Crime Story: एंटीलिया को दहलाने में हिल गई सरकार- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

दूसरी पारी में वाझे ने जब खाकी वर्दी पहनी, तभी सोच लिया था कि इस बार बड़े काम करेगा. उस ने दिलीप छाबडि़या और रिपब्लिक भारत टीवी चैनल के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी जैसे बड़े लोगों पर हाथ डाले, तो मुंबई में फिर से उस के चर्चे होने लगे.

वाझे इस बार ‘बड़े खेल’ करना चाहता था. इसीलिए उस ने अंबानी परिवार को धमकाने के मकसद से उन के आवास के सामने जिलेटिन की छड़ों से भरी गाड़ी रखने की साजिश रची. इस साजिश में उस ने हिरेन के अलावा अपने महकमे के कुछ नएपुराने लोगों को भी शामिल किया. वाझे ने हिरेन को मोटी रकम देने का वादा किया था.

इसी साजिश के तहत 17 फरवरी को हिरेन की स्कौर्पियो चोरी होने का नाटक रचा गया. जिलेटिन की छड़ें रखने के बाद इस स्कौर्पियो को 24-25 फरवरी की दरम्यानी रात अंबानी के आवास एंटीलिया के बाहर लावारिस हालत में छोड़ दिया गया.

अपने उच्चाधिकारियों से कह कर वाझे ने एंटीलिया केस की जांच खुद अपने हाथ में ले ली. उस ने हिरेन और साजिश में शामिल दूसरे लोगों को यह भरोसा दिलाया कि जांच में वह किसी पर भी आंच नहीं आने देगा. लेकिन बाद में यह मामला विपक्ष ने गरमा दिया, जिस से हालात विपरीत होते चले गए.

वाझे ने अपने हाथ से बाजी निकलते देखी, तो उसे डर हुआ कि हिरेन उस का भांडा फोड़ सकता है. एंटीलिया मामले की साजिश की सब से कमजोर कड़ी हिरेन ही था. इसलिए वाझे ने एक अपराध पर परदा डालने के लिए दूसरा अपराध करने की साजिश रची. उस ने हिरेन को ही ठिकाने लगाने का फैसला किया ताकि न रहे बांस और न बजे बांसुरी.

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करा दी हिरेन की हत्या

सचिन वाझे ने पूर्व कांस्टेबल विनायक शिंदे और क्रिकेट सटोरिए नरेश गोरे सहित कुछ दूसरे लोगों के सहयोग से 4 मार्च की रात हिरेन की हत्या करवा दी. वाझे के कहने पर शिंदे ने पुलिस अधिकारी तावड़े के नाम से हिरेन को फोन कर के पूछताछ के लिए बुलाया. उसी रात हिरेन को मार कर मुंब्रा खाड़ी में फेंक दिया गया. हिरेन को ठिकाने लगवाने के बाद वाझे जानबूझ कर एक डांस बार की जांच करने गया था.

एंटीलिया केस और हिरेन की हत्या के मामले में बाद में एनआईए ने 10 अप्रैल को वाझे के सब से करीबी सहायक पुलिस निरीक्षक रियाजुद्दीन काजी को गिरफ्तार कर लिया. काजी से एनआईए ने मार्च के महीने में दसियों बार पूछताछ की थी. उस के खिलाफ कई अहम सबूत मिले. उस ने वाझे के आपराधिक सबूतों को नष्ट किया था. उस की सोसायटी में कई बार खड़ी रही वाझे की स्कौर्पियो के फुटेज निकाल कर उसी ने नष्ट किए थे.

एनआईए ने वाझे की महिला मित्र मीना जार्ज को भी जांच के दायरे में रख कर कई बार पूछताछ की. कहा जाता है कि वह वाझे की काली कमाई का हिसाबकिताब रखती थी. वाझे एक होटल में बैठ कर अपने काले कारनामों की योजना बनाता था. इसी होटल में वह अपने विश्वस्त लोगों से मिलता भी था.

पता चला कि वाझे 16 से 20 फरवरी के बीच नरीमन पौइंट के सब से आलीशान होटल ट्राइडेंट में रुका था. वाझे ने इस होटल में फरजी आधार कार्ड से बुकिंग कराई थी.

महाराष्ट्र एटीएस और एनआईए ने वाझे की 8 लग्जरी कारों के अलावा बैंकों में लाखों रुपए के लेनदेन के सबूत हासिल किए हैं. एक बैंक खाते में डेढ़ करोड़ रुपए जमा होने का पता चला है. उसे सर्विस रिवौल्वर के लिए दी गई 25 गोलियां कम मिलीं, जबकि 62 बेनामी कारतूस मिले. एक डायरी भी बरामद की गई है, जिस में अवैध वसूली और बड़े लोगों को ‘नजराना’ देने का हिसाबकिताब था.

अब इस मामले की जांच में सीबीआई भी जुड़ गई है. बौंबे हाईकोर्ट ने पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की याचिका पर महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ सीबीआई को जांच करने के आदेश दिए हैं. हाईकोर्ट का आदेश होने पर देशमुख ने 5 अप्रैल को गृहमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था.

एंटीलिया केस से शुरू हुए मामलों की जांच सीबीआई और एनआईए कर रही है. जबकि महाराष्ट्र एटीएस ने भी अपनी जांच बंद नहीं की है. हिरेन की स्कौर्पियो चोरी के मामले की जांच मुंबई पुलिस अलग से कर रही है.

एनआईए की पूछताछ में यह बात भी सामने आई है कि अंबानी के आवास के सामने विस्फोटकों से भरी स्कौर्पियो खड़ी करने के बाद वाझे ने एक बड़े एनकाउंटर की योजना बनाई थी. इस में वाझे कुछ लोगों का एनकाउंटर कर पूरे मामले को उन के सिर मढ़ने वाला था.

इस के लिए औरंगाबाद से चोरी एक मारुति ईको कार का उपयोग किया जाना था. आतंकी संगठन जैश उल हिंद के जिम्मेदारी लेने का मामला भी वाझे की ही चाल थी. वाझे को यह उम्मीद नहीं थी कि एनआईए की एंट्री इतनी जल्दी हो जाएगी. एनआईए की एंट्री के साथ ही वाझे का खेल बिगड़ने लग गया था.

इस कहानी में 3 मुख्य किरदार हैं— अनिल देशमुख, परमबीर सिंह और सचिन वाझे. इन में सब से अहम सचिन वाझे और उस की मित्र मंडली है. अब तीनों ही संकट में फंसे हुए हैं और तीनों की ही अलगअलग स्तरों पर जांच चल रही है. वाझे को नौकरी से बर्खास्त करने की प्रक्रिया चल रही है.

सचिन वाझे: मोहरा या बड़ा खिलाड़ी बनने की तमन्ना

करीब 2 महीने की जांचपड़ताल के बाद भी इस सवाल का जवाब सामने नहीं आया कि वाझे का अंबानी परिवार को धमकाने का मकसद अवैध रूप से धन वसूली था या कुछ और?

माना यही जा रहा है कि वाझे ने यह खेल अवैध वसूली के लिए खेला था. इस खेल के पीछे किसी पुलिस अधिकारी या नेता का हाथ था या फिर वाझे खुद अपने लिए वसूली करना चाहता था, यह पहेली भी नहीं सुलझी है.

अगले भाग में पढ़ें- वाझे का शिवसेना से  क्या नाता था

Crime Story: एंटीलिया को दहलाने में हिल गई सरकार- भाग 4

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जांच अभी चल रही है. जांच का ऊंट किस करवट बैठेगा, अभी कहना मुश्किल है. जांच में महाराष्ट्र की ठाकरे सरकार की सांसें अटकी हुई हैं. पता नहीं, कब चूलें हिल जाएं? भाजपा भी मौके की तलाश में गिद्धदृष्टि जमाए हुए है.

अभी सचिन वाझे ही खलनायक और सब से बड़े खिलाड़ी के रूप में सामने आया है. करीब 52 साल के पतलेदुबले सचिन वाझे को पहली नजर में देख कर कोई यकीन नहीं कर सकता कि इस आदमी ने दाऊद इब्राहिम के 3 दरजन शूटरों को मौत के घाट उतारा होगा.

वाझे से दाऊद तो दबता ही था, मुंबई के सट्टेबाज, ड्रग तस्कर, डांस बार मालिक और बड़ेबड़े बिल्डर भी घबराते थे. अपराधियों और पैसे वालों में उस का खौफ था. खौफ का कारण उस का दिमाग, तीन सितारों वाली खाकी वर्दी और हाथ में भरी रहने वाली पिस्तौल थी.

इसी खौफ के पीछे वाझे और उस की मंडली की मुठभेड़ों के झूठेसच्चे किस्से भी थे, जो दुर्दांत अपराधियों के चेहरे पर पसीने ला देते थे. इसी कारण उस ने अपने अफसरों और सरकार में दबदबा बना लिया था. वाझे के पुलिस महकमे में इतना पावरफुल बनने की कहानी काफी लंबी है.

महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर के एक स्थानीय नेता का बेटा सचिन क्रिकेटर और कालेज टीम का विकेटकीपर था. वह महाराष्ट्र पुलिस में भरती हुए 1990 बैच के पुलिस सबइंसपेक्टरों में से एक था. वाझे की पहली पोस्टिंग गढ़ चिरौली के माओवाद प्रभावित इलाके में हुई थी. 2 साल बाद उसे ठाणे शहर पुलिस में शिफ्ट कर दिया गया.

2000 के दशक में वह सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर प्रदीप शर्मा के संपर्क में आया. प्रदीप को तब ‘एनकाउंटर स्पैशलिस्ट’ के रूप में जाना जाता था. ये स्पैशलिस्ट मुंबई पुलिस की अपराध शाखा के क्रिमिनल इंटेलिजेंस यूनिट (सीआईयू) के सदस्य थे, जो सीधे पुलिस कमिश्नर और संयुक्त पुलिस कमिश्नर (अपराध) को रिपोर्ट करते थे.

सीआईयू को तब अंडरवर्ल्ड की बढ़ती ताकत और उन के अपराधों पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. साथ आने के बाद वाझे प्रदीप शर्मा का बेहद करीबी बन गया. प्रदीप की टीम में एक एनकाउंटर स्पैशलिस्ट दया नायक पहले से थे. दया नायक के जीवन पर रामगोपाल वर्मा ने फिल्म ‘अब तक छप्पन’ बनाई थी.

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मुंबई पुलिस में सब से ज्यादा 113 एनकाउंटर प्रदीप शर्मा ने किए हैं. वाझे और उस की टीम ने 63 से ज्यादा एनकाउंटर किए. मुन्ना नेपाली जैसे कुख्यात गैंगस्टर को ठिकाने लगाने के बाद वह शोहरत की बुलंदियों पर पहुंच गया था. सन 2002 में मुंबई के घाटकोपर में बेस्ट की बस में हुए बम विस्फोट मामले के संदिग्ध आरोपी सौफ्टवेयर इंजीनियर ख्वाजा यूनुस की पुलिस हिरासत में हुई मौत को ले कर पुलिस टीम का नेतृत्व करने वाला सचिन वाझे फंस गया था.

चर्चा रही कि यूनुस को हिरासत में मार दिया गया और उस की लाश नाले में फेंक दी गई थी. इस मामले में वाझे को 2004 में निलंबित कर दिया गया. उस ने 2006 में इस्तीफा दे दिया लेकिन जांच लंबित होने के कारण इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया.

वाझे ने 2008 में दशहरा रैली के मौके पर बड़ी धूमधाम के साथ शिवसेना का दामन थाम लिया था. तब शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने अपने निवास मातोश्री पर उस का स्वागत किया था.

वाझे का शिवसेना से नाता

वाझे जब पुलिस की नौकरी की पहली पारी खेल रहा था, तभी से उस के महाराष्ट्र की सब से ताकतवर शख्सियत बाला साहेब ठाकरे से अच्छे संबंध थे. इसीलिए वाझे की शिवसेना में एंट्री पर लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ.

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शिवसेना ने उसे प्रवक्ता बना दिया. वाझे भले ही शिवसेना में शामिल हो गया था, लेकिन सपने बहुत ऊंचे होने के कारण उस का मन पार्टी में नहीं लगा. इसलिए उसने पार्टी की सदस्यता का नवीनीकरण भी नहीं कराया.

शिवसेना से मोहभंग होने के बाद उस ने किताबें लिखीं और खुद को सौफ्टवेयर का हुनरमंद बनाया. सन 2010 में उस ने एक मराठी सोशल मीडिया ऐप लाइ भारी लौंच किया. इस के अलावा कई सौफ्टवेयर फर्मों की शुरुआत की. ये फर्में कुछ साल में बंद हो गईं.

वाझे शिवसेना में सक्रिय नहीं था. इस के बावजूद शिवसेना प्रमुख ठाकरे उस से इतने प्रभावित थे कि जब 2014 में भाजपाशिवसेना ने महाराष्ट्र में सत्ता संभाली, तो ठाकरे ने वाझे को पुलिस में फिर से लेने की सिफारिश की थी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एडवोकेट जनरल की सलाह पर ऐसा नहीं करने का फैसला किया था.

उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री बनने के बाद जून 2020 में वाझे को मुंबई पुलिस में फिर से शामिल कर लिया. उस समय कहा गया था कि मुंबई पुलिस में अफसरों की कमी के कारण वाझे को वापस लिया जा रहा है. मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह की अध्यक्षता वाली विशेष समिति की सिफारिश पर वाझे को दोबारा पुलिस में शामिल किया गया.

अगले भाग में पढ़ें- देशमुख सीबीआई की जांच में बचें य फंसें ?

Crime Story: एंटीलिया को दहलाने में हिल गई सरकार- भाग 6

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मुंबई पुलिस के इंसपेक्टर अनूप डांगे के अनुसार, परमबीर सिंह भी दूध के धुले नहीं हैं. इस बारे में डांगे ने महाराष्ट्र के अतिरिक्त गृह सचिव को एक पत्र भी लिखा था.

पत्र में डांगे ने कहा था 22 नवंबर 2019 की रात जब वह ब्रीच कैंडी इलाके के एक क्लब को बंद कराने पहुंचा, तो उस के मालिक जीतू नवलानी ने धमकी दी और परमबीर सिंह से अपने संपर्कों की बात कही. वहीं पर फिल्म फाइनेंसर भरत शाह के नाती ने एक कांस्टेबल से बदसलूकी की.

बाद में फरवरी, 2020 में जब परमबीर सिंह पुलिस कमिश्नर बने, तो उन्होंने नवलानी के खिलाफ आरोपपत्र दायर नहीं करने के आदेश दिए. नवलानी को अंडरवर्ल्ड डौन इकबाल मिर्ची के मनी लांड्रिंग मामले में ईडी ने गिरफ्तार किया था.

सचिन वाझे अप्रैल के पहले सप्ताह में जब एनआईए की हिरासत में था, तब उस का एक लिखित बयान मीडिया में सामने आया. इस में उस ने पूर्व गृहमंत्री देशमुख के साथ शिवसेना के वरिष्ठ नेता और महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री अनिल परब पर भी वसूली के लिए दबाव बनाने का आरोप लगाया था. साथ ही कहा था कि वसूली मामले की पूरी जानकारी देशमुख के पीए कुंदन को थी.

वाझे ने इस बयान में कहा था कि एनसीपी चीफ शरद पवार ने उन की बहाली का विरोध किया था. वह चाहते थे कि वाझे की बहाली रद्द कर दी जाए. पवार ने मुझे दोबारा निलंबित करने के लिए देशमुख से कहा था.

मुझे यह बात देशमुख ने ही बताई थी और पवार साहब को मनाने के लिए 2 करोड़ रुपए मांगे थे. इतनी बड़ी रकम देना मेरे लिए मुमकिन नहीं था. इस पर देशमुख ने यह रकम बाद में चुकाने को कहा था. इसी के बाद मुझे सीआईयू में नियुक्ति दी गई थी.

वाझे ने पत्र में कहा कि अनिल परब ने पिछले साल जुलाई, अगस्त, अक्टूबर और इस साल जनवरी में मुझे बुलाया और कुछ शिकायतों के आधार पर बीएमसी के कौन्ट्रैक्टरों पर दबाव बना कर अवैध वसूली करने को कहा.

देशमुख ने इस साल जनवरी में अपने सरकारी बंगले पर बुला कर पब व बार आदि से वसूली करने को कहा. ये सब बातें मैं ने तत्कालीन पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह को बता दी थीं और कहा था कि भविष्य में ये लोग मुझे किसी कंट्रोवर्सी में फंसा सकते हैं.

इस पर परमबीर सिंह ने मुझे किसी भी तरह की अवैध वसूली करने से मना कर दिया था. वाझे ने पत्र के आखिर में लिखा कि जज साहब, मैं न्याय चाहता हूं, इसलिए ये सब बातें लिख रहा हूं. इस लेटर बम परभाजपा और शिवसेना ने आरोपप्रत्यारोप लगाए.

महिला मित्र रखती थी हिसाब

निलंबित सहायक पुलिस निरीक्षक सचिन वाझे की एक महिला मित्र है, जिस का नाम मीना जार्ज है. वह ठाणे के मीरा रोड पर एक कौंप्लेक्स के फ्लैट में रहती है. मीना के फ्लैट से एनआईए को वाझे से जुड़े कई दस्तावेज मिले हैं.

कहा जाता है कि मीना ब्लैक मनी को वाइट करने में वाझे की मदद करती थी. उस के पास नोट गिनने की कई मशीनें भी मिली हैं. वह वाझे से मिलने के लिए दक्षिण मुंबई के ट्राइडेंट होटल गई थी. इस होटल की सीसीटीवी फुटेज के आधार पर ही एनआईए ने उस की तलाश शुरू की थी. मीना इस होटल में नोट गिनने की मशीन ले कर वाझे से मिलने गई थी.

कहा जा रहा है कि मूलरूप से गुजरात की रहने वाली मीना जार्ज ने आटो पार्ट्स की कई फरजी कंपनियां बना रखी थीं. बैंकों में भी उस के करीब एक दरजन खाते सामने आए हैं.

चर्चा है कि वाझे अपनी अवैध वसूली का पैसा मीना को देता था. वह उसे अपनी आटो पार्ट्स कंपनियों की कमाई बता कर बैंकों के सीसी खातों में जमा कराती थी. फिर इन पैसों से शेयर खरीदे जाते थे.

चर्चा है कि वाझे ने सरकारी नौकरी की दूसरी पारी शुरू करने के बाद से करोड़ों रुपए शेयर बाजार में निवेश किए. अंदेशा है कि मीना ही वाझे की काली कमाई का हिसाबकिताब रखती थी.

मीना जार्ज को वाझे कई सालों से जानता है. 2016 में उस की लग्जरी बाइक से वह एक बार मनाली गया था. यह बाइक एनआईए ने जब्त की है. एनआईए ने मीना से कई बार पूछताछ की है.

वाझे की 3 कंपनियां हैं. इन में मल्टीबिल्ड इंफ्रा प्रोजैक्ट, टकलीगल सोल्यूशंस और डीजी नेक्स्ट मल्टीमीडिया शामिल हैं. शिवसेना के नेता संजय माशेलकर और विजय गवई उन के बिजनैस पार्टनर हैं.

वाझे के पास 8 लग्जरी गाडि़यां हैं. इस के अलावा इटालियन बेनेली कंपनी की स्पोर्ट्स बाइक है, जिस की कीमत 7-8 लाख रुपए है. ठाणे में उस के फ्लैट की कीमत एक करोड़ रुपए के आसपास है. जबकि वाझे का मासिक वेतन कुल करीब 70 हजार रुपए है.

जांच में पता चला कि वाझे ने अंबानी के घर के सामने स्कौर्पियो में रखने के लिए जिलेटिन के छड़ें खरीदी थीं. उस ने ही क्रिकेट सटोरिए नरेश गोरे के जरिए अहमदाबाद से 11 सिमकार्ड मंगाए थे.

इन सिम का उपयोग शिंदे, नरेश और वाझे आदि ने पूरी साजिश की बातचीत में किया. वाझे के घर से एक अज्ञात व्यक्ति का पासपोर्ट मिला था. आशंका थी कि इस व्यक्ति को किसी फरजी मुठभेड़ में मारा जाना था.

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अंबानी के घर के सामने स्कौर्पियो में मिला धमकीभरा पत्र शिंदे के घर कंप्यूटर पर टाइप किया गया था, पुलिस ने उस के घर से प्रिंटर बरामद किया. इस पूरे मामले में वाझे का सहयोगी सहायक पुलिस निरीक्षक प्रकाश ओवल भी जांच के दायरे में है. उस से भी पूछताछ की गई है.

सीबीआई ने पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख, उन के पीए कुंदन शिंदे और निजी सचिव संजीव पलांडे सहित परमबीर सिंह और सचिन वाझे से पूछताछ की है. वहीं एनआईए ने भी परमबीर सिंह, वाझे, पूर्व पुलिस अधिकारी प्रदीप शर्मा, वकील जयश्री पाटिल और कुछ मौजूदा पुलिस अधिकारियों से पूछताछ की गई है.

Crime Story: एंटीलिया को दहलाने में हिल गई सरकार- भाग 5

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16 साल बाद सचिन वाझे की मुंबई पुलिस में यह दूसरी पारी थी. उसे पुलिस की हाईप्रोफाइल क्राइम ब्रांच में नियुक्त कर सीआईयू का प्रमुख बना दिया गया. वाझे को सीआईयू का चीफ बनाने पर दबे स्वर में विरोध भी हुआ था. इस का कारण था आमतौर पर इस पद की जिम्मेदारी सीनियर पुलिस इंसपेक्टर को दी जाती है जबकि वाझे सहायक पुलिस इंसपेक्टर था.

वाझे ने अपनी दूसरी पारी में सुर्खियों में आने के लिए उखाड़पछाड़ शुरू कर दी. उस ने दिसंबर 2020 में अवैध रूप से कारें मोडिफाई करने के मामले में सेलेब्रिटी कार डिजायनर दिलीप छाबडि़या को गिरफ्तार किया था.

इस से पहले वह नवंबर 2020 में रिपब्लिक टीवी के प्रधान संपादक अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार करने गई रायगढ़ पुलिस के साथ पहुंचा था. अर्नब का मामला रायगढ़ पुलिस का था, लेकिन कहा जाता है कि वाझे सरकार के इशारे पर वहां पहुंचा था और अर्नब को गिरफ्तार कर लाते हुए दिखाई दिया था.

खास बात यह कि वाझे ने अर्नब गोस्वामी के घर जाने के लिए मनसुख हिरेन की उसी स्कौर्पियो का इस्तेमाल किया था, जिस में इस साल 25 फरवरी को मुकेश अंबानी के आवास के सामने जिलेटिन की छड़ें मिली थीं.

मनसुख हिरेन की हत्या के मामले में गिरफ्तार पूर्व कांस्टेबल विनायक शिंदे के दामन पर भी कालिख पुती हुई है. शिंदे पर 11 नवंबर, 2006 को रामनारायण गुप्ता उर्फ लखन भैया की सनसनीखेज हत्या का आरोप था. इस मामले में अदालत ने सन 2013 में 13 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया था. इन में शिंदे भी एक था.

हालांकि इस मामले में अदालत ने पुलिस टीम के मुखिया प्रदीप शर्मा को बरी कर दिया था. इस मामले में नवी मुंबई की पुलिस ने दावा किया था कि लखन भैया को वर्सोवा में मुठभेड़ में मारा गया था, लेकिन हकीकत यह थी कि उसे ठाणे जिले के उस के घर से उठाया गया और बाद में मार दिया गया था.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश ने दोषी पुलिस वालों को ‘कौन्ट्रैक्ट किलर’ बताया था. जेल में उम्रकैद की सजा काट रहा शिंदे एक साल से पैरोल पर बाहर था. वह वाझे से मिलताजुलता रहता था.

एनकाउंटर स्पैशलिस्ट प्रदीप शर्मा भी 2008 में माफिया से संबंधों और फरजी मुठभेड़ मामले में निलंबित किए गए थे. शर्मा को भी परमबीर सिंह ने 2017 में वापस नौकरी में रखा था. परमबीर सिंह उस समय ठाणे पुलिस कमिश्नर थे. तब प्रदीप को एंटी एक्सटौर्शन सेल में लगाया गया था. मुंबई के पुलिस कमिश्नर रहे परमबीर सिंह के बारे में कई तरह के खुलासे हुए हैं. कहने को और पुलिस महकमे के प्रोटोकाल के हिसाब से वाझे उन के लिए एक अदना सा अधिकारी था, लेकिन वाझे से उन के गहरे ताल्लुक थे. कहा जाता है कि लगभग रोजाना परमबीर सिंह और वाझे एक बार साथ बैठ कर कौफी पीते थे.

पैसा तो परमबीर सिंह ने भी कमाया

परमबीर सिंह के पास सरकारी रिकौर्ड के अनुसार, 8 करोड़ 54 लाख रुपए की प्रौपर्टी है. उन के पास हरियाणा में कृषि भूमि है. अभी इस की वैल्यू 22 लाख रुपए बताई है. इस से 51 हजार रुपए की सालाना आय होती है. सन 2003 में उन्होंने मुंबई के जुहू इलाके में 48.75 लाख का फ्लैट खरीदा था. इस की मौजूदा कीमत 4.64 करोड़ रुपए है. इस से उन्हें 25 लाख रुपए की सालाना आय होती है.

जुहू में उन की एक और प्रौपर्टी है. इस की कीमत उन्होंने नहीं बताई है. उन्होंने नवी मुंबई में 2005 में 3.60 करोड़ का एक और फ्लैट खरीदा था. इस की मौजूदा कीमत केवल 2.24 करोड़ रुपए बताई जाती है. यह फ्लैट पतिपत्नी के नाम है. इस से बतौर किराया 9.60 लाख रुपए की सालाना आय होती है.

फरीदाबाद में भी परमबीर सिंह ने 2019 में जमीन खरीदी थी, जिस की वर्तमान कीमत 14 लाख रुपए  है. जबकि उन का मासिक वेतन 2.24 लाख रुपए है.

पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले परमबीर सिंह को अब महाराष्ट्र सरकार घेरने की तैयारी में है. वाझे के मामले में सरकार परमबीर सिंह की अलग से जांच करा रही है.

इस जांच का जिम्मा परमबीर सिंह के कट्टर विरोधी सीनियर आईपीएस अधिकारी संजय पांडे को सौंपा गया है. सरकार ने संजय पांडे को पुलिस महानिदेशक का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा है.

देशमुख सीबीआई की जांच में बचेंगे या फंसेंगे?

पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने 22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर अनिल देशमुख के खिलाफ सीबीआई जांच की मांग की थी. भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि एक पूर्व पुलिस आयुक्त अपने राज्य के गृहमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरापों की सीबीआई से जांच के लिए अदालत पहुंचा था.

तब सुप्रीम कोर्ट ने मामले को गंभीर बताते हुए उन्हें हाईकोर्ट जाने की सलाह दी थी. इस के बाद परमबीर सिंह ने 24 मार्च को बौंबे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने 31 मार्च को परमबीर सिंह की याचिका पर सुनवाई की. चीफ जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी ने परमबीर सिंह को फटकार लगाई.

उन्होंने कहा कि आप ने गृहमंत्री देशमुख के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं, लेकिन उन्हें ले कर कोई एफआईआर क्यों नहीं दर्ज कराई. बिना किसी रिपोर्ट के आखिर उस की सीबीआई जांच कैसे कराई जा सकती है?

चीफ जस्टिस ने कहा कि भले ही आप पुलिस कमिश्नर रहे हैं, लेकिन आप कानून से ऊपर नहीं हैं. क्या पुलिस अधिकारी, मंत्री और नेता कानून से ऊपर हैं? खुद को बहुत ऊपर मत समझिए.

जब आप को पता था कि बौस अपराध कर रहा है, तो एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की? अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया.

बाद में 5 अप्रैल को बौंबे हाईकोर्ट ने देशमुख पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच सीबीआई से कराने के आदेश दिए. अदालत ने कहा कि हम ने इस तरह का मामला पहले कभी नहीं देखा, न ही सुना. एक पुलिस अफसर ने इतने खुले रूप में एक मंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं. ऐसे हालात में अदालत मूकदर्शक नहीं बनी रह सकती. मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए.

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हाईकोर्ट से सीबीआई जांच के आदेश होने के कुछ देर बाद ही देशमुख एनसीपी प्रमुख शरद पवार से मिले. फिर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को अपना इस्तीफा सौंप दिया. इस्तीफे में लिखा कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद मेरा पद पर बने रहना नैतिक रूप से सही नहीं होगा. बाद में उसी दिन एनसीपी के दिलीप वल्से पाटिल को महाराष्ट्र का नया गृहमंत्री बना दिया गया.

हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने 6 अप्रैल को देशमुख पर लगे आरोपों की जांच शुरू कर दी. दूसरी ओर, हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ महाराष्ट्र सरकार और देशमुख ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई.

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को उन की अरजी खारिज करते हुए कहा कि यह 2 बड़े पदों पर बैठे लोगों से जुड़ा मामला है. लोगों का भरोसा बना रहे, इसलिए निष्पक्ष जांच जरूरी है. हम हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं देंगे.

अगले भाग में पढ़ें-  पत्र में लिखा था महिला मित्र रखती थी हिसाब

Serial Story: स्वप्न साकार हुआ- भाग 2

लेखिका-  साधना श्रीवास्तव

‘डार्लिंग, अभी तो मुझे जाना है. हां, 1 घंटे बाद जब वापस आऊंगा तो उधर से ही सब्जी लेता आऊंगा,’ अरविंद बोले.

‘लेकिन सब्जी तो इसी समय के लिए चाहिए,’ वसुधा बोली, ‘ऐसा कीजिए, बबली को अपने साथ लेते जाइए और सब्जी खरीद कर इसे ही दे दीजिएगा. यह लेती आएगी.’

चाय पीने के बाद अरविंद ने बबली से चलने को कहा तो वह दूसरी तरफ का आगे का दरवाजा खोल कर उन की बगल की सीट पर धम से बैठ गई और जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ी, अचानक अरविंद के कंधे पर हाथ मार कर बबली बोली, ‘अपन को 1 सिगरेट चाहिए, है क्या?’

अरविंद चौंक से गए. यह कैसी लड़की है? फिर बबली की आवाज कानों में पड़ी, ‘लाओ न बाबूजी, सिगरेट है?’

अरविंद ने गाड़ी रोक दी और उस की तरफ देखते हुए जोर से बोले, ‘बबली, आज तू पागल हो गई है क्या? सिगरेट पीएगी?’

अरविंद की आवाज बबली के कानों में गरम लावे जैसी पड़ी. तंद्रा टूटते ही उसे लगा कि अतीत के दिनों की आदतें उस पर न चाहते हुए भी जबतब हावी हो जाती हैं. अपने को संभालती हुई बबली बोली, ‘अंकल, आज मैं बहुत थकी हुई थी. आप की गाड़ी में हवा लगी तो झपकी आ गई. उसी में पता नहीं कैसेकैसे सपने आने लगे. जैसे कोई सिगरेट पीने को मांग रहा हो. माफ कीजिए अंकल, गलती हो गई.’ हाथ जोड़ कर बबली गिड़गिड़ाई.

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अरविंद को बबली की यह बात सच लगी और वह चुप हो गए. कार आगे बढ़ी. ढेर सारी सब्जियां खरीदवा कर अरविंद ने बबली को घर छोड़ा और अपने काम से चले गए.

अरविंद ने इस घटना का घर पर कोई जिक्र नहीं किया. वह अनुमान भी नहीं लगा सके कि बबली बार बाला है पर उस की कमजोरी को उन्होंने भांप लिया था.

बबली को अपनी इस फूहड़ता पर बड़ी ग्लानि हुई. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि इतना सावधान रहने पर भी उस से बारबार गलती क्यों हो जाती है. उस ने दृढ़ निश्चय किया कि वह भविष्य में अपने पर नियंत्रण रखेगी ताकि उस का काला अतीत आगे के जीवन में अपनी कालिमा न फैला सके.

बीतते समय के साथ सबकुछ सामान्य हो गया. बबली अपने काम में इस कदर तल्लीन हो गई कि सिगरेट मांगने वाली घटना को भूल ही गई.

एक दिन वसुधा ने बबली को चाबी पकड़ाते हुए कहा, ‘मुझे दोपहर बाद एक सहेली के घर जन्मदिन पार्टी में जाना है, तुम समय से आ कर खाना बना देना. मुझे लौटने में देर हो सकती है. राजन तो आज होस्टल में रुक गया है लेकिन अरविंदजी को समय से खाना खिला देना.’

‘जी, आंटी, लेकिन अगर साहब को आने में देर होगी तो मैं मेज पर उन का खाना लगा कर चली जाऊंगी.’

‘ठीक है, चली जाना.’

शाम को जल्दी आने की जगह बबली कुछ देर से आई तो देखा दरवाजा अंदर से बंद है. उस ने दरवाजे की घंटी बजाई तो अरविंद ने दरवाजा खोला. उसे कुछ संकोच हुआ. फिर भी काम तो करना ही था. सो अंदर सीधे रसोई में जा कर अपने काम में लग गई.

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बरतन व रसोई साफ करने के बाद बबली बैठ कर सब्जी काट रही थी कि अरविंद ने कौफी बनाने के लिए बबली से कहा.

कौफी बना कर बबली उसे देने के लिए उन के कमरे में गई तो देखा, वह पलंग पर लेटे हुए थे और उन्होंने इशारे से कौफी की ट्रे को पलंग की साइड टेबल पर रखने को कहा.

बबली ने अभी कौफी की ट्रे रखी ही थी कि उन्होंने उस का हाथ पकड़ कर खींच लिया. वह धम से उन के ऊपर गिर पड़ी. उसे अपनी बांहों में भरते हुए अरविंद ने कहा, ‘जानेमन, तुम ने तो कभी मौका नहीं दिया, लेकिन आज यह सुअवसर मेरे हाथ लगा है.’

बबली अपने को उन के बंधन से छुड़ाते हुए बोली, ‘छोडि़ए अंकल, क्या करते हैं?’

लेकिन अरविंद ने उसे छोड़ने की जगह अपनी बांहों में और भी शक्ति के साथ जकड़ लिया. अपने बचने का कोई रास्ता न देख कर बबली ने हिम्मत कर के एक जोरदार तमाचा अरविंद के गाल पर जड़ दिया. अप्रत्याशित रूप से पड़े इस तमाचे से अरविंद बौखला से गए.

‘दो कौड़ी की छोकरी, तेरी यह हिम्मत,’ कहते हुए अरविंद उस पर जानवरों जैसे टूट पड़े थे कि तभी दरवाजे की घंटी बज उठी और उन की पकड़ एकदम ढीली पड़ गई.

बबली को लगा कि जान में जान आई और भाग कर उस ने दरवाजा खोल दिया. सामने वसुधा खड़ी थी. उन से बिना कुछ कहे बबली रसोई में खाना बनाने चली गई.

खाना बनाने का काम समाप्त कर बबली जाने के लिए वसुधा से कहने आई. वसुधा ने देखा खानापीना सबकुछ तरीके से मेज पर सज गया था. उस की प्रशंसा करती हुई वसुधा ने कहा, ‘बबली, मुझे तुम्हारा काम बहुत पसंद आता है. मैं जल्दी ही तुम्हारे पैसे बढ़ा दूंगी.’

इतने समय में बबली ने निश्चय कर लिया कि अब वह इस घर में काम नहीं करेगी. अत: दुखी स्वर में बोली, ‘आंटी, इतने दिनों तक आप के साथ रह कर मैं ने बहुत कुछ सीखा है लेकिन कल से मैं आप के घर में काम नहीं करूंगी. मुझे क्षमा कीजिएगा…मेरा भी कोई आत्म- सम्मान है जिसे खो कर मुझे कहीं भी काम करना मंजूर नहीं है.’

‘अरे, यह तुझे क्या हो गया? मैं ने तो कभी भी तुझे कुछ कहा नहीं,’ वसुधा ने जानना चाहा.

‘आप ने तो कभी कुछ नहीं कहा आंटी, पर मैं…’ रुक गई बबली.

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अब वसुधा का माथा ठनका. वह सीधे अरविंद के कमरे में पहुंचीं और बोलीं, ‘आज आप ने बबली को क्या कह दिया कि वह काम छोड़ कर जाने को तैयार है?’

अरविंद ने अपनी सफाई देते हुए कहा, ‘हां, थोड़ा डांट दिया था. कौफी पलंग पर गिरा दी थी. लेकिन कह दो, अब कभी कुछ नहीं कहूंगा.’

पति की बात को सच मान कर वसुधा ने बबली को बहुतेरा समझाया लेकिन वह काम करने को तैयार नहीं हुई.

Mother’s Day Special: मां का फैसला- भाग 1

रजनीगंधा की बड़ी डालियों को माली ने अजीब तरीके से काटछांट दिया था. उन्हें सजाने में मुझे बड़ी मुश्किल हो रही थी. बिट्टी ने अपने झबरे बालों को झटका कर एक बार उन डालियों से झांका, फिर हंस कर पूछा, ‘‘मां, क्यों इतनी परेशान हो रही हो. अरे, प्रभाकर और सुरेश ही तो आ रहे हैं…वे तो अकसर आते ही रहते हैं.’’ ‘‘रोज और आज में फर्क है,’’ अपनी गुडि़या सी लाड़ली बिटिया को मैं ने प्यार से झिड़का, ‘‘एक तो कुछ करनाधरना नहीं, उस पर लैक्चर पिलाने आ गई. आज उन दोनों को हम ने बुलाया है.’’

बिट्टी ने हां में सिर हिलाया और हंसती हुई अपने कमरे में चली गई. अजीब लड़की है, हफ्ताभर पहले तो लगता था, यह बिट्टी नहीं गंभीरता का मुखौटा चढ़ाए उस की कोई प्रतिमा है. खोईखोई आंखें और परेशान चेहरा, मुझे राजदार बनाते ही मानो उस की उदासी कपूर की तरह उड़ गई और वही मस्ती उस की रगों में फिर से समा गई.

‘मां, तुम अनुभवी हो. मैं ने तुम्हें ही सब से करीब पाया है. जो निर्णय तुम्हारा होगा, वही मेरा भी होगा. मेरे सामने 2 रास्ते हैं, मेरा मार्गदर्शन करो.’ फिर आश्वासन देने पर वह मुसकरा दी. परंतु उसे तसल्ली देने के बाद मेरे अंदर जो तूफान उठा, उस से वह अनजान थी. अपनी बेटी के मन में उठती लपटों को मैं ने सहज ही जान लिया था. तभी तो उस दिन उसे पकड़ लिया.

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कई दिनों से बिट्टी सुस्त दिख रही थी, खोईखोई सी आंखें और चेहरे पर विषाद की रेखाएं, मैं उसे देखते ही समझ गई थी कि जरूर कोई बात है जो वह अपने दिल में बिठाए हुए है. लेकिन मैं चाहती थी कि बिट्टी हमेशा की तरह स्वयं ही मुझे बताए. उस दिन शाम को जब वह कालेज से लौटी तो रोज की अपेक्षा ज्यादा ही उदास दिखी. उसे चाय का प्याला थमा कर जब मैं लौटने लगी तो उस ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया और रोने लगी.

बचपन से ही बिट्टी का स्वभाव बहुत हंसमुख और चंचल था. बातबात में ठहाके लगाने वाली बिट्टी जब भी उदास होती या उस की मासूम आंखें आंसुओं से डबडबातीं तो मैं विचलित हो उठती. बिट्टी के सिवा मेरा और था ही कौन? पति से मानसिकरूप से दूर, मैं बिट्टी को जितना अपने पास करती, वह उतनी ही मेरे करीब आती गई. वह सारी बातों की जानकारी मुझे देती रहती. वह जानती थी कि उस की खुशी में ही मेरी खुशी झलकती है. इसी कारण उस के मन की उठती व्यथा से वही नहीं, मैं भी विचलित हो उठी. सुरेश हमारे बगल वाले फ्लैट में ही रहता था. बचपन से बिट्टी और सुरेश साथसाथ खेलते आए थे. दोनों परिवारों का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. उस की मां मुझे मानती थी. मेरे पति योगेश को तो अपने व्यापार से ही फुरसत नहीं थी, पर मैं फुरसत के कुछ पल जरूर उन के साथ बिता लेती. सुरेश बेहद सीधासादा, अपनेआप में खोया रहने वाला लड़का था, लेकिन बिट्टी मस्त लड़की थी.

बिट्टी का रोना कुछ कम हुआ तो मैं ने पूछ लिया, ‘आजकल सुरेश क्यों नहीं आता?’ ‘वह…,’ बिट्टी की नम आंखें उलझ सी गईं.

‘बता न, प्रभाकर अकसर मुझे दिखता है, सुरेश क्यों नहीं?’ मेरा शक सही था. बिट्टी की उदासी का कारण उस के मन का भटकाव ही था. ‘मां, वह मुझ से कटाकटा रहता है.’

‘क्यों?’ ‘वह समझता है, मैं प्रभाकर से प्रेम करती हूं.’

‘और तू?’ मैं ने उसी से प्रश्न कर दिया. ‘मैं…मैं…खुद नहीं जानती कि मैं किसे चाहती हूं. जब प्रभाकर के पास होती हूं तो सुरेश की कमी महसूस होती है, लेकिन जब सुरेश से बातें करती हूं तो प्रभाकर की चाहत मन में उठती है. तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं. किसे अपना जीवनसाथी चुनूं?’ कह कर वह मुझ से लिपट गई.

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मैं ने उस के सिर पर हाथ फेरा और सोचने लगी कि कैसा जमाना आ गया है. प्रेम तो एक से ही होता है. प्रेम या जीवनसाथी चुनने का अधिकार उसे मेरे विश्वास ने दिया था. सुरेश उस के बचपन का मित्र था. दोनों एकदूसरे की कमियों को भी जानते थे, जबकि प्रभाकर ने 2 वर्र्ष पूर्व उस के जीवन में प्रवेश किया था. बिट्टी बीएड कर रही थी और हम उस का विवाह शीघ्र कर देना चाहते थे, लेकिन वह स्वयं नहीं समझ पा रही थी कि उस का पति कौन हो सकता है, वह किस से प्रेम करती है और किसे अपनाए.

Serial Story: बीवी का आशिक- भाग 4

लेखक- एम. अशफाक

अंदर से क्वार्टर देखा, बहुत अच्छी तरह सजा हुआ था. रसोई तो और भी ज्यादा अच्छी तरह सजी हुई थी. मर्द कितना ही सफाई वाला हो, लेकिन इस तरह रसोई और घर नहीं सजा सकता. एएसएम तो वैसे भी अविवाहित था, मेरी छठी इंद्री जाग गई.

‘‘तुम्हारा खाना कौन पकाता है?’’

‘‘जी, वह पानी वाला पका देता है.’’

मैं ने उस का जवाब एक पुलिस वाले की नजर से उस के चेहरे की ओर देखते हुए सुना. मैं ने देखा उस के चेहरे का रंग बदल रहा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस उजाड़ में तुम्हारा दिल कैसे लगता है?’’

वह बोला, ‘‘बस जी, कोई किताब पढ़ लेता हूं या फिर घूमने निकल जाता हूं.’’

बातें करतेकरते हम घर से बाहर निकले तो क्वार्टर के सामने कुछ झोपडि़यां दिखाई दीं. मैं ने उस से पूछा, ‘‘ये किस की झोपडि़यां हैं?’’

‘‘जी, वे भीलों के झोपडे़ हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘चलो, चल कर देखते हैं.’’

वहां गए तो झोपडि़यों के पास कुछ बकरियां बंधी थीं. हमें देख कर कुत्ते भौंकने लगे. उन की आवाज सुन कर झोपडि़यों से औरतें निकल आईं और हमारी ओर देखने लगीं.

मैं ने झोपडि़यों का चक्कर लगा कर देखा तो वहां औरतें ही नजर आईं, मर्द कोई नहीं था. मैं ने उन औरतों से उन के मर्दों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे थरपारकर (रेगिस्तान की एक जगह) में खेतों पर काम करने जाते हैं.’’

‘‘तुम्हारे मर्द खेतों पर रहते हैं और तुम?’’ सवाल सुन कर एक औरत बोली, ‘‘वे वहां और हम यहां.’’

‘‘तुम क्या काम करती हो?’’

‘‘बकरियों का दूध निकाल कर रेलवे वालों को बेचते हैं.’’ एक औरत ने एएसएम को देख कर कहा, ‘‘ये बाबू तो यहां भी दूध लेने आ जाते हैं.’’

मैं ने उसी औरत से कहा, ‘‘तुम्हारा आदमी कहां है?’’

उस ने कहा, ‘‘बताया था ना थरपारकर में काम करता है.’’

‘‘वह यहां कब आता है?’’

‘‘1-2 महीने बाद आता है.’’

‘‘उसे आए हुए कितने दिन हो गए?’’

‘‘एक महीने से तो उस ने सूरत भी नहीं दिखाई.’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘तुम्हारे आदमी का क्या नाम है?’’

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वह कुछ लजा गई, दूसरी औरत ने बताया, ‘‘शिवाराम नाम है.’’

मैं ने एएसएम का बाजू पकड़ा और उसे स्टेशन पर ले आया. एएसएम का उजाड़ इलाके में क्वार्टर, भीलों की जवान लड़की, वह दूध लेने उन के घर जाता था. निस्संदेह वह कोई फरिश्ता नहीं था. उस समय सुबह 7 बजे थे. मैं ने वहां के थाने से पुलिस इंसपेक्टर को बुलवाया और उस से ऊंटों का इंतजाम करने के लिए कहा. उस ने तुरंत ऊंट बुलवा लिए.

मैं पुलिस इंसपेक्टर और 2 सिपाहियों को ले कर थर पार कर के खेतीबाड़ी वाले इलाके में 20 मील लंबा सफर कर के पहुंच गया. शाम का समय था, कुछ लोग अब भी खेतों पर काम कर रहे थे. ऊंट रुकवा कर मैं उन लोगों की ओर गया. पुलिस की वरदी में देख कर वे सब खड़े हो गए.

मैं ने जाते ही सख्ती से पूछा, ‘‘तुम में शिवा कौन है?’’

वे सब डर गए थे, फिर धीरेधीरे एक आदमी हमारी ओर आया. मैं ने पूछा, ‘‘तुम हो शिवा?’’

‘‘हां, मेरा ही नाम शिवा है.’’ उस की आवाज में जरा भी घबराहट नहीं थी.

‘‘तुम ने हत्या की है. मैं तुम्हें गिरफ्तार करने आया हूं. वह कुल्हाड़ी कहां है, जिस से तुम ने हत्या की है?’’

वह जवाब देने के बजाए एक ओर मुंह घुमा कर देख रहा था, वहां एक झोंपड़ी थी. मेरा हमला उस पर इतना सख्त और जल्दबाजी वाला था कि वह संभल नहीं सका. सूबेदार को अपने एरिए का राजा समझने वाला भील अपने बचाव के बारे में सोच भी नहीं सका.

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शिवा मेरे साथ झोपड़ी में गया और वहां से एक कुल्हाड़ी और खून में सने अपने कपड़े जमीन से खोद कर मेरे हवाले कर दिए. वह बिलकुल शांत था, उस के चेहरे से घमंड साफ दिखाई दे रहा था. वह यही समझ रहा था कि उस ने एक व्यभिचारी एएसएम को अपनी पत्नी को बिगाड़ने का बदला ले लिया है.

लेकिन जिस रात वह एएसएम की हत्या करने के लिए कुल्हाड़ी ले कर उस जगह गया था, जहां एएसएम सोया करता था, वहां वह अफसर सोया हुआ था, जो निरीक्षण के लिए आया हुआ था.

हत्यारे ने अंधेरे में अपने शिकार को पहचाना नहीं, उसे यह पता था कि यहां हर रात वही बाबू सोता था, जिस के क्वार्टर में उस की जवान पत्नी दूध देने जाती थी.

उस के  ऊपर हत्या का भूत सवार था. हत्या करने के बाद उसे 20 मील दूर भी जाना था. उसे जब आजीवन कारावास की सजा हुई तो उसे इस का दुख नहीं था, दुख तो उस की पत्नी के प्रेमी के बच जाने का था.

प्रस्तुति : एस.एम. खान

Serial Story: मासूम कातिल- भाग 4

लेखक- गजाला जलील

पेट में पलती औलाद ने मुझे खुदकशी करने न दी. फिर मेरी बदनसीब बेटी अदीना पैदा हो गई. मेरे जिस्म का एक टुकड़ा मेरी गोद में था. मैं ने अपना घर बेच दिया, एक गुमनाम मोहल्ले में एक कमरा खरीद कर रहने लगी. मैं ने अपनी पुरानी सब बातें भुला दीं. मकान से अच्छी रकम मिली थी. फिर मैं थोड़ाबहुत सिलाईकढ़ाई का काम करने लगी.

हम मांबेटी की अच्छी गुजर होने लगी. मैं ने अपनी बेटी की बहुत अच्छी परवरिश की. उसे दुनिया की हर ऊंचनीच समझाई. उस से वादा लिया कि वह मुझ से कोई बात नहीं छिपाएगी. अदीना बेइंतहा हसीन निकली. मैं ने उसे अच्छी तालीम दिलाई. वह बीएससी कर रही थी. एक दिन वह मुझ से कहने लगी, ‘‘मम्मी, मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘कहो.’’

‘‘मैं नौकरी करना चाहती हूं. मेरे एग्जाम भी पूरे हो गए हैं. रिजल्ट भी जल्द आएगा.’’

‘‘नहीं बेटी, नौकरी ढूंढना और करना बड़ा कठिन है.’’

‘‘मम्मी, मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई है.’’

‘‘कहां मिल गई नौकरी तुम्हें?’’

‘‘एक प्राइवेट फर्म है. फर्म के मालिक ने मुझे खुद नौकरी का औफर दिया है. मेरी इमरान साहब से कालेज के फंक्शन में मुलाकात हुई थी. वह चीफ गेस्ट थे. इतने नेक और सादा मिजाज आदमी हैं कि देख कर आप दंग रह जाएंगी.’’

‘‘कौन?’’ मुझे जैसे बिच्छू ने डंक मारा.

‘‘इमरान हसन साहब. बड़े हमदर्द इंसान हैं.’’ अदीना उन के बारे में पता नहीं क्याक्या बोलती रही. मुझे लगा, मेरे चारों तरफ जहन्नुम की आग दहक रही हो. फिर मैं ने खुद पर काबू पाया और कुछ सोच कर अदीना को नौकरी की इजाजत दे दी.

वह मेरी हां सुन कर खुशी से खिल उठी. साथ ही मैं ने एक काम किया. चुपचाप उस का पीछा करना शुरू कर दिया. मैं ने इमरान हसन को देखा, वह उतना ही खूबसूरत और डैशिंग था.

उम्र की अमीरी ने उसे और ग्रेसफुल बना दिया था. मैं उस के एकएक रूप एकएक चाल से वाकिफ थी. फिर मैं ने अदीना को अपनी गमभरी दास्तान सुनाई. वह कांप उठी, उस ने चीख कर पूछा, ‘‘ममा, कौन था वह कमीना बेदर्द इंसान?’’

‘‘मैं खुद उस बेगैरत की तलाश में हूं.’’

‘‘काश! वह मिल जाए.’’ अदीना ने गुर्राते हुए कहा तो मैं ने पूछा, ‘‘क्या करेगी तू उस का?’’

‘‘खुदा की कसम है मम्मी, मैं उसे जान से मार डालूंगी. ऐसा हाल करूंगी कि दुनिया देखेगी.’’

मुझे सुकून मिल गया, मैं ने अदीना की परवरिश इसी तरह की थी. ऐसा ही बनाया था उसे. मेरी निगरानी जारी थी. मैं चुपचाप उस का पीछा करती रही. उस दिन भी मैं अदीना से ज्यादा दूर नहीं थी, जब वह अदीना को अपनी शानदार कार में कहीं ले जा रहा था. वह अदीना को अपने घर ले गया. मैं भी छिप कर अंदर आ गई और दरवाजे के पीछे खड़ी हो गई.

मैं सारे रास्तों से वाकिफ थी. घर सुनसान पड़ा था. हलका अंधेरा था. मेरे कानों में इमरान हसन की नशीली आवाज पड़ी, ‘‘अदीना, तुम मेरी जिंदगी में बहार बन कर आई हो. मैं ने सारी जिंदगी तुम जैसी हसीना की तलाश में तनहा गुजार दी.’’

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‘‘सर, ये आप क्या कह रहे हैं. मैं तो आप पर बहुत ऐतमाद करती थी. आप पर बहुत भरोसा है मुझे.’’

‘‘हां ठीक है, पर मोहब्बत तो उफनती नदी है. उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती. तुम्हारी चाहत मेरी रगरग में समा गई है. मेरी जान, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘सर, ये आप गलत कर रहे हैं. आप मुझे यहां यह कह कर लाए थे कि कुछ लेटर्स भेजने हैं.’’

‘‘ये मेरा घर है और तुम अपनी मरजी से मेरे घर आई हो. अब यहां जो कुछ होगा, उस में तुम्हारी रजा भी समझी जाएगी. इस में मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर तुम बदनाम हो जाओगी. लोग कहेंगे तुम मेरे सूने घर में क्यों आई थीं?’’

‘‘सर, आप मुझे काम के बहाने लाए थे.’’

‘‘कौन सुनेगा, तुम्हारी बकवास.’’ वह हंस कर आगे बढ़ा. उसी वक्त मैं अंदर दाखिल हो गई. मैं ने कहा, ‘‘अदीना, यही है वह आदमी जिस की कहानी मैं ने तुम्हें सुनाई थी. यही है वह वहशी दरिंदा, जिस ने मेरी इज्जत लूटी थी.’’

इमरान मुझे देख कर हैरान रह गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘इमरान, ये तेरी बेटी है. तेरा गुनाह है.’’

फिर हम दोनों मसरूफ हो गए. अदीना ने अपना वादा निभाया. उसे कोने में रखा डंडा मिल गया. हम ने अपना इंतकाम लिया. इज्जत के लुटेरे उस शैतान को हम ने खत्म कर दिया. हम ने बहुत बड़ा नेक काम किया है और कई लड़कियों की इज्जत बचाई है. भले ही आप हमें सजा दीजिए, हमें मंजूर है. सुहाना चुप हो गई.

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यह मेरी जिंदगी का सब से संगीन केस था. मैं बड़ी उलझन में था. अदालत में मैं सरकारी वकील की हैसियत से खड़ा था. मुझे इन मांबेटी पर संगीन जुर्म साबित करना था. उन के खिलाफ बोलना था, पर मेरा जमीर इस बात पर राजी नहीं था. मेरा दिल कहता था कि मैं यह मुकदमा हार जाऊं.

मुझे नहीं मालूम मैं ये मुकदमा ठीक से लड़ पाऊंगा या नहीं. मेरी जबान जैसे गूंगी हो गई थी. मैं अपनी बात कह नहीं पा रहा था. जुबान लड़खड़ा रही थी. और सचमुच मैं यह मुकदमा हार गया. मांबेटी सजा से बच गईं. मैं सही था या नहीं, कह नहीं सकता. आप खुद फैसला कीजिए.

(प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन)

Mother’s Day Special- बहू-बेटी : आखिर क्यों सास के रवैये से परेशान थी जया

Mother’s Day Special- बहू-बेटी: भाग 1

लेखक-अश्विनी कुमार भटनागर

घर क्या था, अच्छाखासा कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ था. सुबह की ट्र्र्रेन से बेटी और दामाद आए थे. सारा सामान बिखरा हुआ था. दयावती ने महरी से कितना कहा था कि मेहमान आ रहे हैं, जरा जल्दी आ कर घर साफ कर जाए. 10 बज रहे थे, पर महरी का कुछ पता नहीं था. झाडू बुहारु तो दूर, अभी तो रात भर के बरतन भी पड़े थे. 2-2 बार चाय बन चुकी थी, नाश्ता कब निबटेगा, कुछ पता नहीं था.

रमेश तो एक प्याला चाय पी कर ही दफ्तर चला गया था. उस की पत्नी जया अपनी 3 महीने की बच्ची को गोद में लिए बैठी थी. उस को रात भर तंग किया था उस बच्ची ने, और वह अभी भी सोने का नाम नहीं ले रही थी, जहां गोद से अलग किया नहीं कि रोने लगती थी.

इधर कमलनाथ हैं कि अवकाश प्राप्त करने के बाद से बरताव ऐसा हो गया है जैसे कहीं के लाटसाहब हो गए हों. सब काम समय पर और एकदम ठीक होना चाहिए. कहीं कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. उन के घर के काम में मदद करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था.

गंदे बरतनों को देख कर दयावती खीज ही रही थी कि रश्मि बेटी ने आ कर मां को बांहों में प्यार से कस ही नहीं लिया बल्कि अपने पुराने स्कूली अंदाज से उस के गालों पर कई चुंबन भी जड़ दिए.

दयावती ने मुसकरा कर कहा, ‘‘चल हट, रही न वही बच्ची की बच्ची.’’

‘‘क्या हो रहा है, मां? पहले यह बताओ?’’

मां ने रश्मि को सारा दुखड़ा रो दिया.

‘‘तो इस में क्या बात है? तुम अपने दामाद का दिल बहलाओ. मैं थोड़ी देर में सब ठीक किए देती हूं.’’

‘‘पगली कहीं की,’’ मां ने प्यार से झिड़क कर कहा, ‘‘2 दिन के लिए तो आई है. क्या तुझ से घर का काम करवाऊंगी?’’

‘‘क्यों, क्या अब तुम्हारी बेटी नहीं रही मैं? डांटडांट कर क्या मुझ से घर का काम नहीं करवाया तुम ने? यह घर क्या अब पराया हो गया है मेरे लिए?’’ बेटी ने उलाहना दिया.

‘‘तब बात और थी, अब तुझे ब्याह जो दिया है. अपने घर में तो सबकुछ करती ही है. यहां तो तू बैठ और दो घड़ी हंसबोल कर मां का दिल बहला.’’

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं सुनूंगी. तुम अब यहां से जाओ. या तो इन के पास जा कर बैठो या छुटकी को संभाल लो और भाभी को यहां भेज दो. हम दोनों मिल कर काम निबटा देंगे.’’

‘‘अरे, बहू को क्या भेजूं, उसे तो छुटकी से ही फुरसत नहीं है. यह बच्ची भी ऐसी है कि दूसरे के पास जाते ही रोने लगती है. रोता बच्चा किसे अच्छा लगता है?’’

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रश्मि को मां की बात में कुछ गहराई का एहसास हुआ. कहीं कुछ गड़बड़ लगती है, पर उस ने कुरेदना ठीक नहीं समझा. वह भी किसी की बहू है और उसे भी अपनी सास से निबटना पड़ता है. तालमेल बिठाने में कहीं न कहीं किसी को दबना ही पड़ता है. बिना समझौते के कहीं काम चलता है?

बातें करतेकरते रश्मि ने एक प्याला चाय बना ली थी. मां के हाथों में चाय का प्याला देते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम जाओ, मां, उन्हें चाय दे आओ. उन को तो दिन भर चाय मिलती रहे, फिर कुछ नहीं चाहिए.’’

मां ने झिझकते हुए कहा, ‘‘अब तू ही दे आ न.’’

‘‘ओहो, कहा न, मां, तुम जाओ और दो घड़ी उन के पास बैठ कर बातें करो. आखिर उन को भी पता लगना चाहिए कि उन की सास यानी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं.’’

रश्मि ने मां को जबरदस्ती रसोई से बाहर निकाल दिया और साड़ी को कमर से कस कर काम में लग गई. फुरती से काम करने की आदत उस की शुरू से ही थी. देखतेदेखते उस ने सारी रसोई साफ कर दी.

फिर भाभी के पास जा कर बच्ची को गोद में ले लिया और हंसते हुए बोली, ‘‘यह तो है ही इतनी प्यारी कि बस, गोद में ले कर इस का मुंह निहारते रहो.’’

भाभी को लगा जैसे ननद ताना दे रही हो, पर उस ने तीखा उत्तर न देना ही ठीक समझा. हंस कर बोली, ‘‘लगता है सब के सिर चढ़ जाएगी.’’

‘‘भाभी, इसे तो मैं ले जाऊंगी.’’

‘‘हांहां, ले जाना. रोतेरोते सब के दिमाग ठिकाने लगा देगी.’’

‘‘बेचारी को बदनाम कर रखा है सब ने. कहां रो रही है मेरे पास?’’

‘‘यह तो नाटक है. लो, लगी न रोने?’’

‘‘लो, बाबा लो,’’ रश्मि ने हंस कर कहा, ‘‘संभालो अपनी बिटिया को. अच्छा, अब यह बताओ नाश्ता क्या बनेगा? मैं जल्दी से तैयार कर देती हूं.’’

भाभी ने जबरन हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों, तुम क्यों बनाओगी? क्या दामादजी को किसी दूसरे के हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता?’’

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हंस कर रश्मि ने कहा, ‘‘यह बात नहीं, मुझे तो खुद ही खाना बनाना अच्छा लगता है. वैसे वह बोल रहे थे कि भाभी के हाथ से बने कबाब जरूर खाऊंगा.’’

‘‘बना दूंगी. अच्छा, तुम इसे जरा गोदी में ले कर बैठ जाओ, सो गई है. मैं झटपट नाश्ता बना देती हूं.’’

‘‘ओहो, लिटा दो न बिस्तर पर.’’

‘‘यही तो मुश्किल है. बस गोदी में ही सोती रहती है.’’

‘‘अच्छा ठहरो, मां को बुलाती हूं. वह ले कर बैठी रहेंगी. हम दोनों घर का काम कर लेंगे.’’

‘‘नहींनहीं, मांजी को तंग मत करो.’’

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