Crime- टोनही प्रथा: आत्महत्या के बाद!

जाने कब से चली आ रही  प्रथा छत्तीसगढ़ स्थापना के 20 वर्ष पूर्ण होने के बाद भी आज  नासूर बनी हुई है. परिणाम स्वरूप जाने कितनी महिलाएं गांव में आत्महत्या कर लेती हैं, अथवा बीच चौराहे पर मार दी जाती हैं.कभी यह घटनाक्रम प्रकाश में आता है और कभी छुपा दिया जाता है.

ऐसे ही एक अत्यंत संवेदनशील मामले में न्यायधानी कहे जाने वाले बिलासपुर की कोनी थाना पुलिस ने महिला को टोनही कहकर प्रताड़ित कर आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने की आरोपी महिला सहित 5 लोगों को गिरफ्तार कर यह संदेश प्रसारित कर दिया है कि ऐसे अनर्गल और महिलाओं को परेशान करने वाले मसले पर छत्तीसगढ़ पुलिस कठोर मुड़ में है.

कोनी थाना क्षेत्र के ग्राम पौंसरा में बजरंग चौक निवासी राशि सिंह ने 9 जून 2021 को अपने ऊपर मिट्टी तेल डालकर आग लगा ली थी. गंभीर रूप से झुलसी अवस्था मे उसे सिम्स में भर्ती किया गया. पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि  पड़ोसी उसे टोनही कहकर प्रताड़ित करते  रहे है. और उसने, उनकी प्रताड़ना से परेशान होकर आग लगाकर खुदकुशी का प्रयास करने की बात अपने इकबालिया बयान में कही.

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पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल ने महिला संबंधी इस गंभीर अपराध को संज्ञान में लेते हुए त्वरित करवाई का निर्देश दिया. परिणाम स्वरूप यह मामला कहीं फाइलों में छुप जाता, बाहर आ गया. और कोनी पुलिस ने  करवाई कर  10 जून को आरोपी राजू सिंह पिता सुखनंदन , सती बाई पति बलराम ठाकुर , भरत सिंह पिता विजय सिंह , जागेश्वर सिंह पिता सुखनंदन सिंह , करतार सिंह पिता सुखनंदन सिंह  को गिरफ्तार कर टोनही प्रताड़ना एक्ट के तहत न्यायालय में पेश कर दिया.

आवश्यकता है जागरूकता की

छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य प्रदेश है जहां बस्तर जैसा बीहड़ अंचल है तो सरगुजा और रायगढ़ जैसा अत्यधिक वनों से परिपूर्ण और आदिवासी बाहुल्य जिले. शिक्षा और जन जागरूकता के अभाव में यहां कई दशकों से सामाजिक कुरीतियां लोगों के जीवन को दुभर  बनाती रही हैं. महिलाओं को लेकर  सबसे बड़ी अंधविश्वास और उत्पीड़न की हथियार है टोनही कह कर के महिलाओं को बात बात परेशान करना और यहां तक कि सामूहिक रूप से हमला करके घायल कर देना, अथवा मार देना.

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जाने कितनी महिलाएं इस क्रूर व्यवस्था के कारण मार दी जाती हैं और अपमान झेलती रहती है. यह भी सच है कि छत्तीसगढ़ सरकार ने टोनही निवारण अधिनियम लागू किया हुआ है मगर इसके बावजूद जन जागरूकता के अभाव में आज भी ग्रामीण अंचल में टोनही कह कर  लोगों को प्रताड़ित किया  जाता है और आगे चलकर ऐसे घटनाक्रमों में कई दर्दनाक हादसे घटित होते रहते हैं. सरकार को इसे हेतु सतत प्रयास करना होगा. शिक्षाविद एल एन दिवेदी के मुताबिक  ग्रामीण अंचल में मैंने यह अनुभव किया है कि यह प्रथा बहुत भीतर तक है, इसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर सरकार को मुहिम चलानी चाहिए कि किसी को भी टोनही कहना संज्ञेय अपराध है और यह एक ऐसा उत्पीड़न है जिसमें कभी भी किसी भी परिवार की महिला को उत्पीड़ित किया जा सकता है.

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 अतः हमें इससे बचना चाहिए गांव-गांव में यह संदेश पहुंचाना चाहिए.

सामाजिक कार्यकर्ता कमल सरविदया टोनही उत्पीड़न पर अनुभव साझा करते हुए बताते हैं कि छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि बिहार, झारखंड, उड़ीसा जैसे प्रांतों में भी यह प्रथा कुछ अलग नाम स्वरूप में विद्यमान है, इसके लिए जहां सरकार को पहल करनी चाहिए वही समाजिक संस्थाओं को भी निरंतर प्रयास करना होगा. शिक्षा के आज के 21 वी शताब्दी के समय में ऐसी घटनाएं यह बताती है कि आज भी हमारा देश किस तरह पिछड़ा हुआ है और कानून कैसे बेबस होकर देखता रह जाता है.

MK- पूर्व सांसद पप्पू यादव: मददगार को गुनहगार बनाने पर तुली सरकार- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने उन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी. इस तरह वह जेल चले गए. जेल में रहते हुए भी वह जो चाहते वही करते थे. इस दौरान वह जेल में बीमारी का बहाना बना कर सरकारी अस्पताल के कैदी वार्ड में डेरा जमाए रहते और अपने समर्थकों को वहां बुला कर पार्टी करते रहते थे. वहां उन का दरबार भी लगता था.

पप्पू यादव भले ही सलाखों के पीछे थे, लेकिन जेल में भी उन का रुतबा कायम था. 26 सितंबर को उन्होंने जेल में ही अपने 50 साथियों के साथ पार्टी मनाई. पप्पू यादव द्वारा जेल में पार्टी करने की बात जब बाहर के लोगों को मालूम हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्ती करते हुए जेल वार्डन और 2 संतरियों को सस्पेंड कर दिया.

इस के करीब 3 महीने बाद सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाइकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिस में पप्पू यादव को जमानत हो गई थी. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि पप्पू यादव जेल से बाहर रह कर अजीत सरकार हत्याकांड के गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं, जिस से न्याय प्रक्रिया में बाधा आ सकती है.

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बेउर जेल से भेजा तिहाड़

पटना के बेउर जेल में रहने के दौरान उन के पास मोबाइल बरामद हुआ था. साथ ही यह भी पता चला था पप्पू यादव ने कई महत्त्वपूर्ण लोगों से बातें की थीं. सीबीआई को शक था कि पप्पू यादव यहां रहते हुए केस को प्रभावित कर सकते हैं अत: सीबीआई ने अदालत से अपील की कि पप्पू यादव की असंवैधानिक गतिविधियों को देखते हुए उन्हें बेउर जेल से हटा कर किसी अन्य जेल में भेजा जाए.

तब कोर्ट के आदेश पर पप्पू यादव को बेउर जेल से दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया गया. 14 फरवरी, 2008 को पटना की स्पैशल सीबीआई कोर्ट ने अजीत सरकार हत्याकांड मामले में पप्पू यादव और राजन तिवारी को उम्रकैद की सजा सुनाई.

5 साल तक तिहाड़ जेल में सजा काटने के बाद 17 मई, 2013 को अजीत सरकार मामले में पर्याप्त सबूतों के अभाव के कारण पप्पू यादव और राजन तिवारी को बरी कर दिया. जेल से बरी होने के बाद पप्पू यादव को चुनाव लड़ने की इजाजत भी मिल गई.

सन 2014 के लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव और उन की पत्नी रंजीत रंजन दोनों ने बिहार के अलगअलग क्षेत्रों से चुनाव लड़ा और दोनों जीत कर लोकसभा पहुंच गए.

इसी साल नरेंद्र मोदी की सरकार अस्तित्व में आई थी और देश का चुनावी समीकरण बदल गया. बिहार में लालू यादव को कमजोर पड़ते देख पप्पू यादव उन का साथ देने के लिए आगे बढ़े, लेकिन लालू यादव इसलिए तैयार नहीं थे कि वह अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटों को सौंपना चाहते थे.

लालू यादव और पप्पू यादव के बीच फिर विवाद पैदा हो गया. इस पर पप्पू यादव ने लालू पर आरोप भी लगाया कि वह उन की हत्या करवाना चाहते हैं. इस के बाद राजद ने पप्पू यादव पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल रहने का आरोप लगा कर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.

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अपनी पार्टी का किया गठन

राजद से निकाले जाने के बाद पप्पू यादव ने बिहार में होने पाले विधानसभा चुनाव से पहले जन अधिकार पार्टी का गठन किया और विधानसभा चुनाव में 243 में से 109 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, मगर उन के 108 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई. 2019 में पप्पू यादव अपनी पार्टी के टिकट पर मधेपुरा की सीट से और उन की पत्नी रंजीत रंजन कांग्रेस पार्टी के तौर पर सुपौल लोकसभा का चुनाव लड़ीं, लेकिन दोनों ही चुनाव हार गए.

इस के बाद सन 2019 में पप्पू यादव तब चर्चा में आए, जब पटना की सड़कों पर बाढ़ का सैलाब उमड़ा था. इस दौरान बिहार में सत्ता पर काबिज जेडीयू और बीजेपी के सुशील मोदी पटना के लोगों की सहायता करने में असमर्थ दिखाई पड़ रहे थे तो दूसरी तरफ पप्पू यादव ने बाढ़ पीडि़तों की काफी सहायता की तब लोगों ने उन्हें अपना मसीहा समझा.

इस बार जब पूरे देश में कोरोना मौत का कहर बरपा रहा था तो पप्पू यादव पटना के अस्पतालों के बाहर लोगों की जान बचाने के लिए कीमती रेमेडेसिविर और औक्सीजन सिलेंडर बांटते नजर आए. उन की मदद से अनेक लोग बेवक्त काल के गाल में समाने से बच गए.

इसी बीच पप्पू यादव को अपने लोगों से सारण में दरजनों एंबुलेंस के खड़ी रहने की बात पता चली तो वह बीजेपी सांसद राजीव प्रताप रूड़ी के रसूख की परवाह किए बिना वहां पहुंचे और इस का भंडाफोड़ कर दिया.

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कहानी लिखते समय पता चला है कि पप्पू यादव को वीरपुर जेल से उन के खराब स्वास्थ्य के आधार पर दरभंगा मैडिकल कालेज अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया है.

पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन और बेटे सार्थक रंजन ने पटना में नीतीश के खिलाफ मोर्चा खोल लिया है. रंजीत रंजन ने नीतीश कुमार को चुनौती दी है कि अगर उन के पति पप्पू यादव का बाल भी बांका हुआ तो वह नीतीश कुमार को खींच कर पटना के चौराहे पर खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगी. बिहार में पप्पू यादव के मामले को ले कर तरहतरह की अफवाहों का बाजार गर्म है.

Crime- लव में धोखा: कौन है दोषी?

चढ़ती उम्र के साथ लव यानी प्यार की डेहरी पर चढ़ना आम बात है. मगर प्यार की इस पगडंडी पर कितने कांटे और शूल मिलेंगे इसकी परवाह किए बगैर जब कोई आगे बढ़ता चला जाता है, तो उसका जीवन बर्बाद होना स्वाभाविक है. छत्तीसगढ़ के जशपुर जिला एक आदिवासी नाबालिग किशोरी इसका ज्वलंत उदाहरण बन कर इन दिनों न्याय मांग रही है. बिल्कुल एक फिल्मी कहानी की तरह हुए इस घटनाक्रम को पढ़कर आप भी महसूस करेंगे कि किसी ने सच कहा है कि प्रेम गली अति सांकरी!

प्यार में अक्सर लड़कियां ही धोखा खाती है. क्योंकि खोने के लिए सिर्फ उन्हीं के पास अपनी इज्जत होती है. वह यह समझ नहीं पाती कि जिस युवा जीवन साथी परवाह पर भरोसा कर रही है कहीं वह उसे बीच रास्ते पर न छोड़ दें. ऐसी परिस्थितियों में लड़कियों के सामने कानून का दरवाजा खटखटाना अथवा जीवन से निराश होकर देह त्याग करना ही बच जाता है.

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पहली घटना –
जिला बिलासपुर के थाना सीपत की एक लड़की ने एक युवक की मोहब्बत के फेर में पड़कर धोखा खाया और आत्महत्या कर ली. युवक ने विवाह करने से कर दिया था इन्कार.

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दूसरी घटना-

जिला रायगढ़ के थाना सारंगढ़ में एक नाबालिग युवती एक युवक से धोखा खाने के बाद गर्भवती हो गई तो विवाह नहीं करने के आरोप के साथ थाना पहुंची. युवक ने पहचानने से किया था इंकार.

तीसरी घटना-

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक युवती प्रेम के भंवर में पढ़कर महानगर चली गई जहां उसे छोड़कर युवक गायब हो गया.

दैहिक शोषण और दोस्त

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिला के थाना नारायणपुर में आर्मी के एक जवान ने एक नाबालिग किशोरी को अपने प्रेम जाल में फंसाया और शादी का झांसा देकर उसका दैहिक शोषण करता रहा. किशोरी को होश आया तो विवाह करने का दबाव बनाया तब आराेपी जवान ने किशोरी को अपने दो दोस्तों के पास भेज दिया. आरोपी जवान के दाेनाें मित्रों ने भी पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया. जब युति दोनों तरफ से लूट और बर्बाद हो गई तब उसे होश आया और वह पुलिस के पास पहुंची.

पुलिस ने पीड़िता के रिपोर्ट पर आरोपी के दोनों साथियों को गिरफ्तार कर लिया. वही जम्मू कश्मीर में ड्युटी में तैनात आर्मी के जवान को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस की टीम रवाना हो गई है. थाना प्रभारी ललित सिंह ने हमारे संवाददाता को बताया साहीडांड़ निवासी अंशुमन टोप्पो सेना में कश्मीर में पदस्थ है. उसका प्रेम प्रसंग एक नाबालिग किशोरी के साथ था और उसे शादी का झांसा देकर दैहिक शोषण किया . जब वह गर्भवती हुई ताे आरोपी फौजी की मां ने पीड़िता का गर्भपात करा दिया.

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सितंबर 2020 में जब पीड़िता ने आरोपी को शादी करने की बात कही तो उसने पीड़िता को दो साथी अमित राम एवं अनीमानंद टोप्पो के पास भेज दिया. पीड़िता ने आरोपी की बात मानते हुए जब उसके दोनों दोस्तों के साथ पहुंची तो आरोपी के दाेनाें दोस्तों ने मिलकर पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया. आरोपी के दोनों दोस्तों द्वारा सामूहिक दुष्कर्म की घटना को अंजाम देने के बाद पीड़िता ने आरोपी सहित उसके दाेनाें दोस्तों के खिलाफ नारायणपुर थाने में मामला दर्ज कराया.

प्यार की डगर पर कांटे ही कांटे

दरअसल प्यार का रास्ता हमेशा से काटो भरा रहा है इसीलिए जहां सामाजिक नियम कायदे बनाए गए हैं वही कानून भी सख्ती के साथ युवक और युवती दोनों के लिए कवच बन कर खड़ा रहता है. मगर जब कभी इन दोनों रास्तों को छोड़ कर कोई आगे बढ़ता है तो उसे धोखा, दुष्कर्म मिलने की संभावना होती है. किसी ने सच कहा है प्रेम गली अति सांकरी है और इसमें समा पाना, पार पाना बेहद मुश्किल होता है.

सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर रमाकांत श्रीवास के मुताबिक कानून के मुताबिक युवती के विवाह की उम्र 18 वर्ष और युवकों के लिए 21 वर्ष तय है. और इस उम्र तक आते-आते दोनों का ही बहक जाना सामान्य बात है. ऐसे में सिर्फ एजुकेशन और जागरूकता ही रक्षा कवच हो सकती है.

हाईकोर्ट के अधिवक्ता डा उत्पल अग्रवाल के मुताबिक प्यार के खेल में युवतियों को धोखा खाने की संभावना ज्यादा होती है और हमारे न्यायालय में भी ऐसे ही प्रकरण ज्यादा आते हैं. दरअसल इसके पीछे नारी मन का कोमल भाव होता है जिसका लाभ धुर्त दोस्त फरेबी युवा उठाते हैं.

उलटी गंगा- भाग 2: आखिर योगेश किस बात से डर रहा था

मैं तो कहती हूं उस की पत्नी को भी जेल में डाल देना चाहिए, जो एक गुनहगार की अगुआई कर रही है,’’ गुस्से से अपनी आंखें लाल कर नीलिका बोली.

‘‘हो सकता है अमनजी सही कह रहे हों और वह लड़की झूठ…’’

‘‘झूठ…? बीच में ही नीलिमा बोल पड़ी,’’ और वे सच बोल रहे हैं? क्यों, क्या वह लड़की पागल है जो खुद को ही बदनाम करेगी? जरूर कुछ किया ही होगा तभी तो वह बोल रही होगी… इसलिए गुनाह कर के भी मर्द बच निकलते हैं, क्योंकि उन की पत्नियां उन्हें बचाने के लिए दीवार बन कर उन के सामने खड़ी हो जाती हैं. जानती हैं कि पति गुनहगार है फिर भी… सच कहती हूं अगर उस की जगह मेरा पति होता न, तो मैं उसे नहीं छोड़ती. जेल भिजवा कर ही रहती साले को, ‘‘नीलिमा के मुंह से ऐसी बातें सुन कर योगेश के रोंगटे खड़े हो गए.’’

‘‘सोचो, खुद की भी बेटी है, अगर उस के साथ कोई ऐसा करे तो? छि:, अरे, औरत क्या कोई वस्तु है, जो जिस का जब मन चाहे इस्तेमाल कर लो, बिना उस की मरजी के?’’

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आज नीलिमा के तेवर देख योगेश की रूह कांप रही थी. बस मन ही मन यही

प्रार्थना किए जा रहा था कि वह इस सब से बचा रहे किसी तरह.

‘‘अब तुम्हें क्या हुआ?’’ योगेश के चेहरे पर हवाइयां उड़ते देख नीलिमा कहने लगी, ‘‘हां, पता है मुझे, तुम्हें भी सुन कर बुरा लग रहा होगा, है न? अरे किसी भी शरीफ इंसान को सुन कर बुरा लगेगा, मगर देखो, हम उन्हें क्या समझते थे और क्या निकले?’’ किसी का कुछ कहा नहीं जा सकता,’’ भुनभुनाते हुए नीलिमा किचन की तरफ बढ़ गई.

योगेश धम्म से वहीं सोफे पर बैठ गया. सोचने लगा कि आज जिस तरह से संस्कारी अमन अंकल की थूथू हो रही है, कल उस की बारी न हो. फिर कैसे नजरें मिलाएगा वह अपनी बेटियों से? गुमसुम सा वह आ कर कमरे में बैठ गया. नीलिमा ने पूछा, ‘‘कुछ खाओगे?’’

बच्चे और नीलिमा तो सो गए, उस की आंखें अब भी जाग रही थीं. अचानक उस के दिल में एक शूल सा उठता, फिर शांत हो जाता. कभी वह अपने सो रहे बच्चों को निहारता, तो कभी एकटक नीलिमा को देखता. आज नीलिमा उसे उस की पत्नी नहीं, बल्कि चंडिका का रूप लग रही थी, जो छूते ही भस्म कर देगी. इसलिए वह हौल में जा कर सोफे पर सोने की कोशिश करने लगा, लेकिन वहां भी उसे कहां चैन.

घर का 1-1 सामान जैसे उस के मुंह चिढ़ा रहा हो, हंस रहा हो उस पर और कह रहा हो, ‘‘देख रहे हो, कैसी उलटी गंगा बह रही है? नहीं बच पाओगे तुम भी योगेश बाबू. देरसबेर ही सही, पर कर्मों का फल तो सब को मिलता ही है. तुम्हें भी जरूर मिलेगा. उन की बातें सुन वह घबरा कर उठ बैठता और लंबीलंबी सांसें लेने लगता. डर के मारे हालत खराब हो रही थी उस की, पर बताए तो किसे और क्या? सोच कर ही कंपकंपा उठता कि अगर उस के किए गुनाह सब के सामने आ गए, तब क्या होगा? उस की तो बसीबसाई गृहस्थी ही उजड़ जाएगी.’’

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‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा. क्यों मैं बेकार की बातें सोच रहा हूं? वह कभी अपना मुंह नहीं खोलेगी और अगर खोल दिया तो? तो मैं उसे झूठा साबित कर दूंगा. कह दूंगा वही मुझ पर डोरे डाल रही थी. जब दाल नहीं गली, तो मुझ पर इलजाम लगा रही है. मगर उस ने कोई सुबूत पेश कर दिया या गवाह खड़ा कर दिया तो, तो क्या होगा? कौन गवाह? किस की  इतनी हिम्मत है कि जो मेरे खिलाफ बोले,’ वह खुद से ही सवालजवाब किए जा रहा था और परेशान हुए जा रहा था. मुक्ता के साथ किए 1-1 अत्याचार आज उस की आंखों के सामने चलचित्र की तरह नाचने लगे.

बात 7-8 साल पहले की है. जिस कंपनी में योगेश बौस था. उसी कंपनी में मुक्ता भी काम करती थी, पर छोटे पद पर. चूंकि योगेश मुक्ता का बौस था, इसलिए उस की मजबूरी थी उस की हर बात को मानना. गोरा रंग, लंबे घने बाल, मोटीमोटी झील सी आंखें और उस का छरहरा बदन देख योगेश उसे देखता ही रह जाता. जिस तरह वह उसे नजरें गड़ाए देखा करता. उस से मुक्ता एकदम असहज हो जाती और अपने कपड़े ठीक करने लगती.

जानती थी वह कि उसे ले कर योगेश के विचार कुछ ठीक नहीं हैं, इसलिए वह अपना काम समय के साथ कर लिया करती ताकि योगेश को उसे कुछ कहने का मौका ही न मिले. फिर भी किसी न किसी बहाने वह उसे अपने कैबिन में बुला ही लेता और घंटों बेमतलब के कामों में उलझाए रखता. जब वह कामों में उलझी रहती, योगेश लगातार अपनी नजरें उस पर ही टिकाए रखता.

आप कितने भी अपने काम में व्यस्त क्यों न हों अगर कोई आप को एकटक निहार रहा हो, तो आप की नजरें खुदबखुद उस ओर चली जाती हैं. ऐसा अकसर होता है. जब मुक्ता की नजर योगेश पर पड़ती, तब भी ढीठ की तरह वह उसे उसी प्रकार निहारता रहता. हार कर मुक्ता ही अपनी नजरें नीची कर लेती या वहां से हट जाती.

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मुक्ता को अब योगेश के सामने जाने से भी डर लगने लगा था, क्योंकि जिस तरह से वह उस के सीने पर अपनी नजरें गड़ाए रहता, उस से वह सहम सी जाती. योगेश के डर से ही अब उस ने जींस टीशर्ट और स्लीवलैस कपड़े पहनने छोड़ दिए थे. जानबूझ कर ढीलेढाले कपड़े पहन कर औफिस जाती, ताकि योगेश उसे न देखे, पर उस की गंदी नजरें फिर भी उसे घूरती रहतीं.

कई बार तो वह जानबूझ कर उस से टकरा जाता, फिर भी मुक्ता ही सौरी बोलती. एक बार तो उस ने उस के सीने पर हाथ ही रख दिया और फिर सौरीसौरी कहने लगा, लेकिन योगेश ने ऐसा जानबूझ कर किया, यह बात मुक्ता जानती थी. ऐसा पहली बार नहीं हुआ था. जब भी मौका मिलता, वह मुक्ता को यहांवहां छू देता और बेचारी कुछ न बोल कर आगे बढ़ जाती.

रोना आता उसे अपनी हालत पर. सोचती क्या लड़की होना इतना बड़ा पाप है? शुरू से ही मुक्ता पर उस की गंदी नजर थी. जानता था वह कि यह नौकरी उस के लिए कितना माने रखती है, क्योंकि उस के घर में कमाने वाला उस के सिवा और कोई नहीं था. पिता की असमय मौत ने घरपरिवार की सारी जिम्मेदारी उस के कंधों पर डाल दी थी. इसी कारण वक्तबेवक्त योगेश उस का फायदा उठाता रहता था.

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उस दिन जानबूझ कर योगेश ने मुक्ता को देर रात तक औफिस में रोक लिया और कहा कि वह उसे घर छोड़ देगा. औफिस के चपरासी को भी उस ने छुट्टी दे दी. लेकिन मुक्ता जल्दीजल्दी अपना काम निबटा कर वहां से जाने ही लगी कि पीछे से आ कर योगेश ने उसे अपनी बांहों में दबोच लिया और उसे यहांवहां छूने लगा.

‘‘सर, यह क्या कर रहे हैं आप? छोडि़ए मुझे,’’ कह कर मुक्ता ताकत लगा कर उस की पकड़ से निकली ही कि फिर से उस ने उसे दबोचना चाहा, यह बोल कर कि इसी मौके की तो उसे कब से तलाश थी. मगर ऐन वक्त पर वही चपरासी वहां पहुंच गया और मुक्ता बच गई. वरना तो आज योगेश उसे नहीं छोड़ता. शायद वह चपरासी भी योगेश के गंदे इरादे भांप गया था, इसलिए अपना खाने का डब्बा छूट जाने का बहाना कर वापस आ गया और मुक्ता बरबाद होने से बच गई.

जरा सी आजादी- भाग 4: नेहा आत्महत्या क्यों करना चाहती थी?

पिछली बालकनी में खड़ी रही शुभा देर तक. नजर नेहा के घर पर थी. रोशनी जल रही थी. वहां क्या हाल है क्या नहीं, यह उसे बेचैन कर रहा था. तभी उस के पतिदेव विजय का फोन आया तो सहसा सारा किस्सा उन्हें सुना दिया.

‘‘मुझे बहुत डर लग रहा है, विजय. अगर नेहा ने कुछ…’’

‘‘ब्रजेश को सब बताया है न तुम ने. अब वह देख लेगा न.’’

‘‘नहीं देखेगा. मुझे लगता है उसे पता ही नहीं कि उसे क्या करना चाहिए.’’

‘‘देखो शुभा, तुम अपना दिमाग खराब मत करो. तुम्हारा ब्लड प्रैशर बढ़ जाएगा और मैं भी वहां नहीं हूं. तुम कोई झांसी की रानी नहीं हो जो किसी की भी जंग में कूदना चाहती हो.’’

‘‘सवाल उस के जीनेमरने का है, विजय. अगर मेरे कूदने से वह बच जाती है तो मेरे मन पर कोई बोझ नहीं रहेगा और अगर उस ने कुछ कर लिया तो जीवनभर अफसोस रहेगा.’’

‘‘तुम ने ठेका ले रखा है क्या सब का? न जान न पहचान.’’

‘‘हम जिंदा इंसान हैं, विजय. क्या मरने वाले को लौटा नहीं सकते? मुझे लगता है मैं उसे मरने से रोक सकती हूं. आप एक बार ब्रजेश से बात कीजिए न. उस का फोन नंबर है मेरे पास, मैं आप को लिखवा देती हूं.’’

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मंदमंद मुसकराने लगे विजय. जानते हैं अपनी पत्नी को. समस्या को सुलझाए बिना मानेगी नहीं और सच भी तो कह रही है. खिलौना टूट जाने के बाद कोई कर भी क्या लेगा? प्रयास का कोई भी औचित्य तभी तक है जब तक प्राण हैं. पखेरू के उड़ जाने के बाद वास्तव में उन्हें भी अफसोस होगा. शुभा का कहा मान लेना चाहिए, किसी के जीवन से बड़ा क्या होगा भला?

‘‘अच्छा बाबा, तुम जैसे कहो. नंबर दे दो, मैं एक बार ब्रजेश से बात करता हूं. शायद कोई रास्ता निकल ही आए.’’

विजय ने आश्वासन दिया और उस का रंग उसे दूसरी सुबह नजर भी आ गया. पूरे 10 बजे ब्रजेश नेहा को उस के पास छोड़ते गए.

‘‘आप पर भरोसा करना चाहता हूं जिस में मेरा ही फायदा होगा.’’

नेहा भीतर जा चुकी थी और जातेजाते कहा ब्रजेश ने, ‘‘शायद कहीं मैं ही सही नहीं हूं. आप मेरी बहन जैसी हैं. वह भी इसी तरह अधिकार से कान मरोड़ देती है. आप जैसा चाहें करें. मैं दखल नहीं दूंगा. बस, मेरा घर बच जाए. मेरी नेहा जिंदा रहे.’’

आभार व्यक्त किया ब्रजेश ने और यह भी बता दिया कि नेहा ने नाश्ता नहीं किया है अभी. एक पीड़ा अवश्य नजर आई उसे ब्रजेश के चेहरे पर और एक बेचारगी भी. ब्रजेश चले गए और शुभा भीतर चली आई.

‘‘नाश्ता क्यों नहीं किया तुम ने?’’

‘‘आप ने कर लिया क्या?’’

‘‘अभी नहीं किया. बोलो, क्या खाएं? तुम्हारा क्या मन है, वही खाते हैं.’’

‘‘मैं बनाऊं क्या? आप पसंद करेंगी?’’

‘‘अरे बाबा, नेकी और पूछपूछ. ऐसा करती हूं, मैं जरा अपनी अलमारी ठीक कर लेती हूं. तुम्हारा मन जो चाहे बना लो.’’

पैनी नजर रखी शुभा ने क्योंकि रसोई में चाकू भी थे. तेज धार चाकू उस ने उठा कर छिपा दिए थे जिस पर नेहा ने आवाज दी. ‘‘दीदी, आप का चाकू आलू तक तो काटता नहीं है, आप इस से काम कैसे करती हैं?’’

‘‘आज बाजार चलेंगे, नेहा. कुछ सामान लाना है. चाकू भी लाने वाले हैं.’’

आधे घंटे के बाद नेहा ने नाश्ता मेज पर सजा कर रख दिया. आलूटमाटर की सब्जी और पूरी. खातेखाते नेहा ने कहा, ‘‘दीदी, आप का घर कितना खुलाखुला है. ऐसा लगता है सांस आती भी है और जाती भी है. मेरे घर में सामान ही इतना है कि…’’

‘‘पुराना सामान निकाल देते हैं. थोड़ा सा बदलाव करते हैं. तुम्हारा घर भी खुलाखुला हो जाएगा. आज बाजार चलते हैं न. चलो, अभी चलें. दोपहर का लंच बाहर ही करेंगे.’’

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‘‘कुछ रुपए दिए हैं ब्रजेश ने. अपने लिए जो चाहूं खरीदने को कहा है.’’

‘‘कोई बात नहीं, मेरे पास भी कुछ रुपए हैं. जरूरत पड़ी तो बैंक से निकाल लेंगे. तुम जो चाहो, ले लेना.’’

‘‘अरे नहीं बाबा, मुझे क्या ताजमहल खरीदना है जो इतने रुपए चाहिए. न सोना चाहिए न महंगी साड़ी. कुछ भी भारीभरकम नहीं चाहिए. कुछ हलकाफुलका चाहिए जिस का मेरी छाती पर कोई बोझ न हो.’’

अभियान शुरू किया नेहा की रसोई से. दुनियाजहान के पुराने बरतन, जिन्हें कभी अपना घर बनाने पर निकाल देंगे, पुराना फ्रिज, पुराना टीवी, रेडियो, पुरानी प्रैस, पुराना लोहा, पुरानीपुरानी किताबें, पुराना फर्नीचर, पुराने परदे, पुराने कपड़े, पुरानी तसवीरें, पुरानी साडि़यां, और भी बहुतकुछ था जिसे बदलने की आवश्यकता थी.

‘‘कल जब अपना घर होगा तब ले लेना नया सब.’’

‘‘अपना घर होगा जब रिटायरमैंट होगा और उस में अभी 4 साल पड़े हैं. तब तक तो मन भी मर जाएगा. कल का इंतजार कब तक, दीदी?’’

‘‘कल का इंतजार तुम अपने हाथों समाप्त कर लो, नेहा.’’

‘‘ब्रजेश औफिस के काम से बाहर जाने वाले हैं इस सोमवार, कह रहे हैं मुझे साथ लेते जाएंगे.’’

‘‘तुम वहां क्या करोगी?’’

‘‘क्या करूंगी, होटल में सड़ूंगी और क्या.’’

‘‘तो मत जाओ. मैं कागजकलम देती हूं, सामान की लिस्ट बनाओ जिसे बदलना चाहती हो. वे बाहर रहेंगे तो हम आराम से सफाई अभियान पूरा कर लेंगे.’’

‘‘घर में तांडव हो जाएगा. मेरी इतनी औकात कहां.’’

‘‘तुम घर की मालकिन हो न. अपनी इच्छा का मान भी करना सीखो. घर के बरतन बदलने में भी तुम ब्रजेशजी का मुंह देखती हो. उन्हें उन के औफिस तक ही रहने दो न.’’

‘‘नहीं रहते न औफिस तक. रसोई के चम्मच तक में उन की मरजी होती है. घर में ऐसा कुहराम मचेगा कि मुझे सांस तक लेना मुश्किल हो जाएगा,’’ खीज पड़ी थी नेहा, ‘‘कल मेरी सास की मरजी थी, अब पति की है. कल बहू की होगी, मेरी मरजी शायद अगले जन्म में होगी.’’

‘‘अगला जन्म किस ने देखा है, पगली. कल क्या होगा कौन जानता है. आज देखो. ब्रजेश को मैं और विजय समझा लेंगे. आज भी शायद विजय ने समझाया होगा.’’

‘‘तो क्या इसीलिए आज बारबार मुझ से कह रहे थे कि मेरा जो जी चाहे मैं करूं, वे मना नहीं करेंगे. कुछ अजीबअजीब सी बातें कर तो रहे थे.’’

‘‘तुम्हारी मरजी की बात अजीबअजीब सी लगी तुम्हें?’’

‘‘जो कभी नहीं हुआ वह एक दिन होने लगे तो अजीब ही लगेगा न.’’

नेहा की बातों में शुभा दिलचस्पी ले रही थी.

Crime: ठगी के रंग हजार!

जैसे-जैसे समाज, देश विकसित होता जा रहा है, वैसे वैसे लोगों में पैसों को लेकर लालच बढ़ती चली जा रही है. ऐसे में रुपए कमाने के लिए मेहनत से दूर रहने वाले, आलसी किस्म के लोग सबसे आसान रास्ता लोगों को ठगने, मुर्ख बनाने का समझते हैं. आज इस रिपोर्ट में हम आपको ठगी के कुछ ऐसे अनोखे प्रकरण बताने जा रहे हैं जो छत्तीसगढ़ में घटित हुए हैं और यह सब बताते हैं कि हमें सतर्क किस तरह रहना होगा.

छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में अगरबत्ती में इस्तेमाल की जाने वाले कपूर के नाम पर लाखों रुपए की ठगी की घटना सामने आई है.यही नहीं किसानों को उन्नत बीज उपकरण देने के नाम पर ठग लिया गया. अंततः ठग किस तरह पकड़े गए पढ़िए आगे-

कपूर सप्लाई करने का झांसा देकर 1 लाख 86 हजार रु की धोखाधड़ी करने वाले तीन आरोपियों को बिलासपुर के कोतवाली पुलिस ने दिल्ली से गिरफ्तार कल की लाया . इन आरोपियों ने खुद को डिवाइन टेम्पर प्राइवेट लिमिटेड इंदौर का प्रतिनिधि बताया और घटना को अंजाम दिया था.

पीड़ित परेश सचदेव दयालबंद में रमेश केमिकल इंडस्ट्री के नाम से दुकान संचालन कर अगरबत्ती बनाने का काम करता है. जिसमें कच्चे माल के रूप में कपूर का इस्तेमाल होता है. उसके पास जुलाई महीने में एक नंबर से फोन आया और खुद को डिवाइन टेम्पर प्राइवेट लिमिटेड, इंदौर मध्य प्रदेश का प्रतिनिधि होना बताया . बातचीत के बाद दोनों के बीच कपूर लेन देन का रेट तय हुआ.

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जिसके बाद पीड़ित ने उसके खाते में 1 लाख 86 हजार रुए नेफ्ट के माध्यम से ट्रांसफर कर दिया, लेकिन पैसे ट्रांसफर करने के बाद भी उसने कपूर सप्लाई नहीं किया. जब 4 माह बीत गया और कपूर नहीं मिला तब प्रार्थी ने पुलिस थाने में दस्तक दी.

शिकायत के बाद पुलिस ने टीम गठित कर मामले की जांच की और साइबर सेल की मदद से टीम को दिल्ली रवाना किया . पुलिस ने दबिश देकर गुलशन सिंह ( 24 वर्ष ), मो जस्सीम ( 19 वर्ष ) और समीर प्रताप ठाकुर ( 36 वर्ष ) को गिरफ्तार किया. सभी आरोपी दिल्ली के रहने वाले है . इनके पास से नगद 1 लाख 50 हजार , 4 मोबाइल फोन , चेक बुक और एटीएम कार्ड बरामद किया गया है.

सीधे सरल किसानों को बनाते हैं ऐसे उल्लू!

छत्तीसगढ़ के न्यायधानी बिलासपुर में किसान इंडिया बायोटेक कंपनी के नाम से किसानों से करोड़ों की ठगी करने वाले गिरोह का पुलिस ने पर्दाफाश किया है. पुलिस ने गिरोह के तीन लोगों को गिरफ्तार कर बैंक पासबुक, एटीएम कार्ड, मोबाइल, रसायनिक खाद, 2.5 लाख रुपए सहित कागजात बरामद किया है. पुलिस बताती है कि इस ठग गिरोह ने छत्तीसगढ़ सहित मध्य प्रदेश, पंजाब, ओडिशा और बिहार में सैकड़ों लोगों को अपना शिकार बनाया है.

पुलिस अधिकारी के मुताबिक- कुछ लोगों ने गांधी नगर निवासी प्रतिमा मिश्रा को ऑर्गेनिक खाद की डीलरशिप देने का झांसा देकर किश्तों में 2 और 3 लाख रुपए वसूल लिया. बहुत दिनों तक खाद की सप्लाई नहीं होने पर प्रतिमा ने संपर्क साधा तो मोबाइल बंद थे. वह तोरवा स्थित ऑफिस भी पहुची तो वहां ताला लगा था. ऐसी परिस्थितियों में उसे ठगी का अहसास हुआ और सिविल लाइन थाने में फरियाद की. जिसके बाद पुलिस ने ‘ऑपरेशन किसान’ का शुभारंभ किया. जांच पड़ताल में जानकारी मिली . किसान इंडिया बायोटेक के नाम पर बंधन बैंक बिलासपुर में खोले गए खाते से जानकारी एकत्र की गई.

इससे पता चला कि दिसंबर 2019 से जनवरी 2020 तक खाते से करीब 1,76,41,744 रुपए का अदान-प्रदान किया गया. एक खाता सागर में भी कोटक महिंद्रा बैंक की शाखा में खोल 40 लाख रुपए से ज्यादा की रकम निकाली गई. यह खाते एक आधार नंबर पर अलग-अलग नाम से खोले गए थे. यह जानकारी भी पुलिस को मिली की आरोपी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, बलरामपुर, लखनऊ आदि शहरों के रहवासी हैं. इस बीच‌ जिला राजनांदगांव में ग्लोबल एग्री बायोटेक के नाम से कुछ लोगों के प्रचार-प्रसार करने की सूचना मिली.इस पर पुलिस ने दबिश देकर देवरिया, उत्तर प्रदेश निवासी शक्ति सिंह उर्फ सतीश सिंह, बलरामपुर, उत्तर प्रदेश निवासी प्रदीप शर्मा उर्फ सौरभ सिंह और गोरखपुर निवासी कृष्ण मोहन पांडेय को धर दबोचा.

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महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि किसानों को “उन्नत फलदार वृक्ष के बीज” के नाम पर बनाते ठगा करते थे. आरोपियों ने पुलिस हिरासत में आने के बाद अपने इकबालिया बयान में बताया कि राजनांदगांव में ग्लोबल एग्री टेक्नोलॉजी के नाम से कार्यालय खोला था. राजनांदगांव, डोंगरगढ़, दुर्ग और कांकेर के लोगों को टार्गेट कर ठगी के फिराक में थे. हर बार अपना नाम बदल कर विभिन्न राज्यों के किसानों को उन्नत फलदार वृक्ष के बीज की डीलरशिप के लिए किसान इंडिया बायोटेक से जुड़ने का झांसा देते ठगते और गायब हो जाते .

Serial Story: अस्मत का सौदा- भाग 1

लेखक- नीरज कुमार मिश्रा

हवेलीनुमा घर के एक हाल में बने एक शानदार औफिस में एक युवक, जिस की उम्र बामुश्किल 30 से 35 साल होगी, एक ऊंची पुश्त वाली कुरसी पर बैठा हुआ कुछ फाइलों के पन्ने पलट रहा था.

‘‘देखिए, आप लोगों के कागज तो पूरे हैं, पर इस में ‘सपोर्टिंग डौक्यूमैंट्स‘ की कमी है,‘‘ उस युवक ने अपनी आंखों के सवाल को सामने बैठी 2 महिला में से एक की आंखों की तरफ उछाला.

‘‘पर, हम ने तो सारे कागज लगा दिए हैं सर,‘‘ एक महिला उत्तेजित स्वर में बोल उठी.

उस की ये बात सुन कर उस युवक के चेहरे पर एकसाथ कई रंग आए और गए.

‘‘अरे, तू चुप रह… सर, यह अभी नईनई आई है न, इसे पता नहीं है आप का तरीका. मैं आप के ‘सपोर्टिंग डौक्यूमैंट्स‘ पूरे कर दूंगी. बस, आप इतना बता दीजिए कि ये बाकी के कागजात कहां पहुंचाने हैं,‘‘ एक महिला ने कहा.

‘‘वहीं, जहां आप हर बार पहुंचाती आई हैं… पर, इस बार मेरी एक छोटी सी शर्त है,‘‘ युवक ने कहा.

‘‘जी… कैसी शर्त?‘‘

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‘‘यही शर्त कि बाकी के कागजात जब आप देने आएं तो इन्हें भी साथ ले कर आएं,‘‘ युवक ने दूसरी महिला के बदन को घूरते हुए कहा.

‘‘जी, बिलकुल. आप के कागज भी पहुंच जाएंगे…. और ये भी,‘‘ महिला इतना कह कर मुसकराते हुए औफिस से बाहर चली गई और वह युवक अपनी ऊंची पुश्त वाली कुरसी में आराम से धंस गया और सिगरेट सुलगा कर गोला छल्ले उड़ाने लगा.

उस युवक का नाम रणबीर सिंह था, जो कि शहर के एक बड़े नेता का सारा कामकाज देखता था.

नेताजी के आगामी एक महीने का कार्यक्रम रणबीर सिंह के अनुसार ही तय किया जाता. कब, कहां किस की प्रतिमा का अनावरण, किस अस्पताल का उद्घाटन, अनाथालयों और विधवा आश्रमों में दिया जाने वाला दान भी रणबीर सिंह ही तय करता था.

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नेताजी के कार्यक्रमों में उन की किस एंगल की तसवीर प्रैस में जाएगी और कौन सी तसवीर सोशल मीडिया पर अपलोड की जाएगी, इन सब बातों को रणबीर सिंह की पारखी नजरों के एक्सरे से ही गुजरना होता था.

रणबीर सिंह भौतिकवादी व्यक्ति था. एक बहुत अच्छी जीवनशैली जीने का आदी हो चुका था रणबीर. निजी मकान, 2-3 गाड़ियां और कई बैंकों में कई खाते भी थे. ऐशोआराम और दौलत रणबीर सिंह ने नेताजी के नाम पर ही बनाई थी.

बहुत से लोग कई प्रकार के काम करवाने के लिए नेताजी के पास आते थे, तो उन सब लोगों से काम करवाने के बदले और सहयोग राशि के नाम पर रकम ऐंठना ही रणबीर सिंह का काम था. मसलन, कोई अपने बेटे की नौकरी लगवाने के लिए नेताजी के पास आता, तो कोई अपना ट्रांसफर अपने मनमुताबिक जगह पर करवाने को आता, तो कोई सिर्फ यही फरियाद ले कर आता कि नेताजी से कह दो कि मेरे नाम का फोन ही कर दें, तो मेरा काम हो जाएगा. और भी बहुत प्रकार के काम आते थे, जिस के एवज में पैसे ऐंठ कर नेताजी से काम करवा देता था रणबीर सिंह. इन सब कामों में रणबीर सिंह का कोई सानी नहीं था.

एक दिन ‘मजनूं का टीला‘ के एक शरणार्थी कैंप में नेताजी को जा कर शरणार्थियों को आर्थिक सहायता प्रदान करने का कार्यक्रम था. नेताजी पंक्ति में खड़े हुए असहाय शरणार्थियों को आर्थिक सहायता दे रहे थे और रणबीर सिंह उन के फोटो उतारने में लगा हुआ था.

‘‘सर, अभी कुछ ठीक नहीं आया… हां, अब जरा इधर देखिए… हां सर, अब मुसकराइए… सर, जरा इस बच्चे के सिर पर हाथ रखने वाला फोटो हो जाए… ऐसी तसवीरें सीधे दिल में उतर जाती हैं,‘‘ कहते हुए रणबीर सिंह पूरी तन्मयता से अपना काम कर रहा था.

तभी सहसा रणबीर सिंह की नजर एक सहमी हुई सी जवान लड़की पर पड़ी, जिस के चेहरे पर मैल लगा होने के बाद भी उस की सुंदरता रूप के पारखी रणबीर सिंह से न छुप सकी. उस लड़की की उम्र महज 20-22 साल ही रही होगी.

‘‘कसम से… अगर इस लड़की पर 20 रुपए की साबुन की टिकिया पूरी तरह खर्च कर दी जाए और इस के जिस्म को मलमल कर धो दिया जाए, तो कोहिनूर हीरा भी फेल हो जाए,‘‘ मन ही मन रणबीर सिंह बुदबुदा उठा था.

रणबीर सिंह ने आगे बढ़ कर उस लड़की को करीब से देखा और उस के सीने पर एक नजर डालते हुए बोला, ‘‘नाम क्या है तेरा?‘‘

‘‘सर, ये नाम नहीं बता पाएगी, क्योंकि गूंगी है,‘‘ उस लड़की के पास खड़ी दूसरी लड़की ने बताया.

‘‘ओह… गूंगी है बेचारी,‘‘ कुटिल भाव रणबीर के मन में आनेजाने लगे और वह सोचने लगा, माना कि उस के और नेताजी के बिस्तर पर सोने वाली लड़कियों की अभी तक कोई कमी नहीं है, पर फिर भी कभीकभी स्वाद बदलने के लिए एक गरीब शरणार्थी लड़की बुरी नहीं रहेगी. और फिर नेताजी के घर का काम भी करेगी और गाहेबगाहे मन बहलाने के काम भी आया करेगी. एक तरीके से गाड़ी की स्टैपनी के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता था रणबीर.

ऐसा सोच कर रणबीर ने आननफानन में नेताजी को इशारा किया, जिसे केवल नेताजी ही समझ पाए थे और बदले में उन से मिले हुए इशारे के अनुसार रणबीर ने अपना काम शुरू कर दिया था.

Serial Story: निर्वासित राजकुमार का प्यार- भाग 3

रायसिंह अपनी पत्नी और 2 बेटों के साथ जैसलमेर रियासत छोड़ कर चले गए थे. इन्हीं रायसिंह की राजकुमारी थी नागरकुंवर बाईसा. नागरकुंवर को महारावल मूलराज ने रायसिंह के साथ नहीं जाने दिया था. इस कारण नागरकुंवर बाईसा रनिवास जैसलमेर में ही रहती थी.

रनिवास में कुंवर भीमसिंह की नजर नागरकुंवर पर पड़ी. गोरी गट्ट मोतियों के पानी जैसी. गाल जैसे मक्खन की डलियां, होंठ ऐसे जैसे मलाई में लाल रंग मिला कर मक्खन पर 2 फांके बना दी हों. आंखें ऐसी जैसे मखमल के बटुए में हीरे रखे हुए हों. भीमसिंह तो उस का रूप देख कर जड़ हो गया.

वापस मूलसागर आने पर एक ही चेहरा बेचैन किए जा रहा था. आंखें बंद करे तो नागरकुंवर, खोले तो नागरकुंवर. किसी से बात करे तो नागरकुंवर. वह परेशान हो गए. बहुत टालने की कोशिश की मगर मन पर काबू नहीं रहा. तब भीमसिंह अकसर रनिवास में जा कर नागरकुंवर से मिलने लगे.

नागरकुंवर 15-16 बरस की थी. ये वही दिन होते हैं, जब कोई दिल को अच्छा लगने लगता है. नागरकुंवर को भीमसिंह अच्छे लगे थे. यही हाल भीमसिंह का भी था. उन्हें नागरकुंवर के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं लगता था.

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भीमसिंह का आनाजाना रनिवास में बढ़ा और नागरकुंवर से मिलनाजुलना भी. तब महारावल सा को उन के दीवान ने एक रोज कहा, ‘‘दाता, बड़ेबुजुर्गों के लिए बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. पर हुकुम, समय आने पर वे भी बड़े होने लगते हैं. हम को उन की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए. बाईसा 15-16 के पेटे में पहुंच गई हैं. वह शादी के लायक हो गई हैं. अब महाराज कुंवर रायसिंह तो यहां हैं नहीं. बाईसा की जिम्मेदारी अपने ऊपर है. दाता, आप फरमाएं तो शादी की बात चलाई जाए.’’

‘‘बाईसा इतनी बड़ी हो गईं क्या?’’

‘‘हां हुकुम, समय तो अपनी गति से चलता है.’’ दीवान बोला.

‘‘ठीक है, कोई ध्यान में है क्या?’’ महारावल मूलराज सफेद दाढ़ी को टटोलते हुए बोले.

‘‘एक है, आप माफी बख्शें तो अर्ज करूं.’’ दीवान ने कहा.

‘‘कौन है?’’ महारावल ने पूछा तो दीवान बोला, ‘‘राठौड़ अपने पुराने रिश्तेदार हैं. जोधपुर के कुंवर भीमसिंहजी यहां पधारे हुए हैं. शादी के हकदार भी हैं. कल को उन्हें राज मिलेगा. ऐसा मौका कब मिलेगा हुकुम. अभी अहसानों से दबे हैं. लगे हाथ बाईसा का ब्याह महाराज कुंवर भीमसिंह जी से कर लें तो सोने पर सुहागा हो जाए. घरघराना सब ठीक है.’’

आवाज को दबाते हुए दीवान आगे बोले, ‘‘हुकुम, जोधपुर से रोजरोज के झगड़ेटंटे होते हैं, वे भी खत्म हो जाएंगे. भीमसिंह जी के गद्दी बिराजने के बाद सरहद पर रोजरोज की किटकिट भी नहीं होगी.’’

‘‘पर भीमसिंह जी यह न समझें कि हम शरण दे कर अहसानों की कीमत ले रहे हैं.’’ महारावल ने कहा.

‘‘नहीं दाता, अहसान तो हम कर रहे हैं, शरण भी दी और बेटी भी.’’

‘‘महाराज कुंवरसा तो निर्वासित हैं. बारात कहां से आएगी. यों कैसे हो पाएगा ब्याह.’’

महारावल चिंता में पड़ गए. उन के बूढ़े चेहरे पर उदासी छा गई. ललाट पर पड़ी सलवटें और अधिक गहरा गईं. आखिर महारावल की सहमति मिल गई.

तब मूलसागर जा कर कुंवर भीमसिंह जी से बात की गई. सुन कर कुंवर भीमसिंह को अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था. उन का दिल बल्लियों उछलने लगा. मगर प्रत्यक्षत: गंभीर बने हुए बोले, ‘‘महारावलसा को पता है कि मैं एक निर्वासित राजकुमार हूं. निर्वासित का क्या भरोसा. उम्र भटकते हुए कट सकती है.’’

‘‘हम संबंधों को देखते हैं, सत्ता को नहीं. सत्ता तो आज है कल नहीं भी होगी. पर संबंध तो शाश्वत रहेंगे. राठौड़ वंश तो पीढि़यों से हमारे समधी रहे हैं. आप यहां पधारे हुए हैं. उस से अच्छा सुयोग और क्या होगा. आप नागरकुंवर बाईसा का पाणिग्रहण करें तो यह जैसलमेर पर आप का अहसान होगा. दाता की इच्छा है कि आप स्वीकृति दें तो विवाह की तिथि तय कर ली जाए.’’

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सारी बात खोल कर सामने रखी तो कुंवर जानबूझ कर पशोपेश में पड़े दिखाई देने लगे.

‘‘मैं आप लोगों का आभारी हूं कि आप ने मुझे इस योग्य समझा. पर आप तो जानते ही हैं कि बारात जोधपुर से नहीं आ पाएगी. इस से आप लोगों की गरिमा को ठेस पहुंच सकती है.’’

‘‘इतिहास गवाह है कुंवरसा, राजेमहाराजे कभी मुहूर्तों और बारातों के मोहताज नहीं होते. आप आदेश करें, सारे इंतजाम हो जाएंगे.’’

इस बार जवाब ठाकुर सवाईसिंह ने दिया, ‘‘जरूर हुकुम. महाराज कुंवरसा का विवाह बडे़ धूमधाम से होगा. आप तैयारियां कीजिए.’’

तुरंत शगुन में हीरे की अंगूठी, गुड़ और नारियल दिया, ‘‘आप ने शगुन कबूल किया हुकुम, सारा जैसलमेर आप का ऋणी हो गया है. महाराज कुंवरसा के यहां न होने से हमारी चिंताएं बढ़ गई थीं. आज हम धन्य हो गए हुकुम.’’

बात पक्की कर दी गई. शादी की तैयारियां बड़ी धूमधाम से की गईं. मूलसागर से बारात जैसलमेर आई. उस का भव्य स्वागत किया गया. सारा शहर दूल्हे की एक झलक देखने के लिए उमड़ पड़ा. रायसिंह अपनी बेटी का कन्यादान करने नहीं पहुंचे. न ही युवरानी या राजकुमारों को ही भेजा. महारावल ने स्वयं कन्यादान किया. शादी धूमधाम से संपन्न हुई.

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कुंवर भीमसिंह व राजकुमारी नागरकुंवर की मुलाकातों के चर्चे शहर में न हों और राजमहल की बदनामी न होने लगे, इसलिए उन दोनों का विवाह कर दिया गया. अब दोनों जीवनसाथी बन गए थे और उन्होंने अपना नवजीवन शुरू कर दिया था.

चंद दिन ही बीते थे कि महाराजा विजय सिंह का 46 साल की उम्र में स्वर्गवास हो गया. गुलाबराय की हत्या के बाद महाराजा विजय सिंह को कुछ भी अच्छा नहीं लगता था और थोड़े समय बाद वह भी चल बसे थे. तब कुंवर भीमसिंह अपनी रानी नागरकुंवर के साथ जोधपुर आ गए. भीमसिंह जोधपुर की राजगद्दी पर बैठ गए और नागरकुंवर महारानी बन गईं.

Satyakatha: अधेड़ औरत के रंगीन सपने- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

तीनों भाई संतराम के मकान के पास ही किराए का कमरा ले कर एक साथ रहते थे. मनोज जहां राजमिस्त्री का काम करता था तो उस के दोनों भाई दिहाड़ी मजदूरी का काम करते थे.

पड़ोस में रहने वाला संतराम चूंकि ठेकेदारी का काम करता था, इसलिए वह अकसर दिहाड़ी मजदूर या दूसरे राजमिस्त्री  की जरूरत पड़ने पर तीनों भाइयों को बुला लेता था. संतराम को पीनेखाने का शौक था.

तीनों भाई भी शराब पीने के आदी थे. इसलिए कुछ समय बाद संतराम के साथ उन की खानेपीने की बैठकें भी होने लगीं. कई बार मनोज संतराम के घर पर ही बैठा था. इसलिए जल्द ही संतराम की पत्नी सुशीला से भी उस की बोलचाल हो गई.

सुशीला की 20 साल पहले जो चंचल स्वभाव की आदत थी, आज भी वह बरकरार थी. सुशीला की नजर मनोज पर पड़ी तो उसे संतराम भी उस के सामने फीका लगने लगा.

मनोज ने पहली ही नजर में सुशीला की आखों से उस के मन की बात भांप ली. एक कुंआरे नौजवान को अगर कोई स्त्री आमंत्रण दे तो भला वह कैसे ठुकरा सकता है. सुशीला के जीवन में एक बार फिर वही कहानी दोहराई जाने लगी, जो उस ने 18 साल पहले दोहराई थी.

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जल्द ही मनोज से सुशीला के जिस्मानी संबंध बन गए. सुशीला की उम्र भले ही 55 साल हो चुकी थी, लेकिन उस के हसरतें आज भी उतनी ही जवान थीं जितनी जवानी की दहलीज पर कदम रखने वाली एक लड़की के होती हैं.

इधर, पिछले कुछ सालों में संतराम के अंदर एक बुरी प्रवृत्ति ने जन्म ले लिया था. वह शराब पीने के बाद अकसर सुशीला के साथ किसी न किसी बात पर मारपीट कर देता था. इस कारण सुशीला और संतराम के संबंधों में एक दरार भी पैदा हो गई थी.

जब 6 महीने पहले मनोज सुशीला की जिदंगी में आया तो उसे जिंदगी में रोशनी की एक नई किरण दिखाई देने लगी. लेकिन इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते.

कुछ दिन पहले संतराम को इस बात का शक हो गया कि सुशीला फिर से अपने पुराने ढर्रे पर चलने लगी है. उसे मनोज के साथ उस के संबध होने का शक हो गया था. वैसे भी सुशीला को संतराम से कोई बच्चा तो था नहीं, इसलिए उसे वैसे भी उस से बहुत लगाव नहीं था.

जब संतराम ने उस के साथ कई बार मारपीट की तो सुशीला ने एक दिन मनोज से कहा कि अगर वह उसे संतराम से छुटकारा दिला दे तो वह पूरी तरह उस की हो कर रहेगी. इतना ही नहीं, उस के घर में जो कुछ भी है और बैंक में जो पैसा या जेवर है, सब उस के हो जाएंगे.

मनोज भी उस के चक्कर में अविवेकी बन गया था. लिहाजा उस ने सुशीला से वादा कर लिया कि वह उसे संतराम से मुक्ति दिलाएगा.

मनोज ने अपनी माशूका से वादा तो कर लिया लेकिन इस काम को अकेले अंजाम देना उस के बस की बात नहीं थी. इसीलिए उस ने सगे भाई आकाश व मौसेरे भाई राजेश को संतराम की हत्या करने में मदद करने के लिए तैयार कर लिया.

आकाश व राजेश कम उम्र के जवान लड़के थे, वे बस इसी से खुश हो गए कि चलो मनोज घर बसा लेगा तो उन्हें पकापकाया खाना मिलना शुरू हो जाएगा. लिहाजा उन्होंने मनोज का साथ देने की हामी भर दी. जब तीनों ने इरादा बना लिया तो सुशीला के साथ मिल कर उन्होंने संतराम की हत्या को अंजाम देने के लिए योजना बनाई.

6 और 7 मई की रात को उन्होंने संतराम की हत्या के लिए चुना. योजना के मुताबिक रात करीब साढ़े 12 बजे मनोज ने जब दरवाजा खटखटाया तो पहले से उन के इंतजार में जाग रही सुशीला ने दरवाजा खोल दिया और वे कमरे के भीतर घुस आए.

संतराम शराब के नशे में बिस्तर पर पड़ा खर्राटे ले रहा था. इस के बाद उन्होंने कमरे में रखी एक ईंट से संतराम के चेहरे व सिर पर इतने वार किए कि बिस्तर पर ही उस की छटपटाते हुए मौत हो गई. घर में लूटपाट की वारदात को दर्शाया जा सके, इसलिए सब ने मिल कर घर का सामान भी इधरउधर बिखेर दिया.

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हालांकि मनोज वारदात के बाद संतराम की मोटरसाइकिल ले जाना चाहता था, लेकिन उस की चाबी उसे नहीं मिली. बाद में जब मनोज अपने भाइयों के साथ वहां से चला गया तो सुशीला ने अपने कपड़े अस्तव्यस्त कर थोड़े फाड़ लिए और घर से बाहर निकल कर शोर मचा दिया कि बदमाशों ने उस के पति की हत्या कर दी है.

मनोज से जब हत्याकांड की सारी जानकारी मिल गई तो पुलिस ने उसी दिन सुशीला को भी गिरफ्तार कर लिया. थोड़ी नानुकुर के बाद उस ने भी अपना अपराध कबूल कर लिया. जांच अधिकारी सुजीत उपाध्याय ने हत्या के मामले में आईपीसी की धारा 120बी व 34 जोड़ कर उन चारों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

—कहानी पुलिस की जांच व आरोपियों से पूछताछ पर आधारित है

पुनर्मरण- भाग 3: शुचि खुद को क्यों अपराधी समझती थी?

मैं अपने पांवों को घसीटते हुए उधर गई जहां बैठ कर विभु भोजन कर रहे थे. देखा, वहां चावल, रोटी के बीच खून की धारें बह रही थीं. शरीर के चिथड़े बिखरे पड़े थे. इस विस्फोट ने माता के कई भक्तों की जानें ले ली थीं. मुझे विभु कहीं नजर नहीं आए. मैं जिसे देखती उसी से पूछती, ‘क्या आप ने विभु को देखा है?’ पर मेरे विभु को वहां जानता ही कौन था. कौन बताता भला.

घायलों की तरफ मैं गई तो विभु वहां भी नहीं थे. तभी मेरा कलेजा मुंह को आ गया. पांव बुरी तरह कांपने लगे. थोड़ी दूर पर विभु का क्षतविक्षत शव पड़ा हुआ था. मैं बदहवास सी उन के ऊपर गिर पड़ी. मैं चीख रही थी, ‘कोई इन्हें बचा लो…यह जिंदा हैं, मरे नहीं हैं.’

मेरी चीख से एक पुलिस वाला वहां आया. विभु का निरीक्षण किया और सिर हिला कर चला गया. मैं चीखतीचिल्लाती रही, ‘नहीं, यह नहीं हो सकता, मेरा विभु मर नहीं सकता.’ सहानुभूति से भरी कई निगाहें मेरी तरफ उठीं पर मेरी सहायता को कोई नहीं आया.

इस आतंकवादी हमले के बाद जो भगदड़ मची उस में मेरा पर्स, मोबाइल सभी जाने कहां खो गए. मैं खाली हाथ खड़ी थी. किसे अपनी सहायता के लिए बुलाऊं. विभु को ले कर कोलकाता तक का सफर कैसे करूंगी?

मैं ने हिम्मत की. विभु को एक तरफ लिटा कर मैं गाड़ी की व्यवस्था में लग गई. पर मुझे विभु को ले जाने से मना कर दिया गया. पुलिस का कहना था कि लाशें एकसाथ पोस्टमार्टम के लिए जाएंगी. मैं विभु को यों नहीं जाने देना चाहती थी पर पुलिस व्यवस्था के आगे मजबूर थी.

मेरा मन क्षोभ से भर गया, धर्म के नाम पर यह आतंकवादी हमले जाने कब रुकेंगे. क्यों करते हैं लोग ऐसा? मैं सोचने लगी, मेरे पति की तरह कितने ही लोग 24 घंटे के भीतर मर गए हैं. क्या गुजर रही होगी उन परिवारों पर. मैं खुद अनजान जगह पर विवश और परेशान खड़ी थी.

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विभु का शव मिलने में पूरा दिन लग गया. मेरे पास पैसा भी नहीं था. एक आदमी मोबाइल लिए घूम रहा था, मैं ने उस से विनती कर के अपने घर फोन मिलाया. घंटी बजती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया. मांजी शायद मंदिर गई होंगी. फिर मैं ने बड़े बेटे का नंबर लगाया तो वह सुन कर फोन पर ही रोने लगा, ‘मां, हम जल्दी ही पहुंचने की कोशिश करेंगे पर फिर भी आने में 3 दिन तो लग ही जाएंगे. आप कोलकाता पहुंचिए. हम वहीं पहुंचेंगे.’

विभु का मृत शरीर मेरे पास था. कोई भी गाड़ी वाला लाश को कोलकाता ले जाने को तैयार नहीं हुआ. मैं परेशान, क्या करूं. उधर दूसरे दिन ही विभु का शरीर ऐंठने लगा था. कुछ लोगों ने सलाह दी कि इन का अंतिम संस्कार यहीं कर दीजिए. आप अकेली इन्हें ले कर इतनी दूर कैसे जाएंगी?

विभु जीवन भर पूजापाठ करते रहे. क्या इसी मौत के लिए विभु भगवान को पूजते रहे?

विभु के बेजान शरीर की और छीछालेदर मुझ से सही नहीं गई. मैं ने सोचा, यहीं गंगा के किनारे उन का अंतिम संस्कार कर दूं. कुछ लोगों की सहायता से मैं ने यही किया. विभु का पार्थिव शरीर अनंत में विलीन हो गया. मेरे आंसू सूख चुके थे. मेरे आंसुओं को पोंछने वाला हाथ और सहारा देने वाला संबल दोनों ही छूट गए थे.

मेरी तंद्रा किसी के स्पर्श से टूटी. जाने कितनी देर से मैं बिस्तर पर इसी हाल में पड़ी रह गई थी. दोनों बहुएं मेरे अगलबगल बैठी थीं और छोटी बहू का हाथ मेरे केशों को सहला रहा था.

‘‘उठिए, मां.’’

मैं ने धीमे से अपनी आंखें खोलीं. दोनों बहुएं आंखों में प्यार, सहानुभूति लिए मुझे देख रही थीं. छोटी बहू की आंखों में प्रेम के साथ कौतूहल भी था. वह बेचारी क्या समझ पाती कि यहां क्या कहानी गढ़ी जा रही है. वह बस टुकुरटुकुर मुझे निहारती रहती.

‘‘नीचे चलिए, मां, पंडितजी आ गए हैं और कुछ पूजाहवन करवा रहे हैं,’’ बड़ी बहू रेवती बोली.

‘‘शायद मेरी उपस्थिति मांजी को अच्छी न लगे. तुम लोग जाओ. मैं यहीं ठीक हूं.’’

‘‘पिताजी के किसी भी संस्कार में शामिल होने का आप को पूरा अधिकार है, मां. आप चलिए,’’ बड़ी बहू ने मुझ से कहा.

भारी कदमों से मैं नीचे उतरी तो वहां का दृश्य देख कर मन भारी हो गया. मांजी त्रिशंक से कह रही थीं, ‘‘बेटा, पंडितजी आ गए हैं. यह जैसा कहें वैसा कर, यह ऐसी पूजा करवा देंगे जिस से विभु का अंतिम संस्कार तेरे हाथों से हुआ माना जाएगा.’’

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अपने को बिना किसी अपराध के अपराधिनी समझ बैठी हूं मैं. एक मरे इनसान की अनदेखी आत्मा की शांति के लिए जो अनुष्ठान किया जा रहा था वह मेरी सोच के बाहर का था. इस क्रिया से क्या विभु की आत्मा प्रसन्न हो जाएगी? यदि मांजी यह सब करतीं तो शायद मुझे इतना दुख न लगता जितना अपने बड़े बेटे को इस पूजा में शामिल होते देख कर मुझे हो रहा था.

पंडितजी जोरजोर से कोई मंत्र पढ़ रहे थे. त्रिशंक सिर पर रूमाल रखे हाथ जोड़ कर बैठा था. एक ऊंचे आसन पर विभु का शाल रख दिया गया था. मांजी रोते हुए यह सब करवा रही थीं. काश, आज विभु यह सब देख पाते कि उन के संस्कारों ने किस तरह उन के बेटे में प्रवेश कर लिया है. गलत परंपरा की नींव त्रिशंक और मांजी मिल कर डाल रहे हैं. मैं भीगी आंखों से अपने पति को एक बार फिर मरते हुए देख रही थी.

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