Social Conflict: पंजाब – प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बढती नफरत

Social Conflict: पंजाब में तकरीबन 18 लाख बाहरी यानी प्रवासी मजदूर काम कर रहे हैं, जिन में से 80 फीसदी असंगठित मजदूर हैं, जो खेतीबारी, उद्योग और दूसरे क्षेत्रों में अपना खास योगदान देते हैं. हालांकि, हाल के समय में पंजाब में कुछ संगठनों और पंचायतों की ओर से प्रवासी मजदूरों के खिलाफ विरोध और उन्हें राज्य से बेदखल करने का माहौल बनाया जा रहा है.

ये हालात पंजाब की इकोनौमी और सामाजिक भाईचारे के लिए गंभीर खतरा बने हुए हैं. प्रवासी मजदूरों का यहां से भागना राज्य की फैक्टरियों और खेतों के काम पर बुरा असर डाल रहा है. एससी और अति पिछड़े मजदूरों का शोषण पंजाब में एससी तबके की आबादी तकरीबन 32 फीसदी है, लेकिन उन के पास केवल 3 फीसदी जमीन है. एससी और अति पिछड़े खेत मजदूर पंजाब की खेतीबारी में खास रोल निभाते हैं, साथ ही वे आमतौर पर कर्ज में डूबे हुए होते हैं.

पंजाब में किसानों की खुदकुशी में एससी मजदूरों की तादाद भी ज्यादा है. अमीर पंजाबी किसानों (जाट सिख) का शोषण और सामाजिक दबदबा इस वर्ग पर बना हुआ है.

यह वर्ग अपनी उथली जमीन और सामाजिक हालात के चलते मजबूर हो कर दूसरे राज्यों जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश से पंजाब में मजदूरी के लिए आता है. इन प्रवासी मजदूरों में भी ज्यादातर एससी और पिछड़े वर्ग के होते हैं.

अमीर पंजाबी समाज का रवैया

पंजाबी समाज में अमीर वर्ग अपने सामाजिक और माली दबदबे के चलते एससी और अति पिछड़े मजदूरों के साथ शोषण से भरा बरताव करता है. हाल ही में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ बढ़ते विरोध के पीछे पंजाबी अमीर वर्ग की चिंता और असुरक्षा की भावना भी है.

पंजाबी लड़कियों के साथ इन के प्रेम संबंध सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल में तनाव और विवाद की नई वजह बन सकते हैं. कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां ऐसे प्रेम संबंधों को ले कर सामाजिक टकराव भी बढ़ा है.

अमेरिका में ट्रंप की इमीग्रैंट नीति से तुलना

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इमीग्रैंट नीति के तहत गैरकानूनी प्रवासियों को वहां से बाहर निकालने को ले कर सख्त कार्रवाई की जा रही है.

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ऐसे बच्चों और नौजवानों को खुद से अमेरिका छोड़ने के लिए बढ़ावा दिया गया है, जो अमेरिका के सामाजिक और माली तानेबाने को दोबारा संजोने की कोशिश कर रहे हैं.

पंजाब में प्रवासी मजदूरों के खिलाफ माहौल भी इसी तरह के सामाजिक और माली दबावों का प्रतिबिंब हो सकता है.

बिहार में राज्य छोड़ने की वजह

बिहार के एससी और पिछड़े वर्ग के लोग मुख्य रूप से जाति पर आधारित सामाजिक दमन और माली मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए पंजाब जैसे राज्यों में जाते हैं. रोजगार की कमी, गरीबी और सामाजिक भेदभाव के चलते बिहार के बड़े हिस्से के मजदूर अपने परिवारों के लिए बेहतर जिंदगी की तलाश में राज्य से बाहर निकलते हैं.

पंजाब में अमीर पंजाबी वर्ग और प्रवासी मजदूरों के बीच यह विवाद जातीय और सामाजिक तनाव से जुड़े हालात को और मुश्किल बना रहा है.

इस मुद्दे पर यह साफ है कि पंजाब के प्रवासी मजदूर न केवल माली, बल्कि सामाजिक रूप से भी एक खुशहाली की बुनियाद हैं. उन के प्रति बढ़ते विरोध, शोषण और बहिष्कार से पंजाब की इकोनौमी और सामाजिक तानेबाने पर गहरा असर पड़ेगा.

एससी और अति पिछड़े प्रवासी मजदूरों का शोषण एक बड़ी चिंता है, जिस पर गंभीरता से सामाजिक और सरकारी ध्यान दिया जाना जरूरी है. पंजाबी समाज में अमीरगरीब के बीच सामाजिक दूरी और प्रेम संबंधों में विवाद इस समस्या को और पेचीदा बनाते हैं.

अमेरिका की डोनाल्ड ट्रंप की कड़ी इमीग्रैंट नीति की तरह पंजाब में भी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ माहौल एक गहरे सामाजिक भेदभाव का परिचायक है.

पंजाब में हिंसा भड़काने में जातिगत तनाव और प्रेम संबंध दोनों का अहम योगदान रहा है. यहां जातिगत तनाव और हिंसा के चलते एससी और जाट जैसी जातियों के बीच पुराना संघर्ष दिखता है, जो सामाजिक और माली लैवल पर गहराता जा रहा है.

एससी परिवारों को उन के ही गांवों में डराधमका कर गांव छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है खासकर तब जब वे जाट लड़कियों के साथ लव मैरिज करते हैं. ऐसा एक मामला पंजाब के मुक्तसर जिले का है, जहां एक एससी परिवार को बेटे के जाट लड़की के साथ शादी करने के बाद उन्हें गांव छोड़ना पड़ा.

कई जगह पंचायतों ने लव मैरिज पर बैन लगा कर ऐसे जोड़ों को समाज से बेदखल किया उन्हें और हिंसा का भी सामना करना पड़ा.

प्रेम संबंधों और विवादों का रोल

पंजाब के कई गांवों में लव मैरिज को ले कर पंचायतें सख्त हो गई हैं खासकर जब यह शादी एक ही गांव या सामाजिक समूह के बाहर की हो. लव मैरिज के खिलाफ पंचायतों ने बेदखली, घर छोड़ने और हिंसा के फैसले लिए हैं. ऐसे विवादों से कई बार परिवारों में टकराव और हिंसा होती है.

मोगा जिले के एक गांव में पंचायत ने लव मैरिज करने वाले नौजवान के परिवार को पीटा और घर से निकाल दिया, जिस से सामाजिक तनाव और भी ज्यादा बढ़ गया.

प्रवासी मजदूरों के खिलाफ हिंसा के हालात

हाल के दिनों में होशियारपुर में 5 साल के बच्चे की हत्या जैसी घटनाओं के चलते प्रवासी मजदूरों के खिलाफ गुस्सा भड़क गया. इन घटनाओं ने जातीय और क्षेत्रीय नस्लभेद को और तेज कर दिया और कई पंचायतों ने प्रवासी मजदूरों को गांव छोड़ने का फरमान जारी किया.

इस से पंजाब में बाहरी राज्यों के मजदूरों के खिलाफ हिंसक माहौल पैदा हो गया, जिस में माली, सामाजिक और जातिगत तनाव के साथ प्रेम संबंधों के विवाद भी जुड़े हैं.

ये हालात संयुक्त रूप से पंजाब में जातिगत तनाव और प्रेम संबंधों के चलते हिंसा भड़काने की वजह बने हैं, जिस से सामाजिक मजबूती पर खतरा बना हुआ है, इसलिए यह साफ है कि पंजाब में इनसानी संबंधों की मुश्किलों में जातिगत तनाव और प्रेम संबंध दोनों ने हिंसा को हवा दी है.

पंजाब में हालिया घटनाओं का कानूनी नतीजा

प्रवासी मजदूरों के खिलाफ गांवों और पंचायतों द्वारा लिए गए कड़े और भेदभाव से भरे फैसलों को ले कर बेशक कई जगह अदालतों में मुकदमे दर्ज हुए हैं. कुछ मामलों में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट तक मुद्दा पहुंचा है, जहां प्रवासी मजदूरों को गैरकानूनी रूप से निकालने की याचिकाएं दी गई हैं.

अदालतों ने प्रवासी मजदूरों के पक्ष में रुख दिखाते हुए संविधान के तहत राज्यों को दूसरे राज्यों के नागरिकों को बाहर निकालने का हक न होने पर बल दिया है और इसे असंवैधानिक माना गया है.

कई पंचायतों ने बिना कानूनी दस्तावेजों वाले प्रवासी मजदूरों को गांवों में रहने से रोकने के लिए कड़े फैसले लिए हैं, जिन में निवास प्रमाणपत्र न देना, वोटरकार्ड न बनवाना और जमीन न देना शामिल है.

पंजाब सरकार और मुख्यमंत्री भगवंत मान ने साफ किया है कि ऐसे भेदभाव करने वाले तत्त्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और प्रवासी मजदूरों के साथ किसी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए.

लव मैरिज को ले कर भी कई पंचायतों ने बैन लगा दिया है और ऐसा करने वालों को गांव से बेदखल करने का आदेश दिया है. इस पर पंजाब सरकार और प्रशासन का रुख मिलाजुला रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने निजी हकों की हिफाजत करते हुए लव मैरिज को कानूनी हक दिलाया है.

लव मैरिज के विरोध में हुई हिंसा और पंचायत के फैसलों को अदालतों ने गैरकानूनी करार दिया है, फिर भी जमीन पर हालात चुनौती से भरे बने हुए हैं. पुलिस ने भी कुछ मामलों में जांच शुरू की है, पर ज्यादातर मामलों में कानूनी सिस्टम के काम करने में देरी देखी गई है. Social Conflict

Hindi Kahani: बूंदबूंद से घड़ा भरे – एक किसान की समझदारी

Hindi Kahani: मानस नदी के किनारे एक गांव बसा था राजपुरा. उस में आबाद 30 में से 25 घर छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों के थे. 2 घर दस्तकारों के और 3 खातेपीते किसानों के थे. वे खातेपीते किसान थे, रामसुख, हरदेव और सुखराम.

एक दिन उस गांव में एक नई और अजीब बात हुई. रामसुख शहर से ट्रैक्टर खरीद कर लाया था. नीले रंग का चमचमाता ट्रैक्टर जब गांव में आ कर रुका तो बच्चे खुशी के मारे उस के चारों ओर घेरा बना कर खड़े हो गए.

रामसुख ट्रैक्टर से नीचे उतरा ही था कि खेतों से लौटते हुए हरदेव से उस की मुलाकात हो गई.

रामसुख ने उसे ट्रैक्टर दिखाया और पूछा, ‘‘आप को कैसा लगा दादा?’’

‘‘बहुत अच्छा है, कितने में खरीदा?’’

‘‘तकरीबन साढ़े 6 लाख रुपए में पड़ा है.’’

कीमत सुन कर हैरानी से हरदेव की आंखें फैल गईं.

‘‘ऐसा है दादा कि 2 लाख रुपए तो मैं ने नकद दिए हैं, बाकी बैंक से कर्ज मिल गया है,’’ रामसुख ने बताया.

हरदेव की हैरानी फिर भी कम न हुई. उस की बराबर की हैसियत के रामसुख के पास 2 लाख रुपए नकद कहां से आ गए? उस के पास तो 50,000 रुपए भी जमा नहीं थे.

‘‘2 लाख रुपए क्या साहूकार से लिए हैं?’’

‘‘नहीं, मैं ने जमा किए हैं.’’

हरदेव को रामसुख की बात पर यकीन तो नहीं हुआ, किंतु उसी वक्त सारी बातें पूछना ठीक न समझ वह चुप हो गया.

रात में हरदेव ठीक से सो नहीं पाया. रामसुख के घर सारी रात मेला सा लगा रहा. गांव में लड्डू बांटे गए. हरदेव सवेरे उठा तो रात में ठीकसे सो न पाने के चलते उस का सिर भारी था. नहाने के लिए वह नदी की ओर जा ही रहा था कि रामसुख मिल गया. वह जुताई के लिए ट्रैक्टर लिए जा रहा था.

‘‘आओ दादा, बैठ कर चलते हैं,’’ रामसुख ने पुकारा. उस ने सहारा दे कर हरदेव को ट्रैक्टर पर बिठा लिया.

ट्रैक्टर खेतों की ओर चल दिया. कल वाला सवाल आज भी हरदेव के दिमाग में घूम रहा था. वह रामसुख से पूछ ही बैठा. ‘‘रामू, एक बात बता. तू ने 2 लाख रुपए जोड़े कैसे?’’

‘‘सीधी सी बात है दादा, बूंदबूंद कर के खाली घड़ा भर जाता है और बूंदबूंद टपकाते रहो तो भरा घड़ा भी खाली हो जाता है.’’

‘‘समझा कर बता. यों पहेलियां न बुझा,’’ हरदेव बोला.

‘‘बात अच्छी न लगे तो बुरा तो न मानोगे. इसी डर से मैं ने अब तक आप को नहीं कहा था.’’

‘‘कह, तेरी बात का बुरा नहीं मानूंगा.’’

‘‘सच तो यह है कि हमारे गलत रीतिरिवाज हमें पनपने नहीं देते. मैं ने अपने को इन से बचा कर रखा और आप इन के शिकार हुए. मैं ने अपने पिता की मौत पर थोड़ा सा पैसा खर्च किया. लोगों की नाराजगी की परवाह नहीं की. भाई व बच्चों की शादी भी साधारण तरीके से कम खर्च में की. न ढेर सारे मेहमान बुलाए और न तरहतरह के पकवानों का भोज दिया.

‘‘झूठी शान और दिखावे के लिए शादियों में ढेर सारे गहने भी मैं ने नहीं चढ़ाए, न ही बैंडबाजे बजवाए. एक ओर मैं ने फालतू खर्च बंद किए, वहीं दूसरी ओर लगातार बचत की. बचत के रुपयों से मुझे ब्याज तो मिला ही, बैंक में मेरी साख भी बनी.

‘‘यही नहीं, खाद, बीज के लिए मुझे बैंक या साहूकार को ब्याज भी नहीं देना पड़ा. 2 लाख रुपए नकद देने के बाद भी अभी कुछ हजार रुपए मेरे बैंक खाते में जमा हैं.

‘‘उधर मेरे बराबर कमाई करने पर भी आप के पास रुपया इसलिए नहीं है कि आप ने अपने पिताजी का लंबाचौड़ा ‘मृत्युभोज’ किया. शादीब्याज खूब शान से किए. इन में दूरदूर के बहुत से मेहमान बुलाए. इस के लिए आप को साहूकार से कर्ज भी लेना पड़ा. फिर आप अपनी फसल वाजिब कीमत पर मंडी में बेचने के बजाय साहूकार को औनेपौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर हुए.

‘‘छोटेछोटे मौकों पर भी आप ने दिल खोल कर खर्च करने में अपनी शान समझी. इन से आप की आमद और खर्च बराबर होते रहे. बचत कुछ हुई नहीं. पैसे से पैसा नहीं बढ़ा.’’

‘‘हमारे देश में गरीबी होने की यह भी एक बड़ी वजह है कि हम दिखावों में अपनी गाढ़ी कमाई खर्च कर देते हैं. इसी कारण हम साहूकारों के हाथों लुटते रहते हैं. अमीर किसानों की देखादेखी गरीब किसानों व खेतिहर मजदूरों को भी अपना पेट काट कर और उधार ले कर ऐसे रीतिरिवाजों को निभाना पड़ता है. इसी वजह से हमारा दिखावा हमें बरबाद कर देता है.’’

‘‘तुम सच कहते हो रामसुख, अब मेरी आंखें खुल गई हैं,’’ हरदेव ने सोचते हुए कहा.

हरदेव की आंखें तो खुलीं, पर खुलीं देर से. अब तक तो वह खेती की कमाई में रामसुख के बराबर था, पर अब वह पीछे रह जाएगा क्योंकि रामसुख ने अब तक की गई बचत के बल पर ट्रैक्टर खरीद लिया था. Hindi Kahani

Romantic Story In Hindi: मेरे हिस्से की वफा – कायनात और अंबर का प्यार

Romantic Story In Hindi: कायनात और अंबर एक ही कालेज में साथ पढ़ते थे, बस सब्जैक्ट दोनों के अलगअलग थे. कायनात उर्दू साहित्य की छात्रा और अंबर कंप्यूटर साइंस का छात्र.

दोनों की क्लासें एक ही फ्लोर पर होने से अकसर वे एकदूसरे से टकरा जाते थे. शुरुआती बातचीत के बाद दोनों पढ़ाई की बातें करतेकरते पहले पारिवारिक और फिर निजी बातें करने लगे थे और फिर हंसीमजाक तक करने लगे थे.

दिन, हफ्ते, महीने ऐसे ही हंसतेखिलखिलाते बीत रहे थे. कायनात के लिए अंबर के दिल में अब एक खास जगह बनने लगी थी, लेकिन वह कह नहीं पाया था.

अगले हफ्ते अंबर का जन्मदिन आने वाला था, जिस में उस ने कायनात को भी बुलाया, पर वह आने को मना करती रही.

अंबर उसे मना ही रहा था कि उस के पहले ही कायनात का फोन बज उठा. उस की मम्मी का फोन था…. जो उसे घर जल्दी आने को कहते हुए बता रही थीं कि शाम को 4 बजे कुछ लोग उस की बड़ी बहन को देखने आने वाले हैं.

‘‘ठीक है अम्मी,’’ कहते हुए कायनात ने फोन काट दिया.

कायनात अंबर से बोली, ‘‘सौरी, आज मैं जल्दी घर जाऊंगी… आखिरी क्लास अटैंड किए बिना.’’

‘‘अच्छा ठीक है, चली जाना, लेकिन यह तो बताओ कि इस शनिवार को मेरे जन्मदिन पर आ रही हो न?’’

‘‘अंबर, बिना अम्मीअब्बू की इजाजत के मैं घर से कहीं नहीं आतीजाती हूं. और अगर कहीं जाती भी हूं तो भाई साथ होते हैं.’’

यह सुन कर अंबर का चेहरा उतर गया. यह देख कायनात झट से बोली, ‘‘अरे बाबा, उदास मत हो. मम्मी को राजी करने की कोशिश करूंगी. अब मुसकराओ… ये देवदास वाली सूरत अच्छी नहीं लग रही है…’’ उस के कहने के अंदाज से दोनों खिलखिला उठे.

घर पहुंचते ही अम्मी की नसीहतें शुरू हो गईं, ‘‘जरा सलीके से कपड़े पहनना. दुपट्टा सिर पर रखना. तेज मत बोलना… अपनी आपा के साथ ही रहना…’’

‘‘जी अम्मी, कुछ और बचा हो तो परची बना कर दे दो… मैं आधे घंटे में रट लूंगी.’’

‘‘तेरी इन्हीं बचकानी हरकतों की वजह से समझाना पड़ता है,’’ अम्मी कह कर काम में लग गईं.

मेहमान आ चुके थे. चायपानी का दौर शुरू हुआ. निखत उन लोगों को पसंद आई, साथ में उन्होंने कायनात को भी अपने दूर के भतीजे के लिए पसंद कर लिया, जिस के लिए कायनात के अम्मीअब्बू ने 2 साल का समय मांग लिया. वे हंसीखुशी राजी हो गए.

कायनात कुछ कह न सकी, लेकिन न जाने क्यों उस के दिमाग में अंबर की तसवीर घूम गई. वह समझ भी नहीं पा रही थी कि इस समय उसे अंबर का खयाल क्यों आया.

इधर अंबर के दिल में कायनात के लिए अहसास और जवां हो रहे थे, उधर कायनात इस बात से बेखबर अंबर को केवल एक दोस्त की हैसियत से देखती थी. निखत की शादी हो गई. उस के बाद कायनात की पढ़ाई भी पूरी हो गई.

2 साल बीतने को आ रहे थे. निखत की ससुराल वालों ने कायनात के रिश्ते की याद दिलाने का संदेशा भेजा.

कायनात अब तक अंबर के प्यार को समझ चुकी थी और खुद भी अहसास कर चुकी थी कि उस का दिल भी अंबर का नाम लेता है.

‘‘कायनात, मैं तुम से मुहब्बत करता हूं,’’ एक दिन अंबर ने दिल की बात कही.

‘‘मगर, मेरा रिश्ता तय हो चुका है. मैं अम्मीअब्बू से बगावत नहीं कर सकती… उन का भरोसा कैसे तोड़ दूं… मैं बागी का कलंक ले कर जी नहीं पाऊंगी.’’

‘‘और हमारा प्यार… अपने दिल पर हाथ रख कर बताओ कि तुम मुझ से प्यार नहीं करती?’’

‘‘अंबर, ऐसा सवाल न पूछो, जिस का जवाब मैं न दे सकूं.’’

‘‘जिस सवाल का जवाब तुम जानती हो, फिर उस से क्यों भागती हो?’’

‘‘मैं मजबूर हूं.’’

‘‘मगर, मैं नहीं… मैं बात करूंगा तुम्हारे अब्बू से.’’

‘‘अंबर, शादी तो मैं अब्बू के कहने पर उन की इज्जत के लिए कर रही हूं, मगर मैं शादी से पहले कुंआरी विधवा की जिंदगी नहीं जी सकती.’’

‘‘मैं समझ गया. तुम अपनी वफा का हक अदा करो, मेरे हिस्से की वफा भी तुम्हारी…’’ इतना कहते ही अंबर की आंखें छलछला गईं और वह आगे कुछ न कह सका. Romantic Story In Hindi

Hindi Romantic Story: इंतजार तो किया होता – आरिफ की मासूम बेवफाई

Hindi Romantic Story: कालेज का पहला दिन था, इसलिए शब्बी कुछ जल्दी ही आ गई थी. वह बहुत ही सुंदर और शर्मीली लड़की थी. उसे कम बोलना पसंद था.

धीरेधीरे कालेज में शब्बी की जानपहचान बढ़ती गई. लड़के तो उस की तारीफ करते न थकते, पर शब्बी किसी भी लड़के की तरफ अपनी नजर नहीं उठाती थी.

एक दिन आसमान पर बादल घिर आए थे. बिजली चमक रही थी. शब्बी तेज कदम बढ़ाते हुए अपने घर की तरफ जा रही थी. अचानक बूंदाबांदी शुरू हो गई, तो वह एक घर के बरामदे में जा कर खड़ी हो गई.

अचानक शब्बी की नजर एक खूबसूरत लड़के आरिफ पर पड़ी. वह उसे देख कर घबरा गई. तभी आरिफ ने मुसकान फेंकते हुए कहा, ‘‘शब्बीजी, आप अंदर आइए न… बाहर क्यों खड़ी हैं?’’

शब्बी यह बात सुन कर शरमा गई और बारिश में ही अपने घर की तरफ चलने लगी. आरिफ ने बांह पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया, ‘‘बुरा मान गई. मैं कोई पराया थोड़े ही हूं…’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ शब्बी ने झेंपते हुए कहा. बारिश धीरेधीरे कम होती जा रही थी. जल्दी ही शब्बी अपने घर की तरफ चल पड़ी.

शब्बी सारी रात करवटें बदलती रही. उस की आंखें आरिफ को खोज रही थीं. उस का बड़े ही प्यार से ‘शब्बीजी’ कहना उसे बहुत पसंद आया था. आरिफ भी उसी कालेज में पढ़ता था. धीरेधीरे दोनों की जानपहचान बढ़ी और फिर मुलाकातें होने लगीं.

एक दिन आरिफ ने कहा, ‘‘शब्बी, मैं तुम्हें बहुत चाहता हूं, अब एक पल की भी जुदाई मुझ से सहन नहीं होती… मैं तुम्हारे घर वालों से तुम्हें मांग लूंगा और दुलहन बना कर अपने घर ले आऊंगा.’’

उस दिन शब्बी ज्यों ही घर पहुंची, उस की नजर कुछ अनजानी औरतों पर पड़ी. पर वह नजरअंदाज करते हुए अपने कमरे की तरफ चली गई.

तभी उस की मां मिठाई का एक डब्बा लिए उस के कमरे में आईं, तो शब्बी झट पूछ बैठी, ‘‘मां, आज मिठाई किस खुशी में लाई हो?’’

सायरा बेगम ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘बेटी, बहुत बड़ी खुशखबरी है. पहले मिठाई खाओ, फिर मैं बताऊंगी.’’

‘‘अच्छा, अब बताइए,’’ शब्बी ने मिठाई खाते हुए पूछा.

‘‘बेटी, खुशी की बात यह है कि तुम्हारा रिश्ता पक्का हो गया है.’’

मां की यह बात सुन कर शब्बी का दिल जोर से धड़कने लगा. उस की नजरों में आरिफ का मासमू चेहरा घूमने लगा. वह बेकरार हो उठी और आरिफ के घर की ओर चल पड़ी.

आरिफ उस वक्त कोई गीत गुनगुना रहा था. शब्बी को इस कदर परेशान और दुखी देख कर वह चौंक उठा, ‘‘क्या हुआ शब्बी? तुम इस तरह परेशान क्यों हो?

‘‘आरिफ…’’ शब्बी कांपते हुए बोली, ‘‘मां ने मेरी शादी पक्की कर दी है. मैं अब तुम्हारे बिन एक पल भी…’’

‘‘छोड़ो भी यह फिल्मी अंदाज…’’ आरिफ ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘ठीक है, शादी कर लो… आखिर कब तक कुंआरी बैठी रहोगी. तुम अपनी मां की बात नहीं मानोगी क्या?’’

आरिफ की यह बात सुन कर शब्बी की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह कांपती आवाज में बोली, ‘‘आरिफ, मैं नहीं जानती थी कि तुम इस कदर बेवफा हो,’’ इतना कह कर शब्बी ने खिड़की के रास्ते नीचे छलांग लगा दी.

यह देख कर आरिफ चीख पड़ा. वह दौड़ता हुआ लहूलुहान शब्बी के पास पहुंचा. ‘‘शब्बी, यह तू ने क्या कर लिया… देखो शब्बी, मैं हूं… हां, मैं… तुम्हारा आरिफ… तुम्हारा हमराज… आंखें खोलो… कुछ पल तो इंतजार किया होता.

‘‘वह तो मैं ने ही अपनी मां को तुम्हारे घर भेजा था तुम्हें अपनी दुलहन बनाने के लिए. उठो शब्बी, मेरी दुलहन.’’

आरिफ दीवानों की तरह चिल्लाए जा रहा था, लेकिन शब्बी तो अब इस दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी. Hindi Romantic Story

Hindi News Story: क्रीमी लेयर पर सियासी जंग

Hindi News Story: एक तरफ अयोध्या के राम मंदिर में ध्वजारोहण हो रहा था, दूसरी तरफ दिल्ली और एनसीआर मास्क लगा कर जहरीली हवा से जूझ रहा था. दिसंबर का महीना आने वाला था और यह साल भी अपना वजूद खोने जा रहा था.

इस बीच अनामिका ने एक दिन विजय को फोन किया, ‘‘यार, कल सुबह तुम मेरे साथ बैंक चलना. एक छोटा सा काम है, फिर हम दोनों ट्रेड फेयर देखने चलेंगे. ज्यादा दिन नहीं बचे हैं.’’

‘‘बैंक तो मैं चल लूंगा, पर ट्रेड फेयर जाने के नाम पर मेरी टांगें कांपने लगती हैं. बहुत भीड़ होती है और खर्च होता है, सो अलग,’’ विजय बोला.

‘‘तुम न बड़े बोरिंग इनसान हो. अभी बोल दूं कि किसी होटल में एक रात बिताते हैं, तो तुम्हारी बांछें खिल जाएंगी. पर अगर मुझे कहीं घूमने जाना हो, तो तुम बहाने बनाने लगते हो. यह गलत बात है,’’ अनामिका ने रूठते हुए कहा.

‘‘अच्छा ठीक है, पहले बैंक का काम निबटाएंगे, फिर देखते हैं कि ट्रेड फेयर जाने का समय बचता भी है या नहीं,’’ विजय बोला.

अगले दिन विजय और अनामिका सुबह 10 बजे ही बैंक चले गए थे. बैंक सरकारी था. अनामिका को अपना केवाईसी अपडेट कराना था. चूंकि बैंक की वैबसाइट में दिक्कत थी, तो उन्हें थोड़ा समय लग रहा था.

वैसे, केवाईसी अपडेट के लिए आप को पहचान और पते के प्रमाण के लिए जिन दस्तावेज की जरूरत होती है, उन में पैनकार्ड और आधारकार्ड सब से खास हैं, साथ ही पासपोर्ट, वोटर आईडी कार्ड, या ड्राइविंग लाइसैंस जैसे दस्तावेज की जरूरत हो सकती है.

इस के अलावा, आप को एक हालिया पासपोर्ट साइज की तसवीर और हाल का उपयोगिता बिल (जैसे बिजली या गैस बिल) या बैंक स्टेटमैंट जैसे पते के प्रमाण की भी जरूरत हो सकती है.

बैंक में एक चपरासी और गार्ड के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. वे दोनों कौन्ट्रैक्ट पर वहां लगे थे. चपरासी ऊंची जाति का था, जबकि गार्ड एससी तबके से था.

गार्ड ने चपरासी को कोई काम करने को कहा था, जबकि चपरासी उसे भाव नहीं दे रहा था. मुद्दा बस इतना था कि चपरासी को एक कागज पर मैनेजर के दस्तखत और मुहर लगवानी थी. चूंकि बैंक में भीड़ ज्यादा थी तो गार्ड अपनी सीट नहीं छोड़ सकता था.

इसी बात पर चौकीदार चिढ़ गया था. वह बोला, ‘‘अब इन्हें भी सीट पर ही काम चाहिए. रिजर्वेशन से सब हड़प रहे हैं और अब काम भी हम से ही कराना चाहते हैं. जिस दिन रिजर्वेशन हट गया न, तब देखना.

मुफ्त की मलाई नहीं मिलेगी, तो आटेदाल का भाव पता चल जाएगा.’’

‘‘तो इस में क्या गलत है. तुम लोगों ने सदियों से हमें दबाया है. हमें हमारा हक मिलना चाहिए,’’ गार्ड ने भी ऊंची आवाज में कहा.

‘‘चिंता मत करो. नई सरकार क्रीमी लेयर वाले मामले पर कुछ धमाका करने वाली है. बहुत फायदा उठा लिया तुम लोगों ने रिजर्वेशन का. थोड़े दिनों के बाद सब बराबर हो जाएंगे,’’ चपरासी ने भड़ास निकालते हुए कहा.

‘‘क्यों अफवाह फैला रहे हो. बात का बतंगड़ बनाना तो कोई तुम से सीखे. मैं लंच टाइम में अपना काम करा लूंगा,’’ इतना कह कर वह गार्ड मेन गेट के बाहर जा कर अपनी सीट पर बैठ गया.

तब तक अनामिका का काम हो चुका था. अभी 12 बज रहे थे. वह और विजय ट्रेड फेयर की तरफ चल दिए.

चूंकि 1-2 दिन में मेला खत्म होने वाला था, तो भीड़ ज्यादा थी. वे दोनों अंदर जा कर सब से पहले एक रैस्टोरैंट में गए. उन्हें चाय पीने की तलब थी.

इसी बीच अनामिका बोली, ‘‘उस चपरासी ने कितनी आसानी से कह दिया कि अब देश से रिजर्वेशन खत्म हो जाएगा. उसे क्या पता कि क्रीमी लेयर क्या होता है.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि क्रीमी लेयर बला क्या है?’’ विजय ने अनामिका को कुरेदते हुए पूछा.

यह सुन कर अनामिका बोली, ‘‘मैं ने बीबीसी के एक लेख में पढ़ा था और वहां इसे अच्छे से समझाया गया था कि ‘क्रीमी लेयर’ की सोच इंद्रा साहनी मामले (1992) में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद पेश की गई थी, जिसे मंडल आयोग मामले के रूप में भी जाना जाता है.

‘‘अदालत ने फैसला सुनाया कि ओबीसी में उन्नत वर्गों को आरक्षण के लाभ का दावा नहीं करना चाहिए, लेकिन इस वर्ग के वास्तव में जरूरतमंद लोगों को यह लाभ मिलना चाहिए.

‘‘इस के मुताबिक, 8 लाख से ज्यादा सालाना आमदनी वाले परिवारों को क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. यह आमदनी सीमा सरकार की ओर से समयसमय पर बदली जाती है. इस के अलावा, ग्रुप ए और ग्रुप बी सेवाओं में ऊंचे पद के अफसरों के बच्चे भी क्रीमी लेयर में शामिल हैं.

‘‘डाक्टर, इंजीनियर और वकील जैसे अमीर पेशेवरों के बच्चों को भी क्रीमी लेयर का हिस्सा माना जाता है. इस के अलावा बड़े पैमाने पर खेतीबारी की जमीन के मालिक परिवारों को भी क्रीमी लेयर में शामिल किया गया है.

‘‘क्रीमी लेयर के सदस्य सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों समेत ओबीसी के लिए आरक्षित लाभों के लिए पात्र नहीं हैं.

‘‘वर्तमान में क्रीमी लेयर की सोच एससी और एसटी पर लागू नहीं होती है. एससी और एसटी के तकरीबन सभी लोगों को आरक्षण का लाभ मिलता है. लेकिन अब कोर्ट की इस ऐतिहासिक सिफारिश के बाद इस में बदलाव की संभावना है.’’

‘‘तो फिर अब इसे क्यों मुद्दा बनाया जा रहा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘मैं तुम्हें हाल की एक खबर बताती हूं. रिटायरमैंट से ठीक पहले चीफ जस्टिस बीआर गवई ने क्रीमी लेयर नौकरियों के कोटे को ले कर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि यह चिंताजनक है कि एससीएसटी समुदायों में सामाजिक और मालीतौर पर अमीर लोग जाति को हथियार बना कर नौकरियों में आरक्षण का बड़ा हिस्सा हथिया रहे हैं.

‘‘एक बड़े अखबार से बातचीत में चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि केंद्र और राज्यों को एससीएसटी समुदायों को उपवर्गीकृत करने का समय आ गया है, ताकि इन समुदायों में वे लोग जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े बने हुए हैं, सरकारी नौकरियों में कोटे के लाभ उठा सकें.

‘‘चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 7 जजों की बैंच ने राज्यों को एससी समुदायों के भीतर जातियों को सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन व सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व के आधार पर उपवर्गीकृत करने की इजाजत दी, यह पक्का करते हुए कि कोटे का बड़ा हिस्सा सब से पिछड़े लोगों को जाए.

‘‘इस बारे में चीफ जस्टिस ने कहा कि अपने ही समुदाय से आलोचना के बावजूद, वे दृढ़ता से महसूस करते हैं कि एससीएसटी समुदायों में क्रीमी लेयर को इन समुदायों में वंचितों के लिए जगह देनी चाहिए.’’

‘‘इस में गलत क्या है? जब क्रीमी लेयर वालों ने पहले ही आरक्षण का फायदा ले लिया है, तो उन की अगली पीढ़ी को खुद ही इस सब का फायदा नहीं लेना चाहिए, तभी तो गरीब एससीएसटी को आरक्षण का असली हक मिल पाएगा,’’ विजय ने कहा.

‘‘विजय, तुम मामले की गहराई नहीं समझ रहे हो. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त, 2024 को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आरक्षण बारे में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा था कि सरकार इन समुदायों के आरक्षण सीमा के भीतर अलग से वर्गीकरण कर सकती है.

‘‘तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मित्तल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की 7 जजों की बैंच के 6 जस्टिस ने एससीएसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण के पक्ष में फैसला सुनाया, जबकि एक जस्टिस ने इस का विरोध किया.

‘‘फैसला सुनाते समय यह सिफारिश भी की गई कि एससी और एसटी के लिए आरक्षण में क्रीमी लेयर का प्रावधान होना चाहिए और यह ओबीसी वर्ग पर लागू क्रीमी लेयर के प्रावधान से अलग होना चाहिए.

‘‘इस फैसले को ले कर कई पहलुओं की तरफ लोगों का ध्यान गया है कि क्या एससी और एसटी के आरक्षण में क्रीमी लेयर देने की जरूरत है?’’

‘‘पर मैं इस फैसले को ऐतिहासिक मानता हूं. तुम इस तरह से यह बात समझो. अगर एक छात्र दिल्ली के किसी बड़े और नामचीन या किसी और बड़े शहर के बढि़या कालेज में पढ़ रहा है और एक छात्र गांवदेहात के किसी साधारण स्कूल या कालेज में पढ़ रहा है, तो इन दोनों छात्रों को एकसमान नहीं माना जा सकता है. अगर एक पीढ़ी आरक्षण का लाभ ले कर आगे बढ़ी है, तो अगली पीढ़ी को आरक्षण नहीं मिलना चाहिए,’’ विजय ने अपना पक्ष रखा.

‘‘ओह, तो यह बात है. पर तुम इस मुद्दे को बड़ा हलके में ले रहे हो. ‘वंचित बहुजन अघाड़ी’ के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने इस फैसले का विरोध किया है. उन्होंने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘सुप्रीम कोर्ट का फैसला एससी के तहत पिछड़ेपन को मापने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले मानदंडों पर चुप है.

‘‘प्रकाश अंबेडकर ने आगे कहा कि आरक्षण से न केवल एससी, एसटी और ओबीसी को लाभ होता है, बल्कि सामान्य श्रेणियों को भी लाभ होता है. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.

‘‘और तो और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सुनाए फैसले के बारे में बौम्बे हाईकोर्ट के वकील संघराज रूपवते ने कहा कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों ने एक बार फिर अदालत की आड़ में वही किया है, जो वे चाहते थे. यह एक ऐसा फैसला है जो हमें जातिविहीन समाज से दूर ले जाता है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उपवर्गीकरण की अनुमति देना 6 जस्टिस की एक बड़ी गलती है.

‘‘वैसे भी एससी और ओबीसी के क्रीमी लेयर अलग होते हैं. इस बारे में ‘नैशनल कौन्फेडरेशन औफ दलित और्गनाइजेशन’ के अध्यक्ष अशोक कुमार भारती इस बारे में कहते हैं कि एससीएसटी सामाजिक, आर्थिक और ऐतिहासिक रूप से वंचित रहे हैं, इन्हें समाज से बाहर रहने के लिए मजबूर किया गया था. इन के खिलाफ अन्याय का भाव अब भी समाज में बरकरार है, जबकि ओबीसी के बारे में ऐसा नहीं है. उन के पास भूमि है, साधन हैं. हालांकि, शिक्षा के मामले में वे भी वंचित हैं.’’

‘‘तो तुम यह मानती हो कि यह सरकार की साजिश है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘एक तरह से कह सकते हैं. जनरल कैटेगरी में जज का बच्चा जज बन सकता है, डाक्टर का बच्चा डाक्टर बन सकता है, इंजीनियर का बच्चा इंजीनियर बन सकता है, पर वंचितों में क्रीमी लेयर की फांस लगा कर उन्हें ऐसा करने से रोक दो कि आप की एक पीढ़ी ने आरक्षण का फायदा ले लिया है, अब अगली पीढ़ी को अपने दम पर यह मुकाम हासिल करना होगा.

‘‘यहां पर एक सामाजिक पहलू भी है. जिस एससीएसटी और ओबीसी के बच्चे अपने मांबाप की बड़ी सरकारी नौकरी की वजह से अब पढ़ाईलिखाई में बेहतर रिजल्ट दे रहे हैं, यह उन्हें मानसिक रूप से दबाने की भी कोशिश है.

‘‘लेकिन टीना डाबी जैसे होनहार जनरल कैटेगरी को टक्कर दे रहे हैं. वे आईएएस टौपर तो थीं ही, उन्हें कथिततौर पर 12वीं जमात के बोर्ड इम्तिहान में 93 फीसदी अंक मिले थे, जिस में राजनीति विज्ञान और इतिहास दोनों में 100 अंक शामिल हैं. सोशल मीडिया पर उन की मार्कशीट वायरल हुई थी,’’ अनामिका बोली.

‘‘मान ली तुम्हारी बात, पर सोशल मीडिया पर कही बात जरूरी नहीं कि सही हो,’’ विजय ने शक जाहिर किया.

‘‘उत्तर प्रदेश में सर्वोदय विद्यालय, मिर्जापुर की 25 छात्राओं में से 12 ने इस साल देश की सब से मुश्किल मैडिकल प्रवेश परीक्षा यानी नीट पास की थी. ये सभी छात्राएं एससी, एसटी और ओबीसी परिवारों से आती हैं.

‘‘तो हम यह नहीं कह सकते हैं कि इन तबकों के बच्चे होनहार नहीं हैं. वे अब पढ़ाईलिखाई की कीमत समझ रहे हैं. अगर उन्हें सही सीख मिले तो वे खुद को साबित करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं,’’ अनामिका बोले जा रही थी.

‘‘ठीक है, ठीक है, पहले तुम पानी पी लो. मान ली तुम्हारी बात. सरकार को एकदम से कोई कड़ा फैसला नहीं लेना चाहिए. चीफ जस्टिस बीआर गवई ने अपनी बात रखी है और उस पर बहस की जा सकती है.

‘‘देश में अभी जाति के नाम की समानता बनाने में समय लगेगा. यह कोई ऐसा फैसला नहीं है कि आज लागू हुआ और कल से देश में बदलाव की बयार बहने लगेगी. यहां बात किसी वंचित समुदाय के मालीतौर पर मजबूत होने की नहीं है, बल्कि उन्हें साथ खड़ा रहने की हिम्मत भी देनी होगी.

‘‘जिन बच्चों के मांबाप ने आरक्षण से खुद को ऊंचा उठाया है, उन बच्चों में थोड़ा आत्मविश्वास आया है, पर अभी दूर तक जाना है और सरकार को कोई भी फैसला लेने से पहले हर पहलू पर गौर करना होगा,’’

विजय ने अनामिका की बात को बैलेंस देते हुए कहा.

‘‘यही आज की जरूरत है. राजनीति और जातिवाद दोनों अलगअलग बातें हैं. अगर कोई सरकार ‘सब का साथ सब का विकास’ का नारा देने की पहल करती है, तो उसे वाकई सब को साथ ले कर चलना होगा, तभी देश में तरक्की दिखाई देगी,’’ अनामिका ने अपनी बात खत्म की.

इस के बाद विजय ने लंच का बिल दिया और वे दोनों उस रैस्टोरैंट से बाहर निकल गए. अभी मेला देखना जो बाकी था. Hindi News Story

Story In Hindi: मजबूरी – क्या रिहान कर पाया तबस्सुम से शादी?

Story In Hindi: आज भी बहुत तेज बारिश हो रही थी. बारिश में भीगने से बचने के लिए रिहान एक घर के नीचे खड़ा हो गया था.

बारिश रुकने के बाद रिहान अपने घर की ओर चल दिया. घर पहुंच कर उस ने अपने हाथपैर धो कर कपड़े बदले और खाना खाने लगा. खाना खाने के बाद वह छत पर चला गया और अपनी महबूबा को एक मैसेज किया और उस के जवाब का इंतजार करने लगा.

छत पर चल रही ठंडी हवा ने रिहान को अपने आगोश में ले लिया और वह किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गया. वह अपने प्यार के भविष्य के बारे में सोचने लगा. रिहान तबस्सुम से बहुत प्यार करता था और उसी से शादी करना चाहता था. तबस्सुम के अलावा वह किसी और के बारे में सोचता भी नहीं था. जब कभी घर में उस के रिश्ते की बात होती थी तो वह शादी करने से साफ मना कर देता था.

रिहान के घर वाले तबस्सुम के बारे में नहीं जानते थे. वे सोचते थे कि अभी यह पढ़ाई कर रहा है इसलिए शादी से मना कर रहा है. पढ़ाई पूरी होने के बाद वह मान जाएगा.

तभी अचानक रिहान के मोबाइल फोन पर तबस्सुम का मैसेज आया. उस का दिल खुशी से झूम उठा. उस ने मैसेज पढ़ा और उस का जवाब दिया. बातें करतेकरते दोनों एकदूसरे में खो गए.

तबस्सुम भी रिहान को बहुत प्यार करती थी और शादी करना चाहती थी. अभी तक उस ने भी अपने घर पर अपने प्यार के बारे में नहीं बताया था. वह रिहान की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रही थी.

ऐसा नहीं था कि दोनों में सिर्फ प्यार भरी बातें ही होती थीं, बल्कि दोनों में लड़ाइयां भी होती थीं. कभीकभी तो कईकई दिनों तक बातें बंद हो जाती थीं. लड़ाई के बाद भी वे दोनों एकदूसरे को बहुत याद करते थे और कभी किसी बात पर चिढ़ाने के लिए मैसेज कर देते थे. मसलन, तुम्हारी फेसबुक की प्रोफाइल पिक्चर बहुत बेकार लग रही है. बंदर लग रहे हो तुम. तुम तो बहुत खूबसूरत हो न बंदरिया. और लड़तेलड़ते फिर से बातें शुरू हो जाती थीं.

पिछले 3 सालों से वे दोनों एकदूसरे को प्यार करते थे और अब जा कर शादी करना चाहते थे. रिहान ने सोच लिया था कि इस साल पढ़ाई पूरी होने के बाद कोई अच्छी सी नौकरी कर वह अपने घर वालों को तबस्सुम के बारे में बता देगा. अगर घर वाले मानते हैं तो ठीक, नहीं तो उन की मरजी के खिलाफ शादी कर लेगा. वह किसी भी हाल में तबस्सुम को खोना नहीं चाहता था.

एक दिन रिहान की अम्मी बोलीं, ‘‘तेरे मौसा का फोन आया था. उन्होंने तुझे बुलाया है.’’

‘‘मुझे क्यों बुलाया है? मुझ से क्या काम पड़ गया उन्हें?’’ रिहान ने पूछा.

‘‘अरे, मुझे क्या पता कि क्यों बुलाया है. वह तो हमें वहीं जा कर पता चलेगा,’’ उस की अम्मी ने कहा.

कुछ देर बाद वे दोनों मोटरसाइकिल से मौसा के घर की तरफ चल दिए. रिहान के मौसा पास के शहर में ही रहते थे. एक घंटे में वे दोनों वहां पहुंच गए. वहां पहुंच कर रिहान ने देखा कि घर में बहुत लोग जमा थे. उन में उस के पापा, उस की शादीशुदा बहन और बहनोई भी थे.

यह सब देख कर रिहान ने अपनी अम्मी से पूछा, ‘‘इतने सारे रिश्तेदार क्यों जमा हैं यहां? और पापा यहां क्या कर रहे हैं? वे तो सुबह दुकान पर गए थे?’’

अम्मी बोलीं, ‘‘तू अंदर तो चल. सब पता चल जाएगा.’’ रिहान और उस की अम्मी अंदर गए. वहां सब को सलाम किया और बैठ कर बातें करने लगे.

तभी रिहान के मौसा चिंतित होते हुए बोले, ‘‘आसिफ की हालत बहुत खराब है. वह मरने से पहले अपनी बेटी की शादी करना चाहता है.’’

आसिफ रिहान के मामा का नाम था. कुछ दिन पहले हुई तेज बारिश में उन का घर गिर गया था. घर के नीचे दब कर मामा के 2 बच्चों और मामी की मौत हो गई थी. मामा भी घर के नीचे दब गए थे, लेकिन किसी तरह उन्हें निकाल कर अस्पताल में भरती करा दिया गया था. वहां डाक्टर ने कहा था कि वे सिर्फ कुछ ही दिनों के मेहमान हैं. उन का बचना नामुमकिन है.

‘‘फिर क्या किया जाए?’’ रिहान की अम्मी बोलीं.

‘‘आसिफ मरने से पहले अपनी बेटी की शादी रिहान के साथ करा देना चाहता है. यह आसिफ की आखिरी ख्वाहिश है और हमें इसे पूरा करना चाहिए,’’ मौसा की यह बात सुन कर रिहान एकदम चौंक गया. उस के दिल में इतना तेज दर्द हुआ मानो किसी ने उस के दिल पर हजारों तीर एकसाथ छोड़ दिए हों. उस का दिमाग सुन्न हो गया.

‘‘ठीक है, हम आसिफ के सामने इन दोनों की शादी करवा देते हैं,’’ रिहान की अम्मी ने कहा.

रिहान मना करना चाहता था, लेकिन वह मजबूर था. उसी दिन शादी की तैयारी होने लगी और आसिफ को भी अस्पताल से मौसा के घर ले आया गया. शाम को दोनों का निकाह करवा दिया गया.

शादी के बाद रिहान अपनी बीवी और मांबाप के साथ घर आ गया. पूरे रास्ते वह चुप रहा. उस का दिमाग काम नहीं कर रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था कि उस के साथ हुआ क्या है.

घर पहुंच कर रिहान कपड़े बदल कर छत पर चला गया. उस ने तबस्सुम को एक मैसेज किया. थोड़ी देर बाद तबस्सुम का फोन आया. रिहान के फोन उठाते ही तबस्सुम गुस्से में बोली, ‘‘कहां थे आज पूरा दिन? एक मैसेज भी नहीं किया तुम ने.’’

तबस्सुम नाराज थी और वह रिहान को डांटने लगी. रिहान चुपचाप सुनता रहा. जब काफी देर तक वह कुछ नहीं बोला तो तबस्सुम बोली, ‘‘अब कुछ बोलोगे भी या चुप ही बैठे रहोगे?’’

‘‘मेरी शादी हो गई है आज,’’ रिहान धीमी आवाज में बोला.

तबस्सुम बोली, ‘‘मैं सुबह से नाराज हूं और तुम मुझे चिढ़ा रहे हो.’’

‘‘नहीं यार, सच में आज मेरी शादी हो गई है. उसी में बिजी था इसलिए मैं बात नहीं कर पाया तुम से.’’

‘‘क्या सच में तुम्हारी शादी हो गई है?’’ तबस्सुम ने रोंआसी आवाज में पूछा.

‘‘हां, सच में मेरी शादी हो गई है,’’ रिहान ने दबी जबान में कहा. उस की आवाज में उस के टूटे हुए दिल और उस की बेबसी साफ झलक रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे वह जीना ही नहीं चाहता था.

‘‘तुम ने मुझे धोखा दिया है रिहान,’’ तबस्सुम ने रोते हुए कहा.

‘‘मैं कुछ नहीं कर सकता था, मेरी मजबूरी थी,’’ यह कह कर रिहान भी रोने लगा.

‘‘तुम धोखेबाज हो. तुम झूठे हो. आज के बाद मुझे कभी फोन मत करना,’’ कह कर तबस्सुम ने फोन काट दिया. फोन रख कर रिहान रोने लगा. वहां तबस्सुम भी रो रही थी. Story In Hindi

Hindi Funny Story: गर्व से कहो हम भ्रष्ट हैं

Hindi Funny Story, लेखक – जे. शर्मा

बस कंडक्टर की रोचक बातों ने मेरा दिल जीत लिया था. मैं जब भी अपना 500 रुपए का कड़क नोट उस की तरफ बढ़ाता, वह बारबार मेरी अनदेखी करते हुए आगे निकल जाता और दूसरी सवारियों की टिकटें काटने लगता.

मेरा माथा ठनका कि आज कुछ न कुछ गलत हो कर रहेगा. यह 500 का नोट कई बार बहुत बड़ी मुसीबत में डाल देता है.

खैर, सब की टिकटें काटने के बाद वह बस कंडक्टर मुसकराता हुआ मेरे पास आ कर बैठते हुए बोला, ‘‘बाबूजी, मैं ने आप को पहले भी इस रूट पर देखा है. आप फूड सप्लाई महकमे में काम करते हैं न?’’

मैं ने सोचा कि शायद इस गलतफहमी में मैं टिकट लेने से बच जाऊंगा. लिहाजा, मैं ने हामी भर दी.

कंडक्टर ने अपनी बात जारी रखी, ‘‘बाबूजी, हमारे चाचा के साले का लड़का भी आप के महकमे में है.

संपत दलाल… नाम सुना होगा आप ने… बहुत ऊंची पोस्ट पर है. राजधानी में एक बड़ी सी कोठी है उस की.

‘‘वैसे, एक बात है बाबूजी कि आप के महकमे में पैसा बहुत है. राइस मिल या फ्लोर मिल वालों को जरा सा इशारा कर दो, बोरी भर कर नोट आप के आंगन में फेंक जाएंगे. आप रातभर बैठे गिनते रहो, सुबह हो जाएगी…’’

वह थोड़ी सांस ले कर आगे बोला, ‘‘मेरा तो यही मानना है कि मुझे अगले जनम में फूड सप्लाई की नौकरी मिले, चाहे चपरासी ही क्यों न बनना पड़े…

‘‘और एक बात सुनो… हमारे पड़ोस में मोहनलाल की कोठी है. वह कस्टम महकमे में चपरासी है. क्या शान है उस की. गाड़ी है, घर में एयरकंडीशनर लगा है. वह हर समय मोबाइल फोन पर बातें करता रहता है और उस के घर के लोग काजूकिशमिश ऐसे चबाते हैं, जैसे मूंगफली के दाने चबा रहे हों. यह सब देख कर मेरे मन में लड्डू फूटने लगते हैं…’’

लेकिन कुछ देर बाद वह थोड़े उदास लहजे में बोला, ‘‘और एक हम सरकारी बसों के कंडक्टर हैं कि सारी उम्र रुपए 10 रुपए का टांका लगालगा कर ही बूढ़े हो जाते हैं. पता नहीं, हमारा अच्छा समय कब आएगा.

‘‘मैं ने 2 लाख रुपए की रिश्वत दे कर अपने छोटे बेटे को म्यूनिसिपल के दफ्तर में चपरासी लगवा दिया है, लेकिन वह ससुरा तो मुफ्त में लोगों के काम करवाता फिरता है. मैं उस से कहता हूं कि 2 लाख रुपए जमा करने में मेरी कमर टेढ़ी हो गई है, वे तो वसूल कर के ला.

‘‘मैं ने भी उसे बोल दिया है कि बेटा, जल्दी ही तेरी शादी कर के तुझे अलग कर दूंगा. जब तेरे बच्चे होंगे और खर्च बढ़ेगा, तब तू खुद ही हाथपैर मारेगा. सारे उसूल धरे के धरे रह जाएंगे.

‘‘अच्छा बाबूजी, आप से हुई बातें बहुत मजे की रहीं. रास्ता कट गया. आप वह 500 रुपए का नोट दिखा रहे थे न… लाओ, मैं आप का टिकट बना देता हूं.

‘‘आजकल टिकट चैकर भी बहुत दुखी करते हैं. महीना तो बंधा है, मगर फिर भी उन की नीयत खराब रहती है. सोचते हैं कि पता नहीं कंडक्टर कितनी लूट मचाते हैं.’’

मीठीमीठी बातें करता हुआ वह कंडक्टर 35 रुपए अपनी जेब में रख लेता है और टिकट नहीं बनाता.

बाकी रुपए वापस करते हुए वह कहता है कि आप जहां कहोगे, हम वहीं उतार देंगे.

मैं भी सोचता हूं कि चलो इसी बहाने मेरे ईरिकशा के 20 रुपए बच जाएंगे. Hindi Funny Story

Superstition: जानलेवा दगना

Superstition: मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में रहने वाले आदिवासी समुदाय में अगर ठंड के समय जब नवजातों को निमोनिया या डबल निमोनिया हो जाता है, तब उन्हें सांस लेने में तकलीफ होती है.

पेटदर्द, दस्त की शिकायत पर परिवार वाले बीमार बच्चे को इलाज के लिए अस्पताल न ले जा कर नवजातों और बच्चों को को ठीक करने के लिए दगना कुप्रथा का सहारा लेते हैं.

आदिवासियों का मानना है कि बच्चों को यह समस्या किसी बीमारी की वजह से नहीं, बल्कि रूहानी ताकत के चलते होती है. ऐसे में दागने से उन के बच्चों की यह बीमारी ठीक हो जाएगी.

जब नवजात को सांस लेने में तकलीफ होती है या दस्त के कारण उस के पेट की नसें बाहर दिखने लगती हैं, तब उन्ही नसों को गरम लोहे की कील, काली चूड़ी, नीम या बांस की डंठल से दागा जाता है.

यह काम गांव में ?ाड़फूंक करने वाली विशेष समुदाय की महिलाएं करती हैं. इन महिलाओं को नवजातों की मालिश के अलावा दागने की जिम्मेदारी दी जाती है. इन इलाकों में काली चूड़ी से टोटका दूर करने की भी कुरीति चलन में है.

दागना है खौफनाक

मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल गांवों में यह प्रथा छोटे बच्चों के लिए बहुत पीड़ादायी है और ज्यादातर मामलों में दागे जाने वाले बच्चों और बच्चियों की मौत हो जाती है, क्योंकि वे दर्द सहन नहीं कर पाते हैं.
जरा सोचिए, गरम सलाखों से महज कुछ ही दिनों के मासूम को अगर जगहजगह पर दाग दिया जाए, तो उसे कितनी तकलीफ होती होगी. उस तकलीफ को आप सिर्फ एहसास ही कर सकते हैं, जबकि वे मासूम तो बोल कर बयां भी नहीं कर सकते हैं.

दर्दनाक घटनाएं

मध्य प्रदेश के शहडोल जिले में सिंहपुर थाना क्षेत्र का एक गांव है कठौतिया. इसी गांव में 3 महीने की बच्ची रुचिका कोल को दागने की एक घटना हुई थी. बच्ची की मां रोशनी कोल का कहना है कि बच्ची को सांस लेने में आ रही दिक्कत की वजह से उसे दागने वाली स्थानीय महिला को दिखाया.

लेकिन दागने के बाद बच्ची की हालत बेहद नाजुक हो गई, तो उसे शहडोल के जिला सरकारी मैडिकल कालेज में भरती करवाया गया, जो गांव कठौतिया गांव से तकरीबन 10 किलोमीटर की दूरी पर है, लेकिन बच्ची को नहीं बचाया जा सका.

इस मामले में डाक्टरों का कहना है कि सलाखों से दागने के बाद बच्ची के निमोनिया का इन्फैक्शन और बढ़ गया, जो उस की मौत की वजह बन गया.

इस घटना के कुछ दिन बाद ही बाद कठौतिया गांव से 3 किलोमीटर दूर सलामतपुर गांव में दागने का एक और मामला आया. इस मामले में 3 महीने की बच्ची को 24 बार गरम सलाखों से दागा गया था, पर बाद में उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, लेकिन इलाज के दौरान उस की भी मौत हो गई.

जागरूकता की कमी

एक संस्था गौतम बुद्ध जागृति समिति के सचिव श्रीधर पांडेय ने बताया कि स्वास्थ्य महकमे ने दागने जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए आशा कर्मी, एएनएम और आंगनबाडि़यों को घरघर निगरानी का जिम्मा सौंपा है, जो बच्चों के बीमार होने पर उन्हें सीधे अस्पताल ले जाने में मदद करेंगी.

लेकिन बीमार बच्चों के परिवार वाले चुपके से बच्चे को झाड़फूंक करने वाली महिला के पास ले जाते हैं, जहां दागने की वजह से हालत बिगड़ने पर ही वे लोग बच्चे को अस्पताल ले जाने को मजबूर होते हैं.

स्वास्थ्य महकमे से जुड़ी एक आशाकर्मी का कहना कि इस क्षेत्र में लंबे से समय से चली आ रही इस कुप्रथा के चलते ही यहां के लोग अस्पताल का रुख कम ही करते हैं.

श्रीधर पांडेय बताते हैं कि दगना कुप्रथा को ले कर बुजुर्गों में आज भी बड़ा विश्वास देखने को मिल रहा है. प्रशासन ने भले ही उन्हें जागरूक करने के लिए गांव में रैली और दीवारों पर नारे लिखवाए हों, लेकिन जो विश्वास उन के मन में बैठा है उसे बाहर निकलना बड़ी चुनौती है.

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि नवजातों के अलावा उन के शरीर के दर्द, जोड़ों का दर्द समेत दूसरी बीमारियों के इलाज के लिए उन के पास सब से सटीक इलाज दागना ही होता है.

इस मसले पर यहां के जागरूक स्थानीय निवासियों और प्रशासन का कहना है कि आदिवासी इलाकों में होने वाली दागने की कुप्रथा दशकों पुरानी है, जिस की रोकथाम और जागरूकता के लिए सरकार, स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्य महकमे सहित दर्जनों एनजीओ भी काम कर रहे हैं. फिर भी बच्चों के साथ होने वाली दागने की घटनाओं पर रोक नहीं लग पा रही है.

कुपोषण है वजह

श्रीधर पांडेय बताते हैं कि ज्यादातर गरीब आदिवासी परिवारों के बच्चे कुपोषण से ग्रसित होते हैं. इस का कारण गर्भावस्था के दौरान मां का खानपान है, क्योंकि इन महिलाओं को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता है और बच्चा जन्म लेने के बाद कुपोषण का शिकार हो जाता है, जिस की वजह से बच्चा बारबार बीमार पड़ता है.

बच्चे के बीमार पड़ने पर यहां के लोग इलाज के लिए तांत्रिकों, ओझाओं वगैरह के पास जाते हैं या झोलाछाप डाक्टरों के पास ही जाते हैं. जहां कई बार सलाखों से दागने के उपाय के साथ इलाज किया जाता है.

कानून का डर नहीं

दगना प्रथा की रोकथाम के लिए बच्चे के परिवार वालों और दागने वाली महिला तांत्रिकों के खिलाफ आपराधिक मामलों में केस भी दर्ज किए जाते हैं. इस के बावजूद इस प्रथा पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.

शहडोल जिले की बंधवा की रहने वाली रामबाई अपने मायके उमरिया के बकेली गई थी. यहां उस के बच्चे राजन की तबीयत बिगड़ गई. गांव में इलाज नहीं मिलने पर रामबाई की मां दाई को बुला लाई.

दाई ने घर में गरम चूड़ी से बच्चे को पेट पर कई बार दागा. इस के बाद उस बच्चे की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई और उसे झटके आने लगे.

डेढ़ महीने के इस बच्चे के मांबाप अस्पताल ले गए जहां डाक्टरों ने पाया कि उस बच्चे की सांसें काफी तेज चल रही थीं. पेट पर सूजन और दागने के काफी निशान थे. बच्चा बेहद गंभीर हालत में भरती किया गया था. इस वजह से उस ने दम तोड़ दिया.

अस्पताल प्रबंधन ने इस की जानकारी पुलिस को दी. इस मामले में शहडोल पुलिस ने गांव की झाड़फूंक करने वाली महिला सहित बच्चे के दादा और मां के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

भयावह हैं आंकड़े

पत्रकार अनुराग कुमार श्रीवास्तव ने शहडोल, उमरिया और अनूपपुर जिलों में ऐसी घटनाओं पर जानकारी इकट्ठा करने के लिए कई लोगों से बातचीत की और दागना प्रथा से प्रभावित आंकड़ों को जमा किया.

पत्रकार अनुराग कुमार श्रीवास्तव बताते हैं कि पिछले 5 साल में तीनों जिलों से तकरीबन 4,000 बच्चे दगना कुप्रथा का शिकार हो चुके हैं. इन में से तकरीबन 2 दर्जन बच्चे अपनी जान तक गंवा चुके हैं. इस के बावजूद यह कुप्रथा रुकने का नाम नहीं ले रही है.

ओडिशा भी पीछे नहीं

श्रीधर पांडेय जिस संस्था से जुड़े हैं, वह ओडिशा राज्य में भी लोगों को अंधविश्वास और कुपोषण से बचाव के मसले पर काम कर रही है. उन का कहना है कि ओडिशा में अंधविश्वास के चलते नवजात बच्चों को ‘बुरी आत्मा’ से बचाने के लिए गरम लोहे से दागा जाता है.

श्रीधर पांडेय के मुताबिक, ओडिशा स्थानीय भाषा में ‘चेंका’ कही जाने वाली प्रथा, आमतौर पर बच्चे के जन्म के 7 से 21 दिनों के बाद की जाती है. कभीकभार मातापिता तब तक इंतजार करते हैं, जब तक कि उन्हें बच्चे के पेट पर नीली इस दिखाई नहीं दे जाती, जिसे वे स्थानीय रूप से ‘पिल्ही’ नामक पेट दर्द की मूल वजह मानते हैं.

जब कोई बच्चा बीमार पड़ता है या नीली नस दिखाई देती है, तो समुदाय का मानना है कि बच्चे पर किसी आत्मा का असर है और गरम लोहे से बच्चे के पेट को दागने से आत्मा बाहर निकल जाएगी और बच्चा बुरी नजर से बच जाएगा. लेकिन ज्यादातर मामलों में बच्चों की मौत हो जाती है.

तोड़ आसान नहीं

सीनियर डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि अंधविश्वास से केवल गरीब और आदिवासी ही नहीं जकड़े हैं, बल्कि इस की जद में पढ़ेलिखों की एक भारी जमात भी शामिल है, इसलिए जब पढ़ालिखा इनसान अंधविश्वास का शिकार हो सकता है, तो गरीब आदिवासियों का अंधविश्वास में विश्वास करना आम बात है.

डाक्टर वीके वर्मा आगे कहते हैं कि सोशल मीडिया से ले कर पूरा तंत्र इस तरह के पोंगापंथ का शिकार है, इसलिए अंधविश्वास की दीवार को तोड़ना आसान नहीं है. वे दिल्ली प्रैस के अंधविश्वास के पोल खोलने वाले लेखों से बेहद प्रभावित रहते हैं. उन का मानना है कि अगर मीडिया अंधविश्वास को ले कर जनता को जागरूक करे, तो भी इस पर काफी लगाम लगाई जा सकती है. Superstition

Bollywood Latest Updates: भड़क गईं नोरा फतेही

Bollywood Latest Updates: गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम से जुड़े एक अंडरवर्ल्ड ड्रग सिंडिकेट पर पुलिस की जांच के दौरान श्रद्धा कपूर और कई दूसरी फिल्म हस्तियों के साथ नोरा फतेही का नाम सामने आया था. यह सिंडिकेट कथिततौर पर माफिया सलीम डोला चलाता था, जो दाऊद इब्राहिम का सहयोगी बताया जाता है.

इस सिलसिले में नोरा फतेही ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘आप जो भी पढ़ते हैं उस पर यकीन मत कीजिए. ऐसा लगता है कि मेरा नाम एक ईजी टारगेट है. लेकिन मैं इस बार ऐसा नहीं होने दूंगी. ऐसा पहले भी एक बार हो चुका है, तुम लोगों ने झूठ बोल कर मुझे बरबाद करने की कोशिश की थी और यह काम नहीं आया…

‘मैं चुपचाप देखती रही कि कैसे हर कोई मेरे नाम को बदनाम करने और मेरी इज्जत मिट्टी में मिलाने की पूरी कोशिश कर रहा था. प्लीज, मेरे नाम और इमेज का इस्तेमाल उन हालत में करने से बचें, जिन का मुझ से कोई लेनादेना नहीं है वरना इस की बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ेगी.’

सीने के 2 पहाड़ से पाया छुटकारा

फिल्म कलाकार और मौडल शर्लिन चोपड़ा अपने काम से ज्यादा अपनी देह से पहचानी जाती हैं. उन्होंने अपने बदन को और सैक्सी बनाने के लिए एक जमाने में ब्रैस्ट इंप्लांट कराया था, जिस में सर्जरी कर के छाती को बड़ा कर दिया जाता है.

पर हाल ही में शर्लिन चोपड़ा ने दोबारा सर्जरी करा कर ब्रैस्ट इंप्लांट को हटवा दिया है. इस की वजह पूछने पर उन्होंने बताया, ‘‘मैं इतना हलका महसूस कर रही हूं जैसे बटरफ्लाई. ऐसा बिलकुल नहीं लगता है कि मेरे सीने पर 2 पहाड़ हैं. ऐसा लगता है कि मैं मुक्त हो चुकी हूं, उस दर्द से और जो कुछ चीजों से जिन से मैं जूझ रही थी.’’

शर्लिन चोपड़ा ने ऐसी सर्जरी कराने वालों को सलाह दी है कि वे इस के नुकसान और फायदे समझ कर ही ब्रैस्ट इंप्लांट कराएं.

‘गबरू’ सनी को मिला सलमान का सहारा

जब से ऐक्टर सनी देओल फिल्मों में दोबारा हिट हुए हैं, उन के हाथ कई बड़ी फिल्में लग गई हैं. अभी सुनने में आया है कि उन्होंने एक फिल्म ‘गबरू’ की शूटिंग भी गुपचुप तरीके से पूरी कर ली है और यह फिल्म अगले साल सिनेमाघरों में आ सकती है.

इस फिल्म से जुड़ी एक बड़ी खबर यह आई है कि इस में सनी देओल के साथ सलमान खान भी दिखाई दे सकते हैं और उन के 3-4 दमदार सीन हो सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो यह दर्शकों के लिए डबल धमाका होगा.

वैसे, सनी देओल के फैन उन की फिल्म ‘बौर्डर 2’ का भी बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

गिरिजा ओक की पीठ पर फिराई उंगली

सार्वजनिक जगहों पर केवल आम लड़कियां ही सिरफिरे लड़कों की गंदी हरकतों का शिकार बनती हों, ऐसा बिलकुल नहीं है, क्योंकि ‘तारे जमीन पर’, ‘शोर इन द सिटी’ और ‘जवान’ जैसी फिल्मों में काम करने वाली हीरोइन गिरिजा ओक ने बताया कि किस तरह उन्हें भी एक लड़के की छेड़छाड़ का शिकार होना पड़ा था.

एक इंटरव्यू में गिरिजा ओक ने बताया, ‘‘लोकल ट्रेनों में लोग आप को छू कर चले जाते हैं या जानबूझ कर आप से टकरा जाते हैं… एक लड़के ने मेरे साथ गलत बरताव किया था. उस ने अपनी उंगली मेरी पीठ पर फिराई. मेरी गरदन से ले कर मेरी पीठ तक और फिर तेजी से घूम गया.’’

जब तक गिरिजा ओक को समझ आया कि क्या हुआ था, तब तक वह लड़का गायब हो चुका था. वे उसे पहचान नहीं पाईं, न ही उस के बारे में कुछ जानती थीं. Bollywood Latest Updates

Domestic Violence: पिटती औरतें – खामोश समाज

Domestic Violence: ‘डबल इंजन’ की सरकार वाले उत्तर प्रदेश में औरतों की क्या गत बन चुकी है, इस पर एक नजर डालते हैं. मामला नेपाल से सटे सिद्धार्थनगर जिले का है, जहां के लोटन कोतवाली क्षेत्र में एक पति ने हैवानियत की सारी हदें पार करते हुए लाठीडंडे से बुरी तरह पिटाई कर अपनी पत्नी को अधमरा कर दिया.

उस औरत को इतना मारा गया कि उस का चेहरा काला पड़ गया और एक हाथ टूट गया है. औरत के प्राइवेट पार्ट को भी डंडे से गहरी चोट पहुंचाई गई.

उस औरत को गंभीर हालत में मैडिकल कालेज, गोरखपुर में भरती कराया गया. पीडि़ता के भाई की शिकायत पर पुलिस ने पति के खिलाफ केस दर्ज किया.

पूरा मामला कुछ इस तरह है कि उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के कोल्हुई थाना क्षेत्र के एक गांव की इस औरत की शादी सिद्धार्थनगर जिले के लोटन कोतवाली क्षेत्र के एक गांव में हुई थी.

बताया जा रहा है कि पति आएदिन मारनेपीटने के साथसाथ अपनी पत्नी पर तमाम तरह के जुल्म करता था. इस हैवानियत से तंग आ कर वह औरत अपने मायके चली गई थी, पर 16 नवंबर, 2025 को आपसी सुलहसमझौते के बाद वह अपनी ससुराल वापस आ गई थी, लेकिन आरोप है कि 17 नवंबर, 2025 की रात पति ने उस की लाठीडंडों, जूतों से पिटाई की और थप्पड़ बरसाए.

इसी साल सितंबर महीने की एक घटना है. आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले में एक शख्स ने अपनी पत्नी को खंभे से बांध कर न केवल बैल्ट से बुरी तरह पीटा, बल्कि बारबार लातों से भी हमला किया. इस दौरान वह औरत चीखतीचिल्लाती रही, दया की भीख मांगती रही, लेकिन पति उस पर लगातार वार करता रहा.

पुलिस के मुताबिक, आरोपी पति बलराजू तारलुपाडु मंडल में अपनी पहली पत्नी भाग्यम्मा के साथ रहता था, जबकि उस की दूसरी पत्नी भी है. हाल ही में वह अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहने के बाद गांव लौटा था.

बताया गया कि बलराजू किसी बीमरी से जूझ रहा है और उस ने अपनी पहली पत्नी भाग्यमा से इलाज के लिए पैसे लाने को कहा था.

भाग्यम्मा ने पैसे देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह 4 बच्चों की अकेली जिम्मेदारी उठा रही थी. इसी बात से नाराज हो कर बलराजू ने उसे खंभे से बांध दिया और बैल्ट से बुरी तरह पीटा.

पुलिस ने यह भी बताया कि बलराजू को अपनी पत्नी पर किसी गैरमर्द के साथ नाजायज रिश्ता होने का शक था और इसी शक ने उस के गुस्से को और ज्यादा भड़का दिया था.

इस तरह की घटनाएं रोजाना की आम बात हैं. कुछ घटनाओं की खबरें बन जाती हैं, बाकी के बारे चुप्पी साध ली जाती है. यहां सिर्फ पति द्वारा अपनी पत्नी को पीटने की बात नहीं हो रही है, बल्कि औरतों का यह पिटना इतना ज्यादा आम हो गया कि कोई भी ऐरागैरा उन पर हाथ साफ करना अपना बुनियादी हक समझता है.

इसी साल जनवरी महीने का एक वाकिआ है. महाराष्ट्र के नवी मुंबई की एक हाउसिंग सोसाइटी में चल रही एक बैठक के दौरान 5 लोगों ने 44 साल एक औरत को कथिततौर पर पीट कर घायल कर दिया था.

पुलिस ने बताया कि पीडि़ता ने मीटिंग के दौरान कुछ सवाल उठाए, जो आरोपियों को पसंद नहीं आए. फिर उन्होंने कथिततौर पर उस औरत के साथ गालीगलौज की, उसे जमीन पर धकेल दिया और कई मुक्के मारे.

सवाल उठता है कि औरतों के साथ यह मारपिटाई होती ही क्यों है? इस का सीधा सा जवाब है कि मर्द द्वारा औरत में डर बिठाना और उस पर काबू रखना. ज्यादातर मर्दों के लिए मर्दानगी की यही परिभाषा है.

लेकिन क्या कोई मर्द इतना ज्यादा गुस्सैल हो सकता है कि उस की पत्नी नाश्ते में परोसी गई साबूदाना की खिचड़ी में नमक कम डाल दे, तो वह अपना आपा खो कर उस की हत्या ही कर दे?

जी हां, साल 2022 में मुंबई के निकट ठाणे में एक बैंक क्लर्क निकेश घाघ ने गुस्से में अपनी 40 साल की पत्नी की गला घोंट कर हत्या कर दी, क्योंकि उस ने जो साबूदाना खिचड़ी परोसी थी, वह बहुत नमकीन थी.

एक अदना से बैंक क्लर्क ने अपनी पत्नी को चुटकीभर नमक की कीमत समझा दी. बेहद शर्मनाक. इस से भी ज्यादा शर्म की बात तो यह है कि भारतीय समाज में आज भी गांवदेहात हो या बड़े शहर, औरतों को मर्दों की पिछलग्गू समझा जाता है.

यह छोटी सोच समाज में गहरे तक पैठी हुई है कि औरत को हमेशा मर्द की गुलाम बन कर रहना चाहिए, वह किसी भी तरह का फैसला लेने के काबिल नहीं होती है, उसे अपने मर्द की सेवा करनी चाहिए और उसे उस से कम कमाना चाहिए, और भी न जाने क्याक्या.

अगर गलती से किसी औरत ने इस सोच को चुनौती दी या खुद को मर्द से बेहतर समझा तो पति को पूरा हक है कि वह उसे ‘उस की सही जगह’ दिखा दे, फिर इस के लिए औरत की खाल ही क्यों न उधेड़ दी जाए.

अपना भाग्य मानती औरतें

भारत में औरतों को धर्म के जंजाल में इस कदर उलझा दिया गया है कि उन्हें लगता है कि मर्द से पिटना भी उन के पिछले जन्मों की सजा है. बहुत सी औरतें अपने मायके में इस तरह से पाली जाती हैं कि वे पितृसत्तात्मक नियमों को गांठ बांध लेती हैं, जैसे ससुराल में लड़की की डोली जाती है और अर्थी ही बाहर निकलती है. यहां यह छिपी सोच है कि ससुराल में कुछ भी भूचाल आ जाए, तुम्हें चूं तक नहीं करनी है.

‘घर में जो हो रहा है, उसे घर तक ही रखना है’, ‘अपने बड़ों के सामने जबान नहीं चलानी है’, ‘पति परमेश्वर होता है’, ‘पति अगर पीट दे तो बात का बतंगड़ नहीं बनाना है’, ‘शर्म औरत का गहना है’, और भी न जाने किस तरह की सीख दी जाती हैं कि अनपढ़ से ले कर एक पढ़ीलिखी औरत भी मर्द के ‘पिटाई पुराण’ का हिस्सा बन जाती है, बेवजह.

जब से भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार आई है, तब से धर्म के नाम पर औरतों के सिर पर अंधविश्वास के इतने घड़े लाद दिए गए हैं कि उन्हें अपने पर हुई घरेलू हिंसा का बोझ महसूस ही नहीं होता है.

बहुत सी औरतों को लगता है कि मर्द की सत्ता के बगैर वे इस समाज में नहीं रह सकतीं और तथाकथित धर्मकर्म के बिना इस दुनिया में, फिर मर्द चाहे उन की इसी दुनिया में चमड़ी न उधेड़ दें.

गरीब घरों की वंचित समाज की औरतों की हालत तो और ज्यादा बुरी है. वे शरीर की मजबूत होती हैं, मर्दों जितनी शरीरिक मेहनत करती हैं, बच्चों को अपने दम पर पालती हैं, फिर भी उन के साथ खूब मारपीट की जाती है.

यहां पर उन की और पति की अनपढ़ता, पति का बेरोजगार होना, पति की नशाखोरी, दूसरी औरत का चक्कर जैसी बहुत सी वजहें होती हैं, जो घर में क्लेश लाती हैं.

ऐसी औरतों के पास न तो पैसा होता है और न ही कहीं जाने की हिम्मत. बच्चों को पालपोस कर बड़ा करने की जिम्मेदारी भी इन पर होती है. अगर कहीं पति ने सिर से छत छीन ली, तो पूरा परिवार ही बिखर जाएगा. फिर इन की समाज में कहीं कोई सिक्योरिटी भी नहीं होती है. घर पर जैसा भी है, मर्द का साया तो साथ है न, इस की एवज में उस ने 2-4 लात जमा भी दी तो क्या हुआ, यह सोच भी औरतों को पिटने पर मजबूर करती है.

‘कास्ट मैटर्स’ के लेखक और दलित ऐक्टिविस्ट डाक्टर सूरज येंगडे बीबीसी के माध्यम से कहते हैं, ‘‘दलित औरतें दुनिया में सब से ज्यादा शोषित हैं. वे घर के अंदर और बाहर दोनों जगहों पर संस्कृति, सामाजिक संरचना और सामाजिक संस्थाओं की भुक्तभोगी हैं. दलित महिलाओं के खिलाफ लगातार होने वाली हिंसा में ये बातें नजर आती हैं.’’

बीबीसी की एक खबर के मुताबिक, ‘इंटरनैशनल दलित सौलिडैरिटी नैटवर्क’ ने दलित औरतों को झेलनी पड़ रही हिंसा को 9 हिस्सों में बांटा था, जिन में से 6 उन की जाति पर आधारित पहचान के चलते होती हैं और 3 जैंडर की पहचान के चलते.

जाति के नाम पर उन्हें यौन हिंसा, गालीगलौज, मारपीट, हमलों का शिकार होना पड़ता है, तो जैंडर के चलते उन्हें कन्या भ्रूण हत्या, जल्दी शादी के चलते बाल यौन अत्याचार और घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है.

मर्दों की ओछी सोच

साल 2019 की ‘औक्सफैम इक्ववैलिटी और इनइक्वैलिटी’ की एक रिपोर्ट पर नजर डालते हैं. इस रिपोर्ट में बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तर प्रदेश के तकरीबन 1,000 परिवारों का सर्वे किया गया था, जिस में यह बात सामने आई थी कि कई घरों के लोगों का ऐसा मानना था कि छोटीछोटी बातों पर औरतों पर हाथ उठाना गलत नहीं है.

यह हाल तो तब था जब रिपोर्ट के मुताबिक यह बात सामने आई थी कि जितनी गृहणियां घर संभालती हैं, अगर उन के कामकाज का हिसाब लगाया जाए, तो ये देश की जीडीपी यानी ग्रोस डोमैस्टिक प्रोडक्ट के 3.1 फीसदी के बराबर होगा.

इस के बावजूद इस रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि कराए गए सर्वे में शामिल परिवारों में से तकरीबन 53 फीसदी लोगों ने इस बात को माना कि अगर औरतें बच्चों की देखभाल में कोताही करती हैं, तो उन्हें फटकारना जायज है.

औरतों द्वारा खाना न पकाने पर 41 फीसदी लोगों ने उन्हें मारनेपीटने की वकालत की वहीं 42 फीसदी लोगों ने पीने का पानी न भरने और ईंधन न जमा करने पर भी उन की पिटाई करने की बात स्वीकारी.

54 फीसदी लोगों ने माना कि अगर औरत बिना बताए घर से बाहर घूमने जाती है, तो उसे डांटनाफटकारना गलत नहीं है. वहीं कुछ लोगों ने इस के लिए औरतों पर हाथ उठाने की बात को भी स्वीकार किया.

मर्द समाज की यह सोच उसे परिवार से मिली है. अगर कोई नकारा और उद्दंड लड़का है, तो परिवार वाले यह सोच कर उस की शादी करा देते हैं कि बहू अपनेआप संभाल लेगी, पर जरा सोचिए कि जो लड़का अपने गुस्सैल स्वभाव के चलते मांबाप को कुछ नहीं समझता है, गालीगलौज करता है, वह कल की आई लड़की की सुन लेगा?

उधर, लड़की के कान में बचपन से ही फूंक दिया जाता है कि पति जो कहे, तुम सिर झुका कर मान लेना. बैंक क्लर्क निकेश घाघ ने नमक की कमी में अपनी पत्नी का गला घोंट दिया. यह कोई एक पल में घटी घटना नहीं थी. ऐसा पहले भी हुआ होगा. उस ने अपनी पत्नी पर पहले भी खाने की थाली उछाल दी होगी या फिर किसी और बात पर उसे लतिया दिया होगा, पर आसपड़ोस वालों ने इसे ज्यादा सीरियसली नहीं लिया. अगर पत्नी ने यह बात अपने मायके वालों को बताई होगी, तो भी उन्होंने चुप रहने की सलाह दी होगी.

जब लड़की को हर जगह से हताशा हाथ लगती है, तो वह इसे अपनी किस्मत मान लेती है. जिन मांबाप ने उसे इतने लाड़प्यार से पाला हो, वे ही उस की पिटाई पर चुप्पी साध लें, तो फिर वह कहां जाएगी?

इधर, मर्द समाज को यह गुमान होता है कि और मारूंगा, बोल क्या कर लेगी? मेरी गुलाम है, तो नजरें नीची कर के चल. समय पर भोजन और शरीर मेरे सामने परोस दे. बस, यही तेरा काम है, तो फिर औरत के लिए जिंदगी नरक बनने में ज्यादा समय नहीं लगता है.

हरियाणा के जींद जिले के गांव बीबीपुर के पूर्व सरपंच, समाजसेवी और ‘सैल्फी विद डौटर’ मुहिम के संस्थापक सुनील जागलान ने इस मुद्दे पर कहा, ‘‘आज हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि समाज में पुरुष सत्ता का प्रकोप अभी भी है और इस का सीधा असर यह होता है कि घरों में घरेलू हिंसा होती है.

‘‘इस में महिलाओं के साथ शारीरिक मारपिटाई के लाखों केस दर्ज होते हैं, लेकिन इस के 30 गुना केस ऐसे होते हैं, जो पुलिस में दर्ज ही नहीं हो पाते हैं. इस के लिए लगातार संवेदनशीलता के साथ लोगों को जागरूक करने की, कानूनी नियमों को आम घरों तक पहुंचाने की बहुत ज्यादा जरूरत है.’’

‘‘हम ने ‘अहसास का सौफ्टवेयर’ नाम का एक कार्यक्रम शुरू किया है, जिस का मकसद पितृसत्ता के वायरस को खत्म करना है. हम इस मुहिम में शहर और गांवदेहात के क्षेत्रों में पंचायतों के माध्यम से काम कर रहे हैं ‘‘इस समस्या का समाधान तभी हो सकता है, जब हम सब यह समझ लें कि महिलाओं के साथ मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से समाज पतन की ओर जाता है.’’ Domestic Violence

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