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Satyakatha- डॉक्टर दंपति केस: भरतपुर बना बदलापुर- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

बात 28 मई की है. शाम के करीब पौने 5 बजे का वक्त रहा होगा. राजस्थान के भरतपुर शहर में डा. सुदीप गुप्ता अपनी पत्नी डा. सीमा गुप्ता के साथ कार से कुम्हेर गेट पर जाहरवीर मंदिर में दर्शन करने जा रहे थे. रोजाना शाम को मंदिर में जा कर दर्शन करना उन की दिनचर्या में शुमार था.

गुप्ता दंपति का शहर में काली की बगीची पर श्रीराम गुप्ता मेमोरियल हौस्पिटल है. इसी हौस्पिटल के ऊपरी हिस्से में वह अपने परिवार के साथ रहते थे. परिवार में डा. सुदीप की मां सुरेखा, पत्नी डा. सीमा और 18 साल का बेटा तथा 15 साल की बेटी थी.

डाक्टर दंपति 5 मिनट पहले ही अपने हौस्पिटल से मंदिर के लिए रवाना हुए थे. कार डा. सुदीप चला रहे थे. डा. सीमा उन के साथ आगे की सीट पर बैठी हुई थी. वह घर से करीब 750 मीटर दूर ही पहुंचे थे कि सरकुलर रोड पर नीम दा गेट के पास पीछे से आए एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवकों ने साइड से ओवरटेक कर अपनी बाइक उन की कार के आगे लगा दी.

सड़क के बीच बाइक रुकने से डा. सुदीप ने फुरती से कार के ब्रेक लगाए. सुदीप कुछ समझ पाते, इस से पहले ही बाइक से उतर कर दोनों युवक कार की ड्राइविंग साइड में डा. सुदीप की तरफ आए. इन में एक युवक ने लाल कपड़े से अपना मुंह ढक रखा था और दूसरे युवक ने न तो मास्क लगाया हुआ था और न ही हेलमेट पहना हुआ था.

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इन दोनों युवकों को डा. सुदीप पहचान नहीं सके. कार के सामने बाइक लगाने की वजह जानने के लिए डा. सुदीप ने अपनी कार के गेट का शीशा नीचे किया.

डा. सुदीप उन युवकों से सवाल पूछते, इस से पहले ही मुंह पर कपड़ा बांधे युवक ने अपनी पैंट में छिपी पिस्तौल निकाली. उस ने बिना कुछ कहेसुने डा. सुदीप की कनपटी के पास 2-3 गोलियां मार दीं. डा. सुदीप के पास आगे की सीट पर ही बैठी डा. सीमा कुछ समझती, इस से पहले ही उस युवक ने उसे भी गोलियों से भून दिया.

डाक्टर दंपति पर गोलियां चलाने के बाद उस युवक ने कुछ पल रुक कर यह तसल्ली की कि दोनों की मौत हुई या नहीं. इस के बाद डा. सुदीप को एक गोली और मारी. फिर सड़क के दोनों ओर से गुजर रहे लोगों को डराने के लिए पिस्तौल से हवा में गोलियां चलाईं.

दोनों युवक बाइक पर सवार हो कर भागने लगे, लेकिन बाइक स्टार्ट नहीं हुई. इस पर गोलियां चलाने वाले युवक ने धक्का दिया. बाइक स्टार्ट होने पर दोनों उस पर सवार हो कर यूटर्न ले कर भाग गए. भागते हुए भी उन्होंने पिस्तौल से हवा में गोलियां चलाईं.

गोलियां लगने से डा. सुदीप और सीमा अपनी कार में ही लुढ़क गए. शहर के सब से प्रमुख रोड पर दिनदहाड़े हुई इस वारदात के समय सड़क के दोनों ओर वाहन लगातार आजा रहे थे, लेकिन किसी ने भी न तो बदमाशों को रोकने की हिम्मत की और न ही उन का पीछा किया. इसीलिए दोनों युवक जिस तरफ से आए थे, बाइक से उसी तरफ भाग गए. यह वारदात वहां आसपास लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद जरूर हो गई.

खास बात यह हुई कि डाक्टर दंपति को सरेआम गोलियां मारने की वारदात लौकडाउन के दौरान हुई. कोरोना संक्रमण की चेन तोड़ने के लिए पूरे राजस्थान में अप्रैल महीने के तीसरे सप्ताह से ही लौकडाउन लगा हुआ था. लौकडाउन में हालांकि आम लोगों के घर से निकलने पर रोक लगी हुई थी, लेकिन फिर भी लोग किसी न किसी बहाने घर से बाहर निकलते ही थे. हरेक चौराहों के अलावा जगहजगह पुलिस तैनात रहती थी. इतनी सख्ती होने के बावजूद दोनों युवक पिस्तौल से गोलियां चलाते हुए भाग गए और पुलिस को पता भी नहीं चला.

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दोनों युवकों के भागने के बाद आसपास के लोग मौके पर एकत्र हो गए. उन्होंने कार में लुढ़के पड़े डा. सुदीप और उस की पत्नी सीमा को पहचान लिया और पुलिस को सूचना दी. कुछ ही देर में पुलिस पहुंच गई. मौके पर एकत्र लोगों ने बताया कि ये डा. सुदीप और उस की पत्नी है. पुलिस ने लोगों की मदद से दोनों को कार से निकाला और तुरंत अस्पताल ले गए. अस्पताल में डाक्टर दंपति को मृत घोषित कर दिया.

दिनदहाड़े डाक्टर दंपति की हत्या की घटना से शहर में दहशत फैल गई. पुलिस के अफसर मौके पर पहुंच गए. शुरुआती जांचपड़ताल में ही साफ हो गया कि डाक्टर दंपति की हत्या बदला लेने के लिए की गई थी.

डाक्टर दंपति के खौफनाक अंत के पीछे की कहानी इस से भी ज्यादा खौफनाक है. उस कहानी तक ले चलने से पहले आप को बता दें कि डा. सुदीप की एक प्रेमिका थी. उस का नाम था दीपा गुर्जर. दीपा के 6 साल का बेटा शौर्य था.

अगले भाग में पढ़ें- क्या दीपा का भाई  फायरिंग की घटना में शामिल था?

मजाक: आज ‘चड्डी दिवस’, कल ‘बनियान दिवस’

लेखक- रामविलास जांगिड़

एक दिन का ‘फादर डे’ भी निबट गया और एक दिन का ‘योगा डे’ भी. फादर नाम के जीव को फिर से वृद्ध आश्रम में जमा करा दें और योगा को भोगा में बदलने का रोगा पाल लें. दोनों का इस्तेमाल कर लिया, फेसबुक पर डाल दिया, ह्वाट्सएप पर सरका दिया, सैल्फीफैल्फी भी ले ली, अब आगे और भी दिन आने वाले हैं, उन की तैयारी में लगना है.

तत्काल इन ‘डेजों’ को लात मार कर ऐसे ही भगाते रहना है. कब तक इन के पीछे पड़े रहेंगे. हमें और भी तो कई दिन मनाने हैं. ‘फादर डे’ पर सैल्फी ले ली है, अब कोई प्राण थोड़े ही देने हैं?

एक दिन का ‘योगा डे’ भी मना लिया बस. रोज योगा करते रहेंगे तो फेसबुक ह्वाट्सएप कौन चलाएगा? सब से ज्यादा जरूरी फेसबुक, ह्वाट्सएप ही हैं. इन के साथ ही हर दिन मनाने के अलगअलग रंगढंग. इन के अलावा संसार में कुछ भी नहीं है. सामने दीवार पर टंगी फादर की तसवीर से नजरें हरगिज न मिलाएं. इन की नसीहतें कौन झेलेगा?

सुबह जल्दी से 10 बजे उठ जाएं. अब बिस्तर के सामने दिखाई देने वाले शौचालय तक पैदल ही जाएं. पैदल चलने के बड़े फायदे होते हैं. नंगे पैर जाएं. इस से आप को उत्तम लाभ होगा.

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शौचालय में अपना मोबाइल फोन ले जाएं. वहीं पर जरूरी चैटिंग साधना पूरी करें. जरूरी ज्ञानबाजी मोबाइल पर फौरवर्ड करें. इस के बाद धीरेधीरे कमरे से बाहर निकलें और उत्तम स्वास्थ्य के लिए पोहा, फाफड़ा, जलेबी वगैरह के साथ बड़ा वाला कप चायकौफी का नाश्ता डकारें.

इस के बाद पेट वाली डकार हरगिज न लें. कचौरी, समोसा वगैरह ले लें. इतना कर लेंगे तो थकना लाजिमी होगा. इसी समय तुरंत ही पलंग पकड़ लें और दोनों हाथों में अपना वही मोबाइल कस लें.

मोबाइल में योग और ध्यान करने के बहुत सारे मैसेजों को इधरउधर फेंकना शुरू करें. ह्वाट्सएप यूनिवर्सिटी में ज्ञान की बातों को समूहों में सप्लाई कर दें. ऐसा करते हुए आप बुरी तरह थक जाएंगे. अब फादर की तसवीर अपने पीछे रखते हुए सीधे लंच पर टूट पड़ें. दाल, चावल, रोटी, दही, सलाद, रायता, पपड़ी, चटनी, अचार, गुलाब जामुन, रसगुल्ला जोजो भी याद आए, वह सब अपने शरीर में जमा कर लें.

शास्त्रों में कहा गया है कि खायापिया ही अंग लगता है, बिना खाए जंग लगता है, इसलिए खाइए उठिए, उठिए खाइए. उठउठ कर खा जाइए, खा कर फिर खाने के लिए उठ जाइए. अभी पोस्ट लंच, प्री डिनर, डिनर और पोस्ट डिनर में आइसक्रीम, लस्सी, कौफी, दाल मखानी, कड़ाही पनीर, परांठा, पनीर टिक्का वगैरह से मन बहलाएं.

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अब समय रात हो गई है और रात में टहलना बहुत जरूरी होता है. बिस्तर से सोफा और सोफे से टीवी तक चल पड़िए. टीवी से किचन तक टहल लीजिए. रात में नंगे पैर न घूमें. चप्पल पहन लें. हाथों में मोबाइल कस कर पकड़े रहिए. कानों पर हैडफोन चढ़ा लीजिए. चैट, सैट, मैट का आखेट कीजिए.

आज ‘बरमूडा दिवस’ है, उस की सैल्फी खींचखांच कर फेसबुक पर टांगते रहिए. दिन, महीने, साल ऐसे ही गुजारते रहिए. आज ‘चड्डी दिवस’, कल ‘बनियान दिवस’. सैल्फियाते रहिए. जब चादर ओढ़ कर सो जाएं तो मोबाइल को फिर कस कर पकड़ लीजिए. ऐसे ही धरती पर बोझ बनते हुए देर रात स्पैशल चैटिंगें करते रहिए. आज रात 2 बजे जल्दी सो गए? अच्छी आदत है.

दिल वर्सेस दौलत: भाग 2

लेखिका- रेणु गुप्ता

‘लेकिन मैं सोच रही हूं अगर अबीर भी दादी की तरह हुआ तो क्या तू खर्चे को ले कर उस की तरफ से किसी भी तरह की टोकाटाकी सह पाएगी? खुद कमाएगी नहीं, खर्चे के लिए अबीर का मुंह देखेगी. याद रख लड़की, बच्चे अपने बड़ेबुजुर्गों से ही आदतें विरासत में पाते हैं. अबीर ने भी अगर तेरे खर्चे पर बंदिशें लगाईं तो क्या करेगी? सोच जरा.’

‘अरे मां, क्या फुजूल की हाइपोथेटिकल बातें कर रही हैं? क्यों लगाएगा वह मु झ पर इतनी बंदिशें? इतना बढि़या पैकेज है उस का. फिर अबीर मु झे अपनी दादी के बारे में बताता रहता है. कहता है, वे बहुत स्नेही हैं. पहली बार जब वे लोग हमारे घर आए थे, दादी ने मु झे कितनी गर्माहट से अपने सीने से चिपकाया था. मेरे हाथों को चूमा था.’

‘तो लाली बेटा, तुम ने पूरापूरा मन बना लिया है कि तुम अबीर से ही शादी करना चाहती हो. सोच लो बेटा, तुम्हारी मम्मा की बातों में भी वजन है. ये पूरी तरह से गलत नहीं. उन के और हमारे घर के रहनसहन में मु झे भी बहुत अंतर लगा. तुम कैसे ऐडजस्ट करोगी?’’ पापा ने कहा था.

‘अरे पापा, मैं सब ऐडजस्ट कर लूंगी. जिंदगी तो मु झे अबीर के साथ काटनी है न. और वह बेहद अच्छा व जैनुइन लड़का है. कोई नशा नहीं है उस में. मैं ने सोच लिया है, मैं अबीर से ही शादी करूंगी.’

‘लाली बेटा, यह क्या कह रही हो? मैं ने दुनिया देखी है. तुम तो अभी बच्ची हो. यह सीने से चिपकाना, आशीष देना, चुम्माचाटी थोड़े दिनों के शादी से पहले के चोंचले हैं. बाद में तो, बस, उन की रोकटोक, हेकड़ी और बंधन रह जाएंगे. फिर रोती झींकती मत आना मेरे पास कि आज सास ने यह कह दिया और दादी सास ने यह कह दिया.

‘और एक बात जो मु झे खाए जा रही है वह है उन का टू बैडरूम का दड़बेनुमा फ्लैट. हर बार त्योहार के मौके पर तु झे ससुराल तो जाना ही पड़ेगा. एक बैडरूम में अबीर के पेरैंट्स रहते हैं, दूसरे में उस की दादी. फिर तू कहां रहेगी? तेरे हिस्से में ड्राइंगरूम ही आएगा? न न न, शादी के बाद मेरी नईनवेली लाडो को अपना अलग एक कमरा भी नसीब न हो, यह मु झे बिलकुल बरदाश्त नहीं होगा.

‘सम झा कर बेटा, हमारे सामने यह खानदान एक चिंदी खानदान है. कदमकदम पर तु झे इस वजह से बहू के तौर पर बहुत स्ट्रगल करनी पड़ेगी. न न, कोई और लड़का देखते हैं तेरे लिए. गलती कर दी हम ने, तु झे अबीर से मिलाने से पहले हमें उन का घरबार देख कर आना चाहिए था. खैर, अभी भी देर नहीं हुई है. मेरी बिट्टो के लिए लड़कों की कोई कमी है क्या?’

‘अरे मम्मा, आप मेरी बात नहीं सम झ रहीं हैं. इन कुछ दिनों में मैं अबीर को पसंद करने लगी हूं. उसे अब मैं अपनी जिंदगी में वह जगह दे चुकी हूं जो किसी और को दे पाना मेरी लिए नामुमकिन होगा. अब मैं अबीर के बिना नहीं रह सकती. मैं उस से इमोशनली अटैच्ड हो गई हूं.’

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‘यह क्या नासम झी की बातें कर रही है, लाली? तू तो मेरी इतनी सम झदार बेटी है. मु झे तु झ से यह उम्मीद न थी. जिंदगी में सक्सैसफुल होने के लिए प्रैक्टिकल बनना पड़ता है. कोरी भावनाओं से जिंदगी नहीं चला करती, बेटा. बात सम झ. इमोशंस में बह कर आज अगर तू ने यह शादी कर ली तो भविष्य में बहुत दुख पाएगी. तु झे खुद अपने पांव पर कुल्हाड़ी नहीं मारने दूंगी. मैं ने बहुत सोचा इस बारे में, लेकिन इस रिश्ते के लिए मेरा मन हरगिज नहीं मान रहा.’

‘मम्मा, यह आप क्या कह रही हैं? मैं अब इस रिश्ते में पीछे नहीं मुड़ सकती. मैं अबीर के साथ पूरी जिंदगी बिताने का वादा कर चुकी हूं. उस से प्यार करने लगी हूं. पापा, आप चुप क्यों बैठे हैं? सम झाएं न मां को. फिर मैं पक्का डिसाइड कर चुकी हूं कि मु झे अबीर से ही शादी करनी है.’

‘अरे भई, क्यों जिद कर रही हो जब यह कह रही है कि इसे अबीर से ही शादी करनी है तो क्यों बेबात अड़ंगा लगा रही हो? अबीर के साथ जिंदगी इसे बितानी है या तुम्हें?’ लाली के पिता ने कहा.

‘आप तो चुप ही रहिए इस मामले में. आप को तो दुनियादारी की सम झ है नहीं. चले हैं बेटी की हिमायत करने. मैं अच्छी तरह से सोच चुकी हूं. उस घर में शादी कर मेरी बेटी कोई सुख नहीं पाएगी. सास और ददिया सास के राज में 2 दिन में ही टेसू बहाते आ जाएगी. जाइए, आप के औफिस का टाइम हो गया. मु झे हैंडल कर लेने दीजिए यह मसला.’

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Crime: अपराध अर्थात “खून” बोलता है!

कहते हैं जघन्य अपराध कभी छुपता नहीं है, खास तौर पर हत्या. यह एक ऐसा गंभीर अपराध है जो हत्यारे की जिंदगी को तबाह कर देता है हत्या का आरोपी जिंदगी भर तिल तिल कर पश्चाताप अथवा भय से मरता रहता है.

अगर कानून और पुलिस से बच भी जाए तो यह अपराध उसे माफ नहीं करता और एक न एक दिन उसे सजा अवश्य मिलती है. ऐसा ही एक सच्चा घटनाक्रम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर घटित हुआ है. पुलिस को युवक की हत्या की गुत्थी को सुलझाने में 10 साल लग गए. आखिरकार उसे 10 साल बाद अपने अपराध की सजा मिल ही गई. देखिए! क्या और कैसे घटनाक्रम बदला. दरअसल,  पुलिस हत्या की फाइल तक बंद कर चुकी थी. लेकिन आखिरकार अब नया सुराग मिलते ही पुलिस ने हत्या के आरोप में दो आरोपीयों को गिरफ्तार कर सजा दिलाई है. तथ्य सामने आया है कि आरोपी ने अपने “अवैध संबंध” को छुपाने के लिए युवक की हत्या की थी. लेकिन उसने बातों में आखिरकार दस साल बाद इसकी जानकारी अपने दोस्त को  दे दी और बात पुलिस तक पहुंच गई. इस तरह एक दोस्त ने ही कानून की मदद कर अपने अपराधी दोस्त को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

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सर कुचल कर हत्या

10 साल पहले जनवरी 2011 में राजधानी रायपुर के खरोरा थाना क्षेत्र में एक व्यक्ति की हत्या हुई थी.  ग्राम कोसरंगी  में पुलिस को लेखराम सेन नाम के व्यक्ति की खेत में लाश मिली थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पाया गया कि उसकी हत्या बेल्ट से गला दबाकर और सिर कुचलकर की गई थी. पुलिस इस अंधे कत्ल को सुलझाने की भरसक कोशिश की मगर जब कोई सुराग नहीं मिला तो पुलिस ने केस को खत्म कर दिया . लेकिन एक दिन अचानक पुलिस को 10 साल बाद सुराग मिला और आरोपी का राज खुल गया.

मुख्य आरोपी संतोष यादव ने कुछ दिन पहले इसी हत्या की पूरी दास्तां बातों बातों में अपने दोस्त को बताई . उसी दोस्त का जमीर जाग उठा और यह सच्चाई पुलिस तक पहुंच तक पहुंचा दी. फिर क्या था, पुलिस ने दो आरोपीयों संतोष यादव और लोकेश यादव को धर दबोचा. पुलिस का भी मानना है यदि आरोपी इस हत्या के राज को राज ही रखता, तो उसका पकड़ा जाना नामुमकिन था. लेकिन हत्या का अपराध छुपता नहीं सो एक बार फिर सिद्ध हो गया कि खून सचमुच बोलता है!

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अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ग्रामीण तारकेश्वर पटेल ने हमारे संवाददाता को बताया दस साल पहले हत्या के मामले में पुलिस ने अज्ञात आरोपी के खिलाफ अपराध दर्ज किया था. सालों साल तक आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी. रायपुर पुलिस ने पुराने गंभीर लंबित मामलों की समीक्षा की. जिसके बाद इस मामले को भी सुलझाने के निर्देश दिए गए थे. मामले की नए सिरे से जांच की गई. संदेह के आधार पर 2 युवक संतोष यादव और लोकेश यादव को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई.

पुलिस  पूछताछ में दोनों ने अंततः हत्या करना स्वीकार कर लिया. आरोपियों ने पुलिस को बताया कि मुख्य आरोपी संतोष यादव अपनी प्रेमिका को मिलने बुलाया था. जिस जगह पर वह मिल रहा था, वहां अचानक लेखराम सेन पहुंच गया और धमकाने लगा. अपने अवैध संबंध को छुपाने के लिए दोनों ने उसकी हत्या कर दी और शव को खेत में छोड़कर भाग गए. पुलिस ने दोनों आरोपी को प्रारंभिक साक्ष्य के आधार पर गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया है.

Satyakatha: अधेड़ औरत के रंगीन सपने- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

नोएडा के ककराला गांव की पुस्ता कालोनी में रात के ढाई बजे सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यों और एक घर के बाहर जमा कालोनी के लोगों की भीड़ इस बात की ओर इशारा कर रही थी कि वहां कोई अनहोनी हुई है. दरअसल, 7 मई 2021 की दरमियानी रात को पुस्ता कालोनी में रामचंद्र सिंह के मकान में किराए पर रहने वाले 52 वर्षीय संतराम की घर में घुस कर कुछ बदमाशों ने हत्या कर दी थी.

जिस वक्त ये वारदात हुई, रात के करीब एक बजे का वक्त था. पुलिस घटनास्थल पर सूचना मिलने के बाद करीब ढाई बजे पहुंची. ककराला गांव गौतमबुद्ध नगर कमिश्नरेट के फेज-2 थानाक्षेत्र के अंर्तगत आता है.

फेज-2 थाने के प्रभारी सुजीत कुमार उपाध्याय उस समय कुछ सिपाहियों के साथ गश्त कर रहे थे. जब कंट्रोलरूम ने उन्हें ककराला में रहने वाले संतराम की उस के घर में हुई हत्या की खबर दी.

थानाप्रभारी सुजीत उपाध्याय अगले कुछ ही मिनटों में बताए गए घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल पर तब तक मकान में रहने वाले कुछ दूसरे किराएदारों और आसपड़ोस के लोगों की काफी भीड़ जमा हो चुकी थी. संतराम की हत्या उस के सिर व चेहरे पर ईंटों के वार कर के की गई थी. पास ही खून से लथपथ एक ईंट इस बात की पुष्टि कर रही थी. कमरे का सारा सामान इधरउधर फैला पड़ा था.

मृतक की पत्नी सुशीला जिस की उम्र करीब 55 साल थी, पति के शव के साथ लिपटलिपट कर रो रही थी. किसी तरह पुलिस ने सुशीला को दिलासा दी तो उस ने सुबकते हुए बताया कि रात करीब साढे़ 12 बजे किसी ने हमारे कमरे का दरवाजा खटखटाया.

मैं ने जैसे ही दरवाजा खोला तो 3 लोग जबरदस्ती कमरे में घुस आए. कमरे में घुसते ही उन्होंने मुझे दबोच लिया और पूछा घर में कितने लोग हैं, जेवर और नकदी कहां रखे हैं. पूछताछ करते हुए उन्होंने मुझे एक के बाद एक साथ 3-4 थप्पड़ मारे और लातघूंसों की बारिश करते हुए मुझे जोर से जमीन पर धक्का दे दिया.

दीवार से सिर टकराने के कारण मैं उसी वक्त बेहोश हो गई. इस के बाद बदमाशों ने क्या किया, मुझे नहीं मालूम. जब कुछ देर बाद मुझे होश आया तो मैं ने अपने पति का शव इसी अवस्था में देखा जैसा इस समय आप देख रहे हैं.

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इस के बाद मैं ने शोर मचा कर अपने मकान के दूसरे किराएदारों और आसपड़ोस के लोगों को एकत्र किया. बाद में अपने जेठ लालूराम को फोन किया. वह गौतमबुद्ध नगर के गांव धूममानिकपुर में रहता था. वह भी एक घंटे में सूचना पा कर आ गया.

थानाप्रभारी सुजीत उपाध्याय को घटना का निरीक्षण करने और सुशीला के बयान से साफ लग रहा था कि संभवत: कुछ बदमाश लूटपाट के इरादे से घर में घुसे होंगे.

घटना का जो खाका तैयार हुआ था उस की पुष्टि के लिए थानाप्रभारी उपाध्याय ने एकएक कर उस मकान में रहने वाले सभी किराएदारों, आसपड़ोस के लोगों और संतराम के बड़े भाई लालूराम से पूछताछ की तो पता चला कि संतराम घरों का निर्माण करने वाला छोटामोटा ठेकेदार था. ठेकेदारी में वह राजमिस्त्रियों की टीम ले कर निर्माण का काम करता था.

इस काम में वहीं आसपास रहने वाले उस के जानकार उस की टीम में शामिल होते थे. संतराम के बारे में एक अहम जानकारी यह मिली कि वह बेहद सरल स्वभाव का इंसान था. आज तक उस का किसी से झगड़ा या दुश्मनी की बात भी किसी को पता नहीं चली थी.

पुलिस को पूछताछ में किसी से भी ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली जिस से हत्याकांड के बारे में तत्काल कोई सुराग मिल पाता.

सुशीला इस घटना की एकमात्र चश्मदीद थी, लेकिन उस ने पूछताछ में बताया कि उस ने आज से पहले कभी उन हमलावरों को नहीं देखा था, वह उन के चेहरे और हुलिए के बारे में भी कोई खास जानकारी नहीं दे सकी. अलबत्ता उस ने यह जरूर कहा कि अगर वे लोग दोबारा उस के सामने आए तो वह उन्हें पहचान सकती है.

चूंकि जिस तरह बदमाशों ने घर में घुसते ही सुशीला के ऊपर हमला किया था, उस से जाहिर तौर पर कोई भी इंसान इतना घबरा जाता है कि वह किसी के चेहरेमोहरे को देखने की जगह पहले अपना बचाव और जान बचाने की कोशिश करता है.

लेकिन 2 ऐसी बातें थीं जो अब तक की जांच व पूछताछ में थानाप्रभारी सुजीत उपाध्याय को परेशान कर रही थीं. एक तो यह बात कि सुशीला के शरीर के सभी हिस्सों  का निरीक्षण करने के बाद भी उन्हें ऐसी कोई गुम या खुली हुई चोट नहीं मिली, जिस से साबित हो कि वह बेहोश हो गई थी. मतलब उस के शरीर पर खरोंच तक के निशान नहीं थे. दूसरे वह पुलिस को घर में लूटपाट होने वाले सामान की जानकारी नहीं दे सकी.

दरअसल, जिन बदमाशों ने घर में घुस कर एक आदमी की विरोध करने पर हत्या कर दी हो, क्या वह बिना कोई लूटपाट किए चले गए होंगे. दूसरे संतराम जिस हैसियत का इंसान था और किराए के मकान में जिस तरह का सामान मौजूद था, उसे देख कर कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस घर में लूटपाट करने के लिए बदमाश किसी की हत्या भी कर सकते हैं.

ऐसे तमाम सवाल थे जिन के कारण सुशीला पुलिस की निगाहों में संदिग्ध हो चुकी थी. लेकिन उस के पति की हत्या हुई थी इसलिए तत्काल उस से पूछताछ करना उपाध्याय ने उचित नहीं समझा.

इस वारदात की सूचना मध्य क्षेत्र के डीसीपी हरीश चंदर व एडीशनल डीसीपी अंकुर अग्रवाल व इलाके के एसीपी योगेंद्र सिंह को भी लग चुकी थी. सूचना मिलने के बाद वे भी मौके पर पहुंच गए. क्राइम इनवैस्टीगेशन व फोरैंसिक टीम के अफसर भी मौके पर पहुंच गए थे.

घटनास्थल से जरूरी साक्ष्य एकत्र किए गए. उस के बाद शव पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

मृतक संतराम के भाई लालूराम जो धूममानिकपुर थाना बादलपुर जिला गौतमबुद्ध नगर में रहता है, की शिकायत पर पुलिस ने 7 मई की सुबह भादंसं की धारा 302 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर लिया, जिस की जांच का जिम्मा खुद थानाप्रभारी सुजीत उपाध्याय ने अपने हाथों में ले लिया.

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डीसीपी हरीश चंदर ने एसीपी योगेंद्र सिंह की निगरानी में हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एक टीम गठित कर दी, जिस में थानाप्रभारी सुजीत उपाध्याय के साथ एसएसआई राजकुमार चौहान, एसआई रामचंद्र सिंह, नीरज शर्मा, हैडकांस्टेबल फिरोज, कांस्टेबल आकाश, जुबैर, विकुल तोमर, गौरव कुमार तथा महिला कांस्टेबल नीलम को शामिल किया गया. पूरे केस में पुलिस काररवाई पर नजर रखने के लिए एडीशनल डीसीपी अंकुर अग्रवाल को जिम्मेदारी सौंपी गई.

हत्या का मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस ने सब से पहले संतराम के शव का पोस्टमार्टम कर शव को उस के परिजनों को सौंपा, जिन्होंने उसी शाम उस का अंतिम संस्कार कर दिया. इस दौरान दिल्ली व आसपास रहने वाले संतराम के काफी रिश्तेदार उस के घर पहुंच चुके थे.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह बात साफ हो चुकी थी कि संतराम की मौत उस के सिर व चेहरे पर लगी चोटों के कारण हुई थी.

पुलिस टीम ने सभी बिंदुओं को ध्यान में रख क र अपनी  जांच शुरू कर दी. टीम ने सुशीला, उस के पति मृतक संतराम और उन के परिवार की कुंडली को खंगालना शुरू कर दिया.

इतना ही नहीं, पुलिस ने वारदात वाली रात को घटनास्थल के आसपास सक्रिय रहे मोबाइल नंबरों का डंप डाटा भी उठा लिया और उन सभी मोबाइल नंबरों की जांचपड़ताल शुरू की जाने लगी, जो वहां सक्रिय थे.

पुलिस ने संतराम व सुशीला के फोन नंबरों की काल डिटेल्स भी निकलवा ली. इस के अलावा गांव में अपने मुखबिरों को सक्रिय कर दिया.

संतराम पुत्र शंकर राम मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के कस्बा व थाना रोजा का रहने वाला था. उस के परिवार में एक भाई लालू राम के अलावा 4 बहनें थी.

यह बात करीब 18-19 साल पहले की है. उन दिनों संतराम अपने गांव व आसपास के इलाकों में राजमिस्त्री का काम करता था. उम्र बढ़ रही थी और उस ने शादी की नहीं थी, इसलिए जो भी कमाता उसे अपने ऊपर खर्च करता था. इंसान के ऊपर जिम्मेदारियां न हों तो शराब ही अधिकांश लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन जाती है.

उसी के गांव में बालकराम भी रहता था, जो उसी की बिरादरी का होने के साथ पेशे से राजमिस्त्री का ही काम करता था. यही कारण था कि संतराम की बालकराम से खासी गहरी दोस्ती थी. संतराम का उस के घर भी आनाजाना था. बालकराम विवाहित था परिवार में पत्नी सुशीला और 5 बच्चे थे. 3 बेटे व 2 बेटियों में सब से बड़ा बेटा था.

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संतराम बालकराम के साथ उस के घर में बैठ कर शराब भी पीता था. बालकराम की पत्नी सुशीला 5 बच्चे होने के बाद भी गेहुएं रंग और छरहरे बदन की इतनी आकर्षक महिला थी कि पहली ही नजर में कोई भी उस की तरफ आकर्षित हो जाता था. सुशीला थोड़ा चंचल स्वभाव की महिला थी.

अगले भाग में पढ़ें- संतराम व सुशीला की खुली पोल

चेतावनी- भाग 1: मीना उन दोनों के प्रेमसंबंध में क्यों दिलचस्पी लेने लगी?

लेखक- अवनिश शर्मा

उन दोनों की जोड़ी मुझे बहुत जंचती.  पिछले कुछ दिनों से वे दोपहर 1  से 2  के बीच रोज पार्क में आते. युवक कार से और युवती पैदल यहां पहुंचती  थी. दोनों एक ही बैंच पर बैठते  और उन के आपस में बात करने के ढंग को देख कर कोई भी कह सकता कि वे प्रेमीप्रेमिका हैं.

मैं रोज जिस जगह घास पर बैठती थी वहां माली ने पानी दे दिया तो मैं ने जगह बदल ली. मन में उन के प्रति उत्सुकता थी इसलिए उस रोज मैं उन की बैंच के काफी पास शाल से मुंह ढक कर लेटी हुई थी, जब वे दोनों पार्क में आए.

उन के बातचीत का अधिकांश हिस्सा मैं ने सुना. युवती का नाम अर्चना और युवक का संदीप था. न चाहते हुए भी मुझे उन के प्रेमसंबंध में पैदा हुए तनाव व खिंचाव की जानकारी मिल गई.

नाराजगी व गुस्से का शिकार हो कर संदीप कुछ पहले चला गया. मैं ने मुंह पर पड़ा शाल जरा सा हटा कर अर्चना की तरफ देखा तो पाया कि उस की आंखों में आंसू थे.

मैं उस की चिंता व दुखदर्द बांटना चाहती थी. उस की समस्या ने मेरे दिल को छू लिया था, तभी उस के पास जाने से मैं खुद को रोक नहीं सकी.

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मुझ जैसी बड़ी उम्र की औरत के लिए किसी लड़की से परिचय बनाना आसान होता है. बड़े सहज ढंग से मैं ने उस के बारे में जानकारी हासिल की. बातचीत ऐसा हलकाफुलका रखा कि वह भी जल्दी ही मुझ से खुल गई.

इस सार्वजनिक पार्क के एक तरफ आलीशान कोठियां बनी हैं और दूसरी तरफ मध्यमवर्गीय आय वालों के फ्लैट्स हैं. मेरा बड़ा बेटा अमित कोठी में रहता है और छोटा अरुण फ्लैट में.

अर्चना भी फ्लैट में रहती थी. उस की समस्या पर उस से जिक्र करने से पहले मैं उस की दोस्त बनना चाहती थी. तभी जिद कर के मैं साथसाथ चाय पीने के लिए उसे अरुण के फ्लैट पर ले आई.

छोटी बहू सीमा ने हमारे लिए झटपट अदरक की चाय बना दी. कुछ समय हमारे पास बैठ कर वह रसोई में चली गई.

चाय खत्म कर के मैं और अर्चना बालकनी के एकांत में आ बैठे. मैं ने उस की समस्या पर चर्चा छेड़ दी.

‘‘अर्चना, तुम्हारी व्यक्तिगत जिंदगी को ले कर मैं तुम से कुछ बातें करना चाहूंगी. आशा है कि तुम उस का बुरा नहीं मानोगी,’’ यह कह कर मैं ने उस का हाथ अपने दोनों हाथों में ले कर प्यार से दबाया.

‘‘मीना आंटी, आप मुझे दिल की बहुत अच्छी लगी हैं. आप कुछ भी पूछें या कहें, मैं बिलकुल बुरा नहीं मानूंगी,’’ उस का भावुक होना मेरे दिल को छू गया.

‘‘वहां पार्क में मैं ने संदीप और तुम्हारी बातें सुनी थीं. तुम संदीप से प्रेम करती हो. वह एक साल के लिए अपनी कंपनी की तरफ से अगले माह विदेश जा रहा है. तुम चाहती हो कि विदेश जाने से पहले तुम दोनों की सगाई हो जाए. संदीप यह काम लौट कर करना चाहता है. इसी बात को ले कर तुम दोनों के बीच मनमुटाव चल रहा है ना?’’ मेरी आवाज में उस के प्रति गहरी सहानुभूति के भाव उभरे.

कुछ पल खामोश रहने के बाद अर्चना ने चिंतित लहजे में जवाब दिया, ‘‘आंटी, संदीप और मैं एकदूसरे के दिल में 3 साल से बसते हैं. दोनों के घर वालों को हमारे इस प्रेम का पता नहीं है. वह बिना सगाई के चला गया तो मैं खुद को बेहद असुरक्षित महसूस करूंगी.’’

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‘‘क्या तुम्हें संदीप के प्यार पर भरोसा नहीं है?’’

‘‘भरोसा तो पूरा है, आंटी, पर मेरा दिल बिना किसी रस्म के उसे अकेला विदेश भेजने से घबरा रहा है.’’

मैं ने कुछ देर सोचने के बाद पूछा, ‘‘संदीप के बारे में मातापिता को न बताने की कोई तो वजह होगी.’’

‘‘आंटी, मेरी बड़ी दीदी ने प्रेम विवाह किया था और उस की शादी तलाक के कगार पर पहुंची हुई है. पापा- मम्मी को अगर मैं संदीप से प्रेम करने के बारे में बताऊंगी तो मेरी जान मुसीबत में फंस जाएगी.’’

‘‘और संदीप ने तुम्हें अपने घरवालों से क्यों छिपा कर रखा है?’’

अर्चना ने बेचैनी के साथ जवाब दिया, ‘‘संदीप के पिता बहुत बड़े बिजनेसमैन हैं. आर्थिक दृष्टि से हम उन के सामने कहीं नहीं ठहरते. मैं एम.बी.ए. पूरा कर के नौकरी करने लगूं, तब तक के लिए उस ने अपने मातापिता से शादी का जिक्र छेड़ना टाल रखा था. मेरा एम.बी.ए. अगले महीने समाप्त होगा, लेकिन उस के विदेश जाने की बात के कारण स्थिति बदल गई है. मैं चाहती हूं कि वह फौरन अपने मातापिता से इस मामले में चर्चा छेड़े.’’

अर्चना का नजरिया तो मैं समझ गई लेकिन संदीप ने अभी विदेश जाने से पहले अपने मातापिता से शादी का जिक्र छेड़ने से पार्क में साफ इनकार कर दिया था और उस के इनकार करने के ढंग में मैं ने बड़ी कठोरता महसूस की थी. उस ने अर्चना के नजरिए को समझने की कोशिश भी नहीं की थी. मुझे उस का व्यक्तित्व पसंद नहीं आया था. तभी दुखी व परेशान अर्चना का मनोबल बढ़ाने के लिए मैं ने उस की सहायता करने का फैसला लिया था.

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मेरा 5 वर्षीय पोता समीर स्कूल से लौट आया तो हम आगे बात नहीं कर सके क्योंकि उस की मांग थी कि उस के कपड़े बदलने, खाना परोसने व खिलाने का काम दादी ही करें.

अर्चना अपने घर जाना चाहती थी पर मैं ने उसे यह कह कर रोक लिया कि बेटी, अगर तुम्हें कोई ऐतराज न हो तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूं. तुम्हारी मां से मिलने का दिल है मेरा.

MK- पूर्व सांसद पप्पू यादव: मददगार को गुनहगार बनाने पर तुली सरकार- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां 

कोरोना काल में पप्पू यादव ने लोगों की मदद कर जान भी बचाई. बढ़ती महामारी कोरोना के बीच जिस समय देश में तमाम एंबुलेंस चालकरूपी गिद्ध पीडि़तों से मुंहमांगी

रकम वसूल रहे थे, सरकार भी जरूरतमंदों को जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने में विफल थी, जिस की वजह से सैकड़ों मरीजों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. उसी दौरान पूर्व सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने 7 मई को सारण जिले के अमनौर कस्बे के विश्वप्रभा सामुदायिक केंद्र परिसर में स्थित एक प्रशिक्षण केंद्र पर औचक छापा मार कर तहलका मचा दिया.

वहां नारंगी रंग के तिरपाल के अंदर दरजनों एंबुलेंस खड़ी मिलीं. यह सारण के भाजपा के वरिष्ठ सांसद राजीव प्रताप रूड़ी का गांव है.

ये सभी एबुंलेंस सांसद राजीव प्रताप रूड़ी की देखरेख में वहां खड़ी थीं. पप्पू यादव ने सभी एंबुलेंस का वीडियो बनाया और अपने ट्वीट पर इसे पोस्ट करते हुए जोरदार सवाल उठाया कि सांसद निधि से खरीदी गई इतनी सारी एंबुलेंस यहां क्यों खड़ी हैं, इस की आधिकारिक जांच होनी चाहिए.

देखते ही देखते पप्पू यादव का यह ट्वीट बिहार सहित पूरे भारत में वायरल हो गया. देश के सभी बड़े टीवी चैनलों पर यह खबर प्रमुखता से चलने लगी. टीवी पर इसे ले कर डिबेट होने लगी. जिस ने भी यह खबर देखी, उस ने कोरोना महामारी की नाजुक घड़ी में राजीव प्रताप रूड़ी द्वारा इतने सारे एंबुलेंस को बेवजह खड़ी रखने के फैसले की निंदा की. इस के साथ ही बिहार में चल रही नीतीश कुमार की सरकार भी लोगों के निशाने पर आ गई.

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इस के बाद बिहार की जनता नीतीश सरकार की नाकामियों पर तरहतरह के तीखे सवाल खड़े करने लगी. अभी कोरोना काल चल रहा था और सरकार लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सेवा देने में पूरी तरह असफल साबित हो रही थी. पटना समेत पूरे बिहार में एंबुलेंस औपरेटर कोरोना मरीज के परिवार वालों से मनमाफिक किराया वसूल रहे थे.

ऐसे मुश्किल समय में बिहार की मौजूदा सरकार द्वारा सारण में खड़ी धूल फांक रही इन एंबुलेंसों का उपयोग कर हजारों मरीजों को समय रहते अस्पताल पहुंचा कर उन की जान बचा सकती थी. यह सभी एंबुलेंस कुछ साल पहले बीजेपी के वरिष्ठ सांसद राजीव प्रताप रूड़ी द्वारा जनता की सेवा के लिए सांसद निधि से खरीदी गई थीं.

लेकिन कोरोना महामारी में लाचार लोगों को मरते हुए देखने के बावजूद बीजेपी के वरिष्ठ सांसद राजीव रूड़ी का खामोश रहना बिहार की जनता के प्रति उन के घोर नकारात्मक रवैए को दिखा रहा था.

एंबुलेंस के अभाव के कारण परिजनों द्वारा मरीजों को ठेलों पर लाद कर अस्पताल तक पहुंचाते देखा जा सकता था. ऐसी विकट परिस्थिति में अगर ये एंबुलेंस मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के काम आ जातीं तो सैकड़ों गरीब असहाय लोगों की जानें बचाई जा सकती थीं.

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वीडियो हुआ वायरल

पप्पू यादव द्वारा इस वीडियो को वायरल किए जाने के बाद सांसद राजीव प्रताप रूड़ी की तरफ से एक बेहद बचकाना सा बयान आया कि सभी एंबुलेंस ड्राइवरों के अभाव में यहां खड़ी हैं. जिस ने भी राजीव प्रताप रूड़ी का यह बयान सुना, सब ने इसे एक गैरजिम्मेदाराना बयान समझा.

बहरहाल, उन के इस बयान को सुन कर पप्पू यादव खामोश नहीं बैठे. उन्होंने जोरशोर से एंबुलेंस चालकों की तलाश शुरू की तो देखते ही देखते उन्होंने 40 कुशल चालकों की फौज खड़ी कर दी और राजीव प्रताप रूड़ी सहित नीतीश कुमार को इन्हें अपनी सेवा में लेने के लिए कहा. लेकिन सरकार ने इस मामले में एकदम चुप्पी साध ली.

बिहार सरकार का लोगों के प्रति ऐसा ढुलमुल रवैया देखने के बाद पप्पू यादव ने एक और ट्वीट करते हुए तंज कसा कि राजीव प्रताप रूड़ी इन एबुंलैंसों द्वारा नदी से बालू ढो रहे हैं. बालू ढोने के लिए उन के पास चालक हैं, लेकिन बीमारों की मदद करने के लिए उन के पास चालक नहीं हैं. प्रमाण के तौर पर उन्होंने नदी से बालू ढो रहे एंबुलेंस की फोटो भी पोस्ट की.

इस के बाद दोनों नेताओं के बीच एक तीखी बयानबाजी शुरू हुई. इस पर अमनौर थाने में पप्पू यादव के खिलाफ कोविड नियम भंग करने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में मामला दर्ज कर लिया गया. पप्पू यादव ने सांसद राजीव प्रताप रूड़ी के पीए द्वारा फोन पर गालीगलौज करने का भी आरोप लगाया.

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पप्पू यादव को भेजा जेल

पप्पू यादव द्वारा बिहार की सुशासन की कुव्यवस्था उजागर किए जाने के बाद नीतीश सरकार तिलमिला कर रह गई. सरकार के शीर्ष नेताओं ने सोचा कि अगर पप्पू यादव बिहार की जनता को इसी तरह एक के बाद एक सरकार की नाकामियां गिनाते रहे तो उन का सरकार चलाना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए पप्पू यादव को किसी तरह गिरफ्तार करने की योजना तैयार की गई.

अत: 10 मई, 2021 को पटना के 5 थानों की पुलिस ने लौकडाउन का उल्लंघन करने, बगैर पुलिस अनुमति के बाहर घूमने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में पप्पू यादव को बुद्धा कालोनी स्थित उन के आवास से गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें गिरफ्तार कर पहले पटना के गांधी मैदान थाने लाया गया. फिर 32 साल पुराने अपहरण के एक पुराने मामले की जांच के लिए मधेपुरा पुलिस को सौंप दिया गया.

अगले भाग में पढ़ें-जेल में ही हो गया था इश्क

Manohar Kahaniya- पाक का नया पैंतरा: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

गिरफ्तार तसकरों से मिली सूचनाओं पर एनसीबी ने पंजाब में औपरेशन इकाई को सतर्क कर दिया. तसकरों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए एनसीबी ओर बीएसएफ सहित विभिन्न खुफिया एजेंसियों ने पंजाब में तसकरों की घेराबंदी शुरू कर दी.

पंजाब में तसकरों की हुई तलाश

एनसीबी ने 7 जून को फिरोजपुर जिले में किचले गांव में काला सिंह के घर पर छापा मारा. घर पर उस के पिता जोगेंद्र सिंह मिले. उन से पूछताछ की गई, लेकिन कोई खास जानकारी नहीं मिली. 4 दिन की कड़ी पूछताछ के बाद एनसीबी के डीडीजी ज्ञानेश्वर सिंह के नेतृत्व में एक दल बीकानेर में गिरफ्तार किए दोनों तसकरों रूपा और हरमेश को ले कर 8 जून को पंजाब गया.

बीएसएफ का दल भी एनसीबी अधिकारियों के साथ पंजाब गया. दोनों एजेंसियों ने गिरफ्तार दोनों तसकरों की निशानदेही पर कई तरह की जांचपड़ताल की. दोनों के आपराधिक रिकौर्ड खंगाले गए. काला सिंह और बौस के बारे में भी जानकारी जुटाई गई. कई संदिग्ध लोगों से भी पूछताछ की गई.

पंजाब से लौट कर एनसीबी ने बीकानेर की खाजूवाला कोर्ट में हेरोइन के सैंपल पेश किए. एनसीबी के जौइंट डायरेक्टर उगमदान सिंह दोनों गिरफ्तार तसकरों और बरामद हेरोइन के सैंपल ले कर अदालत पहुंचे. इस दौरान बीएसएफ का दल भी उन के साथ था.

तसकरों की काल डिटेल्स के आधार पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने 12 जून को राजस्थान में सीमाई इलाकों में रहने वाले 3 युवकों को भी हेरोइन तसकरी के मामले में गिरफ्तार किया. इन युवकों ने पंजाब के तसकरों की मदद की थी.

तसकरों ने रावला स्थित 10 केएनडी के रहने वाले सुखप्रीत के सिमकार्ड का उपयोग बात करने में किया था. कड़ी पूछताछ के बाद सुखप्रीत और उस की निशानदेही पर उस के 2 साथियों को पकड़ा गया.

दूसरी ओर, एनसीबी ने पहले गिरफ्तार 2 तसकरों रूपा और हरमेश का 7 दिन का रिमांड पूरा होने पर 12 जून, 2021 को अदालत में पेश किया. अदालत ने दोनों को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया. इन दोनों से की गई पूछताछ और पंजाब में जा कर की गई पड़ताल में यह बात सामने आई कि पंजाब की जेल में बंद कुख्यात तसकर बलदेव और जोगेंद्र उर्फ समीर जेल से ही तसकरी का नेटवर्क औपरेट कर रहे हैं.

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बीकानेर सीमा पर हेरोइन तसकरी की वारदात में शामिल रहे काला सिंह और बौस इन के गिरोह के ही सदस्य हैं. बलदेव और जोगेंद्र वाट्सऐप काल के जरिए इन से संपर्क में रहते थे.

बीएसएफ और एनसीबी की जांचपड़ताल में सामने आया कि भारत में नारको टेरेरिज्म फैलाने की साजिश में जुटे पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान से भारत में बड़े पैमाने पर हेरोइन आती रही है. यह हेरोइन कई रास्तों से भारत में आती है.

ढाई साल पहले पुलवामा की घटना के बाद जम्मूकश्मीर सीमा पर सख्ती बढ़ने से तसकरी की गुंजाइश कम हो गई थी. इस के अलावा पंजाब से लगी पाकिस्तान सीमा के रास्ते भी तसकरी होती रही है. अब पंजाब सीमा पर भी सख्ती होने से तसकरों ने पिछले कुछ समय से राजस्थान से लगी सीमाओं को तसकरी के लिए सेफ पौइंट मान कर प्रयास शुरू किए हैं.

इस के लिए उन्होंने तारबंदी के बीच में से पीवीसी पाइप निकाल कर उस में से हेरोइन के पैकेट धकेलने का नया तरीका अपनाया है. यह सुखद रहा कि हेरोइन तसकरों को इस नए प्रयोग के दौरान सब से बड़ी मात खानी पड़ी. तारबंदी के बीच पीवीसी पाइप निकालने के दौरान खासी सावधानी भी रखनी पड़ती है, क्योंकि तारबंदी में एक कोबरा तार होता है, जिस में करंट प्रवाहित होता रहता है.

इसी साल फरवरी में राजस्थान के सीमांत इलाके में हिंदुमल कोट मदनलाल बीओपी क्षेत्र में पाकिस्तानी तसकरों ने 6 किलोग्राम हेरोइन सप्लाई की थी. इस में से केवल एक किलोग्राम हेरोइन बरामद हुई. बाकी 5 किलोग्राम हेरोइन भारतीय तसकर ले जाने में सफल हो गए थे. इस मामले में 5 तसकर पकड़े गए थे.

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नवंबर 2020 में गजसिंहपुर में 8 किलोग्राम हेरोइन पकड़ी थी. इस दौरान बीएसएफ की फायरिंग में एक पाकिस्तानी तसकर मारा गया था. भारतीय तसकर भाग गए थे. अप्रैल 2019 में इंद्रजीत सीमा चौकी इलाके में 18 किलोग्राम हेरोइन की तसकरी हुई थी. इस मामले में पंजाब के अबोहर निवासी छिंदा सिंह का नाम सामने आया था. बीकानेर बौर्डर पर पिछले साल अक्तूबर में पंजाब के एक तसकर से सेटेलाइट फोन मिला था.

भारत में कई रास्तों से हेरोइन आती है. अफगानिस्तान से जमीनी स्तर पर पाकिस्तान के रास्ते विभिन्न बौर्डरों से आती है. हवाई मार्ग से भी हेरोइन आती है. समुद्री रास्तों के जरिए भी हेरोइन भारत में पहुंचती है. इस के अलावा नेपाल के रास्ते भी हमारे देश में हेरोइन लाई जाती है.

विभिन्न रास्तों से भारत में आने वाली हेरोइन की सब से ज्यादा खपत पंजाब, मुंबई और दिल्ली में होती है. वैसे तो हेरोइन की खपत पूरे देश में है. बौलीवुड में भी बड़ी मात्रा में हेरोइन की चोरीछिपे खपत होती है.

बहरहाल, पाकिस्तान से जुड़े राजस्थान बौर्डर पर बीएसएफ ने अब तक की सब से बड़ी हेरोइन तसकरी की खेप पकड़ कर पाकिस्तानी तसकरों के नए रास्ते का भंडाफोड़ कर दिया है, लेकिन तसकरों के नेटवर्क को नेस्तनाबूद करना बीएसएफ और एनसीबी के लिए चुनौती है.

अटूट बंधन- भाग 2: प्रकाश ने कैसी लड़की का हाथ थामा

शालिनी को ऐसा लगा जैसे त्रिशा उस से कुछ छिपा रही थी. फिर भी त्रिशा को छेड़ने के लिए गुदगुदाते हुए उस ने कहा, ‘‘अब इतनी भी उदास मत हो जाओ, उन को याद कर के. जानती हूं भई, याद तो आती है, पर अब कुछ ही दिन तो बाकी हैं न.’’ त्रिशा अपनी आदत के अनुसार मुसकरा उठी. शालिनी को जरा परे धकेलते हुए बोली, ‘‘जाओ, मैं नहीं करती तुम से बात. जब देखो एक ही रट.’’

तभी अचानक त्रिशा का मोबाइल बज उठा. ‘‘उफ, कितनी लंबी उम्र है उन की. नाम लिया और फोन हाजिर,’’ शालिनी उछल पड़ी. ‘‘खूब इत्मीनान से जी हलका कर लो. मैं तो चली,’’ कहती हुई शालिनी कमरे से बाहर निकल गई.

दरअसल, बात यह थी कि कुछ ही दिनों में त्रिशा का प्रेमविवाह होने वाला था. डा. आजाद, जिन से जल्द ही त्रिशा का विवाह होने वाला था, लखनऊ विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक थे. त्रिशा और आजाद ने दिल्ली के एक स्पैशल स्कूल से साथसाथ ही पढ़ाई पूरी की थी. उस के बाद आजाद अपने घर लखनऊ वापस आ गए थे. वहीं से उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की और फिर अपनी रिसर्च भी पूरी की. रिसर्च पूरी करने के कुछ ही दिनों बाद उन्हें यूनिवर्सिटी में ही जौब मिल गई. ऐसा लगता था कि त्रिशा और आजाद एकदूसरे के लिए ही बने थे.

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स्कूल में लगातार पनपने वाला लगाव और आकर्षण एकदूसरे से दूर हो कर प्यार में कब बदल गया, पता ही नहीं चला. शीघ्र ही दोनों ने विवाह के अटूट बंधन में बंधने का फैसला कर लिया. दोनों के न देख पाने के कारण जाहिर है परिवार वालों को स्वीकृति देने में कुछ समय तो लगा, पर उन दोनों के आत्मविश्वास और निश्छल प्रेम के आगे एकएक कर सब को झुकना ही पड़ा.

त्रिशा के बेंगलुरु आने के बाद आजाद बहुत खुश थे. ‘‘चलो अच्छा है, वहां तुम्हें इतने अच्छे दोस्त मिल गए हैं. अब मुझे तुम्हारी इतनी चिंता नहीं करनी पड़ेगी.’’ ‘‘अच्छी बात तो है, पर इस बेफिक्री का यह मतलब नहीं कि आप हमें भूल जाएं,’’ त्रिशा आजाद को परेशान करने के लिए यह कहती तो आजाद का जवाब हमेशा यही होता, ‘‘खुद को भी कोई भूल सकता है क्या.’’

आज जब त्रिशा आजाद से बात कर रही थी तो आजाद को समझते देर न लगी कि त्रिशा आज उन से कुछ छिपा रही है, ‘‘क्या बात है, आज तुम कुछ परेशान हो?’’ ‘‘नहीं तो.’’

‘‘त्रिशा, इंसान अगर खुद से ही कुछ छिपाना चाहे तो नहीं छिपा सकता,’’ आजाद की आवाज में कुछ ऐसा था, जिसे सुन कर त्रिशा की आंखें डबडबा आईं. ‘‘मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मैं आप से कल बात करती हूं,’’ यह कह कर त्रिशा ने फोन डिसकनैक्ट कर दिया. अगले दिन त्रिशा और प्रकाश के बीच औफिस में भी कोई बात नहीं हुई. ऐसा पहली बार ही हुआ था. प्रकाश का मिजाज आज एकदम उखड़ाउखड़ा था.

‘‘चलो,’’ शाम को उस ने त्रिशा के पास आ कर कहा. रास्तेभर दोनों ने कोई बात नहीं की. होस्टल आने ही वाला था कि त्रिशा ने खीझ कर कहा, ‘‘तुम कुछ बोलोगे भी कि नहीं?’’ ‘‘मुझे तुम्हारा जवाब चाहिए.’’

कितनी डूबती हुई आवाज थी प्रकाश की. 3 साल में त्रिशा ने प्रकाश को इतना खोया हुआ कभी नहीं देखा था. पिछले 2 दिन में प्रकाश में जो बदलाव आए थे, उन पर गौर कर के त्रिशा सहम गई. ‘क्या वाकई प्रकाश… क्या प्रकाश… नहीं, ऐसा नहीं हो सकता,’ त्रिशा का मन विचलित हो उठा. ‘मुझे तुम से कल बात करनी है. कल छुट्टी भी है. कल सुबह 11 बजे मिलते हैं. गुडनाइट,’’ कहते हुए त्रिशा गाड़ी से उतर गई.

जैसा तय था, अगले दिन दोनों 11 बजे मिले. बिना कुछ कहेसुने दोनों के कदम अनायास ही पार्क की ओर बढ़ते चले गए. त्रिशा के होस्टल से एक किलोमीटर की दूरी पर ही शहर का सब से बड़ा व खूबसूरत पार्क था. ऐसे ही छुट्टी के दिनों में न जाने कितनी ही बार वे दोनों यहां आ चुके थे. पार्क के भीतरी गेट पर पहुंच कर दोनों को ऐसा लगा जैसे आज असाधारण भीड़ उमड़ पड़ी हो. भीड़भाड़ और चहलपहल तो हमेशा ही रहती है यहां, पर आज की भीड़ में कुछ खास था. सैकड़ों जोड़े एकदूसरे के हाथों में हाथ डाले अंदर चले जा रहे थे. बहुतों के हाथ में गुलाब का फूल, किसी के पास चौकलेट तो किसी के हाथ में गिफ्ट पैक. पर प्रकाश का मन इतना अशांत था कि वह कुछ समझ ही नहीं सका.

हवा जोरों से चलने लगी थी. बादलों की गड़गड़ाहट सुन कर ऐसा मालूम होता था कि किसी भी पल बरस पड़ेंगे. मौसम की तरह प्रकाश का मन भी आशंकाओं से घिर आया था. त्रिशा को लगा, शायद आज यहां नहीं आना चाहिए था. तभी अचानक उस का मोबाइल बज उठा. ‘‘हैप्पी वैलेंटाइंस डे, मैडम,’’ आजाद की आवाज थी. ‘‘ओह, मैं तो बिलकुल भूल ही गई थी,’’ त्रिशा बोली.

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‘‘आजकल आप भूलती बहुत हैं. कोई बात नहीं. अब आप का गिफ्ट नहीं मिलेगा, बस, इतनी सी सजा है,’’ आजाद ने आगे कहा, ‘‘अच्छा, अभी हम थोड़ा जल्दी में हैं. शाम को बात करते हैं.’’ आज बैंच खाली मिलने का तो सवाल नहीं था. सो, साफसुथरी जगह देख दोनों घास पर ही बैठ गए. त्रिशा अकस्मात पूछ बैठी, ‘‘क्या तुम वाकई सीरियस हो?’’

‘‘तुम समझती हो कि मैं मजाक कर रहा हूं?’’ प्रकाश का स्वर रोंआसा हो उठा.

Crime: ओलिंपियन सुशील कुमार गले में मेडल, हाथ में मौत

आज सुशील कुमार जिस मुकाम पर हैं, उन का नाम एक बड़े अपराध से जुड़ना वाकई दुखद है और सवाल खड़ा करता है कि क्यों किसी नामचीन पहलवान ने ऐसी वारदात को अंजाम दिया, जो उस की जिंदगी को पूरी तरह बरबाद कर सकती है?

यह सवाल उठने की एक वजह यह भी है कि सुशील कुमार ने कुश्ती में जो कारनामे किए हैं, वह कोई हंसीखेल नहीं है, वरना साल 2008 से पहले चंद खेल प्रेमियों को छोड़ दें तो बहुत से लोगों को यह भी नहीं पता था कि सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त, अखिल कुमार और विजेंदर सिंह में से कौन मुक्केबाज है और कौन पहलवान.

लेकिन भारत ने साल 2008 में चीन में हुए बीजिंग ओलिंपिक खेलों में जो ऐतिहासिक प्रदर्शन किया था, उस में कुश्ती में सुशील कुमार और मुक्केबाजी में विजेंदर सिंह ने कांसे का तमगा जीता था. तब से सुशील कुमार ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और वे न केवल साल 2010 में वर्ल्ड चैंपियन बने, बल्कि साल 2012 में इंगलैंड के लंदन ओलिंपिक में कांसे के तमगे का रंग बदलते हुए उसे चांदी का कर दिया था.

देश की जनता और सरकार ने भी सुशील कुमार को प्यार और तोहफे देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी. खेल जगत का हर बड़ा अवार्ड तो मिला ही, उन्हें नौकरी भी ऐसी दी गई कि वे भविष्य के पहलवानों को अपनी निगरानी में तराश सकें. इतना ही नहीं, 1982 में दिल्ली में हुए एशियाई खेलों के गोल्ड मेडलिस्ट और सुशील कुमार के गुरु महाबली सतपाल ने उन्हें अपना दामाद बनाया.

एक मुलाकात में मैं ने महाबली सतपाल से पूछा था कि उन्होंने सुशील को ही अपनी बेटी सवी के लिए क्यों चुना? तब अपने चिरपरिचित अंदाज में मुसकराते हुए उन्होंने मु झ से ही सवाल कर दिया था कि क्या आज की तारीख में मेरी बेटी के लिए सुशील से योग्य वर तुम्हें कोई दूसरा दिखता है?

सवी से शादी हुई और सुशील कुमार जुड़वां बेटों के पिता बने. इतना ही नहीं, उन्होंने अपने छोटे भाइयों का भी खास खयाल रखा. नजफगढ़ में उन्होंने ‘सुशील इंटरनैशनल’ नाम से एक स्कूल खोला, जिसे उन के भाई संभालते हैं.

फिर ऐसा क्या हुआ कि एक गरीब ड्राइवर के बेटे सुशील कुमार को यह तरक्की और जनता का प्यार रास नहीं आया और उन के साथ धीरेधीरे ऐसे विवाद जुड़ते गए, जो उन्हें अर्श से फर्श तक ले आए?

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जितना मैं ने सुशील कुमार को जाना और सम झा है, साल 2008 उन की जिंदगी का टर्निंग पौइंट था. बीजिंग ओलिंपिक में मेडल जीतते ही दिल्ली देहात का एक लड़का अचानक सुर्खियों में आ गया था. तब उन की उम्र 25 साल थी और उन्होंने अपनी जिंदगी के तकरीबन 12 साल उस छत्रसाल स्टेडियम में गुजार दिए थे.

पर अब चूंकि सुशील कुमार ओलिंपिक मैडल विजेता थे, तो लोग उन्हें अपने कार्यक्रमों में बतौर मुख्य अतिथि न्योता देने लगे थे. पर तब उन के सामने एक बड़ी समस्या यह आती थी कि वे अपनी बात को उतनी आसानी और रोचक ढंग से लोगों के सामने नहीं रख पाते थे. उन की यह  िझ झक बहुत दिनों के बाद दूर हो पाई थी, वरना बहुत सी बार तो उन के कोच ही मीडिया के सवालों के जवाब दे दिया करते थे.

ऐसे ही एक समारोह में मैं ने सुशील कुमार का पहली बार इंटरव्यू किया था और वह भी ठेठ हरियाणवी भाषा में. यह भाषा उन के लिए सहज थी, तो वे भी हरियाणवी में बोलना शुरू हो गए थे. मेरे सवालों का जवाब देते हुए उन के चेहरे पर गजब का आत्मविश्वास दिखा था.

इस के बाद हम बहुत बार मिले. ज्यादातर दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में या फिर सोनीपत के पास बहालगढ़ स्पोर्ट्स अथौरिटी औफ इंडिया के कौंप्लैक्स में, जहां वे एक अलग अंदाज में रहते थे. इन दोनों जगहों पर वे अपने साथियों के साथ जमीन पर गद्दे लगा कर सोते थे और अपना खाना खुद बनाते थे.

जहां तक मु झे याद है, साल 2008 में ओलिंपिक मैडल जीतने के बाद सुशील कुमार के बहालगढ़ वाले कमरे में पहला एयरकंडीशनर लगा था, वरना मैं ने उन्हें मई की चिलचिलाती गरमी में तंबू में बिना पंखे के घोड़े बेच कर सोते देखा है. तब वे इस कहावत को सच साबित कर देते थे कि किसी सोते हुए पहलवान को नहीं जगाना चाहिए, क्योंकि मेहनत करने के बाद जब वह सोता है तो मुरदे के समान बेसुध हो जाता है.

चूंकि दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में ज्यादातर पहलवान हरियाणा या दिल्ली देहात के होते थे, तो उन का हंसीमजाक भी उसी देशीपन से भरा होता था. वे सब तूतड़ाक की भाषा बोलते थे और जो पहलवान कसरत कम कर के खाने पर ज्यादा जोर देता था, उसे दूसरे पहलवान ‘चून’ (आटा) कह कर चिढ़ाते थे.

वैसे भी कुश्ती या पहलवानी से ऐसे बच्चों का नाता ज्यादा रहता है, जो पढ़ाईलिखाई में फिसड्डी ही होते हैं. घर के लोग उन से परेशान हो कर अखाड़े में भेज देते हैं, जहां से बहुत कम ही आगे की ट्रेनिंग के लिए बड़े शहर जा पाते हैं. उन में से भी कोई विरला ही सुशील कुमार बन पाता है.

कहने का मतलब यह है कि सुशील कुमार साल 2008 के बाद अपनी कड़ी मेहनत और कुश्ती के दांवपेंच से देश की शान तो बनते जा रहे थे, पर जिस स्टेडियम वाली जिंदगी से वे प्यार करते थे, वहां खेल की बारीकियां तो सिखा दी जाती थीं, लेकिन शिष्टाचार सिखाने वाले की बेहद कमी थी.

वैसे तो आप किसी भी क्षेत्र में हों, आप का शिष्टाचारी होना अच्छे इनसान होने की निशानी है, लेकिन खिलाडि़यों से भी इसी गुण की डिमांड ज्यादा रहती है. पर अफसोस, बड़े से बड़े खिलाड़ी शिष्टाचार के मामले में मात खा जाते हैं.

दुनियाभर में बहुत से खिलाड़ी पैसे से भले ही मालामाल हुए, पर शिष्टाचार के मामले में फुस निकले. हर कोई सचिन तेंदुलकर और अभिनव बिंद्रा की तरह सौम्य और शिष्टाचारी नहीं  बन पाया.

किसी खिलाड़ी का शिष्टाचारी होना क्यों जरूरी है? क्या शिष्टाचार खिलाड़ी में संयम बनाए रखता है? सरकार और खेल फैडरेशन वाले इस तरफ ध्यान

क्यों नहीं देते हैं? क्या अब समय आ गया है कि फैडरेशन वाले खिलाडि़यों  को शिष्टाचार सिखाने के लिए टीचर बहाल करें?

इन सब सवालों के जवाब महिला फुटबाल की कप्तान रह चुकी सोना चौधरी ने दिए, जो अब मोटिवेशनल स्पीकर भी हैं और कई सरकारी संस्थाओं के मुलाजिमों को जीवन जीने की कला के टिप्स देती हैं.

सोना चौधरी ने इस मुद्दे पर बताया, ‘‘हर खिलाड़ी में साहस होना चाहिए, पर साथ ही उसे होश भी नहीं खोना चाहिए. एक मुकाम पर पहुंच कर हर खिलाड़ी को यह फैसला करना होता है कि उसे समाज में कैसी इमेज बनानी है. उसी हिसाब से आप अपना रोल मौडल भी चुनते हैं, फिर जरूरी नहीं है कि वह रोल मौडल नामी खिलाड़ी ही हो.

‘‘जब मैं फुटबाल खेलती थी, तब मैं मदर टैरेसा की बहुत बड़ी फैन थी. एक बार कोलकाता में हम ने उन से मिलने का समय भी ले लिया था, पर किसी वजह से मिलना मुमकिन नहीं हो पाया था.

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‘‘कहने का मतलब है कि आप जिन गुणों को आत्मसात करना चाहते हैं, उसी मिजाज के लोगों से मिलते हैं या मिलने की कोशिश करते हैं.

‘‘जब आप किसी बड़े मुकाम पर पहुंच जाते हैं, तो आप का निजीपन खो जाता है. आप की समाज और देश के प्रति जवाबदेही बढ़ जाती है. उस रुतबे को बरकरार रखने के लिए और भी ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.

‘‘हर कदम सोचसोच कर रखना पड़ता है, हर शब्द सोचसोच कर बोलना पड़ता है, क्योंकि किसी सार्वजनिक प्लेटफार्म पर आप जो भी बोलते हैं, उसे बहुत से लोग सुनते हैं और अपनी जिंदगी में ढालने की कोशिश करते हैं.

‘‘खिलाड़ी को अपने शिष्टाचार का बहुत ध्यान रखना चाहिए. इस से उस की इमेज बनती है. सरकार और खेल फैडरेशन को अलगअलग फील्ड के माहिर लोगों को बुला कर खिलाड़ी की हर तरह से इमेज डवलप करानी चाहिए. इस के लिए कौंट्रैक्ट पर भी लोगों को रखा जा सकता है.

‘‘लेकिन यह एक बार की ट्रेनिंग से मुमकिन नहीं है, बल्कि यह तो बारबार होना चाहिए, 15 दिन में या महीने में जरूर. तभी कोई खिलाड़ी अच्छा इनसान भी बनता है.

‘‘याद रखिए कि कोई खिलाड़ी बड़ी मुश्किल से ऊंचे मुकाम तक पहुंच पाता है, पर अच्छा इनसान उस से भी मुश्किल से बनता है.

‘‘मेरा मानना है कि शिष्टाचार किसी को डराने की प्रेरणा नहीं देता है, बल्कि यह तो दूसरों को भी गलत राह पर जाने से रोकता है.’’

जहां तक खिलाडि़यों और अपराध के संबंध की बात है, तो रोहतक, हरियाणा के एक वकील नीरज वशिष्ठ का कहना है, ‘‘सभ्य समाज में ऐसे अपराध की कोई जगह नहीं है और जब अपराध खेल जगत में अपने दबदबे के लिए दस्तक देने लगे तो हमें जरूर सोचना चाहिए. जिस खेलकूद से हम अपने बच्चों का भविष्य जोड़ कर देखते हैं, उस में अगर ‘‘मैं ही सबकुछ’’ की जिद हावी हो जाती है तो उस से न केवल खेल, बल्कि उस में शामिल सभी का नुकसान ही होता है.

‘‘हम सब को इस आपराधिक सोच को रोकना होगा, नहीं तो खेल जगत में जो नाम हमारे देश ने हासिल किया है, उसे धूल में मिलते देर नहीं लगेगी.’’

देशदुनिया में इतना नाम मिलने के बावजूद आज अगर सुशील कुमार इस हालत में हैं, तो कानून को भी बारीकी से उन सभी पहलुओं पर गौर करना होगा, जो उन के अपराधी बनने में मददगार साबित हुईं. सागर धनखड़ को तो वापस नहीं लाया जा सकता, पर सुशील कुमार जैसे बड़े खिलाड़ी को अपराध की राह पर जाने से रोका जा सकता है.

कानून का काम केवल सजा दिलाना ही नहीं है, बल्कि अपराधी को अच्छा इनसान बनने की प्रेरणा देना भी कानून का ही फर्ज है.

बात थोड़ी फिल्मी है, पर साल 1971 में आई राजेश खन्ना की फिल्म ‘दुश्मन’ में उन के निभाए गए किरदार से शराब के नशे में गाड़ी चलाते हुए एक आदमी रामदीन की मौत हो जाती है, जिस के बाद कानून उस किरदार को रामदीन के परिवार की देखभाल करने की अनोखी सजा देता है.

लेकिन रामदीन का परिवार उस के साथ दुश्मन जैसा बरताव करता है. लेकिन राजेश खन्ना का किरदार न केवल उस परिवार के पालनपोषण की जिम्मेदारी उठाता है, बल्कि दुश्मन से दोस्त बन जाता है.

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क्या गुनाह साबित होने के बाद सुशील कुमार को भी ऐसी कोई सजा मिल सकती है, जो भारतीय समाज को फिल्म ‘दुश्मन’ जैसा ही संदेश दे जाए? ऐसी सजा जिस में किसी अपराधी को अच्छा इनसान बनने का मौका मिले और अगर वह नामचीन खिलाड़ी है, तो फिर ऐसा करना ज्यादा जरूरी हो जाता है.

सुशील कुमार की इस पैरवी की एक बड़ी वजह यह भी है कि अगर उन्हें आदतन अपराधी मान कर कड़ी सजा दी जाती है, तो यह उन नए पहलवानों का मनोबल तोड़ देगी, जो सुशील कुमार को गुरु मान कर अखाड़े में उतरे हैं.

आज सुशील कुमार को दुनिया के सामने तौलिए के पीछे मुंह छिपाने पर उन की खिल्ली उड़ाने वालों या उन्हें ‘गैंगस्टर’, ‘डौन’ कहने वालों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि इस पहलवान ने दुनिया के मंच पर तिरंगे को फख्र से लहराने का काम कई बार किया है. अब तक आगामी टोक्यो ओलिंपिक में भारत के 8 पहलवानों ने अपना टिकट पक्का कर लिया है, उन में से ज्यादातर के आदर्श सुशील कुमार ही हैं.       द्य

और भी कांड हुए हैं

* हरियाणा के रोहतक में शुक्रवार, 12 फरवरी की शाम हुए एक हत्याकांड में 5 लोगों की मौत हो गई थी. मरने वालों में 2 कोच और एक महिला पहलवान शामिल थी. इस हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप अखाड़े में ट्रेनर का काम करने वाले सुखविंदर पर लगा था.

* इसी तरह साल 2019 के नवंबर महीने में हरियाणा की रहने वाली नैशनल लैवल की ताइक्वांडो खिलाड़ी सरिता जाट को कुश्ती के एक खिलाड़ी सोमवीर जाट ने गोली मार दी थी.

सोमवीर जाट सरिता से प्यार करता था और उस से शादी करना चाहता था, पर सरिता के मना करने पर वह बहुत ज्यादा गुस्सा हो गया था और उस ने सरिता की मां के सामने ही उस की छाती में गोली ठोंक दी थी.

इस वारदात के तकरीबन एक साल बाद आरोपी सोमवीर जाट को पुलिस ने राजस्थान के दौसा इलाके से गिरफ्तार किया था.

* साल 2015 में रोहतक के कबड्डी खिलाड़ी रह चुके सन्नी देव उर्फ कुक्की के सिर भी एक खून का इलजाम लगा था. कुक्की नैशनल लैवल का कबड्डी खिलाड़ी था. विरोधी पक्ष के हत्थे जब कुक्की नहीं लगा तो उस ने कुक्की के छोटे भाई और नैशनल लैवल के कबड्डी खिलाड़ी सुखविंदर नरवाल को गोलियों से भून डाला था.

* हरियाणा के लिए क्रिकेट खेल चुका सुरजीत रंगदारी के मामले में पुलिस के हत्थे चढ़ा था. वह रंगदारी से पैसा इकट्ठा कर के फिर से क्रिकेट खेलना चाहता था, लेकिन पैसे कमाने का उस का यह तरीका उसे जुर्म की राह पर ले गया.

* दिल्ली का जितेंद्र उर्फ गोगी वौलीबाल का नैशनल लैवल का खिलाड़ी था. उस का उठनाबैठना बदमाशों के साथ हो गया और उस ने खेल छोड़ कर दिल्ली, सोनीपत, पानीपत व दूसरी कई जगहों पर वारदात करनी शुरू कर दी थी.

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