व्यवस्था : अपनी कमियों को जरूर देखें

एक रात को मैं अपनी सहकर्मी साक्षी के घर भोजन पर आमंत्रित थी. पतिपत्नी दोनों ने बहुत आग्रह किया था. तभी हम ने हां कर दी थी. साक्षी के घर पहुंची. उन का बड़ा सा ड्राइंगरूम रोशनी में नहाया हुआ था. साक्षी ने सोफे पर बैठे अपने पति के मित्र आनंदजी से हमारा परिचय कराया. साक्षी के पति सुमित भी आ गए. हम लोग सोफे पर बैठ गए थे. कुछ देर सिर्फ गपें मारीं. साक्षी के पति ने इतने बढि़या और मजेदार जोक सुनाए कि हम लोग टैलीविजन पर आने वाले घिसेपिटे जोक्स भूल गए थे. तय हुआ कि महीने में एक बार किसी न किसी के घर पर बैठक किया करेंगे.

हंसी का दौर थमा. भूख बहुत जोर से लग रही थी. रूम के एक हिस्से में ही डाइनिंग टेबल थी. टेबल खाना खाने से पहले ही तैयार थी और हौटकेस में खाना, टेबल पर लगा हुआ था. प्लेट्स सजी थीं. जैसे ही हम खाने के लिए उठने लगे, लाइट चली गई. एक चुटकुले के सहारे 5-10 मिनटों तक इंतजार किया. पर लाइट नहीं आई. आनंद ने पूछा, ‘‘अरे यार, तुम्हारे पास तो इनवर्टर था?’’ उन की जगह साक्षी ने जवाब दिया, ‘‘हां भाईसाहब है, पर खराब है. कब से कह रही हूं कि मरम्मत करने वाले के यहां दे दें. पर ये तो आजकलआजकल करते रहते हैं.’’

सुमित ने कहा, ‘‘बस भी करो. जाओ, माचिस तलाश करो. फिर मोमबत्ती ढूंढ़ो. कैंडललाइट डिनर ही सही.’’ साक्षी उठ कर किचन की तरफ गई. इधरउधर माचिस तलाशती रही, पर माचिस नहीं मिली. वहीं से चिल्लाई, ‘‘अरे भई, न तो माचिस मिल रही है, न ही गैसलाइटर जो गैस जला कर थोड़ी रोशनी कर लूं. अब क्या करूं?’’

‘‘करोगी क्या? यहां आ जाओ, मिल कर निकम्मी सरकार को ही कोस लें. इस का कौन काम सही है?’’ सुमित ने कहा. अपनी बात आगे बढ़ाते हुए वे बोले, ‘‘बिजली का कोई भरोसा नहीं है कि कब आएगी, कब जाएगी. 4 घंटे का घोषित कट है, पर रहता है 8 घंटे. और बीचबीच में आंखमिचौली. कभी अगर ट्रांसफौर्मर खराब हो

जाए, तो समझ लो 2-3 दिनों तक बिजली गायब.’’ तभी आनंद ने कहा, ‘‘अरे भाईसाहब, रुकिए. मेरे पास माचिस है. यह मुझे ध्यान ही नहीं रहा. यह लीजिए.’’

उन्होंने एक तीली जला कर रोशनी की. सुमित तीली और माचिस लिए हुए चिल्लाए, ‘‘जल्दी मोमबत्ती ढूंढ़ कर लाओ.’’ ‘‘मोमबत्ती…यहीं तो साइड में रखी हुई थी,’’ साक्षी ने कहा. दोनों पतिपत्नी मेज के पास पहुंच कर दियासलाई जलाजला कर मोमबत्तियां ढूंढ़ते रहे. पर वह नहीं मिली. कई जगहों पर देखी, लेकिन बेकार. इतने में ही उन्हें एक मोमबत्ती ड्रैसिंग टेबल की दराज में मिल गई. वहीं से वह चिल्लाई, ‘‘मिल गई.’’

जब काफी देर तक मोमबत्ती नहीं जली तो आनंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, मोमबत्ती क्यों नहीं जलाते? क्या अंधेरे में रोमांस चल रहा है?’’ तब तक सुमित ड्राइंगरूम में आ चुके थे, बोले, ‘‘लानत है यार ऐसी जिंदगी पर. जब मोमबत्ती मिली, तो माचिस की तीलियां ही खत्म हो गईं.’’

आनंद कुछ कहते, उस से पहले ही बिजली आ गई. सुमित ने मोमबत्ती एक कोने में फेंक दी और बोले, ‘‘खैर, बत्ती आने से सब काम ठीक हो गया.’’

मौके की नजाकत पर आनंद ने एक जोक और मारा तो सब खिलखिला उठे. प्रसन्नचित्त सब ने भोजन किया. थोड़ी देर में साक्षी फ्रिज में से 4 बाउल्स निकाल कर लाई. सभी लोग खीर खाने लगे. तो मैं ने कहा, ‘‘अरे भाईसाहब, मीठी खीर के साथ एक बात कहूं, आप बुरा तो नहीं मानेंगे?’’

सुमित ने खीर मुंह में भरे हुए ही कहा, ‘‘नहीं. आप तो बस कहिए, क्या चाहती हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी आप सरकार को उस की बदइंतजामी के लिए कोस रहे थे. मैं सरकार की पक्षधर नहीं हूं, फिर भी क्षमाप्रार्थना के साथ कहती हूं कि जब आप के इस छोटे से परिवार में इतनी अव्यवस्था है, आप को पता नहीं कि माचिस कहां रखी है? मोमबत्ती कहां पर है? तो इतने बड़े प्रदेश का भार उठाने वाली सरकार को क्यों कोसते हैं? ‘‘जिले के ट्रांसफौर्मर के शीघ्र न ठीक होने की शिकायत तो आप करते हैं पर घर पर रखे इनवर्टर की आप समय से मरम्मत नहीं करवाते. कभी सोचा है कि ट्रांसफौर्मर के फुंक जाने के कई कारणों में से एक प्रमुख कारण उस पर अधिक लोड होना है. आप के इस रूम में जरूरत से ज्यादा बल्ब लगे हैं. अच्छा हो पहले हम अपने घर की व्यवस्था ठीक कर लें, फिर किसी और को उस की अव्यवस्था के लिए कोसें. मेरी बात बुरी लगे, तो माफ कर दीजिएगा.’’

आनंद ने ताली बजाते हुए कहा, ‘‘दोस्तो, हास्य के बीच, आज का यह सब से गहरा व्यंग्य. चलो, अब मीटिंग बरखास्त होती है.’’

धक्का : मनीषा का दिल क्यों टूट गया

‘‘खैर, खुशी तो हमें तुम्हारी हर सफलता पर होती रही है और यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) द्वारा तुम्हारे चुने जाने पर अब हमें गर्व भी हो रहा है मगर एक बात रहरह कर खटक रही है,’’ उदयशंकर अपनी बात को प्रभावशाली बनाने के लिए बीच में थोड़ा रुक गए, ‘‘तुम्हारे इतने दूर जाने के बाद तुम्हारी मम्मी एकदम अकेली रह जाएंगी.’’

‘‘छोडि़ए भी, उदय भैया, अकेली रह जाऊंगी? आप सब जो हैं यहां,’’ मनीषा जल्दी से बोली. अपने मन की बात उदयशंकर की जबान पर आती देख कर वह विह्वल हो उठी थी.

‘‘हम तो खैर मरते दम तक यहीं रहेंगे. लेकिन हम में और जितेन में बहुत फर्क है.’’

‘‘वह फर्क तो आप की नजरों में होगा, चाचाजी. पापा के गुजरने के बाद मैं ने आप को ही उन की जगह समझा है. आप को अपना बुजुर्ग और मम्मी का संरक्षक समझता हूं,’’ जितेन बोला.

‘‘लीजिए, उदय भैया. अब आप केवल राजन के मित्र ही नहीं, जितेन द्वारा बनाए गए मेरे संरक्षक भी हो गए हैं,’’ मनीषा हंसी.

‘‘उस में मुझे कोई एतराज नहीं है, मनीषा. मुझ से जो भी हो सकेगा तुम्हारे लिए करूंगा. मगर, मनीषा, मैं या मेरे बच्चे हमेशा गैर रहेंगे. सोचता हूं अगर जितेन यूनेस्को की नौकरी का विचार छोड़ दे तो कैसा रहे?’’

‘‘क्या बात कर रहे हैं, चाचाजी? लोग तो ऐसी नौकरी का सपना देखते रहते हैं, इस के लिए नाक रगड़ने को तैयार रहते हैं और मुझे तो फिर इस नौकरी के लिए खास बुलाया गया है और आप कहते हैं कि मैं न जाऊं. कमाल है,’’ जितेन चिढ़ कर बोला.

‘‘लेकिन, तुम्हारी यह नौकरी भी क्या बुरी है? यहां भी तुम्हें खास बुलाया गया था और आगे तरक्की के मौके भी बहुत हैं. भविष्य तो तुम्हारा यहां भी उज्ज्वल है.’’

‘‘चाचाजी, आप ने अपने क्लब का स्विमिंग पूल भी देखा है और समुद्र भी. सो, दोनों का फर्क भी आप समझते ही होंगे,’’ जितेन मुसकराया.

‘‘मैं तो समझता हूं, बरखुरदार, लेकिन लगता है तुम नहीं समझते. क्लब के स्विमिंग पूल का पानी अकसर बदला जाता है, सो साफसुथरा रहता है. मगर समुद्र में तो दुनियाजहान का कचरा बह कर जाता है. फिर उस में तूफान भी हैं, चट्टानें भी और खतरनाक समुद्री जीव भी. यूनेस्को की नौकरी का मतलब है पिछड़े देशों में जा कर अविकसित चीजों का विकास करना, पिछड़ी जातियों का आधुनिकीकरण करना. काफी टेढ़ा काम होगा.’’

‘‘जिंदगी में तरक्की करने के लिए टेढ़े और मुश्किल काम तो करने ही पड़ते हैं, चाचाजी. और फिर जिन्हें समुद्र में तैरने का शौक पड़ जाए वे स्विमिंग पूल में नहीं तैर पाते.’’

‘‘यही सोच कर तो कह रहा हूं, बेटे, कि तुम समुद्र के शौक में मत पड़ो. उस में फंस कर तुम मनीषा से बहुत दूर हो जाओगे. माना कि अब संपर्क साधनों की कमी नहीं, लगता है मानो आमनेसामने बैठ कर बातें कर रहे हैं. फिर भी, दूरी तो दूरी ही है. राजन के गुजरने के बाद मनीषा सिर्फ तुम्हारे लिए ही जी रही है. तुम्हारा क्या खयाल है? सिर्फ आपसी बातचीत के सहारे वह जी सकेगी, टूट नहीं जाएगी?’’

‘‘जानता हूं, चाचाजी. तभी तो मम्मी को आप के सुपुर्द कर के जा रहा हूं. मैं कोशिश करूंगा कि जल्दी ही इन्हें वहां बुला लूं.’’

‘‘और भी ज्यादा परेशान होने को. यहां की इतने साल की प्रभुत्व की नौकरी, पुराने दोस्त और रिश्ते छोड़ कर नए माहौल को अपनाना मनीषा के लिए आसान होगा? अगर कोई अच्छी जगह होती तो भी ठीक था, लेकिन तुम तो अफ्रीकी या अरब इलाकों में ही जाओगे. वहां खुश रहना मनीषा के लिए मुमकिन न होगा.’’

‘‘फिर भी हालात से समझौता तो करना ही पड़ेगा, चाचाजी. महज इस वजह से कि मेरे जाने से मम्मी अकेली रह जाएंगी, इत्तफाक से मिला यह सुनहरा अवसर मैं छोड़ने वाला नहीं हूं.’’

‘‘बहुत अच्छा हुआ, यह बात तू ने मम्मी के जाने के बाद कही,’’ उदयशंकर ने एक गहरी सांस खींच कर कहा.

‘‘क्यों? मम्मी तो स्वयं ही यह नहीं चाहेंगी कि उन की वजह से मेरा कैरियर खराब हो या मैं जिंदगी में आगे न बढ़ सकूं.’’

‘‘बेशक, लेकिन जो बात तुम ने अभी कही थी न, वही तुम्हारे पापा ने उन्हें आज से 25 वर्षों पहले बताई थी.’’

उसे सुन कर उन्हें राजन की याद आ जाना स्वाभाविक ही था. दरवाजे के पीछे खड़ी मनीषा का दिल धक्क से हो गया.

‘‘क्या बताया था पापा ने मम्मी को?’’ जितेन आश्चर्य से पूछ रहा था.

मनीषा ने चाहा कि वह जा कर उदयशंकर को रोक दे. उस ने जो बात उदयशंकर को अपना घनिष्ठ मित्र समझ कर बताई थी उसे जितेन को बताने का उदय को कोई हक नहीं था. वह नहीं चाहती थी कि यह बात सुन कर जितेन उदारता अथवा एहसान के बोझ से दब जाए और मनीषा के प्रति उतना कृतज्ञ न हो पाने की वजह से उस के दिल में अपराधभावना आ जाए, मगर मनीषा के पैर जैसे जमीन से चिपक कर रह गए.

उदयशंकर बता रहे थे, ‘‘तुम्हारी मम्मी कितनी मेधावी थीं, शायद इस का तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा. उन जैसी प्रतिभाशाली लड़की को इतनी जल्दी प्यार और शादी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए था और अगर शादी कर भी ली थी तो कम से कम घर और बच्चों के मोह से तो बचे ही रहना चाहिए था. पर मनीषा ने घर और बच्चों के चक्कर में अपनी प्रतिभा आम घरेलू औरतों की तरह नष्ट कर दी.’’

‘‘खैर, यह तो आप ज्यादती कर रहे हैं, चाचाजी. मम्मी आम घरेलू औरत एकदम नहीं हैं,’’ जितेन ने प्रतिवाद किया, ‘‘मगर पापा ने क्या कहा था, वह बताइए न?’’

‘‘वही बता रहा हूं. तुम्हारी मम्मी ने कभी तुम से जिक्र भी नहीं किया होगा कि उन्हें एक बार हाइडलबर्ग के इंस्टिट्यूट औफ एडवांस्ड साइंसैज ऐंड टैक्नोलौजी में पीएचडी के लिए चुना गया था. तुम्हारी दादी और राजन ने तुम्हारी पूरी देखभाल करने का आश्वासन दिया था.  फिर भी मनीषा जाने को तैयार नहीं हुईं, महज तुम्हारी वजह से.’’

‘‘मैं उस समय कितना बड़ा था?’’

‘‘यही कोई 5-6 महीने के यानी जिस उम्र में मां ही होती है जो दूध पिला दे. और दूध तुम बोतल से पीते थे. सो, तुम्हारी दादी और पापा तुम्हारी देखभाल मजे से कर सकते थे. लेकिन तुम्हारी मम्मी को तसल्ली नहीं हो रही थी. उन के अपने शब्दों में कहूं तो ‘इतने छोटे बच्चे को छोड़ने को मन नहीं मानता. वह मुझे पहचानने लग गया है. मेरे जाने के बाद वह मुझे जरूर ढूंढ़ेगा. बोल तो सकता नहीं कि कुछ पूछ सके या बताए जाने पर समझ सके. उस के दिल पर न जाने इस का क्या असर पड़ेगा? हो सकता है इस से उस के दिल में कोई हीनभावना उत्पन्न हो जाए और मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा किसी हीनभावना के साथ बड़ा हो. मैं, डा. मनीषा, एक जानीमानी औयल टैक्नोलौजिस्ट की जगह एक स्वस्थ, होनहार बच्चे की मां कहलाना ज्यादा पसंद करूंगी.’’’

मनीषा और ज्यादा नहीं सुन सकी. उसे उस शाम की अपनी और राजन की बातचीत याद हो आई.

‘तुम्हारा बच्चा अभी तुम्हें ढूंढ़ने, कुछ सोचने और ग्रंथि बनाने की उम्र में नहीं है. पर जब वह कुछ सोचनेसमझने की उम्र में पहुंचेगा तब वह अपनी ही जिंदगी जीना चाहेगा और तुम्हारी खुशी के लिए अपनी किसी भी खुशी का गला नहीं घोंटेगा. यह समझ लो, मनीषा,’ राजन ने उसे समझाना चाहा था.

‘उस की नौबत ही नहीं आएगी, राजन. मेरी और मेरे बेटे की खुशियां अलगअलग नहीं होंगी. बेटे की खुशी ही मेरी खुशी होगी,’ उस ने बड़े दर्द से कहा था.

‘यानी तुम अपना अस्तित्व अपने बेटे के लिए ऐसे ही लुप्त कर दोगी. याद रखो, मनीषा, चंद सालों के बाद तुम पाओगी कि न तुम्हारे पास बेटा है और न अपना अस्तित्व, और फिर तुम अस्तित्वविहीन हो कर शून्य में भटकती फिरोगी, खुद को और अपने बेटे को कोसती जिस के लिए तुम ने स्वयं को नष्ट कर दिया.’

‘नहीं, मैं बेटे की ख्याति, सुख और समृद्धि के सागर में तैरूंगी. जब मेरा बेटा गर्व से यह कहेगा कि आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी मम्मी की वजह से हूं तो उस समय मेरे गौरव की सीमा की कल्पना भी नहीं की जा सकती.’

‘यह सब तुम्हारी खुशफहमी है, मनीषा. जब तक तुम्हारा बेटा बड़ा होगा उस समय तक अपनी सफलता का श्रेय दूसरों को देने का चलन ही नहीं रहेगा. तुम्हारा बेटा कहेगा कि मैं जो कुछ भी हूं अपनी मेहनत और अपनी बुद्धि के बल पर हूं. यदि मांबाप ने बुद्धि के विकास के लिए कुछ सुविधाएं जुटा दी थीं तो यह उन की जिम्मेदारी थी. उन्होंने अपनी मरजी से हमें पैदा किया है, हमारे कहने से नहीं.’

‘चलिए, आप की यह बात भी मान ली. लेकिन दूर से चुप रह कर भी तो अपने बेटे की सुखसमृद्धि का आनंद उठाया जा सकता है.’

‘हां, अगर दूर और तटस्थ रह कर उस की खुशी में खुश रह सकती हो, तो बात अलग है. लेकिन अगर तुम चाहो कि तुम ने उस के लिए जो त्याग किया है उस के प्रतिदानस्वरूप वह भी तुम्हारे लिए कुछ त्याग कर के दे, तो नामुमकिन है. जहां तक मेरा खयाल है, वह अधिक समय तक तुम्हारे पास भी नहीं रहेगा. आजकल पढ़ाई काफी विस्तृत हो रही है.’

‘चलिए, बेटा रहे न रहे, बेटे के पापा तो मेरे पास ही रहेंगे न?’ मनीषा ने कहा था और सफाई से बात बदल दी थी. ‘वैसे मूर्खताओं में साथ देने के पक्ष में मैं नहीं हूं लेकिन तुम्हारा साथ तो देना ही पड़ेगा,’ राजन हंस कर बोले थे.

लेकिन, कहां दे पाए थे राजन साथ. जितेन अभी कालेज के प्रथम वर्ष में ही था कि एक दिन सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल हो कर वे उस का साथ छोड़ गए थे.

‘‘मम्मी, कहां हो तुम?’’ जितेन के उत्तेजित स्वर से मनीषा चौंक पड़ी. कर दिया न उदयशंकर ने सर्वनाश. जितेन को बता दिया और अब वह कहने आ रहा है कि यूनेस्को की नौकरी से इनकार कर देगा. मनीषा ने मन ही मन फैसला किया कि वह उसे क्या कह कर और क्याक्या कसमें दे कर जाने को मजबूर करेगी.

‘‘हां, बेटे, क्या बात है?’’

‘‘उदय चाचा कह रहे थे कि तुम ने मेरे लिए जीवन में आया एक सुनहरा मौका खो दिया?’’

‘‘हां, मगर वह मैं ने तुम्हारे लिए नहीं, अपनी ममता के लिए किया था. उस का तुम पर कोई एहसान नहीं है.’’

‘‘तुम एहसान की बात कर रही हो, मम्मी, और मैं समझता हूं कि इस से बड़ा मेरा कोई और उपकार नहीं कर सकती थीं,’’ जितेन तड़प कर बोला, ‘‘मैं आप को काफी समझदार औरत समझता था, लेकिन आप भी बस प्यार में ही बच्चे का भला समझने वाली औरत निकलीं. उस समय आप ने शायद यह नहीं सोचा कि आप की ज्यादा लियाकत का असर आप के बेटे के भविष्य पर क्या पड़ेगा?’’

जितेन की बात सुन कर मनीषा चुप रही, तो वह फिर बोला, ‘‘आज अगर आप के पास डौक्टरेट की डिगरी होती तो शायद पापा के गुजरने के बाद आप की पुरानी यूनिवर्सिटी आप को बुला लेती. हम लोग वहीं जा कर रहने लगते और मैं बजाय अफ्रीकीएशियाई देशों में जा कर, एक पश्चिमी औद्योगिक देश में काम करने का मौका पाता. यही नहीं, मेरी पढ़ाई पर इस का काफी असर पड़ता. निश्चित ही आप की आय तब ज्यादा होती. घर में ही एक प्रयोगशाला बनाने की जो मेरी तमन्ना थी, वह अगर हमारे पास ज्यादा पैसा होता तो पूरी हो जाती और उस का असर मेरे रिजल्ट पर भी पड़ता.’’ जितेन के स्वर में भर्त्सना थी.

‘‘हमेशा ही विश्वविद्यालय में फर्स्ट आता है. अरे छोड़ भी. उस से ज्यादा अच्छा रिजल्ट और क्या लाता?’’ मनीषा ने हंस कर बात टालनी चाही.

‘‘वही तो आप समझने की कोशिश नहीं करतीं. 85 प्रतिशत अंकों की जगह 95 प्रतिशत अंक पाना क्या बेहतर नहीं है? खैर, आप जो भी कहिए, आप ने वह फैलोशिप अस्वीकार कर के मेरा जो अहित किया है उस के लिए मैं आप को कभी माफ नहीं कर सकता,’’ कह कर जितेन तेजी से बाहर चला गया.

मनीषा जैसे टूट कर कुरसी पर गिर पड़ी. जितेन की कृतघ्नता या उदासीनता के लिए वह अपने को बरसों से तैयार करती आ रही थी, पर उस के इस आरोप के धक्के को सह सकना जरा मुश्किल था.

सजा के बाद सजा

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शादी से पहले शारीरिक संबंध, सावधानी है जरूरी

आजकल लगभग सभी समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में पाठकों की समस्याओं वाले स्तंभ में युवकयुवतियों के पत्र छपते हैं, जिस में वे विवाहपूर्व शारीरिक संबंध बना लेने के बाद उत्पन्न हुई समस्याओं का समाधान पूछते हैं. विवाहपूर्व प्रेम करना या स्वेच्छा से शारीरिक संबंध बनाना कोई अपराध नहीं है, मगर इस से उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर विचार अवश्य करना चाहिए. इन बातों पर युवकों से ज्यादा युवतियों को ध्यान देने की आवश्यकता है, ताकि भविष्य में उन्हें दिक्कतों का सामना न करना पड़े :

विवाहपूर्व शारीरिक संबंध भले ही कानूनन अपराध न हो, मगर आज भी ऐसे संबंधों को सामाजिक मान्यता नहीं है. विशेष कर यदि किसी लड़की के बारे में समाज को यह पता चल जाए कि उस के विवाहपूर्व शारीरिक संबंध हैं तो समाज उस के माथे पर बदचलन का टीका लगा देता है, साथ ही गलीमहल्ले के आवारा लड़के लड़की का न सिर्फ जीना दूभर कर देते हैं, बल्कि खुद भी उस से अवैध संबंध बनाने की कोशिश करते हैं.

युवती के मांबाप और भाइयों को इन संबंधों का पता चलने पर घोर मानसिक आघात लगता है. वृद्ध मातापिता कई बार इस की वजह से बीमार पड़ जाते हैं और उन्हें दिल का दौरा तक पड़ जाता है. लड़की के भाइयों द्वारा प्रेमी के साथ मारपीट और यहां तक कि प्रेमी की जान लेने के समाचार लगभग रोज ही सुर्खियों में रहते हैं. युवकों को तो अकसर मांबाप समझा कर सुधरने की हिदायत देते हैं, मगर लड़की के प्रति घर वालों का व्यवहार कई बार बड़ा क्रूर हो जाता है. प्रेमी के साथ मारपीट के कारण लड़की के परिवार को पुलिस और कानूनी कार्यवाही तक का सामना करना पड़ता है.

अधिकतर युवतियों की समस्या रहती है कि उन्हें शादीशुदा व्यक्ति से प्यार हो गया है व उन्होंने उस से शारीरिक संबंध भी कायम कर लिए हैं. शादीशुदा व्यक्ति आश्वासन देता है कि वह जल्दी ही अपनी पहली पत्नी से तलाक ले कर युवती से शादी कर लेगा, मगर वर्षों बीत जाने पर भी वह व्यक्ति युवती से या तो शादी नहीं करता या धीरेधीरे किनारा कर लेता है. ऐसे किस्से आजकल आम हो गए हैं.

इस तरह के हादसों के बाद युवतियां डिप्रेशन में आ जाती हैं व नौकरी छोड़ देती हैं. इस से उबरने में उन्हें वर्षों लग जाते हैं. कई बार युवक पहली पत्नी के होते हुए भी दूसरी शादी कर लेते हैं. मगर याद रखें, ऐसी शादी को कानूनी मान्यता नहीं है और बाद में बच्चों के अधिकार के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है जिस का फैसला युवती के पक्ष में आएगा, इस की संभावना बहुत कम रहती है.

शारीरिक संबंध होने पर गर्भधारण एक सामान्य बात है. विवाहित युवती द्वारा गर्भधारण करने पर दोनों परिवारों में खुशियां मनाई जाती हैं वहीं अविवाहित युवती द्वारा गर्भधारण उस की बदनामी के साथसाथ मौत का कारण भी बनता है.

अभी हाल ही में मेरी बेटी की एक परिचित के किराएदार के घर उन के भाई की लड़की गांव से 11वीं कक्षा में पढ़ने के लिए आई. अचानक एक शाम उस ने ट्रेन से कट कर अपनी जान दे दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि लड़की गर्भवती थी. उसे एक अन्य धर्म के लड़के से प्यार हो गया और दोनों ने शारीरिक संबंध कायम कर लिए, मगर जब लड़के को लड़की के गर्भवती होने का पता चला तो वह युवती को छोड़ कर भाग गया. अब युवती ने आत्महत्या का रास्ता चुन लिया. ऐसे मामलों में अधिकतर युवतियां गर्भपात का रास्ता अपनाती हैं, लेकिन कोई भी योग्य चिकित्सक पहली बार गर्भधारण को गर्भपात कराने की सलाह नहीं देगा.

अधिकतर अविवाहित युवतियां गर्भपात चोरीछिपे किसी घटिया अस्पताल या क्लिनिक में नौसिखिया चिकित्सकों से करवाती हैं, जिस में गर्भपात के बाद संक्रमण और कई अन्य समस्याओं की आशंका बनी रहती है. दोबारा गर्भधारण में भी कठिनाई हो सकती है. अनाड़ी चिकित्सक द्वारा गर्भपात करने से जान तक जाने का खतरा रहता है.

युवती का विवाह यदि प्रेमी से हो जाता है तब तो विवाहोपरांत जीवन ठीकठाक चलता है, मगर किसी और से शादी होने पर यदि भविष्य में पति को किसी तरह से पत्नी के विवाहपूर्व संबंधों की जानकारी हो गई तो वैवाहिक जीवन न सिर्फ तबाह हो सकता है, बल्कि तलाक तक की नौबत आ सकती है.

विवाहपूर्व शारीरिक संबंधों में मुख्य खतरा यौन रोगों का रहता है. कई बार एड्स जैसा जानलेवा रोग भी हो जाता है. खास बात यह है कि इस रोग के लक्षण काफी समय तक दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन बाद में यह रोग उन के पति और होने वाले बच्चे को हो जाता है. प्रेमी और उस के दोस्तों द्वारा ब्लैकमेल की घटनाएं भी अकसर होती रहती हैं. उन के द्वारा शारीरिक यौन शोषण व अन्य तरह के शोषण की आशंकाएं हमेशा बनी रहती हैं.

युवती का विवाह यदि अन्यत्र हो जाता है और वैवाहिक जीवन ठीकठाक चलता रहता है, घर में बच्चे भी आ जाते हैं, लेकिन यदि भविष्य में बच्चों को अपनी मां के किसी दूसरे पुरुष से संबंधों के बारे में पता चले तो उन्हें गंभीर मानसिक आघात पहुंचेगा, खासकर तब जब बच्चे टीनएज में हों. मां के प्रति उन के मन में घृणा व उन के बौद्धिक विकास पर भी इस का असर पड़ता है.

इन संबंधों के कारण कई बार पारिवारिक, सामाजिक व धार्मिक विवाद व लड़ाईझगड़े भी हो जाते हैं, जिन में युवकयुवती के अलावा कई और लोगों की जानें जाती हैं. इस के बावजूद यदि युवकयुवती शारीरिक संबंध बना लेने का निर्णय कर ही लेते हैं, तो गर्भनिरोधक विशेषकर कंडोम का प्रयोग अवश्य करें, क्योंकि इस से गर्भधारण व यौन संक्रमण का खतरा काफी हद तक खत्म हो जाता है.

मेरा बॉयफ्रेंड एकांत में जबरदस्ती करता है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 26 वर्षीय युवती हूं. मेरा एक बौयफ्रैंड है, जिसे मैं बेहद पसंद करती हूं. एकांत में वह मेरी ब्रैस्ट को सहलाना चाहता है. मेरे ब्रैस्ट सामान्य से बड़ी है और मैं ने सुना है कि शादी से पहले ब्रैस्ट दबाने अथवा सहलाने से वह बड़ी हो जाती है. मुझे डर है कि यह बेडौल न हो जाए. इसी डर से जब मैं बौयफ्रैंड को मना करती हूं, तो वह नाराज हो जाता है. बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

सैक्स से जुड़े मिथकों में यह भी एक आम मिथक है कि ब्रैस्ट को दबाने, सहलाने व चूमने आदि से वह बड़ी होती है. वास्तव में सैक्स के दौरान फोरप्ले में ब्रैस्ट को छूने, सहलाने से वे कड़े जरूर हो जाते हैं और आमतौर पर ऐसा उत्तेजना की वजह से और ब्रैस्ट की नसों में रक्तसंचार बढ़ने की वजह से होता है.
ब्रैस्ट इंप्लांट के अलावा ऐसा कोई जरीया नहीं है जिस से ब्रैस्ट का साइज बड़ा हो जाए. हां, नियमित ऐक्सरसाइज से बौडी को सही शेप जरूर मिलती है पर ब्रैस्ट बड़ी नहीं होती. वह आकर्षक जरूर दिखने लगती है. अत: बौयफ्रैंड को केवल इस वजह से मना न करें और अपने मन से यह भय निकाल दें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
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नशाखोरी : हुक्का बार बन गए नशे के अड्डे

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश के रहने वाले एक रिटायर्ड पुलिस अफसर को जब पता चला कि 2 महीने से उन के बेटे की ट्यूशन फीस नहीं गई है, तो वे चौंक गए. इस की वजह यह थी कि वे बेटे को समय पर ही फीस दे दिया करते थे. ट्यूटर ने उन्हें यह भी बताया कि उन का बेटा अकसर ट्यूशन पढ़ने नहीं आता है, तो वे समझ गए कि कोई गड़बड़ जरूर है. उन्होंने इस बारे में बेटे से पूछने के बजाय उस की निगरानी शुरू कर दी. दरअसल, वे बेटे की उस हकीकत से रूबरू होना चाहते थे, जो उन से छिपाई जा रही थी. बहुत जल्द ही यह साफ हो गया कि बेटा दोस्तों के साथ घूमता है. बेटे की हरकतों पर उन का शक गहरा गया. एक दिन जब वह घर से निकला, तो उन्होंने उस की तलाश शुरू कर दी. जब वह ट्यूशन सैंटर पर नहीं मिला, तो वे आरडीसी में बने एक साइबर कैफे व हुक्का बार में पहुंच गए.

वहां के नजारे ने उन्हें चौंका दिया. कंप्यूटर तो वहां नाममात्र के ही लगे थे, पर हकीकत में तो बालिग और नाबालिग लड़कों की हुक्का महफिल सज रही थी. उन का बेटा भी वहां मौजूद था. वहां लड़कों को शराब व बीयर भी परोसी जा रही थी. उन्होंने इस की सूचना पुलिस को दी, तो वहां रेड हो गई. इस के साथ ही हुक्का बार की इस हकीकत ने पुलिस के भी होश उड़ा दिए. दरअसल, उस पौश इलाके में काफी दिनों से हुक्का बार की आड़ में छात्रों को नशा परोसने का काम धड़ल्ले से चल रहा था. सुबह के साढ़े 6 बजे से ले कर रात के 10 बजे तक यह बार खुलता था. छात्र कभी स्कूल, तो कभी ट्यूशन के बहाने वहां पहुंच जाते थे. आलम यह था कि छात्रों की वहां भीड़ लगी रहती थी. इस धंधे ने संचालकों को जल्द ही अमीर भी बना दिया था. वे रोजाना 5 हजार से 15 हजार रुपए कमाते थे. उस रिटायर्ड पुलिस अफसर का बेटा भी ट्यूशन की फीस वहां उड़ा रहा था. उस के जैसे दर्जनों छात्र इस लत का शिकार हो रहे थे.

पुलिस ने नशीली चीजों को जब्त करने के साथ ही उस के संचालक अनुराग सिन्हा और वहां पर काम कर रहे दूसरे मुलाजिमों रवि, शिवम व दीपक को गिरफ्तार कर लिया. यह वाकिआ 21 जुलाई, 2016 का है. गाजियाबाद की यह हकीकत चौंकाने वाली जरूर है, लेकिन एकलौती कतई नहीं. नौजवानों के बीच फैशन बन रहे हुक्का बार छोटेबडे़ शहरों में नशे के नए अड्डों के रूप में कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं, जो नकली चमकदमक के बीच जगमग लाइटों की रोशनी में नौजवान जिंदगी के कीमती वक्त को यों ही धुएं में उड़ा रहे हैं. मेरठ सिटी पुलिस ने भी शिकायत की बिना पर आबू लेन बाजार इलाके में एक हुक्का बार का भंडाफोड़ किया. पुलिस ने उस के मालिक तुषार व दूसरे लोगों को हिरासत में ले लिया. उस में छात्रों को हर तरह का नशा मुहैया कराया जा रहा था.

पुलिस को यहां ड्रग्स और शराब के साथ कई तरह के नशे का दूसरा सामान मिला. पुलिस को नशे का मैन्यू कार्ड भी मिला. हुक्का मैन्यू में 30 तरह के फ्लैवरों का जिक्र था, जिन की कीमत सौ रुपए से ले कर 6 सौ रुपए तक होती थी. पिछले दिनों राजस्थान की अजमेर पुलिस ने भी ऐसे हुक्का बार का भंडाफोड़ किया था, जो आलीशान जगह पर बनाया गया था. पुलिस ने इस के संचालकों समेत 16 लड़कों को हिरासत में ले लिया. उत्तराखंड राज्य की राजधानी देहरादून पुलिस ने भी छापामारी में हुक्का बार के नाम पर होने वाले नशे का खेल उजागर किया था. कुछ ही सालों में हुक्का पीना नौजवानों के बीच फैशन बनना शुरू हुआ, तो कुछ ने इसे भुनाना शुरू कर दिया. बात सिर्फ फैशन तक ही नहीं सिमटी रही, उस से भी काफी आगे निकल गई.

हुक्का बार अब नशे के नए अड्डे बन गए हैं, जो किशोर बच्चों को अपनी तरफ खींचने लगे हैं. इस के लिए कोई अलग से लाइसैंस नहीं होता, बल्कि ये हर्बल हुक्का बार, कैफे, रैस्टोरैंट, लौज और होटल की आड़ में चलाए जाते हैं. हुक्का पीना कोई अपराध नहीं है. उसे परोसा जा सकता है. लेकिन उस की आड़ में नशा परोसना अपराध है. यह बात अलग है कि कई जगहों पर हुक्का बार उन के संचालकों के अलावा ड्रग माफिया की कमाई का भी बड़ा जरीया बन गए हैं. नशे के सौदागरों के निशाने पर नई उम्र के छात्र होते हैं. यही  वजह है कि वे उन्हें अपने यहां बैठने की आजादी देते हैं. 25 जुलाई, 2016 को देहरादून शहर की पुलिस ने निरंजनपुर में बने एक ब्लैक हैड हुक्का बार में रेड की, तो चौंक गई. वहां पुलिस को15 लड़के लड़कियां नशा करते मिले थे. इन में 2 नाबालिग थे. नशा बांटने वाले बार संचालकों को जेल भेज दिया गया.

कई बार खुद को बड़ा दिखाने की ललक और धुएं के छल्ले उड़ाने की चाहत हुक्का बार तक ले जाती है. दोस्तों को देख कर भी नौजवान इस तरफ खिंच जाते हैं. हुक्का बार में अलगअलग फ्लैवर के हुक्के का स्वाद चखाया जाता है. ऐसी जगहों पर कई तरह के कश होते हैं, जिन्हें हुक्के के पाइप के जरीए मुंह से खींच कर धुआं निकाला जाता है.

इस के एक दर्जन से ज्यादा फ्लैवर टिकिया के रूप में होते हैं, जिन्हें चिलम के बीच रखा जाता है. जैसा फ्लैवर वैसी कीमत. इन में रोज, औरेंज, मिंट, कीवी, पान, स्ट्रौबेरी, स्वीट-16 वगैरह फ्लैवर होते हैं. इन्हीं में तंबाकू व कैमिकल के जरीए नशा मिलाया जाता है. मसलन, हुक्का फ्लैवर सौ रुपए से ले कर 5-6 सौ रुपए तक होते हैं. इन में अगर चरस या गांजा मिलाया जाता है, तो कीमत बढ़ा दी जाती है. नशे के धंधेबाज नशे के सुरूर के किस्से सुना कर भी नौजवानों पर असर डालते हैं. होंठों की गोलाइयों से छल्ले निकालते नौजवानों के फोटो दीवारों पर टांगते हैं. ऐसी जगहों पर चरस, स्मैक, गांजा, शराब, बीयर सबकुछ परोसा जाता है. इस के लिए कीमत थोड़ा ज्यादा चुकानी पड़ती है. ऐसा भी नहीं है कि पुलिस को अपने इलाके में चलने वाले ऐसे नशे के अड्डों की भनक नहीं होती, बल्कि उस की भी गुपचुप रजामंदी होती है. इस के बदले हुक्का संचालक इलाकाई पुलिस को खुश करने के हथकंडे अपनाते हैं. हुक्का बार में कुछ कश मशहूर होते हैं, जिन में ब्रेन फ्रैशर, सिल्वर फोक व ब्रेन फ्रीजर पान का कश भी है. इस कश को लेने वाले का कुछ पलों के लिए दिमाग सुन्न हो जाता है. मिश्री के दानों के समान बार्बी ट्यूरेट ड्रग महंगी और मशहूर है. इस को सिल्वर पेपर पर रख कर नीचे माचिस जला कर सूंघा जाता है या फिर सीधे किसी चीज के साथ खा लिया जाता है.

डाक्टरों की राय में ऐसे ड्रग कब जानलेवा साबित हो जाएं, इस बारे में कोई नहीं जानता. इस का असर सीधे दिमाग पर होता है, जिस से बेहोशी के साथसाथ मौत भी हो सकती है. धुएं के छल्ले उड़ाने वालों में लड़के ही नहीं, लड़कियां भी शामिल होती हैं. देखादेखी व खुद को नए जमाने का हिस्सा बनाने के लिए वे नशे के अड्डों पर पहुंच जाती हैं. नशा बरबादी का दूसरा नाम है. छात्र नासमझी में धीरेधीरे नशे के आदी हो कर जिंदगी को बरबादी की तरफ ले जाते हैं. हुक्का बार संचालकों की इस में मोटी कमाई होती है. कंप्यूटर व साइबर कैफे की आड़ में भी लोग हुक्का बार चलाते हैं. इन लोगों का मकसद नौजवान पीढ़ी को नशे की लत लगाना होता है. वे इस फार्मूले के कायल होते हैं कि नौजवान जितने ज्यादा नशे के आदी होंगे, उन का उतना ही मुनाफा होगा. कई बार संचालक मोटी फीस वसूल कर बड़ी पार्टियां भी कराते हैं, जिन में कोकीन जैसा खतरनाक नशा भी परोसा जाता है. करोड़ों रुपए की नशे की खेप ऐसी जगहों पर खपा दी जाती हैं. पढ़नेलिखने की उम्र में जिस तरह हुक्का बार की आड़ में छात्रों को नशे की लत लगाई जा रही है, चिंताजनक है. नौजवानों को भी समझना चाहिए कि फैशन या शौक में किया गया कोई भी नशा उन्हें उस का आदी बनाने के साथसाथ उन के भविष्य को भी अंधेरे से भर सकता है.

साइबर युग की एक दिन की जिंदगी

देर रात तक काम कर के सोया प्रदीप सुबह देर तक सोना चाहता था, क्योंकि उसे अगले दिन भी देर रात तक काम करना था. सोने के पहले दिमाग को हलका करने के लिए उस ने 2 लार्ज पैग शराब भी पी ली थी. लेकिन देर तक सोने की उस की यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. क्योंकि सुबह तड़के ही दीवार में लगा अलार्म बजने लगा, जिस से प्रदीप की नींद टूट गई.

आंखें मलते हुए उस ने दीवार की ओर देखा. दीवार में लगी स्क्रीन चमकी और उस में एक चेहरा उभरा. वह चेहरा उस का जानापहचाना था. वह कोई और नहीं, सैवी था. पर वह कोई जीताजागता आदमी नहीं, एक सौफ्टवेयर प्रोग्राम था. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘प्रदीप, उठो तुम्हें आज समय से पहले औफिस पहुंचना है. वहां तुम्हारी सख्त जरूरत है.’’

स्क्रीन से सैवी गायब होता, उस के पहले ही प्रदीप ने कहा, ‘‘एक मिनट सैवी, कहीं तुम मजाक तो नहीं कर रहे. तुम्हें तो पता है मैं ने देर रात तक काम किया है. रात में जो पी थी, अभी उस का नशा भी नहीं उतरा है. ऐसा कौन सा जरूरी काम आ गया कि मुझे समय से पहले औफिस पहुंचना है.’’

सैवी क्या कहता, सिर्फ मुसकरा कर रह गया. जमहाई लेते हुए प्रदीप उठा. वह बाथरूम में घुसा. वाश बेसिन पर लगे शीशे में मुंह देखते हुए उस ने मुंह पर पानी के छींटे मारे. इसी के साथ शीशे, टौयलेट और बेसिन में छिपे तमाम डीएनए और प्रोटीन सेंसर हरकत में आ गए. प्रदीप जो सांस छोड़ रहा था, उस की जांच करने के साथ उस के शरीर की भी जांच शुरू हो गई, जिस से उस के शरीर की किसी भी बीमारी के अणुओं के स्तर का पता चल सके.

बाथरूम से निकल कर प्रदीप ने सिर पर एक कैप रख ली, जिस के माध्यम से अब टेलीपैथी द्वारा घर को नियंत्रित किया जा सकता था. कमरे में उसे थोड़ी गरमी महसूस हुई तो पहला निर्देश कमरा थोड़ा ठंडा करने का दिया गया. प्रदीप को हलकाहलका नशा अब भी था, दूसरे ठीक से वह सो भी नहीं सका था, इसलिए उसे सुस्ती महसूस हो रही थी.

शरीर को उत्तेजित करने वाला संगीत सुनने का मन हुआ. इस के बाद नंबर आया चायनाश्ते का. अगला निर्देश रोबोटिक रसोइए के लिए था कि वह उस के लिए चाय और नाश्ता तैयार कर दे. क्योंकि तब तक रोबोट इस तरह के तैयार हो जाएंगे कि वे घर में नौकर की तरह काम करने लगेंगे.

सारा काम रोबोट करेंगे

उपरोक्त दृश्य आने वाली सदी का है, जब सारे काम इंसान नहीं नई तकनीक करेगी, कंप्यूटर के माध्यम से. यह वह जमाना होगा जब रोबोट केवल इतना ही नही करेंगे, बल्कि साथ घूमनेफिरने भी नहीं जाएंगे, बल्कि साथ में रह कर शौपिंग भी कराएंगे. मालिक की हर बात उन की समझ में आने लगेगी. यह सब वे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के जरिए कराएंगे. चारों तरफ रोबोट ही रोबोट दिखाई देंगे. एयरपोर्ट से ले कर औफिसों तक. ये पुलिस की भी भूमिका संभालेंगे और ड्राइवर की भी. दुकानों के काउंटर पर भी यही बैठे होंगे. ये इंसान की भावनाओं को भी समझेंगे. इस तरह वे एक बेहतरीन काम करने वाले ही नहीं, बेहतरीन साथी भी बन सकेंगे.

आइए, फिर प्रदीप के पास चलते हैं. चायनाश्ते का निर्देश देने के साथ ही प्रदीप ने मैग्नेटिक कार को गैराज से बाहर आ कर खड़ी होने का निर्देश दे दिया था. वह डीजल, पैट्रोल, सीएनजी या इलैक्ट्रिक से चलने वाली कार नहीं थी. चुंबकीय ऊर्जा के दौर में हजारों मील की यात्रा बिना किसी ईंधन के होगी. उस दौर में ट्रेनें, कार, लोग चुंबकीय तरंगों पर तैरेंगे. सुपर कंडक्टर टेक्नोलौजी नई सदी की प्रमुख ऊर्जा तकनीक होगी, जिस में ऊर्जा क्षय नहीं होगी.

आने वाली सदी की छोडि़ए. जर्मनी, जापान और चीन इस तकनीक में आज भी आगे हैं. मैग्लेव ट्रेनें चुंबकीय तरंगों पर तैरते हुए तेज रफ्तार से आगे दौड़ती हैं. उन की ये चुंबकीय तरंगें सुपर कंडक्टर्स के जरिए पैदा की जाती हैं. ये रफ्तार के मामले में विश्व रिकौर्ड तोड़ रही हैं. इनकी अधिकतम रफ्तार 361 मील प्रतिघंटा है. इन से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम होता है.

बहरहाल, कार को बाहर आने का निर्देश दे कर प्रदीप किचन में पहुंचा तो रोबो उस का पसंदीदा चायनाश्ता बना चुका था. प्रदीप ने झट से आंखों पर कौंटेक्ट लेंस चढ़ाया. कौंटेक्ट लेंस पहनते ही वह इंटरनेट से जुड़ गया. इंटरनेट उस की रेटीना पर क्लिक करने लगा. गरमागरमा चायनाश्ते के साथसाथ लेंस पर हेडलाइंस फ्लैश होने लगीं.

मंगल ग्रह पर बन रही कालोनी के प्रोजैक्ट को अगर जल्दी पूरा करना है तो वहां काम करने वालों को बर्फीली ठंड से बचाने के लिए धरती से और संसाधनों की व्यवस्था करनी होगी. पहली स्टारशिप जाने को तैयार है, इस के लिए चंद्रमा की सतह पर लाखों नैनोबोट्स जूपिटर छोड़ने होंगे, ताकि वे स्टारशिप की जरूरी यात्रा के लिए चुंबकीय फील्ड तैयार कर सकें.

कई सालों की मेहनत के बाद अंतरिक्ष में पर्यटकों के लिए एक बड़ा पर्यटनस्थल तैयार कर लिया गया है. अब पर्यटक मौजमस्ती के लिए वहां जा सकते हैं. अभी जो नई बीमारी फैल रही है, वैज्ञानिक उस के वायरस का पता कर रहे हैं, क्योंकि अभी इस का कोई इलाज नहीं है. वैज्ञानिक उस के जींस के कमजोर पहलुओं के बारे में पता लगा रहे हैं.

कौंटेक्ट लेंस पर इन सारी हेडलाइंस को देखने के बाद एक खबर ने प्रदीप का ध्यान आकर्षित किया.

हैडलाइन थी— दिल्ली और उस के आसपास के शहरों को बिजली सप्लाई करने वाले पावर स्टेशन में प्रौब्लम की वजह से बिजली की सप्लाई बाधित हो रही है. अगर जल्दी इस की मरम्मत नहीं की गई तो दिल्ली और उस के आसपास का इलाका अंधेरे में डूब जाएगा.

दरअसल, जिस युग की हम बात कर रहे हैं, तब तक धरती पर मौजूद वे सारे संसाधन खत्म हो चुके होंगे, जिन से अभी ऊर्जा का उत्पादन हो रहा है, इसलिए तब लोग सौर ऊर्जा और अंतरिक्ष से मिलने वाली ऊर्जा पर निर्भर होंगे. अंतरिक्ष में घूमते कृत्रिम उपग्रह बिजलीघर का भी काम करेंगे. बड़ी संख्या में सेटेलाइट सूर्य के विकिरण को सोख कर बिजली उत्पन्न करेंगे. हर सेटेलाइट 5 से 10 गीगावाट बिजली पैदा करने में सक्षम होगा. यह बिजली धरती पर उत्पन्न होने वाली बिजली से सस्ती होगी.

जापान अभी से स्पेस में पावर स्टेशन की संभावना देखने लगा है. मित्सुबिशी इलैक्ट्रिक और कुछ दूसरी कंपनियां इस दिशा में काम भी कर रही हैं. अंतरिक्ष में तैनात होने वाला जापान का बिजलीघर डेढ़ मील में फैला होगा. यह बिलियन वाट बिजली पैदा करेगा.

पावर स्टेशन में होने वाली गड़बड़ी की हेडलाइंस नजर आते ही प्रदीप समझ गया कि औफिस में इतनी सुबहसुबह क्यों बुलाया गया है. वह नाश्ता कर के घर से बाहर आया तो गैराज से बाहर आ कर तैरती हुई कार उस का इंतजार कर रही थी. जल्दी औफिस पहुंचने का निर्देश मिलते ही मैग्नेटिक कार, इंटरनेट, जीपीएस और सड़क में छिपे लाखों चिप्स से जुड़ गई, ताकि मौनिटर पर ट्रैफिक के बारे में जानकारी मिलती रहे.

कार चुंबकीय पट्टी वाली सड़क पर तैरने लगी. इन चुंबकीय तरंगों को सुपर कंडक्टिंग से तैयार किया गया था. कार अभी चली ही थी कि स्क्रीन पर एक बार फिर सैवी का चेहरा उभरा. उस ने कहा, ‘‘प्रदीप, आप के लिए नया संदेश यह है कि आप कौन्फ्रैंस रूम में पहुंच कर सब से मिलें. इस के अलावा आप की बहन का भी एक वीडियो मैसेज है.’’

कार खुद ही आगे बढ़ती जा रही थी. अभी औफिस पहुंचने में समय था, इसलिए प्रदीप ने सोचा कि तब तक बहन का वीडियो मैसेज ही देख ले. उस ने कलाई में बंधी घड़ी का बटन दबाया. घड़ी के बटन पर बहन की तसवीर उभरी. बहन ने कहा, ‘‘प्रदीप, तुम्हें तो पता ही है, शनिवार को सात्विक का बर्थडे है. इस बार तुम उस के लिए नए मौडल का रोबोटिक डौगी ले आना.’’

इलेक्ट्रिसिटी का जमाना खत्म हो चुका था. चुंबकीय ऊर्जा का युग था. प्रदीप की कार के आसपास से अलगअलग बैंडविड्थ में ट्रेनें, ट्रक और कारें ऊपरनीचे और अगलबगल से गुजर रही थीं. ये ऐसी ऊर्जा थी, जिस में कार के लिए कभी ऊर्जा की जरूरत नहीं पड़ने वाली थी, जिस से धन की भी बचत हो रही थी.

प्रदीप औफिस पहुंच गया. वह एक पावर जेनरेटिंग और सप्लाई करने वाली एक बड़ी कंपनी का औफिस था. बहुत बड़ी और काफी ऊंची बिल्डिंग थी. गेट पर पहुंचते ही लेजर ने चुपचाप आंखों की पुतलियों और चेहरे से पहचान कर गेट खोल दिया.

कौन्फ्रैंस रूम आधे से ज्यादा खाली पड़ा था. कुछ सहयोगी आ कर अपनीअपनी सीट पर बैठ चुके थे. प्रदीप के कौंटेक्ट लेंस में उन लोगों की थ्री डी इमेज उभरी, जो कौन्फ्रैंस रूम में टेबल के इर्दगिर्द बैठे थे. ये लोग भले ही औफिस नहीं आ पाए थे, लेकिन होलोग्राफिक तौर पर औफिस में साथ मौजूद थे. कौंटेक्ट लेंस इन लोगों को पहचान रहा था, साथ ही उन की प्रोफाइल और बैकग्राउंड भी दिखा रहा था.

अचानक डायरेक्टर की कुरसी की जगह पर उन की तसवीर उभरी. उन्होंने कहा, ‘‘जेंटलमेन, जैसा कि आप लोगों को पता ही है कि अंतरिक्ष में स्थित अपने पावर हाउस में कुछ गड़बड़ी हो गई है. यह गंभीर मामला है. अच्छी बात यह है कि समय से इस की जानकारी मिल गई, जिस से खतरा टल गया.

दुर्भाग्य से जिस रोबो को मरम्मत की जिम्मेदारी सौंपी गई थी, वह नाकाम रहा. रोबोट ने हमें जो थ्री डी इमेज भेजी है, उस में गड़बड़ी साफ दिख रही है. इस से हमें गड़बड़ी का पता चल गया है. इस काम के लिए वह रोबो पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उस में इस गड़बड़ी को ठीक करने का प्रोग्राम नहीं है, इसलिए हमें वहां अनुभवी रोबोट्स भेजने होंगे.’’

काफी चर्चा के बाद मानव नियंत्रण वाले रिपेयर क्रू को वहां भेजने का निर्णय लिया गया. डायरेक्टर ने कहा, ‘‘प्रदीप, तुम जल्दी से जल्दी ऐसे रोबोट्स तैयार करो, जिन में ऐसे प्रोग्राम हों जो टेलीपैथिक संकेतों पर काम कर के पावर स्टेशन में हुई गड़बड़ी को ठीक कर सकें.’’

इस तरह के रोबोट प्रदीप ने पहले ही तैयार कर रखे थे, इसलिए उस ने तत्काल उन रोबोट्स  को काम पर लगा दिया. ये ऐसे रोबोट्स थे, जिन्हें रोबोटिक मानव कहा जा सकता था. उन के सिर में इलेक्ट्रोड, शरीर में अलगअलग तरह की नैनो मशीनें और चिप लगी थीं, जिस से उन की क्षमता में असीमित वृद्धि हो गई थी.

मीटिंग में कुछ परेशानी वाली बातें भी हुईं. प्रदीप को जो रिपोर्ट मिली थी, उस के अनुसार पावर स्टेशन में जो गड़बड़ी हुई थी, वह किसी दुश्मन देश द्वारा रोबोट में वायरस भेज कर खराबी की गई थी. इसलिए काम करने वाले रोबोट ने ही गड़बड़ी कर दी थी. प्रदीप के इस खुलासे से कौन्फ्रैंस रूम में सन्नाटा पसर गया.

लोगों को विश्वास नहीं हो रहा था कि वायरस की वजह से अपने ही रोबोट ने ऐसा किया है. क्योंकि ऐसा पहले कभी हुआ नहीं था. फिर रोबोट एंटी वायरस से सुसज्जित था. बहरहाल, इस बात को गोपनीय रखने की हिदायत के साथ मीटिंग खत्म हुई.

थके होने के बावजूद उस दिन प्रदीप को काफी व्यस्त रहना पड़ा. पावर स्टेशन की मरम्मत के लिए रोबोट क्रू को नए सिरे से तैयार करना पड़ा. क्वांटम कंप्यूटर के जरिए बनाए सभी प्रायोगिक रोबोट्स निष्क्रिय कर दिए गए. इस के साथ ही रोबोट्स की गड़बड़ी भी ठीक कर दी गई थी. सारा काम हो गया तो प्रदीप घर लौटने की तैयारी करने लगा.

वह कार में बैठा और घर आ गया. 2 दिन से लगातार काम की वजह से प्रदीप बेहद थक गया था. घर पहुंच कर वह सोफे में धंस गया, तभी सैवी एक बार फिर दीवार की स्क्रीन पर उभरा. प्रदीप ने उस की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘प्रदीप, डाक्टर सेन ने एक खास संदेश भेजा है.’’

डा. सेन यानी रोबो डाक्टर. सैवी के संदेश देने के बाद डा. सेन स्क्रीन पर आए. वह इतने वास्तविक लग रहे थे कि लगता ही नहीं था कि वह केवल सौफ्टवेयर प्रोग्राम है. डा. सेन ने कहा, ‘‘प्रदीप, तुम्हें परेशान करने के लिए मुझे खेद है. लेकिन कुछ ऐसा है जो तुम्हें बताना जरूरी था. पिछले साल तुम्हारी जो दुर्घटना हुई थी, वह तो तुम्हें याद ही होगी. उस दुर्घटना में तुम लगभग मर ही चुके थे. तुम्हें शायद याद नहीं कि शिमला में तुम पहाडि़यों से हजारों फुट नीचे गिर गए थे. तुम्हें बाहरी ही नहीं, काफी अंदरूनी चोटें भी आई थीं. तब तुम्हारे कपड़ों ने तुम्हें बचा लिया था.

‘‘तुम्हारे कपड़ों ने ही एंबुलैंस को फोन किया. उसी के आधार पर तुम्हारी मैडिकल हिस्ट्री अपलोड की गई थी. तब एक रोबोट अस्पताल में माइक्रो सर्जरी द्वारा तुम्हारे शरीर के बहते खून को रोका गया था. तुम्हारे पेट, लीवर और आंतें इस तरह क्षतिग्रस्त हो गई थीं कि उन्हें रिपेयर करना मुश्किल था. सौभाग्य से आर्गेनिक तौर पर तुम्हारे इन  अंगों को फिर से तैयार किया गया था. ये सारे अंग एक टिश्यू फैक्ट्री में तैयार किए गए थे. मेरे रिकौर्ड के अनुसार, तुम्हारे एक हाथ को भी बदला गया था.

‘‘आज मैं तुम्हारे इन नए अंगों को एक बार फिर चैक करना चाहता हूं. अपने एमआरआई स्कैनर को हाथ से पकड़ो और इसे पेट की ओर ले जाओ. तुम बाथरूम में जा कर सेलफोन के आकार के इस स्कैनर को अंगों के आसपास घुमाओगे तो इन अंगों की थ्री डी इमेज स्क्रीन पर दिखने लगेगी. इन अंगों की थ्री डी इमेज देख कर हम पता लगाएंगे कि तुम्हारे शरीर में कितना सुधार हुआ है. आज सुबह तुम बाथरूम गए थे तो तुम्हारे पैनक्रियाज में बढ़ते कैंसर का पता चला है.’’

कैंसर का नाम सुन कर प्रदीप तनाव से भर उठा. लेकिन यह सोच कर राहत महसूस की कि कैंसर तो अब मामूली बीमारी रह गई है.

इस वक्त हम जिस युग में हैं, उस युग में ऐसे रोबोट्स विकसित हो जाएंगे, जो जांच से ले कर सारे औपरेशन तक करेंगे. डाक्टरों को कोई बड़ा औपरेशन करना होता है तो एक ही औपरेशन में थक जाते हैं. रोबोट्स इस समस्या का निदान करेंगे. हार्ट सर्जरी के लिए बाईपास औपरेशन में सीने के बीच एक फुट लंबी जगह खोलनी पड़ती है, जिस के लिए जनरल एनेस्थीसिया की जरूरत होती है, साथ ही संक्रमण का भी डर रहता है.

औपरेशन के बाद होश में आने से ले कर स्वास्थ्य में सुधार होने तक असहनीय दर्द और तमाम मुश्किलों का सामना करना होता है. द विंची रोबोटिक सिस्टम से ये पूरी प्रक्रिया काफी छोटी और बेहतर हो जाएगी.

सन 2100 तक हर तरह के औपरेशन रोबोट संभाल लेंगे. वे हर औपरेशन के लिए प्रोग्राम किए जाएंगे. भविष्य में उन्नत कंप्यूटर आएंगे, जिस से माइक्रो औपरेशन होंगे. माइक्रो का मतलब यह है कि वे दिमाग में घुस कर नर्व सिस्टम को भी ठीक कर सकेंगे और औपरेशन भी ऐसा, जिस में चीरफाड़ की गुंजाइश एकदम खत्म हो जाएगी. यकीनन तब तक सर्जिकल औपरेशन की तसवीर पूरी तरह बदल जाएगी.

छोटे से छेद से रोबोट शरीर के अंदर प्रवेश करेगा और काम को अंजाम दे देगा. दर्द भी कम और स्वस्थ भी जल्दी. अभी नर्व फाइबर और बारीक कोशिकाओं का औपरेशन नहीं हो सकता, लेकिन तब संभव होगा. शरीर में कैमरे के तौर पर अंदर डाले जाने वाले इंडोस्कोप शायद पतले धागे से भी ज्यादा पतले होंगे. यानी औपरेशन का काम माइक्रो मशीन कहे जाने वाले रोबोट्स के हाथों में होगा.

रात में प्रदीप को अचानक भांजे का बर्थडे याद आ गया. बर्थडे पार्टी में वह होलोग्राफी इमेज के रूप में मौजूद रहेगा, लेकिन अभी वह एकदम खाली था. समय कैसे कटे, इस के लिए उस ने सैवी को याद किया. सैवी तुरंत स्क्रीन पर हाजिर हुआ. प्रदीप ने कहा, ‘‘सैवी, इस सप्ताह मैं खाली हूं. क्या तुम मेरे लिए किसी साथी की व्यवस्था कर सकते हो?’’

‘‘हां, क्यों नहीं, आप की प्राथमिकताएं मेरी मेमरी में प्रोग्राम्ड हैं. मैं अभी स्क्रीन पर इंटरनेट के जरिए कुछ ऐसी ही प्रोफाइल दिखाता हूं.’’

अगले ही पल स्क्रीन पर कुछ लड़कियों की तसवीरें उभरने लगीं, जो खुद किसी साथी का साथ चाहती थीं. उन में से शिल्पी नाम की लड़की की प्रोफाइल और फोटो प्रदीप को पसंद आई. शिल्पी प्रदीप को पसंद आ गई थी. सैवी ने प्रदीप की प्रोफाइल और वीडियो भेज कर शिल्पी से पूछा कि क्या वह उस के बौस के लिए उपलब्ध है?

शाम को प्रदीप का दोस्त आ गया तो उस ने उस के साथ डिनर और क्रिकेट के मैच का मजा लिया. मैच लिविंग रूम में होलोग्राफिक इमेज के तौर पर उपलब्ध था. लगता था कि मैदान से 50 मीटर दूर स्टेडियम में बैठ कर मैच देख रहे हैं. रात में दोस्त चला गया तो सैवी की तसवीर उभरी, उस ने बताया कि शिल्पी ने उस का आमंत्रण स्वीकार कर लिया है.

सप्ताह का अंत

सप्ताह के अंत में यानी शनिवार को प्रदीप के भांजे का बर्थडे था, जिस में उसे भांजे को एक रोबोटिक डौगी गिफ्ट देना था. प्रदीप घर की स्क्रीन पर ही माल के वर्चुअल टूर पर निकला. वह कई टौय स्टोर में गया. आखिर उसे एक रोबो पसंद आ गया. उस ने टेलीपैथी के जरिए और्डर दिया. यह खरीदारी नेट के जरिए की जा रही थी, लेकिन उसे लगा कि इस से अच्छा होगा वह दुकान पर जा कर देखे और खरीदे.

दुकान पर हर तरह के रोबोट थे. हकीकत यही होगी कि उस समय रोबोट ही सब से बड़ा बिजनैस होंगे. प्रदीप स्टोर पर पहुंचा तो रोबोट क्लर्क ने उस की आगवानी की, ‘‘सर, मैं आप की क्या मदद करूं?’’

प्रदीप को लेटेस्ट रोबोट डौग का मौडल पसंद आया. इतनी ही देर में उस ने कौंटेक्ट लेंस पर लगे नेट से उस के प्राइस की तुलना दूसरे स्टोर के दामों से कर ली. उसे लगा कि मौल में पसंद किया गया रोबोट सही दामों में मिल रहा है, इसलिए डील पक्की हो गई. क्रैडिट कार्ड से कीमत अदा कर के डिलीवरी के लिए वह बहन के घर का पता दे आया.

शिल्पी से मुलाकात

अब प्रदीप खाली था. शाम को उसे शिल्पी से मिलना था. रोमांच भी था और अनजानी खुशी भी. शिल्पी के साथ किस रेस्टोरेंट में जाना है, कहां बैठना है, क्या खाना है, सब कुछ नेट की मदद से तय हो चुका था. अचानक उसे लगा कि शिल्पी को आना है तो घर में कुछ बदलाव होना चाहिए.

चूंकि घर की हर चीज प्रोग्राम्ड थी, इसलिए बदलाव के लिए सैवी से बात कर के पता लगाना था. सैवी ने तत्काल ढेर सारे डिजाइन पेश कर दिए, जिस के अनुसार घर को नया लुक दिया जा सकता था. इस के बाद सैवी ने बताया कि कौन सी कंपनी इस काम के लिए कितना समय और पैसा लेगी. एक इंजीनियरिंग कंपनी ने दावा कि महज 2 घंटे में घर को नया लुक दे देगी. कंपनी के रोबोट सारे घर को इच्छानुसार बदल देंगे.

इस नए लुक की खासियत यह थी कि इस में आप जिस दिन जिस रंग में चाहेंगे, पूरे घर के अंदर का इंटीरियर उसी रंग में दिखेगा. लुक में हलकेफुलके बदलाव भी संभव होंगे. खैर, रोबोट्स ने आ कर घंटर भर में वह सब कर दिया, जो प्रदीप चाहता था.

शिल्पी पेशे से आर्टिस्ट थी. उस की वेब डिजाइनिंग की कंपनी थी. उस के यहां थ्री डी वेब डिजाइनिंग का काम होता था. शिल्पी ने हवा में अंगुलियां चला कर एक छोटे से यंत्र को औन किया, जिस से एनिमेशन हवा की पतली सतह पर तैरने लगे.

देखने में शिल्पी 26 साल की और प्रदीप 28 साल का लग रहा था, जबकि हकीकत में दोनों की असली उम्र 58 और 62 साल थी. दवाओं और जींस ने उन की उम्र को थाम सा लिया था. दरअसल उस युग में ऐसे जींस की खोज हो चुकी होगी, जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को एकदम धीमी कर देंगे.

इस के बाद शिल्पी और प्रदीप ने साथ रहने का फैसला कर के शादी कर ली, जबकि उस युग में जल्दी शादी करने का फैसला कोई नहीं करेगा. शिल्पी गर्भवती हुई तो दोनों ने तय किया कि उन का बच्चा किन खासियत और खूबियों वाला होना चाहिए.

दरअसल, इस के लिए सरकार ने कुछ नियम बना रखे थे. बच्चों की पैदाइश के लिए सरकार ने स्वीकृत जींस की एक सूची बना रखी थी. उसी के तहत पैदा होने वाले बच्चों की जींस में फेरबदल कराया जा सकता था. बच्चों के पैदा होने की दर कम होती जा रही थी, क्योंकि हर कोई एकाकी जीवन जीना चाहता था.

सिसकता शैशव : अमान का अबोध बचपन- भाग 3

वह वहां से भागने ही जा रहा था कि प्रिंसिपल साहब ने प्यार से उस की पीठ सहलाई और कहा, ‘‘बेटा, डरो नहीं, ये लोग तुम्हें तुम्हारे मातापिता के  पास ले जाएंगे. तुम्हें कुछ भी नुकसान नहीं पहुंचाएंगे. इन के पास कोर्ट का और्डर है. हम अब कुछ भी नहीं कर सकते, तुम्हें जाना ही पड़ेगा.’’

अमान ने रोतेरोते कहा, ‘‘मेरे पिताजी को बुलाइए, मैं इन के साथ नहीं जाऊंगा.’’

तब उस पुलिस वाली महिला ने उसे प्यार से गोदी में बैठा कर कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है, तभी तो उन्होंने हमें लेने भेजा है. तुम बिलकुल भी डरो मत, हम तुम्हें कुछ नहीं कहेंगे. पर यदि नहीं जाओगे तो हम तुम्हें जबरदस्ती ले जाएंगे.’’

उस ने बचाव के लिए चारों तरफ देखा, पर कहीं से सहारा न पा, चुपचाप उन के साथ जाने को तैयार हो गया. होस्टल की आंटी उस का सामान ले आई थी.

कलकत्ता पहुंच कर पुलिस वाली आंटी अमान के बारबार कहने पर भी उसे पिता और दादी के पास नहीं ले गई. उस का मन भयभीत था कि क्या मामला है? रात को उन्होंने अपने घर पर ही उसे प्यार से रखा.

दूसरे दिन पुलिस की जीप में बैठा कर एक बड़ी सी इमारत, जिस को लोग कोर्ट कह रहे थे, वहां ले गई. वहां उस के मातापिता दोनों दूरदूर बैठे थे और काले चोगे पहने बहुत से आदमी चारों तरफ घूम रहे थे.

अमान सहमासहमा बैठा रहा. वह कुछ भी समझ नहीं पा रहा था कि यह सब क्या हो रहा है? फिर ऊंची कुरसी पर सफेद बालों वाले बड़ी उम्र के अंकल, जिन को लोग जज कह रहे थे, ने रोबदार आवाज में हुक्म दिया, ‘‘इस बच्चे यानी अमान को इस की मां को सौंप दिया जाए.’’

पुलिस वाली आंटी, जो उसे दार्जिलिंग से साथ लाई थी, उस का हाथ पकड़ कर ले गई और उसे मां को दे दिया. मां ने तुरंत उसे गोद में उठाया और प्यार करने लगीं.

पहले तो उन का प्यारभरा स्पर्श अमान को बहुत ही भाया. परंतु तुरंत ही उसे पिता की राक्षसी वाली बात याद आ गई. तब उसे सचमुच ही लगने लगा कि मां जरूर ही एक राक्षसी है, अभी तो चख रही है, फिर अकेले में उसे खा जाएगी. वह घबरा कर चीखचीख कर रोने लगा, ‘‘मैं इस के साथ नहीं रहूंगा, यह मुझे मार डालेगी. मुझे पिताजी और दादी के साथ अपने घर जाना है. छोड़ दो मुझे, छोड़ो.’’ यह कहतेकहते डर से वह बेहोश हो गया.

जब उस के पिता उसे लेने को आगे बढ़े तो उन्हें पुलिस ने रोक दिया, ‘‘कोर्ट के फैसले के विरुद्ध आप बच्चे को नहीं ले जा सकते, इसे हाथ भी न लगाएं.’’

तब पिता ने गरज कर कहा, ‘‘यह अन्याय है, बच्चे पर अत्याचार है, आप लोग देख रहे हैं कि बच्चा अपनी मां के पास नहीं जाना चाहता. रोरो कर बेचारा अचेत हो गया है. आप लोग ऐसे नहीं मानेंगे तो मैं उच्च न्यायालय में याचिका दायर करूंगा. बच्चा मुझे ही मिलना चाहिए.’’

जज साहब ने नया फैसला सुनाया, ‘‘जब तक उच्च न्यायालय का फैसला नहीं होता है, तब तक बच्चा पुलिस की संरक्षण में ही रहेगा.’’

4 वर्ष का बेचारा अमान अकेला घर वालों से दूर अलग एक नए वातावरण में चारों तरफ पुलिस वालों के बीच भयभीत सहमासहमा रह रहा था. उसे वहां किसी प्रकार की तकलीफ नहीं थी. खाने को मिलता, पर कुछ खाया ही न जाता. टीवी, जिसे देखने को पहले वह सदा तरसता रहता था, वहां देखने को मिलता, पर कुछ भी देखने का जी ही न चाहता. उसे दुनिया में सब से घृणा हो गई. वह जीना नहीं चाहता था. उस ने कई बार वहां से भागने का प्रयत्न भी किया, पर बारबार पकड़ लिया गया. उस का चेहरा मुरझाता जा रहा था, हालत दयनीय हो गई थी. पर अब कुछकुछ बातें उस की समझ में आने लगी थीं.

करीब महीनेभर बाद अमान को नहलाधुला कर अच्छे कपड़े पहना कर जीप में बैठा कर एक नए बड़े न्यायालय में ले जाया गया. वहां उस के मातापिता पहले की तरह ही दूरदूर बैठे हुए थे. चारों तरफ पुलिस वाले और काले कोट वाले वकील घूम रहे थे. पहले के समान ही ऊंची कुरसी पर जज साहब बैठे हुए थे.

पहले पिता के वकील ने खड़े हो कर लंबा किस्सा सुनाया. अमान के मातापिता, जो अलगअलग कठघरे में खड़े थे, से भी बहुत सारे सवाल पूछे. फिर दूसरे वकील ने भी, जो मां की तरफ से बहस कर रहा था, उस का नाम ‘अमान, अमान’ लेले कर उसे मां को देने की बात कही. अमान को समझ ही नहीं आ रहा था कि मातापिता के झगड़े में उस का क्या दोष है.

आखिर में जज साहब ने अमान को कठघरे में बुलाया. वह भयभीत था कि न जाने अब उस के साथ क्या होने वाला है. उसे भी मातापिता की तरह गीता छू कर कसम खानी पड़ी कि वह सच बोलेगा, सच के सिवा कुछ भी नहीं बोलेगा.

जज साहब ने उस से प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, सोचसमझ कर सचसच बताना कि तुम किस के पास रहना चाहते हो… अपने पिता के या मां?’’

सब की नजरें उस के मुख पर ही लगी थीं. पर वह चुपचाप सोच रहा था. उस ने किसी की तरफ नहीं देखा, सिर झुकाए खड़ा रहा. तब यही प्रश्न 2-3 बार उस से पूछा गया तो उस ने रोष से चिल्ला कर उत्तर दिया, ‘‘मुझे किसी के भी साथ नहीं रहना, कोई मेरा अपना नहीं है, मुझे अकेला छोड़ दो, मुझे सब से नफरत है.’’

टॉप 10 प्यार की कहानी Pyar ki kahani in Hindi

Top 10 Pyar ki kahani in Hindi आज हम कुछ ऐसी ही कहानियों की बात करें जिसमें केवल प्यार की कहानियोॆ की दास्तान होगी. जो कहानी प्यार के एंगल से शुरु हुई हो और प्यार के एंगल पर ही खत्म हो. प्यार की कहानियों में सिर्फ दो प्रेमियों के प्यार की कहानियां दी जाएंगी. जिसमें प्रेमियों के बीच प्यार कैसे होता है ये जानने को आपको मिलेगा. Pyar ki kahani in Hindi

1. आखिर कितना घूरोगे : बौस को हड़काने वाली दब्बू लड़की

काली, कजरारी, बड़ीबड़ी मृगनयनी आंखें भला किस को खूबसूरत नहीं लगतीं? मगर उन से भी ज्यादा खूबसूरत होते हैं उन आंखों में बसे सपने कुछ बनने के, कुछ करने के. सपने लड़कालड़की देख कर नहीं आते. छोटाबड़ा शहर देख कर नहीं आते.

फिर भी अकसर छोटे शहर की लड़कियां उन सपनों को किसी बड़े संदूक में छिपा लेती हैं. उस संदूक का नाम होता है- कल. कारण वही पुराना. अभी हमारे देश के छोटे शहरों और कसबों में सोच बदली कहां है? घर की इज्जत है लड़की, जल्दी शादी कर उसे घर भेजना है, वहां की अमानत बना कर मायके में पाली जा रही है. इसीलिए लड़कियों के सपने उस कभी न खुलने वाले संदूक में उन के साथसाथ ससुराल और अर्थी तक की यात्रा करते हैं पर कुछ लड़कियां बचपन में ही खोल देती हैं उस संदूक को, उन के सपने छिटक जाते हैं.

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2. दलदल : सूर्या की ब्लाइंड डेटlove story in hindi

सूर्या ने परफ्यूम की बोतल को ही तकरीबन खाली कर दिया. अगर वह किसी लड़की से मिलने जा रहा हो, तब तो कहने ही क्या. उसे ब्लाइंड डेट का रिवाज बेहद भाता है. आजकल कितनी ही औनलाइन साइटें हैं, जो इस तरह की डेट सैट करने में काफी मदद कर देती हैं.

सूर्या आज पहली बार ब्लाइंड डेट पर नहीं जा रहा है. हां, लेकिन आज की डेट का नाम उसे बहुत लुभा रहा है… चेरी. होटल के बेसमैंट में रैस्टोरैंट था. एक कोने की टेबल पहले ही रिजर्व थी. एक लड़की वहां पहले से ही बैठी थी.

‘‘माफ कीजिए चेरी, मुझे देर हो गई क्या? या फिर आप को मुझ से भी ज्यादा जल्दी थी?’’ तिरछी मुसकान लिए सूर्या फ्लर्ट करने में माहिर था.

‘‘नहीं, मैं ही कुछ जल्दी आ गई. वह नया फ्लाईओवर खुल गया है न, सो आने में समय ही नहीं लगा,’’ चेरी भी बातचीत करने लगी.

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3. पहेली : कौन था नव्या का कातिल?

Romantic love story 

पेड़ों के नीचे एक लड़की का निर्वस्त्र शव बरामद हुआ था, जो खरोंचों से भरा था. आशंका थी कि बलात्कार के बाद उस की हत्या की होगी. मृतका के पास मिले कागजातों से पता चला कि वह शव असिस्टैंट बैंक मैनेजर नव्या का था. उस की कार भी वहां से कुछ दूर खड़ी मिली. पुलिस वाले मुस्तैदी से अपने काम में जुटे थे. तभी जीप रुकी और एसआई राघव उतरे.

‘‘लाश को सब से पहले किस ने देखा था?’’ राघव ने कांस्टेबल से पूछा.

‘‘इस आदिवासी लड़की ने सर.’’ कांस्टेबल एक दुबलीपतली लड़की की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘ये खाना बनाने के लिए यहां से सूखी लकड़ियां ले जाती है.’’

‘‘हुम्म…’’ राघव ने उस लड़की पर नजर डालते हुए अगला सवाल किया, ‘‘और मृतका के घर वाले…’’

‘‘ये हैं सर,’’ कांस्टेबल की उंगली घटनास्थल से थोड़ा हट के खड़े कुछ लोगों की ओर घूम गई.

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4. यादों के सहारे : प्रकाश का प्यार love story

वह बीते हुए पलों की यादों को भूल जाना चाहता था. और दिनों के बजाय वह आज  ज्यादा गुमसुम था. वह सविता सिनेमा के सामने वाले मैदान में अकेला बैठा था. उस के दोस्त उसे अकेला छोड़ कर जा चुके थे. उस ने घंटों से कुछ खाया तक नहीं था, ताकि भूख से उस लड़की की यादों को भूल जाए. पर यादें जाती ही नहीं दिल से, क्या करे. कैसे भुलाए, उस की समझ में नहीं आया.

उस ने उठने की कोशिश की, तो कमजोरी से पैर लड़खड़ा रहे थे. अगलबगल वाले लोग आपस में बतिया रहे थे, ‘भले घर का लगता है. जरूर किसी से प्यार का चक्कर होगा. लड़की ने इसे धोखा दिया होगा या लड़की के मांबाप ने उस की शादी कहीं और कर दी होगी…

‘प्यार में अकसर ऐसा हो जाता है, बेचारा…’ फिर एक चुप्पी छा गई थी. लोग फिर आपसी बातों में मशगूल हो गए. वह वहां से उठ कर कहीं दूर जा चुका था.

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5. विसाल ए यार : इश्क की अंगड़ाईRomantic love story

दिल्ली के साउथ कैंपस के लोधी रोड पर बने दयाल सिंह कालेज में रोहित बीकौम का स्टूडैंट था और उसी की क्लास में आयशा नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी.

रोहित मिडिल क्लास फैमिली से था, जो एक सैकंड हैंड बाइक पर कालेज जाता था. परिवार में एक बहन और एक छोटा भाई था. दोनों ही अभी स्कूल में पढ़ते थे.

मां कम पढ़ीलिखी थीं, मगर उन का सपना बच्चों को अच्छी ऊंची तालीम दिलाना था. पिता दर्जी थे और वे दिनरात मेहनत करते थे, ताकि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकें.

इधर आयशा दिल्ली के नामचीन कपड़ा कारोबारी की बेटी थी. कभी वह क्रेटा गाड़ी से कालेज आ रही थी, तो कभी इनोवा से, कभी होंडा सिटी से तो कभी औडी कार से… मतलब, उस के घर में कई कारें थीं और परिवार के नाम पर केवल एक छोटा भाई और पिता.

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6. एक हंसमुख लड़की : क्या था कजरी के दुख का कारण Romantic Story in Hindi

उस की उम्र थी, यही कोई 18-19 बरस. बड़ीबड़ी आंखें, घने बाल, सफेद मोतियों की लड़ी से दांत. जब हंसती थी, तो लगता था मानो बिजली चमक गई हो. गलीमहल्ले के मनचलों पर तो उस की हंसी कहर बरसाती थी.

मुझे आज भी याद है, एक बार पड़ोस के चित्तू बाबू का लड़का काफी बीमार हो गया था. उस के परिवार के लोग बहुत परेशान थे, लेकिन कजरी बड़े इतमीनान से हंसते हुए कह रही थी, ‘‘ऐ बाबू, भैया ठीक हो जाएंगे, तुम फिक्र न करो,’’ और फिर ढेरों लतीफे सुनाने लगी. यहां तक कि बीमार लड़का भी कजरी के लतीफे सुनसुन कर हंसने लगा था.

मैं तकरीबन 10 साल बाद उस शहर, उस महल्ले में जा रहा था, जहां कजरी अपने बापू के साथ अकेली रहते हुए भी महल्लेभर के सुखदुख में शरीक होती थी.

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7. बेईमान बनाया प्रेम ने: क्या हुआ था पुष्पक के साथ Romantic love story

अगर पत्नी पसंद न हो तो आज के जमाने में उस से छुटकारा पाना आसान नहीं है. क्योंकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है कि आज पत्नी को आसानी से तलाक भी नहीं दिया जा सकता. अगर आप सोच रहे हैं कि हत्या कर के छुटाकारा पाया जा सकता है तो हत्या करना तो आसान है, लेकिन लाश को ठिकाने लगाना आसान नहीं है.

इस के बावजूद दुनिया में ऐसे मर्दों की कमी नहीं है, जो पत्नी को मार कर उस की लाश को आसानी से ठिकाने लगा देते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर तलाक दे कर भी पत्नी से छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन यह सब वही लोग करते हैं, जो हिम्मत वाले होते हैं. हिम्मत वाला तो पुष्पक भी था, लेकिन उस के लिए समस्या यह थी कि पारिवारिक और भावनात्मक लगाव की वजह से वह पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता था.

पुष्पक सरकारी बैंक में कैशियर था. उस ने स्वाति के साथ वैवाहिक जीवन के 10 साल गुजारे थे. अगर मालिनी उस की धड़कनों में न समा गई होती तो शायद बाकी का जीवन भी वह स्वाति के ही साथ बिता देता.

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8. बंद किताब : अभिषेक की चाहत Romantic love stories

‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

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9. हम बेवफा न थे : अख्तर के दिल की आवाजRomantic story

‘‘अरे, आप लोग यहां क्या कर रहे हैं? सब लोग वहां आप दोनों के इंतजार में खड़े हैं,’’ हमशां ने अपने भैया और होने वाली भाभी को एक कोने में खड़े देख कर पूछा.

‘‘बस कुछ नहीं, ऐसे ही…’’ हमशां की होने वाली भाभी बोलीं.

‘‘पर भैया, आप तो ऐसे छिपने वाले नहीं थे…’’ हमशां ने हंसते हुए पूछा.

‘काश हमशां, तुम जान पातीं कि मैं आज कितना उदास हूं, मगर मैं चाह कर भी तुम्हें नहीं बता सकता,’ इतना सोच कर हमशां का भाई अख्तर लोगों के स्वागत के लिए दरवाजे पर आ कर खड़ा हो गया.

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10. अनोखा इश्क : मंगेतर की सहेली से आशिकी Romantic love story in hindi

पारस और दिव्या की सगाई के 10 दिन बाद पारस ने दिव्या से मिलने के लिए कहा. दिव्या परिवार की इजाजत ले कर उस से मिलने गई, मगर आस्था भी उस के साथ गई, क्योंकि दिव्या की मां उसे अकेले नहीं जाने देना चाहती थीं.

पारस आस्था को देखता ही रह गया. दिव्या का गोरा रंग और आस्था का सांवला रंग, दिव्या का भराभरा बदन और आस्था नौर्मल सी, मगर तीखे नैननक्श, पारस तो मानो आस्था में ही खो गया. दिव्या ने पारस को 2-3 बार पुकारा, तब जा कर जैसे उसे होश आया हो.

आस्था बोली, “हैलो जीजू…”

“आस्था, प्लीज, मुझे पारस कहो,” पारस ने साफसाफ कह दिया.

“ओके पारस…”

इस तरह अकसर पारस दिव्या को मिलने के लिए किसी रैस्टोरैंट या पार्क में बुलाता तो आस्था भी साथ होती. वह दिव्या की बैस्ट फ्रैंड जो थी.

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जब सरेआम रानी चटर्जी को किस करते हुए वायरल हुए थे रवि किशन

Ravi Kishan Kiss to Rani Chatterjee: भोजपुरी इंडस्ट्री के सुपरस्टार कहे जाने वाले रवि किशन (Ravi kishan) न केवल भोजपुरी फिल्मों में फेमस हैं, बल्कि उन के चर्चे बौलीवुड (Bollywood) में भी होते हैं. रवि किशन ने अपनी मेहनत और लगन से इंडस्ट्री में अलग पहचान बनाई है. एक्टिंग के मामले में रवि किशन, बौलीवुड और साउथ के एक्टर्स को टक्कर देते हैं. बता दें कि रवि किशन अपनी पर्सनल लाइफ की वजह से काफी सुर्खियों में रहे हैं. उन का नाम बौलीवुड और भोजपुरी एक्ट्रेस नगमा (Nagma) के साथ जुड़ा था. हालांकि बाद में दोनों के रास्ते अलग हो गए थे. इस के बाद रवि किशन और एक्ट्रेस रानी चटर्जी (Rani Chatterjee) करीब आ गए. एक बार रवि ने रानी संग कुछ ऐसा कर दिया था कि वे शर्म से पानीपानी हो गई थीं.

 

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आप को बता दें कि भोजपुरी स्टार रवि किशन और रानी चटर्जी ने कई फिल्मों में साथ काम किया था. इन दोनों ने मिल कर इंडस्ट्री में धमाल मचा दिया था. एक समय ऐसा था जब रानी चटर्जी और रवि किशन को ले कर खूब चर्चा होती थी. कहा जाता है था कि रवि और रानी एकदूसरे को डेट कर रहे थे.

एक बार रवि किशन ने मीडिया के सामने रानी चटर्जी को किस कर दिया था. ये देख वहां मौजूद सभी लोग दंग रह गए थे. इतना ही नहीं रवि किशन का यह अंदाज देख रानी चटर्जी भी हैरान रह गई थीं.


बताते चलें कि भोजपुरी सुपरस्टार रवि किशन ने सलमान खान की एक्ट्रेस नगमा को भी डेट किया था. कहा जाता है कि रवि और नगमा एक दूसरे के लिए काफी सीरियस थे. हालांकि नगमा से प्यार करने से पहले ही रवि किशन शादीशुदा थे, उन के 4 बच्चे भी थे. जब रवि किशन की पत्नी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने जम कर हंगामा किया था. इसी वजह से रवि ने नगमा से दूरी बना ली थी.

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