बियर्ड पाने के ये है पांच आसान ट्रिक, मिलेगा kGF स्टार जैसा मॉचो लुक

लड़को में आजकल बियर्ड रखने का फैशन चल रहा है हर कोई चाहता है कि वो बियर्ड लुक कैरी करें. जिसके लिए वो चाहते है कि घनी दाढ़ी आएं, घने बाल आएं जिससे वो बियर्ड रख सकें, और ये लुक ज्यादातर फिल्मों से लिए जाते है, उदाहरण के तौर पर केजीएफ स्टार रॉकी (यश) का  बियर्ड लुक लोगों में काफी फेमस हुआ था, जिसे देख हर कोई उनके जैसी घनी दाढ़ी लुक कैरी करने लगा था, तो आज हम कुछ ऐसे ही टिप्स बताएंगे, जो आपको घनी दाड़ी रखने के लिए काम आएंगे.

1. क्लीनिंग और मॉइस्चराइजिंग करना है जरुरी 

बियर्ड ग्रोथ के लिए सिर्फ दाढी को धोने और मॉइश्चराइज करने से मदद नहीं मिलेंगी, लेकिन ऐसा करने से दाढ़ी के रोमछिद्र पर लगी हुई गंदगी और शुष्क त्वचा को हटाने में मदद मिलेगी और मॉइस्चराइज करने से बालों के नीचे की त्वचा को हाइड्रेट रखने में मदद मिलेगी.

2. दाढ़ी का तेल/लोशन/बाम 

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुई है कि बियर्ड ऑयल, लोशन और बाम वास्तव में तेजी से दाढ़ी की ग्रोथ में मदद कर सकते हैं. लेकिन हां, ये प्रोडक्ट बियर्ड को मॉइस्चराइज करने और उभरा हुआ दिखने में मदद करते हैं, जिससे बियर्ड दिखने में काफी अच्छी लगती है. इसके अलावा इन प्रोडक्ट से दाढ़ी में मालिश करने से चेहरे के ब्लड सर्कुलेशन में मदद मिलती है जो कि बियर्ड ग्रोथ में मदद कर सकती है.

3. पोषण पर ध्यान दें

यदि आपकी डाइट खराब है तो आप भले ही कितने भी महंगे से महंगे लोशन और क्रीम लगा लीजिए, आपको कोई अंतर नहीं दिखेगा. इसलिए बियर्ड ग्रोथ के लिए अपने न्यूट्रिशन पर ध्यान देना काफी जरूरी है. अगर आप ऐसा करते हैं तो जाहिर सी बात है कि हेल्दी और शाइनिंग वाली बियर्ड पाने मदद मिलेगी. तेजी से दाढ़ी बढ़ाने के लिए डाइट में भरपूर मात्रा में प्रोटीन, आयरन और जिंक से भरपूर खाद्य पदार्थ, साबुत अनाज और हेल्दी फैट वाले फूड को शामिल करें.

4. एक्सरसाइज भी है जरुरी

जिस तरह एक्सरसाइज करने से स्वस्थ रहने में मदद मिलती है, उसी तरह दाढ़ी के विकास में भी एक्सरसाइज काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है दरअसल, एक्सरसाइज करने से ब्लड फ्लो अच्छा रहता है और बालों की जड़ों तक सर्कुलेशन भी अच्छा हो जाता है. इसके अलावा एक्सरसाइज करने से ह्यूमन ग्रोथ हार्मोंस टेस्टोस्टेरोन का लेवल बढ़ जाता है, जो बालों और दाढ़ी के विकास में मदद करता है.

5. स्मोकिंग छोड़ेने से होंगे फायदें

स्मोकिंग करने से शरीर का ब्लड सर्कुलेशन खराब हो जाता है और उससे बालों की जड़ों में केशिका ब्लड फ्लो कम हो जाता है. जिसके कारण दाढ़ी के विकास में देरी होती है.इसलिए धूम्रपान को भी बियर्ड ग्रोथ के लिए हानिकारक माना जाता है.

पुलिस हिरासत में बिग बौस विनर मुनव्वर फारूकी, हुक्का बार जाना पड़ा भारी

बिग बौस विनर 17 के विनर मुनव्वर फारूकी के फैंस के लिए एक बुरी खबर सामने आ रही है, जी हां उनके फैंस को ये खबर सुनकर शौक लगेगा, क्योकि उनके चहते मुनव्वर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया हैं. बीती रात मुंबई पुलिस ने मुनव्वर को हिरासत में ले लिया.

 

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दरअसल, बीती रात मुंबई की एसएस ब्रांच (सोशल सर्विस ब्रांच) ने एक हुक्का बार में रेड मारी, जहां से लगभग 14 लोगों को गिरफ्तार किया गया है. इन 14 लोगों में ही मशहूर कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी भी शामिल हैं, जिन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया. इन आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने कोटपा के तहत मामला दर्ज किया है. हालांकि, मुनव्वर फारूकी जेल से बाहर आ गए हैं.

जानकारी के मुताबिक, मुंबई पुलिस को एक टिप मिलने पर हुक्का बार में छापा मारा. पुलिस ने दावा किया कि वहां पर हुक्के के नाम पर तंबाकू के इस्तेमाल होने की जानकारी मिती थी. हर्बल हुक्के की आड़ में तंबाकू का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा था और इसी वजह से वहां पर छापेमारी की गई. यहां पर पकड़े गए सभी लोगों के खिलाफ सिगरेट और अन्य तंबाकू उप्पाद अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है. हालांकि, पुलिस ने मुनव्वर फारूकी (Munawar Faruqui) को 41A का नोटिस देकर छोड़ दिया है. इस दौरान मुनव्वर से कुछ समय तक पूछताछ भी हुई थी. मुनव्वर फारूकी ने बाहर आकर मुंबई एयरपोर्ट से अपनी एक तस्वीर शेयर की है, जिससे फैंस को राहत मिली है.

 

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इस मामले में पुलिस की तरफ से एक बयान जारी किया गया है, जिसमें बताया गया है कि जिस जगह पर छापेमारी हुई थी, वहां पर मुनव्वर फारूकी भी मौजूद थे. उनका भी टेस्ट किया गया था, जिसमें वह पॉजिटिव पाए गए थे. ये एक संगीन अपराध है और इसी वजह से उनके खिलाफ सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 और COTPA 2003 के तहत मामला दर्ज किया गया है. मुनव्वर पर कई धाराएं लगी हैं और केस दर्ज करने के बाद ही उन्हें छोड़ा गया है. बताते चले कि ओटीटी बिग बौस विनर एलविश यादव जेल में हैं.

होली पर माधुरी दीक्षित के लुक में नजर आईं Rani Chatterjee, इस लुक पर फिदा हुए फैंस

भोजपुरी इंडस्ट्री की जानीमानी एक्ट्रेस रानी चटर्जी अक्सर अपने वीडियो और फोटोज को लेकर सोशल मीडिया पर छाई रहती हैं. रानी को देखने के लिए लोग हमेशा बेताब रहते है. उनकी हर लुक लोगों को अपना दीवाना बना देता हैं. ऐसा ही होली पर देसी लुक कैरी कर, रानी ने सबको अपना फैन बना लिया हैं, जिसकी तारीफ करते करते लोग थक नहीं रहे है.


आपको बता दें कि स्टार से के लिए इस साल की होली पहले सालों से ओर बेहतर रही है जहां सभी स्टार्स मस्ती करते नजर आएं. रानी ने फैंस को इसी मौके पर विजुअल ट्रीट दिया है. जो कि इंटरनेट पर में धड़ल्ले से वायरल हो रही हैं. एक्ट्रेस ने होली पर देसी लुक कैरी किया. जिसकी फोटोज सोशल मीडिया पर छाई हुई है.

भोजपुरी की क्वीन रानी चटर्जी ने अपने इंस्टाग्राम पर कुछ तस्वीरें शेयर की हैं, जिनमें वो साड़ी में नजर आ रही हैं. रानी चटर्जी ने होली के मौके पर अपना देसी लुक दिखाया है. रानी का ये लुक देख फैंस खुशी से खिलखिला उठे हैं. रानी चटर्जी की फोटोज पर लोग दिल खोलकर प्यार बरसा रहे हैं. वहीं कई लोग रानी के पोस्ट पर कमेंट भी कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘रानी चटर्जी तो बिल्कुल माधुरी दीक्षित जैसी लग रही है.’ वहीं दूसरे यूजर ने उन्हें परम सुंदरी बताया है.


रानी चटर्जी ने भोजपुरी के अलावा ओटीटी वर्ल्ड में भी तहलका मचाया है. एक्ट्रेस रानी चटर्जी ने वेब सीरीज मस्तराम में काम किया था. इस सीरीज की वजह से रानी चर्चा में आ गई थी क्योंकि रानी चटर्जी ने इस वेब सीरीज में बेहद बोल्ड सीन्स दिए थे.

पार्टटाइम आईएएस फुलटाइम यूट्यूबर दीपक रावत स्टाइलिश, हैंडसम

आईएएस अधिकारी दीपक रावत अपनी यूट्यूब वीडियोज को ले कर अकसर चर्चाओं में रहते हैं. वीडियो में वे सिंघम स्टाइल में छोटी दुकानों/खुम्टियों पर छापा मारते दिखाई देते हैं. आईएएस दीपक रावत देखनेदिखाने के खेल में कहीं फंस तो नहीं गए हैं? ‘हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़ेलिखे को फारसी क्या’. यह कहावत आईएएस अधिकारी दीपक रावत पर फिट बैठती है क्योंकि काम भले उन का चूंचूं का मुरब्बा हो पर यूट्यूब पर हवा ऐसी बना के रखते हैं कि फिल्मी सिंघम भी पानी न मांगे. देखनेदिखाने के खेल में वे माहिर हो चुके हैं.

इस के लिए उन्होंने यूट्यूब को चुना है, जिस के शौर्ट वीडियोज इफरात से यहांवहां तैरते रहते हैं. जब देश के बड़ेबड़े नेता खुद को दिखाने की होड़ में लगे हों तो यह आईएएस क्यों न लगें भला. साफसाफ कहने का मतलब यह है कि अगर कोई काम होता है तो भला दिखने से कौन रोक सकता है पर अगर दिखाने के लिए ही काम हो तो क्या ही भला? ‘नायक’ मूवी में अनिल कपूर मीडिया के साथ रेड (छापा) मारने निकल जाता है.

गड़बड़ी मिलने पर फैसला लेने में कोई देरी नहीं, झट मंगनी पट ब्याह. ऐसा सा कुछ रियल लाइफ का दीपक रावत दिखाते हैं पर समस्या यह कि वह रील लाइफ के अनिल कपूर जैसे ही नकली लगते हैं. यूट्यूबर रेड स्पैशलिस्ट उत्तराखंड के कुमाऊं जोन का कमिशनर दीपक रावत 2007 बैच के आईएएस अफसर हैं. 1977 मसूरी, उत्तराखंड में जन्म हुआ उन का. अभी 46 साल के हैं. शुरुआती पढ़ाई उत्तराखंड से करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी से अपनी एमफिल तक की पढ़ाई पूरी की. पद की तरह लंबा कद, क्लीन शेव, आंखों पर चश्मा, सरकारी गाड़ी और नायक जैसी पर्सनैलिटी दीपक को बाकी अधिकारियों से अलग तो करती है.

आईएएस का पद बड़ा है. सरकार की व्यवस्था बनाए रखने में इन का इंपोर्टेंट रोल होता है. बाकायदा सरकार से मोटी सैलरी मिलती है. लाइफ सिक्योरिटी के साथ पावर भी हाथ आता है. कुछ लोग इस पावर का इस्तेमाल मदारी के बंदर के हाथ में रखे पाउडर की तरह करते हैं जिसे कभी अपने माथे पे, गाल पर या फिर अपने पेट पर मलते हैं. दीपक रावत यूट्यूब की रेड (छापा) स्पैशलिस्ट हैं.

उन की अधिकतर वीडियोज छोटे दुकानदारों, फुटपाथियों पर रेड डालने की दिखाई देती हैं, मानो वे यूट्यूब पर ही रेड डाल रहे हों. रेड के समय मीडिया की जरूरत नहीं पड़ती पर उन का अपना यूट्यूब चैनल है. चैनल में लगभग 43 लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर्स हैं. वीडियोज में रावत की अलगअलग जगह मारी गई रेड्स हैं. दीपक रावत पाजामा, जैकेट, सिर पर गरम टोपी और पैरों में चप्पल पहने एक हवलदार के साथ दिखाई देते हैं. उन की तरारी आंखें कनखियों से कैमरों को ही देखती हैं, शायद प्रधानमंत्री मोदी उन के प्रेरणास्रोत हों.

यह भी हो सकता है कि अब अपनी वीडियो में उन्होंने काला चश्मा पहनने का रिवाज इसलिए शुरू कर दिया हो ताकि लोगों की नजर कैमरा देखते उन की आंखों पर न पड़े. उन की एक वीडियो में 2 लड़के हैं जो बुलेट बाइक चला कर कहीं जा रहे हैं, लेकिन हैलमेट नहीं लगाने के जुर्म में दीपक रावत के यूट्यूब अदालत में दिखाई देते हैं. रावत की स्टाइल फिल्म ‘नायक’ के अनिल कपूर जैसा ही है. ज्यादा किचकिच नहीं, बस कुछ सवाल जिस के ‘हां न’ में जवाब और फिर थोड़ा सा ज्ञान देने के बाद फैसला सुना दिया जाता है.

बुलेट वाले लड़के को सम झाया जाता है कि रोड ऐक्सिडैंट में 200 से ज्यादा लोग मर चुके हैं, इसलिए हैलमेट लगाया करो. सजा के तौर पर लाइसैंस 3 महीने के लिए रद्द करने के साथ बुलेट जब्त कर ली जाती है. ताकत के हिसाब से शिकंजा अब आप कहेंगे कि इस में गलत क्या है, गलती थी तो सजा मिलनी ही चाहिए. नहीं जी, गलती कुछ नहीं. गलती हलके चरित्र पर है. हाल ही में उन की एक वीडियो वायरल हुई जिस में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अधिकारियों की क्लास लगाते दिखाई देते हैं जैसे दीपक अपनी वीडियो में लगाते हैं. मामला सड़क के गड्ढों को ले कर होता है. अखबार में खबर आने के कारण मुख्यमंत्री गुस्से में होते हैं.

अधिकारियों से जब पूछा जाता है तो वे एकदूसरे पर टालने लगते हैं. जब दीपक से कहा जाता है तो दीपक कुछ कह नहीं पाते. बस, ‘जी सर, जी सर’ कह कर रह जाते हैं जैसे वीडियो में रेड के समय दीपक के सामने लोग करते दिखाई देते हैं. इसे देख कर लगता है कि 43 लाख फौलोअर्स वाले यह सिंघम भीगी बिल्ली बन गए हैं. जाहिर सी बात है, मुख्यमंत्री के पास आईएएस से ज्यादा पावर होती है, इसलिए उन से पंगा दीपक को मुश्किल में डाल सकता था. वरना यह तेजतर्रार आईएएस सड़क पर गड्ढों के कारण मौत का आंकड़ा और सरकार के बजट में रोड सैफ्टी को ले कर कम होता बजट भी, मुख्यमंत्री को जरूर बता ही सकता था. पर नहीं, इस में प्रशासन की बदनामी होती.

धामी और रावत भी पिसते. इसलिए रावत अपनी ताकत के हिसाब से ही रेड डालते हैं, वहां पर ही जहां उन का बस चल सके. गूगल सर्च की जरूरत वैसे रावत सिर्फ सिंघम वाले काम ही नहीं करते बल्कि वह अपने सब्सक्राइबर्स के मनोरंजन के लिए भी वीडियोज बनाते रहते हैं. कैलाश पर्वत और लैंसडाउन की भी वीडियो बनाए हैं. जगहजगह घूमते हुए भी बनाते हैं. जैसे, वे दिखाते हैं, ‘उत्तराखंड के एक पहाड़ पर पादक पत्थर है (पैर के निशान)’. अब इसे दिखाने के लिए उन के साथ कई लोगों के पादक भी साथ जाते हैं. इस पैर के निशान को राम से जोड़ दिया गया और दीपक इसे ‘वैरी इंटरैस्टिंग’ कहते मोहित हो जाते हैं.

सवाल यह कि ‘वैरी इंटरैस्टिंग’ किस लिए, इस ऊलजलूल बात के लिए? इतना पढ़ेलिखे आईएएस अधिकारी होने के बावजूद दीपक रावत अपने एक वीडियो में एक मंदिर में पानी में तैर रहे पत्थर को चमत्कारी बताते हैं. वे उस पत्थर को चमत्कारी बताते हैं जिस पर जय श्रीराम लिखा है. इस से तो यही साबित होता है कि ओल्ड राजिंदर नगर या मुखर्जी नगर की कोचिंग फैक्ट्रियों में आईएएस तो बनाए जाते होंगे पर तार्किक नागरिक नहीं.

दीपक रावत में इतना दम भी नहीं है कि वे कह सकें कि यह चमत्कारी पत्थर नहीं, बल्कि प्यूमिस पत्थर है. वैसे विज्ञान हमें इस पत्थर के बारे में बहुतकुछ बताता है लेकिन रावत का चैनल आईएएस के डंडे और जादुई बातों से भरा है. विज्ञान ने इस पत्थर को प्यूमिस नाम दिया है. जब ज्वालामुखी से बहुत अधिक मात्रा में पानी और गैसों वाला लावा निकलता है तो सूख कर पत्थर का आकार ले लेता है. इस पत्थर में बहुत सारे छेद होते हैं और इस का घनत्व ज्यादा होने के कारण यह पानी में तैरने लगता है. क्या रावत को इस बात का पता नहीं था. चलो मान लिया कि नहीं भी हो सकता है. लेकिन क्या किसी ने टोका नहीं. उन के पास एप्पल का फोन है.

आजकल दफ्तरों में सरकारी वाईफाई होता है, थोड़ा सा गूगल सर्च ही कर लेते. चार ज्ञान की बातें अपनी वीडियो के माध्यम से अपने फौलोअर्स को भी दे देते जो पत्थर को चमत्कारी मान कर पंडों को दानदक्षिणा दे आते हैं पर यहां दीपक रावत की गलती नहीं, धर्म और चमत्कार के नाम पर जब देश में नेता बेवकूफ बना ही रहे हैं तो व्यूज बटोरने में क्या गलत है? फिल्मी सिंघम पर्सनैलिटी रावत के वीडियो की एक खासीयत है. इस में पूरी रेड नहीं होती है बल्कि रेड का एक कटाछंटा हिस्सा होता है.

जाहिर सी बात है, सब्सक्राबर्स ज्यादा लंबा वीडियो देखने में इंटरैस्ट नहीं लेंगे और ‘वैरी इंटरैस्टिंग’ वाली बात डिसइंटरैस्ंिटग हो जाएगी. इसलिए वीडियो में रावत के डायलौग जैसी लाइनों को रखा जाता है, जैसे ‘जितना पूछा जाए उतना ही जवाब दो’, ‘खबरदार, कभी ऐसा दोबारा किया तो’, ‘सील कर दो’. रावत अपने यूट्यूब चैनल का नायक हैं तो जाहिर है कि उन्हीं के हिसाब से ही तो डायलौग काटेछांटे जाएंगे. 2018 नैनीताल की एक घटना तो याद होगी, जिस में सबइंस्पैक्टर गगनदीप सिंह ने मौब (भीड़) से एक मुसलिम लड़के को बचाया था.

लड़का अपनी गर्लफ्रैंड से मिलने मंदिर में जाता है. इस की खबर लोगों को लग जाती है. उस के बाद लोग उस लड़के को जान से मारने को तैयार हो गए थे लेकिन गगनदीप सिंह ने अपनी जान पर खेल कर उस लड़के की जान बचाई. इस घटना के बाद मीडिया के पूछने पर गगनदीप ने कहा था कि वह सिर्फ अपनी ड्यूटी कर रहा था. रातोंरात गगनदीप कई लोगों का स्टार बन गया और ऐसा करने के लिए उसे अपने साथ कैमरामैन रखने की जरूरत नहीं पड़ी थी क्योंकि अच्छाई कोई दिखाने की बात नहीं बल्कि आप की रोजमर्रा की आदत होती है. बतौर आईएएस, रावत की सैलरी अच्छी है तो सिर्फ यह कहना कि ये सब पैसिव इनकम के लिए किया जा रहा है, गलत होगा.

वे अपनी पहचान जिले तक सीमित नहीं रखना चाहते बल्कि फेमस होना चाहते हैं. जिस से उन्हें दूरदूर के लोग भी जानें और पहचानने लग जाएं. लेकिन वे ऐसा अपने काम के जरिए नहीं बल्कि यूट्यूब के जरिए करना चाहते हैं. देखनेदिखाने की होड़ पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने गुजरात के पंचकुई तट पर अरब सागर की गहराई में जा कर प्राचीन द्वारका के भव्य दर्शन किए. प्राचीन समय से ले कर आज तक गरीबी व अन्याय की भव्यता वैसे भी बनी ही हुई है, द्वारका की भव्यता से मन खुश कर लेना ही बढि़या है. इस से समुद्र की गहराई तो सम झ आएगी ही, साथ में, वोट मिलेंगे बोनस में. आज दीपक रावत की पहचान उन के आईएएस पद पर रह कर किए गए काम की वजह से कम, उन के काम के समय की वीडियो शूटिंग से ज्यादा है.

टीवीएफ को ‘एस्पिरेंट्स’ सीरीज के अगले सीजन के लिए रावत को ही बतौर मुख्य अभिनेता रख लेना चाहिए क्योंकि रावत को अब कैमरे का भी अच्छा ज्ञान हो गया है, स्टाइल तो बढ़िया है ही. किसी भी प्रशासनिक अधिकारी की ड्यूटी है कि वे अपने इलाके में एक बेहतर सिस्टम बनाएं जो आम नागरिकों के लिए आसान और अच्छा हो. लेकिन यह जनाब सिस्टम की गलती से होने वाली समस्याओं को अपने यूट्यूब वीडियो में इस्तेमाल करते हैं. लोगों को दंड देने वाली वीडियो में मजा आता है, जैसे प्रशासन का बुलडोजर देखने के व्यूज सोशल मीडिया पर वैसे ही ढेरों रहते हैं, रावत भी उसी दंड का इस्तेमाल कर खूब व्यूज बटोर रहे हैं.

मेरे पापा मेरा हर काम इग्नोर कर देते हैं, ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए ?

सवाल

मेरे पापा और मेरी आपस में नहीं बनती. मैं कोई अच्छा काम कर के उन्हें दिखाता हूं, तो वे अनदेखा करते हैं. उपाय बताएं?

जवाब

अकसर अलगअलग पीढि़यों के बीच मतभेद होते हैं. आप को कोशिश कर के वही काम करने चाहिए, जो आप के पापा को पसंद हों.

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फोबिया के कारण

शोधकर्ता अभी फोबिया के सही कारणों के बारे में आश्वस्त नहीं हैं. हालांकि आम धारणा यही है कि जब कोई फोबिया होता है तो कुछ खास प्रकार के कारकों की समानता देखी जा सकती है. इन कारकों में शामिल हैं :

आनुवंशिक : शोध से पता चला है कि परिवार में किसी खास प्रकार का फोबिया होता है. मसलन, अलगअलग जगह पलेबढ़े बच्चों में एक ही प्रकार का फोबिया हो सकता है. हालांकि एक प्रकार के फोबिया वाले कई लोगों की परिस्थितियों का आपस में कोई संबंध नहीं होता.

सांस्कृतिक कारक : कुछ फोबिया किसी खास प्रकार के सांस्कृतिक समूहों में ही पाए जाते हैं. यह एक ऐसा भय है जिस में लोग सामाजिक परिस्थितियों के कारण दूसरों पर हमला करते हैं या उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं. यह परंपरागत सोशल फोबिया से बिलकुल अलग होता है क्योंकि सोशल फोबिया में पीडि़त व्यक्ति अपमानित होने पर व्यक्तिगत शर्मिंदगी झेलने की आशंका से ग्रसित रहता है. सो संभव है कि फोबिया विकसित करने में संस्कृति की भूमिका हो.

जिंदगी के अनुभव : कई प्रकार के फोबिया वास्तविक जिंदगी की घटनाओं से जुड़े होते हैं जिन्हें होशोहवास में याद किया भी जा सकता है और नहीं भी. मसलन, किसी कुत्ते का फोबिया, यह व्यक्ति को उसी वक्त से हो सकता है जब बहुत छोटी उम्र में वह कुत्ते का हमला झेल चुका हो. सोशल फोबिया नाबालिग उम्र के अल्हड़पन या बचपन की शैतानी से विकसित हो सकता है.

हो सकता है कि इन कारकों का एक मिश्रित रूप किसी फोबिया के विकसित होने का कारण बना हो लेकिन निर्णायक निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले अभी और ज्यादा शोध की आवश्यकता है. किसी व्यक्ति में कोई फोबिया बचपन से ही होता है या किसी को बाद की उम्र में पनप सकता है. कोई भी फोबिया बचपन, जवानी या किशोरावस्था के दौरान विकसित हो सकता है. फोबिया से ग्रस्त लोगों का ताल्लुक अकसर किसी डरावनी घटना या तनावपूर्ण माहौल से रहा है हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि कुछ खास प्रकार के फोबिया क्यों विकसित होते हैं.

फोबिया के इलाज

फोबिया से पीडि़त व्यक्ति की सोच में बदलाव लाने में मदद करते हुए उन के फोबिक लक्षणों को कौग्निटिव बिहेवियरल थैरेपी यानी सीबीटी से कमी लाने में बहुत हद तक सफलता मिली है. यह लक्ष्य हासिल करने के लिए सीबीटी का इस्तेमाल 3 तकनीकों से किया जाता है :

शिक्षाप्रद सामग्री : इस चरण में व्यक्ति को फोबिया व इस के इलाज के बारे में शिक्षित किया जाता है और उसे उपचार के लिए सकारात्मक उम्मीद बनाए रखने में मदद की जाती है. इस के अलावा फोबिया से पीडि़त व्यक्ति को सहयोग देने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता है.

संज्ञानात्मक अवयव : इस से विचारों तथा कल्पनाओं की पहचान करने में मदद मिलती है, जिस से व्यक्ति का बरताव प्रभावित होता है, खासकर ऐसे लोगों का जो पहले से ही खुद को फोबियाग्रस्त होने की धारणा पाल बैठते हैं.

व्यावहारिक अवयव : इस के तहत फोबियाग्रस्त व्यक्ति को समस्याओं से अधिक प्रभावी रणनीतियों के साथ निबटने की शिक्षा देने के लिए व्यवहार संशोधन तकनीक इस्तेमाल की जाती है.

फोबिया कई बार अवसादरोधी या उत्तेजनारोधी उपचार से भी ठीक किया जाता है, जिस से प्रतिकूल स्थिति पैदा करने वाले शारीरिक लक्षणों में कमी लाई जाती है और शरीर में उत्तेजना का प्रभाव अवरुद्ध किया जाता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

सेक्स से पहले ऐसे करें अपने पार्टनर को खुश

4 सहेलियां कुछ अरसे बाद मिली थीं. 2 की जल्दी शादी हुई थी तो 2 कुछ बरसों का वैवाहिक जीवन बिता चुकी थीं. ऐसा नहीं कि उन में और किसी विषय पर बात नहीं हुई. बात हुई, लेकिन बहुत जल्द ही वह पहली बार के अनुभव पर आ टिकी.

पहली सहेली ने पूछा, ‘‘तुम फोन पर ट्रेन वाली क्या बात बता रही थी? मेरी समझ में नहीं आई.’’

दूसरी बोली, ‘‘चलो हटो, दोबारा सुनना चाह रही हो.’’

तीसरी ने कहा, ‘‘क्या? कौन सी बात? हमें तो पता ही नहीं है. बता न.’’

दूसरी बोली, ‘‘अरे यार, कुछ नहीं. पहली रात की बात बता रही थी. हनीमून के लिए गोआ जाते वक्त हमारी सुहागरात तो ट्रेन में ही मन गई थी.’’

तीसरी यह सुन कर चौंकी, ‘‘हाउ, रोमांटिक यार. पहली बार दर्द नहीं हुआ?’’

दूसरी ने कहा, ‘‘ऐसा कुछ खास तो नहीं.’’

तीसरी बोली, ‘‘चल झूठी, मेरी तो पहली बार जान ही निकल गई थी. सच में बड़ा दर्द होता है. क्यों, है न? तू क्यों चुप बैठी है? बता न?’’

चौथी सहेली ने कहा, ‘‘हां, वह तो है. दर्द तो सह लो पर आदमी भी तो मनमानी करते हैं. इन्होंने तो पहली रात को चांटा ही मार दिया था.’’

बाकी सभी बोलीं, ‘‘अरेअरे, क्यों?’’

चौथी ने बताया, ‘‘वे अपने मन की नहीं कर पा रहे थे और मुझे बहुत दर्द हो रहा था.’’

पहली बोली, ‘‘ओह नो. सच में दर्द का होना न होना, आदमी पर बहुत डिपैंड करता है. तुम विश्वास नहीं करोगी, हम ने तो शादी के डेढ़ महीने बाद यह सबकुछ किया था.’’

दूसरी और तीसरी बोलीं, ‘‘क्यों झूठ बोल रही हो?’’

पहली सहेली बोली, ‘‘मायके में बड़ी बहनों ने भी सुन कर यही कहा था, उन्होंने यह भी कहा कि लगता है मुझे कोई धैर्यवान मिल गया है, लेकिन मेरे पति ने बताया कि उन्होंने शादी से पहले ही तय कर लिया था कि पहले मन के तार जोडूंगा, फिर तन के.

‘‘मुझे भी आश्चर्य होता था कि ये चुंबन, आलिंगन और प्यार भरी बातें तो करते थे, पर उस से आगे नहीं बढ़ते थे. बीच में एक महीने के लिए मैं मायके आ गई. ससुराल लौटी तो हम मन से काफी करीब आ चुके थे. वैसे भी मैं स्कूली दिनों में खूब खेलतीकूदती थी और साइकिल भी चलाती थी. पति भी धैर्य वाला मिल गया. इसलिए दर्द नहीं हुआ. हुआ भी तो जोश और आनंद में पता ही नहीं चला.’’

पतिपत्नी के पहले मिलन को ले कर अनेक तरह के किस्से, आशंकाएं और भ्रांतियां सुनने को मिलती हैं. पुरुषों को अपने सफल होने की आशंका के बीच यह उत्सुकता भी रहती है कि पत्नी वर्जिन है या नहीं. उधर, स्त्री के मन में पहली बार के दर्द को ले कर डर बना रहता है.

आजकल युवतियां घर में ही नहीं बैठी रहतीं. वे साइकिल चलाती हैं, खेलकूद में भाग लेती हैं, घरबाहर के बहुत सारे काम करती हैं. ऐक्सरसाइज करती हैं, नृत्य करती हैं. ऐसे में जरूरी नहीं कि तथाकथित कुंआरेपन की निशानी यानी उन के यौनांग के शुरू में पाई जाने वाली त्वचा की झिल्ली शादी होने तक कायम ही रहे. कई तरह के शारीरिक कार्यों के दौरान पैरों के खुलने और जननांगों पर जोर पड़ने से यह झिल्ली फट जाती है, इसलिए जरूरी नहीं कि पहले मिलन के दौरान खून का रिसाव हो ही. रक्त न निकले तो पुरुष को पत्नी पर शक नहीं करना चाहिए.

अब सवाल यह उठता है कि जिन युवतियों के यौनांग में यह झिल्ली विवाह के समय तक कायम रहती है, उन्हें दर्द होता है या नहीं. दर्द का कम या ज्यादा होना झिल्ली के होने न होने और पुरुष के व्यवहार पर निर्भर करता है. कई युवतियों में शारीरिक कार्यों के दौरान झिल्ली पूरी तरह हटी हो सकती है तो कई में यह थोड़ी हटी और थोड़ी उसी जगह पर उलझी हो सकती है. कई में यह त्वचा की पतली परत वाली होती है तो कई में मोटी होती है.

स्थिति कैसी भी हो, पुरुष का व्यवहार महत्त्वपूर्ण होता है. जो पुरुष लड़ाई के मैदान में जंग जीतने जैसा व्यवहार करते हैं, वे जोर से प्रहार करते हैं, जो स्त्री के लिए तीखे दर्द का कारण बन जाता है. ऐसे पुरुष यह भी नहीं देखते कि संसर्ग के लिए राह पर्याप्त रूप से नम और स्निग्ध भी हुई है या नहीं. उन के कानों को तो बस स्त्री की चीख सुनाई देनी चाहिए और आंखों को स्त्री के यौनांग से रक्त का रिसाव दिखना चाहिए. ऐसे पुरुष, स्त्री का मन नहीं जीत पाते. मन वही जीतते हैं जो धैर्यवान होते हैं और तन के जुड़ने से पहले मन के तार जोड़ते हैं व स्त्री के संसर्ग हेतु तैयार होने का इंतजार करते हैं.

भले ही आप पहली सहेली के पति की तरह महीना, डेढ़ महीना इंतजार न करें पर एकदम से संसर्ग की शुरुआत भी न करें. पत्नी से खूब बातें करें. उस के मन को जानने और अपने दिल को खोलने की कोशिश करें. पर्याप्त चुंबन, आलिंगन करें. यह भी देखें कि पत्नी के जननांग में पर्याप्त गीलापन है या नहीं. दर्द के डर से भी अकसर गीलापन गायब हो जाता है. ऐेसे में किसी अच्छे लुब्रीकैंट, तेल या घी का इस्तेमाल करना सही रहता है. शुरुआत में धीरेधीरे कदम आगे बढ़ाएं. इस से आप को भी आनंद आएगा और पत्नी को दर्द भी कम होगा.

कई युवतियों के लिए सहवास आनंद के बजाय दर्द का सबब बन जाता है. ऐसा कई कारणों से होता है, जैसे :

कुछ युवतियों में वल्वा यानी जांघों के बीच का वह स्थान जो हमें बाहर से दिखाई देता है और जिस में वेजाइनल ओपनिंग, यूरिथ्रा और क्लीटोरिस आदि दिखाई देते हैं, की त्वचा अलग प्रकार की होती है, जो उन्हें इस क्रिया के दौरान पीड़ा पहुंचाती है. त्वचा में गड़बड़ी से इस स्थान पर सूजन, खुजली, त्वचा का लाल पड़ जाना और दर्द होने जैसे लक्षण उभरते हैं. त्वचा में यह समस्या एलर्जी की तरह होती है और यह किसी साबुन, मूत्र, पसीना, मल या पुरुष के वीर्य के संपर्क में आने से हो सकती है.

सहवास के दौरान दर्द होने पर तुरंत डाक्टर को दिखाना चाहिए. सहवास से पहले पर्याप्त लुब्रीकेशन करना चाहिए. पुरुष को यौनांग आघात में बल का प्रयोग नहीं करना चाहिए. वही काम मुद्राएं अपनानी चाहिए जिन में स्त्री को कम दर्द होता हो. इस से भी जरूरी बात यह है कि पहले मन के तार जोडि़ए. ये तार जुड़ गए तो तन के तार बहुत अच्छे और स्थायी रूप से जुड़ जाएंगे.    – सहवास के दौरान पर्याप्त लुब्रीकेशन न होने से भी महिला को दर्द का एहसास हो सकता है.

– महिला यौनांग में यीस्ट या बैक्टीरिया का इन्फैक्शन भी सहवास में दर्द का कारण बनता है.

– एक बीमारी एंडोमेट्रिआसिस होती है, जिस में गर्भाशय की लाइनिंग शरीर के दूसरे हिस्सों में बनने लगती है. ऐसा होने पर भी सहवास दर्दनाक हो जाता है.

– महिला के यौनांग की दीवारों के बहुत पतला होने से भी दर्द होता है.

– यूरिथ्रा में सूजन आ जाने से भी सहवास के दौरान दर्द होता है.

नया द्वार: नये दरवाजे पर खुशियों ने दी दस्तक

एक दिन रास्ते में रेणु भाभी मिल गईं. बड़ी उदास, दुखी लग रही थीं. मैं ने कारण पूछा तो उबल पड़ीं. बोलीं, ‘‘क्या बताऊं तुम्हें? माताजी ने तो हमारी नाक में दम कर रखा है. गांव में पड़ी थीं अच्छीखासी. इन्हें शौक चर्राया मां की सेवा का. ले आए मेरे सिर पर मुसीबत. अब मैं भुगत रही हूं.’’

भाभी की आवाज कुछ ऊंची होती जा रही थी, कुछ क्रोध से, कुछ खीज से. रास्ते में आतेजाते लोग अजीब नजरों से हमें घूरते जा रहे थे. मैं ने धीरे से उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘चलो न, भाभी, पास ही किसी होटल में चाय पी लें. वहीं बातें भी हो जाएंगी.’’

भाभी मान गईं और तब मुझे उन का आधा कारण मालूम हुआ.

रेणु भाभी मेरी रिश्ते की भाभी नहीं हैं, पर उन के पति मनोज भैया और मेरे पति एक ही गांव के रहने वाले हैं. इसी कारण हम ने उन दोनों से भैयाभाभी का रिश्ता जोड़ लिया है.

मनोज भैया की मां मझली चाची के नाम से गांव में काफी मशहूर हैं. बड़ी सरल, खुशमिजाज और परोपकारी औरत हैं. गरीबी में भी हिम्मत से इकलौते बेटे को पढ़ाया. तीनों बेटियों की शादी की.

अब पिछले कुछ वर्षों से चाचा की मृत्यु के बाद, मनोज भैया उन्हें शहर लिवा लाए. कह रहे थे कि वहां मां के अकेली होने के कारण यहां उन्हें चिंता सताती रहती थी. फिर थोड़ेबहुत रुपए भी खर्चे के लिए भेजने पड़ते थे.

‘‘तभी से यह मुसीबत मेरे पल्ले पड़ी है,’’ रेणु भाभी बोलीं, ‘‘इन्हीं का खर्चा चलाने के लिए तो मैं ने भी नौकरी कर ली. कहीं इन्हें बुढ़ापे में खानेपीने, पहनने- ओढ़ने की कमी न हो. पर अब तो उन के पंख निकल आए हैं,’’

‘‘सो कैसे?’’

‘‘तुम ही घर आ कर देख लेना,’’ भाभी चिढ़ कर बोलीं, ‘‘अगर हो सके तो समझा देना उन्हें. घर को कबाड़खाना बनाने पर तुली हुई हैं. दीपक भैया को भी साथ लाएंगी तो वह शायद उन्हें समझा पाएंगे. बड़ी प्यारी लगती हैं न उन्हें मझली चाची?’’

चाय खत्म होते ही रेणु भाभी उठ खड़ी हुईं और बात को ठीक तरह से समझाए बिना ही चली गईं.

मैं ने अपने पति दीपक को रेणु भाभी के वक्तव्य से अवगत तो करा दिया था, लेकिन बच्चों की परीक्षाएं, घर के अनगिनत काम और बीचबीच में टपक पड़ने वाले मेहमानों के कारण हम लोग चाची के घर की दिशा भूल से गए.

तभी एक दिन मेरी मौसेरी बहन सुमन दोपहर को मिलने आई. उस ने एम.ए., बी.एड कर रखा था, पर दोनों बच्चे छोटे होने के कारण नौकरी नहीं कर पा रही थी. हालांकि उस के परिवार को अतिरिक्त आय की आवश्यकता थी. न गांव में अपना खुद का घर था, न यहां किराए का घर ढंग का था. 2 देवर पढ़ रहे थे. उन का खर्चा वही उठाती थी. सास बीमार थी, इसलिए पोतों की देखभाल नहीं कर सकती थी. ससुर गांव की टुकड़ा भर जमीन को संभाल कर जैसेतैसे अपना काम चलाते थे.

फिर भी सुमन की कार्यकुशलता और स्नेह भरे स्वभाव के कारण परिवार खुश रहता था. जब भी मैं उसे देखती, मेरे मन में प्यार उमड़ पड़ता. मैं प्रसन्न हो जाती.

उस दिन भी वह हंसती हुई आई. एक बड़ा सा पैकेट मेरे हाथ में थमा कर बोली, ‘‘लो, भरपेट मिठाई खाओ.’’

‘‘क्या बात है? इस परिवार नियोजन के युग में कहीं अपने बेटों के लिए बहन के आने की संभावना तो नहीं बताने आई?’’ मैं ने मजाक में पूछा.

‘‘धत दीदी, अब तो हाथ जोड़ लिए. रही बहन की बात तो तुम्हारी बेटी मेरे शरद, शिशिर की बहन ही तो है.’’

‘‘पर मिठाई बिना जाने ही खा लूं?’’

‘‘तो सुनो, पिछले 2 महीने से मैं खुद के पांवों पर खड़ी हो गई हूं. यानी कि नौ…क…री…’’ उस ने खुशी से मुझे बांहों में भर लिया. बिना मिठाई खाए ही मेरा मुंह मीठा हो गया. तभी मुझे उस के बच्चों की याद आई, ‘‘और शरद, शिशिर उन्हें कौन संभालता है? तुम कब जाती हो, कब आती हो, कहां काम करती हो?’’

‘‘अरे…दीदी, जरा रुको तो, बताती हूं,’’ उस ने मिठाई का पैकेट खोला, चाय छानी, बिस्कुट ढूंढ़ कर सजाए तब कुरसी पर आसन जमा कर बोली, ‘‘सुनो अब. नौकरी एक पब्लिक स्कूल में लगी है. तनख्वाह अच्छी है. सवेरे 9 बजे से शाम को 4 बजे तक. और बच्चे तुम्हारी मझली चाची के पास छोड़ कर निश्ंिचत हो जाती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘जी हां. मझली चाची कई बच्चों को संभालती हैं. बहुत प्यार से देखभाल करती हैं.’’

खापी कर पीछे एक खुशनुमा ताजगी में फंसे हुए प्रश्न मेरे लिए छोड़ कर सुमन चली गई. मझली चाची ऐसा क्यों कर रही थीं? रेणु भाभी क्या इसी कारण से नाराज थीं?

‘‘बात तो ठीक है,’’ शाम को दीपक ने मेरे प्रश्नों के उत्तर में कहा, ‘‘फिर भैयाभाभी दोनों कमाते हैं. मझली चाची के कारण उन्हें समाज की उठती उंगलियां सहनी पड़ती होंगी. हमें चाची को समझाना चाहिए.’’

‘‘दीपक, कभी दोपहर को बिना किसी को बताए पहुंच कर तमाशा देखेंगे और चाची को अकेले में समझाएंगे. शायद औरों के सामने उन्हें कुछ कहना ठीक नहीं होगा,’’ मैं ने सुझाव दिया.

दीपक ने एक दिन दोपहर को छुट्टी ली और तब हम अचानक मनोज भैया के घर पहुंचे.

भैयाभाभी काम पर गए हुए थे. घर में 10 बच्चे थे. मझली चाची एक प्रौढ़ा स्त्री के साथ उन की देखभाल में व्यस्त थीं. कुछ बच्चे सो रहे थे. एक को चाची बोतल से दूध पिला रही थीं. उन की प्रौढ़ा सहायिका दूसरे बच्चे के कपड़े बदल रही थी.

चाची बड़ी खुश नजर आ रही थीं. साफ कपड़े, हंसती आंखें, मुख पर संतोष तथा आत्मविश्वास की झलक. सेहत भी कुछ बेहतर ही लग रही थी.

‘‘चाचीजी, आप ने तो अच्छीखासी बालवाटिका शुरू कर दी,’’ मैं ने नमस्ते कर के कहा.

चाची हंस कर बोलीं, ‘‘अच्छा लगता है, बेटी. स्वार्थ के साथ परमार्थ भी जुटा रही हूं.’’

‘‘पर आप थक जाती होंगी?’’ दीपक ने कहा, ‘‘इतने सारे बच्चे संभालना हंसीखेल तो नहीं.’’

‘‘ठहरो, चाय पी कर फिर तुम्हारी बात का जवाब दूंगी,’’ वह सहायिका को कुछ हिदायतें दे कर रसोईघर में चली गईं, ‘‘यहीं आ जाओ, बेटे,’’ उन्होंने हम दोनों को भी बुला लिया.

‘‘देखो दीपक, अपने पोतेपोती के पीछे भी तो मैं दौड़धूप करती ही थी? तब तो कोई सहायिका भी नहीं थी,’’ चाची ने नाश्ते की चीजें निकालते हुए कहा, ‘‘अब ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की उम्र है न मेरी? इन सभी को पोतेपोतियां बना लिया है मैं ने.’’

फिर मेरी ओर मुड़ कर कहा, ‘‘तुम्हारी सुमन के भी दोनों नटखट यहीं हैं. सोए हुए हैं. दोपहर को सब को घंटा भर सुलाने की कोशिश करते हैं. शाम को 5 बजे मेरा यह दरबार बरखास्त हो जाता है. तब तक मनोज के बच्चे शुचि और राहुल भी आ जाते हैं.’’

‘‘पर चाची, आप…आप को आराम छोड़ कर इस उम्र में ये सब झमेले? क्या जरूरत थी इस की?’’

‘‘तुम से एक बात पूछूं, बेटी? तुम्हारे मांपिताजी तुम्हारे भैयाभाभी के साथ रहते हैं न? खुश हैं वह?’’

मेरी आंखों के सामने भाभी के राज में चुप्पी साधे, मुहताज से बने मेरे वृद्ध मातापिता की सूरतें घूम गईं. न कहीं जाना न आना. कपड़े भी सब की जरूरतें पूरी करने के बाद ही उन के लिए खरीदे जाते. वे दोनों 2 कोनों में बैठे रहते. किसी के रास्ते में अनजाने में कहीं रोड़ा न बन जाएं, इस की फिक्र में सदा घुलते रहते. मेरी आंखें अनायास ही नम हो आईं.

चाची ने धीरे से मेरे बाल सहलाए. ‘‘बेटी, तू दीपक को मेरी बात समझा सकेगी. मैं तेरी आंखों में तेरे मातापिता की लाचारी पढ़ सकती हूं, लेकिन जब तुझ पर किसी वयोवृद्ध का बोझ आ पड़े, तब आंखों की इस नमी को याद रखना.’’

दीपक के चेहरे पर प्रश्न था.

‘‘सुनो बेटे, पति की कमाई या मन पर जितना हक पत्नी का होता है उतना बेटे की कमाई या मन पर मां का नहीं होता. इस कारण से आत्मनिर्भर होना मेरे लिए जरूरी हो गया था. रही काम की बात तो पापड़बडि़यां, अचारमुरब्बे बनाना भी तो काम ही है, जिन्हें करते रहने पर भी करने वालों की कद्र नहीं की जाती. घर में रह कर भी अगर ये काम हम ने कर भी लिए तो कौन सा शेर मार दिया? बहू कमाएगी तो सास को यह सबकुछ तो करना ही पड़ेगा,’’ चाची ने एक गहरी सांस ली.

‘‘कब आते हैं बच्चे?’’ दीपक ने हौले से पूछा.

‘‘9 बजे से शुरू हो जाते हैं. कोई थोड़ी देर से या जल्दी भी आ जाते हैं कभीकभी. मेरी सहायिका पार्वती भी जल्दी आ जाती है. उसे भी मैं कुछ देती हूं. वह खुशी से मेरा हाथ बंटाती है.’’

‘‘और भी बच्चों के आने की गुंजाइश है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘पूछने तो आते हैं लोग, पर मैं मना कर देती हूं. इस से ज्यादा रुपयों की मुझे आवश्यकता नहीं. सेहत भी संभालनी है न?’’

चाय खत्म हो चुकी थी. सोए हुए बच्चों के जागने का समय हो रहा था. इसलिए ‘नमस्ते’ कह कर हम चलना ही चाहते थे कि चाची ने कहा, ‘‘बेटी, दीवाली के बाद मैं एक यात्रा कंपनी के साथ 15 दिन घूमने जाने की बात सोच रही हूं. अगर तुम्हारे मातापिता भी आना चाहें तो…’’

मैं चुप रही. भैयाभाभी इतने रुपए कभी खर्च न करेंगे. मैं खुद तो कमाती नहीं.

चाची को भी मनोज भैया ने कई बहानों से यात्रा के लिए कभी नहीं जाने दिया था. उन की बेटियां भी ससुराल के लोगों को पूछे बिना कोई मदद नहीं कर सकती थीं. अब चाची खुद के भरोसे पर यात्रा करने जा रही थीं.

‘‘सुनीता के मातापिता भी आप के साथ जरूर जाएंगे, चाची,’’ अचानक दीपक ने कहा, ‘‘आप कुछ दिन पहले अपने कार्यक्रम के बारे में बता दीजिएगा.’’

रेणु भाभी और मनोज भैया की नाराजगी का साहस से सामना कर के मझली चाची ने एक नया द्वार खोल लिया था अपने लिए, देखभाल की जरूरत वाले बच्चों के लिए और सुमन जैसी सुशिक्षित, जरूरतमंद माताओं के लिए.

हरेक के लिए इतना साहस, इतना धैर्य, इतनी सहनशीलता संभव तो नहीं. पर अगर यह नहीं तो दूसरा कोई दरवाजा तो खुल ही सकता है न?

जीवन बहुत बड़ा उपहार है हम सब के लिए. उसे बोझ समझ कर उठाना या उठवाना कहां तक उचित है? क्यों न अंतिम सांस तक खुशी से, सम्मान से जीने की और जिलाने की कोशिश की जाए? क्यों न किसी नए द्वार पर धीरे से दस्तक दी जाए? वह द्वार खुल भी तो सकता है.

अलविदा काकुल : रिश्ते की तपिश एकदूसरे के लिए प्यार

पेरिस का अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा चार्ल्स डि गाल, चारों तरफ चहलपहल, शोरशराबा, विभिन्न परिधानों में सजीसंवरी युवतियां, तरहतरह के इत्रों से महकता वातावरण…

काकुल पेरिस छोड़ कर हमेशाहमेशा के लिए अपने शहर इसलामाबाद वापस जा रही थी. लेकिन अपने वतन, अपने शहर, अपने घर जाने की कोई खुशी उस के चेहरे पर नहीं थी. चुपचाप, गुमसुम, अपने में सिमटी, मेरे किसी सवाल से बचती हुई सी. पर मैं तो कुछ पूछना ही नहीं चाहता था, शायद माहौल ही इस की इजाजत नहीं दे रहा था. हां, काकुल से थोड़ा ऊंचा उठ कर उसे सांत्वना देना चाहता था. शायद उस का अपराधबोध कुछ कम हो. पर मैं ऐसा कर न पाया. बस, ऐसा लगा कि दोनों तरफ भावनाओं का समंदर अपने आरोह पर है. हम दोनों ही कमजोर बांधों से उसे रोकने की कोशिश कर रहे थे.

तभी काकुल की फ्लाइट की घोषणा हुई. वह डबडबाई आंखों से धीरे से हाथ दबा कर चली गई. काकुल चली गई.

2 वर्षों पहले हुई जानपहचान की ऐसी परिणति दोनों को ही स्वीकार नहीं थी. हंगरी के लेखक अर्नेस्ट हेंमिग्वे ने लिखा है कि ‘कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जैसे बरसात के दिनों में रुके हुए पानी में कागज की नावें तैराना.’ ये नावें तैरती तो हैं, पर बहुत दूर तक और बहुत देर तक नहीं. शायद हमारा रिश्ता ऐसी ही एक किश्ती जैसा था.

टैक्निकल ट्रेनिंग के लिए मैं दिल्ली से फ्रांस आया तो यहीं का हो कर रह गया. दिलोदिमाग में कुछ वक्त यह जद्दोजेहद जरूर रही कि अपनी सरकार ने मुझे उच्चशिक्षा के लिए भेजा था. सो, मेरा फर्ज है कि अपने देश लौटूं और देश को कुछ दूं. लेकिन स्वार्थ का पर्वत ज्यादा बड़ा निकला और देशप्रेम छोटा. लिहाजा, यहीं नौकरी कर ली.

शुरू में बहुत दिक्कतें आईं. अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने वाले फ्रैंच समुदाय में किसी का भी टिकना बहुत कठिन है. बस, एक जिद थी, एक दीवानगी थी कि इसी समुदाय में अपना लोहा मनवाना है. जैसा लोकप्रिय मैं अपनी जनकपुरी में था, वैसा ही कुछ यहां भी होना चाहिए.

पहली बात यह समझ आई कि अंगरेजी से फ्रैंच समुदाय वैसे ही भड़कता है जैसे लाल रंग से सांड़. सो, मैं ने फ्रैंच भाषा पर मेहनत शुरू की. फ्रैंच समुदाय में अपनी भाषा, अपने देश, अपने भोजन व सुंदरता के लिए ऐसी शिद्दत से चाहत है कि आप अंगरेजी में किसी से पता भी पूछेंगे तो जवाब यही मिलेगा, ‘फ्रांस में हो तो फ्रैंच बोलो.’

पेरिस की तेज रफ्तार जिंदगी को किसी लेखक ने केवल 3 शब्दों में कहा है, ‘काम करना, सोना, यात्रा करना.’ यह बात पहले सुनी थी, यकीन यहीं देख कर आया. मैं कुछकुछ इसी जिंदगी के सांचे में ढल रहा था, तभी काकुल मिली.

काकुल से मिलना भी बस ऐसे था जैसे ‘यों ही कोई मिल गया था सरेराह चलतेचलते.’ हुआ ऐसा कि मैं एक रैस्तरां में बैठा कुछ खापी रहा था और धीमे स्वर में गुलाम अली की गजल ‘चुपकेचुपके रातदिन…’ गुनगुना रहा था. कौफी के 3 गिलास खाली हुए और मेरा गुनगुनाना गाने में तबदील हो गया. मेज पर उंगलियां भी तबले की थाप देने लगी थीं. पूरा आलाप ले कर जैसे ही मैं ‘दोपहर… की धूप में…’ तक पहुंचा, अचानक एक लड़की मेरे सामने आ कर झटके से बैठी और पूछा, ‘वू जेत पाकी?’

‘नो, आई एम इंडियन.’

‘आप बहुत अच्छा गाते हैं, पर इस रैस्तरां को अपना बाथरूम तो मत समझिए’.

‘ओह, माफ कीजिएगा,’ मैं बुरी तरह झेंप गया.

काकुल से दोस्ती हो गई, रोज  मिलनेजुलने का सिलसिला शुरू हुआ. वह इसलामाबाद, पाकिस्तान से थी. पिताजी का अपना व्यापार था. जब उन्होंने काकुल की अम्मी को तलाक दिया तो वह नाराज हो कर पेरिस में अपनी आंटी के पास आ गई और तब से यहीं थी. वह एक होटल में रिसैप्शनिस्ट का काम देखती थी.

ज्यादातर सप्ताहांत, मैं काकुल के साथ ही बिताने लगा. वह बहुत से सवाल पूछती, जैसे ‘आप जिंदगी के बारे में क्या सोचते हैं?’

‘हम बचपन में सांपसीढ़ी खेल खेलते थे, मेरे खयाल से जिंदगी भी बिलकुल वैसी है…कहां सीढ़ी है और कहां सांप, यही इस जीवन का रहस्य है और यही रोमांच है,’ मैं ने अपना फलसफा बताया.

‘आप के इस खेल में मैं क्या हूं, सांप या सीढ़ी?’ बड़ी सादगी से काकुल ने पूछा.

‘मैं ने कहा न, यही तो रहस्य है.’

मैं ने लोगों को व्यायाम सिखाना शुरू किया. मेरा काम चल निकला. मुझे यश मिलना शुरू हुआ. मैं ज्यादा व्यस्त होता गया. काकुल से मिलना बस सप्ताहांत पर ही हो पाता था.

कम मिलने की वजह से हम आपस में ज्यादा नजदीक हुए. एक इतवार को स्टीमर पर सैर करते हुए काकुल ने कहा, ‘मैं आप को आई एल कहा करूं?’

‘भई, यह ‘आई एल’ क्या बला है?’ मैं ने अचकचा कर पूछा.

‘आई एल, यानी इमरती लाल, इमरती हमें बहुत पसंद है. बस यों जानिए, हमारी जान है, और आप भी…’ सांझ के आकाश की सारी लालिमा काकुल के कपोलों में समा गई थी.

‘एक बात पूछूं, क्या पापामम्मी को काकुल मंजूर होगी?’ उस ने पूछा.

मैं ने पहली बार गौर किया कि मेरे पापामम्मी को अंकल, आंटी कहना वह कभी का छोड़ चुकी है. मुझे भी नाम से बुलाए उसे शायद अरसा हो गया था.

‘काकुल, अगर बेटे को मंजूर, तो मम्मीपापा को भी मंजूर,’ मैं ने जवाब दिया.

काकुल ने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया और अपनी आंखें बंद कर लीं. शायद बंद आंखों से वह एक सजीसंवरी दुलहन और उस का दूल्हा देख रही थी. इस से पहले उस ने कभी मुझ से शादी की इच्छा जाहिर नहीं की थी. बस, ऐसा लगा, जैसे काकुल दबेपांव चुपके से बिना दरवाजा खटखटाए मेरे घर में दाखिल हो गई हो.

मैं ज्यादा व्यस्त होता गया, सुबह नौकरी और शाम को एक ट्रेनिंग क्लास. पर दिन में काकुल से फोन पर बात जरूर होती. अब मैं आने वाले दिनों के बारे में ज्यादा गंभीरता से सोचता कि इस रिश्ते के बारे में मेरे पापामम्मी और उस के पापा, कैसी प्रतिक्रया जाहिर करेंगे. हम एकदूसरे से निभा तो पाएंगे? कहीं यह प्रयोग असफल तो नहीं होगा? ऐसे ढेर सारे सवाल मुझे घेरे रहते.

एक दिन काकुल ने फोन कर के बताया कि उस के अब्बा के दोस्त का बेटा जावेद, कुछ दिनों के लिए पेरिस आया हुआ है. हम कुछ दिनों के लिए आपस में मिल नहीं पाएंगे. इस का उसे बहुत रंज रहेगा, ऐसा उस ने कहा.

धीरेधीरे काकुल ने फोन करना कम कर दिया. कभी मैं फोन करता तो काकुल से बात कम होती, वह जावेदपुराण ज्यादा बांच रही होती. जैसे, जावेद बहुत रईस है, कई देशों में उस का कारोबार फैला हुआ है. अगर जावेद को बैंक से पैसे निकालने हों तो उसे बैंक जाने की कोई जरूरत नहीं. मैनेजर उसे पैसे देने आता है. उस की सैक्रेटरी बहुत खूबसूरत है. उस का इसलामाबाद में खूब रसूख है. वह कई सियासी पार्टियों को चंदा देता है. जावेद का जिस से भी निकाह होगा, उस का समय ही अच्छा होगा.

मुझे बहुत हैरानी हुई काकुल को जावेद के रंग में रंगी देख कर. मैं ने फोन करना बंद कर दिया.

जैसे बर्फ का टुकड़ा धीरेधीरे पिघल कर पानी में तबदील हो जाता है, उसी तरह मेरा और काकुल का रिश्ता भी धीरेधीरे अपनी गरमी खो चुका था. रिश्ते की तपिश एकदूसरे के लिए प्यार, एक घर बसाने का सपना, एकदूसरे को खूब सारी खुशियां देने का अरमान, सब खत्म हो चुका था.

इस अग्निकुंड में अंतिम आहुति तब पड़ी जब काकुल ने फोन पर बताया कि उस के अब्बा उस का और जावेद का निकाह करना चाहते हैं. मैं ने मुबारकबाद दी और रिसीवर रख दिया.

कई महीने गुजर गए. शुरूशुरू में काकुल की बहुत याद आती थी, फिर धीरेधीरे उस के बिना रहने की आदत पड़ गई. एक दिन वह अचानक मेरे अपार्टमैंट में आई. गुमसुम, उदास, कहीं दूर कुछ तलाशती सी आंखें, उलझे हुए बाल, पीली होती हुई रंगत…मैं उसे कहीं और देखता तो शायद पहचान न पाता. उसे बैठाया, फ्रिज से एक कोल्ड ड्रिंक निकाल कर, फिर जावेद और उस के बारे में पूछा.

‘जावेद एक धोखेबाज इंसान था, वह दिवालिया था और उस ने आस्ट्रेलिया में निकाह भी कर रखा था. समय रहते अब्बा को पता चल गया और मैं इस जिल्लत से बच गई,’ काकुल ने जवाब दिया.

‘ओह,’ मैं ने धीमे से सहानुभूतिवश गरदन हिलाई. चंद क्षणों के बाद सहज भाव से पूछा, ‘‘कैसे आना हुआ?’’

‘मैं आज शाम की फ्लाइट से वापस इसलामाबाद जा रही हूं. मुझे विदा करने एअरपोर्ट पर आप आ पाएंगे तो बहुत अच्छा लगेगा.’

‘मैं जरूर आऊंगा.’

शायद वह चाहती थी कि मैं उसे रोक लूं. मेरे दिल के किसी कोने में कहीं वह अब भी मौजूद थी. मैं ने खुद अपनेआप को टटोला, अपनेआप से पूछा तो जवाब पाया कि हम 2 नदी के किनारों की तरह हैं, जिन पर कोई पुल नहीं है. अब कुछ ऐसा बाकी नहीं है जिसे जिंदा रखने की कोशिश की जाए.

अलविदा…काकुल…अलविदा…

अनबन की खबरों के बीच ऐश्वर्या राय ने बच्चन फैमिली संग मनाई होली, यहां देखें Photos

बौलीवुड के जाने माने कपल ऐश्वर्या राय बच्चन और अभिषेक बच्चन के अनबन की खबरें काफी समय पहले से आ रही है, बताया जा रहा था कि दोनों के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है, दोनों एक-दूसरे से अलग होने जा रहे हैं, लेकिन अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय बच्चन ने इस दावे को बार-बार गलत साबित किया है. अब इसी बीच होली के मौके पर दोनों को साथ होली खेलते देखा गया है. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया वायरल हो रही हैं.


आपको बता दें कि एक्ट्रेस ऐश्वर्या राय बच्चन इन दिनों अपनी फिल्मों से ज्यादा पसर्नल लाइफ को लेकर चर्चा में रहती हैं. कपल के बीच कुछ दिनों से अनबन को लेकर खबरें वायरल हो रही थी. लेकिन इन खबरों पर दोनों ने पानी फेर दिया और होली के मौके पर दोनों साथ में होली खेलते दिखाई दिए है, साथ ही बेटी आराध्या भी मस्ती करती हुई नजर आई है. दोनों कपल की होली की तस्वीरें अब खूब वायरल हो रही है. जिसे उनके फैंस काफी पसंद कर रहे है. कपल के साथ फोटो में बाकी कई लोग नजर आ रहे है.


होली पर सामने आई ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन की फोटोज आते ही सोशल मीडिया पर छा गई हैं. इन फोटोज पर फैंस जमकर प्यार लुटा रहे हैं. तो वहीं ट्रोल्स इन फोटोज को देखने के बाद बोलती बंद हो गई हैं. ऐश्वर्या राय और अभिषेक बच्चन के साथ उनकी बेटी आराध्या का लुक भी लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींच रहा है.

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