कद: आखिर गोमा को शिंदे साहब क्यों पसंद नहीं थे

कहते हुए शिंदे साहब अपना पसीना पोंछते हुए ‘धप’ से सोफे में धंस गए. गोमा तिरछी नजरों से उन्हें एकटक देखता रहा. ‘लाल मुंह का बंदर… इस के खून में जरूर अंगरेजों का खून मिला होगा, नहीं तो ऐसा लाल भभूका मुंह नहीं हो सकता,’ गोमा सोचते हुए मुसकरा उठा.

शिंदे साहब की नजर गोमा पर पड़ी, तो उस की तिरछी नजर देख कर उन के तनबदन में आग लग गई. वे चिल्लाए, ‘‘अरे कैसा बेशर्म है तू, इतनी मार खा कर भी कोई असर नहीं हुआ?’’

शिंदे साहब को गुस्सा तो बहुत आ रहा था और इच्छा भी हो रही थी कि गोमा का खून कर दें, पर वे ऐसा नहीं कर सकते, यह बात वे दोनों जानते थे.

गोमा शराब पीता था, पर तनख्वाह मिलते ही… और वह भी 2 दिन तक. उस के बाद अगली तनख्वाह के मिलने तक शराब को मुंह नहीं लगाता था. लगाता भी कैसे? पैसे मिलते ही घर में खर्च के लिए कुछ पैसे दे कर एक बार जो पीने के लिए जाता, तो तीसरे दिन होश आने पर खुद को किसी नाले या गटर में पाता. फिर उसे साहब का और खुद का घर याद आता.

शिंदे साहब के घर पहुंचते ही हर महीने मेम साहब से पड़ने वाली नियमित डांट सुनने को मिलती कि पिछले 3 दिन से कहां रहे? यहां काम कौन करेगा? इस तरह शराब में धुत्त रहोगे तो साहब से कह कर पिटवाऊंगी.

मेम साहब मन ही मन भुनभुनाती रहतीं और गोमा चुपचाप अपना काम करता जाता मानो वे किसी और को सुना रही हों. इन के जैसे कितने ही साहब और मेम साहब के लिए गोमा काम कर चुका है. उन लोगों का गुजारा गोमा जैसे लोगों के बिना मुमकिन नहीं है.

अर्दली तो बहुत होते हैं, जिन में से आधे तो केवल भरती और गिनती के नाम पर होते हैं, गोमा जैसे पुराने और मंजे हुए तो बस 2-4 ही होते हैं, जो साहब व मेम साहब की सारी जरूरतें जानते हैं. तभी तो मेम साहब केवल धमकी दे कर रह जाती हैं.

साहब लोगों की बातें नौकर असली या नकली नशे की आड़ में ही तो उजागर कर सकते हैं. वैसे, गोमा की यह आदत भी नहीं थी कि वह साहब लोगों के बारे में इधरउधर चर्चा करे.

गोमा अपने काम से काम रखता था, इसलिए साहब या मेम साहब कैसे हैं या उन के स्वभाव के बारे में ज्यादा सोचता ही नहीं था. पर शिंदे साहब को पहली बार देखते ही उस का मन खराब सा हो गया था. उन की शक्ल से ले कर हर चीज, हर बात बनावटी और बेढंगी लगी थी.

शिंदे साहब का अजीब सा गोराभूरा रंग, कंजी आंखें, मोटे होंठ, भारीभरकम शरीर और बेवजह चिल्लाचिल्ला कर बात करने का तरीका कुछ भी अच्छा नहीं लगा था, इसीलिए उन से सामना न हो, इस बात का वह खयाल रखता था.

पर, उस दिन गोमा ने अपने पूरे होशोहवास में साहब के मुंह पर ऐसी बात कही थी क्योंकि मेम साहब उस से उलझी हुई

थीं और जब उस से सहन न हुआ, तो साहब व मेम साहब दोनों को देख कर ही बोला था.

गोमा सोचता है कि इन बड़े लोगों को रोज नियम से शाम को पीनी है, पूरे तामझाम के साथ. एक अर्दली बोतल खोलेगा, दूसरा भुने हुए काजू, पनीर के टुकड़े, नमकीन वगैरह लाता रहेगा.

2-4 अफसर अपनी बीवियों के साथ हर दिन मौजूद रहते थे.

‘‘मैडम, आप थोड़ी सी लीजिए न, फोर कंपनीज सेक.’’

‘‘न बाबा, हम को हमारा सौफ्ट ड्रिंक ही ठीक है. अपनी वाइफ को पिलाओ,’’ बड़े अफसर की बीवी अफसराना अंदाज में कहतीं.

दूसरी तरफ बड़े साहब इन की बीवी से इस तरह चोंच लड़ा रहे होते जैसे सुग्गा अपनी मादा से.

‘‘मोनाजी, आप तो मौडर्न हैं, कम से कम हमारे पैग को तो छू दीजिए,’’ कहतेकहते उन की नजरें मोनाजी के

पूरे जिस्म का सफर कर किसी ऐसे उभार पर टिक जातीं, जो उन्हें लुभावना लगता था.

गोमा मन ही मन सोच कर हंसता कि अगर कोई नया आदमी उस कमरे में आ जाए, तो उस के लिए यह पहचानना मुश्किल होगा कि कौन किस की बीवी है. सभी अपने पति को छोड़ दूसरे मर्दों से सटीं, हंसतींखिलखिलातीं, लाड़ लड़ाती मिलेंगीं. फिर मर्दों का तो क्या कहना, सारी बगिया के फूल तो उन के लिए हैं, कोई भी तोड़ लो.

शिंदे साहब गोमा पर जितना ही चिल्लाते या झल्लाते, उतना ही उन्हें हैरान करने में मजा आ रहा था. उस ने भी कोई झूठ थोड़े ही बोला था, ‘‘अपनी बीवी को संभाल नहीं पाते हैं और दुनिया वालों की बातों पर गुर्राते हैं.’’

गोमा ने तो कई बार मेम साहब और साहब के जूनियर रमेश को चोंच लड़ाते और इशारे करते देखा था. जब शिंदे साहब दौरे पर होते, तो उन दोनों की पौबारह रहती थी. एकलौते बेटे को बोर्डिंग स्कूल में दाखिल करा कर मिसेज शिंदे एकदम आजाद हो गई थीं.

पति के दौरे पर चले जाने के बाद तो मैदान एकदम साफ रहता. पर, एक मुसीबत तो फिर भी सिर पर होती थी. दिनभर रहने वाले अर्दली को भले ही काम न होने का कह कर विदा कर दें, पर रात को पहरे पर रहने वाला गार्ड तो 9 बजे आ धमकता था.

हालांकि रोज शाम को रमेश ‘इधर से जा रहा था, सोचा पूछ लूं कि कोई काम तो नहीं है’ कहते हुए आ जाता था. गार्ड के आते ही वे दोनों ऐसा बरताव करते, मानो चंद मिनट पहले ही मिले हों और रमेश हालचाल पूछ कर चला जाएगा.

मेम साहब बाजार का कुछ काम बता देती थीं. केवल एक चीज के लिए तो कभी भेजती नहीं थीं, लिस्ट बना कर देती थीं. आज भी एक चीज जो वे लाने को कह रही थीं, उस की ऐसी खास जरूरत नहीं थी.

गोमा ने कहा, ‘‘कुछ और चीजों का नाम लिख दीजिए, फिर चला जाऊंगा. एक चीज के पीछे 2 घंटे बरबाद हो जाएंगे.’’

‘‘अरे वाह, तुझे समय की फिक्र कब से होने लगी. जब पी कर 2 दिनों तक बेसुध पड़ा रहता है, तब समय का खयाल नहीं आता,’’ मेम साहब ने मुंह बनाते हुए जिस तरह कहा, गोमा अपनेआप को रोक न पाया और बोला, ‘‘पीते हैं तो अपने पैसे की, बड़े लोगों की तरह मुफ्त की नहीं.’’

‘‘ठीक है भई, तू शराब पी या कहीं पड़ा रहे, बस अब जा,’’ उन की आवाज में एक उतावलापन था, मानो गोमा को वहां से हटाना ही उन का मकसद था.

गोमा भी शब्दों के तीर छोड़ कर अब वहां से भागना ही चाह रहा था, पर मेम साहब के बरताव से मन में उलझन सी हो रही थी. गोमा को ज्यादा सोचना नहीं पड़ा, क्योंकि तभी रमेश की शानदार मोटरसाइकिल बंगले के अहाते में घुसी.

जब भी शिंदे साहब के घर कोई पार्टी होती, तो सारे इंतजाम रमेश को ही करने पड़ते थे. शिंदे साहब के हर आदेश को ‘यस सर’ कहते हुए वह इस तरह पूरा करता, मानो सिर पर अपने बौस के आदेश का बोझ नहीं, बल्कि फूलों का ताज हो.

पार्टी के दिन रमेश और मेम साहब के बीच हंसीमजाक, नैनमटक्का चलता रहता था. गोमा के अलावा और भी 3-4 अर्दली होते थे. पानी की तरह ‘ड्रिंक’ ले जाने, परोसने, स्नैक्स की प्लेटें ले जाने, चारों ओर घुमाघुमा कर सब को देने के लिए इतने नौकर तो चाहिए ही थे.

पार्टी के बीच अचानक शिंदे साहब के बौस के दिमाग में आइडिया का बल्ब जला. शाम की ‘डलनैस’ को दूर करने के लिए कोई मौडर्न ‘गेम’ खेलने का फुतूर.

‘‘अरे शिंदे, क्या पिलापिला कर ही मार डालोगे?’’

‘‘नो सर, आप कहें तो डिनर सर्व हो जाए?’’

‘‘होहो…’’ अट्टहास करते हुए बौस ने कहा, ‘‘तुम हो पूरे बेवकूफ और वही रहोगे. कभी दिल्लीमुंबई की ‘ऐलीट’ लोगों की पार्टी में शामिल होओगे,

तब समझ आएगा पार्टी का असली रंग और मजा.’’

‘‘जी सर,’’ शिंदे साहब बोले.

‘‘कुछ ‘थ्रिलिंग गेम’ हो जाए,’’ बौस ने कहा.

शिंदे साहब अपने बौस के चेहरे को उजबक की तरह ताकने लगे, कुछ देर पहले जब वे अपनी बीवी से कुछ कहने अंदर जा रहे थे और रमेश के साथ उन की प्रेमलीला देखी, तो उस से वे काफी आहत थे.

‘‘मैडम, अब आप अंदर जाइए, अच्छा नहीं लगता कि आप इस खादिम के साथ यहां रहें,’’ रमेश मेम साहब को चिढ़ाते हुए बोल रहा था.

‘‘यार रमेश, कम से कम अकेले में मुझे मैडम मत कहो,’’ शिंदे साहब की बीवी मचल कर बोलीं.

ऐसा कह कर मेम साहब हाल की तरफ जाने को पलट ही रही थीं कि शिंदे साहब पास ही दिखे.

‘‘क्या बात है डार्लिंग, थकेथके से लग रहे हो? अभी तो पार्टी पूरे शबाब पर भी नहीं आई है,’’ मेम साहब ने शिंदे साहब से पूछा.

शिंदे साहब मन ही मन बोले, ‘तुम तो हो अभी से पूरे शबाब पर,’ फिर रमेश की ओर देख कर रूखी आवाज में बोले, ‘‘गोमा या किसी और को समझा कर आप भी हाल में तशरीफ ले आइए.’’

उन की रूखी आवाज से रमेश को भला क्या फर्क पड़ता. छड़ा, कुंआरा बस मौजमस्ती चल रही है. ज्यादा से ज्यादा उस का तबादला हो जाएगा. वह तो वैसे भी कभी न कभी होना ही है.

‘‘तुम कब से गायब हो, क्या ऐसे अच्छा लगता है कि ‘होस्टेस’ अपने ‘गैस्ट्स’ का खयाल न रखे,’’ अपनी बीवी से कहते हुए शिंदे साहब की दबी आवाज में भी गुस्सा नजर आ रहा था.

‘‘गैस्ट्स के लिए तो सारा तामझाम कर रही हूं डार्लिंग, परेशान मत होइए. तुम्हारे बौस इतने खुश हो जाएंगे कि तुम भी क्या याद करोगे,’’ मेम साहब बोलीं.

उधर बौस के आदेश से थ्रिलिंग गेम ‘वाइफ स्वैपिंग’ की तैयारी में एक खूबसूरत डब्बों में सब की कारों की चाबियां डाल दी गई थीं.

गोमा साहबों और मेम साहबों के तरहतरह के चोंचले, सनकीपन और मूड से उसी तरह वाकिफ था, जिस तरह अपनी हथेली की लकीरों से. उसे किसी भी साहब या मेम साहब के लिए कोई दिली आदर न था और न ही उन से किसी तरह का डर लगता था. उस के कुछ उसूल थे, जिन का पालन वह पूरी ईमानदारी से करता था.

गोमा ने मन ही मन सोचा कि अगर उस की बीवी दूसरे आदमी के साथ इस तरह जाए, तो वह दोबारा उस का मुंह भी नहीं देखे. अगर उस का खुद का रिश्ता दूसरी औरत से हो जाए, तो उस की घरवाली भी उसे यों ही नहीं छोड़ देगी. गोमा के इसी स्वाभिमान ने तो उस के मुंह से वह कहलवाया, जो शिंदे साहब को बरदाश्त नहीं हुआ.

महीने का पहला हफ्ता था और हमेशा की तरह गोमा 3 दिन गायब रह कर चौथे दिन आया था. इस बीच रमेश को ले कर साहब और मेम साहब में तीखी नोकझोंक हुई. जब गोमा सामने आया, तो दोनों का बचाखुचा गुस्सा

उसी पर उतरा, वह भी ऐसा उतरा कि बिलकुल बेलगाम.

मेम साहब की जबान फिसलती गई, ‘‘फिर जा कर गिरा नाले में, तू नाले का कीड़ा ही बना रहेगा. किसी दिन यह शराब तुझे और तेरे घर को बरबाद कर देगी.

‘‘देखना, तेरी बीवी एक दिन तुझे छोड़ कर किसी और के साथ घर बसा लेगी. तुम्हारी जात में तो वैसे भी एक को छोड़ कर दूसरे के साथ बैठ जाना बुरा नहीं माना जाता.’’

इतना सुन कर गोमा मेम साहब के ठीक सामने आ गया और बोला, ‘‘हमारी जात? हमारी जात को कितना जानती

हैं आप? आप लोगों की ऊंची जात में होती होगी चीजों की तरह लुगाइयों की अदलाबदली. हम लोगों के घर बसाने में एक तमीज होती है. कोठे की बाई की तरह नहीं कि आज इस के साथ, कल उस के साथ और परसों तीसरे के साथ.’’

मेम साहब को तो जैसे सांप सूंघ गया. इसी बात का फायदा उठा कर गोमा फिर शुरू हो गया. लगा जैसे आज उस के मन में जो फोड़ा था, वह पक कर

फूट गया और सारा मवाद निकल रहा हो, ‘‘मैं तो महीने में 1-2 दिन ही पीता हूं. केवल इसलिए कि 2-3 दिन तक पैसे की तंगी, घर की चिंता से इतना दूर चला जाऊं कि अपनेआप को मैं खुशकिस्मत समझ सकूं.

‘‘पर, आप बड़े लोग तो रोज महंगी अंगरेजी शराब बहाते हैं अपनी खुशी, अपना फालतू पैसा दिखाने को. मैं तो शराब पी कर भी आप जैसे बड़े लोगों जैसी छोटी हरकत कभी नहीं करता…’’

तब से शिंदे साहब गोमा को पीटे जा रहे हैं, मानो बीवी का सारा गुस्सा उस पर उतार देंगे. उधर गोमा इतनी मार खा कर भी मन ही मन जीत की खुशी महसूस कर रहा था.

गर्मी के वेकेशन पर निकलीं मौनी रॉय, बिकिनी पहन एनॉय करती दिखीं एक्ट्रेस

टीवी और बौलीवुड जगत की जानीमानी एक्ट्रेस मौनी रॉय इन दिनों गर्मी को एंजॉय करती दिख रही हैं. मौनी बिकिनी पहने हुए वेकेशन की फोटोज सोशल मीडिया पर शेयर करती दिख रही हैं. एक्ट्रेस मौनी रॉय की फोटोज को फैंस खूब पसंद कर रहे हैं, जो इंटरनेट पर धड़ल्ले से वायरल हो रही हैं.

 

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आपको बता दें कि मौनी रॉय इन दिनों बाली पहुंच गई हैं, जहां वे पानी में एंजॉय करती दिख रही हैं. मौनी रॉय का यह ग्लैमरस अंदाज उनके फैंस को खूब पसंद आ रहा है. वे उन पर जमकर प्यार लुटा रहे हैं.

मौनी रॉय ने गर्मी के मौसम में फ्लोरल बिकिनी पहनी हुई है, जिसने इंटरनेट का तापमान बढ़ा दिया. मौनी रॉय का कर्वी फिगर लोगों को होश उड़ा रहा है.

एक्ट्रेस मौनी रॉय ने झूले पर बैठकर वेकेशन को फुल एंजॉय किया है. मौनी रॉय की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं, जिन पर फैंस कमेंट कर रहे हैं.

 

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मौनी रॉय को बिकिनी में देखकर एक फैन ने लिखा है, ‘क्या खूब लगती हो.’ एक फैन ने लिखा है, ‘इतना खूबसूरत अंदाज दिखाकर करना क्या चाहती हो?’ वहीं, मौनी रॉय ने हमेशा ही अलगअलग ड्रेस पहन लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है.

उर्फी ने इस बार ड्रेस नहीं पर्स के साथ किया एक्सपेरिमेंट, लौकी से बनाया बैग

टीवी एक्ट्रेस और मॉडल उर्फी जावेद अपने बिंदास फैशल के लिए हमेशा ही सुर्खियों में रहती हैं. वे जहां भी जाती हैं, पैपराजी उन्हें घेर ही लेते हैं. उनके यूनिक स्टाइल को कैप्चर करने के लिए पैपराजी की भीड़ लगी रहती है. लेकिन इस बार उर्फी की ड्रेस नहीं, बल्कि पर्स चर्चा में बना हुआ है. उर्फी ने जो लौकी के साथ कमाल किया है, वह सच में तारीफ के लायक है.

 

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उर्फी जावेद आएदिन अपने अतरंगी फैशन और ड्रेसिंग सेंस को लेकर चर्चा में रहती हैं. उर्फी जावेद की तस्वीरें सोशल मीडिया पर अक्सर वायरल होती हैं और लोग इन पर रिएक्शन देते हैं. दरअसल, उर्फी जावेद लौकी का पर्स बनाकर सड़क पर निकली थीं और लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया. उर्फी जावेद की यह फोटो वायरल होते ही लोग कमेंट कर रहे हैं. यही वजह है कि उर्फी जावेद को देखते ही पैपराजी के कैमरे एक्टिव हो जाते हैं.

उर्फी जावेद की ड्रेस ने इस बार ध्यान न खींचकर उनके हैंड पर्स पर लोगों की निगाहें टिक गईं. दरअसल, उर्फी जावेद ने लौकी से बना हुआ हैंड पर्स लिया हुआ था. उर्फी जावेद ने हाथ में लौकी वाला पर्स डालकर एक से बढ़कर एक पोज दिए हैं. उर्फी जावेद का यह अंदाज सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है.

 

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उर्फी जावेद के आउटफिट की बात करें तो उन्होंने लौकी के पर्स के साथ शॉर्ट ड्रेस पहनी हुई है. जिसमें उन्होंने ऊपर स्वेटर कैरी किया हुआ है. उर्फी की इस ड्रेस को लेकर भी लोग कमेंट कर रहे है. एक्ट्रेस पर एक यूजर ने लिखा कि ‘इतनी गर्मी में स्वेटर कौन पहनता है.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘पंचायत 3 का प्रमोशन किया जा रहा है. उर्फी जावेद ने हाल ही में वेब सीरीज ‘पंचायत 3’ में फुलेरा गांव में सचिव के लिए आवेद किया था. उर्फी जावेद का सचिव पद के लिए इंटरव्यू का वीडियो वायरल हुआ था.

उर्फी जावेद अक्सर अपनी बोल्ड ड्रेसिंग सेंस को लेकर ट्रोल हो जाती हैं. हालांकि, उर्फी जावेद को ट्रोलिंग से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है और वे अतरंगी फैशन करती रहती हैं.

क्या अबौर्शन के बाद कंसीव करने में प्रौब्लम आती है?

सवाल

मैं शादी के 10 महीने बाद ही प्रैग्नैंट हो गई थी. उम्र 28 वर्ष है. कुछ मैडिकल कौम्प्लिकेशंस की वजह से मुझे अबौर्शन कराना पड़ा. सुना है कि अबौर्शन के बाद कंसीव करने में प्रौब्लम आती है. मन में इस बात का डर बैठ गया है. मुझे बताएं क्या यह सही है?

जवाब

अगर अबौर्शन अच्छी गाइनोकोलौजिस्ट की देखरेख में कराया गया है तो परेशानी की बात नहीं है. वैसे, सब की बौडी अलग होती है. बेबी कंसीव करना उसी पर निर्भर करता है. बस, ध्यान रखें कि अबौर्शन के बाद महिला का शरीर काफी कमजोर हो जाता है, ऐसी स्थिति में ऐक्सरसाइज, बहुत हैवी काम, फिजिकल इंटिमेसी जैसी चीजों से परहेज करें.

मिसकैरेज की जो भी वजह रही हो लेकिन अगर समस्या ठीक हो जाने योग्य है, तो पता करें ताकि भविष्य में इस तरह की स्थिति में बचाव हो सके और प्रैग्नैंसी प्लान करें तो डाक्टर से कंसल्ट करें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

एक थप्पड़ की कीमत: रवि ने कौन सी गलती की थी

रोटी बनाती ऋतु को ‘चटाक’ की आवाज के साथ सोहम के रोने का शोर सुनाई दिया. उस ने कमरे में जा कर देखा तो पाया कि रवि ने आज फिर सोहम को एक थप्पड़ जड़ दिया था.

ऋतु सोहम को गोद में ले कर रसोई में आ गई और उसे स्लैब पर बिठा कर चुप कराया, फिर आटे की एक लोई दे दी. नन्हा सोहम पलभर में रोना भूल कर उस लोई से खेलने लगा.

रोटी बेलती ऋतु को सोहम के गाल पर लाल निशान दिख रहे थे. मां का दिल कचोट गया.

‘‘आप ने आज फिर सोहम पर हाथ उठाया?’’ सोहम को सुला रही ऋतु ने रवि से पूछा, ‘‘ऐसा क्या किया था सोहम ने?’’

‘‘बहुत जिद्दी हो गया है सोहम. रिमोट ही नहीं दे रहा था. और हां, मैं ने थप्पड़ नहीं मारा था, बस हलकी सी चपत लगाई थी,’’ रवि बोला.

रवि की बात सुन कर ऋतु हैरान रह गई. अगर वह हलकी सी चपत थी, तो सोहम का गाल कैसे लाल हो गया?

‘‘तुम भी न ऋतु, हर छोटीछोटी बात पर लड़ने लग जाती हो. अरे, सोहम मेरा भी बेटा है. मैं भी उस से प्यार करता हूं और एक थप्पड़ या चपत लगने से तुम्हारा बेटा टूट नहीं जाएगा. लड़का है, इतना तो बरदाश्त करना आना ही चाहिए.’’

‘‘कैसी बात कर रहे हो रवि…

5 साल का बच्चा है सोहम. तुम्हारी यह आदत होती जा रही है कि कहीं भी हाथ चला देते हो. उस दिन सिर पर मार दिया था. कभी कहीं गलत जगह चोट लग गई तो जिंदगीभर पछताना पड़ेगा,’’ ऋतु ने समझाया और सोने चली गई.

सोहम ऋतु और रवि का एकलौता बेटा था. वे दोनों उसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन रवि की गंदी आदत थी हाथ चला देने की. ऋतु के बारबार टोकने पर भी वह नहीं सुधर रहा था, उलटा ऋतु से बहस करता था. इस बात पर ऋतु चिढ़ जाती और कोशिश करती कि जब रवि घर पर हो, तब वह सोहम को अपने साथ ही रखे.

रविवार के दिन शाम को थप्पड़ लगा दिया क्रिकेट मैच आने वाला था, जबकि सोहम कार्टून फिल्म देख रहा था.

‘‘सोहम, रिमोट दो… मैच आने वाला है,’’ रवि ने कहा.

‘‘पापा, बस 5 मिनट और देखने दो न,’’ सोहम ने जिद की.

‘‘नहीं… जल्दी दो रिमोट, वरना टौस निकल जाएगा,’’ रवि ने चिढ़ते हुए कहा.

सोहम नहीं माना, तो आदत के मुताबिक रवि ने उस के सिर के पीछे एक चपत लगा दी और उस से रिमोट छीन लिया.

सोहम सुबकने लगा, पर जल्दी ही वह अपने खिलौनों से खेलने लगा. आधा घंटा भी नहीं बीता कि सोहम को उलटी आ गई.

‘‘मम्मी, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है,’’ अपने बच्चे की बात सुन कर ऋतु डर गई.

‘‘क्या हो गया सोहम?’’ ऋतु ने घबरा कर पूछा.

‘‘मम्मी, सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है,’’ रोते हुए सोहम ने सिर के पीछे की तरफ इशारा किया.

ऋतु ने सोहम के सिर पर तेल की मालिश कर एक पेन किलर दवा दी और गोदी में सिर ले कर दबाने लगी.

ऋतु को कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. उसे नहीं पता था कि रवि ने सोहम के सिर के पीछे मारा था. जब दोबारा उलटी हुई, तब ऋतु ने घबरा कर रवि को आवाज दी, ‘‘देखो न, सोहम के सिर में बहुत दर्द हो रहा है. 2 बार उलटी भी कर दी है. कह रहा है कि अच्छा नहीं लग रहा है. चलो न, किसी डाक्टर को दिखा दें…’’

‘‘यह टीवी बहुत देखता है, इसलिए सिर में दर्द हो रहा होगा. इतनी रात को कहां जाएंगे डाक्टर को दिखाने… कल तक ठीक नहीं हुआ तो दिखा देंगे,’’ इतना कह कर रवि मैच देखने लगा.

सोहम का सिर दबातेदबाते ऋतु और सोहम दोनों सो गए. अगले दिन जब ऋतु जागी तो देखा कि सोहम का आधा चेहरा सूजा हुआ था.

रवि और ऋतु तुरंत सोहम को डाक्टर के पास ले गए. सारी बात सुन कर डाक्टर ने पूछा, ‘‘कोई चोट तो नहीं लगी न बच्चे के सिर के पिछले हिस्से में?’’

डाक्टर की बात सुन कर रवि का चेहरा सफेद पड़ गया और बोला, ‘‘कल मैं ने सोहम के सिर के पीछे थप्पड़ मार दिया था, तभी उसे दर्द…’’

डाक्टर को समझते देर न लगी. सोहम की इस हालत का जिम्मेदार रवि खुद था.

जब डाक्टर को पता चला, तो उन्होंने रवि को खूब डांटा. ऋतु का तो रोरो कर बुरा हाल हो गया, ‘‘लाखों बार समझाया था तुम्हें, अब देख लो… अगर मेरे बेटे को कुछ हुआ, तो मैं तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी.’’

आननफानन में सारे टैस्ट हुए. बात ज्यादा नहीं बिगड़ी थी, लेकिन सोहम की आंखों पर हमेशा के लिए ज्यादा पावर का चश्मा चढ़ गया था.

रवि एक अपराधी की तरह अपने बेटे के सामने खड़ा था. जिस थप्पड़ को मामूली समझ कर वह जबतब जड़ देता था, आज वही थप्पड़ अपनी कीमत वसूल रहा था.

शादी के बाद: क्या विकास को अपना पाई रजनी

रजनी को विकास जब देखने के लिए गया तो वह कमरे में मुश्किल से 15 मिनट भी नहीं बैठी. उस ने चाय का प्याला गटागट पिया और बाहर चली गई.

रजनी के मातापिता उस के व्यवहार से अवाक् रह गए. मां उस के पीछेपीछे आईं और पिता विकास का ध्यान बंटाने के लिए कनाडा के बारे में बातें करने लगे. यह तो अच्छा ही हुआ कि विकास कानपुर से अकेला ही दिल्ली आया था. अगर उस के घर का कोई बड़ाबूढ़ा उस के साथ होता तो रजनी का अभद्र व्यवहार उस से छिपा नहीं रहता. विकास तो रजनी को देख कर ऐसा मुग्ध हो गया था कि उसे इस व्यवहार से कुछ भी अटपटा नहीं लगा.

रजनी की मां ने उसे फटकारा, ‘‘इस तरह क्यों चली आई? वह बुरा मान गया तो? लगता है, लड़के को तू बहुत पसंद आई है.’’

‘‘मुझे नहीं करनी उस से शादी. बंदर सा चेहरा है. कितना साधारण व्यक्तित्व है. उस के साथ तो घूमनेफिरने में भी मुझे शर्म आएगी,’’ रजनी ने तुनक कर कहा.

‘‘मुझे तो उस में कोई खराबी नहीं दिखती. लड़कों का रूपरंग थोड़े ही देखा जाता है. उन की पढ़ाईलिखाई और नौकरी देखी जाती है. तुझे सारा जीवन कैनेडा में ऐश कराएगा. अच्छा खातापीता घरबार है,’’ मां ने समझाया, ‘‘चल, कुछ देर बैठ कर चली आना.’’

रजनी मान गई और वापस बैठक में आ गई.

‘‘इस की आंख में कीड़ा घुस गया था,’’ विकास की ओर रजनी की मां ने बरफी की प्लेट बढ़ाते हुए कहा.

रजनी ने भी मां की बात रख ली. वह दाएं हाथ की उंगली से अपनी आंख सहलाने लगी.

विकास ने दोपहर का खाना नहीं खाया. शाम की गाड़ी से उसे कानपुर जाना था. स्टेशन पर उसे छोड़ने रजनी के पिताजी गए. विकास ने उन्हें बताया कि उसे रजनी बेहद पसंद आई है. उस की ओर से वे हां ही समझें. शादी 15 दिन के अंदर ही करनी पड़ेगी, क्योंकि उस की छुट्टी के बस 3 हफ्ते ही शेष रह गए थे और दहेज की तनिक भी मांग नहीं होगी.

रजनी के पिता विकास को विदा कर के लौटे तो मन ही मन प्रसन्न तो बहुत थे परंतु उन्हें अपनी आजाद खयाल बेटी से डर भी लग रहा था कि पता नहीं वह मानेगी या नहीं.

पिछले 3 सालों में न जाने कितने लड़कों को उसे दिखाया. वह अत्यंत सुंदर थी, इसलिए पसंद तो वह हर लड़के को आई लेकिन बात हर जगह या तो दहेज के कारण नहीं बन पाई या फिर रजनी को ही लड़का पसंद नहीं आता था. उसे आकर्षक और अच्छी आय वाला पति चाहिए था. मातापिता समझा कर हार जाते थे, पर वह टस से मस न होती. उस रात वे काफी देर तक जागते रहे और रजनी के विषय में ही सोचते रहे कि अपनी जिद्दी बेटी को किस तरह सही रास्ते पर लाएं.

अगले दिन रात को तार वाले ने जगा दिया. रजनी के पिता तार ले कर अंदर आए. तार विकास के पिताजी का था. वे रिश्ते के लिए राजी थे. 2 दिन बाद परिवार के साथ ‘रोकने’ की रस्म करने के लिए दिल्ली आ रहे थे. रजनी ने सुन कर मुंह बिचका दिया. छोटे बच्चों को हाथ के इशारे से कमरे से जाने को कहा गया. अब कमरे में केवल रजनी और उस के मातापिता ही थे.

‘‘बेटी, मैं मानता हूं कि विकास बहुत सुंदर नहीं है पर देखो, कनाडा में कितनी अच्छी तरह बसा हुआ है. अच्छी नौकरी है. वहां उस का खुद का घर है. हम इतने सालों से परेशान हो रहे हैं, कहीं बात भी नहीं बन पाई अब तक. तू तो बहुत समझदार है. विकास के कपड़े देखे थे, कितने मामूली से थे. कनाडा में रह कर भी बिलकुल नहीं बदला. तू उस के लिए ढंग के कपड़े खरीदेगी तो आकर्षक लगने लगेगा,’’ पिता ने समझाया.

‘‘देख, आजकल के लड़के चाहते हैं सुंदर और कमाऊ लड़की. तेरे पास कोई ढंग की नौकरी होती तो शायद दहेज की मांग इतनी अधिक न होती. हम दहेज कहां से लाएं, तू अपने घर की माली हालत जानती ही है. लड़कों को मालूम है कि सुंदर लड़की की सुंदरता तो कुछ साल ही रहती है और कमाऊ लड़की तो सारा जीवन कमा कर घर भरती है,’’ मां ने भी बेटी को समझाने का भरसक प्रयास किया.

रजनी ने मातापिता की बात सुनी, पर कुछ बोली नहीं. 3 साल पहले उस ने एम.ए. तृतीय श्रेणी में पास किया था. कभी कोई ढंग की नौकरी ही नहीं मिल पाई थी. उस के साथ की 2-3 होशियार लड़कियां तो कालेजों में व्याख्याता के पद पर लगी हुई थीं. जिन आकर्षक युवकों को अपना जीवनसाथी बनाने का रजनी का विचार था वे नौकरीपेशा लड़कियों के साथ घर बसा चुके थे. शादी और नौकरी, दोनों ही दौड़ में वह पीछे रह गई थी.

‘‘देख, कनाडा में बसने की किस की इच्छा नहीं होती. सारे लोग तुझ को देख कर यहां ईर्ष्या करेंगे. तुम छोटे भाईबहनों के लिए भी कुछ कर पाओगी,’’ पिता ने कहा.

रजनी को अपने छोटे भाईबहनों से बहुत लगाव था. पिताजी अपनी सीमित आय में उन के लिए कुछ भी नहीं कर सकते थे. वह सोचने लगी, ‘अगर वह कनाडा चली गई तो उन के लिए बहुतकुछ कर सकती है, साथ ही विकास को भी बदल देगी. उस की वेशभूषा में तो परिवर्तन कर ही देगी.’ रजनी मां के गले लग गई, ‘‘मां, जैसी आप दोनों की इच्छा है, वैसा ही होगा.’’

रजनी के पिता तो खुशी से उछल ही पड़े. उन्होंने बेटी का माथा चूम लिया. आवाज दे कर छोटे बच्चों को बुला लिया. उस रात खुशी से कोई न सो पाया.

2 सप्ताह बाद रजनी और विकास की धूमधाम से शादी हो गई. 3-4 दिन बाद रजनी जब कानपुर से विकास के साथ दिल्ली वापस आई तब विकास उसे कनाडा के उच्चायोग ले गया और उस के कनाडा के आप्रवास की सारी काररवाई पूरी करवाई.

कनाडा जाने के 2 हफ्ते बाद ही विकास ने रजनी के पास 1 हजार डालर का चेक भेज दिया. बैंक में जब रजनी चेक के भुगतान के लिए गई तो उस ने अपने नाम का खाता खोल लिया. बैंक के क्लर्क ने जब बताया कि उस के खाते में 10 हजार रुपए से अधिक धन जमा हो जाएगा तो रजनी की खुशी की सीमा न रही.

रजनी शादी के बाद भारत में 10 महीने रही. इस दौरान कई बार कानपुर गई. ससुराल वाले उसे बहुत अच्छे लगे. वे बहुत ही खुशहाल और अमीर थे. कभी भी उन्होंने रजनी को इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि उस के मातापिता साधारण स्थिति वाले हैं. रजनी का हवाई टिकट विकास ने भेज दिया था. उसे विदा करने के लिए मायके वाले भी कानपुर से दिल्ली आए थे.

लंदन हवाई अड्डे पर रजनी को हवाई जहाज बदलना था. उस ने विकास से फोन पर बात की. विकास तो उस के आने का हर पल गिन रहा था.

मांट्रियल के हवाई अड्डे पर रजनी को विकास बहुत बदला हुआ लग रहा था. उस ने कीमती सूट पहना हुआ था. बाल भी ढंग से संवारे हुए थे. उस ने सामान की ट्राली रजनी के हाथ से ले ली. कारपार्किंग में लंबी सी सुंदर कार खड़ी थी. रजनी को पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि यह कार उस की है. वह सोचने लगी कि जल्दी ही कार चलाना सीख लेगी तो शान से इसे चलाएगी. एक फोटो खिंचवा कर मातापिता को भेजेगी तो वे कितने खुश होंगे.

कार में रजनी विकास के साथ वाली सीट पर बैठे हुए अत्यंत गर्व का अनुभव कर रही थी. विकास ने कर्कलैंड में घर खरीद लिया था. वह जगह मांट्रियल हवाई अड्डे से 55 किलोमीटर की दूरी पर थी. कार बड़ी तेजी से चली जा रही थी. रजनी को सब चीजें सपने की तरह लग रही थीं. 40-45 मिनट बाद घर आ गया. विकास ने कार के अंदर से ही गैराज का दरवाजा खोल लिया. रजनी हैरानी से सबकुछ देखती रही.

कार से उतर कर रजनी घर में आ गई. विकास सामान उतार कर भीतर ले आया. रजनी को तो विश्वास ही नहीं हुआ कि इतना आलीशान घर उसी का है. उस की कल्पना में तो घर बस 2 कमरों का ही होता था, जो वह बचपन से देखती आई थी. विकास ने घर को बहुत अच्छी तरह से सजा रखा था. सब तरह की आधुनिक सुखसुविधाएं वहां थीं. रजनी इधरउधर घूम कर घर का हर कोना देख रही थी और मन ही मन झूम रही थी.

विकास ने उस के पास आ कर मुसकराते हुए कहा, ‘‘आज की शाम हम बाहर मनाएंगे परंतु इस से पहले तुम कुछ सुस्ता लो. कुछ ठंडा या गरम पीओगी?’’ विकास ने पूछा.

रजनी विकास के करीब आ गई और उस के गले में बांहें डाल कर बोली, ‘‘आज की शाम बाहर गंवाने के लिए नहीं है, विकास. मुझे शयनकक्ष में ले चलो.’’

विकास ने रजनी को बांहों के घेरे में ले लिया और ऊपरी मंजिल पर स्थित शयनकक्ष की ओर चल दिया.

ऊंच नीच की दीवार : दिनेश और सरिता की रिजर्व्ड लवस्टोरी

‘‘बाबूजी…’’

‘‘क्या बात है सुभाष?’’

‘‘दिनेश उस दलित लड़की से शादी कर रहा है,’’ सुभाष ने धीरे से कहा.

‘‘क्या कहा, दिनेश उसी दलित लड़की से शादी कर रहा है…’’ पिता भवानीराम गुस्से से आगबबूला हो उठे.

वे आगे बोले, ‘‘हमारे समाज में क्या लड़कियों की कमी है, जो वह एक दलित लड़की से शादी करने पर तुला है? अब मेरी समझ में आया कि उसे नौकरी वाली लड़की क्यों चाहिए थी.’’

‘‘यह भी सुना है कि वह दलित परिवार बहुत पैसे वाला है,’’ सुभाष ने जब यह बात कही, तब भवानीराम कुछ सोच कर बोले, ‘‘पैसे वाला हुआ तो क्या हुआ? क्या दिनेश उस के पैसे से शादी कर रहा है? कौन है वह लड़की?’’

‘‘उसी के स्कूल की कोई सरिता है?’’ सुभाष ने जवाब दिया.

‘‘देखो सुभाष, तुम अपने छोटे भाई दिनेश को समझाओ.’’

‘‘बाबूजी, मैं तो समझा चुका हूं, मगर वह तो उसी के साथ शादी करने का मन बना चुका है,’’ सुभाष ने जब यह बात कही, तब भवानीराम सोच में पड़ गए. वे दिनेश को शादी करने से कैसे रोकें? चूंकि उन के लिए यह जाति की लड़ाई है और इस लड़ाई में उन का अहं आड़े आ रहा है.

भवानीराम पिछड़े तबके के हैं और दिनेश जिस लड़की से शादी करने जा रहा है, वह दलित है, फिर चाहे वह कितनी ही अमीर क्यों न हो, मगर ऊंचनीच की यह दीवार अब भी समाज में है. सरकार द्वारा भले ही यह दीवार खत्म हो चुकी है, मगर फिर भी लोगों के दिलों में यह दीवार बनी हुई है.

दिनेश भवानीराम का छोटा बेटा है. वह सरकारी स्कूल में टीचर है. जब से उस की नौकरी लगी है, तब से उस के लिए लड़की की तलाश जारी थी. उस के लिए कई लड़कियां देखीं, मगर वह हर लड़की को खारिज करता रहा.

तब एक दिन भवानीराम ने चिल्ला कर उस से पूछा था, ‘तुझे कैसी लड़की चाहिए?’

‘मुझे नौकरी करने वाली लड़की चाहिए,’ दिनेश ने उस दिन जवाब दिया था. भवानीराम ने इस शर्त को सुन कर अपने हथियार डाल दिए थे. वे कुछ नहीं बोले थे.

जिस स्कूल में दिनेश है, वहीं पर सरिता नाम की लड़की भी काम करती है. सरिता जिस दिन इस स्कूल में आई थी, उसी दिन दिनेश से उस की आंखें चार हुई थीं. सरिता की नौकरी रिजर्व कोटे के तहत लगी थी.

सरिता उज्जैन की रहने वाली है. वहां उस के पिता का बहुत बड़ा जूतों का कारोबार है. इस के अलावा मैदा की फैक्टरी भी है. उन का लाखों रुपयों का कारोबार है.

फिर भी सरिता सरकारी नौकरी करने क्यों आई? इस ‘क्यों’ का जवाब स्टाफ के किसी शख्स ने नहीं पूछा.

सरिता को अपने पिता की जायदाद पर बहुत घमंड था. उस का रहनसहन दलित होते हुए भी ऊंचे तबके जैसा था. वह अपने स्टाफ में पिता के कारोबार की तारीफ दिल खोल कर किया करती थी. वह हरदम यह बताने की कोशिश करती थी कि नौकरी उस ने अपनी मरजी से की है. पिता तो नौकरी कराने के पक्ष में नहीं थे, मगर उस ने पिता की इच्छा के खिलाफ आवेदन भर कर यह नौकरी हासिल की.

स्टाफ में अगर कोई सरिता के पास आया, तो वह दिनेश था. ज्यादातर समय वे स्कूल में ही रहा करते थे. पहले उन में दोस्ती हुई, फिर वे एकदूसरे के ज्यादा पास आए. जब भी खाली पीरियड होता, उस समय वे दोनों स्टाफरूम में बैठ कर बातें करते रहते.

शुरूशुरू में तो वे दोस्त की तरह रहे, मगर उन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला. स्टाफरूम के अलावा वे बगीचे और रैस्टोरैंट में भी मिलने लगे, भविष्य की योजनाएं बनाने लगे.

ऐसे ही रोमांस करते 2 साल गुजर गए. उन्होंने फैसला कर लिया कि अब वे शादी करेंगे, इसलिए सरिता ने पूछा था, ‘हम कब शादी करेंगे?’

‘तुम अपने पिताजी को मना लो, मैं अपने पिताजी को,’ दिनेश ने जवाब दिया.

‘मेरे पिताजी ने तो अपने समाज में लड़के देख लिए हैं और उन्होंने कहा भी है कि आ कर लड़का पसंद कर लो. मैं ने मना कर दिया कि मैं अपने ही स्टाफ में दिनेश से शादी करूंगी,’ सरिता बोली.

‘फिर पिताजी ने क्या कहा?’ दिनेश ने पूछा.

‘उन्होंने तो हां कर दी…’ सरिता ने कहा, ‘तुम्हारे पिताजी क्या कहते हैं?’

‘पहले मैं बड़े भैया से बात करता हूं,’ दिनेश ने कहा.

‘हां कर लो, ताकि मेरे पिताजी शादी की तैयारी कर लें,’ कह कर सरिता ने गेंद दिनेश के पाले में फेंक दी. मगर दिनेश कैसे अपने पिता से कहे. उस ने अपने बड़े भाई सुभाष से बात करनी चाही, तो सुभाष बोला, ‘तुम समझते हो कि बाबूजी इस शादी के लिए तैयार हो जाएंगे?’

‘आप को तैयार करना पड़ेगा,’ दिनेश ने जोर देते हुए कहा.

‘अगर बाबूजी नहीं माने, तब तुम अपना इरादा बदल लोगे?’

‘नहीं भैया, इरादा तो नहीं बदलूंगा. अगर वे नहीं मानते हैं, तो शादी करने का दूसरा तरीका भी है,’ कह कर दिनेश ने अपने इरादे साफ कर दिए.

मगर सुभाष ने जब पिताजी से बात की, तब उन्होंने मना कर दिया. अब सवाल यह है कि कैसे शादी हो? सुभाष भी इस बात से परेशान है. एक तरफ पिता?हैं, तो दूसरी तरफ छोटा भाई. इन दोनों के बीच में उस का मरना तय है.

बाबूजी का अहं इस शादी में आड़े आ रहा है. इन दोनों के बीच में सुभाष पिस रहा?है. ऐसा भी नहीं है कि दोनों नाबालिग हैं. शादी के लिए कानून भी उन पर लागू नहीं होता है.

एक बार फिर बाबूजी का मन टटोलते हुए सुभाष ने पूछा, ‘‘बाबूजी, आप ने क्या सोचा है?’’

भवानीराम के चेहरे पर गुस्से की रेखा उभरी. कुछ पल तक वे कोई जवाब नहीं दे पाए, फिर बोले, ‘‘अब क्या सोचना है… जब उस ने उस दलित लड़की से शादी करने का मन बना ही लिया है, तब उस के साथ शादी करने की इजाजत देता हूं? मगर मेरी एक शर्त है.’’

‘‘कौन सी शर्त बाबूजी?’’ कहते समय सुभाष की आंखें थोड़ी चमक उठीं.

‘‘न तो मैं उस की शादी में जाऊंगा और न ही उस दलित लड़की को बहू स्वीकार करूंगा और मेरे जीतेजी वह इस घर में कदम नहीं रखेगी. आज से मैं दिनेश को आजाद करता हूं,’’ कह कर बाबूजी की सांस फूल गई.

बाबूजी की यह शर्त भविष्य में क्या गुल खिलाएगी, यह तो बाद में पता चलेगा, मगर यह बात तय है कि परिवार में दरार जरूर पैदा होगी.

जब से अम्मां गुजरी हैं, तब से बाबूजी बहुत टूट चुके हैं. अब कितना और टूटेंगे, यह भविष्य बताएगा. उन की इच्छा थी कि दिनेश शादी कर ले तो एक और बहू आ जाए, ताकि बड़ी बहू को काम से राहत मिले, मगर दिनेश ने दलित लड़की से शादी करने का फैसला कर बाबूजी के गणित को गड़बड़ा दिया है.

उन्होंने अपनी शर्त के साथ दिनेश को खुला छोड़ दिया. उन की यह शर्त कब तक चल पाएगी, यह नहीं कहा जा सकता है.

मगर शादी की सारी जिम्मेदारी सरिता के बाबूजी ने उठा ली.

भंवर: क्या पूरा हो पाया रजिया का सपना

रजिया तीखे नैननक्श की लड़की थी. खूब गोरी भी थी. एक दकियानूसी परिवार में पलीबढ़ी होने के बावजूद उस ने बीए कर लिया था. वह मास्टरनी बनना चाहती थी, इसलिए अपनी अम्मी से पूछ कर उस ने बीएड का फार्म भर दिया. कुछ ही दिनों में उस के पास बीएड में दाखिला लेने के लिए कालेज से चिट्ठी भी आ गई.

चिट्ठी आते ही रजिया के अब्बू और अम्मी में जम कर झगड़ा शुरू हो गया. अब्बू तो रजिया को शुरू से ही स्कूल में पढ़ाने के खिलाफ थे. रजिया ने जब 5वीं जमात पास की थी, तब उस की पढ़ाईलिखाई को ले कर परिवार के बुजुर्गों में बहस शुरू हो गई थी.

उस की अम्मी नरगिस के अलावा सभी की यह राय थी कि रजिया को स्कूल के बजाय अपने मजहब की तालीम दी जाए. उस के अब्बू करीम साहब चाहते थे कि उसे कुरान शरीफ रटाया जाए. लेकिन रजिया की अम्मी ने उन्हें समझाया, ‘‘वह कुरान शरीफ तो पढ़ ही चुकी है. जमाना अब बदल गया है, इसलिए रजिया के लिए भी पढ़ाईलिखाई की जरूरत है.’’

तभी एक साहब आगे बढ़े और कहने लगे, ‘‘बड़े स्कूल में न भेजो, लड़की बिगड़ जाएगी. पढ़ा कर क्या कराना है, घर में परदे में ही तो रहेगी.’’

काफी बहस के बाद रजिया का दाखिला लखनऊ में कर दिया गया, जहां उस की मौसी रहती थीं. रजिया ने अपनी अम्मी द्वारा हौसला बढ़ाए जाने और अपनी जिद से बीए कर लिया था.

दरअसल, रजिया का परिवार लखनऊ के पास एक छोटे से कसबे में रहता था. वहां आज भी लड़कियों की पढ़ाई पर इतना जोर नहीं दिया जाता था. यही वजह थी कि रजिया ने अपने इलाके के कालेज के बजाय लखनऊ से बीए किया था.

जब करीम साहब से नरगिस ने रजिया की बीएड करने की इच्छा बताई, तो वे आगबबूला हो उठे, ‘‘रहने दो, बहुत हो चुका यह नाटक. यह सब तुम्हारी वजह से हो रहा है. मेरी इज्जत का तो खयाल करो. लोग क्या कहेंगे?’’ करीम साहब ने नरगिस से कहा.

‘‘जरा समझने की कोशिश करो. इस में क्या हर्ज है?’’

‘‘मैं हरगिज रजिया को बीएड में दाखिला कराने के लिए राजी नहीं हूं. लड़की बड़ी हो कर दुलहन बनती है, अपने घर को संभालती है, न कि बेपरदा हो कर बाहर घूमती है.’’

रजिया से तब चुप न रहा गया. उस ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘आप परदापरदा चिल्ला रहे हैं. आज कहां है परदा? बाजारों और बसों में औरतें बुरका पहनती जरूर हैं, पर उन का नकाब हमेशा उठा ही रहता है… क्यों? औरतें खेतों में काम करती हैं, सब्जियां लाती हैं, फिर कहां गया उन का परदा?’’

‘‘तुम मुझ से बहस कर रही हो?’’ करीम साहब ने गुस्से से कहा.

‘‘अब्बू, मैं बहस नहीं कर रही, बल्कि सही बात कह रही हूं. लड़कों की तरह लड़कियों की भी पढ़ाईलिखाई जरूरी है. अगर वे नौकरी न भी करें तो शादी के बाद मां बन कर अपने बच्चों की देखभाल तो अच्छी तरह कर सकती हैं.’’

बातचीत के दौरान वहां उन के कुछ करीबी रिश्तेदार और पड़ोसी भी आ गए. करीम साहब के एक पोंगापंथी दोस्त कहने लगे, ‘‘छोड़ो बेटी इन बातों को, अभी तुम नादान हो. आज हमारे देश की सरकार मुसलमानों के साथ इंसाफ नहीं कर रही है. सरकारी नौकरियों में हमें बहुत कम लिया जाता है. चारों तरफ हिंदूमुसलिम के झगड़े होते रहते हैं. यहां तक कि लोग हमें गयागुजरा समझते हैं. गिरी निगाहों से देखते हैं.’’

‘‘नहीं चाचा मियां, आप के समझने में फर्क है. जो भी पढ़ाईलिखाई में तेज होता है, वह अपनी मंजिल तक आराम से पहुंच जाता है, चाहे फिर वह हिंदू हो या मुसलमान. आज हिंदुस्तान का हर आदमी आजादी से अपने मजहब के मुताबिक रहने और अपने त्योहार मनाने का पूरा हक रखता है.

‘‘उधर जरा पाकिस्तान और दूसरे मुसलिम देशों को देखो, जो इसलामी देश होने का ढिंढोरा पीटते हैं, पर वहां क्या हो रहा है? इसलाम सिखाता है कि सभी से प्यार करो, न कि सिर्फ मुसलमानों को.

‘‘उन देशों में भी बराबरी का हक नहीं है. यहां से गए मुसलमानों को छोटा समझा जाता है, जबकि हमारे देश के कानून में किसी मजहब या बिरादरी को ज्यादा सुविधा नहीं दी गई है. हमारे देश में पढ़ाईलिखाई के आधार पर ही किसी को नौकरी मिलती है, हिंदूमुसलिम के आधार पर नहीं. इस मामले में लड़केलड़कियों में भी भेद नहीं किया जाता. कई नौकरियों में तो लड़के देखते रह जाते हैं और लड़कियां अपनी पढ़ाईलिखाई और हुनर के बल पर नौकरी पा जाती हैं.

‘‘2 मिसाल हमारे गांव की ही ले लो. हरदेव का बड़ा लड़का एक मुकदमे के चक्कर में जेल चला गया. ऐसे मौके पर किसी ने उस का साथ नहीं दिया. घर में उस की औरत और एक बच्चा था. औरत पढ़ीलिखी थी, इसलिए एक दफ्तर में नौकरी कर ली.

‘‘उस ने खुद की गुजरबसर की और अपने आदमी की भी जमानत करा ली,’’ नरगिस ने करीम साहब की ओर देखते हुए फिर कहा, ‘‘दूसरी ताजा मिसाल नईम की बेटी की ले लो. वह अनपढ़ लड़की शादी के बाद ससुराल गई.

‘‘अभी 2 ही साल बीते होंगे शादी को हुए कि उस का आदमी एक हादसे में मारा गया. सासससुर थे ही नहीं, रिश्तेदारों ने भी दुत्कार दिया उसे.

‘‘अब वह अपने बच्चे के साथ दुख व लाचारी के दिन काट रही है. अगर वह भी पढ़ीलिखी होती तो उस की यह हालत नहीं होती,’’ रजिया ने मजबूती से अपनी बात रखी.

इन सब के बावजूद रजिया अपनेआप को एक गहरे भंवर में फंसा हुआ महसूस कर रही थी. करीम साहब अपने फैसले पर अडिग थे, तो आखिर में रजिया की अम्मी को कहना पड़ा, ‘‘यह फैसला मेरा नहीं, बल्कि खुद रजिया का है. कानून के मुताबिक हमें उस के फैसले में दखल देने का कोई हक नहीं है.’’

‘‘हक क्यों नहीं? क्या हम उस के…’’ करीम साहब ने बहुत कोशिश की कि रजिया बीएड में दाखिला न ले, पर नरगिस ने हमेशा की तरह उस की तरफदारी की और वह बीएड करने लगी.

समय बीतता गया. रजिया की ट्रेनिंग पूरी हो गई. कुछ ही दिनों में वह एक स्कूल में अंगरेजी की बड़ी मास्टरनी हो गई.

करीम साहब रजिया के नौकरी करने से परेशान रहने लगे थे और अकसर उन की तबीयत खराब रहने लगी थी. एक दिन जब रजिया स्कूल से आई तो घर में कोई नहीं था. पड़ोसी से पता लगा कि उस के अब्बू की तबीयत खराब हो गई है. लोग उन्हें अस्पताल ले गए हैं.

कुछ ही देर में रजिया अस्पताल पहुंच गई. वहां बड़ी भीड़ जमा थी.

तभी नर्स ने आ कर कहा, ‘‘खून चाहिए. क्या आप में से कोई खून दे सकता है? अस्पताल में खून नहीं है.’’

खून देने के नाम पर सब चुप हो गए. रजिया सब की ओर देख रही थी. रजिया के कानों में एक ही शब्द ‘खून’ बारबार गूंज रहा था.

‘‘खून जितना चाहिए मेरा ले लीजिए, पर मेरे अब्बू को बचा लीजिए.’’

एकएक पल कीमती था. नर्स उसे अंदर ले गई, पर उस का खून दूसरे ग्रुप का था.

करीम साहब का इलाज करने वाले डाक्टरों में सर्जन वसीम भी थे. वे करीम साहब को पहचान गए, जिन के मकान में तकरीबन 23 साल पहले वे अपने मातापिता के साथ रहते थे.

उस समय वसीम और रजिया बहुत छोटे थे, इसलिए अब वे एकदूसरे को नहीं पहचान पाए थे. उन्हीं दिनों वसीम के पिताजी की बदली देहरादून हो गई थी. वसीम की पढ़ाईलिखाई वहीं हुई. वही वसीम अब सर्जन वसीम हो गए थे और रजिया मास्टरनी. उन्होंने रजिया से पूछा, ‘‘ये आप के क्या लगते हैं?’’

‘‘ये मेरे अब्बू हैं.’’

‘‘तो फिर आप का नाम रजिया होगा?’’ सर्जन वसीम ने सवालिया निगाह रजिया पर डाली.

‘‘जी, हां.’’

तभी वसीम ने अपने सहयोगी डाक्टर विमल से कहा, ‘‘डाक्टर, मेरा ब्लड ग्रुप करीम साहब के ब्लड ग्रुप से मिलता है, इसलिए मेरा खून ले लीजिए,’’ कहते हुए डाक्टर वसीम खून देने के लिए करीम साहब के बगल वाले बिस्तर पर लेट गए.

जब खून देने के बाद डाक्टर वसीम बाहर निकले, तो रजिया बड़े आभार से उन्हें देखने लगी और बोली, ‘‘मैं तुम्हारा शुक्रिया किस तरह अदा करूं. तुम ने मेरे अब्बू की जान बचा ली.’’

‘‘अरे, यह तो मेरा फर्ज था,’’ वसीम ने झुकी नजरों से कहा.

‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’ होश में आने पर करीम साहब ने पूछा.

‘‘वसीम. शायद आप ने मुझे पहचाना नहीं? आप रफीक साहब को तो जानते होंगे, जो आप के मकान में रहते थे?’’

‘‘हां. वही रफीक साहब जो सरकारी बैंक में मैनेजर थे?’’

‘‘जी हां, मैं उन्हीं का लड़का हूं.’’

अब सर्जन वसीम बिना रोकटोक उन के घर में आनेजाने लगे. एक शाम चाय पीने के बाद वसीम वहां से चले गए. रजिया ने खिड़की खोल कर सड़क की ओर देखा. सड़क की ज्यादातर बत्तियां बुझ चुकी थीं. सड़क सुनसान थी, जिसे वसीम के जूतों की आहट तोड़ रही थी. पेड़ों, मैदानों और मकानों पर चांदनी छिटक गई थी.

तभी रजिया ने खिड़की के पट बंद कर दिए और सोने की कोशिश करने लगी. लेकिन उस की आंखों के आगे बारबार वसीम का चेहरा नाचने लगता. उस के दिल में वसीम के प्रति प्यार हिलोरे मारने लगा था.

हो भी क्यों न. वसीम थे ही इतने हैंडसम. 5 फुट, 10 इंच का कद, चौड़ा सीना, चेहरामोहरा भी बहुत गजब. कालेज में खूब लड़कियां उन पर मरती होंगी.

एक दिन जब डाक्टर वसीम जाने लगा, तो रजिया ने अकेले में कहा, ‘‘कल मेरे जन्मदिन की पार्टी है. तुम आओगे न?’’

‘‘क्यों नहीं, जरूर आऊंगा और तुम्हें एक खूबसूरत तोहफा दूंगा.’’

यह सुन कर रजिया मुसकरा दी.

पार्टी के दिन अकेले में डाक्टर वसीम ने रजिया से कहा, ‘‘रजिया, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘शादी?’’ रजिया ने चौंक कर कहा, ‘‘क्या यही तोहफा है तुम्हारा?’’

‘‘सिर्फ यह ही नहीं, एक और भी है,’’ कहते हुए डाक्टर वसीम ने सोने की एक अंगूठी रजिया की उंगली में पहना दी.

कुछ ही दिनों में दोनों पक्षों में बातचीत शुरू हो गई. डाक्टर वसीम भी अपने मातापिता की एकलौती औलाद थे, इसलिए वे अपने बेटे के लिए अच्छे खानदान की खूबसूरत और पढ़ीलिखी बहू चाहते थे. राजकुमारी सी रजिया उन्हें एक ही नजर में भा गई.

करीम साहब अपनी रजिया का इतने अच्छे घराने में रिश्ता होने पर फूले नहीं समा रहे थे.

‘‘देखा न आप ने, यह सब रजिया की पढ़ाईलिखाई की वजह से हुआ है,’’ रजिया की अम्मी नरगिस ने करीम साहब से कहा.

करीम साहब बोले, ‘‘तुम ठीक कहती हो. अगर रजिया पढ़ीलिखी नहीं होती, तो किसी डाक्टर से निकाह की बात सोच भी नहीं सकती थी. यह बात सच है कि कोई मजहब पढ़ाईलिखाई के लिए मना नहीं करता.

‘‘उस वक्त मेरी आंखों पर पट्टी पड़ गई थी. अब मेरी आंखें खुल गई हैं. मैं अब सब को सही सलाह दूंगा कि

लड़के के साथसाथ लड़की की तालीम भी जरूरी है, तभी हमारी बिरादरी आगे बढ़ सकेगी.’’

सैक्स सुखदायक है पर इन बातों पर भी गौर करें

सैक्सोलौजिस्ट डा. चंद्रकिशोर कुंदरा के मुताबिक, ‘प्रेमीप्रेमिका के बीच सैक्स संबंध स्थापित करने के लिए भौतिक, रासायनिक व मनोवैज्ञानिक कारक ही जिम्मेदार होते हैं. सैक्स ही एक ऐसी सरल क्रिया है जो प्रेमीप्रेमिका को एकसाथ एक ही समय में पूर्ण तृप्ति देती है.’

सैक्स की संपूर्णता प्रेमिका के बजाय प्रेमी पर निर्भर करती है, क्योंकि प्रेमी ही इस की पहल करता है. प्रेमिका सैक्स में केवल सहयोग ही नहीं करती बल्कि पूर्ण आनंद भी चाहती है. अकसर प्रेमीप्रेमिका सैक्स को सुखदायक मानते हैं, लेकिन कई बार सहवास ऐंजौय के साथसाथ कई समस्याओं को भी सामने लाता है. अनुभव के आधार पर इन को दूर कर प्रेमीप्रेमिका सैक्स का सुख उठाते हैं.

शरारती बनें

सैक्स को मानसिक व शारीरिक रूप से ऐंजौय करने के लिए प्रेमीप्रेमिका को शरारती बनना चाहिए. उत्साह, जोश, तनावमुक्त, हंसमुख, जिंदादिल, शरारती प्रेमीप्रेमिका ही सैक्स को संपूर्ण रूप से भोगते हैं.

आत्मविश्वास की कमी न हो

कई बार आत्मविश्वास की कमी हो जाती है. प्रेमी सैक्स के समय उतावलेपन के शिकार हो कर सैक्स के सुखदायक एहसास से वंचित रह जाते हैं.

सैक्स संबंध बनाते समय प्रेमीप्रेमिका के मन में यदि पौजिटिव सोच होगी, तभी दोनों पूर्ण रूप से संतुष्ट हो पाएंगे और सैक्स में कभी कमजोर नहीं पड़ेंगे.

पोर्न फिल्मों से प्रेरित न हों

प्रेमीप्रेमिका अकसर पोर्न फिल्में देख कर, किताबें पढ़ कर सैक्स में हर पल लिप्त रहने की कोशिश करते हैं. अत्यधिक मानसिक कामोत्तेजना की स्थिति में शीघ्रपतन व तनाव में कमी हो जाती है.

सैक्स में जल्दबाजी

कई बार सैक्स में प्रेमीप्रेमिका जल्दबाजी कर जाते हैं. शराब पी कर सैक्स करना चाहते हैं जोकि ठीक नहीं है. हमेशा मादक पदार्थों से दूर रहें. सैक्स के दौरान प्रेमिका ही मादकता का काम करती है.

बढ़ाएं शारीरिक आकर्षण

सहवास के लिए प्रेमी का शारीरिक आकर्षण, स्मार्टनैस, सैक्सी लुक, साफसफाई काफी महत्त्वपूर्ण है. पुरुषोचित्त गुण के साथसाथ गठीले बदन वाले चतुर सुरुचिपूर्ण वस्त्र, रसिक स्वभाव के प्रेमी ही सैक्स में सफल होते हैं.

रोमांटिक स्वभाव रखें

प्रेमिका सहवास के दौरान चाहती है कि उस का प्रेमी रोमांस व ताजगी द्वारा उसे कामोत्तेजित करे. अत: रोमांस की बातें कर सैक्स को सुखदायक बनाएं.

जब सैक्स का मौका मिले

प्रेमीप्रेमिका अकसर सैक्स के लिए मौके की तलाश में रहते हैं. जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, वे एकदूसरे में समाने के लिए बेताब हो जाते हैं, लेकिन इस दौरान कई बार ऐसे अचानक किसी का दरवाजा खटखटाना व फोन की घंटी बज जाती है. ऐसी बाधाओं को दूर कर सहवास को मानसिक व शारीरिक रूप से सुखदायक बनाएं.

एक साथ स्क्रीन पर नजर आएंगे सारा अली और आयुष्मान खुराना, दोनों की कैमिस्ट्री देखना होगा दिलचस्प

बौलीवुड की सबसे नौटी और बोल्ड एक्ट्रेस सारा अली खान इन दिनों आयुष्मान के साथ एक फिल्म करने जा रही है. दोनों स्टार्स एक साथ एक फिल्म में काम करेंगे, जिसे देखना दर्शकों के लिए काफी एक्साइटेड होगा. दोनों ही स्टार्स ने बेहतर फिल्मों में काम किया है और पौपुलेरिटी हासिल की है. लेकिन अब पहली बार ऐसा होगा कि दोनों को दर्शक एक साथ मस्ती करते दिखेंगे.

 

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आपको बता दें कि आयुष्मान खुराना और सारा अली खान को लेकर एक फिल्म का अनाउंसमेंट किया गया है. आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की साथ में ये पहली फिल्म होगी. इस फिल्म की घोषणा होने के बाद आयुष्मान खुराना और सारा अली खान के फैंस काफी ज्यादा एक्साइटेड हो गए हैं. आयुष्मान खुराना और सारा अली खान को साथ लाने में करण जौहर और गुनीत मोंगा के प्रोडक्शन हाउस का हाथ है.

 

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फिल्म ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने मंगलवार को अपने ट्विटर हैंडल पर आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की पहली फिल्म को लेकर अपडेट दिया है. एक ट्वीट के मुताबिक, करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन और गुनीत मोंगा के सिख्या एंटरटेनमेंट मिलकर एक एक्शन-कॉमेडी फिल्म बनाने जा रहे हैं. हालांकि, अभी इस फिल्म के टाइटल का अनाउंसमेंट नहीं किया गया है. आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की इस फिल्म को आकाश कौशिक डायरेक्ट करने वाले हैं और उन्होंने इस फिल्म को लिखा भी है. आयुष्मान खुराना और सारा अली खान की पहली फिल्म जल्द ही शूटिंग शुरू होने वाली है. बताते चलें कि करण जौहर के धर्मा प्रोडक्शन और गुनीत मोंगा के सिख्या एंटरटेनमेंट का साथ में ये तीसरा प्रोजेक्ट है.

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