Crime Story: पीपीई किट में दफन हुई दोस्ती- भाग 2

27 जून, 2021 को परिजनों को जैसे ही पता चला कि सचिन की हत्या उस के कुछ नजदीकी दोस्तों ने कर दी है तो घर में कोहराम मच गया. परिजनों का रोरो कर बुरा हाल  हो गया. सचिन अपने घर का इकलौता चिराग था, जिसे दोस्तों ने ही बुझा दिया था.

पुलिस की कड़ी पूछताछ में सभी आरोपी टूट गए. सभी ने स्वीकार किया कि उन्होंने सचिन का अपहरण कर उस की हत्या कर दी और लाश का अंतिम संस्कार पीपीई किट पहना कर करने के बाद उस की अस्थियां भी यमुना में विसर्जित कर दीं.

28 जून, 2021 को प्रैस कौन्फ्रैंस में एसएसपी मुनिराज जी. ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का परदाफाश कर दिया.

सचिन की मौत की पटकथा एक महीने पहले ही लिख ली गई थी. आरोपियों ने पहले ही तय कर रखा था कि सचिन का अपहरण कर हत्या कर देंगे. उस के बाद 2 करोड़ रुपए की फिरौती उस के पिता से वसूलेंगे.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों द्वारा सचिन के अपहरण और हत्या के बाद उस के शव का दाह संस्कार करने की जो कहानी सामने आई, वह बड़ी ही खौफनाक थी—

मूलरूप से बरहन कस्बे के गांव रूपधनु निवासी सुरेश चौहान आगरा के दयाल बाग क्षेत्र की जयराम बाग कालोनी में अपने परिवार के साथ रहते हैं. उन का गांव में ही एस.एस. आइस एंड कोल्ड स्टोरेज है.

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इस के अलावा वह आगरा और हाथरस में जिला पंचायत की ठेकेदारी भी करते हैं. लेखराज चौहान भी उन के गांव का ही है. दोनों ने एक साथ काम शुरू किया. दोनों ठेकेदारी भी साथ करते थे. उन दोनों के बीच पिछले 35 सालों से बिजनैस की साझेदारी चल रही थी. सुरेश चौहान का बेटा सचिन व लेखराज का बेटा हर्ष भी आपस में अच्छे दोस्त थे और एक साथ ही व्यापार व ठेकेदारी करते थे.

दयाल बाग क्षेत्र की कालोनी तुलसी विहार का रहने वाला सुमित असवानी बड़ा कारोबारी है. 2 साल पहले तक वह अपनी पत्नी व 2 बेटों के साथ चीन में रहता था. वहां उस का गारमेंट के आयात और निर्यात का व्यापार था. लेकिन 2019 में चीन में जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो वह परिवार सहित भारत आ गया.

दयालबाग में ही सौ फुटा रोड पर उस ने सीबीजेड नाम से स्नूकर और स्पोर्ट्स क्लब खोला. सुमित महंगी गाड़ी में चलता था. वहीं वह रोजाना दोस्तों के साथ पार्टी भी करता था. उस के क्लब में हर्ष और सचिन भी स्नूकर खेलने आया करते थे. इस दौरान सुमित की भी उन दोनों से गहरी दोस्ती हो गई.

बताया जाता है कि हर्ष चौहान के कहने पर सुमित असवानी ने धीरेधीरे सचिन चौहान को 40 लाख रूपए उधार दे दिए. जब उधारी चुकाने की बारी आई तो सचिन टालमटोल कर देता. जबकि उस के खर्चों में कोई कमी नहीं आ रही थी. कई बार तकादा करने पर भी सचिन ने रुपए नहीं लौटाए. यह बात सुमित असवानी को नागवार गुजरी. तब उस ने मध्यस्थ हर्ष चौहान पर भी पैसे दिलाने का दबाव बनाया, क्योंकि उस ने उसी के कहने पर सचिन को पैसे दिए थे.

हर्ष के कहने पर भी सचिन ने उधारी की रकम नहीं लौटाई. यह बात हर्ष को भी बुरी लगी. इस पर एक दिन सुमित असवानी ने हर्ष से कहा, ‘‘अब जैसा मैं कहूं तुम वैसा करना. इस के बदले में उसे भी एक करोड़ रुपए मिल जाएंगे.’’

रुपयों के लालच में हर्ष चौहान सुमित असवानी की बातों में आ गया.

दोनों ने मिल कर घटना से एक महीने पहले सचिन चौहान के अपहरण की योजना बनाई. फिर योजना के अनुसार, सुमित असवानी ने इस बीच सचिन चौहान से अपने मधुर संबंध बनाए रखे ताकि उसे किसी प्रकार का शक न हो.

इस योजना में सुमित असवानी ने रुपयों का लालच दे कर अपने मामा के बेटे हैप्पी खन्ना को तथा हैप्पी ने अपने दोस्त मनोज बंसल और उस के पड़ोसी रिंकू को भी शामिल कर लिया.

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उन्होंने यह भी तय कर लिया था कि अपहरण के बाद सचिन की हत्या कर के उस के पिता से जो 2 करोड़ रुपए की फिरौती वसूली जाएगी. उस में से एक करोड़ हर्ष चौहान को, 40 लाख सुमित असवानी को और बाकी पैसे अन्य भागीदारों में बांट दिए जाएंगे.

षडयंत्र के तहत उन्होंने अपनी योजना को अमलीजामा 21 जून को पहनाया. सुमित असवानी ने अपने मोबाइल से उस दिन सचिन चौहान को वाट्सऐप काल की. उस ने सचिन से कहा, ‘‘आज मस्त पार्टी का इंतजाम किया है. रशियन लड़कियां भी बुलाई हैं. बिना किसी को बताए, चुपचाप आ जा.’’

सचिन उस के जाल में फंस गया. घर पर बिना बताए वह पैदल ही निकल आया. वे लोग क्रेटा गाड़ी से उस के घर के पास पहुंच गए और सचिन को कार में बैठा लिया. रिंकू कार चला रहा था. मनोज बंसल उस के बगल में बैठा था. वहीं सुमित और हैप्पी पीछे की सीट पर बैठे थे. सचिन बीच में बैठ गया.

सुमित असवानी व साथी शाम 4 बजे पहले एक शराब की दुकान पर पहुंचे. वहां से उन्होंने शराब खरीदी. इस के बाद सभी दोस्त कार से शाम साढ़े 4 बजे सौ फुटा रोड होते हुए पोइया घाट पहुंचे. हैप्पी के दोस्त की बहन का यहां पर पानी का प्लांट था. इन दिनों वह प्लांट बंद पड़ा था. हैप्पी ने पार्टी के नाम पर प्लांट की चाबी पहले ही ले ली थी.

वहां पहुंच कर सभी पहली मंजिल पर बने कमरे में पहुंचे. शाम 5 बजे शराब पार्टी शुरू हुई. जब सचिन पर नशा चढ़ने लगा, तभी सभी ने सचिन को पकड़ लिया. जब तक वह कुछ समझ पाता, उन्होंने उस के मुंह पर टेप लगा कर चेहरा पौलीथिन से बांध दिया, जिस से सचिन की सांस घुटने लगी. उसी समय सुमित असवानी उस के ऊपर बैठ गया और उस का गला दबा कर हत्या कर दी. इस बीच अन्य साथी उस के हाथपैर पकड़े रहे.

सचिन की हत्या के बाद उस के शव का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया गया. इस के लिए शातिर दिमाग सुमित असवानी ने पीपीई किट में लाश को श्मशान घाट पर ले जाने का आइडिया दिया ताकि पहचान न हो सके और कोई उन के पास भी न आए.

इस के लिए कमला नगर के एक मैडिकल स्टोर से एक पीपीई किट उन्होंने यह कह कर खरीदी कि एक कोरोना मरीज के अंतिम संस्कार के लिए चाहिए. रिंकू शव को बल्केश्वर घाट पर ले जाने के लिए एक मारुति वैन ले आया.

सचिन के शव को पीपीई किट में डालने के बाद वह बल्केश्वर घाट पर रात साढ़े 8 बजे पहुंचे. वहां उन्होंने बल्केश्वर मोक्षधाम समिति की रसीद कटवाई व अंतिम संस्कार का सामान खरीदा. उन्होंने मृतक का नाम रवि वर्मा और पता 12ए, सरयू विहार, कमला नगर लिखाया था.

अगले भाग में पढ़ें- सबूत मिटाने के लिए अंतिम संस्कार भी पीपीई किट में कर दिया

Crime Story: कुटीर उद्दोग जैसा बन गया सेक्सटॉर्शन- भाग 1

खाने की टेबल पर बैठे जितेंद्र सिंह  फेसबुक मैसेंजर पर आई उस वीडियो काल के बाद अचानक असहज हो गए. क्योंकि सामने बेटी, बेटा, बहू और पत्नी, पोता और पोती सभी डाइनिंग टेबल पर मौजूद थे. उन्होंने फोन को झटपट साइलैंट मोड पर किया. प्लेट में रखे खाने के अंतिम 2 कौर झटपट मुंह में डाले और पानी पी कर झट से उन्हें गले से नीचे उतार कर बोले, ‘‘तुम लोग खाना खाओ, मेरा बाहर से कोई अर्जेंट काल है, उसे अटेंड करता हूं.’’

वह उठे और तेजी के साथ अपने रूम की तरफ बढ़ गए. वे कमरे में घुसते ही सीधे अटैच्ड बाथरूम में गए. फेसबुक की मैसेंजर काल डिस्कनेक्ट हो कर दोबारा शुरू हो चुकी थी. बाथरूम में घुसते ही उन्होंने वीडियो काल अटैंड की.

सामने स्क्रीन पर नजर आ रही खूबसूरत हसीना से फुसफुसाते हुए बोले, ‘‘सौरी जानू… डाइनिंग टेबल पर था और पूरी फैमिली सामने बैठी थी इसलिए काल अटैंड नहीं की.’’

सामने खड़ी हसीना ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं जानेमन, लेकिन अब अगर अकेले हो तो जल्दी से कपड़े उतारो और मेरी प्यास बुझा दो… बहुत देर से तड़प रही हूं… देखो मेरे बदन से कपड़े कैसे उतर रहे हैं… जल्दी करो… मेरी प्यास बुझा दो…’’

और कहते हुए फोन की स्क्रीन पर नजर आने वाली लड़की ने एकएक कर अपने कपड़े उतार कर निर्वस्त्र बदन को इस तरह सहलाना शुरू किया कि उत्तेजना के चरम पर पहुंच चुके जितेंद्र सिंह ने झटपट अपने कपड़े उतार कर अपने अंगों से खेलना शुरू कर दिया.

दूसरी तरफ वीडियो काल पर मौजूद युवती अपने बदन को सहलाते हुए ऐसी कामोत्तेजक आवाजें निकाल कर जितेंद्र को उत्तेजित कर रही थी कि कुछ ही देर में उन का शरीर शिथिल और ठंडा पड़ गया.

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फेसबुक पर 4-5 दिन पहले ही जितेंद्र सिंह की दोस्त बनी रुचिका नाम की इस प्रेमिका ने लगातार दूसरे दिन उन्हें उम्र के उस पड़ाव पर चरम सुख दे कर अपना दीवाना बना लिया था.

60 की उम्र पार कर चुके जितेंद्र सिंह के जीवन में रुचिका कुछ रोज पहले अचानक बहार बन कर आई थी. अचानक चंद रोज पहले फेसबुक पर रुचिका ने उन के मैसेंजर बौक्स में हाय लिख कर दोस्ती करने का निमंत्रण दिया.

रुचिका के प्रोफाइल में उस की निहायत खूबसूरत तसवीरों को देखने के बाद जितेंद्र  खुद को उस की दोस्ती कबूल करने से रोक नहीं सके. रुचिका को दोस्ती का प्रत्युत्तर मिलते ही फेसबुक मैसेंजर पर उन की दोस्ती की चैट का सिलसिला शुरू हो गया. दिन में कई बार बातें होतीं.

रुचिका ने खुद को नौकरीपेशा और हौस्टल में रहने वाली अविवाहित लड़की बताया. 1-2 दिन में जितेंद्र रुचिका से इतनी करीबी महसूस करने लगे कि अपनी फोटो उस के मैसेंजर में भेजने और उस की फोटो मांगने का सिलसिला शुरू हो गया.

2 दिन बाद ही दोनों के बीच वाट्सऐप नंबरों का भी आदानप्रदान शुरू हो गया. इस के बाद शुरू हुआ देर रात तक चैटिंग और वीडियो काल करने का सिलसिला और ऐसी कामुक बातों का दौर जिस ने रहेसहे फासलों की दूरी भी पाट दी.

धीरेधीरे खुलते गए जितेंद्र सिंह

चौथे दिन चैट करते समय रुचिका ने जितेंद्र से अचानक उन के प्राइवेट पार्ट की वीडियो दिखाने की फरमाइश की तो उन्होंने रुचिका से पहले अपना बदन दिखाने को कहा.

रुचिका ने फरमाइश पूरी कर दी तो बेकाबू हुए जितेंद्र ने भी बाथरूम में जा कर वीडियो काल से उसे भी खुद को आदमजात स्थिति में दिखा दिया.

अगले दिन जब वे खाने की टेबल पर थे तो इसी बीच मैसेंजर पर रुचिका का प्रणय निवेदन आया कि वह उन का देखना चाहती है. इसी के बाद जितेंद्र जल्दी से खाना खत्म कर के बाथरूम में पहुंचे और वहां वही सब हुआ, जो पिछली रात को हुआ था.

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दरअसल, पिछले चंद रोज में रुचिका फेसबुक से हुई दोस्ती के बाद उन की जिंदगी में इतनी तेजी से समा गई थी कि वह उन की सोच पर हावी हो गई थी. अपनी उम्र, समाज की ऊंचनीच और भलेबुरे का उन्हें कोई खयाल ही नहीं रहा.

अहसास तो उन्हें तब हुआ जब अचानक उन के फेसबुक वाल पर उन की कुछ न्यूड फोटो किसी ने अपलोड कर दीं. चूंकि जितेंद्र  सिंह सोशल मीडिया पर ज्यादा ही एक्टिव रहते थे, लिहाजा उन्होंने जैसे ही वह अश्लील फोटो देखी तो उन्हें डिलीट कर अपनी फेसबुक वाल को ब्लौक कर दिया ताकि उस पर कोई कुछ भी अपलोड न कर सके. शुक्र था कि अपलोड होने के तुरंत बाद उन्होंने इन्हें डिलीट कर दिया था.

अचानक वह परेशान हो उठे. कहीं उन की ये तसवीरें फेसबुक के किसी फ्रैंड ने देख तो नहीं लीं… यही सोचतेसोचते वह डिप्रेशन में चले गए. बेटियां जवान और शादीशुदा हों और घर में पत्नी के अलावा बेटा, बहू व पोतेपोती हों तो उम्र के इस पड़ाव में बदनामी के डर से परेशान होना लाजिमी होता है.

शुरू हुई ब्लैकमेलिंग

इस घटनाक्रम की परेशानी अभी कम नहीं हुई थी कि उन के वाट्सऐप पर रुचिका की वाइस काल आई, ‘‘जितेंद्रजी, बहुत मजे ले लिए एक मजबूर लड़की से, अब जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ… मैं तुम को पूरी दुनिया में इतना बदनाम कर दूंगी कि कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहोगे.’’

‘‘यार, ये तुम कैसी बातें कर रही हो… हमारे बीच जो कुछ हुआ है वो तो अंडरस्टैंडिंग से हुआ है. और तुम ने मुझ से बात किए बिना मेरी फोटो मेरे फेसबुक पर क्यों डाली?’’ जितेंद्र  सिंह अचानक रुचिका का फोन आने के बाद सहम गए और गिड़गिड़ाते हुए बोले.

‘‘चलो तब बात नहीं की थी तो अब बात कर लेते हैं… बताइए कितना हरजाना देंगे अपनी रुसवाई से बचने के लिए?’’ रुचिका ने अचानक किसी शातिर कारोबारी की तरह बात करनी शुरू कर दी.

‘‘यार, ये तुम कैसी बात कर रही हो… हम दोनों दोस्त हैं. फिर यह हरजाने वाली बात कहां से आ गई.’’ अचानक जितेंद्र रुआंसे हो गए.

उन्हें अपना पूरा अस्तित्व डूबता हुआ सा नजर आने लगा. वह समझ गए कि एक साजिश के तहत वह एक ब्लैकमेलर लड़की के चंगुल में फंस चुके हैं.

उन्होंने समझदारी और चतुराई से काम लिया और बोले, ‘‘देखो यार, मैं कोई अमीर आदमी नहीं हूं और तुम्हारे पास अगर मेरे खिलाफ सबूत हैं तो मेरे पास भी इस बात के सबूत हैं कि तुम ने मुझ से दोस्ती की शुरुआत कर मुझे फंसाया था. तुम शायद मुझे जानती नहीं हो, मेरे कौन्टैक्ट पुलिस के कई अफसरों से हैं.’’

लेकिन साथ ही उन्होंने उसे शांत करने के लिए यह भी बोला, ‘‘हां, अगर तुम कहोगी तो मैं तुम्हारी थोड़ीबहुत हेल्प कर दूंगा. लेकिन मुझे थोड़ा वक्त चाहिए.’’

जितेंद्र सिंह आगे कुछ कह पाते उस से पहले ही रुचिका ने धमकी भरे अंदाज में कहा, ‘‘देख बे ठरकी… तेरे पास केवल 2 दिन का वक्त है 5 लाख रुपए का इंतजाम कर ले, नहीं तो पूरी दुनिया देखेगी कि तेरे जैसे बुड्ढे किस तरह मासूम लड़कियों से फेसबुक पर दोस्ती कर के अपनी ठरक मिटाते हैं. बाकी का हिसाब तुझ से पुलिस अपने आप ले लेगी. मैं बाद में फोन करूंगी. जल्दी से पैसे का इंतजाम कर.’’

फोन कटने के बाद घबराहट में जितेंद्र  की सांसें लोहार की धौंकनी की तरह चलने लगीं.

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सिंदूरी मूर्ति- भाग 2: जब राघव-रम्या के प्यार के बीच आया जाति का बंधन

खुद रम्या को तो रोज 2 ट्रेनें बदल कर अपने गांव से यहां आना पड़ता था. उन की बातों के दौरान ही ट्रेन आ गईं. जब तक वह कुछ समझता ट्रेन चल पड़ी. रम्या उस में सवार हो चुकी थी और वह प्लेटफौर्म पर ही रह गया. यह क्या अचानक रम्या प्लेटफौर्म पर कूद गई.

रम्या जब कूदी उस समय ट्रेन रफ्तार में नहीं थी. अत: वह कूदते ही थोड़ा सा लड़खड़ाई पर फिर संभल गई.

राघव हक्काबक्का सा उसे देखते रह गया. फिर सकुचा कर बोला, ‘‘तुम्हें इस तरह नहीं कूदना चाहिए था?’’

‘‘तुम अभी मुझ से ट्रेन के अप और डाउन के बारे में पूछ रहे थे… तुम यहां नए हो… मुझे लगा तुम किसी गलत ट्रेन में न बैठ जाओ सो उतर गई,’’ कह रम्या मुसकराई.

रम्या के सांवले मुखड़े को घेरे हुए उस के घुंघराले बाल हवा में उड़ रहे थे. चौड़े ललाट पर पसीने की बूंदों के बीच छोटी सी काली बिंदी, पतली नाक और पतले होंठों के बीच एक मधुर मुसकान खेल रही थी. राघव को लगा यह तो वही काली मिट्टी से बनी मूर्ति है जिसे उस के पिता बचपन में उसे रंग भरने को थमा देते थे.

‘‘क्या सोच रहे हो?’’ रम्या ने पूछा.

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‘‘यही कि तुम्हें कुछ हो जाता तो, मैं पूरी जिंदगी अपनेआप को माफ न कर पाता… तुम्हें ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.’’

‘‘ब्लड… ब्लड…’’ यही शब्द उन वाक्यों के उसे समझ आए, जो डाक्टर रम्या की फैमिली से तमिल में बोल रहा था.

राघव तुरंत डाक्टर के पास पहुंच गया. बोला, ‘‘सर, माई ब्लड ग्रुप इज ओ पौजिटिव.’’

‘‘कम विद मी,’’ डाक्टर ने कहा तो राघव डाक्टर के साथ चल पड़ा. उन्हीं से राघव को पता चला कि शाम तक 5-6 यूनिट खून की जरूरत पड़ सकती है. राघव ने डाक्टर को बताया कि शाम तक अन्य सहकर्मी भी आ रहे हैं. अत: ब्लड की कमी नहीं पड़ेगी.

रक्तदान के बाद राघव अस्पताल के एहाते में बनी कैंटीन में कौफी पीने के लिए आ गया. अस्पताल आए 6 घंटे बीत चुके थे. उस ने एक बिस्कुट का पैकेट लिया और कौफी में डुबोडुबो कर खाने लगा.

तभी उस की नजर सामने बैठे व्यक्ति पर पड़ी, जो कौफी के छोटे से गिलास को साथ में दिए छोटे कटोरे (जिसे यहां सब डिग्री बोलते हैं) में पलट कर ठंडा कर उसे जल्दीजल्दी पीए जा रहा था. रम्या ने बताया था कि उस के अप्पा जब भी बाहर कौफी पीते हैं, तो इसी अंदाज में, क्योंकि वे दूसरे बरतन में अपना मुंह नहीं लगाना चाहते. अरे, हां ये तो रम्या के अप्पा ही हैं. मगर वह उन से कोई बात नहीं कर सकता. वही भाषा की मुसीबत.

तभी उस की नजर पुलिस पर पड़ी, जिस ने पास आ कर उस से स्टेटमैंट ली और उसे शहर छोड़ कर जाने से पहले थाने आ कर अनुमति लेने की हिदायत व पुलिस के साथ पूरा सहयोग करने की चेतावनी दे कर छोड़ दिया.

शाम के 6 बज चुके थे. जब उस के सहकर्मी आए तो राघव की सांस में सांस आई. वे सभी रक्तदान करने के पश्चात रम्या के परिजनों से मिले और राघव का भी परिचय कराया.

तब उस की अम्मां ने कहा, ‘‘हां, मैं ने सुबह से ही इसे यहीं बैठे देखा था. मगर मैं नहीं जान पाई कि ये भी उस के सहकर्मी हैं,’’ और फिर वे राघव का हाथ थाम कर रो पड़ीं.

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उन लोगों के साथ राघव भी लौट गया. वह रोज शाम 7 बजे अस्पताल पहुंच जाता और 9 बजे लौट आता. पूरे 15 दिन तक आईसीयू में रहने के बाद जब रम्या प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट हुई तब जा कर उसे रम्या की झलक मिल सकी. रम्या की पीठ का घाव तो भरने लगा था, मगर उस के शरीर का दायां भाग लकवे का शिकार हो गया था, जबकि बाएं भाग में गहरा घाव होने से उसे ज्यादा हिलनेडुलने को डाक्टर ने मना किया था. रम्या निर्जीव सी बिस्तर पर लेटी रहती. अपनी असमर्थता पर आंसू गिरा कर रह जाती.

दुर्घटना के पूरे 6 महीनों के बाद स्वास्थ्य लाभ कर उस दिन रम्या औफिस जौइन करने जा रही थी. सुबह से रम्या को कई फोन आ चुके थे कि वह आज जरूर आए. उस दिन राघव की विदाई पार्टी थी. वह कंपनी की चंडीगढ़ ब्रांच में ट्रांसफर ले चुका था. वह दिन उस का अंतिम कार्यदिवस था.

कंपनी के गेट तक रम्या अपने अप्पा के साथ आई थी. वे वहीं से लौट गए, क्योंकि औफिस में शनिवार के अतिरिक्त अन्य किसी भी दिन आगंतुक का अंदर प्रवेश प्रतिबंधित था. उस का स्वागत करने को कई मित्र गेट पर ही रुके थे. उस ने मुसकरा कर सब का धन्यवाद दिया. राघव एक गुलदस्ता लिए सब से पीछे खड़ा था.

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रम्या ने खुद आगे बढ़ कर उस के हाथ से गुलदस्ता लेते हुए कहा, ‘‘शायद तुम इसे मुझे देने के लिए ही लाए हो.’’

एक सम्मिलित ठहाका गूंज उठा. ‘तुम्हारी यही जिंदादिली तो मिस कर रहे थे हम सब,’ राघव ने मन ही मन सोचा.

खुशी के आंसू- भाग 3: आनंद और छाया ने क्यों दी अपने प्यार की बलि?

लेखिका- डा. विभा रंजन  

“यही कि शादी हो गई होती, अब तक छाया और आनंद, मम्मीपापा बन गए होते,”

तबस्सुम ने सच्ची बात कह दी.

ज्योति ने यह सुना तो सन्न रह गई. जो उस ने सुना वह सच है या तबस्सुम दी ने ऐसे ही यह बात कह दी. पर वे आनंद का नाम क्यों ले रही हैं वे किसी और का भी तो नाम ले सकती हैं. इस का मतलब है, दीदी और आनंद जी… ज्योति को कुछ समझ नहीं आ रहा था. उस ने जैसेतैसे खुद को संभाला और अपने चेहरे के भाव को सामान्य कर कर लिया.

तबस्सुम दिनभर रही और रात होने से पहले वापस घर चली गई. पर ज्योति के मन में हलचल मचा गई. मतलब साफ है, पापा भी इन लोगों के बारे में जानते थे, वह कैसे नहीं जान पाई. पापा की बीमारी में अस्पताल में आनंदजी आते रहते थे. उस समय की परिस्थिति ऐसी थी जिस में इन सभी विषयों पर सोचने की फुरसत भी नहीं थी. जब पापा के कैंसर का पता चला तब हम सभी पापा में लग गए. एक बात तो स्पष्ट है कि आनंद और दीदी का प्यार बहुत गहरा है. एकदूसरे के प्रति अटूट विश्वास है. इसी कारण इन्हें किसी को दिखाने की जरूरत नहीं पडी. उसी प्यार में दीदी ने आनंदजी को मुझ से विवाह करने के लिए मना भी लिया. दीदी ने ऐसा क्यों किया? काश, एक बार मुझे सब सच बता दिया होता. यह तो अच्छा हुआ कि तबस्सुम दी ने मुझे सच से अवगत करा दिया वरना…

स्कूल की परीक्षा समाप्त होने के बाद छाया ने ज्योति से कहा, “ज्योति, पापा की बरसी के बाद  मैं तेरे विवाह की सोच रही हूं. बरसी को 2 महीने रह गए हैं. तब तक मैं धीरेधीरे शादी की तैयारियां भी करती रहूंगी.”

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“इतनी जल्दी क्या है दीदी,”  ज्योति ने कहा.

“नहीं ज्योति, शुभकार्य में विलंब ठीक नहीं,”  छाया को जैसे हड़बड़ी थी.

“हां, तो ठीक है. अगले सप्ताह 27 तारीख को तुम्हारा जन्मदिन है, उस दिन कुछ कार्यक्रम कर लो,”    ज्योति ने कहा.

“धत, मेरे जन्मदिन के समय ठीक नहीं है, किसी और दिन रखूंगी.” छाया ने मना कर दिया.

“दीदी, मुझे कुछ कहना है,” ज्योति ने आग्रह किया.

“हां, बोलो,” छाया ज्योति को देखते हुए बोली.

“दीदी, इस बार  मैं तुम्हारा जन्मदिन अपनी पसंद से सैलिब्रेट करना चाहती हूं,” ज्योति ने बहुत लाड़ से कहा.

“अरे, मेरा जन्मदिन क्या मनाना,” छाया ने टालना चाहा.

“मैं ने कहा न, इस बार मैं तुम्हारा जन्मदिन सैलिब्रेट करूंगी, फिर तो मैं ससुराल चली जाऊंगी, तुम तो मेरी हर इच्छा पूरी करती हो, इतनी सी बात नहीं मानोगी,” ज्योति  छाया से मनुहार करने लगी.

“अच्छा बाबा, तुम सैलिब्रेट करना, पर भीड़भाड़ नहीं, समझीं,” छाया ने अपनी बात रख दी.

“ठीक है, मैं समझ गई,” ज्योति खुश हो गई.

छाया स्कूल में आनंद से, बस, काम की बात किया करती थी. वह कोशिश करती कि आनंद से उस का सामना कम हो. उस ने आनंद को छोड़ने का फैसला तो कर लिया पर जैसेजैसे दिन बीत रहे थे, उस का मन बोझिल होता जा रहा था. अपने जन्मदिन के दिन उस का मन खिन्न हो उठा क्योंकि हर जन्मदिन पर सब से पहले आनंद का ही फोन आता था. इस रास्ते को तो वह स्वयं ही बंद कर आई है.

छाया का मन बेचैन था, इंतजार करता रहा, आनंद का फोन नहीं आया. छाया ने ज्योति से काम का बहाना बनाया और आनंद से मिलने के लिए स्कूल चली आई. स्कूल आ कर पता चला आनंद ने 2 दिनों की छुट्टी ले रखी है. थोड़ी देर स्कूल में रुकने के बाद वह घर आ गई.

ज्योति उस की बेचैनी समझ रही थी. पर वह चुप थी. ज्योति ने पूरे घर को छाया की पसंद के फूलों से सजाया था. उस ने सारा खाना अपने हाथों से बनाया, यहां तक कि केक भी उस ने बडे प्यार से बनाया. छाया ने कहा था इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत है, केक मंगा लेते हैं. पर वह तैयार नहीं हुई.

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ज्योति ने छाया को मां की साड़ी दे कर कहा, “दीदी, शाम को यही पहनना.”

“मां की साडी, क्यों?” छाया ने अचरज से पूछा.

“पहन लो न. बस, ऐसे ही. आज तो मेरी हर बात माननी है, याद है न,” ज्योति ने और्डर से कहा.

“अच्छा, हां.”  छाया ने कहा. छाया का मन हो रहा था वह ज्योति से पूछे कि आनंद को बुलाया है या नहीं. पर उस की हिम्मत नहीं हुई. “तुम क्या पहन रही हो?”  छाया ने प्यार से पूछा.

“आज तुम ने जो पीला सूट दिया था न, वह वाला पहनूंगी. ठीक है न?”  ज्योति खुशी से बोली.

शाम को दोनों बहनें तैयार हो रही थीं, तभी बाई ने बताया कि आनंद बाबू आए हैं. छाया का दिल जोर से धड़कने लगा. उसे लगा, वह गिर जाएगी. उस ने अपनेआप को संभाला.

“आ गए आप, मैं ने तो आप को और पहले से आने को कहा था. आप इतनी देर में क्यों आए?” ज्योति का आनंद से बेतकल्लुफ़ हो कर बोलना आनंद और छाया दोनों ने गौर किया.

“वह कुछ काम था, इसलिए देर हो गई, हैप्पी बर्थडे छाया,” आनंद ने रजनीगंधा का एक खुबसूरत बुके देते हुए छाया से सकुचाते हुए कहा.

छाया ने “थैक्स” कह बुके को झट से अपने कलेजे से लगा लिया और अंदर कमरे में जाने लगी.

“दीदी, कहां जा रही हो, केक नहीं काटोगी,” ज्योति ने छाया का हाथ पकड़ा और उसे खींचती हुई आनंद के पास ला कर सोफे पर बिठा दिया और फिर बोली, “मैं केक ले कर आ रही हूं.”

छाया को बड़ी बेचैनी हो रही थी. आनंद से मिलना भी चाह रही थी, जब आनंद सामने आया तब घबराहट सी होने लगी. तभी ज्योति केक ले आई, “हैप्पी बर्थडे टू यू डीयर दीदी, हैप्पी बर्थडे टू यू.”

ज्योति का उत्साह देखते बन रहा था. दोनों बहनों ने एकदूसरे को केक खिलाया फिर आनंद को केक दिया.”केक तो बहुत अच्छा है,” आनंद ने कहा.“ज्योति ने बनाया है,” छाया ने बड़े गर्व से कहा, “आज का सारा इंतजाम मेरी ज्योति ने किया है.”

“ओह, और गिफ्ट क्या दिया?”

“नहीं दी हूं, अभी दूंगी,” ज्योति ने तपाक से कहा, फिर ज्योति ने आनंद के दिए हुए रजनीगंधा के बुके से एक फूल की डंडी निकाल कर छाया को देते हुए कहा,

“त्वदीयं वस्तु दीदी तुभ्यमेव समर्पये.” यानी, “ तुम्हारी चीज तुम्हें ही सौपती हूं दीदी.”

“क्या बोल रही है,” छाया हड़बड़ा गई.

“सही बोल रही हूं दीदी, तुम्हारी चीज मैं तुम्हें वापस लौटा रही हूं,” ज्योति ने आनंद की ओर अपना हाथ दिखाते हुए कहा.

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“मुझे पता चल चुका है दीदी आप दोनों के बारे में. आप दोनों की तो शादी होने वाली थी, पर पापा के असमय मौत से टल गई. सब जानते हुए आप ने कैसे मेरी शादी आनंदजी से तय कर दी. मैं नहीं जानती आप ने आनंदजी को किस तरह मुझ से शादी के लिए मजबूर किया होगा, लेकिन यह सब करते आप ने एक बार भी नहीं सोचा कि जिस दिन मुझे इस सच का पता चलेगा, उस दिन मुझ पर क्या बीतेगी. यह सच जान कर मैं तो आत्महत्या ही कर लेती दीदी.”

“ज्योति, ऐसा मत बोल,” छाया ने उस की बात काटते हुए तड़प कर उस के मुंह पर अपना हाथ रख दिया.

“मैं ने, बस, तेरी खुशी चाही, और कुछ नहीं.”

“ऐसी खुशी किस काम की दीदी, जिस में बाद में पछताना पडे. आप को क्या लगा, अगर आप सच बता देतीं, तब मैं आप से नफरत करने लगती, आप से दूर हो जाती? नहीं दीदी, मैं आप से कभी नफरत कर ही नहीं सकती दीदी, लेकिन आप ने मुझे अपनी ही नजरों में गिरा दिया,” यह सब  बोल कर ज्योती हांफने लगी.

“बस कर ज्योति, बस कर. मैं ने इतनी गहरी बात कभी सोची ही नहीं. मैं बहुत बडी गलती करने जा रही थी, मुझे माफ कर दे. कभीकभी बड़ों से भी नादानियां हो जाती हैं. बस, एक बार मुझे माफ कर दे मेरी बहन.”

“एक शर्त पर,” ज्योति ने कहा.”मैं तेरी हर शर्त मानने को तैयार हूं, तू बोल कर तो देख,” छाया ने कहा.”आप अभी यह केक मेरे होने वाले आनंद जीजाजी को खिलाइए,” ज्योती ने आनंद की ओर इशारा करते हुए  कहा.

“ओके.” छाया ने केक का टुकड़ा आनंद के मुंह में डाला. उस की आंखें, उस का तनमन, उस का रोमरोम  उस से क्षमायाचना कर रहा था. तीनों की आंखें भरी थीं, पर ये आंसू खुशी के थे.

Crime Story: पुलिस वाले की खूनी मोहब्बत- भाग 3

संयोग ऐसा रहा कि पूजा और स्वीटी करीब 3 साल पहले एक ही समय गर्भवती हुईं. बाद में स्वीटी ने बेटे को जन्म दिया और पूजा ने बेटी को.

बच्चा होने के कई दिन बाद स्वीटी को अजय की दूसरी शादी के बारे में पता चला. इस बात पर स्वीटी का अजय से झगड़ा होने लगा. दिन पर दिन झगड़ा बढ़ता गया. अजय 2 नावों की सवारी कर रहा था. वह न तो स्वीटी को छोड़ना चाहता था और न ही पूजा को.

स्वीटी से रोज होने वाले झगड़े को देखते हुए अजय ने उस का काम तमाम करने पर विचार किया. किरीट सिंह जड़ेजा अजय का दोस्त था. किरीट के पास पैसा भी था और राजनीतिक प्रभाव भी.

भरूच जिले के अटाली गांव में वह एक होटल बनवा रहा था, लेकिन उस का निर्माण कार्य किसी वजह से बीच में ही अधूरा छोड़ दिया था.

गला घोंट कर की थी स्वीटी की हत्या

एक दिन अजय ने किरीट से एक लाश ठिकाने लगाने के बारे में बात की. अजय ने किरीट को यह नहीं बताया कि लाश किस की होगी.

उस ने बताया कि परिवार में एक महिला के गैर व्यक्ति से संबंध हो गए. इस से वह महिला गर्भवती हो गई है. परिवार के लोग उसे मार कर लाश ठिकाने लगाना चाहते हैं. किरीट सिंह ने दोस्ती में अजय से इस काम में सहयोग करने का वादा किया.

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4 जून, 2021 की रात अजय जब घर पहुंचा, तो पूजा से शादी को ले कर स्वीटी से उस का फिर विवाद हुआ. रोजाना के झगड़े से तंग आ कर अजय ने उसे ठिकाने लगाने का फैसला किया.

वह काफी देर तक इस पर सोचता रहा. स्वीटी जब सो गई तो आधी रात बाद उस ने गला घोंट कर उस को मार डाला.

रात भर वह अपने फ्लैट पर ही रहा. सुबह नहाधो कर तैयार हुआ. उस ने अपने दोस्त किरीट सिंह को फोन कर कहा कि परिवार के लोगों ने रिश्ते की बहन को मार डाला है, अब लाश ठिकाने लगानी है.

किरीट ने इस काम में सहयोग करने का वादा करते हुए कहा कि वह लाश को अटाली गांव में उस के निर्माणाधीन होटल के पिछवाड़े ले जा कर ठिकाने लगा दे.

इस के बाद अजय ने अपने साले जयदीप को फोन कर कहा कि स्वीटी रात एक बजे से सुबह साढ़े 8 बजे के बीच घर से बिना बताए कहीं चली गई है. उस समय लाश घर में थी.

बाद में अजय स्वीटी की लाश को एक एसयूवी कार में रख कर अटाली गांव ले गया और दोस्त किरीट सिंह के निर्माणाधीन होटल के पिछवाड़े रख कर जला दी. इस के लिए उस ने कुछ लकडि़यां और कैमिकल का भी इंतजाम कर लिया था. लाश जलाने के बाद वह वापस अपने घर आ गया. इस के बाद की कहानी आप पढ़ चुके हैं.

पुलिस ने स्वीटी की हत्या के आरोप में अजय और किरीट सिंह जडेजा को रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने

27 जुलाई को स्वीटी की हत्या से ले कर उस की लाश जलाने तक की घटना का रीक्रिएशन किया.

बाद में पुलिस ने अटाली में निर्माणाधीन बिल्डिंग के पिछवाड़े से स्वीटी की अंगुलियों की हड्डियां, जला हुआ मंगलसूत्र, हाथ का ब्रैसलेट, अंगूठी आदि बरामद किए.

परिवार वालों ने मंगलसूत्र स्वीटी का होने की पुष्टि की. पुरानी तसवीरों में भी स्वीटी वही मंगलसूत्र पहने हुए थी.

पुलिस इसे अहम सबूत मान रही है. अजय के पौलीग्राफ टेस्ट और एसडीएस परीक्षण की रिपोर्ट भी पौजिटिव आई है.

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अहम सबूत मिले पुलिस को

रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने अदालत के आदेश पर अजय और किरीट सिंह को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया. स्वीटी का बेटा अंश पूजा के पास था. सरकार ने भी पुलिस इंसपेक्टर अजय देसाई को सस्पेंड कर दिया.

अजय भले ही पुलिस इंसपेक्टर था. वह 48 दिनों तक पुलिस को छकाता रहा, लेकिन पुरानी कहावत आज भी सच है कि अपराधी कितना भी शातिर हो, वह कोई न कोई सबूत जरूर छोड़ता है. अजय के साथ भी ऐसा ही हुआ. आखिर वह गिरफ्तार हुआ.

अजय एक म्यान में दो तलवारें रखना चाहता था. यह न तो सामाजिक नजरिए से उचित था और न ही उस की सरकारी नौकरी के लिहाज से. उस ने पूजा से शादी करने की बात स्वीटी को नहीं बता कर अलग सामाजिक अपराध किया.

कोई भी महिला अपने पति का बंटवारा नहीं चाहती. पति की दो नावों की सवारी में पूजा बेमौत मारी गई. 2 शादियां करने के बाद भी उसे कफन तक नसीब नहीं हुआ और स्वीटी के दोनों बेटे भी मां की ममता से महरूम हो गए.

इधर-उधर- भाग 3: अंबर को छोड़ आकाश से शादी के लिए क्यों तैयार हो गई तनु?

Writer- Rajesh Kumar Ranga

आकाश ने वेटर को बिल लाने को कहा तो मैनेजर ने बिल लाने से इनकार कर दिया, ‘‘यह हमारी तरफ से.’’

‘‘नहीं मैनेजर साहब, अभी हम इस होटल के मालिक नहीं बने हैं और बन भी जाएं तो भी मैं नहीं चाहूंगा कि हमें या किसी और को कुछ भी मुफ्त में दिया जाए. मेरा मानना है कि मुफ्त में सिर्फ खैरात बांटी जाती है और खैरात इंसान की अगली नस्ल तक को बरबाद करने के लिए काफी होती है.’’

होटल के बाहर निकल कर आकाश ने तनु की ओर नजर डाली और कहा,

‘‘बहुत दिनों से लोकल में सफर करने की इच्छा थी, आज छुट्टी का दिन है भीड़भाड़ भी कम होगी. क्यों न हम यहां से लोकल ट्रेन में चलें फिर वहां से टैक्सी.’’

तनु ने अविश्वास से आकाश की ओर देखा और फिर दोनों स्टेशन की तरफ चल पड़े.

‘‘आप तो अकसर विदेश जाते रहते होंगे. क्या फर्क लगता है हमारे देश में और विदेशों में?’’

‘‘सच कहूं तो लंदन स्कूल औफ इकौनोमिक्स से डिगरी लेने के बाद मैं विदेश बहुत कम गया हूं. आजकल के जमाने में इंटरनैट पर सबकुछ मिल जाता है और जहां तक घूमने की बात है यूरोप की छोटीमोटी भुतहा इमारतें जिन्हें वे कैशल कहते हैं और किले मुझे ज्यादा भव्य लगते हैं… स्विटजरलैंड से कहीं अच्छा हमारा कश्मीर है, सिक्किम है, अरुणाचल है, बस जरूरत है सफाई की, सुविधाओं की और ईमानदारी की…’’

‘‘जो हमारे यहां नहीं है… है न?’’ तनु ने प्रश्न किया.

‘‘आप इनकार नहीं कर सकतीं कि बदलाव आया है और अच्छी रफ्तार से आया है. जागरूकता बढ़ी है, देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है, हमारे पासपोर्ट की इज्जत होनी शुरू हो गई है. आज का भारत कल के भारत से कहीं अच्छा है और कल का भारत आज के भारत से लाख गुना अच्छा होगा.’’

‘‘आप तो नेताओं जैसी बातें करने लगे आकाशजी,’’ तनु को उस की बातों में कोई दिलचस्पी नहीं थी.

गेटवे के किनारे तनु ने फिर नारियल पानी पीने की इच्छा जाहिर कर दी. दोनों ने नारियल पानी पीया.

सही कहा गया है कि इंसान के हालात का और मुंबई की बरसात का कोई भरोसा नहीं. एक बार फिर बादलों ने पूरे माहौल को अपने आगोश में ले कर लिया और चारों ओर रात जैसा अंधेरा छा गया. अगले ही पल मोटीमोटी बूंदों ने दोनों को भिगोना शुरू कर दिया. दोनों भाग कर पास की एक छप्परनुमा दुकान में घुस कर गरमगरम भुट्टे खाने लगे.

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आकाश ने जेब से पैसे निकाले और भुट्टे वाली बुजुर्ग महिला के हाथ में थमा दिए. उस की नजर उमड़ते बादलों पर ही थी. प्रश्नवाचक दृष्टि से उस ने तनु की ओर देखा और दोनों बाहर निकल गए. टैक्सी लेने की तमाम कोशिशें नाकामयाब होने के बाद दोनों स्टेशन की ओर पैदल ही निकल पड़े. रास्ते में आकाश ने ड्राइवर को फोन कर के कामा होटल से गाड़ी ले कर स्टेशन आने को कह दिया.

घर पहुंचतेपहुंचते रात हो चुकी थी. आकाश और उस के परिवार वालों ने इजाजत

मांगी. उन के जाते ही जयनाथजी कुछ कहने के लिए मानो तैयार ही थे, ‘‘कितने पैसे वाले लोग हैं, मगर कोई मिजाज नहीं, कोई घमंड नहीं, हम जैसे मध्यवर्ग वालों की लड़की लेना चाहते हैं. कोई दहेज की मांग नहीं, यहां तक कि…’’

‘‘तो मुझे क्या करना चाहिए अंबर कि बजाय आकाश को पसंद कर लेना चाहिए, क्योंकि आकाश करोड़पति है, उस के मातापिता घमंडी नहीं हैं. वे धरातल से जुड़े हैं और सब से बड़ी बात कि उन्हें हम, हमारा परिवार, हमारी सादगी पसंद है. अपनी पसंद मैं भाभी को सुबह ही बता चुकी हूं, आकाश से मिलने के बाद उस में कोई तबदीली नहीं आई है…’’

‘‘ठीक है इस बारे में हम बाकी बातें कल करेंगे…’’ जयनाथजी ने लगभग पीछा छुड़ाते हुए कहा.

रात के करीब 2 बजे तनु ने भाभी को फोन मिलाया, ‘‘भाभी मुझे आप से मिलना है. भैया तो बाहर गए हैं. जाहिर है आप भी जग रही होंगी, मुझे अंबर के बारे में कुछ बातें करनी हैं, मैं आ जाऊं?’’

‘‘तनु मैं गहरी नींद में हूं… हम सुबह मिलें?’’

‘‘मैं तो आप के दरवाजे पर ही हूं… गेट खोलेंगी या खिड़की से आना पड़ेगा?’’

अगले ही पल तनु अंदर थी. बातों का सिलसिला शुरू करते हुए भाभी ने तनु से पूछा, ‘‘तुम मुझे अपना फैसला सुना चुकी हो. अब इतनी रात मेरी नींद क्यों खराब कर रही हो?’’

‘‘भाभी, अंबर को फोन कर के कहना है कि मैं उस से शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘क्या?’’ भाभी को लगा कि वह अभी भी नींद में ही है.

पलक झपकते ही तनु ने अंबर को फोन लगा दिया, ‘‘हैलो अंबर मैं तनु बोल रही हूं… मैं इधरउधर की बात करने के बजाय सीधा मुद्दे पर आना चाहती हूं…’’

‘‘ठीक है… जल्दी बता दो मैं इधर हूं या उधर…’’

‘‘इधरउधर की छोड़ो और सुनो सौरी यार मैं तुम से शादी नहीं कर सकती…’’

‘‘ठीक है मगर इतनी रात को क्यों बता रही हो… सुबह तक…’’

‘‘सुबह तक मेरा दिमाग बदल गया तो? तुम चीज ही ऐसी हो कि तुम्हें मना करना बहुत मुश्किल है…’’

‘‘अच्छा औल द बैस्ट, अब सो जाओ और मुझे भी सोने दो, किसी उधर वाले से शादी तय हो जाए तो जगह, तारीख वगैरह बता देना मैं आ जाऊंगा, मुफ्त का खा कर चला जाऊंगा…’’

‘‘मुफ्ती साहब, गिफ्ट लाना पड़ेगा. शादी में खाली लिफाफे देने का रिवाज दिल्ली में होगा, मुंबई में नहीं…’’

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‘‘ठीक है 2-4 फूल ले आऊंगा. अब मुझे सोने दो… सुबह मेरी फ्लाइट है…’’

भाभी बिलकुल सकते में थी, ‘‘ये सब क्या है तनु? तुम तो अंबर पर फिदा हो गई थी… क्या आकाश का पैसा तुम्हें आकर्षित कर गया? क्या उस की बड़ी गाड़ी अंबर की मोटरसाइकिल से आगे निकल गई?’’

‘‘भाभी अंबर पर फिदा होना स्वाभाविक है. ऐसे लड़के के साथ घूमनाफिरना,

मजे करना, अच्छा लगेगा मगर शादी एक ऐसा बंधन है, जिस में एक गंभीर, संजीदा इंसान चाहिए न कि कालेज से निकला हुआ एक हीरोनुमा लड़का.

‘‘हम घर से बाहर निकले तो आकाश ने पूरे शिद्दत से ट्रैफिक के सारे नियमों का पालन किया, मेरे लाख कहने के बावजूद उस ने गाड़ी नो ऐंट्री में नहीं घुमाई, अपने देश के बारे में उस के विचार सकारात्मक थे. उसे देश से कोई शिकायत न थी, रेस्तरां में वेटर से इज्जत से बात की न कि उसे वेटर कह कर आवाज दी, मुफ्त का खाने के बजाय उस ने पैसे देने में अपनी खुद्दारी समझ.

‘‘बड़ी गाड़ी छोड़ कर लोकल ट्रेन में जाने में उसे कोई परहेज नहीं, नारियल पानी पी कर उस ने नारियल एक ओर उछाला नहीं, बल्कि डस्टबिन की तलाश की, भुट्टे वाली माई को उस ने जब मुट्ठीभर पैसे दिए तो उस का सारा ध्यान इस पर था कि मैं कहीं देख न लूं.

‘‘इतने पैसे उस भुट्टे वाली ने एकसाथ कभी नहीं देखे होंगे… इतने संवेदनशील व्यक्तित्व के मालिक के सामने मैं एक प्यारे से हीरो को चुन कर जीवनसाथी बनाऊं? इतनी बेवकूफ मैं लगती जरूर हूं, मगर हूं नहीं.’’

भाभी सिर पर हाथ रख कर बैठ गई.

‘‘क्या सर दर्द हो रहा है.’’

‘‘नहीं बस चक्कर से आ रहे हैं…’’

‘‘रुको, अभी सिरदर्द दूर हो जाएगा…’’ तनु ने कहा.

भाभी बोल पड़ी, ‘‘अब क्या बाकी है?’’

तनु ने फोन उठाया और एक नंबर मिलाया, ‘‘हैलो आकाश, मैं ने फैसला कर लिया है… मुझे आप पसंद हैं. मैं आप से शादी करने को तैयार हूं. मुझे पूरा यकीन है कि मैं भी आप को पसंद हूं.’’

‘‘तुम ने फैसला ले कर मुझे बताने का जो समय चुना वह वाकई काबिलेतारीफ है,’’ दूसरी ओर से आवाज आई.

‘‘हूं… मगर भाभी इस बात को मानती ही नहीं… देखो मुझे धक्के मार कर अपने कमरे से बाहर निकालने पर उतारू है…’’

‘‘आकाश ने जेब से पैसे निकाले और भुट्टे वाली बुजुर्ग महिला के हाथ में थमा दिए.

उसकी नजर उमड़ते बादलों पर ही थी. प्रश्नवाचक दृष्टि से उस ने तनु की ओर देखा और दोनों बाहर निकल गए…’’

Manohar Kahaniya: पुलिस अधिकारी का हनीट्रैप गैंग- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

35साल की उम्र, गोरा रंग, तीखे नाकनक्श और गठीले बदन की सुनीता ठाकुर भोपाल के औद्योगिक क्षेत्र मंडीदीप की निवासी थी. अपनी अदाओं से वह लड़कों को दीवाना बना देती थी. जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही उस के हुस्न के चर्चे मंडीदीप की गलियों में होने लगे थे.

सुनीता के रंगढंग देख कर उस के पिता मानसिंह ठाकुर ने उस की शादी होशंगाबाद के पास के गांव में रहने वाले गणेश राजपूत से कर दी. सुनीता और गणेश के 3 बेटे और एक बेटी थी.

सन 2013 में सुनीता अपने पति गणेश और बच्चों के साथ गांव से आ कर होशंगाबाद के बालागंज में किराए के मकान में रहने लगी. उस की खूबसूरती देख कर कोई यकीन नहीं कर सकता था कि सुनीता 4 बच्चों की मां भी है.

गणेश की माली हालत अच्छी नहीं थी, मगर सुनीता हालात से समझौता करने वाली लड़की नहीं थी. फैशनपरस्त और मौडर्न खयालों की बिंदास युवती को घरपरिवार की बंदिशें ज्यादा दिनों तक रोक नहीं पाईं और एक दिन पति का घर छोड़ वह वापस मंडीदीप में आ कर रहने लगी.

सुनीता अब तितली की भांति तरहतरह के फूलों की महक लेने लगी. उस ने अपनी ख्वाहिशें पूरी करने के लिए लोगों को अपने प्रेमजाल में फंसा कर ब्लैकमेलिंग का धंधा शुरू कर दिया था. देखते ही देखते वह कार में चलने लगी और उस के हाथों में महंगे स्मार्टफोन रहने लगे.

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सुनीता पहले फेसबुक और सोशल मीडिया के जरिए होशंगाबाद जिले के नौजवानों से दोस्ती करती थी.

नजदीकियां बढ़ने पर वह दोस्तों को होटल में ले जा कर उन के साथ अंतरंग संबंध बना कर मोबाइल फोन में वीडियो बना लेती. फिर ब्लैकमेलिंग का खेल खेल कर युवकों से पैसा वसूल करने लगी.

उस ने इसी तरह से होशंगाबाद जिले के सोहागपुर के एक युवा व्यापारी विनोद रघुवंशी को भी फांस लिया था. 17 मार्च, 2021 की बात है. विनोद रघुवंशी के मोबाइल पर सुनीता ने फोन किया, ‘‘विनोदजी, मुझे आप से जरूरी बात करनी है और आप फोन तक नहीं उठा रहे.’’

‘‘हां बताइए, क्या कहना चाहती हैं आप?’’ विनोद रघुवंशी ने पूछा.

‘‘देखो, इस समय मेरे पास 2-3 लड़कियां हैं. एक रात के 2 हजार रुपए लगेंगे.’’ सुनीता बोली.

विनोद ने सुनीता को डांटते हुए कहा, ‘‘नहीं, मुझे किसी की जरूरत नहीं है, अब मुझे कभी फोन मत करना.’’ विनोद ने फोन कट कर के उस के नंबर को ब्लौक लिस्ट में डाल दिया.

सुनीता ने फांसा विनोद रघुवंशी को

सुनीता तो जैसे विनोद के पीछे ही पड़ गई थी. 21 मार्च को सुनीता ठाकुर सोहागपुर पहुंची और दूसरे नंबर से विनोद रघुवंशी को फोन कर के उस से एक बार मिलने को कहा. सुनीता के बारबार के फोन काल से परेशान हो कर विनोद ने उस से मिलने का फैसला किया और सुनीता से मिलने पहुंच गया. सोहागपुर में नए थाने के सामने एक कार में सुनीता ठाकुर के साथ एक महिला और एक युवक भी था.

जब विनोद रघुवंशी सुनीता ठाकुर से मिला तो सुनीता ने कहा, ‘‘देखो, मेरे पास जो 2 लड़कियां हैं, वो एकदम मस्त हैं. उन से मिलोगे तो खुश हो जाओगे. चाहो तो अभी उन्हें हमारे साथ चल कर देख सकते हो.’’

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‘‘मुझे इस की कोई जरूरत नहीं है.’’ विनोद ने कहा.

सुनीता विनोद पर काफी दबाब बनाती रही, लेकिन उस ने उस की एक न सुनी. उस से जल्द ही पीछा छुड़ा कर वह अपने खेत की तरफ चला गया.

दूसरे दिन 22 मार्च को सुनीता ने दोबारा किसी नए नंबर से विनोद को फोन किया और धमकी दे क र कहने लगी, ‘‘मैं तुम्हारे घर पुलिस ले कर आ रही हूं.’’

यह सुन कर विनोद चौंक गया, ‘‘पुलिस… मैं ने ऐसा क्या कर दिया?’’

विनोद के इतना कहने के बाद सुनीता ने उसे वाट्सऐप से एक शिकायती पत्र की कौपी भेजी. उस पर 22 मार्च की ही होशंगाबाद के सिटी थाने की मोहर भी लगी हुई थी.

थानाप्रभारी को दिए गए उस पत्र में सुनीता ठाकुर ने आरोप लगाया था कि विनोद रघुवंशी ने मेरे साथ शादी का झांसा दे कर 4 दिन

तक गलत काम किया और पचमढ़ी घुमाने ले गया था.

इसे देख कर विनोद डर गया. उस ने सुनीता को फोन लगा कर कहा, ‘‘मैडम, मैं ने ऐसा क्या कर दिया जो तुम ने मेरे खिलाफ पुलिस में यह शिकायत की है.’’

‘‘यह बात तो तुम कोर्ट में कहना. पुलिस जब तुम्हें कूट कर जेल भेज देगी तब कोर्ट में तुम्हें अपनी बात कहने का मौका मिलेगा.’’ सुनीता ने धमकाया.

‘‘मैडम, इस शिकायत को वापस ले लो और इस के बदले में जो चाहती हो बता दो.’’ विनोद गिड़गिड़ाते हुए बोला.

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‘‘अगर तुम पुलिसकचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते तो 2 लाख रुपए दे दो.’’

‘‘2 लाख तो अभी मेरे पास नहीं हैं. अभी मेरे पास 20-25 हजार हैं,’’ वह बोला.

‘‘ठीक है, अभी यह दे दो. बाकी बाद में दे देना.’’ सुनीता ने कहा.

30 मार्च को विनोद सुनीता ठाकुर के बताए स्थान पर पैसे पहुंचाने के लिए सोहागपुर से होशंगाबाद चला गया. वहां पहुंच कर उस ने सुनीता ठाकुर को फोन किया, तो उस का फोन बंद मिला.

काफी देर बाद भी जब उस का फोन नहीं मिला तो विनोद वापस लौट आया. लेकिन उस के मन में सुनीता की उस शिकायत का डर बैठा हुआ था.

रुपए के लेनदेन से मामला हुआ उजागर

इस के बाद वह डरी हुई हालत में विधायक सीताशरण शर्मा से मिलने पहुंच गया. विनोद ने अपने साथ हुई ब्लैकमेलिंग की पूरी कहानी विधायक को बताई. विधायक सीताशरण शर्मा ने विनोद से पूछा, ‘‘तुम ने उस महिला के साथ कोई गलत काम तो नहीं किया?’’

अगले भाग में पढ़ें- वीडियो से हुई ब्लैकमेलिंग

Satyakatha: रिश्तों का कत्ल- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

7 जून को पुलिस को मृतक शैलेंद्र की काल डिटेल्स मिल गई थी. विवेचनाधिकारी सिंह ने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो उस में एक नंबर ऐसा भी मिला, जिस से काफी बातचीत हुई थी. पुलिस ने मृतक की पत्नी से उस नंबर के बारे में जानकारी मांगी तो वह नंबर मृतक के दामाद पवन कुमार का निकला.

विवेचनाधिकारी सिंह की नजरों में पता नहीं क्यों पवन संदिग्ध रूप में चढ़ गया था. फिर उन्होंने पवन के बारे में सरिता देवी से जानकारी ली. सास सरिता देवी ने उन्हें दामाद पवन के बारे में जो जानकारी दी, सुन कर वह चौंक गए थे.

पता चला कि पवन ने अपनी पत्नी सृष्टि के होते हुए अपने बड़े साले पीयूष की पत्नी निभा से प्रेम विवाह कर लिया था. यही नहीं, एक मोटी रकम को ले कर ससुर शैलेंद्र और दामाद पवन के बीच कई महीनों से रस्साकशी चल रही थी.

दरअसल, बिहारशरीफ रेलवे स्टेशन के पास एक 5 कट्ठे की जमीन थी. वह जमीन शैलेंद्र कुमार को पसंद आ गई थी. दामाद पवन ने उन्हें वह जमीन दिलवाने की हामी भी भर दी थी. दामाद के जरिए 60 लाख में जमीन का सौदा भी पक्का हो गया था.

जमीन मालिक को कुछ पैसे एडवांस दिए जा चुके थे और 17 जून को जमीन का बैनामा छोटे बेटे मनीष के नाम होना तय हो गया था. इसी दौरान शैलेंद्र की हत्या हो गई.

खैर, पुलिस ने पवन के मोबाइल नंबर को सर्विलांस में लगा दिया और मुखबिरों को भी उस के पीछे लगा दिया ताकि उस की गतिविधियों के बारे में सहीसही पता लग सके.

अंतत: पवन वह गलती कर ही बैठा, जिस की संभावना पुलिस को बनी हुई थी. उस गलती के बिना पर पुलिस ने पवन को उस के रामकृष्णनगर स्थित घर से धर दबोचा और उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई.

पुलिस ने पवन से कड़ाई से पूछताछ करनी शुरू की तो पवन एकदम से टूट गया और ससुर की हत्या का जुर्म कुबूल करते हुए कहा, ‘‘हां सर, मैं ने ही सुपारी दे कर ससुर की हत्या कराई थी. मुझे माफ कर दीजिए सर, मैं पैसों के लालच में अंधा हो गया था.’’ कह कर वह रोने लगा.

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‘‘तुम्हारे इस काम में और कौनकौन थे या फिर तुम ने यह सब अकेले ही किया?’’ विवेचनाधिकारी मनोज कुमार ने सवाल किया.

‘‘साहब, मेरे इस काम में मेरी दूसरी पत्नी निभा, छोटा भाई टिंकू और शूटर अमर शामिल थे.’’ उस ने बताया.

‘‘ठीक है तो ले चलो सभी गुनहगारों के पास.’’

इस के बाद पुलिस पवन को कस्टडी में ले कर रामकृष्णनगर पहुंची और उस की पत्नी निभा तथा छोटे भाई टिंकू को गिरफ्तार कर लिया. उसी दिन कंकड़बाग के अशोकनगर कालोनी से शूटर अमर को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

तीनों आरोपियों ने भी अपने जुर्म कुबूल कर लिए. उस के बाद इस हत्या की जो कहानी सामने आई, बेहद चौंकाने वाली थी, जहां पैसों के लालच में अंधे हुए दामाद ने कई रिश्तों का कत्ल कर दिया था. पढ़ते हैं इस कहानी को—

60 वर्षीय शैलेंद्र कुमार सिन्हा मूलत: बिहार के नालंदा जिले के गड़पर प्रोफेसर कालोनी के रहने वाले थे. उन के परिवार में कुल 5 सदस्य थे. पत्नी सरिता देवी और 2 बेटे पीयूष व मनीष और एक बेटी सृष्टि. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

भौतिक सुखसुविधाओं की ऐसी कोई चीज नहीं थी, जो उन के घर में मौजूद न हो. उस पर से वह खुद भारतीय स्टेट बैंक के मैनेजर थे. उन की अच्छीभली तनख्वाह थी, इसलिए जिंदगी बड़े मजे से कट रही थी.

शैलेंद्र का बड़ा बेटा पीयूष दिव्यांग था. वह पूरी तरह से चलफिर नहीं सकता था. बेटे की हालत देख कर उन के कलेजे में टीस उठती थी.

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छोटा बेटा मनीष हृष्टपुष्ट और तंदुरुस्त था, शरीर से भी और दिमाग से भी. पढ़ने में वह अव्वल था. अपनी योग्यता और काबिलियत की बदौलत मनीष की बैंक में नौकरी लग गई थी और वह असम के गुवाहाटी में तैनात था.

शैलेंद्र ने समय रहते दोनों बेटों की शादी कर दी थी. जिम्मेदारी के तौर पर एक बेटी बची थी शादी करने के लिए, सो उस के लिए भी वह योग्य वर की तलाश कर रहे थे. उन्होंने रिश्तेदारों के बीच में बात चला दी कि बेटी के योग्य कोई अच्छा वर मिले तो बताएं. रिश्तेदारों के बीच से पटना का रहने वाला पवन कुमार का रिश्ता आया.

पवन राजधानी पटना की पौश कालोनी में कोचिंग सेंटर चलाता था. कोचिंग से उस की अच्छीखाई कमाई हो जाया करती थी. बैंक मैनेजर शैलेंद्र को यह रिश्ता पसंद आ गया. उन्होंने बेटी सृष्टि की शादी पवन से कर के अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर दिया.

पवन कुमार 2 भाई थे. दोनों भाइयों में पवन बड़ा था और टिंकू कुमार छोटा. दोनों में पवन सुंदर और बेहद समझदार था. वह कोचिंग से इतना कमा लेता था कि अपना खर्च निकालने के बाद कुछ बैंक बैलेंस बना लिया था.

खैर, शैलेंद्र को यह रिश्ता पसंद आ गया और उन्होंने बेटी सृष्टि की शादी पवन से कर दी. एक प्रकार से पवन के कंधों पर ससुराल की देखरेख की जिम्मेदारी भी आ गई थी.

वह ऐसे कि बड़ा साला पीयूष दिव्यांग था. छोटा साला मनीष परिवार ले कर नौकरी पर गुवाहाटी में रहता था. घर पर बचे सासससुर. उन की देखरेख के लिए एक व्यक्ति की जरूरत रहती थी, सो दामाद पवन सास और ससुर की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहता था.

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दामाद के इस व्यवहार से सासससुर दोनों बहुत खुश रहते थे. वैसे भी बिहार की यह परंपरा है कि बेटी और दामाद घर के मालिक की तरह होते हैं. सास और ससुर बेटी और दामाद की सलाहमशविरा के बिना कोई काम नहीं करते थे.

कोई भी काम होता तो वे दामाद से रायमशविरा लिए बिना नहीं करते थे. बारबार ससुराल आनेजाने से बड़े साले पीयूष की पत्नी निभा, जो रिश्ते में पवन की सलहज लगती थी, दोनों के बीच खूब हंसीठिठोली होती थी.

हंसीठिठोली होती भी कैसे नहीं, उन का तो रिश्ता था ही मजाक का. मजाक का यह रिश्ता दोनों के बीच में कब प्रेम के रिश्ते में बदल गया, न तो पवन जान सका और न ही निभा.

यह रिश्ता प्रेम तक ही कायम नहीं रहा, बल्कि यह जिस्मानी रिश्ते में बदल गया था और पहली पत्नी के रहते पवन ने सलहज निभा से कोर्टमैरिज कर ली और उसे ले कर पटना में रहने लगा था.

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Manohar Kahaniya: पुलिस में भर्ती हुआ जीजा, नौकरी कर रहा साला!- भाग 1

17जून, 2021 को मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा के सीओ डा. अनूप सिंह अपने औफिस मे बैठे थे, तभी एसएसपी पंकज कुमार के पीआरओ का उन के पास फोन आया. पीआरओ की तरफ से सीओ साहब को विशेष जानकारी मुहैया कराई गई थी, जिसे सुन कर सीओ साहब सकते में आ गए थे.

सूचना मिली थी कि आप के सर्किल थाना क्षेत्र में मुजफ्फरनगर जनपद के खतौली थानाक्षेत्र के गांव दहौड़ का रहने वाला कांस्टेबल अनिल कुमार पुत्र सुखपाल, 112 पीआरवी 0281 ड्यूटी कर रहा है. लेकिन हमें यह खबर मिली है कि अनिल कुमार तो अकसर अपने घर पर ही मौजूद रहता है. तो फिर उस की जगह नौकरी कौन कर रहा है, यह जांच कराई जाए.

यह सूचना मिलते ही डा. अनूप सिंह ने तुरंत ही ठाकुरद्वारा थानाप्रभारी सतेंद्र सिंह को यह सूचना दे कर जांच करने को कहा. चूंकि अनिल कुमार की ड्यूटी हमेशा ही 112 पीआरवी में ही चलती रहती थी. इसी कारण उस का थाने आनाजाना बहुत ही कम होता था.

इस अहम जानकारी के मिलते ही थानाप्रभारी सतेंद्र सिंह ने सच्चाई जानने के लिए पुलिस रिकौर्ड में दर्ज कांस्टेबल अनिल कुमार के मोबाइल पर काल की.

‘‘जय हिंद सर.’’ फोन कनेक्ट होते ही दूसरी तरफ से आवाज आई.

‘‘आप कौन?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कांस्टेबल अनिल कुमार रिपोर्टिंग. आदेश कीजिए सर, मेरी लोकेशन ठाकुरद्वारा में ही है सर. मेरी पीआरवी 0281 पर तैनाती है सर.’’ उस ने थानाप्रभारी से कहा.

‘‘अनिल आप फौरन थाने पहुंचो, आप से कुछ जरूरी काम है.’’ थानाप्रभारी ने आदेश दिया.

‘‘ओके सर.’’ कोई 10 मिनट बाद ही होमगार्ड के साथ एक सिपाही थाने पहुंचा.

उस की वरदी पर अनिल कुमार नाम का बैज लगा था. थानाप्रभारी ने युवक को ऊपर से नीचे तक देखा. उस के बाद अनिल कुमार से अपना पूरा परिचय देने को कहा.

थानाप्रभारी की बात सुनते ही एक सिपाही की भांति ही सावधान मुद्रा में अपना परिचय देने लगा. मैं कांस्टेबल 2608 अनिल कुमार पुत्र श्री सुखपाल, थाना खतौली जिला मुजफ्फरनगर के गांव दहौड़ का रहने वाला हूं. वर्ष 2011 बैच का सिपाही हूं. सर, 2016 में बरेली से ट्रांसफर पर मेरी यहां पर नियुक्ति हुई है.’’

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जिस तरह से युवक ने थानाप्रभारी के सामने अपना पूरा परिचय दिया था, उस के आत्मविश्वास को देख कर सतेंद्र सिंह भी चकरा गए. एक बार तो उन्हें लगा कि जिस ने भी कप्तान साहब से उस की शिकायत की है, वह झूठी ही होगी.

सब जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर सतेंद्र सिंह ने अनिल कुमार से आखिरी प्रश्न किया, ‘‘तुम्हारे ट्रांसफर के समय बरेली जिले के कप्तान कौन थे.’’

बस यही प्रश्न ऐसा था कि अनिल कुमार अपने जाल में फंस गया. वह इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दे पाया. फिर भी उन्होंने युवक की चरित्र पंजिका मंगवाई. कागज देख कर सतेंद्र सिंह को विश्वास हो गया कि जरूर कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है.

इस से पहले सतेंद्र कुमार कुछ समझ पाते, युवक सब कुछ समझ गया.

‘‘सर, बहुत जोर से लघुशंका आई है, मैं बस एक मिनट में ही फ्रैश हो कर आया.’’ उस युवक ने कहा.

‘‘ठीक है. जल्दी से हो कर आओ.’’ उस के बाद थानाप्रभारी युवक के बाकी कागजात देखने में व्यस्त हो गए.

काफी समय बाद भी वह युवक वापस नहीं आया तो सतेंद्र कुमार ने संतरी से उसे देखने को कहा. लेकिन अनिल नाम का वह सिपाही कहीं भी नजर नहीं आया. उस के बाद थानाप्रभारी को आभास हो गया कि वह सिपाही फरार हो गया.

उस के फरार होने की जानकारी मिलते ही सतेंद्र कुमार ने उसे हर जगह पर  खोजा, लेकिन उस का कहीं भी अतापता नहीं चला. उस के इस तरह से फरार होने से यह तो साबित हो ही गया था कि जिस ने भी उस की शिकायत कप्तान साहब से की थी, वह बिलकुल ही सही थी.

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यह सब जानकारी मिलते ही सीओ डा. अनूप सिंह ने अनिल की गिरफ्तारी के लिए थानाप्रभारी सतेंद्र सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. अनिल कुमार की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम तुरंत मुजफ्फरनगर रवाना की गई.

सरकारी कागजों में अनिल का पता मुजफ्फरनगर के गांव दहौड़ का था. पुलिस टीम ने गांव जा कर अनिल के बारे में पूछा तो पता चला कि यहां पर कोई अनिल कुमार पुलिस में नहीं है. एक अनिल कुमार तो है जो अपने को सरकारी टीचर बताता है.

असली सिपाही हुआ गिरफ्तार

पुलिस उसी पते पर पहुंच गई तो उस वक्त अनिल नाम का युवक घर पर ही मिल गया. लेकिन यह वह नहीं था, जो लघुशंका के बहाने से थाने से फरार हो गया था.

अपने घर अचानक पुलिस आई देख अनिल कुमार कुछ नरवस सा हो गया. थानाप्रभारी सतेंद्र कुमार ने उस से पुलिस में तैनात होने के बाबत पूछा तो उस ने साफ कह दिया कि वह तो अध्यापक परीक्षा की तैयारी कर रहा है. पुलिस से उस का कोई मतलब नहीं.

फिर उन्होंने उस से सुनील के बारे में पूछा क्योंकि अनिल की मूल फाइल में सुनील कुमार के नाम से कागज थे.

सुनील का नाम सुनते ही उस के चेहरे का रंग उड़ गया. अनिल से सख्ती से पूछताछ की तो सारी सच्चाई पुलिस के सामने आ गई.

सब से हैरत वाली बात यह थी कि अनिल ने सिपाही बन कर जो खेल खेला था, उस की जानकारी गांव वालों को क्या, उस के परिवार वालों तक को पता नहीं थी.

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जब गांव वालों को अनिल की हकीकत का पता चला तो वे सभी दंग रह गए. अनिल के बड़े भाइयों ने पुलिस पूछताछ में बताया कि उन्हें तो केवल इतना ही मालूम था कि गांव गंगधाड़ी निवासी सुनील मुरादाबाद में अपने जीजा अनिल के पास रह कर कोई काम कर रहा है.

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