दीदी : भाग 3- किस के लिए दीदी हार गईं

दीदी अपना वैधव्य बोझ लिए फिर घर लौट आईं. वैधव्य दुख हृदय में होने पर भी अब की बार दीदी के चेहरे पर एक गहन आत्मविश्वास का भाव था, क्योंकि अब वे घर का बोझ बन कर नहीं, घर के बोझ को हलका करने की शक्ति हाथों में लिए आई थीं.

जीजाजी के पैसों से दीदी ने अपना क्लिनिक बनवाना आरंभ कर दिया. साथ ही, एक दुकान किराए पर ले कर महिलाओं व बच्चों का इलाज भी करने लगीं. गृहस्थी की जो गाड़ी हिचकोले खाती चल रही थी, वह फिर से सुचारु रूप से चलने लगी. पापा की जगह दीदी ने संभाल ली. हर कार्य दीदी की सलाह से होने लगा.

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दीदी के प्रति मां के बरताव में धीरेधीरे अंतर आने लगा. वे उन्हें अपने बड़े लड़के की उपाधि देने लगीं. सभी खुश थे, परंतु मझली दीदी अपना स्थान छिन जाने के कारण रुष्ट सी रहतीं, यद्यपि रागिनी दीदी ने अपने अधिकार का दुरुपयोग कभी नहीं किया. हम सब की खुशी को ही उन्होंने अपनी खुशी समझा था. दीपा दीदी के ढेर सारे पुरस्कारों को देख कर उन्होंने खुशी से कहा था, ‘‘अरे, दीपा, तूने तो कमाल कर दिया. इतने पुरस्कार जीत लिए. तू तो वास्तव में ही छिपी रुस्तम निकली.’’

‘‘सच पूछो तो दीदी, इस का श्रेय अमित को है. जानती हो वह आजकल अच्छेअच्छे ड्रामों का निर्देशक है. पुणे से कोर्स कर के आया है. उसी के सही निर्देशन में मैं ने ये ढेर सारे पुरस्कार …’’

बीच में ही दीदी ने दीपा दीदी को अपने अंक में भर लिया था, ‘‘मैं तो पहले ही जानती थी कि अमित के लिए उस की कला केवल शौक ही नहीं, नशा है. कितनी प्रसन्नता की बात है कि वही अमित तुझे साथ ले कर चला है.’’

अमित तब अकसर घर आने लगा था. जब भी किसी ड्रामे या प्रोग्राम की तैयारी करनी होती वह दीपा दीदी को लेने आ पहुंचता और फिर छोड़ जाता. सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी में रात को कभी एक बजा होता तो कभी इस से भी अधिक देर हो जाती.

महल्लेभर में दीपा दीदी और अमित के बारे में बातें होने लगी थीं. एक दिन मां ने ही रागिनी दीदी से कहा, ‘‘बहुत दिनों से सुनती आ रही हूं, रागिनी ये सब बातें. लोग ठीक ही तो कहते हैं, जवान लड़की है, इतनी रात गए तक वह इसे छोड़ने आता है. सोचती हूं, अब दीपा के हाथ भी पीले कर देने चाहिए.’’

दीदी ने लापरवाही से एक हंसी के साथ कहा था, ‘‘मां, लोग जिस ढंग से सोचते हैं न, एक कलाकार उस ढंग से नहीं सोच सकता, क्योंकि उसे तो केवल अपनी कला की ही धुन होती है. अमित को मैं अच्छी तरह जानती हूं, रात को दीपा यदि उस के संरक्षण में घर लौटती है तो ठीक ही करती है.’’

‘‘तू तो अपने बाप से भी दो अंगुल बढ़ कर है. उन्होंने क्या कभी सुनी थी मेरी, जो तू सुनेगी?’’ मां ने खीझ कर कहा था.

‘‘पापा ने भी तो कभी गलत नहीं सोचा था. जो कुछ भी वे सोचते थे, कितना सही होता था.’’ दीदी के उत्तर से मां निरुत्तर हो गई थीं.

एक दिन पापा की ही तरह उन्होंने मुझ से और दीपा से डांस प्रोग्राम करने का अनुरोध किया. वे मेरी छूटी हुई कला को मुझ से फिर जोड़ना चाहती थीं. दूसरे अमित व दीपा के डांस के समय पारस्परिक हावभाव कैसे रहते हैं, इस का अंदाजा भी करना चाहती थीं.

दीपा दीदी ने अमित से दीदी की इच्छा बताई तो वह पूर्ण उत्साह से तैयारी में जुट गया. एक छोटे से ड्रामे की तैयारी भी साथ ही होने लगी. महल्लेभर में खुशी की लहर दौड़ गई.

हीरोइन थी दीपा दीदी. उन के मेकअप के लिए अमित के वही सुझाव. दीपा दीदी के मुख पर विजयभरी मुसकान दौड़ जाती. उधर मेरी आंखों के आगे रागिनी दीदी का लाज से सकुचाया वही चेहरा घूम जाता, जब वे स्वयं दीपा दीदी के स्थान पर होती थीं. मैं कई बार सोच कर रह जाती, ‘रागिनी दीदी चाहें तो अब भी अमित को पा सकती हैं.’

परंतु दीदी को अपने से ज्यादा चिंता हम सब की थी, इसलिए उन्होंने उस ओर कभी सोचा ही नहीं. कभी सोचा भी होगा तो दीपा की खुशी उन्हें अपनी खुशी से भी अधिक प्यारी लगी होगी. अपने को भुला कर वे सादी सी सफेद साड़ी में, हाथ में स्टेथोस्कोप लिए घर से क्लिनिक और क्लिनिक से घर भागती रहतीं. केवल कुछ क्षणों का विश्राम. रात को भी पूरी नींद नहीं सोतीं, कभी कोई डिलिवरी केस अटैंड कर रही हैं तो कभी कोई सीरियस केस.

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हमारा सब का जीवन पटरी पर लौट आया था. वही सब पुराने ठाटबाट. घर में नौकरचाकरों की व्यवस्था, मां के लिए अच्छी से अच्छी खुराक व दवाई का प्रबंध, मेरी व अमर की पढ़ाई फिर से सुचारु रूप से चालू हो गई थी. घर में ट्यूशन का प्रबंध हो गया. दीपा दीदी की प्रतिदिन की नईनई पोशाकों व शृंगार प्रसाधनों की मांग की पूर्ति हो जाती, परंतु रागिनी दीदी?

उन्हें एक दिन अमित के साथ कहीं बाहर जाते देखा था. मरीजों से जबरदस्ती छुट्टी पा कर वे अमित के साथ उस की गाड़ी में गई थीं और कुछ ही घंटों बाद लौट भी आई थीं. तब दीपा दीदी को बहुत बुरा लगा था, ‘‘मैं तो कार्यवश उस के साथ जाती हूं. इन्हें भला दुनिया क्या कहेगी कि विधवा हो कर एक कुंआरे लड़के के साथ…’’ उस दिन मां का गुस्से से कांपता हाथ दीपा दीदी के गाल पर चटाख से पड़ा था, ‘‘ऐसी बातें कहती है बेशर्म उस के लिए? तू अभी भी समझ नहीं पाई है उसे. मैं जानती हूं वह क्यों गई है.’’

सप्ताहभर बाद ही जब रागिनी दीदी ने घर में यह घोषणा की कि वे दीपा का विवाह अमित से करेंगी तो मझली दीदी का चेहरा आत्मग्लानि से स्याह पड़ गया था.

दीदी ने बड़े चाव और उत्साह से दीपा दीदी के साथ जा कर एकएक चीज उस की पसंद की खरीदी. अम्मा व हम सब देखते रहते. दीदी कभी बाजार जा रही हैं तो कभी क्लिनिक, कभी इधर भाग रही हैं तो कभी उधर. उन के थके चेहरे को देख कर अम्मा बोली थीं, ‘‘ऐसे तो तू चारपाई पकड़ लेगी. इतना क्यों थकती है? दीपा तो अपना सामान स्वयं खरीद कर ला सकती है.’’

‘‘उस के लिए यह दिन फिर कभी नहीं आने वाला है, मां. वह लाएगी तो ऐसे ही लोभ कर के सस्ता सामान उठा लाएगी, मैं जानती हूं इस कंजूस को.’’ दीपा दीदी के सब से अधिक फुजूलखर्च होते हुए भी दीदी ने ठीक पिताजी वाले अंदाज से कंजूस बना दिया था.

मेहमानों से घर भर गया. चारों ओर चहलपहल थी. दीदी ने सब इंतजाम कर दिए थे. सभी रिश्तेदार दीदी की प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे, ‘ऐसी बेटी के सामने तो अच्छेअच्छे लड़के भी नहीं ठहर पाएंगे.’

‘कौन लड़का करता है आजकल मां व बहनभाइयों की इतनी परवाह?’ चारों ओर यही चर्चा.

विवाह संपूर्ण रीतिरिवाजों के साथ संपन्न हो गया. विदाई का समय हो गया है. दीपा दीदी कार में अमित के पास बैठीं तो उन्होंने एक विजयभरी मुसकान लिए दीदी की आंखों में झांका. उस मुसकान से दीदी का चेहरा एक अद्भुत प्रसन्नता से खिल उठा, जिसे दीपा दीदी आजीवन समझ न पाएंगी. वह प्रसन्नता एक ऐसे खिलाड़ी की प्रसन्नता थी जो अपने साथी की जीत को खुशी प्रदान करने के लिए स्वयं अपनी हार स्वीकार कर लेता है, परंतु अपने साथी को यह विदित भी नहीं होने देता कि वह जानबूझ कर हारा है.

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दीदी : भाग 2- किस के लिए दीदी हार गईं

मां को एक दिन पापा के कान में कहते सुना था, ‘इस लड़की को आप इतनी छूट दे रहे हैं, फिर वह लड़का भी तो अपनी जातबिरादरी का नहीं है.’

‘अरे, बच्चे हैं, उन के हंसनेखेलने के दिन हैं. हर बात को गलत तरीके से नहीं लेते,’ पापा इतनी लापरवाही से कह रहे थे जैसे उन्होंने कुछ देखा ही न हो.

सचमुच पापा की मृत्यु के बाद ही दीदी ने भी अमित के प्रति ऐसा रुख अपनाया था जैसे कि कभी कुछ हुआ ही न हो. एकदम उस से तटस्थ, अमित कभी घर में आता तो दीदी को उस के सामने तक आते नहीं देखा.

दिल में आता उन्हें पकड़ कर झकझोर दूं. ‘क्या हो गया है दीदी, तुम्हें? तुम्हारे अंदर की हंसने, नाचने व गाने वाली रागिनी कहां मर गई है, पापा के साथ ही?’ विश्वास ही नहीं होता था कि यह वही दीदी हैं.

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अमित के आने में जरा सी देर हो जाती तो वे बेचैन हो उठतीं. तब वे मुझे प्यार से दुलारतीं, फुसलातीं, ‘सुधी, जा जरा अमित को तो देख क्या कर रहे हैं?’ मैं मुंह मटका कर, नाक चढ़ा कर उन्हें चिढ़ाती, ‘ऊंह, मैं नहीं जाती. कोई जरूरी थोड़े ही है कि अमित डांस देखें.’

‘देख सुधी, बड़ी अच्छी है न तू, जा चली जा मेरे कहने से. मेरी प्यारी सी, नन्ही सी बहन है न तू.’

वे खुशामद पर उतर आतीं तो मैं अमित के घर दौड़ जाती. वहीं दीदी अमित से तटस्थ रह कर चाचाजी द्वारा भेजे गए लड़कों की तसवीरों को बड़े चाव से परखतीं और अपनी सलाह देतीं. मेरे मस्तिष्क में 2 विपरीत विचारों का संघर्ष चलता रहता. क्या दीदी विवश हो कर ऐसा कर रही हैं या फिर पापा के मरते ही उन्हें इतनी समझ आ गई कि अपना जीवनसाथी चुनने के उचित अवसर पर यदि वे जरा सी भी नादानी दिखा बैठीं तो उन का पूरा जीवन बरबाद हो सकता है?

एक दिन उन के हृदय की थाह लेने के लिए मैं कह ही बैठी, ‘दीदी, क्या इन तसवीरों में अमित का चित्र भी ला कर रख दूं?’

उन्होंने अत्यंत संयत मन से मेरे गाल थपथपा दिए थे, ‘सुधी, हंसीखेल अलग वस्तु होती है और जीवनसाथी चुनने का उत्तरदायित्व अलग होता है. अमित अभी मेरा भार वहन करने योग्य नहीं है.’

तब मैं समझ पाई थी कि दीदी ने अपने बोझ से हम सब को मुक्त करने के लिए, उन के बोझ को वहन न कर सकने योग्य अमित की तसवीर को अपने मानसपटल से पोंछ दिया था.

उन्होंने अपनी कुशाग्र बुद्धि से ऐसे योग्य, स्वस्थ, सुंदर व कमाऊ पति का चुनाव किया था कि सभी ने उन की रुचि की प्रशंसा की थी. दुलहन बनी दीदी जिस समय जीजाजी के साथ अपना जीवनरूपी सफर तय करने को कार में बैठीं, उन के चेहरे पर कहीं भी कोई ऐसा भाव नहीं था, जिस से किंचित मात्र भी प्रकट होता कि वे विवश हो कर उन की दुलहन बनी हैं.

उन के विदा होते ही अम्मा के घुटे निश्वासों को स्वतंत्रता मिल गई थी, ‘‘यही तो अंतर है लड़का लड़की में. बाप की सारी कमाई खर्च करवा कर चली गई. इस की जगह लड़का होता तो कुछ ही वर्षों में सहारे योग्य हो जाता.’’

उधर, दीपा दीदी का पार्ट घर में प्रमुख हो गया. पापा ने वास्तव में ही कहीं गड़बड़ की तो दोनों दीदियों के नाम रखने में. दीपा तो बड़ी दीदी का नाम होना चाहिए था जो आज भी घर के लिए प्रकाशस्तंभ हैं. दीपा दीदी तो अपने नाम का विरोधाभास हैं. उन के मन में तो अंधकार ही रहता है.

रागिनी दीदी घर से क्या गईं, मेरे लिए तो सबकुछ अंधकारमय हो गया था. अम्मा ने तो बचपन से ही मुझे प्यार नहीं दिया. अमर भैया के बाद वे मेरी जगह एक और लड़के की आशा लगाए बैठी थीं. उधर, मझली दीदी उन्हें इसलिए प्यारी थीं कि वे अमर भैया को आसमान से धरती पर हमारे घर में खींच लाई थीं. मझली दीदी समय की बलवान समझी जाती थीं, इसलिए उन्हें दीपा नाम भी दिया गया. अम्मा द्वारा रखा गया मेरा नाम ‘अपशकुनी’ है.

दीपा दीदी की आजादी दीदी के जाने के बाद प्रतिदिन बढ़ती गई और सारे घर के कार्य का बोझ मुझ पर ही लाद दिया गया. रागिनी दीदी के डांस प्रोग्राम घर पर ही होते थे. उन में हम सब की प्रसन्नता सम्मिलित थी. पर दीपा दीदी तो अधिकतर बाहर ही रहतीं. एक कार्यक्रम समाप्त होता तो दूसरे में जुट जातीं. उन्हें खूब पुरस्कार मिलते तो मां उन की प्रशंसा के पुल बांध देतीं. मुझे प्रोत्साहित करने वाला घर में कोई न था. नाचगाने से मेरा संबंध छूट कर केवल रसोईघर से रह गया. बस, कभी विवश हो जाती तो दीदी को याद कर के रोती. मन हलका हो जाता.

बाद के 5 वर्षों में मेरे लिए कुछ सहारा था तो दीदी से फोन पर बात करना. कितनी तसल्ली होती थी जब दीदी प्यार से फोन पर मुझ से बात करतीं. एक बार उन्होंने मुझ से फोन कर के कहा, ‘सुधी, मैं जानती हूं कि तू मेरे बिना कैसी जिंदगी जी रही होगी, परंतु तू धैर्य मत खोना, जिंदगी में हर स्थिति का सामना करना ही पड़ता है. उस से भागना कायरता है. मैं यह कभी सुनना नहीं चाहूंगी कि सुधी कायर है.’

सच पूछो तो दीदी का जीवन ही मेरे लिए प्रेरणास्रोत था. सब से अधिक प्रेरणा तो मुझे तब मिली जब मुझे यह पता चला कि विवाह के बाद भी दीदी अपनी पढ़ाई कर रही थीं. जीजाजी के रूप में उन्हें ऐसा जीवनसाथी मिला जो केवल पति नहीं था, बल्कि पापा की भांति उन्होेंने दीदी को संरक्षण दे कर पापा के सपने को साकार करना चाहा था.

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इंटर तक दीदी के पास साइंस तो थी ही, उन्होंने मैडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर ली और उन्हें आगरा के मैडिकल कालेज में प्रवेश मिल गया और वे अपनी प्रतिभा के कारण हर वर्ष एकएक सीढ़ी चढ़ती चली गईं. जीजाजी इंडियन एयरलाइंस में पायलट के पद पर कार्यरत थे. अकसर कईकई दिनों तक वे बाहर चले जाते. दीदी का समय अपनी पढ़ाई व कालेज में बीतता. कितने सुचारु ढंग से चल रहा था दीदी का जीवन.

डाक्टर बन र दीदी कालेज से निकलीं तो जीजाजी ने उस खुशी में एक बड़ी पार्टी का आयोजन किया था. उस दिन जीजाजी खुशी के कारण अपने होशोहवास भी खो बैठे थे. सब के बीच दीदी को बांहों में भर कर उठा लिया था, ‘आज मुझे लग रहा है, मैं खुशी से पागल हो जाऊंगा. इसलिए नहीं कि हमारी श्रीमतीजी डाक्टर बनी हैं, बल्कि इसलिए कि हमारे दिवंगत ससुरजी की इच्छा पूर्ण हो गई है. उन की बेटी डाक्टर बन गई है. वे रागिनी को डाक्टर बनाना चाहते थे.’

सभी लोगों ने उन के हृदय की सद्भावना को देख कर तालियां बजाई थीं. दीदी लाज के मारे दोहरी हुई जा रही थीं. उस समय जीजाजी ने अमर व हम दोनों बहनों को भी बुलाया था. कितने ही ढेर सारे उपहार लिए हम प्रसन्नतापूर्वक लौट आए थे.

फिर एक घटना और घटी, कितनी अनचाही, कितनी अवांछित. जीजाजी का विमान दुर्घटनाग्रस्त हो कर आग की लपटों में समां गया था, साथ ही, सभी यात्री और जीजाजी की कंचन काया भी. जिस ने भी सुना वही जड़ हो गया. अम्मा ने माथा पीट लिया. हम सब बहनभाई एकदूसरे को ताकते भर रह गए, एकदम जड़ और शून्य हो कर.

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दीदी : भाग 1- किस के लिए दीदी हार गईं

न जाने जीवन में कभी कुछ इतना अप्रत्याशित व असामयिक क्यों घट जाता है कि जिंदगी की जो गाड़ी अच्छीखासी अपनी पटरी पर चल रही होती है वह एक झटके से धमाके के साथ उलटपलट जाती है. जिस गाड़ी में बैठ कर हम आनंदपूर्वक सफर कर रहे होते हैं, वही हमें व हमारे अरमानों को कुचल कर कितना असहाय व लंगड़ा बना देती है.

ऐसा ही कुछ उस दिन घटा था जब पापा की बस दिल्लीकानपुर मार्ग पर एक पेड़ से टकरा गई थी और इधर हमारे पूरे 5 प्राणियों की जीवनरूपी गाड़ी अंधड़ों व तूफानों से टकराने के लिए शेष रह गई थी. पापा थे, तो यही सफर कितना आनंददायक लगता था. उन की मृत्यु के बाद लगने लगा था कि जिस गाड़ी में हम बैठे हैं उस का चालक नहीं है और टेढे़मेढे़ रास्तों से गुजरती हुई यह गाड़ी हमें खींचे ले जा रही है.

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समाचार पाते ही सब नातेरिश्तेदार इकट्ठे हो गए थे. सभी ओर दार्शनिकताभरे दिलासों की भरमार थी, ‘जिंदगी का कोई भरोसा नहीं. बेचारे अच्छेखासे गए थे, क्या मालूम था लौटेंगे ही नहीं आदि.’

जो कोई भी घर में आता, हम बच्चों को छाती से चिपका कर रो उठता. घर की दीवारों को भी चीरने वाला क्रंदन कई दिनों तक घर में छाया रहा.

लेकिन दीदी को न तो किसी ने छाती से लगाया, न ही वे दहाडें मार कर रोईं. उन का विकसित यौवन, गदराई देह और मांसल मांसपेशियां उन्हें छाती से चिपकाने के लिए प्रत्येक परिचितजनों को कुछ देर सोचने को विवश कर देतीं और छाती से दीदी को चिपकाने के लिए उठे उन के हाथ सहसा ही पीछे हट जाते. न तो दीदी को किसी ने दुलरायाचिपकाया, न ही वे दहाड़ें मारमार कर रो सकीं, सूनीसूनी आंखें, उदास व भावहीन चेहरा लिए वे जहां बैठी होतीं, वहीं बैठी रहतीं.

जिस किसी को भी नजर उन पर पड़ती, उन्हें देख कर कुछ चिंतित सा हो उठता. किसी दूसरे के कान में जा कर कुछ फुसफुसाता. दीदी के कानों में यद्यपि कुछ न पड़ता पर उस फुसफुसाहट की अस्पष्ट भाषा वे अच्छी तरह समझ लेतीं. उन्हें लगने लगा था जैसे कि अपने घर की चारदीवारी में वही सब से अधिक पराई हो गई हैं.

तेरहवीं तक यह फुसफुसाहट कुछ गुमसुम सी भाषा में रही, पर 14वें दिन में ही वह स्पष्ट शब्दों में सुनाई देने लगी, ‘जवान लड़की है, इस के हाथ पीले हो जाते तो सरला का एक भारी बोझ उतर जाता.’ तब निश्चय ही दीदी के अकेलेपन को घर के सदस्यों के बीच पैदा होते हुए मैं ने देखा था. पापा के बिना दीदी एकदम अकेली पड़ गई थीं. मां को तसल्ली देने वाले बहुत थे पर उन का सहयोग कभी भी दीदी को नहीं मिल पाया था.

पापा के जाते ही मां की आंखों में घर के आंगन के बीच दीदी एक बड़ा भारी पत्थर बन गई थीं. लगता था, दीदी के भार का गम मां के लिए पापा की मृत्यु के भार से भी अधिक असहनीय हो गया था. यही कारण था कि दीदी के लिए सबकुछ अचानक ही पराया हो गया था, शायद दूसरों पर अपने बोझ का एहसास भी वे स्वयं करने लगी थीं.

मझली दीदी भी तो थीं. पापा तो उन के भी चले गए थे, मेरे भी और अमर के भी. हम सब के पापा नहीं थे तो घरआंगन तो वही था. पर दीदी के लिए तो घरआंगन भी पराए हो गए थे, इसीलिए कुछ ही दिनों में दीदी अपनी सारी चंचलता खो कर जड़ हो गई थीं.

परंतु जड़ होने का मतलब दीदी के लिए जीवन के प्रति निष्क्रिय होना नहीं था. यह बात दूसरी थी कि वे अपने बोझ को मां के सिर से उतारने की चिंता में अपनी उम्र से कहीं अधिक समझदार व परिपक्व हो गई थीं, इसीलिए घर में चर्चा किए जाने वाले किसी  भी सुझाव का विरोध उस समय उन्होंने नहीं किया. ताऊजी बैठते, चाचाजी भी साथ देते, चाची व ताई भी राय देतीं, मां गुमसुम उन की हां में हां मिलातीं.

‘‘इंश्योरैंस कितना है?’’

‘‘पीएफ?’’

‘‘बैंक बैलेंस कुछ है?’’ आदि प्रश्न पूछे जाते.

‘‘सब जोड़ कर 20 लाख रुपए होते थे. यह तो अच्छा है कि सिर छिपाने को बापदादा का बनाया यह पुराना मकान है. अब इन 20 लाख रुपयों में से खींचतान कर के भले घर का कोई लड़का देख कर रागिनी के हाथ पीले कर ही दो. एक की नैया तो पार लगे. जवान लड़की है, तुम कहां तक देखभाल करोगी? दीपा तो अभी 4-5 साल तक ठहर सकती है, सुधी के वक्त तक अमर संभाल ही लेगा,’’ ताऊजी इन शब्दों के साथ ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझते.

मां केवल गरदन हिला कर स्वीकृति दे देतीं. मेरे अंदर बोलने को कुछ कुलबुलाता, परंतु इतने बुजुर्गों के सम्मुख हिम्मत न होती. ‘आज क्या दीदी ही सब से बड़ा बोझ बन गई हैं, केवल 17 साल की उम्र में ही? क्या होगा उन के उन सपनों का जो पापा ने उन्हें दिखाए थे?’

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पापा थे, तो दीदी का अस्तित्व ही घर में सर्वोपरि था. क्याक्या नहीं सोच डालते थे पापा दीदी को ले कर, ‘अपनी बेटी को डाक्टर बनाऊंगा, फिर लंदन भेजूंगा, वहां से स्पैशलिस्ट बन कर आएगी. खूब औपरेशन किया करेगी. महिलाओं की भीड़ से घिरी रहेगी मेरी बिटिया. एक शानदार प्राइवेट अस्पताल बनाएगी अपने लिए. बस, फिर यह सभी को संभाल लेगी. एक से बढ़ कर एक होंगे मेरे बच्चे.’

‘रहने भी दो, किस दूसरी दुनिया में घूमते रहते हैं आप भी, क्यों भूल जाते हैं कि बेटी तो पराया धन होती है.’

‘ऊंह, मैं अपनी रागिनी को कहीं नहीं भेजूंगा. जिसे गरज होगी वही शादी करेगा इस से. मैं थोड़े ही किसी की खुशामद करने वाला हूं. फिर वह रहेगा भी यहीं, इसी के साथ.’ वे दीदी को झटक कर अपनी गोद में बैठा लेते और उन के बाल सहलाने लगते. तब दीदी रही होंगी यही 12-13 वर्ष की. तब पापा के चेहरे से लगता उन की हर खुशी वही थीं. इतने संतुष्ट और प्रसन्न दिखाई देते जैसे कि उस खुशी से परे उन्हें कुछ और चाहिए ही नहीं था.

सतत ही तो थी पापा की वह खुशी. संतान जब गुणवान हो तो किसे प्रसन्नता नहीं होती? रागिनी दीदी को तो न जाने किन हाथों से रचा गया था कि किसी भी गुण से अछूती नहीं हैं. वे देखने में सुंदर, पढ़ाई में निपुण व कलाओं में प्रवीण, क्या घर क्या बाहर, सब जगह ही दीदी की धाक रहती.

पापा अकसर डांस प्रोग्राम करवाते, जिस में रागिनी दीदी स्टार डांसर होती थीं. उन के साथ दीपा दीदी व महल्ले की अन्य लड़कियां भी डांस प्रस्तुत करती थीं.

हमारे पड़ोसी डा. दीपक का सब से बड़ा बेटा अमित इस प्रोग्राम में विशेष रुचि लेने लगा था. धीरेधीरे अमित दीदी को स्वयं सुझाव देता. ‘यह रंग तुम पर अधिक सूट नहीं करेगा. कोई सोबर कलर पहनो. इस साड़ी के साथ यह ब्लाउज मैच करेगा. ऊंह, लिपस्टिक ठीक नहीं लगी, जरा और डार्क कलर यूज करो. काजल की रेखा जरा और लंबी होनी चाहिए. बाल ऐसे नहीं, ऐसे बनने चाहिए.’ प्रोग्राम के समय भी अमित की आंखें दीदी के चेहरे पर ही टिकी रहतीं, और यदि दीदी की नजरें कभी अकस्मात उस की नजर से टकरा जातीं तो उन के चेहरे पर हजारों गुलाबों की लाली छा जाती.

यह सब किसी से छिप सकता था भला? बस, मझली दीदी कुछ तो यह ईर्ष्या दीदी के प्रति पाले हुए थीं कि अमित उन की ओर ध्यान न दे कर रागिनी दीदी को ही आकर्षण का प्रमुख केंद्र बनाए रहता है. दूसरे, मां की आंखों में अपनेआप को ऊंचा उठाने का अवसर भी वे कभी अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती थीं. उन्होंने दीदी के विरुद्ध अम्मा के कान भरने आरंभ कर दिए.

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फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन

दीदी: किस के लिए दीदी हार गईं

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 5

सर्विलांस टीम ने जब अपना काम शुरू किया तो उसे लोइया गांव या आसपास के इलाके में किसी भी महिला अथवा युवती के लापता होने की जानकारी नहीं मिली. अलबत्ता यह जरूर पता चला कि लोइया गांव के ज्यादातर नौजवान पंजाब व हरियाणा के अलगअलग स्थानों पर तंत्रमंत्र झाड़फूंक और टोनेटोटके, वशीकरण का काम करते हैं.

एसएसपी के निर्देश पर सर्विलांस टीम ने एक साथ 2 तरह से विवेचना के काम को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. टीम ने सब से पहले लोइया गांव से 13 जून से एक महीने पहले तक के उन तमाम फोन नंबरों का डं डाटा एकत्र किया जो उस वक्त वहां सक्रिय थे.

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सर्विलांस टीम ने पंडित ईश्वर चंद के खेत के आसपास से मिले मोबाइल फोनों के डंप डाटा की जांच शुरू करनी शुरू कर दी जो एक थका देने वाली प्रक्रिया थी.

इसी के साथ सर्विलांस टीम ने डिस्ट्रिक्ट क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो और स्टेट क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो में दर्ज लापता युवतियों के बारे में सूचना एकत्र करनी शुरू की. लेकिन ब्यूरो से मिले कोई तथ्य शव से मेल नहीं खा रहे थे.

इस के बाद पुलिस ने यह पता लगाना शुरू किया कि इस गांव के कौनकौन से लोग दूसरे राज्यों में काम करते हैं. क्योंकि अगर मेरठ या आसपास के इलाकों की मृतक महिला होती तो अब तक उस के परिजन पुलिस से संपर्क कर चुके होते.

पुलिस ने जब इस ऐंगल पर पड़ताल शुरू की तो पता चला कि करनाल और लुधियाना भी ऐसे शहर हैं, जहां इस गांव के युवक तंत्रमंत्र और वशीकरण का काम करते हैं. पुलिस की पड़ताल जब लुधियाना तक पहुंची तो उन शहरों में महिलाओं की रिपोर्ट खंगाली गई.

आखिरकार, लुधियाना पहुंची मेरठ की सर्विलांस टीम के हाथ सफलता लग गई. पुलिस को पता चला कि लुधियाना के मोतीनगर इलाके में रहने वाली करीब 20 साल की एक युवती जिस का नाम एकता है, उस के परिवार वालों ने उस की मिसिंग रिपोर्ट दर्ज कराई है.

युवती की मिसिंग रिपोर्ट के साथ उस का फोटो भी था और उस के परिजनों का पता व फोन नंबर भी थे. पुलिस ने परिजनों से जब संपर्क साधा तो उन्हें पता चला कि उन की बेटी एकता ने तो अमन नाम के एक लड़के से शादी कर ली है.

परिजनों ने बताया कि उन की बेटी को कुछ नहीं हुआ है क्योंकि वह तो वाट्सऐप पर उन से चैटिंग करती रहती है और अपना स्टेटस भी चेंज करती रहती है.

हालांकि पुलिस निराश जरूर हो गई थी लेकिन फिर भी उस ने एकता और उस के प्रेमी अमन का मोबाइन नंबर उस के परिवार वालों से हासिल कर लिया.

मेरठ आने के बाद पुलिस ने इन दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकाल कर पड़ताल शुरू कर दी तो पता चला कि एकता का फोन तो कई महीनों से एक्टिव ही नहीं है. अलबत्ता उस के नंबर पर वाट्सऐप जरूर चल रहा है. जबकि अमन का जो नंबर है वह भी लुधियाना के ही किसी फरजी पते से लिया गया था. इसलिए पुलिस ने एक बार फिर लुधियाना का रुख किया.

पुलिस ने लुधियाना में उन दफ्तरों की खाक छाननी शुरू की, जहां एकता काम करती थी. पुलिस का एकता के आखिरी दफ्तर में काम करने वाली उस की एक खास सहेली प्रीति (परिवर्तित नाम) से पता चला कि एकता जब वहां काम करती थी तो वह मोतीनगर में ही दिलशाद नाम के एक तांत्रिक के यहां काम करने वाले अमन से मिलने जाती थी.

तांत्रिक दिलशाद से मिली खास जानकारी

अमन के बारे में यह सुराग मिलते ही सर्विलांस टीम की बांछें खिल गईं. बस फिर क्या था, पुलिस टीम ने दिलशाद को उठा लिया. दिलशाद से अमन के बारे में पूछा गया तो उस ने बता दिया कि उस के यहां अमन नाम का जो लड़का काम करता था, उस का असली नाम शाकेब था और वह अब उस के यहां काम नहीं करता. हां, दिलशाद ने इतना जरूर बताया कि अमन उर्फ शाकेब मेरठ के दौराला में लोइया गांव का रहने वाला है.

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इतनी जानकारी मिलते ही पुलिस टीम उछल पडी. क्योंकि जिस कातिल को वह दुनिया भर में ढूंढ रही थी, वह तो लोइया गांव में ही मौजूद था. इस के बाद का काम बहुत आसान था. दिलशाद से जो जानकारी मिली थी, उस के आधार पर पुलिस ने लोइया गांव के शाकेब के बारे में जानकारी हासिल कर ली.

20 मई, 2020 को सर्विलांस टीम ने शाकेब को उस वक्त उस के घर से उठा लिया जब वह परिवार से मिलने के लिए गांव की तरफ जा रहा था.

बाद में शाकेब ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और एकता की हत्या में सहयोग करने वाले अन्य नामों का खुलासा कर दिया. जिस के बाद पुलिस ने उसी रात को दबिश दे कर शाकेब के पिता, भाई, दोनों भाभियों और उस के दोस्त अयान को गिरफ्तार कर लिया.

उसी रात पुलिस ने काल कर के एकता के घर वालों को भेज कर एकता की हत्या और उस के कातिलों के पकड़े जाने की पूरी जानकारी दे दी. घर वाले अगले ही दिन कांगड़ा से मेरठ पहुंच गए.

पुलिस ने सभी आरोपियों को साथ में ले जा कर उन स्थानों की पहचान की, जहां एकता के शव के दूसरे अंग ठिकाने लगाए थे. पुलिस टीम ने उन जगहों की गहराई से छानबीन की, लेकिन एकता के शव के बाकी हिस्से कहीं नहीं मिले.

दरअसल वक्त इतना बीत चुका था कि शरीर के बाकी हिस्सों का मिलना अब वैसे भी नामुमकिन था. एकता के शव की सच्चाई स्थापित करने के लिए पुलिस ने उस के परिवार के लोगों के ब्लड सैंपल लिए. पुलिस ने एकता के शव के रिजर्व रखे गए अंश से फोरैंसिक जांच के बाद डीएनए कराने की प्रक्रिया शुरू की है ताकि यह साबित किया जा सके कि लोइया गांव में जो शव मिला था वह एकता का ही था.

पुलिस ने सभी आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उन की निशानेदही पर एकता का मोबाइल फोन, शाकेब का मोबाइल फोन, एकता के शव के टुकड़े करने में इस्तेमाल बलकटी और गड्ढा खोदने में इस्तेमाल फावड़ा बरामद कर लिया है.

आरोपियों से विस्तृत पूछताछ व जांच के बाद मामले की जांच कर रहे विवेचक ने एकता हत्याकांड के मुकदमे में सबूत मिटाने की धारा 201, 147,148 व 149 भी जोड़ दी. पुलिस ने सभी आरोपियों को मेरठ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

एक साल पुराने इस ब्लाइंड मर्डर केस की गुत्थी सुलझाने वाली सर्विलांस टीम को एसएसपी अजय साहनी ने 20 हजार रुपए का पुरस्कार दिया है.

जब एकता के हत्यारे को लगी गोली

एकता हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के बाद सभी आरोपियों को प्रैसवार्ता में लाया गया था, उस के बाद पुलिस शाकेब और अन्य लोगों को मैडिकल जांच के लिए अस्पताल ले कर जा रही थी.

तभी रास्ते में शाकेब ने एक सिपाही की पिस्टल छीन कर गोली चला दी. गोली लगने से सिपाही सुधीर मलिक घायल हो गया. पिस्टल ले कर भाग रहे शाकिब को पुलिस ने घेराबंदी कर भराला गांव के जंगल में घेर लिया, जहां मुठभेड़ में उस के पैर में पुलिस की 3 गोलियां लगीं.

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घायल शाकेब को ले कर पुलिस जिला अस्पताल पहुंची, जहां उस का इलाज किया गया. पुलिस का कहना है कि हत्या के आरोप में गिरफ्तार सभी 6 आरोपियों के खिलाफ आवश्यक काररवाई की जा रही है.

शाकिब, उस के भाई मुशर्रत, पिता मुस्तकीम, भाभी रेशमा, इस्मत और दोस्त अयान को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस लाइन में प्रैस कौन्फ्रैंस की गई थी. वहां से सभी मुलजिमों को गाड़ी में बैठा कर दौराला थाने लाया जा रहा था. सिवाया टोलप्लाजा के पास शाकेब के परिवार ने उसे पानी पिलाने की बात कह कर गाड़ी रुकवा ली.

इसी बीच शाकेब ने सिपाही सुधीर की पिस्टल छीन ली. पुलिस पर फायरिंग करता हुआ शाकेब सिवाया के जंगल में घुस गया. शाकेब के फायर करने पर एक गोली कांस्टेबल सुधीर के सीने में लगी. उस के बाद ग्रामीणों की मदद से शाकेब का पीछा किया गया.

शाकेब की फरारी की सूचना के बाद एसपी सिटी और एसएसपी भी मौके की ओर दौड़ गए. घंटों की मशक्कत के बाद सिवाया के जंगल में शाकिब को घेर लिया. जवाबी फायरिंग में शाकिब को कई गोलियां लग गईं.

घायल अवस्था में उसे जिला अस्पताल लाया गया. साथ ही घायल सिपाही को भी अस्पताल में भरती करा दिया है. पुलिस ने हत्या के बाद अब शाकिब के खिलाफ हत्या की कोशिश करने के लिए भादंसं की धारा 307, 392 और 411 का मुकदमा पंजीकृत किया है. अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद उसे मेरठ जेल भेज दिया गया.

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 4

दूसरी तरफ शाकेब जो अब तक खुद को अमन के रूप में पेश करता रहा था. उसे लग गया कि एकता के ऊपर चढ़ा उस के सम्मोहन का जादू अब टूट गया है और मामला बिगड़ चुका है. उस ने एक ही क्षण में फैसला कर लिया कि उसे क्या करना है.

उस ने किसी तरह सब से पहले एकता को शांत कराया और उस से कहा कि वह उस के साथ किसी तरह की जोरजबरदस्ती नहीं करेगा. अगर वह उस के साथ नहीं रहना चाहती तो वह ईद से अगले दिन उस के घर भेज देगा और उस ने जो गहने और पैसे दिए हैं, उसे वापस दे देगा.

शाकेब उर्फ अमन ने एक दिन शांति के साथ एकता को अपने घर पर ही एक मेहमान की तरह रुकने का अनुरोध किया तो एकता भी विरोध न कर सकी. शाकेब के इरादों से अनजान एकता एक दिन के लिए उसी घर में रुकने के लिए मान गई.

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इस के बाद शाकेब ने एकता का अपने पूरे परिवार से बेहद सलीके से परिचय कराया.

शाकेब के परिवार में उस के पिता मुस्तकीम के अलावा 4 भाई थे, जिन में शाकेब खुद सब से छोटा था. मां का इंतकाल हो चुका था. उस से बड़े 3 भाई मुशर्रत, नावेद और जावेद हैं. शाकेब के पिता पेशे से ड्राइवर हैं जबकि चारों भाई दौराला से बाहर अलगअलग शहरों में तंत्रमंत्र और झाड़फूंक का काम करते हैं.

मुशर्रत की शादी इस्मत से हुई थी, जबकि नावेद की पत्नी रेशमा है, आशिया तीसरे नंबर के भाई जावेद की पत्नी थी, जो अपनी पत्नी के साथ अपनी ससुराल गया हुआ था. नावेद भी इन दिनों किसी अपराध में शामिल होने के कारण मेरठ जेल में बंद था.

एकता ने की अपने घर जाने की जिद

एकता शाकेब के परिवार के बारे में जानने के बाद यह तो समझ गई थी कि उस का परिवार अच्छा नहीं है. शाकेब के साथ उस के गांव आने के बाद एकता को पूरी तरह आभास हो चुका था कि वह तथाकथित अमन के सम्मोहन में पड़ कर बुरी तरह फंस चुकी थी.

लेकिन जिस तरह शाकेब ने उसे भरोसा दिया था कि वह ईद के अगले दिन उसे उस के पैसों के साथ सकुशल घर वापस पहुंचा देगा, उसे जानने के बाद वह सुकून महसूस कर रही थी कि चलो उसे अपनी भूल सुधारने का मौका मिल गया है.

वह किसी तरह अगले दिन मनाई जाने वाली ईद का इंतजार करने लगी, ताकि उस के खत्म होते ही वह अपने परिवार के पास वापस लौट सके. रात में एकता ने शाकेब के पूरे परिवार के साथ मिल कर खाना खाया.

खाना खाने के बाद परिवार के सभी लोगों ने सोने से पहले कोल्डड्रिंक पी. शाकेब की भाभी रेशमा ने एकता को भी एक गिलास में डाल कर कोल्डड्रिंक पीने के लिए दी, जिस के बाद सभी लोग खुशनुमा माहौल में कुछ देर बात करने लगे.

चंद मिनटों बाद एकता को नींद की उबासी आने लगी तो उस ने कहा कि उसे सोना है. यह सुनने के बाद सभी लोग उसे कमरे में सोने के लिए छोड़ कर बाहर चले गए.

दरअसल अब तक जो घटनाक्रम हो रहा था, वह एक एक साजिश का हिस्सा था जिसे अब अंजाम दिया जाना था. जिन दिनों अमन बना शाकेब दौराला में एकता के साथ किराए का घर ले कर रह रहा था, उस वक्त वह रोज अपने घर वालों से मिलने के लिए आता था.

उस ने घर वालों को बता दिया था कि उस ने एक हिंदू लडकी को अपने जाल में फंसाया है और उस से दिखावे के लिए शादी भी कर ली है. क्योंकि उस ने लड़की को अपने बारे में यही बताया था कि वह हिंदू है.

परिवार वालों को जब ये पता चला कि एकता शाकेब के प्यार में फंसने के बाद अपने घर से करीब 25 लाख रुपए के गहने व नकदी भी चुरा कर ले आई है तो सब बहुत खुश हुए. चूंकि एक दिन तो एकता के ऊपर अमन उर्फ शाकेब के मुसलिम होने की हकीकत पता चल ही जानी थी और उस के परिवार की हकीकत भी उजागर हो जानी थी.

शाकेब का परिवार यह भी जानता था कि अगर शाकेब से हिंदू लड़की एकता निकाह के लिए राजी भी हो गई तो उन की बिरादरी के लोग उन का गैरमजहब में शादी के कारण जीना हराम कर देंगे. अगर शाकेब और एकता की शादी नहीं हुई तो यह भी तय था कि वह शाकेब को दी गई अपनी सारी रकम मांग लेगी.

इसलिए शाकेब ने अपने पिता, भाई और भाभियों के साथ मिल कर पहले ही यह साजिश तैयार कर ली थी कि एकता को अपने घर ला कर उस की हत्या कर दी जाए. इस से उसे एकता की रकम भी नहीं लौटानी पड़ेगी और उस से छुटकारा भी मिल जाएगा.

एकता के नशे में बेसुध हो जाने के बाद शाकेब ने उस के कपड़े उतारे और नशे की अवस्था में ही उस के शरीर से अपनी हवस की भूख शांत की. एकता के शरीर से खिलवाड़ करने के बाद बिस्तर से उठ कर अंगड़ाई लेने के बाद शाकेब बुदबुदाया, ‘‘मूर्ख लड़की तुझे मेरे साथ सुहागरात मनाने की बड़ी जल्दी थी न…चल मरने से पहले मैं ने तेरी ये ख्वाहिश भी पूरी कर दी. अब अगले जन्म में हमारी मुलाकात होगी.’’

शाकेब ने उस के बाद दूसरे कमरों में बेसब्री से इंतजार कर रहे अपने भाई, भाभियों और पिता को बुलाया. इस के बाद उन्होंने मिल कर एकता की गला दबा कर हत्या कर दी.

चूंकि पूरी साजिश पहले ही तैयार कर ली गई थी. एकता की लाश को भी ठिकाने लगाना था. इस काम के लिए शाकेब ने अपने ही गांव में रहने वाले एक कम उम्र के लड़के अयान को भी अपने साथ मिला लिया था. अयान कुछ दिनों से शाकेब के साथ मिल कर तंत्रमंत्र का काम सीख रहा था. शाकेब ने उसे 20 हजार रुपए भी देने का वायदा किया.

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एकता की हत्या करने के बाद शाकेब ने अपने भाई, पिता और अयान के साथ मिल कर ईद पर दी जाने वाली बलि की पहले बलकटी से एकता की गरदन काट कर उसे धड़ से अलग किया. उस के बाद दोनों हाथों को कंधे से काट कर अलग किया.

दरअसल सिर और दोनों हाथ काटने की खास वजह थी. शाकेब को डर था कि अगर कल को किसी वजह से एकता का शव बरामद भी हो जाए तो उस की पहचान न हो सके. क्योंकि उस के हाथ पर उस का अपना नाम गुदा हुआ था और दूसरे पर उस ने अमन का नाम गुदवाया हुआ था. इसीलिए शाकेब ने उस के दोनों हाथ भी धड़ से अलग कर दिए थे.

एकता की हत्या के बाद उस के शरीर के चारों टुकड़ों को 4 अलगअलग बोरियों में भर कर उसी रात शाकेब अपने भाई व दोस्त के साथ मोटरसाइकिल पर लाद कर उन्हें ठिकाने लगाने के लिए ले गए.

सब से पहले लोइया गांव में ही ईश्वर पंडित के खेत में गड्ढा खोद कर एकता के धड़ वाले हिस्से को दफना दिया गया. शव जल्द से गल जाए, इस के लिए शाकेब ने शव के ऊपर 5 किलो नमक डाल दिया और ऊपर से मिट्टी डाल दी.

धड़ को ठिकाने लगाने के बाद शाकेब ने भाई व दोस्त के साथ मिल कर एकता के सिर व दोनों कटे हुए हाथों को बोरी समेत गांव के आसपास के कीचड़ भरे तालाबों के किनारे दफना दिया.

अगले दिन शाकेब के पूरे परिवार ने धूमधाम से ईद मनाई. उस दिन 5 जून, 2019 थी. ईद मनाने के कुछ दिन बाद ही शाकेब फिर से करनाल में आ कर अपने दोस्तों के साथ तंत्रमंत्र के काम में लग गया.

लेकिन इस दौरान कहीं न कहीं उस के मन में एक डर भी बना रहा. वह जानता था कि एकता ने अपने परिवार को उस के बारे में बता रखा है और यह भी बता दिया है कि उस ने अमन से शादी कर ली है. इसलिए उस ने एकता के मोबाइल का सिम निकाल कर उस के वाट्सऐप तथा फेसबुक को खुद ही अपडेट करने का काम शुरू कर दिया. ताकि उस के परिवार को लगे कि एकता ठीक है.

शाकेब अमन बन कर एकता के वाट्सऐप तथा फेसबुक की गैलरी में पड़ी प्रोफाइल फोटो भी चेंज करता रहता था, जिस से एकता के परिवार को लगता कि वह खुश है. कभीकभी एकता की मां उसे मैसेज करती थी, जिस का वह चैटिंग के जरिए तो एकता बन कर जवाब देता मगर जब वह उस से फोन पर बात करने के लिए कहती तो वह एकता बन कर कह देता कि सौरी मम्मी, मैं फोन पर बात नहीं करूंगी.

इधर कुछ दिन बाद 13 जून को कुत्तों ने ईश्वर पंडित के खेत में उस जगह को खोद दिया, जहां एकता की लाश को दबाया गया था. कुत्ता शव के एक हिस्से को मुंह में दबा कर जा रहा था तो गांव वालों पर ये भेद खुल गया और मामला पुलिस तक पहुंच गया.

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सर्विलांस टीम ने खोला केस

चूंकि पुलिस को एकता की लाश का केवल धड़ मिला था, इसलिए पुलिस के सामने सब से बडी चुनौती थी कि शव की शिनाख्त कैसे की जाए. इसलिए एसएसपी अजय साहनी ने अपनी सर्विलांस टीम को जांच के काम में लगा दिया. ये टीम एसएसपी के कैंप औफिस में उन्हीं की निगरानी में काम करती है और छोटी से छोटी जानकारी के बारे में एसएसपी को ही रिपोर्ट करती है.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 3

एकता ने अपने माता और मामा के घर से करीब 25 लाख के गहने और नकदी चुरा ली थी. वह लुधियाना के बजाय सीधे करनाल पहुंच गई.

एकता ने मातापिता और मामा के घर से चुराए गए नकद रुपए और गहने ले जा कर अमन के हाथों में सौंप दिए और बोली, ‘‘देखो अमन, मैं अपने घर से जेवर और रुपए चुरा कर ले तो आई हूं, लेकिन एक बात साफ समझ लो कि अब मैं अपने घर में नहीं जा सकती. मैं ने तुम पर भरोसा किया है, मेरे भरोसे का खून मत कर देना.’’

इतनी बड़ी रकम और लाखों के गहने देख कर अमन की खुशी की सीमा नहीं रही. उस ने महीनों की मोहब्बत के बाद आज पहली बार एकता को अपनी बांहों में भर लिया.

उस के माथे पर एक प्यारभरी जुंबिश दे कर बोला, ‘‘कैसी बात करती हो पगली, मेरी दुनिया भी तो तुम तक ही सीमित है. तुम फिक्र मत करो, हम 1-2 दिन में ही शादी कर लेंगे और तुम्हें परिवार की चिंता करने की जरूरत नहीं है. मेरा परिवार भी तो तुम्हारा ही परिवार है. शादी के बाद मैं तुम्हें अपने परिवार वालों के पास ले चलूंगा. देखना मेरा परिवार तुम्हें इतना प्यार देगा कि तुम दुनिया को भूल जाओगी.’’

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अमन की बातें सुन कर एकता की आंखें डबडबा आईं. एकता अपनी किस्मत पर इतराने लगी क्योंकि वह तो पंकज की चाहत में अमन से मिली थी, लेकिन उसे क्या पता था कि किस्मत उस के लिए पंकज से भी अच्छा जीवनसाथी चुन चुकी है.

इधर जब एकता अपने परिवार और मामा के घर से नकदी और गहने चोरी कर के भागी तो अगले दिन तक ही उस के मातापिता और मामा के घर में पता चल गया कि वह घर से चोरी कर के भागी है. मामा और मामी एकता के मातापिता के पास पहुंचे तो उन्हें सारी बात पता चली.

पूरा परिवार चिंता में डूब गया. क्या किया जाए इस पर विचार किया गया. एक बात तो साफ थी कि एकता ने अपने ही घर में चोरी करने का ये काम अमन नाम के अपने उस प्रेमी की मदद करने के लिए किया था, जिस से वह शादी करना चाहती थी.

बेटी नहीं मिली तो लिखाई थाने में गुमशुदगी

परिवार ने लुधियाना जा कर एकता की तलाश करने का फैसला किया. लेकिन यह क्या, जब परिवार के लोग लुधियाना पहुंचे तो उन्हें पता चला कि एकता एक महीना पहले ही उस मकान को छोड़ कर जा चुकी थी, जहां वह रहती थी. एकता कहां गई है, किसी को भी इस बात का पता नहीं था.

एकता के घर वाले समझ गए कि एकता पूरी तरह अमन नाम के लड़के के प्यार में पागल हो चुकी है. इसलिए अब एक ही चारा था कि एकता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी जाए.

घर वालों ने पुलिस को यह बात तो नहीं बताई कि उन की बेटी अपने ही घर से बड़ी रकम और गहने चुरा कर भागी है, लेकिन उन्होंने लुधियाना के मोतीनगर थाने में उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराते हुए पुलिस को यह जरूर बताया कि उन की बेटी किसी अमन नाम के लड़के से प्यार करती थी और शायद उसी के बहकावे में आ कर भाग गई है.

मोतीनगर पुलिस ने एकता की गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया और एक एएसआई को उस की तलाश तथा मुकदमे की जांच का काम सौंप दिया. पुलिस ने आसपास के सभी जिलों की पुलिस और नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो में एकता के फोटो और गुमशुदगी से जुड़ी सभी जानकारी भेज दी.

एकता जब अपने परिवार में चोरी कर के अमन के पास आई थी तब यह बात मई, 2019 की थी. दूसरी तरफ जब एकता ने करीब 25 लाख रुपए की नकदी और गहने अमन को ले जा कर दिए तो उस ने करनाल में तंत्रमंत्र का काम करने वाले अपने 5-6 दोस्तों की उपस्थिति में एकता से घर में ही एक पंडित को बुला कर हिंदू रीतिरिवाज से शादी कर ली और अगले ही दिन वह एकता को ले कर अपने गांव दौराला चला गया.

दौराला में अमन ने पहले से ही अपने कुछ परिचितों की मदद से फोन पर बातचीत कर के किराए के एक मकान की व्यवस्था भी कर ली थी. अमन और एकता के पास अपने पहनने के कपड़े तथा जरूरत का कुछ सामान था. बाकी की घरगृहस्थी का जरूरी सामान उन्होंने वहां जा कर खरीद लिया.

लेकिन सब से बड़ी बात यह थी कि एकता से शादी के बाद भी अमन ने उस के शरीर को छुआ तक नहीं था. एकता के पूछने पर वह हमेशा यही कहता कि कुछ दिन बाद वह अपने परिवार वालों से उसे मिलाने के लिए ले जाएगा तब परिवार वालों का आशीर्वाद लेने के बाद ही वह उस के साथ सुहागरात मनाएगा.

अपने परिवार और मातापिता के लिए ऐसे आदर्शवादी पति के मुंह से ये बातें सुन कर एकता का सिर गर्व से ऊंचा हो गया. उसे लगा कि उस ने अमन को अपना जीवनसाथी चुन कर कोई गलती नहीं की है.

इस दौरान एकता ने अपनी मां को 1-2 बार वाट्सऐप पर मैसेज कर के यह बात जरूर बता दी थी कि उस ने अमन से शादी कर ली है और वह बहुत खुश है. साथ ही उस ने यह भी कहा कि उसे ढूंढने की कोशिश न करें.

इस बीच करीब एक महीना गुजर गया. एकता को घर में अकेला छोड़ कर काम की तलाश में जाने की बात कर के अमन रोज कई घंटों के लिए कहीं चला जाता था. शाम को जब वह देर से आता तो पूछने पर एकता को यही बताता कि वह नया काम शुरू करने के लिए जगह की तलाश कर रहा है, जल्द ही उसे औफिस मिल जाएगा.

एकता से टालमटोल करता रहा अमन

जब एक महीना पूरा हो गया तो एकता ने थोड़ा सख्त लहजे में अमन से पूछना शुरू कर दिया कि वह जल्द ही उसे अपने परिवार से मिला देगा और उन का आशीर्वाद ले कर उसे पत्नी का दरजा देगा लेकिन एक महीना होने के बाद भी वह न तो उसे परिवार से मिला रहा था और न ही कोई नया काम शुरू किया. इस तरह तो सारा पैसा भी खत्म हो जाएगा.

एकता ने उस दिन थोड़ा सख्त लहजे में कहा कि उस ने अपने परिवार के साथ छल किया और उस पर भरोसा कर के बहुत बड़ी गलती की है. अमन को उस दिन लगा कि अब अगर उस ने एकता को जल्द ही पत्नी का दरजा नहीं दिया तो वह बगावत कर के उसे छोड़ कर चली जाएगी.

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2 दिन बाद ईद का त्यौहार था. इस से एक दिन पहले अमन दोपहर को अचानक बाहर से काम निबटा कर घर पहुंचा और एकता को बांहों में भर लिया, ‘‘लो जी मैडम, आज वह खुशी का दिन आ गया, जब तुम्हें अपनी ससुराल वालों से मिलना है. जल्दी से तैयार हो जाओ, हमें गांव चलना है घरवालों के पास.’’

एकता की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इस दिन का वह कितनी बेसब्री से इंतजार कर रही थी जब वह पूरी तरह अमन की हो जाएगी. एकता झटपट तैयार हो गई. अमन उसे एक आटोरिक्शा में बैठा कर अपने गांव लोइया आ गया. लेकिन यह क्या अमन तो उसे किसी मुसलिम परिवार में ले आया था.  घर में मौजूद लोगों के मुसलिम लिबास, रहनसहन और बोलचाल देख कर साफ समझ आ रहा था कि वह जिस घर में आई है, वह एक मुसलिम परिवार है.

प्रेमी की असलियत जान कर बिफर पड़ी एकता

एकता ने हैरतभरी निगाहों से अमन की तरफ देखा तो अमन बोला, ‘‘अरे देख क्या रही हो, यही मेरा परिवार है. ये मेरे अब्बू हैं, ये बड़े भाईजान और ये दोनों मेरी भाभीजान हैं.’’

‘‘लेकिन अमन तुम ने तो कभी नहीं बताया कि तुम मेरे धर्म के नहीं और तुम ने तो अपना नाम अमन बताया था.’’ एकता फटी आखों से अमन को देख कर बिफरते हुए बोली.

‘‘अरे..अरे मेरी प्यारी बीवी, इस में नाराज होने की क्या बात है. भई मेरा प्यार का नाम अमन ही है, इस में मैं ने झूठ कहां बोला. हां, वैसे घर वाले मुझे शाकेब कह कर बुलाते हैं. तुम ने तो अपना घरबार मेरे लिए ही छोड़ा है अब मेरा नाम शाकेब हो या अमन, मैं हिंदू हूं या मुसलमान क्या फर्क पडता है.’’

अमन जो वास्तव में शाकेब था, उस ने बड़ी ही धूर्तता के साथ एकता के कंधों को पकड़ कर कहा.

‘‘दूर हट जाओ मुझ से. खबरदार जो मुझे छूने की कोशिश की. तुम्हारा धर्म क्या है, तुम्हारा असली नाम क्या है, मेरे लिए यह बहुत मायने रखता है. तुम ने मेरे साथ छल किया है. इसलिए भूल जाओ कि अब मैं तुम्हारे पास रहूंगी. मुझे अभी अपने घर जाना है, अपने परिवार वालों के पास जाना है. मैं ने तुम्हारे लिए उन का जो दिल दुखाया है, उन से मिल कर मैं माफी मांगना चाहती हूं. तुम्हारी खातिर मैं ने अपने ही घर में चोरी की है. उन की मेहनत की कमाई वापस लौटा कर, मैं उन से माफी मांग कर अपने पाप को कम करना चाहती हैं.’’ एकता ने एक ही सांस में अपनी सारी भड़ास अमन उर्फ शाकेब पर निकाल दी.

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जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 2

एकता ने भी तांत्रिक की वशीकरण विद्या के कई किस्से सुन रखे थे, लिहाजा उस ने पंकज को अपने वश में करने के लिए किसी तांत्रिक से वशीकरण उपाय कराने का मन बनाया.

एक समाचार पत्र में छपे विज्ञापन के आधार पर एक दिन उस ने फोन पर अमन नाम के एक तांत्रिक से बात की. अमन ने एकता को भरोसा दिलाया कि वह सौ फीसदी ऐसा उपाय कर देगा कि उस का आशिक पूरी तरह उस पर लट्टू हो जाएगा.

प्रेमी को वश में करने के लिए गई एकता तांत्रिक के पास

2 दिन बाद ही एकता मोतीनगर स्थित तांत्रिक अमन के औफिस पहुंची. अमन तंत्रमंत्र का काम जरूर करता था लेकिन बातचीत में वह बेहद सलीकेदार था. पहनावे और शक्लसूरत से भी वह बेहद आकर्षक था. फीस तय होने के बाद एकता ने अमन को अपनी समस्या बताई.

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बातों ही बातों में अमन ने यह भी जान लिया कि एकता कांगड़ा में रहने वाले अपने परिवार से दूर लुधियाना में अकेली रहती है और अपने परिवार की इकलौती लड़की है.

अमन समझ गया कि एकता उस के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हो सकती है. क्योंकि उस के आगेपीछे रोकटोक करने वाला कोई नहीं था. लिहाजा अमन ने उस दिन के बाद और भी ज्यादा सलीके से रहना और बातचीत करना शुरू कर दिया. उस ने कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि धीरेधीरे एकता पंकज को भूल कर सिर्फ अमन के बारे में सोचने लगी. अमन और एकता के बीच कुछ ही दिनों में एक तांत्रिक और पीडि़त वाले संबंधों की जगह दोस्ती के संबंध कायम हो गए. दोनों के बीच अब घंटों तक वाट्सऐप चैटिंग, कालिंग और फोन पर बात होने लगी.

धीरेधीरे एकता को अमन से बात करतेकरते इस बात का भी आभास हो गया कि अमन कम पढ़ालिखा जरूर है लेकिन जिस काम को वो करता है उस में इतना पैसा है कि वह चाहे तो लाखों कमा सकता है. जब भी समय मिलता अमन एकता को कभी किसी रेस्टोरेंट में ले जाता तो कभी सिनेमा में मूवी दिखाता.

एकता के दिलोदिमाग से अब पंकज की मोहब्बत का जुनून लगभग पूरी तरह से उतर चुका था. अमन के साथ उस की दोस्ती धीरेधीरे दीवानगी की हद तक परवान चढ़ती जा रही थी. दोनों की दोस्ती को करीब डेढ़ महीने बीत चुका था कि इसी दौरान अमन को अपने पार्टनर तांत्रिक से पैसे के लेनदेन को ले कर झगड़ा हो गया.

दरअसल अमन दिलशाद नाम के जिस तांत्रिक के औफिस में काम करता था, उस के ऊपर धीरेधीरे अमन का ग्राहक पटा कर लाने का 3 लाख रुपए का कमीशन जमा हो चुका था. एक दिन हुआ यूं कि लेनदेन के इसी विवाद में अमन और दिलशाद के बीच हाथापाई हो गई.

दिलशाद ने अमन को अपने यहां से हटा दिया. इस के बाद अमन ने लुधियाना के किसी दूसरे तांत्रिक के साथ मिल कर काम शुरू कर दिया. लेकिन वहां भी एक महीने से ज्यादा अमन की नहीं पटी. क्योंकि दिलशाद की तरह वह तांत्रिक भी आसामियों से मिलने वाला सारा पैसा खुद ही हजम कर लेता था.

अब उस ने मन बना लिया कि वह अंजान लोगों के इस इलाके में काम ही नहीं करेगा. उस ने करनाल जाने की तैयारी कर ली. करनाल में उस के गांव के कई लड़के तंत्रमंत्र और टोनेटोटके का काम करते थे. उस ने सोचा क्यों न वह अपने दोस्तों के सहयोग से करनाल में अपना खुद का काम शुरू करे.

लेकिन इस काम के लिए तो पैसे की जरूरत थी. अचानक उसे एकता का खयाल आया. उस ने सोचा क्यों न एकता को झांसे में ले कर उस से मोटी रकम ऐंठी जाए.

करनाल छोड़ने से पहले अमन ने एकता से मुलाकात की और उसे पिछले दिनों में अपने साथ पार्टनर तांत्रिकों द्वारा किए गए धोखे के बारे में बताया. उस ने कहा कि वह करनाल जा रहा है, वहां जा कर वह कोई ठीया देख कर खुद का औफिस शुरू कर देगा. अपना काम होगा तो वह लाखों रुपए कमा लेगा. कामधंधा जमाने के बाद अमन ने एकता से शादी करने का भी वायदा कर लिया.

अमन करनाल में गांव के रहने वाले अपने दोस्तों के पास करनाल चला गया और वहां कुछ दिन में ही उस ने अपना एक दफ्तर खोल कर तंत्रमंत्र जादू टोने और वशीकरण का काम शुरू कर दिया. अमन ने किराए का एक कमरा भी ले लिया.

कमरा लेने के बाद अमन ने एक दिन एकता को फोन किया. इधर अमन के करनाल जाने के बाद जैसे एकता पर मुसीबतों का दौर शुरू हो गया था. अचानक उस की नौकरी छूट गई. वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे. ऐसे में उसे अमन की बेहद याद सता रही थी.

अचानक उस दिन जब अमन का फोन आया तो उसे लगा जैसे डूबते को किनारा मिल गया हो. बातचीत में एकता ने उसे बता दिया कि उस की नौकरी चली गई है और वह खुद को अकेला महसूस कर रही है.

अमन ने कहा, ‘‘अब तुम लुधियाना छोड़ो, क्योंकि यहां मैं ने अपना औफिस खोल लिया है. सामान ले कर मेरे पास चली आओ. यहीं पर तुम्हारी नौकरी का भी इंतजाम कर दूंगा. इस के बाद हम दोनों यहीं पर अपनी गृहस्थी बसाएंगें.’’

अमन की बातें सुन कर एकता भविष्य के सुनहरे ख्वाब संजोने लगी. अमन ने उसे अपना पता भेज दिया और अगले कुछ दिन बाद ही एकता लुधियाना से अपना बोरियाबिस्तर समेट कर करनाल अमन के पास पहुंच गई.

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1-2 दिन साथ रहने के बाद अमन ने एकता से कहा, ‘‘देखो एकता, अगर हमें अपना भविष्य सुनहरा बनाना है और अपने काम से मोटा पैसा कमाना है तो इस के लिए हमें कुछ मोटी रकम खर्च करनी होगी ताकि हम अपने काम को बड़े स्तर से कर सकें. इसलिए अगर तुम अपने परिवार से कुछ पैसा मांग कर मेरी मदद कर सको तो हमारी आगे की जिंदगी बहुत हसीन हो जाएगी.’’

प्रेमी की मदद करने के लिए एकता पहुंची अपने घर

एकता अमन के प्यार में इस कदर दीवानी हो चुकी थी कि उस पर आंख मूंद कर विश्वास करने लगी थी. कुछ महीने पहले जो एकता अमन के पास किसी और के वशीकरण के लिए आई थी वह अब खुद अमन के वशीकरण का शिकार हो चुकी थी.

अमन की बातों का एकता पर ऐसा असर हुआ कि वह पैसे लेने के लिए अपने परिवार के पास कांगड़ा चली गई.

कांगड़ा में अपने घर पहुंच कर उस ने अपनी मां बबीता को यह नहीं बताया कि वह लुधियाना छोड़ कर करनाल चली गई है. उस ने यह बताया कि अमन नाम के एक लड़के से वह प्यार करती है.

‘‘कौन है, कहां का रहने वाला है और किस जाति का है?’’ मां ने पूछा

‘‘मां ये तो पता है कि वो मेरठ का रहने वाला है, लेकिन जाति का नहीं पता वैसे जितना मैं ने उसे जाना है, अच्छी जाति का ही होगा.’’

एकता ने जिस भोलेपन से जवाब दिया उसे देखसुन कर मां बबीता ने अपना सिर पीट लिया, ‘‘तेरा दिमाग तो ठीक है लड़की, जिस लडके से शादी करना चाहती है, यह तक नहीं पता कि वह किस जाति का है, गोत्र क्या है. अरे वह कुछ कामधाम भी करता है या उसे भी हमारी छाती पर ही ला कर पालेगी.’’ बबीता का पारा चढ़ने लगा.

‘‘देखो मां, वह अच्छाखासा पैसा कमाता है. लोगों की समस्याएं सुलझाता है. कंसलटेंसी का काम करता है.’’ एकता ने मां से अमन के असल कामधंधे की बात छिपा कर इस तरीके से उस के काम का परिचय दिया ताकि मां को अच्छा लगे.

‘‘देख लड़की तेरे पापा ने बड़ी मेहनत से एकएक पाई जोड़ कर तेरी शादी के लिए कुछ गहने बनवाए हैं और पैसा जोड़ा है. अब तू पढ़लिख चुकी है…बहुत हो चुका, छोड़ ये नौकरी और घर आ जा. कोई अच्छा सा लड़का देख कर तेरे हाथ पीले कर देंगे.’’ मां ने समझाया.

मां का लहजा देख कर एकता भी समझ गई कि वह अमन से उस की शादी कतई नहीं करेंगी और न ही उस के लिए मातापिता से उसे कोई आर्थिक मदद मिलेगी. लिहाजा जल्दी ही एकता यह कह कर अपने घर से लुधियाना के लिए चली गई कि वह अंबाला में मामाजी के घर होते हुए लुधियाना चली जाएगी और कुछ दिन में नौकरी से सारा हिसाबकिताब कर के वापस यहां आ जाएगी.

लेकिन इस दौरान एकता ने अपने घर में मां की अलमारी में रखे करीब 3 लाख रुपए की नकदी और 12 लाख रुपए के गहने चुरा कर अपने बैग में रख लिए थे. क्योंकि वह मानती थी कि इन पैसों और गहनों पर तो उसी का अधिकार है. अब वह इन्हें जिस तरह चाहे अपने ऊपर खर्च करे.

अपने ही घर से गहने और रुपया चुरा कर एकता अंबाला में अपने मामा के घर पहुंची और वहां एक रात रुकी. मामा अच्छे संपन्न व्यापारी थे. घर में रुपएपैसे और गहनों की कमी नहीं थी. उसी रात एकता ने अमन के प्यार की दीवानगी में अपने मामा के घर से करीब 2 लाख रुपए नकद और 7 लाख रुपए के गहने चुरा कर अपने बैग में रख लिए.

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अगली सुबह जब तक किसी को कुछ पता चलता तब तक वह मामा के घर से लुधियाना जाने की बात कह कर निकल गई.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

फरेबी अमन ने उजाड़ा चमन : भाग 1

दिल्ली से करीब 50 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में एक कस्बा है दौराला. यहीं पर एक गांव है लोइया, जहां 13 जून 2019 को इसी गांव के रहने वाले शबी अहमद के खेत से एक कुत्ता किसी मानव अंग को ले कर भाग रहा था. कुत्ते को मानव अंग ले कर भागते हुए गांव में रहने वाले ईश्वर पंडित ने देख लिया था.

उसे शक हुआ कि हो ना हो वहां किसी इंसान को मार कर दबाया गया है. ईश्वर ने पहले गांव के कुछ लोगों को ये बात बताई. सब उस जगह पहुंचे, जहां से कुत्ता मानव अंग ले कर भागा था. तलाश करने पर खेत में एक जगह वो गड्ढा मिल गया, जहां एक लाश दबी थी और कुत्ते के खोदने से लाश का कुछ हिस्सा बाहर झांक रहा था. लिहाजा ईश्वर पंडित ने गांव वालों के साथ इस की सूचना दौराला पुलिस को दे दी.

दौराला थाने के एसएचओ इंसपेक्टर जनक सिंह चौहान तत्काल अपनी टीम के साथ लोइया गांव पहुंच गए. पुलिस ने आ कर शबी अहमद के खेत की खुदाई करवाई तो वहां वाकई एक लाश मिली. लाश किसी महिला की थी, जिस का सिर और दोनों हाथ गायब थे.

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शरीर पर अंतर्वस्त्र को छोड़ कर कोई भी कपड़ा नहीं था. देखने से ही लग रहा था कि शायद उस के साथ दुष्कर्म किया गया है जिस के बाद बेदर्दी से उस की हत्या कर के शव को वहां दबा दिया गया है.

घटना दिल दहलाने और किसी को भी झकझोर देने वाली थी. इसलिए एसएचओ ने तत्काल उच्चाधिकारियों को सूचना दे दी. सूचना मिलते ही सीओ जितेंद्र सिंह सरगम, एसपी (सिटी) अखिलेश नारायण सिंह और मेरठ के एसएसपी अजय कुमार साहनी भी क्राइम टीम और डौग स्क्वायड को ले कर मौके पर पहुंच गए.

आमतौर पर पुलिस के लिए हत्या के मामले सामने आने की घटना होना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं थी. लेकिन जिस तरह से इस महिला की हत्या की गई थी, वह जरूर हैरत में डालने वाली बात थी. क्योंकि उस का सिर तथा दोनों हाथ काटने के पीछे का रहस्य किसी की समझ में नहीं आ रहा था.

सिर काटने के पीछे का मकसद तो समझ में आता था कि क्योंकि चेहरा देखने से उस की पहचान हो सकती थी इसलिए कातिल ने उस का सिर काटा होगा. लेकिन उस के दोनों हाथ कंधे से काट दिए गए थे, ये सब की समझ से परे था.

शव बुरी तरह से सड़गल चुका था. इस का मतलब था कि हत्या कर के शव कई दिन पहले दबाया गया होगा.

शव की हालत देखने से एक दूसरी बात भी साफ हो रही थी कि लाश के सिर और हाथ काटने वाला अपराधी बेहद क्रूर होगा तथा उसे गांव में लड़की की पहचान का डर रहा होगा.

इस के बाद क्राइम टीम ने पहले डौग स्क्वायड की मदद से शव के दूसरे हिस्सों और कातिल का सुराग लगाने का प्रयास किया. लेकिन काफी समय बीत जाने के कारण शायद कातिल की गंध और शव के दूसरे हिस्सों की गंध उड़ चुकी होगी . इसलिए डिटेक्टिव कुत्तों से कोई मदद नहीं मिल सकी.

इस के बाद पुलिस ने जेसीबी मशीन और ट्रैक्टर की मदद से पूरे खेत की खुदाई करवाई लेकिन खेत में शरीर का कोई दूसरा हिस्सा बरामद नहीं हो सका. इस दौरान पुलिस की एक टीम ने लोइया गांव के लोगों को बुला कर शव दिखाया और यह जानने की कोशिश की कि कहीं इस गांव की किसी लड़की का तो ये शव नहीं है.

लेकिन पता चला कि गांव से कोई महिला या लड़की गायब नहीं थी. हालांकि उस की पहचान बिना सिर के कारण कोई नहीं कर पा रहा था. एसएसपी अजय साहनी के निर्देश पर उसी दिन शव का पंचनामा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और थाना दौराला में अपराध संख्या भादंसं की धारा 302 पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया.

सीओ जितेंद्र सिंह सरगम ने एसएचओ जनक सिंह चौहान की निगरानी में इस केस की जांच का जिम्मा एसआई एम.पी. सिंह को सौंप दिया और उन के सहयोग के लिए एसआई राजकुमार तथा कुछ पुलिसकर्मियों को नियुक्त कर दिया.

शव का पोस्टमार्टम होने के बाद जांच अधिकारी ने 3 दिन तक अज्ञात महिला की लाश को अस्पताल में सुरक्षित रखवाया लेकिन आसपास के इलाके में मुनादी और समाचार पत्रों में उस लाश की जानकारी छपवाने के बाद भी जब कोई उस की पहचान के लिए नहीं आया तो पुलिस ने लावारिस के तौर पर शव का अंतिम संस्कार कर दिया.

लाश के ब्लड सैंपल और टिश्यू सैंपल सुरक्षित रख लिए गए. दौराला थाने की पुलिस अपने तरीके से इस हत्याकांड की जांच को सुलझाने के काम में लगी थी. लेकिन इस के अलावा एसएसपी अजय कुमार साहनी ने सर्विलांस टीम के इंचार्ज हैड कांस्टेबल मनोज दीक्षित को उन की टीम के साथ इस हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने के काम पर लगा दिया.

सर्विलांस टीम ने जांच तो शुरू कर दी, मगर पुलिस को तत्काल ऐसे साक्ष्य नहीं मिले, जिस से पुलिस मृतका की पहचान कर पाती या पुलिस के हाथ कातिल की गरदन तक पहुंचते.

वक्त धीरेधीरे गुजरता रहा और लोइया गांव में मिले अज्ञात महिला के शव की फाइल पर धूल की परतें जमती रहीं. कहते हैं कातिल कितना भी चालाक हो, लेकिन एक दिन पुलिस के हाथ उस की गरदन तक पहुंच ही जाते हैं.

2 जून, 2020 को मेरठ के एसएसपी अजय साहनी के कौन्फ्रैंस कक्ष में पत्रकारों की भीड़ जमा थी. कोरोना की महामारी का संकट पूरे जोरों पर था और लौकडाउन के कारण पूरा देश अपने घरों के अंदर था. लेकिन उस दिन एसएसपी ने एक साल पहले लोइया गांव में मिली अज्ञात लड़की की हत्या के राज से परदा हटा दिया.

लोइया गांव के खेत में मिली वह लाश एकता जसवाल (20) की थी और उस की हत्या लोइया गांव में रहने वाले शाकेब ने अपने भाई मुशर्रत, अपनी पत्नी इस्मत, पिता मुस्तकीम, एक अन्य भाई नावेद की पत्नी रेशमा और गांव के रहने वाले दोस्त अयान के साथ मिल कर की थी.

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एकता की हत्या करने वाले सभी 6 आरोपियों को सर्विलांस टीम के मुखिया मनोज दीक्षित ने अपनी टीम के कांस्टेबल शाहनवाज राणा, कांस्टेबल बंटी सिंह, महेश कुमार और सौरभ सिंह ने गहन जांच के बाद गिरफ्तार किया था.

मांबाप की एकलौती बेटी थी एकता

आरोपियों से पूछताछ के बाद जब एकता की हत्या का पूरा सच सामने आया तो लव जेहाद की एक ऐसी कहानी से परदा उठा, जिस से पता चला कि बिना विचार किए अंजान लड़कों के प्रेम जाल में फंसने वाली लड़कियां किस तरह लव जेहाद का शिकार हो कर अपनी जिंदगी को दांव पर लगा देती हैं.

एकता जसवाल मूलरूप से हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा जिले की तहसील डेहरा के गांव चिनौर में रहने वाले कर्मवीर जसवाल और बबीता जसवाल की एकलौती बेटी थी. एकता के पिता कांगड़ा की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में ड्राइवर थे, जबकि मां घरेलू महिला.

मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी एकता के सपने पढ़लिख कर बड़ी नौकरी हासिल करने के थे. घर में कोई कमी नहीं थी, इसलिए मातापिता ने एकलौती बेटी की ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए उसे पढ़नेलिखने की पूरी आजादी दी, मनचाही जिंदगी जीने का मौका दिया.

कांगड़ा में अच्छे स्कूल नहीं थे, न ही ऊंची पढ़ाई करने का माहौल, इसलिए इंटरमीडिएट करने के बाद एकता पढ़ाई करने के लिए लुधियाना आ गई और बीकौम की पढ़ाई करने के लिए एक अच्छे कालेज में दाखिला ले लिया. पढ़ाई करने के साथ एकता अपने खर्चे चलाने के लिए पार्टटाइम जौब भी करने लगी थी.

धीरेधीरे उस ने बीकौम की पढ़ाई पूरी कर ली. एक साल पहले वह लुधियाना की एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में काम करती थी और लुधियाना अंकुजा आनंद नगर, खब्बेवार गली नंबर 1 में बी-34 नंबर मकान में किराए का कमरा ले कर रहती थी.

यहीं पर उस की जिंदगी में पंकज सिंह नाम का एक नौजवान आया. पंकज भी एक दूसरी इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में नौकरी करता था. जल्द ही पंकज तथा एकता की दोस्ती प्यार में बदल गई.

पंकज संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार का युवक था. पंकज और एकता के बीच कुछ ही दिनों में इतनी प्रगाढ़ता हो गई कि एकता उस के साथ जिंदगी गुजारने के सपने देखने लगी. लेकिन पंकज एक ऐसा मनचला भंवरा था, इसलिए दूसरी लड़की से संपर्क में आने के बाद उस ने एकता से दूरी बना ली.

एकता की समझ में नहीं आ रहा था कि उस में आखिर ऐसी कौन सी कमी है जो पंकज उसे नजरअंदाज करने लगा है. पंकज को उस ने कई बार मनाने और जानने की कोशिश की लेकिन पंकज ने हर बार उसे झिड़क दिया. एकता पर पंकज को पाने का जुनून सवार था. वह किसी भी तरह पंकज को हासिल कर के अपनी लाइफ सेटल करना चाहती थी.

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पंजाब और हरियाणा ऐसी जगह है, जहां लोग टोनेटोटके और झाड़फूंक करने वाले तथाकथित तांत्रिकों पर जरूरत से ज्यादा विश्वास करते हैं.

जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

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