नौकरी की दलाली: चौधरी तेजपाल की चलाकी

पारितोष ने 500-500 रुपए के नोट की 24 गड्डियों को गिन कर अपने बैग में रखते हुए कहा, ‘‘तेजपालजी, अब आप को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. जल्दी ही आप का बेटा सरकारी नौकरी में होगा, वह भी भारत की राजधानी नई दिल्ली में.’’

‘‘हांजी, अब तो सब आप के हाथ में है पारितोष साहब.’’

पारितोष को अब जटपुर गांव से निकलने की जल्दी थी. 12 लाख रुपए उस के हाथ में इतनी आसानी से आ चुके थे, जिस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

पारितोष कार में बैठते हुए बोला, ‘‘तेजपालजी, बस एक बात का ध्यान रखना कि यह मामला हम दोनों के बीच का है, तो किसी तीसरे को इस की भनक भी नहीं लगनी चाहिए.’’

‘‘अरे साहब, मैं किसी से क्यों कुछ बताने लगा. मैं ने तो आप के आने तक की खबर किसी गांव वाले को नहीं दी. मुझे तो बस अपने बेटे की नौकरी से मतलब है’’

‘‘उस की चिंता मत करो तेजपालजी. नौकरी तो लग गई समझ,’’ कहते हुए पारितोष ने अपनी कार की चाबी घुमाई और वहां से चल पड़ा. कुछ ही देर बाद उस की कार मेन रोड की तरफ दौड़ने लगी थी.

चौधरी तेजपाल कार को तब तक जाते देखते रहे, जब तक कि वह आंखों से ओझल नहीं हो गई.

चौधरी तेजपाल पारितोष को इतनी बड़ी रकम दे कर काफी राहत महसूस कर रहे थे. अब उन का छोटा बेटा अनिल उन को ताना नहीं मार सकता था, ‘पापा, आप ने मेरे लिए किया ही क्या है?’

जब चौधरी तेजपाल का बड़ा बेटा सुनील सेना में मेकैनिक के पद पर भरती हुआ था, तब भी उन्होंने 8 लाख रुपए दलाल को दिए थे.

तब सुनील ने उन से बारबार कहा था, ‘पापा, आप को किसी को एक पैसा देने की जरूरत नहीं है. देखना, मैं अपनी काबिलीयत से हर टैस्ट क्वालिफाई कर जाऊंगा.’

लेकिन बाप का दिल था कि मानता ही नहीं था. चौधरी तेजपाल के कानों में यह बात ठूंसठूंस कर भर दी गई थी कि बिना पैसे दिए कोई काम नहीं होता है, इसलिए वे बेटे की नौकरी लगवाने में कोई भी चूक नहीं करना चाहते थे.

यह सोच कर कि नौकरी न लगने पर कहीं सारी जिंदगी पछताना न पड़े कि काश, पैसे दे दिए होते, इसलिए चौधरी तेजपाल ने किसी की कोई बात नहीं सुनी थी और दलाल के हाथों में चुपचाप 8 लाख रुपए रख दिए थे.

जब सुनील की नौकरी लग गई, तो चौधरी तेजपाल को यह सोच कर बड़ी संतुष्टि मिली कि उन्होंने बाप का फर्ज बखूबी निभाया. उन्हें 8 लाख रुपए का कोई गम नहीं था. वे तो यही सोचते रहे कि उन्हीं 8 लाख रुपए की बदौलत सुनील की नौकरी लगी है.

लेकिन सुनील को यह बात आज तक कचोटती है कि उस के पापा ने उस की काबिलीयत पर यकीन न कर के 8 लाख रुपए की रिश्वत पर यकीन किया.

छोटा बेटा अनिल चौधरी तेजपाल को हमेशा ताने मारता रहता कि बड़े भैया के लिए तो उन्होंने तुरंत दलालों को 8 लाख रुपए दे दिए, लेकिन उस के लिए कुछ नहीं करते.

उन्हीं दिनों खतौली के रहने वाले एक रिश्तेदार ने चौधरी तेजपाल को पारितोष से मिलवाया, जो दिल्ली के जल विभाग में अफसर था. उस रिश्तेदार ने उन्हें यह भी बताया था कि पारितोष ने कई लड़कों को जल विभाग के साथसाथ दूसरे विभागों में सैट कराया है.

पारितोष जुगाड़ू आदमी था और उस की पहुंच ऊपर तक थी. उस ने नौकरी की दलाली की कला अपने ही विभाग के एक आला अफसर से सीखी थी. उस अफसर ने पारितोष को बताया था कि नौकरी चाहने वालों से पैसे पकड़ लो, उन्हें इम्तिहान में बैठाओ.

अगर उन लड़कों में से कोई क्वालिफाई कर जाए तो उसे बताओ कि उस का नंबर लाने में हम ने कितनी मेहनत की है. उस का पैसा हजम कर जाओ. जिंदगीभर वह तुम्हारा एहसानमंद भी रहेगा कि तुम ने उस की नौकरी लगवाई.

जिस के पैसे तुम ने पकड़ रखे हैं और अगर उस का नंबर नहीं आया, तो उसे भी बताओ कि हम ने कोशिश तो बहुत की, लेकिन इस बार जुगाड़ नहीं हो पाया, पर अगली बार जरूर हो जाएगा.

अगर वह पैसे वापसी की जिद करे, तो अनापशनाप खर्चे बता कर उस से लाख 2 लाख तो झटक ही लो, बाकी वापस कर दो. पैसा हमेशा नकदी में और अकेले में पकड़ो, जिस से दूसरे को कानोंकान भी खबर न हो.

तब चौधरी तेजपाल ने पारितोष से संबंध गांठने शुरू किए. पारितोष ने पैसे ले कर 6 महीने के अंदर अपने ही विभाग में अनिल की क्लर्क की नौकरी लगवाने का वादा किया था, लेकिन 6 महीने गुजरने के बाद भी पारितोष कोई साफ जवाब नहीं दे रहा था. कभी कोई बहाना, तो कभी कोई बहाना.

तंग आ कर एक दिन तेजपाल अपने बेटे अनिल को ले कर पारितोष के दिल्ली औफिस पहुंच गए. पारितोष तो जैसे उन के आने का ही इंतजार कर रहा था. उन को देखते ही उस ने कहा, ‘‘बधाई हो तेजपालजी, आप के बेटे की नौकरी लग गई है. नौकरी वाली लिस्ट में उस का नाम आ गया है.’’

यह सुनते ही तेजपाल की आंखें खुशी से चमक उठीं. अनिल के चेहरे पर भी मुसकान तैर गई.

तभी पारितोष ने अपनी दराज में से एक प्रिंटेड पेपर निकाला और तेजपालजी की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘देखो, इस में दूसरे नंबर पर तुम्हारे बेटे अनिल का नाम है.’’

लिस्ट में नाम देखते ही चौधरी तेजपाल तो जैसे खुशी से पागल हो गए. वे बारबार उस पेपर को माथे से लगाने लगे, फिर खुश हो कर अनिल से कहा, ‘‘ले बेटा, तू भी देख ले लिस्ट में अपना नाम. मेरी जिंदगी का एक और सपना पूरा हो गया.’’

अनिल भी खुश हो कर उस पेपर को बड़े ध्यान से पढ़ने लगा. अपना नाम देख कर उस की खुशी का भी कोई ठिकाना न था. तभी कुछ सोच कर वह औफिस से बाहर आया और चौकीदार के पास जमा अपना मोबाइल फोन उस से ले लिया.

अनिल पढ़ालिखा नए जमाने का लड़का था. उस ने इंटरनैट पर दिल्ली जल विभाग में हुई नई नियुक्तियों के बारे में सर्च करना शुरू किया, लेकिन उसे कहीं भी ऐसी कोई लिस्ट नहीं मिली.

अनिल ने इशारे से अपने पापा को बुलाया और कहा, ‘‘मुझे तो यह लिस्ट फर्जी लगती है. इंटरनैट पर तो कोई भी ऐसी लिस्ट नहीं है. पारितोष सर से कहिए कि इंटरनैट पर लिस्ट दिखाएं.’’

लेकिन इंटरनैट पर तो कोई ऐसी लिस्ट तब मिलती, जब उसे अपलोड किया गया होता. पारितोष समझ गया कि कम पढ़ेलिखे और पुराने जमाने के तेजपाल को तो बेवकूफ बनाया जा सकता है, लेकिन नई पीढ़ी के अनिल को नहीं. वह फिर से बहाना बनाते हुए इधरउधर की बातें करने लगा.

अनिल समझ गया कि पारितोष उन्हें चकमा देने की कोशिश कर रहा है. यह देख कर उस का जवान खून उबाल खा गया. उस ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘पारितोष सर, या तो एक हफ्ते में आप मुझे नौकरी का जौइनिंग लैटर दे दीजिए या फिर मेरे पापा के पैसे वापस कर दीजिए.’’

‘‘धमकी दे रहे हो क्या?’’ पारितोष ने आंखें दिखाते हुए कहा.

‘‘मैं तो धमकी नहीं दे रहा, लेकिन अगर आप धमकी ही समझ रहे हैं, तो यही समझ लीजिए,’’ अनिल ने कहा.

‘‘क्या सुबूत है कि तुम्हारे पापा ने मुझे पैसे दिए हैं?’’

‘‘मेरे पापा सीधेसादे हैं. उन्होंने तुम पर यकीन कर के पैसे दिए. अगर उन के पास इस बात का कोई सुबूत नहीं है, तो इस का मतलब यह नहीं कि उन्होंने तुम्हें पैसे नहीं दिए.’’

बात को बढ़ता और बिगड़ता देख चौधरी तेजपाल ने दखल दिया. अपने अनुभव का फायदा उठाते हुए उन्होंने कहा, ‘‘पारितोषजी, इस समय तो हम जा रहे हैं, लेकिन एक हफ्ते बाद फिर आएंगे. या तो आप जौइनिंग लैटर तैयार रखना या फिर हमारी रकम.’’

यह कह कर चौधरी तेजपाल अनिल को ले कर बाहर आ गए.

अनिल गुस्से में बोला, ‘‘पापा, आप ने बीच में टांग अड़ा दी, नहीं तो आज ही आरपार का मामला कर देता.’’

‘‘बेटा, जोश में होश नहीं खोना चाहिए. गुस्से में तू कुछ कर बैठता तो वह हम पर ही उलटा केस ठोंक देता. धमकाने, मारपीट करने, सरकारी काम में बाधा डालने, झूठे आरोप लगाने और भी न जाने क्याक्या. नौकरी तो मिलनी ही नहीं, 12 लाख की बड़ी रकम भी डूब जाती.

‘‘हमारे पास कोई सुबूत नहीं कि हम ने उसे 12 लाख रुपए दिए. मैं ने तो आंखें मूंद कर पारितोष पर यकीन किया था. वह हम पर मुकदमा अलग से करता और मुकदमेबाजी से तेरा कैरियर भी तबाह कर देता. इन सब बातों से बचने और तुझे बचाने के लिए ही बेटा मैं ने टांग अड़ाई.’’

पापा की बात सुन कर अनिल की आंखें खुली की खुली रह गईं. उस ने तो इतनी दूर तक की बात सोची ही नहीं थी. उसे अपने पापा के अनुभव पर गर्व महसूस हो रहा था. वह यह भी समझ गया कि कम से कम अभी पैसे वापस मांगने का रास्ता तो बचा रह गया है. अगर वह पारितोष से लड़ पड़ता, तो वह रास्ता भी बंद हो गया होता.

अब चौधरी तेजपाल के सामने एक ही सवाल मुंहबाए खड़ा था कि पारितोष से पैसा वापस कैसे लिया जाए? उन के पास उसे पैसा देने का कोई भी सुबूत नहीं था. तभी उन्हें अचानक याद आया कि अकसर गन्ना किसान कैसे अपना पैसा ऐसे दलालों के पास फंसा देते हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के साथ अकसर ऐसा होता ही रहता है.  गन्ने का अच्छा पैसा मिल जाता है और किसान अपने बच्चों की नौकरी लगवाने के चक्कर में इन दलालों की बातों में फंस जाते हैं. किसी को नौकरी मिल जाती है, किसी को नहीं मिलती.

इस मायाजाल को आज तक कोई समझ नहीं पाया और बहुतकुछ जानते हुए भी नौकरी के लालच में किसान फंसते ही फंसते हैं.

घर आ कर तेजपाल ने सारा मामला अपनी पत्नी तारा देवी को बताया. तारा देवी एक तेजतर्रार औरत थीं. उन्होंने कुछ सोच कर कहा, ‘‘अनिल के पापा, इस बार तुम जब पारितोष के पास जाओ, तो मुझे भी साथ ले कर चलना.’’

‘‘लेकिन, तुम वहां क्या करोगी?’’

‘‘जो तुम नहीं कर पाए. यकीन करो, मैं वहां काम नहीं बिगाड़ूंगी, बल्कि बनाऊंगी.’’

अगली बार चौधरी तेजपाल अपनी पत्नी तारा देवी और 2 रिश्तेदारों को ले कर पारितोष के औफिस पहुंचे. चौकीदार ने उन के मोबाइल औफिस के बाहर ही रखवा लिए.

चौधरी तेजपाल ने औफिस में ठीक वैसा ही किया जैसा तारा देवी ने उन से करने के लिए कहा था.

तारा देवी पूरी तैयारी के साथ आई थीं. पीली साड़ी, पीला ब्लाउज और उन से मैच करता हुआ मोबाइल का पीला कपड़े का कवर. सबकुछ एक योजना के तहत.

औफिस में पहुंचते ही चौधरी तेजपाल ने हाथ जोड़ते हुए पारितोष से कहा, ‘‘साहब, पिछली बार के लिए माफी मांगता हूं. चलो नौकरी न सही, साहब, हमारे 12 लाख रुपए ही वापस कर दो.’’

पारितोष ने चौधरी तेजपाल और उस के दोनों रिश्तेदारों की जेबों पर एक नजर डाली कि कहीं वे चौकीदार की नजरों से मोबाइल छिपा कर तो नहीं लाए. लेकिन उन के पास ऐसा कुछ नहीं था. फिर एक सरसरी नजर उस ने तारा देवी पर डाली, लेकिन उन के हाथ तो खाली थे.

तब निश्चिंत हो कर पारितोष ने कहा, ‘‘क्यों तेजपालजी, पिछली बार तो तुम और तुम्हारा लड़का बड़ी अकड़ दिखा रहे थे?’’

‘‘अरे साहब, मिट्टी डालिए पिछली बातों पर. लड़का तो नादान है. उस की बातों को दिल पर मत लीजिए.’’

‘‘लेकिन, अगर मैं फिर से यह कह दूं कि क्या सुबूत है तुम्हारे पास कि मैं ने तुम से 12 लाख रुपए लिए हैं?’’

‘‘अरे साहब, सुबूत तो मेरे पास कोई नहीं है कि तुम ने हमारे गांव आ कर फलां तारीख में फलां समय 12 लाख रुपए लिए थे.’’

‘‘हां, मैं ने उस तारीख को उस समय तुम्हारे गांव आ कर तुम से 12 लाख रुपए लिए थे, लेकिन इसे अदालत में कैसे साबित करोगे? अदालत तो सुबूत और गवाह मांगती है.’’

‘‘अरे साहब, मैं अदालत क्यों जाऊंगा यह साबित करने कि आप ने 500-500 रुपए के नोट की 24 गड्डियां अपने चमड़े के बैग में रखी थीं. मेरी खोपड़ी इतनी खराब नहीं हुई है कि आप से दुश्मनी मोल लूं.’’

‘‘तो अब आए न लाइन पर. ये सब काम हुए, लेकिन इन्हें अदालत में साबित करना टेढ़ी खीर है.’’

‘‘अरे साहब, हम आप के खिलाफ जाएंगे ही क्यों? आप ने यही मान लिया है कि आप ने 12 लाख रुपए लिए थे, यही बड़ी बात है. आप मुकर भी तो सकते थे.’’

‘‘तो फिर जाओ. जब मेरे पास पैसे होंगे, मैं तुम लोगों को बुलवा लूंगा. तकादा बिलकुल मत करना, नहीं तो मैं मुकर भी जाऊंगा. फिर तुम क्या कर लोगे? आज के बाद मेरे औफिस में दिखाई मत देना.’’

तारा देवी का मकसद पूरा हो चुका था. उन्होंने तेजपाल से वहां से चलने को कहा. तेजपालजी को समझ में नहीं आ रहा था कि तारा देवी ने यहां आने की जिद की थी, लेकिन उन्होंने तो एक शब्द भी नहीं बोला.

बाहर आ कर तारा देवी ने चौकीदार को अपने पास बुलाया और उस के आगे अपने मोबाइल को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो, अपने साहब का 12 लाख रुपए लेने का वीडियो देखो और आडियो सुनो. सब रिकौर्ड कर लिया गया है. अभी का ताजाताजा.’’

वीडियो रिकौर्डिंग को साफसाफ सुना जा सकता था, जिस में पारितोष 12 लाख रुपए लेने की बात स्वीकार कर रहा है.

रिकौर्डिंग सुनाने के बाद तारा देवी ने चौकीदार से कहा, ‘‘जाओ, कह दो अपने साहब से कि हम अदालत नहीं सीधे विजिलैंस औफिस जा रहे हैं और उस के बाद बड़े अफसरों के पास जाएंगे इस सुबूत के साथ.’’

चौधरी तेजपाल और उस के दोनों रिश्तेदार बड़े हैरान हो कर तारा देवी को देख रहे थे, तभी तारा देवी ने कहा, ‘‘हमें यहां से तुरंत निकलना होगा.’’

अभी उन की कार 10-15 किलोमीटर ही गई होगी, तभी तेजपाल का फोन घनघना उठा. फोन करने वाला पारितोष था. वह घबराते हुए बोला, ‘तेजपालजी, आप के हाथ जोड़ता हूं आप लोग विजिलैंस औफिस मत जाना. वे मेरी नौकरी खा जाएंगे. मैं आज ही आप का पूरा पैसा वापस करने के लिए तैयार हूं. बस, मुझे इतनी बड़ी रकम जुटाने के लिए 2-3 घंटे का समय दे दीजिए.’

चौधरी तेजपाल ने तारा देवी से पूछा कि क्या जवाब देना है, फिर थोड़ी देर के बाद तेजपाल ने कहा, ‘‘हम तुम्हें 4 घंटे का समय देते हैं. तुम पैसा ले कर गाजियाबाद के आउटर पर मेरठ रोड पर गणेश ढाबे के पास मिलना.’’

‘ठीक है, मैं जल्दी से जल्दी पैसा ले कर वहां पहुंचता हूं.’

‘‘ठीक है, आ जाइए पूरा पैसा ले कर, नहीं तो विजिलैंस…’’

‘‘नहींनहीं, तेजपालजी, ऐसा मत करना. मैं आप के आगे हाथ जोड़ता हूं, तबाह हो जाऊंगा मैं. पैसे ले कर आ रहा हूं,’ पारितोष ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

पारितोष समय से पहले आ गया. चौधरी तेजपाल की कार गणेश ढाबे से कुछ आगे एक पेड़ के नीचे खड़ी थी.

पारितोष ने आते ही कार में से चमड़े का भारी बैग निकाला और चौधरी तेजपाल की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘गिन लीजिए, एक रुपया भी कम नहीं है.’’

चौधरी तेजपाल ने वह बैग कार में बैठे अपने रिश्तेदारों को रुपए गिनने के लिए दे दिया. पैसा पूरा था.

घबराए हुए पारितोष को अभी भी समझ में नहीं आ रहा था कि पूरी चौकसी बरतने के बाद भी आखिर उस की वीडियो कैसे बन गई. जब उस ने यह बात पूछी, तो तारा देवी ने अपने ब्लाउज की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘ऐसे… और अभी भी तुम्हारी वीडियो रिकौर्ड हो रही है. तुम्हारे जैसे जालसाजों के लिए ऐसी जालसाजी करनी पड़ती है. पीली साड़ी, पीला ब्लाउज और मोबाइल का ब्लाउज के कपड़े से मैच करता हुआ कवर, जिस से तुम्हारा चौकीदार और तुम दोनों गच्चा खा गए.

‘‘अब हमारे पास तुम्हारे खिलाफ सारे सुबूत हैं. अगर अब तुम ने भविष्य में ऐसी हरकत किसी के साथ भी की तो ये सारे सुबूत विजिलैंस औफिस, तुम्हारे बड़े अफसरों और अदालत को सौंपे जाएंगे.’’

पारितोष ने उन के सामने कान पकड़ कर और उठकबैठक लगा कर माफी मांगी कि अब भविष्य में वह यह काम किसी के साथ नहीं करेगा. उसे अंदाजा नहीं था कि चुप रहने वाली और सीधीसादी दिखाई देने वाली गांव की एक औरत इतनी शातिर दिमाग भी हो सकती है.

तमाचा : क्या सानिया ले पाई अपना बदला

सानिया की सहेलियों को उस से जलन हो रही थी. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सानिया का रिश्ता इतने बड़े घर में हो जाएगा.

सानिया के अब्बा एक मामूली से फोटोग्राफर थे, जबकि उस के होने वाले ससुर एक बड़े बिजनेसमैन थे. सानिया को उस की सास ने एक शादी में देखा था और तभी उसे पसंद कर लिया था. फिर जल्दी ही उस का रिश्ता भी तय हो गया.

आज सानिया की शादी थी. लाल जोड़े में उस का हुस्न और निखर आया था. सभी सहेलियां उसे घेर कर बैठी थीं और हंसीमजाक कर रही थीं.

‘‘सानिया, तुझे पति नहीं लखपति मिल रहा है,’’ सानिया की खास सहेली रिंकी ने कहा.

‘‘काश, हमें भी कोई ऐसा ही मोटा मुरगा मिल जाए, तो जिंदगी ऐश से कटे,’’ टीना ने अपने दिल पर हाथ रख कर कहा.

‘‘रुपएपैसे का लालच मुझे नहीं है. मैं तो सिर्फ यह चाहती हूं कि मेरा होने वाला पति तनमन से मेरा हो, सिर्फ मेरा,’’ सानिया ने धीरे से कहा.

‘‘जब वह तुम से शादी कर रहा है, तो तुम्हारा ही हुआ न,’’ रिंकी ने कहा.

‘‘शादी करना और सिर्फ बीवी का हो कर रहने में फर्क है रिंकी डियर,’’ सानिया ने कहा.

‘‘अच्छा, अपने विचार अपने पास रख,’’ रिंकी ने कहा, तो सभी सहेलियां खिलखिला कर हंस पड़ीं.

शादी के बाद जब सानिया अपनी ससुराल पहुंची, तो वहां की शानोशौकत देख कर वह भी सोचने पर मजबूर हो गई कि आखिर उस की सास ने उसे ही क्यों चुना? यह ठीक था कि वह शक्लसूरत से अच्छी थी, पर उस जैसी तो और भी बहुत होंगी.

शादी के बाद कुछ दिन तो हंसीखुशी से बीत गए. उस का पति नादिर अपने मांबाप का एकलौता बेटा था, इसलिए उसे लाड़प्यार से पाला गया था.

नादिर अपना ज्यादा समय घर से बाहर ही गुजारता था. सानिया इस बारे में कभी पूछती, तो नादिर कह देता कि काम के सिलसिले में उसे बाहर रहना पड़ता है. एक दिन सानिया की तबीयत कुछ खराब थी. उस ने नादिर से कहा कि वह उसे डाक्टर को दिखा लाए, तो नादिर ने कहा कि वह अकेली चली जाए, क्योंकि उसे कुछ जरूरी काम है.

सानिया डाक्टर को दिखाने चली गई. रास्ते में अचानक सानिया ने एक सिनेमाहाल के पास नादिर को एक लड़की के साथ घूमते देखा. वह वहां का नजारा देख कर सबकुछ समझ गई.

सानिया की हालत अजीब हो गई. किसी तरह वह घर वापस आई. शाम को जब नादिर आया, तो सानिया ने पूछा, ‘‘आज आप कहां थे?’’

‘‘मैं काम के सिलसिले में बाहर गया था,’’ नादिर ने साफ झूठ बोला.

‘‘मैं ने अपनी आंखों से आप को एक लड़की के साथ कहीं घूमते देखा था,’’ सानिया बोली.

‘‘ओह… तो तुम ने देख लिया,’’ नादिर ने लापरवाही से कहा.

‘‘कौन थी वह?’’ सानिया ने पूछा.

‘‘किसकिस के नाम पूछोगी? मैं बाहर क्या करता हूं, इस से तुम्हें क्या लेना? तुम्हें बीवी का हक तो मिल रहा है न,’’ नादिर ने कहा.

‘‘तुम्हारे इस रूप के बारे में मैं सोच भी नहीं सकती थी,’’ सानिया ने कहा.

‘‘जैसे तुम दूध की धुली हो. शादी से पहले क्याक्या गुल खिलाए होंगे, कौन जानता है,’’ नादिर ने बेशरमी से कहा.

‘‘अगर मैं यह कहूं कि मैं दूध की धुली हूं, तो…’’ सानिया ने कहा.

‘‘इस का क्या सुबूत है तुम्हारे पास?’’ नादिर ने पूछा.

सानिया ने नादिर के सवाल का जवाब नहीं दिया. उस ने तय किया कि वह अपने सासससुर को नादिर की हरकतों के बारे में सबकुछ बताएगी. आखिर उन्हें भी तो मालूम होना चाहिए कि उन का बेटा घर के बाहर क्याक्या गुल खिलाता है.

रात को सानिया दूध ले कर सासससुर के कमरे की तरफ गई. ‘‘कहीं सानिया को नादिर की हरकतों का पता न चल जाए,’’ ससुर की आवाज सुन कर सानिया के कदम दरवाजे पर ही ठहर गए.

‘‘पता चल जाएगा, तो कौन सी कयामत आ जाएगी. आखिर हम एक गरीब घर की लड़की इसीलिए तो लाए हैं. उसे अपनी जबान बंद रखनी होगी. उस का काम सिर्फ इस घर का वारिस पैदा करना है,’’ सास ने कठोर आवाज में कहा.

सासससुर की बातें सुन कर सानिया हैरान रह गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतने ऊंचे घराने के लोगों के खयाल इतने नीचे होंगे.

उस की सेवा, त्याग और प्यार का उन की नजरों में कोई मोल नहीं था. ऊपर से तो वह शांत थी, लेकिन उस के दिलोदिमाग में एक तूफान मचा था.

‘मैं भी दिखा कर रहूंगी कि मैं क्या कर सकती हूं,’ सानिया ने मन ही मन सोचा.

धीरेधीरे समय गुजरने लगा. इस बीच सानिया कई बार अपने मायके भी गई, लेकिन उस ने अपने मांबाप से कुछ नहीं कहा. सानिया मां बनने वाली है, यह मालूम होते ही पूरे घर में खुशी छा गई. गोद भराई की रस्म के लिए लोगों को बुलाया गया. सानिया कीमती जोड़े और जेवरों से लदी बैठी थी.

गोद भराई की रस्म के बाद सास ने सानिया की बलाएं ली और उसे गले लगाया. ‘‘बहुत जल्द तू इस घर को वारिस देने वाली है. मेरे बेटे का चिराग इस घर को रोशन करेगा. मैं दादी बनूंगी,’’ सास ने खुश होते हुए कहा.

‘आप दादी जरूर बनेंगी और इस घर को वारिस भी जरूर मिलेगा, लेकिन वह आप के बेटे का चिराग नहीं होगा.  इस राज भरी बात को तो सिर्फ मैं ही जानती हूं कि इस बच्चे का बाप आप का बेटा नहीं, कोई और है. यह करारा तमाचा आप लोगों के मुंह पर लगा कर मैं ने अपना बदला ले लिया है,’ सानिया ने कुटिलता से मुसकराते हुए सोचा.

काश, तुम भाभी होती

पुनीत पटना इंजीनियरिंग कालेज में प्रीफाइनल ईयर में पढ़ रहा था. उस का भाई प्रेम इंजीनियरिंग कर 2 साल पहले अमेरिका नौकरी करने गया था. उस के पिता सरकारी नौकरी में थे. वह साइकिल से ही कालेज जाया करता था. एक दिन जाड़े के मौसम में वह कालेज जा रहा था. उस दिन उस का एग्जाम था. अचानक उस की साइकिल की चेन टूट गई. ठंड में इतनी सुबह कोई साइकिल रिपेयर की दुकान भी नहीं खुली थी और न ही कोई अन्य सवारी जल्दी मिलने की उम्मीद थी. उस के पास समय  भी बहुत कम बचा था. कालेज अभी  3 किलोमीटर दूर था. वह परेशान रोड पर खड़ा था. तभी एक लड़की स्कूटी से आई और बोली, ‘‘मे आई हैल्प यू?’’

पुनीत ने अपनी परेशानी का कारण बताया. लड़की स्कूटी पर बैठ गई और पुनीत से बोली ‘‘आप साइकिल पर बैठ जाएं और मेरे कंधे को पकड़ लें. बिना पैडल किए मेरे साथ कुछ दूर चलें. मेरा कालेज आधा किलोमीटर पर है. उस के बाद मैं आप को इंजीनियरिंग कालेज तक छोड़ दूंगी.’’

थोड़ी दूर पर मगध महिला कालेज के गेट पर उस ने दरबान को साइकिल रिपेयर करवाने के लिए बोल कर पुनीत से कहा, ‘‘आप मेरी स्कूटी पर बैठ जाएं, मैं आप को ड्रौप कर देती हूं. कालेज से लौटते वक्त अपनी साइकिल दरबान से ले लेना. हां, उसे रिपेयर के पैसे देना न भूलना.’’

उस लड़की ने पुनीत को कालेज ड्रौप कर दिया. पुनीत ने कहा ‘‘थैंक्स, मिस… क्या नाम…?’’

लड़की बिना कुछ बोले चली गई. कुछ दिनों बाद पुनीत कालेज से लौटते समय सोडा फाउंटेशन रैस्टोरैंट में एक किनारे टेबल पर बैठा था. पुनीत लौन में जिस टेबल पर बैठा था उस पर सिर्फ 2 कुरसियां ही थीं. दूसरी कुरसी खाली थी. बाकी सारी टेबलें भरी थीं.

वह अपना सिर झुकाए कौफी सिप कर रहा था कि एक लड़की की आवाज उस के कानों में पहुंची, ‘‘मे आई सिट हियर?’’ उस ने सिर उठा कर लड़की को देखा तो वह स्कूटी वाली लड़की थी. उस ने कहा, ‘‘श्योर, बैठो… सौरी बैठिए. इट्स माय प्लेजर. उस दिन आप का नाम नहीं पूछ सका था.’’

वह बोली, ‘‘मैं वनिता और फाइनल ईयर एमए में हूं.’’

‘‘और मैं पुनीत, थर्ड ईयर बीटेक में हूं.’’

दोनों में कुछ फौर्मल बातें हुईं. पुनीत बोला, ‘‘मैं रीजेंट में इवनिंग शो देखने जा रहा था. अभी शो शुरू होने में थोड़ा टाइम बाकी था, तो इधर आ गया.’’

वनिता ने अपना बिल पे किया और वह बाय कह कर चली गई. पुनीत ने वनिता का बिल पे करना चाहा था पर उस ने मना कर दिया.

इधर पुनीत के भाई प्रेम की शादी उस के पिता ने एक लड़की से तय कर रखी थी. बस, प्रेम की हां की देरी थी. उन्होंने लड़की की विधवा मां को वचन भी दे रखा था. पर प्रेम अमेरिका में पटना की ही किसी पिछड़ी जाति की लड़की से प्यार कर रहा था बल्कि कुछ दिनों से साथ रह भी रहा था. उस लड़की से अपनी शादी की इच्छा जताते हुए प्रेम ने मातापिता से अनुरोध किया था.

प्रेम के मातापिता दोनों बहुत पुराने विचारों के थे और खासकर पिता बहुत जिद्दी व कड़े स्वभाव के थे. उन्होंने दोनों बेटों को साफसाफ बोल रखा था कि वे बेटों की शादी अपनी मरजी से अच्छी स्वजातीय लड़की से ही करेंगे. उन्होंने प्रेम को भी बता दिया था कि यह रिश्ता मानना ही होगा वरना मातापिता के श्राद्ध के बाद जो करना हो करे.

मातापिता के दबाव में प्रेम ने टालने की नीयत से उन से कहा कि वे पुनीत को लड़की देखने को भेज दें, उसे पसंद आए तो सोच कर बताऊंगा. इधर प्रेम ने पुनीत को सचाई बता दी थी.

पुनीत की मां ने उस से कहा, ‘‘जा बेटे, अपने भैया की दुलहनिया देख कर आओ.’’

पुनीत मातापिता के बताए पते पर होने वाली भाभी को देखने गया. पुनीत ने उसे महल्ले में पहुंचने पर घर की सही लोकेशन पूछने के लिए दिए गए नंबर पर फोन किया. फोन एक लड़की ने उठाया और निर्देश देते हुए कहा, ‘‘मैं बालकनी में खड़ी रहूंगी, आप बाईं तरफ सीधे आगे आएं.’’

वनिता ने उस लड़की से परिचय कराते हुए कहा, यह मेरी सहेली कुमुद…

पुनीत उस पते पर पहुंचा तो बालकनी में वनिता को देख कर चकित हुआ. वनिता ने उसे अंदर आने को कहा. वहां 2 प्रौढ़ महिलाओं के साथ वनिता एक और लड़की के साथ बैठी हुई थी. वनिता ने उस लड़की से परिचय कराते हुए कहा, ‘‘यह मेरी सहेली कुमुद, यह उस की मां और उस किनारे में मेरी मां.’’ दोनों की माताएं उन लोगों को बातें करने के लिए बोल कर चली गईं.

वनिता पुनीत से बोली, ‘‘कुमुद मैट्रिक तक मेरे ही स्कूल में पढ़ी है. मुझ से एक साल सीनियर थी. हमारे पड़ोस में ही रहती थी. इस के पिता अब नहीं रहे. इस की मां कुमुद की शादी को ले कर काफी चिंतित हैं.’’

पुनीत बोला ‘‘क्यों?’’

‘‘कुमुद ही आप के भाई की गर्लफ्रैंड है. कुछ महीनों से अमेरिका में वे साथ ही रह रहे हैं. दोनों में फिजिकल रिलेशनशिप भी चल रहा है. वैसे, आप के मातापिता मुझ से रिश्ता करना चाहते हैं. पर मैं कुमुद की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं करूंगी. कुमुद को मैं अपनी बहन समझती हूं. मैं प्रेम और कुमुद के बीच रोड़ा नहीं बन सकती हूं. आप अपने पेरैंट्स को समझाएं कि अपनी जिद छोड़ दें वरना प्रेम, कुमुद और मेरी तीनों की जिंदगी तबाह हो जाएगी.’’

पुनीत कुछ पल खामोश था. फिर बोला, ‘‘मैं किसी को दुखी नहीं देखना चाहता हूं. घर जा कर बात करता हूं. डोंट वरी. मुझ से जो बन पड़ेगा, अवश्य करूंगा. मैं आप को फोन करूंगा.’’

पुनीत के जाने के बाद कुमुद ने वनिता से कहा, ‘‘तुम्हें अगर प्रेम पसंद है तो तुम्हारे लिए मैं प्रेम से रिलेशन ब्रेक कर सकती हूं.’’

‘‘अरे, ऐसी कोई बात नहीं है. मां मेरे लिए जरूरत से ज्यादा चिंतित है. वैसे भी, प्रेम तुम्हारे अलावा किसी और के साथ रिलेशन में होता तो भी मेरे लिए उस से शादी की बात सोचना भी असंभव थी.’’

‘‘मैं एक बात कहूं?’’

‘‘हां, श्योर.’’

‘‘पुनीत बहुत अच्छा लड़का है. अगर तेरा किसी और से चक्कर नहीं चल रहा है तो तू उस से शादी कर ले.’’

‘‘क्या बात करती हो? मैं मास्टर्स कर रही हूं और वह तो अभी बीटैक थर्ड ईयर में है.’’

‘‘पगली, तुम्हें पता नहीं है कि उस का कैंपस सलैक्शन भी हो गया है. और प्रेम बोल रहा था कि पुनीत सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा है. कंपीट कर गया तो समझ तेरी लौटरी लग जाएगी, नहीं तो इंजीनियर है ही.’’

‘‘फिर भी, तुम क्या समझती हो मैं जा कर उसे प्रपोज करूं?’’

‘‘नहीं, मैं अभी प्रेम की मां को फोन पर इस प्रपोजल के लिए बोल देती हूं. घर आ कर पुनीत ने मातापिता को विस्तार से समझाया. उस ने कहा, ‘‘भैया चाहते तो अमेरिका में ही कोर्ट मैरिज कर लेते, तो उस स्थिति में आप क्या कर लेते. भैया ने आप का सम्मान करते हुए आप से अनुमति मांगी है. मैं ने उस लड़की को देखा है, कुमुद नाम है उस का. काफी अच्छी लड़की है. वह भी आई हुई है. आजकल वयस्क जोड़ों को जातपांत और धर्म शादी करने से नहीं रोक सकते. आप 3 लोगों की खुशियां क्यों छीनना चाहते हैं?’’

मां ने कहा, ‘‘तुम मुझे कुमुद से मिलवाओ, फिर मैं पापा को समझाने की कोशिश करूंगी.’’

‘‘वह तो कल सुबह मुंबई की फ्लाइट से जा रही है. वहीं से अमेरिका चली जाएगी.’’

फिर पुनीत और मां दोनों जा कर कुमुद से मिले. मांबेटे दोनों ने मिल कर पिताजी को काफी समझाया. तब उन्होंने कहा, ‘‘मुझे समाज में शर्मिंदा होना पड़ेगा. वनिता की बूढ़ी विधवा मां को वचन दे चुका हूं. रिश्तेदारी में भी इस बारे में काफी लोगों को बता चुका हूं.’’

उसी समय अमेरिका से प्रेम ने मां से फोन पर कुछ बात की. मां ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारे लिए वनिता की मां को बोल रखा था. वनिता में तुम्हें क्या खराबी नजर आती है. वैसे भी कुमुद तो पिछड़ी जाति की है. तेरे पापा को समझाना बहुत मुश्किल है.’’

प्रेम ने कहा, ‘‘आप लोगों ने पहले मुझे वनिता के बारे में कभी नहीं बताया था. वनिता को मैं ने देखा जरूर है पर मेरे मन में उस से शादी की बात कभी नहीं थी. और जहां तक कुमुद की जाति का सवाल है तो आप लोग दकियानूसी विचारों को छोड़ दें. अमेरिका, यूरोप और अन्य उन्नत देशों में आदमी की पहचान उस की योग्यता से है, न कि धर्म या जाति से. यह उन की उन्नति का मुख्य कारण है. और हां, अगर मैं शादी करूंगा तो कुमुद से ही वरना शादी नहीं करूंगा,’’ इतना बोल कर प्रेम ने फोन काट दिया.

उस की मां ने पुनीत से पूछा ‘‘यह वनिता कैसी लड़की है रे?’’

‘‘मां, वह बहुत अच्छी लड़की है. पढ़नेलिखने और देखने में भी. मैं उस से  2 बार पहले भी मिल चुका हूं.’’

फिर उस के मातापिता दोनों ने आपस में कुछ देर अकेले में बात कर पुनीत से कहा, ‘‘अब इस समस्या का हल तुम्हारे हाथ में है.’’

‘‘मैं भला इस में क्या कर सकता हूं?’’

‘‘कुमुद को हम बड़ी बहू स्वीकार कर लेंगे. पर तुम्हें भी हमारी इज्जत रखनी होगी. वनिता तेरी पत्नी बनेगी.’’

‘‘अभी तो मुझे पढ़ना है. वैसे वह एमए फाइनल में है मां. हो सकता है उम्र में मुझ से बड़ी हो.’’

‘‘लव मैरिज में सीनियरजूनियर या उम्र का खयाल तुम लोग आजकल कहां करते हो. और क्या पता कुमुद प्रेम से बड़ी हो? मैं वनिता की मां को फोन करती हूं. अगर थोड़ी बड़ी भी हुई तो क्या बुराई है इस में,’’ इतना बोल कर उस ने वनिता की मां से फोन पर कुछ बात की.

पुनीत गंभीर हो कर कुछ सोचने लगा था. थोड़ी देर बाद मां ने कहा, ‘‘पुनीत, तुम वनिता से बात कर लो. मैं ने उस की मां  को कहा कि कल शाम तुम दोनों रैस्टोरैंट में मिलोगे.’’ पुनीत और वनिता दोनों अगली शाम को उसी रैस्टोरैंट में मिले. पुनीत बोला, ‘‘मां ने अजब उलझन में डाल दिया है. मैं क्या करूं? आप को ठीक लग रहा है?’’

वनिता बोली, ‘‘मुझे तो कुछ बुरा नहीं दिखता इस में? हां, ज्यादा अहमियत आप की पसंद की है. मैं आप की पसंदनापसंद के बारे में नहीं जानती हूं.’’

‘‘आप तो हर तरह से अच्छी हैं, आप को कोई नापसंद कर ही नहीं सकता. फिर भी मुझे कुछ देर सोचने दें.’’

‘‘हां, वैसे दोनों में किसी को जल्दी भी नहीं है. पर मुझे कुमुद की चिंता है. वैसे हम दोनों के परिवार और कुमुद के परिवार सभी की भलाई इसी में है, और हां, मां बोल रही थी कि मैं पढ़ाई में आप से सीनियर हूं.’’

पुनीत चुपचाप सिर झुकाए बैठा था. तो वनिता बोली, ‘‘मैं अगर सीनियर लगती हूं तो इस साल एग्जाम ड्रौप कर दूंगी. मंजूर?’’

पुनीत हंसते हुए बोला, ‘‘नहीं, आप ऐसा कुछ नहीं करें. आप अपना पीजी इसी साल करें.’’

‘‘एक शर्त पर.’’

‘‘वह क्या?’’

‘‘अभी इसी वक्त से हम लोग आप कहना छोड़ कर एकदूसरे को तुम कहेंगे.’’

‘‘आप भी… सौरी तुम भी न…. पर मेरी भी एक शर्त है.’’

‘‘क्या?’’

‘‘शादी पढ़ाई पूरी होने के बाद ही होगी, भले सगाई अभी हो जाए.’’

‘‘मंजूर है. फोन पर रोज बात करनी होगी और वीकैंड में यहीं मिला करेंगे.’’

‘‘एग्रीड.’’

दोनों एकसाथ हंस पड़े. अगले पल वे वहां से निकल कर एकदूसरे का हाथ पकड़े सड़क पार कर सामने फैले गांधी मैदान में टहलने लगे.

पुनीत बोला, ‘‘पर मुझे एक बात का अफसोस रह गया. मैं तो घाटे में रहा.’’

‘‘कौन सी बात?’’ वनिता ने पूछा.

‘‘अगर भैया की शादी तुम से और मेरी शादी किसी और लड़की से होती तो मैं विनविन सिचुएशन में होता न.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘तुम मेरी भाभी होतीं, तो मेरे दोनों हाथों में लड्डू होते.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पत्नी पर तो हंड्रेड परसैंट हक रहता ही और अगर तुम मेरी भाभी होतीं तो देवर के नाते भाभी से छेड़छाड़ करने और मजाक करने का हक बोनस में बनता ही था.’’

‘यू नौटी बौय,’ बोल कर वनिता उस के कान खींचने लगी.

पहला पहला प्यार: मां को कैसे हुआ अपने बेटे की पसंद का आभास- भाग 2

पल भर के अंदर ही विकी के पिछले 25 बरस आंखों के सामने से गुजर गए और उन 25 सालों में कहीं भी विकी मेरा दिल दुखाता हुआ नहीं दिखा. टेबल पर रखे फल उठा कर खाने से पहले भी वह जहां होता वहीं से चिल्ला कर मुझे बताता था कि मम्मा, मैं यह सेब खाने जा रहा हूं. और आज…एक पल में ही पराया बना दिया बेटे ने.

कलेजे को चीरता हुआ आंसुओं का सैलाब बंद पलकों के छोर से बूंद बन कर टपकने ही वाला था कि अचानक विकी की फुसफुसाहट सुनाई पड़ी, ‘‘तुम ने देखा नहीं है मम्मीपापा के कितने अरमान हैं अपनी बहुओं को ले कर और बस, मैं इसी बात से डरता हूं कि कहीं बरखा मम्मीपापा की कल्पनाओं के अनुरूप नहीं उतरी तो क्या होगा? अगर मैं पहले ही इन्हें बता दूंगा कि मैं बरखा को पसंद करता हूं तो फिर कोई प्रश्न ही नहीं उठता कि मम्मीपापा उसे नापसंद करें, वे हर हाल में मेरी शादी उस से कर देंगे और मैं यही नहीं चाहता हूं. मम्मीपापा के शौक और अरमान पूरे होने चाहिए, उन की बहू उन्हें पसंद होनी चाहिए. बस, मैं इतना ही चाहता हूं.’’

‘‘और अगर वह उन्हें पसंद नहीं आई तो?’’

‘‘नहीं आई तो देखेंगे, पर मैं ने इतना तो तय कर लिया है कि मैं पहले से यह बिलकुल नहीं कह सकता कि मैं किसी को पसंद करता हूं.’’

तो विकी ने शादी नहीं की है, वह केवल किसी बरखा नाम की लड़की को पसंद करता है और उस की समस्या यह है कि बरखा के बारे में हमें बताए कैसे? इस बात का एहसास होते ही लगा जैसे मेरे बेजान शरीर में जान वापस आ गई. एक बार फिर से मेरे सामने वही विकी आ खड़ा हुआ जो अपनी कोई बात कहने से पहले मेरे चारों ओर चक्कर लगाता रहता, मेरा मूड देखता फिर शरमातेझिझकते हुए अपनी बात कहता. उस का कहना कुछ ऐसा होता कि मना करने का मैं साहस ही नहीं कर पाती. ‘बुद्धू, कहीं का,’ मन ही मन मैं बुदबुदाई. जानता है कि मम्मा किसी बात के लिए मना नहीं करतीं फिर भी इतनी जरूरी बात कहने से डर रहा है.

सो कर उठी तो सिर बहुत हलका लग रहा था. मन में चिंता का स्थान एक चुलबुले उत्साह ने ले लिया था. मेरे बेटे को प्यार हो गया है यह सोचसोच कर मुझे गुदगुदी सी होने लगी. अब मुझे समझ में आने लगा कि विनी को भाभी घर में लाने की इतनी जल्दी क्यों मच रही थी. ऐसा लगने लगा कि विनी का उतावलापन मेरे अंदर भी आ कर समा गया है. मन होने लगा कि अभी चलूं विकी के पास और बोलूं कि ले चल मुझे मेरी बहू के पास, मैं अभी उसे अपने घर में लाना चाहती हूं पर मां होने की मर्यादा और खुद विकी के मुंह से सुनने की एक चाह ने मुझे रोक दिया.

रात को खाने की मेज पर मेरा मूड तो खुश था ही, दिन भर के बाद बच्चों से मिलने के कारण राजीव भी बहुत खुश दिख रहे थे. मैं ने देखा कि विनी कई बार विकी को इशारा कर रहा था कि वह हम से बात करे पर विकी हर बार कुछ कहतेकहते रुक सा जाता था. अपने बेटे का यह हाल मुझ से और न देखा गया और मैं पूछ ही बैठी, ‘‘तुम कुछ कहना चाह रहे हो, विकी?’’

‘‘नहीं…हां, मैं यह कहना चाहता था मम्मा कि जब से कानपुर गया हूं दोस्तों से मुलाकात नहीं हो पाती है. अगर आप कहें तो अगले संडे को घर पर दोस्तों की एक पार्टी रख लूं. वैसे भी जब से काम शुरू किया है सारे दोस्त पार्टी मांग रहे हैं.’’

‘‘तो इस में पूछने की क्या बात है. कहा होता तो आज ही इंतजाम कर दिया होता,’’ मैं ने कहा, ‘‘वैसे कुल कितने दोस्तों को बुलाने की सोच रहे हो, सारे पुराने दोस्त ही हैं या कोई नया भी है?’’

‘‘हां, 2-4 नए भी हैं. अच्छा रहेगा, आप सब से भी मुलाकात हो जाएगी. क्यों विनी, अच्छा रहेगा न?’’ कह कर विकी ने विनी को संकेत कर के राहत की सांस ली.

मैं समझ गई थी कि पार्टी की योजना दोनों ने मिल कर बरखा को हम से मिलाने के लिए ही बनाई है और विकी के ‘नए दोस्तों’ में बरखा भी शामिल होगी.

अब बच्चों के साथसाथ मेरे लिए भी पार्टी की अहमियत बहुत बढ़ गई थी. अगले संडे की सुबह से ही विकी बहुत नर्वस दिख रहा था. कई बार मन में आया कि उसे पास बुला कर बता दूं कि वह सारी चिंता छोड़ दे क्योंकि हमें सबकुछ मालूम हो चुका है, और बरखा जैसी भी होगी मुझे पसंद होगी. पर एक बार फिर विकी के भविष्य को ले कर आशंकित मेरे मन ने मुझे चुप करा दिया कि कहीं बरखा विकी के योग्य न निकली तो? जब तक बात सामने नहीं आई है तब तक तो ठीक है, उस के बारे में कुछ भी राय दे सकती हूं, पर अगर एक बार सामने बात हो गई तो विकी का दिल टूट जाएगा.

4 बजतेबजते विकी के दोस्त एकएक कर के आने लगे. सच कहूं तो उस समय मैं खुद काफी नर्वस होने लगी थी कि आने वालों में बरखा नाम की लड़की न मालूम कैसी होगी. सचमुच वह मेरे विकी के लायक होगी या नहीं. मेरी भावनाओं को राजीव अच्छी तरह समझ रहे थे और आंखों के इशारे से मुझे धैर्य रखने को कह रहे थे. हमें देख कर आश्चर्य हो रहा था कि सदैव हंगामा करते रहने वाला विनी भी बिलकुल शांति  से मेरी मदद में लगा था और बीचबीच में जा कर विकी की बगल में कुछ इस अंदाज से खड़ा होता मानो उस से कह रहा हो, ‘दा, दुखी न हो, मैं तुम्हारे साथ हूं.’

ठीक साढ़े 4 बजे बरखा ने अपनी एक सहेली के साथ ड्राइंगरूम में प्रवेश किया. उस के घुसते ही विकी की नजरें विनी से और मेरी नजरें इन से जा टकराईं. विकी अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और उन्हें हमारे पास ला कर उन से हमारा परिचय करवाया, ‘‘बरखा, यह मेरे मम्मीपापा हैं और मम्मीपापा, यह मेरी नई दोस्त बरखा और यह बरखा की दोस्त मालविका है. ये दोनों एम.सी.ए. कर रही हैं. पिछले 7 महीने से हमारी दोस्ती है पर आप लोगों से मुलाकात न करवा सका था.’’

हम ने महसूस किया कि बरखा से हमारे परिचय के दौरान पूरे कमरे का शोर थम गया था. इस का मतलब था कि विकी के सारे दोस्तों को पहले से बरखा के बारे में मालूम था. सच है, प्यार एक ऐसा मामला है जिस के बारे में बच्चों के मांबाप को ही सब से बाद में पता चलता है. बच्चे अपना यह राज दूसरों से तो खुल कर शेयर कर लेते हैं पर अपनों से बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं.

बरखा को देख लेने और उस से बातचीत कर लेने के बाद मेरे मन में उसे बहू बना लेने का फैसला पूर्णतया पक्का हो गया. विकी बरखा के ही साथ बातें कर रहा था पर उस से ज्यादा विनी उस का खयाल रख रहा था. पार्टी लगभग समाप्ति की ओर अग्रसर थी. यों तो हमारा फैसला पक्का हो चुका था पर फिर भी मैं ने एक बार बरखा को चेक करने की कोशिश की कि शादी के बाद घरगृहस्थी संभालने के उस में कुछ गुण हैं या नहीं.

Mother’s Day 2024- कन्याऋण : कन्याऋण : क्या नेहा की शादी का फैसला सही साबित हुआ? – भाग 2

अनुभा की सलाह का उस की सास पर कोई असर नहीं हुआ. वह बोलीं, ‘बहू, यह जरूरी नहीं है कि जो तुम्हारी मौसेरी बहन के साथ हुआ, वैसा ही नेहा के साथ भी घटित हो. मुझे गोमती जीजी ने भरोसा दिया है कि उन के रिश्तेदार बहुत भले और नेक इनसान हैं, वे हमारी नेहा को बहुत प्यार से रखेंगे.’

‘मांजी दूसरे लोगों की बातों से तो हम अपनी नेहा के भविष्य का फैसला नहीं कर सकते,’ अनुभा बोली, ‘नेहा की शादी कर के हमें क्या लाभ होगा? कल को शादी के बाद वह गर्भवती हो गई और उस की संतान भी उस जैसी ही होगी तो कितनी मुसीबत हो जाएगी?’

अनुभा की बात सुन कर सास और भी झल्ला गईं. वह आवेश में बोलीं, ‘वाह बहू, तुम भी कितनी दूर की सोचती हो, तुम्हारी अपनी कोई बेटी नहीं है न इसीलिए तुम क्या जानो, कन्यादान का धर्म क्या होता है? कोई भी मां अपनी बेटी को जीवन भर कुंआरी नहीं रख सकती. मैं तो अब तक यही समझ रही थी कि नेहा को उस की दोनों छोटी भाभियां तो नहीं चाहतीं पर कम से कम तुम तो उस को दिल से चाहती हो पर आज तुम्हारी बातों को सुन कर लगा कि वह मेरा भ्रम था.

‘तुम्हें शायद इस बात की चिंता है कि नेहा की शादी के लिए तुम्हारे पति को 2-4 लाख रुपए की व्यवस्था करनी पड़ेगी पर तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है. तुम्हारे ससुरजी ने नेहा के जन्म के समय ही उस के विवाह के लिए 25 हजार की एफ.डी. करवा दी थी जो अब ब्याज समेत 5 लाख की है. मैं उसी से नेहा के विवाह की सारी व्यवस्था कर लूंगी.’

नवीन इतनी देर तक मौन रह कर दोनों की बातें सुन रहा था. अंत में वह अनुभा को डांटते हुए बोला, ‘तुम मां से क्यों बहस कर रही हो. जब उन को तुम्हारी बात ठीक नहीं लग रही है तो इस विषय पर चर्चा बंद करो.’

फिर नवीन मां से बोला, ‘मां, आप जो भी फैसला करेंगी, मुझे मान्य है. नेहा के विवाह के लिए रुपए की व्यवस्था की चिंता करने की आप को जरूरत नहीं है, मैं सारा इंतजाम कर दूंगा.’

2 माह बाद नेहा के विवाह की तारीख तय हो गई. इस बीच नवीन और उस के दोनों भाई नेहा के ससुराल जा कर लड़के और उस के परिवार से मिल आए. वहां से वापस लौटने के बाद नवीन ने नेहा की ससुराल वालों के लालचीपूर्ण रवैये और लड़के के दब्बूपन के बारे में मां को बता कर अपना असंतोष दिखाया था पर मां अपने निर्णय पर दृढ़ रही थीं.

विवाह की तैयारियों में व्यस्त अनुभा जब भी नेहा को देखती, उस की आंखें भर आतीं. नेहा शादीविवाह का असली मतलब क्या है, इस बात से पूरी तरह अनजान थी पर अपने लिए आए ढेर सारे सामान को देख कर उस की आंखें खुशी से चमक उठती थीं. वह बारबार अनुभा से पूछती, ‘भाभी, यह सारी चीजें मेरी हैं न? भाभी, बबलू, टीना, रीना और मिनी मुझे अपनी चीजें छूने नहीं देते. दोनों भाभियां भी मुझे अपना सामान नहीं देखने देतीं, अब मैं भी अपना सामान किसी को छूनेनहीं दूंगी.’ कभी नेहा कहती, ‘भाभी, शादी में मुझे भी घाघराचुन्नी पहनाओगी न.

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हां, साथ में

मैचिंग चूडि़यां भी पहनाना. मुझे लाल रंग बहुत अच्छा लगता है.’

नेहा की बालसुलभ जिज्ञासाएं देख कर कभी अनुभा सोचती, चलो, नेहा के जीवन में कभी तो खुशी के क्षण आए, चाहे थोडे़ समय के लिए ही सही. उस ने शादी के पहले नेहा को उस के वैवाहिक जीवन के बारे में भी जानकारी देने का प्रयास किया. उस का, अपने पति तथा ससुराल के दूसरे सदस्यों से कैसा व्यवहार हो, इस बारे में भी उसे विस्तार से समझाया.

नेहा उस की बातें सुन कर कुछ क्षण तो गंभीर हो जाती पर फिर अपनी वही बालसुलभ बातें और हरकतें करने लगती.

अनुभा को यह देख कर हैरानी होती कि ज्यादातर रिश्तेदार नेहा की शादी के फैसले पर उस की सास को बधाइयां देते हुए कहते, ‘चलो जी, आप ने तो बेटी की शादी कर के बहुत अच्छा किया. अब आप कन्याऋण से उऋण हो जाएंगी.’ उन की बातें सुन कर उस की सास अपने चेहरे पर गर्वीली मुसकान लाते हुए उस की ओर नजर डालती, ताकि उस को एहसास हो कि नेहा के विवाह का विरोध कर वह कितनी बड़ी गलती कर रही थी.

नेहा के ससुराल जाने के बाद घर एकदम सूना हो गया. उस की बालसुलभ हरकतें रहरह कर अनुभा को याद हो आतीं. मांजी भी नेहा के जाने के बाद से उदास रहने लगी थीं. यद्यपि वे सब के सामने अपनी मनोदशा जाहिर नहीं करतीं पर सब की तरह उन के मन में भी यह आशंका जरूर थी कि नेहा ससुराल में एडजस्ट हो पाएगी कि नहीं.

नेहा को ससुराल गए एक माह से अधिक हो गया था. शुरूशुरू में तो उस से हर दिन ही फोन पर बात हो जाती थी और वह खुश भी लगती थी पर धीरेधीरे उस की आवाज में उदासी छलकने लगी. अब फोन पर वह बोलने लगी थी, ‘भाभी, मुझे यहां अच्छा नहीं लगता. यह लोग सारे समय मुझे देख कर हंसते हैं और मुझे पागल कह कर चिढ़ाते हैं. ये सब बहुत गंदे हैं, राजेश भी इन के साथ मेरा मजाक उड़ाता है.’

नेहा की बातें सुन कर अनुभा को थोड़ी चिंता होनी लगी थी पर वह नेहा को यही समझाती कि वह जिद न करे. सब की बात माने.

पिछले एक सप्ताह से वे जब भी फोन करते नेहा के ससुराल वाले कोई न कोई बहाना बना कर उस से बात नहीं होने देते. कभी कहते, नेहा बाजार गई है, कभी बाथरूम में है तो कभी सो रही है. एक दिन नवीन ने राजेश से बात करने की कोशिश की पर वह भी उन से बात करने से कतराता रहा.

उस दिन रविवार था. नवीन, मांजी और अनुभा ड्रांइगरूम में बैठे नेहा की ही बात कर रहे थे कि नवीन बोला, ‘मां, आज एक बार मैं फिर नेहा से बात करने की कोशिश करता हूं, यदि आज भी उस से बात नहीं हो पाती है तो मैं कल नेहा को कुछ दिनों के लिए उस के ससुराल से ले कर आने की सोच रहा हूं.’

इतना कह कर नवीन नेहा के ससुराल फोन डायल करने लगा. संयोग से उस दिन नेहा ने ही फोन उठाया था.

नवीन की आवाज सुनते ही वह फोन पर ही जोरजोर से रो पड़ी, ‘भैया, आप लोग फोन क्यों नहीं करते? आप यहां से मुझे ले जाओ. ये लोग बहुत खराब हैं. मुझे बहुत तंग करते हैं. मैं इन के पास नहीं रहूंगी.’

नेहा आगे कुछ कहती उस के पहले ही किसी ने रिसीवर उस के हाथ से छीन कर रख दिया था.

अब तो कुछ सोचने का प्रश्न ही नहीं था. उन लोगों ने तय किया कि शाम की ट्रेन से ही नवीन और अनुभा नेहा के ससुराल जा कर एक बार वस्तुस्थिति की जानकारी लें. नेहा की बात सुन कर घर में सब का ‘मूड’ खराब हो गया था.

सुबह अचानक अपने घर में नवीन और अनुभा को देख कर नेहा के ससुराल वाले सकपका गए. नेहा को जब उन के आने का पता चला तो वह दौड़ती हुई आई और नवीन को देखते ही उस से लिपट गई. नेहा की आंखों में दहशत और खौफ देख कर दोनों घबरा गए और अनुभा ने ज्यों ही उस की पीठ पर हाथ फेरा, वह जोरजोर से सुबक पड़ी. बारबार एक ही बात दोहरा रही थी, ‘भाभी, मुझे अपने साथ ले चलो, ये सब लोग बहुत गंदे हैं. मैं इन के घर कभी नहीं आऊंगी.’

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पहला पहला प्यार: मां को कैसे हुआ अपने बेटे की पसंद का आभास-भाग 1

‘‘दा,तुम मेरी बात मान लो और आज खाने की मेज पर मम्मीपापा को सारी बातें साफसाफ बता दो. आखिर कब तक यों परेशान बैठे रहोगे?’’

बच्चों की बातें कानों में पड़ीं तो मैं रुक गई. ऐसी कौन सी गलती विकी से हुई जो वह हम से छिपा रहा है और उस का छोटा भाई उसे सलाह दे रहा है. मैं ‘बात क्या है’ यह जानने की गरज से छिप कर उन की बातें सुनने लगी.

‘‘इतना आसान नहीं है सबकुछ साफसाफ बता देना जितना तू समझ रहा है,’’ विकी की आवाज सुनाई पड़ी.

‘‘दा, यह इतना मुश्किल भी तो नहीं है. आप की जगह मैं होता तो देखते कितनी स्टाइल से मम्मीपापा को सारी बातें बता भी देता और उन्हें मना भी लेता,’’ इस बार विनी की आवाज आई.

‘‘तेरी बात और है पर मुझ से किसी को ऐसी उम्मीद नहीं होगी,’’ यह आवाज मेरे बड़े बेटे विकी की थी.

‘‘दा, आप ने कोई अपराध तो किया नहीं जो इतना डर रहे हैं. सच कहूं तो मुझे ऐसा लगता है कि मम्मीपापा आप की बात सुन कर गले लगा लेंगे,’’ विनी की आवाज खुशी और उत्साह दोनों से भरी हुई थी.

‘बात क्या है’ मेरी समझ में कुछ नहीं आया. थोड़ी देर और खड़ी रह कर उन की आगे की बातें सुनती तो शायद कुछ समझ में आ भी जाता पर तभी प्रेस वाले ने डोर बेल बजा दी तो मैं दबे पांव वहां से खिसक ली.

बच्चों की आधीअधूरी बातें सुनने के बाद तो और किसी काम में मन ही नहीं लगा. बारबार मन में यही प्रश्न उठते कि मेरा वह पुत्र जो अपनी हर छोटीबड़ी बात मुझे बताए बिना मुंह में कौर तक नहीं डालता है, आज ऐसा क्या कर बैठा जो हम से कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है. सोचा, चल कर साफसाफ पूछ लूं पर फिर लगा कि बच्चे क्या सोचेंगे कि मम्मी छिपछिप कर उन की बातें सुनती हैं.

जैसेतैसे दोपहर का खाना तैयार कर के मेज पर लगा दिया और विकीविनी को खाने के लिए आवाज दी. खाना परोसते समय खयाल आया कि यह मैं ने क्या कर दिया, लौकी की सब्जी बना दी. अभी दोनों अपनीअपनी कटोरी मेरी ओर बढ़ा देंगे और कहेंगे कि रामदेव की प्रबल अनुयायी माताजी, यह लौकी की सब्जी आप को ही सादर समर्पित हो. कृपया आप ही इसे ग्रहण करें. पर मैं आश्चर्यचकित रह गई यह देख कर कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उलटा दोनों इतने मन से सब्जी खाने में जुटे थे मानो उस से ज्यादा प्रिय उन्हें कोई दूसरी सब्जी है ही नहीं.

बात जरूर कुछ गंभीर है. मैं ने मन में सोचा क्योंकि मेरी बनाई नापसंद सब्जी या और भी किसी चीज को ये चुपचाप तभी खा लेते हैं जब या तो कुछ देर पहले उन्हें किसी बात पर जबरदस्त डांट पड़ी हो या फिर अपनी कोई इच्छा पूरी करवानी हो.

खाना खा कर विकी और विनी फिर अपने कमरे में चले गए. ऐसा लग रहा था कि किसी खास मसले पर मीटिंग अटेंड करने की बहुत जल्दी हो उन्हें.

विकी सी.ए. है. कानपुर में उस ने अपना शानदार आफिस बना लिया है. ज्यादातर शनिवार को ही आता है और सोमवार को चला जाता है. विनी एम.बी.ए. की तैयारी कर रहा है. बचपन से दोनों भाइयों के स्वभाव में जबरदस्त अंतर होते हुए भी दोनों पल भर को भी अलग नहीं होते हैं. विकी बेहद शांत स्वभाव का आज्ञाकारी लड़का रहा है तो विनी इस के ठीक उलट अत्यंत चंचल और अपनी बातों को मनवा कर ही दम लेने वाला रहा है. इस के बावजूद इन दोनों भाइयों का प्यार देख हम दोनों पतिपत्नी मन ही मन मुसकराते रहते हैं.

अपना काम निबटा कर मैं बच्चों के कमरे में चली गई. संडे की दोपहर हमारी बच्चों के कमरे में ही गुजरती है और बच्चे हम से सारी बातें भी कह डालते हैं, जबकि ऐसा करने में दूसरे बच्चे मांबाप से डरते हैं. आज मुझे राजीव का बाहर होना बहुत खलने लगा. वह रहते तो माहौल ही कुछ और होता और वह किसी न किसी तरह बच्चों के मन की थाह ले ही लेते.

मेरे कमरे में पहुंचते ही विनी अपनी कुरसी से उछलते हुए चिल्लाया, ‘‘मम्मा, एक बात आप को बताऊं, विकी दा ने…’’

उस की बात विकी की घूरती निगाहों की वजह से वहीं की वहीं रुक गई. मैं ने 1-2 बार कहा भी कि ऐसी कौन सी बात है जो आज तुम लोग मुझ से छिपा रहे हो, पर विकी ने यह कह कर टाल दिया कि कुछ खास नहीं मम्मा, थोड़ी आफिस से संबंधित समस्या है. मैं आप को बता कर परेशान नहीं करना चाहता पर विनी के पेट में कोई बात पचती ही नहीं है.

हालांकि मैं मन ही मन बहुत परेशान थी फिर भी न जाने कैसे झपकी लग गई और मैं वहीं लेट गई. अचानक ‘मम्मा’ शब्द कानों में पड़ने से एक झटके से मेरी नींद खुल गई पर मैं आंखें मूंदे पड़ी रही. मुझे सोता देख कर उन की बातें फिर से चालू हो गई थीं और इस बार उसी कमरे में होने की वजह से मुझे सबकुछ साफसाफ सुनाई दे रहा था.

विकी ने विनी को डांटा, ‘‘तुझे मना किया था फिर भी तू मम्मा को क्या बताने जा रहा था?’’

‘‘क्या करता, तुम्हारे पास हिम्मत जो नहीं है. दा, अब मुझ से नहीं रहा जाता, अब तो मुझे जल्दी से भाभी को घर लाना है. बस, चाहे कैसे भी.’’

विकी ने एक बार फिर विनी को चुप रहने का इशारा किया. उसे डर था कि कहीं मैं जाग न जाऊं या उन की बातें मेरे कानों में न पड़ जाएं.

अब तक तो नींद मुझ से कोसों दूर जा चुकी थी. ‘तो क्या विकी ने शादी कर ली है,’ यह सोच कर लगा मानो मेरे शरीर से सारा खून किसी ने निचोड़ लिया. कहां कमी रह गई थी हमारे प्यार में और कैसे हम अपने बच्चों में यह विश्वास उत्पन्न करने में असफल रह गए कि जीवन के हर निर्णय में हम उन के साथ हैं.

आज पलपल की बातें शेयर करने वाले मेरे बेटे ने मुझे इस योग्य भी न समझा कि अपने शादी जैसे महत्त्वपूर्ण फैसले में शामिल करे. शामिल करना तो दूर उस ने तो बताने तक की भी जरूरत नहीं समझी. मेरे व्यथित और तड़पते दिल से एक आवाज निकली, ‘विकी, सिर्फ एक बार कह कर तो देखा होता बेटे तुम ने, फिर देखते कैसे मैं तुम्हारी पसंद को अपने अरमानों का जोड़ा पहना कर इस घर में लाती. पर तुम ने तो मुझे जीतेजी मार डाला.’

हनी सिंह के गाने पर हौट डांस करती दिखीं भोजपुरी एक्ट्रेस नम्रता मल्ला, वीडियो ने मचाया तहलका

भोजपुरी जगत की सबसे बोल्ड और हौट एक्ट्रेस में से एक नम्रता मल्ला का हर कोई दीवाना हैं. फैंस नम्रता के डांस वीडियोज और फोटोज को लेकर अक्सर सुर्खियों में छाई रहती हैं. हाल ही में उनका एक बोल्ड वीडियो वायरल हो रहा है. जिसमें वे डांस करती नजर आ रही है और फैंस उनकी फोटो पर कमेंट करते रुक नहीं रहे हैं.

 

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आपको बता दें कि नम्रता की इस वीडियो ने ये  साबित कर दिया है कि भोजपुरी की सबसे बोल्ड एक्ट्रेस में एक हैं. जिनका डांस देखने के लिए हर कोई बेताब रहता है.  जी हां, इस बात की गवाही उनक इंस्टाग्राम अकाउंट देता हैं. नम्रता का एक नया रील सोशल मीडिया पर धमाल मचा रहा है. लोग उनके हुस्न को देख फैन हो गए है.

एक्ट्रेस नम्रता मल्ला के विजुअल ट्रीट को देखने के बाद लोग उसे शेयर करने से रुक नहीं रहे हैं. इस वीडियो में नम्रता मूव्स देती हुई नजर आ रही हैं. खास बात तो ये है कि नम्रता इस वीडियो में किसी भोजपुरी गाने पर नहीं, बल्कि यो यो हनी सिंह के गाने पर मूव्स करती नजर आ रही हैं. ऐसा बोल्ड डांस लोगों की धड़कनें तेज कर रहा हैं.

 

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बताते चले कि बीते कुछ सालों में नम्रता मल्ला काफी पॉपुलर हो गई हैं. उनकी तस्वीरें और वीडियोज इंटरनेट पर आते ही वायरल हो जाते हैं. नम्रता मल्ला को इंस्टाग्राम पर 2.8 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. बोल्डनेस के मामले में नम्रता मल्ला हर एक हसीना को टक्कर देती हैं.

पहली बार पार्टी में एक साथ स्पॉट हुई रितिक रोशन की गर्लफ्रेंड सबा और एक्स वाइफ सुजैन खान

बौलीवुड जगत में कोई बर्थडे हो या एनीवर्सरी उसका सेलिब्रेशन काफी धूमधाम से मनाया जाता है. ऐसा ही हाल में रितिक रोशन और सुजैन खान के बेटे ऋहान हाल ही में 18 साल के हो गए हैं, जिसका बर्थडे गोवा में बड़ी धूमधाम से मनाया गया. इस पार्टी में खास बात ये रही कि सुजैन और सबा अजाद एक साथ दिखें. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही हैं.

 

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आपको बता दें कि रविवार 31 मार्च को रितिक रोशन ने इंस्टाग्राम पर सुजैन को पार्टी में इन्वाइट करने के लिए थैंक्यू कहा. सुजैन ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर सबा के साथ एक तस्वीर शेयर की. इस पोस्ट में खुलासा किया गया कि वह उन्हें साबू कहकर बुलाती हैं. उन्होंने तस्वीर शेयर करते हुए लिखा, “@सबा, आपके प्यार के लिए थैंक्यू डार्लिंग साबू.” सबा ने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर फोटो रीशेयर करते हुए लिखा, “अब तक के सबसे अच्छे टाइम के लिए थैंक्यू सूज”. दूसरी तस्वीरों में ऋतिक, जायद खान और दूसरे स्टार्स नजर आए.

ऋहान के जन्मदिन पर सुजैन ने इंस्टाग्राम पर सालों की अपने यादगार पलों की एक प्यारी सी रील भी शेयर की. इसे शेयर करते हुए उन्होंने लिखा, “18वें जन्मदिन की शुभकामनाएं मेरे रे. आप अपने जन्म के दिन से ही मेरी ताकत, दृढ़ संकल्प, प्रेरणा रहे हैं. आपका दिल, आपकी आत्मा ने मुझे बनाया है मैं आज जो हूं. आपके जीवन का बेस्ट टाइम अब शुरू हो रहा है.”

 

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बताते चले कि इस साल की शुरुआत में रितिक, सिद्धार्थ आनंद की फिल्म फाइटर में नजर आए थे. अब वे जल्द ही वॉर 2 में मेजर कबीर के रोल में वापसी करेंगे. यह जूनियर एनटीआर की बौलीवुड में पहली फिल्म होगी. सबा की बात करें तो वो पिछले साल अमेजन प्राइम मिनी सीरीज की वेब-सीरीज ‘हूज योर गाइनैक’ और ‘म्यूजिकल सॉन्ग्स ऑफ पैराडाइज’ में नजर आई थीं.

गर्मियों में वजन बढ़ाना है आसान, बस डाइट में शामिल करनी होंगी ये चीजें

Summer Weight Gain Tips: गर्मी का मौसम अब शुरु हो चुका है. इस मौसम में लोगों को अपनी डाइट का काफी ख्याल रखना पड़ता हैं. क्योकि इस मौसम में कुछ खाने में लोगों को ज्यादा परेशानी आती है. जैसे कुछ लोग हैवी डाइट फूड खाना अवाइड कर देते है या आयइली चीजों को सेवन करना बंद कर देते है, तो ऐसे में वे खाने को लेकर चूजी हो जाते है जिसका असर उनके वजन पर पड़ता है. तो आज हम आपको यही बताएंगे कि आप खाने में ऐसा क्या खाएं जिससे गर्मियों में आपका वजन कम न हों और आप अपना वजन बढ़ा सकें. तो इसके लिए आपको अपनी डेली रूटीन में क्या चीजें शामिल करनीं चाहिए इसकी जानकारी आज के आर्टिकल में देंगे.

केला होगा फायदेमंद

आप अपनी डाइट में केले को जोड़ सकते हैं. केले के अंदर भरपूर मात्रा में कार्ब्स और कैलरी मौजूद होते हैं. जो आपके वजन को बढ़ाने में बेहद काम आ सकते हैं. ऐसे में आप केले को दूध के साथ या बनाना शेक के रूप में अपनी डाइट में जोड़ सकते हैं.

एवोकाडो खाने से बढेंगा वजन

आप अपनी डाइट में एवोकाडो को जोड़ सकते हैं. एवोकाडो के अंदर भी भरपूर मात्रा में कैलोरी और कार्ब्स मौजूद होते हैं. ऐसे में इसके सेवन से आसानी से अपना वजन बढ़ा सकते हैं. आप एवोकाडो का जूस या एवोकाडो को सलाद के रूप में खा सकते हैं.

आम है लाभदायक

गर्मियों में सबसे ज्यादा खाए जाने वाला फल आम है. ऐसे में आप आम को जोड़कर अपनी दिनचर्या में जरूरी विटामिन और कैलोरी को जोड़ सकते हैं. आम के सेवन से आसानी से वजन बढ़ाया जा सकता है. आप शाम को मैंगो शेक के रूप में या ऐसे भी खा सकते हैं.

खुबानी से होंगे मोटे

आप अपनी डाइट में खुबानी को जोड़ सकते हैं. खुबानी के अंदर कैलोरी और कार्बोहाइड्रेट्स मौजूद होते हैं जो वजन बढ़ाने में आपके बेहद काम आ सकते हैं. आप नियमित रूप से एक या दो खुबानी खा सेवन कर सकते हैं.

Mother’s Day 2024- कन्याऋण : नेकन्याऋण : क्या नेहा की शादी का फैसला सही साबित हुआ? – भाग 3

नेहा को इस तरह रोते देख कर एक बार तो उस की सास और ससुराल के दूसरे लोग घबरा गए पर तुरंत ही उस की सास अपने को संभालती उन पर हावी होने का प्रयास करते हुए बोली, ‘आप लोगों ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. मुझ से कहा गया था कि लड़की थोड़ी भोली और नादान है पर शादी के बाद पता चला कि आप की बहन तो मानसिक रूप से अविकसित है. हम लोगों ने फिर भी इस को समझाने और निभाने की बहुत कोशिश की पर यह तो बहुत ही जिद्दी और ढीठ है. अच्छा हुआ, आप खुद अपनी बहन को लेने आ गए, वरना हमें इस को आप के पास पहुंचाना पड़ता.’

नेहा की सास को समझाने का प्रयास करते हुए नवीन ने कहा, ‘मांजी, हम लोगों ने तो गौतमी मौसी के माध्यम से सारी बातों का पहले ही खुलासा कर दिया था पर उस समय तो आप ने इस रिश्ते से इनकार नहीं किया बल्कि नेहा को अपनाने के एवज में हम से दहेज के अलावा 3 लाख रुपए नकद अलग से मांगे थे, जो हम ने आप को दिए, फिर धोखे में रखने का प्रश्न ही कहां उठता है?’

‘3 लाख रुपए दे कर आप ने मुझ पर कोई एहसान नहीं किया है,’ नेहा के जेठ ने जोर से कहा, ‘राजेश के लिए तो इस से भी अधिक दहेज देने वालों के प्रस्ताव आ रहे थे पर मेरी ही मति फिर गई थी कि मैं आप के झांसे में आ गया. अब मुझे आप से कोई बहस नहीं करनी, आप अपनी बहन को ले कर लौट जाएं तो बेहतर होगा.’

इसी बीच नेहा के ससुर और ननदोई भी आ गए. नवीन और अनुभा को अचानक अपने घर में देख कर वे हैरान लग रहे थे. नेहा के ससुर ने उस के ननदोई का जैसे ही नवीन से परिचय कराया और वह हाथ मिलाने के लिए नवीन की तरफ बढ़ा, नेहा नवीन को अपनी ओर खींचते हुए चिल्ला पड़ी, ‘भैया, इस के पास मत जाना, यह बहुत खराब है. इस ने जैसे मुझे काटा था, आप को भी काट लेगा.’

नेहा क्या कह रही है, एक बार तो किसी को समझ में नहीं आया. लेकिन उस के ननदोई जरूर सकपका गए थे पर नेहा फिर उस की ओर इशारा करते हुए बोली, ‘भैया, इस को मारो, यह बहुत गंदा है. जब राजेश अपनी मां के साथ बाहर गया हुआ था तो इस ने जबरन मेरे कमरे में घुस कर मेरे साथ बहुत गंदी हरकतें कीं और मैं ने जब इसे रोका तो इस ने मुझे काटा और मेरे सारे कपड़े उतार कर मेरे साथ जबरदस्ती की,’ इतना बताते हुए नेहा अपनी साड़ी का पल्ला फेंकते हुए अपने ब्लाउज को खोल अपने शरीर पर जगहजगह काटे और खरोंचों के निशान दिखाने लगी.

नेहा के इस रहस्योद्घाटन से कमरे में सन्नाटा सा छा गया. उस के ससुराल वालों की निगाहें झुक गईं. खासकर उस के ननदोई का तो बुरा हाल था. नवीन ने दोनों हाथों से अपनी आंखों को ढांपते हुए अनुभा से कहा, ‘अनुभा प्लीज, नेहा को कमरे में ले जा कर उस के कपड़े ठीक करो. अब हमें एक पल भी यहां नहीं ठहरना है.’

नेहा के ससुर ने इतना कुछ हो जाने पर भी नेहा की बात को झुठलाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘नेहा एकदम झूठ बोल रही है. हमारे जवांई बाबू तो बहुत नेक और शरीफ इनसान हैं, वह भला ऐसी गंदी हरकत क्यों करेंगे?’

नवीन ने उन की ओर घृणा से देखते हुए कहा, ‘मुझे आप की कोई सफाई नहीं सुननी है. मेरी बहन कभी भी झूठ नहीं बोलती. मेरी बहन के साथ जो घिनौना और वहशियाना कुकर्म आप के घर में हुआ है, उस के लिए शर्मिंदगी या अफसोस जाहिर करने के बजाय आप फिर झूठ बोल कर मुझ पर हावी होना चाहते हैं, धिक्कार है आप लोगों को. पिछले सप्ताह भर से आप नेहा को हम से बात नहीं करने दे रहे थे, तभी मुझे दाल में कुछ काला होने का शक हो गया था पर अपने ही घर की बहूबेटियों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार आप लोग करेंगे, इस की मैं ने सपने में भी कल्पना नहीं की थी.’

नवीन ने वहां से उठते हुए बेहद दुखी मन से कहा, ‘आज से हमारे बीच के सारे रिश्ते खत्म हो गए. ऐसे दरिंदे और हैवान लोगों के बीच अपनी बहन को छोड़ने के बजाय मैं उसे आजीवन अपने घर में रखना बेहतर समझूंगा. पर यह याद रखें, मैं इतनी आसानी से आप को छोड़ने वाला नहीं. आप की इस हरकत के लिए आप को जेल की हवा नहीं खिलाई तो मेरा भी नाम नवीन नहीं.’

नवीन की इस धमकी से नेहा के सासससुर घबरा गए. उन्होंने हाथ जोड़ कर नवीन को शांत करने का प्रयास किया पर वह यह कहते हुए उठ गया कि मुझे आप से अब कोई बहस नहीं करनी है. मैं अपनी बहन को हमेशा के लिए ले कर जा रहा हूं.

नेहा के साथ भारी मन से वे घर लौट आए थे. मांजी ने जब नेहा को देखा और उस के साथ हुए हादसे के बारे में सुना तो वह सिर थाम कर बैठ गई थीं.

बहुत देर बाद जब वे सामान्य हुईं तो बोलीं, ‘बेटा, यह सब मेरी वजह से हुआ है. मैं मां होते हुए भी अपनी बेटी का सब से बड़ा अहित कर गई. तुम लोगों की बात मान कर नेहा के  विवाह के लिए जिद नहीं करती तो आज मेरी बेटी की यह दुर्दशा नहीं होती. कन्याऋण से उऋण होने के बदले मैं तो तन, मन, धन तीनों से हाथ धो बैठी.’

नेहा के बारे में सोचतेसोचते अनुभा इतनी खो गई कि उस को समय का पता ही नहीं चला. नेहा ने जब आ कर उसे बताया कि मां बुला रही हैं तो वह यथार्थ की दुनिया में वापस आई.

अनुभा मांजी को गंभीर देख कर उन के पास जा कर बैठ गई. मांजी की आंखों में अभी भी आंसू थे. अपने आंसू पोंछते हुए वह बोलीं, ‘‘अनुभा, तुम जब से नेहा को डाक्टर के पास दिखा कर आई हो, मुझे चिंता लग रही है. बेटी, तुम मुझ से लाख छिपाओ पर मैं हकीकत जान गई हूं.’’

मांजी से नजरें चुराते अनुभा बोली ‘‘मांजी आप व्यर्थ ही चिंता कर रही हैं…’’

मांजी ने उस को बीच में ही टोका, ‘‘बेटी, उम्र में तुम से बड़ी होने के कारण मेरे जीवन के अनुभव भी तुम से अधिक हैं. तुम्हारा नजरें चुरा कर मुझ से बात करना मेरे विश्वास को पुख्ता करता है. मैं चाहती हूं कि अब अधिक समय सोचने में नष्ट करने से बेहतर है कि इस समस्या का अविलंब समाधान हो.’’ अपना गला साफ कर के मांजी फिर बोलीं, ‘‘नेहा जब अपना रखरखाव भी ठीक से करने में असमर्थ है तो इस स्थिति में वह मां बनने की जिम्मेदारी कैसे संभाल सकती है? ससुराल के लोग कैसे हैं यह तुम देख कर आई हो. इसीलिए मैं ने सारी स्थितियों पर विचार कर के ही यह फैसला किया है कि हम जितनी जल्दी नेहा को इस समस्या से मुक्ति दिलवा दें, उतना ही बेहतर है. यह शायद मेरा सब से बड़ा प्रायश्चित होगा.’’

अनुभा, मांजी में आए इस अप्रत्याशित बदलाव को देख कर हैरान थी. डेढ़ 2 माह पहले जो महिला कन्यादान के ऋण से उऋण होने तथा किसी भी हालत में बेटी को कुंआरी नहीं रखने की पुरातन विचारधारा में विश्वास करती थी, आज वह अचानक ही इतनी आधुनिक और व्यावहारिक कैसे हो गईं? खैर, जो भी हो मांजी का यह बदलाव उसे बहुत समयोचित लगा.

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