Crime- लव वर्सेज क्राइम: प्रेमिका के लिए

प्यार… लव… यह शब्द,भावना जीवन के लिए कितना महत्वपूर्ण है. यह किसी को “ऊंचाइयों” पर पहुंचा देता है और किसी को इतना नीचे की उसका जीवन जेल के सीखचों में बितता है.
छत्तीसगढ़ के जिला कोरबा में एक प्रेमी ने प्रेमिका की खातिर अपराध की दुनिया में प्रवेश करने के लिए सब कुछ किया परिणाम यह हुआ कि ना तो उसे प्रेमिका मिल पाई और न ही जीवन का सुख. हां वह आज अपने अपराध में शामिल साथी के साथ जेल की हवा खा रहा है.
छत्तीसगढ़ के जिला कोरबा की पुलिस ने दो युवकों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि दोनों युवकों ने “यूट्यूब” से एटीएम काटने का तरीका सीखकर प्रेमिका को खुश करने एटीएम काटकर चोरी करने की योजना बनाई थी. आरोपियों ने कोरबा के बलगी बांकीमोंगरा में लगे एटीएम को काटने की योजना बनाई .
दरअसल,  पम्पहाउस के दिलीप राणा ने  रिपोर्ट दर्ज कराई थी की प्रार्थी का बॉडी गैरेज है, जहां पर डेंटिंग-पेंटिंग व वाहन मरम्मत का कार्य किया जाता है. अज्ञात चोर ने  दुकान का ताला तोड़कर एक ऑक्सीजन सिलेण्डर, दो गैस पाईप, एक कटिंग टॉर्च, एक रेग्युलेटर, मीटर घड़ी तथा सिलेण्डर चाबी को चोरी कर ली है.
Crime: छत्तीसगढ़ में उड़ते नकली नोट!

और पुलिस हो गई सतर्क

किसी बड़ी वारदात होने के हालात को भांपते हुए पुलिस ने सतर्कता बरतते हुए  जांच शुरू कर दी,  सीसीटीवी कैमरों का अवलोकन करने पर दो संदिग्ध व्यक्ति स्कूटी में प्रार्थी के गैरेज से सामान चोरी करते व ले जाते दिखे.
पड़ताल के दौरान पता चला कि इण्डस्ट्रियल एरिया के सर्वमंगला गैस एजेंसी में 2 लड़के और 1 लड़की लाल रंग की  कार कमांक CG 13 Y 3292 से गैस सिलेण्डर को रिफिल कराने लेकर आये थे किन्तु उनके पास पर्ची नही होने से रिफिल नहीं किया गया है.
सर्वमंगला गैस एजेंसी जाकर सीसीटीव्ही फुटेज प्राप्त किया गया और वाहन की जानकारी आरटीओ से प्राप्त करके वाहन स्वामी के बुधवारी स्थित मकान में जाकर दबिश देने पर जानकारी मिली कि संजय पटेल पिता भगतराम पटेल निवासी ढोढ़ीपारा  शादी में जाने के लिये कार को मांगकर ले गया था.जो अब तक वापस नहीं आया है.

पुलिस द्वारा वाहन स्वामी के माध्यम से कार को बुधवारी, गांधी चौक के पास घेराबंदी कर पकड़ा गया. वाहन में आरोपी संजय पटेल पिता भगतराम पटेल उम्र 24 साल निवासी ढोढ़ीपारा चौकी सीएसईबी जिला कोरबा एवं अजय पटेल पिता रामचन्द पटेल उम्र 22 साल निवासी ग्राम जुराली थाना कटघोरा जिला कोरबा मिले. वाहन की तलाशी लेने पर प्रार्थी दिलीप राणा के गैरेज से चोरी किया हुआ दो गैस पाईप, एक कटिंग टॉर्च, एक रेग्युलेटर, मीटर घड़ी तथा सिलेण्डर चाबी, एक घरेलु गैस सिलेण्डर, दस्ताना, पेचकस, सलाईरिंज पाना, टी पाना, लोहे का रॉड एवं एक छोटा ऑक्सीजन सिलेण्डर बरामद हुआ, जिसे जब्त कर लिया गया.

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यूट्यूब से सीखा एटीएम को काटना

लोग अपराध कैसे सीखते हैं यह भी इस सनसनीखेज वारदात के परिदृश्य में समझा जा सकता है. युवा वर्ग पैसों के लिए अब यूट्यूब को नकारात्मक भाव से लेते हुए उसकी वीडियो को देख अपराध करना भी सीख समझ रहा है. हमारी इस कथा में भी यह सत्य सामने आ गया कि यूट्यूब की वीडियो देखकर एटीएम को काटने की प्लानिंग दिमाग में कथित आरोपी को सुझी थी.

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पुलिस ने जब आरोपी संजय पटेल से कड़ाई से पूछताछ की तो  उसने बताया कि लगभग पंद्रह दिन पहले वह  मोबाईल पर यूट्यूब ने एटीएम मशीन को गैस कटर से काटकर रुपये चोरी करने का वीडियो देखता रहता था. यही नहीं आरोपी ने अपनी प्रेमिका और दोस्त के साथ मिलकर एटीएम लूटने की योजना बनाई थी. अपराध की दुनिया में संजय पटेल सफल हो पाता उसके पहले पुलिस की सतर्कता के कारण पकड़ा गया और दोस्त के साथ जेल की हवा खा रहा है इधर उसकी प्रेमिका फरार हो चुकी है जिसे पुलिस ढूंढ रही है.

हरिराम- भाग 1: शशांक को किसने सही राह दिखाई

शशांक अपने आफिस में काम कर रहा था कि चपरासी ने आ कर कहा, ‘‘साहब, आप को बनर्जी बाबू याद कर रहे हैं.’’ उत्पल बनर्जी कंपनी के निदेशक थे. पीठ पीछे उन्हें सभी बंगाली बाबू कह कर संबोधित करते थे. कंपनी विद्युत संयंत्रों की आपूर्ति, स्थापना और रखरखाव का काम करती थी. कंपनी के अलगअलग प्रांतों में विद्युत निगमों के साथ प्रोजेक्ट थे. शशांक इस कंपनी में मैनेजर था.

‘‘यस सर,’’ शशांक ने बनर्जी साहब के कमरे में जा कर कहा. ‘‘आओ शशांक,’’ इतना कह कर उन्होंने उसे बैठने का इशारा किया.

शशांक के दिमाग में खतरे की घंटी बज उठी. उसे लगा कि उस की हालत उस बकरे जैसी है जिसे पूरी तरह सजासंवार दिया गया है और बस, गर्दन काटने के लिए ले जाना बाकी है. शशांक ने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया और चुपचाप कुरसी पर बैठ गया. ‘‘तुम्हारा फरीदाबाद का प्रोजेक्ट कैसा चल रहा है?’’

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‘‘सर, बहुत अच्छा चल रहा है. निर्धारित समय पर काम हो रहा है और भुगतान भी ठीक समय से हो रहा है.’’ ‘‘बहुत अच्छा है. मुझे तुम से यही उम्मीद थी, पर मैं तुम्हें ऐसा काम देना चाहता हूं जो सिर्फ तुम ही कर सकते हो.’’

शशांक चुपचाप बैठा अपने निदेशक मि. बनर्जी को देखता रहा. उसे लगा कि बस, गर्दन पर तलवार गिरने वाली है. ‘‘शशांक, तुम्हें तो पता है कि लखनऊ वाले प्रोजेक्ट में कंपनी की बदनामी हो रही है. भुगतान बंद हो चुका है. हमें पैसा वापस करने का नोटिस भी मिल चुका है. मैं चाहता हूं कि तुम वह काम देखो.’’

‘‘लेकिन वह काम तो जतिन गांगुली देख रहे हैं,’’ शशांक ने कहा. ‘‘मैं ने फैसला किया है कि अब कंपनी के हित में लखनऊ का प्रोजेक्ट तुम देखोगे और जतिन गांगुली फरीदाबाद का प्रोजेक्ट संभालेगा.’’

शशांक की इच्छा हुई कि कह दे कि उस के साथ इसलिए ज्यादती हो रही है क्योंकि वह बंगाली नहीं है. उस ने सोचा कि कंपनी अध्यक्ष से जा कर मिले पर उसे याद आया कि कंपनी अध्यक्ष सेनगुप्ता साहब भी बंगाली हैं. वह भी बंगाली का ही साथ देंगे. शशांक अपने केबिन में जाने से पहले अपनी सहकर्मी वंदना के केबिन पर रुका.

‘‘वंदना, चलो काफी पीते हैं. मुझे तुम से कुछ पर्सनल बात करनी है.’’ काफी पीतेपीते शशांक ने उसे सारी बात बता दी.

‘‘अगले 3 माह में प्रमोशन के लिए निर्णय लिए जाएंगे. यह मामला जतिन गांगुली के प्रमोशन का है. लखनऊ प्रोजेक्ट की जो उस ने हालत की है, उस से प्रमोशन तो दूर उसे कंपनी से निकाल देना चाहिए,’’ वंदना ने कहा. ‘‘क्या मैं सेनगुप्ता साहब से मिलूं?’’

‘‘नहीं, उस से फायदा नहीं होगा. तुम्हें लखनऊ जाना पडे़गा पर फरीदाबाद प्रोजेक्ट की फाइलों की सूची बना कर, आज की स्थिति की रिपोर्र्ट बना कर तुम जतिन गांगुली के दस्तखत ले लेना और उस की कापी सेनगुप्ता साहब को भेज देना. प्रोजेक्ट में गड़बड़ होने पर वे लोग तुम्हें दोष दे सकते हैं,’’ वंदना ने सुझाव दिया. कुछ समय तक दोनों के बीच खामोशी छाई रही.

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‘‘शशांक, तुम से एक बात पूछना चाहती हूं. मुझे दोस्त समझ कर सचसच बताना,’’ वंदना बोली. ‘‘क्या बात है?’’

‘‘कहीं तुम्हारे और तुम्हारी पत्नी सरिता के बीच तनाव तो नहीं?’’ ‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘पिछले हफ्ते तुम फरीदाबाद प्रोजेक्ट की मीटिंग में थे तब शाम को 8 बजे सरिता का फोन मेरे घर पर आया था. तुम्हारे बारे में पूछ रही थी.’’ शशांक को अपनी पत्नी पर क्रोध आ गया. पर उस ने कहा, ‘‘उस दिन मैं उसे बताना भूल गया था. इसलिए वह परेशान होगी.’’

‘‘शशांक, प्रोजेक्ट और प्रमोशन के बीच में अपने परिवार को मत भूलो,’’ वंदना ने गंभीरता से कहा. ‘‘आज कोई मीटिंग नहीं थी क्या? जल्दी आ गए,’’ सरिता ने शशांक के घर पहुंचने पर व्यंग्य भरे लहजे में पूछा.

शशांक के मन में क्रोध भरा हुआ था. वह बिना जवाब दिए अपने कमरे में चला गया. ‘‘मुझे लखनऊ वाले प्रोजेक्ट पर काम दिया गया है. कल ही मैं 1 सप्ताह के लिए लखनऊ जा रहा हूं,’’ उस ने रात को खाना खाते हुए सरिता से कहा.

‘‘अकेले जा रहे हो? क्या तुम्हारी प्यारी दोस्त वंदना नहीं जा रही है?’’ शशांक को लगा कि उस के संयम की सीमा पार हो चुकी है और वह अभी सरिता के गाल पर तमाचा लगा देगा. पर वह आग्नेय नेत्रों से सरिता को देख कर आधा खाना खा कर ही उठ गया.

दूसरे दिन लखनऊ पहुंच कर शशांक कंपनी के अतिथिगृह में ठहरा, जहां उस की मुलाकात अतिथिगृह के प्रभारी हरिराम से हुई. ‘‘नमस्ते साहब,’’ हरिराम ने हाथ जोड़ कर कहा.

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कायरता का प्रायश्चित्त: भाग 3

कुछ देर इधरउधर की बातें होती रहीं. फिर मिहिर ने कहा, ‘‘अब आप लोग मेरे घर कब आ रहे हैं? ऐसा करो मिताली, नवीनजी को ले कर इसी इतवार को आ जाओ.’’

‘‘मिहिर, इस इतवार को तो नवीनजी का बहुत व्यस्त कार्यक्रम है.’’

‘‘मिताली, तुम अकेले ही चली जाना,’’ नवीन बोले, ‘‘मैं फिर कभी चला जाऊंगा.’’

मिहिर घर लौट कर आया तो उस की बेचैनी और बढ़ गई थी.

मिताली इतवार को नियत समय पर मिहिर के घर पहुंच गई. घर में इधरउधर देख कर बोली, ‘‘मिहिर, और कोई दिखाई नहीं दे रहा है, क्या सब लोग कहीं गए हैं?’’

‘‘मिताली, मैं यहां अकेला रहता हूं. दरअसल, मैं जिस लड़की से प्यार करता था उस की शादी कहीं और हो गई. मैं ने निश्चय किया था कि उस के अलावा किसी और लड़की से मैं विवाह नहीं करूंगा और मैं ने ऐसा ही किया.’’

मिताली उसे देख कर हैरान रह गई. बोली, ‘‘पर मिहिर, कब तक व कैसे अकेले जीवन व्यतीत करेंगे आप?’’

‘‘मिताली, मैं अकेला बेशक हूं पर उस की यादें मेरे साथ हैं. वही मेरे जीने का सहारा है. यही नहीं मैं तो अब उसे अकसर प्रत्यक्ष अपनी आंखों से देखता हूं.’’

‘‘तो क्या वह भी इसी शहर में है?’’

‘‘हां, मिताली,’’ मिहिर बोला, ‘‘क्या तुम उस से मिलना चाहोगी, अच्छा चलो, मैं तुम्हें अभी उस से मिलवाता हूं,’’ और भाववेश में मिताली को ले जा कर मिहिर शीशे के सामने खड़ा कर के बोला, ‘‘देखो मिताली, यही है मेरा प्यार.’’

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‘‘मिहिर, यह क्या मजाक है?’’ दूर छिटक कर मिताली गुस्से से बोली.

मिहिर ने उसे सबकुछ सचसच बता डाला और अलमारी से निकाल कर वह ताजमहल व ब्रैसलेट उस के सामने रख दिया.

हतप्रभ खड़ी मिताली कभी मिहिर को तो कभी ब्रैसलेट व सफेद संगमरमर के ताजमहल को देख रही थी जिस पर छोटेछोटे शब्दों में खुदा था, ‘मिताली के लिए’.

मिताली एक अजीब दुविधाजनक स्थिति लिए घर लौटी थी. एक तरफ नवीन था जिस के नाम का मंगलसूत्र उस के गले में पड़ा है. दूसरी तरफ मिहिर, जिस के प्यार का अंकुर कभी उस के मन में फूटा था, किंतु वह फूल पुष्पित न हो सका. और आज इतने सालों के बाद, न जाने कैसे अनायास ही उस में कोंपलें निकलने लगीं.

मिताली रात भर करवटें बदलती रही. सुबह उठी तो सो न पाने के कारण आंखें लाल और सिर में तेज दर्द हो रहा था. नवीन उस की हालत देख कर परेशान हो उठा. अभी तक नौकरानी नहीं आई थी. अत: वह खुद ही चाय बना लाया.

‘‘मिताली, शायद तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है,’’ चाय का प्याला उस की तरफ बढ़ाते हुए नवीन बोला.

‘‘तैयार हो जाओ, मैं आफिस चलते समय तुम्हें डा. मिहिर को दिखा दूंगा.’’

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मिहिर के क्लीनिक में काफी भीड़ थी. अत: नवीन मिताली को छोड़ कर आफिस चला गया. मिताली का जब नंबर आया तो दोपहर हो चुकी थी. मिहिर ने मिताली की जांच की, कुछ दवाएं दीं और बोला, ‘‘चलो, आज हम दोनों बाहर लंच करते हैं.’’

आज मिताली बिना किसी विरोध के मिहिर के साथ चल दी. दोनों ने होटल में खाना खाया, बातें कीं. फिर मिताली घर लौट आई और मिहिर क्लीनिक लौट गया. मिताली का साथ मिहिर को आनंदित करता, उस में नए उत्साह का संचार हो जाता. मिताली को भी मिहिर का साथ सुखद लगता. अब वे हमेशा मिलते रहते.

उस दिन दोपहर से ही आसमान में बादल सूरज के साथ आंखमिचौली कर रहे थे. मिताली को बादलों वाले मौसम में बाहर घूमने में बड़ा मजा आता था. अत: दफ्तर से जल्दी घर लौट आई और फिर शाम को तैयार हो कर वह मिहिर से मिलने क्लीनिक चल दी.

मिहिर भी क्लीनिक से निकलने की तैयारी कर रहा था. अत: दोनों गाड़ी में बैठ कर मिहिर के घर आ गए.

‘‘मिताली, कितना अच्छा लगता है जब तुम साथ होती हो,’’ मिहिर उस की आंखों में झांकते हुए बोला, ‘‘कभीकभी सोचता हूं कि यहां आ कर मैं ने कितना अच्छा किया, यदि यहां न आता तो तुम शायद कभी न मिलतीं.’’

‘‘मिहिर, यदि आप ने अपने दिल की बात तभी मुझ से कह दी होती तो आज आप को यों अकेला जीवन व्यतीत न करना पड़ता.’’

‘‘हां, मिताली, तुम ठीक कहती हो. पर क्या हम अपनी गलती सुधार नहीं सकते?’’

‘‘मिहिर, कुछ गलतियां ऐसी होती हैं जो कभी सुधारी नहीं जा सकतीं. अच्छा, अब मैं चलती हूं, काफी देर हो गई,’’ कौफी का खाली कप मेज पर रखती हुई मिताली बोली.

मिताली बाहर निकली, किंतु तेज बारिश शुरू हो गई थी. उस ने सोचा कि वह निकल जाए. पता नहीं कब बारिश बंद हो, किंतु इतने खराब मौसम में मिहिर ने उसे जाने नहीं दिया. उस ने कहा कि बारिश बंद हो जाएगी तो वह खुद उसे छोड़ आएगा.

आज जैसे कुदरत भी उन्हें मिलाने को तैयार थी. मिताली की बुद्धि ने भावनाओं के ज्वार के सामने हथियार डाल दिए. उन्हें उचितअनुचित का भी ध्यान न रहा. मिहिर के प्रति मिताली के मन में निकली प्रेम की कोंपलों ने आखिर उस रेशमी डोर को काट ही डाला जिस से मिताली नवीन के साथ बंधी थी.

सुबह बारिश रुकी तो मिताली घर आई पर उस के दिल में एक अपराधबोध था कि उस ने ऐसा क्यों किया. पर वह भी क्या करती, मिहिर की आवाज कानों में पड़ते ही या उस के सामने रहते हुए उसे अपनी सुध ही कहां रहती है जो वह सहीगलत का फैसला कर पाती.

‘‘अरे मिताली, तुम रात भर कहां थीं,’’ नवीन बेचैन हो कर बोले, ‘‘मैं पूरी रात तुम्हें ले कर परेशान होता रहा.’’

‘‘नवीन, कल शाम को मैं

डा. मिहिर के क्लीनिक दवा लेने गई थी. लौटते समय एक सहेली के यहां चली गई. मैं तो बारिश में ही आ रही थी पर उस ने यह कह कर आने नहीं दिया कि इस बरसात में जा कर तुम अपनी तबियत और खराब करोगी क्या?’’

‘‘मिताली, आज शाम की टे्रन से सीमा दीदी, 3-4 दिनों के लिए यहां आ रही हैं. रात में जीजाजी का फोन आया था. कोई चीज मंगानी हो तो बता देना. दोपहर में मैं किसी से भिजवा दूंगा,’’ नवीन ने कहा.

मिताली ने सामान की सूची नवीन को दे दी.

करीब हफ्ते भर रह कर सीमा दीदी वापस चली गईं तब मिताली आफिस गई और फिर वहां से मिहिर के घर चली गई.

मिताली को देखते ही मिहिर बोला, ‘‘अरे तुम कहां थीं, न घर आईं न ही फोन किया. कहीं तुम उस दिन की घटना से नाराज तो नहीं हो?’’

मिताली कुछ बोली नहीं. उस ने मिहिर का माथा छू कर देखा तो वह तप रहा था.

‘‘अपने प्रति इतनी लापरवाही ठीक नहीं है, मिहिर. आप सब का इलाज कर सकते हैं, अपना नहीं,’’ मीठी झिड़की देते हुए मिताली बोली.

‘‘मिताली, मेरी बीमारी सिर्फ तुम ही दूर कर सकती हो. अकेलेपन की यह पीड़ा अब मैं और बरदाश्त नहीं कर सकता, न तन से न मन से. तुम मेरे जीवन में आ जातीं तो जीने की राह आसान हो जाती,’’ अपने दिल की बात मिहिर ने मिताली के समक्ष जाहिर कर दी.

‘‘मिहिर, क्या नवीन को छोड़ देना सही होगा?’’ मिताली ने तर्क पेश किया.

‘‘मेरे लिए मिताली, सही और गलत क्या है यह मैं नहीं जानता. बस, इतना जानता हूं कि तुम मेरा प्यार हो और नवीन तुम पर थोपा गया है. तुम्हारा व उस का साथ तो मात्र संयोग है.’’

सच ही तो कह रहे हैं मिहिर. मिताली ने सोचा. नवीन के साथ शादी तय करने के बाद ही तो घर वालों ने उसे बताया था. जबकि मिहिर को मैं ने पसंद किया था. मेरा पहला प्यार है मिहिर.

‘‘मिताली, आज तुम्हारी पसंद तुम्हारे सामने है, जिसे अपनाने में तुम्हें संकोच नहीं करना चाहिए. अपनी इच्छानुसार जीना हर व्यक्ति का अधिकार है. मिताली, तुम मेरे जीवन में आ जाओ. यही हमारी कायरता का प्रायश्चित्त होगा.’’

सच. आखिर सारा दोष मिहिर का तो नहीं, वह भी बराबर की दोषी है. यदि मिहिर ने संकोचवश अपने दिल की बात उस से नहीं कही तो उस ने भी कहां अपने प्यार का इजहार किया था. मिहिर कायर थे तो वही कहां हिम्मती थी. नहीं, अब और अकेलेपन की पीड़ा नहीं उठाने देगी वह. मिहिर के जीवन में आ कर खुशियां भर देगी. मिताली ने मन ही मन फैसला किया तो मिहिर के प्रति उस के हृदय में सहानुभूति की बाढ़ सी आ गई.

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मिताली ने फोन उठाया और नवीन का नंबर मिला कर बोली, ‘‘नवीन, मैं ने एक बार बताया था न कि मैं ने किसी से प्यार किया था. वह कोई और नहीं बल्कि डा. मिहिर हैं. आज मैं ने अपना खोया हुआ प्यार दोबारा पा लिया है.’’

‘‘मिताली, तुम यह क्या बहकी- बहकी बातें कर रही हो,’’ नवीन बोला, ‘‘प्लीज, जल्दी घर आओ. पतिपत्नी के रिश्ते क्या इतने सहज हैं जो तोड़ दिए जाएं.’’

‘‘नवीन, मुझे क्या करना है क्या नहीं, अपनी जिंदगी किस के साथ व्यतीत करनी है किस के साथ नहीं, यह मुझ से बेहतर और कौन जान सकता है? मैं ने काफी सोचसमझ कर फैसला लिया है. रही बात कानूनी काररवाई की तो वह हम बाद में पूरी कर लेंगे,’’ कह कर मिताली ने फोन बंद कर दिया.

यह कैसा प्यार- भाग 3

रमा के पिता ने विजय को घर बुला कर कहा, ‘‘तुम घर के लड़के हो. रमा के लिए लड़के वाले देखने आए थे. उन्होंने रमा को पसंद कर लिया है. मैं चाहता हूं तुम मेरे साथ चलो. हम भी उन का घरपरिवार देख आएं.’’

विजय चाह कर भी मना न कर सका. लड़के वालों ने अच्छा स्वागतसत्कार किया. रमा के पिता ने विवाह की स्वीकृति दे दी.

विजय ने बातोंबातों में लड़के का मोबाइल नंबर ले लिया. साथ ही, घर का पता दिमाग में नोट कर लिया. विजय भलीभांति जानता था कि वह जो कर रहा है और करने वाला है, वह गलत है. लेकिन उस ने स्वयं को समझाया कि रास्ता गलत है, पर मकसद तो अपने प्यार को पाना है. विजय ने रमा के चरित्रहनन की झूठी कहानी बना कर लड़के के पते पर भेजी. साथ ही, रमा को पढ़ाने वाले प्रोफैसर, उस की सहेलियों को भी रमा के विषय में लिख भेजा.

एकदो पत्र तो उस ने महल्ले के लड़कों के नाम, एक अधेड़ प्रोफैसर के नाम इस तरह भेजे मानो रमा अपने प्रेम का इजहार कर रही हो. बात तेजी से फैली. कुछ लोगों ने रमा को पत्र का जवाब लिखा. कुछ लोगों ने उस के पिता को पत्र दिखाया. न जाने कितने प्रकार के अश्लील पत्र रमा की तरफ से विजय ने भेजे.

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कालेज, महल्ले में तमाशा खड़ा हो गया. रमा को समझ ही नहीं आया कि यह सब क्या हो रहा है. जितनी सफाई रमा और उस का परिवार देता, मामला उतना ही उछलता. लड़कियों को ले कर भारतीय समाज संवेदनहीन है. सब मजे लेले कर एकदूसरे को किस्से सुना रहे थे.

हालांकि समझने वाले समझ गए थे कि किसी ने शरारत की है लेकिन समझने के बाद भी लोग अश्लील पत्रों का आनंद ले कर एकदूसरे को सुना रहे थे. प्रोफैसर ने तो अपने कक्ष में बुला कर रमा को अपने सीने से लगा लिया और कहा, ‘‘मैं भी तुम से प्यार करता हूं.’’ जब रमा ने थप्पड़ जमाया तब प्रोफैसर को समझ आया कि वे धोखा खा गए.

लड़के के मोबाइल पर अज्ञात नंबर से रमा का प्रेमी बन कर विजय ने यह कहते हुए जान से मारने की धमकी दी कि रमा और मैं एकदूसरे से प्यार करते हैं पर घर वाले उस की जबरदस्ती शादी कर रहे हैं. यदि तुम ने शादी की तो मार दिए जाओगे.

लड़के वालों के परिवार ने रिश्ता तोड़ दिया. अच्छीभली लड़की का पूरे महल्ले में तमाशा बन गया. बेगुनाह होते हुए भी रमा और उस का परिवार किसी से नजर नहीं मिला पा रहे थे.

विजय को अनोखा आनंद आ रहा था. उस के मातापिता का उजाड़ चेहरा देख कर उसे लग रहा था कि मंजिल अब करीब है.

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रमा के पिता तो शहर छोड़ने का मन मना चुके थे. पुलिस में रिपोर्ट करने पर पुलिस अधिकारी ने उलटा उन्हें ही समझा दिया, ‘‘लड़की का मामला है, आप लोगों की खामोशी ही सब से बढि़या उत्तर है. जितनी आप सफाई देंगे, जांच करवाएंगे, आप की ही मुसीबत बढ़ेगी.’’

विजय को फोन कर के रमा के पिता ने अपने घर बुलाया. रमा की मां का रोरो कर बुरा हाल था. रमा के पिता ने उदास स्वर में विजय से कहा, ‘‘पता नहीं मेरी बेटी से किस की क्या दुश्मनी है कि उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया. उस की शादी टूट गई. हम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. बेटा, तुम तो जानते हो रमा को अच्छी तरह से.’’

विजय ने अपनी खुशी को छिपाते हुए गंभीर स्वर में कहा, ‘‘जी अकंलजी, मैं तो बचपन से देख रहा हूं. रमा पाकपवित्र लड़की है. मैं तो आंख बंद कर के विश्वास करता हूं रमा पर.’’

‘‘बेटा, तुम रमा से शादी कर लो,’’ रमा के पिता ने हाथ जोड़ते हुए विजय से कहा, ‘‘मैं तुम्हारा जीवनभर ऋणी रहूंगा. अन्यथा हम तो शहर छोड़ कर जाने की सोच रहे हैं.’’ रमा दरवाजे के पास छिप कर सुन रही थी और देख रही थी अपने दबंग पिता को नतमस्तक होते हुए.

Satyakatha- सूदखोरों के जाल में फंसा डॉक्टर: भाग 3

19 मई, 2018 को सिद्घार्थ तिगनाथ अपनी मां, पत्नी के साथ तत्कालीन एसपी मोनिका शुक्ला से मिले थे. उन्हें सूदखोरों के खिलाफ सारे सबूत और 8 लाख की लूट संबंधी प्रमाण भी दिए गए थे. पुरानी फाइलों के पन्ने पलटने पर पुलिस का संदेह यकीन में बदल चुका था कि डा. सिद्धार्थ ने सूदखोरों की प्रताड़ना की वजह से ही यह आत्मघाती कदम उठाया है.

पूरे मामले की जांच कर रहे एसआई जितेंद्र गढ़वाल को एक डायरी हाथ लगी, जिसे पढ़ कर मालूम हुआ कि सूदखोरों के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुके थे.

डा. सिद्धार्थ ने अपनी डायरी में मौत से पहले लिखा था, ‘मैं इस विश्वास के साथ दुनिया छोड़ रहा हूं कि मैं सच्चा और इज्जतदार था. बहुत बड़ा योगदान दे सकता था, पर मेरे जीवन में धूर्त लोगों का जमघट रहा है. पिछले 10 सालों से अब बहुत हुआ, इस संसार में रिस्की है अच्छा होना. कमलनाथजी, मोदीजी अवैध सूदखोरी, चैक रख कर ब्लैकमेलिंग करने वालों के खिलाफ कानून जरूर बनाइएगा. शायद मेरी जिंदगी का एक अर्थ निकले.

‘मेरा ये लेटर मीडिया को जरूर देना. शायद इस दबाव में पुलिस कुछ काररवाई करे. जब जीवित रहते किसी ने उन की बात नहीं सुनी तो डायरी में ये सब कुछ लिख कर, अपने जीवन को ही सबूत के तौर पर भेंट चढ़ा दिया.

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इस विश्वास के साथ कि उन्हें न्याय मिलेगा और सरकार इन अपराधों को रोकने के लिए कुछ कानून बनाएगी, जिस से भविष्य में कोई इन सूदखोरों के चक्र में न फंसे.’

डायरी पढ़ कर पता लगा कि प्रतिदिन एक लाख रुपए तक की पैनल्टी लगा कर सूदखोरों ने सिद्धार्थ और उन के पूरे परिवार को जिस तरह से प्रताडि़त किया, उस की कहानी सुनने मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

10 से 20 फीसद के ब्याज से शुरू हुआ यह खेल आखिरकार 120 फीसद ब्याज की दर के कर्ज तक जा पहुंचा था.

चंद लाख रुपए का कर्जा लेने वाले डा. सिद्धार्थ तिगनाथ ब्याज की अदायगी करतेकरते ही 5 करोड़ रुपए से अधिक की धनराशि सूदखोरों को दे चुके थे. बावजूद इस के सूदखोर कर्जा उतरने ही नहीं दे रहे थे.

नतीजतन परिवार की चलअचल संपत्ति गंवा चुके डा. सिद्धार्थ तिगनाथ ने आखिरकार बीती 22 अप्रैल को दुनिया से अलविदा कह दिया. इस के पूर्व वह एक ऐसी डायरी लिख कर गए, जिस में अपनी मौत का जिम्मेदार सूदखोरों की प्रताड़ना को बताया.

उन की डायरी के पन्नों में नरसिंहपुर के लगभग 20 से अधिक सूदखोरों के नाम और अभी तक उन को दिए गए पैसों का पूरा हिसाब था. मरने से पहले डा. सिद्धार्थ सूदखोरों के चंगुल में फंसे अन्य लोगों को सूदखोरों से बचाने की मार्मिक अपील भी कर गए.

डा. सिद्धार्थ की मौत के बाद उन के परिवार वाले, राजनैतिक हस्तियां और सामाजिक कार्यकर्ता नरसिंहपुर पुलिस पर आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने लगे.

समाचार पत्रों में रोज ही सूदखोरों पर शिकंजा कसने के समाचार छप रहे थे. डा. सिद्धार्थ के बहनोई अजय शुक्ला ने फेसबुक पर ‘जस्टिस फार डा. सिद्धार्थ अभियान’ छेड़ दिया था.

इस मुहिम का असर रहा कि युवक कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कुनाल चौधरी, जिला पंचायत नरसिंहपुर के पूर्व अध्यक्ष देवेंद्र पटेल ने भी डा. सिद्धार्थ को न्याय दिलाने के लिए मोर्चा खोल दिया. उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से ले कर डीजीपी व एसपी नरसिंहपुर तक को शिकायत कर दोषी सूदखोरों को गिरफ्तार करने की मांग की.

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मामले की गंभीरता को देखते हुए एसपी विपुल श्रीवास्तव ने व्यक्तिगत रुचि दिखा कर प्रकरण की जांच कराई. नतीजा यह रहा कि सिद्धार्थ की तेरहवीं के ठीक एक दिन पहले ही पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ आत्महत्या करने को विवश करने का मामला दर्ज कर लिया गया.

लंबी पूछताछ के बाद पुलिस ने जिन 7 लोगों के खिलाफ भादंवि की धारा 306, 34 का अपराध दर्ज किया था. उन में सुनील जाट निवासी संजय वार्ड, अजय उर्फ पप्पू जाट, भागचंद उर्फ भग्गी यादव नरसिंहपुर को 6 मई 2021 को गिरफ्तार कर लिया गया.

वहीं 2 मुख्य आरोपी आशीष नेमा के कोविड पौजिटिव होने व सौरभ रिछारिया के घर में परिजन के संक्रमित होने पर ये गिरफ्तार नहीं किए गए थे. इन का जिले के बाहर इलाज चल रहा था. जबकि धर्मेंद्र जाट और राहुल जैन फरार हो गए, जिन की सरगरमी से पुलिस ने तलाश शुरू कर दी.

खैरी गांव का पूर्व सरपंच धर्मेंद्र जाट अपने बीवीबच्चों को जिले से बाहर रिश्तेदारों के यहां भेज कर खुद भी भागने की फिराक में था, मगर पुलिस की सक्रियता से उसे सुबह तड़के खैरी गांव में बने उस के मकान से गिरफ्तार कर लिया. गुलाब चौराहा नरसिंहपुर निवासी राहुल जैन पुलिस को चकमा दे कर भाग गया.

30 मई, 2021 को एसआई जितेंद्र गढ़वाल को मुखबिर के माध्यम से सूचना मिली कि डा. सिद्धार्थ मामले का एक आरोपी राहुल जैन जबलपुर में छिपा हुआ है.

एसआई जितेंद्र गढ़वाल, आरक्षक पंकज और आशीष की टीम वहां पहुंची तो पता चला कि वह तो जबलपुर के कछपुरा इलाके में दूध बेचने का धंधा कर रहा है. पुलिस टीम ने वहां से राहुल जैन को गिरफ्तार कर लिया .

यूं तो डा. सिद्धार्थ की डायरी में उन 20 सूदखोरों के नाम दर्ज थे जो उन से ब्याज के रूप में लाखों की रकम हड़प चुके थे, परंतु पुलिस की जांच में केवल 7 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है. सिद्धार्थ के घर वाले इस बात को ले कर नाराज हैं.

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उन का कहना है कि सभी सूदखोरों के खिलाफ कड़ी कानूनी काररवाई की जाए, जिस से अब कोई शख्स उन सूदखोरों के बनाए चक्रव्यूह में न फंस सके.

कथा संकलन तक 2 मुख्य आरोपी आशीष नेमा और सौरभ रिछारिया को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर पाई थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Story in Hindi- अपना अपना रास्ता: भाग 5

सास को देख रमेश उठ कर बैठ गया, ‘‘मम्मी, आइए. कब से हम लोग आप का इंतजार कर रहे हैं. विनोद और प्रमोद भी घर से गायब हैं. लगता है, क्लब में यारदोस्तों के साथ पत्तों में मशगूल होंगे. हम दोनों बैठेबैठे बोर हो रहे थे अकेले.’’

सोफे पर पसर कर इंद्रा ने बेटीदामाद के चेहरों पर टटोलती सी दृष्टि डाली. न कोई दुख, न उदासी. बस, एक तटस्थ सा भाव, जैसे यह भी एक औपचारिकता है. खबर मिली, चले आए. बस.

मगर दुख और चिंता का भाव आता भी तो क्योंकर? कभी बच्चों ने पिता को पिता नहीं समझा. मातापिता की कलह में विजय हमेशा मां के हाथ रही. पिता सदा से एक परित्यक्त जीवन ढोता रहा. न उस की इच्छा और रुचि की कोई चिंता करने वाला था, न उस के दुख में कोई दुखी होने वाला. घर में सब से बेकार, सब से फालतू कोई चीज यदि थी तो वह था पिता नाम का प्राणी. फिर उस के प्रति किसी प्रकार की ममता, आदर या स्नेह आता तो कैसे?

‘‘अस्पताल क्यों नहीं गए?’’ इंद्रा ने सोफे की पीठ पर बाल फैलाते हुए अचला की ओर देखा.

‘‘अस्पताल? बाप रे, कौन जाता पागल कुत्ते से कटवाने अपने को?’’ अचला ने हाथमुंह नचाते हुए टेढ़ा मुंह बनाया.

‘‘साफसाफ क्यों नहीं कहती कि पापा अस्पताल में हैं, इसलिए हम लोग आप सब से मिलने आए हैं. उन के रहते तो इस घर में पांव रखने में भी डर लगता है. मुझे कैसी खूंखार आंखों से घूरते हैं. बाप रे’’ रमेश ने बिटिया को अचला की गोद में डाल, उसे शाल उढ़ाते हुए मन की सच्ची बात उगल दी.

अचला ने पिता की इच्छा के विरुद्घ घर से भाग कर उस से शादी की थी, क्योंकि सुरेंद्र की नजरों में वह एक आवारा और गुंडा किस्म का लड़का था. इसी वजह से वह ससुर से घृणा करता था.

‘‘तुम ठीक कहते हो. आजकल वे सचमुच पागल कुत्ते की तरह काटने दौड़ते हैं. मैं ने भी फैसला कर लिया है कि अब अस्पताल नहीं जाऊंगी. शायद जाना भी न पड़े. जानते हो, डाक्टर कहते हैं, वे 2-4 दिन के मेहमान हैं.’’

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इंद्रा ने चाय का घूंट निगलते हुए अचला की ओर देखा, ‘‘पहला दौरा उन्हें तब हुआ था जब विनोद कालेज से उषा को भगा कर मुंबई में बेच आया था. 3 दिनों तक वे घर नहीं आए थे. तीसरे दिन पता चला था, होटल में शराब पीतेपीते उन्हें दौरा पड़ा था. वहीं से उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया था. और अब तुम्हारे जाने के बाद उन के इस दूसरे दौरे ने उन के दिल की धज्जियां उड़ा दी हैं. मैं तो आज तक नहीं समझ पाई इस आदमी को. क्या चाहता है, क्या सोचता है, क्या नहीं है इस के पास?’’

निर्लप्त से स्वर में बोलतेबोलते उस ने चाय का खाली प्याला मेज पर रख दिया.

रात को खापी कर देर तक ड्राइंगरूम में बैठ सब ऊधम मचाते रहे. अचला और रमेश के आगमन की सूचना पा कर उन के मित्र भी मिलने चले आए थे.

इंद्रा को सुबह 7 बजे की फ्लाइट पकड़नी थी, सो 6 बजे का अलार्म लगा कर नौकर को सब आदेश दे, वह बिस्तर में दुबक गई.

सुबह घड़ी के अलार्म की जगह मोबाइल की घंटी टनटनाई तो इंद्रा रजाई फेंक कर बिस्तर से उठ बैठी.

‘‘हैलो,’’ उधर से आवाज आई, ‘‘मिस्टर सुरेंद्र अब इस दुनिया में नहीं रहे.’’

‘‘ओहो, अच्छाअच्छा.’’

मोबाइल रख कर कुछ क्षण वह जैसे निर्णय सा लेती रही, ‘इन्हें भी यही वक्त मिला था खबर देने को,’ बड़बड़ाती हुई वह गुसलखाने में घुस गई.

वहां से हाथमुंह धो कर निकली तो नौकर को पुकारा, ‘‘देखो, रामू, मेरी चाय यहीं दे जाओ और ड्राइवर से कहो गाड़ी तैयार करे. जाने का टाइम हो गया है, समझे. और हां देखो, विनोद और प्रमोद को मेरे पास भेज दो जगा कर. कहना बहुत जरूरी काम है. समझ गए?’’

‘‘जी,’’ कह कर रामू ला गया तो वह ड्रैसिंगटेबल के सामने बैठ कर जल्दीजल्दी बालों में कंघी करने लगी. जूड़ा बना कर उस ने होंठों पर लिपस्टिक फैलाई ही थी कि विनोद आंखें मलता सामने आ कर खड़ा हो गया, ‘‘क्या बात है, मम्मी? सुबहसुबह नींद क्यों बिगाड़ दी हमारी? क्या हमें जगाए बिना आप की सवारी सैमिनार में नहीं जा सकती थी?’’

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इंद्रा ने लिपस्टिक को फिनिशिंग टच दे कर बेटे के चेहरे पर आंखें टिका दीं, ‘‘तुम्हारे पापा नहीं रहे. अभीअभी अस्पताल से फोन आया है. रात को वे बहुत बेचैन रहे और सुबह कोई 4 बजे के करीब डाक्टरों की पूरी कोशिश के बावजूद उन का हार्ट सिंक कर गया.’’

‘‘क्या?’’ विनोद की अधखुली आंखें अब पूरी तरह खुल कर फैल गई थीं,  ‘‘इतनी जल्दी?’’

‘‘जल्दी क्या? उन्होंने तो अपनी मौत खुद बुलाई है. खैर, मैं ने तो तुम्हें इसलिए बुलाया है कि मैं तो जा रही हूं. रुक नहीं सकती. वचन जो दे चुकी हूं. तुम लोग रमेश अंकल को फोन कर देना. वे आ कर सब संभाल लेंगे, समझे.’’

नित्य की तरह माथे पर सुहाग चिह्न लगाने के अभ्यस्त हाथ एक क्षण के लिए कांपे. क्या अब भी यह सौभाग्य चिह्न माथे पर अंकित करना चाहिए?

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सौभाग्य चिह्न? कैसा सौभाग्य चिह्न? क्या इस रूप में उस ने कभी इसे माथे पर अंकित किया था?

बस, अन्य सौंदर्य प्रसाधनों की तरह जैसे चेहरे पर पाउडर और होंठों पर लिपस्टिक लगाती रही, वैसे ही यह भी उस के गोरे, उजले माथे पर शोभता रहा. फिर सोचना क्या?

हवा में ठिठका उस का हाथ आगे बढ़ा और माथे पर लाल रंग की गोलमोल बिंदी टिक गई.

कैसे पति? कैसी पत्नी? जब वे अपना रास्ता नहीं छोड़ सके तो मैं ही क्यों छोड़ दूं?

साड़ी का पल्ला ठीक करती हुई वह ड्रैसिंगटेबल के सामने से उठी और पर्स उठा कर बाहर निकल गई. ‘‘देखो, विनोद, कोई पूछे तो कह देना जब खबर आई, मैं घर से जा चुकी थी, समझे.’’

पलट कर तेजतेज कदम रखती हुई वह सीढि़यां उतर कर गाड़ी में बैठ गई. अनिश्चय की स्थिति में सकपकाया सा विनोद गाड़ी को गेट से निकलते देखता रहा. क्या मम्मीपापा में कभी कोई संबंध था? यदि हां, तो फिर कौन सा?

Satyakatha: मकान में दफन 3 लाशें- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

उन्हीं दिनों अहसान को किसी परिचित के मार्फत पता चला कि वार्ड नंबर-6 के बबैल रोड स्थित शिवनगर कालोनी में एक व्यक्ति अपना अर्द्धनिर्मित मकान बेच रहा है. उसे पैसों की बहुत जरूरत है.

औनेपौने दाम लगा कर अहसान सैफी ने वह मकान खरीद लिया. उस पर सिर्फ लेंटर डालना बाकी था, जबकि चारोें दीवारें पूरी तैयार थीं. उस ने जो सपना खुली आंखों से देखा था कि उस का भी अपना मकान हो, उस का वह सपना पूरा हो गया था. कुछ और रुपयों का बंदोबस्त कर उस ने लेंटर डलवा दिया.

अपनी मेहनत की कमाई से बने मकान में रह कर अहसान खुश था. मकान का सपना पूरा होने के बाद अहसान के दिल में एक कसक रह गई थी रातोंरात लखपति बनने की. वह ऐसा नायाब तरीका ढूढने में जुट गया, जिस से लखपति बनने से उसे कोई नहीं रोक पाता.

भले ही अहसान सैफी कम पढ़ालिखा था, लेकिन टेक्नोलौजी के मामले में बेहद शातिर था. इसी शातिरपन का वह लाभ उठाना चाहता था. इस के लिए उस ने शादी डौटकौम का सहारा लिया. अहसान ने शादी डौटकौम पर अपने लिए एक विज्ञापन दिया.

मुंबई के कल्याणी घाट की नाजनीन ने विज्ञापन देखा. उस ने अहसान के दिए मोबाइल नंबर पर संपर्क किया. नेकदिल नाजनीन ने खुल कर उसे अपने बारे में सारी हकीकत बयां कर दी कि वह बेवा है और 2 बच्चे भी हैं. इस रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए वह तैयार है तो बात आगे बढ़ाई जाए.

अपनी ओर से इस रिश्ते को अहसान ने मंजूरी दे दी थी. उसे नाजनीन के दोनों बच्चों से कोई ऐतराज नहीं था. अहसान की ओर से हरी झंडी मिलते ही नाजनीन ने भी अपनी ओर से भी हरी झंडी दे दी थी. रास्ता दोनों ओर से साफ था. नाजनीन के पिता मुन्ना शेख भी बेटी के फैसले के आगे नतमस्तक थे. उन्होंंने बेटी के जीवन में कोई दखल करना उचित नहीं समझा.

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नाजनीन एक धनाढ्य बाप की बेटी थी. खुद उस के बैंक खाते में भी लाखों रुपए थे. यह अहसान सैफी उस से पूछताछ कर के जान चुका था. उसे और क्या चाहिए था. मक्कारी का जाल बुन कर अहसान ने नाजनीन के इर्दगिर्द फैलाया था, वह उस के फैलाए जाल में फंस गई थी.

जल्द ही दोनों ने मुंबई में निकाह भी कर लिया. निकाह के बाद अहसान पत्नी नाजनीन और उस के दोनों बेटों सोहेल और साजिद को मुंबई से ले कर पानीपत अपने घर आ गया. घाटघाट का पानी पी चुके अहसान ने नाजनीन के साथ बड़ा धोखा किया था.

वह पहले से ही शादीशुदा है, ये बात उस ने उसे नहीं बताई थी. पहली पत्नी से उस के 2 बेटे भी हैं, यह भी उस ने छिपाया था. यह जनवरी, 2015 के करीब की बात है.

जीवन के जिस कठिन डगर से हो कर नाजनीन तिलतिल कर गुजर रही थी, पति अहसान का मजबूत साथ पा कर उसे एक किनारा मिल गया था, इस के सिवाय उसे कुछ नहीं चाहिए था. लेकिन पति की कमीनगी से वह परिचित नहीं थी कि उस ने उस के साथ धोखा किया है.

नाजनीन की इसी कमजोरी का फायदा अहसान ने उठाया था. बड़े ही काइयां तरीके से पत्नी को झांसे में रख कर उस के खाते से लाखों रुपए अपने खाते में ट्रांसफर करा लिए. मन की साफ नाजनीन ने यह सोच कर अपने खाते में रखे रुपए पति के खाते में ट्रांसफर कर दिए कि रुपए मेरे खाते में रहें, चाहे पति के खाते में, क्या फर्क पड़ता है, हैं तो हम दोनों एक ही. इस पर खर्च करने का अधिकार दोनों का बनता है.

दिन के उजाले में खुली आंखों से अहसान सैफी ने लखपति बनने के जो सपने देखे थे, पूरे हो गए थे. सपने पूरे होने के बाद अहसान मौज की जिंदगी जी रहा था. और फिर दूसरी पत्नी और बच्चों को छोड़ कर बहाने से बीचबीच में 2-4 दिनों के लिए वह घर से गायब हो जाया करता था.

इस बीच वह मुजफ्फरनगर पहली बीवी नूरजहां और दोनों बेटों से मिलने जाया करता था. मजे की बात तो यह थी अहसान ने पहली बीवी को भी धोखे में रखा था और दूसरी बीवी को भी. पहली बीवी नूरजहां से उस ने दूसरी शादी कर लेने की भनक तक नहीं लगने दी थी. बस वह यहां खानापूर्ति के लिए आता था और खर्चे के रुपए दे कर वापस पानीपत लौट आता था.

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पति अहसान के कईकई दिनों तक घर से अचानक से गायब हो जाने पर नाजनीन परेशान हो जाती थी. जब वह पति से इस बारे में पूछती थी तो वह उस से झगड़ पड़ता और हाथापाई पर उतर आता था. नाजनीन कोई दूध पीती बच्ची नहीं थी, जो पति के जुल्म को भाग्य समझ कर चुपचाप सह लेती. वह पढ़ीलिखी सभ्य खानदान की महिला थी. चुप बैठने वालों में से वह नहीं थी.

पति के अचानक गुम होने का राज फाश करने की उस ने ठान ली. उस दिन के बाद से वह पति पर पैनी नजर रखने लगी थी. जल्द ही पति की कलई खुल गई थी कि वह पहले से शादीशुदा है.

पहली पत्नी नूरजहां से उस के 2 औलादें भी हैं. जबकि अहसान ने उस से झूठ बोला था कि उस ने शादी नहीं की थी. पहली पत्नी नूरजहां भी पति के दूसरी शादी करने की बात जान चुकी थी. इसलिए वह भी उस से नाराज थी.

पति का सच सामने आने के बाद नाजनीन यह कतई बरदाश्त करने को तैयार नहीं थी कि उस का पति पहली पत्नी नूरजहां के साथ कोई संबंध या रिशता रखे.

पति से उस ने साफ कह दिया, ‘‘तुम ने मेरे साथ धोखा किया है. शादीशुदा और 2 बच्चों के बाप होते हुए भी तुम ने झूठ बोल कर यह बात मुझ से छिपाई थी. एक बात कान खोल कर सुन लेना, मेरे जीते जी तुम मेरी सौतन के साथ कोई रिश्ता नहीं रखोगे. अगर मेरी बात तुम ने नहीं मानी तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा, यह तुम समझ लेना. मैं उन औरतों में से नहीं हूं जो पति के हर जुल्म हंस कर सहती रहूं.’’

अहसान सैफी समझ गया था कि नाजनीन जो कह रही है, उसे करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी. लेकिन वह मर्द ही क्या जो पत्नी की धमकियों के आगे घुटने टेक दे. उस ने ठान लिया कि जो होगा देखा जाएगा, लेकिन पहली बीवी को नहीं छोड़ेगा.

सौतन को ले कर नाजनीन और अहसान के बीच में जंग छिड़ी तो जैसे थमने का नाम ही नहीं ले रही थी. नूरजहां को ले कर रोज दोनों के बीच कलह होती थी.

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रोजरोज की कलह से अहसान ऊब चुका था और नाजनीन और उस के दोनों बेटों से छुटकारा पाना चाहता था. लेकिन कैसे? इस बारे में वह सोचने लगा. वह जानता था कि नाजनीन से जीत पाना आसान नहीं होगा. उस के बाद शातिर अहसान ने अपना पैंतरा बदल दिया.

कल तक पत्नी से झगड़ने वाला चालाक अहसान अचानक उस के सामने फल से लदी डालियों के समान झुक गया और अपनी गलती की उस से माफी भी मांग ली. पत्नी को यह भी यकीन दिलाने में कामयाब हो गया कि उस के अलावा वह किसी और औरत की ओर कभी नजर उठा कर भी नहीं देखेगा, पहली पत्नी नूरजहां से भी कभी नहीं मिलेगा और न ही कभी बात करेगा.

पति की बेईमान शराफत पर नाजनीन ने आंख बंद कर यकीन कर लिया. मगर मक्कारी की खाल ओढ़े अहसान मौके की तलाश में बैठा था. जब अहसान को यकीन हो गया कि नाजनीन उस पर अंधा विश्वास करने लगी है तो उस ने अपने मंसूबों का पत्ता खोल दिया.

बात दिसंबर, 2016 के दूसरे पखवाड़े की है. बाजार से अहसान नींद की गोलियों के 2 पत्ते खरीद कर ले आया और अपनी शर्ट की ऊपरी जेब में छिपा कर रख लिए. रात खाने में चुपके से उस ने पूरी की पूरी गोलियां पाउडर बना कर मिला दीं. दवा मिला खाना पत्नी और दोनों बेटों को खिला दिया. खाना खाने के कुछ ही देर बाद तीनों गहरी नींद के आगोश में समा गए. उस ने तीनों को हिलाडुला कर देखा. तीनों के शरीर में कोई हरकत नहीं थी.

अगले भाग में पढ़ें- शादी डौटकौम के जरिए वह एक नए शिकार की तलाश में जुट गया

Manohar Kahaniya- दुलारी की साजिश: भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

उन के रिश्ते के मामा राधा उरांव राजनीति के पुराने खिलाड़ी थे. राजनीति का ककहरा अनिल ने उसी मामा से सीखा और किस्मत आजमाने रामविलास पासवान के पास पहुंच गए. उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ अनिल के सिर पर रख दिया और उन्हें आदिवासी प्रकोष्ठ का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया.

खद्दर का सफेद कुरता पायजामा पहन कर अनिल उरांव ताकतवर हो गए थे. यह घटना से 7 साल पहले की बात है.

अमीरों की तरह ठाठबाट थे प्रियंका के अनिल के पास अब पैसों के साथ साथ सत्ता की पावर थी और बड़ेबड़े माननीयों के बीच में उठनाबैठना भी. पहली बार अनिल ने सत्ता के गलियारे का मीठा स्वाद चखा था. माननीयों के सामने जब नौकरशाह सैल्यूट मारते थे, यह देख कर अनिल का दिल बागबाग हो जाता था.

यहीं से प्रियंका उर्फ दुलारी नाम की महिला अनिल उरांव की किस्मत में दुर्भाग्य की कुंडली मार कर बैठ गई थी. तब कोई नहीं जानता था कि यही प्रियंका एक दिन नागिन बन कर अनिल को डस लेगी.

36 वर्षीया प्रियंका हाट थानाक्षेत्र में स्थित केसी नगर कालोनी में दूसरे पति राजा के साथ रहती थी. पहला पति उसे बहुत पहले तलाक दे चुका था. उस के कोई संतान नहीं थी लेकिन दोनों बड़े ठाठबाट से रहते थे, अमीरों की तरह.

कई कमरों वाले उस के शानदार और आलीशान मकान में सुखसुविधाओं की सारी चीजें मौजूद थीं. घर में कमाने वाला सिर्फ उस का पति था. एक आदमी की कमाई में ऐसी शानोशौकत देख कर मोहल्ले वाले दंग रहते थे.

प्रियंका की शानोशौकत देख कर मोहल्ले वालों का दंग रहना जायज था. उस का पति राजा पूर्णिया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राजनाथ यादव का एक मामूली सा कार ड्राइवर था. उस की इतनी आमदनी भी नहीं थी कि वह घर खर्च के अलावा नवाबों जैसी जिंदगी जिए. ये ऐशोआराम तो प्रियंका की खूबसूरती की देन थी.

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गोरीचिट्टी और तीखे नयननक्श वाली प्रियंका की मोहल्ले में बदनाम औरतों में गिनती होती थी. शहर के बड़ेबड़े धन्नासेठों, भूमाफियाओं और नेताओं का उस के घर पर उठनाबैठना था. उस में लोजपा का युवा नेता अनिल उरांव का नाम भी शामिल था.

शादीशुदा होते हुए भी अनिल उरांव प्रियंका की गोरी चमड़ी के इस कदर दीवाने हुए कि उसे देखे बिना रह नहीं पाते थे. लेकिन प्रियंका उन से तनिक भी प्यार नहीं करती थी. वह तो केवल उन की दौलत से प्यार करती थी. वह जानती थी कि अनिल एक एटीएम मशीन है. बस, उस से दौलत निकालते जाओ, निकालते जाओ और ऐश करते जाओ.

प्रियंका ने बनाई योजना

अनिल उरांव जिस प्रियंका के प्यार में दीवाने थे, पूर्णिया का शूटर अंकित यादव उर्फ अनंत भी उसी प्रियंका को बेपनाह चाहता था. अनिल का उस की प्रेमिका प्रियंका की ओर आकर्षित होना, अंकित के सीने पर सांप लोटने जैसा था.

उस ने प्रियंका से कह दिया था ‘‘तू अपने आशिक से कह देना कि मेरी चीज पर नजर न डाले, वरना जिस दिन मेरा भेजा गरम हो गया तो उस की खोपड़ी में रिवौल्वर की सारी गोलियां डाल दूंगा.’’

फिर उस ने अपने प्रेमी अंकित को समझाया, ‘‘देखो अंकित, तुम ठहरे गरम खून के इंसान. जब देखो गोली, कट्टा और बंदूक की बातें करते हो, कभी ठंडे दिमाग से काम नहीं लेते. जिस दिन से ठंडे दिमाग से सोचना शुरू कर दोगे, उस दिन बिना गोली, कट्टे के सारे काम बन जाएंगे. क्यों बेवजह परेशान हो कर अपना ब्लड प्रैशर बढ़ाते हो. मैं क्या कहती हूं, उसे ध्यान से सुनो. मेरे पास एक नायाब तरीका है. जिस से सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

‘‘बता क्या कहना चाहती है तू.’’ अंकित ने पूछा.

‘‘यही कि अनिल उरांव का अपहरण कर लेते हैं और बदले में उस के घर वालों से फिरौती की एवज में मोटी रकम ऐंठ लेते हैं. नेताजी की जान के बदले उस के घर वालों के लिए 10-20 लाख देना कोई बहुत बड़ी बात

नहीं होगी. बोलो क्या कहते हो?’’ प्रियंका ने प्लान बनाया.

‘‘ठीक है जो करना हो, जल्दी करना. उस गैंडे को तेरे नजदीक देख कर मेरे तनबदन

में आग सी लग जाती है, कहीं ऐसा न हो

कि मैं अपना आपा खो दूं और तू भी स्वाहा हो जाए. जो करना है, जल्दी करना, समझी.’’ अंकित बोला.

‘‘ठीक है, बाबा ठीक है. क्यों बिना मतलब के अपना खून जलाते हो. समझो कि काम हो गया और तुम्हारी राह का कांटा भी हट गया.’’ प्रियंका ने कहा.

प्रियंका और अंकित ने मिल कर अनिल के अपहरण की योजना बना ली. योजना के मुताबिक, 29 अप्रैल, 2021 की सुबह प्रियंका ने अनिल उरांव को फोन कर के अपने घर आने को कहा. अनिल भतीजे राजन को साथ ले कर मोटरसाइकिल से निकले और बीच रास्ते में खुद मोटरसाइकिल से नीचे उतर कर कहा प्रियंका के यहां जा रहा हूं. जब फोन करूं तो बाइक ले कर चले आना.

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फिरौती ले कर बदल गई नीयत

अनिल प्रियंका के यहां पहुंचे तो उस के घर पर पहले से शूटर अंकित यादव उर्फ अनंत, उस का भांजा मिट्ठू कुमार यादव उर्फ मिट्ठू, मोहम्मद सादिक उर्फ राहुल और चुनमुन झा उर्फ बटेसर मौजूद थे.

अंकित को देख कर अनिल घबरा गए और वापस लौटने लगे तो चारों ने लपक कर उन्हें पकड़ लिया. अनिल ने बदमाशों के चंगुल से बचने के लिए खूब संघर्ष किया. कब्जे में लेने के लिए बदमाशों ने अनिल को लातघूंसों से खूब मारा और कपड़े वाली मोटी रस्सी से उन के हाथपैर बांध कर उन्हें कमरे में बंद कर दिया और उन का फोन भी अपने कब्जे में ले लिया ताकि वह किसी से बात न कर सकें.

फिर उन्हीं के फोन से अंकित ने अनिल के घर वालों को फोन कर के अपहरण होने की जानकारी देते हुए फिरौती के 10 लाख रुपए की मांग की. उस के बाद मोबाइल फोन से सिम निकाल कर तोड़ कर फेंक दिया ताकि पुलिस उन तक पहुंच न पाए.

30 अप्रैल, 2021 को फिरौती की रकम मिलने के बाद बदमाशों की नीयत बदल गई. चारों ने प्रियंका के घर पर ही अनिल की गला दबा कर हत्या कर दी और पेचकस जैसे नुकीले हथियार से अंकित ने अनिल की दोनों आंखें फोड़ दीं.

फिर उसी रात अनिल की लाश के. नगर थाने के डंगराहा के एक खेत में गड्ढा खोद कर दफना दी. जल्दबाजी में लाश दफन करते समय मृतक का एक हाथ बाहर निकला रह गया और वे कानून के शिकंजे में फंस गए.

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कथा लिखे जाने तक फरार चल रहा मुख्य आरोपी अंकित यादव उर्फ अनंत और उस का भांजा मिट्ठू कुमार यादव दोनों दरभंगा जिले से नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिए गए थे. दोनों आरोपियों ने लोजपा नेता अनिल उरांव के अपहरण और हत्या  करने का जुर्म स्वीकार लिया था.

जांचपड़ताल में प्रियंका के असम में करोड़ों रुपए संपत्ति का पता चला है, जो अपराध से कमाई गई थी. पुलिस ने संपत्ति जब्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी.

कथा लिखे जाने तक पुलिस पांचों आरोपियों प्रियंका उर्फ दुलारी, अंकित यादव, मिट्ठू कुमार यादव, मोहम्मद सादिक और चुनमुन झा के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. पांचों आरोपी जेल की सलाखों के पीछे अपने किए की सजा भुगत रहे थे.

—कथा मृतक के रिश्तेदारों और पुलिस सूत्रों पर आधारित

Satyakatha: नफरत की विषबेल- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

माइना रामुलु को गिरफ्तार कर के पुलिस टीम जुबली हिल्स थाने ले आई. इंसपेक्टर राजशेखर रेड्डी ने इस की सूचना पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार को दे दी.

महिलाओं के दुश्मन सिरफिरे कातिल माइना रामुलु की गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही सीपी अंजनी कुमार पूछताछ करने थाने पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने हत्यारे रामुलु से 3-4 घंटों तक कड़ाई से पूछताछ की.

चूंकि रामुलु पहले भी ऐसे ही कई मामलों में पकड़ा जा चुका था, इसलिए वह सच बताने में ही अपनी भलाई समझता था. सो उस ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कबूल कर लिया कि उसी ने कमला बैंकटम्मा की हत्या की थी. हत्या करने के बाद उस की ज्वैलरी लूट ली थी. फिर उस ने सिलसिलेवार पूरी कहानी पुलिस अधिकारियों को बता दी.

अगले दिन 27 जनवरी को पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार ने पुलिस लाइंस में प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की. पत्रकारों को जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि माइना रामुलु एक सीरियल किलर है. इस ने बोवेनपल्ली, चंदा नगर और डंडीगल थानाक्षेत्र में सर्वाधिक हत्याएं की थीं.

उस पर विभिन्न मामलों के कुल 21 मुकदमे दर्ज हैं, जिन में 16 मामले महिलाओं की हत्याओं के और 4 चोरियों के हैं. वह कई बार जेल की हवा खा चुका है.

हत्या के एक मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई जा चुकी है. साल 2018 में जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद से वह फरार हो गया था. फरारी के दौरान इस ने 2 और महिलाओं को अपने नापाक इरादों का शिकार बना लिया और बड़ी बेरहमी से उन का कत्ल कर डाला.

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घंटों चली वार्ता के दौरान पत्रकारों के सामने सीपी अंजनी कुमार ने किलर रामुलु की करतूतों की कुंडली खोलते रहे. उस के बाद पुलिस ने हत्यारोपी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया.

पुलिस पूछताछ में 18 महिलाओं के कातिल माइना रामुलु ने दिल दहलाने वाला जो बयान दिया था, उसे सुन कर सभी पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए थे. नफरत की आग में जलते हुए माइना रामुलु एक गुनाह की दास्तान 18 बेगुनाह महिलाओं के खून से लिखेगा, किसी ने सोचा भी न था. आखिर उस के दिल में दबी नफरत की कौन सी चिंगारी सुलग रही थी, जिस में वह आहिस्ताआहिस्ता जल रहा था? आइए पढ़ते हैं यह कहानी.

45 वर्षीय माइना रामुलु मूलरूप से संगारेड्डी जिले के बोरामंडा इलाके के कंडी मंडल के रहने वाले चंद्रियाय का बेटा था. चंद्रियाय के 4 बेटों में माइना रामुलु सब से बड़ा था. 6 सदस्यीय परिवार में चंद्रियाय इकलौते कमाने वाले थे. उन की कमाई इतनी नहीं थी कि परिवार की जीविका चलाने के बाद उन्हें बेहतर जिंदगी दे सके. बड़े होने के नाते यह बात रामुलु समझता था.

रामुलु गरीबी की चादर ओढ़तेओढ़ते ऊब चुका था. वह मुफलिसी वाली जिंदगी नहीं, बल्कि रईसजादों वाली ठाठबाट की जिंदगी जीना चाहता था. सड़कों पर चमचमाती कार देख कर उस का भी मन होता था कि वह भी ऐसी ही कार में आराम से घूमेफिरे. ऐश की जिंदगी जिए.

इन सब के लिए ढेर सारे पैसों की जरूरत होती है, वह पैसा न तो उस के पास था और न ही उस के मांबाप के पास. लिहाजा वह अपना मन मसोस कर रह जाता था.

धीरेधीरे माइना रामुलु जवानी की दहलीज पर कदम रखता जा रहा था. 21 साल का हुआ तो उस के मांबाप ने यह सोच कर बेटे की गृहस्थी बसा दी कि जिम्मेदारी जब सिर पर पड़ेगी तो कमाने लगेगा.

लेकिन हुआ इस का उल्टा. माइना रामुलु के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. रामुलु की पत्नी रेखा उस से 4 कदम आगे निकली. आंखों में जो रईसी का ख्वाब लिए ससुराल की दहलीज पर उतरी थी, उस का ख्वाब धरा का धरा रह गया.

उस के अरमानों का महल रेत की तरह भरभरा कर ढह गया था. आंसू आंखों से सूखने का नाम नहीं ले रहे थे. रेखा की आंखों से निकले आंसुओं से रामुलु के घर की खुशियां बह गई थीं. आए दिन घर में कलह होती थी. रामुलु के मांबाप नई बहू के व्यवहार से परेशान थे. हर घड़ी वे यही सोचते रहते थे कि इस से अच्छा तो कुंवारा ही था. कम से कम बहू के रूप में यह मुसीबत तो नहीं आती, जो दिनरात का चैन छीन चुकी है.

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चंद्रियाय के घर से मुसीबत जाने का नाम ही नहीं ले रही थी. जैसेतैसे रामुलु की शादी का एक साल बीता. एक दिन अचानक रामुलु की पत्नी रेखा ससुराल पक्ष के एक परिचित के साथ भाग गई. घर से बहू के भाग जाने से पूरे गांव में रामुलु और उस के घर वालों की बड़ी बदनामी हुई. इस बदनामी को रामुलु के पिता सहन नहीं कर पाए और दिल का दौरा पड़ने से उन की मृत्यु हो गई.

पिता की मौत से रामुलु को गहरा झटका लगा. वह सोचता था कि उसी की वजह से पिता की मौत हुई थी. वह अपने आप को हर घड़ी कोसता रहता. उसी समय उस के दिल में औरत से घृणा हो गई. यह बात साल 2000 के करीब की है.

पत्नी की बेवफाई से रामुलु अंदर तक टूट गया था. भले ही पत्नी से उस की पटती नहीं थी, लेकिन उसे दिल की गहराइयों से प्यार करता था. उस की खुशियों का खयाल रखता था. सपने में भी उस ने नहीं सोचा था कि उस की पत्नी इस तरह उस के प्यार को ठोकर मार कर पराए मर्द के साथ भाग जाएगी.

उस का चेहरा आंखों के सामने आते ही क्रोध से पागल हो जाता था. गुस्से की ज्वाला में जलते रामुलु ने कसम खा ली कि जिस तरह उस की पत्नी उसे ठुकरा कर पराए मर्द के साथ भाग गई है, उसी तरह उस के किए की सजा हर औरत को भुगतनी होगी. उसी दिन से माइला रामुलु के दिल में औरतों के लिए नफरत की विषबेल पनप गई. बदनामी की तपिश में जलता हुआ माइला रामुलु धीरेधीरे ताड़ी और शराब का आदी बन गया. हर समय वह शराब और ताड़ी के नशे में डूबा रहता.

बात 2003 की है. रामुलु कच्ची दारू पीने तुरपान इलाके में गया. वहां उस की मुलाकात दामिनी से हुई. दामिनी दारू भट्ठी पर काम करती थी. उसे देखते ही रामुलु के जिस्म में वासना के कीड़े कुलबुलाने लगे. वह रोज ही दारू पीने दामिनी की भट्ठी पर आया करता था.

धीरेधीरे उस ने दामिनी को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया. एक दिन धोखे से वह दामिनी को जंगल में ले गया. वहां उस के साथ मुंह काला किया और उस की साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर हत्या कर दी और लाश वहीं छोड़ कर फरार हो गया.

इस के बाद तो माइना रामुलु के जुर्म के रास्ते खुल गए. वह किसी औरत को अपना शिकार बनाता तो उस समय उस के शरीर पर जो भी गहने होते, उन्हें भी लूट लेता.

अगले भाग में पढ़ें- उन महिलाओं की हत्या किसने की

नादानियां- भाग 3: उम्र की इक दहलीज

राकेश का माथा ठनका. अब उस ने प्रथमा की बचकानी हरकतों पर गौर करना शुरू किया. उसे दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आने लगी. उसे याद आया कि बातबात पर ‘पापा’ कहने वाली प्रथमा आजकल उस से बिना किसी संबोधन के ही बात करती है. उस की उम्र का अनुभव उसे चेता रहा था कि प्रथमा उस से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रही है मगर उस के घर का संस्कारी माहौल इस की बगावत कर रहा था, वह ऐसी किसी भी संभावना के खिलाफ था. इस कशमकश से बाहर निकलने के लिए राकेश ने एक रिस्क लेने की ठानी. वह अपने तजरबे को परखना चाहता था. प्रथमा की मानसिकता को परखना चाहता था. जल्द ही उसे ऐसा एक मौका भी मिल गया. साल अपनी समाप्ति पर था. हर जगह न्यू ईयर सैलिब्रेशन की तैयारियां चल रही थीं. रितेश को उस के एक इवैंट मैनेजर दोस्त ने न्यू ईयर कार्निवाल का एक कपल पास दिया. ऐन मौके पर रितेश का जाना कैंसिल हो गया तो प्रथमा ने राकेश से जिद की, ‘‘चलिए न. हम दोनों चलते हैं.’’ राकेश को अटपटा तो लगा मगर वह इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहता था, इसलिए उस के साथ जाने के लिए तैयार हो गया.

पार्टी में प्रथमा के जिद करने पर वह डांसफ्लोर पर भी चला गया. जैसा कि उस का अनुभव कह रहा था, प्रथमा उस से एकदम चिपक कर डीजे की तेज धुन पर थिरक रही थी. कभी अचानक उस की बांहों में झूल जाती तो कभी अपना चेहरा बिलकुल उस के पास ले आती. अब राकेश का शक यकीन में बदल गया. वह समझ गया कि यह उस का वहम नहीं है बल्कि प्रथमा अपने पूरे होशोहवास में यह सब कर रही है. मगर क्यों? क्या यह अपने पति यानी रितेश के साथ खुश नहीं है? क्या इन के बीच सबकुछ ठीक नहीं है? प्रथमा जनून में अपनी हदें पार कर के कोई सीन क्रिएट करे, इस से पहले ही वह उसे अपनी तबीयत खराब होने का बहाना बना कर वहां से वापस ले आया. राकेश को रातभर नींद नहीं आई. पिछले दिनों की घटनाएं उस की आंखों में चलचित्र की तरह गुजरने लगीं.

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रितेश का अपनी मां से अत्यधिक लगाव ही प्रथमा के इस व्यवहार की मूल जड़ था. नवविवाहिता पत्नी को छोड़ कर उस का अपनी मां के पल्लू से चिपके रहना एक तरह से प्रथमा के वजूद को चुनौती थी. उसे लग रहा था कि उस का रूप और यौवन पति को बांधने में नाकामयाब हो रहा है. ऐसे में इस नादान बच्ची ने यह रास्ता चुना. शायद उस का अवचेतन मन रितेश को जताना चाहता था कि उस के लावण्य में कोई कमी नहीं है. वह किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम है.

बेचारी बच्ची, इतने दिनों तक कितनी मानसिक असुरक्षा से जूझती रही. रितेश को तो शायद इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा कि उस का मम्मीप्रेम क्या गुल खिला रहा है. और वह भी तो इस द्वंद्व को कहां समझ सका…या फिर शायद प्रथमा मुझ पर डोरे डाल कर अपनी सास को कमतरी का एहसास कराना चाहती है. ‘कारण जो भी हो, मुझे प्रथमा को इस रास्ते से वापस मोड़ना ही होगा,’ राकेश का मन उस के लिए द्रवित हो उठा. उस ने मन ही मन आगे की कार्ययोजना तय कर ली और ऐसा होते ही उस की आंखें अपनेआप मुंदने लगीं और वह नींद की आगोश में चला गया.

अगले दिन राकेश ने औफिस से आते ही पत्नी के पास बैठना शुरू कर दिया और चाय उस के साथ ही पीने लगा. वह रितेश को किसी न किसी बहाने से उस की चाय ले कर प्रथमा के पास भेज देता ताकि वे दोनों कुछ देर आपस में बात कर सकें. चाय पी कर राकेश पत्नी को ले कर पास के पार्क में चला जाता. जाने से पहले रितेश को हिदायत दे कर जाता कि वह दोस्तों के पास जाने से पहले प्रथमा के साथ कम से कम 1 घंटे बैठे.

शुरूशुरू में तो प्रथमा और रितेश को इस फरमान से घुटन सी हुई क्योंकि दोनों को ही एकदूसरे की आदत अभी नहीं पड़ी थी मगर कुछ ही दिनों में उन्हें एकदूसरे का साथ भाने लगा. कई बार राकेश दोनों को अकेले सिनेमा या फिर होटल भी भेज देता था. हां, पत्नी को अपने साथ घर पर ही रोके रखता. एकदो बार रितेश ने साथ चलने की जिद भी की मगर राकेश ने हर बार यह कह कर टाल दिया कि अब इस उम्र में बाहर का खाना उन्हें सूट नहीं करता. राकेश ने महसूस किया कि अब रितेश भी प्रथमा के साथ अकेले बाहर जाने के मौके तलाशने लगा है यानी उस की योजना सही दिशा में आगे बढ़ रही थी.

हनीमून के बाद रितेश कभी प्रथमा को मायके के अलावा शहर से बाहर घुमाने नहीं ले गया. इस बार उन की शादी की सालगिरह पर राकेश ने जब उन्हें 15 दिनों के साउथ इंडिया ट्रिप का सरप्राइज दिया तो रितेश ने जाने से मना का दिया, कहा, ‘‘हम दोनों के बिना आप इतने दिन अकेले कैसे रहेंगे? आप के खाने की व्यवस्था कैसे होगी? नहीं, हम कहीं नहीं जाएंगे और अगर जाना ही है तो सब साथ जाएंगे.’’ ‘‘अरे भई, मैं तो तुम दोनों को इसलिए भेज रहा हूं ताकि कुछ दिन हमें एकांत मिल सके. मगर तुम हो कि मेरे इशारे को समझ ही नहीं रहे.’’ राकेश ने अपने पुराने नाटकीय अंदाज में कहा तो रितेश की हंसी छूट गई. उस ने हंसते हुए प्रथमा से चलने के लिए पैकिंग करने को कहा और खुद भी उस की मदद करने लगा.

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15 दिनों बाद जब बेटाबहू लौट कर आए तो दोनों के ही चेहरों पर असीम संतुष्टि के भाव देख कर राकेश ने राहत की सांस ली. दोनों उस के चरणस्पर्श करने को झुके तो उन्होंने बच्चों को बांहों में समेट लिया. प्रथमा ने आज न जाने कितने दिनों बाद उसे फिर से ‘पापा’ कह कर संबोधित किया था. राकेश खुश था कि उस ने राह भटकती एक नादान को सही रास्ता दिखा दिया और खुद भी आत्मग्लानि से बच गया.

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