Mother’s Day Special: मां का फैसला- भाग 1

रजनीगंधा की बड़ी डालियों को माली ने अजीब तरीके से काटछांट दिया था. उन्हें सजाने में मुझे बड़ी मुश्किल हो रही थी. बिट्टी ने अपने झबरे बालों को झटका कर एक बार उन डालियों से झांका, फिर हंस कर पूछा, ‘‘मां, क्यों इतनी परेशान हो रही हो. अरे, प्रभाकर और सुरेश ही तो आ रहे हैं…वे तो अकसर आते ही रहते हैं.’’ ‘‘रोज और आज में फर्क है,’’ अपनी गुडि़या सी लाड़ली बिटिया को मैं ने प्यार से झिड़का, ‘‘एक तो कुछ करनाधरना नहीं, उस पर लैक्चर पिलाने आ गई. आज उन दोनों को हम ने बुलाया है.’’

बिट्टी ने हां में सिर हिलाया और हंसती हुई अपने कमरे में चली गई. अजीब लड़की है, हफ्ताभर पहले तो लगता था, यह बिट्टी नहीं गंभीरता का मुखौटा चढ़ाए उस की कोई प्रतिमा है. खोईखोई आंखें और परेशान चेहरा, मुझे राजदार बनाते ही मानो उस की उदासी कपूर की तरह उड़ गई और वही मस्ती उस की रगों में फिर से समा गई.

‘मां, तुम अनुभवी हो. मैं ने तुम्हें ही सब से करीब पाया है. जो निर्णय तुम्हारा होगा, वही मेरा भी होगा. मेरे सामने 2 रास्ते हैं, मेरा मार्गदर्शन करो.’ फिर आश्वासन देने पर वह मुसकरा दी. परंतु उसे तसल्ली देने के बाद मेरे अंदर जो तूफान उठा, उस से वह अनजान थी. अपनी बेटी के मन में उठती लपटों को मैं ने सहज ही जान लिया था. तभी तो उस दिन उसे पकड़ लिया.

ये भी पढ़ें- इक घड़ी दीवार की

कई दिनों से बिट्टी सुस्त दिख रही थी, खोईखोई सी आंखें और चेहरे पर विषाद की रेखाएं, मैं उसे देखते ही समझ गई थी कि जरूर कोई बात है जो वह अपने दिल में बिठाए हुए है. लेकिन मैं चाहती थी कि बिट्टी हमेशा की तरह स्वयं ही मुझे बताए. उस दिन शाम को जब वह कालेज से लौटी तो रोज की अपेक्षा ज्यादा ही उदास दिखी. उसे चाय का प्याला थमा कर जब मैं लौटने लगी तो उस ने मेरा हाथ पकड़ कर रोक लिया और रोने लगी.

बचपन से ही बिट्टी का स्वभाव बहुत हंसमुख और चंचल था. बातबात में ठहाके लगाने वाली बिट्टी जब भी उदास होती या उस की मासूम आंखें आंसुओं से डबडबातीं तो मैं विचलित हो उठती. बिट्टी के सिवा मेरा और था ही कौन? पति से मानसिकरूप से दूर, मैं बिट्टी को जितना अपने पास करती, वह उतनी ही मेरे करीब आती गई. वह सारी बातों की जानकारी मुझे देती रहती. वह जानती थी कि उस की खुशी में ही मेरी खुशी झलकती है. इसी कारण उस के मन की उठती व्यथा से वही नहीं, मैं भी विचलित हो उठी. सुरेश हमारे बगल वाले फ्लैट में ही रहता था. बचपन से बिट्टी और सुरेश साथसाथ खेलते आए थे. दोनों परिवारों का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. उस की मां मुझे मानती थी. मेरे पति योगेश को तो अपने व्यापार से ही फुरसत नहीं थी, पर मैं फुरसत के कुछ पल जरूर उन के साथ बिता लेती. सुरेश बेहद सीधासादा, अपनेआप में खोया रहने वाला लड़का था, लेकिन बिट्टी मस्त लड़की थी.

बिट्टी का रोना कुछ कम हुआ तो मैं ने पूछ लिया, ‘आजकल सुरेश क्यों नहीं आता?’ ‘वह…,’ बिट्टी की नम आंखें उलझ सी गईं.

‘बता न, प्रभाकर अकसर मुझे दिखता है, सुरेश क्यों नहीं?’ मेरा शक सही था. बिट्टी की उदासी का कारण उस के मन का भटकाव ही था. ‘मां, वह मुझ से कटाकटा रहता है.’

‘क्यों?’ ‘वह समझता है, मैं प्रभाकर से प्रेम करती हूं.’

‘और तू?’ मैं ने उसी से प्रश्न कर दिया. ‘मैं…मैं…खुद नहीं जानती कि मैं किसे चाहती हूं. जब प्रभाकर के पास होती हूं तो सुरेश की कमी महसूस होती है, लेकिन जब सुरेश से बातें करती हूं तो प्रभाकर की चाहत मन में उठती है. तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूं. किसे अपना जीवनसाथी चुनूं?’ कह कर वह मुझ से लिपट गई.

ये भी पढ़ें- दो कदम साथ: क्या वे दो कदम भी साथ चल सके

मैं ने उस के सिर पर हाथ फेरा और सोचने लगी कि कैसा जमाना आ गया है. प्रेम तो एक से ही होता है. प्रेम या जीवनसाथी चुनने का अधिकार उसे मेरे विश्वास ने दिया था. सुरेश उस के बचपन का मित्र था. दोनों एकदूसरे की कमियों को भी जानते थे, जबकि प्रभाकर ने 2 वर्र्ष पूर्व उस के जीवन में प्रवेश किया था. बिट्टी बीएड कर रही थी और हम उस का विवाह शीघ्र कर देना चाहते थे, लेकिन वह स्वयं नहीं समझ पा रही थी कि उस का पति कौन हो सकता है, वह किस से प्रेम करती है और किसे अपनाए.

Serial Story: बीवी का आशिक- भाग 4

लेखक- एम. अशफाक

अंदर से क्वार्टर देखा, बहुत अच्छी तरह सजा हुआ था. रसोई तो और भी ज्यादा अच्छी तरह सजी हुई थी. मर्द कितना ही सफाई वाला हो, लेकिन इस तरह रसोई और घर नहीं सजा सकता. एएसएम तो वैसे भी अविवाहित था, मेरी छठी इंद्री जाग गई.

‘‘तुम्हारा खाना कौन पकाता है?’’

‘‘जी, वह पानी वाला पका देता है.’’

मैं ने उस का जवाब एक पुलिस वाले की नजर से उस के चेहरे की ओर देखते हुए सुना. मैं ने देखा उस के चेहरे का रंग बदल रहा था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘इस उजाड़ में तुम्हारा दिल कैसे लगता है?’’

वह बोला, ‘‘बस जी, कोई किताब पढ़ लेता हूं या फिर घूमने निकल जाता हूं.’’

बातें करतेकरते हम घर से बाहर निकले तो क्वार्टर के सामने कुछ झोपडि़यां दिखाई दीं. मैं ने उस से पूछा, ‘‘ये किस की झोपडि़यां हैं?’’

‘‘जी, वे भीलों के झोपडे़ हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘चलो, चल कर देखते हैं.’’

वहां गए तो झोपडि़यों के पास कुछ बकरियां बंधी थीं. हमें देख कर कुत्ते भौंकने लगे. उन की आवाज सुन कर झोपडि़यों से औरतें निकल आईं और हमारी ओर देखने लगीं.

मैं ने झोपडि़यों का चक्कर लगा कर देखा तो वहां औरतें ही नजर आईं, मर्द कोई नहीं था. मैं ने उन औरतों से उन के मर्दों के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे थरपारकर (रेगिस्तान की एक जगह) में खेतों पर काम करने जाते हैं.’’

‘‘तुम्हारे मर्द खेतों पर रहते हैं और तुम?’’ सवाल सुन कर एक औरत बोली, ‘‘वे वहां और हम यहां.’’

‘‘तुम क्या काम करती हो?’’

‘‘बकरियों का दूध निकाल कर रेलवे वालों को बेचते हैं.’’ एक औरत ने एएसएम को देख कर कहा, ‘‘ये बाबू तो यहां भी दूध लेने आ जाते हैं.’’

मैं ने उसी औरत से कहा, ‘‘तुम्हारा आदमी कहां है?’’

उस ने कहा, ‘‘बताया था ना थरपारकर में काम करता है.’’

‘‘वह यहां कब आता है?’’

‘‘1-2 महीने बाद आता है.’’

‘‘उसे आए हुए कितने दिन हो गए?’’

‘‘एक महीने से तो उस ने सूरत भी नहीं दिखाई.’’ वह मुसकरा कर बोली.

‘‘तुम्हारे आदमी का क्या नाम है?’’

ये  भी पढ़ें- Mother’s Day Special: मां हूं न

वह कुछ लजा गई, दूसरी औरत ने बताया, ‘‘शिवाराम नाम है.’’

मैं ने एएसएम का बाजू पकड़ा और उसे स्टेशन पर ले आया. एएसएम का उजाड़ इलाके में क्वार्टर, भीलों की जवान लड़की, वह दूध लेने उन के घर जाता था. निस्संदेह वह कोई फरिश्ता नहीं था. उस समय सुबह 7 बजे थे. मैं ने वहां के थाने से पुलिस इंसपेक्टर को बुलवाया और उस से ऊंटों का इंतजाम करने के लिए कहा. उस ने तुरंत ऊंट बुलवा लिए.

मैं पुलिस इंसपेक्टर और 2 सिपाहियों को ले कर थर पार कर के खेतीबाड़ी वाले इलाके में 20 मील लंबा सफर कर के पहुंच गया. शाम का समय था, कुछ लोग अब भी खेतों पर काम कर रहे थे. ऊंट रुकवा कर मैं उन लोगों की ओर गया. पुलिस की वरदी में देख कर वे सब खड़े हो गए.

मैं ने जाते ही सख्ती से पूछा, ‘‘तुम में शिवा कौन है?’’

वे सब डर गए थे, फिर धीरेधीरे एक आदमी हमारी ओर आया. मैं ने पूछा, ‘‘तुम हो शिवा?’’

‘‘हां, मेरा ही नाम शिवा है.’’ उस की आवाज में जरा भी घबराहट नहीं थी.

‘‘तुम ने हत्या की है. मैं तुम्हें गिरफ्तार करने आया हूं. वह कुल्हाड़ी कहां है, जिस से तुम ने हत्या की है?’’

वह जवाब देने के बजाए एक ओर मुंह घुमा कर देख रहा था, वहां एक झोंपड़ी थी. मेरा हमला उस पर इतना सख्त और जल्दबाजी वाला था कि वह संभल नहीं सका. सूबेदार को अपने एरिए का राजा समझने वाला भील अपने बचाव के बारे में सोच भी नहीं सका.

ये भी पढ़ें- Serial Story: सोने का घंटा- भाग 2

शिवा मेरे साथ झोपड़ी में गया और वहां से एक कुल्हाड़ी और खून में सने अपने कपड़े जमीन से खोद कर मेरे हवाले कर दिए. वह बिलकुल शांत था, उस के चेहरे से घमंड साफ दिखाई दे रहा था. वह यही समझ रहा था कि उस ने एक व्यभिचारी एएसएम को अपनी पत्नी को बिगाड़ने का बदला ले लिया है.

लेकिन जिस रात वह एएसएम की हत्या करने के लिए कुल्हाड़ी ले कर उस जगह गया था, जहां एएसएम सोया करता था, वहां वह अफसर सोया हुआ था, जो निरीक्षण के लिए आया हुआ था.

हत्यारे ने अंधेरे में अपने शिकार को पहचाना नहीं, उसे यह पता था कि यहां हर रात वही बाबू सोता था, जिस के क्वार्टर में उस की जवान पत्नी दूध देने जाती थी.

उस के  ऊपर हत्या का भूत सवार था. हत्या करने के बाद उसे 20 मील दूर भी जाना था. उसे जब आजीवन कारावास की सजा हुई तो उसे इस का दुख नहीं था, दुख तो उस की पत्नी के प्रेमी के बच जाने का था.

प्रस्तुति : एस.एम. खान

Serial Story: मासूम कातिल- भाग 4

लेखक- गजाला जलील

पेट में पलती औलाद ने मुझे खुदकशी करने न दी. फिर मेरी बदनसीब बेटी अदीना पैदा हो गई. मेरे जिस्म का एक टुकड़ा मेरी गोद में था. मैं ने अपना घर बेच दिया, एक गुमनाम मोहल्ले में एक कमरा खरीद कर रहने लगी. मैं ने अपनी पुरानी सब बातें भुला दीं. मकान से अच्छी रकम मिली थी. फिर मैं थोड़ाबहुत सिलाईकढ़ाई का काम करने लगी.

हम मांबेटी की अच्छी गुजर होने लगी. मैं ने अपनी बेटी की बहुत अच्छी परवरिश की. उसे दुनिया की हर ऊंचनीच समझाई. उस से वादा लिया कि वह मुझ से कोई बात नहीं छिपाएगी. अदीना बेइंतहा हसीन निकली. मैं ने उसे अच्छी तालीम दिलाई. वह बीएससी कर रही थी. एक दिन वह मुझ से कहने लगी, ‘‘मम्मी, मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘कहो.’’

‘‘मैं नौकरी करना चाहती हूं. मेरे एग्जाम भी पूरे हो गए हैं. रिजल्ट भी जल्द आएगा.’’

‘‘नहीं बेटी, नौकरी ढूंढना और करना बड़ा कठिन है.’’

‘‘मम्मी, मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई है.’’

‘‘कहां मिल गई नौकरी तुम्हें?’’

‘‘एक प्राइवेट फर्म है. फर्म के मालिक ने मुझे खुद नौकरी का औफर दिया है. मेरी इमरान साहब से कालेज के फंक्शन में मुलाकात हुई थी. वह चीफ गेस्ट थे. इतने नेक और सादा मिजाज आदमी हैं कि देख कर आप दंग रह जाएंगी.’’

‘‘कौन?’’ मुझे जैसे बिच्छू ने डंक मारा.

‘‘इमरान हसन साहब. बड़े हमदर्द इंसान हैं.’’ अदीना उन के बारे में पता नहीं क्याक्या बोलती रही. मुझे लगा, मेरे चारों तरफ जहन्नुम की आग दहक रही हो. फिर मैं ने खुद पर काबू पाया और कुछ सोच कर अदीना को नौकरी की इजाजत दे दी.

वह मेरी हां सुन कर खुशी से खिल उठी. साथ ही मैं ने एक काम किया. चुपचाप उस का पीछा करना शुरू कर दिया. मैं ने इमरान हसन को देखा, वह उतना ही खूबसूरत और डैशिंग था.

उम्र की अमीरी ने उसे और ग्रेसफुल बना दिया था. मैं उस के एकएक रूप एकएक चाल से वाकिफ थी. फिर मैं ने अदीना को अपनी गमभरी दास्तान सुनाई. वह कांप उठी, उस ने चीख कर पूछा, ‘‘ममा, कौन था वह कमीना बेदर्द इंसान?’’

‘‘मैं खुद उस बेगैरत की तलाश में हूं.’’

‘‘काश! वह मिल जाए.’’ अदीना ने गुर्राते हुए कहा तो मैं ने पूछा, ‘‘क्या करेगी तू उस का?’’

‘‘खुदा की कसम है मम्मी, मैं उसे जान से मार डालूंगी. ऐसा हाल करूंगी कि दुनिया देखेगी.’’

मुझे सुकून मिल गया, मैं ने अदीना की परवरिश इसी तरह की थी. ऐसा ही बनाया था उसे. मेरी निगरानी जारी थी. मैं चुपचाप उस का पीछा करती रही. उस दिन भी मैं अदीना से ज्यादा दूर नहीं थी, जब वह अदीना को अपनी शानदार कार में कहीं ले जा रहा था. वह अदीना को अपने घर ले गया. मैं भी छिप कर अंदर आ गई और दरवाजे के पीछे खड़ी हो गई.

मैं सारे रास्तों से वाकिफ थी. घर सुनसान पड़ा था. हलका अंधेरा था. मेरे कानों में इमरान हसन की नशीली आवाज पड़ी, ‘‘अदीना, तुम मेरी जिंदगी में बहार बन कर आई हो. मैं ने सारी जिंदगी तुम जैसी हसीना की तलाश में तनहा गुजार दी.’’

ये भी पढ़ें- Serial Story: सोने का घंटा- भाग 1

‘‘सर, ये आप क्या कह रहे हैं. मैं तो आप पर बहुत ऐतमाद करती थी. आप पर बहुत भरोसा है मुझे.’’

‘‘हां ठीक है, पर मोहब्बत तो उफनती नदी है. उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती. तुम्हारी चाहत मेरी रगरग में समा गई है. मेरी जान, मैं अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘सर, ये आप गलत कर रहे हैं. आप मुझे यहां यह कह कर लाए थे कि कुछ लेटर्स भेजने हैं.’’

‘‘ये मेरा घर है और तुम अपनी मरजी से मेरे घर आई हो. अब यहां जो कुछ होगा, उस में तुम्हारी रजा भी समझी जाएगी. इस में मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा, पर तुम बदनाम हो जाओगी. लोग कहेंगे तुम मेरे सूने घर में क्यों आई थीं?’’

‘‘सर, आप मुझे काम के बहाने लाए थे.’’

‘‘कौन सुनेगा, तुम्हारी बकवास.’’ वह हंस कर आगे बढ़ा. उसी वक्त मैं अंदर दाखिल हो गई. मैं ने कहा, ‘‘अदीना, यही है वह आदमी जिस की कहानी मैं ने तुम्हें सुनाई थी. यही है वह वहशी दरिंदा, जिस ने मेरी इज्जत लूटी थी.’’

इमरान मुझे देख कर हैरान रह गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘इमरान, ये तेरी बेटी है. तेरा गुनाह है.’’

फिर हम दोनों मसरूफ हो गए. अदीना ने अपना वादा निभाया. उसे कोने में रखा डंडा मिल गया. हम ने अपना इंतकाम लिया. इज्जत के लुटेरे उस शैतान को हम ने खत्म कर दिया. हम ने बहुत बड़ा नेक काम किया है और कई लड़कियों की इज्जत बचाई है. भले ही आप हमें सजा दीजिए, हमें मंजूर है. सुहाना चुप हो गई.

ये भी पढ़ें-  संजोग: मां-बाप के वैचारिक मतभेद के कारण विवेक ने क्या लिया फैसला?

यह मेरी जिंदगी का सब से संगीन केस था. मैं बड़ी उलझन में था. अदालत में मैं सरकारी वकील की हैसियत से खड़ा था. मुझे इन मांबेटी पर संगीन जुर्म साबित करना था. उन के खिलाफ बोलना था, पर मेरा जमीर इस बात पर राजी नहीं था. मेरा दिल कहता था कि मैं यह मुकदमा हार जाऊं.

मुझे नहीं मालूम मैं ये मुकदमा ठीक से लड़ पाऊंगा या नहीं. मेरी जबान जैसे गूंगी हो गई थी. मैं अपनी बात कह नहीं पा रहा था. जुबान लड़खड़ा रही थी. और सचमुच मैं यह मुकदमा हार गया. मांबेटी सजा से बच गईं. मैं सही था या नहीं, कह नहीं सकता. आप खुद फैसला कीजिए.

(प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन)

Mother’s Day Special- बहू-बेटी: भाग 1

लेखक-अश्विनी कुमार भटनागर

घर क्या था, अच्छाखासा कुरुक्षेत्र का मैदान बना हुआ था. सुबह की ट्र्र्रेन से बेटी और दामाद आए थे. सारा सामान बिखरा हुआ था. दयावती ने महरी से कितना कहा था कि मेहमान आ रहे हैं, जरा जल्दी आ कर घर साफ कर जाए. 10 बज रहे थे, पर महरी का कुछ पता नहीं था. झाडू बुहारु तो दूर, अभी तो रात भर के बरतन भी पड़े थे. 2-2 बार चाय बन चुकी थी, नाश्ता कब निबटेगा, कुछ पता नहीं था.

रमेश तो एक प्याला चाय पी कर ही दफ्तर चला गया था. उस की पत्नी जया अपनी 3 महीने की बच्ची को गोद में लिए बैठी थी. उस को रात भर तंग किया था उस बच्ची ने, और वह अभी भी सोने का नाम नहीं ले रही थी, जहां गोद से अलग किया नहीं कि रोने लगती थी.

इधर कमलनाथ हैं कि अवकाश प्राप्त करने के बाद से बरताव ऐसा हो गया है जैसे कहीं के लाटसाहब हो गए हों. सब काम समय पर और एकदम ठीक होना चाहिए. कहीं कोई कमी नहीं रहनी चाहिए. उन के घर के काम में मदद करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था.

गंदे बरतनों को देख कर दयावती खीज ही रही थी कि रश्मि बेटी ने आ कर मां को बांहों में प्यार से कस ही नहीं लिया बल्कि अपने पुराने स्कूली अंदाज से उस के गालों पर कई चुंबन भी जड़ दिए.

दयावती ने मुसकरा कर कहा, ‘‘चल हट, रही न वही बच्ची की बच्ची.’’

‘‘क्या हो रहा है, मां? पहले यह बताओ?’’

मां ने रश्मि को सारा दुखड़ा रो दिया.

‘‘तो इस में क्या बात है? तुम अपने दामाद का दिल बहलाओ. मैं थोड़ी देर में सब ठीक किए देती हूं.’’

‘‘पगली कहीं की,’’ मां ने प्यार से झिड़क कर कहा, ‘‘2 दिन के लिए तो आई है. क्या तुझ से घर का काम करवाऊंगी?’’

‘‘क्यों, क्या अब तुम्हारी बेटी नहीं रही मैं? डांटडांट कर क्या मुझ से घर का काम नहीं करवाया तुम ने? यह घर क्या अब पराया हो गया है मेरे लिए?’’ बेटी ने उलाहना दिया.

‘‘तब बात और थी, अब तुझे ब्याह जो दिया है. अपने घर में तो सबकुछ करती ही है. यहां तो तू बैठ और दो घड़ी हंसबोल कर मां का दिल बहला.’’

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं सुनूंगी. तुम अब यहां से जाओ. या तो इन के पास जा कर बैठो या छुटकी को संभाल लो और भाभी को यहां भेज दो. हम दोनों मिल कर काम निबटा देंगे.’’

‘‘अरे, बहू को क्या भेजूं, उसे तो छुटकी से ही फुरसत नहीं है. यह बच्ची भी ऐसी है कि दूसरे के पास जाते ही रोने लगती है. रोता बच्चा किसे अच्छा लगता है?’’

ये भी पढ़ें- ममता के रंग

रश्मि को मां की बात में कुछ गहराई का एहसास हुआ. कहीं कुछ गड़बड़ लगती है, पर उस ने कुरेदना ठीक नहीं समझा. वह भी किसी की बहू है और उसे भी अपनी सास से निबटना पड़ता है. तालमेल बिठाने में कहीं न कहीं किसी को दबना ही पड़ता है. बिना समझौते के कहीं काम चलता है?

बातें करतेकरते रश्मि ने एक प्याला चाय बना ली थी. मां के हाथों में चाय का प्याला देते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम जाओ, मां, उन्हें चाय दे आओ. उन को तो दिन भर चाय मिलती रहे, फिर कुछ नहीं चाहिए.’’

मां ने झिझकते हुए कहा, ‘‘अब तू ही दे आ न.’’

‘‘ओहो, कहा न, मां, तुम जाओ और दो घड़ी उन के पास बैठ कर बातें करो. आखिर उन को भी पता लगना चाहिए कि उन की सास यानी कि मेरी मां कितनी अच्छी हैं.’’

रश्मि ने मां को जबरदस्ती रसोई से बाहर निकाल दिया और साड़ी को कमर से कस कर काम में लग गई. फुरती से काम करने की आदत उस की शुरू से ही थी. देखतेदेखते उस ने सारी रसोई साफ कर दी.

फिर भाभी के पास जा कर बच्ची को गोद में ले लिया और हंसते हुए बोली, ‘‘यह तो है ही इतनी प्यारी कि बस, गोद में ले कर इस का मुंह निहारते रहो.’’

भाभी को लगा जैसे ननद ताना दे रही हो, पर उस ने तीखा उत्तर न देना ही ठीक समझा. हंस कर बोली, ‘‘लगता है सब के सिर चढ़ जाएगी.’’

‘‘भाभी, इसे तो मैं ले जाऊंगी.’’

‘‘हांहां, ले जाना. रोतेरोते सब के दिमाग ठिकाने लगा देगी.’’

‘‘बेचारी को बदनाम कर रखा है सब ने. कहां रो रही है मेरे पास?’’

‘‘यह तो नाटक है. लो, लगी न रोने?’’

‘‘लो, बाबा लो,’’ रश्मि ने हंस कर कहा, ‘‘संभालो अपनी बिटिया को. अच्छा, अब यह बताओ नाश्ता क्या बनेगा? मैं जल्दी से तैयार कर देती हूं.’’

भाभी ने जबरन हंसते हुए कहा, ‘‘क्यों, तुम क्यों बनाओगी? क्या दामादजी को किसी दूसरे के हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता?’’

ये भी पढ़ें- Mother’s Day Special: आंचल भर दूध

हंस कर रश्मि ने कहा, ‘‘यह बात नहीं, मुझे तो खुद ही खाना बनाना अच्छा लगता है. वैसे वह बोल रहे थे कि भाभी के हाथ से बने कबाब जरूर खाऊंगा.’’

‘‘बना दूंगी. अच्छा, तुम इसे जरा गोदी में ले कर बैठ जाओ, सो गई है. मैं झटपट नाश्ता बना देती हूं.’’

‘‘ओहो, लिटा दो न बिस्तर पर.’’

‘‘यही तो मुश्किल है. बस गोदी में ही सोती रहती है.’’

‘‘अच्छा ठहरो, मां को बुलाती हूं. वह ले कर बैठी रहेंगी. हम दोनों घर का काम कर लेंगे.’’

‘‘नहींनहीं, मांजी को तंग मत करो.’’

Mother’s Day Special: मां हूं न- भाग 2

आरती टुकुरटुकुर ससुर का मुंह ताक रही थी. आखिर सुबोध के बिना वह कैसे जिएगी. अभी तक वह उस से लिपटी बेल की तरह जी रही थी. अब वह आधार के बिना जमीन पर बिखर गई थी. अब कौन सहारा देगा. बिना किसी वजह के पति उसे बेसहारा छोड़ कर चला गया था.

पता नहीं कौन उन के बीच आ गई थी. वह कैसी औरत थी, जो उस के पति को अपने मोहपाश में बांध कर चली गई थी. छोटी सी बिटिया, पिता जैसे ससुर, फैला कारोबार, जीवन अब एक तपती दोपहर की तरह हो गया था. नंगे पैर चलना होगा, न आराम न छाया.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

ससुर विश्वंभर प्रसाद ने सहजता से घरसंसार का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था. उस के जीवनरथ का जो पहिया टूटा था, उस की जगह वह खुद पहिया बन गए थे, जिस से आरती के जीवन का रथ फिर से चलने ही नहीं लगा था, बल्कि दौड़ पड़ा था.

विश्वंभर प्रसाद सुबह जल्दी उठ कर नजदीक के क्रिकेट क्लब के मैदान में चले जाते, नियमित टेनिस खेलते. छोटीमोटी बीमारी को तो वह कुछ समझते ही नहीं थे. उन्होंने समय के घूमते चक्र को जैसे मजबूत हाथों से थाम लिया था. वह जवानी के जोश में आ गए थे. सुबोध था तो वह रिटायर हो कर सेवानिवृत्ति का जीवन जी रहे थे. औफिस जाते भी थे तो थोड़े समय के लिए. लेकिन अब पूरा कारोबार वही संभालने लगे थे.

उन की भागदौड़ को देखते हुए एक दिन आरती ने कहा, ‘‘पापा, आप इतनी मेहनत करते हैं, यह मुझे अच्छा नहीं लगता. हम 3 लोग ही तो हैं. इतना बड़ा घर और कारोबार बेच कर छोटा सा घर ले लेते हैं. बाकी रकम ब्याज पर उठा देते हैं. आप इस उम्र में…’’

‘‘इस उम्र में क्या आरती… देखो ब्याज खाना मुझे पसंद नहीं है. आराधना बड़ी हो रही है. हमें उस का जीवन उल्लास से भर देना है. वह बूढ़े दादा और अकेली मां की छाया में दिन काटे, यह मुझे अच्छा नहीं लगेगा.’’

ये भी पढ़ें- लैटर बौक्स: प्यार और यौवन का खत

विश्वंभर ने बाल रंगवा लिए, पहनने के लिए लेटेस्ट कपड़े ले लिए. वह फिल्म्स, पिकनिक सभी जगह आराधना के साथ जाते, जिस से उसे बाप की कमी न खले.

सब कुछ ठीकठाक चलने लगा था कि अचानक एक दिन आरती के मांबाप आ पहुंचे. वे आरती और आराधना को ले जाने आए थे. उन का कहना था कि विधुर ससुर के साथ बिना पति के बहू के रहने पर लोग तरहतरह की बातें करते हैं.

लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि ससुर और बहू का पहले से ही संबंध था, इसीलिए सुबोध घर छोड़ कर चला गया. दोनों ही परिवारों की बदनामी हो रही है, इसलिए आरती को उन के साथ जाना ही होगा. उन के खर्च के लिए रुपए उस के ससुर भेजते रहेंगे.

मांबाप की बातें सुन कर आरती स्तब्ध रह गई. उस पर जैसे आसमान टूट पड़ा हो. फिर ऐसा कुछ घटा, जिस के आघात से वह मूढ़ बन गई. आरती के मांबाप की बातें सुन कर विश्वंभर प्रसाद ने तुरंत कहा था, ‘‘मैं इस बारे में कुछ भी नहीं कह सकता, जो भी निर्णय करना है, आरती को करना है. अगर वह जाना चाहती है तो खुशी से अरू को ले कर जा सकती है.’’

बस, इतना कह कर अपराधी की तरह उन्होंने सिर झुका लिया था. आराधना उस समय उन्हीं की गोद में थी. नानानानी ने उसे लेने की बहुत कोशिश की थी. पर वह उन के पास नहीं गई थी. उस ने दोनों हाथों से कस कर दादाजी की गरदन पकड़ ली थी.

आराधना के पास न आने से आरती की मां ने नाराज हो कर कहा था, ‘‘आंख खोल कर देख आरती, तेरा यह ससुर कितना चालाक है. आराधना को इस ने इस तरह वश में कर रखा है कि हमारे लाख जतन करने पर भी वह हमारे पास नहीं आ रही है. देखो न ऐसा व्यवहार कर रही है, जैसे हम इस के कुछ हैं ही नहीं.’’

इतना कह कर आरती की मां उठीं और विश्वंभर प्रसाद की गोद में बैठी आराधना को खींचने लगीं. आराधना चीखी. बेटे के घर छोड़ कर जाने पर भी न रोने वाले विश्वंभर प्रसाद की आंखें छलक आईं. ससुर की हालत देख कर आरती झटके से उठी और अपनी मां के दोनों हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मम्मी, मैं और आराधना यहीं पापा के पास ही रहेंगे.’’

ये भी पढ़ें- करकट: ताप्ती घर के चमकते हुए लोहे के सफेद करकट को देखकर क्यों रोने लगी?

‘‘कुछ पता है, तू ये क्या कह रही है. तू जो पाप कर रही है, ऊपर वाला तुझे कभी माफ नहीं करेगा और इस विश्वंभर के तो रोएंरोएं में कीड़े पड़ेंगे.’’

‘‘तुम भले मेरी मां हो, पर मैं अपने पिता जैसे ससुर का अपमान नहीं सह सकती, इसलिए अब आप लोग यहां से जाइए, यही हम सब के लिए अच्छा होगा.’’

‘‘अपने ही मांबाप का अपमान…’’ आरती के पिता गुस्से में बोले, ‘‘तुझे इस नरक में सड़ना है तो सड़, पर आराधना पर मैं कुसंस्कार नहीं पड़ने दूंगा. इसलिए इसे मैं अपने साथ ले जाऊंगा.’’

आराधना जोरजोर से रो रही थी. आरती के मांबाप उसे और विश्वंभर प्रसाद को कोस रहे थे. आरती दोनों कानों को हथेलियों से दबाए आंखें बंद किए बैठी थी. अंत में वे गुस्से में पैर पटकते हुए यह कह कर चले गए कि आज से उन का उस से कोई नातारिश्ता नहीं रहा.

मांबाप के जाने के बाद आरती उठी. ससुर के आंसू भरे चेहरे को देखते हुए उन के सिर पर हाथ रखा और आराधना को गले लगाया. इस के बाद अंदर जा कर बालकनी में खड़ी हो गई. उतरती दोपहर की तेज किरणें धरती पर अपना कमाल दिखा रही थीं. गरमी से त्रस्त लोग सड़क पर तेजी से चल रहे थे.

विश्वंभर प्रसाद ने जो वचन दिया था, उसे निभाया. उजड़ चुके घर को फिर से संभाल कर सजाया. आराधना को फूल की तरह खिलने दिया. पौधे को खाद, पानी और हवा मिलती रहे, उस का सही पालनपोषण होता है. आराधना बड़ी होती गई. समझदार हो गई तो एक दिन विश्वंभर प्रसाद ने उसे सामने बैठा कर कहा, ‘‘बेटा, मैं तुम्हारा दादा हूं, पर उस के पहले मित्र हूं. इसलिए मैं तुम से कुछ भी नहीं छिपाऊंगा. हम सभी के जीवन में क्याक्या घटा है, यह जानने का तुम्हें पूरा हक है.’’

आराधना दादाजी के सीने से लग कर बोली, ‘‘दादाजी, यू आर ग्रेट. आप न होते तो हमारा न जाने क्या होता.’’

Crime Story: 3 करोड़ के सोने की लूट- भाग 1

सौजन्य: मनोहर कहानियां

इसी साल 15 मार्च की बात है. दोपहर के तकरीबन डेढ़ बजे का समय था. राजस्थान के हनुमानगढ़ शहर में टाउन बस स्टैंड पर स्थित मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा में लंच का समय था. कर्मचारी गपशप कर रहे थे.

वैसे तो इस औफिस में 5 कर्मचारी हैं, लेकिन उस समय असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह शेखावत सहित केवल 3 कर्मचारी ही औफिस में थे. एक महिला कर्मचारी किसी काम से रेलवे जंक्शन गई थी और एक महिला कर्मचारी औफिस आने के बाद तबीयत खराब होने की बात कह कर घर चली गई थी.

मणप्पुरम कंपनी सोने के जेवरों पर लोन देने का काम करती है. सालों पुरानी इस कंपनी के पूरे देश में लगभग हर जिला मुख्यालय पर कईकई ब्रांच औफिस हैं. कंपनी के लगभग सभी औफिसों में सोने के जेवर और नकदी रहती है, लेकिन सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं होते. यही कारण है कि हर साल देश भर में इस कंपनी के 5-7 औफिसों में लूट की वारदात होती है.

इन में कुछ वारदातों में अपराधी पकड़े जाते हैं और कुछ में नहीं. पकड़े गए अपराधियों से भी माल की आधीअधूरी बरामदगी ही होती है. बिहार के 2-3 कुख्यात गिरोह तो केवल गोल्ड लोन वाली कंपनियों में ही लूट की वारदात करते हैं.

कंपनी की हनुमानगढ़ शाखा में भी सुरक्षा के कोई खास इंतजाम नहीं थे. सुरक्षा के नाम पर कर्मचारी औफिस समय में चैनल गेट बंद रखते थे. कोई ग्राहक आता, तो गेट खोल देते और उस के जाने के बाद बंद कर देते थे.

उस दिन भी कर्मचारियों ने औफिस का चैनल गेट बंद कर ताला लगा रखा था. दोपहर करीब पौने 2 बजे 2 युवक बैंक के चैनल गेट पर पहुंचे. उन्होंने गेट खुलवाने के लिए बाहर लगी घंटी बजाई. युवकों ने अपने चेहरे ढके हुए थे. एक युवक के पास पिट्ठू बैग था.

घंटी की आवाज सुन कर औफिस के अंदर से एक कर्मचारी मोबाइल पर बातें करते हुए आया. उस ने 2 युवकों को बाहर खड़ा देखा, तो ग्राहक समझ कर उन से बिना कुछ पूछताछ किए चैनल गेट का ताला खोल दिया.

चैनल गेट खुलते ही दोनों युवक औफिस के अंदर घुस गए. अंदर आते ही दोनों ने अपने कपड़ों में छिपा कर लाई पिस्तौल निकाल ली. औफिस में मौजूद तीनों कर्मचारियों पर पिस्तौल तान कर बदमाशों ने जान से मारने की धमकी दी और सोने के बारे में पूछा.

ये भी पढ़ें- Crime Story: पाताल लोक का हथौड़ेबाज- भाग 1

पिस्तौल देख कर कर्मचारी घबरा गए. उन्होंने सोने के जेवर लौकर में रखे होने की बात कही, तो बदमाशों ने गोली चलाने की धमकी दी. इस पर असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने लौकर खोल कर नीचे की दराज में रखे सोने के जेवरों के पैकेट लुटेरों के हवाले कर दिए.

लुटेरों ने लौकर में रखी नकदी भी निकाल ली. एक बदमाश ने जेवर और नकदी अपने कंधे पर लटके बैग में भर लिए. इस के बाद दोनों बदमाश कर्मचारियों को धमकी देते हुए चैनल गेट खोल कर तेजी से निकल गए.

बदमाशों को इस वारदात को अंजाम देने में मुश्किल से 4 मिनट लगे थे. लुटेरों के डर से औफिस के कर्मचारी कुछ देर सहमे से अंदर ही खड़े रहे. बाद में वे औफिस से बाहर निकले और आसपास के लोगों को बताया. बाद में पुलिस को सूचना दी.

सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद हनुमानगढ़ एसपी प्रीति जैन, डीएसपी प्रशांत कौशिक, टाउन सीआई लक्ष्मण सिंह राठौड़ और जंक्शन सीआई नरेश गेरा आदि मौके पर पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौकामुआयना कर कंपनी की शाखा के कर्मचारियों और आसपास के लोगों से पूछताछ की.

पूछताछ में पता चला कि औफिस में सायरन लगा होने के बावजूद कर्मचारियों ने वारदात के दौरान या तुरंत बाद उसे नहीं बजाया. अलार्म नहीं बजाने पर एसपी ने कर्मचारियों को फटकार लगाई और 3 बार अलार्म बजा कर उस की जांच भी की.

शाखा के कर्मचारियों ने बताया कि बदमाश सोने के जेवर और कैश ले गए. कितना सोना ले गए, यह रिकौर्ड देखने के बाद बता सकेंगे. उन्होंने नकदी करीब एक लाख रुपए बताई.

आसपास के लोगों से पुलिस को पता चला कि कंपनी की गोल्ड लोन शाखा के सामने टाउन जंक्शन रोड पर एक ट्रक की ओट में एक बाइक सवार खड़ा था. वारदात के बाद दोनों नकाबपोश युवक उस बाइक सवार के साथ फरार हो गए.

पुलिस अधिकारियों ने शहर के सभी मार्गों पर नाकेबंदी करा दी. लुटेरों का पता लगाने के लिए गोल्ड लोन शाखा के बाहर और आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. औफिस के चैनल गेट के पास लगे कैमरे में दोनों बदमाश नजर आ गए, लेकिन उन के चेहरे ढके होने से पहचान नहीं हो सकी. ये बदमाश दोपहर 1.47 बजे औफिस में घुसे और 1.51 बजे बाहर निकल गए थे.

गोल्ड लोन शाखा में लूट की वारदात होने की सूचना पूरे शहर में फैल गई. इस से वे लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुंच गए, जिन्होंने अपने जेवर गिरवी रख कर कंपनी से लोन ले रखा था. पुलिस अधिकारियों ने इन लोगों को यह कह कर वापस भेजा कि अभी जांच चल रही है. लूटे गए जेवरों का रिकौर्ड मिलने पर ही कुछ पता चल सकेगा.

ये भी पढ़ें- Crime Story: पराई मोहब्बत के लिए दी जान

वारदात के तुरंत बाद हालांकि यह पता नहीं चला कि कितना सोना और कितना कैश लूटा गया है. फिर भी एसपी प्रीति जैन ने वारदात को गंभीरता से लेते हुए अधिकारियों की टीम बना कर लुटेरों का पता लगाने के निर्देश दिए.

दूसरे दिन 16 मार्च को पुलिस अधिकारी जांचपड़ताल में जुटे रहे. सीसीटीवी फुटेज के आधार पर लुटेरों की खोजबीन चलती रही. अधिकारियों ने एक बार फिर गोल्ड लोन शाखा के औफिस पहुंच कर कर्मचारियों से पूछताछ की ताकि लुटेरों के बारे में कोई सुराग मिल सके, लेकिन ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से लुटेरों का पता लगाया जाता. कंपनी के कर्मचारियों ने वारदात के करीब 32 घंटे बाद 16 मार्च की रात लगभग साढ़े 9 बजे हनुमानगढ़ टाउन पुलिस थाने पहुंच कर केस दर्ज कराया.

मणप्पुरम गोल्ड लोन हनुमानगढ़ टाउन की ब्रांच मैनेजर भावना मेघवाल ने पुलिस में दर्ज कराई रिपोर्ट में बताया कि लुटेरे सोने के जेवरों के 290 पैकेट और एक लाख 7 हजार 951 रुपए नकद ले गए.

लूटे गए सोने के जेवरों का अनुमानित वजन 6 किलो से ज्यादा बताया गया. इन जेवरों में सोने की अंगूठी, कान की बाली, झुमके, कंगन, टौप्स आदि थे.

अगले भाग में पढ़ें- पुलिस ने जेवरों की लूट का खुलासा किया

Crime Story: 3 करोड़ के सोने की लूट- भाग 2

सौजन्य: मनोहर कहानियां

हालांकि पुलिस ने शाखा मैनेजर की ओर से दी गई रिपोर्ट दर्ज कर ली, लेकिन पुलिस अधिकारियों के मन में कई सवाल भी गहरा गए थे.

लूटे गए 6 किलो सोने की कीमत मौजूदा समय में करीब 3 करोड़ रुपए थी. कंपनी के अधिकारियों की ओर से करीब 30 घंटे तक रिकौर्ड का मिलान करने के बाद इतना सोना लूटे जाने की बात पुलिस अधिकारियों के गले नहीं उतरी.

पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज कराने आई कंपनी की ब्रांच मैनेजर रायसिंहनगर निवासी भावना मेघवाल और दूसरे स्टाफ से थाने में काफी देर तक पूछताछ की. इस में पता चला कि वारदात के समय लौकर में सोने के जेवरों के करीब 1300 पैकेट थे. असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने इन में से नीचे की दराज में रखे 290 पैकेट ही निकाल कर लुटेरों को दिए थे. जेवरों के बाकी लगभग एक हजार पैकेट जो ऊपर की दराज में थे, बच गए थे.

सुरक्षित बच गए जेवरों के पैकेटों में जीपीएस ट्रैकर भी लगा हुआ था जबकि लुटेरों के हाथ लगे जेवरों के पैकेटों में जीपीएस ट्रैकर नहीं था. इसलिए पुलिस अधिकारियों के दिमाग में संदेह पैदा हुआ कि आखिर लुटेरों को नीचे की दराज से ही जेवरों के पैकेट क्यों निकाल कर दिए गए.

लुटेरों को बिना जीपीएस ट्रैकर वाले सोने के जेवरों के पैकेट निकाल कर देने के बारे में पुलिस ने असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने सवाल किए, तो उस ने बताया कि ऐसा घबराहट और हड़बड़ाहट में हुआ. पुलिस की पूछताछ में एक बार वह उखड़ भी गया और कहा कि उसे 6 हजार रुपए तनख्वाह मिलती है. इतनी सी तनख्वाह के लिए क्या मैं अपनी जान दांव पर लगा देता? तीसरे दिन 17 मार्च को एडिशनल एसपी जस्साराम बोस और डीएसपी प्रशांत कौशिक ने एक बार फिर गोल्ड लोन शाखा का बारीकी से मुआयना किया और कर्मचारियों से पूछताछ की.

इस के अलावा पुलिस की टीमें सीसीटीवी में नजर आए बदमाशों का सुराग लगाने और संदिग्ध बदमाशों से पूछताछ में जुटी रही. साइबर एक्सपर्ट की टीम लुटेरों के भागने की दिशा में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देख कर रूट चार्ट बनाने में लगी रहीं. 6 किलो सोने के जेवरों की लूट के मामले में पुलिस हर एंगल से बारीकी से जांचपड़ताल करती रही. कुछ ऐसी बातें थी, जिन से पुलिस अधिकारियों का शक गोल्ड लोन शाखा के कर्मचारियों पर हो रहा था.

इस में वारदात के करीब 32 घंटे बाद रिपोर्ट दर्ज कराना, मुंह पर कपड़ा बांध कर आए दोनों युवकों को बिना कोई पूछताछ किए चैनल गेट खोल कर औफिस के अंदर प्रवेश दे देना, असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह की ओर से लुटेरों को बिना जीपीएस ट्रैकर वाले सोने के जैवरों के पैकेट देना, संदेह को बढ़ावा दे रहे थे.

ये भी पढ़ें- Crime- अंधविश्वास: इनसान नहीं, हैवान हैं ये

वारदात के दौरान या तुरंत बाद कर्मचारियों की ओर से अलार्म नहीं बजाना आदि भी ऐसे बिंदु थे, जो कंपनी के कर्मचारियों को शक के दायरे में खड़ा कर रहे थे. इसलिए पुलिस की एक टीम गोल्ड लोन शाखा के कर्मचारियों की कुंडली खंगालने में जुट गई.

पुलिस ने 20 मार्च को 3 लोगों को गिरफ्तार कर सोने के जेवरों की लूट का खुलासा कर दिया. लूट का मास्टरमाइंड मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा का असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह शेखावत निकला.

पुलिस ने संजय सिंह सहित मदन सोनी और पवन जाट को गिरफ्तार कर लिया. इन में संजय सिंह सीकर जिले की श्रीमाधोपुर तहसील के जालपाली गांव का रहने वाला था. मदन सोनी हनुमानगढ़ टाउन में नाथावाली थेढ़ी वार्ड नंबर 8 और संजय जाट रावतसर के निरवाल का निवासी था. इन लोगों से पूछताछ में जो कहानी उभकर सामने आई, वह इस प्रकार है—

असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने कंपनी की इस शाखा में काफी घोटाला कर रखा था. उस ने फरजी आईडी से कंपनी की इस शाखा में खाते खोल कर सोने के जेवर गिरवी रखे बगैर ही दूसरे कई नामों से लोन उठा रखा था. यह घोटाला वह काफी दिनों से कर रहा था, लेकिन कंपनी को पता नहीं चल सका था. पिछले दिनों कंपनी ने संजय सिंह का तबादला गुजरात कर दिया था. तबादला होने के बावजूद संजय रिलीव नहीं हो रहा था. उसे डर था कि हनुमानगढ़ शाखा से रिलीव होने पर कंपनी का हिसाबकिताब देते समय उस का घोटाला सामने आ जाएगा. इस घोटाले को दबाने के लिए संजय ने मदन सोनी के साथ मिल कर अपनी ही शाखा में लूट की योजना बनाई. हनुमानगढ़ टाउन का रहने वाला मदन सोनी सोने का मूल्यांकन करता था.

संजय ने लूट के लिए बदमाशों का इंतजाम करने की जिम्मेदारी मदन सोनी को सौंप दी. मदन सोनी ने इस काम के लिए अपने परिचित डिप्टी उर्फ अनमोल मेघवाल से संपर्क किया.

डिप्टी उर्फ अनमोल हरियाणा के सिरसा जिले के बेहरवाला खुर्द ऐलनाबाद का रहने वाला था. मदन सोनी ने अनमोल को अपनी योजना बताई. इस पर अनमोल ने लूटे जाने वाले सोने में बराबर का हिस्सा लेने की बात कही. मदन ने इस पर हामी भर ली.

लूटे जाने वाले सोने के बंटवारे की बात तय हो जाने पर अनमोल ने इस काम के लिए अपने परिचित बदमाश तलवाड़ा के बेहरवाला कलां निवासी सोनू, रावतसर के निरवाल गांव निवासी पवन जाट और अपने ही गांव बेहरा वालां खुर्द के रहने वाले भीम को तैयार किया.

इन में सोनू के सोपू गैंग और पवन के बीकानेर की 007 गैंग से तार जुड़े हुए थे. ये दोनों इन अपराधी गिरोह के सक्रिय बदमाश थे. सोनू के खिलाफ हत्या का प्रयास के अलावा आर्म्स ऐक्ट के मुकदमे दर्ज थे.

ये भी पढ़ें- Crime Story: दुश्मनी भी शिद्दत से निभाई

इन लोगों ने वारदात के लिए हनुमानगढ़ के संडे मार्केट से मोटरसाइकिल खरीदी. ऐलनाबाद और तलवाड़ा से हथियार जुटाए गए. अनमोल, पवन, सोनू और भीम 12 मार्च को हनुमानगढ़ आ गए. संजय सिंह और मदन सोनी ने इन बदमाशों के ठहरने के लिए पहले ही 2 अलगअलग होटलों का इंतजाम कर रखा था.

हनुमानगढ़ पहुंचने पर संजय सिंह और मदन सोनी ने लूट की अपनी पूरी योजना बता कर उन्हें सारी बातें समझा दीं. चारों बदमाशों ने मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा की 2 दिन तक बाहर से रैकी कर वारदात करने और भागने के रास्ते देख लिए.

अगले भाग में पढ़ें-  फुटेज के आधार पर पुलिस ने बदमाशों से पूछताछ की

Crime Story: 3 करोड़ के सोने की लूट- भाग 3

सौजन्य: मनोहर कहानियां

बाद में सभी ने मिल कर लूट की योजना को अंतिम रूप दिया. यह तय किया गया कि वारदात 15 मार्च को दोपहर एक से 2 बजे के बीच लंच टाइम में की जाएगी. लंच का समय इसलिए चुना गया क्योंकि इस दौरान आमतौर पर कोई ग्राहक नहीं होता.

योजना के अनुसार, पवन और सोनू शाखा में घुसे. सोनू ने 315 बोर की पिस्तौल और पवन ने एयरगन दिखा कर कर्मचारियों को डराया और गोली चलाने की धमकी दी. इस दौरान असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने बदमाशों के धमकाने पर लौकर में से सोने के जेवरों के पैकेट निकाल कर उन्हें दे दिए.

पवन और सोनू 4 मिनट में ही वारदात को अमलीजामा पहना कर बाहर निकल आए.

गोल्ड लोन शाखा के बाहर एक ट्रक की आड़ में भीम पहले से ही मोटरसाइकिल पर तैयार खड़ा था. भीम ही इन दोनों को होटल से मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा तक लाया था. वारदात के दौरान वह बाहर खड़ा था. इस दौरान वह पवन जाट से मोबाइल पर सीधे संपर्क में था. पवन ने हैडफोन लगा अपना मोबाइल चालू रख रखा था ताकि कोई खतरा होने पर बाहर खड़ा भीम उन को सचेत कर सके.

वारदात के बाद भीम के साथ मोटरसाइकिल पर बैठ कर पवन और सोनू भाग लिए. हनुमानगढ़ से ये तीनों मसीतांवाली हैड होते हुए हरियाणा चले गए. बाद में मदन सोनी और डिप्टी उर्फ अनमोल ने इन तीनों से मिल कर लूटे गए जेवर और नकदी का बंटवारा कर लिया.

संजय सिंह को लौकर में रखे सारे जेवरों के बारे में पता था. उसे पता था कि लौकर में ऊपर की दराज में जेवरों के पैकेट जीपीएस ट्रैकर सिस्टम के साथ रखे हुए हैं और नीचे की दराज में रखे जेवरों के पैकट में जीपीएस ट्रैकर नहीं है. इसलिए उस ने चालाकी से बिना जीपीएस ट्रैकर वाले जेवरों के पैकेट नीचे की दराज से निकाल कर लुटेरों के हवाले कर दिए.

दरअसल, कंपनी ने लूट व चोरी की वारदातों को देखते हुए सुरक्षा के तौर पर लौकर में जेवरों के साथ जीपीएस ट्रैकर रखे हुए हैं. ये जीपीएस ट्रैकर ऊपर वाली दराज में जेवरों के पैकेट के बीच में ही रखे गए थे ताकि कोई वारदात होने पर जीपीएस ट्रैकर के जरिए अपराधी तक पहुंचा जा सके.

संजय सिंह की इसी कारस्तानी ने पुलिस अधिकारियों के दिमाग में संदेह पैदा किया और वह लुटेरों तक पहुंच गई.

वारदात के बाद पुलिस ने मणप्पुरम गोल्ड लोन शाखा के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज में नजर आए लुटेरों की तलाश में हनुमानगढ़ टाउन और जंक्शन के तमाम होटल, धर्मशालाओं के अलावा बसअड्डे और रेलवे स्टेशन पर जांचपड़ताल की. इन जगहों पर लगे कैमरों की फुटेज देखी.

इस जांचपड़ताल में हनुमानगढ़ जंक्शन स्थित कमल होटल और अमर होटल में वारदात से 3-4 दिन पहले रुके लोगों के फुटेज और वारदातस्थल की फुटेज में दिखे संदिग्ध लुटेरों से मिलान कर गए. इन संदिग्धों ने 15 मार्च को ही होटल से चैकआउट कर दिया था.

इन फुटेज के आधार पर पुलिस ने बदमाशों से पूछताछ कर सब से पहले पवन जाट को पकड़ा. पूछताछ में उस ने मदन सोनी और संजय सिंह का नाम लिया. संजय सिंह पहले से ही पुलिस के शक के दायरे में था. पुलिस ने इन दोनों को भी पकड़ कर पूछताछ की, तो लूट की सारी कहानी सामने आ गई. पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर लिया.

इन तीनों से पूछताछ के आधार पर दूसरे दिन 21 मार्च को पुलिस ने सोनू और डिप्टी उर्फ अनमोल मेघवाल को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस की जांच में सामने आया कि असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह ने कंपनी की हनुमानगढ़ शाखा में 841 ग्राम सोने के लोन का घोटाला किया था. उस ने गोल्ड वैल्यूअर मदन सोनी, उस के भाई और दूसरे परिचितों के नाम से गोल्ड लोन के नाम से फरजी खाते खोल कर रुपए उठा लिए थे.

संजय ने फरजीवाड़ा कर कंपनी के कागजातों में इन लोगों से सोना जमा करना दिखाया था, जबकि सोना कंपनी में जमा नहीं हुआ था. कंपनी की औडिट होने पर वह सोने के जेवरों के पैकेट औनलाइन रिलीज कर अकाउंट होल्ड कर देता था.

औडिट टीम के जाने के बाद वह लोन के जेवर जमा बता कर पैसा रिलीज करना दिखा देता था. इस तरह कंपनी की औडिट में भी उस का फरजीवाड़ा पकड़ में नहीं आया था. तबादले के बाद रिलीव होने पर चार्ज देने के समय उस का घोटाला सामने आ सकता था, इसीलिए उस ने कंपनी में लूट की वारदात करवा कर नमकहरामी की.

बाद में पुलिस ने 21 साल के भीम उर्फ भीमसेन मेघवाल और 29 साल के सुभाष जाट को भी इस मामले में गिरफ्तार कर लिया. ये दोनों हरियाणा के बेहरवाला खुर्द ऐलनाबाद के रहने वाले थे. पुलिस ने आरोपियों की निशानदेही पर 4 किलो 862 ग्राम सोने के आभूषण बरामद कर लिए.

इन में सोने की चूडि़यां, अंगूठी, बाजूबंद, हार, मंगलसूत्र व टौप्स आदि शामिल थे. बदमाशों ने सोने के इन जेवरों से करीब 350 ग्राम वजन के डोरे, चीड व स्टोन आदि ब्लेड से काट कर जला दिए थे.

कंपनी की मैनेजर ने लूटे गए जेवरों का कुल वजन 6 किलो 136.87 ग्राम बताया था. इस में से असिस्टैंट मैनेजर संजय सिंह की ओर से फरजीवाड़ा किया गया 841 ग्राम सोना केवल कागजों में ही था.

ये भी पढ़ें- पूर्व उपमुख्यमंत्री के यहां, वंशजों के खून की होली!

यानी लूटे गए सोने के जेवरों का असल वजन 5 किलो 295.87 ग्राम था. इस में 4 किलो 862 ग्राम जेवर बरामद हो गए और 350 ग्राम वजनी नग वगैरह जला दिए गए. इस तरह लूटे गए लगभग 99 फीसदी जेवर बरामद हो गए.

बदमाशों से पुलिस ने एक लाख 390 रुपए नकद, वारदात में इस्तेमाल एक देसी कट्टा, एक एयरगन, 6 कारतूस और मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. गिरफ्तार बदमाश भीम उर्फ भीमसेन वारदात के दौरान बाहर मोटरसाइकिल ले कर खड़ा था.

वारदात के बाद पवन और सोनू उसी के साथ बाइक पर भाग गए थे. बदमाशों ने लूटे गए सोने के जेवर और नकदी हरियाणा के बेहरवाला खुर्द गांव में सुभाष जाट के खेत में बने कमरे में 2 फुट गहरा गड्ढा खोद कर दबा दी थी. सुभाष जाट को लूट का माल अपने खेत में छिपाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.   द्य

मां- भाग 2: आखिर मां तो मां ही होती है

‘‘इस में रह लोगे…पढ़ाई हो जाएगी?’’ मीना ने आश्चर्य से पूछा था.

‘‘हां, क्यों नहीं, लाइट तो होगी न…’’

वह लड़का अब अंदर आ गया था. गैराज देख कर वह उत्साहित था. कहने लगा, ‘‘यह मेज और कुरसी तो मेरे काम आ जाएगी और ये तख्त भी….’’

मीना समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे. लड़के ने जेब से कुछ नोट निकाले और कहने लगा, ‘‘आंटी, यह 500 रुपए तो आप रख लीजिए. मैं 800 रुपए से ज्यादा किराया आप को नहीं दे पाऊंगा. बाकी 300 रुपए मैं एकदो दिन में दे दूंगा. अब सामान ले आऊं?’’

500 रुपए हाथ में ले कर मीना अचंभित थी. चलो, एक किराएदार और सही. बाद में इस हिस्से को भी ठीक करा देगी तो इस का भी अच्छा किराया मिल जाएगा.

घंटे भर बाद ही वह एक रिकशे पर अपना सामान ले आया था. मीना ने देखा एक टिन का बक्सा, एक बड़ा सा पुराना बैग और एक पुरानी चादर की गठरी में कुछ सामान बंधा हुआ दिख रहा था.

‘‘ठीक है, सामान रख दो. अभी नौकरानी आती होगी तो मैं सफाई करवा दूंगी.’’

ये भी पढ़ें- जूही : आखिर जूही से क्या चाहता था आसिफ

‘‘आंटी, झाड़ू दे दीजिए. मैं खुद ही साफ कर लूंगा.’’

खैर, नौकरानी के आने के बाद थोड़ा फालतू सामान मीना ने बाहर निकलवा लिया और ढंग की मेजकुरसी उसे पढ़ाई के लिए दे दी. राघव ने भी अपना सामान जमा लिया था.

शाम को जब मीना ने दीपक से जिक्र किया तो उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘देखो, अधिक लालच मत करना. वैसे यह तुम्हारा क्षेत्र है तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा.’’ मीना को यह लड़का निखिल और सुबोध से काफी अलग लगा था. रहता भी दोनों से अलगथलग ही था जबकि तीनों एक ही क्लास में पढ़ते थे.

उस दिन शाम को बिजली चली गई तो मीना बाहर बरामदे में आ गई थी. निखिल और सुबोध बैडमिंटन खेल रहे थे. अंधेरे की वजह से राघव भी बाहर आ गया था पर दोनों ने उसे अनदेखा कर दिया. वह दूर कोने में चुपचाप खड़ा था. फिर मीना ने ही आवाज दे कर उसे पास बुलाया.

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मन तो लग गया न?’’

‘‘मन तो आंटी लगाना ही है. मां ने इतनी जिद कर के पढ़ने भेजा है, खर्चा किया है…’’

‘‘अच्छा, और कौनकौन हैं घर में?’’

‘‘बस, मां ही हैं. पिताजी तो बचपन में ही नहीं रहे. मां ने ही सिलाईबुनाई कर के पढ़ाया. मैं तो चाह रहा था कि वहीं आगे की पढ़ाई कर लूं पर मां को पता नहीं किस ने इस शहर की आईआईटी क्लास की जानकारी दे दी थी और कह दिया कि तुम्हारा बेटा पढ़ने में होशियार है, उसे भेज दो. बस, मां को जिद सवार हो गई,’’ मां की याद में उस का स्वर भर्रा गया था.

‘‘अच्छा, चलो, अब मां का सपना पूरा करो,’’ मीना के मुंह से भी निकल ही गया था. सुबोध और निखिल भी थोड़े अचंभित थे कि वह राघव से क्या बात कर रही है.

एक दिन नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘दीदी, देखो न गैराज से धुआं सा निकल रहा है.’’

‘‘धुआं…’’ मीना घबरा गई और रसोई में गैस बंद कर के वह बाहर आई. हां, धुआं तो है पर राघव क्या अंदर नहीं है.

ये भी पढ़ें- दिन के सपने: कैसा था रेशमा का मायाजाल

मीना ने जा कर देखा तो वह एक स्टोव पर कुछ बना रहा था. कैरोसिन का बत्ती वाला स्टोव धुआं कर रहा था.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

चौंक कर मीना को देखते हुए राघव बोला, ‘‘आंटी, खाना बना रहा हूं.’’

‘‘यहां तो सभी बच्चे टिफिन मंगाते हैं. तुम खाना बना रहे हो तो फिर पढ़ाई कब करोगे.’’

‘‘आंटी, अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. टिफिन महंगा पड़ता है तो सोचा कि एक समय खाना बना लूंगा. शाम को भी वही खा लूंगा. यह स्टोव भी अभी ले कर आया हूं,’’ राघव धीमे स्वर में बोला.

राघव की यह मजबूरी मीना को झकझोर गई. ‘‘देखो, तुम्हारी मां जब रुपए भेज दे तब किराया दे देना. अभी ये रुपए रखो और कल से टिफिन सिस्टम शुरू कर दो. समझे…’’

Serial Story: उल्टी पड़ी चाल- भाग 5

लेखक- एडवोकेट अमजद बेग

मैं ने तेज लहजे में कहा, ‘‘मैं हकीकत बयान कर रहा हूं काजी साहब. आप जिस मकान में रह रहे हैं, उस का असली मालिक कबीर वारसी है, जो बदकिसमती से आप जैसे धोखेबाज आदमी का रिश्ते में साला है. कबीर वारसी ने यह मकान अपनी बहन मकतूला रशीदा को रहने के लिए दिया था. फिर अचानक कबीर वारसी की मौत हो गई. क्या मैं गलत कह रहा हूं?’’

काजी के गुब्बारे की पूरी हवा निकल चुकी थी. मेरे सच ने उसे हिला कर रख दिया था. यह सब जानकारी मुझे अली मुराद की मेहनत से मिली थी. काजी की बदलती हुई हालत जज और सारे लोगों से छिपी नहीं रह सकी. उस ने संभलने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘कबीर वारसी, ने अपनी मौत से पहले मकान अपनी बहन यानी मेरी बीवी रशीदा के नाम कर दिया था.’’

‘‘और आप की कोशिश यह थी कि रशीदा अपनी मौत से पहले यह मकान आप के नाम कर दे. जब आप की बीवी ने आप की बात नहीं मानी, आप की सारी कोशिशें बेकार गई तो आप ने क्लाइंट को कुर्बानी का बकरा बना कर बीवी का पत्ता साफ कर दिया?’’

‘‘औब्जेक्शन योर औनर. वकील साहब मेरे क्लाइंट पर संगीन इलजाम लगा रहे हैं जो गलत है.’’

जज जो बहुत ही ध्यान से जिरह सुन रहा था, चौक उठा और मुझ से बोला, ‘‘बेग साहब, आप इस्तेगासा के ऐतराज पर क्या कहेंगे?’’

‘‘जनाबे आली, मैं आप को यकीन दिलाता हूं जो संगीन इलजाम मैं ने काजी वहीद पर लगाया है, मैं उसे अदालत में साबित कर के दिखाऊंगा.’’

जज ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘जिरह जारी रखी जाए.’’

‘‘योर औनर, मैं इस केस के जांच अधिकारी से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं.’’ जांच औफिसर को विटनेस बौक्स में बुलाया गया. मैं ने पूछा, ‘‘आईओ साहब, आप ने रिपोर्ट तो बहुत ऐहतियात से तैयार की होगी. मैं कुछ सवाल पूछूंगा, उस का जवाब आप हां या ना में देंगे. मकतूला रशीदा की मौत 15 अक्तूबर की रात 7 से 9 बजे के बीच हुई थी?’’

ये भी पढ़ें- वह लड़का: जाने-अनजाने जब सपने देख बैठा जतिन

‘‘जी हां.’’ आईओ ने जवाब दिया तो मैं ने पूछा, ‘‘उसे गला घोंट कर मारा गया था?’’

‘‘यस.’’

‘‘मकतूला की गरदन पर कातिल की उंगलियों के निशान नहीं मिले, जिस से यह सोचा गया कि कत्ल के वक्त कातिल ने दस्ताने पहन रखे थे?’’

‘‘यस.’’ आईओ का जवाब आया.

‘‘मकतूला की लाश की डाक्टरी जांच से पता चला कि जिस आदमी ने रशीदा का गला घोंटा था, उस ने अपने दाएं हाथ की 2 अंगुलियों में (रिंग फिंगर और मिडिल फिंगर में) हैवी अंगूठियां पहन रखी थीं. अंगुलियों के दबाव के साथ अंगूठियों के दबाव से बनने वाले निशानात मकतूला की गर्दन पर पाए गए थे?’’

‘‘जी हां.’’ आईओ ने कहा.

अंगूठियों के जिक्र पर काजी वहीद ने बेसाख्ता अपने हाथों की तरफ देखा. उस की यह हरकत मुझ से छिपी नहीं रह सकी. मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘आईओ साहब, कत्ल की रात लगभग 11 बजे जब आप ने मुल्जिम फुरकान को उस की ससुराल से गिरफ्तार किया तो क्या उस के दाएं हाथ की रिंग फिंगर और मिडिल फिंगर में आप को अंगूठियां नजर आई थीं.’’

‘‘नो.’’ आईओ ने झटके से कहा.

मैं ने एकदम काजी वहीद की तरफ मुंह कर के कहा, ‘‘काजी वहीद, तुम्हारी अंगूठियां कहां हैं?’’

‘‘म…म… मेरी अंगूठियां… मैं ने तो अंगूठियां नहीं पहनी थीं… आप किन अंगूठियों की बात कर रहे हैं?’’

‘‘वह अंगूठियां जो पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से पहले तुम्हारे दाएं हाथ की 2 अंगुलियों में मौजूद थीं और उस वक्त भी मौजूद थी, जब तुम ने अपने हाथों पर दस्ताने चढ़ा कर अपनी बीवी का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतारा था, जिन के निशान तुम्हारी अंगुलियों पर अभी भी मौजूद हैं.’’

काजी बौखला कर बोला, ‘‘आप झूठ बोल रहे हैं, बकवास कर रहे हैं.’’

‘‘काजी, मैं तुम्हारे जानने वालों में से 10 ऐसे लोगों को गवाही के लिए अदालत में ला सकता हूं जिन्होंने हादसे से पहले कई सालों से तुम्हारी अंगुलियों में चांदी की 2 हैवी अंगूठियां देखी हैं. जिन में से एक अंगूठी में 15 कैरेट का फिरोजा और दूसरी में यमन का अकीक जड़ा हुआ था.’’ मैं ने ड्रामाई अंदाज में अपनी बात खत्म की. और इसी के साथ काजी के हौसले के ताबूत में आखिरी कील ठोंक दी. ‘‘इन बैठे हुए गवाहों में ही 8-10 लोग अंगूठियों की गवाही देने को मिल जाएंगे.’’

इधर मेरी बात खत्म हुई, उधर काजी ने दोनों हाथों से सिर थाम लिया. यह मेरे इस हमले का नतीजा था जो मैं ने अंगूठियों के गवाहों के लिए कहा था. अगले ही पल वह धड़ाम से कटघरे के फर्श पर ढेर हो गया.

पिछली पेशी पर मेरे कड़े सवालात के नतीजे में काजी वहीद के गिरने ने उस का जुर्म साबित कर दिया. अदालत के हुक्म पर जब उसे पुलिस के हवाले किया गया तो उस ने इकबाले जुर्म कर लिया.

काजी की बीवी रशीदा बहुत अच्छी औरत थी. वह फुरकान को बेटा ही समझती थी. जब काजी ने फुरकान के साथ एक लाख का फ्रौड किया तो वह सख्त गुस्सा हुई. उस ने काजी को धमकी दी थी कि अगर उस ने फुरकान की रकम वापस नहीं की तो वह उस के खिलाफ फुरकान के हक में गवाह बन जाएगी.

ये भी पढ़ें- Serial Story: अनजानी डगर से मंजिल- भाग 3

काजी पहले से ही अपनी बीवी की बीमारी से बहुत तंग था और उसे ठिकाने लगाने की तरकीबे सोच रहा था. ताकि मकान पर उस का अकेले कब्जा हो जाए. रशीदा काजी की नीयत को समझ गई थी. वह अपनी जिंदगी  में किसी भी कीमत पर मकान काजी के नाम करने को राजी नहीं हुई तो काजी ने फुरकान को फंसा कर एक तीर से 2 शिकार करने का मंसूबा बना डाला.

काजी ने 15 अक्तूबर की शाम फुरकान को अपने घर बुलाया ताकि हादसे के दिन उस का वहां आना पक्का हो जाए. वह फुरकान के आने से पहले ही अपनी बीवी को गला घोंट कर मार चुका था और खुद घर के अंदर छिपा बैठा था. उस ने घर को अंदर से लौक कर दिया था ताकि फुरकान यह समझे कि घर के अंदर कोई नहीं है और वह मायूस हो कर वापस लौट जाए.

यह बताने की जरूरत नहीं है कि काजी के इकरारे जुर्म के बाद अदालत ने मेरे क्लाइंट फुरकान को बाइज्जत बरी कर दिया. साथ ही उसे एक लाख देने का भी हुक्म दिया. काजी वहीद ने एक टेढ़ी चाल चली थी, पर वह बुरे अंजाम से बच नहीं सका.

प्रस्तुति : शकीला एस. हुसैन    

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें