Acid Attack जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी के सिकुड़ने से

Acid Attack News in Hindi: शनिवार का दिन था. रात के साढ़े 8 बजे थे. माला कर्मकार ‘सियालदहडायमंड हार्बर’ लोकल ट्रेन(Local Train) से दफ्तर से घर लौट रही थीं. उस समय लेडीज कंपार्टमैंट में कुछ गिनीचुनी औरतें ही थीं. एकाध स्टेशन के बाद उन में से 1-1 कर के और भी 4-5 औरतें उतर गईं. अब माला कर्मकार समेत 3 औरतें रह गईं. कल्याणपुर स्टेशन (kalyanpur Station) से कुछ सवारियों को उतार कर जब ट्रेन चली, तो अचानक चलती हुई ट्रेन की खिड़की के सामने एक नकाबपोश आया और उस ने खिड़की पर बैठी माला कर्मकार पर एसिड (Acid) फेंक दिया. यह वह घड़ी थी, जब माला की पूरी जिंदगी ही बदल गई. दरअसल, एक जमीन को ले कर स्वरूप हलदार नामक एक बिल्डर (Builder) के साथ माला कर्मकार के घर वालों का झगड़ा था. बिल्डर जमीन चाहता था और माला का परिवार जमीन बेचने को राजी नहीं था. बिल्डर स्वरूप हलदार कई बार माला कर्मकार के परिवार वालों को नतीजा भुगतने की धमकी दे चुका था. आखिरकार उस ने माला पर एसिड फेंक कर अपनी धमकी को पूरा कर ही दिया. अब वह हवालात में है. उस की जमानत (Bail) नहीं हो पा रही है.

एक और वाकिआ. मनीषा पैलान सुबहसवेरे जब नींद से जाग कर अपना चेहरा आईने में देखती हैं, तो एसिड से झुलसे चेहरे में गाल, आंखें, उस से नीचे गले और छाती की बीभत्सता से उन का पूरा बदन कांप जाता है.

एक मग एसिड ने मनीषा की दुनिया को पूरी तरह झुलसा कर रख दिया है.

मनीषा पैलान का सपना था कि वे अच्छी तरह पढ़लिख कर सब्जी बेचने वाले अपने पिता मुन्नाफ पैलान का सहारा बनें. वे अपने छोटे भाईबहन की पढ़ाई का खर्च जुटाना चाहती थीं, ताकि परिवार सिर ऊंचा कर के जी सके, इसीलिए पढ़ाई के साथसाथ वे नर्सिंग ट्रेनिंग, कंप्यूटर कोर्स, ब्यूटीशियन कोर्स भी कर रही थीं.

रूढ़िवादी मुसलिम परिवार में जनमी मनीषा पैलान कुछ भी कर के अपने पिता और परिवार की लड़खड़ाती जिंदगी को संभालने की कोशिश कर रही थीं.

साल 2015 में मनीषा पैलान ने अपने बचपन के प्यार सलीम हलदार से घर से भाग कर शादी कर ली. लेकिन कुछ समय बाद ही मनीषा के मन में अपने पैरों पर खड़ा हो कर पिता की मदद करने का सपना कुलबुलाने लगा.

मुसलिम परिवार में ऐसा सपना देखने की सख्त मनाही थी. जाहिर है, पतिपत्नी में अनबन होने लगी. मनीषा पैलान ने तलाक लेने का फैसला किया. मनीषा के मुताबिक, सलीम भी तलाक के लिए तैयार था, लेकिन वह इसे मन से स्वीकार नहीं कर पाया.

17 नवंबर, 2015. सर्दी की एक शाम. मनीषा कंप्यूटर क्लास से घर लौट रही थीं. सलीम अपने कुछ दोस्तों के साथ अचानक सामने आया और एक मग एसिड फेंक कर फरार हो गया. मनीषा से अलग होने का गुस्सा उस ने एसिड हमला कर के निकाला था.

सलीम से अलग होने के बाद मनीषा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन के लिए एक बहुत बड़ी लड़ाई इंतजार कर रही है. लगातार थाना, पुलिस और अदालत के चक्कर लगाने के साथसाथ अपनी लड़ाई लड़ने के लिए वे मन को तैयार करती चली गईं.

एसिड हमले की वारदात और पुलिस की कार्यवाही के बाद सलीम समेत दूसरे 5 आरोपी जमानत पर खुलेआम घूम रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं और मामला उठा लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं.

आखिरकार मनीषा को अपना कसबा छोड़ कर कोलकाता आना पड़ा. यहां मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को राज्य सरकार को मनीषा को 3 लाख रुपए हर्जाने के तौर पर दिए जाने का आदेश दिया.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में एसिड हमले के पीडि़तों को 3 लाख रुपए हर्जाना देने का कानून है. इस कानून के तहत हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. इतना ही नहीं, जमानत पर खुलेआम घूम रहे पांचों आरोपियों को भी हाईकोर्ट ने फिर से गिरफ्तारी के साथ जांच का भी आदेश दिया.

सलीम फरार है. बाकियों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है. जहां तक 3 लाख रुपए के हर्जाने का सवाल है, तो 21 साला मनीषा कहती हैं कि अगर काबिलीयत से उन्हें कोई नौकरी मिल गई, तो कुछ सालों में 3 लाख रुपए जमा कर लेना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है. सिर्फ चमड़ी ही तो जल कर सिकुड़ गई है. इस से जीने का रास्ता तो बंद नहीं हो जाता है न? नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए चिकनी चमड़ी होना एकलौती काबिलीयत नहीं हो सकती है.

इलाज के दौरान जब पूरे चेहरे पर पट्टियां बंधी थीं, तब अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने खुद को दिलासा दी थी कि जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो जाती. इस के आगे भी दुनिया है. पर उस के लिए खुद को ही तैयार करना होगा.

मनीषा बताती हैं कि लोकल ट्रेन में उन की आपबीती सुन कर एक मुसाफिर ने यहां तक पूछ लिया था कि सिर्फ एसिड ही फेंका था या रेप भी हुआ था? ऐसी दुनिया से रूबरू होने के बाद भी वे आत्मविश्वास से लबालब हैं. उन का मानना है कि उन का जला चेहरा समाज का आईना है.

मनीषा को जब अस्पताल से छुट्टी मिली, तब उन्हें पता चला कि हमलावर जमानत पर छूट कर महल्ले में लौट आए हैं और छाती फुला कर उन के घर के आसपास घूम रहे हैं.

उसी समय मनीषा ने ठान लिया था कि पूरी हिम्मत के साथ उन्हें समझा देना है कि तुम्हारा एसिड मेरा कुछ भी नहीं जला पाया है. मेरे सपने को, मेरी चाह को जला नहीं सका है.

यही वजह है कि आज भी मनीषा गानों पर थिरकती हैं. ब्यूटीशियन का कोर्स कर के वे महल्ले की औरतों को सजातीसंवारती हैं.

इसी तरह मैत्री भट्टाचार्य द्वारा नाजायज संबंध बनाने से इनकार करने की सजा एसिड हमले से दी गई.

पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिले के रानाघाट स्टेशन पर एक जानपहचान के लड़के ने मैत्री के चेहरे को निशाना बना कर एसिड फेंका. इस हमले में मैत्री का चेहरा तो झुलसा ही, साथ ही एक आंख भी जाती रही. लेकिन उन का मनोबल आज भी नहीं टूटा है.

वे कोलकाता मैडिकल कालेज में अपना इलाज करा रही हैं. उन के कंधे और दाहिने हाथ की चमड़ी ही नहीं, मांसपेशियां तक गल गई थीं और वहां सैप्टिक हो गया था. फिर भी वे दम साध कर कुसूरवारों को सजा दिलाने और एसिड हमले की पीडि़तों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने का संकल्प ले रही थीं. वे एसिड पीडि़तों को संदेश देना चाहती हैं कि जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी की सिकुड़न से.

मैत्री भट्टाचार्य कहती हैं कि बलात्कार के विरोध में लोग सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन एसिड हमले का देश में सख्ती से कोई विरोध नहीं करता, इसीलिए वे इसे एक लंबी लड़ाई मानती हैं. इस लड़ाई में वे आम लोगों का साथ भी चाहती हैं.

आंकड़ों की जबानी

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के आंकड़े कहते हैं कि एसिड हमले की वारदातें हमारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं. साल 2011 में एसिड हमले की जहां महज 106 वारदातें सामने आई थीं, वहीं साल 2015 में 802 वारदातें दर्ज हुई हैं.

जाहिर है, यह चिंता की बात है. वैसे, फरवरी, 2013 से पहले हुए एसिड हमले के आंकड़े पुख्ता आंकड़े नहीं माने जा सकते. वजह, तब तक हमारे देश में एसिड हमले जैसी वारदातों के लिए भारतीय आपराधिक कानून में अलग से कोई धारा नहीं थी.

फरवरी, 2013 को भारतीय दंड विधान में संशोधन किया गया. 326ए और 326बी को गैरजमानती धारा के तहत ऐसे अपराध को चिह्नित किया गया. अपराध साबित होने पर कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया.

इस तरह देखा जाए, तो एसिड हमले के पुख्ता आंकड़े साल 2014 में ही उपलब्ध हो पाए. नई धारा के तहत पूरे देश में एसिड हमले के 225 मामले दर्ज हुए और साल 2015 में यह आंकड़ा बढ़ कर 249 तक पहुंच गया.

सरकार की अनदेखी

पश्चिम बंगाल की बात करें, तो पिछले कुछ सालों से राज्य में एसिड हमले की वारदातें लगातार बढ़ती जा रही हैं. साल 2013 से ले कर अब तक राज्य में ऐसी घटनाएं आएदिन हो रही हैं. उन्हें देख कर साफ लगता है कि एसिड मामलों में पुलिस प्रशासन और सरकार उदासीन है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि बीते 5 सालों में राज्य में 131 मामले दर्ज हुए, वहीं साल 2014 और साल 2015 में 41-41 मामले दर्ज हुए. पर किसी भी आरोपी को सजा नहीं हुई है.

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के विक्रमजीत सेन का मानना है कि गैरजमानती धारा में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही ये जमानत पर छूट जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि पुलिस पुख्ता चार्जशीट तैयार नहीं करती है.

सलफ्यूरिक, नाइट्रिक और हाइड्रोक्लोरिक एसिड खरीदनेबेचने में कंट्रोल के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिन के तहत राज्य सरकार ने 31 मार्च, 2014 को एसिड बिक्री से संबंधित कुछ नियम बनाए थे. मसलन, दुकानदारों को एसिड खरीदारों का एक अलग रजिस्टर रखना होगा और उस रजिस्टर में खरीदार का पूरा नामपता दर्ज करना होगा.

साथ ही, यह भी कहा गया था कि ऐक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट जितनी हैसियत वाला कोई अफसर, सबइंस्पैक्टर की हैसियत वाला पुलिस औचक दौरा कर के एसिड विक्रेताओं के रजिस्टर की जांच कर सकता है.

कानूनी पचड़े में पीड़ित

पश्चिम बंगाल सरकार के मौजूदा नियम के मुताबिक, एसिड पीड़ित को अधिकतम 2 लाख रुपए हर्जाने व बतौर माली मदद के रूप में दिए जाने का प्रावधान है. उधर साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी कर के कहा था कि एसिड पीड़ित को 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार 3 लाख रुपए दे.

पिछले साल जून में एसिड हमले की पीड़िता मनीषा पैलान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने सरकार को 3 लाख रुपए का हर्जाना देने का निर्देश दिया. लेकिन सरकार अभी तक मनीषा को रकम नहीं दे पाई है.

हालांकि इस बारे में गृह विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, इस देरी की वजह कानूनी अड़चन है. दरअसल, वित्त विभाग की मंजूरी मिलने के बावजूद कानून विभाग से कानून में बदलाव की इजाजत अभी तक नहीं मिली है. इस के कारण मामला अधर में लटका हुआ है.

जाहिर है, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार हर्जाना नहीं दे पा रही है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मान कर 3 लाख रुपए का हर्जाना देने के लिए राज्य सरकार को वित्त विभाग की इजाजत चाहिए और वित्त विभाग इस रकम की मंजूरी दे चुका है. लेकिन कानून विभाग द्वारा पुराने कानून में संशोधन किए बिना राज्य सरकार पीड़िता को वह रकम नहीं दे सकती.

पश्चिम बंगाल में एपीडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों और स्वयंसेवी संगठनों के लगातार दबाव बनाने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि सरकारी अस्पतालों में पीड़िता के मुफ्त इलाज का निर्देश सरकार ने जारी कर के छुट्टी पा ली है.

एक मिसाल यह भी

एसिड हमला न केवल पीड़िता के चेहरेमोहरे को बिगाड़ देता है, बल्कि उस के पूरे वजूद को झकझोर कर रख देता है. लेकिन यह एक नाकाम कोशिश होती है. ‘नाकाम कोशिश’ इसलिए है, क्योंकि इस तरह का हमला पीड़ित को कमजोर नहीं बनाता, बल्कि सब से डट कर मुकाबला करने का माद्दा ही पैदा करता है.

आगरा के फतेहाबाद रोड पर गेटवे होटल के ठीक सामने शिरोज हैंगआउट इसी बात का सुबूत है. इस कैफेटेरिया को एसिड हमले की पीड़ित लड़कियां व औरतें चलाती हैं. एसिड ने भले ही इन के चेहरे को बिगाड़ दिया है, लेकिन इन के चेहरे पर हजारों वाट की मुसकराहट है.

एसिड अटैक सर्वाइवल को दोबारा बसाने का अपनी ही तरह का देश में यह पहला प्रोजैक्ट है, बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि एसिड सर्वाइवल द्वारा चलाया जाने वाला यह देश का पहला कैफेटेरिया है. बिगड़े चेहरे, समाज की अनदेखी, आसपड़ोस के लोगों की हमदर्दी, हंसीमजाक, डर को अंगूठा दिखा कर ये लड़कियां शिरोज हैंगआउट चला रही हैं.

साल 2014 में अकेले उत्तर प्रदेश में एसिड हमले के 186 मामले पुलिस ने दर्ज किए थे. इस के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था ‘छांव फाउंडेशन’ की मदद से इन लड़कियों के पुनर्वास की योजना बनाई.

मजेदार बात यह है कि इस कैफेटेरिया में चायकौफी और स्नैक्स के साथ कम्यूनिटी रेडियो सुनने का लुत्फ और लाइब्रेरी में बैठने की भी सहूलियत है. इस के अलावा समयसमय पर यहां आर्ट वर्कशौप और एग्जिबिशन भी कराई जाती हैं.

यह कैफेटेरिया आगरा में न केवल लोकल लोगों के बीच, बल्कि देशीविदेशी सैलानियों के बीच कम समय में ही मशहूर हो गया. इस की मशहूरी को देखते हुए लखनऊ में भी इस की एक शाखा खोल दी गई?है. जाहिर है, उत्तर प्रदेश की यह मिसाल उम्मीद जगाती है, पर इस में सरकार और समाज का साथ मिलना भी बेहद जरूरी है.

सिर्फ दम दिखाने के लिए नहीं होती सुहागरात!

Sex Tips in Hindi: इस रात का इंतजार हर युवा को होता है. लेकिन अगर कहा जाए कि हर किशोर को भी होता है तो भी यह कुछ गलत नहीं होगा. क्योंकि मनोविद कहते हैं 15 साल की होने के बाद लड़की और 16 साल के बाद लड़के, इस सबके बारे में कल्पनाशील ढंग से सोचने लगते हैं. सोचे भी क्यों न, आखिर इस रात को ‘गोल्डेन नाइट’ जो कहते हैं.इस रात में दो अजनबी हमेशा हमेशा के लिए एक हो जाते हैं. दो जिस्म एक जान हो जाते हैं. इस एक रात में न कोई पर्दा होता है, न दीवार. बत्तियां बुझी होती हैं, सांसें उफन रही होती हैं, फिजा में जिस्मानी गंध होती है और दिल की धड़कनों में तूफान आया होता है. गोल्डेन नाइट की यही खासियत है. हर कोई इस रात में अपनी पूरी जिंदगी जी लेना चाहता है. ताकि पूरी जिंदगी यह रात याद आने पर आपके चेहरे पर संतोष और धीमी सी मुस्कान लाती रहे. जब भी इसका जिक्र हो तो उम्र चाहे कोई भी हो चेहरे पर एक गुलाबी आभा खिल जाए.

यह रात सिर्फ भावनाओं के स्तर पर ही नहीं बल्कि बायोलाॅजिकल स्तर पर भी जीवन के लिए एक टर्निंग प्वाइंट होती है. इस रात के बाद लड़की, लड़की नहीं रहती महिला बन जाती है. एक औरत बनते ही उसकी अब तक की दुनिया पूरी तरह से बदल जाती है. रातोंरात जिस्म में कई किस्म की तब्दीलियां आ जाती हैं. इस सबकी नींव इसी रात पड़ती है.

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा युवा हो, जो सामान्य हो और जिसके दिल में इस रात को लेकर हसीन ख्वाब न हो. लेकिन सुहागरात या गोल्डेन नाइट के मायने सिर्फ शारीरिक सम्बंध तक ही सीमित नहीं होता. इस रात को जिस्म भी बदल जाता है, मन भी बदल जाता है और मस्तिष्क भी. विशेषज्ञ कहते हैं क्योंकि सेक्स महज दो टांगों के बीच की जोर अजमाइश भर नहीं है. यह दो कानों के बीच की वह गुनगुनाहट है, जिसका असर हमारी पूरी जिंदगी में रहता है. अगर यह रात लय में कटती है, तो जिंदगी तरन्नुम में रहती है.

अगर यह डर, दहशत और एक दूसरे पर हावी होने में गुजरती है तो जिंदगी नर्क बन जाती है. मतलब साफ है कि पहली रात जिस्म के नहीं आत्मा के मिलन की होती है. दो आत्माओं के बीच सेक्स की रात होती है और अगर दो आत्माएं इस रात एक दूसरे से तृप्त हो जाती है तो यह तृप्ति ताउम्र सुकून देती है.

इस रात में हमें एक दूसरे के जिस्म में ही नहीं मन और आत्मा में भी प्रवेश करने और छा जाने की कोशिश होनी चाहिए. क्योंकि दिल से दिल के मिलन की यह सबसे नाजुक रात होती है. निश्चित रूप से हमें इस रात के पहले बहुत कुछ पता होना चाहिए. लेकिन यह जानकारी सिर्फ सेक्स रोगों के संक्रमण से बचाव भर की नहीं होनी चाहिए. यह जानकारी जिंदगी को कितनी स्मूथ बना सकें इसकी भी होनी चाहिए. अगर इस रात हमने एक दूसरे को दिल की गहराईयों में उतरकर आजमा लिया तो फिर जीवन की राहों में कभी रेगिस्तान नहीं आयेगा. जिंदगी का यह सफर हमेशा सुनहरे नखलिस्तान से होकर गुजरेगा.

अगर हमने इस रात सिर्फ बिस्तर में जिस्म भर की जोर अजमाइश की और फिर अजनबियों की तरह सो गये तो इस रात का यह मिलन हमारी पूरी जिंदगी को रुखा और बेजान बना देगा.

सुहागरात हर किसी की ज़िंदगी का सबसे हसीन सपना होता है. इस सपने को देखने की इजाजत हर उस शख्स को है जो प्राकृतिक रूप से स्वस्थ और पूर्ण है. सुहागरात शब्द में इतना आकर्षण है कि युवक-युवतियां इसका नाम सुनते ही या इसकी याद आते ही रोमांटिक हो जाते हैं. उनका मन आनंद की हिलोरें लेने लगता है. इसकी कल्पना से ये अलौकिक सुख के सागर में डूब जाते हैं. हनीमून या गोल्डेन नाइट का हमारी पूरी जिंदगी में असर पड़ता है. इस रात के जरिये ही दो अपरिचित विपरीत लिंगी एक दूसरे के सही मायनों में होते हैं.

संभोग से सिर्फ भावनात्मक रूप से ही नहीं बल्कि जैविक रूप से भी एक दूसरे के प्रति आकर्षण और प्रेम में बढ़ोत्तरी होती है. इस रात के बाद ही पता चलता है कि वाकई दुनिया में स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक होते हैं.

हमें भावनाओं के समंदर में गोते लगाते हुए इस हकीकत से भी रूबरू रहना चाहिए कि यदि पति पत्नी दोनो में शारीरिक रूप से कोई कमी है तो लाख पाखंड के बावजूद वह आत्मीयता, वह लगाव नहीं पैदा होता जो दो स्वस्थ जिस्मों का आपस में होता है. इसलिए शादी में सेहत की भी तैयारी करनी चाहिए. सिर्फ सजने संवरने पर ध्यान देने से काम नहीं चलेगा, शादी के कई महीनों पहले ही लड़के और लड़की दोनो को ही अपने शारीरिक स्वास्थ्य को लेकर सजग रहना चाहिए ताकि सुहागरात वाले दिन किसी अक्वर्ड की स्थिति न पैदा हो. क्योंकि अगर सुहागरात वाले दिन अगर लड़का, लड़की की जिस्मानी इच्छा पूरी नहीं कर पाता यानी वह उसे संतुष्ट नहीं कर पाता तो लड़की इस स्थिति से आमतौर पर कभी समझौता नहीं करती. मनोविद कहते हैं अगर लड़की कुछ नहीं भी कहती तो भी उसके मन में एक तूफान उठ चुका होता है.

बेहतर है पहले से ही इस सबकी तैयारी रहे. हमें स्वीकारना ही होगा कि शरीर के दूसरे अंगों की तरह सेक्सुअल अंगों की भी समस्याओं का वैसे ही इलाज होता है. अगर ऐसी परेशानियों को शुरु से ही ध्यान न दिया जाए तो जल्द ही ये परेशानियां नासूर बन जाती हैं. एक मशहूर सेक्सोलाॅजिस्ट डाॅ. प्रकाश कोठारी कहते हैं कि युवा दंपति हनीमून के पहले थोड़ी सी सावधानी बरतें तो हनीमून के दौरान उसे किसी तरह की परेशानी से दो चार नहीं होना पड़ेगा, न शारीरिक, न मानसिक.

World Cup Final: सट्टेबाजी, देशभक्ति और धर्मभक्ति के अंधकार में गुम होता खेल

Sports News in Hindi: हाथ को आया, पर मुंह न लगा. यह इस बार भारतीय क्रिकेट टीम (Indian Cricket Team) के साथ हुआ. फाइनल मुकाबले से पहले लगातार 10 मैच जीतने वाली नीली जर्सी पहने ‘टीम इंडिया’ (Team India) के सामने पीली जर्सी वाले आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी खड़े थे, जो बड़े मैचों में गजब का खेल दिखाते हैं. 19 नवंबर, 2023 को अहमदाबाद के नरेंद्र मोदी स्टेडियम (Narender Modi Stadium) में भी यही हुआ. तकरीबन एक लाख, 30 हजार दर्शकों से खचाखच भरे स्टेडियम में उन्होंने भारी दबाव पर पार पाते हुए एक शानदार जीत हासिल की और भारत को 6 विकेट से हराते हुए चमचमाती ट्रॉफी अपने नाम कर ली. दरअसल, आस्ट्रेलिया क्रिकेट टीम की एक बड़ी खासीयत यह है कि वह दबाव वाले मैचों में सामने वाली टीम पर एकदम से हावी हो जाती है. इस टीम की बल्लेबाजी और गेंदबाजी तो बढ़िया है ही, इन की फील्डिंग भी कमाल की होती है.

इस के अलावा यह टीम मानसिक रूप से बहुत ज्यादा मजबूत है. जब यह मैदान पर होती है, तो अलग ही रोब से अपना हर काम करती है. हर खिलाड़ी सामने वाली टीम के बल्लेबाजों पर हावी होने की फिराक में रहता है. गलती की नहीं कि भुगतो खमियाजा.

पर क्या आज की तारीख में क्रिकेट मनोरंजन करने का साधन भर रह गया है? ऐसा नहीं है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पास आज अथाह पैसा है. इतना ज्यादा कि वह अपने खिलाड़ियों को मालामाल रखता है. इस बोर्ड पर काबिज होने के लिए नेता तक उतावले रहते हैं. अगर वे खुद नहीं कोई पद पाते हैं, तो अपने बच्चों को दिला देते हैं.

फिलहाल गृह मंत्री अमित शाह के बेटे जय शाह बीसीसीआई के सचिव हैं और उन का पूरे बोर्ड पर दबदबा साफ दिखाई देता है. वजह साफ है कि बीसीसीआई सोने का अंडा देने वाली मुरगी है, जो आईसीसी पर भी रोब दिखाने में कोताही नहीं बरतती है.

एक कड़वी हकीकत यह भी है कि क्रिकेट चंद देशों में खेला जाने वाला खेल है खासकर यह उन देशों में ज्यादा मशहूर है, जो कभी अंगरेजों के गुलाम रहे थे. इंगलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका में तो इसे आज भी ‘जैंटलमैन का गेम’ कहा जाता है, पर भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बंगलादेश, श्रीलंका में यह गलीकूचों में गेंदबल्ले से खेला जाने वाला सस्ता खेल है.

यही वजह है कि यह भारत और पाकिस्तान में हौकी जैसे उस खेल को खा गया है, जो कभी इन दोनों देशों की शान हुआ करता था. पाकिस्तान तो हौकी के लिहाज से ज्यादा गहरे गड्ढे में है. भारत के भी कुछ खास अच्छे हालात नहीं हैं.

सट्टेबाजी की गिरफ्त में

जहां अथाह पैसा होगा, वहां गैरकानूनी काम भी खूब होंगे. जब से बीसीसीआई ने क्रिकेट को कमाई का धंधा बना लिया है, तब से यह खेल मैदान से ज्यादा सट्टेबाजों के ठिकानों पर खेला जाने लगा है. लोग भले ही इस भरम में रहें कि इस वर्ल्ड कप को आस्ट्रेलिया ने जीता है, पर असली जीत तो हमेशा सटोरियों की होती है.

पता नहीं सटोरियों के उस पैसे का किस तरह का गलत इस्तेमाल होता है, वह ड्रग्स में लगता है या आतंकवाद को बढ़ावा देने में या फिर गैरकानूनी हथियार खरीदने में झोंक दिया जाता है, किसे पता. पर बेवकूफ लोग लगा देते हैं अपनी गाढ़ी कमाई इस गंदे कारोबार में.

‘फ्री प्रैस जर्नल’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एक सट्टेबाज ने कहा था कि उस ने पहले कभी इतना तनाव और उत्साह नहीं देखा. मैच को ले कर लोगों में एक अलग लैवल का क्रेज देखने को मिला.

‘फ्री प्रैस जनरल’ के ही मुताबिक, दाऊद इब्राहिम गिरोह मुंबई, इंदौर, दिल्ली, अहमदाबाद, कराची, दुबई और बैंकौक में फैले सट्टेबाजों के अपने विशाल नैटवर्क के जरीए पूरी फौर्म में दिखा.

‘टीवी-9’ की रिपोर्ट को मानें तो फाइनल मुकाबले में 70,000 करोड़ रुपए का सट्टा लगाया गया था, जबकि भारत और पाकिस्तान के मैच पर 40,000 करोड़ की सट्टेबाजी हुई थी. एक और जानकारी के मुताबिक, इस फाइनल मुकाबले से पहले 500 से ज्यादा बैटिंग वैबसाइट और 200 के आसपास मोबाइल एप्स ऐक्टिव हो गए थे.

इतना ही नहीं, क्रिकेट वर्ल्ड कप में सट्टा लगवाने के आरोप में पतिपत्नी को नंदग्राम पुलिस ने गिरफ्तार किया था. वे दोनों राजनगर ऐक्सटैंशन, गाजियाबाद की एक सोसाइटी में फ्लैट किराए पर ले कर हाई प्रोफाइल लोगों को सट्टा लगवाते थे. इस के लिए वे दुबई से औनलाइन सट्टे की ट्रेनिंग ले कर आए थे.

पुलिस के मुताबिक, दोनों पतिपत्नी ने वर्ल्ड कप के और दूसरे मैचों के दौरान भी सट्टेबाजी करवाई थी. अंदाजा है कि उन्होंने 100 से ज्यादा लोगों के जरीए एक करोड़ रुपए से ज्यादा की सट्टेबाजी की है. आरोपियों के पास से पुलिस ने एक लैपटौप, 4 मोबाइल फोन और 5 सिमकार्ड बरामद किए.

इन के मुंह पर भी तमाचा

फाइनल मुकाबले में भारत की हार से उन लोगों को तो कड़ा सबक मिल गया होगा, जो खेलों को खेल से ज्यादा देशभक्ति या धर्मभक्ति से जोड़ कर देखते हैं. उन के लिए खेल किसी रणभूमि सा हो जाता है और वे अपने योद्धाओं को अजेय समझ लेते हैं. उन्हें तथाकथित ऊपर वाले का दूत मान बैठते हैं.

फाइनल मुकाबला शुरू होने से पहले एक अखबार ‘दैनिक जागरण’ की हैडिंग थी कि ‘आज होगा धर्मयुद्ध’. इस तरह की बचकाना हैडिंग का क्या मतलब? क्या अहमदाबाद में कोई ‘महाभारत’ रचा जा रहे था? ऐसे शीर्षक देश को भरमाने वाले होते हैं और लोगों को उकसाते हैं कि जीतने पर अपने खिलाड़ियों को भगवान मान लें और हारने पर उन्हें राक्षस का सा दर्जा दे दें.

इतना ही, बहुत से लोगों ने तो नरेंद्र मोदी को ही इस हार का जिम्मेदार ठहरा दिया और उन्हें ‘पनौती’ कहा, क्योंकि वे मैच देखने स्टेडियम गए थे. वैसे, यह जो देश का आज का माहौल है, उस में भारतीय जनता पार्टी का भी बड़ा खास रोल है, क्योंकि वह हर बात को देशभक्ति या धर्मभक्ति से जोड़ देती है.

देशभक्ति और धर्मभक्ति के नाम पर किसी गरीब के घर पर बुलडोजर चला दो या किसी का एनकाउंटर कर दो, सब सही मान लिया जाता है. ऐसा ही कुछ आलम इस बार स्टेडियमों में भी दिखा. भारत के मैचों में ‘वंदे मातरम’ और ‘भारत माता की जय’ के नारे लग रहे थे. लोगों के घरों में हवन कराए जा रहे थे.

उत्तर प्रदेश के कानपुर में वर्ल्ड कप के फाइनल में भारत की जीत के लिए कानपुर युवा उद्योग व्यापार मंडल श्याम बिहारी गुट के पदाधिकारियों ने झकरकटी में बने आशा माता मंदिर में हवनपूजन किया था. हरियाणा में अंबाला जिले के काली माता मंदिर में हवनयज्ञ कर भारत की जीत की कामना की गई थी.

क्रिकेटर विराट कोहली दिल्ली में पश्चिम विहार की जिस कालोनी में 10 सालों तक रहे थे, वहां के लोगों ने भारतीय टीम के जीतने और विराट कोहली की 51वीं सैंचुरी के लिए हवन किया था.

उत्तराखंड के कुमाऊं में पत्थरचट्टा में आनंदी मंदिर धाम में लोगों ने भारत की जीत के लिए हवनपूजन किया था, तो वहीं सीरगोटिया में मुसलिम औरतों ने दुआ मांगी था.

इतना ही नहीं, दोनों टीमों की कुंडलियों को खंगाला जा रहा था. सूर्य, मंगल, बुध, शनि, राहुकेतु की दशा और दिशा तय की जा रही थीं.

अहमदाबाद के एक ज्योतिषी कौशिक भाई जोशी ने दावा किया था कि भारतीय क्रिकेट टीम जीतेगी, क्योंकि मकर का चंद्रमा कमाल करेगा.

पंडित संजय उपाध्याय ने मैच से पहले ‘एबीपी न्यूज’ से बातचीत के दौरान बताया, ‘ज्योतिष विद्या के अनुसार इस समय बृहस्पति मेष राशि और राहु मीन राशि में मौजूद है और शनि राशि अपने मूल त्रिकोण राशि में मौजूद है. इस के अलावा मंगल राशि भी वृश्चिक राशि के साथ है.

‘वहीं दूसरी तरफ आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के भी राशि अनुकूल ही है, इसलिए निश्चित तौर पर आज होने वाले भारतआस्ट्रेलिया फाइनल मुकाबले में एक कड़ा रोमांचक मुकाबले देखने को मिल सकता है, लेकिन परिणाम भारत के पक्ष में बनने की ज्यादा स्थितियां देखी जा रही हैं.’

मेरठ के ज्योतिषाचार्य डाक्टर संजीव शर्मा के मुताबिक, ‘जैसा मैं ने देखा है कल मैच के समय की जो कुंडली रहेगी वह कुंभ लग्न की रहेगी. इस समय भारतवर्ष का शनि बहुत अच्छा चल रहा है और शनि देव गोचर में अपनी राशि में ही भ्रमण कर रहे हैं. जो स्टेडियम का नाम है वह नरेंद्र मोदी स्टेडियम है और हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदीजी का शनि भी बहुत अच्छा है.

‘… कुलमिला कर कल अपने तिरंगे की शान व प्रतिष्ठा के लिए 140 करोड़ भारतीय अपने सब्र का फल चखेंगे. दोस्तो, 19 नवंबर, 2023 इतिहास के पन्नों में दर्ज होने वाला है. कल कुछ अलग चमत्कारिक रिकौर्ड बनने वाले हैं. हम सब इस अविस्मरणीय पल का साक्षी बनें. कुछ तो बात है इस देश की माटी में जिस ने सचिन और विराट जैसे खिलाड़ियों को जन्मा है.’

एक ज्योतिषी ने तो भारत को स्टीवन स्मिथ, डेविड वार्नर और पैट कमिंस से बचने की सलाह दी थी. वे तीनों तो ज्यादा करामात नहीं कर पाए, लेकिन फिर भी भारत हार गया.

एक और ज्योतिषी ने तो यह तक कह दिया था कि भारत टौस हारेगा, पर मैच जीतेगा. कुलदीप यादव और रवींद्र जडेजा गेंदबाजी में कमाल दिखाएंगे, पर ऐसा भी नहीं हो पाया.

एक मैच को जिताने की खातिर न जाने कितने लोगों ने अपना कीमती समय खराब कर दिया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के काफिले ने स्टेडियम के आसपास के सिक्योरिटी के सारे इंतजाम गड़बड़ा दिए होंगे. मतलब हर तरह का कर्मकांड किया गया, देशभक्ति और धर्मभक्ति का हर पैतरा आजमाया गया, राजनीतिक कद को भुनाने की कोशिश की गई, पर कोई फायदा नहीं निकला.

दूसरी तरफ आस्ट्रेलिया के लोग थे. स्टेडियम में सिर्फ ‘नीली जर्सी’ ही हर तरफ दिखाई दे रही थी. ‘पीली जर्सी’ के समर्थक न के बराबर थे. अगर यह इतना ही बड़ा उत्सव होता तो यकीनन आस्ट्रेलियाई लोग भी भारत आने को उतावले दिखते, पर ऐसा हुआ नहीं.

याद रहे कि हर चीज में देशभक्ति और धर्मभक्ति को ऊपर रखना एक खतरनाक ट्रैंड है, जो भविष्य में भारत की एकता के लिए महंगा पड़ सकता है, क्योंकि ऐसा दिमागी अंधापन लोगों के मन में जहर भर देता है.

यह ठीक है कि भारतीय क्रिकेट टीम देश की नुमाइंदगी करती है, पर उसे हर मैच के लिए पैसे मिलते हैं. वह एक प्रोफैशनल टीम है और उसे अपनी हारजीत का इतना ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है कि उसे देशभक्ति या धर्मभक्ति से जोड़ दिया जाए.

फाइनल मैच में हारने के बाद भारतीय खिलाड़ियों ने आस्ट्रेलिया की टीम को गले लग कर बधाई दी थी, फिर यह धर्मयुद्ध कैसे हो गया? वैसे भी इस वर्ल्ड कप में विजेता टीम आस्ट्रेलिया को तकरीबन 33 करोड़ रुपए मिले हैं और भारत को तकरीबन 16 करोड़ रुपए. वे तो सभी मालामाल हो गए हैं और लोग दकियानूसी बातों में उलझ कर अपना कीमती समय बरबाद कर रहे हैं.

Oops Moment का शिकार हुई सना मकबूल खान, धड़ाम से गिर पड़ी एक्ट्रेस

टीवी और फिल्म जगत की जानी-मानी एक्ट्रेस सना मकूबल खान (Sana Makbul Khan) का इन दिनों एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है. इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर बवाल मचा दिया है. दरअसल, एक्ट्रेस उप्स मूमेंट का शिकार हुई है जिस का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे देख कर सोशल मीडिया यूजर्स मजाक बना रहे हैं. इस वीडियो को देख कर कई लोग सना पर हंस रहे हैं, तो कुछ लोगों ने एक्ट्रेस का साथ दिया है.

 

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आप को बता दें कि टीवी एक्ट्रेस सना मकबूल खान फिल्मी दुनिया में कदम रख चुकी हैं. इन दिनों सना फिल्मी दुनिया में अपने पैर जमाने में लगी हुई हैं. एक्ट्रेस लगातार साउथ की फिल्में साइन कर रही हैं, जिस के चलते सना की पॉपुलैरिटी भी तेजी से बढ़ रही है. सना की तसवीरें और वीडियोज सोशल मीडिया पर अकसर वायरल होती रहती हैं.

दरअसल, बीते दिनों सना मकबूल खान एक इवेंट में शामिल हुईं, जिस में एक्ट्रेस ब्लू कलर की डेनिम स्टाइल वाला वनपीस पहन कर पहुंचीं. इस मौके का एक वीडियो सामने आया है, जिस में मना मकबूल इवेंट से बाहर निकलती हुई दिख रही हैं, लेकिन अचानक ही वह रेड कार्पेट पर गिर पड़ती हैं. वीडियो में देखा जा सकता है कि सना मकबूल इतना अचानक से गिरती हैं कि कोई उन्हें संभाल भी नहीं पाता. हालांकि, एक्ट्रेस इस स्थिति को काफी अच्छी तरह से हैंडल करती हैं. एक्ट्रेस गिरने के बाद वापस से उठती हैं और बहुत ही कॉन्फिडेंस के साथ पैपराजी को पोज देती हैं.

एक्ट्रेस ने ब्लू ड्रेस के साथ ब्लैक हाई हील्स पैयर की थीं. सना ने अपना लुक काफी सिंपल रखा था. सना मकबूल का यह वीडियो देख कुछ लोग उन पर हंस रहे हैं. वहीं, कुछ लोगों का कहना है कि गिरने में कोई बड़ी बात नहीं है. इस तरह से कोई भी गिर सकता है.

बता दें कि सना मकबूल खान ने अपने कैरियर की शुरुआत मॉडलिंग से की थी. सना मकबूल टीवी सीरियल ‘कितनी मोहब्बत है’ और ‘इस प्यार को क्या नाम दूं’ में नजर आई थीं. एक्ट्रेस रियलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ में भी हिस्सा ले चुकी हैं. बता दें कि सना कई म्यूजिक वीडियो में भी काम कर चुकी हैं, जिन में ‘खेलेगी क्या’, ‘साइको’, ‘गल्लां’, ‘एक तू ही तो है’ आदि म्यूजिक वीडियो शामिल हैं.

Bigg Boss 17: क्या ‘बिग बौस’ के घर में होता है सैक्स? नाविदे सोल ने खोले कई राज

इन दिनों ‘बिग बौस सीजन 17’ बड़ा ही मजेदार चल रहा है. शो में एक से बढ़ कर एक कंटेस्टेंट एक दूसरे को टक्कर देते नजर आ रहे हैं. लेकिन अब शो में एक नए मुद्दे को ले कर बातें चल रही हैं कि क्या ‘बिग बौस’ के शो में सैक्स भी होता है? दरअसल, नाविद सोल (Naved Sole) ने बाहर निकल कर कई राज खोले है, जो कि अब मीडिया की हैडलाइन बन चुकी है.

 

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आप को बता दें कि ‘बिग बौस 17’ से निकले के बाद नाविद सोल ने कहा था कि अभिषेक को ले कर उन के मन में फीलिंग्स है. वही जब उन से पूछा गया कि क्या ‘बिग बौस’ के घर में सैक्स होता है? तो नाविद ने काफी शौकिंग बात बताई. दरअसल, समर्थ जुरेल घर में आने के बाद से कई क्लिप्स वायरल हुई हैं, जिन में दर्शकों ने उन का आपत्तिजनक व्यवहार नोटिस किया था. ऐसी ही एक क्लिप पर सवाल किया गया था. जिस पर नाविद ने बताया कि उन्होंने कंबल के अंदर अजीब हरकत देखी.

नाविद ‘बिग बौस 17’ के अंदर कुछ वक्त और रहना चाहते थे, ताकि वे अपने और अभिषेक के स्पैशल रिश्ते को और समझ सकें. यह बात उन्होंने सिद्धार्थ कनन को बताई थी. सोशल मीडिया पर वायरल क्लिप दिखा कर नाविद से पूछा गया कि क्या ‘बिग बौस’ के घर में सैक्स होता है? इस क्लिप में ईशा बैठी थीं और ब्लैकेंट के अंदर कुछ मूंवमेंट हो रहा था. पास में नाविद भी बैठे थे और यह सब देख रहे थे.


हालांकि, जैसे दिख रहा था उस क्लिप में ऐसा बिलकुल नहीं था. नाविद ने बताया कि वह जिग्ना का पैर था. वे अपने पैर की स्ट्रैचिंग करती रहती हैं. उस वक्त वे पैर को ऊपर-नीचे कर रही थीं. नाविद ने जिग्ना की तारीफ भी की. नाविद बोले कि मैं पूरी ईमानदारी से बताऊंगा और यह शरारत की वजह से नहीं बता रहा जब मैं मकान नं.1 वन हार्ट रूम में था, तब ईशा और समर्थ लगातार ब्लैकेंट के अंदर कुछ अजीब हरकत कर रहे है. मैं ने अंकिता से भी कहा कि ब्लैकेंट के अंदर कुछ हो रहा है. इस के बाद वे बोले कि मुझे नहीं पता कि अंदर क्या हो रहा था. इस के बाद वे हंस कर बात टाल देते हैं और बोलते हैं कि शायद योगा चल रहा होगा.

लाल छींटे : माहवारी ने ली मासूम की जान

‘‘मेरी उम्र कितनी होगी?’’ मिली ने कचरे के ढेर के बीच जमुना की ओर चलते हुए पूछा.

‘‘कौन जाने… शायद इस बरस 12वां साल लगा होगा तेरा,’’ जमुना ने अपने दिमाग पर थोड़ा दबाव दे कर कहा.

‘‘अच्छा… मैं जानती हूं कि आप जन्म देने वाली नहीं, बल्कि मेरी पालने वाली मां हो,’’ मासूम मिली के साथ इस दुनिया में आते ही क्या हुआ था, यह उसे कुछ दिन पहले ही पता चला था, जिस के चलते उस के नन्हे से दिमाग में अनेक तरह के सवाल घूमने लगे थे.

‘‘तुझे कैसे मालूम?’’ जमुना ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘मुझे शर्मिला ताई ने बताया. एक और बात कि आप ने मेरा नाम मिली ही क्यों रखा?’’ मिली ने जैसे आज सवालों की झाड़ी लगा दी थी.

‘‘क्योंकि तू मुझे ऐसे ही एक कूड़े के पहाड़ में दबी हुई मिली थी.’’

‘‘क्या तब आप ने मेरी मां को जाते देखा था? कैसी दिखती थी वह?’’

‘‘नहीं, अब छोड़ इन बातों को… अच्छा चल, आज तू पन्नी इकट्ठा कर और मैं टिन और कांच का सामान उठाती हूं… दिखा तेरे घाव…’’

‘‘आह… दुखता है…’’ कह कर मिली ने अपने हाथ समेट लिए.

‘‘पूरे एक हफ्ते बल्ब और कांच नहीं पकड़ना, ठीक है?’’ जमुना ने उस के हाथ पकड़ कर देखते हुए चिंता से कहा.

‘‘ठीक है मां…’’ कहते हुए मिली रोज की तरह कचरे में से कबाड़ी को बेचने लायक सामान को जगहजगह से उधड़ी बोरियों में बिना हाथों में दस्ताने या मुंह पर मास्क पहने बेखौफ हो कर भरती जा रही थी.

शाम हुई और कुछ पैसे हाथ में आए, जिन्हें ले कर वे दोनों मांबेटी अपने जैसे लोगों के बीच खुद से बनाई बस्ती में जा पहुंचीं.

‘‘मां, आज हाथों के साथसाथ न जाने क्यों पेट में भी दर्द हो रहा है,’’ मिली ने चोट से जख्मी हाथों को अपने पेट पर फेरते हुए जमुना से कहा.

‘‘कोई बात नहीं… तू आज आराम कर… मैं कुछ बनाने लायक बाजार से खरीद लाती हूं,’’ जमुना मिली को उस के बिस्तर पर बिठा कर बाजार चली गई.

दिनभर की थकी मिली के कई अंग जख्मों से भरे पड़े थे. जब वह सो कर उठी तो देखा कि चादर पर लाल छींटे थे. मिली सकपका गई कि उसे न जा जाने कौन सी बीमारी हो गई है.

तब तक मां भी घर आ चुकी थी. उस ने मिली के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बेटी, अब तू बड़ी हो गई है.’’

घर में न साफ पानी का इंतजाम था और न ही साफ नया कपड़ा था. क्या करें गरीब लड़कियां इस उम्र के उमड़ आए पड़ाव का?

मिली कभी कचरे से बीन कर घंटों पुराना अखबार लगाए रही, तो कभी वह कहीं से उड़ आए कपड़े से पोंछती रही. महीने दर महीने ऐसे ही बीतते चले गए. हाथों के घाव तो सूखे, मगर कहीं और के घाव हरे होते चले गए.

‘‘मां, आज मुझ से चला नहीं जा रहा, पेट में बहुत दर्द उठ रहा है,’’ कहते हुए मिली सड़क किनारे धूल के थपेड़ों बीच धम्म से बैठ गई.

‘‘आजकल तुझे क्या हो रहा है? तेरी तो उम्र भी नहीं इतनी बीमार होने की…’’ जमुना उस की दिनबदिन बिगड़ती हालत देख कर कहने लगी.

‘‘मां… मां…’’ मिली कुछ पल तड़पती रही और फिर बेहोश हो गई.

आसपास के लोग उसे सरकारी अस्पताल ले जाने लगे. कमरे के भीतर मिली का चैकअप कर लेडी डाक्टर ने बाहर आ कर कहा, ‘‘माफ कीजिएगा, बच्ची तो नहीं रही.’’

‘‘ऐसे कैसे मर गई मेरी मिली…’’ जमुना की जिंदगी में बस उस का ही तो साथ था.

‘‘उसे हुआ क्या था, यह तो बताइए…’’ मिली को अस्पताल ले जाने वाले लोगों में से एक शख्स ने पूछा.

‘‘टौक्सिक शौक सिंड्रोम…’’ लेडी डाक्टर ने मिली के मरने की वजह बताई.

‘‘इस का मतलब…?’’ उस आदमी ने दोबारा पूछा.

‘‘समझाती हूं… यह उन दिनों में कपड़े को 12 घंटे तक लगाए रखने से शुरू होता है, जिस से गंदगी बच्चेदानी तक पहुंच जाती है और खून में मिल जाती है. इस से ब्लड प्रैशर कम होने लगता है और कई बार हालत इतनी गंभीर हो जाती है कि मौत भी हो

सकती है…’’ लेडी डाक्टर इतना कह कर चली गईं.

उसी भले इनसान ने मिली का क्रियाकर्म कराने का पूरा खर्चा उठाया. वह जानता था कि जिन लोगों के पास जीने तक को पैसे नहीं हैं, वे खुद के मरने पर कहां से कोई इंतजाम कर पाएंगे.

देखा जाए तो मिली का क्रियाकर्म आज हो रहा था, पर वह तो अपनी जन्म देने वाली मां के लिए पैदा होते ही मर चुकी थी. उस के होने या न होने से किसे परवाह. अनचाही बेटियों के लिए यहां किसे चिंता थी. धूधू कर जलती उस की चिता आज गरीबी से नजात पा रही थी. मिली की सांसें वे लाल छींटे ले गए.

दोस्तो, माहवारी किसी के साथ पक्षपात नहीं करती. महीने के ये 4 दिन किसी औरत के धर्म, अमीरगरीब की हैसियत देख कर कमज्यादा नहीं होते.

कई बहनबेटियों की जिंदगी उतनी आसान नहीं कि वे हम और आप की तरह सैनेटरी पैड जैसी बुनियादी चीजों का हर महीने आराम से खर्च उठा सकें.

कितनी बच्चियों के लिए यह माहवारी उन की पढ़ाईलिखाई में रोड़ा बनती आई है, क्योंकि महज उन 4 दिनों में आने वाले लाल छींटे उन्हें घर बैठने पर मजबूर कर देते हैं. धीरेधीरे ये 4 दिन महीनों में बढ़ते जाते हैं और महीने सालों में, नतीजतन उन की पढ़ाईलिखाई बंद करा दी जाती है.

इतना नहीं, संसाधन की कमी के चलते उन्हें बच्चेदानी में इंफैक्शन होने का डर बना रहता है और उस से होने वाली मौत का साया हमेशा उन के सिर पर मंडराता रहता है.

साथी : नौ अलबेले दोस्त

Social Story in Hindi: वे 9 थे. 9 के 9 मूक और बधिर. वे न तो सुन सकते थे, न ही बोल सकते थे. पर वे अपनी इस हालत से न तो दुखी थे, न ही परेशान. सभी खुशी और उमंग से भरे हुए थे और खुशहाल जिंदगी गुजार रहे थे. वजह, सब के सब पढ़ेलिखे और रोजगार से लगे हुए थे. अनंत व अनिल रेलवे की नौकरी में थे, तो विकास और विजय बैंक की नौकरी में. प्रभात और प्रभाकर पोस्ट औफिस में थे, तो मुकेश और मुरारी प्राइवेट फर्मों में काम करते थे. 9वां अवधेश था. वह फलों का बड़े पैमाने पर कारोबार करता था. अवधेश ही सब से उम्रदराज था और अमीर भी. जब उन में से किसी को रुपएपैसों की जरूरत होती थी, तो वे अवधेश के पास ही आते थे. अवधेश भी दिल खोल कर उन की मदद करता था. जरूरत पूरी होने के बाद जैसे ही उन के पास पैसा आता था, वे अवधेश को वापस कर देते थे.

वे 9 लोग आपस में गहरे दोस्त थे और चाहे कहीं भी रहते थे, हफ्ते के आखिर में पटना की एक चाय की दुकान पर जरूर मिलते थे. पिछले 5 सालों से यह सिलसिला बदस्तूर चल रहा था.

वे सारे दोस्त शादीशुदा और बालबच्चेदार थे. कमाल की बात यह थी कि उन की पत्नियां भी मूक और बधिर थीं. पर उन के बच्चे ऐसे न थे. वे सामान्य थे और सभी अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे.

सभी दोस्त शादीसमारोह, पर्वत्योहार में एकदूसरे के घर जाते थे और हर सुखदुख में शामिल होते थे. वक्त की रफ्तार के साथ उन की जिंदगी खुशी से गुजर रही थी कि अचानक उन सब की जिंदगी में एक तूफान उठ खड़ा हुआ.

इस बार जब वे लोग उस चाय की दुकान पर इकट्ठा हुए, तो उन में अवधेश नहीं था. उस का न होना उन सभी के लिए चिंता की बात थी. शायद यह पहला मौका था, जब उन का कोईर् दोस्त शामिल नहीं हुआ था.

वे कई पल तक हैरानी से एकदूसरे को देखते रहे, फिर अनंत ने इशारोंइशारों में अपने दूसरे दोस्तों से इस की वजह पूछी. पर उन में से किसी को इस की वजह मालूम न थी.

वे कुछ देर तक तो खामोश एकदूसरे को देखते रहे, फिर अनिल ने अपनी जेब से पैड और पैंसिल निकाली और उस पर लिखा, ‘यह तो बड़े हैरत की बात है कि आज अवधेश हम लोगों के बीच नहीं है. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी हुई है.’

लिखने के बाद उस ने पैड अपने दोस्तों की ओर बढ़ाया. उसे पढ़ने के बाद प्रभात ने अपने पैड पर लिखा,

‘पर क्या?’

‘इस का तो पता लगाना होगा.’

‘पर कैसे?’

‘अवधेश को मैसेज भेजते हैं.’

सब ने रजामंदी में सिर हिलाया. अवधेश को मैसेज भेजा गया. सभी दोस्त मैसेज द्वारा ही एकदूसरे से बात करते थे, जब वे एकदूसरे से दूर होते थे. पर मैसेज भेजने के बाद जब घंटों बीत गए और अवधेश का कोई जवाब न आया, तो सभी घबरा से गए.

सभी ने तय किया कि अवधेश के घर चला जाए. अवधेश का घर वहां से तकरीबन 5 किलोमीटर दूर था.

अवधेश के आठों दोस्त उस के घर पहुंचे. उन्होंने जब उस के घर का दरवाजा खटखटाया, तो अवधेश की पत्नी आभा ने दरवाजा खोला.

दरवाजे पर अपने पति के सारे दोस्तों को देखते ही आभा की आंखें आंसुओं से भरती चली गईं.

आभा को यों रोते देख उन के मन में डर के बादल घुमड़ने लगे. उन्होंने इशारोंइशारों में पूछा, ‘अवधेश है घर पर?’

आभा ने सहमति में सिर हिलाया, फिर उन्हें ले कर अपने बैडरूम में आई. बैडरूम में अवधेश चादर ओढ़े आंखें बंद किए लेटा था.

आभा ने उसे झकझोरा. उस ने सभी दोस्तों को अपने कमरे में देखा, तो उस की आंखों में हैरानी के भाव उभरे. वह उठ कर बिछावन पर बैठ गया. पर उस की आंखों में उभरे हैरानी के भाव कुछ देर ही रहे, फिर उन में वीरानी झांकने लगी. वह खालीखाली नजरों से अपने दोस्तों को देखने लगा. ऐसा करते हुए उस के चेहरे पर उदासी और निराशा के गहरे भाव छाए हुए थे.

उस के दोस्त कई पल तक बेहाल अवधेश को देखते रहे, फिर विजय ने उस से इशारोंइशारों में पूछा, ‘यह तुम ने अपना क्या हाल बना रखा है? हुआ क्या है? आज तुम हम से मिलने भी नहीं आए?’

अवधेश ने कोई जवाब नहीं दिया. वह बस खालीखाली नजरों से उन्हें देखता रहा. उस के बाकी दोस्तों ने भी उस की इस बेहाली की वजह पूछी, पर वह खामोश रहा.

अपनी हर कोशिश में नाकाम रहने पर उन्होंने आभा से पूछा, तो उस ने पैड पर लिखा, ‘मुझे भी इन की खामोशी और उदासी की पूरी वजह मालूम नहीं, जो बात मालूम है, उस के मुताबिक इन्हें अपने कारोबार में घाटा हुआ है.’

‘क्या यह पहली बार हुआ है?’ विकास ने अपने पैड पर लिखा.

‘नहीं, ऐसा कई बार हुआ है, पर इस से पहले ये कभी इतना उदास और निराश नहीं हुए.’

‘फिर, इस बार क्या हुआ है?’

‘लगता है, इस बार घाटा बहुत ज्यादा हुआ है.’

‘यही बात है?’ लिख कर विकास ने पैड अवधेश के सामने किया.

पर अवधेश चुप रहा. सच तो यह था कि कारोबार में लगने वाले जबरदस्त घाटे ने उस की कमर तोड़ दी थी और वह गहरे डिप्रैशन का शिकार हो गया था.

जब सारे दोस्तों ने उस पर मिल कर दबाव डाला, तो अवधेश ने पैड पर लिखा, ‘घाटा पूरे 20 लाख का है.’

जब अवधेश ने पैड अपने दोस्तों के सामने रखा, तो उन की भी आंखें फटने को हुईं.

‘पर यह हुआ कैसे…?’ अनंत ने अपने पैड पर लिखा.

एक बार जब अवधेश ने खामोशी तोड़ी, तो फिर सबकुछ बताता चला गया. उस ने एक त्योहार पर बाहर से

20 लाख रुपए के फलों की बड़ी खेप मंगवाई थी. पर कश्मीर से आने वाले फलों के ट्रक बर्फ खिसकने के चलते 15 दिनों तक जाम में फंस गए और फल बरबाद हो गए.

‘तो क्या तुम ने इतने बड़े सौदे का इंश्योरैंस नहीं कराया था?’

‘नहीं. चूंकि यह कच्चा सौदा है, सो इंश्योरैंस कंपनियां अकसर ऐसे सौदे का इंश्योरैंस नहीं करतीं.’

‘पर ट्रांसपोर्ट वालों पर तो इस की जिम्मेदारी आती है. क्या वे इस घाटे की भरपाई नहीं करेंगे?’

‘गलती अगर उन की होती, तो उन पर यह जिम्मेदारी जाती, पर कुदरती मार के मामले में ऐसा नहीं होता.’

‘और जिन्होंने यह माल भेजा था?’

‘उन की जिम्मेदारी तो तभी खत्म हो जाती है, जब वे माल ट्रकों में भरवा कर रवाना कर देते है.’

‘और माल की पेमेंट?’

‘पेमेंट तो तभी करनी पड़ती है, जब इस का और्डर दिया जाता है. थोड़ीबहुत पेमेंट बच भी जाती है, तो माल रवाना होते ही उस का चैक भेज दिया जाता है.’

‘पेमेंट कैसे होती है?’

‘ड्राफ्ट से.’

‘क्या तू ने इस माल का पेमेंट कर दिया था?’

‘हां.’

‘ओह…’

‘तू यहां घर पर है. दुकान और गोदाम का क्या हुआ?’

‘बंद हैं.’

‘बंद हैं, पर क्यों?’

‘तो और क्या करता. वहां महाजन पहुंचने लगे थे?’

‘क्या मतलब?’

‘इस सौदे का तकरीबन आधा पैसा महाजनों का ही था.’

‘यानी 10 लाख?’

‘हां.’

इस खबर से सब को सांप सूंघ गया. कमरे में एक तनावभरी खामोशी छा गई. काफी देर बाद अनंत ने यह खामोशी तोड़ी. उस ने पैड पर लिखा, ‘पर इस तरह से दुकान और गोदाम बंद कर देने से क्या तेरी समस्या का समाधान हो जाएगा?’

‘पर दुकान खोलने पर महाजनों का तकाजा मेरा जीना मुश्किल कर देगा.’

‘ऐसे में वे तकाजा करना छोड़ देंगे क्या?’

‘नहीं, और मेरी चिंता की सब से बड़ी वजह यही है. उन में से कुछ तो घर पर भी पहुंचने लगे हैं. अगर कुछ दिन तक उन का पैसा नहीं दिया गया, तो वे कड़े कदम भी उठा सकते हैं.’

‘जैसे?’

‘वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं. मुझे जेल भिजवा सकते हैं.’

मामला सचमुच गंभीर था. बात अगर थोड़े पैसों की होती, तो शायद वे कुछ कर सकते थे, पर मामला 20 लाख रुपयों का था. सो उन का दिमाग काम नहीं कर रहा था. पर इस बड़ी समस्या का कुछ न कुछ हल निकालना ही था, सो अनंत ने लिखा, ‘अवधेश, इस तरह निराश होने से कुछ न होगा. तू ऐसा कर कि महाजनों को अगले रविवार अपने घर बुला ले. हम मिलबैठ कर इस समस्या का कोई न कोई हल निकालने की कोशिश करेंगे.’

अगले रविवार को अवधेश के सारे दोस्त उस के ड्राइंगरूम में थे. 4 महाजन भी थे. अवधेश एक तरफ पड़ी कुरसी पर चुपचाप सिर झांकाए बैठा था. उस के पास ही उस की पत्नी आभा व 10 साला बेटा दीपक खड़ा था.

थोड़ी देर पहले आभा ने सब को चाय पिलाई थी. आभा के बहुत कहने पर महाजनों ने चाय को यों पीया था, जैसे जहर पी रहे हों.

थोड़ी देर तक सब खामोश बैठे थे. वे एकदूसरे को देखते रहे, फिर एक महाजन, जिस का नाम महेशीलाल था, बोला, ‘‘अवधेश, तुम ने हमें यहां क्यों बुलाया है और ये लोग कौन हैं?’’

दीपक ने उसकी बात इशारों में अपने पिता को समझाई, तो अवधेश ने पैड पर लिखा, ‘ये मेरे दोस्त हैं और मैं इन के जरीए आप के पैसों के बारे में बात करना चाहता हूं.’

महाजनों ने बारीबारी से उस की लिखी इबारत पढ़ी, फिर वे चारों उस के दोस्तों की ओर देखने लगे. बदले में अनंत ने लिख कर अपना और दूसरे लोगों का परिचय उन्हें दिया.

उन का परिचय पा कर महाजन हैरान रह गए. एक तो यही बात उन के लिए हैरानी वाली थी कि अवधेश की तरह उस के दोस्त भी मूक और बधिर थे. दूसरे, वे इस बात से हैरान थे कि सब के सब अच्छी नौकरियों में लगे हुए थे.

चारों महाजन कई पल तक हैरानी से उन्हें देखते रहे, फिर महेशीलाल ने लिखा, ‘हमें यह जान कर खुशी भी हुई और हैरानी भी कि आप अपने दोस्त की मदद करना चाहते हैं. पर हम करोबारी हैं. पैसों के लेनदेन का कारोबार करते हैं. सो, आप के दोस्तों ने कारोबार के लिए हम से जो पैसे लिए थे, वे हमें वापस चाहिए.’

‘आप अवधेश के साथ कितने दिनों से यह कारोबार कर रहे हैं?’ अनंत ने लिखा.

‘3 साल से.’

‘क्या अवधेश ने इस से पहले कभी पैसे लौटाने में आनाकानी की? कभी इतनी देर लगाई?’

‘नहीं.’

‘तो फिर इस बार क्यों? इस का जवाब आप भी जानते हैं और हम भी. अवधेश का माल जाम में फंस कर बरबाद हो गया और इसे 20 लाख रुपए का घाटा हुआ. आप लोगों के साथ यह कई साल से साफसुथरा कारोबार करता रहा है. अगर इस ने आप लोगों की मदद से लाखों रुपए कमाए हैं, तो आप ने भी इस के जरीए अच्छा पैसा बनाया है. अब जबकि इस पर मुसीबत आई है, तब क्या आप का यह फर्ज नहीं बनता कि आप लोग इस मुसीबत से उबरने में इस की मदद करें? इसे थोड़ी मुहलत और माली मदद दें, ताकि यह इस मुसीबत से बाहर आ सके?’

यह लिखा देख चारों महाजन एकदूसरे का मुंह देखने लगे, फिर महेशीलाल ने लिखा, ‘हम कारोबारी हैं और कारोबार भावनाओं पर नहीं, बल्कि लेनदेन पर चलता है. अवधेश को घाटा हुआ है तो यह उस का सिरदर्द है, हमें तो अपना पैसा चाहिए.’

‘कारोबार भावनाओं पर ही चलता है, यह गलत है. हम भी अपने बैंक से लोगों को कर्ज देते हैं. अगर किसानों की फसल किसी वजह से बरबाद हो जाती है, तो हम कर्ज वसूली के लिए उन्हें कुछ समय देते हैं या फिर हालात काफी बुरे होने पर कर्जमाफी जैसा कदम भी उठाते हैं.

‘आप अगर चाहें, तो अवधेश के खिलाफ केस कर सकते हैं, उसे जेल भिजवा सकते हैं. पर इस से आप को आप का पैसा तो नहीं मिलेगा. दूसरी हालत में हम आप से वादा करते हैं कि आप का पैसा डूबेगा नहीं. हां, उस को चुकाने में कुछ वक्त लग सकता है.’

कमरे का माहौल अचानक तनाव से भर उठा. चारों महाजन कई पल तक एकदूसरे से रायमशवरा करते रहे, फिर महेशीलाल ने लिखा, ‘हम अवधेश को माली मदद तो नहीं, पर थोड़ा समय जरूर दे सकते हैं.’

‘थैंक्यू.’

थोड़ी देर बाद जब महाजन चले गए, तो दोस्तों ने अवधेश की ओर देखा और पैड पर लिखा, ‘अब तू क्या कहता है?’

अवधेश ने जो कहा, उस के अंदर की निराशा को ही झलकाता था. उस का कहना था कि समय मिल जाने से क्या होगा? उन महाजनों का पैसा कैसे लौटाया जाएगा? उस का कारोबार तो चौपट हो गया है. उसे जमाने के लिए पैसे चाहिए और पैसे उस के पास हैं नहीं.

‘हम तुम्हारी मदद करेंगे.’

‘पर कितनी, 5 हजार… 10 हजार. ज्यादा से ज्यादा 50 हजार, पर इस से बात नहीं बनती.’

इस के बाद भी अवधेश के दोस्तों ने उसे काफी समझाया. उसे उस की पत्नी और बच्चों के भविष्य का वास्ता दिया, पर निराशा उस के अंदर यों घर कर गई थी कि वह कुछ करने को तैयार न था.

आखिर में दोस्तों ने अवधेश की पत्नी आभा से बात की. उसे इस बात के लिए तैयार किया कि वह कारोबार संभाले. उन्होंने ऐसे में उसे हर तरह की मदद करने का वादा किया. कोई और रास्ता न देख कर आभा ने हां कर दी.

बैठ चुके कारोबार को खड़ा करना कितना मुश्किल है, यह बात आभा को तब मालूम हुई, जब वह ऐसा करने को तैयार हुई. वह कई बार हताश हुई, कई बार निराश हुई, पर हर बार उस के पति के दोस्तों ने उसे हिम्मत बंधाई.

उन से हिम्मत पा कर आभा दिनरात अपने कारोबार को संभालने में लग गई. फिर पर्वत्योहार के दिन आए. आभा ने फलों की एक बड़ी डील की. उस की मेहनत रंग लाई और उसे 50 हजार रुपए का मुनाफा हुआ.

इस मुनाफे ने अवधेश के निराश मन में भी उम्मीद की किरण जगा दी और वह भी पूरे जोश से कारोबार में लग गया. किस्तों में महाजनों का कर्ज उतारा जाने लगा और फिर वह दिन भी आ गया, जब उन की आखिरी किस्त उतारी जानी थी.

इस मौके पर अवधेश के सारे दोस्त इकट्ठा थे. जगह वही थी, लोग वही थे, पर माहौल बदला हुआ था. पहले अवधेश और आभा के मन में निराशा का अंधेरा छाया हुआ था, पर आज उन के मन में आशा और उमंग की ज्योति थी.

महाजन अपनी आखिरी किस्त ले कर ड्राइंगरूम से निकल गए, तो आभा अवधेश के दोस्तों के सामने आई और उन के आगे हाथ जोड़ दिए. ऐसा करते हुए उस की आंखों में खुशी के आंसू थे.

अवधेश ने पैड पर लिखा, ‘दोस्तो, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि आप लोगों का यह एहसान कैसे उतारूंगा.’

उस के दोस्त कई पल तक उसे देखते रहे, फिर अनंत ने लिखा, ‘कैसी बातें करता है तू? दोस्त दोस्त पर एहसान नहीं करते, सिर्फ दोस्ती निभाते हैं और हम ने भी यही किया है.’

थोड़ी देर वहां रह कर वे सारे दोस्त कमरे से निकल गए. आभा कई पल तक दरवाजे की ओर देखती रही, फिर अपने पति के सीने से लग गई.

सावित्री और सत्य : एक अनोखी लव स्टोरी

Romantic Story in Hindi: सावित्री को नींद नहीं आ रही थी. अभी पिछले साल ही उस के पति की मौत हुई थी. उस की शादीशुदा जिंदगी का सुख महज एक साल का था. सावित्री ससुराल में ही रह रही थी. उस का पति ही बूढ़े सासससुर की एकलौती औलाद था. ससुराल और मायका दोनों ही पैसे वाले थे. सावित्री अपने मायके में 4 बच्चों में सब से छोटी और एकलौती लड़की थी. मांबाप और भाइयों की दुलारी… मैट्रिक पास होते ही सावित्री की शादी हो गई थी. पति की मौत के बाद उस का बापू उसे लेने आया था, पर वह मायके नहीं गई. उस ने बापू से कहा था कि आप के तो 3 बच्चे और हैं, पर मेरे सासससुर का तो कोई नहीं?है. पहाड़ी की तराई में एक गांव में सावित्री का ससुराल था. गांव तो ज्यादा बड़ा नहीं था, फिर भी सभी खुशहाल थे. उस के ससुर उस इलाके के सब से धनी और रसूखदार शख्स थे. वे गांव के सरपंच भी थे.

पहाडि़यों पर रात में ठंडक रहती ही है. थोड़ी देर पहले ही बारिश रुकी थी. सावित्री कंबल ओढ़े लेटी थी, तभी अचानक ही जोर के धमाके की आवाज से वह चौंक पड़ी थी.

वह बिस्तर से नीचे उतर आई. शाल से अपने को ढकते हुए बगल में सास के कमरे में गई. वहां उस ने देखा कि सासससुर दोनों ही जोरदार धमाके की आवाज से जाग गए थे.

उस के ससुर स्वैटर पहन कर टौर्च व छड़ी उठा कर बाहर जाने के लिए निकलने लगे, तो सावित्री ने कहा, ‘‘बाबूजी, मैं आप को रात में अकेले नहीं जाने दूंगी. मैं भी आप के साथ चलूंगी.’’

काफी मना मरने के बावजूद सावित्री भी उन के साथ चल पड़ी थी.

जब सावित्री बाहर निकली, तो थोड़ी दूरी पर ही खेतों के बीच उस ने आग की ऊंची लपटें देखीं. गांव के कुछ और लोग भी धमाके की आवाज सुन कर जमा हो चुके थे. करीब जाने पर देखा कि एक छोटे हवाईजहाज के टुकड़े इधरउधर जल रहे थे. लपटें काफी ऊंची और तेज थीं. किसी में पास जाने की हिम्मत नहीं थी. देखने से लग रहा था कि सबकुछ जल कर राख हो चुका है.

तभी सावित्री की नजर मलबे से दूर पड़े किसी शख्स पर गई, जिस के हाथपैरों में कुछ हरकत हो रही थी. वह अपने ससुर के साथ उस के नजदीक गई. कुछ और लोग भी साथ हो लिए थे.

उस नौजवान का चेहरा जलने से काला हो गया था. हाथपैरों पर भी जलने के निशान थे. वह बेहोश पड़ा था, पर रहरह कर अपने हाथपैर हिला रहा था.

तभी एक गांव वाले ने उस की नब्ज देखी और फिर नाक के पास हाथ ले जा कर सावित्री के ससुर से बोला, ‘‘सरपंचजी, इस की सांसें चल रही हैं. यह अभी जिंदा है, पर इस की हालत नाजुक दिखती है. इस को तुरंत इलाज की जरूरत है.’’

सरपंच ने कहा, ‘‘हां, इसे जल्द ही अस्पताल ले जाना होगा. प्रशासन को अभी इस की सूचना भी शायद न मिली हो. सूचना मिलने के बाद भी सुबह के पहले यहां पर किसी के आने की उम्मीद नहीं है. तुम में से कोई मेरी मदद करो. मेरा ट्रैक्टर ले कर आओ. इसे शहर के अस्पताल ले चलते हैं.’’

थोड़ी देर में ही 2-3 नौजवान ट्रैक्टर ले कर आ गए थे. उस घायल नौजवान को ट्रैक्टर से ही शहर के बड़े अस्पताल ले गए. सावित्री भी सरपंचजी के साथ शहर तक गई थी.

अस्पताल में डाक्टर ने देख कर कहा कि हालत नाजुक है. पुलिस को भी सूचित करना होगा. यह काम सरपंच ने खुद किया और डाक्टर को तुरंत इलाज शुरू करने को कहा.

इमर्जैंसी वार्ड में चैकअप करने के बाद डाक्टर ने उसे इलाज के लिए आईसीयू में भेज दिया. पर उस शख्स के पास से कोई पहचानपत्र या बोर्डिंग पास भी नहीं मिला.

हादसे की जगह के पास से एक बुरी तरह जला हुआ पर्स मिला था. उस पर्स में ऐसा कुछ भी सुबूत नहीं मिला था, जिस से उस की पहचान हो सके.

डाक्टर ने इलाज तो शुरू कर दिया था. सरपंचजी खुद गारंटर बने थे यानी इलाज का खर्च उन्हें ही उठाना था.

सुबह होते ही इस हादसे की खबर रेडियो और टैलीविजन पर फैल चुकी थी.

पुलिस भी आ गई थी. पुलिस को सारी बात बता कर उस की सहमति ले कर सरपंचजी अपनी बहू सावित्री के साथ अपने घर लौट आए थे.

शहर के एयरपोर्ट पर अफरातफरी का सा माहौल था. एयरपोर्ट शहर से 20 किलोमीटर दूर और गांव की विपरीत दिशा में था. लोग उस उड़ान से आने वाले अपने रिश्तेदारों का हाल जानने के लिए बेचैन थे.

एयरलाइंस के मुलाजिमों ने तो सभी सवारियों और हवाईजहाज के मुलाजिमों की लिस्ट लगा रखी थी, जिस में सब को ही मरा ऐलान किया गया था.

थोड़ी ही देर में टैलीविजन पर एक ब्रेकिंग न्यूज आई कि एक मुसाफिर इस हादसे में बच गया है, जिस की हालत नाजुक है, पर उस की पहचान नहीं हो सकी है. सब के मन में उम्मीद की एक किरण जग रही थी कि शायद वह उन्हीं का सगा हो.

अस्पताल में भीड़ उमड़ पड़ी थी. डाक्टर ने कहा कि अभी वह वैंटिलेटर पर है और हालत नाजुक है. मरीज के पास तो अभी कोई नहीं जा सकता है, उसे सिर्फ बाहर से शीशे से देखा जा सकता है. लोग बाहर से ही उस को देख कर पहचानने की कोशिश कर रहे थे, पर यह मुमकिन नहीं था. उस का चेहरा काफी जला हुआ था. उस पर दवा का लेप भी लगा था.

इधर सरपंच रोज सुबह अस्पताल आते थे, अकसर सावित्री भी साथ होती थी. वह उन को अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी, क्योंकि सरपंच खुद दिल के मरीज थे.

कुछ दिनों के बाद डाक्टर ने सरपंच से कहा, ‘‘मरीज खतरे से बाहर तो है, पर वह कोमा में जा चुका है. कोमा से बाहर निकलने में कितना समय लगेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है. कुछ ही दिनों में उसे आईसीयू से निकाल कर स्पैशल वार्ड में भेज देंगे.

‘‘दूसरी बात यह कि उस का चेहरा बहुत खराब हो चुका है. अगर वह कोमा से बाहर भी आता है, तो आईने में अपनेआप को देख कर उसे गहरा सदमा लगेगा.’’

सरपंच ने पूछा, ‘‘तो इस का इलाज क्या है?’’

डाक्टर बोला, ‘‘उस के चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी करनी होगी, पर इस में काफी खर्च होगा. अभी तक के इलाज का खर्च तो आप देते आए हैं.’’

सरपंच ने कहा, ‘‘आप पैसे की चिंता न करें. अगर यह ठीक हो जाता है, तो मैं समझेगा कि मेरा बेटा मुझे दोबारा मिल गया है.’’

कुछ दिनों के बाद उस मरीज को स्पैशल वार्ड में शिफ्ट किया गया था. वहां उस की देखभाल दिन में तो अकसर सावित्री ही किया करती थी, लेकिन रात में सरपंच के कहने पर गांव से भी कोई न कोई आ जाता था.

तकरीबन 2 महीने बाद उस की प्लास्टिक सर्जरी भी हुई. उस आदमी को नया चेहरा मिल गया था.

इसी बीच सरपंच के ट्रैक्टर की ट्रौली पर एक बैल्ट मिली. हादसे के बाद उस नौजवान को इसी ट्रौली से अस्पताल पहुंचाया गया था. शायद किसी ने उसे आराम पहुंचाने के लिए बैल्ट निकाल कर ट्रौली के एक कोने में रख दी थी, जिस पर अब तक किसी की नजर नहीं पड़ी थी. बैल्ट पर 2 शब्द खुदे थे एसके. उस बैल्ट को देख कर सरपंच को लगा कि उस आदमी की पहचान में यह एक अहम कड़ी साबित हो.

इस की सूचना उन्होंने पुलिस को दे दी. साथ ही, लोकल टैलीविजन चैनल और रेडियो पर भी इसे प्रसारित किया गया.

अगले ही दिन एक बुजुर्ग दंपती उसे देखने अस्पताल आए थे. उन का शहर में काफी बड़ा कारोबार था, पर चेहरा बदल जाने के चलते वे उसे पहचान नहीं पा रहे थे. बैल्ट भी पुलिस को दे दी गई थी.

वहां पर उन्होंने सावित्री को देखा, जो मन लगा कर मरीज की सेवा कर रही थी. अस्पताल से निकल कर वे सीधे पुलिस स्टेशन गए और वहां उस बैल्ट को देख कर कहा कि ऐसी ही एक बैल्ट उन के बेटे की भी थी, जिस पर एसके लिखा था. यह बैल्ट जानबूझ कर उन के बेटे ने खरीदी थी, क्योंकि एसके उस के नाम ‘सत्य कुमार’ से मिलती थी. फिर भी संतुष्ट हुए बिना उसे अपना बेटा मानने में कुछ ठीक नहीं लग रहा था. फिलहाल वे अपने घर लौट गए थे. पर सरपंच का मन कह रहा था कि यह सत्य कुमार ही है.

तकरीबन एक महीना गुजर चुका था. सरपंच और सावित्री दोनों ही सत्य कुमार की देखभाल कर रहे थे.

एक दिन अचानक सावित्री ने देखा कि सत्य कुमार के होंठ फड़फड़ा रहे थे और हाथ से कुछ इशारा कर रहा था. उस ने तुरंत डाक्टर को यह बात कही.

डाक्टर ने कहा कि दवा अपना काम कर रही है और उन्हें पूरी उम्मीद है कि अब वह बिलकुल ठीक हो जाएगा.

कुछ दिन बाद सावित्री उसे जब अपने हाथ से खाना खिला रही थी, सत्य कुमार ने उस का हाथ पकड़ कर कुछ बोलने की कोशिश की थी.

उसी शाम जब सावित्री अपने घर जाने के लिए उठी, तो सत्य कुमार ने उस का हाथ पकड़ कर बहुत कोशिश के बाद लड़खड़ाती जबान में बोला, ‘‘रुको, मैं यहां कैसे आया हूं? मैं तो हवाईजहाज में था. मैं तो कारोबार के सिलसिले में बाहर गया हुआ था.’’

फिर अपने बारे में उस ने कुछ जानकारी दी थी. सरपंच और सावित्री दोनों की खुशी का ठिकाना न था. उन्होंने डाक्टर को बुलाया. डाक्टर ने उसे चैक कर कहा, ‘‘मुबारक हो. अब यह होश में आ गया है. इस के मातापिता को सूचना दे दें.’’

सावित्री और सरपंच अस्पताल में ही रुक कर सत्य कुमार के मातापिता का इंतजार कर रहे थे. वे लोग भी खबर मिलते ही दौड़े आए थे. सत्य कुमार ने अपने मातापिता को पहचान लिया था और हादसे के पहले तक की बात बताई. उस के बाद का उसे कुछ याद नहीं था.

सत्य कुमार के पिता ने सरपंच और सावित्री का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, ‘‘आप के उपकार के लिए हम लोग हमेशा कर्जदार रहेंगे. यह लड़की आप की बेटी है न?’’

सरपंच बोले, ‘‘मेरे लिए तो बेटी से भी बढ़ कर है. है तो मेरी बहू, पर शादी के एक साल के अंदर ही मेरा एकलौता बेटा हम लोगों को अकेला छोड़ कर चला गया, पर सावित्री ने हमारा साथ नहीं छोड़ा.

‘‘मैं तो चाहता था कि यह अपने मांबाप के पास चली जाए और दूसरी शादी कर ले, पर यह तैयार नहीं थी.’’

सत्य कुमार के पिता ने कहा, ‘‘अगर आप को कोई एतराज नहीं है, तो मैं सावित्री को अपनी बहू बनाने को तैयार हूं, क्यों सत्य कुमार? ठीक रहेगा न?’’

सत्य कुमार ने सहमति में सिर हिला कर अपनी हामी भर दी थी. फिर सेठजी ने सत्य कुमार की मां की ओर देख कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘अरे सेठानी, तुम भी तो कुछ कहो.’’

सेठानी बोलीं, ‘‘आप लोगों ने तो मेरे मुंह की बात छीन ली है. मेरे बोलने को कुछ बचा ही नहीं है.’’

फिर वे सावित्री की ओर देख कर बोलीं, ‘‘तुम्हें कोई एतराज तो नहीं है?’’

सावित्री की आंखों से आंसू की कुछ बूंदें छलक कर उस के गालों पर आ गई थीं. वह बोली, ‘‘मैं आप लोगों की भावनाओं का सम्मान करती हूं, पर मैं अपने सासससुर को अकेला छोड़ कर नहीं जा सकती.’’

सरपंच ने सावित्री को समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें एतराज नहीं होना चाहिए, क्योंकि हम सभी लोगों की खुशी इसी में है. और हम लोगों को अब जीना ही कितने दिन है, जबकि तुम्हारी सारी जिंदगी आगे पड़ी है.’’

सेठजी ने भी सरपंच की बातों को सही ठहराते हुए कहा, ‘‘तुम जब भी चाहो और जितने दिन चाहो, सरपंचजी के यहां बीचबीच में आती रहना.’’

सावित्री सेठजी से बोली, ‘‘सत्यजी को आप ने जन्म दिया है और बाबूजी ने इन्हें दोबारा जन्म दिया है, तो इन की भी तो कुछ जिम्मेदारी बनती है मेरे ससुरजी के लिए.’’

सेठजी बोले, ‘‘मैं मानता हूं और मेरा बेटा भी इतनी समझ रखता है. सत्य कुमार को तो 2-2 पिताओं का प्यार मिलेगा. सत्य कुमार सरपंचजी का उतना ही खयाल रखेगा, जितना वह हमारा रखता है.’’

सावित्री और सत्य दोनों एकदूसरे को देख रहे थे. उन लोगों की बातें सुन कर वह कुछ संतुष्ट लग रही थी.

उस दिन सारी रात लोगों ने अस्पताल में ही बिताई थी. सावित्री के मायके में भी सरपंच ने यह बात बता दी थी. सभी को यह रिश्ता मंजूर था. सरपंच ने धूमधाम से अपने घर से ही सावित्री की शादी की थी.

बुढ़ापे में बेटों से चाहत : सही या गलत?

Society News in Hindi: समाचारपत्र (News Paper) में हर रोज नकारात्मकता और विकृत सचाई से रूबरू होना ही होता है. एक सुबह खेल समाचार पढ़ते हुए पन्ने पर एक समाचार मन खराब करने वाला था. अवकाशप्राप्त निर्देशक का शव बेटे की बाट जोहता रह गया. एक समय महत्त्वपूर्ण पद (Important Post) पर आसीन व्यक्ति, जिस की पत्नी मर चुकी थी, आज वृद्धाश्रम (Oldage Home) में रह रहा था. उन का एकमात्र बेटा विदेश में जा बसा था. उसे खबर ही एक दिन बाद मिली और उस ने तुरंत आने में असमर्थता जाहिर की. देश में बसे रिश्तेदारों ने भी अंतिम क्रियाकर्म करने से इनकार कर दिया. आश्रम के संरक्षक ने शवदहन (Crimination) किया. एक समय पैसा, पावर और पद के मद में जीता  व्यक्ति अंतिम समय में वृद्धाश्रम में अजनबियों के बीच रहा और अनाथों सा मरा.

आखिर लोग कहां जा रहे हैं? बेटे की निष्ठुरता, रिश्तेदारों की अवहेलना ने सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर जीवन का गणित कहां गलत हुआ जो अंत ऐसा भयानक रहा. दुनिया में खुद के संतान होने के बावजूद अकेलेपन का अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर होना पड़ा. जवानी तो व्यक्ति अपने शारीरिक बल और व्यस्तता में बिता लेता है पर बुढ़ापे की निर्बलता व अकेलापन उसे किसी सहारे के लिए उत्कंठित करता है.

विदेशों से इतर हमारे देश में सामाजिक संरचना ही कुछ ऐसी है कि परिवार में सब एकदूसरे से गुथे हुए से रहते हैं. मांबाप अपने बच्चों की देखभाल उन के बच्चे हो जाने तक करते हैं. अचानक इस ढांचे में चरमराहट की आहट सुनी जाने लगी है. संस्कार के रूप में चले आने वाले व्यवहार में तबदीलियां आने लगी हैं. बच्चों के लिए संपूर्ण जीवन होम करने वाले जीवन के अंतिम वर्ष क्यों अभिशप्त, अकेलेपन और बेचारगी में जीने को मजबूर हो जाते हैं? इस बात की चर्चा देशभर के अलगअलग प्रांतों की महिलाओं से की गई. सभी ने संतान के व्यवहार पर आश्चर्य व्यक्त किया.

लेखक, संपादक, संवाद, व्हाट्सऐप ग्रुप पर व्यक्त विचार इस समस्या पर गहन विमर्श करते हैं. आप भी रूबरू होइए :

अहमदाबाद की मिनी सिंह ने छूटते ही कहा, ‘‘अच्छा है कि उन के कोई बेटा नहीं है, कम से कम कोई आस तो नहीं रहेगी.’’ पटना की रेनू श्रीवास्तव ने कहा, ‘‘यदि बेटी होती तो शायद ये दिन देखने को न मिलते. बेटे की तुलना में बेटियां संवेदनशील जो होती हैं.’’ वहीं रानी श्रीवास्तव ने इस बात को नकारते हुए कहा, ‘‘बात लड़का या लड़की की नहीं, बल्कि समस्या परिवेश व परवरिश की है. समस्या की जड़ में भौतिकवाद और स्वार्थीपन है.’’

मुंबई की पूनम अहमद ने माना, ‘‘कुछ बेटियां भी केयरलैस और स्वार्थी होती हैं, जबकि कई बहुएं सास के लिए सब से बढ़ कर होती हैं.’’ अपने अंतर्जातीय विवाह का उदाहरण देते हुए वे कहती हैं, ‘‘उन की सास से उन का रिश्ता बहुत ही खास है. बीमार होने पर उन की सास उन के पास ही रहना पसंद करती हैं.’’ पूनम अहमद के एक ऐक्सिडैंट के बाद उन की सास ने ही सब से ज्यादा उन का ध्यान रखा. उन का कहना है, ‘‘पेरैंट्स को प्यार और सम्मान देना बच्चों का फर्ज है चाहे वे लड़के के हों या फिर लड़की के.’’

कौन है जिम्मेदार

सही बात बेटा या बेटी से हट, सोच के बीजारोपण में है. हम बच्चों को शुरू से जीवन की चूहादौड़ में शामिल होने के लिए यही मंत्र बताते हैं कि जीवन में सफल वही होता है जिस के पास अच्छी पदवी, पावर और पैसा है. हम उन्हें भौतिकवाद की शिक्षा देते हैं. बच्चों पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का इतना दबाव होता है कि वे दुनियावी और व्यावहारिक बातों में पिछड़ जाते हैं. किताबी ज्ञान भले ही बढ़ता जाता है पर रिश्तों की डोर थामे रखने की कला में वे अधकचरे रह जाते हैं.

सरिता पंथी पूछती हैं, ‘‘बच्चों को इस दौड़ में कौन धकेलता है? उन के मांबाप ही न, फिर बच्चों का क्या दोष?’’ रेणु श्रीवास्तव सटीक शब्दों में कहती हैं, ‘‘भौतिक सुखों की चाह में मातापिता भी तो बच्चों को अकेलापन देते हैं उन के बचपन में, तो संस्कार भी तो वही रहेगा.’’ वे कटाक्ष करती हैं, ‘‘रोपा पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय.’’ इस पर मुंबई की पूनम अहमद कहती हैं, ‘‘इसी से क्रैच और ओल्डहोम दोनों की संख्या में इजाफा हो रहा है.’’

अजमेर में रहने वाली लीना खत्री कहती हैं, ‘‘हमें अकसर बच्चों की बातें सुनने का वक्त नहीं होता है. यही स्थिति हमारे बूढ़े हो जाने पर होती है जब बच्चे जिंदगी की आपाधापी में उलझ जाते हैं और उन के पास हमारे लिए वक्त नहीं होता है.’’

नीतू मुकुल कहती हैं, ‘‘उक्त घटना हृदयविदारक और चिंतनीय है. मेरे हिसाब से इस समाचार का एक पक्षीय अवलोकन करना सही नहीं. हम बच्चों को पढ़ाने में तो खूब पैसा खर्च करते हैं पर उन के लिए क्या कभी समय खर्च करने की सोचते हैं. केवल अच्छा स्कूल और सुविधाएं देना ही हमारी जिम्मेदारी नहीं है.’’

इंदौर की पूनम पाठक कहती हैं, ‘‘मशीनों के साथ पलता बच्चा मशीन में तबदील हो गया है. उस के पास संवदेनाएं नहीं होती हैं, होता है तो सिर्फ आगे बढ़ने का जनून और पैसा, पावर व सफलता पानी की जिद. इन सब के लिए वह सभी संबंधों की बलि देने को तैयार रहता है.’’

पटना की रेणु अपने चिरपरिचित अंदाज में कहती हैं, ‘‘यह घटना आधुनिक सभ्यता की देन है जहां हृदय संवेदनशून्य हो कर मरुभूमि बनता जा रहा है.’’

ये सभी बातें गौर फरमाने के काबिल हैं. बच्चों के साथ बातें करना, वक्त गुजारना हमें उन के मानस और हृदय से जोड़े रखता है. दिल और मानस को वार्त्तालाप के पुल जोड़ते हैं और उस वक्त हम अपने भावों व संस्कारों को उन में प्रतिरोपित करते हैं. अंधीदौड़ में भागना सिखाने के साथ बच्चों को रिश्तों और जिम्मेदारियों का भी बचपन से ही बोध कराना आवश्यक है. बड़े हो कर वे खुदबखुद सीख जाएंगे, ऐसा सोचना गलत है. पक्के घड़े पर कहीं मिट्टी चढ़ती है भला?

बेरुखी का भाव

बच्चे तो मातापिता के व्यवहार का आईना होते हैं. कई युवा दंपती खुद अपने बुजुर्गों के प्रति बेरुखी का भाव रखते हैं. उन के लिए बुड्ढेबुढि़या या बोझ जैसे अपशब्दों का प्रयोग करते हैं. अपनी पिछली पीढ़ी के प्रति असंवेदनशील और लापरवाह दंपती अपनी संतानों को इसी बेरुखी, संवेदनहीनता और कर्तव्यहीनता की थाती संस्कारों के रूप में सौंपते हैं. फिर जब खुद बुढ़ापे की दहलीज पर आते हैं तो बेचारगी और लाचारी का चोला पहन अपने बच्चों से अपने पालनपोषण के रिटर्न की अपेक्षा करने लगते हैं. हर बूढ़ा व्यक्ति इतना भी दूध का धुला नहीं होता है.

मिनी सिंह पूछती हैं, ‘‘क्या मांबाप अपने बच्चे की परवरिश में भूल कर सकते हैं, तो फिर बच्चों से कैसे भूल हो जाती है?’’

इस पर रायपुर की दीपान्विता राय बनर्जी बिलकुल सही कहती हैं, ‘‘जिंदगी की आपाधापी में निश्चित ही हर बार हम  तराजू में तोल कर बच्चों के सामने खुद को नहीं रख पाते. इंसानी दिमाग गलतियों का पिटारा ज्यादा होता है और सुधारों का गणित कम, एक कारण यह है जो बच्चों को भी अपनी जरूरतों के अनुसार ढलने को मजबूर कर देता है. जो मातापिता जिंदगीभर अपने रिश्तेनातों में स्वार्थ व भौतिकता को तवज्जुह देते हैं, अकसर उन के बच्चों में भी कर्तव्यबोध कम होने के आसार होते हैं.’’

जिम्मेदारी का एहसास

शन्नो श्रीवास्तव ने अपने अनुभवों को सुनाते हुए बताया, ‘‘उन्होंने अपने ससुर की अंतिम समय में अथक सेवा की जिसे डाक्टरों और सभी रिश्तेदारों ने भी सराहा. वे इस की वजह बताती हैं अपने मातापिता द्वारा दी गई शिक्षा व संस्कार और दूसरा, अपने सासससुर से मिला अपनापन.’’

कितना सही है न, जिस घर में बच्चे अपने दादादादी, नानानानी की इज्जत और स्नेहसिंचित होते देखते हैं. कल को हजार व्यस्तताओं के बीच वे अपने बुजुर्गों के प्रति फर्ज और जिम्मेदारियों को अवश्य निभाएंगे, क्योंकि वह बोध हर सांस के साथ उन के भीतर पल्लवित होता है.

पूनम पाठक कहती हैं, ‘‘बात फिर घूमफिर वहीं आती है. उचित शिक्षा और संस्कार बच्चों के बेहतर भविष्य का निर्माण तो करते ही हैं, साथ ही उन्हें रिश्तों के महत्त्व से भी परिचित कराते हैं. सो, सही व्यवहार से बेहतर भविष्य व रिश्तों के बीच संवेदनशीलता बनी रहती है.’’

सुधा कसेरा बड़े ही स्पष्ट शब्दों में कहती हैं, ‘‘हमें स्कूली पढ़ाई से अधिक रिश्तों के विद्यालय में उन्हें पढ़ाने में यकीन करना चाहिए. रिश्तों के विद्यालय में यह पढ़ाया जाता है कि बच्चों के लिए उन के मातापिता ही संसार में सब से महान और उन के सब से अच्छे मित्र होते हैं. दरअसल, रिश्तों को ले कर हमें बहुत स्पष्ट होना चाहिए.

‘‘तथाकथित अंगरेजी सीखने पर जोर देने वाले विद्यालय ने बच्चे को सबकुछ पढ़ा दिया, पर रिश्तों का अर्थ वे नहीं पढ़ा पाए. ऐसे स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे, विदेश में नौकरी तो पा लेते हैं और वे विदेश में सैटल भी हो जाते हैं, लेकिन भारत में रहने वाले मातापिता के प्रति वे अपने कर्तव्य को अनदेखा करने से नहीं चूकते. रिटायर्ड बाप और मां किस काम के? विदेश की चमकीली जिंदगी में टूटे दांतों वाला बूढ़ा बाप बेटे के लिए डस्टबिन से अधिक कुछ नहीं रह जाता.’’

‘‘आज खुद मैं आगे पढ़ने के लिए अपने दोनों बच्चों को बाहर भेज रही हूं. अगर उस के बाद मैं यह आस रखूं कि वे मेरी जरूरत के समय वापस भारत आ जाएंगे तो यह मेरी बेवकूफी होगी. हमें उन्हें खुला आकाश देना है तो खुद की सोच में भी परिवर्तन लाना ही होगा,’’ कहना है सरिता पंथी का.

पद्मा अग्रवाल का कहना है, ‘‘मेरे विचार से बच्चों को दोष देने से पहले उन की परिस्थितियों पर भी विचार करना जरूरी है. एक ओर विदेश का लुभावना पैकेज, दूसरी ओर पेरैंट्स के प्रति उन का कर्तव्य, कई बार वे चाहे कर भी कुछ नहीं कर पाते. अपने कैरियर और जिंदगी ले कर भी तो उन की कुछ चाहतें और लक्ष्य होते हैं.’’

‘‘सीमा तय करना हमारी मानसिकता पर निर्भर करता है. जिस प्रकार मातापिता अपने बच्चे के भविष्यनिर्माण के कारण अपने सुखसंसाधनों का परित्याग करते हैं, उसी प्रकार बच्चों को उन के लिए अपने कैरियर से भी समझौता करना चाहिए. नौकरी विदेश में अधिक पैकेज वाली मिलेगी, तो भारत में थोड़े पैसे कम मिलेंगे, बस इतना ही अंतर है. अधिकतर जो लोग रिश्तों को महत्त्व नहीं देते, वे ही विदेश में बसना पसंद करते हैं. वे यह नहीं सोचते कि उन के बच्चे भी बड़े हो कर उन के साथ नहीं रहेंगे तो उन को कैसा लगेगा,’’ ऐसा मानना है सुधा कसेरा का.

पल्लवी सवाल उठाती हैं, ‘‘क्या हम बच्चे सिर्फ अपनी सुखसुविधाओं के लिए ही पालते हैं? क्या वे हमारे नौकर या औटोमेशन टू बी प्रोग्राम्ड हैं? हर व्यक्ति का नितांत अलग व्यक्तित्व होता है. कोई जीवनभर आप से जुड़ा रहेगा, तो कोई नहीं. क्या पता कल को आप के बच्चे इतना समर्थ ही न हों कि वे आप की देखभाल कर सकें. क्या पता कल को वे किसी बीमारी या मुसीबत के मारे काम ही न कर सकें. कहने का तात्पर्य है कि बच्चों पर निर्भरता की आशा आखिर रखें ही क्यों.’’

पहले संयुक्त परिवार होते थे तो बच्चों का दूर जाना खलता नहीं था. आजकल मांबाप पहले से ही खुद को मानसिक रूप से तैयार करने लगते हैं कि बच्चे अपनी दुनिया में एक दिन अपने भविष्य के लिए जाएंगे ही.

संयुक्त परिवारों के विघटन और एकल परिवारों का चलन ने ही इस एकाकीपन को जन्म दिया है. पहले बच्चे भी अधिक होते थे. भाईबहन मिल कर मांबाप के बुढ़ापे को पार लगा लेते थे. एकदो अगर विदेश चले भी गए तो कोई फर्क नहीं पड़ता था. अब जब एक या दो ही बच्चे हैं तो हर बार समीकरण सही नहीं हो पाता है जीवन को सुरक्षित रखने का.

एहसान नहीं, प्यार चाहिए

जोयश्रीजी कहती हैं, ‘‘अगर बच्चों को मनपसंद कैरियर चुनने व जीने का अधिकार है तो सीनियर सिटीजंस को भी इज्जत के साथ जीने व शांतिपूर्वक मरने का हक है. यदि बच्चे देखभाल करने में खुद को असमर्थ पाते हैं तो उन्हें मातापिता से भी किसी तरह की विरासत की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए.’’

वास्तविकता के मद्देनजर अगर मातापिता बच्चों को बिना उम्मीद पाले, बिना अपने किए का हिसाब गिनाए कई स्मार्ट विकल्पों पर ध्यान दें, मसलन वृद्धाश्रम या सामाजिक सरोकार वाले आश्रम, तो वे बखूबी अपनी जिंदगी किसी पर थोपने के एहसास से बचा कर अपने ही हमउम्र लोगों के साथ हंसतेमुसकराते कुछ नया करते, सीखते और साझा करते जिंदगी बिता सकते हैं. जब दूसरों को सुधारने की गुंजाइश नहीं रहती है तो खुद को कई बातें सहज स्वीकार करनी होती हैं.

बच्चों को उन के कैरियर और विकास से दूर तो नहीं कर सकते. दूसरी बात, पहले बच्चे अकसर मातापिता के साथ ही रह जाते थे चाहे नौकरी हो या पारिवारिक व्यवसाय. पर अब कैरियर के विकल्प के रूप में पूरा आसमान उन का है. मातापिता कब तक उन के साथ चलें. उन्हें तो थमना ही है एक जगह. बेहतर है कि परिवर्तन को हृदय से स्वीकारें और यह युवा होती पीढ़ी के हम मातापिता अभी से इस के लिए खुद को तैयार कर लें.

पहली रात के बारे में क्या आप भी यही सोचती हैं

Sex News in Hindi: हमारे देश शादी (Marriage) के बाद की पहली रात (सुहागरात) (First Night) को बहुत ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है. बौलीवुड (Bollywood) ने भी इस आम प्रक्रिया को बहुत आकर्षक बनाकर पेश किया है. यदि आप भावी दुल्हन (Bride) हैं तो हर दूसरे व्यक्ति द्वारा गाहे-बगाहे दी गई सलाहों ने पहले ही आपकी घबराहट को बढ़ा दिया होगा. इन्हीं सलाहों के माध्यम से कई गलत जानकारियां भी आप तक पहुंचती हैं. हम आपको इसके पीछे की सच्चाई से रूबरू करा रहे हैं.

मिथक : पहली रात सबसे बेहतरीन रात!

सच्चाई : कहने की जरूरत नहीं कि ये संभव नहीं, लेकिन इससे पहले कि आप मुझे रंग में भंग डालनेवाला कहकर दरकिनार कर दें, इन तथ्यों पर भी एक बार जरूर ध्यान दें: बहुत संभव है कि धूमधाम से शादी करने में आप घंटों ढेरों रस्मों-रिवाजों को पूरा करने के लिए बैठे रहे हों, आपने संभवतः पूरे दिन में बहुत कम खाया होगा और आप दोनों ही बेहद थके हुए होंगे. यदि पहली रात को आप दोनों गाल पर के एक छोटे-से किस से ही संतुष्ट हो जाएं तो इसमें आप और आपके पार्टनर दोनों की कोई गलती नहीं है.

डौक्टर शीला डिकुन्हा, सेक्स काउंसलर कहती हैं, ‘‘अपनी पहली रात को सबसे बेहतरीन रात मानने की उम्मीद करना, बेवजह आप पर अतिरिक्त दबाव बना सकती है, जो कि आपके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है. आराम से आगे बढ़ें! अपनी कल्पनाओं की मुद्राओं को आजमाने के लिए आपके पास पूरा जीवन है.’’

मिथक : आपको तेज-तर्रार और्गेज्म मिलना चाहिए, वर्ना आपकी शादीशुदा जिंदगी खराब है

सच्चाईः डा. अंकिता जोशी, काउंसलर, बैंगलोर, कहती हैं, ‘‘आपको बहुत जल्द ही एहसास हो जाएगा कि आपके और्गेज्म की गिनती पर आपकी शादी की सफलता निर्भर नहीं करती है, खासतौर पर पहली रात में.’’ इन सब के अलावा बात करें तो यह अपने रिश्ते में कुछ ज्यादा ही जल्दी उम्मीद करने जैसा होगा. ‘‘यदि आप दोनों अब भी एक-दूसरे को जानने की कोशिश कर रहे हैं तो अपनी पहली कोशिश में ही और्गैज़्म पाने की उम्मीद करना अतिमहत्वाकांक्षी होना होगा. जितना ज्यादा थकान और दबाव होगा, उतना ही कम आमोद आप पा सकेंगी,’’ कहती हैं डा. डिकुन्हा.

मिथक : जितना बड़ा, उतना बेहतर

सच्चाईः इस बात को लेकर उन्हें परखें नहीं या इस बात की चिंता न करें कि जितना छोटा पेनिस होगा, आपकी सेक्सुअल लाइफ उतनी ही असंतुष्टिदायक होगी. यह बहुत पुरानी बातें हैं कि बड़े पेनिस से ही महिलाएं संतुष्ट हो सकती हैं और यह पहले भी मायने नहीं रखता था और अब भी इसका कोई मतलब नहीं.

‘‘महिलाएं क्लिटोरल या जी-स्पौट की उत्तेजना से संतुष्ट होती हैं. इनमें से किसी के लिए भी बड़े पेनिस की जरूरत नहीं होती,’’ कहती हैं डा डिकुन्हा. और यदि तब भी आप उनके गुप्तांग के नाप से उत्साहित नहीं होती हैं तो कई ऐसी मुद्राएं हैं, जो क्लाइमैक्स तक पहुंचने में आपकी मदद कर सकती हैं, नाप मायने नहीं रखता.

मिथक : दुल्हन को संकोची होना चाहिए

सच्चाईः यदि आपकी इच्छा पहल करने और अपनी उत्तेजना अभिव्यक्त करने की है तो बिल्कुल आगे बढ़ें. वे इसके लिए अपने भाग्य का शुक्रिया अदा करेंगे. यूनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया, सैन फ्रैंसिस्को के एक अध्ययन ने खुलासा किया कि 72 प्रतिशत पुरुषों को उनके साथी द्वारा सेक्स की शुरुआत करना पसंद होता है. आंकड़े गलत नहीं हो सकते, क्यों?

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