूंगा यार…’’ विकेश अपनी घड़ी देखते हुए बोला, ‘‘2 घंटे कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला.’’

बृजेश विकेश से हाथ मिला कर उसे बाहर तक छोड़ने आया. जब वह अंदर आया तो सरला से पूछ बैठा, ‘‘अरे, इतने सारे पकवान बनाए थे तुम ने, कुछ ला कर दिया क्यों नहीं? क्या सोचता होगा वह. चाय में चीनी भी कम थी…’’ बृजेश नाराजगी जताते हुए बोला, ‘‘वह मेरा बचपन का दोस्त है. उस के घर में जब भी मैं जाता था, तो उस की मां मुझे बिना खाना खिलाए वापस नहीं आने देती थीं.’’

‘‘तो क्या हुआ…’’ सरला मुंह बना कर बोली, ‘‘बचपन की बात और होती है.’’

‘‘क्या हुआ…’’ बृजेश गुस्से में बोला, ‘‘अरे, वह मेरे बारे में क्या सोचता होगा.’’

‘‘सोचेगा क्या…’’ सरला बोली, ‘‘मैं समझती थी कि इतनी बढि़या नौकरी करने वाला शख्स है, तो मेरी कंपनी की कोई पौलिसी वगैरह लेगा. लेकिन उस को तो खुद खाने के लाले पड़े हैं. ऐसे आदमी को क्या खिलानापिलाना?’’

बृजेश यह सुन एकदम से सन्न रह गया. अपनी आवाज में कठोरता लाते हुए वह बोला, ‘‘ओहो, तो तुम ऐसा सोचती हो, मगर मैं तो कंगाल नहीं हुआ था,

जो तुम ने जानबूझ कर उसे कुछ खिलायापिलाया नहीं. चाय में चीनी कम डाल कर बेइज्जत करने की कोशिश भी की. क्या सोच रहा होगा वह?’’

‘‘अब जो सोचे…’’ सरला मुंह बना कर उठते हुए बोली, ‘‘मुझे रसोईघर में बहुत काम है. मेरी सहेलियां आती ही होंगी.’’

‘‘वह तो ठीक है…’’ बृजेश बोला, ‘‘अगर मेरी नौकरी चली गई होती और कोई मेरे साथ ऐसा बरताव करता, तो तुम्हें कैसा लगता?’’

सरला बोली, ‘‘फिर की फिर देखेंगे. जो आज की सोचता है, जीत उसी की होती है. मैं फालतू लोगों पर समय और पैसा नहीं खर्च कर सकती. यह सामान तो उन सहेलियों के लिए है, जो मेरी चिटफंड और इंश्योरैंस पौलिसी में पैसा देती हैं. मेरे लिए हर बार नया आसामी लाती हैं.’’ Hindi Family Story

Best Hindi Kahani: अलीशेर – एक मुसलमान जो रामलीला में बनता था राम

Best Hindi Kahani: मेला वाली बारी में रामलीला का मेला था. वह जगह बहुत साफसुथरी और हरीभरी थी. चारों तरफ ऊंचेऊंचे पहाड़नुमा भीटे और लंबेलंबे खड़े पेड़ थे. बीच में एक सुंदर तालाब था. एक तरफ रामलीला वाली जगह थी, जहां रामलीला करने वाले लोग राम, लक्ष्मण, सीता और रावण आदि का स्वांग करते थे.

पहले गांव का हिसाब ही अलग था. राम का रोल कोई भी गोराचिट्टा लड़का अदा कर लेता था और सीता का रोल भी कोई कमसिन लड़का, जिसे दाढ़ीमूंछ न आई हो, अदा करता.

इस में हिंदू या मुसलमान होने के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता था. जो भी अच्छी तरह रामलीला का पाठ याद कर उस का सही स्वांग कर लेता, उसे वह रोल दे दिया जाता था. लोग इसे सिर्फ नाटक समझते थे और उसे नाटक की तरह करते थे.

हां, राम का रोल हमेशा अलीशेर अदा करते थे. समय के हिसाब से हर रोल आगेपीछे हो जाते थे या बदल दिए जाते थे, लेकिन अलीशेर को हमेशा रामलीला में राम बनाया जाता था, क्योंकि अलीशेर एक खूबसूरत जवान थे और उन्हें राम का पाठ जबानी याद था. जब सिर पर मुकुट लगाए वह स्टेज पर आते तो लोग मोहित हो जाते थे.

एक बार तो ऐसा भी हुआ कि राम और रावण दोनों का पाठ करने वाले मुसलमान ही थे, क्योंकि जिन लोगों को नौकरी मिल गई, वे शहर चले गए और गांव में एक मेहमान की तरह आने लगे.

लेकिन बाद में गांव का माहौल बदलने लगा. मुसलमानों का एक तबका रामलीला में मुसलिम नौजवानों व बच्चों के शामिल होने का विरोध करने लगा. मुल्लों ने फतवा जारी कर के इसे मजहब के खिलाफ बताया. फतवे में रामलीला में भाग लेना तो दूर इसे देखना भी गलत कहा गया.

इस फतवे का लोगों पर बुरा असर पड़ा. रात में रामलीला देखने वालों की संख्या कुछ कम हो गई. फिर भी रामलीला देखने के लिए मुसलमान बच्चे जाते रहे, लेकिन चोरीछिपे, खुलेआम नहीं.

अलीशेर के डीलडौल का गांव में कोई नौजवान नहीं था और उस पर वर्षों का अभ्यास, सारे पाठ जबानी याद. अत: जब भी राम का रोल उन्हें दिया गया, बिना रोकटोक के उन्होंने कर दिया. उन्होंने मुल्लेमौलवियों के फतवे की परवाह नहीं की और न उन्हें मुसलिम बिरादरी से बाहर कर दिए जाने का डर था. वे इसे गांव की इज्जत वाली बात मान कर एक कलाकार की तरह रामलीला में भाग लेते रहे.

वे हफ्ते में केवल जुमा की नमाज पढ़ते थे, वे भी आखिरी कतार में क्योंकि रामलीला के दिनों में वे मुसलमानों के बीच एक अच्छाखासा तमाशा बन जाते थे. कोईकोई तो उन्हें मसजिद में ही छेड़ देता, ‘‘अरे भाई रामचंद्रजी, आप यहां कैसे? रामचंद्रजी मुसलमान तो थे नहीं.’’ कोई दूसरा कहता, ‘‘अब तो इन्हें मंदिर में भी जगह नहीं मिलेगी…’’

वे चुपचाप किसी का जवाब दिए बगैर मसजिद से बाहर निकल जाते. उन्हें रामचंद्रजी का रोल एक खेल सा लगता और यह खेल वे गांव की इज्जत के लिए खेलते थे ताकि सारे इलाके में उन के गांव की धूम मच जाए.

कुछ दिनों के बाद हिंदुओं में एक नई पार्टी उभरी, जिस का नाम था ग्राम युवक संघ. उस ने सब से पहला काम यह किया कि अलीशेर को हमेशा के लिए रामलीला मंडली से बाहर निकाल दिया, क्योंकि वे मुसलमान थे और उन की जगह एक हिंदू को रखा गया.

अलीशेर तो कहीं के भी न रहे. मुसलमानों के बीच तो पहले ही मजाक विरोधी काम करने वाले के रूप में नफरत की निगाह से देखे जाते थे. अब बचे हिंदू, सो उन्होंने भी अलीशेर को दूध की मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक दिया. अब वे जाते भी तो किधर जाते. जहां जाते लोग उन का मजाक उड़ाते, ‘बेटा न राम के, न रहीम के… किधर जाओगे? बेहतर है, कलमा पढ़ कर दोबारा मुसलमान बन जाओ…’ या इसी तरह कुछ लोग कहते, ‘यार, तुम हिंदू हो जाओ. पहले भी तो तुम्हारे बापदादा हिंदू ही थे,’ अलीशेर इन तमाम बातों का जवाब केवल खामोशी से देते.

अलीशेर खानदानी जमींदार थे, लेकिन उन के चाचा के लड़कों ने चकबंदी में उन की अच्छी जमीन हथिया ली. बदले में उन्हें जो जमीन मिली, वह ऊसर थी. गरीबी की वजह से धीरेधीरे वह जमीन भी बिक गई.

अब उन्हें कोई सहारा नहीं था, इसलिए गांव में लोगों के गायबैल चराने लगे. इस के बदले उन्हें नाश्ता और खाना मिलने लगा. इस के अलावा वे गांव में फेरी भी लगाने लगे. वे कभी अमरूद, कभी कटहल और कभी गुड़ की ‘लकठो’ मिठाई बेचते.

गांव के बच्चों ने उन का नाम रखा था ‘राम मियां.’ बस वे इसी नाम से मशहूर हो गए. गांव के चाहे जिस छोर पर पूछिए, लोग बता देंगे. राम मियां के बाद महल्ले का नाम बताना जरूरी नहीं था.

जब उस दिन रामलीला का मेला लगा तो अलीशेर को बहुत बुरा लगा. कारण कि वह हिंदू लड़का जो राम बना था, लड़कियों जैसी आवाज में रामजी का संवाद बोलने लगा. खैर, अब तो वे बिलकुल इन चीजों से अलग हो चुके थे.

अलीशेर ने रामलीला मेले में तसवीरों की दुकान लगाने का निश्चय किया. कारण कि यदि तसवीर की कीमत 10 रुपए होगी, तो वह मेले में आसानी से 20 रुपए में बिक जाएगी.

बनारस जा कर अलीशेर ने बहुत सारी तसवीरें खरीदीं. राम की तसवीर, कृष्ण की तसवीर, गुरुनानक देव की तसवीर, दरगाह अजमेर शरीफ की तसवीर, मक्कामदीना की तसवीर और कुछ फिल्मी अभिनेताओं की तसवीरें. जब मेला आरंभ हुआ तो उस दुकान पर बच्चों की भीड़ लग गई. एकएक कर के सारी तसवीरें बिक गईं.

अलीशेर को अच्छा फायदा हुआ. बच्चे तो बच्चे होते हैं. उन्हें जो अच्छा लगा खरीद लिया. यदि अलीशेर से यह पूछा जाए कि कौन बच्चा कौन सी तसवीर ले गया, तो वे इस का जवाब नहीं दे सकते थे, क्योंकि भीड़ के आगे उन्हें अपनी तसवीरों को संभाल पाना भी मुश्किल हो गया था.

सूरज डूबने के बाद मेला उठने लगा. अलीशेर को दुकान से अच्छी आमदनी हुई. वह अपनी दुकान बंद कर के ज्यों ही नहर की पगडंडी पर पहुंचे, तो कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया, ‘‘अलीशेर मियां, आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी,’’ एक ने कहा.

‘‘तुम ने हमारे बच्चों को मक्कामदीना और अजमेर शरीफ की तसवीरें क्यों दीं? आखिर उन को इस से क्या लेनादेना. वे मुसलमान तो हैं नहीं,’’ दूसरे आदमी ने कहा.

‘‘अलीशेर भाई, आप ऐसे तो न थे. जरूर इस में किसी विदेशी देश का हाथ होगा. आप ही बताइए कि यदि आप के बच्चों को हम देवीदेवता की तसवीर दें, तो आप को कैसा लगेगा?’’ तीसरे ने कहा.

और इस के बाद कुछ लोगों का मुंह उन की तरफ चिल्लाते हुए दौड़ा, ‘मारोमारो…’ और फिर अलीशेर के ऊपर लाठियों का बरसना तब तक जारी रहा, जब तक वे मर नहीं गए. अलीशेर को अपनी सफाई में कुछ कहने का भी मौका नहीं दिया गया.

पुलिस की जांचपड़ताल के दौरान गांव के लोगों ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. जिस गांव ने 10 साल तक अलीशेर को रामलीला में राम का पाठ करते हुए देखा था, उस दिन उस गांव का एक बच्चा भी उन्हें पहचान न सका. हां, एक पास के गांव का बच्चा, जो उस समय भी उन से खरीदी हुई तसवीर लिए उन्हें घूर रहा था, पुलिस के सामने आया और बोला, ‘‘मैं इन का नाम जानता हूं. इन का नाम है, राम मियां. सारे बच्चे इन्हें इसी नाम से पुकारते हैं.’’

बच्चे की बात सुनते ही पुलिस वाले को क्रोध आया और उस ने बच्चे को एक भद्दी सी गाली दी और कहा, ‘‘राम कब से मियां हो गए?’’

जो मरा उस का नाम एक सच था, जिस बच्चे ने उस का नाम बताया, वह भी एक सच था और पुलिस वाला, जिसे क्रोध आया, वह भी एक सत्य था. सबकुछ सच होते हुए भी एक आदमी की लाश लावारिस पड़ी थी, दूरदूर तक अजीब सी हवा बह रही थी. Best Hindi Kahani

Story In Hindi: अफसोस – बाबा के चंगुल में शादीशुदा सायरा

Story In Hindi: सायरा की शादी अब्दुल से  5 साल पहले हुई थी. अब्दुल की उम्र उस समय 30 साल थी और सायरा की उम्र सिर्फ 20 साल. अब्दुल देखने में सीधासादा, सांवले रंग का था, पर एक अच्छीखासी जायदाद का मालिक भी था. यही वजह थी कि सायरा और उस की मां ने अब्दुल को पसंद किया था.

शादी से पहले ही सायरा ने अब्दुल को अच्छी तरह देखभाल लिया था, जबकि सायरा के बाप और भाई इस शादी के खिलाफ थे. लेकिन सायरा और उस की मां की जिद के आगे उन की एक न चली और जल्द ही वे दोनों शादी के रिश्ते में बंध गए.सायरा जैसी बीवी पा कर अब्दुल की खुशी का ठिकाना न रहा. हो भी क्यों न… सायरा थी ही बला की खूबसूरत. उस के सुर्ख गुलाबी होंठ ऐसे लगते थे मानो गुलाब की पंखुड़ी खिलने के लिए बेताब हो.

जब सायरा हंसती थी तो उस सफेद दांत ऐसे लगते थे मानो मुंह से मोती बिखर रहे हों. लंबे, काले और घने बालों ने तो उस की खूबसूरती में चार चांद लगा दिए थे. उस की पतली कमर और गदराए बदन का तो कहना ही क्या था.शादी को अभी 4 साल ही गुजरे थे कि उन के घर में 3 बच्चों की किलकारियां गूंज चुकी थीं. सायरा की मां भी अपनी बेटी के साथ मुंबई में रहने के लिए आ गई थी.अब्दुल की दुकान भी बढि़या चल रही थी. घर में किसी बात की कोई कमी न थी.

अभी भी अब्दुल सायरा के साथ किराए के घर में रह रहा था, क्योंकि मुंबई में घर खरीदना इतना आसान न था. पर अब्दुल की कमाई इतनी थी कि बच्चों की अच्छी परवरिश और अच्छा खानपान आसानी से हो रहा था.पर एक बात बड़ी अजीब थी.

अब्दुल को देख कर कभी सायरा की दोस्त तो कभी सायरा के रिश्तेदार उसे यह तंज कसते रहते थे कि ‘तुम ने अब्दुल में क्या देख कर शादी की… कहां वह सांवला और बदसूरत, इतनी बड़ी उम्र का और कहां तुम बिलकुल हीरोइन सी खूबसूरत’.शुरूशुरू में तो सायरा उन सब की बातों को नजरअंदाज करती रही, लेकिन बारबार सब से यही बातें सुनसुन कर उस के भी दिल में भी अब्दुल के लिए नफरत जागने लगी. अब वह अब्दुल से कटीकटी सी रहने लगी.

एक दिन सायरा की मां ने उसे मशवरा दिया कि अब्दुल अपने गांव की सारी जमीन बेच दे और यहां मुंबई में अपना बड़ा फ्लैट खरीद ले. सायरा ने जैसे ही यह बात अब्दुल के सामने रखी, वह तुरंत तैयार हो गया और गांव जा कर अपने अब्बा और भाइयों से अपने हिस्से को बेचने की बात कही.

अब्दुल के अब्बा और भाइयों ने उसे काफी समझाया, पर उस ने किसी की न सुनी और अपनी बात पर अटल रहा. जल्द ही उस के अब्बा को उस के आगे झुकना पड़ा और अपना बाग, खेत और उस के हिस्से की दुकान बेचनी पड़ी. इस जल्दबाजी के सौदे में अब्दुल के भाई को काफी नुकसान उठाना पड़ा.

अब्दुल ने वापस आ कर मुंबई में  2 कमरों का फ्लैट खरीद लिया. कुछ महीनों तक तो सबकुछ सही चला, पर अब सायरा के दोस्तों की तादाद बढ़ चुकी थी. सायरा की मां भी ब्यूटीपार्लर जा कर स्मार्ट बन कर रहने लगी. अब आएदिन घर पर कोई न कोई इन दोनों की दोस्त आती रहती थीं और अब्दुल को देख कर उस पर तंज कसती रहती थीं.

अब तो खुद सायरा और उस की मां भी अब्दुल का मजाक उड़ाने में पीछे नहीं रहती थीं. अब्दुल इतना ज्यादा बेवकूफ था कि उस ने सायरा को तो पूरी आजादी दे रखी थी और खुद दिनरात काम में इतना बिजी रहता था कि उसे अपने हुलिए को सुधारने का भी खयाल नहीं आता था.

यही वजह थी कि सायरा धीरेधीरे उस से दूर होती जा रही थी. वह चाहती थी कि अब्दुल उस के नाम घर कर दे, पर अब्दुल तैयार न हुआ. सायरा ने अब्दुल से बातचीत बंद कर दी.सायरा की मां और उस की दोस्तों ने सायरा को एक बाबा का पता बताया और कहा कि बाबा ऐसा तावीज देंगे कि अब्दुल तुम्हारी उंगलियों पर नाचेगा.

अगले दिन सायरा और उस की मां बाबा के पास पहुंच गईं और सारी बात बताई. बाबा उन की बातों को सुन कर समझ चुका था कि ये लालची लोग हैं, इन्हें लूटा जाए. बाबा ने कहा, ‘‘काम तो हो जाएगा, लेकिन इस में एक महीना लगेगा और तकरीबन 5 लाख रुपए का खर्च आएगा. धीरेधीरे अब्दुल के दिमाग को काबू में करना पड़ेगा, जिस से वह तुम्हारी हर बात मान ले. इस में 7 बकरों की कुरबानी देनी पड़ेगी.

‘‘कुछ तावीज अब्दुल के तकिए के नीचे सावधानी से रखने होंगे. उसे पता न चले. कुछ तावीज तुम्हें पहनने होंगे, जो जाफरान से बनाए जाएंगे. पहले 2 लाख रुपए एडवांस और 3 लाख रुपए एक हफ्ते बाद देने पड़ेंगे.’’सायरा और उस की मां तैयार हो गईं.

अगले दिन सायरा ने उस ढोंगी बाबा को पैसे दिए और बाबा ने उसे 3 तावीज अब्दुल के तकिए के भीतर रखने के लिए दे दिए और 7 तावीज सायरा को देते हुए बोला, ‘‘ये तावीज पानी में डाल कर एकएक कर के 7 दिन तक पी लेना और हां, जब तक काम पूरा न हो जाए, तुम अपने शौहर के पास बिलकुल मत सोना.’’अब सायरा और उस की मां को पूरा भरोसा हो गया था कि अब्दुल उन का कहना मानेगा और वह घर हमारे नाम कर देगा.सायरा ने अब्दुल से बात करना बंद कर दिया. अब्दुल जब भी सायरा से बात करने की कोशिश करता, तो वह एक ही जवाब देती कि ‘पहले यह घर मेरे नाम करो. जब तक तुम मेरी बात नहीं मानोगे, मेरे साथ बात मत करना और न ही मेरे पास आना’.

अब्दुल ने सायरा को समझाने की पूरी कोशिश की, ‘‘हमारे इस झगड़े में बच्चों पर गलत असर पड़ रहा है. मेहरबानी कर के यह झगड़ा बंद कर दो.’’पर सायरा उस की एक भी बात सुनने को तैयार न थी. इस झगड़े से अब्दुल का कारोबार भी दिन ब दिन बिखरता जा रहा था.अब्दुल ने सोचा, ‘क्यों न सायरा के नाम वसीयत कर दूं… वह भी खुश हो जाएगी…’ और उस ने अगले दिन सायरा से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे नाम वसीयत कर देता हूं. इस के बाद तो तुम खुश हो जाओगी न?’’

यह सुन कर सायरा बोली, ‘‘ठीक है, मैं कल वकील को बुला लेती हूं. तुम मेरे नाम वसीयत कर दो.’’अब्दुल यह सुन कर खुश हो गया कि अब झगड़ा खत्म हो जाएगा और उस ने मुहब्बत भरी नजरों से सायरा को देखा और अपनी बांहों में भर लिया.सायरा एक ही झटके में अब्दुल से अलग होते हुए बोली, ‘‘पहले वसीयत तो करो, उस के बाद मेरे पास आना.’’अब्दुल खुश था कि एक ही दिन की तो बात है. कल वह सायरा के नाम वसीयत कर देगा, तो फिर उस से ढेर सारा प्यार करेगा.

पर अब्दुल इस बात से अनजान था कि कल क्या ड्रामा होने वाला है. सायरा ने जब अपनी मां से इस बात का जिक्र किया, तो वह झट से बोली, ‘‘बाबाजी के तावीज का असर हो रहा है. इस बारे में पहले बाबाजी से बात करते हैं, उस के बाद कोई फैसला लेना. जब वह वसीयत के लिए तैयार हो गया है तो जल्द ही तुम्हारे नाम घर करने के लिए भी तैयार हो जाएगा, बस तुम थोड़ा सब्र करो.’’

उन्होंने जब बाबा से इस बारे में बात की, तो उन्होंने यही बोला, ‘‘एक हफ्ते में इतना असर हो गया है, तुम बाकी रकम ले कर मेरे पास आ जाओ. मैं तुम्हें कल और तावीज देता हूं. 7 बकरों की कुरबानी भी देनी है, फिर देखना कि तुम जैसा चाहोगी, वैसा ही होगा.’’अगले दिन सायरा ने अपनी बांहें अब्दुल के गले में डालते हुए कहा, ‘‘वकील कल आएगा जानू. तुम अभी काम पर जाओ.

रात में बात करते हैं.’’अब्दुल के जाते ही दोनों मांबेटी ने अब्दुल के रखे हुए पैसों में से बाकी के पैसे भी उठा लिए और उस ढोंगी बाबा के पास पहुंच गईं. बाबा ने उन से पैसे लिए और तावीज देते हुए कहा, ‘‘अभी 7 दिन का और  इंतजार करो. उसे अपने पास बिलकुल मत आने देना. इस बीच अगर वह तुम्हारा कहना मान ले, तो जल्दी उस काम को अंजाम दे देना, उस के बाद ही अपनेआप को छूने देना.’’

शाम को जब अब्दुल घर आया, तो मौका देख कर उस ने सायरा को अपनी बांहों में जकड़ लिया. सायरा झल्लाते हुए फौरन अलग हो गई. उस की आवाज सुन कर मां भी वहां आ गईं और अब्दुल को बुराभला कहते हुए बोलीं, ‘‘क्यों मेरी लड़की को परेशान करता रहता है? जब इस ने मना कर दिया है, तो क्यों इस के कमरे में आता है?’’

अब्दुल यह सब देख कर हैरान था, पर वह कुछ न बोल सका और चुपचाप अपने कमरे में चला गया.अगले दिन वकील आया, तो सायरा ने अब्दुल को फोन कर के घर बुला लिया. अब्दुल ने वकील से कहा, ‘‘मुझे अपनी बीवी सायरा के नाम वसीयत बनानी है कि मेरे मरने के बाद यह घर मेरी बीवी को मिले.’’इस पर सायरा और उस की मां बिफर गईं. सायरा बोली, ‘‘कोई वसीयत नहीं… क्या पता कि तुम बाद में बदल जाओ. घर मेरे नाम पर करो.’’अब्दुल इस बात के लिए तैयार नहीं हुआ.

अब्दुल ने सायरा को काफी समझाया. उस के हाथ जोड़े, पैर पकड़े. अपने मासूम बच्चों का वास्ता दिया, लेकिन सायरा अपनी जिद पर कायम रही और उस ने अब्दुल की एक न सुनी, क्योंकि उसे पूरा यकीन था कि बाबाजी उस का दिमाग जरूर बदलेंगे और यह घर उस का हो जाएगा.इसी बीच सायरा की मुलाकात अपने पहले आशिक से हो गई, जो शादी से पहले उस से प्यार करता था.

सायरा अपनी मां की मौजूदगी में ही उस से मिलने जाने लगी, क्योंकि वह आशिक उस की मां की दूर की बहन का बेटा था. उस की मां भी उसे पसंद करती थी, मगर गरीब होने की वजह से इन दोनों की शादी न हो पाई थी. अब्दुल इस बात से अनजान था. वह इसी उम्मीद में था कि एक न एक दिन सायरा को अपनी गलती का अहसास होगा.लेकिन अब्दुल का ऐसा सोचना गलत था. सायरा अपने उस आशिक के साथ खुश थी, जो उस का ही हमउम्र और खूबसूरत था.

अब तो सायरा अब्दुल की सूरत भी देखना पसंद नहीं करती थी. वह तो इस ताक में थी कि किसी तरह यह घर मिल जाए, फिर इसे बेच कर जिंदगी की नई शुरुआत करे.अब्दुल काफी हताश हो चुका था. आखिर वह दिन भी आ गया, जब अब्दुल ने अपना घर सायरा के नाम कर दिया.

घर नाम होते ही सायरा और उस की मां की खुशी का ठिकाना न रहा. अब तो सायरा का आशिक खुलेआम उस के घर पर आने लगा. अब्दुल कुछ बोलता तो मांबेटी उसे धमका देती थीं.अब्दुल अपना दिमागी संतुलन खो रहा था. वह तो सायरा की याद में गुम रहता, लेकिन सायरा उसे कोई भाव न देती. आखिर सायरा और उस की मां ने अब एक नया दांव चला.

उन्हें किसी भी कीमत पर अब्दुल से छुटकारा चाहिए था. जब आसपड़ोस के लोग सायरा को समझाते तो वह उन से बोलती कि अब्दुल नामर्द है. अब्दुल इन सब बातों से अनजान पागलों की तरह जिंदगी गुजार रहा था. उस की इस हालत के बारे में जब अब्दुल के भाइयों को पता चला, तो वे उसे लेने मुंबई आ गए. उन्होंने सायरा से बात की, तो वह तपाक से बोली, ‘‘मैं एक नामर्द के साथ जिंदगी नहीं गुजार सकती. मुझे इस से तलाक चाहिए.’’

अब्दुल ने जब यह सुना, तो वह दंग रह गया. कुछ ही दिनों में अब्दुल और सायरा का तलाक हो गया. अब्दुल के भाई उसे और उस के बच्चों को गांव ले गए. धीरेधीरे अब्दुल की तबीयत में सुधार आने लगा. अब उसे अपने बच्चों की फिक्र थी. वह उन के लिए कुछ करना चाहता था. एक दिन अब्दुल के पार्टनर का फोन आया और उस ने उस से वापस मुंबई आने को कहा. अब्दुल वापस मुंबई आ गया. उस के पार्टनर ने उस की दुकान और बचत उसे दी और काम संभालने को कहा.

इधर सायरा वह घर बेच कर कहीं और चली गई थी. उस का कुछ पता न था. वैसे, उड़तीउड़ती खबर अब्दुल को भी मिलती रहती थी. अब्दुल के दोस्तों ने मिल कर उस की दूसरी शादी एक बेवा औरत से करवा दी, जिस के 2 मासूम बच्चे थे और कुछ ही दिनों में अब्दुल अपने बच्चों को भी ले आया.अब्दुल ने कड़ी मेहनत की और एक छोटी सी खोली खरीद ली.

वह अपने बीवीबच्चों के साथ बेहतर जिंदगी गुजरने लगा और दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा.उधर सायरा के आशिक ने सब पैसे घूमनेफिरने में उड़ा दिए और जब सब पैसे खत्म हो गए तो वह सायरा और उस की मां को छोड़ कर चला गया, क्योंकि उस ने सायरा से शादी नहीं की थी. वह तो केवल दौलत के लालच में उस के साथ रह रहा था.

सायरा और उस की मां को अब खाने के भी लाले पड़ने लगे और मजबूर हो कर दोनों मांबेटी को दूसरों के घरों में साफसफाई का काम करना पड़ रहा था.फिर एक दिन अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिस ने सायरा को अपाहिज बना दिया. उसे लकवा मार गया था.

सायरा अब बिस्तर पर पड़ी सोचती रहती है कि अगर वह उस ढोंगी बाबा और अपनी मां के चक्कर में न पड़ती तो यह हालत न होती.सायरा की मां ने एक दिन अब्दुल को फोन किया और सारी बातें बताईं. अब्दुल उन के बताए हुए पते पर सायरा से मिलने गया. वहां का नजारा देख कर अब्दुल का दिल रो पड़ा. सायरा सूख कर कांटा हो चुकी थी. वह एक जिंदा लाश बन कर पलंग पर पड़ी थी. उस की एक गलती ने हंसताखेलता परिवार बरबाद कर दिया था. Story In Hindi

Exclusive Interview: कीबोर्ड से बेसुरे भी सुर में गाने लगते हैं – डाक्टर परमानंद यादव

Exclusive Interview: डाक्टर परमानंद यादव गायन में डाक्टरेट करने के बाद साल 1994 में वाराणसी से मुंबई बौलीवुड में प्लेबैक सिंगर बनने नहीं, बल्कि शास्त्रीय संगीत की साधना करने के लिए आए थे. अब तक डाक्टर परमानंद यादव के कई संगीत अलबम भी बाजार में आ चुके हैं. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप ने शास्त्रीय संगीत के प्रति जीवन समर्पित करने की बात क्यों सोची?

मैं देवरिया, उत्तर प्रदेश का रहने वाला हूं. मुझे लगता है कि संगीत मुझे विरासत में मिला है. मेरे दादाजी लोकगीत गाते थे, आल्हा गाते थे. यहां तक कि उन दिनों हमारे मझौली के जो स्थानीय राजा थे, उन के यहां भी एक बार मेरे दादाजी ने जा कर आल्हा गाया था.

दादाजी के संस्कार मेरे पिताजी श्रीकृष्ण यादव में आए. मेरे पिताजी भी गाने के साथसाथ ढोलक भी बहुत अच्छी बजाते थे. उन की आवाज बहुत अच्छी थी. मेरी मां फुलवासी यादव में भी भोजपुरी गानों का स्वर था. वे शादीब्याह के मौके पर बहुत सुर में गाती थीं.

दादाजी और मातापिता के संस्कार सुर के रूप में मेरे अंदर भी आए, जिस के चलते मैं शास्त्रीय संगीत से जुड़ गया. मैं ने रामवृक्ष तिवारी, अजीत भट्टाचार्य, आचार्य नंदन, कुमार गंधर्व सहित कई गुरुओं से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली.

कुमार गंधर्व को ‘आधुनिक कबीर’ कहा जाता है. कुमार गंधर्व ने कबीर को कई फार्म में गाया है. मैं ने बनारस यूनिवर्सिटी के संगीत कालेज से गायन में डाक्टरेट की. मैं ने डाक्टरेट गुरु चित्तरंजन ज्योतिषी के मार्गदर्शन में किया. कुमार गंधर्व के पास जीवन के कटु अनुभवों के साथ ही संगीत का रियाज भी था. वे कहते थे कि मूर्खों की तरह केवल गाना ही मत गाओ, पढ़नालिखना भी सीखो.

एक बार प्रेमचंद के बेटे अमृत राय का उन के पास टैलीग्राम आया. मैं ने टैलीग्राम ले जा कर कुमार गंधर्वजी को दिया, जिन्हें हम ‘बाबा’ कहा करते थे.

‘बाबा’ ने पूछा कि यह किस का टैलीग्राम है? मैं उस वक्त इस नाम से परिचित ही नहीं था. तब तकरीबन डांटते हुए ‘बाबा’ ने मुझ से कहा था, ‘ये प्रेमचंद के बेटे हैं. तुम कुछ पढ़नालिखना भी सीखो.’

फिर वे मुझे अपनी लाइब्रेरी के अंदर ले गए और कहा कि इस में काफी किताबें हैं. कुछ पढ़ा करो. बनारस के हो कर प्रेमचंद, कबीर, तुलसी को नहीं जानोगे, तो फिर क्या जानोगे.

‘बाबा’ ने मुझे यह जो संस्कार दिया, उस ने मेरी जिंदगी ही बदल दी. उस के बाद मेरा भंडार सदा भरा रहा.

आप स्टेज पर संगीत के कार्यक्रम कब से दे रहे हैं?

बचपन से ही. इंटरमीडिएट की पढ़ाई के दौरान ही मैं स्टेज पर गाने लगा था. डाक्टरेट की उपाधि हासिल करने के बाद पिछले 31 सालों में मेरे शास्त्रीय गायन, भोजपुरी लोकगीत सहित 100 से ज्यादा अलबम निकल चुके हैं.

जब आप स्टेज पर गाते हैं और जब आप स्टूडियो में कोई गाना रिकौर्ड करते हैं, तो कहां बतौर गायक आप को ज्यादा सुकून मिलता है?

गायन का असली मजा तो स्टेज पर लाइव गाने में ही है. सामने हजारों सुनने वाले बैठे आप को सुन रहे हों, स्टेज पर गायक के साथ साजिंदे बैठे होते हैं, तब जो किसी गीत को गाने का मूड बनता है, वह स्टूडियो के बंद कमरे में मुमकिन ही नहीं है. स्टूडियो में गाना रिकौर्ड करना उसी तरह से है, जिस तरह से आप कारखाने में कोई काम कर रहे हों.

आप के किस संगीत अलबम को सब से ज्यादा शोहरत मिली?

देखिए, मैं ने सस्ता और स्तरहीन काम नहीं किया. मैं ने गरिमामय ढंग से ही सभी गीत गाए. मैं ने भोजपुरी लोकगीत गाए, तो वे भी पूरी गरिमा के साथ. भोजपुरी लोकगीत व लोकसंगीत काफी समृद्ध है, पर वर्तमान समय के कुछ गायकों ने इसे टपोरी बना दिया है.

फिल्मों में प्लेबैक सिंगिंग न करने की कोई खास वजह?

मैं उस तरफ जाना ही नहीं चाहता था. फिल्मों में गाने के लिए तो गंवार इनसान भी कतार लगाए हुए हैं. ऐसा इनसान जिसे संगीत की एबीसीडी नहीं पता, उसे तो केवल ‘कीबोर्ड’ का सहारा है. ‘कीबोर्ड’ की बदौलत तो ‘बेसुरा’ भी ‘सुर वाला’ बन रहा है. अगर सही लोगों ने बुलाया होता, तो जरूर गाता.

आप को मुंबई में कुमार गंधर्व फाउंडेशन शुरू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

जब मैं मुंबई आया था, तो मुझे मंच नहीं मिलता था. यहां जीहुजूरी और चमचागीरी का माहौल था. मुझे यह सब करना आता नहीं. पर मुझे मदद करने वाले अच्छे लोग मिले. मंच न मिलने का दर्द मैं ने कई दूसरे अच्छे गायकों में भी देखा, तो मैं ने साल 1997 में ‘कुमार गंधर्व फाउंडेशन’ की शुरुआत की.

हम इस फाउंडेशन के तहत अच्छे गायकों की तलाश कर उन्हें मंच देने के साथ ही उन्हें सम्मानित करने का काम भी करते हैं. Exclusive Interview

Caste Violence: शर्मनाक – जातीय जहर ने बनाया बेटी को विधवा

Caste Violence, लेखक – अलखदेव प्रसाद ‘अचल’

बिहार के दरभंगा मैडिकल कालेज में जातीय जहर की वजह से एक बाप ने अपने दामाद को गोली मार कर बेटी को ही विधवा बना डाला. सिर्फ इसलिए कि हमारी जाति ऊंची है, तो हमारा दामाद निचली जाति (केवट) का कैसे हो सकता है?

सहरसा जिले के बनगांव के रहने वाले प्रेमशंकर झा की तकरीबन 19 साल की बेटी तनुप्रिया और पिपरा थाना इलाके के तुला पट्टी के बाशिंदे गणेश मंडल का 24 साल का बेटा राहुल मंडल दोनों डीएमसीएच दरभंगा में बीएसपी नर्सिंग के छात्र थे. राहुल सैकंड ईयर का छात्र था, तो तनुप्रिया फर्स्ट ईयर की छात्रा थी. दोनों में प्यार था और 5 मई को उन्होंने शादी रचा ली थी.

प्रेमशंकर झा को यह नागवार गुजर रहा था. उस ने पहले तो बेटी को समझाने की खूब कोशिश कि, पर जब वह उस में नाकाम रहा, तो उस ने मन ही मन दामाद को ही खत्म कर देने के लिए ठान लिया, जबकि शादी के कई महीने बीत जाने पर तनुप्रिया भी निश्चिंत हो गई थी कि अब सबकुछ ठीक है.

तनुप्रिया के सारे खर्च ससुराल वाले ही चला रहे थे. उधर प्रेमशंकर झा के दिल में जो आग धधक रही थी, वह शांत नहीं हुई थी. वह मन ही मन अपने दामाद को खत्म करने की योजना बनाता जा रहा था. इस के लिए शायद उस ने 5 अगस्त का दिन चुना था.

शादी के बाद राहुल मंडल और तनुप्रिया दोनों होस्टल की अलगअलग मंजिल पर रह रहे थे कि 5 अगस्त को प्रेमशंकर झा नकाब पहने कैंपस के अंदर आया, जो कट्टा छिपाए हुए था. पहले तो उस ने राहुल मंडल की मोटरसाइकिल के प्लग की तार काट दी, फिर पास में ही मोबाइल पर बात करते राहुल मंडल से पूछा कि यह मोटरसाइकिल किस की है?

राहुल ने नजदीक आ कर जैसे ही कहा कि ‘मेरी है’, तो प्रेमशंकर झा नजदीक से उस के सीने में 2 गोलियां उतार दीं.

कुछ ही दूरी पर तनुप्रिया भी खड़ी थी. राहुल गोली लगते ही दौड़ा और तनुप्रिया से लिपट गया, पर जल्दी ही जमीन पर गिर पड़ा. इधर होस्टल के गुस्साए लड़कों ने प्रेमशंकर ?ा को दबोच लिया और उस की धुनाई शुरू कर दी.

इसी बीच पुलिस आई और प्रेमशंकर झा को बचा लिया. जब तनुप्रिया देखने पहुंची कि आखिर उस के पति का हत्यारा कौन है, तो उस की आंखें फटी की फटी रह गईं कि वे तो उस के पिता प्रेमशंकर झा हैं, जिन्होंने उसे न सिर्फ विधवा बना डाला, बल्कि उस की जिंदगी भी कर दी.

इस घटना के बाद तनुप्रिया ने अपने ही पिता के लिए फांसी की मांग कर डाली थी. उस ने गुस्से में यह भी कह दिया था कि अगर कोर्ट से इंसाफ नहीं मिलेगा, तो मेरे पिता ने जिस तरह से मेरी जिंदगी बरबाद कर दी है, उसी तरह से उन की जिंदगी भी मैं बरबाद कर दूंगी.

तनुप्रिया ने अपने पति की हत्या के लिए अपने पिता, दोनों भाइयों और मां को भी जिम्मेदार माना है. इधर पिता का कहना था कि निचली जाति के लड़के से तनुप्रिया की शादी होने से उन्हें समाज से उलाहने मिल
रहे थे. लोग खिल्ली उड़ा रहे थे. उधर सोशल मीडिया पर ऊंची जाति के लोग प्रेमशंकर झा के इस कदम का स्वागत करते देखे गए थे.

ऐसे लोगों ने दलील दी थी कि मातापिता ने लड़की को पालापोसा होगा, पढ़ायालिखाया होगा, तो सपना भी देखा होगा कि इस की शादी किस से करनी है. पर बेटी ने मातापिता के मनसूबों पर पानी फेर दिया. ऐसी हालत में बेटी के बाप का गुस्सा होना लाजिमी था, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि प्रेमशंकर झा की नाक तो बेटी ने कटवाई थी, फिर उस ने तनुप्रिया को गोली न मार कर राहुल मंडल की जीवनलीला क्यों खत्म कर दी?

सिर्फ इसलिए न कि आगे से एससी या पिछड़ी जाति के लड़के ऊंची जाति की लड़की से शादी करने की हिम्मत न जुटाने पाएं कि इस का नतीजा राहुल की तरह हो सकता है.

पर कानून के हिसाब से न तनुप्रिया की गलती है, न राहुल मंडल की, क्योंकि दोनों की उम्र अपना फैसला लेने की हो गई थी. काबिलीयत के हिसाब से भी दोनों ने सही चुनाव किया था.

ऐसा भी नहीं था कि तनुप्रिया और राहुल मंडल ने शादी कर समाज में नया कर दिखाया था. हमारे देश में ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जहां किसी भी जाति या मजहब में लोग अपनी मरजी से शादी करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं. वहां प्रेमशंकर झा ने अपने ही हाथों से अपनी ही बेटी को विधवा बना कर अपनी घटिया सोच को जाहिर कर दिया, क्योंकि उस ने न सिर्फ राहुल मंडल को मार दिया, बल्कि अपनी बेटी की भी जिंदगी बरबाद कर दी.

एक तो ऐसा नहीं लगता कि तनुप्रिया अपने मातापिता के पास जाएगी, अगर चली भी गई, तो उन लोगों में विधवा विवाह का प्रचलन नहीं है. इस से और ज्यादा घटिया सोच कुछ हो ही नहीं सकती. Caste Violence

Supreme Court Judgment: ‘बास्टर्ड’ जातिसूचक गाली नहीं – सुप्रीम कोर्ट

Supreme Court Judgment, लेखक – शकील प्रेम

एससी और एसटी के खिलाफ अपराध होना कोई नई बात नहीं है. इन्हीं अपराधों को रोकने के लिए एससीएसटी ऐक्ट बना था. इस अधिनियम के तहत एससीएसटी को जातिसूचक शब्द कहना भी अपराध माना गया है, लेकिन अगर यह अपशब्द जातिसूचक नहीं है, तो इसे एससीएसटी ऐक्ट की धाराओं में दर्ज नहीं किया जा सकता.

यहां तक कि अगर कोई शख्स किसी एससीएसटी को ‘बास्टर्ड’ (हरामजादा) जैसे शब्दों से भी नवाजे, तो इसे एससीएसटी ऐक्ट में अपराध की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता.

16 अप्रैल, 2025 को सिधान नाम के एक आदमी ने एक एससी शख्स को सड़क पर रोका, धमकी दी और कुल्हाड़ी से हमला किया. हमले से पहले आरोपी सिधान ने उसे ‘बास्टर्ड’ कहा. एससी आदमी ने एफआईआर दर्ज करवाई, जिस में ‘बास्टर्ड’ शब्द के अलावा कोई जातिसूचक शब्द दर्ज नहीं हुआ.

‘बास्टर्ड’ शब्द के साथ ही पुलिस ने एससीएसटी ऐक्ट की धाराएं जोड़ दीं, जिस के बाद आरोपी ने अग्रिम जमानत के लिए केरल हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन हाईकोर्ट ने एससीएसटी ऐक्ट की धारा 18 के तहत जमानत खारिज कर दी.

आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘बास्टर्ड’ शब्द जाति पर आधारित अपमान नहीं है. यह सामान्य सा अपमानजनक शब्द है, जो एससीएसटी ऐक्ट के दायरे में नहीं आता.

सुप्रीम कोर्ट की बैंच ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा, ‘यह आश्चर्यजनक है कि शिकायत में जातिगत अपमान का कोई आरोप न होने पर भी पुलिस ने एससीएसटी ऐक्ट लगाया.’

सुप्रीम कोर्ट ने एससीएसटी ऐक्ट की धारा 3(1)(आर) का हवाला दिया जो कहती है कि अपमान तभी अपराध है, जब यह जाति की पहचान के आधार पर हो और यह अपमान सार्वजनिकतौर पर किया जाए, ताकि पीडि़त अपमानित महसूस हो. यह कह कर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को अग्रिम जमानत दे दी.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि केवल ‘बास्टर्ड’ जैसे अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल एससीएसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध नहीं माना जाएगा. जब तक कि कोई शब्द स्पष्ट रूप से जाति (कास्ट) से जुड़ा न हो, वह एससीएसटी ऐक्ट के तहत अपराध नहीं है. यह फैसला 3 नवंबर, 2025 को जस्टिस अराविंद कुमार और जस्टिस एनवी अंजरिया की बैंच ने सुनाया.

23 अगस्त, 2024 शजन स्केरिया बनाम केरल राज्य के मामले में भी जस्टिस पीबी परदीवाला ने कहा था कि एससीएसटी के खिलाफ कोई भी शब्द तभी अपराध है, जब यह जाति से जुड़ा हो. केवल पीडि़त के एससीएसटी होने से यह ऐक्ट लागू नहीं होता.

5 नवंबर, 2020 को एक अहम फैसले में भी कोर्ट ने कहा कि सभी अपमान एससीएसटी ऐक्ट के तहत नहीं आते जब तक कि उस अपमान का इरादा जातिगत अपमान न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2022 में कृष्ण कुमार सिंह बनाम राज्य के एक फैसले में भी साफ किया था कि केवल अपमानजनक या मानहानिकारी शब्दों का उच्चारण मात्र से आईपीसी की धारा 294(बी) के तहत अपराध नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया जारी करने से पहले मजिस्ट्रेट को जांच करनी चाहिए कि क्या शब्दों का प्रभाव सार्वजनिक नैतिकता पर पड़ता है या नहीं. ‘बास्टर्ड’ जैसे शब्दों को अकेले अपराध मानने के लिए पर्याप्त सुबूत जरूरी हैं.

साल 2007 के मायादेवी बनाम जगदीश प्रसाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पत्नी को नियमित रूप से ‘बास्टर्ड’ जैसे अपशब्द कहना मानसिक क्रूरता है, जो तलाक का आधार बन सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने जिनिया कीटिन बनाम कुमार सीताराम मां?ा, 2003 के एक मामले में साफ किया था कि सिर्फ वैध विवाह से जन्मा बच्चा ही वैध माना जाता है. अगर किसी हिंदू की शादी हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत नहीं हुई है, तो बच्चा ‘बास्टर्ड’ माना जाता है और उसे उत्तराधिकार में अधिकार नहीं मिल सकता.

हालांकि, साल 2005 में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) में संशोधन के बाद अविवाहित माताओं के बच्चों को मां की संपत्ति में अधिकार मिला है.

साल 2014 में एनडी तिवारी के मामले में, रोहित शेखर ने सुप्रीम कोर्ट से ‘बास्टर्ड’, ‘इलिगिटिमेट’ जैसे शब्दों पर प्रतिबंध की मांग की थी, ताकि कानूनी कार्यवाही में मां की गरिमा बनी रहे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया.

हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के यह जजमैंट एससीएसटी ऐक्ट के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए दिए गए. इन मामलों में कोर्ट ने कहा भी कि इस ऐक्ट का मकसद असली अत्याचारों को रोकना है.

सवाल यह है कि कोर्ट असली अपराध किसे मानती है? जिस देश में एक एससी की बरात को सुरक्षित तरीके से सड़क पर निकलने के लिए पुलिस फोर्स तैनात करनी पड़ती है, वहां एससी के प्रति असली अपराध का मापदंड कैसे तय किया जा सकता है? अगर किसी एससी को उस की जाति के चलते ही ‘हरामजादा’ कहा जाए, तो क्या यह उस के खिलाफ मानसिक उत्पीड़न नहीं है?

हाईकोर्ट बनाम वीजे प्रकाश, 1982 के एक मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने पुराने ब्रिटिश फैसलों की आलोचना की थी और ‘हरामजादा’ जैसे शब्दों को किसी भी नागरिक के लिए अपमानजनक माना था.

तब राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के बाद, ऐसे अपमान मालिक और नौकर के रिश्ते में भी क्षतिपूर्ति योग्य नहीं हैं. राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला ‘बास्टर्ड’ जैसे शब्दों को सामाजिक संदर्भ में मानसिक क्रूरता मानता है.

एक तरफ राजस्थान हाईकोर्ट ‘बास्टर्ड’ जैसे शब्दों को अपमानजनक और मानसिक क्रूरता मानती है, तो
वहीं सुप्रीम कोर्ट के लिए किसी एससी को ‘बास्टर्ड’ कहना सामान्य सी बात है. एससी समाज को ले कर अदालतों की यह मानसिकता विरोधाभासी तो है ही, साथ यह एससीएसटी के प्रति समाज के जातिवादी चरित्र को बढ़ावा भी देती है.

जरूरी नहीं है कि हर एससी को कोई उस की जाति का नाम ले कर ही गाली दे, लेकिन यह कड़वी सचाई है कि एससी को उन की जाति के चलते ही ‘बास्टर्ड’ जैसी गालियां दी जाती हैं. Supreme Court Judgment

Editorial: राहुल–तेजस्वी की जातीय रणनीति क्यों नहीं बदल सकी चुनावी हवा?

Editorial: बिहार के विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव का वोट चोरी का पैंतरा बिलकुल काम न आया क्योंकि ऐसा लगता है कि मोटे तौर पर वोटों को मैनेज करने में भारतीय जनता पार्टी पूरी तरह आगे रही. वोट नहीं देने दिया गया हो इस की शिकायतें उतनी नहीं आईं जितनी राहुल गांधी और तेजस्वी यादव बातें कर रहे थे.

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव असल में सिर्फ जाति को ले कर राजनीति कर रहे थे पर जाति ऐसा उलझ सवाल है जिसे वोटों में बदलना न उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी के बस का रहा और न ही लालू प्रसाद यादव के. लालू प्रसाद यादव ने लंबे समय तक राज किया तो इसलिए नहीं कि छोटी जातियों को परेशानी थी, इसलिए कि उनकी दबंग जाति को तब कांग्रेस ने वह जगह नहीं दी जो मिलनी चाहिए थी.

कांग्रेस ने ही पिछड़ी जातियों को 1850 से 1990 तक पढ़ालिखा तो दिया था पर इन्हें सत्ता में भागीदार नहीं बनाया था जबकि उन के पास जमींदारी हटने के बाद जमीनें आ गई थीं और वे पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गए थे. लालू प्रसाद यादव ने उस का फायदा उठाया पर वे लोगों को साथ ले कर नहीं चल सके  और एकएक कर के रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे साथी उन से बिछड़ जाए.

लालू प्रसाद यादव ने सत्ता में आने के बाद उन जातियों को विशेष भाव नहीं दिया जो इतनी दबीकुचली थीं कि कोविड के दिनों में मुंबईदिल्ली में न रह कर अपने गांवों तक जाने के लिए पैदल चलने को तैयार हो गई थीं, बिना यह सोचे कि उन की रास्ते में सोने, खाने, नहाने की क्या व्यवस्था होगी. लालू प्रसाद यादव की पार्टी या कांग्रेस ने उन लोगों का ध्यान रखा जिन्हें अपना देश छोड़ कर बाहर पराए लोगों के बीच में रहना पड़ा हो, लगता नहीं.

इस बीच भारतीय जनता पार्टी से जुड़े धार्मिक संगठनों ने बड़ा खेला खेल दिया. उन्होंने हर निचली, अछूत, दलित, पिछड़ी, अतिपिछड़ी जाति को अपने लोकल गांवदेहात के देवता देने शुरू कर दिए और उन्हें वर्णव्यवस्था बरकरार रखते हुए उन देवताओं के बड़े मंदिर बनवा दिए. इन लोगों को अपनी गरीबी से ज्यादा परेशानी यह होती थी कि उन्हें ऊंचे लोगों के मंदिरों में शूद्रअछूत कह कर घुसने नहीं दिया जा रहा.

उन की इस शिकायत को ही नहीं पूरा कर दिया, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मंत्री, मुख्यमंत्री, विधायक लाइनें लगा कर अतिपिछड़ों, अछूतों, भूमिहारों, दलितों के मंदिरों में सिर नवा आते कि लो बराबरी का दर्जा दे दिया.

रहीसही कसर पैसा दे कर पूरी कर दी गई. नीतीश कुमार ने औरतों के खाते में चुनाव घोषित होने से पहले 10,000 रुपए डलवा दिए. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव नौकरियों के वादे करते रहे पर लगता है कि उन के वादे में दम नहीं रहा.

कुल वोटों को गिनें तो भाजपा और जनता दल (यूनाइटेड) को राष्ट्रीय जनता दल और कांगे्रस से इतने ज्यादा वोट नहीं मिले जितनी सीटें दिखा रही हैं पर यह तो 1950 से ही चल रहा है जब कांग्रेस को 50 फीसदी से कम वोट मिलने पर भी दोतिहाई बहुमत संसद और विधानसभाओं में एक के बाद एक चुनाव में मिलता रहा.

लालू प्रसाद यादव परिवार और गांधी परिवार अभी बिहार की राजनीति में बेमतलब के नहीं हैं. वे चुनाव हारे पर अपने वोट नहीं खोए. उन्हें जनता की देखभाल करनी है सरकार की अति से. सत्ता सुख नहीं मिलेगा तो क्या.

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आरक्षण का एक फायदा यह हुआ है कि अब पिछड़े और एससी वर्गोंके बच्चों के नंबर जनरल कैटेगरी के बच्चों से ज्यादा आने लगे हैं. रेलवे भरती बोर्ड की 2024 की परीक्षा के नतीजों में जूनियर इंजीनियर की पोस्ट के लिए कटऔफ ओबीसी के लिए 846.23 नंबर रहा, जनरल कैटेगरी के लिए 795.16 नंबर और एससी के लिए 720.07 नंबर. 403 पदों के लिए अब जिन्हें नौकरी मिलेगी वे सब बराबर के नंबर पाने वाले होंगे और नौकरी पाने पर जनरल कैटेगरी के लोग पिछड़ों और एससी को नौकरी खाऊ नहीं कह सकेंगे.

आजादी के बाद से आरक्षण को जो संवैधानिक दर्जा मिला उस ने करोड़ों युवाओं को पिछले 50-60 सालों में पढ़ने को और सम?ाने को तैयार कर दिया. उन्होंने सदियों की इस सोच को कि इस समाज में कुछ लोगों को पढ़नेलिखने का हक ही नहीं है, उन को नेचर ने इतना दिमाग भी नहीं दिया है, को झूठा साबित कर दिया है.

इस देश में आज जो भी बना है, उस की जड़ों में केवल पिछड़ों और एससी का हाथ है क्योंकि यहां के सवर्णों ने हाथ से कभी बड़ा काम किया ही नहीं. अंगरेजों ने किलों में उन्हें मशीनों में लगाया था पर जल्दी ही वे यूनियनों के मुखिया बन बैठे और उन्होंने अंगरेजों की लगाई सारी मिलों को आजादी के बाद बंद करवा दिया.

जवाहरलाल नेहरू ने सैकड़ों सरकारी उद्योग तो लगवाए पर वे भूल गए उन में कारीगरों में अगर ऊंची जातियों के लोग पिछड़ों और एससी के साथ काम पर रहेंगे तो काम तो पिछड़ों को करना पड़ेगा. ऊंची जातियों के जो भी लोग कारखानों में गए वे यूनियनों से कारखानों को बंद कराने में लग गए.

रेलवे बोर्ड के जूनियर इंजीनियर अगर अच्छे नंबर वाले पिछड़े और एससी जमात के होंगे तो उम्मीद कर सकते हैं कि सरकारी रेलें भी ठीक काम कर सकेंगी क्योंकि जिन्हें हाथ से काम करने की आदत है वे ही रेलें चला सकते हैं. आज भी जमीन पर काम करने वाले कमा रहे हैं, मंदिरों में घंटियों को बजाने वाले नहीं. रेलवे व्हाइट कौलरों से नहीं चलती.

ओबीसी और एससी अक्ल और लगन में दूसरों से कहीं ज्यादा आगे हैं और तभी उन्हें जब भी अंगरेजों ने बाहर समुद्र पार देशों में भेजा, वहां खाली हाथ पहुंच कर आज मालामाल हैं. हमारी वर्णव्यवस्था एक बहुत बड़े हिस्से के लिए जंजीर बनी हुई है जो इस वर्ग को तो आगे बढ़ने से रोकती है ही, पूरे देश को बढ़ने से रोक रही है.

संविधान में राजनीतिक व सेवाओं के 1950 और 1990 के आरक्षणों से देशको बड़ा लाभ हुआ है. एक समाज को बड़ा बनना है, सुखी रहना है, सेहतमंद रहना है तो हरेक को बराबर का काम करने का मौका मिलना चाहिए. हरेक की ताकत को पहचानो, उसे काम दो तो ही देश तरक्की करेगा वरना देश घंटियां बजाता रहेगा और खाली कटोरा लिए मुफ्त में अनाज की मांग करता रहेगा. Editorial

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