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किन्नर का आखिरी वार- भाग 2

कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां

राइटर- सुरेशचंद्र मिश्र

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आगे पढ़ें कैसे विमला को पाने के जतन करने लगा बंका….

किन्नर के 2 बेटे थे संदीप व कुलदीप. दोनों स्कूल जाते थे. बच्चों की परवरिश और पढ़ाईलिखाई से खर्चे बढ़ गए थे, जबकि आमदनी उतनी ही थी. जरूरत होती तो किन्नर बंका से ब्याज पर पैसे ले लेता था. इसी सिलसिले मे एक रोज बंका, किन्नर यादव के घर आया था. दोनों घर से निकलने लगे, तो विमला ने पति को टोका, ‘‘सुनिए, बच्चों की फीस देनी है, 500 रुपए दे जाओ.’’

‘‘अभी पैसे नहीं है. शाम को बात करते है.’’ किन्नर ने लापरवाही से कहा, तो बंका ने जेब से पर्स निकाला और पांचपांच सौ के 2 नोट निकाल कर विमला की हथेली पर रख दिए, ‘‘ये लो भाभी, बच्चों की फीस दे देना.’’ फिर वह किन्नर की ओर मुखातिब हुआ, ‘‘यार बच्चों की जरूरतों के मामले में भाभी को परेशान मत किया करो. तुम्हारा यह दोस्त है तो..’’ कहने के साथ ही उस ने मुसकरा कर विमला की ओर देखा, ‘‘भाभी, आप संकोच मत करना. जब भी जरूरत हो, कह देना.’’

बंका के पर्स में नोटों की झलक देख विमला हसरत से उस के पर्स को देखती रह गई. बंका समझ गया कि विमला की दुखती रग पैसे की जरूरत है. उस रोज के बाद वह गाहेबगाहे विमला की आर्थिक मदद करने लगा. अब दोनों एकदूसरे को देख मुसकराने लगे थे.

बंका की नजरें विमला के सीने पर पड़ती, तो वह जानबूझ कर आंचल गिरा देती, जिस से बंका अपनी आंखें सेंक सके. दरअसल बंका विमला को पाने के लिए लालायित था, तो विमला भी कुंवारे बंका को अपने रूप जाल में फंसाने को उतावली थी.

घर के बढ़ते खर्चों के कारण किन्नर यादव की व्यस्तता बढ़ गई थी. वह ज्यादा से ज्यादा समय आढ़त पर बिताता था ताकि पल्लेदारी कर ज्यादा पैसा कमा सके. वह सुबह घर से निकलता तो देर रात थकामांदा लौटता था. उस का पूरा दिन और आधी रात आढ़त पर ही बीत जाती थी. घर आता तो खाना खा कर सो जाता था. कभी मन हुआ तो बेमन से विमला को बांहों में लेता फिर अपनी थकान उतार कर एक ओर लुढ़क जाता. इस से विमला का मन भटकने लगा. वह रवि बंका के हसीन जाल में फंसने को उतावली हो उठी.

पहले तो बंका किन्नर यादव की उपस्थिति में ही आता था, बाद में वह उस की गैरमौजूदगी में भी आने लगा. विमला से उस का हंसीमजाक व नैनमटक्का पहले ही दिन से शुरू हो गया था. गुजरते दिनों के साथ दोनों नजदीक भी आते गए. उस के बाद एक दोपहर को वह सब हो गया, जिस की चाहत दोनों के मन में थी.

चाहत में पतिता बन गई विमला

विमला और बंका के सामने एक बार पतन का रास्ता खुला, तो वे उस पर लगातार फिसलते चले गए. दिन में विमला घर में अकेली रहती थी. किन्नर यादव आढ़त चला जाता था और दोनों बच्चे स्कूल. विमला फोन कर के बंका को बुला लेती. बच्चों के स्कूल लौटने से पहले ही बंका अपने अरमान पूरे कर चला जाता था.

दोनों के बीच प्रीत बढ़ी, तो विमला को दिन का उजाला उलझन देने लगा. हर समय किसी के आने का डर भी बना रहता था. इसलिए हसरतों का पूरा खेल उन्हें जल्दीजल्दी निपटाना पड़ता था. दोनों ही इस हड़बड़ी और जल्दबाजी से संतुष्ट नहीं थे.

वे दोनों देह का पूरा खेल सुकून व इत्मीनान से खेलना चाहते थे. जिस दिन किन्नर आढ़त से घर नहीं आ पाता, उस दिन बच्चों के सो जाने के बाद विमला चुपके से उसे घर में बुला लेती.

बंका का किन्नर यादव की गैरमौजूदगी में चुपके से आना और उस के आने से पहले ही चले जाना पड़ोसियों की नजरों से छुपा नहीं रह सका. लिहाजा उन दोनों को ले कर तरहतरह की बातें होने लगीं. फैलतेफैलते ये बातें किन्नर यादव के कानों तक पहुंची तो उस ने विमला से जवाब तलब किया.

रंगे हाथ पकड़े बगैर औरतें हो या पुरुष, अपनी बदचलनी स्वीकार नहीं करते. विमला ने भी मोहल्ले वालों को झूठा और जलने वाला कह कर पल्ला झाड़ लिया. लेकिन किन्नर को इस से संतुष्टि नहीं हुई. उस ने दोनों की निगरानी शुरू कर दी और एक दिन उन्हें आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया.

किन्नर ने विमला को पीटा और बंका को अपमानित कर के घर से निकाल दिया. इस के बावजूद भी दोनों नहीं सुधरे. विमला, बंका को बुलाती रही और वह उस की देह को सुख देने आता रहा.

कुछ समय बाद एक रोज किन्नर ने दोनों को फिर रंगे हाथ पकड़ लिया. उस दिन उस की बंका से मारपीट भी हुई. यह तमाशा पूरे मोहल्ले ने देखा. किन्नर यादव ने बंका को धमकी भी दी, ‘‘तुझ से तो मैं अपने तरीके से निपटूंगा. ऐसा सबक सिखाऊंगा कि पराई औरत के पास जाने से डरेगा.’’

इस घटना के बाद बंका और विमला का मिलन बंद हो गया. किन्नर ने विमला को समझाया, बच्चों की दुहाई दी, इज्जत की भीख मांगी. लेकिन बंका के इश्क में अंधी विमला नहीं मानी. पकड़े जाने के बाद वह कुछ समय तक बंका से दूर रही, उस के बाद फिर से उसे बुलाने लगी.

अक्तूबर के पहले हफ्ते में विमला के दोनों बच्चे संदीप व कुलदीप अपनी नानी के घर सिरिया ताला गांव चले गए. बच्चे नानी के घर गए तो विमला और भी निश्चिंत हो गई.

वह प्रेमी बंका को मिलन के लिए दिन में बुलाने लगी. 8 अक्तूबर, 2020 की सुबह 6 बजे किन्नर किसी काम से घर से निकल गया. उस के जाने के बाद बंका उस के घर आ गया. वह विमला को बाहों में भर कर प्रणय निवेदन करने लगा. विमला ने किसी तरह अपने को मुक्त किया और कहा कि किन्नर किसी भी समय घर आ सकता है. वह वापस चला जाए. खतरा भांप कर बंका ने बात मान ली.

बंका घर से बाहर निकल ही रहा था कि किन्नर यादव आ गया. उस ने बंका को घर से बाहर निकलते देख लिया था, उसे शक हुआ कि बंका विमला के शरीर से खेल कर निकला है. शक पैदा होते ही किन्नर को बहुत गुस्सा आया. उस ने घर में रखा फरसा उठाया और पड़ोसी बंका के घर पहुंच गया.

बंका कुछ समझ पाता उस के पहले ही उस ने उस पर फरसे से प्रहार कर दिया. बंका का कान कट गया और खून बहने लगा. वह बचाओ… बचाओ… की गुहार लगाने लगा, तभी उस ने उस पर दूसरा प्रहार कर दिया, जिस से उस की गर्दन कट गई और वह जमीन पर गिर गया.

इधर बंका की चीख सुन कर विमला उसे बचाने पहुंच गई. विमला को देख किन्नर का गुस्सा और भड़क गया. उस ने बंका को छोड़ विमला पर फरसे से हमला कर दिया. फरसा विमला के पैर में लगा और वह जान बचा कर भागी.

सामने ननकी का घर था, वह उसी घर में घुस गई. पीछा करता हुआ किन्नर भी आ गया. वह विमला के बाल पकड़ कर घर के बाहर लाया और सड़क पर फरसे से उस की गर्दन धड़ से अलग कर दी. ननकी तथा कई अन्य लोगों ने देखा, पर उसे बचाने कोई नहीं आया.

पत्नी की गर्दन काटने के बावजूद किन्नर का गुस्सा ठंडा नहीं हुआ. उस ने एक हाथ में विमला का कटा सिर पकड़ा और दूसरे हाथ में फरसा ले कर थाने की ओर चल दिया. लगभग डेढ़ किलोमीटर का सफर पैदल तय कर के किन्नर थाना बबेरू पहुंचा और पुलिस के सामने आत्म समर्पण कर दिया.

9 अक्तूबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्त किन्नर यादव को बांदा कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

किन्नर का आखिरी वार- भाग 1

कहानी सौजन्य- मनोहर कहानियां

राइटर- सुरेशचंद्र मिश्र

8 अक्तूबर 2020 की सुबह 8 बजे बबेरू कस्बे के कुछ लोगों ने एक ऐसा खौफनाक मंजर देखा, जिस से उन की रूह कांप उठी. एक आदमी सड़क पर बेखौफ पैदल आगे बढ़ता जा रहा था. उस के एक हाथ में फरसा तथा दूसरे हाथ में कटा हुआ सिर था. सिर किसी महिला का था, जिसे वह सिर के बालों से पकड़े था.

कटे सिर से खून भी टपक रहा था, जिस से आभास हो रहा था कि कुछ देर पहले ही उस ने सिर को धड़ से अलग किया होगा. देखने वाले अनुमान लगा रहे थे कि कटा सिर या तो उस आदमी की प्रेमिका का है, या फिर पत्नी का. क्योंकि ऐसा जघन्य काम आदमी तभी करता है, जब या तो प्रेमिका धोखा दे या फिर पत्नी बेवफाई करे.

दिल कंपा देने वाला मंजर बिखेरता हुआ, वह आदमी बाजार चौराहा पार कर के थाना बबेरू के गेट पर जा कर रुका. पहरे पर तैनात सिपाही की नजर जब उस पर पड़ी तो वह घबरा गया, फिर हिम्मत जुटा कर अपनी ड्यूटी निभाने के लिए पूछा, ‘‘कौन हो तुम. और तुम्हारे हाथ में ये कटा सिर किस का है?’’ ‘‘यह सब बातें हम बड़े दरोगा साहब को बताएंगे. उन्हें बुलाओ.’’ उस रौद्र रूपधारी आदमी ने जवाब दिया.‘‘ठीक है, तुम इस कुर्सी पर बैठो. मैं दरोगा साहब को बुला कर लाता हूं.’’उस आदमी ने कटा सिर जमीन पर रखा फिर कंधा से फरसा टिका कर इत्मीनान से कुर्सी पर बैठ गया. पहरे वाला सिपाही बदहवास हालत में थाना इंचार्ज जयश्याम शुक्ला के कक्ष में पहुंचा, ‘‘सर एक आदमी आया है. उस के हाथ में फरसा और महिला का कटा सिर है.’’‘‘क्या?’’ शुक्लाजी चौंके. फिर वह रामसिंह व कुछ अन्य सिपाहियों के साथ थाना परिसर आए, जहां वह आदमी कुरसी पर बैठा था. उसे देख वह भी कांप उठे. कहीं वह पागल तो नहीं, उस स्थिति में वह पुलिस पर भी हमला कर सकता था. उन्होंने उस आदमी से कहा, ‘‘देखो, पहले अपना फरसा और कटा सिर चंद कदम दूर रख दो. फिर मैं तुम्हारी बात सुनूंगा.’’

जय श्याम शुक्ला की बात मान कर उस आदमी ने फरसा और कटा सिर चंद कदम दूर रख दिया. जिसे एक सिपाही ने संभाल लिया. इस के बाद शुक्ला ने उस आदमी को हिरासत में ले कर पूछा, ‘‘अब बताओ, तुम कौन हो, कहां रहते हो और कटा सिर किस का है?’’

‘‘दरोगा बाबू, मेरा नाम किन्नर यादव है. मैं अतर्रा रोड, नेता नगर में रहता हूं. कटा सिर मेरी पत्नी विमला का है. मैं ने ही फरसे से उस का सिर काटा है. मैं हत्या का जुर्म कबूल करता हूं. आप मुझे गिरफ्तार कर लो.’’

‘‘तुम ने अपनी पत्नी विमला की हत्या क्यों की?’’ जय श्याम शुक्ला ने पूछा.

‘‘साहब, वह बदचलन औरत थी. पड़ोसी रवि उर्फ बंका के साथ रंगरेलियां मनाती थी. कई बार मना किया, बच्चों की कसम खिलाई, इज्जत की दुहाई दी, लेकिन वह नहीं मानी. आज मुझ से बर्दाश्त नहीं हुआ. मैं ने बंका पर फरसा से हमला किया तो वह उसे बचाने आ गई. इस पर मैं ने उस की गर्दन काट दी और ले कर थाने आ गया.’’

‘‘बंका कहां है?’’ शुक्लाजी ने पूछा.

‘‘बंका घर में तड़प रहा होगा. उस की किस्मत अच्छी थी, बच गया.’’

मंजर देख पुलिस भी हैरान थी

पूछताछ के बाद प्रभारी निरीक्षक जय श्याम शुक्ला ने कातिल किन्नर यादव को हवालात में बंद कराया, फिर इस दिल कंपा देने वाली घटना की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी. इस के बाद कटा सिर साथ में ले कर पुलिस बल के साथ नेता नगर स्थिति किन्नर यादव के मकान पर पहुंच गए.

उस समय वहां भारी भीड़ जुटी थी. मृतका विमला की सिरविहीन लाश सड़क पर पड़ी थी. उस की गर्दन बड़ी बेरहमी से काटी गई थी. पैर पर भी वार किया गया था, जिस से पैर पर जख्म लगा था. मृतका की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी. रंग साफ और शरीर स्वस्थ था. उस के शव के पास बच्चे तथा महिलाएं बिलख रही थी.

पड़ोस में सूरजभान सविता का मकान था. उस का बेटा रवि उर्फ बंका घायल पड़ा तड़प रहा था. किन्नर यादव ने उस पर भी फरसे से हमला किया था, जिस से उस का एक कान तथा गर्दन कट गई थी. जय श्याम शुक्ला ने उसे इलाज के लिए स्वास्थ केंद्र भिजवा दिया.

जय श्याम शुक्ला अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ शंकर मीणा, अपर पुलिस अधीक्षक महेंद्र प्रताप सिंह चौहान तथा डीएसपी आनंद कुमार पांडेय भी वहां आ गए. उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण किया और पासपड़ोस के लोगों तथा मृतका के पिता रामशरण यादव से घटना के बारे में जानकारी हासिल की.

पड़ोस में रहने वाली ननकी ने बताया कि विमला जान बचाने के लिए उस के घर में घुस आई थी. लेकिन पीछा करते हुए उस का पति किन्नर यादव घर में आ गया था. वह विमला  के बाल पकड़ कर घसीटते हुए घर के बाहर सड़क पर ले गया. फिर उस ने फरसे से विमला की गर्दन धड़ से अलग कर दी. वह चाह कर भी उस की कोई मदद नहीं कर पाई थी.

रामदत्त की बेटी अंतिमा ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि वह घर के बाहर साफसफाई कर रही थी तभी किन्नर चाचा फरसा ले कर आए और बंका पर हमला कर दिया. उस का कान तथा गर्दन कट गई. विमला चाची बंका को बचाने आई तो चाचा ने बंका को छोड़ कर विमला चाची पर हमला कर दिया. वह जान बचा कर ननकी काकी के घर घुस गई. लेकिन उन की जान नहीं बच सकी.

थाने लौट कर पुलिस अधिकारियों ने हवालात में बंद किन्नर यादव को बाहर निकलवा कर बंद कमरे में पूछताछ की. पूछताछ में उस ने सहजता से पत्नी की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. अपर पुलिस अधीक्षक महेंद्र सिंह चौहान ने स्वास्थ केंद्र पहुंच कर घायल रवि उर्फ बंका से जानकारी हासिल की. बंका ने विमला से अवैध रिश्तों की बात स्वीकार की.

इधर पुलिस अधिकारियों के आदेश पर प्रभारी निरीक्षक जयश्याम शुक्ला ने मृतका विमला के सिर और धड़ को एक साथ पोस्टमार्टम के लिए बांदा के जिला अस्पताल भेज दिया. पोस्टमार्टम करा कर पुलिस ने उसी दिन मुक्तिधाम में उस का दाह संस्कार करा दिया.

चूंकि कातिल किन्नर यादव ने स्वयं थाने जा कर आत्मसमर्पण किया था और आलाकत्ल फरसा भी पुलिस को सौंप दिया था. इसलिए प्रभारी निरीक्षक जय श्याम शुक्ला ने मृतका के पिता रामशरण यादव को वादी बना कर धारा 302/324 आईपीसी के तहत किन्नर यादव के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में अवैध रिश्तों की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

किन्नर यादव बांदा जनपद के कस्बा बबेरू नेता नगर में रहता था. 12 साल पहले उस का विवाह मरका क्षेत्र के सिरिया ताला गांव निवासी रामशरण सिंह यादव की बेटी विमला के साथ हुआ था. विमला सरल स्वभाव की महिला थी. किन्नर यादव उसे बहुत प्यार करता था. कालांतर में विमला 2 बेटों संदीप व कुलदीप की मां बनी.

परिवार के लिए हाड़तोड़ मेहनत

किन्नर यादव पटाखा, आतिशबाजी बनाने का बेहतरीन कारीगर था. वह बबेरू के एक लाइसेंस होल्डर के यहां काम करता था. उसे पगार तो मिलती ही थी, साथ में वह अवैध रूप से भी पटाखे बना लेता था. इस से भी उसे ठीकठाक कमाई हो जाती थी. उस के परिवार के भरणपोषण के लिए इतना काफी था. यह काम करने वाले और भी थे.

लेकिन अवैध काम तो अवैध ही होता है. बबेरू पुलिस को भनक पड़ी तो उस ने धरपकड़ शुरू की, लेकिन किन्नर यादव किसी तरह बच गया. इस के बाद पत्नी विमला के समझाने पर उस ने अवैध काम को बंद कर दिया और कस्बे की एक आढ़त पर पल्लेदारी का काम करने लगा.

रवि उर्फ बंका किन्नर यादव के पड़ोस में रहता था. उस के पिता सूरजभान सविता गांव मरका में रहते थे. अविवाहित बंका अपनी मां गोमती के साथ रहता था. वह बिजली विभाग में संविदा कर्मचारी था. वेतन के अलावा उस की ऊपरी कमाई भी थी, सो वह ठाटबाट से रहता था.

बंका और किन्नर यादव हमउम्र थे. दोनो के बीच दोस्ती थी. लेकिन एकदूसरे के घर ज्यादा आना जाना नहीं था. एक बार बंका किसी काम से किन्नर यादव के घर आया. उस ने किन्नर की पत्नी विमला को देखा, तो उस की नियत खराब हो गई.

अगले भाग में पढ़िए विमला को पाने के लिए किस हद तक गया बंका…

ओयो होटल का रंगीन अखाड़ा : भाग 2

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

रात को करीब 10 बजे अजय का अपहरण करने वालों से सुषमा की ये आखिरी बात थी.

इसी के बाद से सुषमा की जान गले में अटकी थी और वह पूरी रात बेचैनी से घर के भीतर टहलती रही. उसे बारबार लग रहा था कि कहीं कोई वाकई उस की एकएक गतिविधि पर नजर तो नहीं रख रहा.

सोचते-सोचते रात आंखोंआंखों में बीत गई. आखिरकार सुषमा ने सुबह अपने पति के बौस को फोन कर के सारी बात बताई. उन्होंने कहा कि वह घर में रहें, कुछ ही देर में पुलिस पहुंच जाएगी.

ठीक वैसा ही हुआ, जैसा अजय के बौस ने कहा था. सुषमा का घर जिस इलाके में है, वह सैंट्रल नोएडा पुलिस के अंडर में आता है. कुछ ही देर में उस के घर की डोरबैल बजी, उस ने दरवाजा खोला तो सादे लिबास में नोएडा पुलिस के एडीशनल कमिश्नर लव कुमार, सैंट्रल नोएडा पुलिस डीसीपी राजेश कुमार सिंह, एडीशनल कमिश्नर रणविजय सिंह, एसीपी विमल कुमार सिंह और सेक्टर 49 थाने के एसओ सुधीर कुमार सिंह सामने खड़े थे.

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दरअसल, सुषमा ने जब अपने पति के बौस को अजय के किडनैप होने की जानकारी और इस की एवज में फिरौती मांगने की बात बताई तो डीआरडीओ की तरफ से नोएडा के कमिश्नर आलोक सिंह को फोन कर के इस मामले में गोपनीय ढंग से काम कर के जल्द से जल्द अजय प्रताप सिंह को अपहर्त्ताओं के कब्जे से मुक्त कराने को कहा गया.

डीआरडीओ का एक्शन

डीआरडीओ देश के सुरक्षा उपकरणों व प्रतिष्ठानों से जुड़ा ऐसा संगठन है जो रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करता है. अजय प्रताप सिंह इसी संस्था से जुड़े वैज्ञानिक थे. उन के पास संस्था से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां भी रहती थीं.

इसलिए जैसे ही पुलिस कमिश्नर को यह जानकारी मिली, उन्होंने एडिशनल कमिश्नर लव कुमार को सारी जानकारी दे कर बेहद गोपनीय ढंग से अजय प्रताप को अपहर्त्ताओं के कब्जे से मुक्त कराने का औपरेशन शुरू करने का आदेश दिया.

इस के बाद लव कुमार ने तड़के ही तमाम अधिकारियों की आपात बैठक बुलाई और सभी अफसरों को सादे कपड़ों में अजय प्रताप के घर पहुंचने को कहा.

अधिकारियों ने अपना परिचय देने के बाद जब सुषमा से अजय प्रताप सिंह के अपहरण से जुड़ी सारी जानकारियां मांगी तो उन्होंने वह पूरा घटनाक्रम बयान कर दिया, जो अब तक हुआ था.

पुलिस ने सुषमा से वे दोनों नंबर हासिल कर लिए, जिन पर पहले पति अजय प्रताप से बात हुई थी और दूसरी बार अपहर्त्ता ने फोन कर के रकम की मांग की थी. सुषमा वर्मा से पुलिस ने एक लिखित शिकायत भी ले ली. सादे लिबास में पुलिस के कुछ लोगों और महिला पुलिस की कुछ तेजतर्रार पुलिसकर्मियों को सुषमा के पास छोड़ कर पुलिस टीम वापस लौट गई.

सुषमा की शिकायत पर उसी दिन थाना 49 पर भादंसं की धारा 364ए के तहत फिरौती के लिए अपहरण का मामला दर्ज कर लिया गया.

डीसीपी राजेश कुमार सिंह ने एडिशनल डीसीपी रणविजय सिंह की निगरानी में एक विशेष टीम का गठन कर दिया. एसीपी विमल कुमार सिंह के नेतृत्व में गठित इस टीम में थाना सेक्टर 49 के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह के अलावा एसआई विकास कुमार, महिला एसआई प्रीति मलिक, हैड कांस्टेबल प्रभात कुमार, जय विजय, कांस्टेबल सुबोध कुमार, सुदीप कुमार,अंकित पंवार और महिला कांस्टेबल रेनू यादव को शामिल किया गया.

इस के अलावा दूसरी स्टार टू टीम के एसआई शावेज खान तथा जोन फर्स्ट की सर्विलांस टीम के एसआई नवशीष कुमार को शामिल किया गया.

सभी टीमों को बता दिया गया था कि मामला बेहद संवेदनशील है, इसलिए बिना विलंब किए और बिना किसी को भनक लगे सावधानी से औपरेशन को अंजाम देना है.

गठित की गई टीमों में काम का बंटवारा कर दिया गया कि किसे इस औपरेशन में क्या भूमिका निभानी है.

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एडिशनल डीसीपी रणविजय सिंह ने गठित की गई टीमों के साथ कोऔर्डिनेशन का जिम्मा खुद संभाला लिया. सर्विलांस टीम ने सुषमा वर्मा से मिले दोनों मोबाइल नंबरों के साथ अजय प्रताप सिंह के नंबर की काल डिटेल्स निकाली और तीनों नंबरों को सर्विलांस पर लगा कर निगरानी शुरू कर दी.

स्टार टू की टीम ने फिरौती के लिए अपहरण करने वाले बदमाशों की धरपकड़ और उन के ठिकानों पर छापेमारी का काम शुरू कर दिया. जबकि इस मामले के जांच अधिकारी थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह ने अपने थाने की टीम के साथ सर्विलांस टीम से मिल रही जानकारी के आधार पर धरपकड़ शुरू कर दी.

सर्विलांस टीम को पता चला कि शाम को 5 बजे के बाद जब अजय प्रताप सिंह का फोन बंद हुआ था, तो उस से पहले उन्होंने आखिरी बार 3 नंबरों पर बात की थी. उन सभी नंबरों की लोकेशन सेक्टर 41 में आगाहपुर के पास बने ओयो होटल की पाई गई. इतना ही नहीं, फोन बंद होते समय अजय प्रताप के फोन की लोकेशन भी पुलिस को इसी होटल की मिली.

पुलिस को मिली राह

जानकारी बेहद महत्त्वपूर्ण थी, लेकिन इस पर ठोस काररवाई करने से पहले अधिकारी यह पुष्टि कर लेना चाहते थे कि उक्त होटल से अपहरण करने वालों का कोई वास्ता है या नहीं. क्योंकि अगर सर्विलांस के आधार पर वहां छापा मारा जाता और अजय प्रताप नहीं मिलते तो उन की जान को खतरा हो सकता था.

लिहाजा अधिकारियों ने एसओ सुधीर कुमार की टीम के एक तेजतर्रार हैड कांस्टेबल जय विजय सिंह को फरजी ग्राहक बना कर ओयो होटल भेजा. जय विजय सिंह ने सेक्टर 41 के ओयो होटल में पहुंच कर वहां एक कमरा बुक कराया और खुद को काम के सिलसिले में पूर्वी उत्तर प्रदेश से आया हुआ बताया.

कमरा बुक करने के बाद जब जय विजय ने होटल में चल रही गतिविधियों की निगरानी शुरू की तो दूसरी मंजिल पर बने 2 कमरों के आसपास कुछ संदिग्ध गतिविधियां दिखीं.

जय विजय ने होटल की पार्किंग की छानबीन की तो वहां अजय प्रताप सिंह की वह होंडा सिटी कार भी खड़ी दिखाई दी, जिस का नंबर सुषमा वर्मा से मिला था.

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जय विजय को जब यकीन हो गया कि हो न हो अजय प्रताप को ओयो होटल के अंदर ही छिपाकर रखा गया है तो उस ने अधिकारियों को सूचना दे दी.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

ओयो होटल का रंगीन अखाड़ा : भाग 3

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

इस पर पुलिस की तीनों टीमों ने 27 सितंबर की रात को सेक्टर 41 के आई ब्लौक में प्लौट नंबर 64 पर बने ओयो होटल को चारों तरफ से घेर कर छापा मारा. एकएक कमरे की तलाशी ली गई तो पुलिस कमरा नंबर 203 में बंधक बना कर रखे गए अजय प्रताप तक पहुंच गई.

उन के कमरे में 3 लोग मिले, जिन में से एक राकेश कुमार उर्फ रिंकू फौजी निवासी गांव चेहडका, जिला भिवाड़ी, राजस्थान था. दूसरा युवक दीपक पुत्र राजेश कुमार भी इसी गांव का रहने वाला था, जबकि इसी कमरे में एक महिला सुनीता गुर्जर उर्फ बबली मिली जो आगाहपुर गांव में सेक्टर 41 की ही रहने वाली थी.

पुलिस ने अचानक उस कमरे में धड़ाधड़ प्रवेश किया और अजय प्रताप को अपने कब्जे में ले लिया. साथ ही कमरे में मौजूद तीनों लोगों को हिरासत में लिया तो सुनीता गुर्जर उर्फ बबली भड़क उठी. उस ने पुलिस को हड़काना शुरू कर दिया, ‘‘औफिसर, इस बदतमीजी की वजह जान सकती हूं?’’

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‘‘मैडम, बदतमीजी की वजह आप को पता होगी, फिर भी हम थाने चल कर इस की असली वजह बताएंगे.’’ रणविजय सिंह ने जवाब दिया.

जब पुलिस ने उन्हें बताया कि उन्हें अजय प्रताप का अपहरण कर फिरौती मांगने के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है तो सुनीता गुर्जर फिर भड़क उठी. उस ने अधिकारियों को धमकाते हुए बताया कि वह बीजेपी की नेता और सोशल वर्कर है. उन की इस गलती की सजा अभी दिलवाएगी.

इस के बाद उस ने कुछ लोगों को फोन किया और फोन करने के बाद धमकी दी कि अभी देखो, थोड़ी देर में तुम को तुम्हारे बाप लोग फोन करेंगे तो देखना तुम कैसे छोड़ोगे.

एडिशनल डीसीपी रणविजय सिंह ने अपनी पुलिस की नौकरी में ऐसे बहुत से छुटभैए नेता देखे थे जो किसी अपराध में पकडे़ जाने पर पुलिस को ऐसी गीदड़भभकियां देते हैं. उन्हें इस बात का भी इल्म था कि कई बार पुलिस ऐसी धमकियों के प्रभाव में आ कर ऐसे लोगों को छोड़ देती है. लेकिन यह मामला जिस तरह का था, उसे देखने के बाद रणविजय सिंह किसी धमकी में नहीं आए और सभी को हिरासत में ले कर पुलिस थाना सेक्टर 49 लौट आए.

पुलिस टीम अपहृत अजय प्रताप सिंह की होंडा सिटी कार के साथ होटल के रजिस्टर तथा होटल के सीसीटीवी कैमरों की डीवीआर भी साथ ले आए.

कैसे फंसे अजय

जब पुलिस ने थाने आ कर थोड़ी सी सख्ती बरती और आरोपियों को सुषमा वर्मा से की गई बातचीत की काल रिकार्डिंग तथा उन के फोन की काल डिटेल्स दिखा कर पुख्ता सबूत सामने रखे तो आरोपियों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और खुलासा किया कि उन्होंने अपने 2 फरार साथियों के साथ मिल कर अजय प्रताप को हनीट्रैप में फंसाया था और उन से मोटी फिरौती वसूलने की योजना थी.

अजय प्रताप ने बताया कि उन्होंने गूगल पर मसाज कराने वाले किसी पार्लर का नंबर सर्च किया था, जिस के बाद उन्हें जस्ट डायल पर नोएडा में मसाज कराने वाला एक नंबर हासिल हुआ. उन्होंने उस नंबर पर फोन किया था.

26 सितंबर को शाम 4 बजे अजय ने जब मसाज सेवा देने वाले उस पार्लर के नंबर पर बात की तो दूसरी तरफ से बात करने वाले ने बताया कि उन के पास एक से एक खूबसूरत लड़कियां है जो सिर्फ मसाज ही नहीं करती बल्कि जिस्म की भूख भी मिटाती हैं.

फोन करने वाले ने इतना प्रलोभन दिया कि अजय प्रताप का मन मचलने लगा. उन्होंने उसी वक्त मसाज कराने का इरादा कर लिया, जब फोन करने वाले ने उन्हें वाट्सऐप पर उन लड़कियों की फोटो भेजीं, जिन में से किसी से भी वे मसाज करा सकते थे.

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बस उन्हीं लडकियों की खूबसूरत और मादक तसवीरें देख कर अजय प्रताप घर का सामान लाने के बहाने कार ले घर से निकल पडे़. लेकिन घर से निकल कर जब उन्होंने मसाज वाले नंबर पर फोन कर के पूछा कि कहां आना है तो उन्हें लौजिक्स सिटी सेंटर बुलाया गया. वहां उन्हें दीपक नाम का शख्स मिला जो उन्हें सेक्टर 41 के आई ब्लाक में ओयो होटल पर ले आया.

शाम को 6 बजे जब वे होटल पहुंचे तो वहां उन की गाड़ी पार्किंग में खड़ी करवा कर इसी होटल के रूम नंबर 203 में ले जाया गया, जहां पहले से ही राकेश फौजी उर्फ रिंकू और बरौला नोएडा के 48बी में रहने वाला अनिल शर्मा और सेक्टर 27 के मकान नंबर 618 में रहने वाला आदित्य मौजूद थे.

वहां पहुंचने के कुछ देर तक तो अजय प्रताप उन चारों से बात करते रहे. जब काफी वक्त गुजर गया और मसाज करने वाली लड़कियां नहीं आईं तो उन्होंने उन लड़कियों को बुलाने को कहा, जिन के फोटो उन्हें भेजे गए थे. उस के बाद अचानक उन चारों का गिरगिट की तरह रंग बदल गया.

उन लोगों ने अजय प्रताप को कुरसी से बांध दिया और धमकी देने लगे कि परिवार के होते हुए वह लड़कियों से मसाज के नाम पर अय्याशी करता है तो अजय प्रताप के होश उड़ गए. क्योंकि उन्हें सपने में गुमान नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है.

होटल के कमरे में मौजूद चारों लोगों ने उन्हें धमकाना शुरू कर दिया कि वे थाने में फोन कर के पुलिस को बुलाएंगे और उसे पुलिस के हवाले कर देंगे.

उन्होंने अजय प्रताप की काल रिकौर्डिंग सुनवाई तो वे और ज्यादा डर गए. अपने ओहदे की संवेदनशीलता और पारिवारिक बदनामी के कारण वह उन के आगे हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे.

उसी वक्त उन में से किसी एक के फोन करने पर एक महिला ने आई, जिसे देख कर वे सभी मैम… मैम कह कर बात करने लगे. उस महिला के बारे में चारों ने बताया कि वह नोएडा क्राइम ब्रांच की इंसपेक्टर हैं और उसे पकड़ने के लिए आई हैं.

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सुनीता ने खुद को इंसपेक्टर बता कर अजय प्रताप को धमकाना शुरू कर दिया और उन्हें आतंकित करने लगी कि जब वह गिरफ्तार हो कर अय्याशी के जुर्म में जेल जाएगा तो उस की ऐसी बदनामी होगी कि न उस का परिवार रहेगा, न ही नौकरी.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

ओयो होटल का रंगीन अखाड़ा : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

सुषमा की पूरी रात आंखोंआंखों में कट गई, पलभर को भी नहीं सोई वह. कभी घर के भीतर चहलकदमी करने लगतीं तो कभी सोचने लगतीं कि मुश्किल की इस घड़ी में क्या करें, किस की मदद लें. उन की आंखों के सामने बारबार पति का चेहरा घूमने लगता. क्योंकि जो मुसीबत उन के सामने आ खड़ी हुई थी, उस में जरा सी लापरवाही उस की मांग का सिंदूर लील सकती थी, मन में यह खयाल आते ही डर के कारण सुषमा का पूरा शरीर सिहर उठता था.

आखिरकार बहुत सोचने के बाद सुषमा ने कठोर फैसला लिया और अपने पति के बौस को फोन कर के पूरी बात बताई.

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37 वर्षीय अजय प्रताप सिंह अपनी पत्नी सुषमा के साथ नोएडा के सेक्टर-77 की सुपरटेक केपटाउन सोसाइटी में रहते थे. वह डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) दिल्ली में बतौर रिसर्च साइंटिस्ट तैनात थे.

मूलत: उन्नाव के रहने वाले अजय प्रताप 26 सितंबर, 2020 की शाम करीब साढ़े 5 बजे अपनी पत्नी से यह कह कर घर से निकले थे कि घर की जरूरतों का कुछ सामान लेने के लिए मार्किट जा रहे हैं और कुछ देर में वापस लौट आऐंगे.

अजय घर से अपनी होंडा सिटी कार यूपी 14 बीएस 5232 ले कर निकले थे. डेढ़दो घंटे बीत जाने पर सुषमा को चिंता होने लगी कि आखिर अजय ऐसी कौन सी शौपिंग करने के लिए गए हैं कि 2 घंटे से ज्यादा का वक्त बीतने पर भी नहीं लौटे.

सुषमा ने अजय का फोन लगाया तो फोन स्विच्ड औफ मिला. इस के बाद उन की चिंता बढ़ गई. सुषमा बारबार पति का नंबर मिलाती रहीं, मगर फोन स्विच्ड औफ बताता रहा.

इसी तरह करीब ढाई घंटे बीत गए. सुषमा सोच ही रही थी कि ऐसे में क्या करें. अचानक सुषमा के फोन पर एक अंजान नंबर से काल आई तो उस ने यह सोच कर फोन उठा लिया कि हो सकता है अजय का फोन खराब हो गया हो या उस की बैटरी चली गई हो. संभव है वह किसी का फोन ले कर काल कर रहे हों.

फोन उठाते ही उम्मीद के मुताबिक दूसरी तरफ से अजय की आवाज सुनाई दी, जैसे ही अजय ने ‘हैलो मैं अजय बोल रहा हूं’ कहा तो उस के बाद पूरी बात बिना सुने ही सुषमा ने गुस्से में एक ही सांस में कई सवाल कर डाले, ‘‘अजय, तुम कहां हो… तुम्हारा फोन क्यों बंद है… ऐसी कौन सी शौपिंग करने चले गए कि ढाई घंटे होने को हैं और अब फोन कर रहे हो?’’

‘‘अरे मेरी बात तो सुनो, मैं बड़ी मुसीबत में फंस गया हूं.’’ दूसरी तरफ से अजय ने सुषमा के सवालों का जवाब देने के बजाए बीच में उस की बात काट कर कहा तो सुषमा के होश उड़ गए. उस ने अटकती सांसों से पूछा, ‘‘मुसीबत…कैसी मुसीबत?’’

‘‘सुषमा मुझे कुछ लोगों ने पकड़ लिया है और एक कमरे में बंद कर रखा है. वे मुझ से बहुत बड़ी रकम की मांग कर रहे हैं.’’

‘‘कौन लोग हैं वे और उन्होंने तुम्हें क्यों पकड़ा…किस बात के पैसे मांग रहे हैं?’’

घबराहट के कारण सुषमा ने पूरी बात सुने बिना ही सवालजवाब शुरू कर दिए तो अजय ने फिर उस की बात काटी, ‘‘मुझे नहीं पता ये लोग कौन हैं, किसलिए पैसे मांग रहे हैं लेकिन इतना जानता हूं कि ये लोग बहुत खतरनाक हैं और अगर हम ने इन की बात नहीं मानी तो ये लोग मुझे मार देंगे… हो सकता है ये तुम से बात करें. इन की बात सुन लेना बेबी और अगर हो सके तो पूरा कर देना वरना शायद हम दोबारा ना मिल सकें.’’

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दूसरी तरफ से फोन कट गया. इस फोन के बाद तो सुषमा को पूरा ब्रह्मांड घूमता नजर आने लगा. उसे सुझाई नहीं दे रहा था कि वह करे तो क्या करे. सुषमा ने उसी नंबर पर कई बार फोन किया, जिस से अजय ने फोन किया था, लेकिन फोन स्विच्ड औफ मिला.

सुषमा समझ गई कि किसी मुसीबत में फंसने की वजह से ही अजय घर नहीं पहुंचे. अजय की रूआंसी और परेशानी भरी आवाज सुन कर उसे समझ आ गया था कि वह जिन लोगों के चंगुल में हैं, वे सचमुच खतरनाक लोग रहे होंगे.

लेकिन मुश्किल यह थी कि अभी तक उसे पूरा मामला समझ नहीं आया था कि उन्होंने अजय को किसलिए बंधक बनाया हुआ है. पैसे क्यों मांग रहे हैं और उन्होंने कितनी रकम मांगी है.

पति के लिए परेशान पत्नी

सुषमा यह सब सोच ही रही थी कि कुछ देर बाद उस के फोन पर फिर से एक अंजान नंबर से काल आई. इस बार नंबर वह नहीं था, जिस से अजय ने बात की थी.

सुषमा ने यह सोच कर फोन उठा लिया कि हो सकता है अजय को बंधक बनाने वाले लोग ही दूसरे नंबर से बात कर रहे हों. सुषमा की शंका सच निकली. फोन पर एक पुरुष ने कड़कती हुई आवाज में कहा कि अजय उन के कब्जे में है और अपने पति से बात करने के बाद वह ये तो समझ ही गई होंगी कि वह जिंदा और सहीसलामत हैं.

दूसरी तरफ से फोन करने वाले ने धमकी दी कि अगर अगले 24 घंटे में उस ने 10 लाख रुपए का इंतजाम कर के रकम नहीं दी तो शायद उसे उस का पति जिंदा नहीं मिलेगा.

फोन करने वाले ने जल्द से जल्द 10 लाख रुपए का इंतजाम करने के लिए कहा, साथ ही धमकी भी दी कि अगर इस बारे में पुलिस को सूचना दी या कोई और चालाकी की तो उस तक अजय की लाश ही पहुंचेगी.

फोन करने वाले ने जब यह कहा कि उन के आदमी हर जगह नजर रख रहे हैं कोई भी चालाकी की तो तुरंत यह खबर उस तक पहुंच जाएगी. यह सुन कर सुषमा का कलेजा मुंह को आ गया. फोन सुनते ही उस ने सुनसान घर में इधरउधर देखा कि कोई आदमी उन के घर में तो नहीं छिपा है.

‘‘देखो भैया, मैं आप की सारी मांग पूरी कर दूंगी लेकिन यह तो बता दो, आप पैसे किस बात के मांग रहे हो… आखिर मेरे हसबैंड ने कौन सी गलती की है? क्या आप का उन से कोई उधार का लेनदेन है?’’

सुषमा ने फोन करने वाले की बात को बीच में काटते हुए हिम्मत जुटा कर सहमते हुए सवाल किया तो दूसरी तरफ से कहा गया, ‘‘मैडम ये नोएडा में रहने का टैक्स है और तुम्हारे पति की ठरक का जुरमाना भी…

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‘‘अब ज्यादा सवाल न कर के पैसे का इंतजाम करो… टाइम कम है हमारे पास… रकम कैसे और कहां लेनी है इस के लिए तुम्हें कल फोन करेंगे लेकिन याद रखना हमारे लोग तुम पर नजर रख रहे हैं.’’ कहते हुए दूसरी तरफ से फोन काट दिया गया.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

ओयो होटल का रंगीन अखाड़ा

टीनऐजर्स लव : वासना के बीच की महीन सीमारेखा

टीनऐजर्स लव : भाग 3

असल तूफान तो उस के बाद आया जब समर अचानक अस्मिता से दूर होने लगा. फिर 6 महीने में सबकुछ बदल गया था. अब सिर्फ अस्मिता उसे फोन करती थी. और…समर, अस्मिता का फोन भी नहीं उठाता था. वह अब उस से बात नहीं करना चाहता था. जब उस की मरजी होती, मिलने को बुलाता, पर उस दौरान भी बात नहीं करता. ऐसा लगता था जैसे वह जिस्म की भूख मिटा रहा है.

अस्मिता उस से प्यार करती थी, लेकिन वह अस्मिता को सिर्फ इस्तेमाल कर रहा था.

अस्मिता की तो पूरी दुनिया ही बदल चुकी थी. वह खुद से नफरत करने लगी थी. उस का आत्मविश्वास हिल गया था. वह अकसर अपनेआप से कहती, ‘मैं इतनी बेवकूफ कैसे हो सकती हूं? मैं अंधों की तरह एक मृगतृष्णा की ओर भागती जा रही हूं.’  वह घंटों रोती.

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निराशा उस की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी. इस हार को बरदाश्त न कर पाते हुए इसी बीच अस्मिता बारबार समर को वापस लाने की नाकाम कोशिश करने लगी. उसे मेल भेजना, प्रेम गीत भेजना, कभीकभी गाली लिख कर भेजना, अब यही उस का काम था.

इसी बीच, एक दिन-

समर : तुम्हें समझ में नहीं आ रहा कि मैं तुम से अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता? मुझे दोबारा फोन मत करना.

अस्मिता : देखो, तुम क्यों ऐसा कर रहे हो? मुझे पता है कि तुम भी मुझ से प्यार करते हो, लेकिन क्या है जिस से तुम परेशान हो?

समर : ऐसा कुछ नहीं है. हमारा रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता. मुझे जिंदगी में बहुतकुछ करना है. मेरे पास इन चीजों के लिए वक्त नहीं है.

अस्मिता : नहीं, देखो समर, प्लीज मेरी बात सुनो. हम दोस्त बन कर भी तो रह सकते हैं? हम इस रिश्ते को वक्त देते हैं. अगर कई साल बाद भी तुम को ऐसा ही लगा. तब सोचेंगे.

समर : तुम पागल हो, मेरे पास फालतू वक्त नहीं है. मेरी एक गर्लफ्रैंड है. और मैं तुम से आगे कभी बात नहीं करना चाहता.

टैलीफोन की यह बातचीत अस्मिता को आज भी याद है. यह उन दोनों के बीच आखिरी बातचीत थी.

इसे सुन कर कोईर् भी कह सकता है कि अस्मिता बेवकूफ थी, भ्रम में जी रही थी. लेकिन वह भी क्या करती? कुल 16 की थी, और उसे लगता था, सब फिल्मों की तरह ही होता है. ‘जब वी मेट’ फिल्म से वह काफी प्रभावित थी. वैसे भी 16 का प्यार हो या 60 का, जब कोई प्यार में होता है, तो कुछ भी सहीगलत नहीं होता.

पर स्कूल में समर उस से बचता, नजरें छिपाता, अस्मिता उस से बात करने जाती तो वह झिड़क देता या दोस्तों के साथ मिल कर उस की खिल्ली उड़ाता, कहता, ‘‘कितनी बेवकूफ है जो उस की बातों में आ कर सबकुछ लुटा बैठी. उस ने तो यह सब एक शर्त के लिए किया था.’’

‘ओह, तो यह सिर्फ उस की एक चाल थी. काश, मैं पहले ही समझ जाती,’  वह घंटों रोती रही.

आज प्यार के मामले में भी उस का भरोसा टूट गया था. प्यार पर से विश्वास तो पहले ही  उठने लगा था.

वार्षिक परीक्षाएं सिर पर मंडरा रही थीं. वह खुद से जूझ रही थी. पर अस्मिता ने पढ़ाई या स्कूल बंद नहीं किया. यह शायद उस की अंदरूनी शक्ति ही थी जिस से वह उबर रही थी या उबरने की कोशिश कर रही थी. हालांकि चिड़चिड़ाहट बढ़ रही थी और उस के बढ़ते चिड़चिड़ेपन से घर पर सब परेशान थे. अगर घर पर कोई कुछ जानना चाहता भी तो उस ने कभी नहीं बताया कि उस के साथ क्या हुआ है.

अस्मिता नई क्लास में आ गई थी. हर बार से नंबर काफी कम थे. समर ने नई कक्षा में पहुंच कर स्कूल ही बदल लिया था. यही नहीं, मोबाइल नंबर भी. अस्मिता के लिए यह सब किसी बहुत बड़े जलजले से कम न था. बात न करे पर रोज वह समर को देख कर ही अपना मन शांत कर लेती थी. पर अब तो…

अस्मिता ने खाना बंद कर दिया था. इस कारण उस की तबीयत बिगड़ रही थी.

बहुत मेहनत से उस ने समर का नया नंबर पता किया. समर ने फोन उठाया मगर सिर्फ इतना कहा, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे फोन करने की? किस से नंबर मिला तुम्हें? आइंदा फोन किया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. मेरे पास तुम्हारे कुछ फोटोज हैं. मैं उन्हें सार्वजनिक कर दूंगा. फिर मत कहना, हा…हा…हा… और समर ने फोन काट दिया.’’

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समर के लिए यह सब खेल था, लेकिन अस्मिता के लिए वह पहला प्यार था. ‘कितनी बेवकूफ थी न मैं, जो अपने आत्मसम्मान को पीछे रख कर भी उसे मनाना और पाना चाहती थी,’ अस्मिता ने सोचा. अब उसे अपनेआप से घिन और नफरत सी होने लगी थी. अस्मिता खुद को खत्म करना चाहती थी.

लेकिन, दीपिका जो उस के अच्छे और बुरे दोनों ही पलों की सहेली थी, ने अस्मिता के मनोबल और उसे, एक हद तक टूटने नहीं दिया. उसे समझाया, ‘‘ऐसे एकतरफा रिश्तों से जिंदगी नहीं चलती. अगर आप किसी से प्यार करते हो और वह नहीं करता. तो आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लो, कुछ नहीं हो सकता. और ऐसे में आत्मसम्मान सब से अहम होता है.’’ कहीं न कहीं अस्मिता की इस हालत की जिम्मेदार वह खुद को भी ठहराती थी.

उस ने कभी भी अस्मिता को अकेला नहीं छोड़ा. हर समय उसे टूटने से बचाया वरना इतना अपमान और असम्मान सहना किसी लड़की के लिए आसान नहीं था. दीपिका की कोशिश का ही नतीजा था कि इतने अपमान, असम्मान के बाद भी अस्मिता ने ठान लिया, ‘‘अब मैं नहीं रोऊंगी. मैं जिंदगी में आगे बढ़ूंगी, कुछ करूंगी. एक हादसे की वजह से मेरी पूरी जिंदगी खराब नहीं हो सकती.’’

अब वह समर को याद भी नहीं करना चाहती थी. समर उस की जिंदगी में अब कोई माने नहीं रखता. लेकिन उस के धोखे को वह माफ नहीं कर पाई. प्यार करना उस ने यदि समर से मिल कर सीखा तो प्यार का सही मतलब और वादे का सही मतलब, शायद समर को अस्मिता से समझना चाहिए था. समर ने सिर्फ प्यार ही नहीं, धोखा क्या होता है, यह भी समझा दिया था. समर से मिल कर उस के साथ रिश्ते में रह कर, अस्मिता का प्यार पर से यकीन उठ चुका अब. वाकई कितनी छोटी उम्र होती है ऐसे प्यार की. शायद सिर्फ शारीरिक आकर्षण आधार होता है. तभी तो इसे कच्ची उम्र का प्यार कहते हैं ‘टीनऐजर्स लव.’

टीनऐजर्स लव : भाग 2

एक रोज फोन पर समर कुछ उदास आवाज में बोला, ‘‘क्या मैं पास हो सकूंगा? मैं ने पढ़ा तो कुछ नहीं. तुम तो फिर भी होशियार हो, मेरा क्या होगा?’’

‘‘सब ठीक होगा, क्लास में तुम से कमजोर भी बहुत हैं,’’ अस्मिता ने उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा.

‘‘मैं क्या करूं बताओ? तुम से बात किए बिना एक पल भी नहीं रहा जाता. हर बार मोबाइल उठा कर देखता हूं कि कहीं तुम्हारा मैसेज या कौल तो नहीं आई, अस्मिता.’’

‘‘मेरा भी यही हाल है. सभी सखीसहेलियों, परिजनों के इतर जीवन अब सिर्फ तुम पर केंद्रित हो गया है. मेरी हर कल्पना, हर सपने का प्रधान किरदार तुम ही हो, समर. मैं इन सभी चीजों को ले कर मजाक में थी. मगर अब यह बेचैनी बताती है, छटपटाहट बताती है कि दिल पर अब मेरा बस नहीं रहा. अब मैं तुम्हारी हो गई हूं. पर क्या वह सब संभव है? मैं भी न, क्याक्या बकती जा रही हूं.’’

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दिन बीतते गए, फोन पर उन की बातें चलती गईं. ‘‘कहीं मिलते हैं, कुछ घंटे साथ बिताते हैं, अब सिर्फ बातों से मन नहीं भरता, अस्मिता.’’ अब समर कभीकभी अस्मिता पर, घर से बाहर मिलने पर भी जोर डालने लगा.

एक दिन निश्चय किया कि कहीं एकांत में मिलते हैं. लेकिन कहां? यह प्रश्न था कि कहां मिला जाए. परेशानी को दूर किया अस्मिता की सहेली दीपिका ने. उसी ने रास्ता सुझाया. दीपिका ने कहा, ‘‘मैं अपनी मम्मी को अपनी बहन के साथ मूवी देखने के लिए भेज दूंगी. उन लोगों के जाते ही तुम दोनों मेरे फ्लैट में आ जाना. मैं बाहर से ताला लगा कर चली जाऊंगी. और ठीक 2 घंटे बाद आ कर ताला खोल दूंगी. अगर कोई आएगा भी तो समझेगा कि घर में कोई नहीं है. देख अस्मिता, तुझे समर के साथ समय बिताने का इस से अच्छा कोई मौका नहीं मिल सकता. तू और समर वहां खूब मस्ती करना.’’

समर को भी इस में कोई आपत्ति न थी. 2 दिन बाद मिलने का कार्यक्रम तय कर लिया गया. मौसम साफ था, हवा में संगीत था, पंछियों की कोमल आवाज मनमस्तिष्क में नव स्फूर्ति भर रही थी. नीयत स्थान और निश्चित समय. समर का पहला और आखिरी काम जो पूर्व तैयारी के साथ संपन्न होने जा रहा था वरना अब तक तो उस ने परीक्षा तक के लिए कोई तैयारी नहीं की थी.

तय दिन तय समय पर, अस्मिता समर के साथ दीपिका के फ्लैट पर पहुंची. प्लान के मुताबिक दीपिका ने अपनी मम्मी और बहन को नई मूवी देखने के लिए भेज दिया. वे दोनों फ्लैट के अंदर और बाहर ताला. लेकिन उन की ये सब गतिविधियां फ्लैट के सामने दूसरे फ्लैट में रहने वाले एक अंकल खिड़की से देख रहे थे.

उन्हें शायद कुछ गड़बड़ लगा. वे अपने फ्लैट से नीचे उतर कर आए और कालोनी के 2-3 लोगों को एकत्र कर धीरे से बोले, ‘‘यह जो फ्लैट है, अरे वही सामने, बख्शीजी का फ्लैट, उस में एक लड़का और एक लड़की बंद हैं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ दूसरे फ्लैट वाले अंकल ने पूछा.

‘‘मतलब… बख्शीजी की लड़की तो बाहर से ताला लगा गई है पर अंदर लड़कालड़की बंद हैं.’’

‘‘अरे, छोड़ो यार, हमें क्या मतलब. इस में नया क्या है? आजकल तो यह आम बात है,’’ दूसरे फ्लैट वाले अंकल टालते हुए बोले.

‘‘अमा यार, कैसी बात कर रहे हो? अपनी आंखों के सामने, यह गलत काम कैसे होने दूं्?’’

‘‘गलत?’’

‘‘हां जी, मैं ने खुद अपनी आंखों से देखा है दोनों को फ्लैट के अंदर जाते हुए.’’

तभी पड़ोस की एक आंटी भी आ गई, ‘‘क्या हुआ भाईसाहब?’’

‘‘अरे, सामने बख्शीजी के फ्लैट में एक लड़कालड़की बंद हैं,’’ पहले वाले अंकल बोले.

‘‘तो ताला तोड़ दो,’’ महिला ने मशवरा दिया.

‘‘नहीं, यह सही नहीं है, जिस का मकान है, उसे बुलाओ,’’ दूसरे अंकल ने सलाह दी.

शोर बढ़ता गया. लोग इकट्ठे होते चले गए. तभी कहीं से पुलिस का एक हवलदार भी पहुंच गया. लोगबाग दरवाजा पीटने लगे. ‘‘बाहर निकलो, दरवाजा खोलो…’’  बिना यह सोचेसमझे कि ताला तो बाहर से बंद है, तो दरवाजा खुलेगा कैसे?

प्लान के मुताबिक, दीपिका समय पूरा होने से 10 मिनट पहले वहां पहुंच गई, लेकिन भीड़ को देख कर एक बार वह भी घबरा गई. उस ने लोगों से वहां इकट्ठे होने का प्रयोजन पूछा और गुस्से में बोली, ‘‘मेरा फ्लैट है, मैं जानूं. आप लोगों को क्या मतलब?’’

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हवलदार ने दीपिका की हां में हां मिलाई और भीड़ से जाने के लिए कहा. और फिर दीपिका के पीछेपीछे वह भी सीढि़यां चढ़ने लगा. थोड़ी देर बाद हवलदार फ्लैट से वापस आया और बोला, ‘‘फ्लैट में तो कोई नहीं था. किस ने कहा कि वहां लड़कालड़की बंद हैं. फालतू में इतना शोर मचा दिया.’’

सामने के फ्लैट वाले अंकल चुपचाप वहां से गायब हो गए, लेकिन उन का दिमाग अभी भी चल रहा था…जैसे ही भीड़ छटी, दीपिका ने अस्मिता और समर को चुपचाप बाहर निकाल दिया. दरअसल, सीढि़यां चढ़ते समय ही दीपिका ने हवलदार को कुछ रुपए दे कर उस का मुंह बंद कर दिया था. जैसेतैसे आई हुई बला टल गई, लेकिन अस्मिता और समर को मुंह देख कर साफ पता लग रहा था कि उन्होंने इन 2 घंटों के दौरान कितना अच्छा समय बिताया होगा.

जब दोनों फ्लैट के अंदर थे तब समर ने कहा, ‘‘सौरी, जल्दीजल्दी में तुम्हारे लिए कोई उपहार लाना तो भूल ही गया.’’

‘‘तुम आ गए हो तो नूर आ गया है,’’ कहते हुए अस्मिता हंस पड़ी. तब दोनों ने हृदय के तार झंकृत हो उठे थे. दिल में एक रागिनी बज उठी थी. रहीसही कसर आंखों से छलकते प्रेम निमंत्रण ने पूरी कर दी थी. सहसा ही समर के हाथ उस के तन से लिपट गए और यह आलिंगन हजारोंलाखों उपहारों से कहीं ज्यादा था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

टीनऐजर्स लव : भाग 1

‘‘आसमानी ड्रैस में बड़ी सुंदर लग रही हो, अस्मिता. बस, एक काम करो जुल्फों को थोड़ा ढीला कर लो.’’  अस्मिता कोचिंग क्लास की अंतिम बैंच पर खाली बैठी नोट बुक में कुछ लिख रही थी कि समर ने यह कह कर उन की तंद्रा तोड़ी.

यह कह कर वह जल्दी ही अपनी बैंच पर जा कर बैठ गया और पीछे मुड़ कर मुसकराने लगा. किशोर हृदय में प्रेम का पुष्पपल्लवित होने लगा और दिल बगिया की कलियां महकने लगीं. भीतर से प्रणयसोता बहता चलता गया. उस ने आंखों में वह सबकुछ कह दिया था जो अब तक पढ़ी किताबें ही कह पाईं.

अस्मिता इंतजार करने लगी कि ब्रैक हो, समर बाहर आए और मैं उस से कुछ कहूं. आधे घंटे का समय एक सदी के बराबर लग रहा था. ‘क्या कहूंगी? शुरुआत कैसे करूंगी? जवाब क्या आएगा,’ ये सब प्रश्न अस्मिता को बेचैन किए जा रहे थे. कुछ बनाती, फिर मिटाती. मन ही मन कितने ही सवाल तैयार करती, जो उसे पूछने थे और फिर कैंसिल कर देती कि नहीं, कुछ और पूछती हूं.

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घंटी की आवाज अस्मिता के कानों में पड़ी. जैसे मां की तुतलाती बोली सुन कर कोई बच्चा दौड़ आता है, वह तत्क्षण क्लासरूम से बाहर आ गई. सोच रही थी कि वह अकेला आएगा. मगर हुआ इच्छा और आशा के प्रतिकूल. वह अपने दोस्तों से बतियाते हुए क्लासरूम से बाहर निकला. समर दोस्तों की टोली में बैठा गपें मार रहा था और चोर नजरों से उसे अकेला देखने की कोशिश भी कर रहा था. घर जाने का समय हो रहा था और आशाइच्छा धूमिल हो रही थी.

कहते हैं न, जब सब रास्ते बंद हो जाते हैं, तब कोई न कोई रास्ता अवश्य निकलता है. अस्मिता किसी काम से अकेली क्लास में आई और समर इसी ताक में था. अस्मिता के पास मात्र 2 मिनट का समय था और कहने को ढेर सारी बातें. उस ने समर के पास आने पर कहा, ‘‘तुम भी न, बहुत स्मार्ट हो.’’

समर ने थैंक्स कहते हुए अस्मिता की हथेली के पृष्ठ भाग पर अपने हाथ से स्पर्श किया. फिर धीरेधीरे उस की पांचों उंगलियां अस्मिता की उंगलियों में समा चुकी थीं. यह थी अस्मिता के जीवन की प्रथम प्रणय गीतिका. जीवन का मृदुल वसंत प्रारंभ हो चुका था. उन दोनों ने एकदूसरे को जी भर कर देखा.

तभी अस्मिता की कुछ सहेलियां क्लासरूम में आ गईं. प्रेममयी क्षणों के चलते दोनों को न ध्यान रहा, न कोई भान. वे उन दोनों की यह हरकत देख कर मुसकराईं और बाहर चली गईं. स्कूल की छुट्टी हुई. अस्मिता घर आ गई. रातभर सो नहीं पाई, करवटें बदलती रही. कब सुबह हो गई, पता ही न चला. सुबह फिर तैयार हो, स्कूल चली गई. उस दिन समर भी जल्दी आ गया था. अस्मिता ने ध्यान से समर की तरफ  देखा. समर ने स्कूलबैग क्रौस बैल्ट वाला डाला हुआ था, जोकि किसी बदमाश बच्चे की भांति इधरउधर हो रहा था.

‘‘हैलो,’’ समर ने अन्य लोगों की नजर से बचते हुए अस्मिता से कहा.

‘‘हाय समर, कैसे हो?’’ उस ने जवाब के साथ ही समर से प्रश्न किया.

‘‘मैं ठीक हूं और तुम से कुछ कहना चाहता हूं. क्या कह सकता हूं?’’

‘‘बिलकुल,’’ अस्मिता समर से मन ही मन प्यार करने लगी थी. कच्ची उम्र में ही उस ने समर को अपना सबकुछ मान लिया था.

‘‘क्या तुम्हारा मोबाइल नंबर मिल सकता है?’’ समर ने संकोच करते हुए कहा.

‘‘ओह हां, अच्छा, तो क्या करोगे नंबर का?’’ अस्मिता ने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा.

‘‘मुझे तुम से कुछ कहना है,’’ समर ने कहा.

‘‘ओके, लिखो…97….’’ अस्मिता ने नंबर दे दिया.

‘‘थैंक्स.’’

एकदूसरे को देखते, हंसतेमुसकराते समय निकल रहा था जैसे मुट्ठी में से रेत देखते ही देखते उंगलियों के बीच की जगह से निकल जाती है.

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दोनों को ही छुट्टी होने की अधीर प्रतीक्षा थी. समर तो मन ही मन योजना बना रहा था…‘12 बजे छुट्टी होगी, 1 बजे यह घर पहुंचेगी, 2 बजे तक फ्री होगी और मुझे ठीक ढाई बजे कौल करना होगा.’ उस का दिमाग तेजगति से काम कर रहा था जैसे मार्च में अकाउंटैंट का दिमाग किया करता है. आखिर ढाई बज ही गए. समर ने बिना क्षण गंवाए, मोबाइल उठाया और अस्मिता का नंबर डायल किया.

पहली बार में तो अस्मिता ने कौल काट दी. फिर मिस्डकौल की. सामान्य औपचारिक बातचीत के बाद समर गंभीर मुद्दे पर आना चाहता था. शायद अस्मिता भी यही तो चाहती थी.

‘‘क्या तुम मुझ से इसी तरह रोज बात करोगी?’’ समर ने पूछा.

‘‘किसी लड़की के भोलेपन का फायदा उठा रहे हो?’’ अस्मिता ने जान कर प्रतिप्रश्न किया.

‘‘नहींनहीं, ऐसे ही, अगर तुम्हें उचित लगे तो,’’ समर ने शराफत दिखाते हुए कहा.

रुकरुक कर दिन में 5-6 बार बातें होने लगीं. समर कभी मिस्डकौल करता तो कभी जोखिम उठाते हुए सीधा कौल कर देता.

दिन बीतते गए, बातें बढ़ती गईं और उन दोनों के संबंधों में प्रगाढ़ता आती गई. हंसीमजाक, स्कूल की बातें, दोस्तोंसहेलियों के किस्से उन के विषय रहते थे. वे स्कूल में बहाना खोजते ताकि एकांत में बैठ कर प्यारभरी बातें कर सकें. रास्ते सुहाने होते गए, हलके स्पर्श में मिठास का एहसास होता.

एक दिन आया जब उन के प्रेम का जिक्र क्लास के हर स्टूडैंट की जबां पर तो था ही, टीचर्स के बीच में भी बात फैल गई और प्रधानाचार्य ने दोनों को स्टाफरूम में बुला कर ऐसी हरकतों के दुष्परिणामों से अवगत करवाया. उन दोनों ने भविष्य में इस प्रकार की गलती दोहराने की प्रतिबद्घता व्यक्त कर पीछा छुड़ा लिया.

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अब लगभग सब लोग उन के बीच का सबकुछ जान चुके थे. यह वह वक्त था जब अर्धवार्षिक परीक्षाएं सिर पर थीं. दोनों को ही किताब खोले महीनों हो गए थे. अस्मिता अपनी बौद्धिकता के अहं में थी और समर अपने बौद्धिक होने के वहम में.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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