अंधविश्वास में मासूम की बलि : तांंत्रिक का खूनी खेल

Crime News in Hindi: ज्योंज्यों अंधेरा घिरता जा रहा था, त्योंत्यों मुकेश की परेशानी बढ़ती जा रही थी. वह कभी दरवाजे की तरफ टकटकी लगाए देखता तो कभी टिकटिक करती घड़ी की सुइयों को निहारने लगता. दरअसल, बात ही कुछ ऐसी थी जिस से मुकेश परेशान था. उस की 2 साल की बेटी कंचन अचानक गायब हो गई थी. शाम को वह घर के बाहर खेल रही थी. पर वह वहां से अचानक कहां गुम हो गई, किसी को पता न चला. यह बात 21 मार्च, 2019 की है. उस दिन होली(Holi) का त्यौहार था. नंदापुर गांव के लोग रंगों से सराबोर थे. फाग गाने वालों की टोली अपना जलवा अलग से बिखेर रही थी. कई लोग ऐसे भी थे, जो नशे में झूम रहे थे. कंचन का पिता मुकेश भी फाग गाता था. फाग गा कर मुकेश जब घर लौटा, तब उसे मासूम कंचन के गुम होने की जानकारी हुई थी. उस के बाद वह कंचन को ढूंढने निकल गया.

लेकिन उस का कुछ भी पता न चल पा रहा था. धीरेधीरे गांव में जब कंचन के गुम होने की खबर फैली तो लोग स्तब्ध रह गए. आज भी अनेक गांवों में ऐसी परंपरा है कि किसी के दुखतकलीफ में लोग एकदूसरे की मदद करते हैं. फाग गाने वाली टोलियों को जब मुकेश की बेटी के गायब होने की जानकारी मिली तो टोलियों ने फाग गाना बंद कर दिया. इस के बाद वे मुकेश के घर पहुंच गए.

घर पर मुकेश की पत्नी संध्या का रोरो कर बुरा हाल था. परिवार की महिलाएं उसे सांत्वना दे रही थीं. लेकिन संध्या का हाल बेहाल था. उस के मन में तमाम तरह की आशंकाएं उमड़ने लगीं.

उधर कंचन की खोज के लिए पूरा गांव एकजुट हो गया था. मुकेश के चाचा रामखेलावन ने 10-10 लोगों की टीमें बनाईं. चारों टीमों ने टौर्च व लालटेन की रोशनी में अलगअलग दिशाओं में कंचन की खोज शुरू कर दी. गांव के हर खेत, बागबगीचे, नदीनाले व झुरमुटों के बीच टीमों ने कंचन की खोज की लेकिन उस का कुछ भी पता नहीं चला.

एक आशंका यह भी थी कि कहीं कंचन भटक कर गांव के बाहर न पहुंच गई हो और कोई जंगली जानवर उसे उठा ले गया हो. अत: इस दिशा में भी गांव के आसपास के जंगल व ऊंचीनीची जमीन के बीच कंचन की खोज की गई, लेकिन ऐसा कोई सबूत नही मिला. रात भर कंचन की खोज हुई. परंतु कंचन के संबंध में कोई जानकारी नहीं मिली.

जब मासूम कंचन का कुछ भी पता नहीं चला तो मुकेश अपने चाचा रामखेलावन के साथ थाना बिंदकी पहुंच गया. थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को उस ने अपनी 2 वर्षीय बेटी कंचन के लापता होने की जानकारी दे दी.

थानाप्रभारी ने कंचन की गुमशुदगी दर्ज कर जरूरी काररवाई करनी शुरू कर दी. उन्होंने फतेहपुर के समस्त थानों को वायरलैस से 2 साल की कंचन के गुम होने की खबर भेजवा दी. थानाप्रभारी को लगा कि जब कंचन तलाश करने के बाद भी कहीं नहीं मिली है तो जरूर उस का किसी ने अपहरण कर लिया होगा और अपहरण फिरौती के लिए नहीं बल्कि किसी रंजिश या दूसरे किसी इरादे से किया होगा.

इस की 2 वजह थीं. पहली यह कि मुकेश कुशवाहा की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि कोई फिरौती के लिए उस की बेटी का अपहरण करे. दूसरी वजह यह थी कि 2 दिन बीत जाने के बाद भी मुकेश के पास किसी का फिरौती के लिए फोन नहीं आया था. रंजिश का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी चंदेल, मुकेश के गांव नंदापुर पहुंचे.

वहां उन्होंने मुकेश से कुछ देर तक रंजिश के संबंध में पूछताछ की. मुकेश ने बताया कि गांव में उस की किसी से कोई रंजिश नहीं है. रुपयों के लेनदेन तथा जमीन से जुड़ा कोई विवाद भी नहीं है.

इस के बाद थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को शक हुआ कि कहीं मासूम का अपहरण किसी सिरफिरे या नशेबाज ने दुष्कर्म के इरादे से तो नहीं कर लिया. फिर दुष्कर्म के बाद उस की हत्या कर दी हो और शव को किसी नदीनाले या झाडि़यों में छिपा दिया हो. इस प्रकार का शक उन्हें इसलिए हुआ, क्योंकि होली का त्यौहार था. नशेबाजी जम कर हो रही थी. हो सकता है कि किसी नशेबाज की नजर बच्ची पर पड़ी हो और वह उसे गलत इरादे से उठा कर ले गया हो. शक के आधार पर उन्होंने पुलिस टीम के साथ नदीनालों, जंगल, झाडि़यों आदि में कंचन की खोज की. लेकिन कंचन का सुराग नहीं मिला.

इधर कंचन के लापता होने से कुशवाहा परिवार की आंखों की नींद उड़ी हुई थी. घर के सभी लोगों को इस बात की चिंता सता रही थी कि कंचन पता नहीं कहां और किस हाल में होगी. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था त्योंत्यों मुकेश व उस की पत्नी संध्या की चिंता बढ़ती जा रही थी.

धीरेधीरे 3 दिन बीत गए, लेकिन अब तक कंचन का पता न तो घर वाले लगा पाए थे और न ही पुलिस को सफलता मिली थी. तब मुकेश अपने सहयोगियों के साथ फतेहपुर के एसपी कैलाश सिंह से मिलने गया. लेकिन एसपी से उस की मुलाकात नहीं हो सकी. तब मुकेश ने एसपी कपिलदेव मिश्रा से मुलाकात की और अपनी व्यथा व्यक्त की.

एएसपी ने उसी समय थाना बिंदकी के थानाप्रभारी से बात की और कंचन को हर हाल में खोजने का आदेश दिया. इस के बाद थानाप्रभारी जीजान से कंचन को ढूंढने में जुट गए. उन्होंने अपने खास मुखबिर भी लगा दिए. पुलिस टीम ने क्षेत्र के आपराधिक प्रवृत्ति के कुछ लोगों को उन के घरों से उठा लिया और थाने  ला कर उन से सख्ती से पूछताछ की. लेकिन उन से कंचन के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली तो उन्हें छोड़ना पड़ा.

नाले में मिला कंचन का शव 25 मार्च, 2019 की शाम 4 बजे चरवाहे सैमसी नाले के पास बकरियां चरा रहे थे. तभी उन की निगाह नाले में उतराते हुए एक सफेद रंग के कपड़े पर पड़ी. लग रहा था उस में किसी बच्चे की लाश हो.

चरवाहे नंदापुर व सैमसी गांव के थे, अत: उन्होंने भाग कर गांव वालों को यह बात बता दी. यह खबर मिलते ही सैमसी व नंदापुर गांव के लोग नाले की ओर दौड़ पड़े. मुकेश भी बदहवास हालत में वहां पहुंचा. उसी दौरान किसी ने फोन कर के यह सूचना बिंदकी थाने में दे दी.

सूचना पा कर थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल पुलिस टीम के साथ नाले की ओर रवाना हो गए. थाना बिंदकी से सैसमी गांव करीब 5 किलोमीटर दूर है. कुछ ही देर में पुलिस वहां पहुंच गई. थानाप्रभारी ने नाले में तैरते हुए उस सफेद कपड़े को बाहर निकलवाया, जिस में कुछ बंधा था. पुलिस ने जैसे ही वह कपड़ा हटाया तो उस में वास्तव में एक बच्ची की लाश निकली. उस लाश को देखते ही वहां खड़ा मुकेश कुशवाहा दहाड़ मार कर रो पड़ा. वह लाश उस की मासूम बच्ची कंचन की ही थी.

2 वर्षीय मासूम कंचन की लाश जिस ने भी देखी, उसी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. क्योंकि कंचन की हत्या किसी रंजिश के चलते नहीं की गई थी. बल्कि उस की बलि दी गई थी. उस बच्ची का शृंगार किया गया था. पैरों में महावर (लाल रंग) तथा माथे पर टीका लगा था. उस का एक हाथ व एक पैर काटा गया था. उस का पेट भी फटा हुआ था.

बच्ची की बलि चढ़ाई जाने की खबर जंगल की आग की तरह पासपड़ोस के गांवों में फैली तो घटनास्थल पर भीड़ और बढ़ गई. बलि चढ़ाए जाने के विरोध में भीड़ उत्तेजित हो गई और शव रख कर हंगामा करने लगी. भीड़ तब और उग्र हो गई जब थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह ने भीड़ को यह कह कर समझाने का प्रयास किया कि कंचन की मौत नाले में डूबने से हुई है.

लोगों को उत्तेजित देख कर थानाप्रभारी के हाथपांव फूल गए. उन्होंने उपद्रव की आशंका को देखते हुए कंचन का शव ग्रामीणों से छीन लिया और थाने में ले आए. पुलिस की इस काररवाई से लोग और भड़क गए. तब लोग ट्रैक्टर ट्रौलियों में भर कर बिंदकी थाने पहुंचने लगे.

कुछ ही समय बाद सैकड़ों लोग थाने में जमा हो गए. ग्रामीणों ने थाने का घेराव कर दिया. उन्होंने ट्रैक्टर ट्रौलियों को सड़क पर आड़ेतिरछे खड़ा कर मुगल रोड जाम कर दिया. इस से कई किलोमीटर तक जाम लग गया. घटना के विरोध में लोग हंगामा कर पुलिस विरोधी नारे लगाने लगे.

थाना प्रभारी की वजह से भड़क गए लोग

थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल को यकीन था कि वह हलका बल प्रयोग कर ग्रामीणों को शांत करा देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ. बल प्रयोग के बावजूद उत्तेजित भीड़ ने पुलिस के कब्जे से कंचन का शव छीन लिया और उसे सड़क पर रख कर हंगामा करने लगे. मजबूरन थानाप्रभारी को हंगामा व सड़क जाम की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को देनी पड़ी. उन्होंने अधिकारियों से अतिरिक्त पुलिस फोर्स भेजने का भी आग्रह किया.

कुछ ही समय बाद एसपी कैलाश सिंह, डीएसपी कपिलदेव मिश्रा, सीओ (सदर) रामप्रकाश तथा सीओ (बिंदकी) अभिषेक तिवारी भारी पुलिस बल के साथ बिंदकी थाने पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने उत्तेजित ग्रामीणों को आश्वासन दिया कि जिस ने भी मासूम की बलि दी है, उसे बख्शा नहीं जाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस ने यदि कोताही बरती है तो संबंधित पुलिसकर्मी के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. डीएसपी कपिलदेव मिश्रा ने कहा कि आप लोग सिर्फ 2 दिन का समय दें. इस बच्ची का कातिल आप लोगों के सामने होगा.

पुलिस अधिकारियों के आश्वासन पर उत्तेजित ग्रामीणों ने कंचन का शव पुलिस को सौंप दिया और जाम हटा दिया. फिर पुलिस अधिकारियों ने आननफानन में कंचन के शव को पोस्टमार्टम हाउस फतेहपुर भिजवा दिया. साथ ही बवाल की आशंका को देखते हुए नंदापुर गांव में पुलिस तैनात कर दी.

थाना बिंदकी पुलिस को आशंका थी कि कंचन की मौत नाले में डूबने से हुई है. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुलिस की आशंका को खारिज कर दिया. रिपोर्ट के अनुसार कंचन की हत्या की गई थी. उस के एक हाथ व एक पैर को किसी धारदार हथियार से काटा गया था. पेट को किसी नुकीली चीज से फाड़ा गया था. अधिक खून बहने से ही उस की मौत होने की बात कही गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद थानाप्रभारी तेजबहादुर सिंह चंदेल ने मुकेश के चाचा रामखेलावन की तरफ से भादंवि की धारा 364, 302 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और मासूम कंचन के हत्यारों की तलाश शुरू कर दी.

तांत्रिक ने स्वीकारी बलि देने की बात

चूंकि कंचन की बलि देने की बात कही जा रही थी और बलि किसी न किसी तांत्रिक ने ही दी होगी. अत: थानाप्रभारी ने तंत्रमंत्र करने वालों की खोज शुरू कर दी. इस के लिए उन्होंने अपने खास मुखबिर भी लगा दिए. मुखबिरों ने नंदापुर व उस के आसपास के गांवों में अपना जाल फैला दिया. जल्द ही उस का परिणाम भी सामने आ गया.

27 मार्च, 2019 की शाम 7 बजे मुखबिर ने थानाप्रभारी को बताया कि सैमसी गांव का हेमराज तंत्रमंत्र करता है. उस के यहां लोगों का आनाजाना लगा रहता है. लेकिन कंचन के गुम होने के बाद उस ने अपनी तंत्रमंत्र की दुकान बंद कर दी है. गांव के लोगों को शक है कि हेमराज ने ही मासूम की बलि चढ़ाई होगी.

मुखबिर की सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी अपनी टीम के साथ रात 10 बजे सैमसी गांव में हेमराज के घर पहुंच गए. वह घर पर ही मिल गया तो वह उसे हिरासत में ले कर थाने आ गए.

हेमराज से कंचन की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. उस ने कहा कि वह तंत्रमंत्र करता है और होली, दिवाली जैसे बडे़ त्यौहारों पर बलि देता है. लेकिन इंसान की बलि नहीं देता. वह तो साधना के बाद मुर्गा या बकरा की बलि देता है. फिर मांस को प्रसाद के तौर पर अपने खास मित्रों में बांट देता है. कंचन की बलि देने का उस पर झूठा आरोप लगाया जा रहा है.

तांत्रिक हेमराज ने जिस तरह से अपने बचाव में दलील दी थी, उस से श्री चंदेल को एक बार ऐसा लगा कि हेमराज सच बोल रहा है. लेकिन दूसरे ही क्षण वह सोचने लगे कि अपराधी अपने बचाव में ऐसी दलीलें अकसर ही पेश करता है. अत: उन्होंने उस की बात को नकारते हुए उस से पुलिसिया अंदाज में पूछताछ शुरू की. लगभग एक घंटे की मशक्कत के बाद रात करीब 12 बजे तांत्रिक हेमराज टूट गया और उस ने कंचन की बलि देने की बात कबूल कर ली.

तांत्रिक हेमराज ने बताया कि उस ने तंत्रमंत्र सिद्ध करने तथा जमीन में गड़ा धन प्राप्त करने के लिए ही कंचन की बलि दी थी. तंत्रसाधना के इस अनुष्ठान में सेलावन गांव का रहने वाला उस का चेला शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास भी शामिल था.

लालच में चढ़ाई थी बलि

उसी की मोटरसाइकिल पर कंचन के शव को रख कर गांव के बाहर नाले में फेंक दिया था. तांत्रिक हेमराज के चेले शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास को पकड़ने के लिए रात के अंतिम पहर में पुलिस ने उस के घर दबिश दी. वह भी घर पर मिल गया और उसे बंदी बना लिया गया. उसे भी थाने ले आए.

थाने में जब उस की मुलाकात हेमराज से हुई तो वह सब समझ गया. अत: उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया. हेमराज की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त गंडासा बरामद कर लिया, जिसे उस ने अपने घर में छिपा दिया था.

पुलिस ने हेमराज के कमरे से पूजन सामग्री, फूल माला, भभूत, सिंदूर, तंत्रमंत्र की किताबें आदि बरामद कीं. पुलिस ने शिवप्रकाश की वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली, जो उस ने शव ठिकाने लगाने में प्रयोग की थी.

कंचन के हत्यारों को पकड़ने तथा आलाकत्ल बरामद करने की जानकारी थानाप्रभारी ने पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही डीएसपी कपिलदेव मिश्रा, सीओ (सदर) रामप्रकाश तथा सीओ (बिंदकी) अभिषेक तिवारी थाने में पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने अभियुक्त हेमराज व शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास से घटना के संबंध में विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद डीएसपी कपिलदेव मिश्रा ने आननफानन में प्रैसवार्ता आयोजित कर कंचन की हत्या का खुलासा किया.

चूंकि अभियुक्त हेमराज व शिवप्रकाश ने कंचन की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था, अत: थानाप्रभारी ने दोनों को अपहरण और हत्या के आरोप में विधिसम्मत बंदी बना लिया. पुलिस जांच और अभियुक्तों के बयानों के आधार पर अंधविश्वास और लालच में मासूम बच्ची कंचन की हत्या की सनसनीखेज कहानी इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर के थाना बिंदकी के अंतर्गत एक गांव है नंदापुर. इसी गांव में मुकेश कुशवाहा अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी संध्या के अलावा एक बेटी रमन थी. मुकेश के पास 3 बीघा खेती की जमीन थी. इसी की उपज से वह अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

संध्या चाहती थी बेटा

बेटी के जन्म के बाद संध्या एक बेटा भी चाहती थी. लेकिन बेटी रमन 8 साल की हो गई थी, उसे दूसरा बच्चा नहीं हो रहा था. जिस की वजह से संध्या चिंतित रहने लगी थी. अपनी मनोकामना पूरी होने के लिए वह वह विभिन्न मंदिरों में जाने लगी थी. वह हर सोमवार घाटमपुर स्थित कुष्मांडा देवी मंदिर जाती. एक तरह से वह धार्मिक विचारों वाली हो गई थी.

इसी बीच वह सितंबर 2016 में गर्भवती हो गई और मई 2017 में संध्या ने एक सुंदर सी बच्ची को जन्म दिया. इस बच्ची का नाम उस ने कंचन रखा. संध्या को हालांकि बेटे की चाह थी लेकिन दूसरी बच्ची के जन्म से उसे इस बात की खुशी हुई कि उस की कोख तो खुल गई. मुकेश भी कंचन के जन्म से बेहद खुश था. खुशी में उस ने अपने समाज के लोगों को भोज भी कराया.

नंदापुर गांव के पास ही एक किलोमीटर की दूरी पर सैमसी गांव बसा हुआ है. दोनों गांवों के बीच एक नाला बहता है, जो सैमसी नाले के नाम से जाना जाता है. सैमसी गांव में हेमराज रहता था. 3 भाइयों में वह सब से छोटा था. उस की अपने भाइयों से पटती नहीं थी. अत: वह उन से अलग रहता था.

जमीन का बंटवारा भी तीनों भाइयों के बीच हो गया था. हेमराज झगड़ालू प्रवृत्ति का था अत: गांव के लोग उस से दूरी बनाए रखते थे. उस के अन्य भाइयों की शादी हो गई थी, जबकि हेमराज की नहीं हुई थी.

हेमराज का मन न तो खेतीकिसानी में लगता था और न ही किसी कामधंधे में. उस ने अपनी जमीन भी बंटाई पर दे रखी थी. वह तंत्रमंत्र के चक्कर में पड़ा रहता था. कानपुर, उन्नाव और फतेहपुर शहर के कई तांत्रिकों के पास उस का आनाजाना रहता था.

इन तांत्रिकों से वह तंत्रमंत्र करना सीखता था. तंत्रमंत्र की किताबें भी पढ़ने का उसे शौक था. किताबों में लिखे मंत्रों को सिद्ध करने के लिए वह अकसर देर रात को पूजापाठ भी करता रहता था.

तांत्रिकों की संगत में रह कर हेमराज ने अंधविश्वासी लोगों को ठगने के सारे हथकंडे सीख लिए थे. उस के बाद वह अपने गांव सैमसी में तंत्रमंत्र की दुकान चलाने लगा. प्रचारप्रसार के लिए उस ने कुछ युवकयुवतियों को लगा दिया, जो गांवगांव जा कर उस का प्रचार करते थे. इस के एवज में वह उन्हें खानेपीने की चीजों के अलवा कुछ रुपए भी दे देता था.

अंधविश्वासी आने लगे हेमराज के पास

शुरूशुरू में तो उस की तंत्रमंत्र की दुकान ज्यादा नहीं चली लेकिन ज्योंज्यों उस का प्रचार होता गया, उस का धंधा भी चल निकला. फरियादी उस के दरबार में आने लगे और चढ़ावा भी चढ़ने लगा. हेमराज के तंत्रमंत्र के दरबार में पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं का आनाजाना अधिक होता था. क्योंकि महिलाएं अंधविश्वास पर जल्दी भरोसा कर लेती हैं.

उस के दरबार में ऐसी महिलाएं आतीं, जिन के संतान नहीं होती. तांत्रिक हेमराज उन्हें संतान देने के नाम पर बुलाता और उन से पैसे ऐंठता. कोई कमजोर कड़ी वाली औरत मिल जाती तो उस का शारीरिक शोषण करने से भी नहीं चूकता था. लोकलाज के डर से वह महिला अपनी जुबान नहीं खोलती थी. सौतिया डाह, बीमारी, भूतप्रेत जैसी समस्याओं से ग्रस्त महिलाएं भी उस के पास आती रहती थीं. अंधविश्वासी पुरुषों का भी उस के पास आनाजाना लगा रहता था.

वह आसपास के शहरों में प्रसिद्ध हो गया तो उस के कई चेले भी बन गए. लेकिन सेलावन गांव का शिवप्रकाश उर्फ ननकू रैदास उस का सब से विश्वासपात्र चेला था. शिवप्रकाश हृष्टपुष्ट व स्मार्ट था. वह दूध का धंधा करता था. आसपास के गांवों से दूध इकट्ठा कर उसे शहर जा कर बेचता था.

शिवप्रकाश एक बार गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था. बताया जाता है कि तब तांत्रिक हेमराज ने उसे तंत्रमंत्र की शक्ति से ठीक किया था. तब से वह तांत्रिक हेमराज का खास चेला बन गया था. फुरसत के क्षणों में शिवप्रकाश हेमराज के दरबार में पहुंच जाता था.

20 मार्च को होली थी. होली के 8 दिन पहले एक रात हेमराज को सपना आया कि उस के खेत में काफी सारा धन गड़ा है. इस धन को पाने के लिए उसे तंत्रसाधना करनी होगी और मां काली के सामने बच्चे की बलि देनी होगी. सपने की बात को सच मान कर हेमराज के मन में लालच आ गया और उस ने खेत में गड़ा धन पाने के लिए किसी बच्चे की बलि देने क ा निश्चय कर लिया.

हर होलीदिवाली पर चढ़ाता था बलि

तांत्रिक हेमराज वैसे तो हर होली दिवाली की रात मुर्गे या बकरे की बलि देता था, लेकिन इस बार उस ने धन पाने के लालच में किसी मासूम की बलि देने की ठान ली. इस बाबत हेमराज ने अपने खास चेले शिवप्रकाश से बात की तो वह भी उस का साथ देने को तैयार हो गया. फिर गुरुचेला किसी मासूम की तलाश में जुट गए.

शिवप्रकाश उर्फ ननकू का नंदापुर गांव में आनाजाना था. वहां वह दूध व खोया की खरीद के लिए जाता था. होली के 2 दिन पहले ननकू, नंदापुर गांव गया तो उस की निगाह मुकेश कुशवाहा की 2 वर्षीय बेटी कंचन पर पड़ी. वह दरवाजे के पास खड़ी थी और मंदमंद मुसकरा रही थी. शिवप्रकाश ने इस मासूम के बारे में अपने गुरु हेमराज को खबर दी तो उस की बांछें खिल उठीं. फिर दोनों कंचन की रैकी करने लगे.

21 मार्च को होली का रंग खेला जा रहा था तथा फाग गाया जा रहा था. शाम 5 बजे के लगभग शिवप्रकाश अपने गुरु हेमराज को साथ ले कर अपनी मोटरसाइकिल से नंदापुर गांव पहुंचा फिर फाग की टोली में शामिल हो गया.

शाम 7 बजे के लगभग दोनों मुकेश कुशवाहा के दरवाजे पर पहुंचे. उस समय कंचन घर के बाहर खेल रही थी. तांत्रिक हेमराज ने दाएंबाएं देखा फिर लपक कर उस बच्ची को गोद में उठा लिया. इस के बाद बाइक पर बैठ कर दोनों निकल गए.

रात के अंधेरे में हेमराज कंचन को अपने घर लाया और नशीला दूध पिला कर उसे बेहोश कर दिया. इस के बाद उस ने बेहोशी की हालत में कंचन का शृंगार किया. शरीर पर भभूत और सिंदूर लगाया. पांव में महावर लगाई, माथे पर टीका तथा गले में फूलों की माला पहनाई. फिर तंत्रमंत्र वाले कमरे में ला कर उसे मां काली की मूर्ति के सामने लिटा दिया. कमरे में हेमराज के अलावा उस का चेला शिवप्रकाश भी था.

हेमराज ने कंचन की पूजाअर्चना की तथा कुछ मंत्र बुदबुदाता रहा. इस के बाद वह गंडासा लाया और मां काली के सामने हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मां, मैं बच्चे की बलि आप को भेंट कर रहा हूं. इस बलि को स्वीकार कर के आप मेरी इच्छा पूरी करना.’’

कहते हुए हेमराज ने गंडासे से कंचन का एक हाथ व एक पैर काट दिया. इस के बाद उस ने उस बच्ची का पेट भी चीर दिया. ऐसा होते ही खून कमरे में फैलने लगा. वह कुछ क्षण छटपटाई, फिर दम तोड़ दिया.

दूसरी रात उस ने कंचन के शव को सफेद कपड़े में लपेटा और शिवप्रकाश के साथ गांव के बाहर नाले में फेंक आया. इधर मुकेश फाग गा कर घर आया तो उसे कंचन नहीं दिखी, तो उस ने उस की खोज शुरू कर दी. दूसरे दिन उस के चाचा ने थाना बिंदकी में गुमशुदगी दर्ज कराई.

पुलिस ने तथाकथित तांत्रिक हेमराज और उस के चेले शिवप्रकाश से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उन्हें 28 मार्च, 2019 को रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक दोनों की जमानत नहीं हुई थी.

Sara Ali khan ने रिलेशनशिप को लेकर कही ये बात कि नाराज हुए कार्तिक आर्यन

Film News in Hindi : इन दिनों करण जौहर (karan Johar) का शो ‘कौफी विद करण’ सीजन 8 (Koffee with karan) सुर्खियों में बना हुआ है. शो में अब तक दीपिका पादुकोण से ले कर सारा अली खान तक आ चुकी हैं. वहीं, इस शो पर कार्तिक आर्यन ( Kartik Aryan) भी आए. हालांकि कार्तिक आर्यन इन दिनों अपनी फिल्म ‘चंदू चैंपियन’ (Chandu Champion) को ले कर सुर्खियों में बने हुए हैं. अभी हाल ही में इस फिल्म से जुड़े कई बड़े अपडेट सामने आए थे. लेकिन कार्तिक आर्यन अपने नए बयान को ले कर ज्यादा सुर्खियां बंटोर रहे हैं. उन्होंने सारा अली खान के साथ अपनी रिलेशनशिप पर रखी राय को ले कर कमेंट किया है.

आप को बता दें कि शो के दौरान करण जौहर ने सारा अली खान से कार्तिक आर्यन संग रिश्ते और ब्रेकअप को ले कर सवाल किए थे. तब जवाब देते हुए सारा अली खान ने कहा था कि ब्रेकअप इतना आसान नहीं होता है.

 

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अब इन सब के बीच अब कार्तिक आर्यन का एक इंटरव्यू वायरल हो रहा है. इस इंटरव्यू के दौरान ने अफेयर्स को ले कर चर्चा की, जिस में वे सारा अली खान के रिलेशनशिप की स्टेंटमेंट को ले कर कमेंट कर रहे हैं.

कार्तिक आर्यन ने ‘फिल्म कंपैनियन’ से बात करते हुए इस बात पर अपनी राय रखी. कार्तिक आर्यन ने कहा कि मुझे लगता है कि अगर रिलेशनशिप लोगों का है, तो दूसरे को इंसान को इस के बारे में बात नहीं करनी चाहिए. हमें अपनी रिलेशनशिप की पूरी इज्जत करनी चाहिए.’

इस के आगे कार्तिक आर्यन ने कहा कि ‘मैंने कभी किसी से अपनी रिलेशनशिप के बारे में बात नहीं की. किसी के लिए रिश्ते के बारे में बोलना अच्छा नहीं है.’

 

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करण जौहर के शो में जब सारा अली खान और अनन्या पांडे आई थीं. तब कौमन बौयफ्रैंड को ले कर सवाल उठा था. इस के बाद से कार्तिक आर्यन काफी चर्चा में रहे.

रफू की हुई ओढ़नी : घूमर वाली मेघा

Story in Hindi

धरतीपुत्र : इंजीनियर बना किसान

Family story in Hindi: मोहन और सुरेश 2 भाई थे. मोहन बड़ा, सुरेश छोटा था. उन के बचपन में ही पिता का देहांत हो गया था. दोनों की मां ने बहुत मुश्किल से उन का पालनपोषण किया था. मां की तकलीफ देखते हुए मोहन छोटी उम्र से ही काम करने लगा था. दोनों मांबेटा मिल कर छोटे से खेत में सब्जियां उगाते, उन्हें बाजार में बेचते, साथ ही दूसरे के खेतों में मजदूरी भी करते थे. एक बार मां ने मोहन से कहा था, ‘‘बेटा, तू भी पढ़ाई कर ले. मैं सब संभाल लूंगी. भले ही अच्छा खाना नहीं दे सकूंगी, रोटी का जुगाड़ तो हो ही जाएगा.’’मोहन ने कहा, ‘‘मां, अगर हम दोनों भाई पढ़ेंगे, तो किसी की पढ़ाई भी सही ढंग से नहीं होगी. अगर मैं तुम्हारी कुछ मदद कर दूंगा, तो छोटा भाई अच्छी तरह पढ़ाई कर लेगा. मैं शाम को मास्टरजी से पढ़ लिया करूंगा और वे इम्तिहान भी दिलवा देंगे.’’

सुरेश पढ़ाई में बहुत तेज था. बड़े भाई और मां की उम्मीदों पर खरा उतरता हुआ वह कामयाबी के रास्ते पर आगे बढ़ता रहा.

मोहन भी पास के हाईस्कूल के एक मास्टरजी की मदद से रात में पढ़ाई करता और उन्हीं की सलाह से फार्म भर कर उस ने मैट्रिक और इंटर का इम्तिहान पास किया था. इस के बाद पत्राचार से बीए करते हुए उस ने नजदीक के कृषि विज्ञान केंद्र से कई तरह की ट्रेनिंग ले कर खेतीबारी से जुड़ी नई से नई तकनीक की जानकारी हासिल कर ली थी.

सुरेश का जिस दिन अपने ही राज्य के इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला हुआ, मोहन ने पूरे गांव को मिठाई खिलाई थी.

सुरेश जब कालेज में पढ़ रहा था, उसी समय उस के बड़े भाई मोहन का ब्याह हो गया. उस की भाभी बहुत प्यारी और सब का ध्यान रखने वाली थीं. भाभी के आने से घर में रौनक हो गई और सुरेश की पढ़ाई पूरी होने से पहले घर में गुडि़या सी भतीजी भी आ गई.

सुरेश अपनी भतीजी को बहुत स्नेह करता था. उस की इच्छा थी कि वह भतीजी को एक अच्छे स्कूल में पढ़ाए और उसे हर वह खुशी दे, जो बचपन में इन दोनों भाइयों को नहीं मिल पाई थी.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहन की इच्छा थी कि सुरेश एमबीए में दाखिला ले ले, पर पढ़ाई खत्म करते ही सुरेश की नौकरी एक बड़ी विदेशी कंपनी में लग गई, जिस का दफ्तर मुंबई में था.

सुरेश की तनख्वाह भी बहुत ज्यादा थी. इस वजह से सुरेश ने पत्राचार कोर्स से एमबीए करने का फैसला किया. उस ने अपने भाई और मां को भी समझ कर नौकरी करने के पक्ष में तैयार कर लिया.

नौकरी लगने के बाद सुरेश ने मोहन और मां से अपने साथ ही मुंबई चलने के लिए कहा, पर मोहन ने मुंबई जाने से मना करते हुए कहा, ‘‘देख भाई, तू वहां नौकरी कर और यहां हमारी खेती भी है, उसे मैं संभालूंगा.

‘‘हम ने तो धीरेधीरे कर के कुछ और खेत भी ले लिए हैं. हमारी जो बंजर जमीन पड़ी थी, उस में भी सरकार की ओर से आम के बाग लगाने का प्रस्ताव मिला है, इसलिए हमें यहीं रहने दे.

‘‘हम मुंबई जरूर घूमने आएंगे. अभी तू अकेले जा कर नौकरी कर ले. जब हम तुम्हारी शादी करेंगे, तब तुम अपनी पत्नी को भी ले जाना. और जब तुम्हारी भतीजी स्कूल में पढ़ने लायक होगी, तब उसे भी अपने साथ रखना.’’

सुरेश बोला, ‘‘क्या भैया, अभीअभी तो मेरी नौकरी लगी है और आप शादी की बात कर रहे हैं. पहले एक अच्छा मकान बना लें, उस के बाद मेरी शादी की सोचना.

‘‘हमारा मकान बहुत छोटा और पुराना है. आप की सारी आमदनी तो मुझे पढ़ाने में लग गई. जो थोड़ीबहुत बचत होती थी, उस से आप ने और खेत ही बढ़ाए हैं.

‘‘मकान की मरम्मत भी नहीं हुई. मेरी भाभी और नन्ही भतीजी को इस मकान में कितनी परेशानी होती है, इसलिए पहले मकान, उस के बाद आगे की कुछ बात आप सोचना.’’

मोहन ने कहा, ‘‘तू तो पूरा पागल है. अरे, हम दोनों काम एकसाथ कर सकते हैं.’’

कुछ दिनों के बाद सुरेश मुंबई चला गया. वह तनख्वाह मिलते ही अपना खर्च निकाल कर हर महीने मोहन भैया को एक अच्छीखासी रकम भेज देता था.

एक दिन सुरेश ने फोन पर भैया से कहा, ‘‘भैया, मैं नए घर का नक्शा भिजवा रहा हूं, आप घर बनवाना शुरू कर दें.’’

मोहन ने वह नक्शा देख कर कहा, ‘‘पर, इतना बड़ा मकान बनाने के लिए तो कई लाख रुपए लगेंगे…’’

सुरेश बोला, ‘‘तो क्या हुआ भैया. मैं बैंक से कर्ज ले लूंगा. मेरी तनख्वाह से कर्ज चुकता होता रहेगा.’’

मोहन ने पहले तो कर्ज लेने के लिए बहुत मना किया, पर सुरेश की जिद पर मान गया. सुरेश ने बैंक से कर्ज ले लिया.

सुरेश की शादी के लिए भी बहुत से प्रस्ताव आ रहे थे. एक अच्छी लड़की देख कर मां और भैयाभाभी ने उस का ब्याह करा दिया.

मोहन जब अपनी पत्नी को ले कर मुंबई जा रहा था, तब वह अपने साथ अपनी भतीजी को भी ले जाना चाह रहा था, लेकिन मां ने समझाया, ‘‘इसे अभी मत ले जाओ, यह छोटी है. थोड़ी और बड़ी हो जाने दो, फिर ले जाना पढ़ाने के लिए.

‘‘अभी तुम दोनों जाओ. वैसे भी तुम दोनों का जीवन शुरू ही हुआ है अभी. पूरी जिंदगी पड़ी है जिम्मेदारी निभाने को.’’

सुरेश चला गया और मोहन ने घर बनवाना शुरू किया, पर न जाने उस के दिमाग में क्या बात आई कि बैंक से कर्ज लिए गए रुपए जैसेजैसे मिलते गए, उन में से आधे पैसों से उस ने खेती लायक कुछ जमीन खरीद ली और उस पर और्गैनिक खेती करने लगा.

मोहन ने आधे पैसे से साधारण सा मकान बना लिया, जिस में सुविधाएं तो सब थीं, पर जो मौडर्न डिजाइन सुरेश ने भेजा था, वह नहीं था.

सुरेश जब भी फोन पर मोहन को मकान के फोटो भेजने के लिए कहता, तो मोहन हंस कर बोलता, ‘‘कुछ राज भी तो रहने दे, जब पूरा मकान बन जाएगा तब देख लेना.’’

पूरा परिवार हंसीखुशी गांव और शहर दोनों जगह पर अपना समय बिता रहा था कि अचानक कोरोना वायरस का कहर शुरू हो गया.

कोरोना काल में हुई मंदी के चलते कई बड़ीबड़ी कंपनियों ने अपने मुलाजिमों की छंटनी कर दी थी. उन्हीं में सुरेश भी था. उस ने गांव जाने का फैसला किया.

पत्नी नेहा गांव जाने के लिए तो तैयार हो गई, पर उसे एक अलग ही चिंता सता रही थी, ‘‘गांव में हमारा रहनाखाना तो हो जाएगा, लेकिन बैंक की किस्त कहां से भरेंगे? हर महीने इतनी बड़ी रकम देना बड़ा मुश्किल होगा. ऐसे में तो हमारी गांव की जमीन भी बिक सकती है. भैया ने सही कहा था आप से कि अभी बड़ा घर बनवाने की जरूरत नहीं है.’’

यह सुन कर सुरेश बोला, ‘‘अभी तो गांव में चल कर देखते हैं. कुछ नहीं होगा तो कोई अपना ही काम शुरू करूंगा. कम से कम यह मुसीबत का समय तो निकल जाए.’’

जब नेहा और सुरेश गांव पहुंचे, तो नए घर को देख कर हैरान रह गए. भैया और मां खेत पर गए थे, भाभी घर में थीं.

थोड़े गुस्से और नाराजगी के मिलेजुले भाव से सुरेश ने भाभी से कहा, ‘‘भाभी, यह सब क्या है… यह घर बनवाया है आप ने… इतने सारे रुपयों में इतना साधारण सा मकान क्यों बना है? मैं ने तो भैया को एक बड़ा और मौडर्न मकान बनाने के लिए पैसा दिया था.’’

भाभी मुसकरा कर बोलीं, ‘‘देवरजी, अभी तो आए हो, पहले नहाधो लो, कुछ खापी कर थोड़ा आराम तो कर लो, फिर अपने रुपयों का भी हिसाब कर लेना.’’

भाभी की बात सुन कर सुरेश थोड़ा सकपका गया, इसलिए वह एकदम से बोला, ‘‘नहींनहीं भाभी, आप बुरा मत मानिए. मैं तो इतना साधारण मकान देख कर यह बोल रहा था.’’

भाभी बोलीं, ‘‘कोई बात नहीं. अच्छा, मैं गरम पानी दे रही हूं. जाओ, पहले नहा कर आओ.’’

कमरे में जाने के बाद सुरेश को नहाने के लिए कपड़े निकाल कर देते हुए नेहा ने कहा, ‘‘आप को आते ही भाभी से ऐसे नहीं बोलना चाहिए था. शायद उन्हें आप की बात पसंद नहीं आई.’’

सुरेश बोला, ‘‘मैं अपनी गलती मानता हूं, लेकिन मैं भी क्या करता… बैंक से इतना ज्यादा कर्ज लिया था. नौकरी लगने के बाद से ही मैं उन्हें पैसे भेजता रहा, बहुत सोचसमझ कर मैं ने खुद पर खर्च किया है. अपने भविष्य के लिए भी मैं ने कुछ भी नहीं रखा है. जोकुछ बचत हुई, तुम्हारे आने के बाद ही हुई. ऐसे में इतना साधारण मकान देख कर मैं अपने को रोक नहीं पाया.’’

नेहा ने कहा, ‘‘जो हो गया, वह हो गया, लेकिन आगे भैया या मां के सामने इस बारे में आप कुछ भी नहीं बोलेंगे.’’

सुरेश ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा ठीक है, अब नहाने भी दोगी या यह भाषण ही देती रहोगी…’’

छोटे भाई के गांव आने की खबर सुन कर मोहन और मां भी घर आ गए. नेहा द्वारा मना किए जाने के बाद भी सुरेश ने मां और भैया के सामने भी अपना वही सवाल रख दिया.

मोहन ने कहा, ‘‘पहले यह बताओ कि अचानक बिना सूचना के तुम कैसे आ गए, वह भी कोरोना काल में. अब यहां तुम्हें 15 दिन तक क्वारंटीन रहना होगा.’’

सुरेश बोला, ‘‘हम क्वारंटीन रह लेंगे, क्योंकि शहर में रहते तो कुछ दिन बाद फाके करने की नौबत आ जाती. एक बुरी सूचना है कि मेरी नौकरी छूट गई है. और अब मैं यह सोच रहा हूं कि बैंक से जो कर्ज लिया उस की किस्त कैसे भर पाऊंगा. इतना पैसा भी नहीं है कि कोई नया रोजगार भी कर सकूं. अभी के समय में तो कोई नया धंधा भी नहीं चलेगा. ऐसे में बैंक की किस्त देना मुश्किल लगता है.’’

मोहन ने कहा, ‘‘तू घबरा मत छोटे, कुछ भी मुश्किल नहीं होगा. हमारा धंधा अभी भी चलेगा.’’

सुरेश ने हैरान हो कर पूछा, ‘‘मैं समझ नहीं भैया, कैसा धंधा?

मोहन ने समझाया, ‘‘तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारे द्वारा हर महीने भेजे गए और तुम्हारे नक्शे के मुताबिक मकान नहीं बना कर बचाए गए रुपए मैं ने कहीं उड़ा दिए क्या? नहीं मेरे भाई. इस साधारण मकान में सुविधाएं तो सारी हैं, बस मौडर्न नहीं है. इस तरह का मकान बनाने से आधी से ज्यादा रकम बच गई थी…’’

‘‘वही तो मैं भी पूछ रहा था कि साधारण मकान बना कर पैसे बचाने की जरूरत क्या आ गई आप को?’’ सुरेश ने मोहन की बात काटते हुए पूछ लिया.

मोहन ने कहा, ‘‘थोड़ा धीरज रख छोटे, वही मैं तुझे बता रहा हूं. उस बची हुई रकम से मैं ने कुछ उपजाऊ जमीन खरीद ली थी और उस पर नए तरीके से खेतीबारी कर रहा हूं.

‘‘इस बार हम ने तरबूज और खरबूजे लगाए थे. इस फसल से खर्च काट कर 3 लाख रुपए की आमदनी हुई है, जिसे मैं ने बैंक में जमा कर दिया है. उस से हम लोग कई महीने तक बैंक की किस्त दे ही सकते हैं. उस के खत्म होने के पहले हमारे आम की फसल की आमदनी आ जाएगी.’’

सुरेश खुश हो कर बोला, ‘‘मान गया भैया आप को. मैं तो महज दिखावे पर ध्यान दे रहा था, पर आप ने घर की माली हालत मजबूत करने पर ध्यान रखा.’’

मोहन ने हंसते हुए कहा, ‘‘आखिर तेरा बड़ा भाई हूं. और हां, तू कहता है तेरा रोजगार खत्म हो गया… कहां खत्म हुआ है. अभी तो और ज्यादा आगे बढ़ने का समय है. मैं अकेले सबकुछ नहीं संभाल पा रहा था, अब तुम मेरी मदद करना.’’

मोहन भैया की सूझबूझ से सुरेश बहुत प्रभावित था. उस ने अपनी पत्नी की ओर देखा और कहा, ‘‘देखा, तुम चिंता करती आ रही थी कि कर्ज कैसे चुकाएंगे. कल तक हम नौकर थे तो परेशानी थी, अब हम अपनी धरती मां के पुत्र बने हैं, अब हमें कोई परेशानी नहीं होगी. बैंक का कर्ज भी चुकता हो जाएगा.

‘‘धरती मां हमें उपज के रूप में अपना इतना स्नेहदुलार देंगी कि हम मालामाल हो जाएंगे. मैं अपने घर में रह कर खेतीबारी करूंगा. हां, मैं धरतीपुत्र किसान हूं.’’

मौत और फैसला : लक्ष्मी, श्रीनिवास और बम धमाका

Family Story in Hindi: लक्ष्मी और श्रीनिवास ने लवमैरिज की थी. पर कुछ समय के बाद ही श्रीनिवास बदल गया था. लक्ष्मी अपने पति को गलत रास्ते पर जाने से न रोक सकी, लेकिन वह अपने सपनों को भी नहीं मरने देना चाहती थी. क्या थे उस के सपने और क्या लक्ष्मी का पति सही रास्ते पर आ पाया? लक्ष्मी अपने हाथ में एक खुला खत लिए हुए खड़ी थी और थरथर कांप रही थी. उस ने घबराते हुए टिकटिक करती हुई घड़ी की तरफ नजर फेंकी. 5 बजने में 35 मिनट बाकी थे. वह फिर से खत देखने लगी. लक्ष्मी देख रही थी कि टेढ़ेमेढ़े अक्षरों में क्या लिखा है, क्या वह इस समय भी पहुंच सकती है? हां, अभी समय है. वह मौके पर पहुंच सकती है. उस ने झपट कर सोफे पर पड़ा हुआ हैंडबैग उठाया और तेजी से बाहर निकली.

घर के सामने ही लक्ष्मी की स्कूटी खड़ी थी. उस ने तेजी से स्कूटी स्टार्ट की और गुलाब बाग की ओर चल पड़ी. उसे रास्ते की भीड़ पर गुस्सा आ रहा था.

फिर भी लक्ष्मी की स्कूटी सनसनाती हुई भीड़भाड़ से भरी सड़कों से गुजरने लगी. लक्ष्मी बारबार घड़ी देख रही थी. समय बड़ी तेजी से निकल रहा था. साढ़े 4 हुए, फिर पौने 5 और अब 4 बज कर 50 मिनट. बस, 10 मिनट और… गुलाब बाग थोड़ी दूर है. ट्रैफिक भी कितना है कि वह कैसी मरी चाल से चला पा रही है स्कूटी को.

4 बज कर 55 मिनट पर लक्ष्मी गुलाब बाग के बड़े दरवाजे पर पहुंची. वहां एक मीटिंग हो रही थी. चारों तरफ नीले झंडे लगे हुए थे.

लक्ष्मी ने स्कूटी खड़ी की और भीड़ की तरफ दौड़ी. भीड़ में घुस पाना बहुत मुश्किल था, लेकिन वह पलभर में ही बीचोंबीच पहुंच गई.

मंच पर फूलमालाओं से लदा हुआ, सफेद कपड़े और नीली टोपी पहने हुए एक आदमी जोरदार भाषण दे रहा था. उस की आवाज लाउडस्पीकरों के जरीए चारों तरफ फैल रही थी.

लक्ष्मी ने न तो उस आदमी की तरफ देखा और न उस के भाषण का एक भी शब्द सुनने की कोशिश की. उस की आंखें श्रीनिवास को ढूंढ़ रही थीं.

आखिरकार लक्ष्मी ने श्रीनिवास को ढूंढ़ ही लिया. वह मंच के नीचे तीसरी लाइन में बैठा था, लेकिन इस समय 5 बजने में सिर्फ कुछ ही सैकंड बाकी थे.

लक्ष्मी जल्दी से जल्दी श्रीनिवास के पास पहुंचने के लिए भीड़ में से रास्ता बनाने की कोशिश कर रही थी. अचानक उस ने देखा कि श्रीनिवास ने अपनी जेब से एक पिस्तौल निकाली. लक्ष्मी को यह होश नहीं रहा कि पहले पिस्तौल छूटी या उस के मुंह से चीख निकल पड़ी.

फूलमालाओं से लदा हुआ आदमी कटे हुए पेड़ की तरह गिर पड़ा. उस के सीने से सुर्ख खून की धार बह चली. भीड़ में इस हादसे से खलबली मच गई. हर आदमी चीख रहा था.

लक्ष्मी भीड़ के बीच फंस गई थी. वह कुचली जा रही थी, लेकिन फिर भी श्रीनिवास के पास पहुंचने की कोशिश कर रही थी.

अचानक लक्ष्मी को श्रीनिवास के चारों तरफ पुलिस की खाकी वरदियां दिखाई दीं. वह समझ गई कि पुलिस ने उसे पकड़ लिया है.

इस के बाद पुलिस की गाड़ी आ गई. उसे श्रीनिवास की झलक भर मिली थी कि सिपाहियों ने उसे गाड़ी में बंद कर दिया. गाड़ी धूल का गुबार उड़ाती हुई चली गई. लक्ष्मी उस गुबार को देखती रह गई.

लक्ष्मी ने पता लगाने की कोशिश की कि श्रीनिवास को किस जेल में भेजा गया है, मगर कुछ भी पता न लग सका. वह उसी जगह घूमती रही. जब अंधेरा हो गया और वह थक कर चूर हो गई, तो घर लौट आई.

अपने कमरे में आते ही लक्ष्मी एक आरामकुरसी पर गिर पड़ी. उस ने कमरे की बत्ती तक नहीं जलाई. खुली खिड़की से आती हुई रोशनी की पट्टी एक नौजवान के फोटो पर पड़ रही थी.

लक्ष्मी उस फोटो की तरफ एकटक देख रही थी. उस नौजवान के चेहरे पर शांत मुसकराहट खेल रही थी. लक्ष्मी समझ नहीं पा रही थी कि उस की मासूम निगाहों के पीछे आतंक की आग कहां छिपी थी. उसे 5 साल पहले की बातें याद आने लगीं…

उस समय वे दोनों कालेज में पढ़ते थे. वह यानी श्रीनिवास कट्टर राष्ट्रीय विचारों का था. लक्ष्मी उस के विचारों से प्रभावित हो कर उस की तरफ खिंच गई थी. श्रीनिवास के विचार कभीकभी उसे बहुत खतरनाक मालूम पड़ते थे, लेकिन वह फिर भी उस की ओर खिंचती ही चली गई.

लक्ष्मी श्रीनिवास के नजदीक आने की कोशिश करने लगी और उस के एक दोस्त ने श्रीनिवास से उस का परिचय करा दिया. श्रीनिवास भी उस की तरफ खिंच गया था, इसलिए उन की दोस्ती बढ़ने लगी. बिलकुल उसी तरह, जैसे हवा लगने से आग बढ़ती है. हालांकि उन के विचार कभीकभी टकरा जाते थे. लक्ष्मी उदारवादी थी, सब को बराबर समझाने वाली. लेकिन वह मोह बंधन तोड़ न सकी और उस ने श्रीनिवास के साथ ब्याह कर लिया.

कुछ समय तक वे दोनों बहुत सुखी रहे. श्रीनिवास एक आदर्श पति की तरह लक्ष्मी को सुखी रखने की कोशिश करता रहा. लक्ष्मी यह देख कर खुश होने लगी कि उस ने अपने पति की विचित्र सोच को बदल दिया है.

एक साल सपनों और कल्पनाओं में निकल गया. इस के बाद श्रीनिवास ऊबने लगा और रात को देर तक बहस करने लगा. वह अब अकसर ही कहने लगता था, ‘‘लक्ष्मी, मैं तो तुम्हें अपनी पत्नी समझता हूं, लेकिन तुम मुझे अपना पति नहीं समझती हो.’’

लक्ष्मी ने श्रीनिवास को अपनी तरफ से समझाने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह उसे जरा भी न समझ पाई. श्रीनिवास इतना जिद्दी था कि अपने सामने किसी की नहीं सुनता था. बस अपने दल के कट्टर नेताओं की ही बात वह मानता था. उन की पार्टी की सरकार थी, पर उसे इस में भी कमी नजर आती थी. वह चाहता था कि जो भी काम हो रहा है, उस का जल्दी से जल्दी नतीजा सामने आए.

एक दिन शाम को श्रीनिवास ने लक्ष्मी के सामने ऐलान कर दिया कि वह इस दल के आंतकवादियों के दस्ते में शामिल हो गया है. उस का विचार था कि केवल हिंसा द्वारा ही देश की संस्कृति को बचाया जा सकता है.

लक्ष्मी को इस फैसले से बहुत दुख हुआ. उस ने खुद अपने और होने वाले बच्चे की खातिर श्रीनिवास को समझाने की कोशिश की. वह प्रेम और फर्ज की जद्दोजेहद में फंसा रहा. न तो वह लक्ष्मी के प्यार को कुचल सकता था और न ही फर्ज से मुंह मोड़ना चाहता था.

आखिर में जब श्रीनिवास को आतंकवादी संगठन द्वारा एक विपक्षी नेता को खत्म करने का काम सौंपा गया, तो उस ने फर्ज के सामने लक्ष्मी के प्यार की परवाह नहीं की. वह लक्ष्मी और अपने मासूम बच्चे को तकलीफ नहीं देना चाहता था, फिर भी वह अपने आदर्शों के सामने निजी बातों को नहीं आने देना चाहता था. अगर वह इस काम से हट गया, तो कभी अपनेआप को माफ नहीं कर सकेगा.

श्रीनिवास ने ये सब बातें लक्ष्मी को अपने आखिरी खत में समझा कर माफी मांग ली थी. ह्वाट्सएप इस्तेमाल करने की कोशिश नहीं की कि कहीं वह पकड़ा न जाए. लक्ष्मी ने उसे इस जुर्म से बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन जब वह वहां पहुंची, तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

अगले दिन सुबह लक्ष्मी सैंट्रल पुलिस स्टेशन जाने वाली बस में बैठ गई. उस के पास ही एक आदमी अखबार पढ़ रहा था. उस अखबार में मोटे अक्षरों में कल शाम की हत्या की खबर छपी थी.

लक्ष्मी उस की तरफ देखे बिना न रह सकी. कुछ लोग श्रीनिवास को हत्यारा और जानवर कह रहे थे, तो कुछ उसे देशभक्त बता रहे थे. लक्ष्मी का दिल पीड़ा से कराह रहा था.

लक्ष्मी का गुस्सा भी बढ़ रहा था. इन लोगों के हिसाब से श्रीनिवास जानवर है. ये अजनबी लोग क्या जानें कि बहादुर होते हुए भी श्रीनिवास का ब्रेनवाश किया जा चुका है. ये क्या जानें कि श्रीनिवास ने कितनी बेवकूफी से सपनों की वेदी पर अपने प्रेम की बलि दी है.

नहीं, कोई भी श्रीनिवास को नहीं समझता. उसे बचाने की कोशिश की जा रही थी. उसे सही बताने की कि एक को मार कर उस आवाज को बदला नहीं जा सकता. उसे समझाने की किसी ने कोशिश नहीं की. सिर्फ वही उस के विचारों को समझ सकी थी. उस ने अपने प्यार से उसे गलत रास्ते पर चलने से रोकने की कोशिश भी की, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. जब उस ने कोशिश करने में जरा भी कसर नहीं रखी, तो वह कैसे अपनेआप को दोष दे.

पुलिस स्टेशन के सामने बस रुक गई, तो लक्ष्मी उतर गई. काफी परेशानी के बाद उसे श्रीनिवास से मिलने की इजाजत मिली.

श्रीनिवास एक आरामदेह कमरे में था. लक्ष्मी ने देखा कि वह हमेशा की तरह शांत है. वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘मेरी लक्ष्मी, मुझे दुख है कि मैं ने तुम्हें तकलीफ पहुंचाई है. चिंता मत करो, कुछ ही दिनों में मैं छूट जाऊंगा.’’

‘‘क्या तुम्हें इस बात का दुख नहीं है कि तुम ने एक आदमी की जान ली है?’’ लक्ष्मी ने पूछा.

‘‘हां, एक इनसान के नाते मुझे दुख है, लेकिन वह आदमी संस्कृति की रक्षा में बाधक था.’’

‘‘तुम अपने नजरिए से ऐसा समझते हो. हो सकता है कि वह अपने नजरिए से समाज के एक हिस्से के लिए कुछ करने की कोशिश कर रहा हो.’’

‘‘बिलकुल हो सकता है, लेकिन वह हमारे सपनों के देश को बनाने में रोड़ा बन रहा था.’’

‘‘ओह श्रीनिवास, तुम सिर्फ अपने नजरिए से ऐसा समझते हो. मैं तुम्हारा नजरिया समझती हूं. तकलीफ मुझे इस पर होती है कि मैं तुम्हारे किसी काम न आ सकी,’’ लक्ष्मी की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मेरी अच्छी लक्ष्मी, तुम गलत कहती हो. तुम हमेशा से मेरी प्रेरणा रही हो. दुखदर्द में तुम ने मुझे बहुत सहारा दिया है. लेकिन लक्ष्मी, तुम्हारा प्रेम और त्याग भी मेरे आदर्शों की भूख न मिटा सके. मैं इतना जिद्दी न होता और मेरे विचार दूसरी ही दिशा में मुड़ जाते. तुम चिंता न करो, मैं जल्दी ही छोड़ दिया जाऊंगा.

‘‘कुछ भी हो लक्ष्मी, अपने बच्चे को अब उसी रास्ते पर ले जाना है. उसे अपनेआप को समझने में मदद देनी है. यह याद रखना कि मैं ने हमेशा तुम्हारे प्रेम और त्याग की कद्र की है. आज भी मेरे साथ तुम्हारी मीठी यादें हैं, मेरे साथ वे पल हैं, जिन में मुझे रोशनी मिली थी, इसलिए कभी हिम्मत मत खोना.’’

लक्ष्मी सब्र के साथ कानून के फैसले का इंतजार करती रही. श्रीनिवास के खिलाफ गवाह नहीं मिले.

फैसला होने का दिन नजदीक आ रहा था. लक्ष्मी के गर्भ के दिन भी पूरे हो रहे थे. जिस दिन सुबह श्रीनिवास का फांसी पर फैसला आने वाला था, ठीक उसी समय, उसी दिन, लक्ष्मी ने एक बेटे को जन्म दिया. वह उस के नन्हे से मुख की तरफ एकटक देखती रही. उस की आंखों में भी उसे वही आग नजर आई, जो श्रीनिवास की आंखों में जला करती है. उसे लगा कि यह भी श्रीनिवास बनेगा.

तभी खबर आई कि कोर्ट ने गवाहों की कमी के आधार पर श्रीनिवास को बरी कर दिया था, पर जब वह बाहर आ रहा था, तब एक आदमी ने उसे माला पहनाई और तभी एक बम धमाका हुआ. वह आदमी और श्रीनिवास दोनों वहीं मारे गए.

लक्ष्मी ने अपने बेटे की तरफ देखा और सोचा कि उस का श्रीनिवास तो फिर से उस के पास आया है, पर उस ने ठान लिया कि वह जिंदगी को नए सिरे से नई दिशा की ओर मोड़ देगी और इस श्रीनिवास को संस्कृति के बहके नारों की ओर नहीं जाने देगी.

समय के साथ : बेशर्म भोलाराम ने क्यों शहर भेजी अपनी बेटियां

Social Story in Hindi: रामलाल की सचिवालय में चपरासी की ड्यूटी थी. वह अपने परिवार के साथ मंत्रीजी के बंगले पर ही रहता था. जब वह सरकारी नौकरी में लगा था, तब गांव में उस की 2 बीघा जमीन थी और एक छोटा सा टूटाफूटा घर था, मगर आज 50 बीघा जमीन और 2-2 आलीशान मकान हैं. तीजत्योहार के अलावा शादीब्याह में जब रामलाल अपनी शानदार कार से बीवीबच्चों के साथ गांव में आता है, तब उसे देख कर कोई यह कह नहीं सकता कि वह चपरासी है. उस के बीवीबच्चों के कीमती कपड़ों को देख कर लोग यही समझते हैं कि वे सब किसी बड़े सरकारी अफसर के परिवार वाले हैं. एक बार रामलाल गांव में अपने फार्महाउस पर था, तभी वहां पर किसी गांव के बड़े सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी करने वाला उस के गांव का भोलाराम आया.

भोलाराम बोला, ‘‘रामलालजी, हम लोग एक ही समय पर सरकारी नौकरी में लगे थे, मगर तुम आज कहां से कहां पहुंच गए और मैं गरीब चपरासी ही रह गया हूं. तुम्हारी इस तरक्की के बारे में मुझे भी कुछ बताओ भाई.’’

‘‘मेरी तरक्की का राज यही?है कि मैं सचिवालय में नौकरी करते हुए समय के साथ चलने लगा था और तुम गांव में ही रह कर अपनी पुरानी दकियानूसी बातों के कारण यह फटेहाल जिंदगी बिता रहे हो…

‘‘मैं ने अपनी दोनों बेटियों को शहर में खूब पढ़ायालिखाया और तुम ने अपनी बेटियों को घर में ही बिठा रखा है. अगर वे शहर में पढ़तीं, तो आज अच्छी नौकरियां कर रही होतीं. मेरी एक बेटी अब तहसीलदार होने वाली है और दूसरी बेटी कलक्टर,’’ रामलाल ने उसे अपनी तरक्की का राज बताया, तो भोलाराम उस से बोला, ‘‘तो मुझे भी अब अपनी दोनों बेटियों के लिए क्या करना चाहिए?’’

‘‘तुम अपनी दोनों बेटियों को हमारे साथ शहर भेज दो. मेरी दोनों बेटियां उन्हें कुछ ऐसा सिखा देंगी कि उन की और तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी.

कुछ ही दिनों में वे उन्हें ऐसा बदल देंगी कि उन्हें देख कर तुम यह कह ही नहीं पाओगे कि वे दोनों तुम्हारी ही बेटियां हैं…’’

रामलाल की इन बातों को सुन कर भोलाराम ने अपनी दोनों बेटियों को उन के साथ भेजने की हां कर दी.

भोलाराम ने अपने घर जा कर ये सभी बातें अपनी बीवी सावित्री को बताईं, तो वह उस से बोली, ‘‘शहर में जा कर हमारी दोनों बेटियां कहीं शहर की लड़कियों की तरह मौजमस्ती करने न लग जाएं?’’

‘‘मौजमस्ती तो हमारी ये दोनों बेटियां अपने गांव में रहते हुए भी कर रही हैं. कहने को उन की उम्र 16 और 18 साल है, लेकिन अभी से उन में आवारा लड़कों के साथ मजे लेने की आदत पड़ चुकी है.’’

सावित्री बोली, ‘‘तुम अपनी बेटियों के बारे में यह सब क्यों कह रहे हो?’’

‘‘कुछ दिन पहले जब मैं दोपहर में अपने खेतों पर गया था, तब बाजरे के खेतों में हमारी ये दोनों बेटियां उषा और शर्मिला बिलकुल नंगधड़ंग हो कर गांव के 2 लड़कों के साथ वही सब कर रही थीं, जो पति अपनी पत्नी के साथ करता है. मैं ने ये सब बातें तुम्हें इसलिए नहीं बताईं कि सुन कर तुम्हें दुख होगा.’’

सावित्री यह सुन कर दंग रह गई.

भोलाराम उस से बोला, ‘‘हमारी दोनों बेटियों को लड़कों के साथ सोने का चसका लग गया है. अगर वे किसी के साथ घर से भाग गईं, तो इस से हमारी गांव में इतनी बदनामी होगी कि हम लोग किसी को मुंह दिखाने नहीं रहेंगे, इसलिए उन्हें रामलाल के साथ शहर भेज देते हैं.’’

सावित्री बोली, ‘‘लेकिन, रामलाल के बारे में हमारी पड़ोसन माला कह रही थी कि वह अपनी लड़कियों को मंत्रीअफसरों के अलावा ठेकेदारों के साथ सुलाता है, तभी तो आज वह उन की कमाई से इतना पैसे वाला बना है. जब उस की दोनों बेटियां छोटी थीं, तब वह अपनी बीवी रीना को उन के साथ सुलाता था.’’

‘‘अपनी बीवी और बेटियों को पराए मर्दों के साथ सुला कर रामलाल ने आज अपनी हैसियत बना ली है. वे सभी लोग आज ऐशोआराम की जिंदगी जी रहे हैं और हम लोग अपनी दकियानूसी बातों के चलते गांव में ऐसी फटेहाल जिंदगी बिता रहे हैं…’’ भोलाराम थोड़ा रुक कर बोला, ‘‘हमें भी अब रामलाल की तरह समय के साथ चलना चाहिए. हमारी दोनों बेटियां गांव के लड़कों को मुफ्त में ही अपनी जवानी के मजे दे रही हैं.

‘‘अगर ये दोनों शहर में मंत्रीअफसरों व ठेकेदारों को मजे देंगी, तो हम लोग भी रामलाल की तरह पैसे वाले हो जाएंगे और फिर उन दोनों की अच्छे घरों में शादियां कर देंगे. आजकल लोग आदमी का किरदार नहीं, बल्कि उस की हैसियत देखते हैं.’’

सावित्री ने अपनी दोनों बेटियों को रामलाल के साथ शहर भेजने का मन बना लिया.

शहर भेजने की ये बातें जब उन की दोनों बेटियों ने सुनी, तो वे खुशी से झूम उठीं.

सावित्री ने उन दोनों को खुल कर कह दिया, ‘‘यहां पर तुम दोनों बहनें बाजरे के खेतों में चोरीछिपे लड़कों के साथ सोती हो, लेकिन शहर में पैसे कमाओगी. लेकिन जरूरी उपाय करना मत भूलना.’’

दोनों बहनें मन ही मन सोच रही थीं कि बाजरे के खेत में तो किसी के आने के डर से वे पूरे मजे नहीं ले पाती थीं. उन्हें हमेशा यह डर लगा रहता था कि कभी कोई वहां पर आ कर उन्हें देख न ले. शहर में तो एसी लगे कमरे होते हैं, वहां पर किसी के आने का उन्हें डर भी नहीं रहेगा.

जब वे दोनों बहनें रामलाल और उस के परिवार के साथ उन की एसी कार में बैठीं, तो एसी की ठंडीठंडी हवा खाते हुए उन्हें कब नींद आ गई, पता नहीं लगा.

रामलाल की बेटियों में से एक ने ही उन्हें जगा कर कहा, ‘‘अब शहर आने वाला है. वहां के एक मौल से तुम्हारे लिए कुछ ढंग के कपड़े लेने हैं, जिन्हें पहन कर तुम दोनों बहनें खूबसूरत लगोगी.’’

जब वे लोग शहर पहुंचे, तो एक बड़े से मौल में उन दोनों के लिए ढंग के कपड़े खरीदे गए. वहीं पर उन के बाल सैट करा कर उन्हें वे कपड़े पहनाए गए. आईने में खुद को देख कर वे दोनों बहनें बड़ी इतरा रही थीं.

जब वे दोनों रामलाल के घर आईं, तो मंत्रीजी भी उन्हें देख कर चौंक गए. उन दोनों को नहला कर मैकअप करा कर जब रामलाल की बेटी उन्हें मंत्रीजी के कमरे में छोड़ने गई, तो मंत्रीजी भूखे भेडि़ए की तरह उन पर झपट पड़े थे.

कुछ ही देर में मंत्री के साथ भी वही हुआ, जो बाजरे के खेत में उन लड़कों से होता?था. मंत्री की तो खुशी की कोई सीमा ही नहीं थी. उन्होंने कुछ दिन बाद दोनों बहनों को एक ठेकेदार से एक लाख रुपए दिलवा दिए.

अपनी दोनों बेटियों की एक लाख रुपए की कमाई देख कर भोलाराम तो खुशी से पागल ही हो गया था.

भोलाराम ने भी अब समय के साथ चलना सीख लिया था, पर उसे यह नहीं मालूम था कि यह मौज कितने दिन चलेगी. जैसे ही लड़कियों में कुछ बीमारी हुई नहीं या और दूसरी जवान लड़कियां दिखी नहीं कि वे वापस गांव में नजर आएंगी.

गोलियों की तड़तड़ाहट : भारी पड़ी सिरफिरे से आशिकी

Crime News in Hindi: दिल्ली (Delhi) से सटे गाजियाबाद (Gaziabad) में हिंडन नदी (Hindon River) किनारे स्थित साईं उपवन बड़ा ही रमणीक स्थल है. यहां पर साईंबाबा का प्रसिद्ध मंदिर है. 25 मार्च, 2019 सोमवार को सुबह का वक्त था. श्रद्धालुजन साईं मंदिर (Sai Temple) में आते जा रहे थे. उसी समय लाल रंग की स्कूटी से गोरे रंग की खूबसूरत युवती और एक स्मार्ट या दिखने वाला युवक वहां पहुंचे. स्कूटी को उपवन परिसर के बाहर एक ओर खड़ी कर वे दोनों मंदिर में प्रवेश कर गए. कोई 10 मिनट के बाद जब वे दोनों साईंबाबा के दर्शन कर के बाहर निकले तो उन के चेहरे खिले हुए थे. यह हसीन जोड़ा आसपास से गुजरने वाले लोगों की नजरों का आकर्षण बना हुआ था. लेकिन उन दोनों को लोगों की नजरों की रत्ती भर भी परवाह नहीं थी. वे अपनी ही दुनिया में मशगूल थे.

जैसे ही दोनों बाहर निकले वह रमणीक इलाका गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंज उठा. किसी की समझ में कुछ नहीं आया. तभी वहां मौजूद लोगों को एक आदमी युवकयुवती की लाशें बिछा कर तेजी से लिंक रोड की तरफ भागता हुआ दिखाई दिया. लोगों ने देखा कि लाशें उसी नौजवान खूबसूरत जोड़े की थीं, जो अभीअभी वहां से हंसतेमुसकराते हुए मंदिर से बाहर निकला था. इसी दौरान किसी ने इस सनसनीखेज घटना की सूचना 100 नंबर पर गाजियाबाद पुलिस को दे दी.

थोड़ी ही देर में सिंहानी गेट के थानाप्रभारी जयकरण सिंह पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. मंदिर परिसर के अंदर लाल सूट पहने एक युवती और एक युवक की रक्तरंजित लाशें औंधे मुंह पड़ी थीं. जयकरण सिंह ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया.

युवकयुवती के कपड़े खून से सने थे. वहां पर काफी लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी. जयकरण सिंह ने उन की नब्ज टटोली, लेकिन उन की सांसें उन का साथ छोड़ चुकी थीं. उन्होंने जल्दी से क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला कर घटनास्थल की फोटोग्राफी करवाई और वहां उपस्थित चश्मदीदों से इस घटना के बारे में पूछताछ करनी शुरू की.

कुछ लोगों ने बताया कि मृतक युवती और युवक कुछ ही देर पहले लाल स्कूटी से एक साथ मंदिर आए थे, जब दोनों साईं बाबा के दर्शन करने के बाद बाहर निकल रहे थे, तभी पहले से घात लगाए हत्यारे ने इस वारदात को अंजाम दे दिया.

पुलिस ने जब दोनों लाशों की शिनाख्त कराने की कोशिश की तो भीड़ ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया. यह देख इंसपेक्टर जयकरण सिंह ने आरटीओ औफिस से उस लाल रंग की स्कूटी का विवरण मालूम किया, जिस से वे आए थे. आरटीओ औफिस से मृतका की शिनाख्त प्रीति उर्फ गोलू, निवासी विजय विहार (गाजियाबाद) के रूप में हुई.

तय हो गई थी शादी

पुलिस द्वारा सूचना मिलने पर थोड़ी देर में युवती के घर वाले भी रोतेबिलखते हुए घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने युवती की शिनाख्त के साथसाथ युवक की भी शिनाख्त कर दी. मृतक सुरेंद्र चौहान उर्फ अन्नू था. उन्होंने यह जानकारी भी दी कि उन की बेटी प्रीति और सुरेंद्र चौहान बहुत जल्द परिणय सूत्र में बंधने वाले थे. सुरेंद्र के मातापिता भी इस रिश्ते के लिए राजी थे.

घटनास्थल की जांच के दौरान वहां पर पौइंट 9 एमएम पिस्टल के कुछ खोखे और मृतका प्रीति की लाल रंग की स्कूटी बरामद हुई, जिसे पुलिस टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मृतका के पिता प्रमोद कुमार से युवक सुरेंद्र चौहान के पिता खुशहाल सिंह के बारे में जानकारी मिल गई. पुलिस ने उन्हें भी इस दुखद घटना के बारे में बता दिया. इस के बाद खुशहाल सिंह भी अपने परिजनों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.

चूंकि दोनों लाशों की शिनाख्त हो चुकी थी, लिहाजा थानाप्रभारी ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाशें पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दीं.

25 मार्च को ही मृतका प्रीति के पिता प्रमोद कुमार की शिकायत पर इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा कोतवाली सिंहानी गेट में अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

इस केस की आगे की तफ्तीश थानाप्रभारी जयकरण सिंह ने खुद संभाली. उन्होंने इस घटना के बारे में एसपी श्लोक कुमार और सीओ सिटी धर्मेंद्र चौहान को भी अवगत करा दिया.

एसएसपी उपेंद्र कुमार अग्रवाल ने इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए एसपी श्लोक कुमार के निर्देशन और सीओ धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी जयकरण सिंह के साथ इंसपेक्टर (क्राइम ब्रांच) राजेश कुमार, एसआई श्रीनिवास गौतम, हैडकांस्टेबल राजेंद्र सिंह, माइकल बंसल, कांस्टेबल अशोक कुमार, संजीव गुप्ता, सेगेंद्र कुमार, संदीप कुमार और गौरव कुमार को शामिल किया गया.

जांच टीम ने एक बार फिर साईं उपवन पहुंच कर वहां के लोगों से घटना के बारे में पूछताछ शुरू की तो पता चला कुछ लोगों ने एक लंबी कदकाठी के आदमी को वहां से भागते हुए देखा था. वह अधेड़ उम्र का आदमी था जो कुछ दूरी तक भागने के बाद वहां खड़ी एक कार में सवार हो कर फरार हो गया था.
हालांकि मंदिर परिसर में 8 सीसीटीवी कैमरे लगे थे लेकिन दुर्भाग्यवश सभी खराब थे. मृतका के पिता प्रमोद कुमार ने बताया कि प्रीति सुबह 7 बजे ड्यूटी पर जाने के लिए निकली थी. वह वसुंधरा के वनस्थली स्कूल के यूनिफार्म स्टौल पर नौकरी करती थी.

उस के काम पर चले जाने के बाद वह बुलंदशहर जाने वाली बस में सवार हो गए थे. अभी उन की बस लाल कुआं तक ही पहुंची थी कि उन्हें मोबाइल फोन पर प्रीति को गोली मारे जाने का दुखद समाचार मिला. जिसे सुनते ही वह फौरन घटनास्थल पर आ गए थे.

पिता ने बताई उधार की कहानी

प्रमोद कुमार से पूछताछ के बाद पुलिस ने मृतक सुरेंद्र चौहान के पिता खुशहाल सिंह को भी कोतवाली बुला कर उन से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि उन के बेटे की हत्या में कल्पना नाम की औरत का हाथ हो सकता है. दरअसल, सुरेंद्र का गाजियाबाद के ही प्रताप विहार में शीशे के सामान का कारोबार था, इसी कारोबार के लिए सुरेंद्र ने कुछ समय पहले कल्पना से कुछ रुपए उधार लिए थे. कल्पना रुपए वापस करने के लिए लगातार तकादा कर रही थी.

चूंकि सुरेंद्र के पास उसे देने लायक पैसे इकट्ठे नहीं हुए थे. इसलिए वह कल्पना को कुछ दिन तक और रुकने को कह रहा था. 2 दिन पहले शनिवार के दिन भी कल्पना उन के घर पर अपने रुपए लेने आई थी, इस दौरान कल्पना ने गुस्से में आ कर सुरेंद्र को बहुत बुराभला कहा था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस टीम इस हत्याकांड की गुत्थी को सुलझाने के लिए उन तमाम पहलुओं पर विचारविमर्श करने लगी, जिस पर आगे बढ़ कर हत्यारे तक पहुंचा जा सकता था. इस में पहला तथ्य घटनास्थल पर मिले पौइंट 9 एमएम पिस्टल से फायर की गई गोलियों के खोखे थे. इस प्रकार के पिस्टल का इस्तेमाल आमतौर पर पुलिस अधिकारी करते हैं. यह सुराग इस तथ्य की ओर इशारा कर रहा था कि हत्यारे का कोई न कोई संबंध पुलिस डिपार्टमेंट से है.

दूसरा तथ्य मृतक सुरेंद्र उर्फ अन्नू के पिता खुशहाल सिंह के अनुसार उन के बेटे को कर्ज देने वाली औरत कल्पना से जुड़ा था. तीसरा सिरा मृतका प्रीति और उस के मंगेतर सुरेंद्र की बेमेल उम्र से ताल्लुक रखता था.

दरअसल प्रेमी सुरेंद्र की उम्र अभी केवल 26 साल थी जबकि उस की प्रेमिका प्रीति की उम्र 32 साल थी. इसलिए यहां इस बात की संभावना थी कि उन के बीच उम्र का यह फासला उन के परिवार के लोगों में से किसी सदस्य को पसंद नहीं आ रहा हो और आवेश में आ कर उस ने इस घटना को अंजाम दे दिया हो.
इस के अलावा एक और भी महत्त्वपूर्ण बिंदु था, जिसे कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था. प्रीति उर्फ गोलू की उम्र अधिक थी. यह भी संभव था कि उस के प्रेम संबंध पहले से किसी और युवक के साथ रहे हों. पहले प्रेमी को पता चल गया हो कि प्रीति की शादी सुरेंद्र चौहान से हो रही है. संभव था कि उस ने प्रीति को सबक सिखाने के लिए सुरेंद्र का काम तमाम कर दिया.

चूंकि वारदात के समय उस के साथ उस का मंगेतर सुरेंद्र चौहान भी था, इसलिए गुस्से से बिफरे पहले प्रेमी ने उस को भी मार डाला हो. बहरहाल इन तमाम बिंदुओं पर विचार विमर्श कर के पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंचने के प्रयास में जुटी थी.

पुलिस टीम ने 27 मार्च को एक बार फिर दोनों के परिवार के पुरुष और महिला सदस्यों तथा वारदात के वक्त साईं उपवन में मौजूद चश्मदीदों को बुला कर पूछताछ की. साथ ही प्रीति और सुरेंद्र के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा कर उन की गहन जांच की.

इस जांच में चौंकाने वाली बातें सामने आईं. प्रीति के पिता प्रमोद कुमार ने बताया कि उन का एक रिश्तेदार दिनेश कुमार दिल्ली ट्रैफिक पुलिस में एएसआई के पद पर तैनात है. उस का चौहान परिवार के घर पर काफी आनाजाना था. लेकिन जिस दिन यह दोहरा हत्याकांड हुआ उस दिन के बाद वह बुलाए जाने के बावजूद वारदात वाली जगह पर नहीं आया था. और तो और प्रीति के अंतिम संस्कार में भी वह शामिल नहीं हुआ था.

यह बात प्रमोद कुमार और उन के परिवार के सदस्यों को बहुत अटपटी लगी थी. जब पुलिस ने उन से डिटेल्स में बात की तो प्रमोद कुमार ने अपने मन की सब बातें विस्तार से बता दीं. जिन्हें सुनते ही पुलिस टीम ने दिल्ली पुलिस में ट्रैफिक विभाग में तैनात एएसआई दिनेश कुमार से पूछताछ करने का मन बना लिया. चूंकि घटनास्थल पर पौइंट 9 एमएम पिस्टल के खाली खोखे मिले थे, जिस की वजह से भी वारदात में किसी पुलिस वाले के शामिल होने का शक था, इसलिए अब एएसआई दिनेश कुमार से पूछताछ करना बेहद जरूरी हो गया था.

पुलिस वाला आया शक के घेरे में

थानाप्रभारी जयकरण सिंह ने एएसआई दिनेश कुमार से संपर्क करने की कोशिश की मगर कामयाब नहीं हुए. आखिरकार 30 मार्च की सुबह एक मुखबिर की सूचना पर उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया. जब उस से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ शुरू की गई तो उस ने जो कुछ बताया उस से रिश्तों में उलझी एक सनसनीखेज कहानी उभर कर सामने आई.

प्रमोद कुमार अपने परिवार के साथ गाजियाबाद के विजय विहार में रहते हैं. उन के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटियां थीं. वह बड़ी बेटी के हाथ पीले कर चुके थे. दूसरी बेटी प्रीति उर्फ गोलू और उस से छोटी बेटी अभी पढ़ाई कर रही थी. 22 वर्षीय प्रीति मिलनसार स्वभाव की थी. वह जिंदगी के हर एक पल का पूरा लुत्फ उठाने में विश्वास रखती थी.

बड़ी बेटी की शादी के एक साल बाद प्रमोद कुमार ने प्रीति के भी हाथ पीले कर देने की सोची. उन्होंने उस के लिए कई जगह रिश्ते की बात चलाई, मगर आखिर अपनी हैसियत के अनुसार मौके पर प्रीति किसी न किसी बहाने से शादी करने से इनकार कर देती थी.

प्रीति का अपनी बड़ी बहन के घर काफी आनाजाना था. अपने हंसमुख स्वभाव की वजह से वह बहन की ससुराल में भी काफी घुलमिल गई थी. उस के जीजा का जीजा दिनेश कुमार दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल था. दिनेश मूल रूप से उत्तर प्रदेश के पिलखुआ का रहने वाला था. उस की पत्नी और बच्चे पिलखुआ में ही रहते थे. दिनेश जब भी रमेश के घर आता वह प्रीति से खूब बातेें करता था. बला की हसीन और दिलकश प्रीति की चुलबुली मीठी बातें सुन कर वह भावविभोर हो जाता था.

प्रीति को भी दिनेश से बातें करने में खुशी मिलती थी. वह उस समय उम्र के उस पड़ाव पर भी पहुंच गई थी, जहां एक मामूली सी चूक भविष्य के लिए नासूर बन जाती है. लेकिन इस समय प्रीति या उस की बहन सीमा ने इन बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी.

धीरेधीरे प्रीति की जिंदगी में दिनेश का दखल बढ़ने लगा. अब वह प्रीति से उस के गाजियाबाद स्थित घर पर भी मिलने आने लगा था. इतना ही नहीं जब कभी प्रीति या उस के परिवार में अधिक रुपयों की जरूरत होती वह अपनी ओर से आगे बढ़ कर उन की मदद करता था.

प्रीति के पिता प्रमोद कुमार भी दिनेश कुमार के बढ़ते अहसानों के बोझ तले इतने दब चुके थे कि दिनेश के रुपए वापस करना उन के वश के बाहर हो गया. दिनेश कुमार ये रुपए प्रीति के घर वालों को यूं ही उधार नहीं दे रहा था.

रिश्तों में सेंध

दरअसल दिनेश कुमार अपनी उम्र से लगभग आधी उम्र की प्रीति के ऊपर न केवल पूरी तरह से फिदा था बल्कि उस के साथ उस के शारीरिक संबंध भी स्थापित हो चुके थे. वह प्रीति को किसी न किसी बहाने से अपने साथ घुमाने ले जाता था, जहां दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते थे.

समय का पहिया अपनी गति से आगे बढ़ता रहा, दिनेश कुमार सन 1994 में कांस्टेबल के पद पर दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. सन 2008 में उस का प्रमोशन हेड कांस्टेबल के पद पर हो गया. इस के 8 साल बाद एक बार फिर उस का प्रमोशन हुआ और वह एएसआई बन गया. इन दिनों वह ट्रैफिक विभाग में सीमापुरी सर्कल में तैनात था.

प्रीति के साथ जिस सुरेंद्र कुमार नाम के युवक की जान गई थी, वह मूलरूप से उत्तराखंड का रहने वाला था. उस के पिता खुशहाल सिंह सेना में रह चुके थे. रिटायरमेंट के बाद वह अपने गांव में सेटल हो गए. 2 बेटों के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. सब से बड़ा बेटा सुधीर हरिद्वार में रहता था. वह अपनी दोनों बेटियों की शादी कर चुके थे और इन दिनों एक पोल्ट्री फार्म चला रहे थे.

करीब 2 साल पहले उन का छोटा बेटा सुरेंद्र कुमार उर्फ अन्नू उत्तराखंड से गाजियाबाद आ गया था और प्रताप विहार में शीशे का बिजनैस करने लगा था. 2 साल तक अथक मेहनत करने के बाद आखिर उस का काम चल निकला. इस के बाद उस ने अपने मातापिता को भी अपने पास बुला लिया था. कुछ ही महीने पहले उस की मुलाकात प्रीति उर्फ गोलू से हुई थी. पहली ही मुलाकात में दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे थे.

सुरेंद्र से मुलाकात होने के बाद प्रीति फोन से सुरेंद्र से अकसर बात करती रहती थी. दिन गुजरने लगे उन के प्यार का रंग गहरा होता चला गया. कुछ दिनों के बाद सुरेंद्र और प्रीति का प्यार ऐसा परवान चढ़ा कि दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया. प्रीति के घर वाले इस के लिए राजी हो गए थे. शादी की बात तय हो जाने पर दोनों प्रेमी खुश हुए. हालांकि प्रीति की उम्र सुरेंद्र से करीब 6 साल ज्यादा थी मगर दोनों में से किसी को इस पर जरा भी एतराज नहीं था.

प्रीति सुरेंद्र के साथ शादी के लिए तो दिलोजान से रजामंद थी किंतु उस के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि दिनेश के साथ उस के विगत कई सालों से जो प्रेमिल संबंध थे उन से निकलना आसान नहीं था.

वजह यह कि दिनेश कुमार किसी भी हालत में उस की शादी किसी और से नहीं होने देना चाहता था.
प्रीति को अपने काबू में रखने के लिए उस ने उस की हर जायजनाजायज मांगें पूरी की थीं. हाल ही में उस ने प्रीति के पिता को 3 लाख रुपए उधार भी दिए थे. एएसआई दिनेश कुमार के बयान कितने सच और कितना झूठ है यह तो पुलिस की जांच के बाद पता चलेगा. परंतु इतना तय है कि प्रीति के घर में उस का इतना दखल था कि वह बेधड़क जब चाहे तब उस के घर आ जा सकता था.

प्रीति और सुरेंद्र के बीच जब से प्यार का सिलसिला शुरू हुआ था तब से प्रीति ने एएसआई दिनेश से मिलनाजुलना कम कर दिया था. पहले तो दिनेश कुमार प्रीति और सुरेंद्र के प्यार से अनजान था, लेकिन 4-5 दिन पहले जब प्रीति ने उस का फोन रिसीव करना बंद कर दिया तो वह सोच में पड़ गया.

दिल्ली पुलिस में 25 सालों से नौकरी कर रहे एएसआई दिनेश कुमार को यह समझने में देर नहीं लगी कि मामला बेहद गंभीर है. फिर भी उस ने किसी तरह प्रीति को फोन कर के उस से बातें करने की कोशिश जारी रखी. लेकिन 2 दिन पहले प्रीति ने दिनेश कुमार के लगातार आने वाले फोन से परेशान हो कर अपने मोबाइल फोन का सिम बदल लिया.

मामला बिगड़ता देख एएसआई दिनेश कुमार समझ गया कि प्रीति किसी कारण उस से संबंध तोड़ने पर आमादा है. जिस के फलस्वरूप उस ने प्रीति को सबक सिखाने की ठान ली. 24 मार्च, 2019 को दिनेश की रात की ड्यूटी थी.

25 मार्च की सुबह अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद वह शाहदरा निवासी अपने दोस्त पिंटू शर्मा के पास गया. उस की मारुति स्विफ्ट कार पर सवार हो कर वह प्रीति के घर जा पहुंचा. कार पिंटू शर्मा चला रहा था. प्रीति के घर पहुंच कर जब उसे पता चला कि प्रीति साईं उपवन मंदिर गई है तो वह उस का पीछा करता हुआ वहां भी पहुंच गया.

अचानक की गईं दोनों की हत्याएं

उधर साईं मंदिर में दर्शन करने के बाद जैसे ही प्रीति और सुरेंद्र अपने जूतों की ओर बढ़े, तभी एएसआई दिनेश कुमार प्रीति से बातें करने के लिए आगे बढ़ा. उस ने प्रीति को अपनी ओर बुलाया मगर प्रीति ने उस की ओर देख कर अपनी नजरें फेर लीं.

यह देख दिनेश कुमार की त्यौरियां चढ़ गईं. वह आगे बढ़ा और प्रीति का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचने लगा, मगर प्रीति ने उस का हाथ झटक दिया. प्रीति की यह बात एएसआई दिनेश कुमार को बहुत बुरी लगी. तभी उस ने अपना सर्विस पिस्टल निकाला और प्रीति के ऊपर फायर कर दिए.

प्रीति को खतरे में देख कर सुरेंद्र उसे बचाने के लिए दौड़ा तो दिनेश ने उस के भी सीने में 3 गोलियां उतार दीं. इस के बाद वह बाहर स्विफ्ट कार में इंतजार कर रहे पिंटू शर्मा के साथ वहां से फरार हो गया.
गाजियाबाद पुलिस की नजरों से बचने के लिए 5 दिनों तक दिनेश कुमार अपने रिश्तेदारों के घर छिपा रहा. दिनेश की गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने शाहदरा से इस हत्याकांड में शामिल रहे उस के दोस्त पिंटू को भी गिरफ्तार कर लिया.

वारदात में प्रयोग की गई एएसआई दिनेश कुमार की सर्विस पिस्टल, 3 जीवित कारतूस तथा स्विफ्ट कार भी गाजियाबाद पुलिस ने बरामद कर ली. 2 अप्रैल, 2019 को दिल्ली पुलिस ने भी एएसआई दिनेश कुमार को उस के पद से बर्खास्त कर दिया.

मेरी पत्नी सैक्स के लिए काफी एक्साइटेड रहती है लेकिन मैं उसे समय नहीं दे पाता, क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 33 वर्ष है. अच्छी प्राइवेट जौब में हूं. काफी बिजी शैड्यूल है मेरा पूरे दिन का. शादी हुए एक साल हो गया है. घर की सारी जिम्मेदारी पत्नी संभालती है. मेरी समस्या यह है कि औफिस से घर रोज डेढ़ घंटे की ड्राइव कर के पहुंचता हूं. काफी थक जाता हूं. जी करता है बस सो जाऊं. दूसरी तरफ पत्नी रात को सैक्स के लिए काफी एक्साइटेड रहती है.

यही नहीं, वह चाहती है कि पहले हम फोरप्ले करें. उस के बाद इंटरकोर्स. जबकि, थकावट के कारण मैं फोरप्ले न कर इंटरकोर्स कर के सो जाता हूं. अब देख रहा हूं कि पत्नी कुछ मायूस सी रहती है. मुझ से कोई शिकायत तो नहीं करती पर कहती है कि सो जाओ, थक गए हो. मुझे उस का ऐसा कहना अच्छा नहीं लगता. उसे मेरी प्रौब्लम समझनी चाहिए. फोरप्ले करना ऐसा क्या जरूरी है, सैक्स तो हम करते ही हैं न. उस का यों मुंह फुला कर रहना मुझे अच्छा नहीं लगता क्योंकि रूठनामनाना मुझे पसंद नहीं. अभी तो शादी हुए महज एक ही साल हुआ है, पता नहीं आगे की लाइफ कैसे कटेगी?

जवाब

आप ने अपने लिए प्रौब्लम खुद ही खड़ी की है. आप कह रहे हैं कि आप की पत्नी को आप की प्रौब्लम समझनी चाहिए तो वह समझ रही है, तभी तो आप से कोई शिकायत नहीं कर रही है. मायूस और मुंह फुला कर इसलिए रह रही है क्योंकि आप उसे सम झने की कोशिश नहीं कर रहे हैं. उसे आप के थोड़े से टाइम की जरूरत है जो आप से नहीं मिल पा रहा. लेकिन आप की अपनी मजबूरी है जो पत्नी भी समझती है.

दूसरी बात, आप का यह कहना कि फोरप्ले उस के लिए ऐसा क्या जरूरी है, बिलकुल गलत है. चाहे आदमी हो या औरत, सैक्स एंजौय करना इंटिमैसी के लिए बहुत जरूरी है. लेकिन कई बार आदमियों के लिए सैक्स का मतलब सिर्फ पेनिट्रेशन होता है लेकिन डायरैक्ट पेनिट्रेशन औरतों के लिए पेनफुल साबित हो सकता है. इसलिए बेहतर सैक्स के लिए बहुत जरूरी होता है फोरप्ले यानी सैक्स करने से पहले एकदूसरे को उत्तेजित करने वाली क्रियाएं. ऐसा देखा गया है कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में देर से उत्तेजित होती हैं, इसलिए सैक्स से पहले उन के पार्टनर की जिम्मेदारी है कि फोरप्ले जरूर करें ताकि उन्हें अच्छा महसूस हो.

आप के रिश्ते को बेहतर बनाने के लिए सैक्स जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी फोरप्ले भी है. जब आप और आप के पार्टनर एकदूसरे को छेड़ते हैं, चूमते हैं तो आप दोनों एकदूसरे के प्रति ज्यादा आकर्षित महसूस करने लगते हैं. कई बार ऐसा कहा जाता है कि सैक्स से ज्यादा जरूरी फोरप्ले होता है.

इसलिए अपने बिजी शैडयूल से, कैसे भी हो, अपनी पत्नी के लिए समय निकालिए. पतिपत्नी के बीच ये दूरियां ही कभीकभी रिश्ते को समाप्ति के कगार पर ले आती हैं. आप यह गलती न करें. इस समस्या का समाधान आप के हाथों में ही है. इस बारे में आप ज्यादा मत सोचिए और आज से ही इस की शुरुआत करें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

क्यों बड़ी उम्र के मर्दों की तरफ आकर्षित होती हैं लड़कियां?

Society News in Hindi: कार्यालय में चर्चा का बाजार कुछ ज्यादा ही गरम था. पता चला कि नेहा ने अपने से उम्र में 15 साल बड़े अधिकारी प्रतीक से विवाह रचा लिया है. एक हफ्ते बाद जब नेहा से मुलाकात हुई तो वह बेहद खुश नजर आ रही थी. अपने से ज्यादा उम्र के व्यक्ति से विवाह (Marriage) करने की कोई लाचारी या बेचारगी का भाव उस के चेहरे पर नहीं था. चूंकि उन के बीच चल रहे संबंधों (Relations) की चर्चा पहले से होती थी, सो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ. ऐसे एक नहीं अनेक किस्सों को हम हकीकत में बदलते देखते हैं. विशेषकर कार्यक्षेत्र में तो यह स्थिति अधिक देखने को मिलती है कि लड़कियां अपने से बड़ी उम्र के पुरुषों के प्रति अधिक आकर्षित (Attraction) हो रही हैं. आजकल यह आश्चर्यजनक नहीं, बल्कि सामान्य बात हो गई है.

अकसर नौकरीपेशा लड़कियां या महिलाएं अपने दफ्तर के वरिष्ठ अधिकारी के प्रेमजाल में फंस जाती हैं और जरूरी नहीं कि वे उन के साथ कोई लंबा या स्थायी रिश्ता ही बनाना चाहें, लेकिन कई बार लड़कियां इस चक्कर में अपना जीवन बरबाद भी कर लेती हैं. ऐसे रिश्ते रेत के महल की तरह जल्द ही ढह जाते हैं.

बात जब विवाह की हो तो ऐसे रिश्तों की बुनियाद कमजोर होती है. पर मन की गति ही कुछ ऐसी है, जिस किसी पर यह मन आ गया, तो बस आ गया. फिर उम्र की सीमा और जन्म का बंधन कोई माने नहीं रखता. हालांकि यह स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं है, फिर भी कई बार कुछ परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं कि मन बस वहीं ठहर जाता है.

सुरक्षा का भाव

कई बार कम उम्र की लड़कियां अपने से काफी अधिक उम्र के व्यक्ति के साथ अपनेआप को सुरक्षित महसूस करती हैं. ऐसा अकसर तब होता है जब कोई लड़की बचपन से अकेली रही हो. परिवार में पिता या भाई जैसे किसी पुरुष का संरक्षण न मिलने के कारण उसे अपमान या छेड़खानी का सामना करना पड़ा हो तो ऐसी लड़कियां सहज ही अपने से अधिक उम्र के व्यक्ति के साथ अपनेआप को सुरक्षित महसूस करती हैं. कई बार लड़कियों के इस रुझान का फायदा पुरुष भी उठाते दिख जाते हैं.

हालात

कार्यक्षेत्र की परिस्थितियां कई बार ऐसा संपर्क बनाने में अहम भूमिका निभाती हैं. कई दफ्तरों में फील्डवर्क होता है. काम सीखनेसमझने के मद्देनजर लड़कियों को सीनियर्स के साथ दफ्तर से बाहर जाना पड़ता है. गैरअनुभवी लड़कियों को इस का फायदा मिलता है. धीरेधीरे लड़कियां पुरुष सहयोगियों के करीब आ जाती हैं. काम के सिलसिले में लगातार साथ रहतेरहते कई बार दिल भी मिल जाते हैं.

लालच वाली सोच

पुरुषों की स्वार्थी वृत्ति भी कई बार कम उम्र की लड़कियों को अपने मोहजाल में फंसा लेती है. लड़कियां यदि केवल सहकर्मी होने के नाते पुरुषों के साथ वार्त्तालाप कर लेती हैं, काम में कुछ मदद मांग लेती हैं तो स्वार्थी प्रवृत्ति के पुरुष इस का गलत फायदा उठाने की कोशिश करते हैं और लड़कियां उन के झांसे में आ जाती हैं.

मजबूरियां

कई बार मजबूरियां साथ काम करने वाले अधिक उम्र के सहकर्मी के करीब ले आती हैं. तब मुख्य वजह मजबूरी होती है, संबंधित पुरुष की उम्र नहीं. आजकल कार्यस्थलों पर काम की अधिकता हो गई है, जबकि समय कम होता है. कम समय में अधिक कार्य का लक्ष्य पूरा करने के लिए लड़कियां अपने सहकर्मी पुरुषों का सहयोग लेने में नहीं हिचकतीं, यह जरूरी भी है. किंतु मन का क्या? सहयोग लेतेदेते मन भी जब एकदूसरे के करीब आ जाता है तब उम्र का बंधन कोई माने नहीं रखता.

प्रलोभन

प्रलोभन या लालचवश भी कमसिन लड़कियां उम्रदराज पुरुषों के चंगुल में फंस जाती हैं. कई लड़कियां बहुत शौकीन और फैशनेबल होती हैं. उन की जरूरतें बहुत ज्यादा होती हैं, पर जरूरतों को पूरा करने के साधन उन के पास सीमित होते हैं. ऐसी स्थिति में यदि कोई अधिक उम्र का व्यक्ति, जो साधनसंपन्न है, पैसों की कोई कमी नहीं है, समाज में रुतबा है तो लड़कियां उस की ओर आकर्षित हो जाती हैं. उस समय उन्हें दूरगामी परिणाम नहीं दिखते, तात्कालिक लाभ ही उन के लिए सर्पोपरि होता है.

कई लड़कियां कैरियर के मामले में शौर्टकट अपनाना चाहती हैं और ऊंची छलांग लगा कर पदोन्नति प्राप्त कर लेना चाहती हैं. यह लालच अधिकारी की अधिक उम्र को नजरअंदाज कर देता है.

किसी भी अधिक उम्र के व्यक्ति का अपना प्रभाव, व्यक्तित्व, रुतबा या रहनसहन भी लड़कियों को प्रभावित करने का माद्दा रखता है. राजनीति और कारोबार जगत से जुड़ी कई हस्तियों के साथ कम उम्र की लड़कियों को उन के मोहपाश में बंधते देखा गया है.

बहरहाल, जरूरी नहीं कि ऐसे संबंध हमेशा बरबाद ही करते हों. कई बार ऐसे संबंध सफल होते भी देखे गए हैं. बात आपसी संबंध और परिपक्वता की है जहां सूझबूझ, विवेक और धैर्य की आवश्यकता होती है. फिर असंभव तो कुछ भी नहीं होता.

यह भी एक तथ्य है कि आकर्षण तो महज आकर्षण ही होते हैं और ज्यादातर आकर्षण क्षणिक भी होते हैं. दूर से तो हर वस्तु आकर्षक दिख सकती है. उस की सचाई तो करीब आने पर ही पता चलती है, कई बार यही आर्कषण आसमान से सीधे धरातल पर ले आता है. आकर्षण, प्यार, चाहत और जीवनभर का साथ ये सब अलगअलग तथ्य होते हैं. इन्हें एक ही समझना गलत है. किसी अच्छी वस्तु को देख कर आकर्षित हो जाना एक सामान्य बात है. पर इस आकर्षण को जीवनभर का बोझ बनाना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा हो सकता है, क्योंकि हर चमकती चीज सोना नहीं होती.

फिर भी बदलते वक्त की जरूरत कहें या बढ़ती हुई जरूरतों को जल्दी से जल्दी बिना मेहनत किए पूरा करने की होड़, अधिक उम्र के पुरुषों की तरफ लड़कियों का आकर्षित होना एक अच्छी शुरुआत तो नहीं कही जा सकती. इस नादानी में उन का भविष्य जरूर दावं पर लग सकता है.

अब बैडरूम में मूड औफ नहीं, लव औन होगा

Sex Tips in Hindi: रागिनी पिछले 5 सालों से खुशहाल विवाहित जीवन (Married Life) जी रही हैं. रागिनी और गगन के प्यार की निशानी उत्सव 4 साल का है. आजकल वे कुछ बुझीबुझी लगती हैं. इस का कारण है उन की उदासीन बैडरूम लाइफ (Bedroom Life). दिन भर रागिनी घर के हर छोटेबड़े काम को मैनेज करने में बिजी रहती हैं. दोपहर से रात तक उत्सव की देखरेख में अलर्ट रहती हैं. उत्सव को सुलाने के बाद अपने बैड पर जाने से परहेज करती हुई वे उत्सव के कमरे में उस के साथ ही सो जाती हैं. इस का कारण पता चला कि हड़बड़ी वाली रोजाना की सैक्स लाइफ (Sex Life), जो रागिनी और गगन दोनों का मूड औफ कर तनाव का कारण बनती है.

-आमरा अपनी सैक्स लाइफ से खुश हैं, लेकिन चाहतें अनेक हैं. उन के पति भी खुश हैं बैड पर, लेकिन कहीं न कहीं आमरा को दुख है कि उन के पति बैड पर उस का मन क्यों नहीं पढ़ पाते. आमरा उन से स्पर्श की चाहत रखती हैं. मगर बैड पर जाते ही आरव अपना होशहवास खो देते हैं. जल्दबाजी के कारण एकदूसरे में खो नहीं पाते. आलम यह है कि आमरा सैक्स से बचती हैं.

-माही एक कामकाजी महिला है. शाम को औफिस से लौटते ही माही और रंजन अपनी दुलारी 10 साल की बेटी परी के साथ समय बिताते हैं. डिनर तक तो सब ठीक रहता है, लेकिन बैडरूम लाइफ दोनों को अपसैट कर देती है. असल में माही बैडरूम में पति के साथ अकेले में समय बिताना चाहती हैं. रंजन की बांहों में समा कर दिन भर की और भविष्य की बातें करना चाहती हैं. उस के बाद जेहन की थकान को प्यार में डूब कर मिटाना चाहती हैं, लेकिन रंजन उन की भावनाओं की कद्र न कर सीधे सैक्स का मूड बना लेते हैं. नजीजतन, मशीनी प्रक्रिया की तरह सैक्स होता है और बाद में माही का मन बुझाबुझा रहता है.

ऊपर बताए गए तीन केसों में एक बात सामने आई कि सैक्स में गलतियां हमेशा के लिए एकदूजे से दूर कर देती हैं. माना जाता है कि प्यार करना और प्यार को निभाना औरत जानती है. प्यार को सैक्स का अंजाम देने में पति माहिर होते हैं. यह काफी हद तक सच है. मौका कोई भी हो, कैसी भी स्थिति हो, थकावट से शरीर स्थूल हो या मूड हो या न हो पर पति का बैड पर जाते ही सैक्स का मूड बन जाता है या यों कहें कि पति सैक्स के लिए बमुश्किल ही इनकार करेगा. इस पर उस की पत्नी नानुकर करे, तो उसे वह सहन नहीं. यहां हम पतियों पर किसी प्रकार का आक्षेप नहीं लगा रहे. दूसरी ओर पत्नियां भी प्यार को सैक्स का अंजाम देना चाहती हैं, लेकिन प्यार से प्यार तक. ऐसा नहीं होने पर दोनों ओर से खीज होती है.

इस संबंध में सैक्सोलौजिस्ट का मानना है कि प्यार में कैद होते ही अधिकांश पतियों के दिलदिमाग में सैक्स उछालें मारता है. दिन भर काम करने के दौरान भी दिमाग के किसी कोने में बेसब्री बैड लाइफ का ऐंजौयमैंट जीने की होती है. ऐसे में पति आउट औफ कंट्रोल होते जाते हैं. बस, प्यार को तुरतफुरत अंजाम देना और पार्टनर की खीज महसूस किए बिना सो जाना. यही नहीं, कई बार पति भी खीज महसूस करते हैं, जो पार्टनर में तनाव का कारण बनती है. दूसरे शब्दों में कहें तो बैड पर प्यार में जल्दबाजी दिखाना दोनों पार्टनर्स के लिए ठीक नहीं. बैड पर आप का और उन का मूड हमेशा औन रहे और प्यार हमेशा औन रहे इस के लिए गलतियों पर नजर डालते हैं. इन से बचिए और मूड करें औन:

क्लाइमैक्स की बेताबी

इरादे बुलंद हों तो कदम खुदबखुद मंजिल तक पहुंच जाते हैं. फिर चाहे राहें पथरीली अथवा मखमली ही क्यों न हों. बुलंद इरादों के बलबूते मंजिल पर फतह होती है. इस सफर में कई कठिनाइयों, तकलीफों, सहूलतों से गुजरना पड़ता है. यही फलसका आप की सैक्स लाइफ पर भी लागू होता है. अधिकांश पति बैड पर पहुंचते ही सैक्स के लिए तैयार हो जाते हैं. कुछ ही पलों में प्यार को अंजाम देने में मशगूल हो जाते हैं. इस फलसफे से बेखबर कि चरम तक पहुंचने के लिए कई राहों से गुजरना पतिपत्नी दोनों के लिए उपयुक्त रहता है. इस हड़बड़ी में पति फोरप्ले को पूरी तरह नजरअंदाज करता है. रोजाना की क्रिया से पत्नी उकता जाती है. अगली बार यह गलती न करें. क्लाइमैक्स से पहले बांहों में भर कर प्यारदुलार करें.

अहम है फोरप्ले

इस बात को गांठ बांध लें कि जब बिस्तर पर दोनों खुश होते हैं, तब अंजाम दोनों को खुशी देता है. लेकिन बिस्तर पर पति की प्यार में हड़बड़ी का अंजाम पत्नी को खीज देता है. जाहिर है, उस के मूड से पति का मूड भी औफ हो जाएगा. अगली बार बिस्तर पर जल्दबाजी की गलती न दोहराएं. थोड़ा धैर्य रखें. पहले प्यारदुलार यानी फोरप्ले से पत्नी का मूड बनाएं. पत्नी के उत्तेजित होने के बाद दोनों अंजाम के पलपल की हसीन जन्नत को महसूस कर पाएंगे अन्यथा इस दैनिक मशीनी क्रिया के बाद भी आप दोनों खालीपन, तनाव, निराशा व खीज से भरे रहेंगे.

मन को पढ़िए

सिर्फ पति अपने आनंद को तवज्जो न दे. थोड़ा पत्नी का भी ध्यान रखे. पत्नी की बिस्तर पर पसंदनापसंद का भी ध्यान रखे. फोरप्ले से अंजाम और अंजाम के बाद की सहलाहट का ध्यान रखे. बहुत सी बातें पत्नी जबां पर नहीं लाती. वह सब पति पर छोड़ती है. उन का पूरा न होना उस में अजीब सा खालीपन भर देता है. एक खुशहाल बैडलाइफ के लिए पति को पत्नी के मन की बात समझनी होगी.

कुछ पल मस्ती, कुछ पल शरारत

अकसर पति बिस्तर में मस्ती व शरारत में बहकना भूल जाते हैं. सीधे अंजाम की सीढ़ी चढ़ते जाते हैं. भले ही अंजाम में पत्नी का शारीरिक साथ रहता है, पर वह मन से दूर होती है या यों कहें कि पति बिस्तर में पत्नी का खयाल नहीं रखता यानी पत्नी के कोमल बदन का भी नहीं. अगली बार यह गलती न हो, इस का ध्यान रखें. इस बात का भी ध्यान रहे कि पत्नी को रतिक्रिया में जोरजबरदस्ती कतई पसंद नहीं होती है.

सिनेमा नहीं है बैडरूम

आमतौर पर पति फिल्मों में फिल्माए गए बैडरूम दृश्यों को असल जिंदगी में जीना चाहता है. उस की चाहत रहती है कि पत्नी का भी इस में सहयोग मिले. पत्नी के नानुकर करने पर पति का गुस्सा 7वें आसमान पर होता है. कई बार नौबत इमोशनल ब्लैकमेल से बढ़ती हुई अलगाव तक पहुंच जाती है. पति इसे स्वीकार ले कि असल जिंदगी का बैडरूम फिल्मी परदे से बहुत अलग होता है. याद रहे हर बार प्यार का मीठा अंजाम दोनों को संतुष्टि और सहजता देता है.

जिम्मेदारी दोनों की

सैक्सोलौजिस्ट यही कहते हैं कि चरमोत्कर्ष की पूरी जिम्मेदारी पति पर नहीं डाली जानी चाहिए. अंजाम तभी सफल होता है जब पतिपत्नी दोनों का सहयोग हो. अधिकांश पतियों की आदत होती है कि वे अंजाम का सुख लेने के बाद पत्नी को भूल जाते हैं. प्यार भरा स्पर्श हो या न हो पति आसानी से अंजाम तक पहुंच ही जाते हैं. वे इस बात से बेखबर होते हैं कि अपने इजैट्यूलेशन के बाद उन की पत्नी मीठे सुख की जन्नत की सैर नहीं कर पाती. ऐसे में चरमोत्कर्ष तक नहीं पहुंचने का ठीकरा किसी एक के सिर पर फोड़ना गलत है.

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