नेताओं की नेतागीरी में मोहरा बनते ‘स्टूडेंट’

क्या देश अभी भी लकीर का फकीर बना हुआ है? क्या यह सोच भारत के जनमानस में अभी भी नहीं पहुंची है कि कम से कम 12 साल से छोटे बच्चों के साथ हमें कैसा कोमल बरताव करना चाहिए? क्या सिर्फ अपनी नौकरी बचाने और नेताओं के इशारे पर हर उस गलत चीज को भी हम सिर झुका कर आसानी से मान लेते हैं और कोई भी हुक्म बजा लाते हैं?

इस का सब से बड़ा उदाहरण हैं प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्रियों के आने पर स्कूल के बच्चों को उन की रैलिया में, सभाओं में ले जाने का काम स्कूल मैनेजमैंट खुशी या मजबूर हो कर करने लगता है और समझने वाली बात यह है कि निजी स्कूल ऐसा क्यों नहीं करते और सरकारी स्कूलों के बच्चों को आननफानन स्कूल ड्रैस में सभा में भीड़ बढ़ाने के लिए ले जाया जाता है? इसे बच्चों के साथ क्रूरता और अपराध की कैटेगिरी में रखा जाना चाहिए.

सवाल यह भी है कि अगर कहीं ऐसे हालात में कोई हादसा हो जाए, तो उस का जिम्मेदार कौन होगा, यह भी तय करने की जरूरत है.

तमिलनाडु के कोयंबटूर जिला शिक्षा अधिकारी ने कोयंबटूर में भारतीय जनता पार्टी के नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रोड शो में स्कूली बच्चों की भागीदारी पर जांच के आदेश जारी कर दिए हैं. इस से पक्ष और विपक्ष के बीच बहस की तलवार खींच गई है. मामला पुलिस तक पहुंच गया है और अब मद्रास हाईकोर्ट मे चल रहा है.

सनद रहे कि नरेंद्र मोदी ने मेट्टुपालयम रोड पर बने गंगा अस्पताल और आरएस पुरम के मुख्य डाकघर के बीच 4 किलोमीटर लंबा रोड शो किया था. सरकारी सहायता प्राप्त श्री साईं बाबा मिडिल स्कूल के 14 साल से कम उम्र के बच्चे रोड शो के दौरान अलगअलग जगहों पर पार्टी के प्रतीक चिह्नों वाली भगवा रंग की कपड़े की पट्टियां पहने हुए भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित मंचों पर परफौर्म करते हुए देखे गए.

याद रहे कि कानूनन राजनीतिक रैलियों में बच्चों की भागीदारी भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के निर्देशों के खिलाफ है. ऐसे में जब आज लोकसभा चुनाव अपने उफान पर है यह सवाल और भी ज्यादा जरूरी हो जाता है, जिस का जवाब तय किया जाना चाहिए.

अधिकारियों ने स्कूल मैनेजमैंट को प्रधानाध्यापक और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने और घटना की रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है. सवाल और जवाब यही है कि ऐसे घटनाक्रम में सख्त कार्यवाही होनी चाहिए और आइंदा ऐसा न हो, यह संदेश चला जाना चाहिए.

कोयंबटूर जिला कलक्टर ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘हम ने मुद्दे का संज्ञान लिया है और एआरओ ने संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी है. जांच के निष्कर्षों के आधार पर उचित कार्यवाही की जाएगी.’

श्रम विभाग के संयुक्त आयुक्त और मुख्य शिक्षा अधिकारी द्वारा भी अलगअलग जांच शुरू कर दी गई हैं.
भारत निर्वाचन आयोग के अनुसार ऐसे कार्य आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) का उल्लंघन करते हैं. स्कूल मैनेजमैंट पर कार्यवाही की जाती है. मगर इस सब के बावजूद देशभर में ये खबरें अकसर सुर्खियां बटोरती हैं कि प्रधानमंत्री या कोई अन्य राजनीतिक नेता के स्वागत में स्कूली बच्चों को भेड़बकरियों की तरह ठेल दिया जाता है. यह एक आपराधिक कृत्य है और इस से नेताओं को बचना ही चाहिए. स्कूल मैनेजमैंट को भी सख्ती बनाए रखनी चाहिए.

ऐसे मामलों में सब से ज्यादा जिम्मेदारी जहां एक ओर स्कूल मैनेजमैंट की है वहीं दूसरी ओर बच्चों के अभिभावकों को भी इस दिशा में जागरूक होने की जरूरत है.

दीपिका पादुकोण के पोस्ट ने किया सबको हैरान, फैंस के सवालों का लगा तांता

बौलीवुड की बोल्ड एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण इन दिनों अपनी प्रग्नेंसी को लेकर सुर्खियों में बनीं हुई हैं. एक्ट्रेस जल्द ही मां बनने वाली हैं. इस बात की जानकारी रणवीर सिंह और दीपिका पादुकोण ने सोशल मीडिया हैंडल पर दी थीं. एक्ट्रेस प्रेग्नेंसी पीरियड को एन्जॉय कर रही है. इस बीच एक्ट्रेस ने इंस्टाग्राम पर भी एक पोस्ट शेयर किया हैं. जिसे देख लोग परेशान हो गए हैं.


आपको बता दें कि दीपिका पादुकोण जल्द ही सबको गुडन्यूज सुनाने वाली हैं. लेकिन इन सब खबरों के बीच एक्ट्रेस ने अपनी प्रेग्नेंसी से फर्स्ट ट्राइमिस्टर को पार कर दूसरे ट्राइमिस्टर में पहुंच चुकी हैं. इस बीच एक्ट्रेस इंस्टाग्राम पर भी खास एक्टिव नहीं हैं. अब हाल ही में एक्ट्रेस दीपिका पादुकोण ने इंस्टास्टोरी पर एक क्रिप्टिक पोस्ट शेयर किया है. ये पोस्ट पढ़कर लोग उनकी सेहत की चिंता कर रहे हैं. जिस पोस्ट में एक क्वोटेशन है. इसमे लिखा है, ‘कम पोस्ट कर रही हूं. काम ज्यादा कर रही हूं. तुलना कम और दर्शा ज्यादा रही हूं. शिकायत कम और प्रार्थना ज्यादा कर रही हूं. बातचीत कम और काम पूरे ज्यादा कर रही हूं.’ इस पोस्ट को पढ़ने के बाद लोग सोच में पड़ गए हैं कि दीपिका पादुकोण यहां किस बारे में बात कर रही हैं. यही नहीं, इस पोस्ट को देखने के बाद लोगों को अदाकारा की सेहत की चिंता सताने लगी हैं. सोशल मीडिया पर इस पोस्ट को वायरल करते हुए एक यूजर ने कमेंट कर पूछा, ‘सब ठीक है?’.Post

दीपिका पादुकोण के वक्र फ्रंट की बात करें तो, उनकी पिछली रिलीज मूवी फाइटर ने खूब सफलता हासिल की. इससे पहले साल 2023 में भी एक्ट्रेस ने जवान और पठान जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में दी थी. अब इस साल अदाकारा अजय देवगन स्टारर मूवी ‘सिंघम अगेन’ में भी नजर आएंगी. साथ ही एक्ट्रेस ने सुपरस्टार प्रभास की अपकमिंग मूवी ‘कल्कि 2898 एडी’ में भी नजर आएंगी.

Summer Special: सेहत का खजाना है सत्तू, गर्मी से बचने के लिए इसे खाएं जरूर

गर्मियों के दिनों की शुरुआत हो चुकी है और इस मौसम सबके लिए जरुरी है भरपूर एनर्जी.  गरमियो को लोग एनर्जी देने के लिए तरह तरह की चीजे खाते है. इस मौसम में मौसम में लोग सत्तू पीना ज्यादा पसंद करते है. सत्तू का इस्तेमांल कर कई तरह की चीजे भी बनाई जाती है. गर्मियो लोग अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए रोजाना सत्तू पिया करते है. प्रोटीन से भरपूर सत्तू शरीर को ताकत देता है. यह जीम लवर्स के लिए प्रोटीन का अच्छा स्त्रोत है. आइए जानते है गर्मियों में इसके क्या फायदें है.

 

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जानें क्या है सत्तू

सत्तू सूखे भुने हुए चने से बनाया जाता है. यह ज्यादात्तर भारत के उत्तरी भाग में खाया जाता है. खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे राज्यों में सबसे ज्यादा सत्तू का सेवन किया जाता है. सत्तू अपने पोषण संबंधी लाभों के लिए जाना जाता है. यह शरीर के लिए बहुत लाभदायक होता है.

सत्तू का सेवन वैसे गर्मियों में होता है. सत्तू आपको गर्मियों में चिलचिलाती धूप और गर्मी से बचाता है. यह शरीर को ठंडा रखता है. वैसे तो सत्तू को पानी के साथ मिलाकर खाया जाता है. लेकिन अब सत्तू को आप कई तरह से बना भी सकते हैं जो खाने में स्वाद भी होता है और आपको भरपूर पोषण भी देता है.

सत्तू खाने के फायदे

शरीर के लिए सत्तू के कई फायदे हैं. यह शरीर को मिलने वाले प्रोटीन और फाइबर का नेचुरल स्त्रोत है. जैसा कि हम जानते हैं कि सत्तू में फाइबर की मात्रा अधिक होती है. इससे इम्युनिटी बढ़ती है. साथ ही वेटलॉस के लिए भी यह काफी फायदेमंद होता है.

अगर आप रोज सवेरे खाली पेट सत्तू काते हैं तो इससे आपकी पाचन क्रिया अच्छी होती है और आसानी से फ्रेश हो जाएंगे. यही नहीं सत्तू एसिडिटी का भी बढ़िया इलाज करता है.

सत्तू घर में कैसे बनाया जाता है?

सत्तू भुने हुए चनों से बनाया जाता है. इसे बनाने के लिए चने को तब तक भुनना होता है तक कि वह सुनहरा ना हो जाए. फिर भुने हुए चनों को पीसकर बारीक पाउडर बनाया जाता है. इस पाउडर का यूज अलग-अलग डिश को बनाने में किया जाता है.

शरीर को देता है प्रोटीन

इसके सेवन के बाद आपको शरीर में अच्छे बदलाव देखने को मिलेंगे. सत्तू के साथ अच्छे-अच्छे पकवान और ड्रिंक बनाकर अपनी गर्मियों को लाभदायक बनाएं. जिससे आपका परिवार और आपके बच्चे हमेशा स्वस्थ बने रहेंगे.

क्या बौडी बिल्डर्स के लिए फायदेमंद है सत्तू?

सत्तू उन बौडी बिल्डर्स के लिए ठीक है जो प्रोटीन पर ज्यादा पैसा खर्च नहीं कर सकते हैं. घर में ही चने को पीसकर वह आसानी से पाउडर बना सकते हैं.

सत्तू खाने के नुकसान

सत्तू में फाइबर की मात्रा अधिक होती है. ऐसे में इससे पेट का फूलना, ऐंठन, गैस और दस्त लग सकते हैं. जिन्हें पथरी की समस्या है वह गलती से भी सत्तू का सेवन ना करें. यह उनके लिए बहुत हानिकारक साबित हो सकता है सत्तू खाने से पथरी के मरीज को दर्द उठ सकता है. इसलिए पथरी वाले मरीजों को सत्तू से बिल्कुल दूर रखें.

‘शिव शक्ति’ फेम स्टार्स की टूटी सगाई, एक साल भी नहीं टीक पाया रिश्ता

टीवी सीरियल के स्टार्स अक्सर मीडिया पर छाएं रहते है कभी अपने ब्रेकअप्स को लेकर तो कभी शादियों को लेकर छाएं रहते है. अब हाल में सीरियल ‘शिव शक्ति- तप तांडव त्याग’ का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री सुभा राजपूत और वैभव रॉय चर्चा में बनें हुए है. उनकी की सगाई टूट गई है.

 

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आपको बता दें कि टीवी सीरियल एक्ट्रेस सुभा राजपूत और वैभव रॉय को लेकर एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है. इस स्टार कपल ने 3 साल तक एक दूसरे को डेट करने के बाद साल 2022 के दिसंबर महीने में सगाई की थी. जिसकी तस्वीरें इन दोनों ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर भी शेयर की थीं. मगर अब इस सगाई के 1 साल पूरे होने के बाद ही दोनों का रिश्ता डगमगाने लगा और दोनों ने आपसी सहमति से ये सगाई तोड़ दी है.

खबरों की मानें तो इन दोनों के रिश्ते टूटने की जानकारी एक करीबी सूत्र ने दी है. जिसके बाद टीवी न्यूज इंडस्ट्री में सुभा राजपूत और वैभव रॉय के ब्रेकअप की खबर सुर्खियों में आ गई. रिपोर्ट की मानें तो करीबी सूत्र ने कहा, ‘वैभव और सुभा ने आपसी सहमति से इस सगाई को खत्म करने का फैसला लिया है. उन्हें महसूस हुआ कि उन्हें जिंदगी से अलग चीजें चाहिए. हालांकि ये एक मुश्किल फैसला था. लेकिन, ये उन दोनों के लिए बिल्कुल सही फैसला है.’ इस खबर की कंफर्मेशन के लिए जब वैभव से अप्रोच किया गया तो उनसे संपर्क नहीं हो सका. जबकि, सुभा ने कहा कि वो अपनी निजी जिंदगी के बारे में बात करना नहीं चाहती हैं.

 

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बता दें कि वैभव रॉय भी टीवी एक्टर हैं. वो गुस्ताख दिल, डोली अरमानों की और कुछ तो है तेरे मेरे दरमियां का हिस्सा रहे. इन दिनों वो टीवी सीरियल शैतानी रस्में में नजर आ रही हैं. फिलहाल वो किसी रियलिटी शो का हिस्सा नहीं बने हैं. हालांकि इस बारे में बात करते हुए टीवी स्टार ने कहा था कि वो अतीत के बारे में नहीं जानते. कभी किसी चीज के लिए मना नहीं करना चाहिए.

जबकि, अदाकारा सुभा राजपूत ‘शिव शक्ति- तप तांडव त्याग’ के अलावा कई और शोज और ओटीटी शोज में नजर आई हैं. वो इश्कबाज में प्रियंका सिंह ओबराय के भी किरदार में नजर आई थीं. इन दिनों अदाकारा ‘शिव शक्ति- तप तांडव त्याग’ से फैंस का प्यार पा रही हैं.

मेरे पति मेरी बड़ी बहन से प्यार करते हैं, मैं शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं हूं क्या करूं?

सवाल
मैं 31 वर्षीय विवाहिता व 2 बेटियों की मां हूं. मेरी शादी को 16 वर्ष हो चुके हैं. मैं अपनी शादीशुदा जिंदगी से खुश नहीं हूं. मेरे पति मेरी बड़ी बहन से प्यार करते हैं. उन दोनों में अवैध संबंध भी हैं. यह बात मुझे 4 सालों से मालूम है पर चाह कर भी मैं कुछ नहीं कर पाई, क्योंकि मेरे पति बहुत ही तानाशाही प्रवृत्ति के हैं. बातबात पर उन का गुस्सा बेकाबू हो जाता है. मैं उन का विरोध करने के बारे में सोच भी नहीं सकती. इसलिए देख कर बस कुढ़ती रहती हूं. वे मेरी बेटियों पर भी ध्यान नहीं देते.

मेरी बेटी जिस अध्यापक से पिछले 9 सालों से पढ़ी रही है उन्होंने जब नोटिस किया कि मैं परेशान हूं तो मेरी परेशानी की वजह जाननी चाही. जानने के बाद वे मुझ से काफी हमदर्दी रखने लगे हैं. मैं भी उन्हें चाहने लगी हूं. 6 महीने पहले जब उन्होंने कहा कि मेरे साथ अपनी खुशियां बांटना चाहते हैं, तो मैं सुन कर दंग रही गई. मैं उन से नजदीकियां बढ़ने से जो इस तरह के रिश्तों में बढ़नी स्वाभाविक है डरती हूं. बताइए मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब
4 साल पहले आप को अपने पति के अवैध संबंधों की बाबत मालूम चल गया था, तो आप को इस का विरोध करना चाहिए था. पति कितने भी बड़े तानाशाह क्यों न रहे हों, इस तरह की ज्यादती के लिए आवाज न उठा कर आप ने उन्हें खेलनेखाने की खुली छूट दे दी. पति से खौफ खाती रहीं तो भी आप अपनी  बहन को अपने ही घर में जमा डालने के डांटफटकार लगा सकती थीं अब भी समय है, उसे लताडे़, उस के पति से शिकायत करें. अपने मायके वालों को भी उस की करतूत बताएं. इतना करने से वह आप के रास्ते से हट जाएंगी.

रही अपनी बेटी के अध्यापक की बात तो उन से आप को अपनी निजी बात शेयर नहीं करनी चाहिए थी. वे आप से जो हमदर्दी जता रहे हैं वह आप की बेचारगी पर तरस खा कर. वे मौके का फायदा उठाना चाहते हैं. ऐसे अवसरवादी व्यक्ति से आप को सावधान रहना चाहिए. बाहर खुशियां तलाशने के बजाय अपनी खोई खुशियों को संजाने का प्रयास करना चाहिए. आप को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि आप पर 2 बेटियों की भी जिम्मेदारी है. आप कहती हैं कि आप के पति अपनी बेटियों पर ध्यान नहीं देते तो ऐसे में तो आप की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है. अत: समझदारी से काम लें.

मेहमान बनें, सिरदर्द नहीं : रखें इन बातों का खयाल

अपने किसी जानपहचान वाले या सगेसंबंधी के यहां छुट्टियां मनाने जाना एक सुखद अनुभव है. भागदौड़ भरी जिंदगी में वहां कई ऐसे पल मिल जाते हैं, जब हमें चैन की सांसें मिलती हैं. आबोहवा बदलने से बहुत सी परेशानियां तो अपनेआप ही चली जाती हैं. चाहे कोई भी उम्र हो, सब के लिए कुछ न कुछ जरूर होता है. हम खुद को तरोताजा महसूस करने लगते हैं.

आसान शब्दों में कहें तो हमारा तनमन आने वाले समय के लिए रीचार्ज हो जाता है, इसलिए हमारा भी यह फर्ज है कि जिन लोगों के चलते हम को इतना सब मिला, उन के लिए हम भी थोड़ा सोचें.

चलिए, जिक्र करते हैं उन बातों की, जिन का हमें मेहमान बनते वक्त हमेशा खयाल रखना चाहिए:

* अगर हमारा कार्यक्रम लंबा है यानी 15-20 दिन या महीनेभर का है, तो कोशिश की जानी चाहिए कि उसी शहर में जाएं, जहां एक से ज्यादा रिश्तेदार हों. 2-2, 3-3 दिन तक बारीबारी से सब के यहां रुकते रहने से किसी पर ज्यादा बोझ भी नहीं पड़ेगा और सभी से मुलाकात भी हो जाएगी.

* छुट्टियों में किसी खास के पास जाने की आदत नहीं बनानी चाहिए. इस से उस के मन में आप के लिए नयापन लगातार कम होता जाता है, भले ही वह आप का मायका या पुश्तैनी घर ही क्यों न हो. समय के साथ लोगों की पसंद और प्राथमिकताएं लगातार बदलती हैं.

* बहुत से लोगों की आदत होती है कि किसी के भी घर पहुंच जाते हैं. लोग भले ही ऊपर से कुछ न कहें, लेकिन आज की गलाकाट प्रतियोगिता के जमाने में हर कोई इतना फ्री नहीं होता कि उस को बारबार किसी की खातिरदारी करने में दिलचस्पी हो, वह भी दूर के जानपहचान वालों की. खुद को किसी के सिर पर थोपने की लत अपनी इज्जत के लिए भी खतरा है.

* हम अपने घर में तो बच्चों को खूब रोकटोक करते हैं, लेकिन किसी के घर मेहमान बन कर जाते ही उन पर से ध्यान हटा लेते हैं. ऊपर से उन के सामने ही यह बोल कर कि ‘यह तो बहुत शरारती है’ एक तरह से उन को खुली छूट दे देते हैं.

मेजबान खुद आप को संभालने में जुटा हुआ है, ऐसे में अगर आप के बच्चे उस के घर में धमाचौकड़ी, तोड़फोड़ करते रहेंगे, तो झिझक के मारे वह उन को तो कुछ नहीं कहेगा, लेकिन आप के अगली बार न आने की बात मन में जरूर सोचने लगेगा.

* अकसर देखा गया है कि अपने से कम पैसे वाले मेजबान को मेहमान अपना रोब दिखाने का ‘सौफ्ट टारगेट’ समझ लेते हैं. आप कितने महंगे कपड़े पहनते हैं, कितने का खाते हैं. इस का गैरजरूरी हिसाब देना मेजबान के मन में आप के लिए नेगेटिव भाव पैदा करता है.

* मेजबान के बच्चों की तुलना ज्यादा नंबर लाने वाले अपने बच्चे से मत कीजिए. इस से वे बच्चे आप से कन्नी काटने लगेंगे. बच्चों को असहज देख उन के मांबाप भी असहज हो जाएंगे.

अगर आप मेजबान के बच्चों का सचमुच भला चाहते हैं, तो उन्हें कभीकभार दोस्त की तरह सलाह दे दें. अपने बच्चों के सामने इशारोंइशारों में छोटा कतई न दिखाएं.

* हर किसी का अपना स्वभाव होता है. हो सकता है कि किसी को ज्यादा लोगों से मिलनाजुलना पसंद न हो या वह आप से न मिलना चाहे. घर में जिन से आप की अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, उन तक ही सीमित रहिए. इस से आप को भरपूर स्वागत का अनुभव होगा.

* जिस मेजबान की जो हैसियत है, उसे उस की जरूरत के हिसाब से उपहार दें. सभी जगह आधा किलो मिठाई का डब्बा ले कर चलने की आदत सही नहीं है. हर कोई आप से प्यार किसी न किसी उम्मीद के साथ ही करता है, इस सच को स्वीकार करना सीखें.

* मेजबान से बहुत ज्यादा प्यार जताना वह भी केवल शब्दों के जरीए, उन के मन में आप की इमेज पर बुरा असर डालेगा. सच्चा प्यार है तो उस को अपने काम से दिखलाइए, वरना बदलाव सामान्य रखिए. खोखली बातें कुछ दिनों तक ही अच्छी लगती हैं.

इन बातों का ध्यान रखें और देखें कि हर मेजबान खुद ही कहेगा, ‘‘आप का हमारे घर में स्वागत है.’’

वह बेमौत नहीं मरता: एक कठोर मां ने कैसे ले ली बेटे की जान

बड़बड़ा रही थीं 80 साल की अम्मां. सुबहसुबह उठ कर बड़बड़ करना उन की रोज की आदत है, ‘‘हमारे घर में नहीं बनती यह दाल वाली रोटी, हमारे घर में यह नहीं चलता, हमारे घर में वह नहीं किया जाता.’’ सुबह 4 बजे उठ जाती हैं अम्मां, पूजापाठ, हवनमंत्र, सब के खाने में रोकटोक, सोनेजागने पर रोकटोक, सब के जीने के स्तर पर रोकटोक. पड़ोस में रहती हूं न मैं, और मेरी खिड़की उन के आंगन में खुलती है, इसलिए न चाहते हुए भी सारी की सारी बातें मेरे कान में पड़ती रहती हैं.

अम्मां की बड़ी बेटी अकसर आती है और महीना भर रह जाती है. घूमती है अम्मां के पीछेपीछे, उन का अनुसरण करती हुई.

आंगन में बेटी की आवाज गूंजी, ‘‘अम्मां, पानी उबल गया है अब पत्ती और चीनी डाल दूं?’’

‘‘नहीं, थोड़ा सा और उबलने दे,’’ अम्मां अखबार पढ़ती हुई बोलीं.

मुझे हंसी आ गई थी कि 60 साल की बेटी मां से चाय बनाना सीख रही थी. अम्मां चाहती हैं कि सभी पूरी उम्र उन के सामने बड़े ही न हों.

‘‘हां, अब चाय डाल दे, चीनी और दूध भी. 2-3 उबाल आने दे. हां, अब ले आ.’’

अम्मां की कमजोरी हर रोज मैं महसूस करती हूं. 80 साल की अम्मां नहीं चाहतीं कि कोई अपनी इच्छा से सांस भी ले. बड़ी बहू कुछ साल साथ रही फिर अलग चली गई.

बेटे के अलग होने पर अम्मां ने जो रोनाधोना शुरू किया उसे देख कर छोटा लड़का डर गया. वह ऐसा घबराया कि उस ने अम्मां को कुछ भी कहना छोड़ दिया.

दुकान के भी एकएक काम में अम्मां का पूरा दखल था. नौकर कितनी तनख्वाह लेता है, इस का पता भी छोटे लड़के को नहीं था. अम्मां ही तनख्वाह बांटतीं.

छोटे बेटे का परिवार हुआ. बड़ी समझदार थी उस की पत्नी. जब आई थी अच्छे खातेपीते घर की लड़की थी लेकिन अब 18 साल में एकदम फूहड़गंवार बन कर रह गई है.

अम्मां बेटी के साथ बैठ कर चुहल करतीं तो मेरा मन उबलने लगता. गुस्सा आता मुझे कि कैसी औरत है यह. कभी उन के घर जा कर देखो तो, रसोई में वही टीन के डब्बे लगे हैं जिन पर तेल और धुएं की मोटी परत चढ़ चुकी है. बहू की क्या मजाल जो नए सुंदर डब्बे ला कर रसोई में सजा ले और उन में दालें, मसाले डाल ले.

मरजी अम्मां की और फूहड़ता का लेबल बहू के माथे पर. बड़ी बेटी जो दिनरात मां का अहम् संतुष्ट करती है, जिस का अपना घर हर सुखसुविधा से भरापूरा है, जो माइक्रोवेव के बिना खाना ही गरम नहीं कर सकती, वह क्या अपनी मां को समझा नहीं सकती? मगर नहीं, पता नहीं कैसा मोह है इस बेटी का कि मां का दिल न दुखे चाहे हजारों दिल दिनरात कुढ़ते रहे.

‘‘मेरे घर में 3 रोटियां खाने का रिवाज नहीं,’’ अम्मां ने बहू के आते ही घर के नियम उस के कान में डाल दिए थे. जब अम्मां ने देखा कि बहू ने चौथी रोटी पर भी हाथ डाल दिया तो बच्चों को नपातुला भोजन परोसने वाली अम्मां कहां सह लेती कि बहू हर रोज 1-1 रोटी ज्यादा खा जाती.

छोटा लड़का मां को खुश करताकरता ही बीमार रहने लगा था. सुबह से शाम तक दुकान पर काम करता और पेट में डलती गिन कर पतलीपतली 5 रोटियां जो उस के पूरे दिन का राशन थीं. बाजार से कुछ खरीद कर इस डर से नहीं खाता कि नौकरों से पता चलने के बाद अम्मां घर में महाभारत मचा देंगी.

‘‘किसी ने जादूटोना कर दिया है हमारे घर पर,’’ बेटा बीमार पड़ा तो अम्मां यह कहते हुए गंडेतावीजों में ऐसी पड़ीं कि अड़ोसीपड़ोसी सभी उन को दुश्मन नजर आने लगे, जिन में सब से ऊपर मेरा नाम आता था.

अम्मां का पूरा दिन हवनमंत्र में बीतता है और जादूटोने पर भी उन का उतना ही विश्वास था. पूरा दिन परिवार का खून जलाने वाली अम्मां को स्वर्ग चाहिए चाहे जीते जी आसपास नरक बन जाए. छोटा बेटा इलाज के चक्कर में कई बार दिल्ली गया था. सांस अधिक फूलने लगी थी इसलिए इन दिनों वह घर पर ही था. एक सुबह वह चल बसा. हम सब भाग कर उन के घर जमा हुए तो मेरी सूरत पर नजर पड़ते ही अम्मां ने चीखना- चिल्लाना शुरू किया, ‘‘हाय, तू मेरा बेटा खा गई, तूने जादूटोने किए, देख, मेरा बच्चा चला गया.’’

अवाक् रह गई मैं. सभी मेरा मुंह देखने लगे. ऐसा दर्दनाक मंजर और उस पर मुझ पर ऐसा आरोप. मुझे भला क्या चाहिए था अम्मां से जो मैं जादूटोना करती.

‘‘अरे, बड़की बहू तेरी बड़ी सगी है न. सारा छोटा न ले जाए इसलिए उस ने तेरे हाथ जादूटोने भेज दिए…’’

मैं कुछ कहती इस से पहले मेरे पति ने मुझे पीछे खींच लिया और बोले, ‘‘शांति, चलो यहां से.’’

मौका ऐसा था कि दया की पात्र अम्मां वास्तव में एक पड़ोसी की दया की हकदार भी नहीं रही थीं.

इनसान बहुत हद तक अपने हालात के लिए खुद ही जिम्मेदार होता है. उस का किया हुआ एकएक कर्म कड़ी दर कड़ी बढ़ता हुआ कितनी दूर तक चला आता है. लंबी दूरी तय कर लेने के बाद भी शुरू की गई कड़ी से वास्ता नहीं टूटता. 80 साल की अम्मां आज भी वैसी की वैसी ही हैं.

बहू दुकान पर जाती है और बड़ी पोती स्कूल के साथसाथ घर भी संभालती है. अम्मां की सारी कड़वाहट अब पोती पर निकलती है. 4 साल हो गए बेटे को गए. इन 4 सालों में अम्मां पर बस, इतना ही असर हुआ है कि उन की जबान की धार पहले से कुछ और भी तेज हो गई है.

‘‘कितनी बार कहा कि सुबहसुबह शोर मत किया करो, अम्मां, मेरे पेपर चल रहे हैं. रात देर तक पढ़ना पड़ता है और सुबह 4 बजे से ही तुम्हारी किटकिट शुरू हो जाती है,’’ एक दिन बड़ी पोती ने चीख कर कहा तो अम्मां सन्न रह गईं.

‘‘रहना है तो तुम हमारे साथ आराम से रहो वरना चली जाओ बूआ के साथ. दाल वाली रोटी पसंद नहीं तो बेशक भूखी रह जाओ, सादी रोटी बना लो मगर मेरा दिमाग मत चाटो, मेरा पेपर है.’’

‘‘हायहाय, मेरा बेटा चला गया तभी तुम्हारी इतनी हिम्मत हो गई…’’

अम्मां की बातें बीच में काटते हुए पोती बोली, ‘‘बेटा चला गया तभी तुम्हारी भी हिम्मत होती है उठतेबैठते हमें घर से निकालने की. पापा जिंदा होते तो तुम्हारी जबान भी इतनी लंबी न होती…’’

खिड़की से आवाजें अंदर आ रही थीं.

‘‘…अपने बेटे को कभी पेट भर कर खिलाया होता तो आज हम भी बाप को न तरसते. अम्मां, इज्जत लेना चाहती हो तो इज्जत करना भी सीखो. मुझे पापा मत समझना अम्मां, मैं नहीं सह पाऊंगी, समझी न तुम.’’

शायद अम्मां का हाथ पोती पर उठ गया था, जिसे पोती ने रोक लिया था.

तरस आता था मुझे बच्ची पर, लेकिन अब थोड़ी खुशी भी हो रही है कि इस बच्ची को विरोध करना भी आता है.

पेपर खत्म हुए और एक दिन फिर से घर में कोहराम मच गया. घबरा कर खिड़की में से देखा. चमचमाते 3 बड़ेछोटे टं्रक आंगन में पड़े थे. जिन पर अम्मां चीख रही थीं. दुकान से पैसे ले कर खर्च जो कर लिए थे.

‘‘घर में इतने ट्रंक हैं फिर इन की क्या जरूरत थी?’’

‘‘होंगे, मगर मेरे पास नहीं हैं और मुझे अपना सामान रखने के लिए चाहिए.’’

अम्मां कुली का हाथ रोक रही थीं तो पोती ने अम्मां का हाथ झटक दिया था और बोली, ‘‘चलो भैया, टं्रक अंदर रखो.’’

छाती पीटपीट कर रोने लगी थी अम्मां, पोती ने लगे हाथ रसोई में जा कर टीन के सभी डब्बे बाहर ला पटके जिन्हें बाद में कबाड़ी वाला ले गया. पोती ने नए सुंदर डब्बे धो कर सामने मेज पर सजा दिए थे. अम्मां ने फिर मुंह खोला तो इस बार पोती शांत स्वर में बोली, ‘‘पापा कमाकमा कर मर गए, मेरी मां भी क्या कमाकमा कर तुम्हारी झोली ही भरती रहेगी? हमें जीने कब दोगी अम्मां? जीतेजी जीने दो अम्मां, हम पर कृपा करो…’’

पोती की इस बगावत से अम्मां सन्न थीं. वे सुधरेंगी या नहीं, मैं नहीं जानती मगर इतना जरूर जानती हूं कि अम्मां के लिए यह सब किसी प्रलय से कम नहीं था. सोचती हूं इतना ही विरोध अगर छोटे बेटे ने भी कर दिखाया होता तो इस तरह का दृश्य नहीं होता जो अब इस घर का है.

कुछ और दिन बीत गए. 20 साल की पोती धीरेधीरे मुंहजोर होती जा रही है. अपने ढंग से काम करती है और अम्मां का जायज मानसम्मान भी नहीं करती. हर रोज घर में तूतू मैंमैं होती है. बच्चों के खानेपीने में अम्मां की सदा की रोकटोक भला पोती सहे भी क्यों. भाई को पेट भर खिलाती है, कई बार थाली में कुछ छूट जाए तो अम्मां चीखने लगती हैं,  ‘‘कम डालती थाली में तो इतना जाया न होता…’’

‘‘तुम मेरे भाई की रोटियां मत गिना करो अम्मां, बढ़ता बच्चा है कभी भूख ज्यादा भी लग जाती है. तुम्हारी तरह मैं पेट नापनाप कर खाना नहीं बना सकती…’’

‘‘मैं पेट नाप कर खाना बनाती हूं?’’ अम्मां चीखीं.

‘‘क्या तुम्हें नहीं पता? घर में तुम्हीं ने 2 रोटी का नियम बना रखा है न और पेट नाप कर बनाना किसे कहते हैं. तुम्हारी वजह से मेरा बाप मर गया, सांस भी नहीं लेने देती थीं तुम उन्हें. घुटघुट कर मर गया मेरा बाप, अब हमें तो जीने दो. इनसान दिनरात रोटी के लिए खटतामरता है, हमें तो भर पेट खाने दो.’’

अम्मां अब पगलाई सी हैं. सारा राजपाट अब पोती ने छीन लिया है. जरा सी बच्ची एक गृहस्वामिनी बन गई.

‘‘रोती रहती हैं अब अम्मां. सभी को दुश्मन बना चुकी हैं. कोई उन से बात करना नहीं चाहता. पोती को कोसना घटता नहीं. अपनी भूल वह आज भी नहीं मानतीं. 80 साल जी चुकने के बाद भी उन्हें बैराग नहीं सूझता. सब से बड़ा नुकसान उन पंडितों को हुआ है जो अब यज्ञ, हवन के बहाने अम्मां से पूरीहलवा उड़ाने नहीं आ पाते. जब कभी कोई भटक कर आ पहुंचे तो पोती झटक देती है, ‘‘जाओ, आगे जाओ, हमें बख्शो.

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