लुब्रिकैंट अपनाएं, सैक्स को मजेदार बनाएं

Sex News in Hindi: शादीशुदा जिंदगी को कामयाब व सुख से भरा बनाने के लिए जहां विश्वास, प्यार, समर्पण और तालेमल का अहम रोल रहता है, वहीं सैक्स (Sex) भी खास अहमियत रखता है. सैक्स संबंध पतिपत्नी को शारीरिक (Physical) ही नहीं, मानसिक (Mentally) रूप से भी एकदूसरे के करीब लाते हैं. अगर पतिपत्नी के बीच कामयाब सैक्स नहीं हो पाता है, तो शादीशुदा जिंदगी (Marriage Life) एक समय में आ कर बोझ सी बन जाती है. सैक्स को खुशनुमा बनाने में जहां एकांत, तनावरहित (Stressless) माहौल व पतिपत्नी (Husband Wife) का मूड में रहना जरूरी होता है, वहीं सैक्स को मजेदार बनाने और दूसरी परेशानियों से बचने के लिए लुब्रिकैंट (lubricant) का भी अहम रोल होता है.

आमतौर पर फोरप्ले के दौरान पतिपत्नी के अंगों में कुदरती तौर से ही लुब्रिकैंट बनना शुरू हो जाता है, लेकिन कुछ मामलों में बाहर के लुब्रिकैंट इस्तेमाल कर के सैक्स का मजा लेना पड़ता है.

औरतों में लुब्रिकैंट की मात्रा का लैवल इन हालात पर निर्भर करता है:

माहवारी के दौरान

माहवारी के समय एस्ट्रोजन हार्मोन औरतों के निजी अंगों के लुब्रिकेशन को गड़बड़ा देता है, जबकि ओवुलेशन के समय यह सब से ज्यादा होता है.

उम्र

रजोनिवृत्ति का समय निकल जाने के बाद औरतों को जोश में आने में काफी समय लगता है. ऐसा एस्ट्रोजन का लैवल कम हो जाने के चलते होता है.

तनाव

तनाव किसी भी संबंध को खराब करने का काम करता है. तनाव के चलते औरतों में सैक्स का जोश कम हो जाता है. इस के अलावा एकाग्रता, खून के दौरे और वेजाइना में नमी बनाए रखने में परेशानी होती है.

सैक्स के समय होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए डाक्टर भी बाहरी लुब्रिकैंट को इस्तेमाल करने की सलाह देते हैं. वैसे तो बाजार में कई तरह के लुब्रिकैंट मौजूद हैं लेकिन इन का इस्तेमाल औरतों की शारीरिक जरूरत के आधार पर ही करना चाहिए.

लुब्रिकैंट के बारे में कुछ अहम जानकारी:

तेल वाले लुब्रिकैंट

बेबी औयल, पैट्रोलियम वाली क्रीम या त्वचा पर लगाने वाली क्रीम तेल वाले लुब्रिकेट होते हैं. लेकिन इन के इस्तेमाल करने से कई बार वेजाइनल संक्रमण के खतरे बढ़ जाते हैं. सैक्स के बाद जब भी वेजाइना को साफ किया जाता है तो औयल ठीक से धुल नहीं पाता है और आगे चल कर यही फंगल या बैक्टीरियल इंफैक्शन का रूप लेने लगता है, जिस से वेजाइना में खुजली, बारबार पेशाब आना और दर्द जैसी समस्याएं होने लगती हैं. इस के अलावा घरों में लंबे समय तक रखने पर कई बार इन की क्वालिटी में भी खराबी आ जाती है. साथ ही, ये शुक्राणुओं की क्वालिटी में भी कमी ला सकते हैं. तेल वाले लुब्रिकैंट से कंडोम के फटने का भी खतरा होता है, जिस से अनचाहे बच्चे के ठहरने का भी डर बना रहता है.

पानी वाले लुब्रिकैंट

इस तरह के लुब्रिकैंट के लिए बाजार में कई तरह की चीजें मौजूद हैं. इन में नमक का लैवल कम होता है और औरत की प्रजनन ताकत पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है. इस के अलावा ये संवेदनशील त्वचा पर भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

सिलिकौन वाले लुब्रिकैंट

ये पानी वाले लुब्रिकैंट से भी ज्यादा महफूज होते हैं. इस के साथ ही इस के इस्तेमाल से त्वचा ज्यादा नरम और मुलायम हो जाती है.

ध्यान रखने वाली बातें

लुब्रिकैंट का इस्तेमाल करने से पहले इस बात का ध्यान रखें कि आप इन लुब्रिकैंट का इस्तेमाल अपने शरीर के संवेदनशील हिस्सों पर कर रहे हैं, इसलिए हमेशा ऐसे लुब्रिकैंट का इस्तेमाल करें जिस से आप की त्वचा को नुकसान न पहुंचे.

लुब्रिकेशन में कुछ जोड़े थूक का इस्तेमाल करते हैं. थूक में कीटाणुओं की भरमार होती?है, जो आसानी से वेजाइना में जा कर बैक्टीरियल इंफैक्शन की समस्या पैदा कर सकते हैं. इस के इस्तेमाल से जननांगों में होने वाली हरपीज और यीस्ट इंफैक्शन जैसी खतरनाक बीमारियों का भी डर बना रहता है.

फ्लेवरफ्री लुब्रिकैंट के इस्तेमाल से सैक्स सुख भले ही मिल जाए लेकिन वेजाइना में सूखेपन की समस्या हो जाती है. जब जोड़ा एकसाथ नहा रहा हो तो कंडीशनर या बौडी जैल जैसी चीजें चरम सुख पाने के लिए उस एक पल के लिए सुखद जरूर लगती हैं, पर उस के बाद वेजाइना में परेशानी हो सकती है.

कैसे करें इस्तेमाल

लुब्रिकैंट का इस्तेमाल करना या न करना केवल जोड़ों की निजी इच्छा पर निर्भर करता है. अगर लुब्रिकैंट पहली बार इस्तेमाल किया जा रहा है तो सब से पहले थोड़ी मात्रा में लुब्रिकैंट को खरीद कर इस के असर को देखें, फिर इस की बड़ी मात्रा खरीदें. लुब्रिकैंट को अपने बिस्तर के पास ही रखें, ताकि जरूरत पड़ने पर इस का इस्तेमाल किया जा सके. याद रखें, सैक्स का मजा बढ़ाने के लिए सब से पहले थोड़ी मात्रा में ले कर इस का इस्तेमाल करें.

यह पौलिथीन आपके लिए जहर है!

Society News in Hindi: संपूर्ण दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक बार इस्तेमाल किए जाने वाली सभी प्रकार की प्लास्टिक हमारे लिए  जहर के समान है. लगभग 10 वर्षों से प्लास्टिक को लेकर वैज्ञानिक तथ्य सामने आ चुके हैं कि इसे जल्द से जल्द प्रतिबंधित कर दिया जाना चाहिए. इसमें रखा हुआ खाद्यान्न जहरीला हो जाता है. कई रोगों का कारण बनता है, यह सब मालूम होने के बावजूद हम प्लास्टिक का इस्तेमाल बेखौफ कर रहे हैं और अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं. अनेक प्रकार के रोगों की सौगात हमारे जीवन को दुश्वार कर रही है. यही नहीं यह प्लास्टिक मानव समाज के साथ-साथ पर्यावरण को भी नष्ट कर रही है और मासूम जानवरों पर भी यह प्लास्टिक कहर बनकर टूट रही है.

गाय के पेट से निकला प्लास्टिक

पौलीथिन का उपयोग  पर्यावरण के लिए घातक है, वहीं मनुष्य समाज के लिए जहरीला और जानलेवा साबित हो रहा है. इसे अनजाने में खाकर मवेशियों की भी असामयिक मौत की खबरें निरंतर आ रही हैं. ऐसा ही एक वाक्या छत्तीसगढ़ के धमतरी शहर से लगे ग्राम अर्जुनी कांजी हाउस में देखने को मिला. अर्जुनी के कांजी हाउस में ढाई साल की बछिया की मृत्यु प्लास्टिक का सेवन करने से हो गई. सहायक पशु शल्यज्ञ डा. टी.आर. वर्मा एवं उनकी टीम के द्वारा शव परीक्षण के दौरान पाया गया कि बछिया के उदर में  बड़ी मात्रा में पौलीथिन साबुत स्थिति में है.

साथ ही प्लास्टिक, रस्सी के गट्ठे के अलावा भी कुछ  वस्तुएं  पाई गईं. उप संचालक पशु चिकित्सा सेवाएं डौ. एम.एस. बघेल के बताते हैं कि लोग अनुपयोगी अथवा सड़े-गले भोजन को पौलीथिन में रखकर सड़क किनारे फेंक देते हैं, जिसे अनजाने में भोजन के साथ-साथ पौलीथिन को भी घुमंतू किस्म के लावारिस जानवर अपनी भूख मिटाने खा जाते हैं. प्लास्टिक से निर्मित पौलीथिन को मवेशी पचाने में असमर्थ होते हैं, जो आगे चलकर ठोस अपचनीय अपशिष्ट पदार्थ का रूप ले लेती है, जिसके कारण बाद में भारी तकलीफ होती है और उनकी मौत हो जाती है. प्रसिद्ध पशु प्रेमी निर्मल जैन बताते हैं गायों के पेट की अधिकांश जगह में पौलीथिन स्थायी रूप से रह जाती है जिससे पशु चाहकर भी अन्य प्रकार के भोजन को ग्रहण करने में असमर्थ  होता  है.

जिलाधिकारी  (आई ए एस) रजत बंसल ने उक्त घटना की जानकारी  मिलने पर संवेदनशीलता व्यक्त  करते हुए दु:ख व्यक्त कर  कहा – दैनिक जीवन में प्रतिबंधित प्लास्टिक थैलियों एवं कैरी बैग को पूर्णतः परित्याज्य करने आमजनता को प्रशासन के साथ आगे आना होगा. एक बात प्रयोग किए जाने वाले प्लास्टिक से सिर्फ मानव जीवन, पर्यावरण को ही खतरा नहीं  है, बल्कि बेजुबान जानवर गाय, भैंस, बकरी की भी अकाल मृत्यु हो रही है.

प्लास्टिक की जगह जूट के बैग अपरिहार्य

पौलीथिन के स्थान पर जूट के बैग तथा गैर प्लास्टिक से निर्मित कैरी बैग का उपयोग करने एवं पैकेटों को ढके हुए डस्ट बिन में ही डालने की आवश्यकता है. देश परदेश के आवाम को चाहिए कि प्लास्टिक का जल्द से जल्द इस्तेमाल बंद कर दें. हम सरकार के आह्वान अथवा जागरूकता अभियान का इंतजार क्यों करें समझदारी इसी में है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.

इसके अलावा यह भी एक सच है कि पशु मालिक अपने मवेशियों को खुला छोड़ देते हैं परिणाम स्वरूप आवारा लावारिसों  की तरह घूमते हुए जानवर अनेक बीमारियों का शिकार हो रहा है. प्लास्टिक खाकर मौत का बुला रहा  है .अच्छा हो हम अपने जानवरों की रक्षा स्वयं करें और उसे कदापि खुला छोड़ने का स्वार्थ भरा कृत्य न करें, इससे पशुधन की हानि को रोका जा सकेगा, साथ ही सड़क दुर्घटनाएं घटित नहीं  होंगी.कहा जाता है कि भारतीय नागरिक परजब तलक कठोर दंडात्मक कार्रवाई नहीं की जाती, वह सही रास्ते पर नहीं आते हैं.

अभी हाल ही में मोटर यान अधिनियम लागू हुआ तो त्राहि-त्राहि मच गई, दस हजार से पचास हजार तक जुर्माने लगने लगे तो लोगों के दिमाग ठिकाने आ गए और घटनाक्रम सुर्खियों में आ गया. क्या सरकार को सड़कों पर घूमने वाले पशुओं के संदर्भ में भी ऐसे नियम कानून बनाने होंगे, क्या नियम बनने के बाद ही इस पर लगाम लग सकेगी, अच्छा हो, हम अपने पशुधन की रक्षा स्वयं करें और आदर्श नागरिक समाज बनाने में मदद करें.

पति की हत्या करने वाली पत्नी की खुली पोल

Crime News in Hindi: कभीकभी कोई रात आदमी के लिए इतनी भारी हो जाती है कि उसे काटना मुश्किल हो जाता है. जयलक्ष्मी गुरव (Jai laxmi Gurav) के लिए भी वह रात ऐसी ही थी. उस पूरी रात वह पलभर के लिए भी नहीं सो सकी थी. कभी वह बिस्तर पर करवटें बदलती तो कभी उठ कर कमरे में टहलने लगती. उस के मन में बेचैनी थी तो आंखों में भय था. एकएक पल उसे एकएक साल के बराबर लग रहा था. किसी अनहोनी की आशंका से उस का दिल कांप उठता था. सवेरा होते ही जयलक्ष्मी बेटे के पास पहुंची और उसे झकझोर कर उठाते हुए बोली, ‘‘तुम यहां आराम से सो रहे हो और तुम्हारे पापा रात से गायब हैं. वह रात में गए तो अभी तक लौट कर नहीं आए हैं. वह घर से गए थे तो उन के पास काफी पैसे थे, इसलिए मुझे डर लग रहा है कि कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई?’’

जयलक्ष्मी बेटे को जगा कर यह सब कह रही थी तो उस की बातें सुन कर उस की ननद भी जाग गई, जो बेटे के पास ही सोई थी. वह भी घबरा कर उठ गई. आंखें मलते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ भाभी, भैया कहां गए थे, जो अभी तक नहीं आए. लगता है, तुम रात में सोई भी नहीं हो?’’

‘‘मैं सोती कैसे, उन की चिंता में नींद ही नहीं आई. उन्हीं के इंतजार में जागती रही. मेरा दिल बहुत घबरा रहा है.’’ कह कर जयलक्ष्मी रोने लगी.

बेटा उठा और पिता की तलाश में जगहजगह फोन करने लगा. लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. उस के पिता विजय कुमार गुरव के बारे में भले पता नहीं चला, लेकिन उन के गायब होने की जानकारी उन के सभी नातेरिश्तेदारों को हो गई. इस का नतीजा यह निकला कि ज्यादातर लोग उन के घर आ गए और सभी उन की तलाश में लग गए.

जब सभी को पता चला विजय कुमार के गायब होने के बारे में

विजय कुमार गुरव के गायब होने की खबर मोहल्ले में भी फैल गई थी. मोहल्ले वाले भी मदद के लिए आ गए थे. हर कोई इस बात को ले कर परेशान था कि आखिर विजय कुमार कहां चले गए? इसी के साथ इस बात की भी चिंता सता रही थी कि कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई. क्योंकि वह घर से गए थे तो उन के पास कुछ पैसे भी थे. किसी ने उन पैसों के लिए उन के साथ कुछ गलत न कर दिया हो.

38 साल के विजय कुमार महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग जिले की तहसील सावंतवाड़ी के गांव भड़गांव के रहने वाले थे. उन का भरापूरा शिक्षित और संपन्न परिवार था. सीधेसादे और मिलनसार स्वभाव के विजय कुमार गडहिंग्लज के एक कालेज में अध्यापक थे. अध्यापक होने के नाते समाज में उन का काफी मानसम्मान था. गांव में उन का बहुत बड़ा मकान और काफी खेती की जमीन थी. लेकिन नौकरी की वजह से उन्होंने गडहिंग्लज में जमीन खरीद कर काफी बड़ा मकान बनवा कर उसी में परिवार के साथ रहने लगे थे.

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विजय कुमार के परिवार में पत्नी जयलक्ष्मी के अलावा एक बेटा था. पत्नी और बेटे के अलावा उन की एक मंदबुद्धि बहन भी उन्हीं के साथ रहती थी. मंदबुद्धि होने की वजह से उस की शादी नहीं हुई थी. बाकी का परिवार गांव में रहता था. विजय कुमार को सामाजिक कार्यों में तो रुचि थी ही, वह तबला और हारमोनियम बहुत अच्छी बजाते थे. इसी वजह से उन की भजनकीर्तन की अपनी एक मंडली थी. उन की यह मंडली गानेबजाने भी जाती थी.

दिन कालेज और रात गानेबजाने के कार्यक्रम में कटने की वजह से वह घरपरिवार को बहुत कम समय दे पाते थे. उन की कमाई ठीकठाक थी, इसलिए घर में सुखसुविधा का हर साधन मौजूद था. आनेजाने के लिए मोटरसाइकिलों के अलावा एक मारुति ओमनी वैन भी थी.

इस तरह के आदमी के अचानक गायब होने से घर वाले तो परेशान थे ही, नातेरिश्तेदारों के अलावा जानपहचान वाले भी परेशान थे. सभी उन की तलाश में लगे थे. काफी प्रयास के बाद भी जब उन के बारे में कुछ पता नहीं चला तो सभी ने एकराय हो कर कहा कि अब इस मामले में पुलिस की मदद लेनी चाहिए.

इस के बाद विजय कुमार का बेटा कुछ लोगों के साथ थाना गडहिंग्लज पहुंचा और थानाप्रभारी को पिता के गायब होने की जानकारी दे कर उन की गुमशुदगी दर्ज करा दी. यह 7 नवंबर, 2017 की बात है.

पुलिस ने भी अपने हिसाब से विजय कुमार की तलाश शुरू कर दी. लेकिन पुलिस की इस कोशिश का कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला. पुलिस ने लापता अध्यापक विजय कुमार की पत्नी जयलक्ष्मी से भी विस्तार से पूछताछ की.

पत्नी ने क्या बताया पुलिस को

जयलक्ष्मी ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार रोज की तरह उस दिन कालेज बंद होने के बाद 7 बजे के आसपास वह घर आए तो नाश्तापानी कर के कमरे में बैठ कर पैसे गिनने लगे. वे पैसे शायद फीस के थे, जिन्हें अगले दिन कालेज में जमा कराने थे. पैसे गिन कर उन्होंने पैंट की जेब में वापस रख दिए और लेट की टीवी देखने लगे.

रात का खाना खा कर साढ़े 11 बजे के करीब विजय कुमार पत्नी के साथ सोने की तैयारी कर रहे थे, तभी दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी. जयलक्ष्मी ने सवालिया निगाहों से पति की ओर देखा तो उन्होंने कहा, ‘‘देखता हूं, कौन है?’’

विजय कुमार ने दरवाजा खोला तो शायद दस्तक देने वाला विजय कुमार का कोई परिचित था, इसलिए वह बाहर निकल गए. थोड़ी देर बाद अंदर आए और कपड़े पहनने लगे तो जयलक्ष्मी ने पूछा, ‘‘कहीं जा रहे हो क्या?’’

‘‘हां, थोड़ा काम है. जल्दी ही लौट आऊंगा.’’ कह कर वह बाहर जाने लगे तो जयलक्ष्मी ने क हा, ‘‘गाड़ी की चाबी तो ले लो?’’

‘‘चाबी की जरूरत नहीं है. उन्हीं की गाड़ी से जा रहा हूं.’’ कह कर विजय कुमार चले गए. वह वही कपड़े पहन कर गए थे, जिस में पैसे रखे थे. इस तरह थोड़ी देर के लिए कह कर गए विजय कुमार गुरव लौट कर नहीं आए.

पुलिस ने विजय कुमार के बारे में पता करने के लिए अपने सारे हथकंडे अपना लिए, पर उन की कोई जानकारी नहीं मिली. 3 दिन बीत जाने के बाद भी थाना पुलिस कुछ नहीं कर पाई तो घर वाले कुछ प्रतिष्ठित लोगों को साथ ले कर एसएसपी दयानंद गवस और एसपी दीक्षित कुमार गेडाम से मिले. इस का नतीजा यह निकला कि थाना पुलिस पर दबाव तो पड़ा ही, इस मामले की जांच में सीआईडी के इंसपेक्टर सुनील धनावड़े को भी लगा दिया गया.

जब सीआईडी के इंसपेक्टर को सौंपी गई जांच

सुनील धनावड़े जांच की भूमिका बना रहे थे कि 11 नवंबर, 2017 को सावंतवाड़ी अंबोली स्थित सावलेसाद पिकनिक पौइंट पर एक लाश मिलने की सूचना मिली. सूचना मिलते ही एसपी दीक्षित कुमार गेडाम, एसएसपी दयानंद गवस इंसपेक्टर सुनील धनावड़े पुलिस बल के साथ उस जगह पहुंच गए, जहां लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी.

यह पिकनिक पौइंट बहुत अच्छी जगह है, इसलिए यहां घूमने वालों की भीड़ लगी रहती है. यहां ऊंचीऊंची पहाड़ियां और हजारों फुट गहरी खाइयां हैं. किसी तरह की अनहोनी न हो, इस के लिए पहाडि़यों पर सुरक्षा के लिए लोहे की रेलिंग लगाई गई है.

दरअसल, यहां घूमने आए किसी आदमी ने रेलिंग के पास खून के धब्बे देखे तो उस ने यह बात एक दुकानदार को बताई. दुकानदार ने यह बात चौकीदार दशरथ कदम को बताई. उस ने उस जगह का निरीक्षण किया और मामले की जानकारी थाना पुलिस को दे दी.

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पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल के निरीक्षण में सैकड़ों फुट गहरी खाई में एक शव को पड़ा देखा. शव बिस्तर में लिपटा था. वहीं से थोड़ी दूरी पर एक लोहे की रौड पड़ी थी, जिस में खून लगा था. इस से पुलिस को लगा कि हत्या उसी रौड से की गई है. पुलिस ने ध्यान से घटनास्थल का निरीक्षण किया तो वहां से कुछ दूरी पर कार के टायर के निशान दिखाई दिए.

इस से साफ हो गया कि लाश को कहीं बाहर से ला कर यहां फेंका गया था. पुलिस ने रौड और बिस्तर को कब्जे में ले कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

सीआईडी इंसपेक्टर सुनील धनावड़े विजय कुमार गुरव की गुमशुदगी की जांच कर रहे थे, इसलिए उन्होंने लाश की शिनाख्त के लिए जयलक्ष्मी को सूचना दे कर अस्पताल बुला लिया.

लाश तो मिली पर नहीं हो सकी पुख्ता शिनाख्त

लाश की स्थिति ऐसी थी कि उस की शिनाख्त आसान नहीं थी. फिर भी कदकाठी से अंदाजा लगाया गया कि वह लाश विजय कुमार गुरव की हो सकती है. चूंकि उन के घर वालों ने संदेह व्यक्त किया था, इसलिए पुलिस ने लाश की पुख्ता शिनाख्त के लिए डीएनए का सहारा लिया. जिस बिस्तर में शव लिपटा था, उसे जयलक्ष्मी को दिखाया गया तो उस ने उसे अपना मानने से इनकार कर दिया.

भले ही लाश की पुख्ता शिनाख्त नहीं हुई थी, लेकिन पुलिस उसे विजय कुमार की ही लाश मान कर जांच में जुट गई. जिस तरह मृतक की हत्या हुई थी, उस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि यह हत्या प्रेमसंबंधों में हुई है. पुलिस ने विजय कुमार और उन की पत्नी जयलक्ष्मी के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि विजय कुमार और जयलक्ष्मी के बीच संबंध सामान्य नहीं थे.

इस की वजह यह थी कि जयलक्ष्मी का चरित्र संदिग्ध था, जिसे ले कर अकसर पतिपत्नी में झगड़ा हुआ करता था. जयलक्ष्मी का सामने वाले मकान में रहने वाले सुरेश चोथे से प्रेमसंबंध था, इसलिए घर वालों का मानना था कि विजय कुमार के गायब होने के पीछे इन्हीं दोनों का हाथ हो सकता है.

यह जानकारी मिलने के बाद सुनील धनावड़े समझ गए कि विजय कुमार के गायब होने के पीछे उन की पत्नी जयलक्ष्मी और उस के प्रेमी सुरेश का हाथ है. उन्होंने जयलक्ष्मी से एक बार फिर पूछताछ की. वह उस की बातों से संतुष्ट नहीं थे, लेकिन कोई ठोस सबूत न होने की वजह से वह उसे गिरफ्तार नहीं कर सके. उन्होंने सुरेश चोथे को भी थाने बुला कर पूछताछ की. उस ने भी खुद को निर्दोष बताया. उस के भी जवाब से वह संतुष्ट नहीं थे, इस के बावजूद उन्होंने उसे जाने दिया.

उन्हें डीएनए रिपोर्ट का इंतजार था, क्योंकि उस से निश्चित हो जाता कि वह लाश विजय कुमार की ही थी. पुलिस डीएनए रिपोर्ट का इंतजार कर ही रही थी कि पुलिस की सरगर्मी देख कर जयलक्ष्मी अपने सारे गहने और घर में रखी नकदी ले कर सुरेश चोथे के साथ भाग गई. दोनों के इस तरह घर छोड़ कर भाग जाने से पुलिस को शक ही नहीं, बल्कि पूरा यकीन हो गया कि विजय कुमार के गायब होने के पीछे इन्हीं दोनों का हाथ है.

शक के दायरे में आई पत्नी और उस का प्रेमी

पुलिस सुरेश चोथे और जयलक्ष्मी की तलाश में जुट गई. पुलिस उन की तलाश में जगहजगह छापे तो मार ही रही थी, उन के फोन भी सर्विलांस पर लगा दिए थे. इस से कभी उन के दिल्ली में होने का पता चलता तो कभी कोलकाता में. गुजरात और महाराष्ट्र के शहरों की भी उन की लोकेशन मिली थी. इस तरह लोकेशन मिलने की वजह से पुलिस कई टीमों में बंट कर उन का पीछा करती रही थी.

आखिर पुलिस ने मोबाइल फोन के लोकेशन के आधार पर जयलक्ष्मी और सुरेश को मुंबई के लोअर परेल लोकल रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया. उन्हें थाना गडहिंग्लज लाया गया, जहां एसएसपी दयानंद गवस की उपस्थिति में पूछताछ शुरू हुई. अब तक डीएनए रिपोर्ट भी आ गई थी, जिस से साफ हो गया था कि सावलेसाद पिकनिक पौइंट पर खाई में मिली लाश विजय कुमार की ही थी. पुलिस के पास सारे सबूत थे, इसलिए जयलक्ष्मी और सुरेश ने तुरंत अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों के बताए अनुसार, विजय कुमार की हत्या की कहानी इस प्रकार थी.

कैसे हुआ जयलक्ष्मी और सुरेश में प्यार

34 साल का सुरेश चोथे विजय कुमार गुरव के घर के ठीक सामने रहता था. उस के परिवार में पत्नी और 2 बच्चों के अलावा मातापिता, एक बड़ा भाई और भाभी थी. वह गांव की पंचसंस्था में मैनेजर के रूप में काम करता था. घर में पत्नी होने के बावजूद वह जब भी जयलक्ष्मी को देखता, उस के मन में उसे पाने की चाहत जाग उठती.

37 साल की जयलक्ष्मी थी ही ऐसी. वह जितनी सुंदर थी, उतनी ही वाचाल और मिलनसार भी थी. उस से बातचीत कर के हर कोई खुश हो जाता था, इस की वजह यह थी कि वह खुल कर बातें करती थी. ऐसे में हर कोई उस की ओर आकर्षित हो जाता था. पड़ोसी होने के नाते सुरेश से उस की अकसर बातचीत होती रहती थी.

बातचीत करतेकरते ही वह उस का दीवाना बन गया था. जयलक्ष्मी का बेटा 18 साल का था, लेकिन उस के रूपयौवन में जरा भी कमी नहीं आई थी. शरीर का कसाव और चेहरे के निखार से वह 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के इसी यौवन और नशीली आंखों के जादू में सुरेश कुछ इस तरह खोया कि अपनी पत्नी और बच्चों को भूल गया.

कहा जाता है कि जहां चाह होती है, वहां राह मिल ही जाती है. जयलक्ष्मी तक पहुंचने की राह आखिर सुरेश ने खोज ही ली. विजय कुमार से दोस्ती कर के वह उस के घर के अंदर तक पहुंच गया था. इस के बाद धीरेधीरे उस ने जयलक्ष्मी से करीबी बना ली. भाभी का रिश्ता बना कर वह उस से हंसीमजाक करने लगा. हंसीमजाक में जयलक्ष्मी के रूपसौंदर्य की तारीफ करतेकरते उस ने उसे अपनी ओर इस तरह आकर्षित किया कि उस ने उसे अपना सब कुछ सौंप दिया.

विजय कुमार गुरव दिन भर नौकरी पर रहते और रात में गानेबजाने की वजह से अकसर बाहर ही रहते थे. इसी का फायदा जयलक्ष्मी और सुरेश उठा रहे थे. जयलक्ष्मी को अपनी बांहों में पा कर जहां सुरेश के मन की मुराद पूरी हो गई थी, वहीं जयलक्ष्मी भी खुश थी. दोनों विजय कुमार की अनुपस्थिति में मिलते थे, इसलिए उन्हें पता नहीं चल पाता था.

लेकिन आसपास वालों ने विजय कुमार के घर में न रहने पर सुरेश को अकसर उस के घर आतेजाते देखा तो उन्हें शंका हुई. उन्होंने विजय कुमार को यह बात बता कर शंका जाहिर की तो विजय कुमार हैरान रह गए. उन्हें तो पत्नी और पड़ोसी होने के नाते सुरेश पर पूरा भरोसा था.

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इस तरह दोनों विजय कुमार के भरोसे का खून कर रहे थे. उन्होंने पत्नी और सुरेश से इस विषय पर बात की तो दोनों कसमें खाने लगे. उन का कहना था कि उन के आपस में संबंध खराब करने के लिए लोग ऐसा कह रहे हैं.

भले ही जयलक्ष्मी और सुरेश ने कसमें खा कर सफाई दी थी, लेकिन विजय कुमार जानते थे कि बिना आग के धुआं नहीं उठ सकता. लोग उन से झूठ क्यों बोलेंगे? सच्चाई का पता लगाने के लिए वह पत्नी और सुरेश पर नजर रखने लगे. इस से जयलक्ष्मी और सुरेश को मिलने में परेशानी होने लगी, जिस से दोनों बौखला उठे. इस के अलावा सुरेश को ले कर विजय कुमार अकसर जयलक्ष्मी की पिटाई भी करने लगे थे.

इस तरह बनी विजय कुमार की हत्या की हत्या की योजना

इस से जयलक्ष्मी तो परेशान थी ही, प्रेमिका की पिटाई से सुरेश भी दुखी था. वह प्रेमिका की पिटाई सहन नहीं कर पा रहा था. जयलक्ष्मी की पिटाई की बात सुन कर उस का खून खौल उठता था. प्रेमी के इस व्यवहार से जयलक्ष्मी ने एक खतरनाक योजना बना डाली. उस में सुरेश ने उस का हर तरह से साथ देने का वादा किया.

योजना के अनुसार, घटना वाले दिन जयलक्ष्मी ने खाने में नींद की गोलियां मिला कर पति, ननद और बेटे को खिला दीं, जिस से सभी गहरी नींद सो गए. रात एक बजे के करीब सुरेश ने धीरे से दरवाजा खटखटाया तो जयलक्ष्मी ने दरवाजा खोल दिया. सुरेश लोहे की रौड ले कर आया था. उसी रौड से उस ने पूरी ताकत से विजय कुमार के सिर पर वार किया. उसी एक वार में उस का सिर फट गया और उस की मौत हो गई.

विजय कुमार की हत्या कर के लाश को दोनों ने बिस्तर में लपेट दिया. इस के बाद जयलक्ष्मी ने लाश को अपनी मारुति वैन में रख कर उसे सुरेश से सावंतवाड़ी के अंबोली सावलेसाद पिकनिक पौइंट की गहरी खाइयों में फेंक आने को कहा.

सुरेश लाश को ठिकाने लगाने चला गया तो जयलक्ष्मी कमरे की सफाई में लग गई. उस के बाद सुरेश लौटा तो जयलक्ष्मी ने वैन की भी ठीक से सफाई कर दी. इस के बाद उस ने विजय कुमार की गुमशुदगी की झूठी कहानी गढ़ डाली. लेकिन उस की झूठी कहानी जल्दी ही सब के सामने आ गई.

पूछताछ के बाद पुलिस ने जयलक्ष्मी के कमरे का बारीकी से निरीक्षण किया तो दीवारों पर भी खून के दाग नजर आए. पुलिस ने उन के नमूने उठवा लिए. इस तरह साक्ष्य एकत्र कर के पुलिस ने दोनों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेरे बॉयफ्रेंड को सेक्स के दौरान कंडोम लगाना पसंद नहीं है, मैं क्या करूं?

सवाल
मैं 52 वर्षीय महिला हूं. पति को गुजरे 5 साल हो गए हैं. पिछले कुछ महीनों से एक 27 वर्षीय अविवाहित युवक से मेरे जिस्मानी संबंध हैं. वह मेरा बहुत खयाल रखता है और हम दोनों आपसी रजामंदी से सैक्स संबंध बनाते हैं. मैं उस के साथ सहज महसूस करती हूं और वह न सिर्फ सैक्स में, बल्कि दुखतकलीफ में भी सदैव साथ निभाता है. वह काफी जोशीला भी है मगर सैक्स के समय उसे कंडोम लगाना पसंद नहीं है. हालांकि मैं परिवार नियोजन करा चुकी हूं. इस में कोई खतरा तो नहीं है? कृपया सलाह दें.
जवाब
आप के सैक्स पार्टनर का सैक्स के दौरान कंडोम का प्रयोग नहीं करने से परिवार नियोजन से कोई संबंध नहीं है. सैक्स संबंध के दौरान गर्भ ठहरेगा इस की भी गुंजाइश न के बराबर है. पर कंडोम न सिर्फ गर्भनिरोध में बल्कि यौनजनित संक्रमण से भी बचाव करने का अच्छा साधन माना जाता है. सैक्स पार्टनर से कहें कि वह सैक्स के दौरान कंडोम का प्रयोग करे. इस से आप दोनों ही यौन संक्रमण से बचे रहेंगे और तनावमुक्त हो कर सैक्स का आनंद उठा पाएंगे.

 

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

चुग गई खेत : बाप जातेजाते बेटे को बना गया भिखारी

राम कुमार काफी देर से बहू मालती को बारबार कह रहा था कि उसे बड़े जोरों की भूख लगी है. खाली पेट उस की जान निकली जा रही है.

मालती पहले तो कपड़े धोने का बहाना बनाती रही, फिर पड़ोस की धन्नो मौसी अपना समय गुजारने के लिए उस के पास आ बैठी.

धन्नो मौसी गांव में दाई का काम करती थी. वह जवान औरतों और मनचली लड़कियों के नाजायज संबंधों की भी पूरी जानकारी रखती थी.

इस समय भी धन्नो मौसी किसी औरत के अपने जेठ से नाजायज संबंधों की रसीली दास्तान मिर्चमसाला लगा कर मालती को सुना रही थी.

मालती भी अपने भूखे ससुर की जरूरत को अंगूठा दिखाते हुए धन्नो मौसी की बेहूदा बातें चटखारे ले कर सुन रही थी.

जिस्मानी संबंधों की दास्तान सुन कर मालती अपनी सैक्स भावनाओं को भड़का रही थी.

मालती का पति नरपाल सुबह से किसी काम से शहर गया था. उस के पास जो जमीन थी, उसे किसी को बंटाई पर दे रखा था. फसल तैयार होने पर वह आधी फसल लेता था.

मालती की शादी को 5 साल हो चुके थे, पर अभी तक बच्चा नहीं हुआ था. इस के बावजूद नरपाल दिनरात मालती की जवानी में ही खोया रहता था. मेहनत कर के रुपयापैसा कमाना उस की आदत में नहीं था. बाप की जमीन से जो कमाई होती थी, उसी को खा रहा था.

राम कुमार बारबार समझाता था कि खेतों को बंटाई पर देने के बजाय खुद मेहनत करे, मगर नरपाल ने बाप की सीख पर ध्यान नहीं दिया. उसे तो हर तरफ मालती की मचलती जवानी नजर आती थी.

राम कुमार की उम्र 55 साल की हो चुकी थी. उस की पत्नी को मरे 10 साल हो चुके थे.

पत्नी का अचानक साथ छोड़ जाना, बेटे की लापरवाही व निकम्मेपन ने उसे परेशान कर दिया था. इसी परेशानी, तनाव व घर में आएदिन क्लेश के चलते वह लकवे का शिकार हो गया था.

राम कुमार अपने छोटेछोटे कामों के लिए दूसरों का मुहताज हो गया था. नरपाल तो अपने बाप की तरफ जरा भी ध्यान नहीं देता था.

राम कुमार ने नरपाल की शादी यह सोच कर की थी कि बेटा नहीं तो बहू ही उस की देखभाल करेगी. मगर उस की उम्मीदों पर पानी फिर गया.

लाचार और बेबस राम कुमार काफी देर तक गिड़गिड़ाता रहा कि दोपहर को खाना बना दे, उसे भूख लगी है. मगर मालती जानबूझ कर उस की फरियाद को अनसुना करती रही.

‘‘अरे बहू, अगर खाना नहीं बनाती, तो एक गिलास पानी ही दे दे. क्यों मुझे भूखाप्यासा मारने पर तुली है?’’ राम कुमार की आवाज भर्रा उठी थी.

‘‘अरे मालती, तुम्हारा ससुर तो तुम्हें दो घड़ी आराम से बैठने नहीं देगा. बेचारे की प्यास बुझ, मैं चली अपने घर. यहां बैठना तो मुश्किल हो रहा है,’’ हाथ नचाते हुए धन्नो मौसी चली गई.

‘‘इस बूढ़े ने तो नाक में दम कर दिया है,’’ मालती पैर पटकते हुए रसोईघर में गई और पानी का लोटा राम कुमार के सामने मेज पर रख दिया. पानी रख कर वह बड़बड़ाते हुए दूसरे कमरे में जा कर लेट गई.

पानी देखा, तो राम कुमार के मुरझाए चेहरे पर चमक आ गई. उस ने थोड़ा झाक कर हाथ बढ़ाया, तो पानी के लोटे तक हाथ पहुंच तो गया, मगर आधे जिस्म से अपना संतुलन नहीं बना पाया.

पानी का लोटा हाथ में न आने की वजह से मेज पर ही लुढ़क गया और सारा पानी मेज पर बिखर गया.

अपनी बेबसी और बहू की लापरवाही पर राम कुमार रो पड़ा. लाचार बूढ़े की सिसकियां घर में मातम और अनहोनी का माहौल पैदा कर रही थीं. कमरे में पानी बिखरने पर बिगड़ी मालती छाती पर हाथ मारते हुए ससुर को कोसने लगी.

घर में शोर सुन कर पड़ोस में रहने वाली एक 40 साला विधवा विमला आ गई. पड़ोस की औरतें और बच्चे भी वहां जमा हो गए.

फर्श पर बिखरा पानी देख कर विमला समझ गई कि माजरा क्या है. उस ने फौरन अपने घर से पानी ला कर राम कुमार को पिलाया, तो मालती उस के पीछे पड़ गई और आरोप लगा दिया कि बूढ़े के विमला के साथ नाजायज संबंध हैं.

यह सुन कर बेचारी विधवा विमला अपने घर चली गई. वह अपनी बदनामी से परेशान हो गई थी. शाम को नरपाल जैसे ही घर आया, कुछ औरतों ने मालती की शिकायत की कि वह उस के अपाहिज बाप पर जुल्म कर रही है. आज तो उस ने ससुर को सारा दिन खाना भी नहीं दिया.

महल्ले की औरतों की बातें सुन कर नरपाल का जमीर जागा. वह घर में घुसते ही मालती पर बरस पड़ा.

पति के बदले तेवर देख कर मोटेमोटे आंसू बहाती हुई मालती ससुर पर गलत आरोप लगाने लगी कि इस घर में रह कर अपनी बेइज्जती नहीं कराएगी. घर में अपने बाप को रखे या उसे. जब तक वह अपने बाप को घर से नहीं निकालेगा, तब तक वह लौट कर नहीं आएगी.

ऐसा सुन कर नरपाल नरम पड़ गया, मगर मालती अपनी जिद पर अड़ गई थी. उस ने पति की बात नहीं मानी और कंधे पर बैग उठाए आटोरिकशे में बैठ कर बसअड्डे पहुंच गई.

नरपाल ने तो यह सोच कर मालती को धमकाया था कि उसे अपनी गलती का एहसास होगा, मगर यहां तो पासा ही पलट गया था.

नरपाल भी बस में बैठा और मालती को मनाने ससुराल चला गया. वहां पहुंच कर मालती से माफी मांगते हुए घर चलने को कहा, तो नरपाल की सास ने बेटी का पक्ष लेते हुए कहा, ‘‘देखो दामादजी, मेरी बेटी को आप का बाप तंग करता है. जब तक वह जिंदा है, तब तक मालती वहां नहीं जाएगी.’’

‘‘मगर मांजी, मैं तो मालती के बगैर एक रात भी अकेला नहीं रह सकता. मालती में तो मेरी जान अटकी है,’’ नरपाल ने मालती का हाथ थाम कर अपनी दीवानगी जाहिर की.

सास मन ही मन खुश हुई. उसे लगा कि बेटी ने नरपाल को अपने रंगरूप का दीवाना बना रखा है. अब तो बूढ़ा जल्दी ही मरेगा. तब उस की बेटी अपने घर में मजे से रहेगी.

उस ने नरपाल से कहा, ‘‘अगर ऐसा है, तो तुम भी यहां रहने आ जाओ. तब तो दोनों की समस्या ही खत्म हो जाएगी.’’

नरपाल भी तो यही चाहता था. इधर मालती का छोटा भाई कालेज जाने लगा था. बापू के साथ खेतों में काम करने वाले आदमी की जरूरत थी. नरपाल ने वह कमी पूरी कर दी थी.

रात के 10 बजने को थे. अपाहिज राम कुमार आंसू बहा रहा था. उसे लगा कि बुरे समय में बहू ने तो साथ छोड़ा, अपना पैदा किया बेटा भी उसे भूल गया.

अचानक राम कुमार के जेहन में खयाल आया. उस ने मेज पर टेबल फैन चलता देखा. उस ने माचिस की तीली जला कर तार को जला दिया. तार जलने से चिनगारियां निकलीं, तो उस ने तार को पकड़ कर अपनेआप को फर्श पर गिरा लिया.

तभी एक दर्दनाक चीख कमरे में गूंजी. बिजली के तार ने राम कुमार को दूर झटक दिया. वह गेंद की तरह लुढ़कता हुआ कमरे की दीवार से जा टकराया और बेहोश हो गया.

किसी के चीखने की आवाज सुन कर पड़ोस में रहने वाली विधवा विमला भागी आई. वह राम कुमार को बेहोश देख कर सहम गई. उसे लगा कि कहीं बूढ़ा मर गया, तो उस के सिर पर हत्या का आरोप न लग जाए.

विमला ने गौर से देखा. राम कुमार की सांसें चल रही थीं. उस ने सीने पर हाथ रख के देखा, तो दिल धड़क रहा था. वह फौरन दूसरी गली में रहने वाले डाक्टर को बुला लाई.

डाक्टर ने बेहोशी हटाने का टीका लगाया, तो राम कुमार को होश आ गया. होश में आते ही उस ने उठने की कोशिश की, तो वह अपनेआप उठ खड़ा हुआ और खुशी के मारे चीख उठा, ‘‘डाक्टर साहब, मैं खड़ा हो सकता हूं… मेरे हाथ और पैर में जान आ गई है.’’

डाक्टर के पूछने पर राम कुमार ने बिजली के करंट लगने की बात बताई.

डाक्टर ने चैकअप कर के बताया, ‘‘बिजली का करंट लगने से तुम्हारे जिस्म का जो आधा हिस्सा बेकार हो गया था, अब उस में जान आ गई है. अगर सही समय पर दवा दी जाए, तो तुम 5-10 दिनों में ठीक हो सकते हो.’’

यह सुन कर राम कुमार के चेहरे पर खुशी उभर आई.

‘‘आप दवा दीजिए डाक्टर साहब, इन के बेटाबहू तो यहां पर हैं नहीं, फिर भी इनसानियत के नाते मैं इन की देखभाल करूंगी,’’ विमला ने मदद करने का भरोसा दिया.

डाक्टर दवाएं दे कर चला गया. विमला ने राम कुमार को हलका खाना बना कर खिलाया और दवा दे कर अपने घर चली गई.

4-5 दिन गुजर गए थे. विमला राम कुमार को सुबहशाम दवा देती, खाना बना कर खिलाती. वह धीरेधीरे अच्छा होने लगा.

राम कुमार मन ही मन विमला का एहसानमंद था. मगर गांव के कुछ लोगों ने नीची जाति की विमला के ऊंची जाति के जमींदार के घर के रसोईघर में खाना बना कर खिलाने पर नाराजगी जताई.

गांव में पंचायत हुई कि विमला को सजा के रूप में गांव से निकाल दिया जाए.

यह खबर राम कुमार को लगी, तो उस ने फौरन विमला को बुला कर पूछा, ‘‘गांव वाले तुझे भलाई करने की सजा देना चाहते हैं. मगर मेरी मजबूरी किसी ने नहीं देखी. क्या तुम गांव छोड़ कर चली जाओगी?’’

‘‘अगर मेरी मदद करने कोई नहीं आया, तो मैं गांव छोड़ दूंगी,’’ विमला ने मायूस होते हुए कहा.

‘‘ठीक है, तुम ने मुझे नई जिंदगी दी है. मेरे बेटाबहू तो मुझे मरने के लिए छोड़ गए थे. तुम भाग कर कहीं मत जाओ, दुनिया का मुंह बंद करने के लिए मेरे पास एक हथियार है,’’ राम कुमार ने कहा, तो विमला के मायूस चेहरे पर उम्मीद की रेखा उभरी.

‘‘ऐसा कौन सा रास्ता है आप के सामने, जिस से गांव वाले चुप हो जाएंगे?’’

‘‘हम अभी चल कर शादी कर लेते हैं. औरत की कोई जाति नहीं होती. मेरी पत्नी बन कर तुम भी मेरे समान हो जाओगी. फिर देखूंगा एक अच्छे इनसान को दुनिया परेशान कैसे करती है?’’ कहते हुए राम कुमार ने विमला का हाथ थाम लिया.

‘‘लेकिन, बेटाबहू भी तो आप के खिलाफ हो जाएंगे,’’ विमला ने अपना डर जताया.

‘‘मुझे ऐसे बेटाबहू की परवाह नहीं है,’’ राम कुमार ने कहा और कुछ दिनों बाद शादी कर के विमला को बीवी का दर्जा दे दिया.

गांव वाले फिर भी नहीं माने. अब तो वे किसी भी हालत में राम कुमार को भी गांव से निकालने पर आमादा हो गए.

राम कुमार ने भी गांव छोड़ना ही मुनासिब समझ. वह अपनी जमीन और घरबार बेच कर सारा रुपयापैसा समेट कर किसी अजनबी शहर में जा बसा, जहां कोई भी उसे नहीं जानता था.

नरपाल और मालती को खबर लगी, तो वे भागे आए. गांव में तो सबकुछ लुट चुका था. न जमीन, न घरबार. बाप जातेजाते अपने बेटे को भिखारी बना गया था.

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अपशकुनी: पहली नजर का प्यार

अनन्य पार्किंग में अपनी कार खड़ी कर के उतर ही रहा था कि सामने से स्कूटी से उतरती लड़की को देख कर ठगा सा रह गया. उस लड़की ने बड़ी अदा से हैलमेट उतार कर बालों को झटका तो मानो बिजली सी कौंध गई.

उस के स्कूटी खड़ा कर आगे बढ़ने तक वह बड़े ध्यान से उसे देखता रहा. सलीके से पहनी हैंडलूम की साड़ी, कंधों तक लहराते काले बाल और एकएक कदम नापतौल कर रखती गरिमा से भरी चाल उस के व्यक्तित्व को अद्भुत आभा प्रदान कर रहे थे.

अपनी मौसेरी बहन के बेटे चिरायु के जन्मदिन की पार्टी में शामिल होने के लिए अनन्य उत्सव रिजोर्ट आया था. वह लड़की भी उत्सव की ओर जा रही थी. अनन्य को कुछ और देर तक उसे निहारने का सुख मिल गया.

उत्सव के गेट में घुसते ही वह लपक कर लिफ्ट की ओर दौड़ गई. जब तक अनन्य को होश आता, लिफ्ट ऊपर जा चुकी थी. अनन्य के पास अब इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई चारा भी नहीं था. पहली बार उसे धीमी गति से चलने के कारण खुद पर गुस्सा आया.

जब वह तीसरी मंजिल पर पार्टी वाले हौल में पहुंचा तो उसी लड़की को अपनी बहन सुजाता से बात करते देख हैरान रह गया. उसे देखते ही सुजाता खिलखिला कर हंस दी.

‘‘तुम शायद इसी की शिकायत कर रही हो. यही पीछा कर रहा था न तुम्हारा? ठहरो, अभी इस के कान पकड़ती हूं,’’ सुजाता नाटकीय अंदाज में बोली थी.

‘‘मैं खुद कान पकड़ता हूं, दीदी. मैं किसी का पीछा नहीं कर रहा था. मैं तो चिरायु के जन्मदिन की पार्टी में आ रहा था. कोई मेरे आगे चल रहा हो तो मैं क्या करूं.’’

‘‘मैं ऐसे दिलफेंक लड़कों के लटके- झटके खूब समझती हूं. जरा पूछिए इन से कि ये महाशय मेरे पीछे ही क्यों चल रहे थे? तेज कदमों से चल कर मेरे आगे क्यों नहीं निकल गए थे?’’

‘‘अनन्य, तुम्हें अवनि के इस सवाल का जवाब तो देना ही पड़ेगा. अब बोलो, क्या कहना है तुम्हारा?’’ सुजाता को न्यायाधीश बनने में आनंद आने लगा था.

‘‘ऐसा कोई नियम है क्या दीदी कि सड़क पर किसी लड़की के पीछे नहीं चल सकते?’’ अनन्य ने जवाब में सवाल खड़ा कर दिया.

‘‘नियम तो नहीं है, पर इसे पीछा करना कहते हैं, बच्चू. और इस के लिए दंड भुगतना पड़ता है,’’ सुजाता मुसकराते हुए बोली.

‘‘ठीक है, आप का यही निर्णय है तो मैं दंड भुगतने के लिए तैयार हूं,’’ अनन्य जोर से हंसा, पर तभी चिरायु आ धमका था और बात बीच में ही रह गई थी.

‘‘मामा, कितनी देर से आए हो. मेरा गिफ्ट कहां है?’’ चिरायु अनन्य की बांहों में झूल गया.

अनन्य ने छोटा सा पैकेट निकाल कर चिरायु को थमा दिया था.

‘‘इतना छोटा सा  गिफ्ट?’’ चिरायु ने मुंह बनाया.

‘‘खोल कर तो देख. आंखें खुली की खुली रह जाएंगी.’’

चिरायु ने बड़े यत्न से कागज में लपेटा हुआ पैकेट एक झटके में फाड़ा तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा.

‘‘ओह, वाह वीडियो गेम? मामा, आप सचमुच ग्रेट हो. पापा, देखो, अनु मामा मेरे लिए क्या लाए हैं.’’

ध्रुव वीडियो गेम को देखने में व्यस्त हो गए. सुजाता भी दूसरे मेहमानों की आवभगत में जुट गई.

अनन्य का ध्यान फिर पास ही बैठी अवनि की ओर आकर्षित हो गया. उस के लिए मानो अन्य अतिथि वहां हो कर भी नहीं थे. उस का मन कर रहा था कि वह बस अवनि को निहारता रहे. एकदो बार कनखियों से देखते हुए उस की दृष्टि अवनि से मिली तो लगा जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो.

जन्मदिन का उत्सव समाप्त होते ही उस ने सुजाता से पूछा, ‘‘दीदी, कौन है वह? पहले तो उसे कभी नहीं देखा.’’

‘‘किस की बात कर रहा है तू?’’ सब कुछ समझते हुए भी सुजाता मुसकराई.

‘‘वही जो आप से मेरी शिकायत कर रही थी,’’ अनन्य भी मुसकरा दिया.

‘‘तुझे क्या करना है? तू तो विवाह के नाम से ही दूर भागता है. कैरियर बनाना है. जीवन में आगे बढ़ने के रास्ते में तो विवाह तो सब से बड़ी बाधा है न?’’ सुजाता ने अनन्य के ही शब्द दोहरा दिए थे.

‘‘पर दीदी अवनि को देखते ही मैं ने अपना खयाल बदल दिया है. पता नहीं क्या जादू है उस के व्यक्तित्व में. कुछ बताइए न उस के बारे में.’’

‘‘यही तो रोना है…जिस अवनि को देख कर तुम सम्मोहित हुए हो उस ने अपने चारों तरफ वैराग्य और वासनारहित ऐसा आवरण ओढ़ रखा है कि उस तक पहुंचना कठिन ही नहीं असंभव है. और क्यों न हो, इस संसार ने भी तो उस के साथ ऐसा ही व्यवहार किया है,’’ सुजाता का दर्दीला स्वर सुन कर अनन्य चौंक उठा.

‘‘ऐसा क्या कर दिया संसार ने अवनि के साथ?’’ क्षणमात्र में ही अब तक की सुनी हुई समस्त अनहोनी घटनाएं अनन्य के मानसपटल पर कौंध गई.

‘‘पता नहीं तुम्हें याद है या नहीं, हमारे पुराने गौलीगुड़ा वाले घर के सामने डा. निशीथ राय रहा करते थे…’’

‘‘खूब याद है,’’ अनन्य सुजाता की बात पूरी होने से पहले ही बोल उठा, ‘‘हां, बचपन में बीमार पड़ने पर मां उन्हीं के पास इलाज के लिए ले जाती थीं.’’

‘‘वे हमारे दूर के रिश्ते के चाचा थे. अवनि उन की बहन सुनंदा की छोटी बेटी है.’’

‘‘लेकिन हुआ क्या उस के साथ?’’ अनन्य उतावला हो बैठा. वह उस के बारे में सब कुछ जान लेना चाहता था.

‘‘5 वर्ष पहले की बात है. अवनि का विवाह एक बड़े संपन्न परिवार में तय हुआ था. गोदभराई की रस्म के बाद जब वर पक्ष के लोग वापस लौट रहे थे तो उन की कार को सामने से आते ट्रक ने टक्कर मार दी. उस दुर्घटना में भावी वर और उस के पिता दोनों की मौत हो गई.’’

‘‘ओह, कितना अप्रत्याशित रहा होगा यह सब?’’

‘‘अप्रत्याशित? यह कहो कि बिजली गिरी थी अवनि और उस के परिवार पर. अवनि तो पत्थर हो गई थी यह सब देख कर. उस के मातापिता सांत्वना देने गए थे पर वर पक्ष ने उन का मुंह भी देखना पसंद नहीं किया, बैठने के लिए पूछना तो दूर की बात है,’’ सुजाता ने बताया.

‘‘कितना संताप झेलना पड़ा होगा बेचारी को,’’ अनन्य बुझे स्वर में बोला.

‘‘2-3 वर्ष इलाज करवाया गया अवनि का तब कहीं जा कर वह सामान्य हुई. अब भी छोटी सी बात से डर जाती है. जैसे तुम उस के पीछे चल रहे थे पर उस को लगा कि तुम उस का पीछा कर रहे थे. कोई जोर से बोल दे या रात के सन्नाटे के उभरते स्वर, सब से वह छोटी बच्ची की तरह डर जाती है.’’

‘‘मातापिता ने फिर से विवाह की कोशिश नहीं की?’’

‘‘की थी, पर उस के अपशकुनी होने की बात कुछ ऐसी फैल गई थी कि कोई तैयार ही नहीं होता था. मातापिता ने उसे बहुत प्रोत्साहित किया, ढाढ़स बंधाया तब कहीं जा कर फिर से उस ने पढ़ाई प्रारंभ की. अर्थशास्त्र में एमफिल करते ही यहां महिला कालेज में व्याख्याता बन गई. मुश्किल से 6 माह हुए हैं यहां आए. कालेज के छात्रावास में ही रहती है. कहीं खास आनाजाना भी नहीं है. कभी बहुत आग्रह करने पर हमारे यहां चली आती है.’’

‘‘कितने दुख की बात है. जीवन ने उस के साथ बड़ा क्रूर उपहास किया है,’’ अनन्य को उस से हमदर्दी हो आई थी.

‘‘जीवन से अधिक क्रूर मजाक तो उस के अपनों ने किया है. 2 बड़े भाई हैं, एक बड़ी बहन है. तीनों अपनी गृहस्थी में इतने मगन हैं कि छोटी बहन के संबंध में सोचते तक नहीं. मेरी बूआ यानी अवनि की मां बिलकुल अकेली पड़ गई हैं. एक ओर बीमार पति की तीमारदारी तो दूसरी ओर अवनि की समस्या. उन का हाल पूछने वाला तो कोई है ही नहीं,’’ सुजाता का गला भर आया. आंखें भीग गईं.

‘‘जो हुआ, बहुत दुखद था, पर दीदी, इस का अर्थ यह तो नहीं कि पूरा जीवन एक दुर्घटना की भेंट चढ़ा दिया जाए,’’ अनन्य को अपनी बात कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे.

‘‘तुम सही कह रहे हो अनन्य, पर यह सब उसे बताएगा कौन? अभी तक तो सब ने उस के घावों पर नमक छिड़कने का ही काम किया है.

एक दिन अचानक वह मुझ से मिलने चली आई. बातों ही बातों में पता चला कि तैयार हो कर कालेज के लिए निकली तो कुछ छात्राएं उस के सामने पड़ गईं.

अवनि को देखते ही वे आपस में ऊंचे स्वर में बातें करने लगीं कि आज सवेरेसवेरे अवनि मैडम का मुंह देख लिया है, पता नहीं दिन कैसा गुजरेगा. यह बताते हुए वह रो पड़ी,’’ सुजाता ने बताया.

‘‘इस तरह कमजोर पड़ने से काम कैसे चलेगा. उन छात्राओं को तभी इतनी खरीखोटी सुनानी चाहिए थी कि फिर से ऐसी बेहूदा बात कहने का साहस न कर पाएं,’’ अनन्य क्रोध से भर उठा.

‘‘कहना बहुत सरल होता है, अपनी ही बात ले लो. कुछ ही देर पहले तुम अवनि के व्यक्तित्व से पूर्णतया अभिभूत लग रहे थे. पर मुझे नहीं लगता कि यह सब कुछ जानने के बाद भी तुम्हारे मन में उस के प्रति वही भावनाएं होंगी?’’ सुजाता व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोली.

‘‘आप के इस प्रश्न का उत्तर अभी तो मेरे पास नहीं है. सबकुछ जाननेसमझने के लिए समय तो चाहिए न दीदी,’’ अनन्य के हर शब्द में गहराई थी, अवनि के प्रति सहानुभूति थी.

सुजाता बस मुसकरा कर रह गई थी. अनन्य के जाने के बाद सुजाता सोच में डूब गई.

उस के मन में विचारों का तेजी से मंथन चल रहा था. कभी वह अनन्य के बारे में सोचती तो कभी अवनि के बारे में.

‘‘कब तक यों ही बैठी रहोगी? ढेरों काम पड़े हैं,’’ तभी ध्रुव ने उस की तंद्रा भंग की.

‘‘क्या करूं, फिर वही कहानी दोहराई जा रही है. पता नहीं अवनि को कोई सहारा देने का साहस जुटा पाएगा या नहीं?’’ निराश स्वर में बोल सुजाता उठ खड़ी हुई.

‘‘इस चिंता में घुलना छोड़ दो सुजाता. अवनि पढ़ीलिखी है, समझदार है, आत्मनिर्भर है. धीरेधीरे अपने बलबूते जीना सीख जाएगी,’’ ध्रुव ने समझाना चाहा था.

कुछ माह भी नहीं बीते थे कि एक दिन अचानक ही शुभदा मौसी का फोन आ गया. इधरउधर की बात करने के बाद वे बोलीं, ‘‘क्या कहूं सुजाता, मन रोने को हो रहा है. पर सोचा पहले तुम से बात कर लूं. शायद तुम्हीं कोई राह सुझा सको.’’

‘‘क्या हुआ, मौसी? सब खैरियत तो है?’’ सुजाता बोली.

‘‘मेरी कुशलता की इतनी चिंता कब से होने लगी तुम्हें? काश, तुम ने मुझे समय से सचेत कर दिया होता.’’

‘‘क्या कह रही हो मौसी? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा,’’ सुजाता परेशान हो उठी.

‘‘मैं उस मुई अवनि की बात कर रही हूं. पता नहीं कब से प्रेमलीला चल रही है दोनों की. अब अनन्य जिद ठाने बैठा है कि विवाह करेगा तो अवनि से ही, नहीं तो कुंआरा रहेगा.’’

‘‘मेरा विश्वास करो मौसी. मुझे तो इस संबंध में कुछ भी पता नहीं है.’’

‘‘पर अनन्य तो कह रहा था कि वह अवनि से पहली बार चिरायु के जन्मदिन पर ही मिला था.’’

‘‘उस समारोह में तो बहुत से लोग आमंत्रित थे. कहां क्या चल रहा था, मैं कैसे बता सकती हूं.’’

‘‘ठीक है, मान ली तुम्हारी बात. पर अब तो कुछ करो, सुजाता. मेरा तो एक ही बेटा है. उसे कुछ हो गया तो मैं बरबाद हो जाऊंगी,’’ शुभदा फोन पर ही रो पड़ीं.

‘‘ऐसा मत बोलो मौसी, ऐसा कुछ नहीं होगा. क्या पता इस में भी कोई अच्छाई ही हो,’’ सुजाता ने उन्हें ढाढ़स बंधाया.

‘‘इस में क्या अच्छाई होगी. मेरी तो सारी उमंगों पर पानी फिर गया. इस से तो अनन्य कुंआरा ही रह जाता तो मैं संतोष कर लेती. सुजाता, वादा कर कि तू अनन्य को समझा लेगी.’’

‘‘ठीक है, मैं प्रयत्न करूंगी मौसी. पर कोई वादा नहीं करती. तुम तो जानती ही हो, आजकल कौन किस की सुनता है. जब अनन्य तुम्हारी बात नहीं मान रहा तो मेरी क्या मानेगा,’’ सुजाता ने अपनी विवशता जताई थी.

‘‘प्रयत्न करने में क्या बुराई है? तुझे तो बहुत मान देता है. शायद मान जाए. अपनी मौसी के लिए तू इतना भी नहीं करेगी?’’ शुभदा ने जोर डालते हुए कहा था.

‘‘क्यों शर्मिंदा करती हो, मौसी. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगी.’’

सुजाता ने शुभदा को आश्वस्त तो कर दिया पर अति व्यस्तता के कारण अगले 2 महीने तक अवनि और अनन्य से मिलने तक का समय नहीं निकाल पाई. पर एक दिन अचानक शुभदा मौसी को आया देख उस के आश्चर्य की सीमा न रही.

‘‘आओ मौसी, तुम्हारा फोन आने के बाद व्यस्तता के कारण अनन्य से मिलने का समय ही नहीं निकाल पाई. मैं आज ही अनन्य से मिलने की कोशिश करूंगी,’’ सुजाता मौसी को अचानक आया देख वह अचकचा कर बोली.

‘‘अब उस की कोई आवश्यकता नहीं, बेटी. मैं तो उन दोनों के विवाह का निमंत्रण देने आई हूं. अनन्य को बहुत समझायाबुझाया, लेकिन वह माना ही नहीं. पता नहीं उस जादूगरनी ने क्या जादू कर दिया. बेटे की जिद के आगे झुकना ही पड़ा,’’ शुभदा मौसी भरे गले से बोलीं और निमंत्रणपत्र दे कर उलटे पांव लौट गईं.  बहुत प्रयत्न करने पर भी उन्हें रोक नहीं पाई सुजाता. शायद वे अनन्य और अवनि के विवाह के लिए सुजाता को भी दोषी मान रही थीं.

शुभदा मौसी तो निमंत्रणपत्र दे कर चली गईं पर सुजाता के मन में बेचैनी हो रही थी कि आखिर अनन्य क्यों अवनि के बारे में सबकुछ जानने के बाद विवाह के लिए राजी हो गया और अवनि कैसे अपनी पुरानी यादों को भूल कर विवाह के लिए तैयार हो गई? सुजाता ने अनन्य और अवनि से बात की तो दोनों ने ही कहा, ‘‘दीदी, हम दोनों ने एकदूसरे को अच्छी तरह समझ लिया है. साथ ही हम यह भी समझ गए हैं कि शकुनअपशकुन कुछ नहीं होता. जीवनसाथी अगर अच्छा हो तो जिंदगी अच्छी गुजरती है. अत: एकदूसरे को समझने के बाद ही हम ने शादी का फैसला लिया है.

सुजाता ने अपने में कई ताजगी का अनुभव किया.

अनन्य और अवनि का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ था. य-पि शुभदा मौसी किसी अशुभ की आशंका से सोते हुए भी चौंक जाती थीं.

अनन्य और अवनि के विवाह को अब 5 वर्ष का समय बीत चुका है. 2 नन्हेमुन्नों के साथ दोनों अपनी गृहस्थी में कुछ ऐसे रमे हैं कि दीनदुनिया का होश ही नहीं है उन्हें. पर शुभदा मौसी हर परिचित को यह समझाना नहीं भूलतीं कि शकुनअपशकुन कुछ नहीं होता. यह तो केवल पंडों का फैलाया वहम है.

वापसी: क्यों शेखर अपनी पत्नी से नाराज रहता था?

भादों महीने की काली अंधेरी रात थी. हलकी रिमझिम चालू थी. हवा चलने से मौसम में ठंडक थी. रात में लगभग एक बज रहा था. दिनभर तरहतरह की आवाजें उगल कर महानगर लखनऊ 3-4 घंटे के लिए शांत हो गया था.

गोमती नदी के किनारे बसी एक कालोनी के अपने मकान की ऊपरी मंजिल के कमरे में शेखर मुलायम बिस्तर पर करवटें बदल रहा था. उस की नजर बगल में बैड पर गहरी नींद में सो रही रमा पर पड़ी, जो आराम से सो रही थी.

घड़ी पर नजर डालते हुए शेखर मन ही मन बड़बड़ाया, ‘4 घंटे बाद रमा के जीवन में कितना बड़ा तूफान आने वाला है, जिस से वह बेचारी अनजान है. यह तूफान तो रमा के घरेलू जीवन को ही उजाड़ देगा और वह पूरी जिंदगी उसी के भंवर में डूबतीउतराती रहेगी. दुनिया कहां से कहां पहुंच गई और रमा पुराने विचारों पर ही भरोसा रखती है. समय के साथ ताल मिला कर चलना सीखा होता और मैं क्या चाहता हूं, यह समझा होता तो आज उसे छोड़ने का यह समय तो न आता.’

शेखर उस अंधेरे में देखते हुए सोच रहा था, ‘3 घंटे बाद 4 बजेंगे. मैं बैडरूम से निकल कर दबेपांव घर से बाहर जा कर टैक्सी पकड़ूंगा और अमौसी हवाई अड्डे पर पहुंच जाऊंगा. वहां साढ़े 5 फुट की निशि ग्रे रंग की जींस और लाल रंग का टौप पहन कर खड़ी होगी. मुझे देखते ही अपने केशों को एक खास अंदाज में झटकते हुए अपने गुलाबी होंठों से मोनालिसा की तरह मुसकराते हुए इंग्लिश में कहेगी, ‘गुडमौर्निंग शेखर. मुझे विश्वास था कि तुम देर जरूर करोगे’ और मैं निशि के मरमरी हाथ को अपने हाथ में ले कर कहूंगा, ‘सौरी डार्लिंग.’

यह सब सोच कर शेखर के होंठों पर हंसी तैर गई. उस की आंखों के सामने औफिस की कंप्यूटर औपरेटर निशि तैर गई. 22 साल की परी जैसी मोहक देह के बारे में सोचते ही शेखर के शरीर में रोमांच की लहर दौड़ गई.

एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में एग्जीक्यूटिव के रूप में काम करने वाले खुले विचारों के शेखर को रमा की सादगी अखरती थी. रमा पतिपरायण पत्नी थी. पति के अस्तित्व में अपने अस्तित्व को देखने वाली पत्नी, जो आज के समय में मिलना मुश्किल है. पर शेखर, रमा की सादगी से काफी नाखुश था.

शेखर को अकसर लगता कि रमा उस जैसे कामयाब आदमी के लायक नहीं है, गांव की सीधी, सरल और संस्कारी लड़की से शादी कर के उस ने बहुत बड़ी भूल की है. फैशनपरस्ती भी कोई चीज होती है.

अतिआधुनिक लड़कियों की तसवीर रमा में ढूंढ़ने वाला शेखर कभी चिढ़ कर कहता, ‘रमा, आदमी को यौवन से मदमाती औरत अच्छी लगती है. बर्फ बन जाने वाली ठंडी पत्नी नहीं. पुरुष को सहचरी चाहिए, सेविका नहीं.’

रमा फिर भी शेखर की चाहत पूरी कर पाने वाली आधुनिका नहीं बन सकी. शेखर उंगली रख कर रमा का दोष बता सके, इस तरह का नहीं था. रमा अपने काम, पति के प्रति वफादारी और चरित्र की कसौटी पर एकदम खरी उतरती थी.

शेखर की निगाह उस के विभाग में नईनई आई 22 साल की खूबसूरत, मस्त और कदमकदम पर सुंदरता बिखेरती कंप्यूटर औपरेटर निशि पर जम गई.

निशि समय की ठोकर खाई युवती थी. उस ने देखा कि औफिस के एग्जीक्यूटिव और विभाग के अधिकारी शेखर की नजर उस की सुंदरता पर जमी है और उस की कृपादृष्टि से वह औफिस में स्थायी हो सकती है व उन्नति भी पा सकती है, इसलिए समय और मौके के मूल्य को समझते हुए व शेखर की नजरों में अपने प्रति चाहत देख कर उस के करीब पहुंच गई. थोड़े समय में ही शेखर और निशि नजदीक आ गए.

निशि के साथ रहने के कारण शेखर घर देर से पहुंचने लगा. रमा ने इस बारे में कभी शेखर से पूछा भी नहीं कि इतनी देर तक वह कहां रहता है. उलटे शेखर से प्रेम से पूछती, ‘लगता है, आजकल औफिस में काम बढ़ गया है, जो इतनी देर हो जाती है. लाइए आप का सिर और पैर दबा दूं.’

रमा के इस व्यवहार से शेखर सोचने लगता कि यह औरत भी अजीब है. कभी इस के मन में किसी तरह का अविश्वास, शंका नहीं आती. रमा के इस तरह के व्यवहार से उस का अहं घायल हो जाता.

शेखर निशि को 3-4 बार अपने घर भी ले आया. रमा ने निशि की खूब खातिर की. शेखर ने सोचा था कि रमा निशि से उस के संबंध के बारे में पूछताछ करेगी, मगर उस की यह धारणा गलत निकली.

निशि अपनी मुसकान से, अदाओं से और बातों से शेखर का मन बहलाने लगी. शेखर ने उस की नौकरी सालभर में ही पक्की करवा दी और वेतन भी लगभग तीनगुना करवा दिया. नौकरी पक्की होते ही शेखर को लगा कि अब निशि धीरेधीरे उस के प्रति लापरवाह होती जा रही है. जब भी मिलने को कहो तो किसी न किसी काम का बहाना कर के मिलने को टाल जाती है.

इस बीच, उस ने अंदाज लगाया कि निशि उस के बजाय निखिल से अधिक मिलतीजुलती है. उस से कुछ अधिक ही संबंध गहरा हो गया है. उस का दिमाग चकराने लगा. वह उदास हो गया.

एक दिन शेखर ने निशि से पूछ ही लिया, ‘निशि, तुम्हारे और निखिल के संबंधों को मैं क्या समझूं?’

निशि ने कंधे उचकाते हुए कहा, ‘निखिल मेरा दोस्त है. क्या मैं औरत होने के नाते किसी पुरुष से दोस्ती नहीं कर सकती?’

‘मैं इतने तंग विचारों वाला आदमी नहीं हूं, फिर भी मैं किसी और पुरुष के साथ तुम्हारी नजदीकी बरदाश्त नहीं कर सकता.’

‘आप का मैं कितना सम्मान करती हूं, यह आप भी जानते हैं. पर एक ही आदमी में अपनी सारी दुनिया देखना मेरी आदत में नहीं है’, निशि ने शेखर का हाथ अपने हाथ में ले कर मुसकराते हुए कहा, ‘आप मुझे अपनी जागीर समझें. मैं जीतीजागती महिला हूं, मेरे भी कुछ अपने अरमान हैं.’

शेखर ने खुश होते हुए कहा, ‘निशि, तुम मुझे उतना ही प्यार करती हो, जितना मैं तुम से करता हूं?’

‘चाहत को भी भला तौला जा सकता है?’ निशि हंस?? कर बोली.

‘निशि, चलो, हम दोनों विवाह कर लेते हैं.’

निशि चौंकी, फिर गुलाबी होंठों पर मुसकान बिखेरती हुई बोली, ‘लेकिन आप तो शादीशुदा हैं. दूसरी शादी तो कानूनन हो नहीं सकती. यदि आप अकेले होते तो मेरा समय अच्छा होता.’

‘निशि, अपने प्रेम के लिए मैं अपना घरेलू जीवन तोड़ने को तैयार हूं. प्लीज, इनकार मत करना. कल सुबह दिल्ली के लिए हवाई जहाज से 2 टिकट बुक करा लेता हूं. सुबह साढ़े 5 बजे अमौसी हवाई अड्डे पर आ जाना. अब देर करना ठीक नहीं है. मुझे रमा और निशि के बीच भटकना नहीं है. तुम सुबह आना, मैं इंतजार करूंगा.’

तब निशि केवल इतना ही बोल सकी, ‘ठीक है.’

बैड पर करवट बदल रहे शेखर यह सोच कर मुसकरा पड़ा कि कुछ घंटे बाद ही निशि हमेशा के लिए मेरी होगी.

शेखर ने घड़ी में समय देखा, 2.30 बजे थे.

तभी फोन की घंटी बज उठी. निशि का ही होगा. मैं भूल न जाऊं, यही याद दिलाने के लिए उस ने फोन किया होगा. सचमुच निशि कितनी अच्छी है. एकदम सच्चा प्रेम करती है मुझ से.

शेखर ने धीरे से उठ कर फोन का रिसीवर उठा लिया, ‘‘हैलो, मैं शेखर बोल रहा हूं.’’

‘‘शेखर, मैं निशि बोल रही हूं.’’

‘‘मैं पहले ही जान गया था कि तुम्हारा फोन होगा. इतनी उतावली क्यों हो रही हो? मैं भूला नहीं हूं. एकएक पल गिन रहा हूं, नींद नहीं आ रही है क्या.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. दरअसल, मैं कल आप की हालत देख कर संकोचवश कुछ कह नहीं सकी. काफी सोचने के बाद मुझे लगा कि एक शादीशुदा पुरुष की रखैल बनने के बदले निखिल की पत्नी बन जाना मेरे और तुम्हारे दोनों के लिए अच्छा रहेगा.

‘‘निखिल से विवाह कर के उस की पत्नी के रूप में मैं समाज में प्रतिष्ठा भी पाऊंगी और रमा बहन जैसी बेकुसूर औरत का संसार भी नहीं उजड़ेगा. तुम हवाई अड्डे जाने के लिए घर से निकलो, उस के पहले ही मैं और निखिल यह शहर छोड़ चुके होंगे. हम दोनों अभी नैनीताल जा रहे हैं. वहीं शादी कर के हनीमून मनाएंगे.

‘‘मुझे उम्मीद है कि तुम मुझे माफ कर दोगे. रमा दीदी सुंदर, सुशील हैं, उन्हें प्रेम दे कर उन से प्रेम पा सकते हो. एक औरत हो कर भी मैं ने रमा दीदी के साथ बहुत अन्याय किया है. अब इस से अधिक अन्याय मैं नहीं कर सकती. बात मेरी समझ में आ गई, भले ही थोड़ी देर से आई है. इसलिए अब मैं प्रेम के अंधेरे रास्ते पर नहीं चलना चाहती. अब आप मेरा इंतजार मत कीजिएगा.’’

फोन कट गया. शेखर का दिमाग चकराने लगा. उसे लगा वह रो पड़ेगा. लड़खड़ाते हुए बालकनी में आया. संभाल कर रखे जहाज के दोनों टिकटों को फाड़ कर हवा में उछाल दिया. उस के बाद आ कर कमरे में लेट गया. उस की नजर बगल में बेखबर सो रही रमा पर पड़ी. शेखर आंख बंद कर रमा और निशि की आपस में तुलना करने लगा.

4 बजे का अलार्म बजा. रमा ने आंख बंद कर के लेटे शेखर को झकझोरा, ‘‘उठो, 4 बज गए हैं. दिल्ली नहीं जाना क्या? तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं चाय बना कर ला रही हूं.’’

शेखर रमा को ताकने लगा. उसे लगा कि उस ने आज तक रमा को प्रेमभरी नजरों से देखा ही नहीं था. वाकई सीधीसादी होने के बावजूद रमा निशि से सुंदरता में बीस ही है. सादगी का भी अपना अलग सौंदर्य होता है.

‘‘इस तरह क्या देख रहे हो? क्या आज से पहले मुझे नहीं देखा था? चलो, जल्दी तैयार हो जाओ, देर हो रही है.’’

शेखर ने रमा को बांहों में बांध लिया और बोला, ‘‘रमा, मैं अब दिल्ली नहीं जाऊंगा.’’

रमा ने शेखर का यह व्यवहार सालों बाद अनुभव किया था. शेखर भी महसूस कर रहा था कि आज जब वह रमा को दिल से प्यार कर रहा है तो रमा की मदमाती अदाओं में कुछ अलग कशिश है. बीता वक्त लौट तो नहीं सकता था लेकिन उसे संवारा तो जा सकता था.

लोलिता : खेल या इश्क किसका जुआरी थी सोम

भारत के ऐयाश कारोबारी सोम को नेपाल के कैसिनो में जुआ खेलने की आदत थी. वहां उस की मुलाकात लोलिता नाम की एक लड़की से हुई. सोम ने उस से शादी कर ली और भारत ले आया. यहां एक दिन जब लोलिता को सोम की असलियत पता चली, तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. आगे क्या हुआ?

उत्तर प्रदेश के तराई इलाके नीमा कलां से महज 25 किलोमीटर दूर नेपाल की सरहद शुरू होती है. नेपाल और भारत के बीच आनेजाने के लिए पासपोर्ट की जरूरत नहीं पड़ती है. लिहाजा, दोनों देशों के नागरिक एकदूसरे के देश में आजा कर खरीदारी कर सकते हैं.

नीमा कलां की सरहद से लगे हुए एक नेपाली शहर का नाम बीरगंज है. चूंकि नेपाल में बहुत ज्यादा उद्योगधंधे नहीं हैं, इसलिए नेपाल विदेशी मुद्रा कमाने के लिए पर्यटन को बहुत बढ़ावा देता है. बीरगंज में भी 2 शौपिंग माल और विदेशी सामान का एक बहुत अच्छा बाजार है.

अभी पिछले साल ही बीरगंज में एक कैसिनो भी खुल गया था. वह कैसिनो बाहर से देखने में तो कुछ खास नहीं लगता था, पर अंदर जा कर उस की भव्यता का पता चलता था.

उस कैसिनो में पैसे कमाने के लिए कई किस्म के प्रोग्राम और गेम खेले जाते थे. साथ ही, लड़कियों का लुभाने वाला डांस और स्टैंडअप कौमेडी भी होती थी.

बीरगंज के इस कैसिनो में आने वाले लोगों में भारत के नागरिक ज्यादा होते थे, जो ठीक सुबह 10 बजे कैसिनो आ जाते, दिनभर जुआ खेलते और कैसिनो के अंदर ही खातेपीते, फिर शाम को 6 बजे तक नेपाल से भारत आ जाते थे.

इन्हीं जुआरियों में से एक का नाम था सोम, जो नीमा कलां का रहने वाला था और अपने बड़े भाई रवि के साथ विरासत में मिले कारोबार को चलाता था, पर यह साझा तो नामभर का ही था, क्योंकि सोम अलमस्त स्वभाव का था, जो अपने दोस्तों के साथ घूमनाफिरना, जुआ खेलना और नशा करना पसंद करता था, जबकि कारोबार की जिम्मेदारी रवि पर ही रहती थी, जो सोम को उस के अजीब और मुंहफट स्वभाव के चलते कुछ भी नहीं कहते थे.

जब नेपाल के बीरगंज में कैसिनो के खुलने की खबर सोम तक पहुंची, तब उस की खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं रहा. अब वह बीरगंज जा कर दिनभर जुआ खेल सकता था.

सोम ने पहले ही दिन से कैसिनो जाना शुरू कर दिया था. वहां पर सिर्फ मैनेजर और कुछ तगड़े बाउंसरों को छोड़ कर कोई भी पुरुष कर्मचारी नहीं था. खेलने वाले सिक्के यानी कौइन बांटने से ले कर शराब परोसने तक का सारा काम खूबसूरत लड़कियां करती थीं.

शराब परोसने वाली लड़कियों का पूरा शरीर तो शर्ट और पैंट से ढका रहता था, पर शर्ट के सीने के 2 बटन खुले रहते थे, जिस से लड़कियों के सीने की गोलाई का कुछ हिस्सा दिखता रहता था.

सोम जम कर जुआ खेलता था. वह कभी जुए में जीतता, तो कभी हारता. जीतने पर वह जम कर शराब पीता और हारता तो गम को कम करने के लिए फिर शराब पीता था. वह जीते हुए पैसे दोस्तों पर उड़ाना नहीं भूलता था.

आज भी सोम लगातार हारता जा रहा था और अगली चाल चल कर वह शायद पूरा गेम हार भी जाता, अगर वहां पर काम कर रही एक लड़की ने उसे अपनी आंखों के इशारे से ऐसी चाल चलने से मना न किया होता. सोम ने उस लड़की के इशारे को समझ और अपनी चाल बदल दी, जिस से वह जीत गया.

सोम ने सब की नजर बचा कर उस लड़की को 2,000 रुपए देने की कोशिश की, पर उस ने पैसे लेने से इनकार कर दिया. उस की ईमानदारी से खुश हो कर सोम ने उस का नाम पूछा. उस लड़की ने अपना नाम लोलिता बताया.

‘‘बहुत ग्लैमरस नाम है तुम्हारा, एकदम तुम्हारे चेहरे की तरह,’’ सोम ने कहा, तो लोलिता के चेहरे पर एक फीकी सी मुसकराहट बिखर गई.

उस दिन के बाद से सोम ने नोटिस किया कि जब कभी वह बाजी हारने लगता, उसी समय वहां गुलाबी रंग के दस्ताने पहने हुए लोलिता उस के पास आ कर खड़ी हो जाती. इस के बाद से ही सोम हारी हुई बाजी जीतने लगता था. ऐसा एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुआ था.

सोम को लगने लगा था कि यह लड़की उस के लिए लकी है. लिहाजा, वह कैसिनो में बारबार लोलिता को पास बुलाता और उस से बातें करना चाहता, पर वह ऐसा करने से मना कर देती, क्योंकि कैसिनो के अंदर वह कैमरे की नजर में होती थी और किसी भी कस्टमर से ज्यादा नजदीकी दिखाना मना था.

लिहाजा, सोम ने चुपके से उस का मोबाइल नंबर ले लिया और देर रात में लोलिता से बातें कर के उस ने यह जान लिया कि लोलिता के पिता की मौत हो चुकी है, जबकि मां कैंसर से जूझ रही हैं.

लोलिता ने सोम को यह भी बताया कि उस का चित्रमान नाम का एक बौयफ्रैंड है, जो उसी कैसिनो में बाउंसर है. उसे लोलिता का कैसिनो में काम करना बिलकुल पसंद नहीं है.

सोम को लोलिता का साफगोई से अपने बारे में सबकुछ बताना बहुत अच्छा लगा और उस ने लोलिता को एक मजबूत और ईमानदार लड़की समझ, पर फिर भी सोम ने उसे दोबारा कुछ पैसे दे कर उस के जिस्म को भोगना चाहा, पर उसे मुंह की खानी पड़ी थी, क्योंकि लोलिता पैसे से कमजोर जरूर थी, लेकिन अपने जिस्म को बेच कर जीना नहीं चाहती थी.

सोम ने लोलिता से ब्याह रचाने की सोची. लेकिन जब लोलिता ने अपने  बौयफ्रैंड चित्रमान को सोम के इरादे के बारे में बताया, तो पहले तो वह नाराज हुआ, पर बाद में उस ने लोलिता को सोम से शादी रचाने के लिए हामी भर दी, क्योंकि ऐसा कर के लोलिता एक पैसे वाले की पत्नी बन जाएगी और फिर वह अपनी मां का इलाज भी करा सकेगी. लोलिता ने सोम को शादी के लिए हां बोल दी.

लोलिता जब तक नेपाल में थी, तब तक उस का पहनावा साधारण ही लगता था, पर आज जब उस ने लाल रंग की सुर्ख साड़ी पहनी और अपने बालों को पार्लर गर्ल की मदद से एक नया ब्राइडल लुक दिया, तो देखने वाले उसे निहारते ही रह गए. लोलिता ने जल्दी ही बड़े भैया रवि और भाभी का मन मोह लिया था.

शादी को 2 महीने हो चले थे. एक दिन रवि भैया ने लोलिता को अपने पास बुला कर बताया कि अभी तक सोम के अंदर जिम्मेदारी की भावना नहीं आई है और वह परिवार के कारोबार में कोई हाथ भी नहीं बंटाता है, पर सिर्फ दोस्तयारों के साथ मजे करने से तो जिंदगी कटती नहीं है.

इसी बीच भाभी ने बीच में टोक कर उन दोनों के बीच की बात खत्म कर दी, ‘‘अरे, अब यहीं बातें करते रहोगे या काम पर भी जाओगे… और अब आप सोम की चिंता करना छोड़ दो, उस की पत्नी आ गई है उस का ध्यान रखने के लिए…’’

सोम आज भी रात 12 बजे के बाद ही घर आया और पूछने पर कह दिया कि दोस्तों के साथ बैठा हुआ था. लोलिता ने उस के इंतजार में डिनर भी नहीं किया था.

‘‘डिनर लगा दूं क्या?’’ लोलिता ने पूछा, तो सोम ने लोलिता के होंठों पर एक जोरदार किस किया और उस की कमर में हाथ डाल कर उसे बिस्तर पर पटक कर लोलिता के सारे कपड़े तन से अलग कर दिए. फिर दीवार पर लगे टैलीविजन पर एक पोर्न मूवी चला दी.

लोलिता ने शरमा कर आंखें बंद कर लीं, तो सोम लोलिता से मूवी देखने की  जिद करने लगा, पर उस पोर्न मूवी में जो हरकतें वह गोरा जोड़ा कर रहा था, वे लोलिता को बेहूदा लग रही थीं और उसे देखने भर से उबकाई आ रही थी.

पर सोम को न जाने क्या हुआ कि उस ने भी लोलिता से पोर्न मूवी की हीरोइन की तरह हरकतें करने को कहा, पर लोलिता ने ऐसा करने से मना कर दिया.

‘‘भला तुझे ऐसा करने में क्या दिक्कत है?’’ सोम ने झल्लाते हुए कहा.

‘‘यह सब गंदा काम है, मुझे ठीक नहीं लगता,’’ धीमी आवाज में लोलिता ने कहा, तो सोम बिफर गया, ‘‘भला तुम्हारे जैसी नेपाली लड़की, जो कैसिनो में काम करती थी, को यह सब करने से क्या परहेज? मैं ने तो सुना है कि तुम लोग पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हो…’’ सोम ने कहा, तो लोलिता को यह बात बुरी तरह अखर गई, पर उस ने यह बात अपने मन में ही दबा कर रख ली.

अगले कुछ दिनों में लोलिता को यह बात अच्छी तरह से पता चल गई थी कि इतना समझाने-बुझाने के बाद भी सोम दोस्तों के साथ जुआ खेलता है, इसलिए लोलिता आज सोम को कभी जुआ न खेलने और कारोबार पर ध्यान लगाने के लिए अपने सिर की कसम देगी.

‘अगर सोम कारोबार की कुछ जिम्मेदारी संभालते, तो बड़े भैया रवि को बैंगलुरु नहीं जाना पड़ता,’ यही सब सोचते हुए न जाने कब लोलिता की आंख लग गई, उसे पता नहीं चला.

रात के शायद 2 बज रहे थे. लोलिता की आंख खुली, तो वह अपना मोबाइल उठा कर सोम को फोन करने के लिए सोचने लगी और पानी लाने के लिए किचन की ओर बढ़ी कि तभी उस की नजर भाभी के कमरे से आती हुई रोशनी पर पड़ी.

‘भाईसाहब तो आज बाहर गए हैं, फिर भी भाभी जाग रही हैं… लगता है कि उन का टैलीविजन खुला रह गया है…’ यह सोचते हुए लोलिता भाभी के कमरे की ओर बढ़ चली.

कमरे के बाहर जा कर लोलिता को ठिठक कर रुक जाना पड़ा था, क्योंकि कमरे से हवस से भरी आवाजें आ रही थीं. उस ने चाबी के छेद से कमरे के अंदर झांका, तो अंदर का सीन देख कर हैरान रह गई. टैलीविजन पर वही पोर्न मूवी चल रही थी, जो सोम ने उस दिन लोलिता को दिखाई थी.

लोलिता की नजर बिस्तर की तरफ घूमी, तो देखा कि सोम आंखें बंद किए बिस्तर पर पड़ा था और उस की भाभी बेशर्मी से सोम के साथ वे सभी अश्लील हरकतें कर रही थीं, जिन्हें करने से लोलिता को परहेज था.

लोलिता का दिमाग फटा जा रहा था. भाभी ऐसा क्यों कर रही हैं? और फिर एक भरोसे पर ही तो वह सोम के साथ अपने देश से भारत चली आई थी. अपनी बीमार मां और प्रेमी की भी परवाह नहीं की थी उस ने, पर सोम ने उस के भरोसे को तोड़ कर तारतार कर दिया था.

लोलिता की आंखें अंगारे जैसी धधक उठी थीं. उस ने अपने मोबाइल के कैमरे से कमरे का वह सीन कैद कर लिया था.

अगले दिन से ही लोलिता ने अपनेआप को बदल लिया था. कहां तो वह साड़ी पहन कर रहना पसंद करती थी, पर आज तो वह नीली जींस और पीले रंग की झनी सी टीशर्ट में बहुत खूबसूरत लग रही थी.

नाश्ते की टेबल पर बैठे हुए सोम ने कहा, ‘‘आज तो एकदम गजब ढा रही हो लोलिता…’’

लोलिता ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘अभी तो कुछ नहीं लग रही, कहर तो शाम को ढहेगा.’’

शाम को लोलिता ने जिद कर के सोम को घर से बाहर नहीं जाने दिया और 8 बजे से ही उसे शराब पिलाने लगी. सोम ने लोलिता से बैली डांस दिखाने की फरमाइश की, तो लोलिता ने झट से अपनी टीशर्ट और जींस उतार फेंकी और केवल ब्रापैंटी में बैली डांस के ऐसे लटकेझटके दिखाए कि सोम सारी दुनिया भूल कर लोलिता के हुस्न के जादू में गोते लगाने लगा.

ठीक उसी दौरान लोलिता ने खुद ही टैलीविजन पर एक पोर्न मूवी चला दी और सोम के जिस्म से लिपटने लगी. हुस्न और शराब का नशा सोम के सिर पर हावी था. वह लोलिता से जम कर सैक्स करना चाहता था, पर लोलिता अब भी हाथ नहीं आ रही थी.

आखिरकार सोम को लगा कि लोलिता ने समर्पण कर ही दिया है, पर लोलिता के कोमल शरीर में प्रवेश करने की कोशिश बेकार हो गई थी.

लोलिता को इसी पल का इंतजार था. उस ने कागजात की एक फाइल निकाली और कुछ जगहों पर नशे में चूर सोम के दस्तखत कराने लगी.

ये कागजात भविष्य में इस बात की तसदीक करने वाले थे कि बैंक के सभी खातों में लोलिता सोम की नौमिनी है और उस की जायदाद और कारोबार में भी उस की आधी हिस्सेदार है.

अगले दिन पौ फटते ही लोलिता नेपाल के बीरगंज जाने वाली बस में बैठ चुकी थी और उस के पास उस के कपड़े, गहने, नकदी और बैंक के कागजात थे. और हां, वह अपने जेठ रवि को सोम और भाभी की अश्लील वीडियो क्लिपिंग मोबाइल पर भेजना नहीं भूली थी.

बीरगंज पहुंच कर लोलिता अपनी मां से मिल कर बहुत खुश हुई. उस की मां की हालत पहले से काफी बेहतर लग रही थी. चित्रमान ने उन का काफी ध्यान रखा था.

अब लोलिता अपनी मां को छोड़ कर कभी कहीं नहीं जाएगी. वैसे तो लोलिता अब चित्रमान को भी छोड़ कर कहीं नहीं जाना चाहती है, लेकिन क्या अब चित्रमान उसे अपनाएगा, क्योंकि लोलिता ने प्रेमी को छोड़ दूसरे मर्द से शादी कर के काम तो गलत ही किया था.

‘‘तुम ने कुछ गलत नहीं किया. अगर तुम ने एक पैसे वाले से शादी की तो सिर्फ अपनी मां के इलाज के पैसों की जरूरत को पूरा करने के लिए. और अगर तुम ने सोम से धोखे से दस्तखत कराए, तो उस में भी कुछ गलत नहीं है. आखिर वह भी तो अपनी भाभी से नाजायज रिश्ता रख कर तुम्हें धोखा दे रहा था,’’ चित्रमान ने लोलिता को गले से लगाते हुए कहा.

भारत में रवि ने अपनी पत्नी का अश्लील वीडियो देख कर उसे तलाक दे दिया और सोम के पास से तो लोलिता पहले से ही सबकुछ ले कर उसे सजा दे चुकी थी.

नेपाल के बीरगंज में वह कैसिनो अब भी गुलजार रहता है, जहां रोजाना लाखों रुपए का जुआ खेला जाता है और अब भी कई लोलिता अपने असली कपड़ों के ऊपर मजबूरी का जामा ओढ़े शराब परोसते देखी जा सकती हैं.

Happy Birthday Deepika: रणवीर सिंह की इन आदतों से परेशान है दीपिका पादुकोण

बौलीवुड की जानी-मानी एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण (Deepika Padukone) अपनी फिल्मों और बोल्डनेस को लेकर अक्सर सुर्खियों में बनीं रहती है. बीते दिनों वो अपनी फिल्म ‘पठान’ (Pathan)को लेकर काफी चर्चा में रही हैं. और अब वह आने वाली फिल्म ‘फाइटर’ (Fighter) को लेकर चर्चा में बनीं हुई है लेकिन बौलीवुड की ये मशूहर एक्ट्रेस आज अपने जन्मदिन (Birthday) को लेकर मीडिया की लाइमलाइट (Limelight) में है. जी हां, दीपिका आज अपना 37वां बर्थडे सेलिब्रेट (Celebrate) कर रही है.


इस बात से तो सभी वाकिफ है कि दीपिका पादुकोण रणवीर सिंह से शादी कर कितनी खुश है. दोनों का प्यार पूरे बौलीवुड में मशहूर है दोनों की केमेस्ट्री को काफी पसंद किया जाता है. लेकिन इतने प्यार के बावजूद भी दीपिका रणवीर सिंह की एक आदत से बहुत ज्यादा परेशान हैं. इतनी कि वह कभी-कभी इरिटेट भी हो जाती हैं. इस बात का खुलासा खुद एक्ट्रेस ने अपने एक इंटरव्यू में किया था. उन्होंने कहा था, मुझे रणवीर की ये आदत बिल्कुल पसंद नहीं है. वो अपना खाना वो बहुत ही जल्दी खा लेते हैं, ये सब देखकर मैं बहुत इरिटेट हो जाती हूं. इतने मैं दो बाइट ही लेती हूं कि रणवीर अपना खाना खत्म कर चुके होते हैं.

आपको बता दें कि मॉडलिंग के बाद फिल्मों में एंट्री करने वाली दीपिका ने अपने अब तक के करियर में कई ऐसे किरदार निभाए हैं जिन्होंने आज उन्हें टॉप एक्ट्रेस बनाया है. दीपिका पादुकोण आज बॉलवुड की हाईएस्ट पेड एक्ट्रेस में से एक हैं. फिल्म मेकर्स में उन्हें अपनी फिल्मों में देखना चाहते हैं. वह मेकर्स की पहली पसंद बन चुकी हैं. दीपिका अपनी एक फिल्म के लिए करीब 15 से 30 करोड़ रुपये तक चार्ज करती हैं. इतना ही नहीं उनकी कुल नेटवर्थ 314 करोड़ रुपये के आस-पास बताई जाती है.

 

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बता दें कि दीपिका पादुकोण आखिरी बार साल 2022 में ‘गहराइया’ में नजर आई थीं. इस फिल्म को कुछ खास सफलता नहीं मिली थी. लेकिन इसमें उनके किरदार को काफी पसंद किया गया था. आने वाले साल में भी दीपिका के पास कई बड़े प्रोजेक्ट हैं. वह जल्द ही ‘फाइटर’ ‘सपना दीदी’ और फिल्म ‘सिंघम अगेन’ में नजर आने वाली हैं.

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