फेसबुक फ्रैंडशिप : भाग 1

शुरुआत तो बस यहीं से हुई कि पहले उस ने फेस देखा और फिदा हो कर फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी. रिक्वैस्ट 2-3 दिनों में ऐक्सैप्ट हो गई. 2-3 दिन भी इसलिए लगे होंगे कि उस सुंदर फेस वाली लड़की ने पहले पूरी डिटेल पढ़ी होगी. लड़के के फोटो के साथ उस का विवरण देख कर उसे लगा होगा कि ठीकठाक बंदा है या हो सकता है कि तुरंत स्वीकृति में लड़के को ऐसा लग सकता है कि लड़की उस से या तो प्रभावित है या बिलकुल खाली बैठी है जो तुरंत स्वीकृति दे कर उस ने मित्रता स्वीकार कर ली.

यह तो बाद में पता चलता है कि यह भी एक आभासी दुनिया है. यहां भी बहुत झूठफरेब फैला है. कुछ भी वास्तविक नहीं. ऐसा भी नहीं कि सभी गलत हो. ऐसा भी हो सकता है कि जो प्यार या गुस्सा आप सब के सामने नहीं दिखा सकते, वह अपनी पोस्ट, कमैंट्स, शेयर से जाहिर करते हो. अपनी भावनाएं व्यक्त करने का साधन मिला है आप को, तो आप कर रहे हैं अपने को छिपा कर किसी और नाम, किसी और के फोटो या किसी काल्पनिक तसवीर से.

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यदि अपनी बात रखने का प्लेटफौर्म ही चाहिए था तो उस में किसी अप्सरा की तरह सुंदर चेहरा लगाने की क्या जरूरत थी? आप कह सकती हैं कि हमारी मरजी. ठीक है, लेकिन है तो यह फर्जी ही. आप साधारण सा कोई चित्र, प्रतीक या फिर कोई प्राकृतिक तसवीर लगा सकते थे. खैर, यह कहने का हक नहीं है. अपनी मरजी है. लेकिन जिस ने फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी उस ने उस मनोरम छवि को वास्तविक जान कर भेजी न आप को?

आप शायद जानती हो कि मित्र संख्या बढ़ाने का यही साधन है, तो भी ठीक है, लेकिन बात जब आगे बढ़ रही हो तब आप को समझना चाहिए कि आगे बढ़ती बात उस सुंदर चित्र की वजह से है जो आप ने लगाई हुई है अपने फेसबुक अकांउट पर. आप ने अपने विषय में ज्यादा कोई जानकारी नहीं लिखी. आप से पूछा भी मैसेंजर बौक्स पर जा कर. और पूछा तभी, जब बात कुछ आगे बढ़ गई थी. कोई किसी से यों ही तो नहीं पूछ लेगा कि आप सिंगल हो. और आप का उत्तर भी गोलमोल था. यह मेरा निजी मामला है. इस से हमारी फेसबुक फ्रैंडशिप का क्या लेनादेना?

बात लाइक और कमैंट्स तक सीमित नहीं थी. बात मैसेंजर बौक्स से होते हुए आगे बढ़ती जा रही थी. इतनी आगे कि जब लड़के ने मोबाइल नंबर मांगा तो लड़की ने कहा, ‘‘फोन नहीं, मेल से बात करो. फोन गड़बड़ी पैदा कर सकता है. किस का फोन था, कौन है वगैराहवगैरहा.’’

अब मेल पर बात होने लगी. शुरुआत में लड़के  ने फेस देखा. मित्र बन जाने पर लड़के ने विवरण देखा उसे पसंद आया. उसे किसी बात की उम्मीद जगी. भले ही वह उम्मीद एकतरफा थी. उसे नहीं पता था शुरू में कि वह जिस दुनिया से जुड़ रहा है वहां भ्रम ज्यादा है,  झूठ ज्यादा है. पहले लड़की के हर फोटो, हर बात पर लाइक, फिर अच्छेअच्छे कमैंट्स और शेयर के बाद निजी बातें जानने की जिज्ञासा हुई दोनों तरफ से. हां, यह सच है कि पहल लड़के की तरफ से हुई. लड़के ही पहल करते हैं. लड़कियां तो बहुत सोचनेविचारने के बाद हां या नहीं में जवाब देती हैं.

बात आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी लड़के पर ही आती है समाज, संस्कारों के तौर पर. तो शुरुआत लड़के ने ही की. इंटरनैट की दुनिया में आ जाने के बाद भी समाज, संस्कार नहीं छूट रहे हैं यानी 21वीं सदी में प्रवेश किंतु 19वीं सदी के विचारों के साथ. फेसबुक पर सुंदर चेहरे से मित्रता होने  पर लड़के के अंदर उम्मीद जगी. विस्तृत विवरण देख कर उस ने हर पोस्ट पर लाइक और सुंदर कमैंट्स के ढेर लगा दिए. बात इसी तरह धीरेधीरे आगे बढ़ती रही. लड़की के थैंक्स के बाद जब गुडमौर्निंग, गुडइवनिंग और अर्धरात्रि में गुडनाइट होने लगी तो किसी भाव का उठना, किसी उम्मीद का बंधना स्वाभाविक था. लगता है कि दोनों तरफ आग बराबर लगी हुई है. लड़के को तो यही लगा.

लड़के ने विस्तृत विवरण में जाति, धर्म, शिक्षा, योग्यता, आयु सब देख लिया था. पूरा स्टेटस पढ़ लिया था और उस को ही अंतिम सत्य मान लिया था. जो बातें स्टेटस मेें नहीं थीं, उन्हें लड़का पूछ रहा था और लड़की जवाब दे रही थी. जवाब से लड़के को स्पष्ट जानकारी तो नहीं मिल रही थी लेकिन कोई दिक्कत वाली बात भी नजर नहीं आ रही थी. फेसबुक पर ऐसे सैकड़ों, हजारों की संख्या में मित्र होते हैं सब के. आमनेसामने की स्थिति न आए, इसलिए एक शहर के मित्र कम ही होते हैं. होते भी हैं तो लिमिट में बात होती है. सीमित लाइक या कमैंट्स ही होते हैं खास कर लड़केलड़की के मध्य.

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लड़का छोटे शहर का था. विचार और खयालात भी वैसे ही थे. लड़कियों से मित्रता होती ही नहीं है. होती है तो भाई बनने से बच गए तो किसी और रिश्ते में बंध गए. नहीं भी बंधे तो सम्मानआदर के भारीभरकम शब्दों या किसी गंभीर विषय पर विचारविमर्श, लाइक, कमैंट्स तक. ऐसे में और उम्र के 20वें वर्ष में यदि किसी दूसरे शहर की सुंदर लड़की से जब बात इतनी आगे बढ़ जाए तो स्वाभाविक है उम्मीद का बंधना.

फोटो के सुंदर होने के साथसाथ यह भी लगे कि लड़की अच्छे संस्कारों के साथसाथ हिम्मत वाली है. किसी विशेष राजनीतिक दल, जाति, धर्म के पक्ष या विपक्ष में पूरी कट्टरता और क्रोध के साथ अपने विचार रखने में सक्षम है और आप की विचारधारा भी वैसी ही हो. आप जब उस की हर पोस्ट को लाइक कर रहे हैं तो जाहिर है कि आप उस के विचारों से सहमत हैं. लड़की की पोस्ट देख कर आप उस के स्वतंत्र, उन्मुक्त विचारों का समर्थन करते हैं, उस के साहस की प्रशंसा करते हैं और आप को लगने लगता है कि यही वह लड़की है जो आप के जीवन में आनी चाहिए. आप को इसी का इंतजार था.

बात तब और प्रबल हो जाती है जब लड़का जीवन की किसी असफलता से निराश हो कर परिवार के सभी प्रिय, सम्माननीय सदस्यों द्वारा लताड़ा गया हो, अपमानित किया गया हो, अवसाद के क्षणों में लड़के ने स्वयं को अकेला महसूस किया हो और आत्महत्या करने तक का विचार मन में आ गया हो. तब जीवन के एकाकी पलों में लड़के ने कोई उदास, दुखभरी पोस्ट डाली हो. लड़की ने पूछा हो कि क्या बात है और लड़के ने कह दिया हाले दिल का. लड़की ने बंधाया हो ढांढ़स और लड़के को लगा हो कि पूरी दुनिया में बस यही है एक जीने का सहारा.

लड़के ने पहले अपने ही शहर में महिला मित्र बनाने का प्रयास किया था, जिस में उसे सफलता भी मिली थी. लड़की खूबसूरत थी. पढ़ीलिखी थी. स्टेटस में खुले विचार, स्वतंत्र जीवन और अदम्य साहस का परिचय होने के साथ कुछ जबानी बातें भी थीं. लड़के ने इतनी बार उस लड़की का फोटो व स्टेटस देखा कि दोनों उस के दिलोदिमाग में बस गए. फोटो कुछ ज्यादा ही. अपने शहर की वही लड़की जब उसे रास्ते में मिली तो लड़के ने कहा, ‘‘नमस्ते कल्पनाजी.’’

लड़की हड़बड़ा गई, ‘‘आप कौन? मेरा नाम कैसे जानते हैं?’’

लड़के ने खुशी से अपना नाम बताते हुए कहा, ‘‘मैं आप का फेसबुक फ्रैंड.’’

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और लड़की ने गुस्से में कहा, ‘‘फेसबुक फ्रैंड हो तो फेसबुक पर ही बात करो. घर वालों ने देख लिया तो मुश्किल हो जाएगी. उन्हें फेसबुक का पता चलेगा तो वह अकाउंट भी बंद हो जाएगा. चार बातें अलग सुनने को मिलेंगी. वे कहेंगे स्वतंत्रता दी है तो इस का यह मतलब नहीं कि तुम लड़कों से फेसबुक के जरिए मित्रता करो. उन से मिलो…और प्लीज, तुम जाओ यहां से, मैं नहीं जानती तुम्हें. क्या घर से मेरा निकलना बंद कराओगे? घर पर पता चल गया तो घर वाले नजर रखना शुरू कर देंगे.’’ फिर, घर वालों का प्रेम, विश्वास और भी बहुतकुछ कह कर लड़की चली गई.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

 

थाई गर्ल की कातिल सहेली

थाई गर्ल की कातिल सहेली : भाग 3

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

सहेली आईडा को आया लालच

आईडा का टूरिस्ट वीजा 26 सितंबर को खत्म हो रहा था. उसे वीजा की अवधि बढ़वानी थी. इस के लिए उस ने किसी एजेंट से भी बात कर ली थी. वीजा बढ़वाने के लिए उसे पैसों की जरूरत थी.

इस के अलावा थाईलैंड के बानपाको में रहने वाले उस के भाई ने गाड़ी का एक्सीडेंट कर दिया था. उस की गाड़ी पुलिस ने जब्त कर ली. भाई की गाड़ी छुड़वाने के लिए भी आईडा को पैसे चाहिए थे. आईडा ने अपने 2-4 परिचितों से पैसे उधार मांगे, लेकिन उसे कहीं से मदद नहीं मिली.

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उसे पता था कि वनिडा अच्छा पैसा कमाती है. वह ठाठ से रहती और खूब खर्च करती है. थाईलैंड में अपने घर भी पैसा भेजती है. उसे पता था कि वनिडा का वीजा 20 सितंबर को खत्म हो रहा है और वह वापस थाईलैंड जाना चाहती है. इस से आईडा को अनुमान था कि वनिडा के पास अभी काफी पैसा होगा. इसलिए उस ने वनिडा को शराब पिला कर उसे लूटने की योजना बनाई.

आईडा ने वनिडा से 5 सितंबर की रात को पार्टी करने की बात तय कर ली. योजना के तहत आईडा रात करीब साढ़े 9 बजे वनिडा के घर पहुंची. दोनों ने शराब व वोदका पी. नशीले पदार्थ वाले हुक्के के भी कश लगाए.

इस बीच वे मछली वगैरह भी खाती रहीं. आईडा ने जानबूझ कर वनिडा को ज्यादा शराब पिलाई. वनिडा जब बेसुध हो गई, तो आईडा वनिडा का कीमती माल तलाश करने लगी.

इस बीच, उसे खयाल आया कि अगर वनिडा को होश आ गया, तो वह चिल्लाएगी. इस से वह पकड़ी जाएगी. अगर उसे अभी होश नहीं आया, तो सुबह कीमती सामान नहीं मिलने पर वह सीधा उस पर चोरी का आरोप लगाएगी.

इस से बचने के लिए आईडा ने वनिडा का काम तमाम करने का फैसला किया. उस ने कमरे में गद्दे पर बेसुध पड़ी वनिडा का कंबल से गला दबा दिया. इस के बाद उस पर टिश्यू पेपर और नायलोन का कंबल डाल कर लाइटर से आग लगा दी. ज्यादा नशे में होने से बेसुध होने के कारण वनिडा चीखपुकार भी नहीं सकी. वह जिंदा ही जल गई.

वनिडा को जला कर आईडा ने उस के 3 आईफोन और सोने की चेन सहित करीब 2 लाख रुपए का कीमती सामान बटोरा और तड़के अपने कमरे पर आ गई. अपने कमरे में उस ने वनिडा की सोने की चेन चावल के डब्बे में छिपा कर रख दी.

आईडा इतनी शातिर थी कि 6 सितंबर को सुबह जब कमरे में वनिडा का जला हुआ शव मिला, तो पुलिस की काररवाई के दौरान वह थाईलैंड की अन्य महिलाओं के साथ मृतका को श्रद्धांजलि देने के लिए हाथ जोड़े वहां कई घंटे तक खड़ी रही. इस दौरान उस ने किसी को भी शक नहीं होने दिया.

वनिडा की मर्डर मिस्ट्री का रहस्य उस की रूममेट रूंघटीथा म्याऊ से पूछताछ के बाद सुलझा. म्याऊ ने पुलिस को बताया कि वह वनिडा की मृत्यु के बाद भरूच से सूरत आई थी. भरूच से वह काफी सामान लाई थी. वनिडा के कमरे में आग लगने के कारण वहां सामान नहीं रख सकी, तो वह आईडा के कमरे पर सामान रखने गई. आईडा के मकान मालिक ने ज्यादा सामान कमरे में रखने से मना कर दिया.

आईडा ने स्वीकारा अपराध

इस पर म्याऊ ने अपना कुछ गैरजरूरी सामान अपने आटोचालक को दे दिया. इस दौरान आईडा ने भी आटो चालक को एक बैग दे कर कहा कि वह बाद में ले लेगी. आटोचालक ने आईडा का दिया बैग और म्याऊ का दिया सामान ला कर अपने घर पर रख दिया. स्पा में काम करने वाली थाईलैंड की युवतियों ने अपने आटोचालक तय कर रखे हैं. उन्हें जब भी कहीं आनाजाना होता है, तो फोन कर के उन्हें बुला लेती हैं.

म्याऊ ने पुलिस को यह भी बताया कि वनिडा के पास 3 मोबाइल फोन और सोने की चेन थी, जो गायब हैं. रुपएपैसे और अन्य कीमती सामान के बारे में म्याऊ को ज्यादा पता नहीं था.

म्याऊ से पूछताछ के बाद पुलिस ने आटो चालक से पूछताछ की. उस ने म्याऊ और आईडा की ओर से दिए गए सामान के बारे में बता दिया. पुलिस ने उस के घर जा कर सामान चेक किया, तो उस बैग में वनिडा का मोबाइल मिला, जो आईडा ने उसे दिया था.

पहले से ही शक के दायरे में चल रही आईडा पर पुलिस का संदेह पुख्ता हो गया. पुलिस को आईडा से पूछताछ में काफी पापड़ बेलने पड़े. उस ने हिंदी, गुजराती या अंग्रेजी भाषा समझने से इनकार कर दिया. वह केवल थाई भाषा ही बोलती रही.

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उस से पूछताछ के लिए दुभाषिए की मदद लेनी पड़ी. वह बारबार वनिडा की हत्या से साफ इनकार करते हुए पुलिस से सबूत बताने की बात कहती रही.

विदेशी युवती का मामला होने के कारण पुलिस उस से सख्ती भी नहीं कर पा रही थी. पुलिस ने उस के घर की तलाशी ली, तो चावल के डब्बे से वनिडा की सोने की चेन बरामद हो गई. कुछ अन्य सामान भी मिल गया. पुलिस ने उसे रात साढ़े 9 बजे वनिडा के घर आने और तड़के करीब साढ़े 4 बजे मुंह ढक कर जाने के सीसीटीवी फुटेज दिखाए. इस के बाद उस ने वनिडा की हत्या करने की बात कबूल कर ली. आईडा से उस ताले की चाबी भी बरामद हो गई, जो वह वनिडा की हत्या के बाद उस के कमरे के बाहर लगा कर आई थी.

पुलिस ने आईडा को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस को अन्य लोगों से पता चला कि आईडा के खिलाफ मलेशिया और जापान में जुआ का अड्डा चलाने के आपराधिक मामले दर्ज हैं. पुलिस इन मामलों का पता लगाने का प्रयास कर रही है.

बहरहाल, आईडा ने छोटे से लालच में अपनी ही सहेली का खून कर दिया. पैसे कमाने आई आईडा को अब भारत में अपने किए की सजा भुगतनी होगी.

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थाई गर्ल की कातिल सहेली : भाग 2

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

फोरैंसिक विशेषज्ञों ने कहा कि मौके के हालात से लगता है कि इस में कोई और शामिल हो सकता है, जिस ने युवती को जलाया. युवती ने खुद ऐसा नहीं किया होगा. जलाने में संभवत: ज्वलनशील पदार्थ का इस्तेमाल किया गया होगा. शव को जलने में 2 से 3 घंटे का समय भी लगा होगा. वनिडा का शव जिस गद्दे पर मिला, वह रुई का था. आग केवल गद्दे तक ही लगी थी, पूरे कमरे में नहीं फैली थी.

फोरैंसिक एक्सपर्ट ने दी चौंकाने वाली रिपोर्ट

कमरे के बाहर से ताला लगा होना भी संदेह पैदा कर रहा था. कोई भी व्यक्ति बाहर से ताला लगा कर केवल तभी सोता है, जब या तो उस का कोई साथी उसी के सामने बाहर गया हो और उसे वापस आना हो.

अथवा ऐसा तब होता है जब अंदर वाले को किसी से डर या खतरा हो, तब वह किसी से बाहर का ताला लगवा सकता है. लेकिन पुलिस को ऐसा भी कोई आदमी नहीं मिला, जिस से वनिडा ने कमरे का बाहर का ताला लगवाया हो.

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विशेषज्ञों ने माना कि जलते समय युवती होश में नहीं थी. संभवत: वह गहरे नशे में रही होगी. इसीलिए वह जलने पर न तो चीखीचिल्लाई और न किसी ने उस की कोई आवाज सुनी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञ हत्या की आशंका जताते हुए अपने तर्क दे रहे थे, लेकिन हत्या का मामला दर्ज करने से पहले पुलिस सबूत जुटाना चाहती थी. इसलिए पुलिस ने दक्षिण गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (डीजीवीसीएल) के बिजली अधिकारियों से भी मौका निरीक्षण कराया, ताकि पता चल सके कि शार्ट सर्किट तो नहीं हुआ था. जांच पड़ताल के बाद बिजली अधिकारियों ने साफ कर दिया कि कमरे में शार्ट सर्किट नहीं हुआ था.

शव मिलने के तीसरे दिन पुलिस ने 16 लोगों से अलगअलग पूछताछ की. इन में वनिडा की रूममेट, उसे घर और स्पा ले जाने वाले आटो चालक, सहेलियों और सीसीटीवी फुटेज में नजर आए संदिग्ध लोग शामिल थे.

पुलिस ने वनिडा के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स भी निकलवाई. इस बीच, पुलिस ने वनिडा के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने विसरा और अन्य सैंपल जांच के लिए एफएसएल भिजवा दिए.

पुलिस की जांचपड़ताल में पता चला कि करीब 27 साल की वनिडा एक साल पहले टूरिस्ट वीजा पर सूरत आई थी. वह 3-4 महीने से नगीन भाई पटेल के मकान में किराए के कमरे में रहती थी. उस के साथ थाईलैंड की ही निवासी रूंघटीथा म्याऊ नाम की युवती भी रहती थी.

फोरैंसिक विभाग ने प्राथमिक जांच रिपोर्ट पुलिस को दी. इस में मौत का कारण तो नहीं बताया गया, लेकिन यह जरूर कहा गया कि जलाते समय युवती जीवित थी. उस की श्वास नली में कार्बन मिला है. कोई व्यक्ति जिंदा जलता है, तो उस की सांस की नली में कार्बन पाया जाता है. यह हो सकता है कि युवती को बेहोश कर या कोई मादक पदार्थ पिला कर जलाया गया हो.

मामला विदेशी युवती की मौत का था. इसलिए पुलिस सभी एंगल से मामले की जांच कर रही थी. लोगों से पूछताछ में पुलिस को कुछ ऐसी बातें पता चलीं, जिस से पुलिस ने माना कि वनिडा की हत्या हुई होगी. हत्या के एंगल से जांच की गई, तो यह माना गया कि कातिल बहुत शातिर है.

उस ने वनिडा को जलाने के लिए पैट्रोल या केरोसिन के बजाय शराब, नेल पेंट, डिओड्रेंट या किसी अन्य बिना गंध वाले ज्वलनशील पदार्थ का इस्तेमाल किया होगा, क्योंकि पैट्रोल व केरोसिन की गंध दूर तक फैलती है.

11 सितंबर को उमरा थाना पुलिस ने अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ वनिडा की हत्या का मामला दर्ज कर लिया. हत्या का मामला एफएसएल की प्राथमिक रिपोर्ट व डीजीवीसीएल के बिजली अधिकारियों की रिपोर्ट और अन्य सबूतों के आधार पर दर्ज किया गया.

80 से ज्यादा लोगों से की पूछताछ

लगभग 80 से ज्यादा लोगों से की गई पूछताछ और 50 से अधिक सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने के बाद पुलिस ने 2 लोगों पर शक की सुई टिका दी. इन में एक आईडा थी और दूसरा चेतन. थाईलैंड की ही रहने वाली आईडा मृतका वनिडा की अच्छी दोस्त थी.

वह भी वनिडा की ही तरह एक स्पा सैंटर में काम करती थी. वहीं, चेतन वनिडा के मकान के पास ही रहता था. चेतन ने ही वनिडा को 5 सितंबर को आखिरी काल की थी. चेतन सूरत के ही एक स्पा में मैनेजर की नौकरी करता है.

पुलिस ने अपने मुखबिर लगाए और इन दोनों की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू कर दी. निगरानी रखने के बाद पुलिस ने चेतन को शक के दायरे से बाहर कर आईडा पर सारा ध्यान केंद्रित कर दिया.

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पुलिस की ओर से जरूरी सबूत जुटाने के बाद सूरत के पुलिस कमिश्नर अजय तोमर ने 14 सितंबर, 2020 को वनिडा की हत्या का खुलासा कर दिया. पुलिस ने आईडा को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस की जांचपड़ताल और आईडा से की गई पूछताछ में वनिडा की हत्या की जो कहानी उभरकर सामने आई, वह इस प्रकार है –

थाईलैंड की रहने वाली वनिडा और आईडा अच्छी दोस्त थीं. दोनों लगभग हमउम्र थीं. दोनों की ही शादी हो चुकी थी. वनिडा का एक बेटा है. पति और बेटा थाईलैंड में रहते हैं. वनिडा पैसा कमाने के मकसद से टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थी. वह स्पा का काम जानती थी. भारत में स्पा सेंटरों में विदेशी युवतियों की सब से ज्यादा मांग रहती है. परिचित थाई युवतियों के माध्यम से वह सूरत आ गई. सूरत में उसे एक स्पा सेंटर में काम मिल गया. स्पा में वह अच्छा पैसा कमा रही थी. उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी.

आईडा भी थाईलैंड से टूरिस्ट वीजा पर सूरत आई थी. वह भी शादीशुदा थी लेकिन वह करीब एक साल से अपने पति से अलग रहती थी. उस का पति थाईलैंड में रहता है.

एक देश की होने और एक ही काम करने के कारण वनिडा और आईडा में अच्छी दोस्ती हो गई. आईडा भी मगदल्ला गांव में ही किराए के मकान में थी. वनिडा व आईडा के मकान के बीच 10 मिनट का पैदल का रास्ता है.

दोनों सहेलियों को एकदूसरे की सारी बातें पता थीं. वे कभीकभी अपने कमरे पर पार्टी कर लेती थीं. थाईलैंड के खानपान के लिहाज और स्पा मसाज के पेशे से जुड़ी होने के कारण सिगरेट पीना, वोदका, बीयर, और शराब पीने के अलावा हुक्के के कश लगाना तथा झींगा मछली वगैरह खाना इन का शौक था. इन की पार्टी करीब 11-12 बजे शुरू हो कर भोर होने तक चलती थी.

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जानें आगे की कहानी अगले भाग में…

थाई गर्ल की कातिल सहेली : भाग 1

(कहानी सौजन्य-मनोहर कहानियां)

गुजरात का सूरत शहर साडि़यों और हीरों के काम के लिए दुनियाभर में मशहूर है. इसी शहर के मगदल्ला गांव में 6 सितंबर 2020 को सुबह करीब 7 बजे एक मकान में किराए पर रहने वाली थाईलैंड की युवती वनिडा बुर्सोन उर्फ मिम्मी के कमरे से धुआं निकलता हुआ दिखाई दिया.

धुआं देख कर आसपास के लोग वहां एकत्र हो गए. कमरे के बाहर ताला लगा हुआ था. लोगों ने समझा कि कमरा बंद है, तो वनिडा कहीं गई होगी. उस के पीछे से कमरे में  किसी कारण से आग लग गई है. लोग कयास लगाने लगे कि आग कैसे लग गई? आग किसी भी कारण से लग सकती है. या तो शौर्ट सर्किट हो गया होगा या फिर वनिडा रसोई गैस खुली छोड़ गई होगी.

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वहां मौजूद लोग आपस में आग लगने के कारणों पर कयास लगा रहे थे. इतनी देर में एक पड़ोसी ने मकान मालिक नगीन भाई प्रभुभाई पटेल को फोन कर के आग लगने की सूचना दे दी. कुछ ही देर में मकान मालिक का दामाद हितेश भाई वहां पहुंच गया.

हितेश ने लोगों से वनिडा के बारे में पूछा, लेकिन किसी को कुछ पता होता तो वह बताता. तब हितेश ने जल्द ही कमरे का ताला तोड़ दिया. कमरे के अंदर धुआं भरा हुआ था. जमीन पर पड़े गद्दे पर आग जल रही थी. उस ने आसपड़ोस से पानी मंगा कर आग पर फेंका. जलते हुए गद्दे पर एक चादर भी जलती हुई नजर आई. हितेश ने चादर खींची, तो उस के नीचे किसी इंसान के पैर नजर आए.

जलते हुए गद्दे पर किसी इंसान के पैर होने की बात सुन कर वहां मौजूद लोगों में दहशत फैल गई. दहशत इसलिए भी फैली कि कमरे के बाहर से ताला लगा हुआ था. वनिडा अगर कमरे में थी, तो बाहर ताला कैसे लगा हुआ था.

डरेसहमे लोगों ने इस की सूचना पुलिस को दी. कुछ ही देर में उमरा थाना पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस जिस समय उस कमरे में घुसी, उस समय भी गद्दा जल रहा था. पुलिस ने पानी डाल कर आग बुझाई. गद्दे पर देखा, तो एक युवती की लाश थी. लाश पूरी तरह जल चुकी थी. चेहरा भी जल गया था. फिर भी आसपड़ोस के लोगों ने कदकाठी और बाकी चीजों से उस की शिनाख्त कर बताया कि लाश वनिडा की है.

जली हालत में मिली लाश

पुलिस ने आसपड़ोस के लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि थाईलैंड की रहने वाली वनिडा किराए के इस कमरे में 3-4 महीने पहले ही आई थी. उस के साथ थाईलैंड की ही रहने वाली एक और सहेली रूंघटीथा म्याऊ भी रहती थी, लेकिन उस समय वह गुजरात के ही भरूच शहर गई हुई थी.

पुलिस को मौके पर वनिडा के मोबाइल भी नहीं मिले, जबकि वह 2-3 कीमती मोबाइल रखती थी. घटनास्थल पर ऐसा कोई सुराग नहीं मिला, जिस से वनिडा की मौत के कारणों का पता चल पाता. मोबाइल नहीं मिलने पर पुलिस ने यह माना कि शायद वह आग में जल गए होंगे, लेकिन उन के अवशेष भी नहीं मिले थे.

घर में कोई भी सामान बिखरा हुआ नहीं मिला. इसलिए लूटपाट या चोरी का संदेह भी नहीं हुआ. मौके पर खानेपीने का कुछ सामान, शराब की बोतलें, गिलास और कोल्ड ड्रिंक की बोतलें जरूर मिली.

पड़ोसियों ने बताया कि वनिडा सूरत के इस्कान मौल में एक स्पा में काम करती थी. वह पिछली रात को करीब साढ़े 8 बजे आटोरिक्शा से घर आई थी. रात को उस के कमरे पर उस की सहेली मिलने आई थी. रात को संभवत: सहेली के साथ वनिडा ने पार्टी की थी, क्योंकि पहले उन की मौजमस्ती की सी आवाजें आ रही थीं. बाद में वनिडा के कमरे से झगड़ा होने की आवाज भी आई थी.

कुछ लोगों ने बताया कि रात को एक कार में वनिडा के 3 बौयफ्रैंड भी आए थे. रात में एक बाइक पर भी अज्ञात युवक घूमता हुआ देखा गया था. कुछ लोगों ने वनिडा के पूर्व प्रेमी लालू पर शक जताया.

ताज्जुब की बात यह थी कि वनिडा की मौत जलने से हुई थी, लेकिन किसी ने उस की चीखपुकार नहीं सुनी. मैडिकल साइंस में माना जाता है कि होशोहवास वाला कोई भी व्यक्ति जलता है, तो चीखताचिल्लाता जरूर है. ऐसा भी कारण सामने नहीं आया कि वनिडा ने खुदकुशी करने के मकसद से खुद को आग के हवाले किया हो.

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मामला बड़ा संदेहास्पद था. यह साफ नहीं हो रहा था कि वनिडा की हत्या हुई है या यह कोई हादसा है. उमरा थाना प्रभारी ने उच्चाधिकारियों को सूचना दे कर एफएसएल की टीम और क्राइम ब्रांच की टीम को मौके पर बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम और क्राइम ब्रांच की टीम ने मौके से कुछ साक्ष्य एकत्र किए. फोरैंसिक टीम के विशेषज्ञों ने हत्या की आशंका जताते हुए कुछ सैंपल भी लिए.

उमरा थाना पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर एक्सीडेंटल डैथ मानते हुए मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी. सूरत के गांव मगदल्ला और आसपास के इलाकों में थाईलैंड की कई युवतियां अकेली और अन्य परिवार भी रहते हैं.

पुलिस ने उन से भी वनिडा के बारे में पूछताछ की, लेकिन ऐसी कोई बात पता नहीं चली जिस से कि उस की मौत का राज खुल पाता. शादीशुदा वनिडा सूरत में अकेली रहती थी. उस का पति व बेटा थाईलैंड में रहते हैं. पुलिस ने लोगों से वनिडा का थाईलैंड का पता हासिल किया ताकि दूतावास के जरिए उस के परिजनों को सूचना भेजी जा सके. बाद में पुलिस ने थाईलैंड हाई कमीशन को मामले की सूचना दे दी.

पूछताछ में कोई सुराग नहीं मिलने पर पुलिस ने सीसीटीवी कैमरों के फुटेज के सहारे जांच आगे बढ़ाने का फैसला किया. आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखने के बाद पुलिस हालांकि किसी नतीजे पर तो नहीं पहुंची, लेकिन कुछ लोगों को चिन्हित कर उन से पूछताछ करने का निर्णय लिया.

इस के लिए दूसरे दिन 7 सितंबर को पुलिस की स्पेशल जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया गया. डीसीपी विधि चौधरी के नेतृत्व में इस टीम में उमरा थाने के इंसपेक्टर के अलावा क्राइम ब्रांच को भी शामिल किया गया.

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एसआईटी के अधिकारियों ने मौकामुआयना करने वाली फोरैंसिक टीम से राय ली. फोरैंसिक विशेषज्ञों ने कहा कि शव को देखने के बाद ऐसा नहीं कहा जा सकता कि यह आकस्मिक मौत है. अगर घर में शार्ट सर्किट भी होता तो शव इतना नहीं जलता. शव फर्श पर पड़ा था. आग लगने के बाद आदमी छटपटाता है. इधरउधर भाग कर आग बुझाने की कोशिश करता है.

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रहने दो इन सवालों को : भाग 4

रिजवाना के कमरे में 3 और लड़कियां थीं, जिन्हें बाहर कर दिया गया था. शशांक बुरी तरह रिजवाना को जलील कर रहा था और उसे शारीरिक चोट भी पहुंचाई थी. मृगांक तुरंत रिजवाना को अपनी तरफ खींचते हुए अभी कुछ कहता, उस से पहले गगन त्रिपाठी मृगांक पर बुरी तरह चीखे, ‘‘क्या रासलीला चल रही है यहां मुसलिम वेश्या के साथ?’’ साफ शब्दों में मगर ऊंची आवाज में मृगांक ने कहा, ‘‘मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप लोग मुझे इतना अपना समझते हैं कि यहां तक पहुंच जाएंगे. नीति, ज्ञान और सचाई को सीढ़ी बना कर आप लोगों ने लोगों के सरल विश्वास का जितना बलात्कार किया है उतना ही इन मासूम लड़कियों के साथ हुआ है. छोटी बच्चियों को मांस के भाव खरीदबिक्री करने वाले लोग भी आप जैसे हैं और उन की बोटी नोचने वाले भी आप जैसे. धर्म की आड़, कभी जाति की आड़, कभी संस्कृति की आड़ में बस लोगों के झांसे में आने की देर है, आप उन के विश्वास का शोषण भी करते हैं और उन के उद्धार करने का श्रेय भी स्वयं लेते हैं.’’

गगन त्रिपाठी की पूरी पौलिश उतर चुकी थी. वे क्रोधित हो सभी को ले वहां से निकल गए. उन के जाने के बाद रिजवाना की ओर देखा मृगांक ने. मृगांक की तरफ पीठ कर के वह बगीचे में शांति से खड़े पेड़ों को देख रही थी. फल हो या छाया, हमेशा सबकुछ लुटाने को तैयार थे पेड़, मगर हमेशा हर व्यवहार को सहन कर जाने को विवश भी. उस की पीठ की आधी फटी कुरती की ओर नजर गई मृगांक की. शशांक ने कुरती को फाड़ डाला था. झक गोरी पीठ पर झुलसे हुए इलैक्ट्रिक शौक के दाग. मृगांक करुणा से भर उठा. अब तक छोटी बच्चियों के प्रति उस के मन में हमेशा पिता सा वात्सल्य रहा. लेकिन रिजवाना ने अपनी दृष्टि से मृगांक की अनुभूतियों को विराग से रागिनी के मदमाते निर्झर की ओर मोड़ दिया था.

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नेहभरे स्वर में पुकारा उस ने, ‘‘रिजवाना.’’ वह अब तक खिड़की के पास खड़ी बाहर देख रही थी. पुकारते ही आंखों में मूकभाषा लिए अपनी मुखर दृष्टि उस की आंखों में डाल दी.

मृगांक ने पूछा, ‘‘बताओगी तुम्हारी पीठ पर जो झुलसे हुए दाग हैं, क्या ये उन्हीं दरिंदों की वजह से हैं.’’

‘‘हां, भूखे भेडि़यों के आगे शरीर न डालने की बेकार कोशिशों का नतीजा. और भी हैं, पेट के पास,’’ यह कह कर उस ने अपनी कमीज उठा कर दिखाई. फिर धीरे से कहा, ‘‘जाने क्यों मैं आप के सामने खुद को बहुत महफूज समझती हूं. लगता है जैसे…’’ और उस ने सिर झुका लिया. रिजवाना के अनकहे शब्दों की गरमी मृगांक के जज्बातों को पिघलाने लगी. मृगांक स्थिर नेत्रों से उस की ओर देखता रहा. एक नशा सा छाने लगा, कहा, ‘‘और कहो.’’ ‘‘मैं आप के पास रहना चाहती हूं हमेशा के लिए. जानती हूं, यह कहां मुमकिन होगा- आप ब्राह्मण और मैं मुसलमान, वह भी मैं बदनाम.’’

‘‘बस, यह मत कहो. जाति, धर्म और पेशे से इंसान कभी इंसान नहीं होता, न कोई इन्हें मानने से पाक होता है. जो दिल दूसरों के दर्द में पसीजे और दूसरों को हमेशा अपने प्रेम के काबिल समझे, बराबर समझे, वहीं इंसान है. और इस लिहाज से तुम पाक हो, प्यार के काबिल हो. लेकिन, एक दिक्कत है.’’ यह सुन कर आंखों में रिजवाना के खुशियां तैरने लगी थीं. अचानक वह खुशियों में डूबने लगी, पूछा, ‘‘क्या?’’

‘‘मैं तुम से उम्र में 20 साल बड़ा हूं. तुम्हारे साथ जुल्म न हो जाएगा? कैसे चाह सकोगी मुझे?’’ ‘‘सच कहूं तो उम्र का यह फासला आप की शख्सियत में रूमानियत भरता है.’’

उस ने अपनी आंखें झुका लीं. मृगांक ने अपनी दोनों बांहें उस की ओर पसार दीं. रिजवाना अपने दोनों बाजुओं के घेरे में मृगांक को ले कर खुद उस में समा गई. एक महीने के भीतर ही दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली. दोनों मिल कर नवलय का काम देखने लगे. इन दोनों की शादी की बात गगन त्रिपाठी तक पहुंच चुकी थी. गगन त्रिपाठी अब सांसद बनने की तैयारी में थे, बड़ा बेटा विधायक. ब्राह्मण की ऊंची नाक की इस बेटे ने ऐसीतैसी कर दी तो सीधा असर वोटबैंक पर आ पड़ा. कम से कम मुसलिम वोट और देहव्यापार तथा नाचगाने करने वाली औरतों के वोट गगन त्रिपाठी को मिल जाएं तो ब्राह्मण वोट के खिसकने का दर्द कुछ कम हो. इस बीच, ब्राह्मण वोटर मान जाएं तो वारेन्यारे.

गगन त्रिपाठी सदलबल पहुंच गए चिल्लाघाट. पंचायतसभा बुलाई गई. रिजवाना के भाई को नौकरी, गांव में 2 हैंडपंप, बिजली की व्यवस्था तत्काल करवाई गई.

पंचायत और मुसलिम समाज के साथ चर्चा कर के इस नतीजे पर पहुंचा गया कि रिजवाना गांव की बेटी है, जब इस गांव की बेटी गगन त्रिपाठी के घर की बहू बन गई है तो उसे बदनाम औरत न समझ, पूरी इज्जत बख्शी जाए. अगर त्रिपाठी की पार्टी को जिताने का वादा किया जाए तो गांव के लोगों की मुंहमांगी मुराद पूरी होगी.

उधर, मुसलिम भाई, जो रिजवाना के साथ हाथापाई में उतरे थे, अब उस की बदौलत बांदा की कुछ मुख्य सीटों पर त्रिपाठी की पार्टी से खुद के भाईभतीजों को उतारना चाहते थे, आपस में जबरदस्त गठबंधन.

मृगांक और रिजवाना को हिंदुमुसलिम एकता का प्रतीक बना कर चुनावी रणनीति तैयार होने लगी. बड़ेबड़े होर्डिंग्स में दोनों की तसवीरें लग गईं. उन दोनों को सार्वजनिक चुनावी सभा में उपस्थित होने का निमंत्रण भेजा गया.

मंच पर आज मृगांक, रिजवाना और उस की बेटी शीरी उपस्थित थे. काफी लुभावने भाषणों के बाद मृगांक की बारी आई. उस ने माइक संभाला, कहा, ‘‘आज जो भी मैं कहूंगा, जरूरी नहीं कि उस से सब के मनोरथ पूरे हो पाएं. मैं ने रिजवाना से इसलिए शादी नहीं की कि मुझे हिंदूमुसलिम एकता के झंडे गाड़ने थे. सच कहूं तो जातिधर्म को ले कर मैं कोई भेद महसूस नहीं करता, जो जोड़ने की जुगत करूं. उस का मुसलिम होना, मेरा हिंदू होना सबकुछ सामान्य है मेरे लिए, जैसे इंसान होना. यह भी नहीं कि लाचार औरत पर मैं ने कोई कृपा बरसाई है. उस ने मुझे पसंद किया, मैं ने उसे. उम्र का फासला उसे डिगा नहीं पाया और हम एक हो गए. और हमारी बेटी, जो उस के किसी पाप का नतीजा नहीं है, हमदोनों के प्रेम में माला सी है. मेरे पिता मुझे हमेशा बड़ा आदमी बनने की नसीहत देते थे. उन्हें अफसोस होगा उन के हिसाब से मैं बड़ा नहीं बन पाया.’’

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रिजवाना की गोद से मृगांक ने बच्ची को लिया, रिजवाना का हाथ पकड़ा और स्टेज से उतर कर दोनों ने राह पकड़ी अपने तरीके से अपनी दुनिया बसाने की सोची.

रहने दो इन सवालों को : भाग 3

रिजवाना जमीन की ओर देखती, कहती गई, ‘‘ग्राहक के साथ सोने की जबरदस्ती, पैसे वे लोग रखेंगे, हम बस उन के गुलाम. जब तक हम कहीं और न बिकें, उन के लाए ग्राहकों को खुश करें. और उन्हें भी.’’ मृगांक ने पूछा, ‘‘तुम घर से निकल कर उन तक पहुंची कैसे?’’

‘‘आप को मालूम होगा, बांदा जिले में शजर पत्थरों के नक्काशीदार गहने बड़े भाव से बिकते हैं. मैं शजर पत्थरों से गहने बनाती थी, रोजीरोटी के लिए. ‘‘घर में मुझे मिला कर 3 बहनें थीं. एक भाई भी. अब्बा कौटन मिल में मजदूरी करतेकरते फेफड़े की बीमारी से चल बसे. भाई काम पर तो जाता लेकिन उम्र कम होने की वजह से मजदूरी नहीं मिलती थी. बहनों को घर पर काम होता था. 4 साल पहले जब मैं 16 साल की थी, सोचा शजर पत्थरों से गहने अच्छी बनाती हूं, क्यों न शहर में बेचा करूं, पैसे आएंगे.

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‘‘चिल्लाघाट से बांदा मुख्य बाजार आने के लिए बस पर चढ़ी, तभी अचानक किसी ने नाक पर रूमाल रख दिया. जब होश आया, खुद को होटल के कमरे में 4 लोगों के साथ पाया. कोठे में बेच दी गई. बेटी शीरी वहीं हुई. ‘‘अचानक उस कोठे पर पुलिस और महिला सुरक्षा संस्थान की दबिश पड़ी तो कोठे की मालकिन ने इन लोगों के हाथों हम 15 लड़कियों को बेच दिया था. हम महीनेभर से यहीं इलाहाबाद में थे.’’

‘‘चलो, एकबार कोशिश करते हैं. तुम्हारे घर वालों तक तुम्हें पहुंचाना मेरा काम है. स्वीकार न किए जाने पर नवलय तो है ही.’’ केन नदी के किनारे से मृगांक की जीप दौड़ती जा रही थी.

भुरागढ़ किला और विंध्य पठारों के पास से गुजरती जीप पर बैठे रिजवाना और मृगांक किले को ही एकटक देख रहे थे. मृगांक ने पूछा, ‘‘जानती हो इस भुरागढ़ किले के बारे में?’’ रिजवाना उदासीन थी, कहा, ‘‘ज्यादा नहीं, आप ही बताइए.’’

‘‘महाराजा धनसाल के बेटे जगत राई और उन के बेटे थे किराट सिंह. उन्हीं किराट सिंह ने यह किला बनवाया था. 1857 में नवाब अली बहादुर ने यहीं से ब्रिटिश अधीनता के विरुद्ध बिगुल फूंका था.’’

‘‘हूं,’’ रिजवाना दूर काली मिट्टी और उस पर उपजे सरसों, मटर, गेहूं के खेतों में कहीं खो गई थी. यमुना और केन की मिलनरेखा दूर से दिखने लगी थी. चिल्लाघाट आने को था, शाम की सुरमई शांति में दूर से फाग गीतों के धुन कानों में पड़ रहे थे. धर्म के मोह से ऊपर उठ कर फाग ने यौवन की मादकता को पुकारा था.

रिजवाना बचपन के दिनों की इस मनोरम जगह पर मृगांक की उपस्थिति से प्रफुल्लित सी सिहर गई. गोद में बच्ची और गांवघर के लोगों का अचानक खयाल आना उसे मायूस कर गया. रिजवाना के छोटे से घरआंगन में तब दीपक की रोशनी टिमटिमा रही थी. दोनों बहनें खाना बना रही थीं. भाई चारपाई पर लेटा था. बहन को देख दोनों बहनें दौड़ी आईं. लेकिन रिजवाना की गोद में बच्ची को देख दोनों ठिठक गईं. भाई चारपाई से उठ बैठा. मगर, बस बैठा देखता रहा. दोनों बहनें मां को बुला लाईं जो अंदर कढ़ाई और कशीदे का काम कर रही थीं. मृगांक के साथ उस की अम्मी की बातों का सार यही रहा कि एक बेटी के चलते शबाना और अमीना, जिन का निकाह होना लगभग तय है, की जिंदगियों पर पानी फिर जाएगा. ऊपर से इस की गोद में हराम की औलाद. गांव वाले हुक्कापानी बंद कर देंगे. ऐसे भी, बेटी की गुमशुदगी से कम जिल्लतें नहीं हुई हैं.

मृगांक समझ गया कि दाल नहीं गलेगी. कम से कम सुबह तक तो ठहरें. इलाहाबाद से बांदा तक

7 घंटे के सफर के बाद अब रात को वापस जाना मुमकिन नहीं. इधर, रिजवाना को ले कर या छोड़ कर अपने घर जाना भी संभव नहीं. अम्मी ने रातभर के लिए खाना भी मुहैया कराया और पनाह भी. सुबह दोनों निकलने वाले ही थे कि चिल्लाघाट पंचायत के 4 लोग दनदनाते सुबह 7 बजे इन के घर पहुंच गए. एक ने चीखा, ‘‘अंदर नापाक औरत के साथ क्या गुल खिला रहे हो, मृगांक बाबू? इतने बड़े नेता के बेटे हो कर भगोड़ी के साथ नापाक रिश्ता?’’

वे लोग रिजवाना को अब तक बाहर खींच लाए थे. रिजवाना की अम्मी दहाड़े मार कर रोने लगीं. बहनों ने उन्हें डपटा, तो चुप हो गईं. मृगांक ने बाहर आ कर उन्हें रोकने के लिए कहा, ‘‘क्यों मासूम परिवार को सता रहे हो आप लोग? मुझे अपने पिताजी के काम से अब कोई मतलब नहीं.’’

पंचायत के एक आदमी ने कहा, ‘‘सात घाट का पानी पीने के लिए घर से भाग खड़ी हुई और अब नापाक हो कर वापस लौटी है. हमारे मजहब में ऐसी औरतों को बागी मान कर सजा के लायक माना गया है.’’ इतना कहते हुए उन लोगों ने उस की चुन्नी नीचे खींच दी और उस के हाथों को मरोड़ कर खुद के करीब ले आए. मृगांक ने झपट कर रिजवाना को अपने पास खींचा और चीखा, ‘‘शर्म नहीं आती लड़की की इज्जत उतार कर गांव की इज्जत बचा रहे हो?’’

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‘‘बात आप के पिताजी तक पहुंचेगी. आप लड़की हमें सौंप दें तो हम आप को और आप के इस लड़की के साथ ताल्लुकात को हजम कर जाएंगे.’’ ‘‘नापाक कौन है मैं समझ नहीं पा रहा- लड़की को सौंप दूं- ताकि आप शौक से इस की बोटी नोचें. कह दें गगन त्रिपाठीजी से, मुझे कोई दिक्कत नहीं,’’ मृगांक ने साफ कहा.

वे दोनों इलाहाबाद वापस आ गए थे. दोनों के रिश्तों के बारे में इतने कसीदे काढ़े गए थे कि गगन त्रिपाठी और उन के बड़े बेटे शशांक आपे से बाहर हो गए. रिश्तेदारों में मृगांक के सामाजिक कामों को ले कर बड़ी छीछालेदार हुई. अब लेदे कर वेश्या ही बची थी, सपूत ने वह भी पूरा कर दिया. जातिबिरादरीधर्म सबकुछ उजड़ गया था त्रिपाठीजी का. ब्राह्मण बिरादरी गगन त्रिपाठी पर बड़ा गर्व करती थी. कैसा दिमाग चला कर सत्ता के करीबी हो गया उन की ही बिरादरी का व्यक्ति. गगन त्रिपाठी अपनी जातिबिरादरी के गर्व थे. अब बेटे ने कुजात की लड़की की संगत कर के धर्मभ्रष्ट कर दिया. गगन त्रिपाठी जितना सोचते, उन का पारा उतना सातवें आसमान पर पहुंच जाता. सदलबल बड़े बेटे को साथ ले वे इलाहाबाद पहुंच गए.

नवलय संस्थान पर त्रिपाठीजी और उन के लोगों का जब धावा पड़ा तब मृगांक के वापस आने में एक घंटा बाकी था. उन के इस तरह यहां आने से यहां की दीदियां घबरा गईं. सहयोगी नेकराम ने मृगांक को फोन लगाया. जब तक मृगांक यहां पहुंचे, शशांक रिजवाना के कमरे में घुस आया था.

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रहने दो इन सवालों को : मृगांक की कैसी थी जिंदगी

रहने दो इन सवालों को : भाग 2

इधर एक भी ईंट भरभरी हुई, तो पूरी मीनार के ढहने का अंदेशा हो जाता है. बेटे तो नींव की ईंटें हैं, चूलें हिल जाएंगी. यह अनाड़ी तो बिना भविष्य बांचे दरदर लोगों की भलाई किए फिरता है. दिमाग ही नहीं लगाता कि जहां भलाई कर रहा है वहां फायदा है भी या नहीं. न जाति देखता, न धर्म, न विरोधी पार्टी, न विरोधी लोग. कोई भेदविचार नहीं. सत्यवादी हरिश्चंद्र सा आएदिन सत्य उगल देता है जो अपनी ही पार्टी के लिए खतरे का सिग्नल बन जाता है. सो, क्यों न इस लड़के को यहां से निकाल कर इलाहाबाद भेज दिया जाए. कम से कम इस से उस का भला हो न हो, पार्टी को नुकसान तो कम होगा. ऐसे भी इस लड़के के आसार सुख देने वाले तो लगते नहीं. काफीकुछ भलेबुरे का सोच गगन त्रिपाठी बेटे मृगांक को आईएएस की तैयारी करने के लिए इलाहाबाद छोड़ आए. जिस के पंख निकले ही थे दूसरों को मंजिल तक पहुंचाने के लिए, वह क्या दूसरों के पंख कुतरेगा खुद की भलाई के लिए?

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मृगांक इलाहाबाद में भी अपने ही तौरतरीकों में रम गया. इतिहास में पीएचडी करते हुए विश्वविद्यालय में ही प्रोफैसर हो गया. आईएएस की कोचिंग से निसंदेह उस में ज्ञान के प्रति ललक बढ़ी थी और मानव जीवन के प्रति जिज्ञासा भी. लिहाजा, सामाजिक कार्यों की उस की फेहरिस्त बड़ी लंबी थी. 29 वर्ष की अवस्था में वह 700 मुकदमे लड़ रहा था जो उपभोक्ता संरक्षण से ले कर सड़क परिवहन व्यवस्था में सुरक्षा की अनदेखी, शिक्षा के गिरते स्तरों में प्राइवेट स्कूलों की उदासीनता और सरकारी स्कूलों में लापरवाही तथा देहव्यापार में लिप्त लोगों को कानूनी दायरे में ला कर सजा दिलवाने व इस व्यापार में लगी मासूम बच्चियों के संरक्षण वगैरा के मामले थे. प्रोफैसर की नौकरी बजाते हुए अकेले ही कुछ अच्छे लोगों के सहयोग से वह इन कामों को आगे बढ़ा रहा था. हां, उस के दादाजी का कभी पुलिस विभाग में होना उसे पहचान का लाभ जरूर देता था. न जाने पहचान का लाभ लोग किसकिस वजह लेते हैं, मृगांक के लिए तो यह लाभ सिर्फ सर्वजनहिताय था.

5 फुट 10 इंच की लंबाई के साथ बलिष्ठ कदकाठी में सांवला रंग आकर्षण पैदा करता था उस में. रूमानी व्यक्तित्व में निर्विकार भाव. दिनभर क्लास, फिर दोपहर 3 बजे से शाम 8 बजे तक भागादौड़ी और रात अपनी छोटी सी कोठरी में अध्ययन, चिंतन, मनन व निद्रा. घरपरिवार, राजनीति, रिश्तों के मलाल, आदेशनिर्देश, लाभनुकसान सब पीछे छूट गए थे.

शादी के लिए घर वालों ने कितनी ही लड़कियों की तसवीरें भेजीं, मां ने कितने ही खत लिखे. दीदी ने सैकड़ों बार फोन किए. मगर मृगांक की आंखें लक्ष्य पर अर्जुन सी टिकी रहीं. उधर, बांदा में पिता की राजनीतिक ताकत और बड़े भाई का राजपाट मृगांकनुमा बाधा के बिना बेरोकटोक फलफूल रहे थे. भाई की पत्नी ऊंचे घराने की बेटी थी जो बेटा पैदा कर के ससुर की आंखों का तारा बन बैठी थी.

जिंदगी की रफ्तार तेज थी, एकतरफ लावलश्कर के साथ ठसकभरी जिंदगी, दूसरी तरफ मृगांक के कंधों पर जमानेभर का दर्द. मगर सब अपनी धुन में रमे थे. मृगांक भी लक्ष्य की ओर दौड़ रहे थे मगर निजी जिंदगी से बेखबर.

इन दिनों उस ने ‘नवलय’ संस्थान की शुरुआत की. दरअसल, देहव्यापार से मुक्त हुई लड़कियां काफी असुरक्षित थीं. एक तरफ उन लोगों से इन्हें खतरा था जो इन्हें खरीदबेच रहे थे. दूसरे, घर परिवार इन लड़कियों को सहज स्वीकार नहीं करते थे, जिन के लिए अकसर वे अपनी जिंदगियां दांव पर लगाती रही थीं. ऐसे में मृगांक खुद को जिम्मेदार मान इन लड़कियों की सुव्यवस्था के लिए पूरी कोशिश करता. नवलय इन असुरक्षित लड़कियों का सुरक्षित आसरा था. मृगांक ने बांदा जिले के चिल्लाघाट की रिजवाना को कल घर पहुंचाने की जिम्मेदारी ली थी. इस बहाने वह मां से भी मिल लेगा. कई साल हो गए थे घर गए हुए. बड़े भाई का बेटा भी अब 7 साल का हो चुका था.

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शाम 5 बजे जब वह नवलय आया, तो नीम के पेड़ के पास खड़े हो कर रिजवाना को घुटघुट कर सुबकते देखा. वह संस्थान के औफिस में जा कर बैठ तो गया लेकिन मन उस का रिजवाना की ओर ही लगा रहा. अपने औफिसरूम से अब भी वह रिजवाना और उस की उदास भंगिमा को देख पा रहा था. चेहरा मृगांक का जितना ही पौरुष से भरा था, भावनाएं उस की उतनी ही मृदुल थीं. रसोइए कमल को बुला कर कहा कि वह रिजवाना को बुला लाए. रिजवाना की रोनी सूरत देख वैसे तो उस का मिजाज उखड़ गया था, सो जरा सी डपट के साथ समझाने के लहजे में उस ने कहा, ‘‘जब घर से बाहर आ ही गई हो, काफी मुसीबतें झेल भी चुकी हो, तो अब रोना क्या? अब तो हम तुम्हारे घर जा ही रहे हैं.’’

गहरी चुप्पी. ‘‘क्यों, कुछ कहोगी?’’

चुप्पी… ‘‘देखो, मैं थप्पड़ जड़ दूंगा,’’ थकामांदा मृगांक आजकल कुछ चिड़चिड़ा सा हो रहा था. मृगांक के मुख से यह सुनते ही गुस्से से भर रिजवाना ने मृगांक की तरफ देखा. रोने से आंखें कुछ सूजी हुई थीं, मगर दृष्टि स्पष्ट. गोरे से रक्तिम चेहरे पर अनगिनत भाव, जिन में स्वाभिमान सब से मुखर था. तीखे नैननक्श, गोलाई में नुकीला चेहरा, ठुड्डी तक हीरे सी कटिंग. मृगांक के कंधे तक उस की ऊंचाई. दुबली ऐसी, कि वक्त की रेत ने चंचल नदी के किनारों को पाट दिया हो जैसे. नदी आधी जरूर हो गई थी, मगर प्यार और संभाल की बारिश मिले तो वह आबाद हो जाए.

मृगांक का गुस्सा उस के रूमानी नखरों के बीच काफूर हो गया. मन ही मन उस ने कहा, ‘वाह.’ एक मिनट तक दोनों एकदूसरे की ओर देखते रहे. मृगांक ने चुप्पी तोड़ी, कहा, ‘‘क्या बात है, मुझ से कहो. यहां की सारी बच्चियों के लिए मैं ही पिता, मैं ही मां. तुम्हारी भी अगर…’’

‘‘मेरे हिस्से का रिश्ता मुझे तय करने दीजिए. जरूरी नहीं कि तुरंत 2 व्यक्तियों को किसी रिश्ते के नाम में बांध ही दिया जाए.’’ रिजवाना की इन बातों में बड़ी कशिश थी. वह क्या अनछुआ सा था अब तक जिसे छूने की प्यास सताने लगी मृगांक को. कभी ऐसा महसूस तो नहीं हुआ था उसे, आज क्यों…?

मृगांक ने मुसकराते हुए उस की तरफ देखा, फिर कहा, ‘‘क्यों दुखी हो, मुझ से कहो.’’ तड़पती सी वह धीरे से बोली, ‘‘मैं अपने घर चिल्लाघाट नहीं जाऊंगी. बच्ची को ले कर वहां जाऊंगी तो घर वाले तो क्या, पूरे गांव वाले कच्चा चबा जाएंगे.’’

मृगांक को बड़ा तरस आया उस पर. पूछा, ‘‘क्या हुआ था तुम्हारे साथ? मैं ने पुलिस की दबिश डलवा कर तुम 15 लड़कियों को जहां से छुड़ाया, वह तो नरक से कुछ कम नहीं था. इन में से कई लड़कियां असम, बिहार और पश्चिम बंगाल से लाई गई हैं. तुम और 3 दूसरी लड़कियां उत्तर प्रदेश की हो. ये लोग दुबई आदि जगहों पर शेखों के पास तुम जैसी लड़कियों को बेच देते हैं.’’

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‘‘3 महीनों से हमें इलाहाबाद में रखा हुआ था. हमारे साथ यहां बहुत बुरा सुलूक होता था. करंट देने से ले कर कोड़े बरसाने तक. 3-4 दिनों तक खाना नहीं देना, सब के सामने कपड़े फाड़ डालना, मारना, पीटना आदि.’’ रिजवाना की बातें सुन कर मृगांक की आंखों में दर्द भर आया. उस ने तड़प कर पूछा, ‘‘क्यों?’’

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रहने दो इन सवालों को : भाग 1

‘भाइयो और बहनो, मैं अदना सा गगन त्रिपाठी, महान बांदा जिले के लोगों का अभिवादन करता हूं. यहां राजापुर गांव में गोस्वामी तुलसीदास ने जन्म ले कर देश के इस हिस्से की धरती को तर दिया था. वहीं, यह जिला मशहूर शायर मिर्जा गालिब का कितनी ही बार पनाहगार रहा है. उसी बांदा जिले के बाश्ंिदों को अच्छेबुरे की मैं क्या तालीम दूं? वे खुद ही जानते हैं कि इस जिले का समुचित विकास कौन कर सकेगा, हिंदूमुसलिम एकता को बरकरार रख दोनों की तहजीबों को कौन सही इज्जत देगा, यमुना को प्रदूषण से कौन बचाएगा, केन नदी की धार को कौन फसलों की उपज के बढ़ाने के काम में लाएगा. कहिए भाइयोबहनो, कौन करेगा ये सब?’ गगन चीरने वाले नारों के बीच गगन त्रिपाठी का चेहरा दर्प से दमकने लगा. सभी ऊंची आवाजों में दोहरा रहे थे, गगन त्रिपाठी जिंदाबाद, लोकहित पार्टी जिंदाबाद.

भीड़ में पहली लाइन की कुरसी पर बैठा 13 साल का मृगांक पिता के ऊंचे आदर्शों और महापुरुषों से संबंधित बातों को अपने जज्बातों में शिद्दत से पिरो रहा था. वह पिता गगन त्रिपाठी के संबोधनों और भाषणों से खूब प्रेरित होता है. अकसर उन के भाषणों में गांधी, ज्योतिबा फूले और मदर टेरेसा का जिक्र होता, वे इन के कामों की प्रशंसा करते, लोगों से उन सब की जीवनधारा को अपनाने की अपील करते. बांदा जिले के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार से है मृगांक. उस के दादाजी पुलिस विभाग में अफसर थे. मृगांक के पिता गगन त्रिपाठी को नौकरी में रुचि नहीं थी.

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गगन त्रिपाठी के होने वाले ससुरजी की राजनीतिक पैठ के चलते मृगांक के दादा के पास उन का आनाजाना लगा रहता, सरकारी अफसरशाही से राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश. इधर, पिता के अफसरी अनुशासन की वजह से गगन त्रिपाठी अपने पिता से कुछ खिंचे से रहते. घर आतेजाते भावी ससुरजी को गगन में उन का पसंदीदा राजनीतिज्ञ नजर आया. उन्होंने देर किए बिना, गनन त्रिपाठी के पिता को मना कर अपनी बेटी की घंटी गगन के गले में बांध दी और उस के फुलटाइम ट्रेनर हो गए.

समय के साथ राजनीति में माहिर होते गगन त्रिपाठी विधायक बन गए. साल गुजरे. बेटी हुई, 18 साल की उस के होते ही दौलतमंद व्यवसायी के साथ उस की शादी कर दी. पारिवारिक मर्यादा अक्षुण्ण रखने के लिए उसे 10वीं से ज्यादा नहीं पढ़ाया गया. अभी बड़ा बेटा 27 वर्ष का था, पिता की राजनीति में विश्वस्त मददगार और भविष्य का राजनीतिविद, पिता की नजरों में कुशल और उन के दिशानिर्देशों के मर्म को समझने वाला. बड़े बेटे की पढ़ाई कालेज की यूनियन और राजनीतिक चुनावों के गलियारों में ही संपन्न हो गई.

मृगांक अभी 23 वर्ष का था, पढ़ाई, खेलकूद में अव्वल, विरोधी किस्म के सवाल खड़े करने वाला, कम शब्दों में गहरी बातें कहने वाला, मां का लाड़ला, पिता की दुविधा बढ़ाने वाला. मृगांक के स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद गगन त्रिपाठी की ओर से उस पर कलैक्टर बनने का जोर आ पड़ा. घरभर में इस बात की चर्चा दिनोंदिन जोर पकड़ रही थी. एक दिन पिताजी की ओर से मृगांक के लिए बुलावा आया. बुलावे

का अर्थ मृगांक भलीभांति समझ रहा था. 2 मंजिले पुश्तैनी मकान के बीचोंबीच संगमरमरी चबूतरा, आंगन में कई सारे पौधे लगे थे. गगन त्रिपाठी नाश्ते से निवृत हो आंगन में रखी आरामकुरसी पर बैठे थे. सुबह 9 बजे का वक्त था. 55 वर्ष की उम्र, गोरा रंग धूप में ताम्रवर्ण, कदकाठी ऊंची और बलिष्ठ, खालिस सफेद कुरता, चूड़ीदार पजामे पर भूरे रंग का जैकेट. वे तैयार बैठे थे, कहीं निकलना था, शायद. मृगांक सामने आ खड़ा हुआ. पिता के प्रति सम्मान और अबोला डर था लेकिन हृदय में पिता की सात्विकता और आदर्श को ले कर बड़ा गहरा विश्वास था. इस के पहले पिता से जब भी उस की बातें होतीं, वे अकसर उस की पढ़ाई व सेहत की बेहतरी के साथ बड़ा आदमी बनने की नसीहत देते.

आज उस के भविष्य के स्वप्नों की जिरह थी. पिता की सुननी थी, अपनी कहनी भी थी. उस ने पिता की नजरों में देखा. पिता के आसन से गगन त्रिपाठी बोले, ‘‘तो आप कलैक्टर बनने की तैयारी को ले कर क्या फैसला ले रहे हैं? आप पढ़ने में अच्छे हैं. हम उम्मीद लगाए हैं कि आप कलैक्टर बन कर हमारी पार्टी और परिवार का भला करेंगे. पुरानी पार्टी हम ने छोड़ दी है. अब हमारी अपनी पार्टी को सरकारी बल चाहिए. आप का इस बारे में न कहना हम पसंद नहीं करेंगे.’’

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मंच के भाषण और पत्रकारों के जवाबों से अलग यह सुर मृगांक को अवाक कर गया. क्या अलग परिस्थितियों में राजनेता की सोच अलगअलग होती है? वास्तव में कौन है-पिता या गगन त्रिपाठी? या कि पिता का वास्तविक रूप यही है जो अभीअभी वह देख रहा है. सफल होना और सार्थक होना दोनों अलग बातें हैं, क्यों नहीं लोग सार्थक होने की भी पहल करें. मृगांक के दिल में आंदोलन के तूफान उठने शुरू हुए. वह स्थिर और भावहीन खड़ा रहा फिर भी.

पिता ने आगे कहा, ‘‘बेटा ऐसा हो जो पिता का सहारा बने. जैसा कि आप के अंदाज से लग रहा है, आप अपने मन की करना चाहते हैं. ऐसा है, तो आप को मुझ से सचेत रहना चाहिए.’’ बेटे के रूप में जिस गगन त्रिपाठी ने खुद के पिता की इच्छाओं को किनारे कर दिया, अब मृगांक के लिए उन की बातें कुछ और ही थीं. विशुद्ध राजनीतिज्ञ की तरह एक पिता कहता गया, ‘‘मेरे लोग कई बार आप के बारे में खबर दे चुके हैं कि बिना सोचेसमझे आप लोगों के बीच संत बने फिरते हैं. दूसरे वार्डों, तहसीलों में उन लोगों की मदद कर आते हैं जिन्होंने दूसरी पार्टी के लोगों को जिताया. समझ रहे हैं मेरी बात आप?’’

यह पहला अवसर था जब वह पिता को भलीभांति समझने का प्रयास कर रहा था. इस के पहले वह जो देखतासुनता आया था, गहरे विश्वास की लकीर पर चल कर फकीर बना बैठा था. मृगांक कितना भी कोमल हृदय क्यों न हो, था तो खानदानी पूत ही. वह सख्त हुआ. यह बात और थी कि इस अड़े हुए घोड़े को वह कौन सी दिशा दे. विनम्रता में भी उस ने ठसक नहीं छोड़ी, कहा, ‘‘पिताजी, मैं जो भी सोचता हूं कुछ सोचसमझ कर ही. आप की सलाह मैं ने सुन ली है. अगर मैं कलैक्टर बन भी जाता हूं तो सिवा न्याय और सचाई के, किसी को नाजायज लाभ न दे पाऊंगा. कानों में मेरे न्याय के लिए चीखते लोगों की गूंज होगी तो मैं उन्हें अनसुना कर के न खुद ऐयाशी कर सकता हूं, न दूसरे को ऐयाशी करने में मदद कर सकता हूं.’’

अचानक क्रोध से फट पड़े गगन त्रिपाठी. उन्होंने कहा, ‘‘अरे मूर्ख सम्राट, जो आदर्श का पाठ मैं पढ़ाता रहा हूं, वह राजनीति की बिसात थी. शिकार के लिए फैलाए दानों को तो तू ने भूख का इलाज ही बना लिया. दूर हो जा मेरे सामने से. जिस दिन दिमाग ठिकाने आए, मेरे सामने आना.’’

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आराम से सभ्य शब्दों में बातें करने वाले, लोगों को पिघला कर मक्खन बनाने वाले गगन त्रिपाठी बेटे की बातों से इतने उतावले हो चुके थे कि उन की लोकलुभावन बाहरी परत निकल गई थी. वे असली चेहरे के साथ अब बाहर थे. क्यों न हो, यह तो आस्तीन में ही सांप पालने वाली बात हो गई थी न. राजनीति की इतनी सीढि़यां चढ़ने में उन के दिमाग के पुरजेपुरजे ढीले हो गए थे. और फिर सशक्त खेमे वाले विरोधियों को पछाड़ कर ऊंचाई पर बने रहने की कूवत भी कम माने नहीं रखती.

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