सैक्स एजुकेशन : इशारों में बात करने का समय नहीं रहा

हिंदी फिल्म ‘पति, पत्नी और वो’ के एक सीन में हीरो कार्तिक आर्यन बोलता है, ‘‘बीवी से सैक्स मांग लें तो हम भिखारी. बीवी को सैक्स के लिए मना कर दें तो हम अत्याचारी. और किसी तरह जुगाड़ लगा के उस से सैक्स हासिल कर लें तो बलात्कारी भी हम हैं.’’

इस संवाद पर बवाल हुआ था और बहुत से लोगों को यह एतराज था कि इस तरह के संवाद मैरिटल रेप (शादी के बाद पत्नी के साथ जबरदस्ती या बहलाफुसला कर सैक्स करना) को बढ़ावा देता है और मर्दों की घटिया सोच को भी दिखाता है. कोई भी मर्द सैक्स पाने के लिए भिखारी, अत्याचारी और यहां तक कि बलात्कारी भी बन सकता है.

क्या वाकई ऐसा है? क्या जब कोई लड़की ‘नो मींस नो’ बोलती है, तो मर्द को सम?ा जाना चाहिए कि उसे अपनी हद नहीं पार करनी चाहिए? लेकिन क्या लड़कियों, खासकर भारतीय समाज में जहां लड़की को मर्दवादी सोच के चलते दोयम दर्जे का सम?ा जाता है, को इतनी सम?ा भी है कि वे सैक्स के लिए कब हां करनी और कब मना करना है, पर अपनी राय मजबूती के साथ रख सकें?

शायद नहीं, तभी तो भारत में सैक्स को ले कर आज भी उतनी गंभीरता से बहस नहीं होती है, जितनी पश्चिमी देशों में. यही वजह है कि जब पतिपत्नी या कोई और जोड़ा बिस्तर पर होते हैं, तो वे सैक्स पर अपनी बात कहने से घबराते हैं.

लड़की को लगता है कि अगर कहीं वह ज्यादा खुल गई, तो उसे धंधे वाली या सैक्स के लिए उतावली सम?ा लिया जाएगा. लड़का भी यही सोच कर चुप्पी साध लेता है कि अगर कहीं लड़की ने बोल दिया कि उसे मजा नहीं आया, तो वह अपना मुंह कैसे उसे दिखा पाएगा.

भारत में अमूमन घरों में भी औरतें या मर्द आपस में ऐसे जुमले बोलते हैं कि सैक्स को ले कर बात भी हो जाती है और किसी को भनक तक नहीं लगती है. बड़ी औरतें नई ब्याही लड़की से जब पूछती हैं कि पति से ‘सही’ निभ रही है न, तो इस ‘सही’ का मतलब यही होता है कि सैक्स लाइफ में कोई दिक्कत तो नहीं है.

सुहागरात पर ‘बिल्ली मारना’ मुहावरा भी यही बात कहता है कि पति को पहली रात को ही अपनी मर्दानगी का नमूना दिखा देना चाहिए, ताकि पत्नी उम्रभर उस के काबू में रहे. ‘सुहागरात पर दूध का असर हुआ या नहीं’, ‘मैं ने तो हनीमून पर छत और पंखा ही देखा’, ‘पलंग सहीसलामत है न’, ‘पति ने छतरी का इस्तेमाल किया या नहीं’ जैसे बहुत से वाक्य हैं, जो सैक्स लाइफ को ही कोडवर्ड में बयां करते हैं.

दरअसल, भारत में सैक्स ऐजूकेशन की कमी के चलते ऐसा है. बच्चों को जो जानकारी परिवार के बड़े लोगों से आसान भाषा में सहज रूप से मिलनी चाहिए, वह नदारद है. परिवार में सैक्स पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता है.

लेकिन बच्चे अपनी जिज्ञासा के चलते कहीं से तो जानकारी लेंगे ही, फिर वे उन के दोस्त हों या सोशल मीडिया, अधकचरी जानकारी को ही वे सही मान लेते हैं. इस का नतीजा भयावह भी हो सकता है.

उदाहरण के तौर पर, हमारे समाज में यह सोच बनी हुई है कि अगर सुहागरात पर सैक्स करने के दौरान अगर लड़की के खून नहीं आया तो वह कुंआरी नहीं है, बल्कि खेलीखाई है. पर हकीकत इस से अलग भी हो सकती है, क्योंकि लड़की के अंग की ?िल्ली तो किसी और वजह जैसे खेलकूद या साइकिल चलाने से भी टूट सकती है.

इसी तरह अगर कोई लड़का शादी की पहली रात को अपने साथी को सैक्स का पूरा सुख नहीं दे पाया या वह सैक्स करने में ही नाकाम रहा, तो वह खुद को नामर्द मान लेता है और फिर तनाव में जीने लगता है, जबकि इन दोनों समस्याओं का समाधान उस जोड़े की आपसी बातचीत से ही निकल सकता है.

हाल के सालों में टैलीविजन के इश्तिहारों में माहवारी और कंडोम को ले कर जो खुलापन दिख रहा है, पहले वैसा नहीं था. यहां तक कि ब्रा और पैंटी के इश्तिहार भी छिपेछिपाए से होते थे. इश्तिहार तो बदल गए, पर समाज की सोच अभी भी पुरानी ही है.

मांबाप को आज भी यह लगता है कि अगर उन के बच्चों को कम उम्र में ही सैक्स की जानकारी मिल गई, तो वे उसे अपनी नादानी में आजमाना चाहेंगे, पर ऐसा नहीं है. अगर उन्हें अपने मांबाप से ही सटीक जानकारी मिलने लगेगी तो उन की सैक्स को ले कर फैंटेसी से भी परदा हटने लगेगा. सरकार जो खर्चा एड्स जैसी बीमारियों से जागरूक बनाने के लिए कर रही है, उसे अगर सैक्स ऐजूकेशन पर खर्च करे तो ऐसी बीमारियां बहुत कम पनपेंगी.

लिहाजा, इशारों की भाषा में सैक्स को  सम?ाने के दिनों को अब भूल जाना चाहिए और साफ और सरल अंदाज में बच्चों को इस की तालीम देनी चाहिए. यह परिवार और सरकार दोनों की बराबर की जिम्मेदारी है. फिर किसी मर्द को भिखारी, अत्याचारी या बलात्कारी बनने की नौबत ही नहीं आएगी.

लड़की मुझसे ऊंचे पद पर है घरवाले शादी करने से मना करते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 24 साल है. मैं उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में रहता हूं. मेरी नौकरी तो प्राइवेट है, पर तनख्वाह अच्छी है. वहां एक लड़की मेरी अच्छी दोस्त है. वह मेरी मैनेजर भी है. हम दोनों शादी करना चाहते हैं, पर मेरे घर वाले बोल रहे हैं कि लड़की तुझ से बड़े पद पर है, तो वह जिंदगीभर तुझ पर अपना हुक्म चलाएगी. मैं अपने परिवार वालों की सोच कैसे बदलूं?

जवाब

आप घर वालों की सोच ज्यादा बदलने की कोशिश मत कीजिए, जो पुराने खयालों के हैं कि पत्नी उम्र में पति से छोटी हो, पति से कम पढ़ीलिखी हो, कद में छोटी हो और अब नए जमाने में आमदनी में भी नीचे हो. मैनेजर होने के नाते वह अभी दफ्तर में भी तो आप पर हुक्म चलाती है न, जो आप को मानना पड़ता है.

आपसी तालमेल और समझ आप दोनों के बीच होना जरूरी है कि दफ्तर की जिंदगी और पद घर की जिंदगी में दखल नहीं देंगे. घर वालों की बातों पर ध्यान मत दीजिए, लेकिन आप को यह खयाल रखना पड़ेगा कि शादी के बाद पत्नी की पोस्ट और पगार को ले कर आप में गिल्ट या हीनभावना न आए.

फर्ज की याद : शर्मा जी ने गणेशी के हाथ का पानी क्यों नहीं पिया

जब से सुनील शर्मा इस दफ्तर में प्रमोशन ले कर आए हैं तब से वे कभी चपरासी गणेशी से पानी नहीं मंगाते हैं. वे खुद ही उठ कर पी आते हैं, चाहे मेज पर कितना भी काम हो.

गणेशी कई दिनों से सुनील शर्मा की इस आदत को देख रहा था. आज भी जब वे पानी पी कर अपनी मेज पर आ कर बैठे तब गणेशी आ कर बोला, ‘‘बाबूजी, एक बात कहूं…’’

‘‘कहो,’’ सुनील शर्मा ने नजर उठा कर गणेशी की तरफ देखा.

‘‘जब से आप आए हो, उठ कर पानी पीते हो.’’

‘‘हां, पीता हूं,’’ सुनील शर्मा ने सहजता से जवाब दिया.

‘‘आप मुझे आदेश दे दिया करें न, मैं पिला दिया करूंगा. आखिर मेरी ड्यूटी पानी पिलाने की ही है,’’ गणेशी ने सवालिया निगाहों से पूछा.

‘‘देखो गणेशी, मेरा उसूल है कि अपना काम खुद करना चाहिए,’’ सुनील शर्मा ने अपनी बात रखी.

‘‘ऐसी बात नहीं है बाबूजी, आप मेरे हाथ का पानी पीना नहीं चाहते हैं,’’ गणेशी ने यह कह कर गुस्से से सुनील शर्मा को देखा.

सुनील शर्मा तुरंत कोई जवाब नहीं दे पाए. गणेशी फिर बोला, ‘‘मगर, मैं सब जानता हूं बाबूजी, आप मेरे हाथ का पानी क्यों नहीं पीना चाहते हैं.’’

‘‘क्या जानते हो?’’

‘‘मैं अछूत हूं, इसलिए आप मेरा दिया पानी नहीं पीना चाहते हो.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है गणेशीजी, मैं छुआछूत को नहीं मानता हूं.’’

‘‘फिर मुझ से पानी मंगा कर क्यों नहीं पीते हो?’’

‘‘देखो गणेशीजी, आप चपरासी हो. मैं जब से इस दफ्तर में आया हूं, किसी को आप ने अपनी मरजी से पानी नहीं पिलाया. जिस बाबू ने पानी पीने के लिए कहा तब कहीं जा कर आप ने पिलाया…’’ समझते हुए सुनील शर्मा बोले, ‘‘इसी बात को मैं कई दिनों से देख रहा था, जबकि तुम्हारा यह फर्ज बनता है कि बाबुओं को बिना मांगे पानी पिलाना चाहिए.’’

‘‘बाबूजी, जब प्यास लगती है तभी तो पानी पिलाना चाहिए.’’

‘‘नहीं, यही तो आप गलती कर रहे हो. बिना मांगे पानी ले कर हर मेज पर पहुंच जाना चाहिए. यही एक चपरासी का फर्ज होता है…’’ समझते हुए सुनील शर्मा बोले, ‘‘यही वजह है कि मैं खुद उठ कर पानी पीता हूं. आप ने आज तक अपनी मरजी से मुझे पानी नहीं पिलाया है.’’

‘‘अरे बाबूजी, आप ही पहले ऐसे आदमी हो वरना सभी बाबू मांग कर पानी पीते हैं. आप ही ऐसे हैं जो मुझे अछूत समझ कर पानी नहीं मंगाते हो,’’ गणेशी ने आरोप लगाते हुए कहा.

सुनील शर्मा सोच में डूब गए. गणेशी उन की बात का उलटा मतलब ले रहा है. वे कुछ और जवाब दें, इस से पहले ही साहब की घंटी बज उठी. गणेशी साहब के केबिन में चला गया.

सुनील शर्मा मन ही मन झुंझला उठे. पास की मेज पर बैठे मुकेश भाटी बोले, ‘‘शर्माजी, देख लिए गणेशी के तेवर. आप की बात का उस पर कोई असर नहीं पड़ा.’’

‘‘हां भाटीजी, असर तो नहीं पड़ा,’’ उन्होंने भी स्वीकार करते हुए कहा.

‘‘इसलिए मैं कहता हूं कि अपने उसूल छोड़ दो वरना यह आप पर छुआछूत बरतने का केस दायर कर देगा…’’ सम?ाते हुए मुकेश भाटी बोले, ‘‘फिर कचहरी के चक्कर काटते रहना क्योंकि कानून भी इस का ही पक्ष लेगा.’’

‘‘देखो भाटीजी, मैं तो उस को अपने फर्ज की याद दिला रहा था.’’

‘‘कोई जरूरत नहीं है शर्माजी. जिस को अपना फर्ज समझना ही नहीं है उसे याद दिलाना फुजूल है. उस से बहस कर के खुद का सिर फोड़ना है. फिर मेरा काम था समझने का समझ दिया. आप अपने उसूलों पर ही रहना चाहते हो तो रहो. कल को कुछ हो जाए, तो फिर मुझे कुछ मत कहना,’’ कह कर मुकेश भाटी अपने काम में लग गए.

सुनील शर्मा के भीतर इन बातों को सुन कर हलचल मच गई. अब पहले वाला जमाना नहीं है. सरकार भी रिजर्वेशन के तहत सब महकमों में इन की भरती करती जा रही है, इसलिए चपरासी से ले कर अफसर तक ये ही मिलेंगे.

जिस परिवार में सुनील शर्मा का जन्म हुआ है, वह ब्राह्मण परिवार है. 1970 के पहले उन का ठेठ देहाती गांव था. छुआछूत का जोर था. किसी अछूत को छूना भी पाप समझ जाता था, इसलिए वे गांव में ही अलग बस्ती में रहते थे.

सुनील शर्मा के पिता गंगा सागर गांव में शादीब्याह कराने और कथा बांचने का काम करते थे. वे यह काम केवल ऊंची जाति वालों के यहां किया करते थे. निचली जाति के लोगों के यहां कर्मकांड के लिए वे मना कर दिया करते थे.

गांव की दलित बस्ती गंगा सागर से बहुत नाराज रहती थी. मगर वे कर कुछ नहीं पाते थे, क्योंकि उन की चलती ही नहीं थी.

जब कोई दलित किसी काम से गंगा सागर के पास आता था, तो वे उन्हें बाहर बिठा कर संस्कार करा देते थे. बदले में वे कुछ सिक्के देते थे, जिन्हें वे जमीन पर ही रखवा देते थे. तब यजमान मखौल उड़ा कर कहते थे, ‘पंडितजी, यह कैसा नियम. मेरे हाथ से नहीं लिया, मगर हाथ से अपवित्र सिक्के को आप ने ग्रहण कर लिया तो अपवित्र नहीं हुए.’

बदले में गंगा सागर संस्कृत में शुद्धीकरण के श्लोक पढ़ कर उसे शुद्धी का पाठ पढ़ा देते थे.

उस समय दलितों में कूटकूट कर अपढ़ता भरी थी. विरोध करने के बजाय वे सबकुछ सच मान लेते थे. गांव में कोई गंगा सागर को दलित दिख जाता, तो वे उस से बच कर निकलते थे.

मगर जैसेजैसे दिन बीतते रहे, छुआछूत की यह परंपरा शहरों में खत्म होने के साथसाथ गांवों में भी खत्म होने लगी थी. अब तो न के बराबर रही है. अब भी कुछ पुराने लोग हैं जो छुआछूत को मानते हैं क्योंकि वे उसी जमाने में जी रहे हैं.

सुनील शर्मा को आज नौकरी करते हुए 32 साल हो गए हैं. इन 32 सालों में उन्होंने बहुतकुछ देख लिया है. रिटायरमैंट में 3 साल बचे हैं. गणेशी जैसे कितने ही लोग हैं जो इस दलित अवसर को भुनाना चाहते हैं. इन को सामान्य वर्ग के प्रति हमेशा से नफरत थी, जो विष बीज बन कर वट वृक्ष बन गई है. सरकार ने साल 1989 में इन के लिए जातिसूचक शब्द का इस्तेमाल करने पर बैन लगा दिया है, तब से ही इन के हौसले बढ़ने लगे हैं.

‘‘अरे शर्माजी, पानी पीयो,’’ इस आवाज से सुनील शर्मा की सारी विचारधारा भंग हो गई.

गणेशी गिलास लिए उन के सामने खड़ा था. उन्होंने गटागट पानी पी कर वापस उसे गिलास थमा दिया.

गणेशी बोला, ‘‘बाबूजी, आप ने मुझे मेरा फर्ज याद दिला दिया.’’

‘‘वह कैसे गणेशीजी?’’ हैरानी से सुनील शर्मा ने पूछा.

‘‘देखिए बाबूजी, अब तक जो मांगता था, उसे ही मैं पानी पिलाता था, मगर आप ने यह कह कर मेरी आंखें खोल दीं कि पानी तो हर मेज पर जा कर पिलाना चाहिए, इसलिए आज से ही मैं ने आप से शुरुआत की है.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा काम किया गणेशीजी. चलो, मेरी बात पर आप ने गौर तो किया.’’

‘‘हां बाबूजी, अब मुझे किसी को फर्ज की याद दिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी,’’ कह कर गणेशी चला गया.

मगर सुनील शर्मा उस में अचानक आए इस बदलाव को देख कर हैरान थे.

सलाहकार: कैसे अपनों ने उठाया शुचिता का फायदा

छात्रछात्राओं का प्रिय शगल हर एक अध्यापक- अध्यापिका को कोई नाम देना होता है और चाहे अध्यापक हों या प्राध्यापक, सब जानबूझ कर इस तथ्य से अनजान बने रहते हैं, शायद इसलिए कि अपने जमाने में उन्होंने भी अपने गुरुजनों को अनेक हास्यास्पद नामों से अलंकृत किया होगा. ऋतिका इस का अपवाद थीं. वह अंगरेजी साहित्य की प्रवक्ता ही नहीं होस्टल की वार्डन भी थीं, लेकिन न तो लड़कियों ने खुद उन्हें कोई नाम दिया और न ही किसी को उन के खिलाफ बोलने देती थीं.

मिलनसार, आधुनिक और संवेदनशील ऋतिका का लड़कियों से कहना था : ‘‘देखो भई, होस्टल के कायदे- कानून मैं ने नहीं बनाए हैं, लेकिन मुझे इस होस्टल में रह कर पीएच.डी. करने की सुविधा इसलिए मिली है कि मैं किसी को उन नियमों का उल्लंघन न करने दूं. मैं नहीं समझती कि आप में से कोई भी लड़की होस्टल के कायदेकानून तोड़ कर मुझे इस सुविधा से वंचित करेगी.’’

इस आत्मीयता भरी चेतावनी के बाद भला कौन लड़की मैडम को परेशान करती? वैसे लड़कियों की किसी भी उचित मांग का ऋतिका विरोध नहीं करती थीं. खाना बेस्वाद होने पर वह स्वयं कह देती थीं, ‘‘काश, मुझ में होस्टल की मैनेजिंग कमेटी के सदस्यों को दावत पर बुला कर यह खाना खिलाने की हिम्मत होती.’’

लड़कियां शिकायत करने के बजाय हंसने लगतीं. ऋतिका मैडम का व्यवहार सभी लड़कियों के साथ सहृदय था. किसी के बीमार होने पर वह रात भर जाग कर उस की देखभाल करती थीं. पढ़ाई में कोई दिक्कत होने पर अपना विषय न होते हुए भी वह यथासंभव सहायता कर देती थीं, लेकिन अगर कभी कोई लड़की व्यक्तिगत समस्या ले कर उन के पास जाती थी तो बजाय समस्या सुनने या कोई हल सुझाने के वह बड़ी बेरुखी से मना कर देती थीं.

लड़कियों को उन की बेरुखी उन के स्वभाव के अनुरूप तो नहीं लगती थी फिर भी किसी ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया. मनोविज्ञान की छात्रा श्रेया ने कुछ दिनों में ही यह अटकल लगा ली कि ऊपर से सामान्य लगने वाली ऋतिका मैम, भीतर से बुरी तरह घायल थीं और जिंदगी को सजा समझ कर जी रही थीं.

मगर उन से पूछने का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि अगर उस का प्रश्न सुन कर ऋतिका मैडम जरा सी भी उदास हो गईं तो सब लड़कियां उन का होस्टल में रहना मुश्किल कर देंगी. एम.ए. की छात्रा होने के कारण श्रेया अन्य लड़कियों से उम्र में बड़ी और ऋतिका मैडम से कुछ ही छोटी थी, सो प्राय: हमउम्र होने के कारण दोनों में दोस्ती हो गई और दोनों एक ही कमरे में रहने लगीं.

एक दिन एक पत्रिका द्वारा आयोजित निबंध लेखन प्रतियोगिता में भाग ले रही छात्रा रश्मि उन के कमरे में आई. ‘‘मुझे समझ में नहीं आ रहा कि मैं हिंदी में निबंध लिखूं या अंगरेजी में?’’

‘‘लिखना तो उसी भाषा में चाहिए जिस में तुम सुंदरता से अपने भाव व्यक्त कर सको,’’ श्रेया बोली.

‘‘दोनों में ही कर सकती हूं.’’

‘‘इस की दोनों भाषाओं पर अच्छी पकड़ है,’’ ऋतिका मैडम के स्वर में सराहना थी जिसे सुन कर रश्मि का उत्साहित होना स्वाभाविक ही था.

‘‘इस प्रतियोगिता में मैं प्रथम पुरस्कार जीतना चाहती हूं, सो आप सलाह दें मैडम, कौन सी भाषा में लिखना अधिक प्रभावशाली रहेगा?’’ रश्मि ने ऋतिका से मनुहार की.

‘‘तुम्हारी शिक्षिका होने के नाते बस, इतना ही कह सकती हूं कि तुम अच्छी अंगरेजी लिखती हो और सलाह तो मैं किसी को देती नहीं,’’ ऋतिका मैडम ने इतनी रुखाई से कहा कि रश्मि सहम कर चली गई.

‘‘जब आप को पता है कि उस की अंगरेजी औसत से बेहतर है, तो उसे उसी भाषा में लिखने को कहना था क्योंकि अंगरेजी में जीत की संभावना अधिक है,’’

श्रेया बोली. ‘‘इतनी समझ रश्मि को भी है.’’

‘‘फिर भी बेचारी आश्वस्त होने आप के पास आई थी और आप ने दुत्कार दिया,’’ श्रेया के स्वर में भर्त्सना थी, ‘‘मैडम, आप से सलाह मांगना तो सांड को लाल कपड़ा दिखाना है.’’

ऋतिका ने अपनी हंसी रोकने का असफल प्रयास किया, जिस से प्रभावित हो कर श्रेया पूछे बगैर न रह सकी : ‘‘आखिर आप सलाह देने से इतना चिढ़ती क्यों हैं?’’

‘‘चिढ़ती नहीं श्रेया, डरती हूं,’’ ऋतिका मैडम आह भर कर बोलीं, ‘‘मेरी सलाह से एकसाथ कई जीवन बरबाद हो चुके हैं.’’ ‘‘किसी आतंकवादी गिरोह की आप सदस्या रह चुकी हैं?’’ श्रेया ने उन की ओर कृत्रिम अविश्वास से देखा. ऋतिका ने गहरी सांस ली,

‘‘असामाजिक तत्त्व ही नहीं शुभचिंतक भी जिंदगियां तबाह कर सकते हैं, श्रेया.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘बड़ी लंबी कहानी है.’’

‘‘मैडम, आज पढ़ाई यहीं बंद करते हैं. कल रविवार को कहीं घूमने न जा कर पढ़ाई कर लेंगे,’’ कह कर श्रेया उठी और उस ने कमरे का दरवाजा बंद किया, बत्ती बुझा कर बोली, ‘‘अब आप शुरू हो जाओ. कहानी सुनाने से आप का दिल हलका हो जाएगा और मेरी जिज्ञासा शांत.’’

‘‘मेरा दिल तो कभी हलका नहीं होगा मगर चलो, तुम्हारी जिज्ञासा शांत कर देती हूं.

‘‘शुचिता मेरी स्कूल की सहपाठी थी. जब वह 7वीं में पढ़ती थी तो उस के डाक्टर मातापिता उसे दादी के पास छोड़ कर मस्कट चले गए थे. जब भी वह उन्हें याद करती, दादी प्रार्थना करने को कहतीं या उसे दिलासा देने को राह चलते ज्योतिषियों से कहलवा देती थीं कि उस के मातापिता जल्दी आएंगे.

‘‘मस्कट कोई खास दूर तो था नहीं, सो दादी से शुचि की उदासी के बारे में सुन कर अकसर उस के मातापिता में से कोई न कोई बेटी से मिलने आता रहता था. इस तरह शुचि भाग्य और भविष्यवक्ताओं पर विश्वास करने लगी. विदेश से लौटने पर उस के आधुनिक मातापिता ने शुचि को बहुत समझाया मगर उस की अंधविश्वास के प्रति आस्था नहीं डिगी.

‘‘रजत शुचि का पड़ोसी और मेरे पापा के दोस्त का बेटा था, सो एकदूसरे के घर आतेजाते मालूम नहीं कब हमें प्यार हो गया, लेकिन यह हम दोनों को अच्छी तरह मालूम था कि सही समय पर हमारे मातापिता सहर्ष हमारी शादी कर देंगे, मगर अभी से इश्क में पड़ना गवारा नहीं करेंगे.

लेकिन मिले बगैर भी नहीं रहा जाता था, सो मैं पढ़ने के बहाने शुचि के घर जाने लगी. शुचि के मातापिता नर्सिंग होम में व्यस्त रहते थे इसलिए रजत बेखटके वहां आ जाता था. जिंदगी मजे में गुजर रही थी. मैं शुचि से कहा करती थी कि प्यार जिंदगी की अनमोल शै है और उसे भी प्यार करना चाहिए. तब उस का जवाब होता था, ‘करूंगी मगर शादी के बाद.’

‘‘‘उस में वह मजा नहीं आएगा जो छिपछिप कर प्यार करने में आता है.’

‘‘‘न आए, मगर जब मैं अपने मम्मीपापा को यह वचन दे चुकी हूं कि मैं शादी उन की पसंद के डाक्टर लड़के से करूंगी, जो उन का नर्सिंग होम संभाल सके तो फिर मैं किसी और से प्यार कैसे कर सकती हूं?’

‘‘असल में शुचि के मातापिता उसे डाक्टर बनाना चाहते थे लेकिन शुचि की रुचि संगीत साधना में थी, सो दामाद डाक्टर पर समझौता हुआ था. हम सब बी.ए. फाइनल में थे कि रजत का चचेरा भाई जतिन एम.बी.ए. करने वहां आया और रजत के घर पर ही रहने लगा.

‘‘एक रोज शुचिता पर नजर पड़ते ही जतिन उस पर मोहित हो गया और रजत के पीछे पड़ गया कि वह उस की दोस्ती शुचिता से करवाए. रजत के असलियत बताने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. मालूम नहीं जतिन को कैसे पता चल गया कि रजत मुझ से मिलने शुचिता के घर आता है. उस ने रजत को ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया कि या तो वह उस की दोस्ती शुचिता के साथ करवाए नहीं तो वह हमारे मातापिता को सब बता देगा.

‘‘इस से बचने की मुझे एक तरकीब समझ में आई कि शुचिता के अंधविश्वास का फायदा उठा कर उस का चक्कर जतिन के साथ चला दिया जाए. रजत के रंगकर्मी दोस्त सुधाकर को मैं ने अपने और शुचिता के बारे में सबकुछ अच्छी तरह समझा दिया. एक रोज जब मैं और शुचिता कालिज से घर लौट रहे थे तो साधु के वेष में सुधाकर हम से टकरा गया और मेरी ओर देख कर बोला कि मैं चोरी से अपने प्रेमी से मिलने जा रही हूं. उस के बाद उस ने मेरे और रजत के बारे में वह सब कहना शुरू कर दिया जो हम दोनों के अलावा शुचिता को ही मालूम था, सो शुचिता का प्रभावित होना स्वाभाविक ही था.

‘‘शुचिता ने साधु बाबा से अपने घर चलने को कहा. वहां जा कर सुधाकर ने भविष्यवाणी कर दी कि शीघ्र ही शुचिता के जीवन में भी उस के सपनों का राजकुमार प्रवेश करेगा. सुधाकर ने शुचिता को आश्वस्त कर दिया कि वह कितना भी चाहे प्रेमपाश से बच नहीं सकेगी क्योंकि यह तो उस के माथे पर लिखा है. उस ने यह भी बताया कि वह कहां और कैसे अपने प्रेमी से मिलेगी.

‘‘शुचिता के यह पूछने पर कि उस की शादी उस व्यक्ति से होगी या नहीं, सुधाकर सिटपिटा गया, क्योंकि इस बारे में तो हम ने उसे कुछ बताया ही नहीं था, सो टालने के लिए बोला कि फिलहाल उस की क्षमता केवल शुचिता के जीवन में प्यार की बहार देखने तक ही सीमित है. वैसे जब प्यार होगा तो विवाह भी होगा ही. सच्चे प्यार के आगे मांबाप को झुकना ही पड़ता है.

‘‘उस के बाद जैसे सुधाकर ने बताया था उसी तरह जतिन धीरेधीरे उस के जीवन में आ गया. शुचिता का खयाल था कि जब साधु बाबा की कही सभी बातें सही निकली हैं तो मांबाप के मानने वाली बात भी ठीक ही निकलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जतिन ने यहां तक कहा कि उसे उन का एक भी पैसा नहीं चाहिए…वे लोग चाहें तो किसी गरीब बच्चे को गोद ले कर उसे डाक्टर बना कर अपना नर्सिंग होम उसे दे दें. शुचिता ने भी जतिन की बात का अनुमोदन किया. शुचिता के मातापिता को मेरी और अपनी बेटी की गहरी दोस्ती के बारे में मालूम था, सो एक रोज वह दोनों हमारे घर आए.

‘‘‘देखो ऋतिका, शुचि हमारी इकलौती बेटी है. हम ने रातदिन मेहनत कर के जो इतना बढ़िया नर्सिंग होम बनाया है या दौलत कमाई है इसीलिए कि हमारी बेटी हमेशा राजकुमारियों की तरह रहे. जतिन अच्छा लड़का है लेकिन उस की एक बंधीबधाई तनख्वाह रहेगी. वह एक डाक्टर जितना पैसा कभी नहीं कमा पाएगा और फिर हमारे इतनी लगन से बनाए नर्सिंग होम का क्या होगा? अपनी बेटी के रहते हम किसी दूसरे को कैसे गोद ले कर उसे सब सौंप दें? हम ने शुचि के लिए डाक्टर लड़का देखा हुआ है जो हर तरह से उस के उपयुक्त है और उस के साथ वह बहुत खुश रहेगी. तुम भी उसे जानती हो.’

‘‘‘कौन है, अंकल?’

‘‘‘तुम्हारा भाई कुणाल. उस के अमेरिका से एम.एस. कर के लौटते ही दोनों की शादी कर देंगे.’ ‘‘ ‘मैं ठगी सी रह गई. शुचिता मेरी भाभी बन कर हमेशा मेरे पास रहे इस से अच्छा और क्या होगा? जतिन तो आस्ट्रेलिया जाने को कटिबद्ध था.

‘‘‘आप ने यह बात छिपाई क्यों?’ मैं ने पूछा, ‘क्या पता भैया ने वहीं कोई और पसंद कर ली हो.’

‘‘‘उसे वहां इतनी फुरसत ही कहां है? और फिर मैं ने कुणाल और तुम्हारे मम्मीपापा को साफ बता दिया था कि मैं कुणाल को अमेरिका जाने में जो इतनी मदद कर रहा हूं उस की वजह क्या है. उन सब ने तभी रिश्ता मंजूर कर लिया था. तुम्हें बता कर क्या ढिंढोरा पीटना था?’

‘‘अब मैं उन्हें कैसे बताती कि मुझे न बताने से क्या अनर्थ हुआ है. तभी मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी. शुचिता के जिस अंधविश्वास का सहारा ले कर मैं ने उस का और जतिन का चक्कर चलवाया था, एक बार फिर उसी अंधविश्वास का सहारा ले कर उस चक्कर को खत्म भी कर सकती थी लेकिन अब यह इतना आसान नहीं था.

रजत कभी भी मेरी मदद करने को तैयार नहीं होता और अकेली मैं कहां साधु बाबा को खोजती फिरती? मैं ने शुचिता की मम्मी को सलाह दी कि वह शुचि के अंधविश्वास का फायदा क्यों नहीं उठातीं? उन्हें सलाह पसंद आई. कुछ रोज के बाद उन्होंने शुचिता से कहा कि वह उस की और जतिन की शादी करने को तैयार हैं मगर पहले दोनों की जन्मपत्री मिलवानी होगी. अगर कुछ गड़बड़ हुई तो ग्रह शांति की पूजा करा देंगे.

‘‘अंधविश्वासी शुचिता तुरंत मान गई. उस ने जबरदस्ती जतिन से उस की जन्मपत्री मंगवाई. मातापिता ने एक जानेमाने पंडित को शुचिता के सामने ही दोनों कुंडलियां दिखाईं. पंडितजी देखते ही ‘त्राहिमाम् त्राहिमाम्’ करने लगे. ‘‘‘इस कन्या से विवाह करने के कुछ ही समय बाद वर की मृत्यु हो जाएगी. कन्या के ग्रह वर पर भारी पड़ रहे हैं.’

‘‘‘उन्हें हलके यानी शांत करने का कोई उपाय जरूर होगा पंडितजी. वह बताइए न,’ शुचिता की मम्मी ने कहा. ‘‘ ‘ऐसे दुर्लभ उपाय जबानी तो याद होते नहीं, कई पोथियां देखनी होंगी.’

‘‘‘तो देखिए न, पंडितजी, और खर्च की कोई फिक्र मत कीजिए. अपनी बिटिया की खुशी के लिए आप जो पूजा या दान कहेंगे हम करेंगे.’

‘‘‘मगर पूजा से अमंगल टल जाएगा न पंडितजी?’ शुचिता ने पूछा.

‘‘‘शास्त्रों में तो यही लिखा है. नियति में लिखा बदलने का दावा मैं नहीं करता,’ पंडितजी टालने के स्वर में बोले.

‘‘‘ऐसा है बेटी. जैसे डाक्टर अपने इलाज की शतप्रतिशत गारंटी नहीं लेते वैसे ही यह पंडित लोग अपनी पूजा की गारंटी लेने से हिचकते हैं,’ शुचिता के पापा हंसे.

‘‘उस के बाद शुचिता ने कुछ और नहीं पूछा. अगली सुबह उस के कमरे से उस की लाश मिली. शुचिता ने अपनी कलाई की नस काट ली थी. उस ने अपने अंतिम पत्र में लिखा था कि पंडितजी की बात से साफ जाहिर है कि उस की जिंदगी में जतिन का साथ नहीं लिखा है, वह जतिन से बेहद प्यार करती है.

उस के बगैर जीने की कल्पना नहीं कर सकती और न ही उस का अहित चाहती है, सो आत्महत्या के सिवा उस के पास कोई और विकल्प नहीं है. ‘‘शुचिता की आत्महत्या के लिए उस के मातापिता स्वयं को अपराधी मानते हैं, मगर असली दोषी तो मैं हूं जिस की सलाह पर पहले एक नकली ज्योतिषी ने शुचिता का जतिन से प्रेम करवाया और मेरी सलाह से ही उस प्रेम संबंध को तोड़ने के लिए फिर एक झूठे ज्योतिषी का सहारा लिया गया.

‘‘शुचिता के मातापिता और उस से अथाह प्यार करने वाला जतिन तो जिंदा लाश बन ही चुके हैं. मगर मेरे कुणाल भैया, जो बचपन से शुचिता से मूक प्यार करते थे और जिस के कारण ही वह बजाय इंजीनियर बनने के डाक्टर बने थे, बुरी तरह टूट गए हैं और भारत लौटने से कतरा रहे हैं इसलिए मेरे मातापिता भी बहुत मायूस हैं. यही नहीं मेरे इस तरह क्षुब्ध रहने से रजत भी बेहद दुखी हैं. तुम ही बताओ श्रेया, इतना अनर्थ कर के, इतने लोगों को संत्रास दे कर मैं कैसे खुश रह सकती हूं या सलाहकार बनने की जुर्रत कर सकती हूं?’’

 

दिल के रिश्ते : क्या रवि ने धोखाधड़ी

ट्रेन अहमदाबाद स्टेशन से अपने तय समय पर शाम के पौने 6 बजे रवाना हुई. सामान के नाम पर एकलौता बैग राजन ने ऊपर लगेज स्टैंड पर रखा और फर्स्ट क्लास कंपार्टमैंट की आरामदायक सीट पर अधलेटा सा खिड़की के कांच से बाहर पीछे छूटते लोगों को देखता अपने घर के खयालों में गुम हो गया.

ट्रेन जितनी रफ्तार से मंजिल की ओर दौड़ रही थी, राजन का दिमाग उतनी ही रफ्तार से यादों के पथरीले रास्तों पर दौड़ रहा था. उन रिश्तों के आसपास, जिन में 2 छोटे भाई, बहन स्नेहा और रवि थे. रवि जिस से राजन के परिवार का खून का रिश्ता नहीं था.

वे स्कूल के खुशगवार दिन थे. पढ़ने की लगन के बीच शाम को खेलना और मस्त रहना राजन के साथ एक आम दिनचर्या हुआ करती थी. इसी बीच पापा का खेत के काम में हाथ बंटाने का आदेश मिलना एक तरह का बदलाव ले कर आता था.

‘‘साहब, रात में खाना चाहिए क्या?’’ ट्रेन कैटरिंग स्टाफ का एक लड़का सामने आ कर खड़ा हो गया, तो राजन वर्तमान में लौट आया.

‘‘क्या है खाने में?’’

‘‘वैज या नौनवैज?’’ उस स्टाफ ने बड़े अदब से पूछा.

‘‘वैज…’’ राजन ने भी उतनी ही सहजता के साथ जवाब दिया.

‘‘मटरपनीर, दाल अरहर, मिक्स वैज, चावल, चपाती, रायता और सलाद.’’

कुछ सोच कर राजन बोला, ‘‘ठीक है, भेज देना.’’

लड़का चला गया, तो राजन ने एक बार खिड़की से बाहर नजर डाली. ट्रेन खेतों, पेड़पौधों और छितराई बस्तियों को पीछे छोड़ते हुए सरपट दौड़ रही थी.

राजन ने उठ कर बैग से आज ही बुक स्टौल से खरीदी पत्रकार रवीश कुमार की एक किताब ‘बोलना ही है’ निकाली और बर्थ पर बैठ कर पढ़ने लगा.

राजन 3 साल बाद अपने घर लौट रहा था, वह भी अकेले. उस की पत्नी शीतल ने यह कह कर चलने से मना कर दिया था कि एक हफ्ता गांव में रहे तो बच्चे पढ़ाई से दूर हो जाएंगे. उस का मानना है कि गांव में निठल्लेपन को बढ़ावा मिलता है.

राजन के पापा का बरताव सब बच्चों के प्रति दोस्ताना था. किसी दिन खेत में काम ज्यादा होता, तो सुबह के नाश्ते के समय वे कहते थे, ‘आज तुम में से एक की जरूरत है, जिस को स्कूल में बहुत जरूरी काम न हो, वह छुट्टी ले ले.’’

फिर किसी दिन स्नेहा पूछ लेती, ‘‘पापा, वैसे तो आप हम सब को खूब पढ़ कर कामयाब होने की सलाह देते हो, दूसरी तरफ रोज किसी न किसी की छुट्टी भी करा देते हो. ऐसा क्यों?’’

पर इस बात का पापा ने कभी जवाब नहीं दिया.

गरमियों में पास के शहर में मेला लगता था, जिस का राजन को पूरे साल इंतजार रहता था. उस दिन हर साल की तरह पापा सब को मेला दिखाने ले कर गए. सब ने उस दिन खूब मस्ती की. झला झले, आइसक्रीम खाई और खिलौने भी खरीदे. आखिर में सब सर्कस देखने की कतार में खड़े थे कि राजन की उम्र का एक लड़का उन्हें भीड़ में रोता दिखाई दिया.

‘क्या नाम है तुम्हारा?’ पापा ने बड़े प्यार के साथ उस के सिर पर हाथ फेर कर पूछा था.

‘रवि,’ उस लड़के ने सुबकते हुए जवाब दिया था.

‘तुम्हारे मम्मीपापा कहां हैं?’

पर छोटी उम्र के उस बच्चे के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था. सर्कस देखने का प्रोग्राम रद्द कर पापा ने उसे खिलौने दिलाए और जो उस ने खाने को कहा खिलाया. फिर उसे सही जगह पहुंचाने की कोशिश में देर रात हो गई. निराश हो कर जब वे सब घर लौटे, तो रवि उन के साथ था.

शायद प्यार से बड़ी कोई रिश्तेदारी नहीं होती. 2-4 दिन लगे रवि को उन के बीच घुलमिल जाने में और उतने ही दिन उस ने अपने मम्मीपापा को याद किया.

फिर जिंदगी ने अपनी रफ्तार पकड़ ली. रवि अब राजन के साथ स्कूल जाने और बीच में छुट्टी ले कर खेतों मे काम करने की पारिवारिक परंपरा का हिस्सा हो गया.

धीरेधीरे खेत के काम में रवि का ऐसा मन लगा कि वह कभीकभार ही स्कूल जाता था. इस बात से राजन और उस के दोनों भाई एक तरह से खुश थे, क्योंकि उन के हिस्से का सारा काम अब रवि ने संभाल लिया था.

स्नेहा समेत वे चारों भाईबहन बहुत अच्छे नंबरों से ग्रैजुएशन और फिर पोस्ट ग्रैजुएशन तक पढ़े. सब से छोटा भाई नीलेश पीडब्लूडी महकमे में इंजीनियर हो गया था. उस से बड़ा संजीव पास के इलाके के स्कूल में टीचर और राजन भारत संचार निगम लिमिटेड में क्लर्क हो गया था, जबकि रवि एक तरह से उन की पुश्तैनी जायदाद और मातापिता का सहारा बन गया.

गांव से निकलते समय राजन और उस के दोनों भाइयों ने यह फैसला किया था कि चूंकि रवि ने उन के हिस्से का काम किया है, इसलिए उसे कभी किसी तरह की कोई दिक्कत नहीं होने दी जाएगी.

राजन के विचारों ने जितने समय में जिंदगी के पिछले 10 साल के सार को दोहराया, ट्रेन उतने समय में दिल्ली पहुंच गई थी. वहां की आबोहवा से अपनेपन की महक आने लगी थी. अभी घर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर होने के बावजूद लगता था कि वह घर पहुंच गया है.

राजन जब ट्रेन से नीचे उतरा, तो अनाउंसमैंट हो रही थी कि करनाल के लिए लोकल ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 10 से चलने के लिए तैयार है. अचानक उस की नजर प्लेटफार्म पर आजा रहे लोगों के बीच एक चेहरे पर पड़ी. कोई उस का ही हम उम्र सिर पर एक गट्ठर सा लिए चला जा रहा था.

जब तक राजन यह तय कर पाता कि वह चेहरा जाना पहचाना था, तब तक वह आंखों से ओझल हो गया. दिल कहता था कि राजन ने भीड़ में रवि को देखा था, पर तब तक ट्रेन चल पड़ी थी.

दोपहर के 2 बजे राजन घर में दाखिल हुआ, तो उसे देखते ही घर में जैसे उत्सव का सा माहौल बन गया. घर के सब सदस्य हालचाल पूछने के लिए जमा हो गए. पड़ोस के चाचाताऊ के परिवार सहित, सिवा रवि के.

जब भीड़ छंट गई, तो राजन ने पापा से पूछा, ‘‘रवि कहां है?’’

जवाब देने की जगह पापा गुमसुम से हो गए. उन के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘चला गया.’’

‘‘क्यों चला गया?’’

‘‘बेटा, अपनेपराए में फर्क तो होता ही है न? एक न एक दिन तो वह फर्क अपना असर दिखाता ही है. पराए लोग चोरी करने से बाज नहीं आते. वह भी नहीं आया,’’ पापा ने आंखें चुराते हुए कहा, जैसे वे कुछ छिपा रहे हों.

‘‘उस ने क्या चोरी किया? पैसे चुराए हैं क्या?’’

‘‘हां, हर साल की तरह इस बार भी धान की फसल बेच कर वह घर आया तो रुपए ला कर घर में नहीं दिए. उस से पूछा तो बहाने बनाता रहा. ज्यादा जोर डाल कर पूछा तो तेरा नाम ले कर कहने लगा कि भैया के आने पर बताऊंगा. गुस्से में तेरे बड़े भाई ने कह दिया कि वह हमेशा के लिए घर से चला जाए और वह चला गया.’’

इस खबर को सुन कर राजन को ठीक वैसा ही लगा जैसा किसी अपने की मौत हो जाने पर लगता है. भैया छुट्टी पर घर आए हुए थे, इस बात की खुशी अब मन से काफूर हो गई. राजन वापस चल दिया.

‘‘कहां जा रहे हो बेटा? रवि अब कहां मिलेगा?’’

‘‘मंडी जा रहा हूं. आढ़ती से पूछने कि क्या रवि रुपए ले गया था?’’

‘‘हम ने फोन कर के पूछा था,’’ अपराधियों की तरह सिर झांका कर पापा ने कहा.

‘‘क्या बताया उस ने?’’

‘‘रवि ने… यह कह कर रुपए वहीं छोड़ दिए थे कि अगले साल स्नेहा की शादी में इकट्ठा ले कर जाएगा…’’ पापा ने कहा. उन की आंखों में पछतावे के आंसू झलक आए थे, ‘‘बेटा, हमें माफ कर दो. रवि लगन से काम करने में इतना बिजी रहता था कि बहुत बातें बताना भूल जाता था. वह समझता था कि गैर होने की वजह से हर बात बताने की उस की मजबूरी है.

‘‘जो थोड़ीबहुत बातें वह बता नहीं पाता था, वे ही सब के मन में शक पैदा करती रहीं. आज वही शक हद पर पहुंच गया था.’’

‘‘सही कहा पापा आप ने, गैरों को हर पल अपनी ईमानदारी का सुबूत देते रहना होता है. यही समाज का उसूल है. आप भी तो उसी समाज का हिस्सा हैं, फिर आप से या भैया से क्या गिला करना?

‘‘लेकिन, रवि अपनेपन का जो सुबूत दे गया है, वह मुझे हमेशा कचोटता रहेगा. उस ने अपना समझ कर परिवार के लिए सबकुछ किया और हम ने उसे खाली हाथ चलता कर दिया,’’ राजन ने कहा और खेतों की ओर निकल गया. शायद कहीं रवि दिख ही जाए.

धब्बा : गीता डाक्टर के पास क्यों गई

नैक्स्ट,’ महिला डाक्टर की अपने केबिन से आवाज आई, तो गीता अंदर गई.

‘‘बोलिए, क्या तकलीफ है?’’ डाक्टर ने सिर से पैर तक उसे देखते हुए पूछा, जिस के सूख चुके शरीर पर फैले लाल दाने किसी अनहोनी के होने का अंदेशा उस की समस्या सुनने से पहले ही दे रहे थे.

‘‘बताइए, क्या तकलीफ है?’’ डाक्टर ने दोबारा पूछा.

‘‘डाक्टर मैडम, कुछ दिनों से दवा खाने पर भी बुखार और कमजोरी कम नहीं हो रही है और ये लाल दाने निकल आए हैं. घर के नजदीक के एक डाक्टर के पास गई थी, पर वे कहीं बाहर गई हैं, इसलिए आप के पास आई हूं.’’

‘‘उन्होंने कुछ टैस्ट कराए थे?’’

‘‘जी, ये रही उन की रिपोर्ट.’’

पूरी रिपोर्ट ध्यान से पढ़ने के बाद डाक्टर ने गीता से पूछा, ‘‘शादी हुई है?’’

‘‘जी.’’

‘‘पति कहां हैं?’’

‘‘वे भी बीमार चल रहे हैं, इसलिए ससुराल वालों ने मुझे मायके भेज दिया है.’’

‘‘बता सकती हो कि क्या हुआ है उन्हें?’’

उन दोनों की बात कोई सुन तो नहीं रहा है, गीता ने आसपास नजर घुमाते हुए पक्का कर धीमी आवाज में कहा, ‘‘मेरी ससुराल वालों ने मुझे ज्यादा तो नहीं बताया, बस कहा कि उन्हें मर्दाना अंग में कुछ तकलीफ हो गई है, लंबा इलाज चलेगा और किसी से इस बारे में बात करने से भी मना किया है.’’

‘‘अच्छा, पति क्या नशा करते हैं?’’ डाक्टर का सवाल सुन कर गीता कुछ हिचकिचाई.

‘‘जी, कभीकभी करते हैं,’’ उस ने अपनी आंखें चुराते हुए कहा.

‘‘सूई से करते हैं?’’

‘‘जी.’’

‘‘आखिरी बार उन से संबंध कब बने थे?’’ डाक्टर ने पूछा.

गीता कुछ घबराई और उस से रहा न गया, ‘‘इस से मेरे बुखार का क्या लेनादेना?’’

‘‘लेनादेना तो है, इसीलिए पूछ रही हूं.’’

‘‘जी, 2 महीने पहले.’’

‘‘क्या वे निरोध इस्तेमाल करते थे?’’

‘‘जी नहीं.’’

‘‘क्या आप के पति और आप के एकदूसरे के अलावा किसी और के साथ भी सैक्स संबंध रहे हैं?’’

‘‘पिछली डाक्टर ने भी ऐसे ही ऊटपटांग सवाल मुझसे पूछे थे और यहां आप भी चालू हो गईं. मुझे आप में से किसी पर भी भरोसा नहीं है. मैं किसी और अच्छे डाक्टर को दिखाऊंगी,’’ गीता गुस्से से अपनी रिपोर्ट उठा कर वहां से जाने लगी.

‘‘डाक्टर बदलने से आप की समस्या बदल नहीं जाएगी.’’

डाक्टर की बात सुन कर गीता सदमे से दरवाजा पकड़ कर खड़ी हो गई, शायद उसे अपनी बीमारी का पता पहले से था, बस कबूल नहीं कर पा रही थी. वह दूसरी डाक्टर को इसलिए दिखाने आई थी कि वह उसे एड्स का धब्बा लगने की हामी शायद न भरे.

‘‘आप की रिपोर्ट बता रही है कि आप एचआईवी पौजिटिव हैं और आप के पति एड्स से पीड़ित होंगे’’

‘‘जी, मैं जानती हूं.’’

‘‘फिर, आप ने मुझे इतनी देर गुमराह क्यों किया?’’

‘‘मैडम, इस धब्बे ने मेरे पति को अछूत बना कर रख दिया है. न तो हमारे परिवार में अब कोई आनाजाना करता है और न ही समाज में इज्जत बची है. मैं अपनी हालत भी उन की तरह होते नहीं देख सकती, इसलिए मैं यहां आ कर अकेले रह रही हूं.’’

‘‘हिम्मत रखिए, आप का दर्द मैं अच्छी तरह समझ सकती हूं.’’

‘‘मैडम, इस का कोई तो इलाज होगा?’’ भरी जवानी में अपने प्राण जाते देख गीता खुद को टूटने से रोक न पाई.

‘‘जागरूकता ही एड्स का एकमात्र इलाज है. आप से वह सवाल इसलिए पूछा गया था कि उस तीसरे इनसान को सजग कर टैस्ट करने को कहा जा सके और वह किसी के साथ भी बिना सुरक्षा के संबंध बनाने से रुक जाए, नहीं तो यही बीमारी किसी चौथे को और उस से न जाने कितने लोगों में फैलती चली जाएगी, जिसे ट्रैक करना मुश्किल होता जाएगा.’’

‘‘डाक्टर मैडम, अगर किसी औरत से संबंध होते तो आप को बताने में उतनी हिचक नहीं होती, मगर किस मुंह से कहूं कि उन्हें मर्द पसंद हैं.’’

‘‘जो मर्द समलैंगिंक संबंध बनाते हैं, उन्हें यह खतरा औरों के मुकाबले ज्यादा होता है.’’

‘‘पर, मुझे यह बात समझ नहीं आई कि उन के सूई से नशा करने से, समलैंगिक संबंध बनाने से, निरोध न इस्तेमाल करने से यह बीमारी मुझ तक कैसे पहुंच गई’’

‘‘तुम्हारे सारे सवालों में ही तुम्हारा जवाब छिपा हुआ है.’’

‘‘काश, वक्त रहते थोड़ी सावधानी वे दिखा देते, तो आज इस धब्बे के साथ जीने के लिए न वे मजबूर होते, न मैं. उन के अकेले के शौक ने हम में से कितनों को मौत के मुंह में धकेल दिया है.’’

‘‘तुम घबराओ नहीं, मेरे पास यहां बैठो,’’ डाक्टर ने गीता का हाथ पकड़ते हुए कहा.

‘‘नहीं मैडम, आप मुझे मत छुइए, नहीं तो यह बीमारी आप को भी लग जाएगी.’’

‘‘मैं मानती हूं कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, पर यह किसी को छूने से, उस के साथ खाने से या साथ घूमनेफिरने से नहीं फैलती. पर, एक बात मैं दावे से कह सकती हूं कि यह बीमारी प्यार और अपनेपन से घटती जरूर है.’’

‘‘आज कितने दिनों बाद किसी ने मुझ से इतने अच्छे से बात की होगी,’’ गीता दुखी जरूर थी, पर कुछ मीठे बोल उसे इन हालात से जूझाने का हौसला दे रहे थे.

‘‘कोई भी तकलीफ हो तो मुझे फोन करने से झिझकना मत. इस फोल्डर से तुम्हें इस बीमारी संबंधी सभी जरूरी जानकारी मिल जाएगी और साथ ही उन अनेक संस्थान के पते व फोन नंबर भी मिल जाएंगे, जहां तुम खुद को कभी अकेला नहीं समझागी.

‘‘आप का बहुत शुक्रिया मैडम.’’

एड्स एक लाइलाज बीमारी है,

मात्र जागरूकता है इस की दवा.

ये अपनेपन, सहयोग से घटती है,

और बंट जाती है करने पर दुआ.

Mother’s Day 2024- कन्याऋण : कन्याऋण : क्या नेहा की शादी का फैसला सही साबित हुआ? – भाग 1

नेहा के ससुराल से लौट कर आने के बाद से ही मांजी बहुत दुखी और परेशान लग रही हैं. बारबार वह एक ही बात कहती हैं, ‘‘अनुभा बेटी, काश, मैं ने तुम्हारी बात मान ली होती तो आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता. तुम ने मुझे कितना समझाया था पर मैं अपने कन्याऋण से उऋण होने की लालसा में नेहा की जिंदगी से ही खिलवाड़ कर बैठी. अब तो अपनी गलती सुधारने की गुंजाइश भी नहीं रही.’’

अनुभा समझ नहीं पा रही थी कि मांजी को कैसे धीरज बंधाए. जब से उस ने नेहा को सुबहसुबह बाथरूम में उलटियां करते देखा उस का माथा ठनक गया था और आज जब डा. ममता ने उस के शक की पुष्टि कर दी तो लगता है अनर्थ ही हो गया.

डाक्टर के यहां से लौटने के बाद मांजी ने जब उस से पूछा तो उन की मानसिक अवस्था को देखते हुए वह उन से सच नहीं बोल पाई और यह कह दिया कि एसिडिटी के कारण नेहा को उलटियां हो रही थीं. लेकिन अनुभा को लगा था कि उस की सफाई से मांजी के चेहरे से शक और संदेह के बादल छंट नहीं पाए थे. उन्हें सच क्या है, इस का आभास हो गया था.

सहसा अनुभा की नजरें नेहा की ओर उठीं. वह सारी चिंताओं से अनजान अपनी गुडि़या से खेल रही थी. उस के साथ क्या हो रहा था और आगे क्या होगा? उस का जरा सा भी एहसास उसे नहीं था. अबोध नेहा को देख कर तो उस का मन यह सोच कर और भी खराब हो गया कि कैसे वह भविष्य में आने वाली मुश्किलों का सामना कर पाएगी.

यद्यपि नेहा उस की ननद है पर अनुभा ने सदैव उसे अपनी बेटी की तरह ही समझा है. जब शादी होने के बाद अनुभा ससुराल आई थी, उस समय नेहा 4 साल की रही होगी.

ससुराल आने पर अनुभा ने जब पहली बार नेहा को देखा, तभी उस के प्रति उस के मन में सहानुभूति और प्रेम जाग उठा था, क्योंकि मायके में उस के घर के पास ही मंदबुद्धि और मानसिक रूप से विकलांग बच्चों का एक स्कूल था. इस कारण ऐसे बच्चों के मनोभावों से उस का पूर्व परिचय रहा था. वह जानती थी कि नेहा का बौद्धिक और शैक्षणिक विकास आम बच्चों की तरह नहीं हो सकता इसलिए नेहा की सारी जिम्मेदारियां उस ने शुरू से ही अपने ऊपर ले ली थीं.

अनुभा ने नेहा को मानसिक रूप से अविकसित बच्चों के विशेष मनो- चिकित्सा केंद्र में प्रवेश भी दिलवाया था ताकि अपने समान बच्चों के बीच रह कर उस में किसी प्रकार की हीनभावना नहीं आ पाए. वह नेहा को घर पर भी उस की समझ के अनुसार कभी माला पिरोने, कभी पेंटिंग करने तो कभी घर के छोटेमोटे कामों में व्यस्त रखती थी.

नेहा को भी शुरू से ही अनुभा से गहरा लगाव हो गया था. वह हर समय भाभीभाभी कह कर उस के इर्दगिर्द घूमती रहती. जबकि नेहा की नासमझी की हरकतों से तंग आ कर कई बार मांजी अपना आपा खो कर उस पर हाथ उठा देतीं. उस के भाई तथा दूसरी भाभियां भी नेहा को बातबात में टोकते या डांटते रहते थे.

नेहा उम्र में जरूर बड़ी हो रही थी पर उस की बुद्धि और समझ तो 5-6 साल के बच्चे जितनी हो कर ठहर गई थी. घर में नेहा को किसी की भी डांट पड़ती तो वह भाग कर अनुभा के पास चली आती. वह कभी उसे प्यार से समझाती तो कभी गंभीर हो कर उस की गलती का एहसास करवाने का प्रयास करती.

नेहा 18 वर्ष की हो गई. उस की हमउम्र लड़कियों के जब शादीविवाह होने लगे तो वह भी कभीकभी बहुत भोलेपन से उस से पूछती, ‘भाभी, मेरा विवाह कब होगा? मेरा दूल्हा घोड़ी पर बैठ कर कब आएगा?’

वह नेहा को समझाती, ‘अभी तो तुम्हें पढ़लिख कर बहुत होशियार बनना है, फिर कहीं जा कर तुम्हारा विवाह होगा.’ नेहा उस के इस तरह समझाने पर संतुष्ट हो कर सबकुछ भूल कर खेलने में व्यस्त हो जाती पर नेहा के ऐसे सवाल उसे अकसर भविष्य की चिंता में डाल जाते.

एक दिन सास ने उस के पति नवीन के सामने नेहा के विवाह का प्रसंग छेड़ते हुए बताया कि उन की पड़ोसिन गोमती देवी ने अपने रिश्ते के चाचा के बेटे के लिए नेहा के रिश्ते की बात चलाई है. मांजी के मुंह से अचानक नेहा के विवाह की चर्चा सुन कर नवीन और अनुभा दोनों ही अवाक् रह गए.

नवीन ने कहा भी, ‘मां, नेहा जिस स्थिति में है, उस का विवाह करना क्या उचित होगा? दूसरे, क्या वे लोग नेहा के बारे में सबकुछ जानते हैं. यदि उन लोगों को अंधेरे में रख कर हम ने विवाह किया तो यह रिश्ता कितने दिन निभ पाएगा?’

नवीन की बातों को सुन कर मांजी एक बार तो गंभीर हो गईं, फिर कुछ सोच कर बोलीं, ‘बेटा, मैं ने गोमती देवी से सारी बात स्पष्ट करने के बाद ही तुम्हारे सामने इस रिश्ते की बात छेड़ी है. लड़के के एक पांव में पोलियो होने की वजह से वह बैसाखी से चलता है. उन लोगों ने इस संबंध को स्वीकार करने के बदले में 3 लाख रुपए नकद मांगे हैं, बाकी जो कुछ दहेज में हम नेहा को दें, वह हमारी इच्छा है. अब जब अपनी बेटी में ही कमी है तो हमें थोड़ा झुकना तो पडे़गा ही.’

मांबेटे की बातचीत सुन रही अनुभा अब स्वयं को रोक नहीं सकी और बोली, ‘मांजी, बीच में बोलने के लिए मैं क्षमा चाहूंगी पर मैं एक बात जरूर कहना चाहूंगी कि नेहा के विवाह का फैसला करने से पहले हमें एक बार सारी स्थितियों पर गंभीरता से विचार कर लेना चाहिए.’

‘सारी स्थितियों को स्पष्ट करने से तुम्हारा तात्पर्य क्या है बहू?’ मांजी ने उसे टोकते हुए पूछा.

‘मांजी, मेरे कहने का मतलब है कि दूसरों के बहलावे में आ कर हमें नेहा की शादी का फैसला नहीं करना चाहिए. मैं ने तो अपनी मौसी की लड़की को देखा है. उस की स्थिति भी कमोबेश नेहा जैसी ही थी. मेरी मौसी ने रुपयों का लालच दे कर एक गरीब घर के लड़के से अपनी बेटी का विवाह कर दिया पर शादी के 2 माह बाद ही उस के ससुराल वालों ने उसे यह कहते हुए वापस लौटा दिया कि उस कम दिमाग लड़की के साथ उन के बेटे का निभाव नहीं हो सकता. उन्होंने मेरी मौसी के रुपए भी हड़प लिए और उन की बेटी को भी वापस भेज दिया. मांजी, मुझे डर है कि हमारी नेहा के साथ भी ऐसा ही कुछ न घट जाए.’

एक-दूसरे का हाथ थामे नजर आए अरबाज खान और शूरा खान, ट्रोलर्स ने कहा- ‘बेटी की उम्र की है पत्नी’

बौलीवुड के न्यूली मैरीड कपल अरबाज खान और शूरा खान अपने अफेयर और शादी को लेकर खूब सुर्खियों में रहे हैं. शूरा खान पेशे से एक मेकअप आर्टिस्ट हैं. दोनो कई बार एक साथ स्पॉट हुए है. हाल ही में कपल साथ नजर आएं जहां दोनों ने एक दूसरे का हाथ पकड़ा हुआ था, इसी को लेकर अब लोग ट्रोल करते नजर आ रहे है. कपल का ये वीडियो आते ही वायरल हो रहा है.

 

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आपको बता दें कि अरबाज खान और शूरा खान एंटरनटेनमेंट की दुनिया में पौपुलर कपल हैं. मीडिया इस कपल को देखते ही एक्टिव हो जाते है. ऐसा ही अब पैपराजी ने उन्हे कैमरे में हाथों में हाथ डाले कैप्चर किया है. इस वीडियो में आप देख सकते है कि अरबाज खान और शूरा खान एक-दूसरे के हाथों में हाथ डाले नजर आए. बता दें ये वीडियो इंस्टाग्राम पर खूब वायरल हो रहा है. इस कपल को साथ में देखकर फैंस उनकी जमकर तारीफ कर रहे हैं. वहीं, ट्रोल्स ने अरबाज खान और शूरा खान को जमकर ट्रोल किया है. एक यूजर ने लिखा है, ‘कल ही हाथ बदल जाएगा. ‘ एक यूजर ने लिखा है, ‘अपनी बेटी के साथ कहां जा रहा है.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘बुढ़ापे का सहारा.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘डैडी एंड बेबी.

 

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बताते चलें कि अरबाज खान और शूरा खान ने बीते साल 2023 के दिसंबर में निकाह किया था. दोनों के निकाह के दौरान परिवार के लोग और करीबी दोस्त मौजूद रहे. अरबाज खान और शूरा खान की मुलाकात फिल्म ‘पटना शुक्ला’ के सेट पर हुई थी और इसके बाद दोनों के बीच प्यार का बीच पनप गया. फिल्म ‘पटना शुक्ला’ हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई है.

करोड़ों की सैलरी के सपने

यह आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस की वजह से है या कंपनियों के मुनाफों की लिमिट के आने या सब से बड़ी बात, दुनियाभर में अमीरों व गरीबों के बीच बढ़ती खाई बढ़ने पर शोर की वजह से, इस साल भारत में स्टार्टअप्स करोड़ प्लस नौकरियां देने में हिचकिचाने लगे हैं. पहले हर साल 100-200 युवाओं को कैंपस रिक्रूटमैंट में ही बहुत मोटी सैलरी दे दी जाती थी और यही मेधावी युवा आगे चल कर एमएनसी कंपनियों के सीईओ बन जाते थे.

अब कंपनियों के मोटे मुनाफे कम होने लगे हैं. जो स्टार्टअप चमचमा रहे थे, अब अपने ही बो  झ से चरमरा रहे हैं. हर कोई वैल्यूएशन बढ़ाचढ़ा कर, बेच कर कुछ सौ करोड़ रुपए जेब में डाल कर चलने की फिराक में है और इस दौरान भारी नुकसान को कम करने के लिए तेजी से छंटनी की जा रही है. स्टार्टअप ही नहीं, इन्फोसिस जैसी कंपनियों को भी अपनी एंपलौई स्ट्रैंग्थ कम करनी पड़ रही है.

यह कोई बड़े राज की बात नहीं है कि ऐसा क्यों हो रहा है. असल में पिछले 5-7 सालों में स्टार्टअप्स ने जो हल्ला मचा कर जीवन को सुगम बनाने के ऐप्स बनाए थे और छोटछोटे धंधों को टैक्नोलौजी के सहारे एक छत के नीचे लाने की कोशिश की थी, उस के साइड इफैक्ट्स दिखने लगे हैं.

लोग अब सिर्फ कंप्यूटर से बात करने के लिए कतराने की सोच पर पहुंच रहे हैं. एक के बाद दूसरा बटन दबाते रहिए. यह जेल की तरह लगने लगा था जिस में कंप्यूटर- चाहे मोबाइल हो, लैपटौप हो या डैस्कटौप, एक जेल सा बन गया था जिस में दुनिया से कट कर रहना पड़ रहा था. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस इस रूखेपन को कम कर रहा है और ग्राहक की आवाज की टोन को पहचान कर उसी लहजे में जटिल समस्याओं को सुल  झाने के प्रोग्राम बनाए जा रहे हैं ताकि ग्राहक बिदकें न. पर यह न भूलें कि असल जिंदगी तो ब्रिक, मोर्टार और हाड़मांस से चलती है. ऐप ने दफ्तरों से भिड़ने के कंपल्शन को कम किया है लेकिन इस के बदले उस ने ह्यूमन टच छीन लिया है.

एआई की आवाज कितनी ही मधुर क्यों न हो, कितनी ही ह्यूमन लगे, पता चल ही जाता है कि यह मशीनी है. ऐसे में ग्राहक उचट जाता है कि वह अपनी खास समस्या को हल करने के लिए कहे या न कहे.

जो मोटी सैलरीज मिल रही थीं वे उन स्टार्टअप्स से मिल रही थीं जो सिर्फ हवाहवाई बातें करने में आगे आ रहे थे. ब्रिक और मोर्टार सेवाएं तो आदमियों की सहायता से ही मिल रही थीं. उबर और ओला चलाने वाले तो ड्राइवर ही हैं जो कंप्यूटर एलगोरिदम की तोड़ निकालने में लगे थे या जिन की कमर कंप्यूटर एलगोरिदम तोड़ रहा था.

आज छोटा सा स्टार्टअप भी अरबों की वैल्यूएशन का काम कर रहा था इसलिए कि वह ह्यूमन एफर्ट को किसी बेचारे से छीन रहा था. अमेजन, फ्लिपकार्ट, स्विगी, बिग बास्केट ने लाखों छोटे व्यापार बंद करा दिए और अपने कंप्यूटर कंट्रोल्ड वर्कर्स को लूट कर ग्राहकों को सेवाएं देनी शुरू कीं. अब ग्राहक उकताने लगे हैं. दुनियाभर में कंजम्पशन बढ़ने लगा मगर उत्पादन नहीं. अमीरों के सुख की चीजें भरभर कर बनने लगीं क्योंकि स्टार्टअप चलाने वाले उस कैटेगरी में आते हैं जो ऊपरी एक फीसदी हैं. वे आम आदमी की तकलीफें नहीं सम  झते- जो यूक्रेन में लड़ रहा है, सऊदी डैजर्ट में पसीना बहा कर शहर बसा रहा है, घरों तक पानी, बिजली, सीवर पहुंचा रहा है, पक्के मकान बना रहा है. कोई स्टार्टअप या कंस्ट्रक्शन कंपनी बिना ह्यूमन टच के ये सब नहीं कर सकती, न शायद कभी कर पाएगी. कंप्यूटर स्लेव कभी नहीं बनेगा, यह एहसास होने लगा है और शायद स्टार्टअप और टैक्नो इंडस्ट्रीज अब ठंडी पड़ने लगी हैं.

करोड़ों की सैलरी के सपने टूट रहे हैं. उत्तर प्रदेश में 6,000 कौंस्टेबलों की भरती के लिए 50,00,000 उम्मीदवारों का जमा हो जाना साबित करता है कि सैलरी लैवल तो अब भी 20-30 हजार रुपए ही है, वह भी सरकारी नौकरी में, और उसी के लिए मारामारी हो रही है. पेपर लीक भी एक धंधा बना हुआ है, सरकारें परेशान हैं. कुछ को करोड़ों के पैकेज बेरोजगारों के मुंह से निवाले छीन कर दिए जा रहे थे पर अब इन में कुछ कमी होने लगी है.

गुणों को पहचानें, पर्सनैलिटी निखारें

अपनी पर्सनैलिटी पर भरोसा करें. अपने रंगरूप, कद, पढ़ाई, बैकग्राउंड को भूल कर हमेशा यह सोचिए कि आप में कुछ ऐसे गुण हैं जो आप की लाइफ को लिवएबल, हैप्पी, प्रौसपरस बना सकते हैं. अपनी कमियों को छिपाइए नहीं पर उन से घबरा कर कछुए की तरह खोल में न छिपिए. हर युवा कुछ गुण रखता है. हरेक में कुछ करने की, कुछ बनने की तमन्ना होती है. सोशल नौर्म्स कुछ ऐसे हैं जो कुछ यंग को एहसास दिलाते हैं कि उन की कोई कीमत नहीं है. इस गलतफहमी को खुद दूर करें. आप को लूटने वाले इस गलतफहमी का सहारा ले कर ही जेब पर डाका डालते हैं. वे सपने दिखाते हैं, ठोस प्लान या प्रोग्राम नहीं बनाते.

यह सोच कर चलें कि रास्ते पर पड़े पत्थरों को लांघ कर या रास्ता बना कर चलना संभव है. हम में से हरेक ऐसा करता है. हम पानी के गड्ढों से भरी सड़क पर सूखी जगह देख कर चलते हैं पर बाढ़ आ जाने के बाद जूते, पैर या पैंट के गीली हो जाने के बावजूद रास्ता पार करना नहीं छोड़ते क्योंकि इस पानी के दूसरी तरफ कोई है जो बचा कर रखेगा, कुछ राहत मिलेगी, कुछ सुकून मिलेगा.

पढ़ाई हो, हौबी हो, खेल का मैदान हो, रंगमंच हो, पहले ही न घबराइए. उतरिए तो सही. हो सकता है सोने का अंडा हाथ लग जाए, वरना अनुभव तो मिलेगा ही न, जो आगे काम आएगा. लेकिन इस के लिए भीड़ की मानसिकता का शिकार न बनें.

शातिर, बेईमान लोग भीड़ का इस्तेमाल करते हैं. कमजोरों को बहकाने के लिए जब इतने सारे लोग एक तरफ जा रहे हैं तो कुछ अच्छा होगा वहां, इस को जम कर भुनाया जाता है. आप ने जो भी सीखा, जो भी जाना, उस का इस्तेमाल कर के अपना फैसला लें कि आप भीड़ का हिस्सा बन कर अपनी सफलता की चाबी भीड़ के सब से आगे वाले के हाथ में देना चाहते हैं या अपने हाथ में रखना चाहते हैं.

हर व्यक्ति सफल हो सकता है. आप कितने सफल हो सकते हैं, इस का आकलन पहले न करें. पहले तो यही उम्मीद करें कि हर सपना, प्लान सक्सैसफुल ही कंप्लीट होगा. उस पर आप के ऐक्टिव होने की देर है बस, हाथ में कुछ लगेगा ही, कम या ज्यादा. हां, इस के लिए तैयारी करनी पड़ती है. नदी पार करने के लिए नाव बनानी पड़ती है. जब दूसरे पार कर सकते हैं तो आप भी बच सकते हैं, दूसरों से बेहतर भी हो सकते हैं.

तैयारी करने में जरूरी है कि अपने सपनों पर फोकस करें. उन को साकार करने के तरीके ढूंढ़ें. लोगों से पूछें पर फैसला हमेशा अपनी जानकारी के सहारे लें. आप के पास जानकारी जुटाने के हजारों तरीके हैं. आज इंटरनैट तो है ही, साथ ही, विस्तृत जानकारी वाली किताबों की दुकानें व लाब्रेरियां भी हैं. इंटरनैट तो आप को हताश भी कर सकता है पर किताबें, आमतौर पर एक नए निर्माण का मैसेज देती हैं. आगे चलिए तो सही, कुछ मिलेगा. हर वक्त बैठे रह कर मोबाइल से खेलना आप का ऐम (लक्ष्य) न हो, यह खयाल रखें. बल्कि, एक तमन्ना हो कुछ करने की और उसे पूरा करें.

मेरे जीजाजी मुझसे काफी स्नेह करते हैं पर मेरे पति उन्हें पसंद नहीं करते, पति को कैसे समझाऊं?

सवाल
मेरी शादी को 1 साल हुआ है. यों तो पति और ससुराल वाले सब अच्छे हैं, पर पति को मेरा मायके जाना पसंद नहीं है. दरअसल, हमारा कोई भाई नहीं है. इसीलिए मेरी बड़ी बहन सपरिवार मम्मी पापा के पास रहती है. बहन मुझ से 10 साल बड़ी है. मेरे जीजा जी बिलकुल बड़े भाई की तरह मुझ से स्नेह करते हैं पर मेरे पति उन्हें पसंद नहीं करते. मुंह से कुछ नहीं कहते पर उन का चेहरा सब बयां कर जाता है. पति को कैसे समझाऊं?

जवाब
आप की शादी को थोड़ा ही वक्त बीता है, अभी आप को अपने पति को समय देना चाहिए. यदि आप के पति नहीं चाहते कि आप मायके ज्यादा जाएं या अपने बहनोई से खुल कर बात करें. तो आप उन्हें शिकायत का मौका न दें. हो सकता है कि समय के साथ उन का व्यवहार बदल जाए और उन्हें रिश्तों की अहमियत समझ आने लगे.

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