पुड़िया : राहुल और सुमन का अनचाहा गिफ्ट

लगातार बज रही मोबाइल फोन की घंटी से राहुल जाग गया था, लेकिन तब तक फोन कट चुका था. उस ने मोबाइल देखा, तो सुमन की 12 मिस्ड काल थीं.

अभी पिछली रात ही तो वे दोनों काफी देर तक फोन पर औनलाइन थे, जब सुमन ने कहा था, ‘मैं आखिरी बार पूछ रहीं हूं. अब मेरे पास कोई और रास्ता नहीं है सिवा खुदकुशी कर लेने के या घर छोड़ कर कहीं अनजान जगह जाने के…’

कम शब्दों में ही बहुतकुछ समझा और समझाया जा रहा था. फोन रखने के काफी देर बाद भी राहुल को नींद नहीं आई थी. न जाने कब उस की अभी एक घंटे पहले ही आंख लग गई थी. उस ने सुमन को कोई ऐसीवैसी हरकत न करने को कितना समझाया था, तो क्या सुमन ने सचमुच…

राहुल यह सोच कर ही घबरा उठा था. उस ने नंबर डायल कर दिया. दूसरी तरफ सुमन थी, ‘राहुल, मैं अभी तुम्हारे पास आ रही हूं, सबकुछ छोड़ कर. हम किसी नई अनजान जगह पर चले जाएंगे, जहां हमें कोई भी नहीं जानतापहचानता होगा और वहीं जा कर अपनी एक नई जिंदगी शुरू करेंगे.’

राहुल अवाक सा रह गया. उस के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘नहीं सुमन, हम ऐसा नहीं कर सकते.’’

सुमन ने सुबकते हुए कहा, ‘राहुल, तो इतने साल से तुम मुझे प्यार नहीं करते थे? तुम मुझे सिर्फ अपनी जिस्मानी भूख शांत करने की खुराक समझते रहे. अपना सबकुछ तो तुम्हें दे दिया है. बस एक जान बची है, वह भी दे देती हूं.’

राहुल ने भी रोते हुए कहा, ‘‘नहीं सुमन, मैं ने तुम से सच्चा प्यार किया है, जो हमेशा ही जस का तस बना रहेगा. लेकिन, तुम इस कदर पागलों जैसी न बात करो और न ही ऐसे खयाल पालो. मैं तुम्हें थोड़ी देर में बताता हूं.’’

फोन रखने के बाद राहुल अपने बिस्तर पर निढाल हो गया. उस का सिर लग रहा था मानो फट जाएगा. उस के सामने सबकुछ किसी फिल्म की तरह चलने लगा…

इंटर की कैमिस्ट्री कोचिंग की क्लास में सुमन उस की बैचमेट थी. अल्हड़ सी सुमन एक औसत रंगरूप की लड़की थी. न जाने नोट्स के लेनदेन के बीच या किसी न्यूमैरिकल की गुत्थी सुलझाते हुए कब दोनों के दिल उलझ गए, पता ही नहीं चला.

सबकुछ नौर्मल चल रहा था कि अचानक बोर्ड के इम्तिहान की घोषणा के साथ ही कोचिंग क्लासेस बंद हो गईं और दोनों ने एकदूसरे की अहमियत अपने लिए महसूस की.

इस के बाद उन दोनों ने फोन पर बातें शुरू कर दी थीं, लेकिन अपने भविष्य को ले कर भी वे सजग थे. यही वजह थी कि उन्होंने इंटर का इम्तिहान अच्छे नंबरों से पास किया था.

सुमन ने वहीं अपने शहर के महिला डिगरी कालेज में दाखिला लिया और राहुल ने यूनिवर्सिटी से अपनी आगे की पढ़ाई करने का फैसला लिया. दोनों में सब्र था, एकदूसरे पर अटूट भरोसा था, फिर भी कभीकभार वे दोनों 2-4 दिन में चोरीछिपे मिल लिया करते थे.

अब तो दोनों ने एकदूसरे के घर आनाजाना शुरू कर दिया था. राहुल सुमन के मम्मीपापा से अच्छी तरह घुलमिल चुका था, तो सुमन भी राहुल की मां और बहन निकिता की अच्छी दोस्त बन चुकी थी.

निकिता की शादी के लिए वर की तलाश की जा रही थी, जिस को ले कर दोनों के बीच खूब हंसीमजाक भी चलता रहता था.

कभीकभी ऐसा भी होता था कि घर वाले कहीं बाहर गए हों तो ऐसे में सुमन और राहुल का प्रोग्राम बन जाता था. दोनों समझदार थे. कभी जिस्मानी ताल्लुक का न खयाल आया, न कोशिश की गई किसी तरफ से, मगर वह कहते हैं न कि इस उम्र में इतना उतावलापन होता है कि सबकुछ जान लेने की जल्दी रहती है.

ऐसे ही कोई दिन था, जब उखड़ीउखड़ी सांसों के साथ सुमन राहुल से मिली थी. उस के उठते उभार और सूखे होंठ देख कर राहुल को लगा कि वह प्यासी है और राहुल के होंठ उस के होंठों से जा मिले. इस के बाद तो वह सबकुछ हो गया, जिसे शादी के पहले गलत माना जाता है.

बात आईगई हो गई. जहां राहुल को इस का पछतावा था, वहीं सुमन को सबकुछ सौंपने का सुख महसूस हो रहा था.

आजकल राहुल बहुत सुकून में था, क्योंकि उस की बहन निकिता की

शादी तय हो चुकी थी और लड़का ओएनजीसी में एक अच्छे पद पर था. शादी चूंकि रिश्तेदारी में ही तय हुई थी, इसलिए दहेज का ज्यादा दबाव भी नहीं था.

तभी ‘भैया’ की पुकार सुन कर राहुल का ध्यान भंग हुआ. निकिता चाय का प्याला हाथ में लिए सामने खड़ी थी. इस उलाहने के साथ कि महाराज आजकल बहरे होते जा रहे हैं, मेरे जाने के बाद इन का न जाने क्या होगा.

आमतौर पर राहुल इस का जवाब पलट के दे ही देता था, मगर उस ने कुछ भी नहीं कहा. चाय रखी हुई थी. वह फिर से अपने खयालों में खो गया.

अभी पिछले हफ्ते की ही तो बात है, जब सुमन ने बहुत घबरा कर राहुल से तुरंत मिलने को कहा था. इस खास हिदायत के साथ कि घर के अलावा कहीं दूसरी जगह पर.

सुमन से जब राहुल मिला, तो सुमन बहुत घबराई हुई थी. उस का गला

रुंधा हुआ, मगर उस की आवाज में एक भरोसा था.

सुमन ने बताया कि उस का प्रेग्नेंसी किट से टैस्ट पौजिटिव आया है. इतना सुन कर राहुल को मानो सदमा सा लगा था, फिर भी खुद को संभालते हुए उस ने कहा था, ‘‘घबराओ मत. एक बार फिर से चैक कर लो.’’

दोबारा जांच करने पर भी वही नतीजा आने पर सुमन के सब्र का बांध टूट गया. तब उस ने कहा था, ‘‘राहुल, तुम मुझ से शादी कर लो.’’

‘‘नहीं, ऐसा अभी मैं कैसे कर सकता हूं? अगले महीने ही तो निकिता की शादी है,’’ राहुल बोला.

‘‘मगर, फिर मैं क्या करूं? कहां जाऊं?’’ कह कर सुमन फिर से सुबकने लगी.

राहुल बोला, ‘‘क्या बताऊं, मेरा दिमाग कुछ भी काम नहीं कर रहा.’’

‘‘हां, तुम्हारे दिमाग को वह सब काम तो खूब बढि़या से करने को आता है,’’ सुमन ने ताना मारा. उन दोनों के बीच की बातचीत बेनतीजा निकली.

राहुल ने सुमन का पिछले कई दिनों के बाद कल रात को फोन रिसीव किया था. उसे लगने लगा कि दिमाग की नसें फट जाएंगी, तो वह उस सोच से उबरने की सोचने लगा. जितना वह उसे भूलना चाहता था, उतना ही उस में उलझता जा रहा था.

तभी राहुल को रेलवे स्टेशन के पास वाली पुलिया के नीचे का वह तंबू याद आया, जिस का संचालक कोई चिलमबाज था और खुद को खानदानी हकीम बताता था.

राहुल को मानो किसी काली अंधेरी गुफा के भीतर से सूरज की कोई किरण दिखाई दे गई. वह दिमागी तौर पर अचानक ही बहुत हलकाफुलका महसूस करने लगा था. तुरंत ही वह वहां से समस्या बता कर एक पुडि़या लिए हुए सुमन के घर पहुंच गया.

औपचारिक बातचीत और चाय की चुसकियां लेते हुए राहुल ने वह पुडि़या सुमन के हाथों में पकड़ा दी और इशारेइशारे में उस के सेवन के लिए भी उसे समझा दिया.

पढ़ीलिखी सुमन के दिमाग में कई बार ऐसे किसी झोलाछाप से ली हुई दवा के इस्तेमाल न करने और दिल में समाज और परिवार के लोगों को ले कर ऊहापोह मचती रही, पर आखिरकार समाज का डर ही जीता और सुमन ने उस पुडि़या का चूरन पानी में घोल कर पी लिया.

रात होतेहोते सुमन को खून आना शुरू हो गया. पहलेपहल तो इस पीड़ा के बीच भी सुमन मन ही मन खुश हुई कि दवा सही काम कर गई, मगर समय बीतने के साथ खून रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था और वह अपने कमरे में ही बेहोश हो गई.

उधर राहुल मानो सारी समस्या से बाहर आ चुका था. हालांकि रहरह कर उसे सुमन का खयाल आ ही जाता था. उधर सुमन की मां ने जब बहुत देर तक सुमन की आहट महसूस नहीं की, तो उन्होंने उस के कमरे में जा कर देखा. वहां का सीन देखते ही उन के होश उड़ गए.

सुमन को अस्पताल में भरती कराया गया, जहां डाक्टरों ने सबकुछ साफ कर दिया. अगले दिन सुबह के 10 बजे राहुल का फोन सुमन के नंबर पर आया और सुमन के पिता ने बात की.

सुमन के बारे में सुनते ही राहुल को मानो चक्कर आ गया. सुमन के पिता बहुत सुलझे हुए और समझदार इनसान थे. उन्होंने कोई आक्रामक तेवर नहीं दिखाया था, न ही वे राहुल या सुमन को दोष दे रहे थे. हां, उन के स्वर में चिंता जरूर छिपी थी, जैसा कि लाजिमी भी था. उन के इस बरताव ने राहुल को पछतावा महसूस करने पर मजबूर कर दिया.

राहुल ने अपने पिता से आज औफिस न जाने के लिए कहा और उन को साथ ले कर अस्पताल चला गया. सुमन और राहुल के पिता ने हालात को भांपते हुए यह फैसला किया कि राहुल और सुमन की शादी भी निकिता के ब्याह मंडप में ही कर दी जाएगी.

जीत गई द्रौपदी : एक पत्नी ने खेला गजब का दांव

मैनी गरीब जरूर थी, पर रूप के मामले में बहुत धनवान थी. लंबा शरीर, सुराहीदार गरदन और गोरा रंग. गांव में निकलती तो मनचलों की आंखें उस के उभारों पर टिक जातीं.

गांव में ही रहने वाला मूलन ठाकुर मैनी को देख कर लार गिराता था और हमेशा उस के शरीर को घूरा करता था. और वैसे भी कोई लड़की या औरत मूलन की गंदी नजर से बची नहीं थी.

मैनी भी मूलन की नजर को अच्छी तरह से पहचानती थी. आज तक उस ने खुद को मूलन नाम के कामी मर्द से खुद को बचा कर रखा था.

झोंपड़ी के बाहर साइकिल के खड़खड़ाने की आवाज आई, तो मैनी समझ गई कि उस का मरद ढोला दिनभर आसपास के गांवों में फेरी लगाने के बाद वापस आ गया है. मैनी गुड़ और पानी ले आई.

ढोला खटिया पर बैठ चुका था. गमछे से अपने माथे का पसीना पोंछते हुए उस ने फीकी मुसकराहट से अपनी 7 साल की बेटी बिट्टी को पुचकारा.

बिट्टी किसी खाने वाली चीज की उम्मीद में अपने बापू के हाथों को टटोलने लगी. ढोला ने उसे गोद में उठा कर अपने पास बिठा लिया और उस के सिर पर हाथ फेरने लगा.

मैनी के चेहरे पर नजर जाते ही ढोला की दिनभर की थकान कुछ कम हुई. उस ने गुड़ खाते हुए मैनी का हाथ पकड़ कर उसे पास बिठाने की कोशिश की, पर मैनी उस से दूर छिटकते हुए बोली, ‘‘काहे नहीं और कोई काम करते हैं अब… इस धंधे में हमें अब कोई बरकत नहीं दिखती.’’

मैनी की शिकायत सुन कर ढोला का मुंह लटक गया और वह बोला, ‘‘अरे, अब गांव में भी ये प्लास्टिक के देशी खिलौने कोई नहीं लेता. हर तरफ चीन के बने खिलौने पहुंच गए हैं. विदेशी के सामने देशी खिलौने की क्या औकात…’’

‘‘तो काहे नहीं हमें अपने साथ ले कर चलते हो… गांव के लोग एक औरत को फेरी लगाते देख कर उस की खूबसूरती निहारेंगे तो ज्यादा सामान खरीदेंगे,’’ मैनी ने अपने बड़े उभारों

को थोड़ा सा उचकाते हुए कहा और मुसकराने लगी.

ढोला साइकिल पर बच्चों के खिलौने लाद कर फेरी लगाता था. दिनभर कई किलोमीटर साइकिल चला लेने के बाद भी रोजाना 50-60 रुपए ही कमा पाता था, जो उस के 3 लोगों के परिवार को चलाने के लिए बहुत कम थे.

हालांकि ढोला के पास जमीन का एक छोटा टुकड़ा भी था, जिस में वह बड़ी मेहनत से खेती करता था, पर खेतीकिसानी भी बिना संसाधनों के कहां पनपती है?

बड़ी मुश्किल से थोड़ाबहुत गेहूं पैदा हुआ था इस बार. ढोला के खेत में लगी हुई बालियां सुनहरी हो चुकी थीं. ढोला और मैनी के मन में संतोष था कि चलो गेहूं की फसल होने के चलते उन को भूखा तो नहीं रहना पड़ेगा.

ढोला खुश था कि अब वह अपने लिए देशी शराब की बोतल भी लाएगा. सालभर हो गया है और हलक के नीचे शराब की एक बूंद भी नहीं उतरी है.

रात में ढोला मैनी के पास लेटा तो प्यार जताता हुआ बोला, ‘‘बस मैनी, कुछ दिन की बात और है. एक बार फसल बिक जाए तो हमारी सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी और फिर हम यह काम छोड़ कर दुकान कर लेंगे.’’

उन दोनों की आंखों में एक सुनहरा भविष्य करवट ले रहा था.

अगली सुबह जब ढोला खेत की तरफ जाने लगा, तो उस की नजर अपने खेत से उठते धुएं की तरफ गई. किसी खतरे के डर से उस का कलेजा मुंह को आने लगा. वह पूरी ताकत लगा कर दौड़ते हुए खेत के पास पहुंचा.

ओह, यह क्या… ढोला की नजरों के सामने ही पूरी फसल राख हुई जा रही थी और वह सिर्फ खड़े हो कर देखने के अलावा कुछ नहीं कर सकता था.

जरूर गांव के किसी आदमी ने ही ढोला से अपनी दुश्मनी निकाली है, पर भला गरीब ढोला से किसी को क्या परेशानी हो सकती थी? यह सवाल बारबार ढोला के मन को कचोटे जा रहा था. उसे रोना आ रहा था, पर रोते भी नहीं बन रहा था.

अब न तो ढोला दारू पी पाएगा और न ही घर के लिए तेल, गुड़ वगैरह खरीद पाएगा… सोचविचार के सांप एक के बाद उसे डसे जाते थे.

फसल जल गई थी. घर में जो राशन बचा था, वह ज्यादा से ज्यादा एक हफ्ते और चल सकता था. इस के बाद तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी… फिर क्या करेगा ढोला? किसी तरह से अपनी पत्नी और बेटी का पेट तो भरना ही है उसे.

इसी सोचविचार में अपने मुंह को लटकाए ढोला घर की तरफ जाता था

कि तभी गांव में रहने वाला बिरजू

उसे देख कर बोला, ‘‘काहे परेशान हो ढोला भाई?’’

ढोला ने उसे अपनी आपबीती कह सुनाई, तो बिरजू बोला, ‘‘तो इस में परेशानी की क्या बात है… मूलन ठाकुर की हवेली पर जुआ चलता है. 10 रुपए की चाल के बदले कोई भी 100 रुपए तक जीत सकता है… और, साथ ही साथ मूलन ठाकुर कभीकभी सब को दारू भी पिलाता है.’’

मुफ्त की दारू का नाम सुनते ही ढोला के मन में दारू पीने की इच्छा जाग गई. फसल तो जाती रही क्यों न चल कर मूलन ठाकुर के यहां जुआ खेल लिया जाए. 10 के बदले 100 रुपए मिलेंगे. 2-3 बार पैसे लगा दिए तो वह मतलब भर का पैसा जीत जाएगा.

ढोला का मन मचल गया, पर दुविधा यह थी कि एक बार दांव लगाने के लिए कम से कम 10 रुपए तो चाहिए थे.

‘10 रुपए तो मैनी आराम से दे सकती है,’ यही सोच कर ढोला लंबे कदमों से घर की ओर बढ़ गया. दरवाजे पर पहुंचा ही था कि अंदर से मैनी के रोने की आवाज ढोला के कानों तक टकराई. फसल में आग लग जाने की बात मैनी तक पहले ही पहुंच चुकी थी.

ढोला ने मैनी को ज्ञान देते हुए कहा, ‘‘जो हो गया है, उस पर दुख करने से क्या फायदा. अब आगे की सोचो और एक महीने पहले जो 10 रुपए मैं ने

तुम्हें दिए थे, वे मुझे ला कर दे दो.

हो सकता है, मैं इस के 10 गुना पैसे ले कर लौटूं…’’

‘‘पर, वे पैसे तो मैं ने चावल लाने के लिए रखे हैं. बिट्टी कई दिन से भात मांग रही है.’’

मैनी ने बहुत नानुकर की, पर भला पति के सामने उस की क्या चलती. थकहार कर मैनी को 10 रुपए ढोला को देने ही पड़े.

मूलन ठाकुर के दरवाजे पर महफिल लगी हुई थी. कई आदमी जुआ खेलने में मसरूफ थे और ठाकुर एक तरफ कुरसी पर बैठा मजे ले रहा था. बीचबीच में नौकर शराब और पकौड़ी ले कर आता और मेज पर रख कर चला जाता.

ढोला को देख कर मूलन ठाकुर के चेहरे पर एक शैतानी मुसकराहट दौड़ गई, ‘‘आओ ढोला, आओ. आज तुम भी अपनी किस्मत आजमाओ… तुम्हारी फसल नहीं रही तो क्या हुआ, यह खेल ही तुम्हारे सब खर्चे पूरे कर देगा.’’

ढोला ने 10 रुपए का नोट रख कर दांव लगाया और पहला दांव वह जीत गया. अब उस के हाथ में 100 रुपए आ गए. ‘कौन कहता है कि पैसे कमाना मुश्किल है,’ ढोला मन ही मन सोच रहा था.

इस के बाद ढोला एक के बाद एक कई दांव जीत चुका था. पूरे 500 रुपए थे उस की मुट्ठी में. उसे जीतता देख कर मूलन ठाकुर भी खेल में शामिल हो गया और फिर पता नहीं क्या हुआ कि ढोला अपनी जीती हुई सारी रकम हार बैठा और खाली हाथ घर पहुंचा.

मैनी को सारी बात बताई, तो वह बिफर पड़ी, ‘‘बिटिया भात मांग रही है और घर में अब कुछ नहीं है. क्या खिलाऊं उसे? और तुम तो फेरी पर नहीं जा रहे… मैं क्या खिलाऊंगी बिट्टी को अब…’’ शराब के नशे में डूबे ढोला को अब कोई बात नहीं समझ में आ रही थी. बिस्तर पर लेटते ही वह नींद से घिर गया.

अगली सुबह जब ढोला जागा, तो उस के मन में जुए की हार को जीत में बदलने की बात चल रही थी. वह घर से मूलन ठाकुर की हवेली की ओर बढ़ चला कि मैनी की आवाज आई, ‘‘बिट्टी के लिए घर में कुछ खाने को नहीं है. क्या करूं?’’

ढोला ने मैनी को यकीन दिलाया कि आज चाहे कुछ भी हो जाए, वह पैसे ले कर ही घर लौटेगा.

जुए का इतिहास बहुत पुराना है और इस बात की गवाही देता है कि जुए के खेल में औरत की आन बहुत जल्दी दांव पर लग जाती है.

ढोला आज भी पहले तो खूब पैसे जीता और फिर बाद में हारने लगा. जब उस के पास कुछ नहीं बचा, तो उस ने अपना खेत दांव पर लगा दिया और फिर खेत भी बहुत आसानी से हारने के बाद उस ने मैनी के गहने दांव पर लगा दिए और गहने भी हार बैठा.

ढोला खेल से उठ गया था, क्योंकि मूलन ठाकुर ने उसे पत्नी के सारे गहने और खेत के कागज ला कर सौंपने को कहा था.

मैनी सन्न रह गई थी कि आज ढोला यह क्या कर आया है. खेत तक हार गया. अब तक वे गरीबी की मार ही झेल रहे थे, पर अब उन्हें भुखमरी भी झेलनी पड़ेगी.

पर क्या कर सकती थी वह अकेली औरत? ढोला के सामने उस की एक न चली. ढोला ने उस के गहने और खेत के कागज छीन लिए और ठाकुर को सौंपने के लिए चल दिया.

देर रात तक जब ढोला घर वापस नहीं आया, तब मैनी उसे खुद ही ढूंढ़ने चल दी.

मैनी जानती थी कि इस समय ढोला कहां पर होगा, इसलिए वह सीधा मूलन के घर जा पहुंची और एक कोने में खड़े हो कर खेल देखने लगी.

ढोला लगातार हार रहा था और ऐसा लग रहा था कि मूलन ठाकुर किसी बुरी नीयत से ढोला को जुआ खेलने के लिए उकसाए जा रहा था.

मैनी ने मन ही मन काफीकुछ सोचा और ठाकुर के सामने आ कर इठलाते हुए बोली, ‘‘ठाकुर साहब, वैसे तो हमारा पसंदीदा खेल गुल्लीडंडा है, पर मेरा ढोला अब थका हुआ लग रहा है, इसलिए आप को एतराज न हो, तो मैं अपने मरद की जगह जुआ खेलूंगी.’’

मूलन ठाकुर ने मैनी को ऊपर से नीचे की तरफ घूरा और अपनी जांघ पर हाथ मार कर जोरजोर से हंसने लगा, ‘‘तू आना ही चाहती है तो आ जा. तेरे साथ तो मजा ही आएगा.’’

ठाकुर की बात के जवाब में मैनी ने कमर मचकाई और पास आ कर बैठ गई.

‘‘हां तो मैनी, बोलो दांव पर क्या लगाती हो?’’ मूलन ठाकुर ने पूछा.

‘‘एक औरत का सब से बड़ा धन तो उस के जेवर होते हैं. मैं इन्हें ही दांव पर लगा सकती थी, पर वे तो मेरा मरद पहले ही हार चुका है और बाकी की कसर उस ने खेत हार कर पूरी कर

दी है.’’

‘‘अरे अब क्या है तेरे पास? और अगर कुछ नहीं बचा तो अपनेआप को भी दांव पर लगा दे. तुझे द्रौपदी बनने का मौका दे रहा हूं. अगर तू हारी तो तेरे बदन पर मेरा हक होगा, तू मेरी रखैल बन कर रहेगी. लगा दे अपने को दांव पर और बन जा द्रौपदी,’’ मूलन ने एक बार फिर अपनी जांघ पर अपना हाथ मारते हुए कहा.

कुछ देर तक मैनी शांत रहने की ऐक्टिंग करती रही और फिर बोली, ‘‘मैं अपनेआप को दांव पर लगा तो दूं, पर मेरी यह शर्त होगी कि मेरे जिस्म पर जीतने वाले का हर तरीके से हक होगा, लेकिन मेरे जेवर और खेत मुझे वापस करने होंगे.’’

मूलन को इस समय सिवा मैनी को जीत कर अपनी रखैल बना कर उस के जिस्म को भोग लेने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था, इसलिए उस ने मैनी को तुरंत ही उस के जेवर और खेत लौटा देने की हामी भर ली और अब मैनी ने खुद को दांव पर लगा दिया.

मूलन ने जबरदस्त चाल चली और बड़े आराम से दांव जीत गया. मैनी खुद को जुए में हार गई थी और अब वह मूलन ठाकुर की रखैल हो गई थी.

ढोला को अपनी पत्नी का इस तरह से रखैल हो जाना कुछ अजीब सा लग रहा था, इसलिए वह मैनी से शिकायत करने लगा, जिस के बदले में मैनी ने उसे जवाब दिया, ‘‘तुम ने मेरे गहने और खेत जुए में हार कर यह पक्का कर दिया था कि हम आज नहीं तो कल मर ही जाएंगे, पर मैं ने जुए में खुद को हार कर तुम्हें अहसास कराया है कि तुम गलती करने जा रहे थे…’’

मैनी ने ढोला से यह भी कहा कि जुए में जो आदमी अपनी पत्नी के गहने और खेत दांव पर लगा सकता है, वह कल अपनी पत्नी को भी जुए में हार सकता है, इसलिए ढोला को सजा के तौर पर अकेले ही जिंदगी काटनी होगी, जबकि उस की बेटी मैनी के साथ रहेगी.

मैनी यह बात अच्छी तरह जानती थी कि ढोला की माली हालत इस लायक नहीं रह गई थी कि वह अपनी बेटी को दोनों समय का खाना खिला सके, इसलिए उस ने अपने दिमाग का इस्तेमाल किया और एक तरह से अपने पति ढोला और बिट्टी की जिंदगी की हिफाजत भी की.

भोजपुरी एक्ट्रेस श्वेता शर्मा ने डांस में किया सपना चौधरी को फेल, हरियाणवी गाने पर लगाए ठुमके

भोजपुरी जगत की जानी मानी एक्ट्रेस श्वेता शर्मा अपने टैलेंट से लोगों का दिल जीत लेती हैं, उनकी हर एक अदा पर फैंस फिदा हैं. श्वेता शर्मा की अदाएं बेहद ही कातिलाना है. उनके डांस पर तो लोग दिल दें बैठते हैं. वही, श्वेता शर्मा की बोल्डनेस की बात करें तो वे नम्रता मल्ला को भी टक्कर देती है और डांस में इस बार सपना चौधरी को मात दी हैं. जी हां, श्वेता शर्मा का एक वीडियो खूब वायरल हो रहा हैं. जिसमें वे हरियाणवी गानें पर थिरकी हुई नजर आ रही हैं.

 

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आपको बता दें कि एक्ट्रेस ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को अपडेट करते हुए एक वीडियो शेयर किया हैं. जसमें वे जमकर डांस कर रही हैं. श्वेता शर्मा ने हरियाणवी गाने पर अपना जलवा दिखाया हैं. श्वेता शर्मा का ये क्लिप इंटरनेट पर आग की तरह फैल रहा है. श्वेता शर्मा के इस रील पर लोग जमकर रिएक्ट कर रहे हैं. इस क्लिप पर एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा, ‘सपना चौधरी को फेल कर दिया.

 

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भोजपुरी की क्वीन श्वेता शर्मा सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. श्वेता शर्मा अक्सर अपने फैंस के साथ तस्वीरें और वीडियोज शेयर करती रहती हैं. श्वेता शर्मा के पोस्ट पर लोग जमकर रिएक्ट कर रहे हैं. श्वेता शर्मा ने कई भोजपुरी म्यूजिक वीडियो में अपना जलवा बिखेरा है. बताते चलें कि श्वेता शर्मा बोल्ड फिगर की मालकिन हैं. श्वेता शर्मा अपने फिगर को मेंटेन करने के लिए जिम में कड़ी मेहनत करती हैं.

करण कुंद्र ने तेजस्वी प्रकाश पर यूं लुटाया प्यार, ब्रेकअप की खबरों पर लगाई चुप्पी

टीवी जगत की हिट जोड़ी तेजस्वी प्रकाश और करण कुंद्रा काफी लंबे सयम से एक दूसरे को डेट कर रहे है, दोनों की कभी साथ पब्लिक में स्पॉट होना, तो कभी ब्रेकअप की खबरों का आना मीडिया की सुर्खियों में छाया रहता हैं. वहीं, दोनों की मुलाकात बिग बौस 14 से शुरु हुई. इस स्टार कपल का प्यार का रिश्ता अभी तक बरकरार है. जिसका एक वाक्य हाल ही में देखने को मिला हैं. करण ने सोशल मीडिया पर एक साथ अपनी वीडियो शेयर की हैं. जिस पर लोग दिल खोलकर प्यार लुटा रहे हैं.

 

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आपको बता दें कि अक्सर इस स्टार कपल की ब्रेकअप की खबरें उड़ती रहती हैं. कुछ वक्त पहले भी रिपोर्ट्स सामने आई थीं कि इन दोनों के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है. हालांकि इन रिपोर्ट्स पर दोनों ही सितारों की क्यूट बॉन्डिंग ने ठंडा पानी डाल दिया था. अब एक बार फिर ये स्टार कपल एक साथ नजर आया है.

करण कुंद्रा ने खुद एक प्यारा वीडियो सोशल मीडिया साइट इंस्टास्टोरी पर शेयर कर फैंस का दिल जीत लिया है. इस वीडियो में दोनों स्टार्स सुकून के पल साथ बिताते दिख रहे हैं. सामने आए वीडियो में करण कुंद्रा और तेजस्वी प्रकाश क्यूट अंदाज में एक दूसरे पर प्यार लुटाते दिख रहे हैं. जिसके बाद ये वीडियो टीवी एंटरटेनमेंट न्यूज की दुनिया में आग की तरह वायरल हो रहा है. जिस कई फैंस ने जमकर कमेंट्स किए हैं.

 

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करण कुंद्रा और तेजस्वी प्रकाश के इस वीडियो पर कमेंट कर एक यूजर ने लिखा, ‘आखिरकार दोनों साथ आ गए.’ जबकि, एक यूजर ने कमेंट कर लिखा, ‘लंबे वक्त बाद दोनों को साथ देखा है.’ तो एक यूजर ने इनका लवी-डवी मूड देखकर लिखा, ‘ये सब घर जाकर करो.’ वहीं, कई यूजर्स अपने फेवरेट कपल को बुरी नजर से बचाते दिखे.

मेरे घरवाले मेरी शादी लड़की से कराना चाहते हैं पर मैं एक लड़के से प्यार करता हूं, मैं क्या करूं?

सवाल-

मेरी उम्र 25 साल है. मेरे घर वाले एक ऐसी लड़की के साथ मेरी शादी कराना चाहते हैं, जो मुझे पसंद नहीं है. हकीकत तो यह है कि मैं किसी भी लड़की को पसंद नहीं करता हूं, बल्कि एक हमउम्र लड़के के साथ मेरी गहरी दोस्ती है या कह लें कि हम दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं. घर वालों को मनाने के लिए मैं क्या करूं?

जवाब-

आप घर वालों को साफसाफ बता दें कि आप शादी नहीं कर सकते और क्यों नहीं कर सकते, यह भी बता दें, क्योंकि आप का राज ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह पाएगा. बताने के बाद का विरोध झेलने के लिए खुद को दिमागी तौर  पर तैयार रखें. पहले आप को नसीहतें मिलेंगी और उस के बाद धौंस.

मुमकिन है कि इस के बाद भी आप नहीं माने, तो आप को घर और समाज से भी निकाला जा सकता है. घर वालों के दबाव में शादी न करें. इस से आप की और जिस लड़की से आप शादी करेंगे, उस की भी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. अपने दोस्त के साथ अलग रहने के अलावा आप के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें-  सरस सलिल-व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

सेक्स से जुड़ी बीती बातें पार्टनर को बताने से पहले पढ़ें ये खबर

क्या आपके पार्टनर को पता है कि आप आखिरी बार किसके साथ हमबिस्तर हुईं थीं? इससे भी प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या उन्हें यह जानने की जरूरत है? ये दो महत्वपूर्ण सवाल हैं, जिनको लेकर महिलाओं (और पुरुष) के मन में अपने वर्तमान पार्टनर के साथ एक अच्छा सेहतमंद भावनात्मक और सेक्शुअल रिश्ता बनाए रखने के लिए खींचतान लगी रहती है.

क्या आपको अपने पार्टनर से सच्ची बातचीत के लिए अपने अतीत की सारी बातें उनके सामने खोलकर रख देनी चाहिए? या फिर अपने रिश्ते को खुशहाल बनाए रखने के लिए चुनकर बातें बतानी चाहिए? हमने काउंसलर्स और थेरैपिस्ट्स से बात की, ताकि आप दोनों स्थितियों में से चुनाव कर सकें.

शुरू से सच्ची रहें

रीमा शाह, क्लीनिकल साइकोलौजिस्ट, पुणे, कहती हैं,“शुरू से ही सच्चे रहना सबसे उपयुक्त है. आपका अतीत आपका हिस्सा है और उसके बारे में शर्मिंदा होने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है. यदि आपके पार्टनर को आपके अतीत से परेशानी है तो कम से कम आप शुरू से ही सबकुछ सोच-समझकर फैसला ले सकती हैं.”

जरूरत हो तभी कहें

डॉ मोहित शाह, कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट और साइकोथेरैपिस्ट, अनलिमिटेड पोटेंशियलिटीज, मुंबई, सचेत करते हैं,“आपको अपनी सेक्शुअल हिस्ट्री तभी शेयर करनी चाहिए, जब आपका पार्टनर सुनना चाहता हो. और अपनी बातें संक्षिप्त ही रखें. ‘अद्भुत’ या ‘लाजवाब’ जैसे शब्दों का प्रयोग न करें और अपनी अतीत की सेक्शुअल परफौमसेंस को लेकर शेखी न बघारें.”

कुछ बातों के लिए कहें ‘ना’

वहीं दूसरी ओर मुंबई की सीनियर कंसल्टेंट साइकियाट्रिस्ट और थेरैपिस्ट, माइंडफ्रेम्स की डॉ शेफाली बत्रा का कहना है,“किसी भी रिश्ते के लिए संवाद बेहद अहम होता है; यह सलाह देना कि पार्टनर्स एक-दूसरे से चीजें छिपाएं, बिल्कुल गलत होगा, लेकिन बात जब सेक्शुअल हिस्ट्री की हो तो कुछ बातें हैं, जिन्हें न कहना ही बेहतर होगा. क्योंकि इससे आपको कोई फायदा नहीं होता. इसका मतलब यह नहीं कि आप झूठ कहें. पर अपने सेक्शुअल अतीत का पूरा बायो डेटा खोलकर रख देना भी कोई विकल्प नहीं है.”

पार्टनर और दोस्त में अंतर होता है

डॉ बत्रा इस ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि अपने पार्टनर के साथ अपनी सेक्शुअल उपलब्धियों के बारे में बात करना, दोस्तों के सामने अपनी जीत का परचम लहराने से बिल्कुल अलग है. “दोस्तों के बीच आप अपने पूर्व प्रेमियों, सेक्शुअल पोजिशन्स इत्यादि के बारे में बातचीत कर सकती हैं, लेकिन कपल्स में यह पूरी तरह से आप दोनों के संवेदनशीलता और परिपक्वता पर निर्भर करता है. और यहां तक कि जो जोड़े बहुत करीब होते हैं, उनमें भी जलन की भावना होती है. इससे कोई फर्क़ नहीं पड़ता कि आप कितनी खुली सोच रखती हैं, असल में तो आप इंसान ही हैं और जलन महसूस करना स्वाभाविक है.

अतीत के सेक्शुअल अनुभवों की बातें करना आपके रिश्ते के बीच शक और द्वेष के बीज बोएगा. इसके अलावा, परिपक्व जोड़ों को इस तरह के सवाल पूछने ही नहीं चाहिए, क्योंकि कौन अतीत में रहना पसंद करेगा?” पूछती हैं डॉ बत्रा. “यह बिल्कुल निरर्थक बातचीत है, जो आपके रिश्ते को नुक़सान पहुंचा सकती है. यह तो ऐसा हुआ कि आप अपने पार्टनर से कह रही हों कि आपके भूतपूर्व प्रेमी का पीनिस उनके से बड़ा था-अब जब भी आप दोनों सेक्स करेंगे, तब उनके दिमाग में यह बात गूंजेगी कि उनका पीनिस उतना बड़ा नहीं कि वे आपको संतुष्ट कर सकें,” वे आगे जोड़ती हैं.

लेकिन यदि शेयर करना ही पड़े तो…

और हो सकता है कि जिज्ञासा हमारे कमजोर मानवीय दिमाग पर हावी हो जाए. अतः यदि आपको लगता है कि आप या आपके पार्टनर अपनी सेक्शुअल हिस्ट्री एक-दूसरे से बांटना चाहते हैं तो काउंसलर्स का कहना है कि आपको पहले खुद सचेत होना होगा. खुद से पूछें कि क्या आप तैयार हैं अपने पार्टनर द्वारा साझा की गई बातों को सुनने के लिए या क्या वे आपकी बातें सुन पाएंगे? डॉ बत्रा कहती हैं,“मैं सेक्शुअल हिस्ट्री को एक हौरर फिल्म मानती हूं-आपको लगता है कि आप इसे झेल सकती हैं, लेकिन बाद में रातों की नींद उड़ जाती है. और वह भी किसी अच्छी वजह से नहीं.”

सीधा और स्पष्ट

सीधे दो टूक बात करने में विश्वास रखती हैं तो इन नियमों का पालन करें:

  • याद रखें कि आप अपने अतीत की सेक्शुअल बातें अस्पष्ट तौर पर ग़ुस्से में सज़ा देने के लिए न कह रही हों. इस तरह की मानसिक लड़ाई आपके रिश्ते को नुकसान पहुंचा सकती है.
  • यदि वे आपके खट्टे-मीठे सेक्शुअल अनुभवों के बारे में पूछ रहे हों तो इसके पीछे की उनकी भावना को समझें. आपको लगता है कि इससे समस्याएं बढ़ जाएंगी तो महत्वपूर्ण पहलुओं को शेयर करने से इनकार कर दें. जरूरत हो तो थेरैपिस्ट की मदद लें.
  • यदि आप दोनों की सहमति से यह निर्णय लिया गया है तो इसके लिए सही समय चुनें. रात के डिनर के वक्त इस पर बात करें, ताकि आपके पास पूरी प्राइवसी हो.
  • पहले से सीमाएं तय कर लें, ताकि आप जिन बातों को शेयर करने में सहज हैं, केवल वही बातें करें.
  • याद रखें कि आप दोनों एक-दूसरे को कठोरता से जज न करें. एक-दूसरे को अपने अतीत में प्रवेश करने का मौका दें और अच्छे भविष्य की ओर आगे बढ़ें.

गियर वाली साइकिल : विक्रम साहब की दरियादिली

‘टनटनटन…’ साइकिल की घंटी बजती तो दफ्तर के गार्ड विक्रम साहब की साइकिल को खड़ी करने के लिए दौड़ पड़ते. विक्रम साहब की साइकिल की इज्जत और रुतबा किसी मर्सडीज कार से कम न था.

विक्रम साहब ठसके से साइकिल से उतरते. अपने पाजामे में फंसाए गए रबड़ बैंड को निकाल कर उसे दुरुस्त करते, साइकिल पर टंगा झोला कंधे पर टांगते और गार्डों को मुन्नाभाई की तरह जादू की झप्पी देते हुए अपनी सीट की तरफ चल पड़ते.

विक्रम साहब एक अजीब इनसान थे. साहबी ढांचे में तो वे किसी भी एंगल से फिट नहीं बैठते थे या यों कहें कि अफसर लायक एक भी क्वालिटी नहीं थी उन में. न चाल में, न पहनावे में, न बातचीत में, न स्टेटस में. 90 हजार रुपए महीना की तनख्वाह उठाते थे विक्रम साहब, पर अपने ऊपर वे 2 हजार रुपए भी खर्च न करते थे. दाल, चावल, सब्जी, रोटी खाने के अलावा उन्होंने दुनिया में कभी कुछ नहीं खाया था. अपने मुंह से तो यह सब वे बताते ही थे, उन के डीलडौल को देख कर लगता भी यही था कि उन्होंने रूखी रोटी और सूखी सब्जी के अलावा कभी कुछ खाया भी नहीं होगा.

काग जैसा रूप था उन का, पर अपनी बोली को उन्होंने कोयल जैसी मिठास से भर दिया था. औरतों के तो वे बहुत ही प्रिय थे. मर्द होते हुए भी औरतें उन से बेझिझक अपनी निजी बातें शेयर कर सकती थीं. उन्हें कभी नहीं लगता था कि वे अपने किसी मर्द साथी से बात कर रही हैं. लगता था जैसे अपनी किसी प्रिय सखी से बातें कर रही हैं. उन्हें विक्रम साहब के चेहरे पर कभी हवस नहीं दिखती थी.

दफ्तर में 10 मर्दों के साथ 3 औरतें थीं. बाकी 7 के 7 मर्द विक्रम साहब की तरह औरतों में लोकप्रिय बनने के अनेक जतन करते, पर कोई भी कामयाब न हो पाता था.

विक्रम साहब सीट पर आते ही सब से पहले डस्टर ले कर अपनी मेज साफ करने लगते थे, फिर पानी का जग ले कर वाटर कूलर की तरफ ऐसे दौड़ लगाते थे जैसे अपने गांव के कुएं से पानी भरने जा रहे हों.

चपरासी शरमाते हुए उन के पीछे दौड़ता, ‘‘साहब, आप बैठिए. मैं पानी लाता हूं.’’

विक्रम साहब उसे मीठी डांट लगाते, ‘‘नहीं, तुम भी मेरी तरह सरकारी नौकर हो. तुम को मौका नहीं मिला इसलिए तुम चपरासी बन गए. मुझे मौका मिला इसलिए मैं अफसर बन गया. इस का मतलब यह नहीं है कि तुम मुझे पानी पिलाओगे. तुम्हें सरकार ने सरकारी काम के लिए रखा है और पानी या चाय पिलाना सरकारी काम नहीं है.’’

विक्रम साहब के सामने के चारों दांत 50 की उम्र में ही उन का साथ छोड़ गए थे. लेकिन कमाल था कि अब 59 साल की उम्र में भी उन के चश्मा नहीं लगा था.

दिनभर लिखनेपढ़ने का काम था इसलिए पूरा का पूरा स्टाफ चश्मों से लैस था. एक अकेले विक्रम साहब नंगी आंखों से सूई में धागा भी डाल लेते थे.

फुसरत के पलों में जब सारे लोग हंसीमजाक के मूड में होते तो विक्रम साहब से इस का राज पूछते, ‘‘सर, आप के दांत तो कब के स्वर्ग सिधार गए, पर आंखों को आप कौन सा टौनिक पिलाते हैं कि ये अभी भी टनाटन हैं?’’

विक्रम साहब सब को उलाहना देते, ‘‘मैं तुम लोगों की तरह 7 बजे सो कर नहीं उठता हूं और फिर कार या मोटरसाइकिल से भी नहीं चलता हूं. मैं दिमाग को भी बहुत कम चलाता हूं, केवल साइकिल चलाता हूं रोज 40 किलोमीटर…’’

विक्रम साहब के पास सर्टिफिकेटों को अटैस्ट कराने व करैक्टर सर्टिफिकेट बनाने के लिए नौजवानों की भीड़ लगी रहती थी. बहुत से गजटेड अफसरों के पास मुहर थी, पर वे ओरिजनल सर्टिफिकेट न होने पर किसी की फोटोकौपी भी अटैस्ट नहीं करते थे. डर था कि किसी गलत फोटोकौपी पर मुहर व दस्तखत न हो जाएं.

लेकिन विक्रम साहब के पास कोई भी आता, उन की मुहर हमेशा तैयार रहती थी उस को अटैस्ट कर देने के लिए. वे कहते थे, ‘‘मेरी शक्ल अच्छी तरह याद कर लो. जब तुम डाक्टर बन जाओगे तो मैं अपना इलाज तुम्हीं से कराऊंगा.’’

नौजवानों के वापस जाते ही वे सब से कहते, ‘‘ये नौजवान ऐसे ही बेरोजगारी का दंश झोल रहे हैं. फार्म पर फार्म भरे जा रहे हैं. हम इन्हें नौकरी तो नहीं दे सकते हैं, पर कम से कम इन के सर्टिफिकेट को अटैस्ट कर के इन का मनोबल तो बढ़ा ही सकते हैं.’’

सब उन की सोच के आगे खुद को बौना महसूस कर अपनेअपने काम में बिजी होने की ऐक्टिंग करने लगते.

विक्रम साहब में गुण ठसाठस भरे हुए थे. वे कभी किसी पर नहीं हंसते थे, दुनिया के सारे जुमलों को वे खुद में दिखा कर सब का मनोरंजन करते थे.

विक्रम साहब जिंदादिली की मिसाल थे. दफ्तर में हर कोई हाई ब्लडप्रैशर की दवा, कोई शुगर की टिकिया, कोई थायराइड की टेबलेट खाखा कर अपनी जिंदगी को तेजी से मौत के मुंह में जाने से थामने की कोशिश में लगा था, पर विक्रम साहब को इन बीमारियों के बारे में जानकारी तक नहीं थी. उन्हें कभी किसी ने जुकाम भी होते नहीं देखा था.

विक्रम साहब चकरघिन्नी की तरह दिनभर काम के चारों ओर चक्कर काटा करते थे. वे अपने अलावा दूसरों के काम के बोझ तले दबे रहते थे. सारा काम खत्म करने के बाद शाम 5 बजे वे लंच के लिए अपने झोले से रोटियां निकालते थे.

यों तो विक्रम साहब की कभी किसी से खिटपिट नहीं होती थी लेकिन आखिर थे तो वे इनसान ही. बड़े साहब के अडि़यल रवैए ने उन को एक बार इतना खिन्न कर दिया था कि उन्होंने अपनी सीट के एक कोने में हनुमान की मूरत रख ली थी और डंके की चोट पर ऐलान कर दिया था, ‘‘जब एक धर्म वालों को अपने धार्मिक काम पूरे करने के लिए दिन में 2-2 बार काम बंद करने की इजाजत है तो उन को क्यों नहीं? उन के यहां त्रिकाल संध्या का नियम है. वे दफ्तर नहीं छोड़ेंगे त्रिकाल संध्या के लिए, लेकिन दोपहर की संध्या के लिए वे एक घंटा कोई काम नहीं करेंगे.’’

विक्रम साहब के इस सवाल का किसी के पास कोई जवाब नहीं था. दफ्तर में धर्म के नाम पर सरकारी मुलाजिम समय का किस तरह गलत इस्तेमाल करते हैं, इस का गुस्सा सालों से लोगों के अंदर दबा पड़ा था. विक्रम साहब ने उस गुस्से को आवाज दे दी थी.

महीने के तीसों दिन रात के 8 बजे तक दफ्तर खुलता था. रोटेशन से सब की ड्यूटी लगती थी. इस में तीनों औरतों को भी बारीबारी से ड्यूटी करनी पड़ती थी.

रात 8 बजे तक और छुट्टियों में ड्यूटी करने में वे तीनों औरतें खुद को असहज पाती थीं. उन्होंने एक बार हिम्मत कर के डायरैक्टर के सामने अपनी समस्या रखी थी.

डायरैक्टर साहब ने उन्हें टका सा जवाब दिया था, ‘‘जब आप ऐसी छोटीमोटी परेशानी भी नहीं उठा सकतीं तो नौकरी में आती ही क्यों हैं?’’

साथी मर्द भी उन औरतों पर तंज कसते, ‘‘जब आप को तनख्वाह मर्दों के बराबर मिल रही है तो काम आप को मर्दों से कम कैसे मिल सकता है?’’

लेकिन विक्रम साहब के आने के बाद औरतों की यह समस्या खुद ही खत्म हो गई थी. वे पता नहीं किस मिट्टी के बने थे, जो हर रोज रात के 8 बजे तक काम करते और हर छुट्टी के दिन भी दफ्तर आते थे.

6 बजते ही वे तीनों औरतोें को कहते, ‘‘आप जाएं अपने घर. आप की पहली जिम्मेदारी है आप का परिवार. आप के ऊपर दोहरी जिम्मेदारियां हैं. हमारी तरह थोड़े ही आप को घर जा कर बनाबनाया खाना मिलेगा.’’

विक्रम साहब की इस हमदर्दी से सारे दूसरे मर्द कसमसा कर रह जाते थे.

विक्रम साहब न तो जवान थे, न हैंडसम और न ही रसिकमिजाज, इसलिए औरतों के प्रति उन की इस दरियादली पर कोई छींटाकशी करता तो लोगों की नजर में खुद ही झूठा साबित हो जाता.

विक्रम साहब की इस दरियादिली का फायदा धीरेधीरे किसी न किसी बहाने दूसरे मर्द साथी भी उठाने लगे थे.

विक्रम साहब जब सड़क पर साइकिल से चलते तो वे एक साधारण बुजुर्ग से नजर आते थे. कोई साइकिल चलाने वाला भरोसा भी नहीं कर सकता था कि उन के बगल में साइकिल चला रहा यह आदमी कोई बड़ा सरकारी अफसर है.

‘वर्ल्ड कार फ्री डे’ के दिन कुछ नेता व अफसर अपनीअपनी कारें एक दिन के लिए छोड़ कर साइकिल से या पैदल दफ्तर जाने की नौटंकी करते हुए अखबारों में छपने के लिए फोटो खिंचवा रहे थे. विक्रम साहब के पास कुछ लोगों के फोन भी आ रहे थे कि वे सिफारिश कर के किसी बड़े अखबार में उन के फोटो छपवा दें.

विक्रम साहब अपनी साइकिल पर बैठ कर उस दिन दिनभर दौड़भाग में लगे थे, उन लोगों के फोटो छपवाने के लिए, पर उस 59 साल के अफसर की ओर न अपना फोटो छपवाने वालों का ध्यान गया था और न छापने वालों का, जो चाहता तो लग्जरी कार भी खरीद सकता था. पर जिस ने इस धरती को बचाने की चिंता में अपने 35 साल के कैरियर में हर रोज साइकिल चलाई थी, उस ने अपनी जिंदगी के हर दिन को ‘कार फ्री डे’ बना रखा था.

विक्रम साहब के रिटायरमैंट में बहुत कम समय रह गया था. सब उदास थे खासकर औरतें. उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि विक्रम साहब के जाने के बाद उन्हें पहले की तरह 8 बजे तक और छुट्टियों में भी अपनी ड्यूटी करनी पड़ेगी.

वे सब चाहती थीं कि विक्रम साहब किसी भी तरह से कौंट्रैक्ट पर दूसरे लोगों की तरह नौकरी करते रहें.

विक्रम साहब कहां मानने वाले थे. उन्होंने सभी को अपने भविष्य की योजना बता दी थी कि वे रिटायरमैंट के बाद सभी लोगों को साइकिल चलाने के फायदे बताएंगे खासकर नौजवानों को वे साइकिल चलाने के लिए बढ़ावा देंगे.

विक्रम साहब ने एक बुकलैट भी तैयार कर ली थी, जिस में दुनियाभर की उन हस्तियों की तसवीरें थीं, जो रोज साइकिल से अपने काम करने की जगह पर जाती थीं. उस में उन्होंने दुनिया के उन आम लोगों को भी शामिल किया था, जो साइकिल चलाने के चलते पूरी जिंदगी सेहतमंद रहे थे.

विक्रम साहब ने अपनी खांटी तनख्वाह के पैसों में से बहुत सी रकम बुकलैट की सामग्री इकट्ठा करने व उस की हजारों प्रतियां छपवाने में खर्च कर डाली थीं.

उन तीनों औरतों ने भी विक्रम साहब के रिटायरमैंट पर अपनी तरफ से उन्हें गियर वाली साइकिल गिफ्ट करने के लिए रकम जमा करनी शुरू कर दी थी. उन की दिली इच्छा थी कि विक्रम साहब रिटायरमैंट के बाद गियर वाली कार में न सही, गियर वाली साइकिल से तो जरूर चलें.

 

गांव की ओर : रमुआ की नौकरी

डाक्टर की सलाह पर रमुआ हवापानी बदलने के लिए अपने गांव जा रहा था. न जाने कितने साल हो गए थे उसे गांव गए हुए. मांबाप के मरने के बाद से वह एक बार भी गांव नहीं गया था.

रमुआ तकरीबन 10-12 साल पहले गांव से शहर आया था. गांव में उस की थोड़ीबहुत खेती थी. खेती के साथसाथ वह गांव में मजदूरी भी करता था.

गांव के कुछ लोग शहर में मजदूरी करते थे. जब रमुआ उन को गांव से वापस शहर जाते देखता था तो उस का मन भी मचल उठता था. लेकिन मांबाप उसे शहर नहीं जाने देते थे.

जब मजदूर शहर से गांव लौटते तो अपनी बीवी के लिए चूड़ियां, बिंदी वगैरह लाते थे. यह देख कर रमुआ की बीवी सोचती कि काश, उस का पति भी शहर जाता. वह रमुआ को शहर जाने के लिए उकसाती थी.

एक दिन जिद कर के रमुआ रोजगार के लिए शहर चला गया. हफ्तेभर बाद उस ने बीवीबच्चों को भी वहां बुला लिया.

रमुआ को अपने गांव वालों की मदद से कैमिकल बनाने वाली किसी फैक्टरी में दिहाड़ी पर काम मिल गया था. रहने के लिए उस ने अपने साथियों के साथ शहर के बाहर एक नाले के किनारे ?ोंपड़ी बना ली थी.

रमुआ को जब पहली बार तनख्वाह मिली तो वह हैरान रह गया. इतना पैसा उस ने आज तक नहीं कमाया था.

रमुआ सोचने लगा कि वह अपने बच्चों को खूब पढ़ालिखा कर सरकारी नौकरी दिलाएगा.

शुरू के कुछ महीने तो अच्छे बीते, लेकिन बाद में यही पैसे कम पड़ने लगे. शहर में महंगाई ज्यादा थी और खर्चे भी गांव से ज्यादा थे.

धीरेधीरे रमुआ को भी अपने साथियों की तरह शराब पीने की लत लग गई. कभीकभी उसे काम नहीं मिलता था. फैक्टरी में हड़ताल भी अकसर होती रहती थी.

समय के साथसाथ रमुआ के बच्चे बड़े होते गए. साथ ही, नाले से लगा पूरा इलाका भी ?ोंपडि़यों का एक जंगल सा बन गया.

अब हफ्ता वसूलने वाले गिरोह पैदा हो गए थे. रमुआ को भी नगरपालिका व गुंडों को हफ्ता देना पड़ता था. इस चक्कर में जो आमदनी पहले बहुत ज्यादा दिखती थी, अब उस में घर का खर्चा चलाना भी मुश्किल हो गया था. बीवी तो पहले ही लोगों के घरों में बरतन मांजने का काम कर रही थी, अब बच्चों को भी काम पर लगा दिया गया था. इस इलाके में यह नई बात नहीं थी. सब परिवारों में यही हो रहा था.

रमुआ की बीवी का किसी गैर मर्द से चक्कर चल रहा था. इस बात को ले कर वह आएदिन अपनी बीवी से लड़ता रहता था. वह उसे शराब पीने के लिए कोसती थी.

धीरेधीरे रमुआ का बेटा व बेटी भी दूसरे बच्चों की तरह बुरी आदतों के शिकार हो गए. बेटा भी अब छिप कर शराब पीने लगा था. बीड़ी तो वह खुलेआम ही पीता था.

पहले जब रमुआ अपने बेटे को डांटता और पीटता था तो वह चुपचाप सुन लेता था, लेकिन अब वह भी जवाब देने लगा था, ‘तुम खुद पीते हो तो मुझे डांटते क्यों हो?’

रमुआ ताज्जुब से सिर पकड़ कर बैठ जाता था. सोचता कि आजकल के बच्चों को क्या हो गया है. उस ने तो बचपन में क्या पूरी जिंदगी में अपने बाप को ऐसे जवाब देना तो दूर आंख मिला कर बात भी नहीं की थी.

दूसरी ओर रमुआ की बड़ी बेटी, जो अपनी मां के साथ काम पर जाती थी, ने भी बस्ती की दूसरी लड़कियों के रंगढंग अपना लिए थे. वह काली थी तो क्या हुआ, पर जवान थी. लोगों की तीखी नजरें व फिकरे उस की जवानी में उबाल लाते थे. उस ने बस्ती के कुछ आवारा लड़कों को दिल दे दिया था.

प्यार के 2 रास्ते होते हैं. एक रास्ता शादी का होता?है और दूसरा बरबादी का.

रमुआ की बेटी इतनी खुशनसीब नहीं थी कि प्यार के पहले रास्ते पर चलती. कई लड़कों से उस के जिस्मानी रिश्ते बने और वह भी बिना शादी के ही पेट से हो गई.

हालांकि बस्ती में रहने वाली दाई ने दूसरी लड़कियों की तरह उसे भी इस मुसीबत से छुटकारा दिला दिया था, पर रमुआ के लिए यह बात फांस बन गई.

तभी फैक्टरी में हड़ताल हो गई. इस बार हड़ताल काफी लंबी चली. लगता था जैसे दोनों तरफ के लोग अखाड़े में उतर आए हों.

जल्दी ही भूखे रहने की नौबत आ गई. शहर की महंगाई में अकेली कमाई से पेट नहीं भरता. इस वजह से घर में क्लेश बढ़ गया.

अब बीवी अकेली कमाती थी, इसलिए दबती नहीं थी. रमुआ मन मार कर रह जाता था. मौका मिलते ही वह घर का सामान बेच कर शराब पी लेता था.

एक दिन रमुआ की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो गई. ज्यादा शराब पीने व फैक्टरी में जो कैमिकल बनता था, उस की वजह से रमुआ के फेफड़े खराब हो गए. डाक्टर ने उसे कुछ दिन जगह बदलने की सलाह दी.

पहले तो रमुआ ने डाक्टर की सलाह नहीं मानी. लेकिन जब वह ठीक नहीं हुआ तो गांव जाने की तैयारी करने लगा.

एक दिन रमुआ के घर पुलिस आई और उस के बेटे कालू के बारे में पूछने लगी. रमुआ को हैरानी हुई कि आखिर उस के बेटे ने ऐसा क्या कर दिया.

काफी पूछने पर पुलिस ने बताया कि कालू ने चोरी की है.

रमुआ घबरा कर बोला, ‘साहब, वह तो कई दिनों से घर आया ही नहीं, पता नहीं कहां गया है?’

‘क्या तुम्हें अपने बच्चे के बारे में पता नहीं, कैसे बाप हो तुम?’ पुलिस ने धमकाया.

रमुआ सिर ?ाका कर चुपचाप सुनता रहा. उस के दिमाग में हलचल मच गई. वह सोचने लगा कि आखिर इस शहर ने उसे क्या दिया? फिर उसे लगा कि इस शहर ने उसे काम तो दिया है नहीं तो गांव में कभी अकाल, तो कभी बाढ़ की मार सहनी पड़ती थी.

काफी सोचविचार के बाद रमुआ ने गांव लौटने की ठानी. गांव जाने के लिए पहले तो रमुआ की बीवी व बच्चों ने मना किया, पर बाद में वे राजी हो गए.

गांव पहुंचते ही रमुआ के दोस्तों व रिश्तेदारों ने उसे घेर लिया.

शाम को रमुआ अपने दोस्तों के साथ गांव घूमने गया तो उस ने देखा कि गांव के बाहर खुदाई का काम चल रहा?है.

‘‘अरे रहमान, यहां क्या हो रहा है?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘गांव में कच्ची नहर बन रही है. इस में पानी आएगा और हम साल की 2 फसलें ले सकेंगे.

‘‘और हां, इस की खुदाई भी हम गांव वाले ही कर रहे हैं. पंचायत इस के बदले में हमें 10 किलो अनाज व 30 रुपए दिहाड़ी देती है,’’ रहमान ने बताया.

‘‘अच्छा, तभी तो मैं ने गांव में कोई हुक्का पीते या बातें करते हुए नहीं देखा,’’ रमुआ ने कहा.

‘‘हां, अब बच्चे भी स्कूल जाते हैं और आदमी व औरतें नहर व दूसरे कामों पर जाते हैं,’’ रहमान ने बताया.

‘‘दूसरे कौन से काम…?’’ रमुआ ने हैरानी से पूछा.

‘‘प्रधानमंत्री गांव सड़क योजना, सरकारी दवाखाना, स्कूल व पंचायत के भवन बनाने जैसे काम,’’ रहमान ने जोश में आ कर बताया.

‘‘क्या गांव में इतने सारे काम हो रहे हैं?’’ रमुआ आंखें फाड़ कर बोला.

‘‘और नहीं तो क्या,’’ रहमान ने जवाब दिया.

लौटते समय अंधेरा हो गया था. रहमान ने चलते हुए कहा, ‘‘यार, तुम्हें तो अंधेरे में परेशानी होती होगी. तुम तो शहर में बिजली के आदी हो गए होगे?’’

अब रमुआ क्या जवाब देता. उस की झोंपड़ी में 25 वाट का बल्ब था. वह भी कभीकभी ही रोशनी देता था. गली में खंभा तो था, पर बल्ब नहीं था.

आज खाना रमुआ के दोस्त बनवारी के यहां था. रमुआ व उस के परिवार को लगा कि उन्हें इतना लजीज खाना खाए कितने साल हो गए.

सुबह उठ कर रमुआ अपने खेत की ओर गया. इतने सालों में जमीन में खरपतवार हो गए थे. खेत की मिट्टी को हाथ लगाते ही रमुआ रोने लगा.

उसे दीनू काका आते दिखाई दिए तो उस ने पूछा, ‘‘इतनी सुबहसुबह कहां जा रहे हो काका?’’

‘‘पास के कसबे के बैंक में जा रहा हूं. खेत में बीज बोने व हल खरीदने के लिए कर्ज ले रहा हूं,’’ दीनू काका ने जवाब दिया.

‘‘क्या सरकार हम जैसे छोटे लोगों को भी कर्ज देती है?’’ रमुआ ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘हां, वह भी कम ब्याज पर,’’ दीनू काका ने कहा और चल पड़े.

रमुआ की बीवी को पड़ोसी फरजाना पंचायतघर की ओर ले गई. उस ने गांव की औरतों व शहर की एक लड़की को वहां बैठे देखा तो पूछा, ‘‘अरे दीदी, यहां क्या हो रहा है?’’

‘‘यह लड़की गांव की औरतों को सिलाईकढ़ाई का काम सिखाती है और शहर से काम ला कर देती है,’’ फरजाना ने कहा.

रात को रमुआ व उस की बीवी ने गांव में आए इस बदलाव को देख कर एक फैसला किया.

सुबह रमुआ को अपना घर ठीक करते हुए देख वहां सब लोग जमा हो गए. जुम्मन ने हैरत से पूछा, ‘‘क्यों रमुआ, यहां ज्यादा दिन रहने का इरादा है क्या?’’

‘‘अब मैं कभी शहर नहीं जाऊंगा. सब के बीच यहीं काम करूंगा. शहर में गंदगी व बीमारी के सिवा कुछ नहीं रखा है. अब मैं ने सोच समझ कर फैसला किया है कि मुझे यहीं पर रहना है,’’ रमुआ ने गांव वालों से कहा.

रमुआ की बीवी फैसला सुनाते हुए बोली, ‘‘बस, अब हम यह गांव छोड़ कर कभी नहीं जाएंगे.’’

कुछ अरसे बाद रमुआ की बेटी की शादी भी गांव में हो गई. उस का बेटा मजदूरी के साथसाथ खेती भी करने लगा. सभी लोग खुश थे.

अब रमुआ न शराब पीता था, न ही उस की बीवी उस से झगड़ती थी.

रमुआ को देख कर बाकी गांव वाले भी शहर से वापस आ गए. अब लोग शहर जाने की बात पर एकदूसरे को चुटकुले सुनाते और हंसते हैं

घर है या जेल : क्या था मोहन की कमाई का राज

नई नवेली पत्नी उर्मिको पा कर मोहन बहुत खुश था. हो भी क्यों न, आखिर हूर की परी जो मिली थी उसे. सच में गजब का नूर था उर्मि में. अगर उसे बेशकीमती पोशाक और लकदक गहने पहना दिए जाते तो वह किसी रानीमहारानी से कम न लगती. लेकिन बेचारी गरीब मांबाप की बेटी जो ठहरी, तो कहां से उसे यह सब मिलता भला, पर सपने उस के भी बहुत ऊंचेऊंचे थे.

अब सपने तो कोई भी देख सकता है न. तो बेचारी वह भी ऊंचेऊंचे सपना देखती थी कि उस का राजकुमार भी सफेद छोड़े पर चढ़ कर उसे ब्याहने आएगा और उसे दुनियाभर की खुशियों से नहला देगा.

लेकिन जब उर्मि ने अपने दूल्हे के रूप में मोहन को देखा तो उस का मन बु?ाबुझा सा हो गया क्योंकि मोहन उस के सपनों के राजकुमार से कहीं भी मैच नहीं बैठ रहा था. खैर, चल पड़ी वह अपने पति मोहन के साथ जहां वह उसे ले गया.

‘‘जब शादी हो ही गई है तो अब अपनी जिम्मेदारी भी संभालना सीखो…’’ पिता का यह हुक्म मान कर मोहन उर्मि को ले कर शहर आ गया और काम की तलाश करने लगा.

लेकिन मोहन को कहीं भी कोई ढंग का काम नहीं मिल पा रहा था. दिहाड़ी पर मजदूरी कर के वह किसी तरह कुछ पैसे कमा लेता, मगर उतने से क्या होगा और दोस्त के घर भी वह कितने दिन ठहरता भला?

आखिर मोहन को काम न मिलता देख उस दोस्त ने सलाह दी कि क्यों न वह बड़ी सब्जी मंडी से सब्जियां ला कर बेचे. इस से उस की अच्छी कमाई हो जाएगी और रोज काम न मिलने की फिक्र भी नहीं रहेगी.

किसी तरह जोड़ेजुटाए पैसों से मोहन बड़ी सब्जी मंडी जा कर सब्जियां खरीद लाया और उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचने लगा.

अब मोहन का रोज का यही काम था. अंधेरे मुंह सुबहसवेरे उठ कर वह बड़ी सब्जी मंडी चला जाता और वहां से थोक भाव में खूब सारी फलसब्जियां खरीद कर उन्हें लोकल बाजार में जा कर बेचता.

अब मोहन की कमाई इतनी होने लगी थी कि पतिपत्नी के लिए अच्छे से दालरोटी जुट जाती थी. बेचारा मोहन, जब फलसब्जियां बेच कर थकाहारा घर आता तो उस के माथे पर पसीने का मुकुट और सीने में धड़कनों का जंगल होता, लेकिन फिर भी वह अपनी खूबसूरत पत्नी का मुखड़ा देख कर अपनी सारी थकान भूल जाता.

लेकिन उस की उर्मि जाने उस से क्या चाहती थी. वह कभी खुश ही नहीं रहती थी. नहीं, वैसे तो वह खुश रहती थी, पर मोहन को देखते ही ठुनकने लगती थी कि उसे क्याक्या कमी है.

बेचारा मोहन हर तरह से कोशिश करता कि उर्मि को खुश रखे, पर उस की मांगें रोजाना बढ़ती ही जाती थीं.

मोहन मेहनत के चार पैसे इसलिए ज्यादा कमाना चाहता था ताकि उर्मि को ज्यादा से ज्यादा खुश रख सके, मगर उर्मि को इस बात की जरा भी परवाह नहीं थी. वह तो अपने ही पड़ोस के एक बांके नौजवान धीरुआ के साथ नैनमटक्का कर रही थी.

तेलफुलेल, चूड़ी, बिंदी वगैरह बेचने वाला धीरुआ पर उस का दिल आ गया था. जब भी वह उसे देखती, उसे कुछकुछ होने लगता.

सोचती, काश, धीरुआ उस का पति होता तो कितना मजा आता. पता नहीं, क्यों उस के मांबाप ने उस से 10 साल  से भी ज्यादा बड़े मोहन के साथ उसे ब्याह दिया?

उधर धीरुआ भी जब उर्मि को देखता तो देखता रह जाता. उस के गठीले बदन के उभार को देख कर उस के मुंह से लार टपकने लगती. उसे लगता, कैसे वह उसे अपने ताकतवर हाथों में समेट ले और फिर कभी छोड़े ही न. और वैसे भी वह अभी तक कुंआरा था.

जब भी उर्मि उस की दुकान पर आती, धीरुआ उसे ही निहारते रहता. यह बात उर्मि भी सम?ा रही थी इसलिए तो बहाना बना कर वह उस की दुकान पर अकसर जाती रहती थी.

धीरुआ अपने मोबाइल फोन में उर्मि को बढि़याबढि़या प्यार वाले गाने सुनाता और वीडियो भी दिखाता. प्यार वाले गाने सुन कर वह ऐसे मंत्रमुग्ध हो जाती कि पूछो मत. वह खुद को उस गाने की हीरोइन ही सम?ाने लगती और धीरुआ को हीरो.

एक दिन उर्मि ने ठुनकते हुए मोहन से मोबाइल फोन की मांग कर दी. हैसियत तो नहीं थी बेचारे की, लेकिन फिर भी एक सस्ता सा मोबाइल, जिस से सिर्फ बात हो सकती थी, उर्मि के लिए खरीद लाया.

मोबाइल फोन देख कर उर्मि बहुत खुश तो नहीं हुई, पर लगा चलो बात तो होगी न इस से. अब उस का जब भी मन करता, धीरुआ को फोन लगा देती और खूब बातें करती. पर अपने पति मोहन से कभी सीधे मुंह बात नहीं करती थी.

न जाने क्यों उर्मि बातबात पर मोहन पर चढ़ जाती और बेचारा मोहन भी उस के गुस्से को शरबत सम?ा कर चुपचाप हंसतेहंसते पी जाता.

सोचता, उम्र कम है इसलिए सम?ा भी थोड़ी कम है. मगर उसे तो मोहन जरा भी भाता ही नहीं था. उस का दिल तो अपने आशिक धीरुआ के दिल से जा कर अटक गया था.

किसी तरह हिचकोले खाते हुए मोहन और उर्मि की गृहस्थी चल रही थी. लेकिन कहते हैं न, वक्त कब करवट ले, कह नहीं सकते. अचानक एक दिन लोगों में हड़कंप देख कर मोहन चौंक गया. देखा तो सब अपनेअपने सामान समेट कर भागने लगे हैं.

‘‘अरे, क्या हुआ भाई?’’ मोहन ने पास में अपनी सब्जियां समेट रहे सब्जी वाले से पूछा.

‘‘अरे, क्या हुआ क्या, तुम भी अपना सामान जल्दी से उठा कर भागो. तुम देख नहीं रहे कब्जा हटाने के लिए नगर प्रशासन का दस्ता आया हुआ है,’’ उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘नगर प्रशासन का दस्ता… पर वह क्यों भाई?’’ मोहन ने उस सब्जी वाले से हैरानी से पूछा.

‘‘क्योंकि यहां सब्जियां बेचना गैरकानूनी है,’’ ?ां?ालाते हुए उस सब्जी वाले ने कहा.

‘‘गैरकानूनी… पर यहां शहर के बीचोंबीच कुछ लोगों ने जो मौल और होटल बना रखे हैं, वे भी आधे से ज्यादा सरकारी जमीन पर हैं तो उन्हें ये प्रशासन वाले क्यों कुछ नहीं कहते? क्या इन लोगों पर कभी कोई कार्यवाही नहीं होती? हम गरीब ही मिले हैं इन्हें सताने को?’’ मोहन ने गुस्से से कहा.

‘‘अरे भाई, वे अमीर लोग हैं. पैसा और पहुंच बहुत है उन की. फिर उन के खिलाफ क्यों कोई कार्यवाही होने लगी? चल, मैं तो चला, तू भी निकल ले जल्दी से,’’ कह कर वह सब्जी वाला चलता बना.

मोहन भी खुद में भुनभुनाते हुए अपनी सब्जियां समेटने लगा, लेकिन तभी किसी की कड़क आवाज से वह कांप उठा और उस के हाथ थरथर कांपने लगे.

‘‘क्यों बे, अब तु?ो क्या अलग से न्योता देता… हां, बोल?’’ कह कर उस में से एक ने उस की टोकरी में ऐसी लात मारी कि वह लुढ़कती हुई दूर चली गई. सारे टमाटर सड़क पर छितरा गए.

तभी एक दूसरा अफसर उस की तरफ बढ़ा ही था कि मोहन हाथ जोड़ कर विनती करते हुए कहने लगा, ‘‘साहब, मैं अभी उठाए लेता हूं सारी सब्जियां, दया माईबाप दया…’’

लेकिन मोहन की बातों को अनसुना कर एक बड़े अफसर ने कड़क आवाज में कहा, ‘‘इन का तो यह रोज का नाटक है. जब तक इन्हें सबक नहीं सिखाओगे, सम?ोंगे नहीं,’’ कह कर उस ने उस की बचीखुची सब्जियां भी फेंक दीं.

बेचारा मोहन उन सब के सामने गिड़गिड़ाता रह गया. वह अपने आंसू पोंछते हुए जो भी सब्जियां बची थीं, ले कर घर चला गया, पर वहां भी उर्मि की जहरीली बातों ने उसे मार डाला.

‘‘तो क्या करूं… बोल न? क्या गरीब होना मेरी गलती है या वहां जा कर सब्जियां बेच कर मैं ने कोई गुनाह कर दिया, बोलो?’’ मोहन रोंआसी आवाज में बोला.

‘‘वह सब मु?ो नहीं पता… तुम चोरी करो, डकैती करो, जेब काटो चाहे जो भी करो मु?ो तो बस पैसे चाहिए घर चलाने के लिए,’’ जख्म पर महरम लगाने के बदले उर्मि अपनी बातों से उसे और जख्म देने लगी.

अब क्या करता बेचारा, पैसे तो थे नहीं जो फिर से कोई धंधा शुरू करता. कहीं सचमुच में उर्मि उसे छोड़ कर भाग न जाए, इस वजह से मोहन ने गलत रास्ता अख्तियार कर लिया.

अब सब्जियां बेचने के बजाय लोगों की जेबें काटने लगा और छोटीमोटी चोरियां भी करने लगा.

शुरूशुरू में तो मोहन को बहुत बुरा लगता था ये सब काम करने में, लेकिन फिर धीरेधीरे उसे भी यह सब करने में मजा आने लगा.

घर में सामानपैसा आते रहने से उर्मि भी अब खुश रहने लगी थी. उस के ठाठ देख आसपड़ोस की औरतें जल मरतीं और उर्मि उन्हें देख और इतराती. लेकिन उन के पास यह सुख भी ज्यादा दिनों तक टिका न रह सका.

एक दिन मोहन चोरी करते हुए पुलिस के हत्थे चढ़ गया और उसे जेल भेज दिया.

मोहन के जेल जाने से उर्मि को कोई खास फर्क नहीं पड़ा, बल्कि उस की तो और मौज हो गई. अब वह खुल कर धीरुआ के साथ आंखें चार करने लगी.

धीरुआ उसे जबतब अपने घर ले जाता और दोनों खूब मस्ती करते. अपनी मोटरसाइकिल पर वह उर्मि को खूब घूमाताफिराता, सिनेमा दिखाता. जब लोग कुछ कहते तो उर्मि उन्हें दोटूक जवाब दे कर चुप कर देती.

इधर बिना गुनाह साबित हुए ही मोहन महीनों तक जेल में पड़ा सड़ता रहा, क्योंकि कोई उस की जमानत कराने नहीं आया इसलिए. जब जान लिया उर्मि ने कि अब मोहन नहीं आने वाला, तो एक दिन वह धीरुआ के साथ भाग गई.

बिना गुनाह साबित हुए ही महीनों जेल में गुजारने की बात जब एक कैदी दोस्त ने सुनी तो उसे मोहन पर दया आ गई. छूटते ही उस कैदी दोस्त ने मोहन की जमानत तो करवा दी, लेकिन महीनों जेल में पड़े रहने से वह बहुत कमजोर हो गया. जब पत्नी के बारे में जाना तो उस का दिल और टूट गया. लगा जिस के लिए उस ने इतना सबकुछ सहा, वही उस का साथ छोड़ गई.

अब मोहन बीमार और बेसहारा हो गया था. न तो अब वह कोई काम करने लायक रहा और न ही चोरीजेबकतरी के ही लायक रह गया. कोई कुछ दे जाता तो खा लेता, वरना भूखे पेट ही सो जाता. उसे लग रहा था कि उस के लिए तो जेल भी वैसी ही थी जैसा घर.

हवस का नतीजा : मुग्धा का पति कैसा था

मुग्धा का बदन बुखार से तप रहा था. ऊपर से रसोई की जिम्मेदारी. किसी तरह सब्जी चलाए जा रही थी तभी उस का देवर राज वहां पानी पीने आया. उस ने मुग्धा के हावभाव देखे तो उस के माथे पर हाथ रखा और बोला, ‘‘भाभी, आप को तो तेज बुखार है.’’

‘‘हां…’’ मुग्धा ने कमजोर आवाज में कहा, ‘‘सुबह कुछ नहीं था. दोपहर से अचानक…’’

‘‘भैया को बताया?’’

‘‘नहीं, वे तो परसों आने ही वाले हैं वैसे भी… बेकार परेशान होंगे. आज तो रात हो ही गई… बस कल की बात है.’’

‘‘अरे, लेकिन…’’ राज की फिक्र कम नहीं हुई थी. मगर मुग्धा ने उसे दिलासा देते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं. मामूली बुखार ही तो है. तुम जा कर पढ़ाई करो, खाना बनते ही बुला लूंगी.’’

‘‘खाना बनते ही बुला लूंगी…’’ मुग्धा की नकल उतार कर चिढ़ाते हुए राज ने उस के हाथ से बेलन छीना और बोला, ‘‘लाइए, मैं बना देता हूं. आप जा कर आराम कीजिए.’’

‘‘न… न… लेट गई तो मैं और बीमार हो जाऊंगी,’’ मुग्धा बैठने वालियों में से नहीं थी. वह बोली, ‘‘हम दोनों मिल कर बना लेते हैं,’’ और वे दोनों मिल कर खाना बनाने लगे.

मुग्धा का पति विनय कंपनी के किसी काम से 3 दिनों के लिए बाहर गया हुआ था. वह कर्मचारी तो कोई बहुत बड़ा नहीं था, लेकिन बौस का भरोसेमंद था. सो, किसी भी काम के लिए वे उसे ही भेजते थे.

मुग्धा का 21 साल का देवर राज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. विनय जैसा प्यार करने वाला पति पा कर मुग्धा भी खुश रहती थी. कुछ पति की तनख्वाह और कुछ वह खुद जो निजी स्कूल में पढ़ाती, दोनों से मिला कर घर का खर्च अच्छे से निकल आता. सासससुर गांव में रहते थे. देवर राज अपनी पढ़ाई के चलते उन के साथ ही रहता था.

जिंदगी में कमी थी तो बस यही कि खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के 10 सालों के बाद भी उन के कोई औलाद नहीं थी. अब मुग्धा 35 साल की हो चुकी थी. अपनी हमउम्र बाकी टीचरों को उन के बच्चों के साथ देखती तो न चाहते हुए भी उसे रोना आ ही जाता. वह अपनी डायरी के पन्ने इसी पीड़ा से रंगती जाती.

रोटियां बन चुकी थीं. राज ने उसे कुरसी पर बैठने को बोला और सामान समेटने लगा. मुग्धा ने सिर पीछे की ओर टिकाया और आंखें बंद कर लीं. वातावरण एकदम शांत था. तभी वहां वही तूफान फिर से गरजने लगा जिस का शोर मुग्धा आज तक नहीं भांप पाई थी.

राज की गरदन धीरे से मुग्धा की ओर घूम चुकी थी. वह कनखियों से मुग्धा की फिटिंग वाली समीज में कैद उस के उभारों को देखने लगा था. मुग्धा की सांसों के साथ जैसेजैसे वे ऊपरनीचे होते, वैसेवैसे राज के अंदर का शैतान जागता जाता.

‘‘हो गया सब काम…?’’ बरतनों की आवाज बंद जान कर मुग्धा ने अचानक पूछते हुए अपनी आंखें खोल दीं.

राज हकबका गया और बोला, ‘‘हां भाभी, बस हो ही गया…’’ कह कर राज ने जल्दीजल्दी बाकी काम निबटाया और खाने की चीजों को उठा कर मेज पर ले गया.

मुग्धा ने मुश्किल से 2 रोटियां खाईं, वह भी राज की जिद पर. वह जबरदस्ती सब्जी उस की प्लेट में डाल दे रहा था. खाने के बाद मुग्धा सोने जाने लगी तो राज बोला, ‘‘भाभी, 15 मिनट के लिए आगे वाले कमरे में बैठिए न… मैं आप के लिए दवा ले आता हूं.’’

‘‘अरे नहीं, रातभर में उतर जाएगा…’’ मुग्धा ने मना किया लेकिन राज कहां मानने वाला था.

‘‘मैं पास वाले कैमिस्ट से ही दवा ले कर आ रहा हूं भाभी… जहां से आप मंगाती हैं हमेशा… दरवाजा बंद कर लीजिए… मैं अभी आया…’’ कहता हुआ वह निकल गया.

मुग्धा ने दरवाजा बंद किया और सोफे पर पैर ऊपर कर के बैठ गई.

राज ने तय कर लिया था कि आज तो वह अपने मन की कर के ही रहेगा. इस बीच कैमिस्ट की दुकान आ गई.

‘‘क्या बात है राज बाबू?’’ कैमिस्ट ने राज को खोया सा देखा तो पूछा. राज का ध्यान वापस दुकान पर आया.

‘‘दवा चाहिए थी,’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘अबे तो यहां क्या मिठाई मिलती है?’’ कैमिस्ट उसे छेड़ते हुए बोला. वह उस का पुराना दोस्त था.

राज मुसकरा उठा और कहा, ‘‘अरे, जल्दी दे न…’’

‘‘जल्दी दे न…’’ बड़बड़ाते हुए कैमिस्ट ने हैरत से उस की ओर देखा, ‘‘कौन सी दवा चाहिए, यह तो बता?’’

राज को याद आया कि उस ने तो सचमुच कोई दवा मांगी ही नहीं है. उस ने ऐसे ही बोल दिया, ‘‘भाभी की तबीयत ठीक नहीं है. उन्हें बुखार है. जरा नींद की गोली देना.’’

‘नींद की गोली बुखार के लिए…’ सोचते हुए कैमिस्ट ने उसे देखा. वह खुद भी मुग्धा के हुस्न का दीवाना था. हमेशा उस के बारे में चटकारे लेले कर बातें किया करता था. उस ने राज के मन की बात ताड़ ली. ऐसी बातों का उसे बहुत अनुभव जो था. उस ने नींद की गोली के साथ बुखार की भी दवा दे दी.

राज ने लिफाफा जेब में रखा और तेजी से वापस चलने को हुआ कि तभी कैमिस्ट चिल्लाया, ‘‘अरे भाई, खुराक तो सुन ले.’’

राज को अपनी गलती का अहसास हुआ. वह काउंटर पर आया. कैमिस्ट ने उसे डोज बताई और आंख मारते हुए बोला, ‘‘यह नींद वाली एक से ज्यादा मत देना… टाइट चीज है…’’

‘‘अबे, क्या बकवास कर रहा है,’’ राज के मन का डर उस की जबान से बोल पड़ा. उस की तो चोर की दाढ़ी में तिनका वाली हालत हो गई. वह जाने लगा.

कैमिस्ट पीछे से कह रहा था, ‘‘अगली बार हम को भी याद रखना दोस्त…’’

राज उस को अनसुना करता हुआ आगे बढ़ गया. घर लौटने पर डोर बैल बजाते ही मुग्धा ने दरवाजा खोल दिया और बोली, ‘‘यहीं बैठी थी लगातार…’’

‘‘जी भाभी, आइए अंदर चलिए…’’ राज ने अपने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा.

मुग्धा अपने कमरे में आ कर लेट गई. राज ने उसे पहले बुखार की दवा दी. मुग्धा दवा ले कर सोने के लिए लेटने लगी तो राज ने उसे रोका, ‘‘भाभी, अभी एक दवा बाकी है…’’

‘‘कितनी सारी ले आए भैया?’’ मुग्धा ने थकी आवाज में बोला और बाम ले कर माथे पर लगाने लगी.

‘‘भाभी दीजिए, मैं लगा देता हूं,’’ कह कर राज ने उस से बाम की डब्बी ले ली और उस के माथे पर मलने लगा. थोड़ी देर बाद उस ने मुग्धा को नींद वाली गोली भी खिला दी और लिटा दिया.

राज उस का माथा दबाता रहा. थोड़ी देर बाद उस ने पुष्टि करने के लिए मुग्धा को आवाज दी. ‘‘भाभी सो गईं क्या?’’

कोई जवाब नहीं मिला. राज ने उस के चेहरे को हिलाडुला कर भी देख लिया. कोई प्रतिक्रिया न पा कर वह समझ गया कि रास्ता साफ हो चुका है.

राज की कनपटियों में खून तेजी से दौड़ने लगा. वह बत्ती जलती ही छोड़ मुग्धा के ऊपर आ गया. मर्यादा के आवरण प्याज के छिलकों की तरह उतरते चले गए. कमरे में आए भूचाल से मेज पर रखी विनयमुग्धा की तसवीर गिर कर टूट गई.

सबकुछ शांत होने पर राज थक

कर चूरचूर हो कर मुग्धा के बगल में लेट गया.

‘‘बस अब बुखार उतर जाएगा भाभीजी… इतना पसीना जो निकलवा दिया मैं ने आप का,’’ राज बेशर्मी से बड़बड़ाया और मुग्धा की कुछ तसवीरें खींचने के बाद उसे कपड़े पहना दिए.

मुग्धा अब तक धीमेधीमे कराह रही थी. राज पलंग से उतरा और खुद भी कपड़े पहनने लगा. तभी उस की नजर आधी खुली दराज पर गई. भूल से मुग्धा अपनी डायरी उसी में छोड़ी हुई थी. राज ने उसे निकाला और कपड़े पहनतेपहनते उस के पन्ने पलटने लगा.

अचानक एक पेज पर जा कर उस की आंखें अटक गईं. वह अभी अपनी कमीज के सारे बटन भी बंद नहीं कर पाया था लेकिन उस को इस बात की परवाह नहीं रही. वह अपलक उस पन्ने में लिखे शब्दों को पढ़ने लगा. उस में मुग्धा ने लिखा था, ‘बस अब बहुत रो लिया, बहुत दुख मना लिया औलाद के लिए. मेरा बेटा मेरे पास था और मैं उसे पहचान ही नहीं पाई. जब से मैं यहां आई, उसे बच्चे के रूप में देखा तो आज अपनी कोख के बच्चे के लिए इतनी चिंता क्यों? मैं बहुत जल्दी राज को कानूनी रूप से गोद लूंगी.’

राज की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. वह सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया और जोरजोर से रोने लगा, फिर भाग कर मुग्धा के पैरों को पकड़ कर अपना माथा उस से रगड़ते हुए रोने लगा, ‘‘भाभी, मु?ो माफ कर दो… यह क्या हो गया

मु?ा से.’’

अचानक राज का ध्यान मुग्धा के बिखरे बालों पर गया. उस ने जल्दी से जमीन पर गिरी उस की हेयर क्लिप उठाई और मुग्धा का सिर अपनी गोद

में रख कर बालों को संवारने लगा. वह किसी मशीन की तरह सबकुछ कर

रहा था. हेयर क्लिप अच्छे से उस के बालों में लगा कर राज उठा और घर से निकल गया.

अगली सुबह तकरीबन 8 बजे मुग्धा की आंखें खुलीं. उस का सिर अभी तक भारी था. घर में भीड़ लग चुकी थी.

एक आदमी ने आखिरकार बोल ही दिया, ‘‘देवरभाभी के रिश्ते पर भरोसा करना ही पागलपन है…’’

मुग्धा के सिर में जैसे करंट लगा. वह सवालिया नजरों से उसे देखने लगी. तभी इलाके के पुलिस इंस्पैक्टर ने प्रवेश किया और बताया, ‘‘आप के देवर राज की लाश पास वाली नदी से मिली है. उस ने रात को खुदकुशी कर ली…’’

मुग्धा का कलेजा मुंह को आने लगा. वह हड़बड़ा कर पलंग से उठी लेकिन लड़खड़ा कर गिर गई.

एक महिला सिपाही ने राज के मोबाइल फोन में कैद मुग्धा की कल रात वाली तसवीरें उसे दिखाईं और कड़क कर पूछा, ‘‘कल रंगरलियां मनातेमनाते ऐसा क्या कह दिया लड़के से तू ने जो उस ने अपनी जान दे दी?’’

तसवीरें देख कर मुग्धा हैरान रह गई. अपनी शारीरिक हालत से उसे ऐसी ही किसी घटना का शक तो हो रहा था लेकिन दिल अब तक मानने को तैयार नहीं था. वह फूटफूट कर रोने लगी.

इंस्पैक्टर ने उस महिला सिपाही को अभी कुछ न पूछने का इशारा किया और बाकी औपचारिकताएं पूरी कर वहां से चला गया. धीरेधीरे औरतों की भीड़ भी छंटती गई.

विनय का फोन आया था कि वह आ रहा?है, घबराए नहीं, लेकिन मुग्धा बस सुनती रही. उस की सूनी आंखों के सामने राज का बचपन चल रहा था. जब वह नईनई इस घर में आई थी.

दोपहर तक विनय लौट आया और भागते हुए मुग्धा के पास कमरे में पहुंचा. वह जड़वत अभी भी पलंग पर बैठी शून्य में ताक रही थी. विनय ने उस के कंधे पर हाथ रखा लेकिन मुग्धा का शरीर एक ओर लुढ़क गया.

‘‘मुग्धा… मुग्धा…’’ चीखता हुआ विनय उसे ?ाक?ोरे जा रहा था, पर मुग्धा कभी न जागने वाली नींद में सो चुकी थी.

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