अनबन की खबरों के बीच ऐश्वर्या राय ने बच्चन फैमिली संग मनाई होली, यहां देखें Photos

बौलीवुड के जाने माने कपल ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन के अनबन की खबरें काफी समय पहले से आ रही है, बताया जा रहा था कि दोनों के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है, दोनों एक-दूसरे से अलग होने जा रहे हैं, लेकिन अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन ने इस दावे को बार-बार गलत साबित किया है. अब इसी बीच होली के मौके पर दोनों को साथ होली खेलते देखा गया है. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया वायरल हो रही हैं.


आपको बता दें कि एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन इन दिनों अपनी फिल्मों से ज्यादा पसर्नल लाइफ को लेकर चर्चा में रहती हैं. कपल के बीच कुछ दिनों से अनबन को लेकर खबरें वायरल हो रही थी. लेकिन इन खबरों पर दोनों ने पानी फेर दिया और होली के मौके पर दोनों साथ में होली खेलते दिखाई दिए है, साथ ही बेटी आराध्या भी मस्ती करती हुई नजर आई है. दोनों कपल की होली की तस्वीरें अब खूब वायरल हो रही है. जिसे उनके फैंस काफी पसंद कर रहे है. कपल के साथ फोटो में बाकी कई लोग नजर आ रहे है.


होली पर सामने आई ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन की फोटोज आते ही सोशल मीडिया पर छा गई हैं. इन फोटोज पर फैंस जमकर प्यार लुटा रहे हैं. तो वहीं ट्रोल्स इन फोटोज को देखने के बाद बोलती बंद हो गई हैं. ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन के साथ उनकी बेटी आराध्या का लुक भी लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच रहा है.

तापसी पन्नू ने बॉयफ्रेंड संग रचाई गुपचुप शादी? बैंडमिंटन खिलाड़ी संग लिए सात फेरे!

बौलीवुड में इन दिनों एक्ट्रेस और एक्टर शादी के बंधन में बंधते नजर आ रहे है, एंटरटेनमेंट की दुनिया में शादियों का तांता लग चुका है. ऐसा ही एक ओर कपल शादी के बंधन में बंधता नजर आया है. जी हां, बौलीवुड की एलीगेंट और खूबसूरत एक्ट्रेस तापसी पन्नू शादी के बंधन में बंध गई है. उन्होंने अपने बौयफ्रेंड संग सात फेरे लिए है. जो कि पेशे से बैडमिंटन एथलीट है.


आपको बता दें कि तापसी पन्नू इस समय अपनी प्रोफेशनल नहीं बल्कि पर्सनल लाइफ को लेकर चर्चा में आ गई हैं और उनकी चर्चा में आने की वजह उनकी शादी है जो कि 23 मार्च को उदयपुर में हुई है. इस शादी में केवल परिवार के लोग और करीबी दोस्त शामिल हुए थे. एक्ट्रेस ने अपने बॉयफ्रेंड मैथियास बोए संग शादी की है. तापसी पन्नू की शादी की खबर आने के बाद उनके फैंस काफी खुश हैं. हालांकि, तापसी पन्नू की तरफ से अपनी शादी को लेकर कोई जानकारी नहीं दी गई है.

मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक तापसी पन्नू और मैथियास बोए की शादी जोरशोर से उदयपुर में हुई. इस शादी में सिर्फ परिवार के लोग और करीबी दोस्त शामिल हुए. तापसी पन्नू की प्री-वेडिंग फंक्शन 20 मार्च से शुरू हो गए थे. तापसी पन्नू की शादी को काफी प्राइवेट रखा गया था. ये कपल शादी को लेकर कोई कवरेज या शोर नहीं चाहते थे. जिसके चलते शादी को खास लोगों के साथ सेलिब्रेट किया गया. तापसी पन्नू और मैथियास बोए की शादी में कुछ सेलिब्रिटीज शामिल हुए थे, जिसमें अनुराग कश्यप, पावेल गुलाटी, कनिका ढिल्लों और उनके पति हिमांशु शर्मा का नाम है. तापसी पन्नू और मैथियास बोए की शादी को लेकर कहा जा रहा है कि दोनों ने सिख और ईसाई रीति-रिवाज से शादी की है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Kanika Dhillon (@kanika.d)


बताते चले कि कनिका ढिल्लों ने अपने इंस्टाग्राम अकांउट से तस्वीरें शेयर की हैं. कनिला ढिल्लों ने तस्वीरों के कैप्शन में हैशटैग के साथ लिखा था, ‘मेरे यार की शादी है.’ जिससे अंदाज लगाया जा रहा है कि वह तापसी पन्नू और मैथियास बोए की शादी में शामिल हुई हैं. गौरतलब है कि तापसी पन्नू और मैथियास बोए काफी समय से एक-दूसरे को डेट कर रहे थे. मैथियास बोए बैंडमिंटन खिलाड़ी हैं और साल 2013 में उनकी मुलाकात तापसी पन्नू से हुई थी. हालांकि, तापसी पन्नू और मैथियास बोए ने अपने रिश्ते को लेकर कभी कोई बात नहीं की.

क्या है लोकसभा में बहुमत होने का मतलब

लोकसभा में बहुमत होने का मतलब होता है केंद्र सरकार चलाना और जनता को सही सरकार देना. अफसोस यह है कि बहुमत वाली पार्टी भारतीय जनता पार्टी अपनी सारी ताकत सही सरकार चलाने की जगह पर विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने, परेशान करने में लगी रहती है. पहले कर्नाटक, फिर मध्य प्रदेश, फिर राजस्थान, फिर महाराष्ट्र, फिर झारखंड, फिर बिहार में पिछले 6-8 सालों से लगातार भारतीय जनता पार्टी घुसपैठियों की तरह चुनी हुई सरकारों को गिराने में लगी हुई है.

हो सकता है कि भारतीय जनता पार्टी के मन में पुराणों में बारबार बताए गए चक्रवर्ती राजाओं का खयाल आता हो या कांग्रेस का इतिहास दोहराने की तमन्ना हो. पुराणों में हर राजा अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ता रहता था और नरेंद्र मोदी की सरकार केंद्रीय जांच एजेंसियों के जरीए यह कर रही है. पुराणों के अनुसार भी जो राजा चक्रवर्ती बनने की इच्छा रखने वाले राजा की शरण में बिछ जाता था, वह धर्मप्रिय माना जाता था, निष्कलंक बन जाता था.

अब अरविंद केजरीवाल की मजबूत बहुमत वाली दिल्ली सरकार, जिस पर उपराज्यपाल का घोड़ा हर समय मंडराता रहता है, अपना बहुमत विधानसभा में साबित करने में लगे हैं. यह सोच कि दूसरी पार्टी की सरकार चले ही न, सारे कामों पर काला पानी फेर देती है. लोकतंत्र के बिना यह देश गुलाम बन कर रह जाएगा पर अपनों का नहीं दूसरों का. ज्ञात इतिहास के अनुसार यह देश शायद ही किसी देशी राजा के अंतर्गत रहा है. चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के नाम लिए जाते हैं, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि उन का इतिहास बहुत छोटेछोटे तथ्यों के टुकड़े जोड़ कर गढ़ा गया है और यह कभी पता नहीं चलेगा कि उस में कितना सच है.

मुगलों और अंगरेजों ने इतिहास लिखवाया और उस से साफ है कि हिंदू राजाओं का राज कभी लंबाचौड़ा और विस्तृत नहीं रहा. मराठा, चोल, चालुक्य साम्राज्य हुए पर थोड़े दिन के लिए. लोकतंत्र में गांरटी है कि देश अमेरिका की तरह एक रहेगा, एक केंद्र रहेगा जिस पर पूरी जनता को भरोसा रहेगा, लोगों को अपने अधिकार सुरक्षित लगेंगे, अपनी आस्था (चाहे अंधविश्वास क्यों न हो) सुरक्षित लगेगी, लोग 2-3 पीढि़यों तक की योजना बना सकेंगे.

तोड़फोड़ की राजनीति का नतीजा इसी से दिखता है कि पौराणिक कथाओं में राजाओं के महलों और ऋषियों के आश्रमों के किस्से तो हैं पर नहरों, सड़कों, बाजारों के नहीं. कहीं ऐसा न हो कि चक्रवर्ती बनने की इच्छा भारत को पाकिस्तान, बंगलादेश और अफगानिस्तान के दर्जे पर खड़ा कर दे.

जब घर का ही कोई करे छेड़छाड़

तकरीबन रोजाना ही अखबारों में आने वाली रेप की घटनाएं हम सभी को परेशान करती हैं. कोई बड़ी घटना घट जाती है, तो बरसाती मेंढक की तरह कैंडल मार्च और रेपिस्ट को सजा देने की मांग तेजी से उठने लगती है, पर समय के साथ सब शांत हो जाता है और ‘जैसे थे’ उसी तरह हम सभी अपनी आदत के मुताबिक सबकुछ भूल कर अपनेअपने काम में लग जाते हैं.

खैर, अखबारों में आए रेप के मामलों में कम से कम रेपिस्ट पकड़ा तो जाता है, बाकी इस तरह की न जाने कितनी घटनाएं घर की चारदीवारी में ही घटती हैं, जिन के बारे में किसी को कुछ पता ही नहीं चल पाता. पता चलता भी हो तो अपना होने की आड़ ले कर इस तरह के लोग छूट जाते हैं.

घर में ही छेड़छाड़ और बदसलूकी के मामलों में ज्यादातर टीनएजर्स या कम उम्र के बच्चे शिकार होते हैं. अब तो ऐसे मामलों में लड़के भी महफूज नहीं हैं.

छोटे बच्चों के साथ घर का कोई सदस्य इस तरह का बरताव करता है, तो बच्चा किसी से कहने से डरता है. उस के अंदर ‘मेरी बात कोई नहीं मानेगा तो…? मुझे मारेगा तो…?’ इस तरह का डर ज्यादा होता है.
घर में ही सगेसंबंधियों द्वारा की जाने वाली छेड़छाड़ की घटना में जब कम उम्र के बच्चे शिकार होते हैं, तो उन के अंदर इतनी समझ नहीं होती कि उन के साथ उन के अपने ही यह कैसा बरताव कर
रहे हैं.

उन छोटे बच्चों को कुछ गलत होने का अनुभव तो होता है, पर यह गलत क्या है और इस बरताव के बारे में किस से कहा जाए, इस की समझ नहीं होती.

उन्हें इस बात का भी डर होता है कि मांबाप से कहेंगे तो वे नहीं मानेंगे और उलटा उन्हें ही डांट पड़ेगी. कुछ मामलों में यह भी होता है कि खराब बरताव करने वाला ही मांबाप से न कहने के लिए डराताधमकाता है.

ऐसे मामलों में बच्चों के साथ खराब बरताव करने वाले आदमी को जब पता चलता है कि उस के द्वारा किए गए खराब बरताव की शिकायत बच्चे ने मांबाप से नहीं की है, तो उस का हौसला बढ़ जाता है.
यहां केवल रेप की ही बात नहीं है, गलत तरीके से छूना या खराब इशारे भी इस में शामिल होते हैं. मांबाप इस तरह की शिकायत पुलिस से करने से डरते हैं.

एक एनजीओ के मुताबिक, वैसे तो घरेलू छेड़छाड़ के मामलों में ज्यादातर मांबाप ही ढकने का काम करते हैं. कभीकभी इस तरह के मामले में बच्चा बहुत डर जाता है, जिस की वजह से उस के बरताव में काफी बदलाव आ जाता है. तब मांबाप को साइकोलौजिस्ट की मदद लेनी पड़ती है. दूसरी ओर थाने में इस तरह की शिकायतें कम ही पहुंचती हैं. घर की इज्जत बचाने के चक्कर में घरेलू छेड़छाड़ की शिकायतें मात्र 15 फीसदी ही हो पाती हैं.

इस बारे में पुलिस अफसरों का कहना है कि जब मांबाप अपने बच्चों के साथ खराब बरताव करने वाले से कुछ कहने में खुद को काफी असहज महसूस करते हैं, तो थाने आ कर कहने या शिकायत करने की बात तो बहुत दूर है.

जिस तरह घरेलू हिंसा में थोड़ीबहुत हिंसा होती है, तो ‘औरत को थोड़ा सहन तो करना ही पड़ता है’ यह सोच कर लोग शिकायत नहीं करते, उसी तरह छेड़खानी के मामले में भी ‘ठीक है, अब इस बात को ले कर फजीहत नहीं करवानी, संभल कर चलना चाहिए’ यह सोचने वाले लोग ज्यादा हैं. इस बात को बढ़ाने से कोई फायदा नहीं है, इस तरह की सोच वाले लोग पुलिस तक बात को पहुंचने नहीं देते.

ज्यादातर मामलों में तो यह भी होता है कि लोग जानते ही नहीं कि इस तरह के मामलों में सारी पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाती है, जिस से आगे चल कर कोई परेशानी न हो.

छेड़छाड़ को छिपाने से छेड़छाड़ करने वाले को बढ़ावा ही मिलता है. बच्चे के साथ जब भी कोई घर का आदमी गलत बरताव करता है और बच्चा इस बारे में मांबाप को बताता है, तो उन्हें उस आदमी के खिलाफ कोई न कोई कदम जरूर उठाना चाहिए. उस आदमी को टोकना चाहिए और अगर इस पर भी वह न माने, तो पुलिस में शिकायत करने की धमकी देनी चाहिए.

ऐसा करने पर छेड़छाड़ करने वाला आदमी बदनामी के डर से अपने कदम पीछे खींच लेगा, जबकि मांबाप ऐसे मामलों में बच्चे को छेड़छाड़ करने वाले आदमी से दूर रहने और जो हुआ उसे भूल जाने की सलाह देते हैं.

छेड़छाड़ करने वाला सगा होने की वजह से संबंध बिगड़ेंगे और घर के दूसरे लोगों को पता चल गया तो बात का बतंगड़ बनेगा, इस डर से लोग कुछ कहते नहीं हैं.

मांबाप का यह बरताव बच्चे के दिमाग पर बुरा असर डालता है. बच्चे का अपने मांबाप के ऊपर से विश्वास उठ जाता है, क्योंकि बच्चे को भरोसा होता है कि कम उम्र में अपने साथ होने वाले गलत बरताव से वे उसे बचा लेंगे. अगर ऐसे समय में मांबाप कुछ नहीं करते, तो बच्चा निराश हो जाता है और उस का मांबाप के ऊपर से भरोसा उठ जाता है.

बच्चे के बदले बरताव को समझें. अकसर ऐसा होता है कि बच्चे के साथ जो हो रहा होता है, बच्चा उस बारे में मांबाप से कह नहीं पाता, पर उस के बरताव में यह बात आ जाती है. ऐसे बरताव के बाद बच्चा डराडरा सा रहने लगता है. उस का स्वभाव बदल जाता है. जो आदमी बच्चे के साथ गलत बरताव कर रहा होता है, उस के पास जाने से डरता है. बच्चे के इस बरताव को मांबाप को समझना चाहिए.

टीनएज लड़की या लड़का है, तो उस का भी बरताव बदल जाता है. मातापिता के रूप में अगर आप को अपने बच्चे के बरताव में बदलाव नजर आए, तो उस से प्यार से बात कर के बदलाव की वजह जानने की कोशिश करेंगे, तो यकीनन वह बता देगा.

याद रखिए, घरेलू छेड़छाड़ में बच्चे को अपने मांबाप पर भरोसा होगा तो वह यकीनन उस के साथ क्या गलत हो रहा है, जरूर बताएगा. पर अगर उसे इस बात का डर हुआ कि मांबाप उसे
ही गलत समझेंगे तो वह नहीं बताएगा, इसलिए बच्चे को इस बारे में सही सीख दें.

क्या चाटपपड़ी के धंधे की रील्स बनाकर कमाई की जा सकती है?

सवाल

मैं 19 साल का एक लड़का हूं. मैं सोनीपत में रहता हूं और मैं ने बीए तक की पढ़ाई की है, पर मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि आगे क्या करूं. मेरे पापा की चाटपपड़ी की छोटी सी दुकान है. वे चाहते हैं कि मैं उन का हाथ बंटाऊं. वैसे, आजकल सोशल मीडिया पर बहुत दिखाते हैं कि लोग छोटेछोटे काम से भी काफी पैसा बना रहे हैं. कोई किसी छोलेकुलचे वाले की रील बना रहा है, तो कोई किसी मोमोज बनाने वाले की. क्या चाटपपड़ी का धंधा भी ऐसे ही चमक सकता है?

जवाब

कम लागत से ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है और जल्द से जल्द कमाना है, तो वह अब फूड आइटम से ही मुमकिन है. आप अपने पापा का बिजनैस में हाथ बंटाएं और उस में नएनए प्रयोग करें तो खासा पैसा कमा सकते हैं. हां, इस के लिए आप को मेहनत बहुत करना पड़ेगी और शर्म छोड़ना पड़ेगी. याद रखें कि इस धंधे में साफसफाई की खासी अहमियत है, इस के बाद स्वाद की. इन पर जरूर ध्यान दें.

पुलिस ऐग्जाम: रीवां जिले की एक प्रेम कहानी

‘उत्तर प्रदेश में पुलिस भरती परीक्षा के अभ्यर्थियों के लिए रेलवे का प्रयागराज डिवीजन 20 स्पैशल ट्रेन चला रहा है. प्रयागराज जंक्शन पर माघ मेला हेतु बने ‘यात्री आश्रयों’ को भी खोल दिया गया है…’

मध्य प्रदेश में रीवां जिले में रहने वाले 27 साल के मनोज जाटव को जब यह खबर मिली, तब उस ने राहत की सांस ली. वह भी तो कांस्टेबल की पोस्ट के लिए पिछले 2 साल से कड़ी मेहनत कर रहा था. सतना से प्रयागराज के लिए भी स्पैशल ट्रेन चलाई गई थी.

लंबेचौड़े कद का मनोज गोरे रंग का नौजवान था और अपने मांबाप का एकलौता बेटा भी. वह पढ़ने में काफी होशियार था और गणित के सवाल हल करना तो उस के बाएं हाथ का खेल था.

मनोज के पिता मऊगंज तहसील के एक गांव में खेतीबारी करते थे. ज्यादा जमीन तो नहीं थी, पर जैसेतैसे गुजारा हो जाता था. मनोज रीवां शहर में सरकारी नौकरी की कोचिंग ले रहा था. खाली समय में वह एक गैराज में मोटरसाइकिल की मरम्मत का काम भी देखता था. उसे इस काम में महारत हासिल थी, पर सरकारी नौकरी के तो अपने ही ठाठ होते हैं, फिर पुलिस में तो ‘ऊपरी कमाई’ का जलवा है ही.

मनोज समय पर रेलवे स्टेशन पहुंच गया. सतना से आई ट्रेन ठसाठस भरी हुई थी. इतना बड़ा हुजूम देख कर मनोज ठगा सा रह गया. यह था कांस्टेबल की नौकरी के लिए सरकारी इंतजाम? पर जाना तो था ही, तो उस ने कमर कस ली और जिस भी डब्बे में जगह मिली, वह घुस ही गया.

इतनी भीड़ की वजह यह थी कि उत्तर प्रदेश कांस्टेबल भरती के कुल पद 60,244 थे और तकरीबन 50 लाख नौजवानों ने इन पदों को पाने का आवदेन दे रखा था. इन में से 35 लाख पुरुष और 15 लाख महिला उम्मीदवार थीं यानी एक पद के लिए पुरुष वर्ग में 66, जबकि महिला वर्ग में 125 दावेदार.

इधर, मनोज ट्रेन में घुस तो गया, पर शौचालय से आगे बढ़ ही नहीं पाया. उस ने जैसेतैसे शौचालय के बंद दरवाजे से कमर टिकाई और अपना बैग संभालते हुए खड़ा हो गया.

थोड़ी ही देर में मनोज की नजर एक लड़की पर पड़ी. अच्छे नैननक्श की लंबी, शरीर किसी खिलाड़ी जैसा खिला हुआ और रंगरूप भी बढि़या. पर वह तो जैसे ‘रजिया फंस गई गुंडों में’ वाली हालत में थी.

उस लड़की को कई लड़कों ने जैसे घेर रखा था और इस भयंकर भीड़ का फायदा उठा कर वे उसे मसल रहे थे. एक लड़के ने अपने दोस्त को दबी जबान से कहा भी था, ‘‘रगड़ दे इस की जांघ पर अपना घुटना.’’

मनोज समझ गया था कि यह लड़की काफी देर से इन छिछोरों से जूझ रही है. उस ने अपना दिमाग लगाया और अपना बैग उस लड़की को देते हुए बोला, ‘‘आप अपना बैग यहां नीचे भूल गई हैं. संभाल लें, वरना कोई ले उड़ेगा.’’

वह लड़की पहले तो कुछ समझ नहीं, पर मनोज के दोबारा जोर दे कर कहने पर उस ने वह बैग लिया और अपनी छाती से सटा लिया. इस से उन मनचलों और उस के बीच दूरी बन गई.

तकरीबन सवा 3 घंटे के बाद ट्रेन प्रयागराज स्टेशन पहुंची. मनोज और वह लड़की बड़ी मशक्कत के साथ ट्रेन से बाहर आए.

प्लेटफार्म पर उस लड़की ने मनोज को उस का बैग दिया और बोली, ‘‘थैंक्स. आज आप ने मुझे उन घटिया लड़कों की बेहूदा हरकतों से बचा लिया.

‘‘वैसे, मेरा नाम संतोष यादव है और मैं सतना के पास एक गांव में रहती हूं. आप का क्या नाम है?’’

‘‘जी, मेरा नाम मनोज जाटव है और मैं कांस्टेबल के इम्तिहान के लिए प्रयागराज आया हूं,’’ मनोज ने अपना बैग लेते हुए कहा.

‘‘अच्छा, एससी कोटे से हो. तुम्हारा ऐग्जाम तो क्लियर हो ही जाएगा,’’ संतोष ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘ओह, तो संतोषजी यह सोचती हैं मेरे बारे में. पर शायद आप को पता नहीं है कि मैं हमेशा से होनहार बच्चा रहा हूं. देखना, मैरिट से पास हो जाऊंगा.’’

‘‘खुद पर इतना ज्यादा यकीन… देखते हैं.’’

‘‘अच्छा, तुम्हारी कौन सी शिफ्ट है?’’ मनोज ने बात बदलते हुए कहा, ‘‘मेरी तो सुबह 10 से 12 बजे वाली शिफ्ट है.’’

‘‘मेरी तो दोपहर की. 3 से 5 बजे वाली.’’

‘‘फिर तो हमारी राहें अलग हो जाएंगी,’’ मनोज बोला.

‘‘अभी एकसाथ सफर ही कहां शुरू किया है,’’ संतोष ने स्टेशन से बाहर निकलते हुए कहा.

उस दिन संतोष अपनी सहेली के घर रुकी थी और मनोज एक धर्मशाला में. अगले दिन 17 फरवरी को दोनों का कांस्टेबल का ऐग्जाम था.

अगली सुबह मनोज समय पर सैंटर पहुंच गया था. वहां कड़े इंतजाम थे. जैमर लगा हुआ था. हर तरह की जांचपड़ताल की जा रही थी. सीसीटीवी कैमरे लगे थे और पूरा स्टाफ एकदम चाकचौबंद दिख रहा था.

मनोज का ऐग्जाम बढि़या हुआ था. गणित के सवाल उस के लिए बहुत आसान थे. 150 सवाल पूछे गए थे. इस इम्तिहान में सामान्य हिंदी, सामान्य ज्ञान, संख्यात्मक और मानसिक योग्यता परीक्षण और मानसिक योग्यता, जिस में बुद्धिमत्ता और तर्क शामिल थे. हर गलत जवाब के लिए 0.5 की नैगेटिव मार्किंग होनी थी.

उधर, संतोष अपनी शिफ्ट पर समय से पहुंच गई थी. उस का ऐग्जाम भी ठीकठाक हुआ था. बस, थोड़ा गणित कमजोर रह गया था. शाम को 5 बजे जब वह बाहर निकली, तो मनोज को वहां देख कर हैरान रह गई.

‘‘अरे, पढ़ाकू बच्चा यहां क्या कर रहा है?’’ संतोष ने अपनी खुशी छिपाते हुए कहा.

‘‘शाम 7 बजे की ट्रेन है. सोचा, तुम्हारा हालचाल ले लूं,’’ मनोज बोला.

‘‘ऐग्जाम तो सही रहा. पास हो गई तो फिजिकल में तो बाजी मार ही लूंगी. मेरी जबरदस्त प्रैक्टिस है,’’ संतोष बोली.

‘‘चलो, स्टेशन चलते हैं. समय पर पहुंच कर सीट घेर लेंगे. मुझे अब शौचालय के आगे खड़े हो कर नहीं जाना,’’ मनोज ने कहा.

‘‘भीड़ तो होगी ही. इस अखबार की कटिंग देखो. इस में लिखा है कि राज्य के सभी 75 जिलों के 2,385 केंद्रों पर परीक्षा आयोजित की जा रही है, जहां 48,17,441 अभ्यर्थी परीक्षा देंगे.

‘‘समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों से 6 लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने आवेदन किया है, जिस में बिहार से 2,67,305, हरियाणा से 74,769, झारखंड से 17,112, मध्य प्रदेश से 98,400, दिल्ली से 42,259, उम्मीदवार शामिल हैं. 97,277 राजस्थान से, 14,627 उत्तराखंड से, 5,512 पश्चिम बंगाल से, 3,151 महाराष्ट्र से और 3,404 पंजाब से.’’

‘‘तुम्हें बड़ी अच्छी जानकारी है,’’ मनोज ने ताली बजाते हुए कहा.

‘‘यह मजाक की बात नहीं है. देश में बेरोजगारी की हद है. इस ऐग्जाम में आधे पद तो जनरल और इकोनौमिकली वीकर सैक्शन के हैं. ओबीसी के तकरीबन 16,000, एससी और एसटी के 12,000 पद हैं.

‘‘तुम ही बताओ, जनरल वालों को कांस्टेबल बनने की जरूरत ही क्या है? उन के पास तो बड़ी नौकरी पाने के खूब मौके होते हैं.’’

‘‘बोल तो तुम सही रही हो. अच्छा, बाकी सब छोड़ो… तुम्हारा गणित का ऐग्जाम तो ठीकठाक ही हुआ है, पर तुम्हें अपना मोबाइल नंबर तो अच्छे से याद होगा न?’’

‘‘ओह, तो जनाब को मेरा मोबाइल नंबर चाहिए. बात को इतना घुमा क्यों रहे हो मनोज बाबू,’’ कहते हुए संतोष ने अपना मोबाइल नंबर दे दिया.

मनोज ने उस नंबर पर मिसकाल दे दी और सेव कर लिया. बातें करतेकरते वे दोनों प्रयागराज स्टेशन जा पहुंचे.

इस बार उन दोनों को डब्बे में चढ़ने के बाद जगह तो मिल गई थी, पर भीड़ का आलम तकरीबन वही था. रेलवे के बड़े अफसरों ने कोशिश की थी कि भगदड़ के हालात न बनें.

संतोष और मनोज दोनों सटे हुए खड़े थे, तभी मनोज ने संतोष को देखते हुए कहा, ‘‘क्या यह हमारी पहली और आखिरी मुलाकात है?’’

‘‘ऐसा क्यों कहा?’’ संतोष ने पूछा.

‘‘संतोष, एक बात कहूं?’’ मनोज ने उस के चेहरे के एकदम करीब हो कर कहा.

संतोष का दिल एकदम से धड़क गया. उस का हाथ मनोज के हाथ से छू गया. मनोज ने हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘‘मुझे तुम्हारे साथ हमेशा रहना है. मैं चाहता हूं कि हमारी जिंदगी का सफर भी ऐसे ही एकदूसरे के करीब रह कर गुजरे.’’

इतना सुनते ही संतोष ने अपना सिर मनोज की छाती पर टिका दिया. मनोज का दिल भी ट्रेन की रफ्तार सा दौड़ने लगा था.

‘‘कांस्टेबल के ऐग्जाम के रिजल्ट का इंतजार करते हैं. मनोज, हम 3 बहनें हैं. मैं सब से बड़ी हूं. पिता की आमदनी इतनी ज्यादा नहीं है कि उन से भी अपनी शादी का जिक्र कर सकूं. पहले हमें अपने पैरों पर खड़ा होना होगा,’’ संतोष बोली.

उन दोनों का वापसी का सफर बातों और वादों में गुजर गया. 17 और 18 फरवरी को कांस्टेबल का ऐग्जाम हुआ था. इस के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर वायरल हो गया कि पेपर लीक हुआ था.

हालांकि, सरकार की ओर से कहा गया कि ऐसी अफवाहों पर ध्यान न दें, पर धुआं उठ रहा था, तो कहीं आग जरूर लगी होगी.

दरअसल, इस ऐग्जाम के दौरान तकरीबन 244 ‘सौल्वर’ और ऐग्जाम में सेंध लगाने की कोशिश में जुटे गिरोह के कई लोग पकड़े गए थे. इस मामले में कई जगह एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी.

एक दिन संतोष ने मनोज को फोन किया, ‘‘सुना तुम ने. हमारी सारी मेहनत बेकार गई. पेपर लीक हो गया है. मुझे तो पहले से ही आइडिया था, जब मेरी एक सहेली मीना ने बताया था कि उस ने पैसे दे कर पेपर खरीदा था. काफी पैसे भी दिए थे. तब मुझे लगा था कि वह ऐसे ही बोल रही है, पर अब दाल में काला लग रहा है.’’

दूसरी ओर से मनोज ने कहा, ‘पेपर तो लीक हुआ ही है. पुलिस कई जगह छापेमारी कर रही है. इस मामले में एसओजी सर्विलांस सैल, एसटीएफ यूनिट गोरखपुर और इटावा पुलिस ने 4 आरोपियों को गिरफ्तार किया है. उन के पास से अभ्यर्थियों की मार्कशीट, एडमिट कार्ड, ब्लैंक चैक, मोबाइल फोन और लैपटौप जैसा दूसरा सामान बरामद हुआ है.

‘इस से पहले इस मामले में पेपर लीक के आरोपी नीरज यादव को भी गिरफ्तार किया जा चुका है. वह बलिया का रहने वाला है और पहले मर्चैंट नेवी में नौकरी करता था. हालांकि, बाद में उस ने नौकरी छोड़ दी थी. उसे ही मथुरा के एक शख्स ने ‘आंसर की’ भेजी थी. एसटीएफ इस मामले में भी जांच कर रही है.’

‘‘अरे यार, सुना है कि पेपर के दौरान ही गड़बड़ी करने वाले 244 लोग गिरफ्तार किए गए थे. कहीं कोई दूसरे की जगह बैठ कर ऐग्जाम दे रहा था, तो कहीं कोई ‘सौल्वर गैंग’ पकड़ा गया था. सोशल मीडिया पर पेपर लीक की खबरें भी तैरती रही थीं,’’ संतोष ने अपनी भी जानकारी जोड़ी.

‘मेरी तो पूरी मेहनत मिट्टी में मिल गई. सुना है कि 6 महीने बाद ऐग्जाम दोबारा होगा, पर न जाने क्यों मेरा मन अब सरकारी नौकरी से हट गया है. ये सब गड़बडि़यां भी तो बेरोजगारी को बढ़ाने वाली होती हैं. बहुत से नौजवान हिम्मत हार जाते हैं. कोचिंग में दिए गए उन के पैसे बरबाद हो जाते हैं. मांबाप के सपने पूरे होने से पहले ही टूट जाते हैं,’ मनोज बोला.

‘‘तुम सही कह रहे हो, पर अगर नौकरी नहीं करोगे तो क्या करोगे? हमारा भविष्य दांव पर लग जाएगा,’’ संतोष ने दिल की बात कही.

‘कल मैं सतना आ रहा हूं, तुम स्टेशन पर मिलने आ जाना. फिर बताऊंगा कि हमें क्या करना है,’ मनोज बोला.

‘‘ठीक है,’’ संतोष ने इतना ही कहा और फोन काट दिया.

अगले दिन ट्रेन आने से पहले ही संतोष स्टेशन पर आ चुकी थी. थोड़ी देर में वे दोनों एक चाय स्टाल पर खड़े चाय पी रहे थे.

‘‘संतोष, मैं ने सोच लिया है कि अब मैं बाइक मरम्मत का अपना काम शुरू करूंगा. मेरे एक दोस्त के पास खाली जगह है. उस ने हां बोल दिया है. शुरू में थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी होगी, पर मुझे अपनी बाजुओं पर यकीन है. क्या तुम मेरा साथ दोगी?’’ मनोज ने अपना इरादा जाहिर कर दिया.

संतोष ने मनोज को बड़े गौर से देखा, फिर उस का हाथ कस कर पकड़ते हुए कहा, ‘‘मंजूर है, पर तुम्हारा सारा अकाउंट मैं ही संभालूंगी.’’

‘‘पर, तुम्हारा गणित तो कमजोर है,’’ मनोज ने चुटकी ली.

‘‘प्रेमिका का गणित कमजोर हो सकता है, पर जीवनसाथी का नहीं. समझे मेरे मनोज बाबू,’’ संतोष के इतना कहते ही वे दोनों खिलखिला कर हंस दिए.

‘‘कहां तो हम दोनों कांस्टेबल बन कर अपना और देश का भला करना चाहते थे, पर ऐसा हो नहीं पाया. हमारी तो ‘ऊपरी कमाई’ भी गई,’’ मनोज ने संतोष को कनखियों से देखते हुए कहा.

‘‘सच है, पहले हम दूसरों से रिश्वत लेते और अब जब कोई कांस्टेबल हमारे गैराज पर आएगा, तो उस के हाथ गरम करने पड़ेंगे,’’ संतोष बोली, तो मनोज धीरे से मुसकराया और उस के होंठों को चूम लिया.

दरवाजा खोल दो मां : क्या था चुडै़ल का सच

10 वीं क्लास तक स्मिता पढ़ने में बहुत तेज थी. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था, पर 10वीं के बाद उस के कदम लड़खड़ाने लगे थे. उस को पता नहीं क्यों पढ़ाईलिखाई के बजाय बाहर की दुनिया अपनी ओर खींचने लगी थी. इन्हीं सब वजहों के चलते वह पास में रहने वाली अपनी सहेली सीमा के भाई सपन के चक्कर में फंस गई थी. वह अकसर सीमा से मिलने के बहाने वहां जाती और वे दोनों खूब हंसीमजाक करते थे.

एक दिन सपन ने स्मिता से पूछा, ‘‘तुम ने कभी भूतों को देखा है?’’

‘‘तुम जो हो… तुम से भी बड़ा कोई भूत हो सकता है भला?’’ स्मिता ने हंसते हुए मजाकिया लहजे में जवाब दिया.

सपन को ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी, इसलिए अपनी बात को आगे रखते हुए पूछा, ‘‘चुड़ैल से तो जरूर सामना हुआ होगा?’’

‘‘नहीं, ऐसा कभी नहीं हुआ है. तुम न जाने क्या बोले जा रहे हो,’’ स्मिता ने खीजते हुए कहा.

तब सपन उसे एक कमरे में ले कर गया और कहा, ‘‘मेरी बात ध्यान से सुनो…’’ कहते हुए स्मिता को कुरसी पर बैठा कर उस का हाथ उठा कर हथेली को चेहरे के सामने रखने को कहा, फिर बोला, ‘‘बीच की उंगली को गौर से देखो…’’ आगे कहा, ‘‘अब तुम्हारी उंगलियां फैल रही हैं और आंखें भारी हो रही हैं.’’

स्मिता वैसा ही करती गई और वही महसूस करने की कोशिश भी करती गई. थोड़ी देर में उस की आंखें बंद हो गईं.

फिर स्मिता को एक जगह लेटने को बोला गया और वह उठ कर वहां लेट गई.

सपन ने कहा, ‘‘तुम अपने घर पर हो. एक चुड़ैल तुम्हारे पीछे पड़ी है. वह तुम्हारा खून पीना चाहती है. देखो… देखो… वह तुम्हारे नजदीक आ रही है. स्मिता, तुम डर रही हो.’’

स्मिता को सच में चुड़ैल दिखने लगी. वह बुरी तरह कांप रही थी. तभी सपन बोला, ‘‘तुम्हें क्या दिख रहा है?’’

स्मिता ने जोकुछ भी देखा या समझने की कोशिश की, वह डरतेडरते बता दिया. वह यकीन कर चुकी थी कि चुड़ैल जैसा डरावना कुछ होता है, जो उस को मारना चाहता है.

‘‘प्लीज, मुझे बचाओ. मैं मरना नहीं चाहती,’’ कहते हुए वह जोरजोर से रोने लगी.

सपन मन ही मन बहुत खुश था. सबकुछ उस की सोच के मुताबिक चल रहा था.

सपन ने बड़े ही प्यार से कहा, ‘‘डरो नहीं, मैं हूं न. मेरे एक जानने वाले पंडित हैं. उन से बात कर के बताता हूं. ऐसा करो कि तुम 2 घंटे में मु  झे यहीं मिलना.’’

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए जैसे ही स्मिता मुड़ी, सपन ने उसे टोका, ‘‘और हां, तुम को किसी से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है. मु  झ पर यकीन रखना. सब सही होगा.’’

स्मिता घर तो आ गई, पर वे 2 घंटे बहुत ही मुश्किल से कटे. पर उसे सपन पर यकीन था कि वह कुछ न कुछ तो जरूर करेगा.

जैसे ही समय हुआ, स्मिता फौरन सपन के पास पहुंच गई. सपन तो जैसे इंतजार ही कर रहा था. उस को देखते ही बोला, ‘‘स्मिता, काम तो हो जाएगा, पर…’’

‘‘पर क्या सपन?’’ स्मिता ने डरते हुए पूछा.

‘‘यही कि इस काम के लिए कुछ रुपए और जेवर की जरूरत पड़ेगी. पंडितजी ने खर्चा बताया है. तकरीबन 5,000 रुपए मांगे हैं. पूजा करानी होगी.’’

‘‘5,000 रुपए? अरे, मेरे पास तो 500 रुपए भी नहीं हैं और मैं जेवर कहां से लाऊंगी?’’ स्मिता ने अपनी बात रखी.

‘‘मैं नहीं जानता. मेरे पास तुम्हें चुड़ैल से बचाने का कोई दूसरा रास्ता नहीं है,’’ थोड़ी देर कुछ सोचने का दिखावा करते हुए सपन बोला, ‘‘तुम्हारी मां के जेवर होंगे न? वे ले आओ.’’

‘‘पर… कैसे? वे तो मां के पास हैं,’’ स्मिता ने कहा.

‘‘तुम्हें अपनी मां के सब जेवर मुझे ला कर देने होंगे…’’ सपन ने जोर देते हुए कहा, ‘‘अरे, डरती क्यों हो? काम होने पर वापस ले लेना.’’

स्मिता बोली, ‘‘वे मैं कैसे ला सकती हूं? उन्हें तो मां हर वक्त अपनी तिजोरी में रखती हैं.’’

‘‘मैं नहीं जानता कि तुम यह सब कैसे करोगी. लेकिन तुम को करना ही पड़ेगा. मुझे उस चुड़ैल से बचाने की पूजा करनी है, नहीं तो वह तुम्हें जान से मार देगी.

‘‘अगर तुम जेवर नहीं लाई तो बस समझ लो कि तब मैं तुम्हें जान से मार दूंगा, क्योंकि पंडित ने कहा है कि तुम्हारी जान के बदले वह चुड़ैल मेरी जान ले लेगी और मु  झे अपनी जान थोड़े ही देनी है.’’

उसी शाम स्मिता ने अपनी मां से कहा, ‘‘मां, आज मैं आप का हार पहन कर देखूंगी.’’

स्मिता की मां बोलीं, ‘‘चल हट पगली कहीं की. हार पहनेगी. बड़ी तो हो जा. तेरी शादी में तुझे दे दूंगी.’’

स्मिता को रातभर नींद नहीं आई. थोड़ा सोती भी तो अजीबअजीब से सपने दिखाई देते.

अगले दिन सीमा स्मिता के पास आ कर बोली, ‘‘भैया ने जो चीज तुझ से मंगवाई थी, अब उस की जरूरत नहीं रह गई है. वे सिर्फ तुम्हें बुला रहे हैं.’’

जब स्मिता ने यह सुना तो उसे बहुत खुशी हुई. वह भागती हुई गई तो सपन उसे एक छोटी सी कोठरी में ले गया और बोला, ‘‘अब जेवर की जरूरत नहीं रही. चुड़ैल को तो मैं ने काबू में कर लिया है. चल, तुझे दिखाऊं.’’

स्मिता ने कहा, ‘‘मैं नहीं देखना चाहती.’’

सपन बोला, ‘‘तू डरती क्यों है?’’

यह कह कर उस ने स्मिता का चुंबन ले लिया. स्मिता को उस का चुंबन लेना अच्छा लगा.

थोड़ी देर बाद सपन बोला, ‘‘आज रात को जब सब सो जाएं तो बाहर के दरवाजे की कुंडी चुपचाप से खोल देना. समझ तो गई न कि मैं क्या कहना चाहता हूं? लेकिन किसी को पता न चले, नहीं तो तेरे पिताजी तेरी खाल उतार देंगे.’’

स्मिता ने एकदम से पूछा, ‘‘इस से क्या होगा?’’

सपन ने कहा, ‘‘जिस बात की तुम्हें समझ नहीं, उसे जानने से क्या होगा?’’

स्मिता ने सोचा, ‘जेवर लाने का काम बड़ा मुश्किल था. लेकिन यह काम तो फिर भी आसान है.’

‘‘अगर तू ने यह काम नहीं किया तो चुड़ैल तेरा खून पी जाएगी,’’ सपन ने एक बार फिर डराया.

तब स्मिता ने कहा, ‘‘यह तो बताओ कि दरवाजा खोलने से होगा क्या?’’

‘‘अभी नहीं कल बताऊंगा. बस तुम कुंडी खोल देना,’’ सपन ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा.

‘‘खोल दूंगी,’’ स्मिता ने चलते हुए कहा.

‘‘ठाकुरजी को हाथ में ले कर बोलो कि जैसा मैं बोल रहा हूं, तुम वही करोगी?’’ सपन ने जोर दे कर कहा.

स्मिता ने ठाकुर की मूर्ति को हाथ में ले कर कहा, ‘‘मैं दरवाजा खोल दूंगी.’’

पर सपन को तो अभी भी यकीन नहीं था. पता नहीं क्यों वह फिर से बोला, ‘‘मां की कसम है तुम्हें. कसम खा?’’

आज न जाने क्यों स्मिता बहुत मजबूर महसूस कर रही थी. वह धीरे से बोली, ‘‘मां की कसम.’’ जब स्मिता घर गई तो उस की मां ने पूछा, ‘‘तेरा मुंह इतना लाल क्यों हो रहा है?’’

जब मां ने स्मिता को छू कर देखा तो उसे तेज बुखार था. उन्होंने स्मिता को बिस्तर पर लिटा दिया. शाम के शायद 7 बजे थे. स्मिता के पिता पलंग पर बैठे हुए खाना खा रहे थे. स्मिता पलंग पर पड़ीपड़ी बड़बड़ाए जा रही थी.

जब स्मिता को थर्मामीटर लगाया गया, उस को 102 डिगरी बुखार था. रात के 9 बजतेबजते स्मिता की हालत बहुत खराब हो गई. फौरन डाक्टर को बुलाया गया. स्मिता को दवा दी गई.

स्मिता के पिताजी के दोस्त भी आ गए थे. स्मिता फिर भी बड़बड़ाए जा रही थी, पर उस पर किसी परिवार वाले का ध्यान नहीं जा रहा था.

स्मिता को बिस्तर पर लेटेलेटे, सिर्फ दरवाजा और उस की कुंडी ही दिखाई दे रही थी या उसे चुड़ैल का डर दिखाई दे रहा था. कभीकभी उसे सपन का भी चेहरा दिखाई पड़ता था. उसे लग रहा था, जैसे चारों लोग उसी के आसपास घूम रहे हैं और तभी वह जोर से चीखी, ‘‘मां, मुझे बचाओ.’’

‘‘क्या बात है बेटी?’’ मां ने घबरा कर पूछा.

‘‘दरवाजे की कुंडी खोल दो मां. मां, तुम्हें मेरी कसम. दरवाजे की कुंडी खोल दो, नहीं तो चुड़ैल मुझे मार देगी.

‘‘मां, तुम दरवाजे को खोल दो. मां, मैं अच्छी तो हो जाऊंगी न? मां तुम्हें मेरी कसम,’’ स्मिता बड़बड़ाए जा रही थी.

स्मिता के पिताजी ने कहा, ‘‘लगता है, लड़की बहुत डरी हुई है.’’

स्मिता की बत्तीसी भिंच गई थी. शरीर अकड़ने लगा था. यह सब स्मिता को नहीं पता चला. वह बारबार उठ कर भाग रही थी, जोरजोर से चीख रही थी, ‘‘मां, दरवाजा खोल दो. खोल दो, मां. दरवाजा खोल दो,’’ और उस के बाद वह जोरजोर से रोने लगी.

मां ने कहा, ‘‘बेटी, बात क्या है? बता तो सही? क्या सपन ने कहा है ऐसा करने को?’’

‘‘हां मां, खोल दो नहीं तो एक चुड़ैल आ कर मेरा खून पी जाएगी,’’ स्मिता ने डरी हुई आवाज में कहा.

अब उस के पिताजी के कान खड़े हो गए. उन्होंने फिर से पूछा, ‘‘साफसाफ बताओ, बात क्या है?’’

‘‘पिताजी, मुझे अपनी गोद में लिटा लीजिए, नहीं तो मैं…

‘‘पिताजी, सपन ने कहा है कि जब सब सो जाएं तो चुपके से दरवाजा खोल देना. अगर दरवाजा नहीं खोला तो चुड़ैल मेरा खून पी जाएगी.’’

वहीं ड्राइंगरूम में बैठेबैठे ही स्मिता के पिताजी ने किसी को फोन किया था. शायद पुलिस को. थोड़ी देर में कुछ पुलिस वाले सादा वरदी में एकएक कर के चुपचाप उस के मकान में आ कर दुबक गए और दरवाजे की कुंडी खोल दी गई.

रात के तकरीबन 2 बजे जब स्मिता तकरीबन बेहोशी में थी तो उसे कुछ शोर सुनाई दे रहा था. पर तभी वह बेहोश हो गई. आगे क्या हुआ ठीक से उस को मालूम नहीं. पर जब उसे होश आया तो घर वालों ने बताया कि 5 लोग पकड़े गए हैं.

सब से ज्यादा चौंकाने वाली बात यह कि इन पकड़े गए लोगों में से एक सपन और एक चोरों के गैंग का आदमी भी था जिस के ऊपर सरकारी इनाम था.

बाद में वह इनाम स्मिता को मिला. स्मिता 10 दिनों के बाद अच्छी हो गई. अब स्मिता के अंदर इतना आत्मविश्वास पैदा हो गया था कि एक क्या वह तो कई चुड़ैलों की गरदन पकड़ कर तोड़ सकती थी.

देह : क्यों खौफ में जी रही थी बुधिया

चारपाई पर लेटी हुई बुधिया साफसाफ देख रही थी कि सूरज अब ऊंघने लगा था और दिन की लालिमा मानो रात की कालिमा में तेजी से समाती जा रही थी.

देखते ही देखते अंधेरा घिरने लगा था… बुधिया के आसपास और उस के अंदर भी. लगा जैसे वह कालिमा उस की जिंदगी का एक हिस्सा बन गई है…

एक ऐसा हिस्सा, जिस से चाह कर भी वह अलग नहीं हो सकती. मन किसी व्याकुल पक्षी की तरह तड़प रहा था. अंदर की घुटन और चुभन ने बुधिया को हिला कर रख दिया. समय के क्रूर पंजों में फंसी उलझी बुधिया का मन हाहाकार कर उठा है.

तभी ‘ठक’ की आवाज ने बुधिया को चौंका दिया. उस के तनमन में एक सिहरन सी दौड़ गई. पीछे मुड़ कर देखा तो दीवार का पलस्तर टूट कर नीचे बिखरा पड़ा था. मां की तसवीर भी खूंटी के साथ ही गिरी पड़ी थी जो मलबे के ढेर में दबे किसी निरीह इनसान की तरह ही लग रही थी.

बुधिया को पुराने दिन याद हो आए, जब वह मां की आंखों में वही निरीहता देखा करती थी. शाम को बापू जब दारू के नशे में धुत्त घर पहुंचता था तो मां की छोटी सी गलती पर भी बरस पड़ता था और पीटतेपीटते बेदम कर देता था.

एक बार जवान होती बुधिया के सामने उस के जालिम बाप ने उस की मां को ऐसा पीटा था कि वह घंटों बेहोश पड़ी रही थी.

बुधिया डरीसहमी सी एक कोने में खड़ी रही थी. उस का मन भीतर ही भीतर कराह उठा था.

बुधिया को याद है, उस दिन उस की मां खेत पर गई हुई थी… धान की कटाई में. तभी ‘धड़ाक’ की आवाज के साथ दरवाजा खुला था और उस का दारूखोर बाप अंदर दाखिल हुआ था. आते ही उस ने अपनी सिंदूरी आंखें बुधिया के ऊपर ऐसे गड़ा दी थीं मानो वह उस की बेटी नहीं महज एक देह हो.

‘बापू…’ बस इतना ही निकल पाया था बुधिया की जबान से.

‘आ… हां… सुन… बुधिया…’ बापू जैसे आपे से बाहर हो कर बोले थे, ‘यह दारू की बोतल रख दे…’

‘जी अच्छा…’ किसी मशीन की तरह बुधिया ने सिर हिलाया था और दारू की बोतल अपने बापू के हाथ से ले कर कोने में रख आई थी. उस की आंखों में डर की रेखाएं खिंच आई थीं.

तभी बापू की आवाज किसी हथौड़े की तरह सीधे उसे आ कर लगी थी, ‘बुधिया… वहां खड़ीखड़ी क्या देख रही है… यहां आ कर बैठ… मेरे पास… आ… आ…’

बुधिया को तो जैसे काटो तो खून नहीं. उस की सांसें तेजतेज चलने लगी थीं, धौंकनी की तरह. उस का मन तो किया था कि दरवाजे से बाहर भाग जाए, लेकिन हिम्मत नहीं हुई थी. उसी पल बापू की गरजदार आवाज गूंजी थी, ‘बुधिया…’

न चाहते हुए भी बुधिया उस तरफ बढ़ चली थी, जहां उस का बाप खटिया पर पसरा हुआ था. उस ने   झट से बुधिया का हाथ पकड़ा और अपनी ओर ऐसे खींच लिया था जैसे वह उस की जोरू हो.

‘बापू…’ बुधिया के गले से एक घुटीघुटी सी चीख निकली थी, ‘यह क्या कर रहे हो बापू…’

‘चुप…’ बुधिया का बापू जोर से गरजा और एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के दाएं गाल पर दे मारा था.

बुधिया छटपटा कर रह गई थी. उस में अब विरोध करने की जरा भी ताकत नहीं बची थी. फिर भी वह बहेलिए के जाल में फंसे परिंदे की तरह छूटने की नाकाम कोशिश करती रही थी. थकहार कर उस ने हथियार डाल दिए थे.

उस भूखे भेड़िए के आगे वह चीखती रही, चिल्लाती रही, मगर यह सिलसिला थमा नहीं, चलता रहा था लगातार…

बुधिया ने मां को इस बाबत कई बार बताना चाहा था, मगर बापू की सुलगती सिंदूरी आंखें उस के तनमन में झुरझुरी सी भर देती थीं और उस पर खौफ पसरता चला जाता था, वह भीतर ही भीतर घुटघुट कर जी रही थी.

फिर एक दिन बापू की मार से बेदम हो कर बुधिया की मां ने बिस्तर पकड़ लिया था. महीनों बिस्तर पर पड़ी तड़़पती रही थी वह. और उस दिन जबरदस्त उस के पेट में तेज दर्द उठा. तब बुधिया दौड़ पड़ी थी मंगरू चाचा के घर.

मंगरू चाचा को  झाड़फूंक में महारत हासिल थी.

बुधिया से आने की वजह जान कर मंगरू ने पूछा था, ‘तेरे बापू कहां हैं?’

‘पता नहीं चाचा,’ इतना ही कह पाई थी बुधिया.

‘ठीक है, तुम चलो. मैं आ रहा हूं,’ मंगरू ने कहा तो बुधिया उलटे पैर अपने झोंपड़े में वापस चली आई थी.

थोड़ी ही देर में मंगरू भी आ गया था. उस ने आते ही झाड़फूंक का काम शुरू कर दिया था, लेकिन बुधिया की मां की तबीयत में कोई सुधार आने के बजाय दर्द बढ़ता गया था.

मंगरू अपना काम कर के चला गया और जातेजाते कह गया, ‘बुधिया, मंत्र का असर जैसे ही शुरू होगा, तुम्हारी मां का दर्द भी कम हो जाएगा… तू चिंता मत कर…’

बुधिया को लगा जैसे मंगरू चाचा ठीक ही कह रहा है. वह घंटों इंतजार करती रही लेकिन न तो मंत्र का असर शुरू हुआ और न ही उस की मां के दर्द में कमी आई. देखते ही देखते बुधिया की मां का सारा शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ गया.

आंखें पथराई सी बुधिया को ही देख रही थीं, मानो कुछ कहना चाह रही हों. तब बुधिया फूटफूट कर रोने लगी थी.

उस के बापू देर रात घर तो आए, लेकिन नशे में चूर. अगली सुबह किसी तरह कफनदफन का इंतजाम हुआ था.

बुधिया की यादों का तार टूट कर दोबारा आज से जुड़ गया.

बापू की ज्यादतियों की वजह से बुधिया की जिंदगी तबाह हो गई. पता नहीं, वह कितनी बार मरती है, फिर जीती है… सैकड़ों बार मर चुकी है वह. फिर भी जिंदा है… महज एक लाश बन कर.

बापू के प्रति बुधिया का मन विद्रोह कर उठता है, लेकिन वह खुद को दबाती आ रही है.

मगर आज बुधिया ने मन ही मन एक फैसला कर लिया. यहां से दूर भाग जाएगी वह… बहुत दूर… जहां बापू की नजर उस तक कभी नहीं पहुंच पाएगी.

अगले दिन बुधिया मास्टरनी के यहां गई कि वह अपने ऊपर हुई ज्यादतियों की सारी कहानी उन्हें बता देगी. मास्टरनी का नाम कलावती था, मगर सारा गांव उन्हें मास्टरनी के नाम से ही जानता है.

कलावती गांव के ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ाती हैं. बुधिया को भी उन्होंने ही पढ़ाया था. यह बात और है कि बुधिया 2 जमात से ज्यादा पढ़ नहीं पाई थी.

‘‘क्या बात है बुधिया? कुछ बोलो तो सही… जब से तुम आई हो, तब से रोए जा रही हो. आखिर बात क्या हो गई?’’

मास्टरनी ने पूछा तो बुधिया का गला भर आया. उस के मुंह से निकला, ‘मास्टरनीजी.’’

‘‘हां… हां… बताओ बुधिया… मैं वादा करती हूं, तुम्हारी मदद करूंगी,’’ मास्टरनी ने कहा तो बुधिया ने बताया, ‘‘मास्टरनीजी… उस ने हम को खराब किया… हमारे साथ गंदा… काम…’’ सुन कर मास्टरनी की भौंहें तन गईं. वे बुधिया की बात बीच में ही काट कर बोलीं, ‘‘किस ने किया तुम्हारे साथ गलत काम?’’

‘‘बापू ने…’’ और बुधिया सबकुछ सिलसिलेवार बताती चली गई.

मास्टरनी कलावती की आंखें फटी की फटी रह गईं और चेहरे पर हैरानी की लकीरें गहराती गईं. फिर वे बोलीं, ‘‘तुम्हारा बाप इनसान है या जानवर… उसे तो चुल्लूभर पानी में डूब मरना चाहिए. उस ने अपनी बेटी को खराब किया.

‘‘खैर, तू चिंता मत कर बुधिया. तू आज शाम की गाड़ी से मेरे साथ शहर चल. वहां मेरी बेटी और दामाद रहते हैं. तू वहीं रह कर उन के काम करना, बच्चे संभालना. तुम्हें भरपेट खाना और कपड़ा मिलता रहेगा. वहां तू पूरी तरह महफूज रहेगी.’’

बुधिया का सिर मास्टरनी के प्रति इज्जत से झुक गया.

नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर उतरते ही बुधिया को लगा जैसे वह किसी नई दुनिया में आ गई हो. सबकुछ अलग और शानदार था.

बुधिया बस में बैठ कर गगनचुंबी इमारतों को ऐसे देख रही थी मानो कोई अजूबा हो.

तभी मास्टरनीजी ने एक बड़ी इमारत की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘‘देख बुधिया… यहां औरतमर्द सब एकसाथ कंधे से कंधा मिला कर काम करते हैं.’’

‘‘सच…’’ बुधिया को जैसे हैरानी हुई. उस का अल्हड़ व गंवई मन पता नहीं क्याक्या कयास लगाता रहा.

बस एक झटके से रुकी तो मास्टरनी के साथ वह वहीं उतर पड़ी.

चंद कदमों का फासला तय करने के बाद वे दोनों एक बड़ी व खूबसूरत कोठी के सामने पहुंचीं. फिर एक बड़े से फाटक के अंदर बुधिया मास्टरनीजी के साथ ही दाखिल हो गई.

बुधिया की आंखें अंदर की सजावट देख कर फटी की फटी रह गईं.

मास्टरनीजी ने एक मौडर्न औरत से बुधिया का परिचय कराया और कुछ जरूरी हिदायतें दे कर शाम की गाड़ी से ही वे गांव वापस लौट गईं.

शहर की आबोहवा में बुधिया खुद को महफूज सम  झने लगी. कोठी के चारों तरफ खड़ी कंक्रीट की मजबूत दीवारें और लोहे की सलाखें उसे अपनी हिफाजत के प्रति आश्वस्त करती थीं.

बेफिक्री के आलम से गुजरता बुधिया का भरम रेत के घरौंदे की तरह भरभरा कर तब टूटा जब उसे उस दिन कोठी के मालिक हरिशंकर बाबू ने मौका देख कर अपने कमरे में बुलाया और देखते ही देखते भेडि़या बन गया. बुधिया को अपना दारूबाज बाप याद हो आया.

नशे में चूर… सिंदूरी आंखें और उन में कुलबुलाते वासना के कीड़े. कहां बचा पाई बुधिया उस दिन भी खुद को हरिशंकर बाबू के आगोश से.

कंक्रीट की दीवारें और लोहे की मजबूत सलाखों को अपना सुरक्षा घेरा मान बैठी बुधिया को अब वह छलावे की तरह लगने लगा और फिर एक रात उस ने देखा कि नितिन और श्वेता अपने कमरे में अमरबेल की तरह एकदूसरे

से लिपटे बेजा हरकतें कर रहे थे. टैलीविजन पर किसी गंदी फिल्म के बेहूदा सीन चल रहे थे.

‘‘ये दोनों सगे भाईबहन हैं या…’’ बुदबुदाते हुए बुधिया अपने कमरे में चली आई.

सुबह हरिशंकर बाबू की पत्नी अपनी बड़ी बेटी को समझा रही थीं, ‘‘देख… कालेज जाते वक्त सावधान रहा कर. दिल्ली में हर दिन लड़कियों के साथ छेड़छाड़ व बलात्कार की वारदातें बढ़ रही हैं. तू जबजब बाहर निकलती है तो मेरा मन घबराता रहता है. पता नहीं, क्या हो गया है इस शहर को.’’

बुधिया छोटी मालकिन की बातों पर मन ही मन हंस पड़ी. उसे सारे रिश्तेनाते बेमानी लगने लगे. वह जिस घर को, जिस शहर को अपने लिए महफूज समझ रही थी, वही उसे महफूज नहीं लग रहा था.

बुधिया के सामने एक अबूझ सवाल तलवार की तरह लटकता सा लगता था कि क्या औरत का मतलब देह है, सिर्फ देह?

गैस की कालाबाजारी: प्यार की अनोखी जोड़ी

उत्तराखंड के काफी खूबरसूरत लैंसडाउन इलाके में बहुत से सैलानी आते हैं. वहां का मौसम है ही इतना खुशनुमा कि शहरी लोगों को अपनी तरफ खींच ही लेता है. इसी के चलते वहां बहुत से छोटेबड़े होटल, ढाबे और रैस्टोरैंट बन गए हैं. अब तो रिजौर्ट भी खूब दिखने लगे हैं.

इसी लैंसडाउन इलाके में बनी एक गैस एजेंसी से जुड़े दर्जनों गांवों में लोग आज भी वहां गैस की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. वजह, काफी समय से चैलूसैंण गांव के अलावा पाली, शीला, सुराड़ी, धुरा, सिलोगी, बाघों, अमलेशा और रिंगालपानी जैसे बहुत से गांवों में घरेलू गैस नहीं पहुंच पा रही थी.

‘‘अरे, यहां जमा हो कर क्या होगा. गैस एजेंसी का मालिक कालाबाजारी का शातिर खिलाड़ी है. वह घरेलू गैस को तिकड़मबाजी से होटल, ढाबे और रैस्टोरैंट वालों को बेच देता है और भारी मुनाफा कमाता है,’’ सिलोगी गांव के पान सिंह ने कहा.

‘‘केंद्र की मोदी सरकार कितना भी दावा कर ले कि ‘न खाएंगे और न खाने देंगे’, पर कालाबाजारी हद पर है और नेताओं की नाक के नीचे सब गोरखधंधा हो रहा है,’’ सुराड़ी के नरेंद्र सिंह ने कहा और गुस्से में सड़क पर ही थूक दिया.

पाली गांव के दर्शन कुमार ने दबी जबान में कहा, ‘‘शहर में पैट्रोमैक्स (छोटे गैस सिलैंडर) में गैस रिफिल का धंधा भी जोरों पर चल रहा है. शहर में गैस की सप्लाई सामान्य हो या फिर कितनी भी किल्लत चल रही हो, लेकिन पैट्रोमैक्स में आसानी से गैस मिल जाती है.

‘‘इन पैट्रोमैक्सों में 100 रुपए किलो गैस बेची जाती है. साफ है कि 450 रुपए का गैस सिलैंडर रिफिल कर के 1,600 रुपए में बिक रहा है. आखिर इन को कहां से सिलैंडर मिल रहे हैं?’’

धुरा गांव के संदीप सिंह ने नया ही बम फोड़ा, ‘‘हरिद्वार की खबर नहीं सुनी क्या तुम लोगों ने… वहां तो उज्ज्वला योजना में ही फर्जीवाड़ा सामने आया है. लोग फर्जी दस्तावेज लगा कर मुफ्त कनैक्शन और सब्सिडी पा रहे हैं. इन में ऐसे लोग

भी शामिल हैं, जिन के पास अपनी कार है. खुद को गरीब दिखा कर हम जैसों के पेट पर लात मारते हैं.’’

‘‘हां, मैं ने भी यह खबर पढ़ी थी. हरिद्वार जिले में डेढ़ लाख ऐसे कनैक्शनों की जांच हो रही है. पुष्पक गैस एजेंसी के मैनेजर राकेश सिंह के मुताबिक, कई उपभोक्ताओं की मौत हो चुकी है, फिर भी कनैक्शन से सप्लाई और सब्सिडी जारी हो

रही है,’’ चैलूसैंण गांव के हिम्मत सिंह ने बताया.

‘‘सरकार धार्मिक जगहों को तो संवार रही है, सड़कें और सुरंगें बनाने के दावे कर रही है, पर पहाड़ की गरीब जनता की सुध नहीं ले रही है. हमारे गांव के गांव खाली हो रहे हैं, पर सरकार चाहती है कि रिजौर्ट में अमीर लोग खूब आते रहें.

‘‘अरे, जब उन की सेवा करने के लिए पहाड़ी लोग ही नहीं बचेंगे, तो वे क्या खाक हमारी वादियों का मजा ले पाएंगे. एक मैगी बनाने वाले को भी सस्ता सिलैंडर चाहिए, लेकिन इस कालाबाजारी ने सब बेड़ा गर्क कर के रख दिया है,’’ पास खड़े मैगी बनाने वाले पवन राजपूत ने अपना दर्द बयां किया.

इन सब लोगों में 23 साल का प्रेम रावत भी शामिल था, जो अमलेशा गांव में रहता था. यह गांव पौड़ीगढ़वाल जिले के जयहरीखाल ब्लौक और लैंसडाउन तहसील में था, जो अमकटाला ग्राम पंचायत के तहत आता था. इस गांव का भौगोलिक क्षेत्रफल 114.41 हैक्टेयर था.

ऐसा बताया जाता है कि अमलेशा गांव की कुल आबादी 151 थी, जिस में 44 परिवार शामिल थे. प्रेम रावत का परिवार भी उन में से एक था. घर कच्चा था और रोजगार की कमी. खेती से मुश्किल से गुजारा होता था और बीए करने के बावजूद प्रेम रावत को उत्तराखंड में ही कहीं अच्छी नौकरी नहीं मिल पा रही थी. वह अपने दोस्तों की तरह दिल्ली के होटलों में बरतन घिस कर अपनी जिंदगी को नरक नहीं बनाना चाहता था.

प्रेम रावत भी घरेलू गैस सिलैंडर पाने की आस में गैस एजेंसी आया था, पर नतीजा वही ढाक के तीन पात. प्रदेश में ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ शुरू होने के बाद घरघर गैस सिलैंडर तो पहुंच गए हैं, लेकिन पर्वतीय इलाकों में अब भी सिलैंडर रिफिल कराने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था या कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था. ऊपर से कालाबाजारी कोढ़ पर खाज साबित हो रही थी.

प्रेम रावत को आज भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा था. उसे अपनी मां कटोरी देवी की याद आ गई, जिस की धुएं की वजह से फेफड़े और आंखें कमजोर हो गई थीं. पिता श्याम सिंह रावत की आमदनी से किसी तरह घर का खर्च चलता था. कमाई के आधे से ज्यादा रुपए लकड़ीचूल्हा में खर्च हो जाते थे.

प्रेम अभी गांव की बस का इंतजार कर ही रहा था कि उसे अपने ही गांव की ज्योति नयाल आती दिखी. वह 22 साल की जवान लड़की थी. दुबलीपतली, पर बहुत गोरी और खूबसूरत. प्रेम उस के रूप का दीवाना था.

ज्योति अपने पिता के साथ खेतीबारी में हाथ बंटाती थी और उस ने अपने घर में एक बड़े कमरे में मशरूम की खेती भी कर रखी थी. उस के उगाए मशरूम लोकल होटल में सप्लाई होते थे.

प्रेम और ज्योति बस का इंतजार करने लगे. आज प्रेम सोच रहा था कि वह ज्योति से अपने दिल की बात कह देगा, पर उसे शक था कि क्या ज्योति एक बेरोजगार के प्यार को अपना लेगी?

‘‘बड़े दिनों में नजर आई. कहां रहती हो आजकल? कोई खैरखबर नहीं,’’ प्रेम ने पूछा.

ज्योति ने एक नजर उसे देखा और बोली, ‘‘सारी खैरखबर मैं ही लूं? तुम भी तो फोन कर सकते थे. अभी मैं मशरूम सप्लाई कर के आ रही हूं.

‘‘लैंसडाउन में आज भी गैस कंपनी के आगे लोगों की भीड़ जमा थी. गांव वालों को घरेलू गैस चूल्हे की सप्लाई नहीं हो रही है. बड़ी दिक्कत होने लगी है. तुम तो जानते ही हो कि जंगल से जलावन लकड़ी लाने में औरतों को कितना खतरा रहता है,’’ ज्योति ने कहा.

‘‘पिछले साल के दिसंबर महीने की ही तो खबर है, जब लैंसडाउन वन प्रभाग के दुगड्डा रेंज के तहत टाटरी गांव में भालू के हमले से एक औरत गंभीर रूप से घायल हो गई थी.

‘‘खबर में बताया गया था कि टाटरी गांव की कुसुम देवी जंगल में चारा लेने गई थी कि तभी भालू ने उस पर हमला बोल दिया. वह तो भला हो कि कुसुम देवी ने दरांती से भालू पर जोरदार हमला किया और अपनी जान बचा ली, वरना कुछ भी हो सकता था,’’ प्रेम ने ज्योति के डर को खबर का जामा पहना दिया.

ज्योति का मूड खराब हो गया. बस भी तो नहीं आ रही थी. इतने में उन्हीं के गांव का राम सिंह वहां आ गया, जो एक होटल में कुक था. वह गढ़वाली खाना बनाने में माहिर था.

राम सिंह को देख प्रेम ने कहा, ‘‘इन लोगों के चलते घरेलू गैस की कालाबाजारी होती है. हमारे हिस्से के सिलैंडर ये लोग हड़प लेते हैं.’’

यह सुन कर राम सिंह चिढ़ गया और प्रेम का गरीबान पकड़ लिया और डपट कर बोला, ‘‘इतना ही दर्द हो रहा है तो गैस एजेंसी फूंक दो न. वे लोग ही कालाबाजारी करते हैं. अगर किसी को घरबैठे सिलैंडर मिल जाए, तो कोई पागल ही होगा जो मना करेगा.’’

ज्योति ने चिल्लाते हुए कहा, ‘‘छोड़ इसे. नौकरी के नशे में इतने भी मत उड़ो कि आसापास का कुछ भी न दिखे. अपनी ताकत खाना बनाने के लिए बचा कर रखो. घर पर भी रसोई बनानी होगी.’’

राम सिंह ने प्रेम को तो छोड़ दिया, पर ज्योति को घूरते हुए बोला, ‘‘सब सम?ाता हूं कि तुम दोनों में क्या खिचड़ी पक रही है. पूरे पहाड़ पर गूंज रही तेरी और प्रेम की लवस्टोरी.’’

‘‘तो तेरे पेट में क्यों दर्द हो रहा है? लगता है, आज होटल में देशी दारू नहीं मिली, जो मरोड़ उठ रही है,’’ ज्योति ने खरीखरी सुना दी.

राम सिंह गुस्से में पैर पटकता हुआ चला गया. प्रेम को अंदाजा नहीं था कि राम सिंह इस तरह की बात बोल देगा. वह डर गया. उसे लगा कि ज्योति को बुरा लगा होगा. वह चुप ही रहा.

इतने में बस आ गई. ज्योति बोली, ‘‘चलना है कि नहीं या यहीं बुत बने खड़े रहोगे?’’

प्रेम बस में चढ़ गया. ज्यादा भीड़ नहीं थी. उन्हें सीट मिल गई. दोपहर के 3 बजे थे. वे शाम तक घर पहुंच जाते. ड्राइवर ने गढ़वाली गाना ‘मेरी प्यारी सुशीला’ बजा रखा था.

सीट पर बैठते ही ज्योति ने प्रेम के कंधे पर सिर टिका दिया और अपनी आंखें बंद कर लीं. प्रेम की बांछें खिल गईं. उस ने ज्योति का हाथ पकड़ लिया. ज्योति आंखें बंद किए ही मुसकरा दी. इस के बाद पता ही नहीं चला कि कब उन का गांव आ गया.

ज्योति से विदा ले कर प्रेम अपने घर पहुंचा. मां रसोई में दालभात पका रही थीं. वहां नया भरा गैस चूल्हा देख कर प्रेम हैरत में पड़ गया.

‘‘यह नया चूल्हा कौन लाया?’’ प्रेम ने अपनी मां से पूछा.

‘‘तेरे पिताजी. बस, दलाल को 300 रुपए ऊपर से दिए. बोले कि कब तक लकड़ी के धुएं में अपनी आंखें फोड़ती रहेगी.

‘‘बेटा, अब जल्दी से कोई नौकरी देख कर ब्याह कर ले और मेरे लिए कमेरी बहू ले आ. अब मैं थक चुकी हूं अकेले काम करतेकरते,’’ इतना कह कर मां चूल्हे में फूंकनी से आंच तेज करने लगीं.

प्रेम छत पर चला गया. उसे ज्योति की याद आ गई. उस ने मन ही मन राम सिंह का शुक्रिया अदा किया, जिस ने आज ऐसा सच बोला, जो घरेलू गैस की कालाबाजारी से ज्यादा बड़ा था, पर उतना घिनौना नहीं. इस सच ने तो ज्योति और प्रेम को और नजदीक ला दिया था.

छत से तारों को देखता हुआ प्रेम नई जिंदगी के सपनों में खो गया. पड़ोस के घर पर रेडियो में वही गढ़वाली गाना ‘मेरी प्यारी सुशीला’ बज रहा था.

Holi 2024 – रंग दे चुनरिया: क्या एक हो पाए गौरी-श्याम

वह बड़ा सा मकान किसी दुलहन की तरह सजा हुआ था. ऐसा लग रहा था, जैसे वहां बरात आई है. दूर से देखने पर ऐसा जान पड़ता था, जैसे हजारों तारे आकाश में एकसाथ टिमटिमा रहे हों. छोटेछोटे बल्ब जुगनुओं की तरह चमक रहे थे. लेकिन श्याम की नजर उस लड़की पर थी, जो उस के दिल की गहराइयों में उतरती चली गई थी. वह कोई और नहीं, बल्कि उस की भाभी की बहन गौरी थी. खूबसूरत चेहरा, प्यारी आंखें, नाक में चमकता हीरा और गोरेगोरे हाथों में मेहंदी का रंग उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहा था. श्याम उसे अपना दिल दे बैठा था. उस ने महसूस किया कि गौरी के बिना उस की जिंदगी अधूरी है.

गौरी कभीकभार तिरछी नजरों से उसे देख लेती. एक बार दोनों की नजरें आपस में मिलीं, तो वह मुसकरा दी. तभी भाभी ने उसे पुकारा, ‘‘श्याम?’’

‘‘जी हां, भाभी…’’ उसे लगा कि भाभी ने उस की चोरी पकड़ ली है. ‘‘क्या बात है, आज तुम उदास क्यों हो? कहीं किसी ने हमारे देवरजी का दिल तो नहीं चुरा लिया?’’

‘‘नहीं भाभी, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ वह अपनी घबराहट को छिपाने के लिए रूमाल निकाल कर पसीना पोंछने लगा.

श्याम अपनी भाभी के जन्मदिन पर उन के साथ उन के मायके गया था, लेकिन उसे क्या पता था कि यहां आते ही उसे प्रेम रोग लग जाएगा. गौरी सुंदर थी, इसलिए उस के मन को भा गई और वह उस पर दिलोजान से फिदा हो गया. अपने प्यार का इजहार करने के बारे में वह सोच रहा था कि क्या भाभी उसे अपनी देवरानी बनाने के लिए तैयार होंगी. भाभी अगर तैयार भी हो जाएं, तो क्या भैया होंगे? देर रात तक वह यही सोचता रहा.

अगले दिन श्याम चुपके से गौरी के कमरे में पहुंचा. वहां वह खिड़की खोल कर बाहर का नजारा देख रही थी. वह उस की आंख बंद कर उभारों से हरकत करते हुए बोला, ‘‘कैसा लगा गौरी?’’ गौरी खड़ी होती हुई बोली, ‘‘श्याम, ऐसी हरकतों से मुझे सख्त नफरत है.’’

‘‘ओह गौरी, मैं कोई पराया थोड़े ही हूं.’’

‘‘मैं दीदी और जीजाजी से शिकायत करूंगी.’’ ‘‘गौरी, मुझे साफ कर दो. आइंदा, मैं कभी ऐसी हरकत नहीं करूंगा.’’

‘‘मैं अभी दीदी को बुला कर लाती हूं,’’ कह कर गौरी फीकी मुसकान के साथ वहां से चली गई. श्याम का मोह भंग हुआ. उसे लगा कि गौरी को उस से प्यार नहीं है. वह अब तक उस से एकतरफा प्यार कर रहा था. लेकिन अब क्या होगा? कुछ देर बाद भाभी यहां पहुंच जाएंगी, फिर सारी पोल खुल जाएगी. खैर, बाद में जो होगा देख लेंगे… सोच कर उस ने गौरी के नाम एक खत लिख कर तकिए के नीचे रख दिया और अपने गांव चल दिया.

गौरी आधे घंटे बाद चाय ले कर जब कमरे में पहुंची, तो उस का दिल धकधक करने लगा. एक अनजान ताकत उस के मन को बेचैन कर रही थी कि आखिर श्याम कहां चला गया. लेकिन तभी उस की नजर तकिए के नीचे दबे कागज पर गई. वह उसे उठा कर पढ़ने लगी:

‘प्रिय गौरी, खुश रहो. ‘मैं अपने किए पर बहुत पछताया, लेकिन तुम भी पता नहीं किस पत्थर की बनी हो, जो मेरे लाख माफी मांगने के बावजूद भैया और भाभी से कहने के लिए चली गईं. पता नहीं, क्यों मैं तुम्हारे साथ गलत हरकत कर बैठा? मैं गांव जा रहा हूं. जब भैया वापस आएंगे, तो मेरी खैर नहीं.

‘गौरी, मैं ने अपनी जिंदगी में सिर्फ तुम्हीं को चाहा, लेकिन मुझे मालूम न था कि मेरा प्यार एकतरफा है. काश, यह बात पहले मेरी समझ में आ जाती. ‘अच्छा गौरी, हो सके तो मुझे माफ कर देना. मैं रो कर सब्र कर लूंगा कि अपनी जिंदगी में पहली बार किसी को चाहा था.

‘तुम्हारा श्याम.’ गौरी की आंखों से पछतावे के आंसू बहने लगे. चाय का प्याला जैसे ही उठाया, वैसे ही गिर कर टुकड़ेटुकड़े हो गया. उसे ऐसा लगा कि किसी ने उस के दिल के हजार टुकड़े कर दिए. उस ने कभी सोचा भी न होगा कि श्याम अपने भैया और भाभी की इतनी इज्जत करता है.

तभी उस की दीदी कमरे में आई, ‘‘क्या बात है गौरी, यह प्याला कैसे टूट गया. श्याम कहां है?’’ आते ही दीदी ने सवालों की झड़ी लगा दी. अचानक उस की निगाह गौरी के हाथ में बंद कागज पर चली गई, जिसे वह छिपाने की कोशिश कर रही थी. वह खत ले कर पढ़ने लगी.

‘‘तो यह बात है…’’ ‘‘नहीं दीदी, वह तो श्याम,’’ गौरी अपनी बात पूरी नहीं कर सकी.

‘‘अरे, तेरी आवाज में कंपन क्यों पैदा हो गया. प्यार करना कोई बुरी बात नहीं है. एक बात बताओ गौरी, क्या तुम भी उस से प्यार करती हो?’’ गौरी ने नजरें झुका लीं, जो इस

बात की गवाह थीं कि उसे भी श्याम से प्यार है. ‘‘लेकिन गौरी, श्याम कहां चला गया?’’

गौरी ने रोते हुए सारी बातें बता दीं. यह सब सुन कर गौरी की बहन खूब हंसी और बोली, ‘‘गौरी, अगर मैं तुम्हें अपनी देवरानी बना लूंगी, तो तुम मेरा हुक्म माना करोगी या नहीं?’’

‘‘दीदी, मैं नहीं जानती थी कि मेरी झूठी धमकी को श्याम इतनी गंभीरता से लेगा. मैं जिंदगीभर तुम्हारी दासी बन कर रहूंगी, लेकिन श्याम के रूप में मुझे मेरी खुशियां लौटा दो. वह मुझे बेवफा समझ रहा होगा.’’ इस के बाद दोनों बहनें काफी देर तक बातें करती रहीं.

श्याम की भाभी जब अपनी ससुराल लौटीं, तो गौरी को भी साथ ले आईं. श्याम घर में नहीं था. जैसे ही उस ने शाम को घर में कदम रखा, तो सामने गौरी को देखा, तो मायूस हो कर बोला, ‘‘गौरी, क्या भाभी और भैया अंदर हैं?’’

‘‘हां, अंदर ही हैं.’’ यह सुन कर जैसे ही श्याम लौटने लगा, तो गौरी ने उस की कलाई पकड़ ली और बोली, ‘‘प्यार करने वाले इतने कायर नहीं हुआ करते श्याम. मैं सच में तुम से प्यार करती हूं.’’

‘‘गौरी मेरा हाथ छोड़ दो, वरना भैया देख लेंगे.’’ ‘‘मैं ने सब सुन लिया है बरखुरदार, तुम दोनों अंदर आ जाओ.’’

आवाज सुन कर दोनों ने नजरें उठा कर देखा, तो सामने श्याम का बड़ा भाई खड़ा था. ‘‘मेरे डरपोक देवरजी, अंदर आ जाइए,’’ अंदर से श्याम की भाभी ने आवाज दी.

इस तरह श्याम और गौरी की शादी धूमधाम से हो गई. इस साल होली का त्योहार दोनों के लिए खुशियां ले कर आया.

होली के दिन गौरी ने श्याम के कपड़ों पर जगहजगह मन भर कर रंग लगाया. ‘‘गौरी, आज तेरी चुनरी की जगह गालों को लाल करूंगा,’’ कह कर श्याम भी गौरी की तरफ बढ़ा.

तब ‘डरपोक पिया, रंग दे चुनरिया’ कह कर गौरी ने शर्म से अपना चेहरा हाथों से ढक लिया.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें