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ट्रस्ट एक प्रयास : भाग 1

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

हम सब अपनीअपनी जिंदगी में कितने ही सपने देखते हैं. कुछ टूटते हैं तो कुछ पूरे भी हो जाते हैं. बस, जरूरत है तो मात्र ‘प्रयास’ की. कई बार सिर्फ एक शब्द जिंदगी के माने बदल देता है. मेरी जिंदगी में भी एक शब्द ‘ट्रस्ट’ ने जहां मेरा दिल तोड़ा वहीं उसी शब्द ने मेरे सब से खूबसूरत सपने को भी साकार किया.

अंगरेजी के शब्द ट्रस्ट का हिंदी में अर्थ है ‘विश्वास’ और इस छोटे से शब्द में कितना कुछ छिपा हुआ है. उफ, कितनी आहत हुई थी, जब अपनों से ही धोखा खाया था.

आलोक मेरे सामने खडे़ थे. मैं अभीअभी रजिस्ट्रार आफिस से सब बंधनों से मुक्त हो कर आई थी.

‘‘नैना, क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?’’

‘‘आलोक, मुझे आप पर पूरा विश्वास है लेकिन हालात ही कुछ ऐसे हो गए थे.’’

मेरी आंखों के सामने बाऊजी का चेहरा आ रहा था और उन्हें याद करतेकरते वे फिर भर आईं.

मेरी आंखें गंगायमुना की तरह निरंतर बह रही थीं तो मन अतीत की गलियों में भटक रहा था जो भटकतेभटकते एक ऐसे दोराहे पर आ कर खड़ा हो गया जहां से मायके के लिए कोई रास्ता जाता ही नहीं था.

मेरा विवाह कुछ महीने पहले ही हुआ था. शादी के कुछ समय बाद आलोक और मैं सिंगापुर गए हुए थे. आलोक का यह बिजनेस ट्रिप था. हम दोनों काफी समय से सिंगापुर में थे. बाऊजी से फोन पर मेरी बात होती रहती थी. अचानक एक दिन बड़े भैया का होटल में फोन आया, ‘नैना, बाऊजी, नहीं रहे.’

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मुझे नहीं पता कब आलोक ने वापसी की टिकटें बुक कराईं और कब हम लोग सिंगापुर से वापस भारत आए.

बरामदे में दरी बिछी हुई थी. बाऊजी की तसवीर पर माला चढ़ी हुई थी. उन के बिना घर कितना सूनासूना लग रहा था. पता लगा कि भाई हरिद्वार उन की अस्थियां प्रवाहित करने गए हुए थे.

‘नैना, तू आ गई बेटी,’ पीछे पलट कर देखा तो वर्मा चाचा खडे़ थे. उन्हें देख मैं फूटफूट कर रो पड़ी.

‘चाचाजी, अचानक बाऊजी कैसे चले गए.’

‘बेटी, वह काफी बीमार थे.’

‘लेकिन मुझे तो किसी ने नहीं बताया. यहां तक कि बाऊजी ने भी नहीं.’

‘शायद वह नहीं चाहते थे कि तुम बीमारी की खबर सुन कर परेशान हो, इसलिए नहीं बताया.’

लेकिन भाइयों ने भी मुझे उन के बीमार होने की खबर देने की जरूरत नहीं समझी थी. मैं पूछना चाहती थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों किया गया? लेकिन शब्द थे कि जबान तक आ ही नहीं रहे थे. वर्मा चाचाजी ने बताया कि आखिरी समय तक बाऊजी की आंखें मुझे ही ढूंढ़ रही थीं.

घर वापस आ कर मैं चुपचाप लेटी रही. विश्वास नहीं हो रहा था कि बाऊजी अब इस दुनिया में नहीं रहे.

बाऊजी मेरे लिए सबकुछ थे क्योंकि होश संभालने के बाद से मैं ने उन्हें ही देखा था. बडे़ भाई विजय और अजय दोनों मुझ से उम्र में काफी बडे़ थे. बेहद सरल स्वभाव के बाऊजी डी.ए.वी. स्कूल की एक शाखा में प्रिंसिपल थे और स्कूल से लौटने के बाद का सारा समय वह मेरे साथ बिताते थे.

मां को तो मैं बचपन में ही खो चुकी थी लेकिन बाऊजी ने मां की कमी कभी महसूस नहीं होने दी. वह कहानियां भी लिखा करते थे. उन की उपदेशात्मक कहानियां मुझे आज भी याद हैं. एक बार उन्होंने मुझे कृष्ण की जन्मकथा सुनाई और पूछा कि नैना, बताओ, कृष्ण पर किस का ज्यादा हक है? यशोदा का या देवकी का? मेरे द्वारा यशोदा का नाम लेते ही उन का चेहरा खुशी से खिल उठा था.

उस समय तो नहीं लेकिन कुछ वर्षों के बाद बाऊजी ने एक रहस्य से परदा उठाया था. वह नहीं चाहते थे कि मुझे किसी और से पता चले कि मैं उन की गोद ली हुई बेटी हूं. हां, मैं उन की सगी संतान नहीं थी लेकिन शायद उन्हें अपने प्यार व मुझे दिए हुए संस्कारों पर पूरापूरा विश्वास था. इसीलिए मेरे थोड़ा समझदार होते ही उन्होंने खुद ही मुझे सच से अवगत करा दिया था.

अतिशयोक्ति नहीं होगी, मैं कुछ देर के लिए सकते में अवश्य आ गई थी लेकिन बाऊजी के प्यार व उन की शिक्षा का ऐसा असर था कि मैं बहुत जल्द सामान्य हो गई थी.

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खुद से ही यह सवाल किया था कि क्या कभी उन के प्यार में बनावट या पराएपन का आभास हुआ था? नहीं, कभी नहीं. कितने स्नेह से उन्होंने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था, ‘मेरी बेटी, तुम तो मेरे लिए इस दुनिया का सब से नायाब तोहफा हो. तुम मेरी बेटी हो इसलिए नहीं कि तुम्हें हमारी जरूरत थी बल्कि इसलिए क्योंकि हमें तुम्हारी जरूरत थी. तुम्हारे आने के बाद ही हमारा परिवार पूर्ण हुआ था.’

बाऊजी को सब लोग बाबूजी या लालाजी कह कर पुकारते थे लेकिन मैं अपनी तोतली बोली में उन्हें बचपन में ‘बाऊजी’ कहा करती थी और जब बड़ी हुई तो उन्होंने बाबूजी की जगह बाऊजी ही कह कर पुकारने को कहा. उन्हें मेरा बाऊजी कहना बहुत अच्छा लगता था.

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बाऊजी ने बताया था कि मां हर त्योहार या किसी भी खुशी के मौके पर अनाथाश्रम जाया करती थीं. एक बार उन्होंने आश्रम में एक छोटी सी बच्ची को रोते देखा. इतना छोटा बच्चा, आज तक आश्रम में नहीं आया था. रोती हुई वह बच्ची मात्र कुछ हफ्तों की थी और उसे अपनी मां की गोद भी नसीब नहीं हुई थी. पता नहीं किस निर्मोही मां ने अपनी बच्ची का त्याग कर दिया था.

‘पता नहीं क्या सम्मोहन था उस बच्ची की आंखों में कि प्रकाशवती यानी तुम्हारी मां अब हर रोज उस बच्ची को देखने जाने लगीं और किसी दिन न जा पातीं तो बेचैन हो जाती थीं. एक दिन मैं और तुम्हारी मां आश्रम पहुंचे. जैसे ही बच्ची आई उन्होंने उसे उठा लिया. बच्ची उन की गोद से वापस आया के पास जाते ही रोने लगी. यह देख कर मैं चकित था कि इतनी छोटी सी बच्ची को ममता की इतनी सही पहचान.

‘प्रकाशवती अब मुझ पर उस बच्ची को गोद लेने के लिए जोर डालने लगीं. दरअसल, उन्हें बेटी की बहुत चाह थी, जबकि मैं  ‘हम दो हमारे दो’ का प्रण ले चुका था. बच्ची को देखने के बाद उन की बेटी की इच्छा फिर से जागने लगी थी. मैं ने प्रकाशवती को समझाया कि बच्ची बहुत छोटी है. बहुत बड़ी जिम्मेदारी का काम होगा. लेकिन वह टस से मस न हुईं. आखिर मुझे उन की जिद के आगे झुकना ही पड़ा. वैसे एक बात कहूं, बेटी, मन ही मन मैं भी उस बच्ची को चाहने लगा था. बस, वह बच्ची कुछ ही दिनोें में नैना के रूप में हमारी जिंदगी में बहार बन कर मेरे घर आ गई.’

मैं डबडबाई नजरों से बाऊजी को निहारती रही थी.

‘लेकिन ज्यादा खुशी भी कभीकभी रास नहीं आती. तुम अभी 2 साल की भी नहीं हुई थीं कि तुम्हारी मां का निधन हो गया. दोनों बेटे बडे़ थे, खुद को संभाल सकते थे लेकिन जब तुम्हें देखता था तो मन भर आता था.

‘एक बार किसी जानकार ने तुम्हें ‘बेचारी बिन मां की बच्ची’ कह दिया. मुझे बहुत खला था वह शब्द. बस, मैं ने उस दिन से ही फैसला कर लिया था कि प्रकाशवती की बेटी को किसी भी तरह की कमी नहीं होने दूंगा. कोई उसे बेचारी कहे, ऐसी नौबत ही नहीं आने दूंगा. उस के बाद से ही तुम्हारे भविष्य को ले कर बहुत कुछ सोच डाला.’

ट्रस्ट एक प्रयास : भाग 2

लेखिका- अर्चना वाधवानी   

उफ, बाऊजी ने मुझे इतनी अच्छी परवरिश दी थी लेकिन लानत है मुझ पर जो आखिरी समय उन की सेवा न कर सकी. वह लाड़ करते  हुए मुझ से कहते थे कि किसी ने सच ही कहा है कि बेटी सारी जिंदगी बेटी ही रहती है. लेकिन मैं ने क्या फर्ज पूरे किए बेटी होने के?

आलोक ने मुझे बहुत समझाया कि इस सब में मेरी कोई गलती नहीं थी. हमें यदि समय पर खबर की जाती और तब भी न पहुंचते तब गलत था. उन की बातें ठीक थीं लेकिन दिल को कैसे समझाती.

बहुत गुस्सा था मन में भाइयों के लिए. बाऊजी की क्रिया थी. पगड़ी की रस्म के बाद आलोक किसी जरूरी काम से चले गए पर मैं वहीं रुकी थी. जब सब लोग चले गए तो मैं जा कर भाइयों के पास बैठ गई.

‘भैया, आप लोगों ने मुझे खबर क्यों नहीं की? बाऊजी आखिरी समय तक मेरी राह देखते रहे.’

‘नैना, जो बात करनी है, हम से करो,’ तीखा स्वर गूंजा तो मैं चौंक पड़ी. सामने दोनों भाभियां लाललाल आंखों से मुझे घूर रही थीं.

मैं थोड़ी सी अचकचा कर बोली, ‘भाभी, क्या बात हो गई. आप सब मुझ से नाराज क्यों हैं?’

‘पूछ रही हो नाराज क्यों हैं? पता नहीं तुम ने बाबूजी को क्या पट्टी पढ़ा दी कि उन्होंने हमारा हक ही छीन लिया,’ जवाब में छोटी भाभी बोलीं तो मैं तिलमिला गई.

बस, फिर क्या था, दोनों भाभियों ने मुझे खूब खरीखोटी सुनाईं और उस का सार था कि बाऊजी ने मेरे बहकावे में आ कर मकान में मेरा भी हिस्सा रखा था. बाऊजी के इलाज पर खर्चा उन लोगों ने किया, सेवा उन लोगों ने की इसीलिए केवल उन लोगों का ही मकान पर हक बनता था.

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मैं ने भाइयों की ओर देखा तो बडे़ भाई विजय मुझ से नजरें चुरा रहे थे. इस का मतलब था कि मकान के गुस्से में आ कर इन लोगों ने मुझे बाऊजी के बीमार होने की खबर नहीं की थी.

मैं ने बाऊजी की तसवीर की ओर देखा, वह मुसकरा रहे थे. इस से पहले कि मैं कुछ बोल पाती, छोटी भाभी ने ऐसी बात कह दी कि मेरे पांव तले की जमीन खिसक गई. उन्होंने कड़वाहट से कहा, ‘पता नहीं बाबूजी को बाहर वालों पर इतना तरस क्यों आता था. न जात का पता न मांबाप का, बस, ले आए उठा कर.’

मुझ से और नहीं सुना गया. मैं उठ खड़ी हुई. मेरे दोनों बडे़ भाई एकदम से मेरे पास आ कर बोले, ‘नैना, दरअसल हम पर बहुत उधार है और मकान बेच कर हम यह उधार चुकाएंगे, इसलिए ये दोनों परेशान हैं. हम ने तो इन से कहा था कि नैना को हम अपनी परेशानी बताएंगे तो वह हमारे साथ रजिस्ट्रार आफिस जा कर ‘रिलीज डीड’ पर साइन कर देगी. ठीक कहा न?’

सच क्या था, मैं अच्छी तरह समझती थी. मैं मरी सी आवाज में केवल यही पूछ पाई कि कब चलना है, और अगले ही दिन हम रजिस्ट्रार आफिस में बैठे हुए थे.

मेरे आगे कई कागज रखे गए. मैं एकएक कर के सब कागजों पर अंगूठा लगाती गई और अपने हस्ताक्षर भी करती गईर्र्र्र्. हर हस्ताक्षर पर भाई का प्यारदुलार, मेरा रूठना उन का मनाना मेरी आंखों के आगे आता चला गया. वहीं बैठे एक आदमी ने जब मुझ से उन कागजों को पढ़ने के लिए कहा, तो मेरा मन भर आया था. क्या कहती उस से कि मेरा तो मायका ही सदा के लिए छिन गया. बाऊजी क्या गए सब ने मुंह ही फेर लिया. भाभियां तो फिर पराई थीं लेकिन भाइयों की क्या कहूं. वे भी पराए हो गए.

भाइयों को जो चाहिए था वह उन्हें मिल गया लेकिन मेरा सबकुछ छिन गया. मेरे बाऊजी, मेरा मायका, मेरा बचपन. लगा, जैसे अनाथ तो मैं आज हुई हूं.

शायद मैं यानी नैना, जिस पर बाऊजी कितना गर्व करते थे, उस रोज टूट गई थी. घर पहुंची तो आलोक कहीं फोन मिला रहे थे.

‘कहां चली गई थीं तुम? पता है कहांकहां फोन नहीं किए?’ वह चिल्ला पडे़ लेकिन मेरी हालत देख कर कुछ नरम पड़ते हुए पूछा, ‘नैना, कहां थीं तुम?’

क्या कहती उन्हें. वह मेरे पास आए और बोले, ‘तुम्हारे वर्मा चाचाजी ने यह पैकेट तुम्हारे लिए भिजवाया था.’

मैं चुपचाप बैठी रही.

वह आगे बोले, ‘लाओ, मैं खोल देता हूं.’

वह जब पैकिट खोल रहे थे तो मैं अंदर कमरे में चली गई.

कुछ देर बाद वह भी मेरे पीछेपीछे कमरे में आ गए और बोले, ‘नैना, आखिर बात क्या हुई. कल से देख रहा हूं तुम हद से ज्यादा परेशान हो.’

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कब तक छिपाती उन से. वैसे छिपाने का फायदा क्या और बताने में नुकसान क्या. रिश्ता तो उन लोगों ने लगभग तोड़ ही दिया था. मैं ने आलोक को एकएक बात बता दी.

वह कुछ देर के लिए सन्न रह गए. कुछ देर बाद बोले, ‘नैना, कितना सहा तुम ने. तुम्हें क्या जरूरत थी उन लोगों के साथ अकेले रजिस्ट्रार आफिस जाने की. मुझे इस लायक भी नहीं समझा. कल रात से मैं तुम से पूछ रहा था लेकिन तुम ने कुछ नहीं बताया. वहां से इतना कुछ सुनना पड़ा फिर भी उन लोगों की हर बात मानती चली गईं. द फैक्ट इज, यू डोंट ट्रस्ट मीं. सचाई तो यह है कि तुम्हें मुझ पर भरोसा ही नहीं है,’ कह कर वह दूसरे कमरे में चले गए.

जेहन में जैसे ही भरोसे की बात आई मुझे लगा जैसे किसी ने झकझोर कर मुझे जगा दिया हो. मैं अतीत से निकल वर्तमान में आ गई.

‘‘आलोक, क्या कह रहे हैं आप. मैं आप पर भरोसा नहीं करती.’’

ट्रस्ट एक प्रयास

बेटी की सनक : भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

बेटी के प्यार के बारे में जानते ही वह उस के प्रति सख्त हो गईं और उसे साफतौर पर देवदीप से मिलने पर मना कर दिया. यही नहीं, देवदीप के घर आने पर भी पाबंदी लगा दी.

उम्र के जिस मोड़ से रिया गुजर रही थी, उस उम्र में अकसर बच्चों के पांव फिसल जाते हैं. ऐसे में कहीं कोई ऊंचनीच हो जाए तो समाज में वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी. चंदना को इसी बात का डर सता रहा था, इसीलिए उन्होंने बेटी को देवदीप से मिलने और बात करने से मना कर दिया था.

मां की यह बात रिया को काफी नागवार लगी थी. रिया ने यह बात प्रेमी देवदीप को बता दी. यही नहीं वह अपने दिल की हर बात अपनी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल से भी शेयर करती थी. दोनों हमउम्र भी थीं और हमराज भी. एकदूसरे के दिल की बातें सीने में दफन कर लेती थीं.

उस दिन के बाद से चंदना की बेटी पर सख्ती कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी. बेटी से कहीं भी जानेआने पर उस से हिसाब लेने लगी थीं. मसलन कहां जा रही है? वहां काम क्या है? घर कब लौटोगी? वगैरह…वगैरह.

अचानक मां के बदले तेवर से रिया परेशान हो गई. मां की टोकाटाकी उसे कतई पसंद नहीं थी. मां के इस रवैए से उस के मन में नकारात्मक सोच पैदा हो गई. वह यह भी सोच रही थी कि मां उस के प्रेमी देवदीप को पसंद नहीं करती, मां के जीते जी वह देवदीप को अपना जीवनसाथी नहीं बना सकती तो क्यों न मां को ही हमेशा के लिए अपने रास्ते हटा दे. न रहेगा चंदना नाम का कांटा, न चुभेगा पांव में. उस के बाद तो जीवन भर मजे ही मजे रहेंगे.

रिया के कच्चे दिमाग में खतरनाक योजना अंतिम रूप ले चुकी थी. जल्द से जल्द वह इस काम को अंजाम देना चाहती थी. वह यह भी जानती थी कि इस काम को अकेली पूरा नहीं कर सकती. इसलिए उस ने अपनी इस खतरनाक योजना में मौसेरी बहन आयशा और प्रेमी देवदीप को भी शामिल कर लिया. आयशा ने रिया का विरोध करने के बजाए उस का साथ देने के लिए हामी भर दी थी.

सब कुछ उस की योजना के मुताबिक चल रहा था. 23 अगस्त, 2020 को रिया आयशा को घर बुला लाई. उस के आने से रिया की हिम्मत दोगुनी हो गई थी. दोनों ने मिल कर रात भर चंदना को मौत के घाट उतारने की योजना बनाई.

रिया बेसब्री से अगली सुबह होने का इंतजार कर रही थी कि कब सुबह हो और मां को मौत के घाट उतारा जाए. मां के लिए उस के दिल में जरा भी रहम नहीं था.

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अगली सुबह 10 बजे रिया और आयशा बाजार गईं. उस दिन चंदना ड्यूटी नहीं गई थीं, घर पर ही थीं. मैडिकल की दुकान से दोनों ने नींद की 10 गोलियां खरीदीं और घर ला कर अलमारी में छिपा दीं.

दोपहर करीब साढ़े 12 बजे रिया ने 3 कप चाय बनाई. एक प्याली खुद ली, दूसरी प्याली आयशा को दी और तीसरी प्याली मां को दी. उस ने मां की चाय में चुपके से नींद की सारी गोलियां डाल दी थीं. चाय पीने के थोड़ी देर बाद ही दवा ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया.

चंदना अचेत हो कर बिस्तर पर गिर गईं. दोनों को बड़ी बेसब्री इसी पल का इंतजार था. रिया ने मां को हिला कर देखा, उन के जिस्म में कोई हरकत नहीं थी. फिर क्या था, दोनों ने मिल कर चुन्नी से चंदना का गला घोंट दिया.

कुछ ही पलों में चंदना की मौत हो गई. लेकिन रिया को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि उस की मां मर चुकी है. फिर खुद कलयुगी बेटी ने मां के पैरों में बिजली का तार फंसा कर 10 मिनट तक करंट दौड़ाया ताकि मां की मौत पक्की हो जाए.

इस के बाद रिया को यकीन हुआ कि उस के रास्ते का कांटा हमेशा के लिए निकल चुका है. उस के बाद लाश ठिकाने लगाने के लिए उस ने मदद के लिए प्रेमी देवदीप को फोन किया. देवदीप रिया के घर पहुंचा.

तीनों ने चंदना की लाश एक चादर में बांध कर बैड के नीचे डाल दी. फिर रिया ने अलमारी में रखे लाखों के सोनेचांदी के गहने निकाले और एक पोटली में बांध कर तीनों घर से निकल गए, ताकि यह लगे कि लूट के चलते घटना घटी है. जाने से पहले रिया ने मां का फोन स्विच्ड औफ कर दिया था.

यह सब करतेकरते दोपहर के 2 बज गए थे. उस के बाद रिया प्रेमी देवदीप और मौसेरी बहन आयशा के साथ दिन भर इधरउधर घूमती रही. गहने उस ने देवदीप के हवाले कर दिए थे. फिर घूमतेटहलते रात में रिया और आयशा नानी के घर पहुंच गईं.

रिया ने नानी से झूठ बोला कि वह पिकनिक पर आयशा के साथ कोटा गई थी. लौटते वक्त मां को फोन लगाया तो मां के फोन की घंटी बजती रही लेकिन उन्होंने काल रिसीव नहीं किया, इसलिए यहां चली आई.

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फिर नानी के घर से रिया ने अपने पड़ोसी इंजीनियर अंकल रामेश्वर सूर्यवंशी को फोन कर के मां के फोन न उठाने वाली बात बता कर उन्हें घर जा कर पता लगाने को कहा. ताकि मौका मिलते ही उन्हें फंसा कर खुद को बेदाग साबित कर दे.

लेकिन कानून के लंबे हाथों से वह बच नहीं पाई और सलाखों के पीछे पहुंच गई. वह खुद तो जेल गई ही, साथ में अपनी बहन और दोस्त को भी जेल ले गई.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने देवदीप से सारे गहने बरामद कर लिए थे. कलयुगी बेटी की करतूतों पर पूरा शहर थूथू कर रहा था. लोग यही कह रहे थे कि ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही अच्छा है.

बेटी की सनक : भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

उसी शाम मुखबिर के जरिए पुलिस को एक ऐसी चौंका देने वाली सूचना मिली, जिसे सुन कर पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. रिया ने पूछताछ में पुलिस को बताया था कि जिस दिन उस की मां की हत्या हुई, उस दिन वह घर पर नहीं थी, बल्कि अपनी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल और दोस्त देवदीप गुप्ता के साथ घटना से 2 दिन पहले कोटा घूमने गई थी.

वह झूठ बोल रही थी. दरअसल, रिया घर छोड़ कर कहीं गई ही नहीं थी. यह सुन कर पुलिस हैरान रह गई कि रिया ने झूठ क्यों बोला कि वह घटना से 2 दिन पहले घूमने गई थी. इस का मतलब वह घटना के बारे में बहुत कुछ जानती थी या घटना में उस का कहीं न कहीं हाथ था.

रिया की काल डिटेल्स से भी बात स्पष्ट हो गई थी कि वह उस दिन कहीं नहीं गई थी, बल्कि घर पर ही थी. इस बात की पुष्टि हो जाने के बाद पुलिस की नजर पूरी तरह रिया पर जा टिकी.

रिया से दोबारा पूछताछ करनी जरूरी थी, लिहाजा 29 अगस्त, 2020 को पुलिस रिया को पूछताछ के लिए घर से थाने ले आई और उस से कड़ाई से पूछताछ शुरू की तो वह जल्द ही टूट गई और अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि उसी ने मौसेरी बहन आयशा और प्रेमी देवदीप गुप्ता के साथ मिल कर अपनी मां की हत्या की थी. पुलिस को भटकाने के लिए उस ने घटना को लूट की ओर मोड़ने की कोशिश की थी.

अलमारी में रखे मां के सोनेचांदी के जेवरात वह अपने साथ ले गई थी. रिया के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस की मौसेरी बहन आयशा जायसवाल और प्रेमी देवदीप गुप्ता को गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर जेवरात बरामद कर लिए.

तीनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने सचिव चंदना की हत्या की कहानी कुछ इस तरह बताई—

45 वर्षीय चंदना डडसेना मूलरूप से बिलासपुर के पथरिया की रहने वाली थी. एकलौती बेटी रिया और सास यही उस का घरसंसार था. वह सास और बेटी का चेहरा देख कर जी रही थी, यही उस के जीने का सहारा भी थे.

दोनों की जिम्मेदारी चंदना के कंधों पर थी. अपना दायित्व समझ कर चंदना उसे ईमानदारी से निभा रही थी. चंदना के कंधों पर जिम्मेदारी का यह बोझ उस समय आया, जब रिया 5-6 साल की रही होगी. उन्हीं दिनों मासूम रिया के सिर से पिता और चंदना के सिर से पति का साया उठ गया था. जेल के अंदर कैदियों ने पीटपीट कर उन की हत्या कर दी थी.

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चंदना डडसेना के पति का नाम विजय डडसेना था. वह पथरिया चुनचुनिया पंचायत क्षेत्र के एक इंटर कालेज में सरकारी अध्यापक थे. खुद्दार और स्वाभिमानी विजय डडसेना अपने कुशल व्यवहार के लिए इलाके में मशहूर थे. अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा सजग और कानून का पालन करने वाले थे. इन से जब कोई गलत और अनुचित बात करता था, तो वह उस का विरोध करते थे.

उस दिन 4 अप्रैल, 2009 की तारीख थी जब विजय डडसेना के जीवन में काल कुंडली मार कर बैठा. उन दिनों बिलासपुर में पंचायती चुनाव होने वाला था. उसी संबंध में चुनाव से पहले एक मीटिंग आयोजित की गई थी. उस मीटिंग में एसडीएम और तमाम अधिकारियों के साथ अध्यापक विजय डडसेना भी मौजूद थे. चुनाव में उन की भी ड्यूटी लगी थी. मीटिंग चुनावी प्रशिक्षण के लिए आयोजित की गई थी.

विजय डडसेना का किसी बात को ले कर एसडीएम से विवाद हो गया था. दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि नाराज एसडीएम ने उन्हें जेल भिजवा दिया. कुछ दिनों बाद जेल में उन की कैदियों के साथ लड़ाई हो गई. गुट बना कर कैदियों ने जेल में ही अध्यापक विजय डडसेना की पीटपीट कर हत्या कर दी.

अध्यापक विजय डडसेना की हत्या से बिलासपुर में तूफान खड़ा हो गया था. उन की हत्या के विरोध में कई दिनों तक सामाजिक संगठनों ने आंदोलन दिया. आंदोलन पर विराम लगाने के लिए अनुकंपा के आधार पर सरकार ने मृतक की पत्नी चंदना डडसेना को सरकारी नौकरी और 15 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की थी.

बाद के दिनों में पथरिया चुनचुनिया पंचायत में चंदना डडसेना की सचिव पद पर नियुक्ति हो गई थी. मुआवजे के 15 लाख रुपए में से 7 लाख बेटी रिया को और 8 लाख रुपए में से आधीआधी रकम सास और बहू को मिल गई थी.

इस के बाद से चंदना की जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, चूंकि रिया चंदना की एकलौती औलाद थी, इसलिए वह जिद्दी भी थी. जिस काम के लिए वह जिद पर अड़ जाती थी, उसे पूरा कर के ही मानती थी. बेटी की जिद के सामने मां को झुकना पड़ता था.

वह जानती थीं ऐसा नहीं करती, तो बेटी से सदा के लिए हाथ धो बैठती, इसलिए बेटी के सामने झुकना उन की मजबूरी थी. वह वही करती थीं, जो बेटी कहती थी.

17 वर्षीया रिया जिस स्कूल में पढ़ती थी, उसी स्कूल में देवदीप गुप्ता भी पढ़ता था. फर्क सिर्फ इतना था वह दसवीं में थी तो देवदीप 12वीं में था.

देवदीप रिया के मोहल्ले में रहता था. 4 भाई बहनों में वह दूसरे नंबर का था. पिता की सरकारी नौकरी थी. घर में पिता की कमाई से अच्छे पैसे आते थे. मां पर दबाव बना कर देवदीप पैसे ऐंठता और अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर गलीमोहल्लों में घूमता था. यही उस की दिनचर्या थी.

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बहरहाल, स्कूल के दिनों में घर जातेआते रास्ते में दोनों के बीच परियच बढ़ा. यह परिचय बाद में दोस्ती में बदल गया और फिर दोस्ती प्यार में. चूंकि देवदीप गुप्ता रिया के ही मोहल्ले का ही रहने वाला था और एक ही स्कूल में पढ़ता था, यह बात रिया की मां चंदना जानती थी. पढ़ाई के बहाने से रिया देवदीप को घर बुलाती थी और दोनों घंटों साथ समय बिताते थे.

शुरू के दिनों में चंदना ने बेटी को देवदीप से मिलने के लिए मना नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी आंखें भी बंद नहीं की थीं. उस के घर आने के बाद वह दोनों पर नजर रखती थीं. आखिरकार चंदना को बेटी के प्यार के बारे में पता चल ही गया.

बेटी की सनक : भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के थाना सकरी इलाके में स्थित है उसलापुर गुप्ता कालोनी. इसी कालोनी में पथरिया चुनचुनिया की पंचायत सचिव चंदना डडसेना अपनी 17 वर्षीया एकलौती बेटी रिया डडसेना के साथ रहती थी.

इस कालोनी में उन्होंने 2 माह पहले ही किराए पर कमरा लिया था. इस से पहले वह परिवार सहित पथरिया में स्थित अपनी ससुराल में रह रही थीं. उन की ससुराल में सास के अलावा कोई नहीं था. ससुर की मृत्यु हो चुकी थी. पति विजय डडसेना की बदमाशों ने जेल में हत्या कर दी थी.

पति और ससुर की मौत के बाद चंदना ने अपनी सास को अपने साथ रखा, बिलकुल मां की तरह क्योंकि उन के अलावा सास की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.

बहरहाल, उस दिन तारीख थी 22 अगस्त, 2020. रिया मां चंदना से कह कर अपनी मौसेरी बहन आसना जायसवाल और दोस्त देवदीप गुप्ता के साथ कोटा (राजस्थान) टूर पर गई. घर पर चंदना डडसेना अकेली थीं. इन की सास बीते कई दिनों से पथरिया में रह रही थीं.

रिया ने 24 अगस्त, 2020 की रात 10 बजे के करीब मां को फोन कर हालचाल पूछना चाहा, लेकिन उन का फोन बंद आ रहा था. उस ने जितनी बार फोन मिलाया, हर बार फोन स्विच्ड औफ आया. इस से रिया थोड़ी परेशान हो गई कि मां का फोन बंद क्यों आ रहा है? वह कभी अपना फोन बंद नहीं रखती थीं.

दरअसल, रिया मां को फोन कर के यह बताना चाहती थी कि वह कोटा से वापस लौट आई है और इस समय नानी के यहां रुकी हुई है, सुबह घर लौट आएगी. पर मां से बात न होने पर वह बुरी तरह परेशान हो गई.

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रात काफी हो गई थी. रिया समझ नहीं पा रही थी कि इस समय किस के पास फोन कर के मां के बारे में पता लगाए. जब कुछ समझ में नहीं आया तो वह सो गई. उस ने नानी से भी कुछ नहीं बताया.

अगली सुबह रिया ने अपने पड़ोसी अंकल इंजीनियर रामेश्वर सूर्यवंशी को फोन कर के कहा, ‘‘अंकल, रात से मां का फोन बंद आ रहा है. मुझे बहुत डर लग रहा है कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो हो नहीं हुई है. अंकल प्लीज, घर जा कर मां को देख लो. हो सके तो मां से मेरी बात करा दीजिए प्लीज.’’

रिया के आग्रह पर पड़ोसी रामेश्वर सूर्यवंशी ने हां कर दी. उन्होंने यह भी कहा कि घर पहुंच कर तुम्हारी मां से मैं बात करा दूंगा. उन के आश्वासन के बाद रिया ने फोन काट दिया.

एक घंटे बाद रामेश्वर अपनी पत्नी के साथ चंदना डडसेना के घर पहुंचे. उन के घर का मुख्यद्वार अंदर की ओर खुला हुआ था. वहीं से उन्होंने ‘भाभीजी… भाभीजी’ कह कर चंदना को पुकारा और खड़े हो गए.

आवाज लगाने के बाद जब अंदर से कोई हलचल नहीं हुई तो ‘भाभीजी… भाभीजी’ आवाज देते हुए पतिपत्नी अंदर घुस गए. अंदर गहरा सन्नाटा पसरा था. इधरउधर देखते हुए वह चंदना के बैडरूम में पहुंचे.

दरवाजे के ऊपर बाहर से सिटकनी चढ़ी हुई थी. रामेश्वर सूर्यवंशी ने सिटकनी खोली और दरवाजे से ही अंदर की ओर झांक कर कमरे का निरीक्षण किया. जैसे ही उन की नजर बैड के पास नीचे फर्श पर गई, पतिपत्नी दोनों के होश फाख्ता हो गए. वहां से दोनों उलटे पांव बाहर की ओर भागे.

दरअसल फर्श पर चंदना डडसेना की लाश पड़ी थी. उन के गले में दुपट्टा लिपटा था. दोनों पैर एक रंगीन चादर से बंधे हुए थे. लाश के पास ही उन का फोन पड़ा था.

बाहर आ कर पतिपत्नी दोनों ने थोड़ी राहत की सांस ली. जब रामेश्वर सूर्यवंशी सामान्य हुए तो उन्होंने रिया को फोन कर के घटना की सूचना दी और जल्द से जल्द घर पहुंचने के लिए कहा. फिर उन्होंने 100 नंबर पर डायल कर घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

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घटनास्थल (उसलापुर गुप्ता कालोनी) सकरी थाना क्षेत्र में पड़ता था. सकरी थाना प्रभारी रविंद्र यादव सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए.

थोड़ी देर बाद सीएसपी आर.एन. यादव भी आ गए. इधर मां की मौत की जानकारी मिलते ही रिया भी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल के साथ घर पहुंच गई. उस का रोरो कर बुरा हाल था. रिया को रोते हुए देख कर आयशा भी खुद को नहीं संभाल पाई. उस ने भी रोरो कर अपनी आंखें सुजा लीं.

चंदना कोई साधारण महिला नहीं थीं. वह चुनचुनिया की पंचायत सचिव थीं. अपने अच्छे व्यवहार से उन्होंने लोगों के बीच अच्छी पकड़ बना रखी थी. थोड़ी ही देर में चंदना की हत्या की खबर पूरी कालोनी में फैल गई थी. जिस ने भी उन की हत्या की खबर सुनी, दौड़ेभागे उन के आवास पहुंच गए.

मौके से पुलिस को मृतका के मोबाइल के अलावा कुछ नहीं मिला. वह भी स्विच्ड औफ था. घर की अलमारी खुली हुई थी. अलमारी के अंदर सामान तितरबितर था. देखने से ऐसा नहीं लग रहा था कि हत्या लूट की वजह से हुई हो.

अगर लूट की वजह से घटना घटी होती तो मृतका और लुटेरों के बीच संघर्ष के निशान जरूर मिलते, लेकिन मौके से संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले थे. इस में पुलिस को कहानी कुछ और ही नजर आई.

पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. थाने पहुंच कर थानाप्रभारी रविंद्र यादव ने रामेश्वर सूर्यवंशी की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर आगे की काररवाई शुरू कर दी.

मृतका की बेटी रिया से पुलिस ने किसी पर शक होने की बात पूछी तो उस ने अपने पापा के पुराने दोस्त और पड़ोसी रामेश्वर सूर्यवंशी पर ही मां की हत्या का आरोप लगा दिया.

जबकि रिया के फोन करने पर रामेश्वर ही सब से पहले उस के घर पहुंचे थे और उन्होंने ही चंदना की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. लेकिन जब मृतका की बेटी ने उन पर ही शक जताया तो रिया के बयान के आधार पर पुलिस रामेश्वर सूर्यवंशी को हिरासत में ले कर पूछताछ के लिए थाने ले आई.

पुलिस पूरी रात सूर्यवंशी से पूछताछ करती रही लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. जब हत्या में उन की कोई भूमिका सामने नहीं आई तो पुलिस ने उन्हें कुछ हिदायत दे कर इस शर्त पर छोड़ दिया कि दोबारा बुलाए जाने पर थाने आना होगा.

अगले दिन चंदना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट थानाप्रभारी रविंद्र यादव के पास आ गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने और नशीली दवा खिलाने की बात लिखी थी. इसलिए मृतका का विसरा सुरक्षित रख लिया गया.

मतलब साफ था कि सचिव की हत्या लूट के लिए नहीं, बल्कि किसी और वजह से की गई थी. हत्या की वजह क्या हो सकती है, यह जांच का विषय था.

पुलिस को भटकाने के लिए हत्यारों ने हत्या जैसे जघन्य अपराध को लूट की ओर ले जाने की कोशिश की थी. पुलिस का शक मृतका के करीबियों पर बढ़ गया था. पुलिस ने रिया से दोबारा पूछताछ की तो इस बार उस का बयान बदल गया. रिया के बदले बयान ने उसे शक के घेरे में खड़ा किया.

शक के आधार पर पुलिस ने रिया को निशाने पर ले लिया और उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. यही नहीं, पुलिस ने गोपनीय तरीके से उस की छानबीन भी शुरू कर दी थी.

—कथा में रिया परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बेटी की सनक

प्यार का मोहरा

प्यार का मोहरा- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

‘‘हां, ऐसा ही कुछ समझ लो. जिस के सामने रूप का खजाना फैला हो, उसे सामान्य लड़की कैसे पसंद आ सकती है.’’ सनी ने यह बात अनीता की तरफ देखते हुए कुछ इस ढंग से कही कि अनीता एक क्षण के लिए सकुचा गई.

उस ने अपने आप को संभाल कर कहा, ‘‘कम से कम कुछ हिंट तो दो कि तुम्हें कैसी दुलहन चाहिए. अगर तुम मुझे अपनी पसंद बताओगे तो मैं कोशिश करूंगी कि तुम्हारी पसंद की लड़की ढूंढ सकूं.’’

सनी कुछ क्षणों के लिए चुपचाप अनीता को निहारता रहा, ‘‘मुझे बिलकुल आप जैसी दुलहन चाहिए.’’

सनी ने यह बात कही तो कुछ देर के लिए अनीता चुप रही, फिर आहिस्ता से बोली, ‘‘तुम मजाक बहुत अच्छा कर लेते हो.’’

‘‘मैं मजाक नहीं कर रहा हूं. अगर ऊपर वाले ने आप जैसी कोई और लड़की बनाई हो तो मुझे दिखाना. वैसे मेरा खयाल है कि वह ऐसा नायाब हीरा एक ही बनाता है.’’

तारीफ की यह इंतहा थी. ऐसी इंतहा औरतों को अच्छी लगती है. फिर भी अनीता ने बनते हुए कहा, ‘‘आखिर मुझ में ऐसा क्या खास है कि आप को मेरे जैसी बीवी की आस है.’’

‘‘यह तो मेरा दिल और मेरी आंखें जानती हैं कि आप में ऐसा क्या खास है. जो कुछ भी मैं कह रहा हूं, वह एकदम सच है.’’ सनी ने जब यह बात कही तो अनीता के मुंह से बोल नहीं फूटे.

सनी के जाने के बाद भी अनीता के कानों में सारी रात उस के कहे शब्द गूंजते रहे.

यह हकीकत है कि तारीफ हर नारी की कमजोरी है. सनी की बातों ने उस रात उस की आंखों से नींद छीन ली थी. अगले दिन जब सनी अनीता के घर आया तो उसे ही देखता रहा. अनीता ने उस से नजरें चुराते हुए कहा, ‘‘तुम्हें और कोई काम नहीं है क्या, जो मुझे ही देखते रहते हो?’’

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‘‘जी हां, आप सही कह रही हैं. मुझे आप के सिवा कुछ भी नहीं दिखता. आप नहीं जानतीं, आप ने मेरा सुखचैन छीन लिया है. आप की वजह से मैं कोई काम नहीं कर पाता. मैं हर वक्त केवल आप के बारे में ही सोचता रहता हूं.’’ सनी अपनी ही रौ में कहता चला गया.

अनीता ने उसे झिड़कते हुए कहा, ‘‘मुझे परेशान मत करो.’’

यह सुन कर सनी वहां से चला गया.

सनी अपने कमरे पर पहुंच गया. वह कुछ देर चुपचाप बैठा रहा और अनीता के बारे में सोचता रहा. फिर उस ने मोबाइल उठाया और अनीता के मोबाइल पर मैसेज भेज दिया. मैसेज में उस ने ‘सौरी’ लिखा था.

अनीता ने अपने मोबाइल पर आए सनी के मैसेज को देखा तो कुछ देर तक मैसेज को देखती रही, फिर उस ने सनी को काल किया. सनी ने जैसे ही फोन उठाया, अनीता ने कहा, ‘‘तुम तुरंत मेरे घर आओ.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया.

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सनी हड़बड़ा गया. उसे कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन उसे इस बात की खुशी थी कि अनीता ने खुद उसे अपने घर बुलाया है. वह समझ गया कि अनीता उस से नाराज नहीं है. वह लगभग दौड़ता हुआ अनीता के कमरे पर पहुंच गया.

अनीता ने उसे बैठने का इशारा किया. सनी कुरसी पर बैठ गया. अनीता ने उस की ओर देखते हुए कहा, ‘‘तुम ने कल जो भी कहा था, वह तुम्हें नहीं कहना चाहिए था.’’

‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं, मैं ने कुछ भी गलत नहीं कहा था. मैं अब भी अपनी बात पर कायम हूं.’’ सनी एकएक शब्द सोच कर कह रहा था, ‘‘आप मेरी बातों का गलत मतलब मत निकालिए. मेरे दिल में कोई पाप नहीं है. मुझे आप बेहद सुंदर लगती हैं, इसलिए मैं ने अपने दिल की बात ईमानदारी से आप से कह दी थी. यदि यह बात मैं छिपा कर रखता तो यह अच्छा नहीं होता.’’

सनी की बात सुन कर अनीता मुसकरा दी, ‘‘तुम से बातों में कोई नहीं जीत सकता.’’

सनी को महसूस होने लगा कि अनीता के दिल में उस के लिए कुछ जगह जरूर है. इस के बाद दोनों की नजदीकियां और भी बढ़ गईं. जब भी दोनों बैठते तो घंटों बातें करते रहते.

सर्दियों के दिन आ गए थे. एक दिन दोनों बाइक पर सवार हो कर काफी दूर निकल गए थे. खुली सड़क पर बाइक चलाते हुए सनी को सर्दी लगने लगी थी. यह देख कर पीछे बैठी अनीता ने उसे अपनी शौल में ढकने की कोशिश की.

इस कोशिश में वह सनी से चिपक कर बैठ गई. अनीता के बदन का स्पर्श पा कर सनी की कनपटियां गरम होने लगीं. वह फंसेफंसे स्वर में बोला, ‘‘प्लीज, आप मुझ से इतना सट कर मत बैठिए.’’

‘‘क्यों? मैं तो तुम्हें ठंड से बचाना चाहती हूं.’’

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‘‘लेकिन मैं ठीक से गाड़ी नहीं चला पाऊंगा, मुझे कुछकुछ हो रहा है.’’ सनी कांपती हुई आवाज में बोला.

‘‘क्यों जनाब! ऐसा क्या हो रहा है?’’ अनीता ने यह बात कुछ इस अदा से कही कि सनी ने बाइक रोक दी और पीछे पलट कर शरारत से अनीता की आंखों में देखते हुए बोला, ‘‘मैं बता दूं कि मुझे क्या हो रहा है?’’

कथा पुलिस सूत्रें पर आधारित

प्यार का मोहरा- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

ताजनगरी आगरा के सिकंदरा क्षेत्र के नगला सोहनलाल में अपने पति व बच्चों के साथ रहती थी. 30 वर्षीय अनीता. उस का विवाह करीब 14 साल पहले गुलाब सिंह से हुआ था. उस के 3 बच्चे थे. गुलाब सिंह घर के पास ही जूते बनाने की एक फैक्ट्री में काम करता था.

उस दिन गुलाब सुबह फैक्ट्री चला गया. बच्चे स्कूल चले गए. फिर अनीता ने आराम से बैठ कर चायनाश्ता किया. चाय पी कर जब उस ने दोपहर के खाने का इंतजाम करना चाहा तो बनाने के लिए घर पर कोई सब्जी नहीं थी. इसलिए वह दोपहर व शाम के लिए बाजार से सब्जी खरीदने चली गई.

घंटे भर बाद जब वह बाजार से वापस लौट रही थी, तभी उसे पीछे से बाइक के हौर्न की आवाज सुनाई दी. अनीता ने मुड़ कर देखा तो उसे अपनी बगल में बाइक पर सवार एक युवक दिखाई दिया. उसे देखते ही अनीता पहचान गई.

वह उस के पड़ोस में रहने वाला सनी था. 22 वर्षीय सनी ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अनीताजी, इतना सारा सामान ले कर पैदल क्यों जा रही हो? मैं भी घर ही जा रहा हूं, आइए आप को छोड़ दूंगा.’’

‘‘आप बेवजह परेशान होंगे?’’ अनीता ने मुसकरा कर कहा. हालांकि वह मन ही मन सनी की पेशकश पर राहत महसूस कर रही थी.

‘‘देखिए, आप मुझ से गैरों की तरह व्यवहार कर रही हैं. मैं आप का पड़ोसी हूं. पड़ोसी होने के नाते आप की मदद करना मेरा फर्ज है.’’ कह कर सनी ने बाइक रोकी और अनीता के हाथ से सामान के थैले ले कर बाइक में लगे हुक में फंसा दिए. फिर बाइक पर बैठते हुए अनीता से बोला, ‘‘आइए बैठिए.’’

अनीता सकुचाते हुए बाइक पर उस के पीछे बैठ गई. कुछ ही देर में दोनों नगला सोहनलाल पहुंच गए. अनीता बाइक से उतरी और थैले हुक से निकालने लगी तो सनी ने उसे टोका, ‘‘आप नाहक परेशान हो रही हैं, मैं सामान अंदर रख देता हूं. इस बहाने कम से कम आप एक कप चाय तो पिलाओगी.’’

‘‘अरे, आप कैसी बातें कर रहे हैं? चाय तो मैं आप को पिलाऊंगी ही.’’ अनीता सनी की बात से झेंप गई थी.

अनीता ने अपने घर के मेन गेट का ताला खोला और सनी के साथ अंदर आ गई. सनी को कमरे में बैठा कर अनीता चाय बनाने चली गई.

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सनी कागारौल में रहता था. लेकिन नगला सोहनलाल के पास एक फैक्टरी में काम करने के कारण उस ने नगला सोहनलाल में ही किराए पर एक कमरा ले लिया था. सनी अविवाहित था और काफी खूबसूरत नौजवान था.

जब उस की नजर पड़ोस में रह रही अनीता पर पड़ी तो उस के हुस्न से उस की आंखें चुंधिया गईं. उस के पड़ोस में ही रहती थी, इसलिए उसे अनीता के बारे में जानने में देर नहीं लगी. वह जान गया था कि अनीता विवाहित है और 3 बच्चों की मां है.

3 बच्चों की मां होने वाली बात जानने के बाद तो सनी हैरत में पड़ गया. क्योंकि देखने से किसी तरह भी नहीं लगता था कि वह 3 बच्चों की मां है. इस का मतलब यह था कि अनीता का खूबसूरत हुस्न सदाबहार था, ऐसे हुस्न पर उम्र का कोई असर नहीं पड़ता.

सनी उसे किसी भी तरह अपना बनाना चाहता था. इसी वजह से वह जानबूझ कर उस के सामने पड़ता और राह चलते पड़ोसी होने का एहसास कराते हुए उस के हालचाल पूछ लेता. नजरें टकरातीं तो वह अनीता को देख कर मुसकरा देता.

उस दिन संयोग ही था कि जब वह बाजार से घर लौट रहा था तो उस की नजर अनीता पर पड़ गई. मौका अच्छा देख कर वह उस के पास पहुंच गया और मदद के बहाने उस के साथ उस के घर तक पहुंच गया.

चाय पीने के बाद सनी जाने के लिए उठ खड़ा हुआ, ‘‘अनीताजी, अपने हाथों से बढि़या टेस्टी चाय पिलाने का शुक्रिया. अगर आप को कभी किसी चीज की जरूरत हो या मेरी मदद की आवश्यकता पड़े तो आप मुझे तुरंत बुला लेना.’’

कह कर उस ने अनीता को अपना मोबाइल नंबर नोट करा दिया और अनीता ने भी उसे अपना नंबर दे दिया.

उस दिन के बाद उन दोनों में गाहेबगाहे फोन पर बातचीत होने लगी. कभी सुबह कभी दोपहर के समय सनी अनीता के पास आ कर बैठ जाता था. दोनों काफी देर वे बातें करते रहते थे. सनी उस से मीठीमीठी बातें करता था, अत: अनीता को भी उस से अपना वक्त बांटना अच्छा लगने लगा. धीरेधीरे दोनों की मित्रता गहराने लगी.

उस रोज शाम को तेज बरसात हो रही थी. अपने कमरे के बाहर खड़ा सनी बादल की गरज और बरसते पानी को देख रहा था. ऐसे मौसम में उसे अकेलापन बहुत साल रहा था. तभी अचानक उस की निगाह सामने सड़क पर पानी में भीगती हुई आ रही अनीता पर पड़ी. अनीता के हाथ में एक बैग भी था.

पानी से पूरी तरह भीग जाने से अनीता का पीला कुरता उस के बदन से चिपक गया था, जिस से उस का हुस्न उस भीगे कुरते में नुमाया हो रहा था. उस के भीगे अप्रतिम सौंदर्य को सनी एकटक देखता रह गया. एकाएक उस के तनमन में चाहत की एक अनोखी बरसात होने लगी.

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फिर एकाएक उस ने कमरे में जा कर छतरी उठाई और अनीता की तरफ दौड़ा. उस ने अनीता को छतरी की ओट में लेते हुए पूछा, ‘‘आप तो बारिश में बुरी तरह भीग गई हैं?’’

‘‘जब मैं घर से निकली थी, तब अनुमान नहीं था कि इतनी तेज बारिश हो जाएगी. मुझे उम्मीद थी कि मैं बारिश होने से पहले ही घर पहुंच जाऊंगी.’’ अनीता अपने आप में सिमट गई. अपनी हालत पर उसे शर्म आ रही थी.

सनी अनीता को छतरी की ओट में उस के घर तक लाया. अनीता ने उसे कमरे में बैठने का संकेत करते हुए कहा, ‘‘आप दो मिनट बैठो. मैं कपड़े बदल कर आती हूं.’’

सनी के दिमाग में अजीब सी उथलपुथल मची हुई थी. वह अनीता का भीगा सौंदर्य देखने के बाद अपनी सुधबुध खो बैठा था. वह सोच भी नहीं सकता था कि अनीता की खूबसूरती इस तरह कयामत ढाने वाली होगी. रहरह कर अनीता का भीगा बदन उस के हवास पर ठोकर मार रहा था.

‘‘ये लीजिए चाय.’’ आवाज सुन कर सनी की तंद्रा टूटी. उस ने चौंक कर अनीता की तरफ देखा. भीगे खुले बालों में अनीता उस समय अनिंद्य रूपसी नजर आ रही थी.

सनी ने कांपते हाथों से चाय का प्याला पकड़ा. अनीता उस के सामने एक कुरसी पर बैठ कर तौलिए से अपने गीले बालों को सुखाने लगी. सनी नजरें झुका कर चाय पीने की कोशिश करने लगा. लेकिन कनखियों से वह अनीता के सौंदर्य को निहार रहा था.

अनीता ने भी उस की इस चोरी को पकड़ लिया था. वह मुसकराते हुए सनी से बोली, ‘‘तुम्हारी शादी हो गई?’’

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‘‘अभी नहीं हुई,’’ सनी मुसकराया, ‘‘रिश्ते तो बहुत आ रहे हैं, लेकिन मुझे कोई लड़की पसंद नहीं आ रही.’’

‘‘लगता है तुम्हारी कोई खास पसंद है?’’

—कथा पुलिस सूत्रें पर आधारित

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