Romantic Story: रंग और रोशनी – शादी की बात सुन प्रिया सकपका क्यों गई?

Romantic Story: मनीष अपनी पत्नी मुक्ता के साथ बरामदे में बैठा शाम की चाय की चुसकियां ले रहा था. दफ्तर में बीते दिन के  कुछ रोचक पल मुक्ता को सुना रहा था. मुक्ता भी उस के साथ अपने दिन भर के अनुभव बांट रही थी. अरेंज्ड मैरिज और नईनई गृहस्थी के अनुभव. बहुत कुछ था दोनों के बीच साझा करने को.

‘‘वाह, एक तो तुम्हारे हाथ के बने समोसे और वे भी एअर फ्रायर में. स्वाद भी और सेहत भी. एक अच्छी पत्नी का फर्ज तुम बढि़या ढंग से निभा रही हो.’’

मनीष के कथन पर मुक्ता शरमाते हुए हंसी ही थी कि तभी मनीष का दोस्त गोपाल आ गया.

‘‘आओ गोपाल, बैठो. मुक्ता 1 कप चाय गोपाल के लिए भी हो जाए.’’

मनीष के कहते ही मुक्ता फुरती से रसोई की ओर चल दी.

‘‘क्या दोस्त, मेरे आते ही भाभी को भगा दिया? खैर, अच्छा ही किया. आज मैं तुझे एक समाचार देने आया हूं. तेरी प्रिया अपनी मां के घर वापस आ गई है. मुझे आज बाजार में मिली थी. मैं ने जैसे ही तेरे बारे में खबर दी तो, वह तेरा फोन नंबर मांगने लगी… कहने लगी उस का फोन चोरी हो गया था, इसलिए तेरा नंबर खो गया.’’

आगे गोपाल ने क्या कहा, वह मनीष को सुनाई नहीं दिया. वह तो प्रिया का नाम सुनते ही अतीत की गहरी खाई में गिरता चला गया. 6 माह पहले तक इस नाम के इर्दगिर्द ही उस का पूरा जीवन सिमटा था. उस की प्रिया, उस की जान, उस का प्यार…

कमल की पार्टी में प्रिया अलग ही चमक रही थी. कौन था ऐसा पार्टी में जिस की नजर उस पर न पड़ी हो. मनीष अपने शरमीले स्वभाव के कारण बस दूर से ही उसे निहार कर खुश था. पर पार्टी के बाद जब पता चला कि प्रिया का घर मनीष के रास्ते में आता है, तो उसे घर छोड़ने का काम उस ने सहर्ष स्वीकार लिया. प्रिया की आंखों और मुसकराहट में भी तो कुछ महसूस किया था उस ने. रास्ते में पता चला कि प्रिया कालेज में पढ़ती है. मनीष कालेज की पढ़ाई के बाद प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहा था.

‘‘तब तो तुम बहुत मेधावी होगे. मुझे जो समझ न आया करे उसे क्या तुम से समझने आ जाया करूं?’’

‘‘जब तुम्हारा मन करे,’’ मनीष ने बिना देर किए कहा. आखिर अंधा क्या चाहे 2 आंखें.

मनीष अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. उस के पिताजी नौकरी के सिलसिले में अकसर दौरे पर रहते थे और मां इतनी सीधी थीं कि प्रिया का घंटों मनीष के कमरे में रहना उन्हें जरा भी नहीं अखरता था. प्रिया के घर जाने में मनीष को किसी बहाने की जरूरत न थी. प्रिया की मां अकसर घर से बाहर रहती थीं. पति से उन का तलाक हो चुका था.

धीरे-धीरे मनीष और प्रिया के संबंधों में प्रगाढ़ता आने लगी. कुछ दोष उम्र का भी था. कच्ची उम्र, सतरंगी सपने. बिना आई लव यू कहे भी दोनों एकदूसरे को अपने दिल का हाल सुनाने में सक्षम थे. दोनों को एकदूसरे का साथ बहुत भाता. जब साथ न

होते तब व्हाट्सऐप पर हरपल की खबर रहती. प्रिया मनीष की हर बात में अपनी हां मिलाती. मनीष उसे नित नए कपड़े, नेलपौलिश, लिपस्टिक, परफ्यूम इत्यादि देता रहता. यहां तक कि प्रिया की औनलाइन शौपिंग के लिए उसे क्रैडिट कार्ड भी मनीष ने ही दिया था. इस के बदले में प्रिया ने मनीष की हर कमी को पूरा कर दिया था. उस ने कभी मनीष को स्वयं को हाथ लगाने से नहीं रोका था. शायद मनीष का शरमीला स्वभाव उसे आगे बढ़ने की स्वीकृति नहीं देता यदि प्रिया ने उस दोपहर अपने अकेले घर में स्वयं को मनीष को न सौंप दिया होता. उस अनुभव के बाद मनीष का मन प्रिया के बिना कहीं लगता ही नहीं था. दोनों एकदूसरे के घर, कमरे में एकांत तलाशते. एकदूसरे के बिना स्वयं को अकेला पाते.

‘‘प्रिया, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम्हारे मेरी जिंदगी में आने से पहले मेरा जीवन कितना सूना था. तुम ने उस में रंग और रोशनी भर दी.’’

मनीष प्रिया के प्रेम की लहर में बह जाता-

‘‘जीना हराम कर रखा है मेरी इन आंखों ने,

खुली हों तो तलाश तेरी और बंद हों तो ख्वाब तेरे.’’

इस प्रेम का असर मनीष की निजी जिंदगी में तो हो ही रहा था, उस की पढ़ाई पर भी पड़ने लगा था. उस की प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में न तो वह लगन थी और न ही मेहनत, जिस की जरूरत होती है. प्रिया की सूरत और उस के सपने कभी उसे अकेला न छोड़ते. इस का नतीजा यह रहा कि वह परीक्षा में असफल रहा. अब चूंकि घर पिताजी की पेंशन पर चल रहा था, इसलिए मनीष को जेबखर्ची, क्रैडिट कार्ड इत्यादि सब बंद करने पड़े.

मनीष को आज भी अच्छी तरह याद है जब उस के मित्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण रह जाने पर अफसोस करने आए थे. सब के साथ प्रिया भी आई थी पर उस के चेहरे पर अफसोस का कोई भाव न था, बल्कि जब उस के एक मित्र ने यह कहा कि मनीष प्रिया के कारण परीक्षा में पूरी मेहनत न कर सका तो कितनी बेहयाई से हंसते हुए उस ने कहा था कि वाह, एक तो फेल हो गए, उस पर तुर्रा यह कि इलजाम किसी और के सिर मढ़ दो. यह अच्छा है यानी उस के स्वर में हमदर्दी की जगह व्यंग्य था.

मनीष को प्रिया की यह बात बुरी अवश्य लगी थी, पर वह इसे प्रिया का अल्हड़पन समझ कर टाल गया था. अभी तक उस ने प्रिया से अपने जीवन का हिस्सा बनने की बात भी कहां छेड़ी थी. जब वह उस के जीवन में शामिल हो जाएगी, तभी तो एक की स्थिति की जिम्मेदारी दूसरे की भी होगी. उसे विश्वास था कि प्रिया के साथ से वह जीवन में अवश्य सफल होगा. इसीलिए जल्द ही बिना देर किए मनीष ने प्रिया के समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया.

प्रिया स्तब्ध सी उसे देखती रह गई. फिर उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो मनीष? माना कि तुम मुझे अच्छे लगते हो,

पर शादी? शादी की क्या जरूरत है, मैं तो तुम्हारी हूं ही.’’

‘‘पर प्रिया ऐसे कब तक चलेगा? मेरे मातापिता मेरी शादी की सोचेंगे और आखिर तुम्हारी मां भी कब तक इंतजार करेंगी. उन्हें भी तो तुम्हारी शादी की चिंता होगी. मैं ने सोचा है कि कोई छोटीमोटी नौकरी तो मुझे मिल ही जाएगी. पिताजी ने एक जगह बात चलाई है, छोटी ही सही पर गृहस्थी का बोझ मैं उठा लूंगा.’’

‘‘छोटीमोटी नौकरी? समझने की कोशिश करो मनीष… पैसे के बिना जीवन क्या है? देखो, आजकल तुम न तो मुझे कोई उपहार दे पाते हो और न ही मेरी खरीदारी करा पाते हो. ऐसे में भला शादी की कैसे सोच सकते हो? वैसे भी शादी का मतलब है खाना पकाना, घर संभालना, बच्चे पैदा करना और फिर उन का पालनपोषण और भविष्य की चिंता में घुलते रहना. बदले में एक ढर्रे की जिंदगी. मुझे इन सब से चिढ़ है. मैं एक स्वतंत्र विचारों की लड़की हूं. मेरी मां को ही देख लो. आज अकेले कितनी प्रसन्न और मस्त हैं. मैं भी वैसा ही जीवन चाहती हूं.’’

प्रिया के इस उत्तर ने मनीष को निरुत्तर कर दिया. उस दिन के बाद से मनीष को न जाने ऐसा क्यों लगने लगा जैसे प्रिया उस से कतराने लगी है, जैसे उस का व्यवहार ठंडा पड़ने लगा है, वह उस से किनारा करने लगी है. वह कई दिनों तक उस से न मिलती, न ही फोन पर संपर्क करती. कहीं टकरा जाने पर बहानों की कतार लगा देती, ‘‘बस इतना ही जान पाए अपनी प्रिया को तुम मनीष? मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं? मैं स्वयं को भूल सकती हूं पर तुम मेरी हर सांस में बसते हो…’’

बात इमोशनल ब्लैकमेल तक पहुंच जाती. मनीष पूछना चाहता कि इतनी चाहत है, तो छलकती क्यों नहीं है तुम्हारे चेहरे पर? पर डरता था कि कहीं बात साफ करतेकरते वह प्रिया को खो न बैठे. उसे इंतजार मंजूर था पर अपने सुनहरे स्वप्नों की उड़ान में दरार नहीं.

‘प्रिया को पाने से पहले मुझे जीवन में कुछ और बुलंदियां भी हासिल करनी होंगी,’ सोच उस नेएक बार फिर प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. अब की बार उस ने शुरू से ही पूरा परिश्रम करने की ठानी थी. कभीकभार फोन पर प्रिया से बात कर वह स्वयं को हलका महसूस कर लेता था.

फिर एक दिन प्रिया ने बताया, ‘‘मैं अपने मामा के घर जा रही हूं… तुम यों परेशान हो रहे हो जैसे मेरी शादी हो रही है. तुम क्या समझते हो मैं तुम्हारे बिना खुश रह सकूंगी? पर मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रही हूं. मेरे यहां रहते तुम पढ़ाई में मन नहीं लगा पाओगे. यह हमारी परीक्षा की घड़ी है. मनीष इस में हमें पास हो कर दिखाना है.’’

बड़ी मुश्किल से मनीष का मन शांत हो पाया था.

प्रिया के जाने के बाद सुहावना मौसम भी बोझिल लगता. मानो अंदर का बुझापन बाहर की रौनक पर हावी हो गया हो. लेकिन समय अपनी गति कब छोड़ता है? परीक्षा की तारीख पास आ रही थी. किसी तरह मनीष ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाया. पर प्रिया के पत्र का इंतजार उसे रोज रहता. अंतत: 3 महीने बाद उस का पत्र आया. पत्र में प्रिया की मजबूरियों का बखान था…. मनीष के बिना वह कितनी अधूरी थी, कितनी तनहा. प्रिया की तड़प पढ़ कर मनीष की आंखें भर आईं कि क्यों वह बारबार प्रिया के प्यार पर अविश्वास की परत चढ़ा देता है? हर किसी का प्यार करने और जताने का ढंग अलगअलग होता है और फिर प्रिया एक लड़की है. कुछ शर्म, कुछ हया उस के व्यक्तित्व का हिस्सा है. जरूरी तो नहीं हर बात कही जाए, कुछ महसूस भी की जाती है. एक सच्ची प्रेमिका पा कर वह स्वयं को धन्य मान रहा था.

परीक्षा समाप्त हो गई. कुछ ही समय बाद परिणाम भी आ गया. इस बार मांपिताजी की प्रसन्नता का ठिकाना न था. घर पर दोस्तों के लिए एक छोटी सी दावत रखी थी. उस शाम मनीष को प्रिया की कमी बहुत खली थी. वह प्रिया को यह खुशखबरी स्वयं सुनाना चाहता था. उस के चेहरे की खुशी को वह अपनी आंखों से देखना चाहता था. फोन पर खबर दे कर वह इस दृश्य को खोना नहीं चाहता था.

मनीष ने कमल से प्रिया का पता मांगते

हुए, जो उस के अलावा प्रिया का भी दोस्त था कहा, ‘‘यार, प्रिया को यह खुशखबरी दे दूं…

सच कहूं तो मैं उस से शादी करना चाहता हूं.

हम दोनों ने अलग रह कर बहुत कठिन परीक्षा दी है. यह त्याग उस ने मेरी सफलता के

लिए दिया और अब जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं तो…’’

‘‘अरे मनीष, तुम्हारे जैसा सुशील और लायक लड़का प्रिया जैसी तितली के जाल में फंस जाएगा यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था. प्रिया जैसी लड़की सैरसपाटे के लिए ठीक है

पर शादी के लिए नहीं. क्यों अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है?’’

कमल ने मनीष के मन की शांत झील में पहला पत्थर मारा था. उस ने प्रिया के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर मनीष स्तब्ध रह गया.

‘‘प्रिया के प्रियों की संख्या का भान है तुझे? आए दिन वह किसी न किसी से रासलीला रचा रही होती है… उस की मां भी तो वैसी ही,’’ और फिर आगे कुछ कहने के बजाय कमल हंसने लगा.

‘‘बदलता है रंग आसमान कैसेकैसे.’’

मनीष की नायिका अचानक खलनायिका बना दी गई थी. उस के मन में उथलपुथल मची थी कि क्या सच में वह बेवकूफ बन रहा था या प्रिया जैसी प्रेमिका के कारण कमल उस से जल रहा है? उस का मन बेचैन हो उठा था. यह उस के जीवन का अहम निर्णय था. इसलिए उस ने खुद छानबीन करने की ठानी. मनीष ने काफी पूछताछ की. जितनी जानकारी मिलती गई, उस का मन उतना ही खिन्न होता गया. वह कितना पागल था प्रिया के प्यार में. प्रिया की रस घुली बातों में आने में उसे जरा भी देर न लगती थी.

‘‘ख्वाहिशों के काफिले भी बड़े अजीब होते हैं, वे गुजरते वहीं से हैं जहां रास्ते नहीं होते हैं.’’

अब मनीष की सफलता का परिणाम सुन कर शायद प्रिया शादी के लिए फौरन हामी भर

दे. विरह में बीते दिनरातों की व्यथा सुनाए. पर आंखों देखी मक्खी किस से निगली जाती है भला? इसलिए मां के बारबार पूछने पर मनीष ने उन की पसंद की लड़की से शादी के लिए हां कह दी.

उसी सप्ताहांत मनीष अपने मांपिताजी के साथ लड़की देखने उन के घर पहुंचा. लड़की सुंदर थी. उन्हें भी मनीष पसंद आया. रिश्ता पक्का हो गया. किंतु मनीष अपनी जीवनसंगिनी से अपने जीवन का अतीत अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. अत: उस ने मुक्ता से अकेले में बात करने की इच्छा व्यक्त की. संकोचवश मुक्ता कुछ असहज थी.

मनीष ने ही शुरुआत की, ‘‘जब हम दोनों अपना पूरा जीवन साथ गुजारने का निर्णय लेने जा रहे हैं, तो हमें अपना अतीत भी साझा कर लेना चाहिए. मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. पहले सुन लो, फिर जो तुम्हारा निर्णय होगा, मुझे मान्य होगा,’’ और फिर मनीष ने मुक्ता को प्रिया के बारे में पूरी ईमानदारी से सब बता दिया.

कुछ क्षण चुप रहने के बाद मुक्ता बोली, ‘‘चलिए, खट्टा ही सही पर आप को प्यार में अपना निर्णय लेने का मौका तो मिला… ताउम्र यह गिला तो नहीं रह जाएगा कि किसी से प्यार ही न कर सके. मेरा भी मन था कि मैं लव मैरिज करूं पर हमारे यहां तो लड़कियों का आंख उठाना भी वर्जित है.’’

‘‘तो तुम क्या इसलिए उदास लग रही हो?’’

मुक्ता चुप रही, लेकिन उस की आंखों ने हामी भर दी थी.

‘‘अच्छा किया तुम ने अपने दिल की बात मुझ से कही. हमारे बीच कोई संकोच नहीं होना चाहिए.’’

‘‘दरअसल, मैं भी चाहती थी कि जो खुशी प्यार में पड़े लोगों को महसूस होती है,

उसे मैं भी अनुभव कर पाती… प्यार में जिंदगी बदल देने वाले वे…’’ बोलते ही मुक्ता रुक गई. फिर जीभ काटते हुए कहने लगी, ‘‘माफ कीजिए, मैं भी पागल हूं, पता नहीं क्याक्या बोल रही हूं.’’

मगर उस की बातें सीधे मनीष के दिल तक पहुंचीं. कितनी साफगोई से मुक्ता ने अपनी ख्वाहिश उस पर जाहिर कर दी थी. ठीक ही तो है मनीष ने अपनी मरजी कर के देख ली और अब मातापिता की इच्छा से शादी कर रहा था. किंतु मुक्ता को अपनी मरजी का अवसर कहां मिला?

मनीष ने उसी दिन से मुक्ता के जीवन में प्यार का रंग और प्यार के  खुमार की रोशनी भरने की जिम्मेदारी उठा ली. उस ने हर प्रयास कर के मुक्ता को प्यार में मिलने वाली हर खुशी दी. यहां तक कि शादी होने तक मुक्ता को लगने लगा कि जैसे उस की लव मैरिज हो रही हो.

सच कहते हैं कि शादियां ऊपर तय होती हैं. यहां जमीन पर तो हम सिर्फ उन का मेल कराते हैं. मनीष और मुक्ता असल मानों में हमसफर बने.

आज गोपाल फिर उसी भूकंप की खबर लाया था, जिस से कभी मनीष का संसार डोल जाया करता था. पर आज वह शांत था. उस का संसार प्रसन्नता के झूले में झूल रहा था और इस की डोर थी मुक्ता के हाथों में. दोनों प्यार में जिंदगी बदल देने वाले रंग और रोशनी अनुभव कर रहे थे.

Romantic Story: नींव – अंजु ने ऐसा क्या किया कि संजीव खुश हो गया?

Romantic Story, लेखक – वैभव जैन

उस दिन करीब 8 साल के बाद मानसी को एक हेयर सैलून से बाहर आते देखा तो आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. कालेज के दिनों में वह कभी मेरी बहुत अच्छी दोस्त हुआ करती थी. फिर वह एमबीए करने मुंबई चली गई और हमारे बीच संपर्क कम होतेहोते समाप्त हो गया था.

मैं मुसकराता उस के सामने पहुंचा तो उस ने भी मुझे फौरन पहचान लिया. हम ने बड़े अपनेपन के साथ हाथ मिलाया और हंसतेमुसकराते एकदूसरे के बारे में जानकारी का आदानप्रदान करने लगे.

‘‘तुम यहां दिल्ली में कैसे नजर आ रही हो?’’

‘‘मेरे पति को यहां नई जौब मिली है.’’

‘‘क्या पति को घर छोड़ कर केश कटवाने आई हो?’’

‘‘नहीं भई. वे मुझे यहां छोड़ कर किसी दोस्त से मिलने गए हैं. बस, अब लेने आते ही होंगे. तुम बताओ जिंदगी कैसी गुजर रही है?’’

‘‘ठीकठीक सी गुजर रही है.’’

‘‘तुम्हारी पत्नी क्या करती है?’’

‘‘अंजु नौकरी करती है.’’

‘‘तुम तो कहा करते थे कि पत्नी को सिर्फ घरगृहस्थी की जिम्मेदारियां संभालनी चाहिए. फिर अंजु को नौकरी कैसे करा रहे हो?’’ उस ने हंसते हुए पूछा.

‘‘मैं तो अभी भी यही चाहता हूं कि अंजु घर में रहे पर आज की महंगाई में डबल इनकम का होना जरूरी है.’’

‘‘बच्चे कितने बडे़ हो रहे हैं?’’

‘‘हमारा 1 बेटा है समीर, जो पिछले महीने 6 साल का हुआ है.’’

‘‘उस के लिए भाई या बहन अभी तक क्यों नहीं लाए हो?’’

‘‘अरे, दूसरे बच्चे की बात ही मत छेड़ो. आजकल 1 बच्चे को ही ढंग से पालना आसान नहीं है. तुम अपने बारे में बताओ.’’

‘‘मैं तो कोई जौब नहीं करती हूं. पति सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं. 3 साल अहमदाबाद में रहे. अब यहां दिल्ली की एक कंपनी में जौब शुरू करने के कारण 2 महीने पहले यहां आए हैं. अभी तक मन नहीं लग रहा था पर अब तुम मिल गए हो तो अकेलेपन का एहसास कम हो ही जाएगा. कब मिलवा रहे हो अंजु और समीर से, संजीव?’’

‘‘बहुत जल्दी मिलने का कार्यक्रम बना लेते हैं. तुम ने अपने बच्चों के बारे में तो कुछ बताया नहीं,’’ मैं ने जानबूझ कर विषय बदल दिया.

‘‘मेरी 2 बेटियां हैं – श्वेता और शिखा. श्वेता स्कूल जाती है और शिखा अभी 2 साल की है.’’

‘‘बहुत अच्छा मैंटेन किया हुआ है तुम ने खुद को. कोई देख कर कह नहीं सकता कि तुम 2 बेटियों की मम्मी हो.’’

‘‘थैंकयू, मैं नियम से डांस करती हूं. कोई टैंशन नहीं है, इसलिए स्वास्थ्य ठीक चल रहा है,’’ मेरे मुंह से अपनी प्रशंसा सुन वह खुश हो कर बोली, ‘‘वैसे तुम भी बहुत जंच रहे हो. तुम्हें देख कर कोई भी कह सकता है कि तुम ने जिंदगी में अच्छी तरक्की की है.’’

‘‘थैंकयू, ये शायद तुम्हारे पति ही हमारी तरफ आ रहे हैं,’’ अपनी तरफ एक ऊंचे कद व आकर्षक व्यक्तित्व वाले पुरुष को आते देख कर मैं ने कहा.

आत्मविश्वास से भरा वह व्यक्ति मानसी का पति रोहित ही निकला. उस ने रोहित से मेरा परिचय कालेज के बहुत अच्छे दोस्त के रूप में कराया.

रोहित ने बड़ी गर्मजोशी के साथ मुझ से हाथ मिलाया. फिर हम दोनों एकदूसरे के काम के विषय में बातें करने लगे.

मानसी अब चुप रह कर हमारी बातें सुन रही थी.

करीब 15 मिनट बातें करने के बाद रोहित ने विदा लेने को अपना हाथ आगे बढ़ा दिया और बोला, ‘‘संजीव, तुम्हें अपनी वाइफ और बेटे के साथ हमारे घर बहुत जल्दी आना ही है. मानसी को अपने शहर में बोर मत होने देना.’’

‘‘हम बहुत जल्दी मिलते हैं,’’ मैं ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

‘‘अपना मोबाइल नंबर तो दो, नहीं तो एकदूसरे के संपर्क में कैसे रहेेंगे?’’ मानसी को याद आया तो हम ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिया.

वे दोनों अपनी कार में बैठे और हाथ हिलाते हुए मेरी आंखों से ओझल हो गए.

मैं ने डिपार्टमैंटल स्टोर से घर का सामान खरीदा और अपनी 2 साल पुरानी कार से घर आ गया.

‘‘आप कहां अटक गए थे? मुझे मशीन लगानी थी पर बिना वाशिंग पाउडर के कैसे लगाती?’’ अंजु मुझे देखते ही नाराज हो उठी.

‘‘मशीन अब लगा लो. खाना देर से खा लेंगे,’’ मैं ने उसे शांत करने के लिए धीमी आवाज में जवाब दिया.

‘‘कितनी आसानी से कह दिया कि मशीन अब लगा लो. मैं नहा चुकी हूं और समीर को तो सही वक्त पर खाना चाहिए ही न. अब खाना बनाऊं या मशीन लगाऊं?’’ उस का गुस्सा कम नहीं हुआ था.

‘‘इतनी गुस्सा क्यों हो रही हो? तुम मशीन लगा लो, आज लंच करने बाहर चलते हैं.’’

‘‘अपना पेट खराब करने के लिए मुझे बाहर का खाना नहीं खाना है. आप यह बताओ कि अटक कहां गए थे?’’

‘‘अटका कहीं नहीं. ऐसे ही विंडो शौपिंग करते हुए समय का अंदाजा नहीं रहा,’’ न जाने क्यों उसे मानसी और रोहित से हुई मुलाकात के बारे में उस समय कुछ बताने को मेरा मन नहीं किया.

अंजु ड्राइंगरूम में समीर द्वारा फैलाई चीजें उठाने के काम में लग गई. अब उस का ध्यान मेरी तरफ न होने के कारण मैं उसे ध्यान से देख सकता था.

कितना फर्क था मानसी और अंजु के व्यक्तित्व में. शादी होने के समय वह आकर्षक फिगर की मालकिन होती थी, पर अब उस का शरीर काफी भारी हो चुका था. चेहरे पर तनाव की रेखाएं साफ पढ़ी जा सकती थीं. उस का स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता. समीर के होने के समय से उसे पेट और कमर दर्द ने एक बार घेरा तो अब तक छुटकारा नहीं मिला है.

अंजु की मानसी से तुलना करते हुए मेरा मन अजीब सी खिन्नता महसूस कर रहा था. रोहित और हमारे आर्थिक स्तर में खास अंतर नहीं था. पर हमारी पत्नियों के व्यक्तित्व कितने विपरीत थे.

मेरा चेहरा सारा दिन मुरझाया सा रहा. रात में भी ढंग से नींद नहीं आई. मानसी का रंगरूप आंखों के सामने आते ही बगल में लेटी अंजु से अजीब सी चिढ़ हो रही थी.

किसी से अपनी हालत की तुलना कर के दिमाग खराब करने का कोई फायदा नहीं होता है. खुद को बारबार ऐसा समझाने के बाद ही मैं ढंग से सो पाया था. मेरे पास मानसी का 2 दिन बाद ही औफिस में लंच के समय फोन आ गया.

‘‘अपने घर का पता बताओ. हम आज रात को अंजु और समीर से मिलने आ रहे हैं,’’ उस की यह बात सुन कर मैं बहुत बेचैन हो उठा.

‘‘आज मत आओ. अंजु को अपने भाई के यहां जाना है,’’ मैं ने झूठ बोल कर उन के आने को टाल दिया.

‘‘चलो, उन से मिलने फिर किसी और दिन आ जाएंगे पर तुम अपना पता तो लिखवा ही दो.’’

मैं उसे घर बुलाना नहीं चाहता था पर मजबूरन उसे अपना पता लिखवाना पड़ा. मैं ने उस से ज्यादा बातें नहीं कीं. कहीं मन ही मन मैं ने यह फैसला कर लिया कि मैं उन के साथ ज्यादा घुलनेमिलने से बचूंगा.

फिर मैं शनिवार की शाम को औफिस से घर पहुंचा तो वे दोनों मुझे ड्राइंगरूम में बैठे मिले. अंजु उन से बातें कर रही थी. मानसी के सामने वह बहुत साधारण सी नजर आ रही है, ऐसी तुलना करते ही मेरा मन उखड़ सा गया.

तभी मैं एकदम चुपचुप सा हो गया. मेरे मुकाबले अंजु उन दोनों से वार्त्तालाप करने की जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बेहतर ढंग से निभा रही थी.

मानसी ने अचानक मुझ से पूछ ही लिया, ‘‘इतने उदास क्यों दिख रहे हो, संजीव?’’

‘‘सिर में दर्द हो रहा है. आज औफिस में काम कुछ ज्यादा ही था,’’ मुझे यों झूठ बोलना पड़ा तो मेरा मन और बुझाबुझा सा हो गया.

रोहित ने मेरे बेटे समीर से बहुत अच्छी दोस्ती कर ली थी. मानसी अंजु के साथ खूब खुल कर हंसबोल रही थी. बस मैं ही खुद को उन के बीच अलगथलग सा महसूस कर रहा था.

उन दोनों को रोहित के किसी मित्र के घर भी जाना था, इसलिए वे ज्यादा देर नहीं बैठे और हमें जल्दी अपने घर आगामी रविवार को आने का निमंत्रण देने के बाद चले गए.

उन के जाने के बाद मैं बहुत चिड़चिड़ा हो गया. मैं ने उन से ज्यादा तअल्लुकात न रखने का फैसला करने में ज्यादा वक्त नहीं लिया.

‘‘ये अच्छे लोग हैं. दोनों का स्वभाव बहुत अच्छा है,’’ अंजु के मुंह से उन दोनों की तारीफ में निकले इन शब्दों को सुन कर मैं अपनी चिढ़ व नाराजगी को नियंत्रण में नहीं रख सका.

‘‘यार, इन लोगों की बात मुझ से मत करो. ये बनावटी लोग हैं. इन की सतही चमकदमक से प्रभावित न होओ. ऐसे लोगों के साथ मित्रता बढ़ा कर सिर्फ दुख और परेशानियां ही हासिल होती हैं,’’ मैं ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘क्या कालेज के दिनों में आप मानसी के बहुत अच्छे दोस्त नहीं थे?’’ मुझे यों अचानक उत्तेजित होता देख कर वह हैरान नजर आ रही थी.

‘‘मानसी मेरे एक अच्छे दोस्त नवीन की प्रेमिका थी. इस कारण मुझे उसे सहन करना पड़ता था. जब मानसी का उस के साथ चक्कर खत्म हो गया, तब मैं ने उस के साथ बोलना बिलकुल खत्म कर दिया था. वह न तब मुझे पसंद थी और न आज.’’

‘‘मुझे तो दोनों अच्छे इंसान लगे हैं. क्या अगले संडे हम उन के घर नहीं जाएंगे?’’

‘‘नहीं जाएंगे और अब कोई और बात करो. हमें नहीं रखना है इन के साथ ज्यादा संबंध,’’ रूखे से अंदाज में उसे टोक कर मैं ने मानसी और रोहित के बारे में चर्चा खत्म कर दी.

अंजु ने फिर उन दोनों के बारे में कोई बात नहीं की. सच तो यह है कि वह मुझे ज्यादा खुश नजर आ रही थी. उस ने बड़े प्यार से मुझे खाना खिलाया और सोने से पहले सिर की मालिश भी की.

अगले दिन अंजु ने मुझे सुबह उठा कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘उठिए, सरकार. आज से हम दोनों रोज नियमित रूप से घूमने जाया करेंगे.’’

‘‘यार, तुम्हें जाना हो तो जाओ पर मुझे सोने दो,’’ मैं ने फिर से रजाई में घुसने की कोशिश की.

‘‘नहीं जनाब, ऐसे नहीं चलेगा. अगर आप मेरा साथ नहीं देगे तो मैं और मोटी हो जाऊंगी. क्या आप मुझे मानसी की तरह सुंदर और स्मार्ट बनता नहीं देखना चाहते हो?’’

अंजु की बात सुन कर मैं उठ बैठा और फिर बोला, ‘‘तुम उस के जैसा नकली पीतल नहीं, बल्कि खरा सोना हो. बेकार में उस के साथ अपनी तुलना कर के टैंशन में मत आओ.’’

अंजु ने अपनी बांहों का हार मेरे गले में डाल कर कहा, ‘‘टैंशन में मैं नहीं, बल्कि आप नजर आ रहे हो.’’

‘‘मैं टैंशन में नहीं हूं,’’ मैं ने उस से नजरें चुराते हुए जवाब दिया.

‘‘मैं आप के हर मूड को पहचानती हूं, जनाब. मुझ से कुछ भी छिपाने की कोशिश बेकार जाएगी.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘मतलब यह कि मेरी मानसिक सुखशांति की खातिर आप की झूठ बोलने की आदत बहुत पुरानी है.’’

‘‘तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है. मैं ने कब तुम से झूठ बोला है?’’

अंजु ने हलकेफुलके अंदाज में जवाब दिया, ‘‘मैं बताती हूं. जब हमारे पास कार नहीं थी तो आप कार की कितनी बुराई करते थे. कार के पुरजे महंगे आते हैं, सर्विसिंग महंगी होती है, पैट्रोल का खर्चा बहुत बढ़ जाता है, मुझे ड्राइव करना अच्छा नहीं लगता और भी न जाने आप क्याक्या कहते थे.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रही हो?’’

‘‘पहले एक और बात सुनो और फिर मैं आप के सवाल का जवाब दूंगी.

जब समीर के ऐडमिशन का समय आया तो आप महंगे पब्लिक स्कूलों के कितने नुक्स गिनाते थे. वहां पढ़ने वाले अमीर मांबाप के बच्चे छोटी उम्र में बिगड़ जाते हैं, बच्चे को अच्छे संस्कार घर में मिलते हैं स्कूल में नहीं, जैसी दलीलें दे कर आप ने मेरे मन को शांत और खुश रखने की सदा कोशिश की थी.’’

‘‘मैं जो कहता था वह गलत नहीं था.’’

‘‘मैं यह नहीं कह रही हूं कि आप गलत कहते थे.’’

‘‘मैं वही कह रही हूं, जो मैं ने शुरू में कहा था. मेरे मन की सुखशांति के लिए आप दलीलें गढ़ सकते हो, लेकिन ऐसे मौकों पर आप की जबान जो कहती है वह आप की आंखों के भावों से जाहिर नहीं होता है.’’

‘‘तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं.’’

‘‘देखिए, जब आप कार की बुराई करते थे तब हम कार नहीं खरीद सकते थे. लेकिन जब कार घर में आई तो आप कितने खुश हुए थे.

फिर जब समीर को अच्छे स्कूल में ऐडमिशन मिल गया तो भी आप की खुशी का ठिकाना नहीं रहा था.’’

‘‘अब यह भी समझा दो कि तुम ये पुरानी बातें आज क्यों उठा रही हो?’’

‘‘क्योंकि आज भी आप की जबान पर कुछ और है और दिल में कुछ और. आज भी मेरे मन के सुकून की खातिर आप मानसी जैसी सुंदर, स्मार्ट महिला की बुराई कर रहे हो. लेकिन कल रात मैं ने देखा था कि जब भी आप सहज हो कर उस से बातें करते थे तो आप की आंखें खुशी से चमक उठती थीं.’’

‘‘सचाई यह भी है कि मानसी के मुकाबले मैं मोटी और अनाकर्षक लगती हूं. तभी अपनी पुरानी आदत के अनुरूप आप ने अपना सुर बदल लिया है. लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘लेकिन आप मुझे हीनभावना का शिकार बनने से बचाने के लिए न मानसी की बुराई करो और न ही उन के साथ परिचय गहरा करने से कतराओ. कार और समीर के ऐडमिशन का संबंध हमारी माली हालत से था पर यह मामला भिन्न है. मैं भली प्रकार समझती हूं कि अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने का प्रयास मुझे ही करना होगा. तभी मैं ने अपने में बदलाव लाने की कमर कस ली है.

‘‘आप बनावटी व्यवहार से मुझे झूठी तसल्ली दे कर मेरे मन की सुखशांति बनाए रखने की चिंता छोड़ दो. आप के सहज अंदाज में खुश रहने से ही हमारे बीच प्यार की नींव मजबूत होगी.

‘‘आप के सहयोग से मैं अपने लक्ष्य को बहुत जल्दी पा लूंगी. इसीलिए मेरी प्रार्थना है कि कुछ देर और सोने का लालच त्याग कर मेरे साथ घूमने चलिए.’’

‘‘यार, तुम तो बहुत समझदार हो,’’ मैं ने दिल से उस की प्रशंसा की.

‘‘और प्यारी भी तो कहो,’’ अंजु इतरा उठी.

‘‘बहुतबहुत प्यारी भी हो… मेरे दिल की रानी हो.’’

‘‘थैंकयू. अगले संडे हम मानसी के घर चलेंगे न?’’

‘‘श्योर.’’

‘‘और अभी मेरे साथ पार्क में घूमने चल रहे हो न?’’

‘‘जरूर चल रहा हूं पर वैसे इस वक्त मैं तुम्हारे साथ कहीं और होना चाहता हूं,’’ मेरी आवाज नशीली हो उठी.

‘‘कहां?’’

‘‘इस रजाई की गरमाहट में.’’

‘‘अभी सारा दिन पड़ा है. पहले पार्क चलो,’’ मेरी आंखों में प्यार से झांकते हुए अंजु का चेहरा लाजशर्म से लाल हो उठा तो वह मेरी नजरों में संसार की सब से खूबसूरत औरत बन गई थी.

Romantic Story: चाय पे बुलाया है – क्या मनीष के हसीन ख्वाब पूरे हुए?

Romantic Story: यह मेरी नजरों का धोखा था या मैं वाकई निराश होता जा रहा था. क्या करूं, उम्र भी तो हो चली थी. 38 वर्ष की आयु तक पहुंचते हुए मैं ने अच्छीखासी प्रोफैशनल उन्नति प्राप्ति कर ली थी. कई प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेते हुए मैं ने बैंक में प्रोबेशनरी औफिसर का पद प्राप्त कर लिया. अब एक प्रतिष्ठित सरकारी बैंक में ब्रांच प्रबंधक के तौर पर पदासीन था. अपना घर भी बना लिया और बड़ी गाड़ी भी ले ली थी. अच्छीखासी शक्लसूरत भी थी, घरपरिवार भी संपन्न था पर शादी नहीं हुई. सभी पूछते, कब सुना रहे हैं खुशखबरी, साहब? क्या कहता? कोई उत्तर नहीं, कोई कारण भी नजर नहीं आता था. पता नहीं बात क्यों नहीं बनी थी अब तक. हंस कर टाल जाता कि जब सलमान खान शादी करेगा, तब मैं भी खुशखबरी सुना दूंगा. पर अब लगने लगा था कि शायद मैं सलमान खान को पीछे छोड़ दूंगा.

कुछ दिनों से देख रहा था कि सामने वाली बिल्ंिडग में रहने वाली सुंदरसुकोमल लड़की मुझे देख मुसकराती थी. आखिर रोजरोज तो गलतफहमी नहीं हो सकती थी.

एक दिन दफ्तर जाने के लिए जब नीचे उतरा तब भी देखा था कि वह अपनी बालकनी में खड़ी मुझे देख रही थी. अगले दिन भी और उस के अगले दिन भी. हिरनी सी बड़ी, कजरारी आंखों में मृदुल सौम्यता, कोमल कपोलों पर छिटका गुलाबी रंग और रसभरे होंठों पर खेलती हलकी मुसकान, इतना लावण्य किसी की दृष्टि से छिप सकता था भला. जाहिर था, मैं ने भी देखा. एक और खास बात होती है दृष्टि में, चाहे कोई हमारी पीठ पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हो, हमें पता चल जाता है. हम घूम कर उस देखने वाले को देख लेते हैं. यह प्रकृति का कैसा अनूठा रहस्य है, इसे मैं आज तक समझ नहीं पाया. तभी तो तीसरी मंजिल से मुझे देखती उस सुंदरी तक मेरी दृष्टि खुद ही पहुंच गई थी.

मैं झिझकता रहा और उस की हलकी, अधूरी मुसकान का कोई प्रतिउत्तर नहीं दे पाया था. परंतु उस दिन तो हद हो गई. वह मेरे दफ्तर जाने वाले समय पर लिफ्ट में भी साथ ही आ गई.

‘‘हैलो,’’ अपनी जानलेवा मुसकान के साथ वह मुझ से बोल उठी. अभी तक सिर्फ सूरत देखी थी पर कहना पड़ेगा, जितनी मोहक सूरत उतनी ही कातिल शारीरिक संरचना भी थी. ऊंची आकर्षक कदकाठी, सुडौल बदन, कमर तक लंबे बाल.

मर्दों की एक विशेषता होती है कि वे एक ही नजर में औरत के सौंदर्य को नापने की क्षमता रखते हैं. मैं ने जल्दी उस पर टिकी अपनी दृष्टि हटा ली और अपनी विस्फारित आंखों को भी नियंत्रण में किया. कहीं मेरा गलत प्रभाव न पड़ जाए उस पर.

‘‘हैलो,’’ मैं ने हौले से कहा. मुझे डर था कि कहीं मेरा उतावलापन उसे डरा न दे. बस, एक हलकी सी मुसकराहट रखी चेहरे पर. फिर वह सब्जी लेने दुकान में चली गई और मैं गाड़ी में सवार हो अपने दफ्तर. पर सारे रास्ते आज सिर्फ मेरा रेडियो नहीं चला, पूरा गला खोल कर हर प्रेमभरा गीत मैं ने भी गाया रेडियो के साथ. एक अजीब सा रोमांच छा रहा था मेरे ऊपर. बैंक में भी लोगों ने पूछ डाला, ‘‘क्या बात है, साहब, आज आप बहुत प्रसन्न लग रहे हैं?’’ क्या बताऊं कि क्या बात थी. पर खुश तो था मैं.

देर शाम घर लौटते समय दिल हुआ कि आइसक्रीम लेता चलूं. घर पर मां भी हैरान हुई थीं, ‘‘आज आइसक्रीम?’’

‘‘यों ही, बस.’’

‘‘क्या बात है, बहुत खुश लग रहा है. काम बढ़ गया है इसलिए?’’ मां ने तंज किया था. मुझे घर वाले वर्कोहोलिक पुकारते. अब तक मेरी शादी न होने का जिम्मेदार भी वे मेरे काम, काम और बस काम करने को ही ठहराते थे.

‘‘कहा न, यों ही. मैं आइसक्रीम नहीं ला सकता क्या?’’ मेरे जोर देने पर अब मां चुप हो गई थीं.

‘‘तेरे लिए एक रिश्ता आया है,’’ उन्होंने बात बदलते हुए कहा था.

‘‘कहां से?’’

‘‘वह मन्नो मौसी हैं न, उन की रिश्तेदारी में है लड़की. नौकरी नहीं करती है. मैं ने कह दिया है कि वैसे तो मनीष को नौकरी वाली लड़की चाहिए पर फिर भी तसवीर भिजवा दो. तेरे ईमेल पर भेजी होगी. खुद भी देख ले और हमें भी दिखा दे जरा.’’

वह फोटो वाली लड़की उतनी सुंदर नहीं थी जितनी वह बालकनी वाली. पर यों हवा में, बस मुसकराहट के आदानप्रदान के बदले रिश्ता तो भिजवाया नहीं जा सकता. क्या बताता मां को? बस, मन्नो मौसी वाली लड़की की फोटो दिखला दी. मां को पसंद भी आ गई थी. ‘‘घर में तो ऐसी ही लड़कियां जंचती हैं,’’ मां अब मेरी शादी और टालने के मूड में नहीं थीं.

‘‘थोड़े दिन रुक सकती हो तो रुक जाओ.’’

‘‘क्या होगा थोड़े दिनों में?’’

मैं आशान्वित था कि शायद यहीं इसी सोसाइटी में बात बन जाए. ‘‘अभी काफी काम है दफ्तर में. फिर तुम कहोगी समय निकाल, मिलने चलना है वगैरा.’’ फिलहाल मैं ने बात टाल दी थी.

अगली सुबह फिर लिफ्ट में मिल गई थी वह. ‘‘हैलो,’’ वही कर्णप्रिय स्वर.

‘‘हैलो,’’ आज मेरी मुसकराहट कुछ और फैली हुई थी.

‘‘मेरा नाम सुलोचना है. हम हाल ही में सोसाइटी में शिफ्ट हुए हैं. आप यहां कब से रह रहे हैं?’’

‘‘मैं मनीष हूं. यहां कई वर्षों से रह रहा हूं. वहां छठवीं मंजिल पर, अपने मम्मीपापा के साथ. और आप?’’ मेरे लिए जानना आवश्यक था कि सुलोचना शादीशुदा है या नहीं. नए जमाने की लड़कियां कोई भी शादी का चिह्न नहीं धारण करती हैं, फिर गलतफहमी हो जाए तो किस की गलती.

‘‘मैं भी अपने मम्मीपापा के साथ रहती हूं. कभी घर पर चाय पीने आइए न. बाय,’’ सुकोमल हाथ हिलाती हुई  वह सब्जी लेने दुकान में चली गई थी और मैं गाड़ी में सवार हो, अपने दफ्तर की ओर चल दिया था.

सारे रास्ते मेरे कानों में उसी के सुर गूंजते रहे…कभी घर पर चाय पीने आइए न…मेरे मुंह से खुद ही गीत निकल पड़ा, ‘शायद मेरी शादी का खयाल दिल में आया है, इसीलिए मम्मी ने तेरी मुझे चाय पे बुलाया है…’ क्या सचमुच चला जाऊं उस के घर चाय के बहाने? सोचता रहा पर निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाया था.

अगली सुबह बैंक जाते समय जब सुलोचना फिर लिफ्ट में मुझ से टकराई थी तो कुछ शिकायती लहजे में बोली थी, ‘‘आप कल आए क्यों नहीं चाय पर? कितना इंतजार किया मैं ने?’’

मुझे कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. अब तक मैं शादी के लिए तरसता रहा था और अब यों अचानक एक सुंदरी मुझे चाय पे बुला रही थी, मेरे न आने पर मुझ से रूठ रही थी. उफ, मैं गदगद हो उठा था. ‘‘आज शाम मैं पक्का आऊंगा, यह वादा रहा,’’ कहते हुए मुझे लगा जरा ज्यादा फिल्मी हो गया है. पर अब तो तीर कमान से निकल चुका था. अपनी बात पर हंस कर मैं आगे बढ़ गया.

शाम को बैंक से जल्दी निकल कर, घर जा कर फ्रैश हो कर मैं सुलोचना के घर पहुंच गया. अच्छेभले लोग लगे. बातचीत में सभ्य, चाय के साथ जिद कर के पकौड़े भी परोसे. ‘‘सुलोचना ने बनाए हैं,’’ उस की मम्मी का कहना मुझे बहुत अच्छा लगा था. मम्मी और सुलोचना तो काफी हंसबोल रहे थे. बस, उस के पापा जरा गंभीर थे. मानो मेरे पूछने को प्रतीक्षारत थे, फौरन बिफर पड़े थे, ‘‘अरे जनाब, यह मोदी सरकार के फैसले ने जो डीमोनेटाइजेशन किया है उस ने जीना हराम कर दिया है. अब बताइए, पैसा होते हुए भी हम पैसेपैसे को मुहताज हो गए हैं. क्या फायदा नौकरी कर सारी उम्र बचत करने का? ‘‘आज जब जरूरत है तो हम अपना ही पैसा नहीं इस्तेमाल कर सकते. बैंकों की लंबीलंबी कतारों में खड़े होने की हिम्मत सब में तो है नहीं. और फिर इन कतारों में खड़े हो कर भी कितना पैसा निकाल पाएंगे? जरूरत ज्यादा की हो तो कोई क्या करे?’’

‘‘आप चिंता न करें. मुझे बताएं, मैं जो भी मदद कर सकता हूं, करूंगा. मैं बैंक से आप के लिए पैसे निकलवा दूंगा. हां, एक भारतीय नागरिक होने के नाते नियमकानून मेरे ऊपर भी वही लागू हैं जो आप के ऊपर, इसलिए निर्धारित सीमा से अधिक रुपए नहीं निकाल पाऊंगापर आप को कतार में खड़े होने की आवश्यकता नहीं. और हां, यदि अत्यधिक आवश्यकता हो तो मैं अपने पास से भी कुछ राशि आप को दे सकता हूं.’’ मेरी बात से वे पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे. चायपकौड़े की पार्टी कर मैं अपने घर लौट आया.

‘‘सोसाइटी में किस से इतनी जानपहचान हो गई रे तेरी?’’ मां अचंभित अवश्य थीं.

‘‘हैं एक. बताऊंगा,’’ बात टालते हुए मैं अपने कमरे में चला गया. सोचा, पहले बात कुछ आगे तो बढ़े.

उस दिन के बाद हफ्तेभर मैं ने सुलोचना के परिवार की भरसक सहायता की. वे लोग मुझ से बेहद खुश थे. आनाजाना काफी बढ़ गया था. मैं बेधड़क उन के घर जाने लगा था. सुलोचना के मम्मीपापा मुझ से बहुत घुलमिल गए थे. मैं मन ही मन मोदी सरकार के फैसले का धन्यवाद करते नहीं थकता था. मां बारबार मन्नो मौसी वाले रिश्ते के बारे में पूछतीं. मैं ने सोचा अब मां को सुलोचना के मम्मीपापा से मिलवा देने का समय आ गया है.  अगले ही दिन मैं सुलोचना के घर पहुंच गया था. थोड़ी देर हलकीफुलकी बातचीत करने के बाद मैं मुद्दे की बात पर आया, ‘‘आंटीजी, मैं सोच रहा था कि क्यों न आप को अपनी मम्मी से मिलवा दूं? मेरा मतलब है…’’

‘‘मैं तो खुद ही यह सोच रही थी, बेटा. हम दोनों तुम्हारे घर आने ही वाले हैं. बस, सुलोचना की शादी के कार्ड छप कर आ जाएं. फिर सब से पहला कार्ड तुम्हें ही देंगे. तुम मदद न करते तो इस की शादी की तैयारी के लिए राशि एकत्रित करना जटिल हो जाता,’’ सुलोचना की मम्मी ने मेरे ऊपर वज्रपात कर दिया था. सुलोचना की शादी? तो क्या इसीलिए मुझ से दोस्ती की थी? सोसाइटी में सभी जानते थे कि मैं बैंक में उच्चपदाधिकारी हूं. आज तक शादी न होने से मुझे इतनी पीड़ा नहीं हुई थी जितनी आज अपने स्वप्नमहल के टूटने से हुई.

मैं उदासीन हो घर लौट आया था. धम्म से सोफे पर बैठ समाचार सुनने लगा. देखने वालों को लग रहा था कि मैं समाचार सुनने में खोया हूं परंतु उस समय मेरी कोई भी इंद्रिय जागरूक अवस्था में नहीं थी. न तो मेरे कान कुछ सुन रहे थे और न ही मेरी आंखें कुछ देख पा रही थीं. मन दहाड़ें मार रहा था. शुक्र है मन की दहाड़ किसी को सुनाई नहीं दे सकती. उस दिन मां भी अलग ही रूप में थीं. बड़बड़ाती जा रही थीं, ‘‘जब देखो तब काम. शादी कब करेगा यह लड़का. वैसे ही रिश्ते आने कम होते जा रहे हैं, ऐसे ही चलता रहा तो कहां से लाऊंगी इस के लिए लड़की…अब मैं तेरी एक नहीं सुनूंगी. मैं ने फैसला कर लिया है कि मन्नो मौसी वाले रिश्ते को हां कर दूंगी. तेरी नजर में कोई है तो बता दे, वरना मैं इस सर्दी में तेरी शादी करवा दूंगी.’’ मेरे चुप रहने में ही मेरी भलाई थी.

Short Story: फ्रेम में सजे महापुरुष की दुविधा

Short Story: मैंने औफिस की अपने पीछे वाली दीवार पर महापुरुषों की तसवीरें इसलिए नहीं लगाई हैं कि मैं उन की तरह हूं या होना चाहता हूं या कि मैं उन के पदचिह्नों पर चलने वाला सरकारी मुलाजिम हूं. होना बहुत मुश्किल होता है, दिखाना बहुत आसान.

होने का जोखिम मैं ही क्या, आज कोई भी नहीं उठाना चाहता. दिखने का सब आसानी से उठा लेते हैं, उठा रहे हैं. देश की मिट्टी तक बेच कर उस मिट्टी से सोना कमा रहे हैं.

मैं सरकार बदलते ही कई महापुरुषों की तसवीरें एकदम हटा कर रातोंरात उन की जगह नई सरकार के महापुरुषों की तसवीरें अपने औफिस की दीवार पर लटकाता रहने वाला महापुरुष हूं. और तब तक यह काम सारे काम छोड़ करता रहूंगा, जब तक सरकारी नौकरी में हूं, ताकि हर नई सरकार को मैं अपना बंदा लगूं.

तब मुझ से काम करवाने कोई आए, तो उस में यही इंप्रैशन जाए कि मैं टुच्चेपुच्चे टाइप का पिछली सरकार का अफसर नहीं, वर्तमान सरकार का खांटी पार्टी वर्कर हूं, नई सरकार का कोई महापुरुष टाइप का पुरुष हूं कि इन के उन के नीचे मुझे लेटेबैठे देख सब मुझे भी महापुरुष समझें, क्योंकि इन दिनों इसी तरह के महापुरुष होने का प्रचलन चलन में है.

अब औफिसों में कुछ बदलें या न, पर सरकार के बदलने के साथ सरकारी औफिसों के फ्रेम में बंद दीवारों पर टंगने वाले महापुरुष भी बदलते रहते हैं. सरकारों की कोई विचारधारा हो या न, पर अपनेअपने मार्क्ड महापुरुष जरूर होते हैं, जिन की पीठ पर सवार हो कर ये भी महापुरुष बने फिरते हैं. आज के समय का कोई ऐवरग्रीन महापुरुष नहीं, सत्ता समय महापुरुष हैं.

सरकार के साथ बदलते अपने औफिस की दीवार पर बदलते इन फ्रेमों में जबरदस्ती हंसते महापुरुषों को नजर न होने के बाद भी अकसर मैं ने देखा है कि वे वैसे तो सारा साल अपनीअपनी फ्रेम में बंद अपने गले के बदले अपनी फ्रेम पर कागजी फूलों की माला डलवाए, अपनी सरकार का मार्गदर्शन करने के लिए फ्रेम में बंद होने के बाद भी फ्रेम से बाहर आने को न दिखने वाली छटपटाहट लिए छटपटाते ही रहते हैं, पर जबजब इन की कोई जयंतीवयंती, पुण्यतिथि आती है, तब इन की फ्रेम से बाहर आने की छटपटाहट कुछ और ही बढ़ जाती है.

मतलब, तब फे्रम में बंद होने के बाद भी इन की बाहर आने की छटपटाहट साफ महसूस करने की ताकत न होने के बाद भी साफ महसूस की जा सकती है.

तब मैं ने फ्रेम में जबरदस्ती मुसकराते बंद उस हंसते महापुरुष को फ्रेम से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करते देखा तो जान गया कि या तो बंधु की पुण्यतिथि नजदीक है या फिर जयंती. इन महापुरुषों को अकसर इन्हीं 2 दिनों में फ्रेम से बाहर आने की इजाजत होती है.

वे महापुरुष आधे फ्रेम से बाहर निकल जाने के बाद बाकी बहुत मशक्कत के बाद भी न निकल पाए तो वे फ्रेम से बाहर निकलने को आड़ेतिरछे होते जोर मारते मदद को पुकारे तो मैं ने उन की मदद करने पर उन्हें बहुत गुस्सा होते देखा.

हद है यार, फ्रेम में बंद हो जाने के बाद भी चैन से नहीं रह सकते क्या? अब बाहर आ कर क्या नया करने का इरादा है?

फ्रेम में बंद मुसकराते दीवार पर टंगे महापुरुषों पर जब जरा गौर से नजर दौड़ाई, तो फ्रेम में बंद महात्मा गांधी वाले फोटो में छटपटाहट थी.

सच कहूं, तो उन्हें मैं ने जब से देखा है, फ्रेम में बंद ही देखा है या फिर खुले में उन का रोल करते फिल्मों में किसी और कलाकार को.

जब वे फ्रेम से बाहर निकलने को बहुत ही कराहने लगे, तो मैं ने उन के पास जा कर पूछा, ‘‘क्या है गांधी? छटपटा क्यों रहे हो? अब तो यहां ऐसे ही चलेगा. महापुरुष फ्रेम में बंद ही मुसकराते हुए अच्छे लगते हैं. अब तुम फ्रेम में ही बंद रहो, तो तुम्हारी भी इज्जत बनी रहे और हमारी भी.’’

‘‘अपने सपनों के भारत को देखना चाहता हूं कि वह इस साल कितना और गिरा? साल में 1-2 दिन तो हमारा भी बाहर निकलना बनता है कि नहीं?’’

‘‘तुम बाहर निकलोगे तो दिवंगत होने के बाद भी तुम्हारा मन आत्महत्या करने को हो जाएगा,’’ पता नहीं क्यों कह मैं ने दिया.

‘‘मतलब? मरने के बाद भी क्या आदमी आत्महत्या करने की सोच सकता है?’’ गांधी ने जैसेतैसे फ्रेम में से पूरा निकलने की कोशिश करते हुए मेरी बाजू पकड़ कर पूछा, तो मैं ने कहा, ‘‘गांधी, फ्रेम में रहो तो हंसने को न चाहते हुए भी मन कर ही जाया करेगा. अब वह समय नहीं, जो तुम्हारे टाइम में था, क्योंकि वह कुछ बना ही नहीं जो तुम बनाना चाहते थे, तो ऐसे में फ्रेम से बाहर निकल क्यों परेशान होना?’’

‘‘तो फ्रेम से बाहर निकल कर अपने सपनों को बचाने के लिए सत्याग्रह करूंगा, उस के लिए असहयोग आंदोलन छेड़ूंगा,’’ फादर औफ नेशन ने कहा, तो सुन कर मैं हंसा और बोला, ‘‘अरे माई डियर, कहने के लिए फादर औफ नेशन, अब तुम्हें अपनाने के लिए नहीं, दिखाने, खाने, सत्ता पाने, लोगों को बरगलाने मात्र के लिए फादर रह गए हो.

‘‘अब तो यहां कदमकदम पर असत्याग्रह हो रहे हैं. देश को तोड़ने को एकदूसरे के लिए सहयोग हो रहे हैं. अब न कहीं विचार है, न कहीं आचार. सब मौके की देशभक्ति में रमे हैं.

‘‘अब समय पहले से ज्यादा नाजुक चल रहा है, इसलिए प्लीज, सबकुछ किया करो, पर फ्रेम के भीतर रह कर ही,’’ मैं ने कहा, तो उन की एक टांग फ्रेम के बाहर तो एक भीतर. उन का एक बाजू फ्रेम के बाहर तो दूसरा भीतर. मतलब, वे न फ्रेम के बाहर, न फ्रेम के भीतर.

Romantic Story: रुक गई प्राची – क्या प्राची को उसका प्यार मिल पाया

Romantic Story: चंद्रभागाके तट पर खड़ी प्राची आंखों में असीम आनंद लिए विशाल समुद्र में नदियों का मिलन देख रही थी. तभी बालुई तट पर खड़ी प्राची के पैर सागर ने पखार लिए. असीम आनंद की अनुभूति गजब का आकर्षण होता है समुद्र का. प्राची का मन किया कि वह समुद्र का किनारा छोड़ कर उतरती जाए, समाती जाए, ठीक समुद्र के बीचोंबीच जहां नीला सागर शांत स्थिर है. शायद उस के अपने मन की तरह. फिर मन ही मन सोचने लगी कि क्यों आई सब छोड़ कर, सब को छोड़ कर या फिर भाग कर… सागर देखने की उत्कंठा तो कब से थी. वह पुरी पहुंचने से पहले कुछ देर के लिए कोर्णाक गई थी, पर उस का मन तो सागर में बसा था. उसे पुरी पहुंचने की जल्दी थी.

मगर कल ऐसा क्या हुआ कि बौस के सामने छुट्टी का आवेदन दिया कि कल ही जाना जरूरी है. मां को ओडिसा घुमाने ले जाने के लिए. कल ही से छुट्टी चाहिए और वह भी कम से कम 5 दिनों की. बौस के चेहरे से लग रहा था कि उन्हें प्राची की बात पर यकीन नहीं हुआ. मगर प्राची का चेहरा कह रहा था कि अगर छुट्टी नहीं मिली तो भी चली जाएगी विदआउट पे लीव पर या फिर नौकरी से इस्तीफा देना पड़े तब भी.

बौस ने छुट्टी सैंक्शन कर दी. प्राची के चेहरे पर सुकून आया. मगर उस ने यह बात सिर्फ अपनी सहेली निकिता से शेयर की, इस ताकीद के साथ कि औफिस के किसी भी सहयोगी को पता न चले कि वह कहां जा रही है. प्राची घर चल दी. कोलकाता शहर नियोन लाइट में जगमगा रहा था. प्राची की आंखों में भी आंसू झिलमिला गए. अचानक मानो नियोन लाइट से होड़ लगी हो.

कई सारे सवाल प्राची के मन में उमड़ रहे थे. वह जानती थी कि इन के जवाब उसे खुद ही देने हैं. वह पूछना चाहती थी खुद से कि क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है? उसे पता था निखिल के सामने होने से यह संभव नहीं. वह सब भूल जाती है बस लगता है निखिल सामने रहे उस के बाद उसे दुनिया में किसी भी चीज की जरूरत नहीं.

सुबह के 4 बजे ही बिस्तर छोड़ दिया प्राची ने. एक एअरबैग में कुछ कपड़े रखे, मेकअप का जरूरी सामान लिया और जरूरत भर के पैसे ले कर वह बसस्टैंड की तरफ चल पड़ी. वह चाहती थी कि रात होने से पहले पुरी पहुंच जाए. इस के पीछे 2 वजहें थीं. एक तो वह अंधेरा होने से पहले पहुंचना चाहती थी ताकि उसे होटल में कमरा मिलने में कोई परेशानी न हो और दूसरा अगर उसे होटल नहीं मिला तो उस के अंकल रेलवे में काम करते हैं. वहां रेलवे का गैस्टहाउस भी था. वहां कुछ इंतजाम हो जाता.

दूसरी अहम बात उस ने यह सुन रखी थी कि पूनम की रात समुद्र की लहरें काफी तेज उछलती हैं मानो चांद को छूना चाहती हों. उसे यह शानदार दृश्य देखना था और संयोग से उस दिन पूनम की रात भी थी. जब वह समुद्र के तट पर पहुंची शाम ढल रही थी. समुद्र के दूसरी छोर से चांद निकल रहा था सफेद चमकीला. प्राची के कदम थम से गए. एक तरफ रेत के किनारे से बुलाता सागर तो दूसरी तरफ होटलों की कतार, जहां उसे कुछ दिन रहना था. वह सोचने लगी कि पहले होटल ले या समुद्र को छू ले. अगले ही पल अपने एअरबैग को रेत पर पटका उस ने और दौड़ गई समुद्र किनारे.

सूरज के ढलते ही अंधेरा हो गया. रात में समुद्र की आवाज एक भय पैदा कर रही थी. सिहरन सी होने लगी. अपने दोनों हाथों को सीने में बांध वह जाने लगी पास और पास हाहाकार करते समुद्र के. उसे लगा जैसे यह उस के ही दिल की आवाज हो. दूर समुद्र के दूसरे छोर पर चांद रोशन था. गहन समुद्र… दूर तक पानी ही पानी. बस लहरें उठने के शोर से पता चलता था कि समय सरक रहा है. जी चाहा कि दूर समुद्र में उतरती जाए… चलती ही जाए जब तक कि पानी उस की सांसों की डोर न थामने लगे. मगर इस खयाल को परे झटका प्राची ने. सोचा यह तो आत्महत्या करने वाली बात होगी. उस ने ऐसा तो कभी नहीं चाहा. बहुत जीवट है उस में. जमाने से लड़ कर अपना मुकाम बना सकती है. प्राची लौट चली. पुकारते समुद्र की आवाज को अनसुना कर के. बैग को एक झटके से कंधे पर लटकाया और चल पड़ी.

उसे होटल का कमरा भी लेना था. देर हो रही थी. अब सोचविचार का वक्त नहीं था.

अंधकार अपनी पूरी शिद्दत से पसर चुका था. वह चलतेचलते भीड़भाड़ वाले इलाके से दूर आ चुकी थी. सामने जो होटल आया उस ने रिसैप्शन पर जा कर सीधे पूछा कि कोई रूम खाली है? हां में जवाब मिलने पर वह कमरा देखने चली गई. सोचा जैसा भी हो आज रात रुक जाएगी. पसंद नहीं आएगा तो कल बदल लेगी. मगर कमरा खूबसूरत था. सब से अच्छी बात यह कि उस की फेसिंग समुद्र की तरफ थी. वह अब पास जाए बिना भी समुद्र देख सकती है, जिस के लिए वह आई है. खुश हो कर प्राची ने कमरा ले लिया और खाने का और्डर दे कर फ्रैश होने चली गई. उस के आने तक डिनर भी आ गया. वह खाना खा कर बाहर बालकनी में बैठ गई, हाथ में कौफी का मग थामे. अब उस के पास तनहाई थी, समुद्र था और थी निखिल की यादें. वह इसी के लिए तो आई थी. खुद से बातें करने… जीवन की दिशा तय करने. वहां उस के आगे वह कुछ सोच पाने में असमर्थ जैसे कुछ सोच पाना उस के इख्तियार में नहीं.

हां, वह प्यार करती है निखिल को बेहद. उस के बिना जीने की कल्पना भी उसे पागल बना देती है. मगर निखिल का कुछ पता नहीं चलता. उस की आंखें तो कहती हैं वह भी आकर्षित है, मगर जबान कुछ कहना नहीं चाहती. वह चाहती है निखिल एक बार कहे. बहुत असमंजस में है प्राची. उस के सामने कैरियर है, प्यार है, वह क्या करे. डरती है, कहीं आगे बढ़ कर यह बात निखिल को बताई तो कहीं इनकार से दिल न टूट जाए. उस के बाद उस के साथ एक औफिस में काम करना संभव नहीं होगा. प्यार मिला, तो खजाना मिलेगा और न मिला तो जैसे सब छूट जाएगा, दिल टूटेगा, कैरियर भी समाप्त. फिर क्या करेगी वह इस बड़े से शहर में. वापस घर जा कर सब लोगों को, दोस्तों को गांव के परिचितों को क्या बताएगी? बड़े दंभ के साथ वह घर छोड़ कर आई गांव से यहां तक. फिर 1 ही साल में अपने मांबाबूजी को भी शहर ले आई अपने साथ रखने के लिए गोया जता रही हो वह कि आज के दौर में वह किसी बेटे से कम नहीं उन के लिए. फिर उसे अपने पैरों पर खड़ा होना है. मुकाम हासिल करना है. प्यार करने तो नहीं आई इस कोलकाता जैसे शहर में. तो फिर निखिल उस का रहनुमां कैसे बन बैठा? क्यों वह चकोर की तरह बिहेव करती है? क्यों तकती है उस का रास्ता? इन्हीं सवालों के जवाब खोजने हैं आज उसे यहां. अब उसे फैसला लेना होगा. खुद को मजबूत बनाने ही तो यहां आई है.

प्राची जानती है कि निखिल को उस की केयर है. वह परेशान होगा. फिर भी उसे बता कर नहीं आई कि वह कहां जा रही है. उस ने अपना मोबाइल भी स्विचऔफ कर दिया ताकि कोई उसे डिस्टर्ब न कर सके. उसे फैसला लेना है जीवन का, प्यार का, कैरियर का.

अब रात ढल रही है. एकांत कमरे में प्राची सोने की कोशिश में है. पूरे चांद को और समुद्र की लहरों को देख उन का उछाल बारबार आंखों के सामने आ रहा है प्राची के… काश वह निखिल के साथ यहां आ पाती. उस के साथ जिंदगी बिताना कितना सुखद होता. यह सोच कर उसे रोमांच हो आया.

प्राची को याद है, वह रात को 10 बजे अपनी डैस्क का काम खत्म कर के घर आती है. उस के ऐडिटोरियल हैड उस के कार्यव्यवहार से बहुत संतुष्ट हैं. रात अपनी न्यूज स्टोरी की आखिरी कौपी उन को दे कर वह कैब से घर चली जाती है. जहां रोज की तरह छत वाले कमरे का अकेलापन उस का इंतजार कर रहा होता है. मां पहले अकसर उस के लिए गरम खाना बनाती थी उस के आने के बाद, मगर बाद में उस ने जिद कर के मां को मना कर दिया. इस के 2 कारण थे- एक तो मां की बढ़ती उम्र की वजह से उन के घुटनों का दर्द और दूसरी वह खुद इतनी थकी होती कि खाने की हिम्मत नहीं होती. चाहती, बस कुछ ऐसा मिल जाए जिसे सीधे गटक लिया जाए हलक में दलिए की तरह. सो अब उसे खाना भी वहीं कमरे में रखा मिल जाता है जिसे नहाने के बाद प्राची जैसेतैसे निगलती है और फिर कुछ देर टीवी के बाद सीधे बिस्तर में.

वह कभी रात को किसी से भी फोन पर बात नहीं करती. मगर आज क्यों बारबार उसे लग रहा है कि बस एक बार निखिल की भारी आवाज सुन ले. बस एक बार फोन कर उस पार से आती उस की सांसें महसूस करे बस एक बार. इसी असमंजस में उस ने हाथ बढ़ा कर पर्स में पड़ा अपना मोबाइल निकालने का उपक्रम किया. बस इतने में ही उस का दिल जोरों से धड़क उठा. जैसेतैसे उस ने उसे औन किया. इस के साथ ही उस के मन में हजारों खयाल एकसाथ उमड़ पड़े.

निखिल का उस के साथ ऐक्स्ट्रा अटैंटिव बरताव करना, उस की बातों में प्राची ने हमेशा एक सम्मान मिश्रित प्रेम अनुभव किया. प्राची ने कभी कोई हलकी बात उस के मुंह से नहीं सुनी किसी के लिए भी.

अपने कालेज के दिनों से ही प्राची अपने व्यक्तित्व के चलते हर जगह छाई रहती थी. पढ़ाई, संगीत, वादविवाद प्रतियोगिता हो या फिर फैशन डिजाइनिंग अथवा कालेज की छमाही पत्रिका में लेखन, संपादन हर जगह प्राची आगे… कालेज के लड़कों की ही नहीं लड़कियों की भी जैसे स्टार रही है वह.

उसे याद है कितने ही लड़के उस के आतेजाते रास्ते में खड़े उस की राह ताकते रहते. कुछ करीब आ कर बातें करने की कोशिश करते. कई बार उसे अब सोच कर हंसी आती है कि कैसे किसी भी साल रोज डे के दिन उस के कालेज पहुंचने से पहले ही उस की डैस्क गुलाबों से भरी होती, लाल, पीले, मैरून, पिंक… सब को पता था उसे गुलाबों से बेइंतहा लगाव है. हर बुके के साथ उस के लिए विश लिखी होती, साथ ही लिखा होता उस लड़के का नाम और एक दबा सा अस्पष्ट प्रीत निवेदन. प्राची उन सब प्रीत निवेदन की परचियों को फाड़ कर फेंक देती और गुलाब रख लेती. उस का इतना प्रभावी व्यक्तित्व था कि लड़के उस के साथ रहते, मगर जो किला उस ने अपने चारों ओर बना रखा था उसे भेद कर भीतर आने की हिमाकत कोई नहीं कर पाया. और आज जैसे लग रहा है, उन दिनों में मजबूत रही प्राची खुद ही अपने बनाए किले की प्राचीरें तोड़ने को मजबूर है.

औफिस में भी एक निखिल को छोड़ कर उस ने लगभग सभी की आंखों में अपने लिए एक सवाल देखा. कभी वह ‘हम भी खड़े हैं राहों में’ वाले स्टाइल में होता, कभी केवल टाइमपास जैसा कहीं किसी सौदेबाजी की तरह. मगर वह कभी नहीं डगमगाई. नहीं झुकी किसी प्रलोभन के आगे. उस का काम बोलता था. उस की खबरों की रिपोर्टिंग में उस का नाम बोलता था. मगर आज इस आधी रात को क्यों टूट रही है वह और वह भी एक ऐसे सहकर्मी के लिए जिस ने सामने से कभी कुछ कहा नहीं… उसे कोई इशारा भर भी नहीं किया. बस वह रोज उस का लंच टाइम में वेट करता. साथ चाय पीती उस के साथ. वहीं बहुत सी बातें होतीं. प्राची अब सोचती है बातें भी क्या. वह बस उसे सुनती मंत्रमुग्ध सी हो जाती उस की आवाज में. कुछ ही पलों में लगता जैसे समुद्र तट पर खड़ी है वह. अंधकार में स्वर की लहरों पर सवार है. बहा लिए जा रहा कोई उस के अनछुए मन को. सिहरन सी भर रहा है कोई उस अनछुए तन में.

अचानक तंद्रा भंग हुई उस की. उस ने देखा मोबाइल में पता नहीं कब उस की उंगलियां निखिल का नंबर ढूंढ़ लाईं जिसे उस ने ‘ऐ बेबी’ के नाम से सेव किया था. सर्दी की यह रात तेजी से ढल रही थी. फोन हाथ में लिए प्राची उठी. दिल जोर से धड़क रहा था. खिड़की से समुद्र की ओर झांका जो इस वक्त हिलोरें ले रहा था. लहरों की आवाजें किनारों की चट्टानों से टकराने की… लग रहा था जैसे हजारों लहरों पर निखिल का नाम लिखा है और वह नाम उस की मन की कठोर चट्टानों को भिगो रहा है… तोड़ने की, भेदने की कोशिश कर रहा है… अचानक उसे खयाल आया निखिल सोते हुए कैसा लगता होगा और फिर यह सोचती सी प्राची एक षोडसी सी लजा उठी.

मगर इस खयाल से वह बेहद खुशी से भर उठी. उस ने फोन वापस औफ कर दिया. सोचा अगली सुबह निखिल से जरूर बात करेगी. अभी नहीं. इस निर्णय के बाद उसे लगा कि अब सो पाएगी वह. हालांकि सुबह होने को है, मगर कुछ घंटे चैन की नींद फ्रैश कर देती है उसे, यह वह जानती है. उस ने अब तय किया कि सुबह उठ कर समुद्र के किनारे जब लहरें हौले से उस के पैरों को भिगो रही होंगी और समुद्र के ऊपर आसमान में निखिल को ले कर उस की कल्पनाओं की तरह असंख्य पंछी उड़ रहे होंगे तब ऐसे में वह निखिल को फोन से अपने मन की बात बता देगी. प्राची को ये सब सोचते हुए बेहद सुकून मिला और फिर पता ही नहीं चला कि वह कब अपने होंठों पर एक मुसकान लिए नींद के आगोश में चली गई.

करीब 2 घंटे की गहरी नींद के बाद प्राची जागी. खिड़की से बाहर झांका. सूर्य एक नारंगी रंग के गोले की तरह निकलने के उपक्रम में था. शांत समुद्र में बहुत हलकी सी चमकीली लहरें जैसे बुला रही थीं उसे. प्राची जल्दी से अपना कैमरा उठा कर दौड़ पड़ी समुद्र की ओर… यही पल उसे कैद करने हैं… अपने जेहन में भी, अपने जीवन में भी. इन्हीं की साक्षी बन उसे निखिल को अपना फैसला बताना है.

नंगे पैरों को लहरें चूम रही थीं. प्राची ने वक्त के इस बेहद खास लमहे को पहले अपने कैमरे में कैद किया. फिर कांपते हाथों से पर्स से मोबाइल निकाल कर निखिल का नंबर मिलाया. धड़कते दिल से उस की रिंगटोन सुनती रही, ‘‘सुनो न, संगेमरमर की ये मीनारें.’’ यह सुनते हुए उसे लग रहा था जैसे दिल की धड़कनें कानों से कनपटियों के निचले हिस्से तक जमा हो रहीं… वह खोई थी लहरों में, गीत में… उस बेहद रोमानी आलम में अचानक फोन कनैक्ट हुआ.

‘‘हैलो… निखिल….’’ वह जोर से लगभग चिल्लाते हुए बोली पर दूसरी ओर से कोई रिप्लाई नहीं आया.

‘‘निखिल…’’ वह फिर से बोली. ‘‘हैलो, वे सोए हैं अभी… आप कौन?’’ आवाज निश्चित किसी लड़की की थी.

‘‘जी मैं उनके औफिस से बोल रही हूं,’’ किसी तरह रुकरुक कर प्राची ने बताया. दूसरी तरह चुप्पी छाई रही.

‘‘आप कौन?’’ अटकते हुए किसी तरह प्राची ने पूछ ही लिया. ‘‘मैं निखिल की पत्नी और आप?’’

प्राची के हाथ से फोन छूट कर गीले बालू पर गिर गया. हैरान खड़ी थी वह… लहरें अब भी प्राची के पैरों को, फोन को भिगो रही थीं… समुद्र की आवाज गूंज रही थी… लहरें आ रही थीं… जा रही थीं.

Hindi Kahani: उसकी रोशनी में – क्या सुरभि अपना पाई उसे

Hindi Kahani: पूस का महीना था, कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. रात 10 बजे सूरत में हाईवे के किसी होटल पर यात्रियों के भोजन के लिए बस आधे घंटे के लिए रुकी थी. मैं ने भी भोजन किया और फिर बस में सवार हो गया. मुझे उस शहर जाना है, जो पहाडि़यों की तलहटी में बसा है और अपने में गजब का सौंदर्य समेटे हुए है. जहां कभी 2 जवां दिल धड़के, सुलगे थे. और उसी की स्मृति मात्र से छलक जाती हैं आंसुओं की बूंदें, पलकों की कोर पर.

बस ने थोड़ी सी ही दूरी तय की होगी कि मेरी आंख लग गई. रतनपुर बौर्डर पर ऐंट्री करते ही रोड ऊबड़खाबड़ थी, जिस कारण बस हिचकोले खाती हुई चल रही थी. मेरा सिर बस की खिड़की के कांच से टकराया, तो नींद में व्यवधान पड़ा. आंखें मसलीं, घड़ी देखी तो सुबह होने में थोड़ी देर थी. बाहर एकदम सन्नाटा छाया हुआ था. बस सर्द गुबार को चीरती हुई भागी जा रही थी.

सुबह के 8 बजे थे. सूरज की किरणें धरती को स्पर्श कर चुकी थीं. उदयापोल सर्कल पर बस से उतरा ही था कि रिकशा वाला सामने आ खड़ा हुआ. मेरे पास लगेज था. मैं बस से नीचे उतर आया. मैं यहां अपने प्रिय मित्र पीयूष की शादी में शरीक होने आया था. उस ने शादी के निमंत्रणपत्र में साफ लिखा था कि यदि तू शादी में नहीं आया तो फिर देखना.

हालांकि सफर बहुत लंबा था. तकरीबन 800 किलोमीटर का. जाने का मन तो नहीं था, लेकिन 2 बातें थीं. एक तो इस ‘देखना’ शब्द का दबाव जो मुझ से सहन नहीं हो रहा था, दूसरा इस शहर से जुड़ी यादें, जिन्हें खुद से अलग नहीं कर पाया. मैं ने आंखें मूंद कर भीतर झांकने की कोशिश की, एक सलोनी छवि आज भी मेरे हृदय में विद्यमान है. उस के होने मात्र से ही मेरे भीतर का आषाढ़ भीगने लगता था और मन हमेशा हिरण की तरह कुलांचें भरने लगता था. उसे गाने का बहुत शौक था. वह रातभर मुझे अपनी मधुर आवाज में अलगअलग रागों से परिचित करवाती थी, पर अब तो मन की चित्रशाला में रागरंग रहा ही नहीं, वहां मात्र यादों के चित्र शेष रह गए हैं.

‘‘किधर चलना है साहब ’’ औटो वाले ने पूछा.

‘‘मीरा गर्ल्स कालेज के सामने वाली गली में.’’

‘‘आइए बैठिए,’’ कहते हुए उस ने मेरा लगेज रिकशा में रख दिया.

‘‘अरे, तुम ने बताया नहीं, कितना चार्ज लगेगा ’’

‘‘क्या साहब, सुबह का समय है, शुरुआत आप के हाथ से होनी है, 50 रुपया लगते हैं, जो भी जी आए, दे देना.’’

रिकशा में बैठा मैं उस की ‘जो भी जी में आए, दे देना’ वाली बात पर गौर कर रहा था. सोच रहा था, सुबह का वक्त भी है, 50 रुपए से कम देना भी ठीक नहीं होगा. मैं भी उसे अपनी तरफ से कहां निराश करने वाला था.

रास्ते में सिगनल पर रिकशा थोड़ी देर लालबत्ती के हरा होने के इंतजार में खड़ा रहा. यह चेटक सर्कल था. मैं ने नजर दौड़ाई. सिगनल के दाईं ओर चेटक सिनेमा हुआ करता था. अब वह नहीं रहा, उसे तोड़ कर शायद कौंप्लैक्स बनाया जा रहा है. 5 साल में बहुत कुछ बदल गया था. सिनेमा वाली जगह दिखी तो मन अतीत की स्मृतियों को कुरेदने लगा.

यादों का सिरा पकड़े मैं आज तक उस की रोशनी के कतरे तलाश रहा हूं, यादें उस के आसपास भटक कर आंसुओं में बह जाती हैं.

10 साल मैं इसी शहर में रहा था. इस शहर को अंदरबाहर से समझने में मुझे ज्यादा समय नहीं लगा. हां, तब यहां इतनी चकाचौंध भी नहीं थी. समय के चक्र के साथ इस शहर ने विश्वपटल पर अपनी रेखाएं खींच दी हैं. उन दिनों यहां मात्र यही एक टौकीज हुआ करता था. यहीं पर मैं ने सुरभि के साथ पहली फिल्म देखी थी बालकनी में बैठ कर. फिल्म थी, ‘प्रिंस.’

वह शायद दिसंबर का कोई शनिवार था. वह होस्टल में रहती थी. होस्टल की चीफ वार्डन लड़कियों को अधिक समय तक बाहर नहीं रहने देती थी. उन्हें 8 बजे तक किसी भी हालत में होस्टल में पहुंच जाना होता था. शनिवार को उस ने वार्डन से कह दिया कि आज वह घर जा रही है, सोमवार तक लौट आएगी. शाम के 5 बजे वह अपना बैग उठा कर मेरे कमरे पर आ गई थी.

‘आज तुम आ गई हो तो अपने हाथ से खाना भी बना कर खिला दो.’

‘क्या  खाना, मुझे कौन सा खाना बनाना आता है.’

‘फिर तुम्हें आता क्या है यदि हमारी शादी हुई तो मुझे खाना बना कर कौन खिलाएगा ’

‘कौन खिलाएगा का क्या मतलब, बाहर से मंगवाएंगे.’

‘क्या पुरुष शादी इसलिए करते हैं कि घर में पत्नी के होते हुए उन्हें खाना बाहर से मंगवाना पड़े.’

‘पुरुषों की तो पुरुष जानें, मैं तो अपनी बात कर रही हूं.’

उस की बातें सुन कर एक पल मुझे अपनी मां की याद आ गई. वे घर का कितना सारा काम करती हैं और एक यह है आधुनिक भारतीय नारी, जिसे काम तो क्या, खाना तक बनाना नहीं आता.

‘अरे, महाशय, कहां खो गए  मैं तो यों ही मजाक कर रही थी. खाना बाद में खाना, पहले मैं तुम्हारे लिए एक कप चाय तैयार कर देती हूं.’

उस दिन पहली बार उस के हाथ की चाय पी कर मन को कल्पना के पंख लग गए थे.

‘मैं खाना भी स्वादिष्ठ बनाती हूं, पर आज नहीं. आज तो मूवी देखने चलना है.’

‘ओह, मैं तो भूल ही गया था, 5 मिनट में तैयार हो जाता हूं.’

हम जल्दी से सिनेमा देखने पहुंच गए. अब मल्टीप्लैक्स का जमाना आ गया था. सिनेमाघर के बाहर मुख्यद्वार के ऊपर रंगीन परदा लगा था, जिस पर फिल्म के नायकनायिका का चित्र बना था. अभिनेत्री अल्प वस्त्रों में थी, जिस से पोस्टर पर बोल्ड वातावरण अंगड़ाइयां ले रहा था. मैं टिकट विंडो पर जाता, उस से पहले ही उस ने मना कर दिया, पोस्टर इतना गंदा है तो फिल्म कैसी होगी  चलो, फतेहसागर घूमने चलते हैं.

‘अरे, क्या फतेहसागर चलते हैं  किस ने कहा कि फिल्म गंदी है ’

‘तुम तो पागल हो, पोस्टर नहीं दिखता क्या, कितना खराब सीन दिया है.’

‘ओह, कितनी भोली हो तुम. फिल्म वाले इस तरह का पोस्टर बाहर नहीं लगाएंगे तो लोग फिल्म की ओर कैसे आकर्षित होंगे  वैसे फिल्म में ऐसा कुछ है नहीं, जैसा तुम सोच रही हो. टीवी पर कई दिन से इस का ऐड भी आ रहा था. रिव्यू में भी इसे अच्छा बताया गया है.’

वह मूवी देखने में थोड़ा असहज महसूस कर रही थी, लेकिन जैसेतैसे उसे मना लिया. उस के चेहरे पर अचानक मुसकान थिरकी और वह मान गई.

सिनेमा हौल की बालकनी तो जैसे हमारे लिए ही सुरक्षित थी. पूरे हौल में एकाध सिर इधरउधर बिखरे नजर आ रहे थे. फिल्म थोड़ी ही चली थी कि गीत आ गया. गीत आया जो आया, मेरे लिए मुसीबत की घंटी बजा गया. नायकनायिका दोनों आलिंगनबद्ध शांत धड़कनों में उत्तेजना का संचार करता दृश्य, अचानक उस ने मेरी आंखों पर अपनी हथेली रख दी.

‘आप यह सीन नहीं देख सकते,’ उस ने कहा.

जब तक फिल्म खत्म नहीं हुई, मेरे साथ यही चलता रहा. उस दिन तो मैं वह मूवी आधीअधूरी ही देख पाया, फिर एक दिन अपने दोस्तों के साथ जा कर अच्छी तरह देखी. यह फिल्म सुरभि के साथ मेरी पहली और आखिरी फिल्म थी. छोटी सी तकरार को ले कर उस ने मुंह क्या मोड़ा, दोस्ती के गहरे और मजबूत रिश्ते को भी तारतार कर दिया. वह मुहब्बत की मिसाल थी पर उस ने वापस कभी मेरी ओर झांक कर नहीं देखा. इस बात को 5 वर्ष बीत गए. पता नहीं, वह कहां होगी, पर मैं हूं कि आज भी मुझे उस के साए तक का इंतजार है. कभी सोचता हूं कि यह भी क्या कोई जिंदगी है जो उस के बिना गुजारनी पड़े.

‘‘साहब, कौन से मकान के बाहर रोकना है, बता देना ’’ रिकशा वाले ने कहा.

‘‘उस सामने वाले घर के बगल में ही रोक देना.’’

पीयूष मुझे देखते ही सामने दौड़ा आया और बांहों में जकड़ लिया.

‘‘मुझे पता था, तुम अवश्य आओगे. मेरे लिए न सही, पर किसी खास वजह के लिए. और हां, तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है.’’

‘‘और वह क्या खबर है ’’

‘‘शाम को तुम्हें अपनेआप पता चल जाएगा. थके हुए हो, अभी तुम आराम करो.’’

‘‘अच्छा, एक बात बता यार, कभी सुरभि दिखाई दी क्या, मेरे जाने के बाद ’’

‘‘हां… मिली थी, तुम्हारे लिए कोई संदेश दिया था. शाम को रिसैप्शन के समय बताऊंगा.’’

अब मेरे लिए यह दिन निकालना भारी पड़ेगा. मन तो करता है कि अभी दिन ढल जाए और रिसैप्शन शुरू हो जाए. ‘काश, वह आज भी मेरा इंतजार कर रही होगी. उस का हृदय इतना पाषाण नहीं हो सकता. फिर उस ने मुझ से मिलने की कोशिश क्यों नहीं की. पीयूष को क्या बताया होगा उस ने. यह भी कितना नालायक है, बात अभी क्यों नहीं बताई मुझे.’’

मैं बेसब्री से रिसैप्शन शुरू होने का इंतजार कर रहा था. आखिर दिन ढल भी गया और रिसैप्शन में मेरी आंखों ने वह देखा जो पीयूष मुझे दिन में बता नहीं पाया था.

सुरभि शादी में आई थी. उस के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. उस के साथ तकरीबन 2 साल का सुंदर बच्चा भी था. वह बिलकुल सुरभि पर गया था. मैं उस से आंखें बचा रहा था, पर शायद उसे मेरी उपस्थिति का पहले से अंदाजा था. यह बच्चा किस का है. कहीं सुरभि ने…

पीयूष से मुझे पता चला कि सुरभि जब मुझ से रूठ कर गई, तब घर वालों के दबाव में उस ने शहर के एक रईस युवक से शादी कर ली थी, पर शादी के एक साल में ही उन के रिश्ते में दरार पड़ गई और वह गुमनाम सी बन कर रह गई.

मैं ने उसे कितना समझाया था  हरदम उसे अपना समझा. उसे खरोंच तक नहीं लगने दी, पर वह मुझे नीचा दिखा गई. मैं उस के दिल और दोस्ती की आज भी कद्र करता हूं और हमेशा करूंगा. साथ ही कभीकभी एक अपराधबोध भी मेरे अंदर जागृत होता है, जिस का एहसास मुझे हमेशा सालता रहेगा. पर हैरानी है कि वह मुझे अकेला और तनहा छोड़ गई. लगता नहीं कि अब किसी और के साथ निबाह हो सकेगा.

उसे नहीं पता कि आज भी मैं उसे कितना प्यार करता हूं, पर आज मेरे कदम उस की ओर उठ नहीं पा रहे हैं और होंठ भी खामोश हैं. आंखों में जलधारा लिए मैं ने भी नजरें घुमा लीं.

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