सलमान ने सोचा न था

सलमान की शादी को 10 साल हो गए थे. वह अपने परिवार के साथ मुंबई में जिंदगी गुजार रहा था. उस के इस परिवार में बीवी रेशमा और 4 बच्चे बड़ी बेटी आयशा 9 साल की, दूसरी बेटी

7 साल की, बेटा अयान 2 साल का और सब से छोटी बेटी, जो महज सालभर की थी. इस परिवार के साथ सलमान की सास भी पिछले 3 साल से रह रही थीं. जिंदगी अच्छी गुजर रही थी. काम भी अच्छा चल रहा था. घर में किसी चीज की कोई कमी न थी.

लौकडाउन के दौरान सलमान की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, जिस से उस की जिंदगी पत?ाड़ पेड़ के समान बिखर कर रह गई.

कारोबार खत्म हो चुका था. बीवी रेशमा ने अचानक नईनई मांगें शुरू कर दीं. पहला लौकडाउन खुल चुका था. कारोबार सही नहीं चल पा रहा था. उधर रेशमा जिम जाने लगी. जिम जाने में सलमान को कोई एतराज नहीं था, लेकिन वह जिम से 5-6 घंटे में वापस आती. न टाइम पर खाना, न बच्चों की कोई परवाह.

घर में ?ागड़ा बढ़ने लगा. सलमान ने अपनी सास से भी कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. बच्चों को टाइम पर न खाना मिल रहा है और न ही उन की औनलाइन ठीक से पढ़ाई हो पा रही है. मेरा भी काम अभीअभी शुरू हुआ है. मैं भी बच्चों को टाइम नहीं दे पा रहा हूं.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम मेरी बेटी के फिट होने से जल रहे हो. उसे अभी अपनी फिटनैस का खयाल रखना है. अभी उस की उम्र ही क्या है.’’

मांबेटी ने सलमान की एक न सुनी. सलमान चुप हो कर रह गया.

जिंदगी यों ही गुजर रही थी. फिर अचानक एक दिन सलमान की जिंदगी में नया भूचाल आ गया. रेशमा ने सलमान के सामने सारी प्रोपर्टी अपने नाम करने की शर्त रख दी. सलमान ने ऐसा करने से मना कर दिया, तो रेशमा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. उस ने सलमान से बात करना छोड़ दिया. उसे वह अब अपने पास फटकने भी नहीं देती.

इस के चलते सलमान परेशान रहने लगा. उस ने अपनी सास से कहा, ‘‘रेशमा को सम?ाओ. छोटेछोटे बच्चे हैं. इन की जिंदगी पर क्या असर पड़ेगा.’’

इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘तुम उस के नाम प्रोपर्टी कर दो. रेशमा के अब्बा ने मेरे नाम कुछ नहीं किया, तो आज मैं तुम्हारे पास पड़ी हूं.’’

सलमान ने कहा, ‘‘वे तुम्हें बुलाते हैं, तुम क्यों नहीं जातीं?’’

उस पर सास बोलीं, ‘‘अब उन के बस की बात ही क्या है. सब तो उन्होंने बेच दिया.’’

इस पर सलमान बोला, ‘‘मैं तो कमा रहा हूं. मैं ने तो अब तक कुछ बेचा नहीं, उलटे खरीदा ही है. मेरे अब्बा भी अभी जिंदा हैं. मैं उन की प्रोपर्टी इस के नाम कैसे कर सकता हूं. जो मेरे नाम है, मैं उस की वसीयत रेशमा के नाम कर देता हूं.’’

सास बोलीं, ‘‘ठीक है.’’

कुछ ही घंटों में उन्होंने एक वकील को घर पर बुला लिया. वकील से बात करने के बाद सलमान की बीवी रेशमा और सास बोलीं कि वसीयत नहीं, गिफ्ट डीड बनाओ.

इस पर सलमान बोला, ‘‘गिफ्ट डीड बनने से तो मेरा कोई हक नहीं रहेगा.

यह गलत है. मैं केवल वसीयत कर सकता हूं.’’

इस पर मांबेटी दोनों भड़क गईं और सलमान को बुराभला कहने लगीं.

सलमान ने उन दोनों को बच्चों का वास्ता दिया. इस पर सलमान की सास बोलीं, ‘‘ये बच्चे घर से लाई थी क्या…? तेरे बच्चे हैं, तू संभाल.’’

सलमान उन की यह बात सुन कर हक्काबक्का रह गया. वक्त इसी तरह गुजर रहा था कि मांबेटी ने घर से पैसे और जेवर उठा लिए और चंपत हो गईं.

मिस्टर बेचारा : कैसा था उस लड़की का खुमार?

दरवाजा खुला. जिस ने दरवाजा खोला, उसे देख कर चंद्रम हैरान रह गया. वह अपने आने की वजह भूल गया. वह उसे ही देखता रह गया.

वह नींद में उठ कर आई थी. आंखों में नींद की खुमारी थी. उस के ब्लाउज से उभार दिख रहे थे. साड़ी का पल्लू नीचे गिरा जा रहा था. उस का पल्लू हाथ में था. साड़ी फिसल गई. इस से उस की नाभि दिखने लगी. उस की पतली कमर मानो रस से भरी थी.

थोड़ी देर में चंद्रम संभल गया, मगर आंखों के सामने खुली पड़ी खूबसूरती को देखे बिना कैसे छोड़ेगा? उस की उम्र 25 साल से ऊपर थी. वह कुंआरा था. उस के दिल में गुदगुदी सी पैदा हुई.

वह साड़ी का पल्लू कंधे पर डालते हुए बोली, ‘‘आइए, आप अंदर आइए.’’

इतना कह कर वह पलट कर आगे बढ़ी. पीछे से भी वह वाकई खूबसूरत थी. पीठ पूरी नंगी थी.

उस की चाल में मादकता थी, जिस ने चंद्रम को और लुभा दिया था. उस औरत को देखने में खोया चंद्रम बहुत मुश्किल से आ कर सोफे पर बैठ गया. उस का गला सूखा जा रहा था.

उस ने बहुत कोशिश के बाद कहा, ‘‘मैडम, यह ब्रीफकेस सेठजी ने आप को देने को कहा है.’’

चंदम ने ब्रीफकेस आगे बढ़ाया.

‘‘आप इसे मेज पर रख दीजिए. हां, आप तेज धूप में आए हैं. थोड़ा ठंडा हो जाइएगा,’’ कहते हुए वह साथ वाले कमरे में गई और कुछ देर बाद पानी की बोतल, 2 कोल्ड ड्रिंक ले आई और चंद्रम के सामने वाले सोफे पर बैठ गई.

चंद्रम पानी की बोतल उठा कर सारा पानी गटागट पी गया. वह औरत कोल्ड ड्रिंक की बोतल खोलने के लिए मेज के नीचे रखे ओपनर को लेने के लिए झुकी, तो फिर उस का पल्लू गिर गया और उभार दिख गए. चंद्रम की नजर वहीं अटक गई.

उस औरत ने ओपनर से कोल्ड ड्रिंक खोलीं. उन में स्ट्रा डाल कर चंद्रम की ओर एक कोल्ड ड्रिंक बढ़ाई.

चंद्रम ने बोतल पकड़ी. उस की उंगलियां उस औरत की नाजुक उंगलियों से छू गईं. चंद्रम को जैसे करंट सा लगा.

उस औरत के जादू और मादकता ने चंद्रम को घायल कर दिया था. वह खुद को काबू में न रख सका और उस औरत यानी अपनी सेठानी से लिपट गया. इस के बाद चंद्रम का सेठ उसे रोजाना दोपहर को अपने घर ब्रीफकेस दे कर भेजता था. चंद्रम मालकिन को ब्रीफकेस सौंपता और उस के साथ खुशीखुशी हमबिस्तरी करता. बाद में कुछ खापी कर दुकान पर लौट आता. इस तरह 4 महीने बीत गए.

एक दोपहर को चंद्रम ब्रीफकेस ले कर सेठ के घर आया और कालबेल बजाई, पर घर का दरवाजा नहीं खुला. वह घंटी बजाता रहा. 10 मिनट के बाद दरवाजा खुला.

दरवाजे पर उस की सेठानी खड़ी थी, पर एक आम घरेलू औरत जैसी. आंचल ओढ़ कर, घूंघट डाल कर.

उस ने चंद्रम को बाहर ही खड़े रखा और कहा, ‘‘चंद्रम, मुझे माफ करो. हमारे संबंध बनाने की बात सेठजी तक पहुंच गई है. वे रंगे हाथ पकड़ेंगे, तो हम दोनों की जिंदगी बरबाद हो जाएगी.

‘‘हमारी भलाई अब इसी में है कि हम चुपचाप अलग हो जाएं. आज के बाद तुम कभी इस घर में मत आना,’’ इतना कह कर सेठानी ने दरवाजा बंद कर दिया.

चंद्रम मानो किसी खाई में गिर गया. वह तो यह सपना देख रहा था कि करोड़पति सेठ की तीसरी पत्नी बांहों में होगी. बूढ़े सेठ की मौत के बाद वह इस घर का मालिक बनेगा. मगर उस का सपना ताश के पत्तों के महल की तरह तेज हवा से उड़ गया. ऊपर से यह डर सता रहा था कि कहीं सेठ उसे नौकरी से तो नहीं निकाल देगा. वह दुकान की ओर चल दिया.

सेठानी ने मन ही मन कहा, ‘चंद्रम, तुम्हें नहीं मालूम कि सेठ मुझे डांस बार से लाया था. उस ने मुझ से शादी की और इस घर की मालकिन बनाया. पर हमारे कोई औलाद नहीं थी. मैं सेठ को उपहार के तौर पर बच्चा देना चाहती थी. सेठ ने भी मेरी बात मानी. हम ने तुम्हारे साथ नाटक किया. हो सके, तो मुझे माफ कर देना.’ इस के बाद सेठानी ने एक हाथ अपने बढ़ते पेट पर फेरा. दूसरे हाथ से वह अपने आंसू पोंछ रही थी.

लोकतंत्र: कीचड़ में भाजपा और चंडीगढ़ का संदेश

कहा जाता है कि कुछ लोग होते हैं जो 100 जूते खाकर भी हंसते हैं. भारतीय राजनीति में भी अब धीरे-धीरे कुछ यही स्थितियां बनती चली जा रही हैं जहां राजनीति में शुचिता और जनता का भय खत्म होता चला जा रहा है. यही कारण है कि देश भर ने देखा कि चंडीगढ़ में महापौर चुनाव में किस तरह नग्न खेल हुआ. अच्छा होता कि भारतीय जनता पार्टी जो देशभक्ति की बात करती है, सिद्धांतों की बात करती थी स्वयं आगे आकर के चंडीगढ़ में हुए महापौर चुनाव पर पहले प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अपने मेयर, चुने गए व्यक्ति को हटाकर संदेश देती की निष्पक्ष चुनाव नहीं हुए हैं. और पापा यह सब पसंद नहीं करती है. मगर हुआ यह की मामला उच्चतम न्यायालय पहुंच गया देश भर में धांधली का वीडियो प्रसारित हो गया मगर भाजपा के छोटे से बड़े नेता तक के मुंह से एक शब्द नहीं निकला.

उल्टा हुआ यह की आप पार्टी के तीन पार्षदों को तोड़ने का प्रयास जारी हो गया. अब वह समय आ गया है जब चुनाव के बाद किसी भी तरह की दल बदल को गैरकानूनी घोषित कर दिया जाए चंडीगढ़ में महापौर चुनाव का यही संदेश है कि देश की राजनीति में आज स्वच्छता और ईमानदारी भाईचारे की स्थापना की जाए. यह नहीं होना चाहिए कि अगर कोई एक दल सत्ता में है तो दूसरा दल, रुपए पैसों और पदों की लालच देकर विधायकों, पार्षदों या सांसदों को तोड़े.

यही कारण है कि आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चंडीगढ़ महापौर चुनाव पर आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर तीखा हमला बोला है. केजरीवाल ने कहा- ” न्यायालय के फैसले के बाद भाजपा पूरे देश में बेनकाब हो गई है. यह भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी (इंडिया) गठबंधन की पहली और बहुत बड़ी जीत है. मैं इसके लिए शीर्ष न्यायालय का बहुत-बहुत शुक्रिया करता हूं. ”

इससे पहले सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट साझा कर केजरीवाल ने कहा -” कुलदीप कुमार एक गरीब घर का लड़का है. इंडिया गठबंधन की ओर से चंड़ीगढ़ का महापौर बनने पर बहुत-बहुत बधाई. ये केवल भारतीय जनतंत्र और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की वजह से संभव हुआ है. हमें किसी भी हालत में अपने जनतंत्र और स्वायत्त संस्थाओं की निष्पक्षता को बचाकर रखना है. सर्वोच्च न्यायालय का फैसला एक ऐसे समय में आया है जब देश में हालात बहुत कठिन है, तानाशाही चल रही है और स्वायत्त संस्थानों को कुचला जा रहा है.ऐसे में जनतंत्र को बचाने के लिए यह फैसला काफी मायने रखता है.”

राजनीति का चंडीगढ़ बॉर्डर 

भारतीय राजनीति में पंजाब के चंडीगढ़ महापौर चुनाव , उसके परिणाम और उच्चतम न्यायालय में मामले के पहुंचने के बाद कुलदीप कुमार के महापौर पर मोहर लगाया जाना,अपने आप में एक ऐसा संदेश है जिसे हर राजनीतिक पार्टी को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और देश की जनता को याद रखना चाहिए कि आगे कभी कोई ऐसा मामला न होने पाए.

संभव तो यही कारण है कि आप पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष केजरीवाल ने कहा -” चंड़ीगढ़ में बीस वोट इंडिया गठबंधन के थे, सोलह वोट भाजपा के थे. सबने यह देखा है कि किस तरह से गठबंधन के वोट गलत तरीके से अवैध घोषित कर दिए गए और हमारे उम्मीदवार कुलदीप कुमार को हारा हुआ और भाजपा उम्मीदवार को जीता हुआ घोषित कर दिया गया. लेकिन न्यायालय ने तीव्र गति से मामले की सुनवाई में ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ कर दिया.यह भारतीय राष्ट्रीय विकासात्मक समावेशी (इंडिया) गठबंधन की पहली और बहुत बड़ी जीत है.”

सच तो यह है कि सारे देश और दुनिया ने देखा है कि उच्चतम न्यायालय ने लोकतंत्र को निरंकुश भाजपा के जबड़े से बचाया है भाजपा चुनावी हेर फेर का सहारा लिया . यह भारतीय जनता पार्टी के नेताओं की हट धर्मिता है कि मामला उच्चतम न्यायालय में होने के बावजूद आप पार्टी के तीन पार्षदों को तोड़ने का प्रयास चलता रहा. अब जब उच्चतम न्यायालय से फैसला आ गया है तब भी सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी मौन रहेगी या फिर आप या कांग्रेस पार्टी के पार्षदों को तोड़कर महापौर बनने का प्रयास करवाएगी.

गौरतलब है कि पीठ ने अदालत के समक्ष गलत बयान देने के लिए चंडीगढ़ महापौर चुनाव के पीठासीन अधिकारी अनिल मसीह के खिलाफ अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 340 के तहत आपराधिक कार्यवाही भी कर दी है. अदालत ने सुनवाई के दौरान मतपत्र और रिकार्ड पेश करने का आदेश दिया था. इन्हें पांच फरवरी को पिछले आदेश के अनुसार पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपने कब्जे में ले लिया था. उच्चतम न्यायालय द्वारा चंडीगढ़ का महापौर घोषित किए जाने के बाद आम आदमी पार्टी (आप) के पार्षद कुलदीप कुमार ने कहा -” यह लोकतंत्र और शहर के निवासियों की जीत है.” कुमार ने न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा अगर चंडीगढ़ महापौर चुनाव में भाजपा ने धांधली नहीं की होती तो यह पहले ही महापौर बन गए होते कुमार ने कहा, ‘यह लोकतंत्र की जीत है, चंडीगढ़ निवासियों की जीत है और सच्चाई की जीत है.”न्यायालय के फैसले के बाद महापौर बने कुमार ने कहा-“‘आज, मेरी आंखों में खुशी के आंसू हैं.”

जानिए आखिर महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं

महिलाएं किसी पुरुष को आखिर क्‍यों पसंद करती हैं? और ऐसी कौन सी खास बात है जिससे प्रभावित होकर वह किसी पुरुष के साथ सेक्‍सुअल संबंध बनाने के लिए अपने आप को राजी करती हैं? इस तथ्‍य पर रिसर्च करने के बाद टैक्‍सास विवि के मनोविज्ञान विभाग के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस ने एक किताब लिखी है. इस किताब का नाम है वॉय वुमन हैव सेक्‍स. किताब सेक्‍स संबंधों को लेकर महिलाएं क्‍या सोचती हैं? इस सवाल पर कई रोचक खुलासे करती है, किताब में इस बात के 200 कारण बताए गए है, जिनके चलते महिलाएं किसी पुरुष के साथ सेक्‍सुअल संबंध बनाती हैं या उसे पसंद करती हैं.

टेक्सस यूनिवर्सिटी में साइकॉलजी के प्रोफेसर्स सिंडी मेस्टन और डेविड बस की लिखी किताब – वाय वुमेन हेव सेक्स ( महिलाएं सेक्स क्यों करती हैं ) में करीब 200 कारणों को बताया गया है.

रिसर्च के दौरान देखा गया कि ज्यादातर पुरुषों को महिलाएं सेक्सुअली अट्रैक्टिव लगती हैं , जबिक महिलाओं को पुरुषों में ऐसी कोई बात नज़र नहीं आती. रिसर्च के दौरान 1000 महिलाओं का इंटरव्यू किया , जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ सोने के अपने कारण बताए.

एक महिला ने बताया – वह सेक्स इसलिए करती है ताकि बोरियत दूर कर सके क्योंकि सेक्स करना लड़ने से कहीं आसान है. जबकि कुछ दूसरी महिलाओं के लिए यह माइग्रेन और सिरदर्द दूर भगाने का उपचार है.

रिसर्च में कुछ महिलाओं ने ऐसी बातें भी कहीं जिन्हें सुनकर हैरानी हो सकती है. कुछ महिलाएं महज दया की वजह से पुरुषों के साथ सोती हैं जबकि कुछ महिलाएं अपने स्वार्थ के लिए सेक्स का इस्तेमाल करती हैं जैसे रुपये – पैसों के लिए और दूसरी कीमतों चीजों को हासिल करने के लिए.

कुछ ने कहा – मैंने किसी पुरुष के साथ इसलिए संबंध बनाए क्योंकि उसने मेरे लिए एक शानदार डिनर का आयोजन किया या उसने मुझ पर काफी रुपये खर्च किए.

यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों पर किए गए इस सर्वे में 10 में से 6 ने माना कि वह आमतौर पर ऐसे पुरुष के साथ सो चुकी हैं जो उनका बॉयफ्रेंड नहीं हैं. कुछ ने कहा – वह सेक्स इसलिए करती हैं ताकि अपनी सेक्सुअल परफॉर्मंस को इंप्रूव कर सकें. यही बताते हुए एक विद्यार्थी ने कहा – मैंने अपने बॉयफ्रेंड के साथ इसलिए सेक्स किया ताकि मैं अपने सेक्सुअल स्किल्स को और बेहतर बना सकूं.

इस रिसर्च में यह भी पता चला कि महिलाएं ऐसे पुरुषों पर ज्यादा आकर्षित होती हैं जो लंबे हों, जिनकी आवाज़ रौबदार हो और जिनके शरीर से मदहोश कर देने वाली महक आती हो.

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न, पिछड़ों और दलितों को फंसाने का खेल

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न सम्मान नरेंद्र मोदी सरकार के हाथों से मिलना कोई ताली बजाने वाली बात नहीं है. यह सिर्फ मई, 2024 के चुनावों की दांवपेंच वाली बात है. नरेंद्र मोदी सरकार उसी तरह कुरुक्षेत्र का युद्ध जीतने की कोशिश कर रही है जैसे कृष्ण ने महाभारत की कहानी में किया था. कृष्ण ने युद्ध से हिचक रहे अर्जुन को पट्टी पढ़ाई, दांवपेंच खेले, अपनों को कौरवों की तरफ भेजा, कौरवों के साथियों को फोड़ा, नियमरिवाज ताक पर रखे ताकि कौरव और पांडव दोनों के परिवार खत्म हो जाएं.

आज जो हो रहा है वह पिछड़ों और दलितों को फंसाने के लिए हो रहा है. कर्पूरी ठाकुर से भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस को कोई प्रेम नहीं है क्योंकि उन्होंने बिहार के अमीर, जमींदार, ऊंची जातियों के दबदबे को खत्म करने की बात उठाई थी. उन्होंने भारतीय जनसंघ (तब भारतीय जनता पार्टी का यही नाम था) और कांग्रेस के खिलाफ दबीकुचली जनता को जमा किया था.

आज भारत रत्न दे कर उन्हें असल में मरने के बाद इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कांगे्रसी वल्लभभाई पटेल और सुभाषचंद्र बोस को किया गया था. मंदिर की राजनीति भी पुरानी हार के गड़े मुरदों के पुतले खड़े कर के वोट जमा करना है. भारतीय जनता पार्टी हमेशा दूसरे घरों में तोड़फोड़ करा कर सत्ता में बने रहने की कोशिश करती है. यह हमारी धार्मिक कला है जिस में घरों में आने वाला पुरोहित बड़ेबड़े शब्दों में जजमान की तारीफ करता है और पड़ोसियों के राज जगजाहिर करता है ताकि उसे मोटी दक्षिणा मिल सके. भारतीय जनता पार्टी इसी बात को राष्ट्रीय पैमाने पर कर रही है और कर्पूरी ठाकुर के गुणगान कर के अब बिहार के पिछड़ों से वोट दक्षिणा में मांग रही है.

यह काबिलेतारीफ है कि धर्म के दुकानदार आसानी से हार नहीं मानते. ईसाई मिशनरी हों या इसलामी मौलवी या बौद्ध भिक्षु या निरंकारी सिख, उन्होंने धर्म के नाम पर हर तरह की आफतें झेली हैं ताकि इन के भाईबंदों को हलवापूरी मिलती रहे. यही वजह है कि 2000 साल की गुलामी के बावजूद गांवों से दक्षिणा देने का रिवाज कभी कम नहीं हुआ. जो हिंदू अपने धर्म को छोड़ कर गए, उन्हें नए धर्म में उसी तरह दक्षिणा देना शुरू करना पड़ा.

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देकर उन के परिवार वालों को राष्ट्रपति भवन में बुला कर फोटो हर जगह छपवा और चिपकवा दी जाएगी पर चुनावों के बाद कर्पूरी ठाकुर ने जो कहा था, जो करना चाहा था वह कभी नहीं किया जाएगा. हमारे दक्षिणापंथी कभी भी राजपाट पिछड़ों व दलितों के हाथों में नहीं जाने देंगे, चाहे वे पढ़लिख जाएं, पार्टियां बना लें, चुनाव जीत जाएं. पार्टियों में तोड़फोड़, मुकदमे, जीभर के पैसा लुटाना इसीलिए किया जाता है न.

शीतल देवी : बिना हाथों की तीरंदाज

एशियाई पैरा गेम्स 2023 में एक ऐसा इतिहास रच गया, जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. एक तो दिव्यांगता उस के बाद ऐसा हौसला और जज्बा कि आप शीतल देवी की पीठ थपथपा दें, वाहवाह कर उठें.

शीतल देवी दोनों हाथों से खेल नहीं सकती हैं, मगर जब वे अपने पैरों और मुंह का हुनर दिखाती हैं, तो लोग हैरान हो जाते हैं. दरअसल, इस प्रतिभा का उदय पहली दफा किश्तवाड़ में भारतीय सेना की एक प्रतियोगिता में हुआ था.

गोल्ड मैडल जीतने वाली शीतल देवी ने सचमुच एक ऐसा इतिहास रच दिया है, जो अब सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा. 16 साल की शीतल देवी ने चीन के हांगझाऊ में हुए एशियाई पैरा खेलों में 2 गोल्ड समेत 3 मैडल जीत कर इतिहास रच दिया. वे एक ही संस्करण में 2 गोल्ड मैडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला भी हैं.

शीतल देवी के पिता एक किसान हैं और मां सामान्य गृहिणी, जो घर में भेड़बकरियों की देखभाल करती हैं. एक साधारण परिवार की इस बेटी का जीवन जन्म से ही संघर्षपूर्ण रहा है.

शीतल देवी के जन्म से ही दोनों हाथ नहीं थे. वे ‘फोकोमेलिया’ नामक  बीमारी से पीडि़त हैं. इस बीमारी में अंग पूरी तरह से विकसित नहीं होते हैं. पर अहम बात यह है कि बाजू न होना शीतल देवी के लिए दिव्यांगता का अभिशाप बन नहीं सका. वे बिना दोनों बाजू के सिर्फ छाती के सहारे दांतों और पैरों से तीरंदाजी का अभ्यास करती थीं.

ट्रेनिंग के शुरुआती दिनों में शीतल देवी धनुष तक को नहीं खींच पाती थीं, मगर कोच ने ऐसा धनुष तैयार कराया, ताकि वे पैर से आसानी से धनुष उठा सकें और कंधे से तीर चलाने लगें.

महज 16 साल की उम्र में शीतल देवी ने अपने नाम कई उपलब्धियां दर्ज की हैं. ट्रेनिंग के 6 महीने बाद शीतल देवी ने वह कर दिखाया, जिस का इंतजार सब को था. उन्होंने हरियाणा के सोनीपत में पैरा ओपन नैशनल्स में सिल्वर मैडल हासिल किया.

यही नहीं, साल 2023 की शुरुआत में उन्होंने चैक गणराज्य के पिलसेन में वर्ल्ड कप तीरंदाजी चैंपियन में भी सिल्वर मैडल जीता. वे फाइनल में तुर्की की ओजनूर क्योर से हार गई थीं, लेकिन वर्ल्ड चैंपियनशिप में मैडल जीतने वाली बिना हाथों वाली पहली महिला तीरंदाज बन गई थीं.

एशियाई पैरा गेम्स में शीतल देवी ने 2 गोल्ड और एक सिल्वर मैडल हासिल किया. उन के शानदार प्रदर्शन को देख कर उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने उन्हें अपनी कंपनी की कोई भी मनचाही कार लेने की पेशकश की.

शीतल देवी के लिए एक पोस्ट साझा करते हुए आनंद महिंद्रा ने लिखा, ‘मैं अपने जीवन की छोटीमोटी समस्याओं पर शिकायत नहीं करूंगा. शीतल, आप सभी के लिए एक शिक्षक हैं. कृपया हमारी रेंज में से कोई भी कार अपने लिए चुनें और हम इसे आप की सुविधा के अनुसार कस्टमाइज कर आप को तोहफे में देंगे.’

कुलमिला कर शीतल देवी की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं लगती है. जो शीतल देवी धनुष नहीं उठा पाती थीं, उन्होंने दाएं पैर से धनुष उठाने का अभ्यास किया और 2 साल की कड़ी मेहनत की बदौलत जीत का परचम लहरा दिया.

साल 2021 में 14 साल की उम्र में बतौर तीरंदाज कैरियर की शुरुआत करने वाली शीतल देवी ने पहली बार किश्तवाड़ में भारतीय सेना की एक युवा प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था. ट्रेनिंग के दौरान उन के लिए एक खास तरह का धनुष तैयार कराया गया, ताकि वे पैर से आसानी से धनुष उठा सकें और कंधे से तीर को खींच सकें.

शीतल देवी के कोच अभिलाषा चौधरी और कुलदीप वेदवान हैं. महज 2 साल की होतेहोते 16 साल की उम्र में शीतल देवी ने अपने नाम कई उपलब्धियां दर्ज की हैं. ट्रेनिंग के 6 महीने बाद उन्होंने वह कर दिखाया, जिस का इंतजार सब को था.

इस से पहले उन्होंने सोनीपत में पैरा ओपन नैशनल्स में सिल्वर मैडल हासिल कर के दिखा दिया था कि वे देश के लिए आगे इतिहास रचने वाली हैं और एक रोल मौडल बनने वाली हैं.

मैं आगे पढ़ना चाहती हूं लेकिन घर वाले मेरी शादी करना चाहते है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 19 साल की लड़की हूं और हरियाणा के एक गांव में रहती हूं. हमारे यहां लड़की को घर पर बोझ समझ जाता है और उन्हें ज्यादा पढ़ने भी नहीं दिया जाता है. मैं ने 10वीं जमात पास की है और आगे भी पढ़ना चाहती हूं, पर घर वाले मेरी शादी करना चाहते हैं. इस बात से मैं बड़ी परेशान रहती हूं. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरी इस समस्या का हल हो जाए?

जवाब

आप जैसे भी हो पढ़ाई जारी रखने की कोशिश करें. हरियाणा की कई लड़कियां जैसे कल्पना चावला, फोगाट बहनें  मानुषी छिल्लर, रानी रामपाल और कविता चहल साबित कर चुकी हैं कि छोरियां किसी छोरे से कम नहीं हैं. यह बात अपने घर वालों को समझाएं.

बिना पढ़ाई के लड़कियों की जिंदगी गुलामों सरीखी हो जाती है. अभी आप कम गुलाम हैं, शादी के बाद मुमकिन है कि ज्यादा गुलाम बन जाएं, इसलिए पढ़ाई की लड़ाई अभी लडि़ए. घर वालों को सम?ाएं कि जमाना बदल गया है और लड़कियां अब बोझ नहीं रहीं, बल्कि बोझ उठाने वाली बन रही हैं.

अपने गांव में अच्छी पारिवारिक मैगजीन मंगवा कर लोगों को पढ़ने दें. ‘सरिता’ और ‘गृहशोभा’ ऐसे कूपमंडूक लोगों को सही राह दिखाने वाली पत्रिकाएं हैं, जो किसी भी नजदीकी बुक स्टौल पर मिल जाएंगी.

लूणी घी : हुस्न के चक्कर में बनें घनचक्कर

सुबह के काम से फारिग हो कर सुरेश खिड़की पर खड़ा सब्जी वाले का इंतजार कर रहा था. वह हाथ में मोबाइल पर रील्स देखने में बिजी था कि अचानक ‘लूणी घी चाहिए, लूणी…’ की आवाज ने उसे बाहर देखने को मजबूर कर दिया. खिड़की के बाहर राजस्थानी कुरतेघाघरे में सजी, सिर पर मटकियां रखे 2 अनजान लड़कियां खड़ी पुकार लगा रही थीं.

‘‘क्या है?’’ सुरेश ने बेहद रुखाई से पूछा, लेकिन उन लड़कियों के ठेठ राजस्थानी लहजे में बोले गए शब्द उस के पल्ले नहीं पड़े थे.

‘लूणी चाहिए, लूणी घी. खारा वाला घी लूणी,’ कहते हुए वे दोनों खिड़की के और निकट सरक आईं.

‘‘नहीं चाहिए,’’ कह कर सुरेश ने उन की ओर से पीठ मोड़ ली और फिर अपने मोबाइल में ध्यान लगाना चाहा, पर वे कहां पिंड छोड़ने वाली थीं. उन की आपस में कुछ अपनी भाषा में बात करने की आवाज कानों में आती रही.

‘‘ऐ साहब, सुनो. जरा यह बता दो कि यह मोबाइल नंबर सही है क्या?’’

सुरेश ने बेरुखी से पूछा, ‘‘अब क्या चाहती हो?’’

जवाब में उन में से एक लड़की ने कुरते की जेब से एक परची निकाल कर सुरेश की ओर बढ़ा दी.

‘‘क्या करूं इस का?’’ सुरेश ने पूछा.

उसी पहली वाली लड़की ने जवाब दिया, ‘‘जरा अपने मोबाइल से बात करा दो. यह नंबर एक सरदारजी ने दिया है. साहब, हम तो यहां बिलकुल नएनए आए हैं. वे लूणी घी चाहते हैं और कहा था कि इस नंबर पर फोन कर देना, तो स्कूटर पर वे खुद लेने आ जाएंगे.’’

काफी कोशिश करने पर बड़ी मुश्किल से सुरेश उन की बात कुछकुछ समझ पा रहा था. उन दोनों में बड़ी कशिश थी. उन्होंने ओढ़नी ओढ़ी हुई थी, पर उन के ब्लाउज बेहद छोटे थे. उन्हें भी उन्होंने पीछे से ढीला छोड़ा हुआ था. उन के उभार बाहर निकल रहे थे.

सुरेश देखने से अपने को रोक नहीं सका. अपने मोबाइल से नंबर मिलाया, तो जवाब आया, ‘दिस नंबर डज नौट एग्जिस्ट.’

सुरेश ने परची उस के हाथ पर रखते हुए कहा, ‘‘नंबर गलत है.’’

वह लड़की अनजान बनते हुए बोली, ‘‘एक सरदारजी ने पिछली बार लूणी घी लिया था. कहा था कि जब भी आऊं उन्हें दे जाऊं. ठीक है न, वह तो पूरा घी मांग रहे थे, पर कह रहे थे कि पैसे वे पेटीएम से भेजेंगे. हम यह तरीका नहीं समझाते न साहब.’’

उन के भोलेपन पर हैरान होते हुए अब तक सुरेश को भी यह जानने की उत्सुकता होने लगी थी कि आखिर यह लूणी घी क्या बला है.

दरवाजा खोल कर सुरेश बाहर निकल आया, ‘‘देखूं, क्या है तुम्हारे पास.’’

मटकियां नीचे उतार कर वे दोनों घाघरे को घुटने के ऊपर कर के बैठ गईं, ‘‘लूणी घी है हमारे पास. लो देखो, ठेठ बीकानेर म्हारा घर है.’’

फिर उन्होंने खूब चहकचहक कर अपनी भाषा में सुरेश को सम?ाया कि  वे बड़ी दूर बीकानेर की रहने वाली

हैं. काफिले के साथ वे निकली थीं. चलतेचलते यहां बिहार तक आ पहुंची हैं. नदी पार उन की गाडि़यां, भैंसें और मर्द हैं. पर अब वे घूमतेघूमते थक चुकी हैं. उन का घी बिक जाए, तो वे लौट जाएंगी.

एक लड़की की आंखों में मोटेमोटे आंसू छलछला आए, ‘‘साहब, यह घी नहीं लोगे, तो यह घी बेकार जाएगा. हम तो सरदारजी के लिए ही लाए थे.’’

उन की भोलीभाली सूरतें, गांव की पोशाक और सैक्सी बोली, बारबार गिरती ओढ़नी से सुरेश का मन ललचा उठा.

‘‘लाओ, एक डब्बा दे दो. कितने का है?’’ कह कर सुरेश पैसे लेने अंदर जाने लगा व साथ में रुपए भी लेता आया, ताकि जल्द से जल्द इन से पीछा छुड़ा कर दरवाजा बंद करे. आजकल अकेले घर में किसी भी अनजान को घुसाना कोई अक्लमंदी नहीं है.

सुरेश लौटा तो वे अपने सारे के सारे डब्बे थैले से निकाल चुकी थीं. एक बोली, ‘‘बस, कोई 5 किलो है. सारा ले लो साहब. हम भी लौट जाएंगी अपने काफिले के पास.’’

‘‘नहीं, इतना घी ले कर मैं क्या करूंगा. कहीं और बेच लेना.’’

पर वे जिद करती रहीं. सुरेश को एका एक अपने दोस्त रोहन का ध्यान आया. क्यों न उसे बुला ले. वह राजस्थानका रहने वाला है. इन की भाषा भी समझ लेगा और इन्हें समझबुझ कर इन की समस्या भी शायद सुलझ दे.

सुरेश को लालच था कि कुछ देर वे ऐसे ही बैठी रहें. उन की खुली टांगें न्योता दे रही थीं.

‘‘रोहन आ जा. अच्छा माल घर आया है,’’ सुरेश ने फोन किया.

रोहन ने आते ही उन लड़कियों को ताड़ा, फिर राजस्थानी भाषा में पूछा कि वे कहां की रहने वाली हैं. अपनी भाषा सुनते ही वे दोनों ऐसी खिल गईं, मानो उन्हें कोई अपना सगा मिल गया हो. हाथमुंह मटकामटका कर उन्होंने कुछ ऐसी बातें की कि रोहन को भी लगा कि ये लड़कियां आसानी से पट जाएंगी.

मटकी में से जरा सा घी निकाल कर अपने हाथ पर रख कर दोनों ने सुरेश और रोहन के मुंह के पास अपने हाथ कर दिए. ‘‘घी तो बिलकुल शुद्ध है. लूणी घी का मतलब ही शुद्ध मक्खन से निकला हुआ घी. देखो न इस का रंग. गाय का दूध पीला होता है न, इसी से यह पीला है. किसी को भी दोगे तो बढि़या लड्डू बनेंगे. सरदारजी ने 8 किलो घी खरीद लिया है, तो जरूर बढि़या होगा,’’ रोहन बोला.

सुरेश खुश था कि ये लड़कियां उन के इतने पास बैठी हैं. ये लड़कियां उसे सैक्सी लगीं, पर वे हमेशा अपने मर्दों से घिरी रहती थीं. उन के बदन से चमेली की सी खुशबू आ रही थी. सुरेश को तो नशा सा होने लगा था.

उन लड़कियों ने मटकी से साथ लाए प्लास्टिक के डब्बों में घी भरना शुरू कर दिया था.

एक लड़की कहने लगी, ‘‘साहब, यह डब्बा एक किलो का है.’’

रोहन कहने लगा कि यह डब्बा तो बहुत बड़ा है. इस में तो डेढ़ 2 किलो घी आ जाएगा, पर वे दोनों एक नहीं मानीं.

‘‘नहींनहीं साहब, हम को बेईमानी मत सिखाओ. हम अभी कुंआरी हैं. हमारे मांबाप ने कहा है कि भूखी मर जाना, पर कभी बेईमानी न करना. हम तो पूरा डब्बा ही भरेंगी.’’

अब तो सुरेश और रोहन उन दोनों की ईमानदारी और सचाई पर कुछ इस कदर फिदा हुए कि सारा घी तुलवाने की सोच बैठे कि 600 रुपए का घी 400 रुपए के भाव में मिल रहा है. यह भी किलो का सवा या डेढ़ किलो. आपस में बांट कर अगले महीने के लिए रख लेंगे, कोई बिगड़ने वाली चीज तो है नहीं.

सुरेश और रोहन ने उन के 5 किलो के डब्बे का घी तुलवा कर रुपए उन के हाथ पर धरे तो उन के खिले हुए चेहरों की चमक देखते ही बनती थी.

सुरेश और रोहन सोच रहे थे कि उन्हें और कैसे रोका जाए, तभी एक लड़की ने जब मटकी जो आधी से कम भरी थी, सिर पर रखी तो फूट गई. घी उस पर बह गया. ??

दूसरी लड़की ने कहा, ‘‘चल, जल्दी चल. डेरे पर जा कर नहाना पड़ेगा.’’

उन दोनों के भोलेपन पर तो सुरेश और रोहन रीझ ही चुके थे. सुरेश ने कहा, ‘‘अरे, ऐसे घी में तर हो कर कहां जाओगी? चलो, यहीं नहा लो. हम कमीज दूसरी दे देंगे. ब्लाउज को घर ले जाना.’’

दोनों लड़कियों ने एकदूसरे को देखा और बोली, ‘‘साहब, आप शरीफ आदमी हैं, इसलिए हम नहा लेते हैं, वरना आज के मर्दों का क्या भरोसा.’’

उस के बाद एक लड़की ने आराम से कोने में खड़े हो कर पीठ कर के ब्लाउज उतार कर निकाल कर रखा, फिर ओढ़नी रखी. लहंगा नहीं उतारा, पर जब गुसलखाने से बाहर फेंका, तो सुरेश और रोहन की हालत बुरी थी.

अब उन दोनों की नजर उस लड़की पर टिकी थी, तो दूसरी लड़की पीछे ही खड़ी थी. थोड़ी देर में नहा कर वापस आई. सुरेश की कमीज पहने वह मौडर्न और चुस्त ही नहीं और सैक्सी लग रही थी. उन्होंने अपना सामान उठाया और चल दीं.

उन में से एक लड़की कहती गई, ‘‘साहब, हमें फोन कर देना. हम आ जाएंगी. इस फोन में रिकौर्डिंग भी है न.’’

सुरेश और रोहन को समझ नहीं आया कि वह क्या कह रही हैं. वह तो बाद में पता चला कि जब वे दोनों नहाने वाली लड़की को देख रहे थे, उन्हीं के फोन से दूसरी लड़की वीडियो बना रही थी. उस ने पीछे से पर्स, लैपटौप, फोन चार्जर अपनी थैली में डाल लिया था. उन की हिम्मत यह थी कि वे सुरेश के फोन पर ही उसे फोन करने को कह गईं.

वे दोनों जानती थीं कि सुरेश पुलिस में तो जाएगा नहीं, क्योंकि अगर वे पकड़ी भी गईं तो कपड़े उतारते हुए वीडियो से सुरेश और रोहन पर उलटा केस बना डालेंगी. लूणी घी के चक्कर में सुरेश अकेला ही नहीं, रोहन भी बुरी तरह फंस गया था.

वह लूणी घी नहीं था, किसी तरह की ग्रीस थी, जो सुरेश और रोहन को फेंकनी पड़ी थी. वे लड़कियां दिनदहाड़े धोखा दे गई थीं. ?

राज : सायरा की खूबसूरती

उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर में एक गांव है चंदनवाला, जहां पर शादाब अपने अम्मीअब्बा और एक छोटे भाई के साथ रहता था. उन की हवेली काफी बड़ी थी. वहीं नजदीक ही शादाब के चाचा अनीस भी अपने परिवार के साथ रहते थे.

दोनों परिवारों का एकदूसरे के घर में आनाजाना लगा रहता था. शादाब बिजनौर में मोबाइल फोन की दुकान चलाता था. उस की अच्छीखासी कमाई थी. एक दिन उस के लिए नंदपुर गांव की सायरा का रिश्ता आया.

सायरा गजब की खूबसूरत थी, जिसे देखते ही शादाब के अब्बा फुकरान ने उसे अपने घर की बहू बनाने का फैसला कर लिया.

कुछ ही दिनों में शादाब और सायरा का निकाह हो गया. शादी की पहली रात थी. शादाब ने जैसे ही सायरा का घूंघट उठाया, उस के मुंह से खुद ब खुद निकला, ‘‘आप गजब की खूबसूरत हैं.’’

शादाब के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर सायरा शरमा गई और अपने चेहरे को हथेलियों से छिपाने लगी.

शादाब ने बड़े प्यार से सायरा के नाजुक हाथों को उस के चेहरे से हटाया और कहा, ‘‘मेरा चांद हो तुम, जिसे आज जीभर कर देखने दो.’’

सायरा शादी के सुर्ख जोड़े में वाकई कयामत ढा रही थी. उस के सुनहरे बाल, गोरेगोरे गाल, सुर्ख होंठ और बड़ीबड़ी आंखें शादाब को पागल बना रही थीं.

फिर उन दोनों ने एकदूसरे के आगोश में जिस्म की प्यास बुझाई. सुहागरात की उस पहली रात में ही शादाब सायरा का दीवाना बन गया और तनमन से उसे चाहने लगा.

शादी के कई महीनों तक शादाब सायरा के पास अपने घर पर रुका और उसे हर वह खुशी दी, जो एक बीवी को चाहिए.

फिर सायरा पेट से हो गई. यह सुन कर शादाब की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने सायरा का पूरी तरह खयाल रखा, पर उसे अपनी दुकान पर भी जाना था, जो कई महीने से अपने नौकर के भरोसे  छोड़े हुए था.

एक दिन अब्बा ने शादाब से कहा, ‘‘बेटा, अब तू अपना काम देख. सायरा की देखभाल के लिए हम सब हैं न.’’

शादाब बिजनौर में अपनी दुकान पर चला गया. वह हर महीने घर आताजाता था, ताकि सायरा खुद को अकेला महसूस न करे.

आखिरकार वह दिन भी आ गया, जब सायरा ने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया, जिसे पा कर पूरे घर में खुशी का माहौल छा गया.

7वें दिन शादाब ने अपनी बेटी का अकीका बड़ी धूमधाम से मनाया. पूरे गांव को दावत में बुलाया गया और तरहतरह के लजीज खाने का इंतजाम किया गया.

शादाब के अम्मीअब्बा तो पोती पा कर झूम उठे. वे पहली बार दादादादी बने थे, इसलिए उन्होंने सायरा का बहुत खयाल रखा और प्यार दिया. शादाब कुछ दिन गांव में रुक कर अपनी दुकान पर चला गया.

सायरा की बेटी अब 7 महीने की हो गई थी, जिस से पूरे घर में खुशियां ही खुशियां दिखाई देती थीं.

गरमी के दिन थे. रात के 10 बजे थे. सायरा घर में अकेली थी. गरमी के मारे उस का बुरा हाल था. उस के सासससुर छत पर सोए हुए थे, पर सायरा गरमी की वजह से सो नहीं पा रही थी. उस ने अपने कपड़े बदल कर हलकी और ?ानी नाइटी पहन ली, जिस में उस की उभरी हुई गोरीगोरी छाती साफ दिखाई दे रही थी.

सायरा ने गरमी से बचने के लिए अपने कमरे का दरवाजा खोल रखा था और वह आराम से अपने बिस्तर पर लेटी हुई थी कि तभी उसे अपने बदन पर किसी के हाथ फेरने का अहसास हुआ, जो उस के नाजुक पेट से होते हुए उस की मुलायम छाती को सहला रहा था.

सायरा की आंख खुल गई, पर उसे उन हाथों से जो मजा आ रहा था, वह चाह कर भी कुछ न बोल सकी और यों ही आंखें बंद किए पड़ी रही.

थोड़ी देर के बाद उस ने हलकी सी आंख खोल कर देखा तो पाया कि उस का चचेरा देवर नदीम उस के नाजुक अंगों को सहला रहा था.

सायरा को मजा आ रहा था. उस ने यह जानने के लिए कि नदीम उस के साथ और क्या करेगा, आंखें बंद कर के सोने का नाटक जारी रखा.

नदीम सायरा के बदन को सहलाते हुए उस की उभरी हुई छाती को अपने मुंह में ले कर चूमने लगा, तो सायरा भी मदमस्त हो गई. उस ने नदीम को अपने ऊपर खींच लिया.

नदीम अब सायरा की रजामंदी समझ कर उस पर भूखे भेडि़ए की तरह झपट पड़ा. उस ने सायरा की गरदन पर चुम्मों की ऐसी बौछार कर दी कि वह झूम उठी.

थोड़ी देर बाद नदीम ने सायरा के बदन के एकएक नाजुक अंग को चूमना शुरू कर दिया. जोश में आई सायरा नदीम को अपने ऊपर खींचने लगी.

नदीम ने बिना समय गंवाए सायरा के नाजुक बदन को मसलना शुरू कर दिया. फिर काफी देर तक नदीम सायरा के बदन को रौंदता रहा. संतुष्ट होने के बाद भी वह सायरा को अपनी बांहों में जकड़े हुए एक तरफ निढाल हो कर लेट गया.

सायरा ने नदीम से जो जिस्मानी सुख आज हासिल किया था, वह उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई मर्द उसे इतनी खुशी भी दे सकता है.

सायरा और नदीम का एक बार जिस्मानी रिश्ता बना, तो अब थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. उन्हें जब भी मौका मिलता, वे एकदूसरे से अपने बदन की प्यास बुझाते. उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि जब शादाब को इस का पता चलेगा, तो क्या होगा. ऐसा हुआ भी. एक दिन शादाब ने दोनों को ऐसी हालत में पकड़ा कि वे अपना जुर्म न छिपा सके.

दरअसल, शादाब अपने घर आया हुआ था. घर के सभी लोग छत पर सोए हुए थे, नीचे बस सायरा अकेली सो रही थी. रात के तकरीबन 2 बजे नदीम नीचे आया और सायरा के कमरे में घुस गया.

सायरा नदीम को देख कर उस की बांहों से लिपट गई. दोनों ने बिना समय गंवाए अपने कपड़े उतारे और एकदूसरे को चूमने लगे.

उधर छत पर शादाब की नींद खुल गई. उसे गरमी की वजह से बहुत तेज प्यास लगी थी. वह पानी पीने के लिए नीचे आ गया.

शादाब अभी नल के पास पहुंचा ही था कि उसे अपने कमरे से सायरा की सिसकियों की आवाज सुनाई दी. उस ने कमरे के भीतर झांक कर देखा तो उस का खून खौल उठा.

नदीम और सायरा अपने जिस्म की भूख मिटा रहे थे. जैसे ही उन की नजर शादाब पर पड़ी, वे हड़बड़ा कर एकदूसरे से अलग हो गए. नदीम अपने कपड़े पहन कर वहां से निकल गया और सायरा अपने किए की माफी मांगने लगी, पर शादाब कुछ न बोला. उस के जिस्म का खून मानो जम चुका था. जिसे उस ने सच्चे दिल से इतना प्यार किया, उस ने उस के ही प्यार को धोखा दे दिया.

कुछ देर बाद शादाब वहां से उठा और चुपचाप जा कर छत पर लेट गया. सुबह होते ही वह बिजनौर के लिए रवाना होने लगा, तो उस के अब्बू बोले, ‘‘तू कल ही तो आया है, फिर इतनी जल्दी क्यों जा रहा है?’’

शादाब ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया और अपना रोता हुआ चेहरा उन लोगों से छिपाते हुए अपनी दुकान पर आ गया.

सायरा समझ गई थी कि शादाब को गहरा सदमा लगा है. वह घबरा रही थी कि पता नहीं, अब क्या होगा. उस ने शादाब को कई बार फोन किया, पर शादाब ने उस का फोन नहीं उठाया.

2 महीने ऐसे ही निकल गए, पर शादाब ने न तो सायरा से बात की और न अब अपने घर वापस आया.

3 महीने बाद जब सायरा ने अपने ससुर को बताया कि शादाब उस से बात नहीं कर रहा है और न घर ही आ रहा है, तो उन्हें बड़ी हैरानी हुई.

अगले दिन वे बिजनौर के लिए रवाना हो गए और शादाब से बोले, ‘‘बेटा, ऐसा कौन सा काम आ पड़ा, जो तुम घर पर भी नहीं आ रहे हो और बहू का फोन भी नहीं उठा रहे हो?’’

शादाब बोला, ‘‘मुझे अब सायरा से तलाक चाहिए. मैं उस के साथ अब नहीं रह सकता.’’

यह सुन कर शादाब के अब्बा दंग रह गए और बोले, ‘‘बेटा, सायरा इतनी अच्छी बहू है, सब से कितना प्यार करती है, सब की देखभाल करती है. ऐसी

क्या कमी है उस में, जो तुम ऐसा बोल रहे हो?’’

शादाब ने कहा, ‘‘बस, मुझे उस के साथ कोई रिश्ता नहीं रखना है. मैं उसे तलाक देना चाहता हूं.’’

शादाब के अब्बा गुस्सा करते हुए बोले, ‘‘लगता है, तुम ने किसी और औरत से रिश्ता बना लिया है, जो इतने महीनों से घर नहीं आए और इतनी प्यारी बीवी को छोड़ने की बात कर रहे हो.

‘‘यह बात ध्यान रखो कि मैं अपनी पोती के बिना नहीं रह सकता और मैं तुम्हें बहू को छोड़ने भी नहीं दूंगा. तुम जिस लड़की के लिए मेरी बहू को छोड़ने की सोच रहे हो, वह सिर्फ तुम्हारी दौलत के चक्कर में होगी.’’

शादाब ने कहा, ‘‘मैं बस सायरा के साथ नहीं रह सकता. जब तक वह वहां रहेगी, तब तक मैं घर नहीं आऊंगा.’’

शादाब के अब्बा ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की, पर शादाब पर कोई असर नहीं हुआ. अब्बू ने उसे जायदाद से बेदखल करने की धमकी दी, पर वह टस से मस नहीं हुआ.

सायरा के अब्बू को जब शादाब की इस हरकत का पता चला, तो वे आगबबूला हो गए और गांव के कुछ जिम्मेदार लोगों को अपने साथ ले कर शादाब के घर आ गए और उन्हें बुराभला कहने लगे.

शादाब के अब्बू ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘हम तो यही चाहते हैं कि हमारी बहू हमारे साथ रहे, पर शादाब को पता नहीं किस औरत का भूत सवार है, जो वह सायरा को रखने के लिए तैयार ही नहीं.’’

सायरा के अब्बू बोले, ‘‘ठीक है, मैं अपनी बेटी को ले जा रहा हूं. तुम कल आ कर पंचायत में मिलना और शादाब को भी साथ लाना. जब फैसला करना है, तो शादाब का होना भी जरूरी है.’’

अगले दिन शादाब भी आ गया. उस के अब्बा शादाब को ले कर उस की सुसराल पहुंचे. वहां बैठे पंचों में से एक ने शादाब से पूछा, ‘‘तुम सायरा को क्यों छोड़ना चाहते हो?’’

शादाब बोला, ‘‘मुझे इस के साथ नहीं रहना. बस, मैं इसे तलाक देना चाहता हूं.’’

दूसरे पंच ने पूछा, ‘‘अगर तुम सायरा को छोड़ोगे, तो उस मासूम बच्ची का क्या होगा? वह किस के पास रहेगी? कौन उस की जिम्मेदारी उठाएगा?’’

शादाब बोला, ‘‘जिसे आप ठीक सम?ा, बच्ची उस के पास ही रहेगी.’’

तीसरे पंच ने कहा, ‘‘बच्ची को तो मां ही अच्छी तरह पाल सकती है.’’

शादाब बोला, ‘‘जैसी आप सब की मरजी.’’

यह सुनते ही शादाब के अब्बा रोने लगे और बोले, ‘‘क्यों किसी बाजारू औरत के चक्कर में अपना घर बरबाद कर रहा है और अपने खून को ही क्यों किसी को दे रहा है… कल को सायरा शादी करेगी तो बच्ची भी उस के साथ जाएगी. क्या तुझे अच्छा लगेगा कि हमारा खून किसी और के पास जाए?’’

शादाब कुछ न बोला. वह बस सायरा को तलाक देने पर अड़ा रहा. उस ने सायरा की कोई गलती भी नहीं बताई कि वह उसे क्यों छोड़ना चाहता है.

पहले वाले पंच ने शादाब से पूछा, ‘‘ठीक है, हम तुम दोनों का तलाक करा देते हैं, पर तुम सायरा की कोई ऐसी गलती तो बताओ, जो तुम उसे छोड़ना चाहते हो?’’

शादाब बोला, ‘‘वह मेरी बीवी है. मैं उस की बुराई नहीं कर सकता. बस, मैं उस के साथ रहना नहीं चाहता.’’

दूसरे पंच ने पूछा, ‘‘क्या तलाक होने के बाद तुम उस की गलती बताओगे?’’

शादाब ने कहा, ‘‘तलाक के बाद जब वह मेरी बीवी ही नहीं रहेगी, तो मुझे उस की गलती से क्या मतलब, जो मैं उस की बुराई करूं.’’

एक पंच ने कहा, ‘‘इस का मतलब तो यही है कि तुम ने सायरा की जिंदगी से खेला है. उस के साथ इतना समय गुजार कर उसे तनहा छोड़ दिया.

सारी गलती तुम्हारी है, इसलिए तुम्हें 12 लाख रुपए सायरा को देने पड़ेंगे, ताकि वह अपनी और अपनी बच्ची की जिंदगी सही ढंग से गुजार सके और उसे किसी के आगे हाथ न फैलाने पड़ें.’’

शादाब ने कहा, ‘‘मुझे मंजूर है.’’

अगले ही दिन शादाब ने 12 लाख रुपए अदा किए और सायरा से छुटकारा पा लिया. इस तरह वह सब की नजरों में तो बुरा बन गया, पर उस ने सायरा के राज को एक राज रखा कि किस तरह उस ने उस के प्यार को धोखा दे कर नदीम के साथ नाजायज रिश्ता रखा था.

मुलाकात : विनीत और सुधा का ब्याह

विनीत प्लेटफार्म पर बेतहाशा भागता जा रहा था, क्योंकि ट्रेन चल पड़ी थी. अगर यह गाड़ी छूट जाती तो पूरे 6 घंटे बाद ही उसे दूसरी गाड़ी मिलती. यही सोच कर उस ने आखिरी डब्बा पकड़ना चाहा.

अगर वह लड़की उस पल विनीत का हाथ न पकड़ती, तो शायद वह गाड़ी के नीचे ही आ जाता.

उस लड़की का नाम सुधा था. उस ने कहा, ‘‘अगर आप का हाथ छूट जाता तो क्या होता?’’

विनीत कुछ नहीं बोला, बस एहसान जताती निगाहों से उसे देखता रहा.

‘‘अरे, आप तो हांफ रहे हैं… चलिए, मेरी सीट पर बैठ जाइए,’’ कहते हुए सुधा चल पड़ी.

विनीत सुधा के पीछेपीछे चल पड़ा. वह अपनी मंडली में आते हुए बोली, ‘‘वनी, हटना. इन्हें बिठाना है.’’

एक अनजान नौजवान को सुधा के साथ देख कर वनी सवालिया निगाहों से उसे घूरते हुए थोड़ा खिसक गई.

सुधा ने पानी का गिलास विनीत की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लीजिए, गला तर कर लीजिए,’’ फिर उस ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘‘वनी, ये साहब भागतेभागते डब्बा पकड़ रहे थे. अगर मैं सहारा…’’

‘‘तो बेचारे चारों खाने चित हो जाते,’’ हंसते हुए सुधा की सहेली वनी ने बात पूरी की, ‘‘अरे सुधा, तू भी बैठ जा हमारे पास.’’

सुधा विनीत के पास बैठ गई.

ट्रेन तेज रफ्तार से भागती जा रही थी. थोड़ी देर चुप्पी छाई रही, फिर विनीत ने पूछा, ‘‘आप कहां तक जाएंगी?’’

‘‘चंडीगढ़,’’ सुधा ने कहा.

‘‘मुझे भी तो वहीं जाना है. वहां किस जगह?’’

‘‘कालेज की ओर से खेलों में हिस्सा लेने जाना है,’’ वनी ने कहा.

‘‘मैं भी तो वहां बैडमिंटन खेलने जा रहा हूं,’’ विनीत ने मुसकराते हुए कहा.

विनीत के सजीलेपन से सुधा बहुत खुश हुई. रास्ते में जहां भी ट्रेन रुकती, चायनाश्ता लेने विनीत ही उतरता था. पूरे 7 घंटे बाद सभी चंडीगढ़ जा पहुंचे.

सुधा और वनी की हौकी की टीम जीत चुकी थी. इधर विनीत का खेल भी बहुत अच्छा रहा.

इन 2-3 दिनों में सुधा और विनीत बहुत करीब आ चुके थे. एक दिन खेल खेलने के बाद शाम को दोनों घूमने निकल पड़े. आसमान पर कालेकाले बादल तैर रहे थे. ठंडी हवा चल रही थी. वे एक पार्क में आ बैठे. रंगबिरंगे फूलों के बीच फुहारे बड़े सुंदर लग रहे थे. विनीत आइसक्रीम ले आया.

सुधा ने कहा, ‘‘इस को लाने की क्या जरूरत थी?’’

‘‘देखती नहीं, अभी कितनी गरमी पड़ रही है.’’

फिर वह आइसक्रीम का मजा लेते हुए बोला, ‘‘सुधा, 2-3 दिन पता ही नहीं चले कि कैसे कट गए.’’

‘‘हां,’’ सुधा ने धीरे से कहा.

‘‘घर जा कर कहीं तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगी?’’

‘‘नहीं, अब मैं भला तुम्हें कैसे भुला सकती हूं. तुम तो मेरी धड़कन बन चुके हो,’’ विनीत के पास सिमटते हुए सुधा ने जवाब दिया.

‘‘तो मैं समझूं कि मैं तुम्हें प्यार कर सकता हूं?’’

सुधा शरमा गई. जिंदगी में पहली बार उसे किसी से प्यार हुआ था.

अचानक रिमझिम पानी बरसने लगा. विनीत बोला, ‘‘आओ सुधा, चलें. लगता है, तेज बारिश होगी.’’

सुधा उठने लगी तो जोर की बिजली कड़की. सुधा डर कर विनीत से लिपट गई, तो विनीत ने भी उसे बांहों में जकड़ लिया.

पार्क खाली होने लगा था. थोड़ी देर रुकने के लिए वे दोनों वहीं पास की खाली कोठरी में चले गए.

अब जोरों से बारिश होने लगी. उन्हें उम्मीद थी कि बिन मौसम की बरसात है, इसलिए जल्दी ही बादल छंट जाएंगे, लेकिन उन का सोचना गलत था.

रात बहुत हो चुकी थी. बारिश थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. भीगने की वजह से सुधा ठंड से कांप रही थी.

विनीत ने सुधा का हाथ अपने हाथ में ले लिया. इतना भीगने पर भी सुधा के जिस्म से आग बरस रही थी.

विनीत सुधा को अपने आगोश में लेने लगा, तो वह बोली, ‘‘नहीं, अभी नहीं विनीत.’’

‘‘लेकिन, इस मौसम ने मुझे पागल बना दिया है. मैं तुम्हारे बगैर नहीं रह पाऊंगा,’’ विनीत हवस की आग में जल रहा था.

सुधा का तेजी से दिल धड़क उठा. उस के जिस्म में तूफान उमड़ रहा था. वह भी जैसे सोचनेसमझने की ताकत खो चुकी थी. उस ने खुद को विनीत के हवाले कर दिया.

काफी देर बाद जब बारिश रुकी, तो वे किसी तरह होस्टल में पहुंचे और चुपचाप अपनेअपने कमरे में जा कर दुबक गए.

घर आ कर सुधा को लगा कि वह बहुत बड़ा जुर्म कर के आई है. कहीं विनीत बेवफा निकला, तो क्या होगा. नहीं, उसे ऐसा नहीं करना चाहिए था. लेकिन अब सोचने से क्या फायदा था. तीर कमान से निकल चुका था.

सुधा अंदर ही अंदर घुटने लगी. अगर कुछ हो गया तो वह अपने पिताजी को क्या बताएगी, जिन्होंने उसे इतनी आजादी दे रखी थी. वह क्यों इस चक्रव्यूह में फंस गई?

तकरीबन एक महीने बाद डाकिया एक लिफाफा दे गया. जब उसे खोला तो सुधा खुशी से झूम उठी. उस में लिखा था, ‘सुधा, अगले महीने मेरे बाबूजी तुम्हारे यहां रिश्ता तय करने आ रहे हैं. दूसरी खुशखबरी है कि मुझे नौकरी भी मिल गई है. तुम्हारा, विनीत.’

जब विनीत के पिता सुधा को देख कर लौटे, तो उन का चेहरा गुस्से से लालपीला हो रहा था. आते ही वे बोले, ‘‘एक बात कान खोल कर सुन लो. तुम्हारी शादी उस बदनाम लड़की से कभी नहीं हो सकती.’’

‘‘लेकिन क्या हुआ? कुछ बताइए न. पिताजी, मुझे पूरी उम्मीद है कि सुधा ऐसी नहीं हो सकती,’’ विनीत जल्दी से बोला.

‘‘मैं कहता हूं, उस लड़की को भूल जाओ. वह तो अच्छा हुआ कि मेरा पुराना दोस्त डाक्टर मदन मिल गया. अगर वह समय पर नहीं बताता, तो

हम अपनी बिरादरी में नाक कटा बैठते. जानते हो, वह लड़की मां बनने वाली है.’’

‘‘लेकिन पिताजी, आप मेरी बात सुन लीजिए,’’ गुजारिश करते हुए विनीत ने कहा.

‘‘नहीं बेटा, मेरे जीतेजी यह रिश्ता नहीं हो सकता,’’ नफरत से उन्होंने मुंह फेर लिया.

‘‘नहीं पिताजी, मेरे जुर्म की सजा आप सुधा को मत दीजिए. गलती मेरी ही है. उस की होने वाली औलाद का पिता मैं ही हूं.’’

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’ फिर थोड़ी देर रुक कर वह मुसकराते हुए बोले, ‘‘बेटा, मुझे खुशी है कि इतना सब होते हुए भी तुम ने उस लड़की को अपनाने की बात की है.’’

विनीत के चेहरे पर मुसकान तैर गई. कुछ दिनों बाद विनीत और सुधा का ब्याह हो गया.

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